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पंजाब में सिर उठा रहे आतंकी संगठन

तरनतारन की घटना से सुरक्षा एजेंसियाँ हुईं चौकन्नी, आईएसआई की साज़िश

क्या कुछ ताक़तें पंजाब में आतंकवाद को फिर ज़िन्दा करने की कोशिश कर रही हैं? राज्य के तरनतारन में सरहाली थाने को 9 दिसंबर को जिस तरह रॉकेट लॉन्चर से निशाना बनाया गया और इसकी ज़िम्मेदारी प्रतिबन्धित ख़ालिस्तानी आतंकी संगठन सिख फॉर जस्टिस ने ली, उससे सुरक्षा एजेंसियाँ चौकन्नी हो गयी हैं। प्रदेश में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद राज्य की क़ानून व्यवस्था की स्थिति पर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं, और अब इस घटना से भगवंत सिंह मान सरकार को विपक्ष ने निशाने पर ले लिया है।

इस घटना में रॉकेट लॉन्चर से हमला किया गया। हालाँकि इसमें किसी की जान नहीं गयी। घटना की गम्भीरता इस बात से लग जाती है कि सरकार ने आनन-फ़ानन क्षेत्र के एसएचओ को हटा दिया और मुख्यमंत्री भगवंत मान ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से ख़ास मुलाक़ात की। मुख्यमंत्री ने गृह मंत्री के सामने पंजाब की सीमा पर फेंसिंग का मुद्दा उठाया। मान ने यह भी बताया कि पंजाब की सीमाओं को लेकर गृह मंत्री ने ज़रूरी सुझाव दिये हैं। इस घटना के बाद पंजाब और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियाँ चौकन्नी हो गयी हैं।

हाल के महीनों में पंजाब में आतंकवाद के फिर सिर उठाने की आशंका बढ़ी है। सुरक्षा एजेंसियों को मिले इनपुट्स और कुछ इंटेरसेप्ट्स इस बात का संकेत करते हैं कि एक समय लगभग ख़त्म कर दिये गये आतंकी संगठन और ख़ालिस्तानी तत्व सक्रिय और एकजुट होने के कोशिशें कर रहे हैं। इसे लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय समय-समय पर पंजाब सरकार को इनपुट्स देता रहा है।

जब यह घटना हुई, तो पंजाब के पुलिस प्रमुख गौरव यादव समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौक़े पर पहुँचे और यह जानने की कोशिश की कि क्या यह घटना विदेश से संचालित है और इसके पीछे आतंकी संगठन हैं। अभी तक जो चीज़ें सामने आयी हैं, उनसे यह ज़ाहिर हो गया है कि इसके पीछे आतंकी संगठन है। यह राकेट रात क़रीब 1:00 बजे दाग़ा गया, जो थाने के लोहे के गेट से टकराकर थाने में बने साँझ केंद्र में जा गिरा। इस घटना में थाने के इमारत में खिड़कियों के शीशे टूट गये।

यह जाँच चल ही रही थी कि पुलिस थाने पर हुए रॉकेट हमले की ज़िम्मेदारी प्रतिबन्धित ख़ालिस्तानी आतंकी संगठन सिख फॉर जस्टिस ने ले ली। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने जाँच का दायरा बड़ा करके इसकी छानबीन शुरू कर दी है। साथ ही सुरक्षा तंत्र को भी मज़बूत किया जा रहा है, ताकि ऐसी घटना का दोहराब न हो। बहुत से सुरक्षा जानकारों को लगता है कि पंजाब में नयी सरकार होने के कारण आतंकी दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

इस घटना की राजनीतिक नुक़सान को समझते हुए आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी बयान जारी करने में देरी नहीं की। उन्होंने कहा- ‘इस घटना पर कड़ी कार्रवाई होगी। जब से आप सत्ता में आयी है, पंजाब में बड़े गैंगस्टर पकड़े गये हैं। पुराने दलों के संरक्षण में काम कर रहे लोगों को पकड़ा गया है।’

इस घटना के लिए ख़ालिस्तानी संगठन के ज़िम्मा लेने से चिन्ता इसलिए पसरी है, क्योंकि अगस्त में भी पंजाब में ऐसा आतंकी हमला हो चुका है। उस समय पंजाब पुलिस के ख़ुफ़िया विभाग के मोहाली स्थित मुख्यालय पर राकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड (आरपीजी) से आतंकियों ने हमला किया था। इसके तार कनाडा में बैठे आतंकी लखबीर सिंह लांडा से साथ जुड़े थे।

मोहाली में ख़ुफ़िया विभाग के मुख्यालय पर हमले, पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला की हत्या, हिन्दू नेता सुधीर सूरी की हत्या से जुड़े इनपुट केंद्रीय एजेंसियों ने पुलिस को दिये थे। तरनतारन की इस घटना का भी अग्रिम अलर्ट दिया गया था। पिछले वर्ष 23 दिसंबर को लुधियाना के ज़िला अदालत में आइईडी ब्लास्ट हुआ था, जिसका अलर्ट 9 दिसंबर को ही ख़ुफ़िया एजेंसियों ने पुलिस को भेजा था।

याद रहे इस मामले की जाँच एनआईए कर रही है। इससे पहले जुलाई में इसी क्षेत्र में एक आतंकी को ढाई किलो आरडीएक्स और आइईडी के साथ गिरफ़्तार किया गया था। सीमावर्ती राज्य होने के कारण पंजाब में इस तरह के खतरे को लेकर सुरक्षा एजेंसियाँ हमेशा आगाह करती रही हैं।

पुलिस की लापरवाही

पंजाब में हुए आतंकी हमलों में पहले भी केएलएफ और लखबीर का नाम आता रहा है। एजेंसियों का मानना है कि लखबीर ने इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन (आईएसवाईएफ) के प्रमुख लखबीर सिंह रोडे के माध्यम से तरनतारन ज़िले में अपना नेटवर्क बनाया है। रोडे युवाओं को ख़ालिस्तान मूवमेंट से जोडऩे का काम करता रहा है। घटना के बाद पुलिस ने लखबीर के गुर्गों की तलाश में छापेमारी भी की है। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) और केंद्रीय फोरेंसिक टीम भी घटनास्थल का गहन जायज़ा ले चुकी है। आरपीजी लॉन्चर भी टीम ने क़ब्ज़ें में लिया है।

इस घटना की गाज थाना सरहाली के प्रभारी इंस्पेक्टर प्रकाश सिंह पर गिरी, जिन्हें हटा दिया गया। जानकारी के मुताबिक, उन्हें एसएसपी ने एक पत्र लिखकर थाने के बाहर संतरी पोस्ट बनाने की हिदायत दी थी; लेकिन उन्होंने इस निर्देश का पालन नहीं किया। न ही वहाँ लगे सीसीटीवी कैमरे ठीक कराये, जो काफ़ी दिन से ख़राब चल रहे थे।

अभी तक की जाँच से ज़ाहिर होता है कि आतंकियों ने थाने के सामने से गुज़रते जम्मू-राजस्थान नेशनल हाईवे के किनारे लगे बिजली के खम्भे के सहारे खड़े होकर यह आरपीजी दाग़ा था। यहाँ से थाना सिर्फ़ 20 मीटर दूर है। लेकिन आरपीजी का निशाना चूक गया और यह थाने के मुख्य गेट की ग्रिल से टकराकर सांझ केंद्र की दीवार से जा टकराया। अन्यथा जानी नुक़सान भी हो सकता था।

आतंकी घटना के बाद गाँव खारा से फ़तेहाबाद मार्ग या चोहला साहिब जाने वाली सडक़ से भागे। पुलिस टीम ने सरहाली से हरीके पत्तन के बीच क़रीब 80 सीसीटीवी कैमरों को खँगाला। वहाँ आठ मोबाइल टॉवरों के डंप की भी जाँच की गयी।

आईएसआई के तार

रॉकेट से हमले की यह घटना पाकिस्तान सीमा से महज़ 40 किलोमीटर दूर सरहाली पुलिस थाने हुई। इसमें रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड (आरपीजी) हमला किया गया। इसके पीछे ख़ालिस्तान लिबरेशन फोर्स (केएलएफ) के आतंकी लखबीर सिंह का हाथ सामने आया था। भारतीय एजेंसियों को मिले इनपुट्स से ज़ाहिर होता है कि आईएसआई ने कनाडा में रह रहे लखबीर को पंजाब में गड़बड़ी का ज़िम्मा दिया है। सीमा पार से ड्रोन के माध्यम से आरपीजी यहाँ भेजे गये हैं। ‘तहलका’ की जानकारी बताती है कि तीन आरपीजी भेजे गये थे, जिनमें दो अभी भी आतंकियों के स्लीपर सेल्स के पास हैं। लिहाज़ा सुरक्षा एजेंसियाँ और पुलिस चौकन्नी है।

जिस इलाक़े में यह घटना हुई है, वह आतंकी हरविंदर सिंह उर्फ़ रिंदा का पैतृक गाँव है। पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई से रिंदा के सम्पर्क की जानकारी एजेंसियों को रही है। पाकिस्तान में अब नया सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर अहमद के आने के बाद जम्मू-कश्मीर और पंजाब में आतंकी घटनाओं को तेज़ी देने की कोशिश हो सकती है। आईएसआई ख़ालिस्तान समर्थक आतंकियों को हाल के वर्षों में सक्रिय करने की कोशिश करती रही है।

भारत की सुरक्षा एजेंसियों को इस बात की जानकारी है कि नवंबर के आख़िरी सप्ताह में बब्बर खालसा इंटरनेशनल की एक बैठक हुई थी। बीच में रिन्दा की मौत हो जाने की अफ़वाहें भी उठीं थीं। हालाँकि सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि वह ज़िन्दा है। ख़ुफ़िया दस्तावेज़ों के मुताबिक, ख़ुद बब्बर खालसा इंटरनेशनल के कमांडरों ने कहा है कि रिंदा मरा नहीं है।

“शुरुआती जाँच में ख़ुलासा हुआ है कि आरपीजी का इस्तेमाल कर हाईवे से ग्रेनेड दाग़ा गया। यूएपीए के तहत एफआईआर दर्ज की गयी है। यह पड़ोसी देश की एक रणनीति है कि वह भारत को नुक़सान करे। बीएसएफ और केंद्रीय एजेंसियों के साथ मिलकर पंजाब पुलिस घटना की जाँच कर रही है।’’

गौरव यादव

डीजीपी, पंजाब

मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता का प्रश्न

शिवेंद्र राणा

मानवाधिकार वो मौलिक एवं अपरिहार्य (इनेलिएवल) अधिकार हैं, जो मानव जीवन के लिए आवश्यक हैं। ये अधिकार प्रकृति प्रदत्त हैं और प्रत्येक मनुष्य के लिए हैं। केवल इसलिए कि वह मनुष्य है, चाहे वह किसी भी नस्ल या प्रजाति, धर्म या पन्थ, राष्ट्र या महाद्वीप या लिंग का हो।  इसी 10 दिसंबर को ऐतिहासिक यथार्थता की परिणीति दिवस के रूप में मानवाधिकार भारत समेत पूरे विश्व में मनाया गया। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् कराहती मानवता को नियमावली का संबल देते हुए सयुंक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 10 दिसंबर, 1948 को मानवीय अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को स्वीकार किया गया था।

भारतीय संविधान में इस सार्वभौमिक घोषणा के स्पष्ट प्रभाव को सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया है। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद (1973) में तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति ने कहा था कि मैं यह धारित करने में असमर्थ हूँ कि ये अधिकार नैसर्गिक या असंक्रमणीय नहीं हैं। वास्तव में भारत मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा का पक्षकार था तथा उक्त घोषणा कुछ मौलिक अधिकारों को और असंक्रमणीय वर्णित करती है। पुन: चेयरमैन रेलवे बोर्ड तथा अन्य बनाम श्रीमती चंद्रिका दास वाद (2000) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंगीकृत प्रसंविदा है तथा घोषणाओं पर हस्ताक्षर करने वाले देशों द्वारा इसका आदर किया जाना चाहिए तथा इन घोषणाओं तथा प्रसंविधान में शब्दों को दिये गये अर्थ का ऐसा लगाया जाना चाहिए, जिससे इन अधिकारों का प्रभावशाली ढंग से कार्यान्वयन किया जा सके। भारतीय संविधान का भाग के भाग-3 में अनुच्छेद-12 से 35 तक छ: प्रकार के मौलिक अधिकारों का विवरण है। इनमें समता का अधिकार (अनु.14-18), स्वतंत्रता का अधिकार (अनु.19-22), शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनु.23-24), धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28), संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (अनुच्छेद 29-30), सांविधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)। इस भाग को ‘भारत के मैग्नाकार्टा’ के रूप में सम्बोधित किया जाता है।

मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के पश्चात् भारतीय संविधान में मूल अधिकारों का समावेश किया जाना, विश्व के अन्य देशों की समकालीन लोकतंत्रात्मक तथा मानवीय वृत्ति और संवैधानिक प्रथा के अनुरूप ही था। भारतीय संविधान सभा की सार्वभौम घोषणा द्वारा मानवाधिकार प्रतिपादित मानवीय गरिमा को समर्थित, बुनियादी सिद्धांतों को प्रतिष्ठित, आत्मार्पित एवं क्रियान्वित करने के लिए कटिबद्ध थे। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान ही भारतीय नेतृत्व वर्ग मानवाधिकारों को एक आकार देने का प्रयास कर रहा था। जैसे सन् 1918 में कांग्रेस के बम्बई अधिवेशन सर्वप्रथम मूल अधिकारों की माँग की गयी थी। तत्पश्चात् भारत के राज्य-संघ विधेयक (1925) में विधि के समक्ष समता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, इच्छानुरूप धार्मिक पालन जैसे अधिकारों की घोषणा की गयी। वहीं सन् 1927 के मद्रास अधिवेशन में पुन: मूल अधिकारों की माँग करते हुए प्रस्ताव पारित किया गया। सन् 1928 के नेहरू समिति की रिपोर्ट में मूल मानवाधिकारों की प्राप्ति को भारतीय जनता का सर्वोपरि लक्ष्य घोषित किया गया था।

ध्यातव्य है कि नेहरू रिपोर्ट में शामिल 19 मूल अधिकारों में 10 को भारतीय संविधान में यथावत् सम्मिलित कर लिया गया। पुन: सन् 1930 में घोषित प्रस्ताव में जिन सामाजिक-आर्थिक अधिकारों पर चर्चा हुई, उनमें अनेक को संविधान के नीति निदेशक तत्त्वों में शामिल किया गया।

सन् 1931 के कराची अधिवेशन में पारित प्रस्ताव में मूल अधिकारों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया। अत: भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के प्रति कटिबद्धता इतिहास की एक स्वाभाविक यात्रा जो निर्बाध गतिशील रहीं है। 16 दिसंबर,1966 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय सन्धि स्वीकृत की गयी, जिसे 10 अप्रैल, 1979 को भारत सरकार ने सहमति प्रदान की।

पुन: अक्टूबर, 1991 में मानवाधिकारों के संरक्षण और उनके लिए जागरूकता प्रसार हेतु आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान पेरिस सिद्धांत अंगीकृत किये गये, जिनकी पुष्टि संयुक्त महासभा द्वारा 20 दिसंबर, 1993 को की गयी। तब इसी अनुरूप भारत ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन एक सांविधिक निकाय के रूप में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम-1993 के अंतर्गत किया। यह देश में मानवाधिकारों का प्रहरी है। यह उन सभी मूलभूत अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, जो अंतरराष्ट्रीय सन्धियों द्वारा घोषित अथवा भारतीय संविधान द्वारा सुनिश्चित एवं न्यायपालिका द्वारा अधिरोपित किये गये हैं। आयोग का चरित्र न्यायिक है। इसे सिविल न्यायालय जैसे अधिकार तथा शक्तियाँ प्राप्त हैं। उपरोक्त अधिनियम के आलोक में ऐसे ही आयोग की स्थापना सभी राज्यों में भी की गयी है।

भारत में मानवाधिकारों का उन्नयन उनके विकास की यात्रा न्यायिक सक्रियता के बिना सम्भव नहीं थी। न्यायपालिका ने समय-समय पर अपने निर्णयों द्वारा मानवाधिकार के क्षेत्र प्रसारित और सामाजिक एवं राजनीतिक दृष्टि से प्रतिष्ठित किया। जैसे, एकांत कारावास के विरुद्ध अधिकार (सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन, 1978), गोपनीयता का अधिकार (खडक़ सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1964), बेडिय़ों के विरुद्ध अधिकार ( चाल्र्स शोभराज बनाम दिल्ली प्रशासन, 1978), फाँसी के दण्ड विलंबन के विरुद्ध अधिकार (टी. वशीश्वरन बनाम तमिलनाडु राज्य,1983), शीघ्र परीक्षण का अधिकार (हुसैन आरा ख़ातून बनाम गृह सचिव बिहार राज्य, 1980), हिरासत में होने वाली हिंसा के विरुद्ध अधिकार (शीला बार्से बना महाराष्ट्र राज्य,1983) इत्यादि।

भारत में मानवाधिकारों की प्रतिष्ठा स्थापित करने में न्यायपालिका ने विशेष सक्रियता दिखायी है। इस समय पाकिस्तान का ट्रांसजेंडर समुदाय अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सडक़ों पर है। पाकिस्तानी संसद ने ट्रांसजेंडर्स को उनका क़ानूनी हक़ दिलाने के लिए सन् 2018 में एक विधेयक पारित किया था। लेकिन वहां का रूढि़वादी राजनीतिक-धार्मिक वर्ग इस आधार पर इसका विरोध है कि इससे पश्चिमी तौर-तरीक़ों और समलैंगिकता को बढ़ावा मिलता है।

इस क़ानून पर संकट देख ट्रांसजेंडर्स समुदाय आन्दोलनरत है, जबकि भारतीय राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) बनाम भारत सरकार (2014) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर समुदाय को तृतीय लिंग घोषित किया एवं नवतेज सिंह बनाम भारत संघ मामले में (2018) समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए भारतीय दण्ड संहिता की धारा-377 को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया। रणजीत सिंह ब्रह्मजीत सिंह बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले (2005) में सर्वोच्च न्यायालय ने मानवाधिकारों को एक बड़ा आयाम दिया। अपने निर्णय में उसने दलितों के सामाजिक बहिष्कार, महिलाओं के साथ अन्याय, पर्यावरणीय अपकर्ष, प्रदूषण, कुपोषण को मानवाधिकारों के उल्लंघन के विविध स्वरूप माना है।

हालाँकि मानवाधिकारों में विशेष पक्ष है- सुरक्षा बलों अर्थात् सेना, अर्ध-सेना और पुलिस के जवानों का, जिस पर गम्भीरतापूर्वक विचार नहीं किया गया है। यह एक गम्भीर प्रश्न है कि क्या एक लोकततांत्रिक देश में मानवीय गरिमा को संरक्षित करते मूल अधिकार भी चयनित तरीक़े से प्रभाव में होने चाहिए? क्या आम जनता को मिलने वाले मानवाधिकार का कवच सुरक्षा बलों एवं पुलिस तक विस्तारित नहीं होना चाहिए? क्या इन्हें राष्ट्र में इंसान नहीं समझा जाता? क्या इन्हें तकलीफ़ नहीं होती क्या इनकी भावनाएँ आहत नहीं होतीं? यह प्रश्न भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के देशों के लिए विचारणीय होना चाहिए। लोकततांत्रिक देशों के लिए तो यह मुद्दा अति आवश्यक हो कि क्या अपने आम नागरिकों के गरिमामय जीवन की अधिकारिता के नाम पर सुरक्षा बलों और पुलिसवालों के साथ ही उनके परिवारों की पीड़ा और कष्टों को अनदेखा किया जा रहा है?

इसे विमर्श को कुछ प्रतिमानों से समझा जा सकता है। उदाहरणस्वरूप, मानवाधिकारवादियों के विशेष निशाने पर रहने वाला सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून (अफस्पा), जिसे सन् 1947 में चार अध्यादेशों के माध्यम से जारी किया गया था, तथा सन् 1948 में एक अधिनियम द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था। प्रारम्भ में इसे सशस्त्र बल (असम और मणिपुर) विशेष अधिकार अधिनियम-1958 के रूप में जाना जाता था।

नगा विद्रोह से निपटने के लिए यह क़ानून पहली बार सन् 1958 में लागू हुआ था। यह सशस्त्र बलों को बिना समन (वारंट) के परिसर में प्रवेश करने, तलाशी लेने और गिरफ़्तारी करने की कार्यकारी शक्तियाँ जैसे कई विशेष अधिकार देता है। इन असाधारण शक्तियों के प्रयोग से प्राय: अशान्त इलाक़ों में सुरक्षा बलों पर फ़र्ज़ी मुठभेड़ों और अन्य मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं। जीवन रेड्डी समिति (2004) एवं दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग (2005) ने इसे निरस्त करने की सिफ़ारिश भी की। हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय (नगा पीपुल्स मूवमेंट ऑफ ह्यूमन राइट्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, 1998) में अफस्पा की संवैधानिकता को बरक़रार रखते हुए कुछ बिन्दुओं पर सुधार के लिए निर्देशित किया। यह कही-न-कही उन अंतर्निहित मुद्दों पर गम्भीर विमर्श की आवश्यकता को प्रदर्शित करता है, जो सतही तौर पर नहीं दिखते।

अफस्पा का अस्तित्व पूर्वोत्तर के राष्ट्र के लिए विघटनकारी विद्रोह पर ही आधारित है। जहाँ विद्रोही पक्ष की हिंसा नैतिकता के सारे प्रतिमान ध्वस्त कर दे, वहाँ सैन्य बलों की दृढ़ कार्रवाई एक सामान्य प्रतिक्रिया बन जाती है और इस दौरान मानवाधिकारों की अवहेलना से इनकार नहीं किया जा सकता और आत्मरक्षा का अधिकार किसी भी मानव का प्रकृति प्रदत्त सबसे प्रमुख नैसर्गिक अधिकार है। किन्तु यह परिस्थिति विशेष पर निर्भर करता है। साथ ही एकपक्षीय भी नहीं होता। संसद में नगा विद्रोह पर हुई बहस के दौरान अगस्त, 1956 में लोकसभा में नगा विद्रोह पर हुई बहस के दौरान थांगकुल नागा समुदाय से आने वाले पूर्वोत्तर के समाजवादी सांसद रिसांग किसींग ने कहा था- ‘जबसे दोनों पक्षों द्वारा क्रूर तौर-तरीक़ों का अपनाया जाना शुरू हुआ है, तबसे बेदाग़ रिकॉर्ड का दावा कौन कर सकता है? पहला पत्थर वही फेंक सकता है, जिसने कभी भी पाप न किया हो। मैं यह सवाल नागा विद्रोहियों और सरकार दोनों ही से पूछता हूँ।’

स्वयं प्रधानमंत्री नेहरू ने सेना की तरफ़ से की गयी कठोर कार्यवाहियों को स्वीकार किया, परन्तु विद्रोही द्वारा की गयी सेना के जवानों की क्रूर हत्याओं की भत्र्सना तभी की थी। अत: अधिकार, जो गरिमामय मानव जीवन की प्राथमिक आवश्यकता हैं; सर्वसुलभ होने चाहिए। इससे सम्बन्धित एक प्रयास फरवरी, 2019 में हुआ, जब उच्चतम न्यायालय ड्यूटी के दौरान भीड़ के हमलों का शिकार होने वाले सुरक्षा बलों के जवानों के मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए दायर याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया एवं केंद्र सरकार, रक्षा मंत्रालय, जम्मू-कश्मीर और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को नोटिस जारी किया। यह पहल तब हुई, जब दो सैन्य अधिकारियों की पुत्रियों ने इस सम्बन्ध में याचिका दायर कर माँग की कि ड्यूटी के दौरान उन्मादी भीड़ के हमलों का शिकार होने वाले सुरक्षा बलों के जवानों के मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए एक नीति तैयार की जानी चाहिए। कहना था कि वह जम्मू-कश्मीर में सैनिकों और सेना के क़ाफ़िलों पर उग्र और विघटनकारी भीड़ के हमलों की घटनाओं से काफ़ी विचलित हैं।

यह मुद्दा तार्किक एवं विचारणीय है। मानवाधिकार सिर्फ़ आम जनता के लिए ही क्यों हो? उन सशस्त्र बलों के जवानों के लिए क्यों नहीं, जिन्हें बस्तर और दंतेवाड़ा में निर्ममता से मार डाला गया, जिन पर कश्मीर में जानवरों की तरह पत्थर और गोलियाँ बरसती हैं। उन सैनिकों के लिए क्यों नहीं, जो घाटी एवं पूर्वोत्तर में राष्ट्रद्रोहियों के हाथों अपनी जान गवाँ रहे हैं, जिनके सीमा पर सिर काटे जा रहे हैं?

क्या वर्दी पहने राष्ट्र की सुरक्षा एवं क़ानून-व्यवस्था की ज़िम्मेदारी उठाने वाले लोगों की गणना इंसानी बिरादरी के बजाय यांत्रिक वस्तुओं में की जानी चाहिए, जिन्हें गरिमामय मानवीय जीवन हेतु आवश्यक मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा जाना चाहिए। वे जो अपने राष्ट्र की सुरक्षा और अपने परिवारों के भरण-पोषण के लिए जान हथेली पर लिए खड़े सुरक्षा बलों के लिए भी बहुत नहीं, परन्तु थोड़े मानवाधिकार होने चाहिए। वैसे भी सेना और अर्धसैनिक बलों में सेवा देने वाले समाज के सम्भ्रांत और उच्च वर्गों के नहीं बल्कि ग्रामीण इलाक़े के ग़रीब किसान मज़दूरों के बेटे-बेटियाँ ही होते हैं, जिनके प्रति इतना भावनात्मक लगाव देश रख ही सकता है।

पुलिस विभाग को ही लें, जहाँ कर्तव्य भार (ड्यूटी) की कोई निर्धारित समय सीमा नहीं है। एक पुलिसकर्मी से अनवरत 24 घंटे ड्यूटी की अपेक्षा होती है। एक पुलिसकर्मी 15-16 घंटे की ड्यूटी के बाद भी अपने अधिकारी के आदेश की अवहेलना नहीं कर सकता, क्योंकि इसे अनुशासनहीनता माना जाता है। ऐसी अमानवीयता पूर्ण कर्तव्य पालन (ड्यूटी) के पश्चात् किसी व्यक्ति से मानवीय व्यवहार की उम्मीद कैसे की जा सकती है अर्थात् जो स्वयं अमानवीयता का शिकार हैं, उनसे मानवीयता की अपेक्षा मानवाधिकार तो छोडि़ए, उनके सामान्य अधिकारों का भी देश में सम्मान नहीं हो रहा। पुलिस सुधार की प्रक्रिया वर्षों से ठण्डे बस्ते में है। वही सस्ते की क़िस्म की लोकप्रियता के लिए एक वर्ग सेना को अपमानित करने तथा उसका मनोबल कमज़ोर करने में लगा है।

आश्चर्यजनक है कि पशु अधिकारों के लिए तख़्तियाँ लहराते हुए सडक़ों पर आन्दोलन करने वाला देश का प्रगतिशील वर्ग शहीद सुरक्षा बलों एवं पुलिसवालों के परिवारों के मानवाधिकारों पर चर्चा तक करने को तैयार नहीं है। आतंकवादियों, अपराधियों के हाथों शहीद होने वाले सुरक्षा बलों के जवानों की शव-यात्रा में इन मानवाधिकार के मसीहा वर्ग को पहुँचकर उनके लिए भी थोड़ी बहुत तकरीरें करनी चाहिए। साथ ही वे जो सत्ता में बैठकर राष्ट्रवाद का ज्ञान दे रहें हैं, उनका भी बयानबाज़ी से इतर सुधार का कोई गम्भीर संगठित प्रयास नहीं दिखता। इन्हें इसकी भी समझ होनी चाहिए कि उत्तेजक राष्ट्रवाद की उद्घोषणा अंतत: समस्या ही पैदा करती है। बेहतर होता कि मानवाधिकार पर एक गम्भीर नीति का प्रणयन हो, ताकि भविष्य में राष्ट्र के राजनीतिक-सामाजिक वातावरण में अशान्ति का प्रसार रोका जा सके।

(लेखक राजनीति व इतिहास के जानकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

पॉक्सो के बावजूद त्वरित न्याय नहीं

किसी भी क़ानून का मूल्यांकन करने के लिए एक दशक यानी 10 साल का वक़्त पर्याप्त होता है। देश में 10 साल पहले बच्चों को यौन शोषण सम्बन्धित अपराधों के मामलों में जल्दी न्याय दिलाने के लिए पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस) अधिनियम-2012 लागू हुआ। इस अधिनियम के तहत 18 साल से कम आयु के बच्चों को यौन अपराधों, यौन शोषण, अश्लील सामग्री से सुरक्षा देने और उसके हितों की रक्षा के लिए लाया गया। इस क़ानून के ज़रिये नाबालिग़ बच्चे के प्रति होने वाले ऐसे अपराधों के मामलों में कार्रवाई की जाती है। क़ानून के अनुसार, ऐसे मामलों के निपटारे केस दर्ज होने की तारीख़ से एक साल के भीतर निपटा देने चाहिए, ताकि पीडि़त बच्चे को त्वरित इंसाफ़ मिल सके। लेकिन क्या ऐसा हो रहा है?

सवाल कई हैं। मसलन, क़ानून क्या कहता है और ज़मीनी स्तर पर इसका अमल कितने फ़ीसदी हो रहा है? न्याय न होने के क्या कारण हैं? क्या सरकार ने न्यायिक व्यवस्था का संगठनात्मक ढाँचा उतना मज़बूत व समर्थ बना दिया है, जो त्वरित इंसाफ़ के लिए ज़रूरी है? इस सन्दर्भ में हक़ीक़त क्या है? इसका विश्लेषण हाल ही में जारी स्वतंत्र थिंक टैंक ‘विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी’ की पहल ‘जस्टिस एक्सेस एंड लॉवरिंग डीलेज इन इंडिया’ की रिपोर्ट ‘पॉक्सो का एक दशक’ में किया गया है। यह रिपोर्ट बताती है कि यौन शोषण के मामलों में सज़ा पाने वाले दोषियों से तीन गुणा ज़्यादा संख्या बरी होने वालों की है। अर्थात् किसी एक मामले में आरोपी दोषी पाया जाता है, तो तीन मामलों में आरोपी बरी हो रहे हैं। सन् 2016 में 60 फ़ीसदी ऐसे मामले एक साल में निपटाये गये; लेकिन अब 20 फ़ीसदी भी नहीं निपट रहे। देश में आंध्र प्रदेश ऐसा राज्य है, जहाँ बाल यौन शोषण के अपराधी सबसे अधिक बरी हो रहे हैं और केरल में सबसे कम। यह हक़ीक़त काफ़ी चिन्ताजनक और सरकारों व न्याय प्रणाली के लिए शर्मनाक स्थिति से रू-ब-रू कराती है।

विश्व बैंक के डाटा ‘एविडेंस फॉर जस्टिस रिफॉर्मर्स’ कार्यक्रम के सहयोग से यह अध्ययन किया गया है। इस रिपोर्ट में नवंबर, 2012 से लेकर फरवरी, 2021 तक की अवधि देश के 28 राज्यों के 468 ज़िलों के सर्वे का अध्ययन किया गया है। अध्ययन के दौरान लगभग चार लाख पॉक्सो मामलों से सम्बन्धित आँकड़े इकट्ठे किये गये और लम्बित मामलों व निपटाये जा चुके मामलों का पैटर्न समझने के लिए 2.31 लाख मामलों का विश्लेषण किया गया। आँकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक मामले लम्बित हैं। उत्तर प्रदेश में नंवबर, 2012 से लेकर फरवरी, 2021 के बीच पॉक्सो के तहत जितने मामले दर्ज किये गये उनमें से तीन-चौथाई यानी 77.77 फ़ीसदी मामले लम्बित हैं। उत्तर प्रदेश के बाद पश्चिम बंगाल में 74.6 फ़ीसदी मामले लम्बित हैं, तो बिहार में 67.6 फ़ीसदी मामले अभी तक लटके हुए हैं। वहीं महाराष्ट्र में 60.2 फ़ीसदी, गुजरात में 51.5 फ़ीसदी, कर्नाटक में 45.5 फ़ीसदी, हरियाणा में 41.4 फ़ीसदी, झारखण्ड में 38.6 फ़ीसदी, पंजाब में 36 फ़ीसदी, चंडीगढ़ में 35 फ़ीसदी, आंध्र प्रदेश में 33.5 फ़ीसदी, राजस्थान में 24.9 फ़ीसदी और तमिलनाडु में 19.7 फ़ीसदी पॉक्सो के मामले लम्बित हैं।

हालाँकि तमिलनाडु में अध्ययन की अवधि के दौरान जितने मामले दर्ज किये गये, उनमें से 80.2 फ़ीसदी मामलों का निपटारा कर दिया गया और रिपोर्ट लिखे जाने तक 19.7 फ़ीसदी मामले ही लम्बित बचे थे। ‘पॉक्सो एक दशक’ नामक इस अध्ययन में कहा गया है कि पॉक्सो के तहत किसी एक मामले में दोषी साबित हुआ, तो तीन मामलों में आरोपी को बरी कर दिया गया। दोषसिद्धि की तुलना में बरी किये जाने की दर काफ़ी अधिक रही।

यह अध्ययन इस बात का भी $खुलासा करता है कि आंध्र प्रदेश में पॉक्सो अधिनियम के तहत सबसे अधिक आरोपी बरी हो रहे हैं। अर्थात् बरी होने वाले आरोपियों का औसत दोषी ठहराये जाने वाले आरोपियों से सात गुना अधिक है। उसके बाद पश्चिम बंगाल है, जहाँ यह औसत पाँच गुना अधिक है। केरल इकलौता ऐसा राज्य है, जहाँ यह अन्तर बहुत कम है। केरल में 16.49 फ़ीसदी मामलों में दोषी साबित हुआ, तो 20.5 फ़ीसदी मामलों में अपराधी छूट गये यानी उनका अपराध साबित नहीं हो सका। कुल मिलाकर यह अध्ययन इस पर रोशनी डालता है कि कुल मामलों में से महज़ 14 फ़ीसदी मामलों में आरोपी दोषी ठहराये गये, जबकि 43 फ़ीसदी मामलों में आरोपी सुबूतों के अभावों या अन्य क़ानूनी पेचीदगियों के चलते बरी हो गये। वहीं 43 फ़ीसदी मामले लम्बित हैं या दूसरी अदालतों में स्थानांतरित कर दिये गये।

भारत में एनजीओ की भरमार

 समाज सेवा के नाम पर करोड़ों रुपये की मदद लेकर लाखों एनजीओ खा रहे मेवा

 देश में 32 लाख एनजीओ होने का मतलब है, 438 लोगों पर एक एनजीओ

समाज सेवा और दबे-कुचले तबक़ों को न्याय दिलाने के नाम पर बने नॉन गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशन (एनजीओ) यानी ग़ैर-सरकारी संगठनों की आज दुनिया भर में भरमार है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में तक़रीबन 32 लाख से भी ज़्यादा एनजीओ और लाखों समाजसेवी संगठन हैं। इन एनजीओ की नींव सन् 1945 से पडऩी शुरू हुई। सन् 1945 में ही संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद-71 में एनजीओ को परिभाषित किया गया है। भारत में जितने एनजीओ हैं, उनमें 22,762 एनजीओ एफसीआरए से पंजीकृत हैं, जिनमें  31 दिसंबर 2021 से 31 दिसंबर 2022 तक के लिए सिर्फ़ 16,829 एनजीओ के लाइसेंसों को नवीनीकृत किया गया है।

हालाँकि एनसीओ की निश्चित और औपचारिक परिभाषा नहीं है और इन्हें सरकारी प्रभाव से स्वतंत्र ग़ैर-सरकारी संस्थाओं के रूप में पारिभाषित किया जाता है; लेकिन फिर भी एनजीओ सरकारी धन प्राप्त कर रहे हैं। इतना ही नहीं, इन एनजीओ को दानदाताओं से भी जमकर मदद मिलती है। आज देश के जितने भी एनजीओ हैं, उनमें से अधिकतर सरकारी और ग़ैर-सरकारी वित्त पोषित हैं। लेकिन दुर्भाग्य से इनमें से ज़्यादातर एनजीओ समाज सेवा और निचले तबक़ों की मदद के नाम पर सिर्फ़ ख़ानापूर्ति करके मोटी कमायी करने में लगे हैं। लेकिन इसके लिए सिर्फ़ एनजीओ ज़िम्मेदार नहीं है, बल्कि सरकार में बैठे मंत्री और एनजीओ को फंड जारी करने वाले सरकारी अधिकारी व कर्मचारी भी बराबर के दोषी हैं, जो रिश्वत, शराब और अय्याशी के लिए बिक जाते हैं।

सोचिए, आज की तारीख़ में देश में तक़रीबन हर 438 लोगों पर एक एनजीओ है, इसके बावाजूद न तो समाज में कोई सुधार हो रहा है और न ही सशक्तिकरण। इन एनजीओ की काम करने प्रकृति अलग-अलग होती है, जिसके तहत कोई ग़रीब बच्चों की शिक्षा के लिए चलाया जा रहा है, कोई दबे-कुचले लोगों को न्याय दिलाने के नाम पर चलाया जा रहा है, कोई एनजीओ महिलाओं को न्याय दिलाने और उनके सशक्तिकरण के लिए चलाया जा रहा है, कोई नशा मुक्ति के लिए चलाया जा रहा है, तो कोई एनजीओ समाज में एकता के लिए चलाया जा रहा है। लेकिन बहुत कम एनजीओ ही ऐसे हैं, जो अपने काम को ठीक से अंजाम दे रहे हैं। इसके बाद भी उनके काम के तरीक़े और एनजीओ मालिकों की ईमानदारी को देखे बग़ैर हर साल करोड़ों का सरकारी फंड इन एनजीओ को आँख मूँदकर जारी कर दिया जाता है। कई लाख एनजीओ सरकार और सरकारी ठेकेदारों से मिलकर करोड़ों रुपये डकार रहे हैं और आज भी समाज के उस तबक़े के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं, जिसके नाम पर यह मोटा फंड हड़प रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि इन एनजीओ की जाँच करने को कोई राज़ी नहीं है।

देश के उद्धार के नाम से लगातार बढ़ते इन एनजीओ को मानव कल्याण की जगह अगर मानव विनाश का कारण कहा जाए, तो ग़लत नहीं होगा। पिछले समय में सीबीआई ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत एनजीओ के आँकड़े जमा करने को कहा था; लेकिन इस पर राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों की लापरवाही साफ़ देखने को मिली। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई को देश के अन्दर काम कर रहे एनजीओ की जाँच करते हुए उनकी संख्या बताने को कहा था।

सन् 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई से कहा था कि वह जाँच करे कि देश में चल रहे एनजीओ बैलेंस शीट फाइल कर रहे हैं या नहीं, उनकी आय कितनी है? उनका कामकाज कैसा है? और वे एनजीओ के लिए ज़रूरी सभी नियमों का पालन करते हैं या नहीं? इसके बाद सीबीआई द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में जमा हलफ़नामे में बताया था कि देश के 26 राज्यों में 31 लाख और सात केंद्र शासित प्रदेशों में 82,000 एनजीओ पंजीकृत हैं। जबकि तीन राज्यों- कर्नाटक, ओडिशा और तेलंगाना सरकारों ने अपने राज्यों में पंजीकृत एनजीओ की कोई जानकारी नहीं दी थी। उस समय की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले उत्तर प्रदेश में 5,48,000 एनजीओ हैं, जो देश के दूसरे प्रदेशों में सबसे ज़्यादा है। दूसरे सबसे ज़्यादा एनजीओ महाराष्ट्र में हैं, जिनकी संख्या 5,18,000 है। वहीं केरल में 3,70,000, पश्चिम बंगाल में 2,34,000, दिल्ली में 76,000 से ज़्यादा एनजीओ पंजीकृत हैं।

सीबीआई के दबाव के बावजूद देश के सभी एनजीओ में से सिर्फ़ 10 फ़ीसदी एनजीओ ने ही रजिस्ट्रार ऑफ सोसायटी में बैलेंस शीट जमा की और अपना रिकॉर्ड जमा कराया है। फिर क्यों न बाक़ी 90 फ़ीसदी एनजीओ की जाँच की जाए और उन्हें बन्द किया जाए? लेकिन यह काम इसलिए आसान नहीं है, क्योंकि ज़्यादातर एनजीओ नेताओं, मंत्रियों और उनके चहेतों के हैं। यही कारण है कि लेन-देन और काम के मामले में देश के ज़्यादातर एनजीओ पारदर्शिता नहीं रखते हैं।

लेकिन कुछ एनजीओ देश में इतना अच्छा काम कर रहे हैं, जिन्होंने मिसाल पेश की हुई है। इनमें से कई एनजीओ को कई-कई बार सम्मान मिल चुका है। कोरोना-काल में मरीज़ों की मदद के लिए बना डॉक्टर्स फॉर यू नाम का एनजीओ अच्छा काम कर रहा है। इसके अलावा सन् 2002 में बना स्माइल फाउंडेशन निर्धन और साधनहीन बच्चों की शिक्षा के लिए अच्छा काम कर रहा है। इस एनजीओ ने ग़रीब तबक़े के बच्चों की शिक्षा, रोज़गार, ग़रीब परिवारों के स्वास्थ्य और ग़रीब महिलाओं के सशक्तिकरण पर काफ़ी काम किया है। कई पुरस्कार जीतने वाली डॉक्यूमेन्ट्री ‘आई एम कलाम’ भी स्माइल फाउंडेशन से सहायता पाने वाले बच्चों पर ही बनायी गयी थी।

वहीं नन्हीं कली नाम के एनजीओ की स्थापना सन् 1996 में आनंद महिंद्रा ने की थी। आज यह एनजीओ बेटियों की शिक्षा को लेकर काफ़ी बड़े स्तर पर काम कर रहा है। नन्हीं कली में 21 अन्य एनजीओ काम कर रहे हैं। नन्हीं कली का हर साल तक़रीबन 1,00,000 बच्चियों को शिक्षित करने का लक्ष्य रहता है। गिव इंडिया फाउंडेशन भी 200 से ज़्यादा भारतीय एनजीओ के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन डोनेशन प्लेटफॉर्म की तरह काम करता है। यह एनजीओ अपने दान किये पैसों की पारदर्शिता और विश्वसनीयता के लिए प्रसिद्ध है, जो ज्वॉय ऑफ गिविंग वीक नाम से नेशनल मीडिया इवेंट करके फंड इकट्ठा करके दान के रास्ते तैयार करता है। गूँज नाम का एनजीओ एक अच्छा काम करने वाला भारतीय एनजीओ है। गूँज को फोब्र्स मैगजीन में भारत के सबसे शक्तिशाली ग्रामीण उद्यमी संगठन के रूप में सूचीबद्ध किया जा चुका है। यह एनजीओ भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोज़गार को बढ़ावा देने के लिए काम करता है। इसका वस्त्र सम्मान कार्यक्रम काफ़ी मशहूर है। इसके अलावा गूँज एनजीओ शहरों से कपड़े, किताबें और अन्य चीज़ें एकत्रित करके गाँव के ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँचाता है।

वहीं साल 1978 में हेल्पएज इंडिया नाम के एनजीओ की नींव रखी गयी। आज यह एनजीओ भारत के ग़रीब, असहाय और अकेले रहने वाले बुजुर्गों के कल्याण के लिए काम करता है।

सवाल यह है कि हर साल विश्व एनजीओ दिवस मनाया जाता है; लेकिन इस समय किसी भी एनजीओ से उसके कामकाज का ब्योरा नहीं माँगा जाता, ताकि उसके चलने या न चलने को लेकर निर्णय लिया जा सके और सरकारी पैसे के दुरुपयोग को रोका जा सके। $कानून की धारा-12 की उप धारा चार के खंड (बी) के तहत एनजीओ खोलने वाले व्यक्ति को एनजीओ की मौज़ूदगी तीन साल तक कम-से-कम 15,000 रुपये ख़र्च करके उस क्षेत्र में नि:स्वार्थ काम किया हो, जिसके लिए वह रजिस्टर्ड हुआ है, तभी उसे सरकारी मदद मिल सकती है। इसके बाद एनजीओ को जो भी सरकारी या ग़ैर-सरकारी फंड प्राप्त हो, उसका साफ़ ब्योरा रखना और उस फंड को ईमानदारी से ख़र्च करना एनजीओ की पहली ज़िम्मेदारी है। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है और देश के ज़्यादातर एनजीओ सरकारी तथा ग़ैर-सरकारी फंड प्राप्त करके उसे लगातार हड़प रहे हैं। अगर देश के सभी एनजीओ की पूरी निष्ठता से जाँच की जाए, तो आधे से ज़्यादा एनजीओ सिर्फ़ पैसा खाऊ निकलेंगे।

भारत में हो मज़बूत साइबर सुरक्षा

एम्स से चार करोड़ रोगियों का डेटा चोरी होने के बाद बढ़े साइबर हमले

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में चार करोड़ लोगों के डेटा की चोरी के कुछ ही दिन बाद ही हैकिंग के लिए 30 नवंबर को कथित तौर पर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (आईसीएमआर) के सर्वर पर 6,000 बार साइबर हमले दूसरा गम्भीर झटका है।

यह डिजिटल इंडिया की कमज़ोरियों को उजागर करता है। साथ ही यह भी एक चेतावनी ही है कि हैकिंग दूसरे देश से की गयी और उसकी सम्भावित भागीदारी को देखते हुए मज़बूत सुरक्षा घेरा विकसित करने की तत्काल ज़रूरत है। यदि परिष्कृत रैंसमवेयर हमला वास्तव में एक अंतरराष्ट्रीय साज़िश है, जैसा कि सन्देह है; व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा की सख़्त ज़रूरत है।

हमलों पर हमले

02 दिसंबर को हैकर्स ने तमिलनाडु स्थित मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल से जुड़े 1,50,000 से अधिक रोगियों का डेटा रिकॉर्ड बेचने की ख़बर आयी: केवल 100 डॉलर प्रति डाउनलोड के लिए। विश्लेषकों ने कहा कि अस्पताल के आईटी विक्रेता को पहले निशाना बनाया गया और उस विक्रेता के सिस्टम के माध्यम से हैकर्स अस्पताल प्रणाली में घुस गये। पिछले महीने साइबर हमले के बाद सफदरजंग अस्पताल का सर्वर भी एक दिन के लिए डाउन रहा था।

मार्च में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज को साइबर हमले का सामना करना पड़ा था। कोरोना महामारी के बाद देश में चिकित्सा संस्थानों पर साइबर हमलों में बढ़ोतरी एक बड़ी चिन्ता का विषय है। हैकर्स और आपराधिक सिंडिकेट बड़ी मात्रा में रोगी डेटा को लक्षित कर रहे हैं।

हैकिंग हुई कैसे?

एम्स पर हमला 23 नवंबर को तब सामने आया, जब उपयोगकर्ताओं ने पाया कि वे उस महत्त्वपूर्ण एप्लिकेशन तक नहीं पहुँच सकते, जो अप्वाइंटमेंट का प्रबंधन करता है, चिकित्सा रिकॉर्ड संग्रहीत करता है और सुविधा के किये गये नैदानिक परीक्षणों से रिपोर्ट होस्ट करता है। रिकॉर्ड दिखा रहे हैं कि 23 नवंबर को सुबह 7:07 बजे एम्स के सर्वर पर अन्तिम लेन-देन हुआ। सर्वर अंतत: समझौता किया गया था। रैनसमवेयर भेजने के लिए हैकर्स द्वारा इस्तेमाल किये गये दो ईमेल पते dogA2398@protonmail.com और mouse63209@ptotonmail.com थे।

सुरक्षा में सेंध ने विशेष रूप से ई-अस्पताल एप्लिकेशन को प्रभावित किया और इसने एम्स परिसर में ओपीडी, आपातकालीन और अन्य रोगी देखभाल सेवाओं के ऑनलाइन कामकाज को ठप्प कर दिया। बड़े पैमाने पर साइबर हमले ने रोज़मर्रा के काम, नियुक्तियों और पंजीकरण, बिलिंग, रोगी देखभाल की जानकारी और लैब रिपोर्ट को पटरी से उतार दिया। हमले ने मेगा-अस्पताल के मुख्य और बैकअप सर्वरों पर फाइलें और डेटा संक्रमित कर दिया। एम्स में सब कुछ मैनुअल मोड में चला गया। मेगा अस्पतालों के प्राथमिक और बैकअप सिस्टम पर हैकर्स ने फाइलों और डेटा को दूषित कर दिया। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में सब कुछ मैनुअल मोड पर स्विच करना पड़ा, और एक साल में 40 लाख रोगियों की आमद वाला चिकित्सा केंद्र एक सप्ताह तक का$गज़ों के भरोसे चला।

डेटा सुरक्षा पर सन्देह

दिल्ली स्थित एम्स जो भारत का सबसे बड़ा स्वास्थ्य संस्थान है; में 19 जुलाई, 2016 को मोदी सरकार की डिजिटल इंडिया पहल के तहत ई-अस्पताल परियोजना का कार्यान्वयन पूरा किया गया था। ऐसा करते हुए यह देश का पहला पूरी तरह से डिजिटल सार्वजनिक अस्पताल बन गया था।

पूर्ण डिजिटलीकरण के छ: महीने बाद 9 जनवरी, 2017 को न्यूरोसर्जरी विभाग के डॉ. दीपक अग्रवाल, जो उस समय कम्प्यूटरीकरण समिति के अध्यक्ष थे; ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को एक पत्र लिखा। उन्होंने अपने पत्र में इंगित किया कि राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) द्वारा ई-अस्पताल की स्थापना आईटी अवसंरचना स्थापित करने के लिए जिम्मेदार सरकारी विभाग को रखरखाव और सुरक्षा के लिए उपयुक्त प्रणालियों के साथ मज़बूत नहीं किया गया था। उन्होंने लिखा कि इंस्टॉलेशन के लिए साइट पर कोई डेटाबेस एडमिनिस्ट्रेटर, सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेटर और सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर नहीं है, जो पूरे प्रोजेक्ट को ख़तरे में डालता है।

इसके चार महीने बाद एम्स के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. डी.के. शर्मा ने भी ई-अस्पताल के कार्यान्वयन के बारे में एक रिपोर्ट में इसी तरह के मुद्दों को उठाया। स्वास्थ्य मंत्रालय को लिखते हुए उन्होंने बताया कि एम्स ऑनलाइन पंजीकरण प्रणाली में 6,500 से अधिक नयी नियुक्तियाँ और प्रतिदिन 5,000 से अधिक फॉलोअप देखे जा रहे थे। हालाँकि उन्होंने प्रमुख चिन्ताओं को भी उजागर किया। डॉ. शर्मा ने लिखा- ‘एनआईसी से बार-बार अनुरोध करने के बावजूद प्राथमिक साइट विफलता के मामले में संचालन की निरंतरता बनाये रखने के लिए कोई आपदा बैकअप नहीं है।’

इसके बाद 16 जुलाई, 2016 को एम्स में ई-हॉस्पिटल एप्लिकेशन के कार्यान्वयन की प्रगति बैठक के कार्यवृत्त में कहा गया है कि एम्स में किये गये डिजिटल परिवर्तन के पीछे एनआईसी ड्राइविंग आईटी बल है। लेकिन मंत्रालय को लिखे डॉ. शर्मा के पत्र में कहा गया है कि एनआईसी का अस्पताल के साथ कोई सर्विस एग्रीमेंट नहीं था। उन्होंने लिखा- ‘एनआईसी के साथ कोई सेवा-स्तरीय समझौता नहीं है, जिसके कारण विक्रेता (एनआईसी) को सेवा में किसी भी चूक के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता है और रखरखाव का समय अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा नहीं करता है।’

जाँच जारी

पुलिस ने आईपीसी की धारा-385 (जबरन वसूली करने के लिए किसी व्यक्ति को चोट के डर से डराना), 66 और 66-एफ आईटी एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। प्रारम्भिक विश्लेषण में पाया गया है कि चार सर्वर- दो एप्लिकेशन सर्वर, एक डेटाबेस सर्वर और एक बैकअप सर्वर संक्रमित पाये गये। एन्क्रिप्शन एक ही नेटवर्क में संलग्न विंडोज सर्वरों में से एक द्वारा ट्रिगर किया गया था। लेकिन इस सर्वर की फाइलें एन्क्रिप्ट नहीं की गयी थीं।

एनआईए ने एक टीम एम्स भेजी। हैकिंग और फिशिंग जैसे साइबर सुरक्षा ख़तरों से निपटने के लिए नोडल एजेंसी इंडियन कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम ने भी इस मामले को देखने के लिए एक टीम की प्रतिनियुक्ति की है। यह इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत काम करता है। इसके अलावा रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ), दिल्ली पुलिस, ख़ुफ़िया ब्यूरो, सीबीआई और गृह मंत्रालय भी इस घटना की जाँच कर रहे हैं। प्रारम्भिक जाँच में यह भी पता चला है कि हमलावर के दो प्रोटॉन मेल एड्रेस हैं- dog2398 और mouse63209,   जिनकी पहचान एन्क्रिप्टेड फाइलों के हेडर से की गयी है। एम्स में राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) ई-हॉस्पिटल विभिन्न अस्पताल मॉड्यूल के लिए 24 सर्वर का उपयोग करता है और इनमें से चार सर्वर, ई-हॉस्पिटल के प्राथमिक और द्वितीयक डेटाबेस सर्वर, प्राथमिक अनुप्रयोग और प्रयोगशाला सूचना प्रणाली (एलआईएस) के प्राथमिक डेटाबेस सर्वर रैनसमवेयर के साथ संक्रमित थे।

फिलहाल एम्स दिल्ली में रैनसमवेयर हमले पर एम्स प्रशासन अपनी चुप्पी तोडऩे को तैयार नहीं है और अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि एम्स के सर्वर हैकरों के चंगुल से मुक्त हुए हैं या नहीं। हालाँकि कहा जा रहा है कि धीरे-धीरे डेटा रिकवर हो रहा है, जिसके चलते ऑनलाइन ओपीडी शुरू की गयी है।

सुरक्षा पर सवाल

क्या हम वास्तव में मानते हैं कि हमारा डेटा और भी सुरक्षित है? आज सब कुछ क्लाउड पर है, इसलिए यह साइबर-हमलों / ख़तरों के लिए प्रवण है और हैकर एक भी अवसर नहीं खोते हैं। लिहाज़ा बहुत मज़बूत संगठनों के लिए भी ख़तरे की खिडक़ी मौजूद है। यह देखा गया है कि जहाँ महत्त्वपूर्ण डेटा ऑनलाइन संग्रहीत किया जाता है, अधिकारियों ने शायद सर्वर मिररिंग सहित डेटा बैकअप सुविधा के प्रावधान नहीं किये थे।

वास्तविक हैकर आसानी से आसान पासवर्ड को दरकिनार कर आंतरिक नेटवर्क तक पहुँच सकते हैं, जो सरकारी नेटवर्क में दुर्लभ है। सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे ऐसे असुरक्षित ईमेल का जवाब न दें, जिनमें गुप्त साइफर यूआरएल होते हैं; जो महत्त्वपूर्ण मैलवेयर, ट्रोजन, रैंसमवेयर के लिए घातक इंजेक्टर हो सकते हैं और बार-बार पासवर्ड बदलते रहते हैं। आख़िरी यह कि कम-से-कम कुप्रबंधित मल्टीकास्ट पोर्ट डेटा हैक के लिए एक बड़ा ख़तरा नहीं है, जो कई सुरक्षित परतों की स्थलाकृति होने के बावजूद गेटवे के अन्दर पूर्ण पहुँच प्रदान करता है। समय आ गया है, जब हम अपने सिस्टम को फिशिंग प्रयासों का मुक़ाबला करने के लिए तैयार करें।

बुलडोज़र कार्रवाई पर प्रश्नचिह्न

आजकल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बुलडोज़र मनमानी करते हुए क़ानून की धज्जियाँ उड़ा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय में भी इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ सुनवाई हुई है। लोगों की करुण अपील के बाद भी योगी आदित्यनाथ सरकार अपनी बुलडोज़र कार्रवाई को रोक नहीं रही है। मुख्यमंत्री योगी अपनी बुलडोज़र कार्रवाई को लेकर पूरे देश में इतनी चर्चा बटोर चुके हैं कि लोग उन्हें बुलडोज़र बाबा कहते हैं। बुलडोज़र से तोडफ़ोड़ के बारे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कई बार कह चुके हैं कि वह अपराधियों के ख़िलाफ़ बुलडोज़र से कार्रवाई करेंगे। वहीं अनेक लोगों और विरोधियों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ अपने विरोधियों, आलोचकों और एक धर्म विशेष के लोगों के विरुद्ध बुलडोज़र का दुरुपयोग कर रहे हैं।

यह उनकी हिंसक मानसिकता का नमूना है। एक स्थानीय नेता का कहना है कि योगी आदित्यनाथ एक सन्त के रूप में अपनी पहचान को अब पलीता लगाकर तानाशाह की छवि लोगों के मन में गढ़ रहे हैं। उन्हें समझना चाहिए कि वह कोई गुंडा-मवाली नहीं हैं। इसलिए उन्हें लोगों से एक अच्छे प्रशासक की भाँति व्यवहार करना चाहिए।

स्थानीय नेता ने कहा कि वह एक हिन्दूवादी नेता हैं। मगर उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि वह अब प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं तथा प्रदेश की प्रजा उनकी अपनी प्रजा हैं। अगर उन्होंने अपनी बुलडोज़र नीति नहीं बदली तथा उसका सदुपयोग नहीं किया, तो उनके विरुद्ध लोगों को होते देर नहीं लगेगी। अगर उन्हें बुलडोज़र ही चलाना है, तो प्रदेश भर में हो चुके अतिक्रमण पर चलाना चाहिए। सडक़ों के दोनों ओर जो अतिक्रमण है, उसे हटाकर सडक़ों को ठीक कराएँ, तो उनकी जय-जयकार भी हो।

न्यायालय ने किये प्रश्न

इधर बुलडोज़र कार्रवाई, विशेषकर प्रयागराज में हिंसा के मास्टरमाइंड कहे जाने वाले जावेद मोहम्मद उर्फ़ जावेद पंप के आलीशान घर पर बुलडोज़र चलाने को लेकर बवाल मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश में प्रशासन की तरफ़ से चल रहे बुलडोज़र कार्रवाई रुकवाने हेतु जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ने सर्वोच्च न्यायालय में जो याचिका दायर की थी, उस पर सर्वोच्च न्यायालय सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को समन भेजकर जवाब माँग चुका है।

हालाँकि बुलडोज़र कार्रवाई को रोकने के लिए न्यायालय ने कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया है, मगर उत्तर प्रदेश में चल रही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर प्रश्न अवश्य खड़े किये हैं। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार से स्पष्ट कह दिया है कि कोई भी तोडफ़ोड़ की कार्रवाई क़ानून की प्रक्रिया के अनुसार ही होनी चाहिए। सब कुछ निष्पक्ष होना चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि अधिकारी क़ानून के अनुसार कार्य करेंगे।

विदित हो कि 10 जून, 2022 को जुमे की नमाज़ के बाद प्रयागराज में हिंसा के कथित मास्टरमाइंड जावेद मोहम्मद के प्रयागराज स्थित आलीशान घर को प्रयागराज विकास प्राधिकरण ने 12 जून को ध्वस्त कर दिया। इसी मामले में सर्वोच्च न्यायालय के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार से जवाब माँगा था।

बिहार सरकार को फटकार

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की देखा-देखी दिल्ली में केंद्र सरकार से लेकर मध्य प्रदेश, झारखण्ड, बिहार में भी बुलडोज़र चल रहे हैं। पटना उच्च न्यायालय ने तो इसी बुलडोज़र कार्रवाई को लेकर बिहार की जदयू-रालोद की गठबंधन वाली सरकार की जमकर फटकार लगायी है। पटना उच्च न्यायालय ने अगमकुआँ क्षेत्र में एक महिला का घर बुलडोज़र से गिराने को लेकर पटना उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख़ अपनाते हुए कहा कि पटना एसपी (पूर्व), अंचल अधिकारी और अगमकुआँ पुलिस थाने के एसएचओ की फटकार लगाते हुए कहा कि क्या यहाँ भी बुलडोज़र चलने लगा? ऐसा कौन पॉवरफुल आदमी है कि बुलडोज़र लेकर घर तोड़ दिया इसका? तमाशा बना दिया है, किसी का भी घर बुलडोज़र से तोड़ देंगे? न्यायालय ने पुलिस और स्थानीय प्रशासन की कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि अगमकुआँ पुलिस स्टेशन के अधिकारी क्षेत्र में सक्रिय भू-माफ़िया के साथ मिले हुए हैं।

उच्च न्यायालय ने बिहार सरकार से पूछा कि क्या उसने भूमि विवाद को चिह्नित करके भूमि निष्पादन की शक्ति थाने को ही दे दी है? अगर किसी को कोई समस्या है तो वह पुलिस स्टेशन जा सकता है, पैसा दे सकता है और किसी का घर तोड़ सकता है। क्या यहाँ भी बुलडोज़र चलने लगा? आप किसका प्रतिनिधित्व करते हैं? राज्य या किसी निजी व्यक्ति का? तमाशा बना दिया। किसी का भी घर बुलडोज़र से तोड़ देंगे। क्या न्यायालय को बन्द कर देना चाहिए?

भाजपा नेताओं की दबंगई

उत्तर प्रदेश में भाजपा नेताओं से लोग डरते हैं, क्योंकि उनकी दबंगई चलती है। अभी नवंबर के ही महीने में लखीमपुर खीरी में भाजपा विधायक योगेश वर्मा ने एक दुकानदार से थोड़ी-सी नोंकझोंक पर रात के 10:00 बजे कई दुकानों पर बुलडोज़र चलवा दिया। लखीमपुर खीरी के ही रहने वाले विशाल कहते हैं कि लखीमपुर खीरी में बुलडोज़र की यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी यहाँ अकारण ही बुलडोज़र चलता रहा है। भाजपा नेता और अधिकारियों से हर कोई डरता है कि कहीं बुलडोज़र न चल जाए। यहाँ के भाजपा नेता कितने घमंड में रहते हैं, इसकी बानगी किसान आन्दोलन के समय उन पर गाड़ी चढ़ाने से ही पता चलती है।

भौजीपुरा निवासी देवेंद्र सिंह कहते हैं कि बुलडोज़र कार्रवाई का उत्तर प्रदेश में यह हाल है कि शायद ही कोई जनपद ऐसा बचा होगा, जहाँ बुलडोज़र नहीं चला हो। हालाँकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने प्रदेश में अतिक्रमणकारियों के मन में इसी बुलडोज़र से डर पैदा किया है, मगर जहाँ भाजपा नेताओं के अतिक्रमण का मामला होता है, वहाँ कहीं पर भी बुलडोज़र नहीं चलता है। अवैध अतिक्रमण हटाने को लेकर इन दिनों सभी जनपदों के नगरों से लेकर गांवों तक बुलडोज़र कार्रवाई हो रही है, जिसे लेकर कुछ लोग प्रसन्न हैं, तो कुछ लोग क्रोधित भी हैं।

अतिक्रमण हटाने का क़ानून

बुलडोज़र से अतिक्रमण हटाने की परम्परा भले ही नयी लगती हो, मगर इससे पहले भी सरकारों ने बुलडोज़र से अतिक्रमण हटवाये हैं। मगर बुलडोज़र से अतिक्रमण हटाने और विरोधियों के घर ढहाने की इतनी बड़ी कार्रवाई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार के अतिरिक्त आज तक किसी अन्य मुख्यमंत्री के कार्यकाल में नहीं हुई। अतिक्रमण हटाने कार्रवाई उत्तर प्रदेश नगरीय नियोजन एवं विकास अधिनियम-1973 के तहत होती है। नगरीय नियोजन एवं विकास अधिनियम-1973 की धारा-27 के तहत सरकार किसी भी अवैध सम्पत्ति को ढहाने, अतिक्रमण हटाने का राजस्व विभाग अथवा स्थानीय पुलिस प्रशासन को अवैध सम्पत्तियों को ढहाने का आदेश दे सकती है।

अगर इस अधिनियम के तहत सरकार द्वारा सम्पत्ति गिराने के अंतिम आदेश के अधिकतम 40 दिन के अन्दर अवैध निर्माण ढहाना आवश्यक होता है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार दो में जघन्य आरोपियों, अवैध निर्माण करने वालों तथा अतिक्रमणकारियों के यहाँ लगातार बुलडोज़र चल रहा है। यह बुलडोज़र कार्रवाई योगी आदित्यनाथ सरकार एक में भी हुई थी, मगर योगी आदित्यनाथ सरकार दो में यह अधिक तीव्रता से हो रही है।

शिकायतों की झड़ी

योगी सरकार दो की बुलडोज़र कार्रवाई से समाज दो हिस्सों में बँट चुका है। समाज का एक हिस्सा वो है, जो अतिक्रमणकारियों द्वारा सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने की शिकायत सरकार से, राजस्व विभाग से और पुलिस प्रशासन से लगातार कर रहा है। वहीं समाज का दूसरा हिस्सा उन लोगों का है, जो अपने यहाँ बुलडोज़र कार्रवाई को लेकर यह शिकायत कर रहे हैं कि उनके विरुद्ध कार्रवाई उचित नहीं है। स्थानीय न्यायालयों से लेकर प्रदेश के इलाहाबाद उच्च न्यायालय और देश के सर्वोच्च न्यायालय तक इस प्रकार की शिकायतें योगी आदित्यनाथ सरकार की इस नीति के विरुद्ध पहुँच रही हैं। समाज की इसी श्रेणी में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अधिकारियों से मिलीभगत करके अपने द्वारा अतिक्रमित की गयी भूमि के बचाव के प्रयास में लगातार लगे हैं। कुल मिलाकर बुलडोज़र कार्रवाई चल रही है; मगर इसे निष्पक्ष होना चाहिए, तब इसका लाभ अधिक होगा।

धारावी के पुनर्विकास की कोशिश फिर

एशिया की सबसे बड़े स्लम पर 31 करोड़ के ख़र्चे का नतीजा सिफ़र, अब 5,069 करोड़ का टेंडर अडानी को

तक़रीबन दो दशक के बाद अब जाकर कहीं धारावी के विकास के लिए अदानी प्रॉपर्टीज को 5,069 करोड़ के टेंडर को मंज़ूरी मिल गयी है। मुम्बई की मीठी नदी के किनारे बसे धारावी का विकास होते-होते थम-सा गया था। लेकिन सरकार ने विभिन्न काम पर करोड़ों रुपये ख़र्च किये हैं। स्लम पुनर्वास प्राधिकरण से मिली जानकारी के अनुसार, विभाग द्वारा धारावी पुनर्विकास परियोजना पर पिछले 15 वर्षों में 31.27 करोड़ रुपये ख़र्च किये गये हैं। स्लम पुनर्वास प्राधिकरण ने पिछले 15 वर्षों में (1 अप्रैल, 2005 से 31 मार्च, 2020 तक) किये गये ख़र्चों की एक सूची प्रदान की। 01 अप्रैल, 2005 से 31 मार्च, 2020 तक धारावी पुनर्विकास परियोजना पर 31, 27,66,148 रुपये ख़र्च किये गये हैं। पीएमसी चार्ज पर 15.85 करोड़ रुपये का ख़र्च दिखाया गया है। विज्ञापन और प्रचार पर 3.65 करोड़ रुपये ख़र्च किये गये। व्यावसायिक शुल्क और सर्वेक्षण पर 4.14 करोड़ रुपये ख़र्च किये गये हैं। क़ानूनी फीस पर 2.27 करोड़ रुपये ख़र्च किये गये हैं।

धारावी पुनर्विकास परियोजना (डीआरपी) का सरकारी संकल्प 4 फरवरी, 2004 को जारी किया गया था। धारावी पुनर्वास परियोजना पर हुए ख़र्च के बारे में आरटीआई एक्टिविस्ट अनिल गलगली ने जानकारी माँगी थी। जानकारी के आधार पर गलगली ने अफसोस जताते हुए कहा कि पिछले 17 वर्षों में एक इंच का पुनर्विकास नहीं हुआ है। इससे करोड़ों रुपये का नुक़सान हुआ है। यदि सरकार निजी डेवलपर के बजाय धारावी को पुनर्विकास करती है, तो एक बड़ा हाउसिंग स्टॉक बन जाएगा और सरकार की तिजोरी भर जाएगी। अनिल गलगली कहते हैं कि उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री और गृह मंत्री को एक पत्र भेजा था; लेकिन सरकार ने निजी डेवलपर को वरीयता दी और अदानी प्रॉपर्टीज के 5,039 करोड़ के टेंडर को मंज़ूरी मिल गयी।

धारावी पुनर्विकास परियोजना लगभग दो दशकों से रुकी हुई थी। दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गियों में से एक धारावी झुग्गी के पुनर्विकास में भूमि अधिग्रहण और धन का भारी निवेश शामिल होगा। इस परियोजना में इतनी देर क्यों हुई और वास्तव में इसकी अवधारणा क्या है? यह भी जानना ज़रूरी है।

एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी (स्लम) धारावी की पुनर्विकास परियोजना सन् 2004 में शुरू की गयी थी। सन् 2009, 2016 और 2018 में पुनर्विकास के लिए निविदाएं आमंत्रित की गयी थीं। लेकिन कभी टेंडर का कोई जवाब नहीं आया, तो कभी तकनीकी दिक़्क़तों के चलते टेंडर रद्द कर दिया गया। तीन बार टेंडर रद्द करने के बाद अब चौथी बार वैश्विक स्तर पर टेंडर मँगाये गये थे। मुम्बई को स्लम मुक्त बनाने के लिए स्लम पुनर्वास योजना शुरू की गयी। स्लम पुनर्वास प्राधिकरण सन् 1995 में अस्तित्व में आया। इस योजना में झुग्गीवासियों को नि:शुल्क आवास उपलब्ध कराने की नीति अपनायी गयी। इसके चलते ही धारावी के पुनर्विकास की अवधारणा सामने आयी।

विकास का सफ़र

धारावी झुग्गी पुनर्विकास (धारावी स्लम रि-डेवलपमेंट) योजना के तहत करने का निर्णय लिया गया। दरअसल यह परियोजना सन् 2004 में काग़ज़ पर आयी थी। इस सम्बन्ध में एक अधिसूचना जारी की गयी थी। इस सम्बन्ध में एक अधिसूचना जारी की गयी थी। तत्कालीन सरकार ने धारावी के लोगों को पूरे धारावी के पुनर्विकास और इसे शंघाई में बदलने का सपना दिखाना शुरू किया। इस परियोजना को विशेष परियोजना का दर्जा देकर परियोजना को स्वतंत्र रूप से लेने का निर्णय लिया गया। धारावी पुनर्वास परियोजना (डीआरपी) नामक एक स्वतंत्र प्राधिकरण भी स्थापित किया गया था।

शिवसेना-भाजपा गठबंधन सरकार के दौरान सन् 1997 में धारावी के पुनर्विकास पर विचार किया गया था। लेकिन पिछले 25 वर्षों में सिर्फ़ काग़ज़ी सफ़र चलता रहा। सन् 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के कार्यकाल में धारावी के पुनर्विकास की योजना एडवांटेज महाराष्ट्र कार्यक्रम में प्रस्तुत की गयी थी। इस योजना को आर्किटेक्ट मुकेश मेहता की फर्म ने प्लान किया था। इसे राज्य सरकार ने मंज़ूरी दे दी थी। प्रोजेक्ट प्लानिंग का काम शुरू हुआ; लेकिन प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ा। प्रमोटर ने आरोप लगाया था कि धारावी के पुनर्विकास का काम कुछ अधिकारियों के साथ-साथ स्वयंभू सामाजिक कार्यकर्ताओं की वजह से रुक गया था।

इसके बाद देवेंद्र फडणवीस सरकार ने धारावी के पुनर्विकास के लिए पहल की और निविदाएं आमंत्रित कीं। दुबई की कम्पनी का टेंडर स्वीकार कर लिया गया। लेकिन फिर राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ और फडणवीस सरकार के टेंडर को महा विकास अघाड़ी सरकार ने रद्द कर दिया। उसके लिए रेलवे साइट का तकनीकी मुद्दा उठाया गया था। उसके बाद महा विकास अघाड़ी सरकार ने टेंडर मँगवाये। इसमें दो-राय नहीं कि धारावी के पुनर्विकास योजना के टेंडर में हर सरकार अपना हित देखती है। अब यह माना-जाना चाहिए कि शिंदे सरकार द्वारा टेंडर तय किया जाएगा और जल्द ही पुनर्विकास परियोजना शुरू की जाएगी।

धारावी को क्या मिलेगा?

यह पुनर्विकास परियोजना लगभग 700 एकड़ के क्षेत्र में की जाएगी और इससे धारावी में रहने वाले लाखों लोगों को लाभ होगा। इसके अलावा धारावी के क़रीब 12,000 छोटे और मझोले उद्योगों को भी इस पुनर्विकास का लाभ मिलेगा। धारावी के निवासी इस प्रोजेक्ट में 350 से 400 वर्ग फीट का मकान की माँग कर रहे हैं। माना जा रहा है कि इसलिए चार एफएसआई का इस्तेमाल कर री-डवेलपमेंट किया जाएगा।

ख़ास बात यह कि इस प्रोजेक्ट में बड़ी संख्या में किफ़ायती और किराये के मकान बनेंगे। धारावी के अपात्र निवासियों को भी मकान उपलब्ध कराया जाएगा, जिसके लिए निर्माण शुल्क और अन्य शुल्क लिए जाएँगे। इसलिए धारावी में मूल भूमि मालिक और किरायेदार दोनों वैकल्पिक परिसर की माँग कर रहे हैं। इसके अलावा कई व्यावसायिक उद्यम भी हैं। राज्य सरकार ने समय-समय पर अनाधिकृत निर्माणों को नियमित करने की समय सीमा बढ़ायी थी, ताकि झुग्गीवासियों को वैकल्पिक स्थान मिल सके।

अडानी के लिए लाभदायक

धारावी, बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) के मुम्बई के वित्तीय केंद्र से सिर्फ़ 15 मिनट की ड्राइव दूर है। पुनर्विकास के बाद धारावी बीकेसी का एक विस्तार ही होगा और अच्छी बिक्री मूल्य प्राप्त करेगा। अडानी को परियोजना के हिस्से के रूप में लाखों वर्ग फुट आवासीय और वाणिज्यिक स्थान बेचने का मौक़ा मिलेगा। एक ज़माने में बीकेसी आवासीय सम्पत्तियों की क़ीमत 10,000 से 11,000 रुपये प्रति वर्ग फीट थी। आज लक्जरी सम्पत्तियों के लिए 65,000 रुपये प्रति वर्ग फुट देना पड़ता है। जहाँ रियल एस्टेट क्षेत्र में लागत तीन गुना बढ़ गयी है, वहीं बिक्री मूल्य चार गुना बढ़ गया है। यह परियोजना अडानी के लिए बहुत लाभदायक होगी।

एक नज़र में योजना

परियोजना की लागत  20,000 करोड़ रुपये

समय सीमा   सात साल

पुनर्वास वाले लोग     6,50,000

क्षेत्रफल 2.5 वर्ग किलोमीटर

फ्लोर स्पेस इंडेक्स    चार

निवेश  अडानी करेंगे 5,069 करोड़ रुपये का निवेश

बाघों पर कहर टूटने का मौसम

जनवरी की दस्तक के साथ ही कड़ाके की सर्दियाँ स्वाद के चटोरों के चेहरों पर जितनी चमक ला सकती हैं, उससे कहीं ज़्यादा रौनक़ बाघ के तस्करों के चेहरों पर आएगी। जानकारी के मुताबिक, अवैध आखेट मारे गये बाघों की खालें, हड्डियों और अन्य अंग तस्करी के ज़रिये थाईलैंड और म्यांमार की सीमा पर जा रहे हैं। गोल्डन सिटी के नाम से कुख्यात मंडी में इनकी हाट ऐसे लगती है, जैसे हमारे यहाँ सब्ज़ियों की। इस पूरे गोरखधंधे को वन्य जीवन व्यापार (वाइल्ड लाइफ ट्ऱेड) कहा जाता है। चीन, तिब्बत सरीखे देशों में बाघ के अंगों की माँग ज़्यादा होने से भारत में बाघों के शिकार की घटनाएँ तेज़ी से बढ़ रही है। इस बाबत हो रहे नित नये ख़ुलासे इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि स्थानीय शिकारी 20-30 हज़ार से दो लाख तक के मुनाफ़े के लाभ में बाघों केा मौत के घाट उतार रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बाघों के अंगों को 25 से 30 लाख तक में बेचा जा रहा है।

जानकारों का कहना है कि सरिस्का से बाघों के अंग गुडग़ाँव और दिल्ली से सीमा पार कर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पहुँचते हैं। सूत्रों का कहना है कि बाघों के पैरों के नाखून का इस्तेमाल ज़्यादातर तांत्रिक क्रियाओं के लिए किया जाता है तिब्बत में बाघों की हड्डियों का उपयोग शक्तिवर्धक दवाएँ बनाने के लिए किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय संगठन ट्रैफिक की ताजा रिपोर्ट ‘स्किन एंड बोन्स’ से इसका ख़ुलासा होता है।

रिपोर्ट बताती है कि जनवरी, 2000 से जून, 2022 तक के बीच 50 देशों में 3,377 बाघों के बराबर अंगों की तस्करी की गयी। इन वर्षों में तस्करी को 2,205 घटनाएँ सामने आयीं। भारत में जनवरी, 2018 से जून, 2022 के बीच ही 165 घटनाएँ हुईं। मतलब साफ़ है कि भारत से तस्करी ज़्यादा हो रही है। हालाँकि विशेषज्ञ इस रिपोर्ट को विश्वसनीय नहीं मानते। इसकी वजह चीन थाईलैंड, इंडोनेशिया अफ्रीकी देशों में टाइगर का पालतू होना है। यानी वन्य जीव कानून होने के बावजूद तस्करी अपेक्षाकृत आसान है। इसलिए केस भी कम होंगे।

 

सम्भवत: यही वजह रही कि रणथंभौर टाइगर रिजर्व से बाघों को कोटा स्थित मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में शिफ्ट करने की माँग पहले कुतर्कों में उलझ कर रह गयी। इसकी वजह थी रणथंभोर रिजर्व में महज तीन साल के बाघ की रहस्यमय मौत को लेकर अजब-ग़ज़ब पहेलियाँ बुझाने का अंतहीन सिलसिला शुरू हो गया था। हालाँकि वन विभाग के सूत्र इन चर्चाओं को ख़ारिज करते हैं कि यह घटना बाघ और मानवों के बीच संघर्ष का नहीं आखेट का नतीजा थी। हालाँकि जब लोग रणथंभोर के फलोदी की रेंज के डागरवाड़ा गाँव के इस साल के बच्चे की मौत बाघ से हमले में होने की बात करते हैं, तो बाघ-मानव संघर्श के कयासों को बल मिलता नज़र आता है। लेकिन सूत्र अवैध आखेट की सम्भावना से भी इनकार नहीं करते। अलबत्ता इस बात को ग़लत बताते है कि रणथंभोर भी आगे चलकर अवैध आखेट सरिस्का बन जाएगा?

शुरुआत राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने रणथंभौर के बाघों को कोटा रिजर्व में शिफ्ट करने की अनुमति जारी कर दी थी। लेकिन वन महकमा इनको जोड़ों या फिर इकलोते बाघों को भेजने पर आनाकानी में अड़ा रहा; जबकि वन्य जीव प्रेमी भी इस बात से सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि बाघों या जोड़ों की बजाय बाघिनों को भेजा जाए। उनका तर्क था कि कोटा स्थित मुकुंदरा हिल्स में दो बाघ और एक बाघिन मौजूद है। यदि बाघिन भेजी जाती है, तो नया अभयारण्य जल्द से जल्द आबाद हो सकेगा।

वन्य जीव प्रेमियों ने केंद्र सरकार से भी इस बात का आग्रह किया। लेकिन आस-पास के इलाक़ों में मानवीय गतिविधियों और अवैध आखेट के चलते वन्यजीव प्रेमी बाघों की सुरक्षा को लेकर मुतमईन नहीं थे। उनका कहना था कि इस मामले में वन महकमा आज भी डाँवाडोल है। अभी भी वन विभाग मुकुंदरा में बसे हज़ारों लोगों का विस्थापन कर उन्हें गाँवों से सुरक्षित नहीं निकाल पाया है। ऐसे में मुकुंदरा हिल्स में बाघों का कुनबा बढऩे के साथ बाघ और मानवों के बीच टकराव को बढ़ाएगा। यह स्थिति तो बाघ संरक्षण की कोशिशों को भी मटियामेट कर देगी। पीपुल्स फॉर एनीमल्स संगठन के प्रदेश प्रभारी ने इन अंदेशों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री को भी पत्र लिखा था। उनका कहना था कहना है कि मुकुंदरा को टाइगर रिजर्व घोषित किये हुए 20 साल हो गये। लेकिन गावों के विस्थापन समस्या, तो जस-की-तस अटकी रही है।

दूसरी तरफ़ वन्यजीव प्रेमी इस बात को लेकर भी हैरान है कि इंसानी ज़िन्दगियों के साथ-साथ बेशक़ीमती बाघों को बचाने के लिए कोई दो साल पहले वन विभाग ने धोलपुर से कौटा तक के रियासतकालीन रॉयल राजस्थान टाइगर कॉरिडोर को फिर से ज़िन्दा करने की कोशिश की थी। लेकिन ताज़ुब है, ये कोशिशों आज तक भी सिरे नहीं चढ़ी? पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था ग्रीन कोर के सूत्रों का कहना है कि 10 अगस्त, 2017 को संस्था ने करौली और धौलपुर से कोटा और झिरी तक टाइगर कॉरिडोर बनाने का प्रस्ताव सरकार को भेजा था।

सभी पहलुओं पर विचार विमर्श के बाद अक्टूबर, 2017 में राज्य सरकार में इसे मंज़ूरी भी दे दी थी। इस आदेश के तहत धौलपुर से कोटा तक के कॉरिडोर को दो हिस्सों में बाँटा गया था। पहले हिस्से में धौलपुर से लेकर रणथंभोर तक का इलाक़ा शामिल कर भरतपुर की वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के केसरबाग़ को भी रणथंभोर से जोड़ दिया गया था; जबकि सवाई माधोपुर करौली और बूंदी वन क्षेत्र पहले से ही रणथंभोर के क्षेत्राधिकार में था। ग्रीन कोर संस्था का मसौदा कई बातों की तरफ़ ध्यान बँटाता है। मसलन नदियों के तटीय इलाक़ों और उनसे सटे नालों के आस-पास ही ज़्यादातर वन क्षेत्र में बाघों का पर्यावास है।

दूसरी तरफ़ कोटा से धौलपुर तक चंबल नदी और वन क्षेत्र बाघों के लिए ख़ासा मुफ़ीद रहा है। रहा सवाल बाघों की चहलकदमी का? उनके पदचिह्न इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि रणथंभौर के बाघ धौलपुर के झिरी क्षेत्र में भी आते जाते हैं। लेकिन जंगलों की कटाई और इंसानी दख़ल के चलते रियासतकालीन बाघ कॉरिडोर उजड़ता चला गया। ग्रीन कोर संस्था के सचिव डॉ. सुधीर गुप्ता राजस्थान रॉयल कॉरिडोर की योजना को अमल में लाना इसलिए ज़रूरी बताते हैं कि इससे बाघों का 150 साल पुराना खोया रास्ता उन्हें वापस मिल सकेगा। इतना ही नहीं बाघों और इंसानों का टकराव भी ख़त्म होगा। साथ ही बाघों को फलने-फूलने का पर्याप्त माहौल भी मिल सकेगा। लेकिन सवाल है कि वन महकमे ने इन स्थितियों तथा बाघ वीरू की मौत से कोई सबक़ क्यों नहीं लिया? अधिकारी बाघों को कोटा के मुकुंदरा हिल्स में शिफ्टिंग में तो जुट गये। लेकिन इस बार भी कॉरिडोर को भुला बैठे और बाघों को सीमित दायरे वाले टाइगर रिजर्व के टुकड़ों में बँटे हिस्से में छोडऩे की योजना बना ली।

इस सरकारी क़वायद पर सवाल न उठे तो क्या हो? लेकिन हक़ीक़त समझें, तो जब भी बाघों और इंसानों का टकराव बढ़ता है, अधिकारी कॉरिडोर बनाकर उनके कुदरती ठिकानों को बढ़ाने औंर अभ्यारण्यों में बसे गाँवों के विस्थापन का राग अलापने लगते हैं। लेकिन जैसे ही पुर्नवास पैकेज का ज़िक्र छिड़ता है, तो बाघों की चिन्ता में परेशान होने वाले अफ़सर लापता हो जाते हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून के वन्य जीव विशेषज्ञ डॉ. बिलाल हबीब कहते हैं- ‘राजस्थान ही नहीं दुनिया भर में टाइगर कॉरिडोर बाघों का आहार ख़त्म होने के कारण कम हुए हैं। बाघ 62 प्रजातियों के जानवरों का शिकार करता है, जबकि इनमें से 50 तो पूरी तरह विलुप्त हो चुकी है।

डॉ. हबीब कहते हैं कि अगर सरकारें बाघों के प्रति गम्भीर है, तो पहले बाघों के आवास और भोजन का इंतज़ाम करना हेागा। उधार के शिकार से अब काम चलने वाला नहीं होगा। हबीब कहते हैं, एक बाघ को 50 वर्ग किलोमीटर का कोर क्षेत्र चाहिए। लेकिन प्रदेश के किसी भी अभयारण्य में बाघों को इतना क्षेत्र उपलब्ध नहीं है। इस मुद्दे से निपटने का एक ही तरीका है और वह है राजस्थान रॉयल टाइगर कॉरिडोर को फिर से ज़िन्दा करना। चकित करने वाली बात है कि सरिस्का और मुकुंदरा किसी के बीच में कॉरिडोर नहीं बन पाया; हालाँकि अब उम्मीद जगी है।

नक़ली दवाइयों का काला धंधा

हिमाचल में नक़ली दवाइयों के एक और पर्दाफाश पर उच्च न्यायालय का स्वत: संज्ञान

हिमाचल में एक करोड़ रुपये से ज़्यादा मूल्य की नक़ली दवाइयाँ और कच्ची सामग्री की बरामदगी ने अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर की दवा कम्पनियों और राज्य की साख को बट्टा लगाया है। बाहरी राज्यों को भेजे जाने वाली तैयार दवाइयों के अलावा 30 किलो से ज़्यादा दवा बनाने की कच्ची सामग्री के साथ चार लोगों की गिरफ़्तारी लेख लिखे जाने तक हो चुकी थी। यह मामला बेहद गम्भीर है और लाखों-करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा है। मामले की गम्भीरता के महत्त्व को इसी से समझा जा सकता कि राज्य उच्च न्यायालय ने इस बाबत प्रकाशित ख़बरों को आधार मानते हुए स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर दिया है। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस गम्भीर मुद्दे पर राज्य के मुख्य सचिव, प्रधान सचिव स्वास्थ्य और गृह (दोनों) निदेशक स्वास्थ्य सेवाएँ, सोलन के ज़िला उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक को नोटिस जारी करते हुए तीन सप्ताह में इस बाबत शपथ-पत्र देने को कहा है। ज़ाहिर है तीन सप्ताह के दौरान पुलिस और स्वास्थ्य विभाग को बहुत कुछ ठोस करना पड़ेगा।

बद्दी की इकाई में तैयार सप्लाई के लिए भेजे जाने वाले हज़ारों कैप्सूल और टेबलट की बरामदगी से अंदाज़ लगाया जा सकता है कि कितने बड़े स्तर पर यह धंधा चल रहा था। जाँच में बद्दी में बनी कुछ दवाइयाँ उत्तर प्रदेश के आगरा और अलीगढ़ भेजी जाती थी। इनका वहाँ इस्तेमाल होता रहा है; लेकिन कब से और किन-किन शहरों और क़स्बों में यह विस्तृत जाँच में स्पष्ट होगा। इससे पहले भी राज्य में नक़ली दवाइयाँ बनाने के मामले सामने आते रहे हैं। नामचीन दवा कम्पनियों के लेबल वाली इन दवाओं का निर्माण प्रदेश में ख़ूब हो रहा है। इसे राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग की नाकामी कहा जाएगा। स्वास्थ्य विभाग समय-समय पर कार्रवाई करता है, बावजूद इसके नक़ली दवा बनाने का धंधा बदस्तूर चल रहा है।

हिमाचल में बनी स्तरहीन नक़ली दवाओं के इस्तेमाल का सबसे बड़ा उदाहरण दो साल पहले का है। दिसंबर, 2019 से जनवरी, 2020 के दौरान राज्य के सिरमौर ज़िले के कालाअंब की दवा कम्पनी, डिजिटल विजन कम्पनी के कफ सीरप से अकेले जम्मू क्षेत्र में एक दर्ज़न से ज़्यादा बच्चों की मौत हुई थी। इनमें से ज़्यादातर बच्चों को हल्की खाँसी-जुकाम हुआ और कम्पनी के कफ सीरप के उपयोग के बाद उनकी दर्दनाक मौत ही हुई। इस मामले को उजागर करने वाले समाजसेवी सुकेश खजूरिया के मुताबिक, वह कफ सीरप नहीं, बल्कि मौत की दवा थी, जिसने नौनिहालों को उनके माँ-बाप से छीन लिया। जम्मू में एक दर्ज़न बच्चे-बच्चियों की आँकड़ा तो रिकॉर्ड पर है, और न्यायालय के आदेश पर मृतक बच्चे-बच्चियों के परिजनों को तीन-तीन लाख रुपये का मुआवज़ा मिल चुका है। इस मामले में न्यायालय की प्रताडऩा के बावजूद फिर नया मामला सामने आ गया है। पिछले पाँच साल में ही आधा दर्ज़न से ज़्यादा ऐसे मामले सामने आ चुके हैं।

फूड लाइसेंस वाली इकाइयाँ यहाँ विभिन्न प्रकार के रोगों को दूर करने वाल कैप्सूल और टेबलेट बना रही है। इसी साल सितंबर में बद्दी के धर्मपुर गाँव में आर्य फार्म नामक कम्पनी यही कर रही थी। कम्पनी मालिक के पास फूड सेफ्टी एंड स्टैडर्ड अथॉरटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) का लाइसेंस बना था और दवाइयाँ सप्लाई कर रही थी। बिना लाइसेंस वाली ऐसी कम्पनियाँ कैसी दवाइयाँ बनाएगी और उनका क्या और कैसा असर होगा इस समझना ज़्यादा मुश्किल नहीं है। बिना लाइसेंस या दूसरे के लाइसेंस पर काम करने वाली इकाइयाँ भी काम कर रही है; लेकिन इन्हें चिह्नित कर कार्रवाई करना राज्य सरकार के लिए मुश्किल काम बना हुआ है। हिमाचल में 1,500 से ज़्यादा दवा निर्माता कम्पनियाँ पंजीकृत हैं। इनमें से आधी सोलन ज़िले के बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ (बीबीएन) में हैं। यह क्षेत्र जहाँ उपेक्षित है, वहीं स्वास्थ्य विभाग भी पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो पा रहा है। इतने बड़े क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए एक पुख़्ता सिस्टम की ज़रूरत है, जिसकी शुरुआत से ही कमी है। अगर सिस्टम मज़बूत और कार्रवाई कारगर हो, तो ऐसे मामलों में कमी आती; लेकिन यह संख्या तो बढ़ रही है।

हिमाचल जैसे छोटे से पहाड़ी राज्य में देश की 30 प्रतिशत से ज़्यादा दवाइयाँ बनती है। यहाँ 45,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का वार्षिक कारोबार होता है। यहाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर की दवा कम्पनियाँ भी हैं, जिनके उत्पाद बाहरी देशों में भी जाते हैं। बीबीएन एक तरह से देश का बहुत बड़ा फार्मा हब है, जिससे हिमाचल की पहचान देश-विदेश में है। लगातार नक़ली दवा के मामले सामने आने से साख गिर रही है और इसे बचाने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की है। कई बार यहाँ बनी दवाइयों के नमूने दूसरे राज्यों में मानकों पर खरे भी नहीं उतरे हैं। नामी कम्पनियों के नाम वाली दवाइयाँ यहाँ से बाहर जा रही है और ख़ूब बिक रही है।

नामी कम्पनियों वाली नक़ली और स्तरहीन दवाइयाँ जिन राज्यों में चोरी छिपे या मिलीभगत से भेजी जा रही है, उनकी वहाँ पूरी खपत हो रही है। मतलब ऐसा धंधा करने वालों का काला कारोबार लोगों की जान की क़ीमत पर ख़ूब फल-फूल रहा है। बद्दी के नक़ली दवा मामले में गिरफ़्तार मोहित बंसल आगरा का रहने वाला है। कभी दवाइयों की थोक (होलसेल) की दुकान में काम करने वाला यह शख़्स काफ़ी समय से बद्दी में एक दवा इकाई को किराये पर लेकर निर्माण में लगा हुआ है। उसकी बद्दी इकाई के गोदाम से 30 किलो से ज़्यादा की कच्ची सामग्री बताती है कि वह कितने बड़े पैमाने पर काम कर रहा था। उसके अलावा अतुल गुप्ता, विजय कौशल और कर्मचारी नरेश कुमार हैं। मोहित बंसल की इकाई में कोलेस्ट्रोल को नियंत्रित करने के लिए रोजडे-10, एंटी बायोटिक दवा ग्लीमीसेव-एम2 और अस्थमा में आराम के लिए मोंटेयर-10 और दर्द निवारक दवा जोरोडोल टीएच-4 जैसी विभिन्न प्रकार के कैप्सूल और टेबलेट बनती थी। ऐसी दवाइयाँ देश की जानी-मानी दवाइयाँ बनाती है और जिनकी माँग देश में बहुत है।

नक़ली दवा बनाने वाले इस गिरोह के इस काम में अन्य राज्यों से भी तार जुड़ हैं। बद्दी में बनने वाली स्तरहीन और नक़ली दवाइयों पर लेबल और प्रिंटिग का काम उत्तराखण्ड से कराया जाता था। यह ग़ैर-क़ानूनी काम है और इसे करने वाली इकाइयाँ भी जाँच के घेरे में रहेगी। दवा निर्माण में सबसे अहम इसकी कच्ची सामग्री होती है, जो बिना लाइसेंस आसानी से नहीं मिल सकती। ऐसे धंधे में लगे हुए लोगों के लिए शायद यह मुश्किल काम नहीं है। मोहित बंसल की इकाई को कच्ची सामग्री सप्लाई करने वाले अभी पुलिस पकड़ से बाहर है। शुरुआती पूछताछ से ख़ुलासा हुआ है कि नक़ली दवा का यह धंधा दो साल से चल रहा था। हिमाचल के ड्रग्स कंट्रोल एडमिनस्ट्रेशन (डीसीए) के पास सूचना थी कि बद्दी की एक इकाई ने एक बड़ी खेप उत्तर प्रदेश भेजी है। इसके बाद इकाई के कामकाज पर नज़र रखी जाने लगी।

हिमाचल सीमा पर ड्रग्स इंस्पेक्टर की टीम ने एक कार में रखी दवाइयों की जाँच की तो मामले का पर्दाफाश हो गया। इसके बाद इसी इकाई की ओर से आगरा (उत्तर प्रदेश) भेजे गये नक़ली दवाओं की जानकारी भी मिली। यह मामला बेहद गम्भीर है और राज्य सरकार को इस दिशा में बहुत कुछ ठोस काम करने की ज़रूरत है। यह लाखों-करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ी बात है। तकलीफ़ होने के बाद आराम के लिए जो दवा ख़रीदी जा रही है, वह असली है या नक़ली इसका पता नहीं चल पाता। स्तरहीन दवा उल्टा असर भी कर सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के मुताबिक, राज्य सरकार को नक़ली दवा बनाने वाले लोगों और इनकी इकाइयों पर कड़ी कर्रवाई करनी चाहिए। लाइसेंस निलंबन, रद्द या इकाई को सील करने से ज़्यादा दोषियों को कड़ी सज़ा दिलवाने जैसी ठोस पहल करने की ज़रूरत है।

रैपर कुछ, दवा कुछ

हिमाचल के फार्मा हब बद्दी, बरोटीवाला, नालागढ़, कालाअंब (ज़िला सिरमौर) आदि की कुछ इकाइयों से चोरी छिपे सिप्ला, इप्का लैब, कैडिला, मैकलियोड फार्मास्यूटिकल, सिंगोवा फार्मा और यूएसवी प्राइवेट लिमिटेड जैसी नामचीन दवा कम्पनियों के नाम पर स्तरहीन दवाइयाँ बाहर जा रही हैं। सरकार की स$ख्ती और कड़ी कार्रवाई के अलावा ऐसी कम्पनियों को भी नज़र रखनी होगी। इस काले धंधे में लगे लोग जहाँ लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं, वहीं नामी कम्पनियों की साख और भरोसे को तोड़ रहे हैं।

“जब तक घटना बड़ी न हो जाए, सरकारें जागती नहीं हैं। जम्मू क्षेत्र में कुछ दिनों के अंतराल के बाद जब बच्चों की मौत होने लगी, तो वजह कफ सीरप सामने आया। लेकिन उसके बाद भी दवा बिकती रही। बच्चों के लिए खाँसी और जुकाम से राहत के लिए तीन तरह के कफ सीरप बनाने वाली डिजिटल विजन कम्पनी हिमाचल के ज़िला सिरमौर के कालाअंब की ही थी। अब बद्दी में फिर नक़ली दवा के धंधे का पर्दाफाश हुआ है। जम्मू क्षेत्र में एक दर्ज़न मौतों के बाद हलचल शुरू हुई। क्या फिर वैसी किसी घटना का इंतज़ार है?’’

सुकेश खजूरिया

समाजसेवी, जम्मू

झारखण्ड के कई गाँव बदहाल

गाँव की बात दिमाग़ में आते ही एक सुकून भरे शान्त, सजह, सादगीपूर्ण वातावरण का आभास उभर जाता है। हरे-भरे खेत, हल जोतते किसान, मवेशियों के गले में टुनटुन करती घंटियाँ, चौपाल पर हुक्के की गुडग़ुड़ाहट के बीच बतियाते बुजुर्गों का दृश्य मानस पटल पर उभर आता है। क्योंकि बचपन से इसी तरह का दृश्य हमने पाया या समझाया गया था। लेकिन हक़ीक़त इससे परे है। कुछ गाँव शहरों के नज़दीक होने के कारण बदल गये हैं और उन्होंने आधुनिकता की चादर ओढ़ ली है। जीवनशैली बदल गयी है, तो कुछ गाँव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। लोग पलायन कर रहे हैं।

यह सही है कि हम सूचनाओं के युग में जी रहे हैं। हर तरफ़ की सूचनाएँ मिनटों में मिल रही हैं। पर गाँव की सही स्थिति देखनी है, तो सूचना देनी वाली तमाम तकनीकों को हटाकर नंगी आँखों से गाँव जाकर देखें। आज़ादी के 75 साल हो गये हैं। देश आज अमृत महोत्सव मना रहा है; लेकिन झारखण्ड के कई ऐसे गाँव हैं, जो आज भी अमृत यानी विकास की बाट जोह रहे हैं। वहाँ के लोगों को अमृत-काल के किसी अमृत के रूप में आधुनिक सुख-सुविधा की दरकार नहीं है; केवल बिजली, पानी, सडक़, स्वास्थ्य, पेंशन, शिक्षा, रोज़गार जैसी बुनियादी सुविधाएँ चाहिए।

सरकारी सुविधाएँ नहीं

झारखण्ड की राजधानी रांची है। इसलिए कम से कम यह तो उम्मीद की ही जा सकती है कि इस ज़िले के सुदूरवर्ती गाँव भी आदर्श गाँव होंगे। हक़ीक़त इससे से परे है। रांची से महज 50 किलोमीटर दूर तमाड़ प्रखण्ड में गाँव गोमिया कोचा और इसी से सटा दूसरा गाँव कुरुचुडीह है। यह तमाड़ प्रखण्ड का पहाड़ी की तलहटी में बसा है। गोमिया कोचा में मुंडा और महतो परिवार के लगभग 250 लोग रहते हैं। इसी तरह कुरुचुडीह में 350 लोग रहते हैं। इन गाँवों की स्थिति देख कर मन द्रवित हो जाता है। यहाँ के लोग समस्याओं के मकडज़ाल में फँसे हैं। गाँव के लोग वृद्धा और विधवा पेंशन से महरूम हैं। स्कूल के नाम पर एक प्राथमिक विद्यालय। हाईस्कूल 20 किलोमीटर दूर और कॉलेज तो बुंडू या रांची आकर ही। पूरे गाँव में केवल एक युवा संजय मुंडा स्नातक हैं। गाँव से आने-जाने का कोई साधन नहीं, केवल सुबह-शाम ऑटो चलता है। वह भी एक तरफ़ का किराया 20 रुपये है, जो ग़रीबों की जेब पर भारी है। अँधेरा होने के बाद अवागमन का वह साधन भी बन्द। सडक़ वर्षों पहले बनी थी, जो इतनी जर्जर हो चुकी है कि होना न होना बराबर ही है। शाम के बाद कोई भी व्यक्ति अपने घर से नहीं निकलता; क्योंकि जंगली हाथियों का डर रहता है। बिजली के खम्भे हैं; लोकिन बिजली भगवान भरोसे। स्वास्थ्य सेवा के नाम पर झोलाछाप डॉक्टर मिल जाते हैं, जो चीर-फाड़ तक करते हैं। राशन कार्ड है; लेकिन राशन लाने के लिए 20 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। सारा दिन बर्बाद करके गये भी, तो डीलर कुछ-न-कुछ नुक्स निकालकर राशन नहीं देता है या कम देता है। जीवनयापन थोड़ी-बहुत खेती पर निर्भर है। वह भी हाथियों ने अगर उपद्रव नहीं मचाया, तो फ़सल मिल जाती है, अन्यथा यह मेहनत भी बेकार।

योजनाओं से अनभिज्ञता

गोमिया कोचा में लोग लगभग 70 साल से रह रहे हैं। खुंटकटी क्षेत्र होने के कारण युगल सिंह मुंडा ने उन्हें सादा पट्टा देकर बसाया था। मुंडा रसीद उन्हें दी गयी। आज भी उन्हें वही रसीद मिलती है। यही प्रमाण है उनके निवासी होने का। इस प्रमाण का सरकारी अधिकारियों की नज़र में कोई मोल नहीं है। उनके पास खतियान नहीं होने के कारण इनके समक्ष समस्याओं का अंबार खड़ा हो गया है। वे सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हैं। उन्हें यह तक नहीं पता कि केंद्र या राज्य सरकार उनके हित के लिए क्या-क्या योजनाएँ चला रही हैं?

वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन, आयुष्मान योजना, कुपोषण से मुक्ति के लिए चल रही कल्याणकारी योजनाओं के नाम तक वह नहीं जानते। गाँव वाले बताते हैं कि कभी न ही कोई जनप्रतिनिधि यहाँ आता है और न ही कभी कोई अधिकारी। इनकी सुध लेने वाले कोई नहीं है। इलाके के लोगों ने आज तक अपने सांसद और विधायक का चेहरा नहीं देखा है।

दूरदराज़ के गाँव और भी बदतर

केंद्र या राज्य की सरकार हो या फिर कोई भी राजनीतिक दल के नेता, सभी गाँव की बात करते हैं। गाँव के विकास की बात कहते हैं। उनकी ज़ुबान पर हर समय रहता है कि गाँव का विकास होगा, तभी शहर विकसित होंगे। हक़ीक़त में ऐसा हो रहा है क्या? झारखण्ड में कुल 32,623 गाँव हैं। जो भारत के कुल गाँव का लगभग 5.42 फीसदी है।

राज्य में सबसे अधिक गाँव दुमका ज़िला और सबसे कम गाँव लोहरदगा में है। शहरों से सटे गाँव को तो फिर भी थोड़ी-बहुत सुविधाएँ मिल रही हैं, विकसित भी हो रहे हैं। लेकिन सुदूरवर्ती गाँव की स्थिति दयनीय है। राज्य में कई ऐसे गाँव हैं, जहाँ तक पहुँचना भी दूभर है। इनकी सुध न ही कभी सरकार लेती है और न ही अधिकारी। केवल चुनाव में मतदान के समय स्थानीय स्तर पर इनका उपयोग कर लिया जाता है।

हर ज़िले में हैं बदहाल गाँव

दुमका ज़िले के जामा प्रखण्ड का एक लकडज़ोरिया गाँव है। इस गाँव के लोग बताते हैं कि बदहाली का आलम यह है कि यहाँ आसपास के गाँव के लोग अपनी लड़कियों की शादी करना नहीं चाहते। क्योंकि गाँव में आने-जाने के लिए सडक़ ही नहीं है। कार तो पहुँच ही नहीं सकता, मोटरसाइकिल से भी आना-जाना दूभर है। इसी तरह खूँटी ज़िले के गोविंदपुर लापुंग गाँव की ओर जाने वाली सडक़ की स्थिति है। गाँव के लोग बताते हैं कि सडक़ 25 साल पहले बनी थी। मौज़ूदा स्थिति में लोग सडक़ की बजाय खेत-खलिहान से निकलना ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। गुमला ज़िले के पहाड़ी की तलहटी में बसा गाँव बहेरापाट और पहाड़ टुडुमरा की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। साहिबगंज का रामपुर-बांसजोरी गाँव हो, या फिर लातेहार जले का कुजरूम गाँव, या फिर जामताड़ा का सियारकेटिया गाँव। हर गाँव की दास्ताँ एक जैसी हैं।

राज्य में सभवत: शायद ही कोई ऐसा ज़िला हो, जिसके अधिनस्थ सभी गाँवों में बुनियादी सुविधाएँ मौज़ूद हों। लोग सडक़, बिजली, पानी, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधा और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ मुकम्मल तौर पर मिल रहा हो। कुछ गाँव तो ऐसे हैं, जहाँ आज भी लोग पानी जैसी समस्या से जूझ रहा। लोग पहाड़ की तलहटी में स्थित कुआँ से पानी लाते हैं या फिर कोसों दूर नदी-नाले के पानी का उपयोग कर रहे।

स्मार्ट गाँव बनाने की ज़रूरत

सन् 2011 के सेंसेक्स के अनुसार, देश में 6,49,481 गाँव हैं। देश की 65 प्रतिशत आबादी गाँवों में रहती है। भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है। ऐसे में शहरों से ज़्यादा गाँव को प्यार और विकसित करने की ज़रूरत है। भारत में केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी बनाने की बात की थी। हालाँकि सरकार इस दिशा में अच्छे स्तर पर काम करे, तो स्मार्ट सिटी बनने में भी समय लगेगा। लेकिन देश हित केवल स्मार्ट सिटी से ही नहीं, स्मार्ट गाँवों के बनने से होगा।

स्मार्ट गाँव का मतलब बेतरतीब तरी$के से निर्माण या आधुनिकता से ढकना नहीं, बुनियादी सुविधाएँ और खेती के लिए नयी तकनीक उपलब्ध कराना है। रोज़गार का अवसर देना, जिससे पलायन रुके। हमारा पेट गाँव से आये अनाज, फल, सब्ज़ियों से भरता है। अगर ये उत्पादन बन्द हो जाएँगे, असुविधा के कारण लोग पलायन करने लगेंगे, तो शहरी क्षेत्र में पेट भरना भी मुश्किल हो जाएगा। शहरी क्षेत्र की सारी सुविधाएँ धरी-की-धरी रह जाएँगी। इसलिए गाँवों को विकसित करने के लिए सजगता की  ज़रूरत है। हर स्तर पर ठोस प्रयास की ज़रूरत है। लोगों तक सडक़, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार जैसी बुनियादी सुविधा पहुँचाने की ज़रूरत है। तभी हमारी परम्परा भी बची रहेगी। सभ्यता भी बची रहेगी, हम भी बचे रहेंगे।