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गांधी से मेरी तुलना न करें, पुरानी चीजें भूल देश को बताएं हम क्या कर सकते हैं: राहुल

राहुल गांधी ने अपनी पार्टी के तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं को सख्त हिदायत दी है कि वे उनकी महात्मा गांधी से तुलना न करें क्योंकि गांधीजी का देश के लिए योगदान अतुलनीय है। साथ ही उन्होंने नेताओं को यह भी कहा है कि वे बार-बार नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी के देश के योगदान को न दोहराएं और यह बताएं कि हम खुद जनता के लिए क्या कर सकते हैं।

‘भारत जोड़ो यात्रा’ के जयपुर पहुंचने पर शुक्रवार शाम राहुल गांधी ने पार्टी के नेताओं को तीन मुख्य बिंदुओं पर कड़ा संदेश दिया – ‘महात्मा गांधी से मेरी तुलना मत कीजिए। मेरा नाम भी उनके साथ मत लीजिए और कोई तुलना नहीं होनी चाहिए। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया।’

राहुल गांधी ने इस अवसर पर पार्टी कार्यकर्ताओं को सलाह दी कि पार्टी के अतीत पर ध्यान देना छोड़ दें। राहुल ने कहा – ‘दूसरी बात जो मैं कहना चाहता हूं वह थोड़ी कठिन है। देखें कि राजीव गांधी ने देश के लिए क्या किया, इंदिरा गांधी ने क्या किया  कि वे देश के लिए शहीद हो गए आदि। उन्होंने देश के लिए बहुत अच्छा किया।’

उन्होंने कहा – ‘लेकिन कांग्रेस के लोगों को हर बैठक में इसका जिक्र नहीं करना चाहिए। राजीव गांधी, इंदिरा गांधी, सरदार पटेल, गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू ने देश के लिए जो किया वह अब हो गया है। हमें अतीत में नहीं ठहरना है ! वर्तमान को समझना है और देश का भविष्य संवारना है।’

कांग्रेस नेता ने पार्टी नेताओं को तीसरी सलाह में कहा – ‘कांग्रेस कार्यकर्ताओं को अब इस बारे में बात करनी चाहिए कि वे लोगों के लिए क्या कर सकते हैं और यह अधिक महत्वपूर्ण है। मेरे दिमाग में जो भी विचार आते हैं, मैं खुद को व्यक्त करता हूं। मुझे  खेद है (ऐसा कहने के लिए) लेकिन जरूरी है हम वर्तमान पर ध्यान दें।’

राहुल गांधी ने इस मौके पर भाजपा सरकार पर गलत जीएसटी, विमुद्रीकरण आदि के लिए हमला किया। राहुल गांधी ने कहा – ‘भारत की आधी संपत्ति 100 लोगों के हाथों में है। और इन 100 लोगों के लिए देश चलाया जा रहा है। इन 100 लोगों में से 4 से 5 ऐसे हैं जिन्हें राजा कहा जा सकता है, क्योंकि हर संस्थान उनके लिए काम करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके लिए काम करते हैं।’

राहुल गांधी का ट्वीट -@RahulGandhi हमें अतीत में नहीं ठहरना है! वर्तमान को समझना है और देश का भविष्य संवारना है।

केजीएफ मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर पर रोक लगाई

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने राहुल गांधी, जयराम रमेश और सुप्रिया श्रीनेत के खिलाफ केजीएफ सॉन्ग कॉपीराइट उल्लंघन मामले में दर्ज एफआईआर पर शुक्रवार को रोक लगा दी। इन नेताओं के खिलाफ एमआरटी म्यूजिक कंपनी ने यह शिकायत दर्ज कराई है, जिसके पास ‘केजीएफ चैप्टर 2’ हिंदी वर्जन के अधिकार हैं।

याद रहे कांग्रेस नेताओं राहुल गांधी, जयराम रमेश और सुप्रिया श्रीनेत के खिलाफ भादंसं की धारा 403, 465, 120 बी और धारा 63 कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के तहत केस मामला दर्ज किया गया था।

कंपनी का कहना है कि उसने हिंदी में केजीएफ-2 के साउंडट्रैक के अधिकार हासिल करने के लिए मेकर्स को बड़ी रकम अदा की थी। उसका आरोप है कि कांग्रेस ने अपनी राजनीति के लिए उनकी मंजूरी लिए बिना अपने अभियान वीडियो में इस साउंडट्रैक को इस्तेमाल किया है।

नाबालिगों तक हुक्का

देश के छोटे-बड़े शहरों में चल रहे कुछ हुक्का बार नाबालिगों को भी परोस रहे तम्बाकू

बड़े शहरों में नशेड़ियों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ छोटे शहरों में नशेड़ी युवा और किशोर बढ़ रहे हैं। युवाओं और नाबालिगों को नशे के चंगुल में फँसाने वालों को इससे कोई मतलब नहीं कि वे कितना बड़ा अपराध कर रहे हैं। कानूनी तौर पर तमाम प्रतिबंधों के बावजूद आजकल हुक्का बारों में नाबालिगों को तम्बाकू तथा अन्य नशीले पदार्थ आसानी से मिल जाते हैं। भारत के बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों (टियर-II शहरों) तक में हुक्का बारों में जाकर हुक्के और चिलम से दम लगाने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसी को लेकर तहलका एसआईटी की एक खोजी रिपोर्ट :-

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‘मुझे नाबालिगों को हुक्का परोसने में कोई समस्या नहीं है। वे तम्बाकू का जो भी स्वाद माँगेंगे, स्ट्रॉन्ग या लाइट; मैं उनकी सेवा करूँगा। लेकिन हमें उस दौरान बहुत सावधान रहना होगा। अगर मेरे कैफे में नाबालिगों की हुक्का पार्टी करने की खबर लीक हो गयी, तो हम दोनों मुश्किल में पड़ जाएँगे। अधिकारी मेरा कैफे बन्द कर देंगे। कुछ ऐसा ही हाल बगल में स्थित कैफे का हुआ था। करीब 14-15 साल की एक लड़की कैफे में हुक्का पीती पकड़ी गयी। कैफे को सील कर दिया गया था, और तीन साल बाद जाकर ही उसे खोलने की अनुमति मिल पायी।’ यह बात कोलकाता स्थित क्लब 21 के प्रबंधक सपन देव ने ‘तहलका’ रिपोर्टर से कही।

बेशक कई लोग हुक्के को अपेक्षाकृत हानिरहित शगल के रूप में लेते हैं; लेकिन हुक्का धूम्रपान जल्दी ही एक आदत में भी बदल सकता है। फिर इसे लत में बदलने में भी देर नहीं लगती।

रेलवे के एक सेवानिवृत्त अधिकारी के इकलौते बेटे 21 वर्षीय निशेष (बदला हुआ नाम) ने ‘तहलका’ से बातचीत में बताया- ‘एक समय पर जब मेरे माता-पिता ने मुझे पैसे देना बन्द कर दिया, तो मैंने हुक्के की अपनी आदत को पूरा करने के लिए अपनी किडनी बेचने में मदद के लिए एक एजेंट से भी सम्पर्क किया था। मुझे स्कूल में हुक्का पीने की लत लग गयी थी, और जब मैं आगे की पढ़ाई के लिए एक इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिल हुआ, तब यह समस्या और गम्भीर हो गयी।’
निशेष के मुताबिक, जब वह सातवीं कक्षा में था, तब उसने दोस्तों के साथ समय बिताने के लिए धूम्रपान करना शुरू किया। जैसे-जैसे समय बीतता गया, उन्हें अकसर धूम्रपान करने का चस्का लग गया। धीरे-धीरे यह आदत लत में बदल गयी। लेकिन शुक्र है, परामर्श सत्रों की एक शृंखला के बाद निशेष ने आखिरकार इस आदत से छुटकारा पा लिया है और अब वह सामान्य जीवन जी रहा है। वर्तमान में वह सरकारी नौकरी में शामिल होने के लिए अपने नियुक्ति पत्र का इंतजार कर रहा है। निशेष अकेला नहीं है, जिसे हुक्का पीने की लत लग गयी है। पेशे से कैब ड्राइवर विक्की (बदला हुआ नाम) को 17 साल की उम्र में हुक्का पीने की लत लग गयी थी। वह जो भी कमाता, हुक्का पर उड़ा देता था। नशे की लत ने उसके पारिवारिक जीवन पर गहरा असर डाला, जिसका नतीजा यह हुआ कि उसकी हुक्के की आदत से परेशान उसकी पत्नी उसे 28 साल की उम्र में हमेशा के लिए छोड़कर चली गयी और उसका बेटा भी पत्नी के साथ ही चला गया।

उपरोक्त दो उदाहरणों से संकेत मिलता है कि भारत में लोग, विशेष रूप से नाबालिग गाँजा पीने और धूम्रपान करने या अन्य नशीली दवाओं के विकल्प के रूप में हुक्के की तरफ आकर्षित होने लगे हैं। लोग सोचते हैं कि हुक्का धूम्रपान नुकसानदायक ड्रग्स का एक अपेक्षाकृत हानिरहित विकल्प है और अन्य अवैध मनोरंजनों, विशेष रूप से शराब की तुलना में इसे हासिल करना भी आसान है। जब आप 18 वर्ष के हो जाते हैं, तब कानूनी रूप से तम्बाकू खरीद सकते हैं। हाई स्कूल में कुछ वरिष्ठ छात्र उन उत्पादों को खरीदने के लिए पर्याप्त अनुभवी होते हैं, जिनमें वे चीजें भी शामिल हैं, जिन्हें वे हुक्के में डालकर धूम्रपान कर सकते हैं। वे इन उत्पादों को खरीदते हैं और उन्हें अपने छोटे साथियों को देते हैं। जाहिर है शराब की तुलना में तम्बाकू प्राप्त करना आसान है।

हालाँकि हुक्का बार, जो भारत भर के महानगरों और टियर-II शहरों में तेजी से बढ़ रहे हैं; अब दबाव महसूस करने लगे हैं। एक के बाद एक राज्य सरकारें उन पर प्रतिबंध लगा रही हैं। न केवल किशोरों को हुक्का आसानी से उपलब्ध कराने के लिए, बल्कि उन सामग्रियों का उपयोग करने के लिए भी, जो कानून की नजर में अवैध हैं। नाबालिगों को तम्बाकू परोसने के लिए बेंगलूरु, हैदराबाद, नोएडा, गाजियाबाद, दिल्ली, चंडीगढ़, कोलकाता आदि शहरों में हुक्का बार में समय-समय पर छापेमारी की गयी हैं; इसके बावजूद शहरी युवाओं के लिए हुक्का बार पसंदीदा ठिकाने बने हुए हैं।

हाल में पश्चिम बंगाल सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य पर हुक्का तम्बाकू के प्रतिकूल प्रभाव का हवाला देते हुए कोलकाता में हुक्का बार पर प्रतिबंध लगा दिया। फैसले की घोषणा करते हुए कोलकाता के मेयर फरहाद हकीम ने कहा कि कोलकाता नगर निगम (केएमसी) शहर में हुक्का बार संचालित करने वाले रेस्तरां के लाइसेंस रद्द कर देगा। उन्होंने कहा कि प्रशासन को शिकायतें मिली थीं कि इन बारों में हुक्के में कुछ नशीले पदार्थों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप युवा नशेड़ी बन रहे हैं। मेयर ने कहा कि हुक्के में सलाखों द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले रसायन स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं। इसलिए हमने उन्हें बन्द करने का फैसला किया है।

यह समझाने के लिए कि क्यों एक के बाद एक राज्य सरकारें सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव का हवाला देते हुए हुक्का बारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रही हैं? ‘तहलका’ ने पश्चिम बंगाल सरकार के कोलकाता में उनके खिलाफ कार्रवाई की घोषणा करने से बहुत पहले इन बारों पर एक जाँच की थी। जाँच में खुलासा हुआ कि कैसे कुछ हुक्का बार नाबालिगों को तम्बाकू के साथ हुक्का परोस रहे थे, जो उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

भारत के संघीय खाद्य, औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम के अनुसार, खुदरा विक्रेता के लिए अब 21 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति को सिगरेट, सिगार, ई-सिगरेट और हुक्का (शीशा) सहित कोई भी तम्बाकू उत्पाद बेचना अवैध है। लेकिन ‘तहलका’ की पड़ताल से जाहिर होता है कि कैसे हुक्का बार कम उम्र के मेहमानों को नशे के साथ तम्बाकू से भरा हुक्का परोसते हैं।

हम पहली बार क्लब 21, कोलकाता में बावर्ची व प्रबंधक सपन देव से मिले। हमने सपन से एक काल्पनिक सौदे के साथ सम्पर्क किया कि हम उसके बार में 40 मेहमानों की बर्थ-डे पार्टी आयोजित करना चाहते हैं, जिनमें ज्यादातर नाबालिग बच्चे हैं; जो पार्टी में हुक्का पी रहे होंगे। सपन ने हमारे प्रस्ताव पर तुरन्त हामी भर दी। हमारे द्वारा की गयी इस मुलाकात में क्लब 21, कोलकाता में बावर्ची व प्रबंधक सपन देव ने काफी कुछ ऐसा कहा, जो चौंकाने वाला है।

रिपोर्टर : एक पार्टी आयोजित करनी है।

सपन

सपन : कौन-सी तारीख को?
रिपोर्टर : ये पब है न! क्लब 21; …हमने 26 जनवरी को एक पार्टी आयोजित करनी है, 40 लोगों की।
सपन : कितने बजे होगी?
रिपोर्टर : शाम को होगी, …बर्थ-डे पार्टी है।
सपन : हम्म, उस दिन …एक छोटा हाल है, वो ही दे पाएँगे। पूरा नहीं दे पाएँगे।
रिपोर्टर : 40 हैं।
सपन : 40 हैं, …बच्चे हैं?
रिपोर्टर : हमने देख लिया।
सपन : आपने देख लिया छोटा वाला? वास्तव में हुक्का बार है यह।
रिपोर्टर : बच्चों के लिए हुक्का तो चल जाएगा न?
सपन : अंडर 18 को वास्तव में अनुमति नहीं है। अभी अभिभावक हैं, वो ही अनुमति दे सकते हैं। पीयो-न-पीयो, आपका मामला है।
रिपोर्टर : आपको कोई दिक्कत नहीं है?
सपन : नहीं, हमको नहीं है।
रिपोर्टर : अगर कोई बच्चा हुक्का पीये, तो आपको कोई दिक्कत नहीं है?
सपन : नहीं है। अगर उसका अभिभावक इज़ाज़त देगा, तो हमें कोई परेशानी नहीं है।

अब सपन ने अपने हुक्का बार में परोसे जाने वाले तम्बाकू के फ्लेवर के बारे में ‘तहलका’ को बताया। उनके मुताबिक, उनके बार में तम्बाकू के करीब 18 फ्लेवर (सुगंध) परोसे जाते हैं।

रिपोर्टर : कितने टाइप का तम्बाकू मिलेगा उसमें?
सपन : कितने टाइप का तम्बाकू होगा?
रिपोर्टर : तम्बाकू कितने तरह के होंगे?
सपन : इसमें कितना हम देख लेते हैं शायद। हम लोगों के पास अभी 17-18 फ्लेवर का है।
रिपोर्टर : का तम्बाकू?
सपन : हाँ।

हमने सपन देव से आश्वासन लेने की कोशिश की कि वह अन्तिम समय में अपने हुक्का बार में बच्चों को जाने देने के अपने वादे से पीछे नहीं हटेंगे। हालाँकि सपन ने हमारी आशंका को दूर करने की कोशिश की। उन्होंने हमें आश्वासन दिया कि 15-16-17 आयु वर्ग के सभी 40 नाबालिग बच्चे हुक्का पार्टी के लिए उनके कैफे का उपयोग कर सकते हैं।

रिपोर्टर : ऐसा तो नहीं है, आपसे बात हुई है। हम आपको पैसा दें और आप बाद में नकार दें कि बच्चों के लिए हुक्का बार नहीं चलेगा?
सपन : नहीं, नहीं; वो नहीं होगा।
रिपोर्टर : मैं पहले ही बता रहा हूँ, …16 साल के बच्चे हैं। मस्ती करेंगे, …40 बच्चे हैं। 15-16-17 किशोर श्रेणी के होंगे, वो कर लेंगे अपने आप। यहाँ आइसोलेशन में डांस वगैरह सब कर लेंगे।
सपन : सब कर लेंगे, पर्सनल (निजी) है।

अब सपन ने 40 नाबालिग बच्चों के लिए जरूरी हुक्का की संख्या बतायी। उनके मुताबिक, एक हुक्का तीन बच्चों द्वारा इस्तेमाल किया जा सकता है।

रिपोर्टर : सपन जी! यह बताएँ कि इसमें 40 बच्चे हैं, …40 बच्चों के लिए कितना हुक्का ठीक रहेगा?
सपन : 40 बच्चों में एक हुक्का तीन आदमियों के लिए शेयर हो सकता है। उससे ज्यादा नहीं।
रिपोर्टर : एक हुक्का तीन आदमियों में।
सपन : हम्म।

सपन के मुताबिक, हमें 40 बच्चों के लिए 12 से 15 हुक्का चाहिए। इस संख्या के नीचे एक किलजॉय (आनन्द रहित) होगा, क्योंकि हम हुक्का का आनन्द नहीं ले जाएँगे।

रिपोर्टर : तो 40 बच्चों में कितने हुक्का आप देंगे?
सपन : उस हिसाब से 12 या 15 लेना चाहिए।
रिपोर्टर : 12-15 हुक्का?
सपन : हाँ, अगर इससे कम लेंगे, तो आपका फ्लेवर जल जाएगा।
रिपोर्टर : मजा नहीं आएगा?
सपन : मजा नहीं आएगा।

अब सपन ने हमें हुक्का में इस्तेमाल होने वाले तम्बाकू के फ्लेवर के नाम बताये। उनके मुताबिक, वह हुक्का में ट्री-पन, पान, सेब और रसभरी फ्लेवर का इस्तेमाल करेंगे।

रिपोर्टर : उसमें तम्बाकू कौन-सी होगी?
सपन : वो तो आपके पसन्द से। जैसे ट्री-पुन है, पान है, आपका एप्पल है, स्ट्रॉबेरी है। ये सब अलग-अलग फ्लेवर आते हैं। जो चूज करेंगे, वो ही मेन्यू देखकर देंगे।
रिपोर्टर : वो आप लगवा देंगे? …40 बच्चों में 12 हुक्के ठीक रहेंगे। एक पर तीन लगेंगे?
सपन : हाँ।

अब सपन ने हमें हुक्का की $कीमत बतायी। बड़ा हुक्का 650 से 700 रुपये की रेंज में है और छोटे की कीमत 500 रुपये का।

रिपोर्टर : तो सारे सर्व करेंगे न उस दिन?
सपन : हाँ।
रिपोर्टर : ये जितने भी हैं, छोटे-बड़े ये सारे?
सपन : नहीं बड़े का रेट अलग है। …बड़ा आपका 650-700 तक है। और छोटा 500 तक है। बार टेंडर ये जो है, ये 500 तक है। ये आपका 650 तक है, …ये 400 है।
रिपोर्टर : एक हुक्के से कितने लोग ले लेते हैं?
सपन : तीन।
रिपोर्टर : लेकिन ये हुक्का अनलिमिटेड रहेगा?
सपन : कोई नहीं, जितना हुक्का जाएगा, उतना ही बिल बनेगा।

अब सपन ने हमें सलाह दी कि प्रस्तावित हुक्का पार्टी की भनक किसी को न लगे, नहीं तो हम दोनों को परेशानी होगी और उसका कैफे बन्द हो जाएगा।

रिपोर्टर : आप लोगों को कोई दिक्कत न हो?
सपन : देखिए, उस टाइम चेकिंग हो गया किसी भी तरह से किसी के पास खबर आ गया, तो दिक्कत दोनों को ही है। मेरा तो कैफे बन्द कर देगा। और खोलने ही नहीं देगा।

तब सपन ने अपने कैफे के पास स्थित एक हुक्का बार का उदाहरण दिया, जिसे बन्द कर दिया गया था, क्योंकि उस कैफे में 14-15 साल की एक लड़की को हुक्का पीते हुए देखा गया था। दोबारा खुलने से पहले पार्लर तीन साल तक बन्द रहा।

सपन : नीचे का कैफे ऐसे ही बन्द हुआ एक बार 14-15 साल की लड़की को पकड़ लिया था। पूरा कैफे बन्द हो गया।
रिपोर्टर : किस चीज में पकड़ा गया?
सपन : हुक्का पी रहा था।
रिपोर्टर : नीचे भी हुक्का है?
सपन : नीचे हुक्का था। वो बन्द कर दिया अभी। वो तीन साल के बाद फिर से खुला है।

सपन के बाद ‘तहलका’ की मुलाकात कोलकाता स्थित हैशटैग लाइव हुक्का बार के मैनेजर देबरता घोष से हुई। हमने देबरता को वही काल्पनिक सौदा दिया कि आने वाली 26 जनवरी को हम उसके हुक्का बार में 40 लोगों की पार्टी आयोजित करना चाहते हैं, जिसमें 30 नाबालिग और 10 वयस्क शामिल हैं। देबरता ने हमारी माँग मान ली और हमसे कहा कि वह हमारे छोटे मेहमानों को हुक्का में तेज स्वाद वाला तम्बाकू देगा और हमें यह भी आश्वासन दिया कि उसके बार में एक मामूली हुक्का पार्टी का आयोजन करने से कोई समस्या नहीं होगी।

रिपोर्टर : अच्छा ये बताएँ, 30 बच्चों पर 10 हुक्का काफी रहेंगे?

मैनेजर देबरता घोष

देबरता : हाँ, हो जाएगा, कोई दिक्कत नहीं; …हो जाएगा, और अलग से एक-दो फ्लेवर चाहिए तो…?
रिपोर्टर : हार्ड फ्लेवर चाहिए सबके लिए।
देबरता : हो जाएगा।
रिपोर्टर : फ्लेवर, मतलब तम्बाकू।
देबरता : हाँ।
रिपोर्टर : कहीं कोई इश्यू तो नहीं है, बच्चों के साथ हुक्का-वुक्का पीते हुए?
देबरता : नहीं, नहीं।

देबरता ने हमें यह भी आश्वासन दिया कि जो किशोर मौज-मस्ती के लिए वहाँ आएँगे, उन्हें कोरोना प्रतिबंधों के कारण फेस मास्क पहनने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।

रिपोर्टर : देबू! मैं एक बात बताता हूँ। बच्चे मस्ती करेंगे, …कोई मास्क नहीं पहनेगा।
देबरता : नहीं, नहीं; वो सब नहीं।
रिपोर्टर : कहीं तुम हमें बोलो कि कोविड है, मास्क पहनो?
देबरता : नहीं सर!
देबरता ने अब ‘तहलका’ रिपोर्टर को आश्वासन दिया कि हमारे नाबालिग मेहमानों को ते•ा स्वाद वाले तम्बाकू के साथ हुक्का पीने की अनुमति दी जाएगी।

रिपोर्टर : हुक्का तो ले सकते हैं बच्चे?
देबरता : हाँ।
रिपोर्टर : हाँ तो, हुक्का करवा दीजिए। हुक्का में सबसे हार्ड फ्लेवर कौन-सा होता है तम्बाकू का?
देबरता : हार्ड में तो… जैसे कि गम सुपारी। पान के साथ भी मिक्स होता है। पान रजनी हो गया। मतलब बहुत सारा है। हार्ड फ्लेवर, लाइट फ्लेवर में है।

अब हम कोलकाता के तीसरे हुक्का बार ओल्ड स्ट्रीट क्लब पहुँचे और क्लब इंचार्ज फैज अहमद से मिले। हमने 40 मेहमानों की नाबालिग की हुक्का पार्टी आयोजित करने का वही काल्पनिक सौदा फैज को दिया, जिसके लिए उन्होंने तुरन्त हामी भर दी। फैज ने हमें भरोसा दिलाया कि वह हमारे मेहमानों को तेज स्वाद वाला तम्बाकू देगा, जिससे उन्हें काफी नशा होगा।

रिपोर्टर : हुक्का कौन-कौन सा है आपके पास फ्लेवर?

फैज अहमद, क्लब इंचार्ज

फैज : जो आपको चाहिए, वो मिलेगा।
रिपोर्टर : हार्ड-से-हार्ड तम्बाकू वाला।
फैज : वो हो जाएगा।
रिपोर्टर : नशा अच्छा हो जाएगा?
फैज : हाँ।
रिपोर्टर : ठीक है।

फैज ने हमारे 14-15-16 साल के नाबालिग मेहमानों को वयस्क बताया और हमें बताया कि वे अपने बार में हुक्का भी इस्तेमाल कर सकते हैं; उन्होंने कहा कि 40 मेहमानों के लिए कम-से-कम 18-20 हुक्का चाहिए।
रिपोर्टर : अच्छा ये बताएँ, 30 बच्चे हैं हमारे और 10 बड़े हैं, तो कितने हुक्के चाहिए। 40 लोग में कितना हुक्का दे देंगे आप। कितने हुक्के होने चाहिए?
फैज : बच्चे लोगों को भी लगेगा?
रिपोर्टर : हाँ।
फैज : बच्चे कितनी उम्र के हैं?
रिपोर्टर : 14,15,16 के।
फैज : मतलब जवान ही है सारे, …14-15-16 सब जवान ही हुए न सारे। हैं 40 में कम-से-कम 18-20 बेस तो लगेगा ही। कम-से-कम 20…।
रिपोर्टर : 18-20 हुक्के तो लगेंगे ही?

हमने फैज से फिर कहा कि हमारे कई मेहमान नाबालिग हैं, जिसे उन्होंने सकारात्मक रूप से स्वीकार किया।
रिपोर्टर : उसमें फैज साहब याद रखिएगा, बच्चे भी हुक्का यूज (इस्तेमाल) करेंगे।
फैज : वो तो आप लोग पहले ही बता चुके थे। बच्चा भी रहेगा, मतलब जवान टाइप के। ज्यादा भी नहीं है, नॉर्मल (सामान्य) ही है?
रिपोर्टर : 14-15 साल के।

फैज अब हमें एम.बी. रोनी से मिलवाते हैं, जो अपने क्लब में हुक्का तैयार करता है। रोनी ने हमें अपने क्लब में हुक्का में तम्बाकू के विभिन्न स्वादों के बारे में बताया। उनके अनुसार, कुछ फ्लेवर बहुत हार्ड होते हैं और काफी तेज होंगे।


रिपोर्टर : हुक्का आप ही बनाते हैं?
रोनी : हाँ, हम ही बनाते हैं।
रिपोर्टर : हुक्का में कौन-सा फ्लेवर सबसे हार्ड होता है?
रोनी : हार्ड करके कोई फ्लेवर नहीं है। लेकिन कोई फ्लेवर है, जो सर (सिर) पर हिट करता है। बहुत ज्यादा डालने के बाद कई बार हिट कर जाता है। वो ही सब फ्लेवर हैं। जैसे डबल एप्पल हो गया, ब्रेन फ्रीजर हो गया। ये सब फ्लेवर जब कोई देखने में बड़ा दिखता है, उन लोगों को देते हैं।
रोनी ने अब खुलासा किया कि उनके हुक्का बार में आने वाले बच्चे अपनी पसन्द के हिसाब से तम्बाकू का फ्लेवर ऑर्डर करते हैं।
रिपोर्टर : बच्चे कौन-सा लेते हैं, हुक्का बार में फ्लेवर?
रोनी : वो लोग अपने हिसाब से ऑर्डर देते हैं। उनके हिसाब से जो उनको ठीक लगे। जैसे की लाइट फ्लेवर है, तो मिक्स करके दे देते हैं। और समझ में नहीं आ रहा है कि बहुत ज्यादा हार्ड हो जा रहा है और कुछ फ्लेवर को ऐड करके लाइट बनाकर बच्चा लोगों को देते हैं।

‘तहलका’ की पड़ताल से पता चला कि किसी भी हुक्का बार को इस बात की चिन्ता नहीं है कि हुक्का पीने से नाबालिगों के स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है। वे नाबालिगों के लिए हुक्का पार्टी आयोजित करने की पेशकश करते हुए कैमरे में कैद हो गये और जाहिर हो गया कि उनके दिमाग में नाबालिगों के स्वास्थ्य की चिन्ता आखिरी मुद्दा है। जिन राज्यों में हुक्का पार्लरों की अनुमति है, वहाँ उन्हें सख्त दिशा-निर्देशों का पालन करना होता है और वे 18 साल से कम उम्र के युवाओं को सेवा नहीं दे सकते हैं।

लेकिन ‘तहलका’ की पड़ताल से पता चलता है कि कितने हुक्का कैफे अच्छी तरह से यह जानते हुए भी नाबालिगों को शीशा तम्बाकू बेचते हैं कि यह अवैध है। जाँच से पता चला कि कैसे क्लब 21 के प्रबंधक ने कम उम्र के ग्राहकों के लिए तम्बाकू की किस्मों का वादा करते हुए हुक्कात पार्टी की मेजबानी करने के लिए आसानी से सहमति व्यक्त की। उसने बहुत हल्के से लेकर बहुत तेज नशे उपलब्ध करने का वादा किया, जो नाबालिगों के स्वास्थ्य के साथ घिनौना खिलवाड़ है। बता दें कि शीशा पीना सिगरेट से कम खतरनाक नहीं है। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य पर हुक्का धूम्रपान के प्रतिकूल प्रभाव का हवाला देते हुए कोलकाता में हुक्का बार पर प्रतिबंध लगा दिया था

रूस का यूक्रेन की राजधानी कीव पर हमला, कई जगह धमाकों की आवाज ; ब्लैकआउट

रूस ने शुक्रवार को यूक्रेन में बड़ा हमला किया है। रिपोर्ट्स में बताया गया है कि यूक्रेन की राजधानी कीव में धमकों की आवाजें सुनी गयी हैं। कीव के मेयर ने इन धमाकों की पुष्टि की है।

कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि रूस ने बड़े पैमाने पर यह हमले किये हैं। कीव में ब्लैकआउट होने की भी खबर है। रूसी सेना के यूक्रेन के कई इलाकों को टारगेट करने की बात रिपोर्ट्स में कही गयी है।

कीव के मेयर विटाली क्लिट्सको ने कहा है कि राजधानी में धमाके हुए हैं और ब्लैकआउट हो गया है। कई शहरों में रूसी सेना ने शुक्रवार सुबह हमले किए हैं। यूक्रेन के अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि राजधानी कीव के शहर के मध्य इलाकों में धमाकों की जानकारी मिली है।

मेयर के मुताबिक राजधानी के डेसन्यान जिले में धमाकों की आवाजें सुनी गयी हैं।  जनता को सुरक्षित जगहों में जाने की ताकीद की गयी है। उधर पूर्वी खारकीव इलाके  के गवर्नर ने कहा कि रूस की तरफ से किये गए हमलों के बाद मुख्य शहर में बिजली नहीं है।

राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ ने पूरे किये 100 दिन, आज जयपुर में कार्यक्रम

राहुल गांधी के नेतृत्व में चल रही ‘भारत जोड़ो यात्रा’ ने शुक्रवार को 100 दिन पूरे कर लिए। कन्याकुमारी से शुरू हुई यह यात्रा 3500 किलोमीटर से ज्यादा चलकर कश्मीर तक जानी है। यात्रा में राहुल गांधी लगातार मौजूद रहे हैं। आज यात्रा के 100 दिन पूरे होने पर कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है जिसमें जानी मानी गायिका सुनिधि चौहान गीतों का लाइव परफॉर्मेंस देंगी।

यात्रा आज दौसा से जयपुर पहुँच रही है। वहीं सुनिधि चौहान परफॉर्म करेंगी। कार्यक्रम में राहुल गांधी भी रहेंगे। राहुल गांधी ने दौसा में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस भी की है जिसमें उन्होंने देश की एकता पर जोर दिया है। यात्रा का राजस्थान में आज आठवां दिन है। राहुल गांधी 19 दिसंबर को अलवर में सार्वजनिक सभा को संबोधित करेंगे।

भारत जोड़ो यात्रा अब तक तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश से गुजर चुकी है। यात्रा 24 दिसंबर को दिल्ली में प्रवेश करेगी और उसके बाद उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब के रास्ते जम्मू-कश्मीर पहुंचेगी।

यात्रा के दौरान ही कांग्रेस ने हिमाचल में विधानसभा का चुनाव भाजपा को हराकर बड़े बहुमत के साथ जीता है। हिमाचल के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री सहित सभी जीते 40 विधायक और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह भी आज राहुल गांधी के साथ यात्रा में शामिल हुए हैं। कल तक यह उनके साथ रहेंगे।

गुजरात में मोदी का जादू

इस बार के ‘तहलका’ के अंक में हमारी विशेष रिपोर्ट गुजरात और हिमाचल विधानसभा के चुनाव नतीजों में भाजपा और कांग्रेस की जीत पर है। हालाँकि गुजरात में यह पहले से तय दिख रहा था; लेकिन जिस आसानी और अन्तर से भाजपा ने जीत हासिल की, वह नि:सन्देह यह साबित करता है कि गृह राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जन अपील न केवल बरक़रार है, बल्कि और बढ़ी है। नतीजों के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया- ‘धन्यवाद गुजरात’। उन्होंने आगे लिखा- ‘अभूतपूर्व चुनाव परिणामों को देखकर मैं अभिभूत हूँ। लोगों ने विकास की राजनीति को आशीर्वाद दिया और साथ ही इच्छा व्यक्त की कि वे इस गति को चाहते हैं। मैं गुजरात की जन शक्ति को नमन करता हूँ।’

गुजरात के इस नतीजे की गूँज कर्नाटक, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में साल 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव में सुनी जा सकती है। हालाँकि यहाँ यह भी दिलचस्प है कि हिमाचल के विधानसभा चुनाव में भाजपा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा आगे करने के बावजूद हार का सामना करना पड़ा। गुजरात में लाभ पाने वाली दूसरी लाभार्थी आम आदमी पार्टी (आप) है, जिसने शून्य लोकसभा सांसदों के साथ भी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल कर लिया है। यह कोई छोटी बात नहीं है कि आम आदमी पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के गृह राज्य गुजरात को एक राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए चुना, जहाँ उसे जबरदस्त उछाल के साथ 12.9 फ़ीसदी वोट मिले। नियमों के अनुसार, एक राजनीतिक दल को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने के लिए चार राज्यों में कम-से-कम छ: फ़ीसदी वोट शेयर की आवश्यकता होती है। आम आदमी पार्टी पंजाब और दिल्ली में सत्ता में है और उसके पास गोवा में दो विधायक हैं। गुजरात में भी उसने पाँच सीटें जीतीं। इससे अब इस तेज़ी से उभरती पार्टी की विस्तार योजनाओं को बल मिल सकता है।

आम आदमी पार्टी ने 15 साल तक दिल्ली नगर निगम की सत्ता में रहने वाली भाजपा को भी इस बार दिल्ली की इस छोटी सत्ता से बाहर करके राष्ट्रीय राजधानी में पहली बार नागरिक निकाय का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया। आम आदमी पार्टी ने 250 वार्डों में से 134 पर जीत हासिल की, जबकि भाजपा को 104 सीटें मिलीं और कांग्रेस सिर्फ नौ के साथ तीसरे स्थान पर रही। कांग्रेस को भी कई राज्य गँवाने के बाद पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में पूर्ण बहुमत के साथ एक बार फिर से सत्ता मिल गयी। उसने वहाँ अपने मुक़ाबले में खड़ी भाजपा को हराया। कांग्रेस पार्टी ने करीब चार साल और 18 हार और कई नेताओं के भाजपा में चले जाने के बाद हिमाचल प्रदेश में बड़ी जीत हासिल की है। वह भी ऐसे समय में, जब जीत के लिए तड़प रही कांग्रेस को सब कुछ खो गया लग रहा था। इतना शोर मचाने के बावजूद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी हिमाचल में अपना खाता तक नहीं खोल पायी। उसके सबसे प्रमुख चेहरे लोकसभा के पूर्व सदस्य राजन सुशांत सहित सभी 68 उम्मीदवारों को अपनी जमानत गँवानी पड़ी। उसे कुल वैध मतों (वोटों) में से जमानत बचाने के लिए ज़रूरी 16.7 फ़ीसदी मत नहीं मिल सके।

‘तहलका’ के इस अंक की कवर स्टोरी विशेष जाँच दल (एसआईटी) के लगातार किये गये ख़ुलासे के अनुरूप, ‘नाबालिग़ों तक हुक्का’ है, जिससे उजागर होता है कि कैसे प्रतिबंध के बावजूद नाबालिग़ों को हुक्का बारों में आसानी से तम्बाकू मिल जाता है। ऐसे हुक्का बार भारत भर में महानगरों और टियर-II शहरों (द्वितीय श्रेणी के शहरों) में तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

विकास को कैसे गति देंगे दाग़ी जनप्रतिनिधि?

गुजरात विधानसभा चुनाव में चुने गये सभी 182 विधायक इन दिनों काफ़ी ख़ुश नज़र आ रहे हैं। सबसे ज़्यादा ख़ुशी भाजपा के विधायकों में है, जिनकी संख्या 156 है। लेकिन विडम्बना यह है कि गुजरात के इन नव निर्वाचित 182 विधायकों में से क़रीब 40 विधायक यानी तक़रीबन 22 फ़ीसदी विधायक आपराधिक श्रेणी के हैं। यह कोई नया मामला नहीं है, क्योंकि देश भर में सैकड़ों सांसद और विधायक आपराधिक पृष्ठभूमि के ही हैं। इसे भी देश का दुर्भाग्य कहना चाहिए, क्योंकि आपराधिक प्रवृत्ति के जनता के ये निर्वाचित प्रतिनिधि सत्ता पाने के बाद निरंकुश ही होते हैं।

हाल ही में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स’ (एडीआर) और ‘गुजरात इलेक्शन वॉच ने नवनिर्वाचित हलफ़नामों के विश्लेषण की रिपोर्ट सार्वजनिक की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, 40 आपराधिक पृष्ठभूमि के विधायकों में से 29 यानी कुल 182 विधायकों के 16 फ़ीसदी विधायकों के ख़िलाफ़ हत्या की कोशिश यानी भारतीय दण्ड संहिता की धारा-307, बलात्कार यानी धारा-376, यौन उत्पीडऩ यानी धारा-354 और महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों जैसे संगीन मामले दर्ज हैं। इन 29 में से 20 विधायक भाजपा के, चार कांग्रेस के, दो आम आदमी पार्टी के हैं, वहीं एक निर्दलीय और एक समाजवादी पार्टी का विधायक है।

भाजपा की अगर बात करें, तो उसके 26 विधायकों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले लम्बित हैं। इन विधायकों का चुना जाना जनता के चुनाव पर सवालिया निशान है और यह दर्शाता है कि आज भी लोग अपने जनप्रतिनिधियों का चरित्र नहीं, बल्कि उनका धनबल देखते हैं। बात अगर साल 2017 की करें, तो उस समय भी 47 विधायक आपराधिक प्रवृत्ति के चुने गये थे।

चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था एडीआर नवनिर्वाचित विधायकों के हलफ़नामों का विश्लेषण करने के बाद उनके चरित्र की रिपोर्ट पेश करता है। इस बार आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 40 नवनिर्वाचित विधायकों ने भी अपनी रिपोर्ट में अपने-अपने ऊपर चल रहे आपराधिक मामलों का ज़िक्र किया है। हालाँकि यह कोई गारंटी नहीं है कि हर विधायक अपने ख़िलाफ़ दर्ज सभी आपराधिक मामलों का एकदम सही-सही ब्योरा देता है। ज़्यादातर उन्हीं मामलों को विधायक अपने हलफ़नामे में उजागर करते हैं, जो संगीन और सार्वजनिक होते हैं।

गुजरात दंगों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के ख़िलाफ़ भी कई मामले दर्ज हुए, जिनमें से ज़्यादातर मामले इन दोनों बड़े नेताओं के केंद्र की सत्ता में आने के बाद ख़त्म हो गये। आज भी इन दोनों बड़े नेताओं पर कथित आरोप लगते रहते हैं। इस बार के विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान तो गृह मंत्री अमित शाह ने खुलेआम यहाँ तक कह दिया कि 2002 में इन्होंने ने हिंसा करने की कोशिश की थी, हमने इनको ऐसा पाठ पढ़ाया, चुन-चुनकर सीधा किया जेल में डाला, उसके बाद से 22 साल हो गये, कहीं कोई कफ्र्र्यू नहीं लगाना पड़ा। यह निशाना कांग्रेस पर नहीं था, बल्कि मुसलमानों पर था। भाजपा नेता और गृहमंत्री के इस बयान को लेकर यह कहना उचित ही होगा कि चुनाव प्रचार में इस तरह की भाषा जब गृहमंत्री ख़ुद बोल रहे हों, तो भाजपा के उन कार्यकर्ताओं और नेताओं की कौन कहे, जो खुलेआम कांग्रेस और मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलते फिरते हैं।

सवाल यह है कि भाजपा नेताओं के आपराधिक मामलों पर गृह मंत्री क्या कहेंगे? इस बार विधानसभा में एक ही मुस्लिम विधायक चुना गया है, जबकि 40 विधायक वो हैं, जो यह स्वीकार कर चुके हैं कि उनके ख़िलाफ़ आपराधिक मामले हैं। ज़ाहिर ही है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले इन विधायकों में ज़्यादा यानी कम-से-कम 39 या सबके सब हिन्दू ही हैं। जो लोग चुने जाने से पहले या पिछली बार विधायक बनने के दौरान अगर अपराध कर चुके हैं, तो अब क्या वे विधायक चुने जाने के बाद अपराध से तौबा करेंगे? लगता तो नहीं है।

बहुमत से सत्ता में आयी भाजपा की गुजरात सरकार को, मुख्यमंत्री भूपेंद्र भाई पटेल को और साफ़-स्वच्छ छवि के आधार पर गुजरात में लगातार 20 साल से विधानसभा चुनाव और देश में दो बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस दिशा में भी काम करना चाहिए कि उनके राज्य में किसी दाग़ी नेता को भी टिकट नहीं मिलना चाहिए। लेकिन भाजपा से ही ऐसे जन प्रतिनिधियों को टिकट मिलना विडम्बना नहीं, तो और क्या है? स्वच्छ राजनीति की बात कहने वाले प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे अब देश की राजनीति में स्वच्छ छवि के नेताओं को स्थापित करने से पहले अपनी पार्टी में साफ़-स्वच्छ छवि के नेताओं को जगह दें और आपराधिक प्रवृत्ति ही नहीं, बल्कि आपराधिक आरोपों से घिरे नेताओं के ख़िलाफ़ भी सख़्ती से पेश आएं। उन्हें इस बात का ध्यान रखना होगा कि उनकी केंद्र की सरकार में भी कई नेता और मंत्री दाग़ी हैं।

हिमाचल प्रदेश में भी इस बार चुने गये 41 फ़ीसदी विधायक दाग़ी हैं। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस के 40 प्रत्याशियों में से 23 विधायकों पर घोषित आपराधिक मामले और नौ विधायकों पर गम्भीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। वहीं भाजपा के कुल 25 विधायकों में से पाँच पर घोषित आपराधिक मामले, जबकि तीन विधायकों पर गम्भीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इस बार सन् 2017 के मुक़ाबले नौ फ़ीसदी ज़्यादा विधायक हिमाचल में आपराधिक श्रेणी के हैं। आज देश में एक भी ऐसी पार्टी नहीं है, जिसमें दागडी चेहरे न हों।

 

घट रहा मुस्लिम प्रतिनिधित्व

इस बार के गुजरात चुनाव में एक ही मुस्लिम विधायक चुनकर विधानसभा तक पहुँच सका है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि गुजरात में पहले भी मुस्लिम विधायकों का टोटा रहा है; लेकिन इस बार मुस्लिम बहुल 73 विधानसभा सीटों पर 230 मुस्लिम उम्मीदवारों के मैदान में होने के बावजूद सिर्फ़ एक मुस्लिम विधायक का चुना जाना हैरान करता है। हालाँकि सन् 1980 के विधानसभा चुनाव के बाद से ही मुस्लिम विधायकों की संख्या लगातार गिरती रही है। सन् 1990 में भी तीन ही मुस्लिम उम्मीदवार जीते थे। सन् 2002 के बाद भाजपा ने मुस्लिम उम्मीदवारों को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया है, वहीं कांग्रेस ने भी साल 2002 से छ: मुस्लिम उम्मीदवारों से ज़्यादा को कभी टिकट नहीं दिया। सन् 2017 में कांग्रेस के तीन मुस्लिम उम्मीदवार जीतकर विधानसभा पहुँचे थे। वहीं सन् 1984 में अहमद भाई पटेल के सांसद बनने के बाद आज तक कोई मुस्लिम सांसद गुजरात से नहीं जीत सका है। अहमद भाई पटेल तीन बार लोकसभा सांसद और पाँच बार राज्यसभा सांसद रहे थे। हालाँकि केंद्र में मंत्री एक बार भी नहीं बने। जबकि गुजरात में क़रीब नौ से 10 फ़ीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। कुल 182 विधानसभा सीटों में से 30 से अधिक विधानसभाओं में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 15 फ़ीसदी से ज़्यादा, तो 20 विधानसभाओं में 20 फ़ीसदी से भी ज़्यादा है। सन् 2011 की जनगणना के मुताबिक उस समय गुजरात की मुस्लिम आबादी क़रीब 10 फ़ीसदी थी।

चुनाव परिणाम: भाजपा की जीत-हार

गुजरात की बम्पर जीत ने भाजपा की हिमाचल और दिल्ली में हार ढक दी । साल 2022 देश की राजनीति में काफ़ी कुछ अलग रहा। चुनाव की बात करें, तो साल के जाते-जाते भाजपा ने मोदी की लोकप्रियता के बूते गुजरात में बम्पर जीत हासिल की; लेकिन इन्हीं मोदी की लोकप्रियता दिल्ली के नगर निगम और हिमाचल के विधानसभा चुनाव में काम नहीं कर पायी और भाजपा को सत्ता गँवानी पड़ी। इसके अलावा दिसंबर में ही अलग-अलग राज्यों में छ: विधानसभा और एक लोकसभा सीट के उप चुनाव में भी भाजपा को दो ही विधानसभा सीटें मिलीं। भाजपा ने भले इन हारों को गुजरात की बम्पर जीत से ढकने की कोशिश की हो; लेकिन सत्य यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव उसके लिए सन् 2019 जैसे सरल नहीं होंगे। बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

क्या गुजरात विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड तोड़ जीत भाजपा को 2024 में होने वाले आम चुनाव में जीत की गारंटी देती है? शायद नहीं। गुजरात में भाजपा की जीत शुद्ध रूप से मोदी के प्रति राज्य की जनता का समर्थन, ठीक-ठाक स्तर पर भाजपा के बड़े नेताओं की तरफ़ से किया गया धार्मिक ध्रुवीकरण, ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी का अपने लिए सहानुभूति जुटाना जैसे कारकों का नतीजा है। प्रधानमंत्री मोदी को भाजपा ने हिमाचल के विधानसभा चुनाव में भी अपना चेहरा बनाया था; लेकिन वहाँ कांग्रेस बहुमत से जीती। ऐसा ही हाल दिल्ली के नगर निगम चुनाव में रहा, जहाँ मोदी के चेहरे के बावजूद लोगों ने अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी पर ज़्यादा भरोसा किया।

उत्तर भारत में भाजपा को 2024 की मंज़िल पाने से पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के रास्ते से गुज़रना है, जबकि दक्षिण के कर्नाटक में भी कांग्रेस उसे मज़बूत चुनौती दे सकती है। इन सभी राज्यों में आम आदमी पार्टी की ज़्यादा सम्भावना नहीं है। लिहाज़ा कांग्रेस के वोट बँटने का ख़तरा भी कम रहेगा; भले कर्नाटक में उसे जनता दल(एस) से चुनौती रहेगी।

गुजरात का जनादेश:

कुल सीटें- 182

भाजपा   156

कांग्रेस    17

आप      05

सपा      01

अन्य     03

 

 

आप बनाम कांग्रेस

गुजरात में बड़ी जीत ने निश्चित ही भाजपा ख़ेमे में जोश भर दिया है, जहाँ सन् 2017 के चुनाव में उसे कांग्रेस ने ख़ूब पानी पिलाया था। इस बार कांग्रेस ने चुनाव को ऐसे लिया, मानो उसे यह जीतना ही न हो। ऊपर से आम आदमी पार्टी (आप) ने 12.9 फ़ीसदी वोट (मत) लेकर कांग्रेस को काफ़ी नुक़सान पहुँचाया। एक मोटे अनुमान के मुताबिक, आप कांग्रेस के हिस्से के कुछ लाख नहीं क़रीब 35 लाख (क़रीब 12 फ़ीसदी) वोट अपने पाले में ले गयी। राज्य की कुल 182 सीटों में से 35 सीटों पर आप ने कांग्रेस को तीसरे नंबर पर धकेल दिया। पांच सीटें आप ने जीतीं भी। लिहाज़ा कांग्रेस को इन 40 सीटों पर आप ने सीधा नुक़सान पहुँचाया।

गुजरात में कांग्रेस को सन् 1990 के बाद पहली बार सबसे कम वोट मिले हैं। यहाँ तक कि सन् 1990 की आडवाणी की रथ यात्रा वाली राम लहार में भी कांग्रेस ने 31 फ़ीसदी वोट हासिल किये थे। इस बार कांग्रेस का वोट प्रतिशत 27.3 तक आ गया और हाथ में सीटें रह गयीं महज़ 17 ही। पंजाब में कुछ इस तरह ही आप ने अपना सत्ता का रास्ता बनाया था। यदि कांग्रेस अब भी सक्रियता, संगठन और प्रदेश नेतृत्व पर फोकस नहीं करती है, तो आप उसका आधार खा सकती है। हाँ, इसके लिए आप को भी ज़मीन पर काम रहना होगा; क्योंकि ग्रामीण इलाक़ों में अभी भी कांग्रेस को लोग मानते हैं।

आपने सन् 2017 में भी गुजरात चुनाव लड़ा था। तब उसे 29,000 से कुछ ही ज़्यादा वोट मिले थे। लेकिन इस बार उसके कुल वोटों की संख्या 41 लाख पार कर गयी। यदि कांग्रेस की बात करें, तो उसे इस बार 86.83 लाख वोट मिले, जबकि सन् 2017 के विधानसभा चुनाव में उसने 1.24 करोड़ वोट हासिल किये थे। इनमें से उसके ज़्यादातर वोट आप के खाते में गये।

कांग्रेस चुनाव में कितनी गम्भीर थी, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिन राहुल गाँधी ने 2017 के चुनाव में गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए 30 जनसभाएँ की थीं। लेकिन इस बार राहुल सिर्फ़ एक दिन दो रैलियाँ करने पहुँचे। उनके विपरीत प्रधानमंत्री मोदी ने 31 जनसभाएँ कीं और केजरीवाल ने 19 रैलियाँ कीं। दोनों ने रोड शो अलग से किये। तब कांग्रेस को 41 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिले थे और इस बार 27 फ़ीसदी।

इसमें कोई शक नहीं कि पार्टी अध्यक्ष न होने के बावजूद राहुल गाँधी ही जनता में कांग्रेस का असली चेहरा हैं। उनका न आना कांग्रेस को भारी पड़ा, बेशक इसके अलग कारण थे। मल्लिकार्जुन खडग़े ऐसा नेता नहीं, जो कांग्रेस को वोट दिला सकें। वह राहुल गाँधी की तरह देशव्यापी छवि वाले नेता नहीं। न वह राहुल जैसे भाग-दौड़ कर सकते हैं। दूसरी तरफ़ प्रधानमंत्री मोदी ऊर्जा से भरे रहते हैं। गुजरात चुनाव से निपटते ही अहमदाबाद से आकर शाम को दिल्ली में वे भाजपा की बैठक में पहुँच गये। कांग्रेस ने ख़ुद को 2024 के लोकसभा चुनाव पर फोकस कर दिया है और राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ उसी का हिस्सा है। पार्टी के दक्षिण से एक सांसद ने कहा- ‘राहुल कांग्रेस की उम्मीद हैं, इसमें कोई दो-राय नहीं। जनता उनसे प्यार करती है, यह भारत जोड़ो यात्रा से साबित हो गया है। दक्षिण में इस यात्रा ने कांग्रेस की ज़मीन को मज़बूत किया है और पार्टी कार्यकर्ता बहुत सक्रिय हो गया है। लेकिन मेरे विचार में राहुल जी को गुजरात और हिमाचल दोनों जगह चुनाव प्रचार में जाना चाहिए था। यात्रा का समय चुनाव से क्लैश नहीं करना चाहिए था।’

भाजपा का ध्रुवीकरण

भाजपा गुजरात को किसी भी सूरत में जीतना चाहती थी। यह चुनाव उसके दो बड़े नेताओं- प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह के चुनाव प्रचार में बयानों और ध्रुवीकरण की खुली कोशिशों से साफ़ ज़ाहिर हो गया था। इसकी तैयारी भाजपा ने तब कर दी, जब पार्टी की सरकार ने बिलकिस बानो रेप मामले के दोषियों को छोड़ दिया। इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने खुलकर बयान दिया- ‘2002 के दोषियों को ऐसी सज़ा दी गयी कि वे दोबारा सिर नहीं उठा सके।’

धार्मिक आधार पर वोटों ध्रुवीकरण की यह बहुत बड़ी कोशिश थी। भाजपा सरकार ने चुनाव से ऐन पहले बिलकिस बानो रेप मामले के दोषियों को जब रिहा किया, उसके महज़ ढाई महीने बाद ही प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए। नतीजा देखिये कि बिलकिस बानो के दोषियों को रिहा करने वाली सरकारी समिति के सदस्य सी.के. राउलजी ने भाजपा के टिकट पर गोधरा से बम्पर 35,000 वोटों से जीत हासिल की। यह एक ऐसी सीट है, जहाँ मुस्लिम भी बड़ी संख्या में हैं। राउलजी को भाजपा ने टिकट दिया, जिससे इलाक़े में हिन्दू-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण हो गया। इसका असर गोधरा से बाहर भी पड़ा। पंचमहल ज़िले में गोधरा समेत कुल पाँच विधानसभा सीटें हैं और सभी पर भाजपा की जीत हुई।

दिलचस्प यह भी है कि सन् 2007 और सन् 2012 में राउलजी कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जीते थे। उन्हें हिन्दू और मुस्लिम दोनों वोट मिले थे। इस बार भाजपा ने उन्हें साथ लिया और ध्रुवीकरण के सहारे बम्पर वोट हासिल कर लिये। इसके अलावा भाजपा ने नारोदा पाटिया नरसंहार के दोषी मनोज कुकरानी की बेटी पायल कुकरानी को टिकट दिया। फरवरी, 2002 के इन दंगों में 97 मुसलमानों की जान गयी थी और 32 लोगों को कोर्ट ने दोषी ठहराया था, जिनमें कुकरानी शामिल हैं। पायल ने यह चुनाव 83,000 के वोटों के बड़े अन्तर से जीता। ध्रुवीकरण का एक और बड़ा उदाहरण अहमदाबाद में एलिसब्रिज की सीट है, जहाँ भाजपा ने अमित पोपटलाल शाह को मैदान में उतारा। पूर्व मेयर पोपटलाल को टिकट देने के लिए दो बार से लगातार चुनाव जीत रहे विधायक का टिकट काट दिया। याद रहे इन्हीं पोपटलाल का नाम हीरेन पांड्या हत्याकांड में बहुत चर्चा में रहा था। यह माना जाता है कि अहमदाबाद एलिसब्रिज सीट से चुनाव लडऩे वाले पांड्या भाजपा में नरेंद्र मोदी के मुखर विरोधी थे। इन्हीं पांड्या की हत्या मामले में पोपट लाल शाह का नाम आया था। भाजपा ने उन्हें अहमदाबाद से मैदान में उतारा, जिसका असर इस ज़िले की 21 सीटों पर पड़ा। इनमें से भाजपा ने 19 जीत लीं।

भाजपा को फ़ायदा या नुक़सान?

बेशक गुजरात, हिमाचल (दोनों विधानसभा) और दिल्ली (एमसीडी) के इन तीन चुनावों में जनता ने भाजपा, कांग्रेस और आप सभी को कुछ-न-कुछ दिया है; लेकिन जनता में भाजपा अपनी बम्पर जीत को भुनाने में सबसे आगे रही है। गुजरात की जीत के बाद शाम को ही भाजपा के कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा- ‘यह बड़ी जीत ज़ाहिर करती है कि देश की जनता भाजपा को चाहती है और उसको भरपूर प्यार दिया।’

वास्तव में यह प्यार गुजरात से बाहर हिमाचल और दिल्ली में भाजपा को नहीं मिला। लेकिन सच यह है कि यह मोदी के शब्दों की चतुराई भर थी। गुजरात के साथ ही हुए दो चुनावों में भाजपा को हार मिली, जिसे वो बहुत चतुराई से गोल कर गये। हिमाचल में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में बहुत हासिल कर बता दिया कि भाजपा को हराया जा सकता है। वहाँ भाजपा ने मोदी का चेहरे सामने रखकर ही चुनाव लड़ा था। ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने हिमाचल जैसे छोटे राज्य में चार दौरे किये और 10 के क़रीब चुनाव जनसभाएँ कीं। प्रदेश का होने के कारण भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा तो काफ़ी समय तक हिमाचल में रहे। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर भी हिमाचल के ही हैं।

गुजरात की बात करें, तो मोदी और शाह ने एक बार फिर साबित किया कि अपने गृह राज्य में उनकी बेहतरीन पकड़ है। वे जनता की नब्ज़ पहचानते हैं और संकट में चुनाव कैसे जीता जा सकता है, इसका प्रबंधन भी करना जानते हैं। गुजरात की 182 सीटों में से भाजपा की 156 सीटों पर जीत कोई छोटी जीत नहीं है। भाजपा का एजेंडा सर्वविदित है। वह उसे छिपाती नहीं है। गृह मंत्री अमित शाह ने बिना किसी लाग लपेट के सन् 2002 के दंगों पर टिप्पणी की। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषणों में जो कहना था, कहा।

इस चुनाव में सबसे ज़्यादा नुक़सान निश्चित ही कांग्रेस का हुआ है। सबको पता था कि आम आदमी पार्टी गुजरात में सरकार तो नहीं ही बना पाएगी, दूसरे नंबर पर भी नहीं रहेगी। लेकिन इसके बावजूद उसका प्रचार ऐसा था, मानों सरकार बनाने जा रही हो। चुनाव से पहले केजरीवाल ने तो मीडिया के सामने एक पर्ची पर सीटें तक लिख दी थीं। अब चुनाव बाद का दृश्य देखिए। केजरीवाल ने एक बार भी चुनाव में तीसरे नंबर पर रहने का मलाल ज़ाहिर नहीं किया, बल्कि इस बात पर ख़ुशी ज़ाहिर की कि उनकी पार्टी राष्ट्रीय पार्टी बन गयी। दरअसल केजरीवाल को भी पता था कि वह जीत नहीं सकती। उनकी रणनीति ही छ: फ़ीसदी से ज़्यादा वोट लेने की थी, ताकि राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल सके। आप इसमें सफल रही।

गुजरात की जीत को भाजपा और उनका थिंक टैंक 2024 के आम चुनाव के लिए भुनाना चाहता है। लेकिन पार्टी को भी पता है कि गुजरात से बाहर हिमाचल और देश की राजधानी के निगम चुनाव में उसे मात मिली है। दक्षिण में राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा ने भाजपा के विस्तार की योजनाओं को धक्का दिया है। उसे अब वहाँ पहले से कहीं ज़्यादा मेहनत करनी होगी। दूसरा कारण यह भी है कि गुजरात का जनादेश दक्षिण राज्यों में कोई असर नहीं डालता। उत्तर भारत कांग्रेस की कमज़ोर कड़ी है। हालाँकि यदि वह अगले साल के विधानसभा चुनाव में हिमाचल के बाद राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में कुछ कमाल कर पाती है, तो भाजपा के लिए 2024 में गम्भीर चुनौती पेश कर सकती है।

गुजरात में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लिए वोट माँगे और उन्हें मिले; लेकिन ऐसा हिमाचल में नहीं हुआ। लिहाज़ा भाजपा सिर्फ़ गुजरात के बम्पर जीत के भरोसे बहुत आश्वस्त नहीं हो सकती। हिमाचल और एमसीडी के चुनाव में उनके ब्रांड नाम पर वोट नहीं पड़े। हो सकता है कि लोकसभा के चुनाव में जनता अलग तरीक़े से सोचे। क्योंकि उसके सामने मोदी का कोई स्पष्ट राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प नहीं है। राज्यों में ऐसी स्थिति नहीं है। राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के अलावा टीएमसी, डीएमके जैसे क्षेत्रीय दल वहाँ काफ़ी मज़बूत हैं।

भूपेंद्र पटेल फिर बने मुख्यमंत्री

गुजरात में एक बार फिर भूपेंद्र पटेल मुख्यमंत्री बन गये। प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की उपस्थिति में 12 दिसंबर को उन्होंने राज्यपाल आचार्य देवव्रत से पद की शपथ ली। पाटीदार आन्दोलन को ख़त्म करने में भूपेंद्र पटेल ने बड़ी भूमिका निभायी थी। उनके दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने से ज़ाहिर हो जाता है कि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह उनके नेतृत्व से ख़ुश हैं। भूपेश को तब मुख्यमंत्री बनाया गया था, जब कुछ महीने पहले भाजपा ने गुजरात की पूरी सरकार ही बदल दी थी। कहा जाता है कि ऐसा एंटी-इंकम्बेंसी से बचने के लिए किया गया। गुजरात मोदी-शाह का गृह राज्य है; लिहाज़ा वहाँ मुख्यमंत्री का कामकाज हमेशा परीक्षा के पैमाने पर रहता है।

 

हिमाचल में कांग्रेस की जबरदस्त वापसी

यह बहुत दिलचस्प बात है कि प्रियंका गाँधी का कांग्रेस राजनीति में हिमाचल से कोई सीधा नाता नहीं। वह पार्टी महासचिव के नाते उत्तर प्रदेश की प्रभारी हैं। हाँ, उनका शिमला के छराबड़ा में घर ज़रूर है। लेकिन प्रियंका ने इस बार हिमाचल चुनाव की कमान जिस तरीक़े से सँभाली, उसने सबको हैरान कर दिया। कांग्रेस की प्रदेश में सत्ता में वापसी का श्रेय कुछ हद तक प्रियंका को दिया जा सकता है। कांग्रेस नेताओं के मुताबिक, अग्निवीर योजना का विरोध और पुरानी पेंशन के वादे को सबसे ऊपर रखने का सुझाव प्रियंका गाँधी का ही था। शिमला के अपने घर में बैठकर उन्होंने चुनाव की रणनीति बुनी और लगातार नेताओं का फीडबैक लिया। काफ़ी नेताओं ने ‘तहलका’ से बातचीत में स्वीकार किया कि प्रियंका काफ़ी तेज़ तर्रार रणनीतिकार हैं और आक्रामक भी हैं।

 

हिमाचल का चुनाव जीतकर कांग्रेस ने यह सन्देश दिया है कि जनता के सही मुद्दों के साथ चुनाव लड़ा जाए, तो भाजपा को हराया जा सकता है। भाजपा भले गुजरात के नतीजे में हिमाचल की अपनी हार छिपा लेना चाहती हो, सच यह है कि वहाँ प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे को सामने रखकर चुनाव लडऩे के बावजूद उसे कांग्रेस से हार मिली है। भाजपा अब वोट शेयर प्रतिशत की आड़ ले रही है; लेकिन उसके और कांग्रेस में 14 सीटों का अन्तर है। अपने ज़िले में 10 में से आठ सीटें भाजपा को जिताने के बावजूद जयराम ठाकुर भाजपा के लिए कमज़ोर कड़ी साबित हुए।

भाजपा ने दिग्गज नेता और दो बार मुख्यमंत्री रहे प्रेम कुमार धूमल को एकदम किनारे कर दिया, और यह चीज़ उसे बहुत भारी पड़ी। भाजपा के ही भीतर कई बड़े नेताओं का मानना था कि यदि धूमल को हमीरपुर हलक़े से मैदान में उतारा गया होता, तो भाजपा की झोली में कुछ और सीटें आतीं और कांग्रेस के लिए चुनाव फँस जाता। धूमल से हुई ज्यादती से राजपूत वोट बड़े पैमाने पर कांग्रेस के साथ गया। यही नहीं, ऊपरी हिमाचल में, जहाँ धूमल का ख़ासा प्रभाव था; में भाजपा को सीटों के लाले पड़ गये। शिमला, सिरमौर, सोलन में भाजपा की बुरी गत हुई और प्रदेश के सबसे बड़े ज़िले कांगड़ा में उसे 15 में चार ही सीटें मिलीं। इस चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी ने हिमाचल में चार दौरे किये और 10 के क़रीब जनसभाओं को सम्बोधित किया। लेकिन इसके बावजूद भाजपा जीत नहीं पायी। आम आदमी पार्टी (आप) को तो जनता ने सिरे से ही ख़ारिज कर दिया और उसके खाते में बमुश्किल कुछ हज़ार ही वोट आये।

आँकड़ों का खेल

भाजपा हारने के बाद कांग्रेस और उसके वोट शेयर में सिर्फ़ एक फ़ीसदी का ही अन्तर होने का ढिंढोरा तो पीट रही है; लेकिन यह नहीं बता रही कि सन् 2017 के मुक़ाबले में उसे जनता ने 6.3 फ़ीसदी वोट कम दिये। सन् 2017 के चुनाव में भाजपा को 44 सीटों के साथ 49.2 वोट मिले थे। अब 42.9 फ़ीसदी वोट मिले हैं। अर्थात् पिछली बार से 19 सीटें कम मिली और 6.3 फ़ीसदी वोट कम।

उधर कांग्रेस को सन् 2017 में 42.1 फ़ीसदी वोट मिले थे और सीटें 21 मिली थीं। इस बार उसे सीटें मिली हैं 40 और उसका वोट शेयर 43.9 फ़ीसदी रहा। अर्थात् पिछली बार से 1.8 फ़ीसदी ज़्यादा मत मिले और सीटें 19 ज़्यादा। निर्दलीय दोनों बार 3-3 ही जीते। हिमाचल के चुनाव में कांगड़ा ज़िला हमेशा निर्णायक साबित होता रहा है और इस बार 15 में से 10 सीटें कांग्रेस को मिली हैं। पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का नाम चुनाव में ख़ूब भुनाया और आख़िर में उनकी फोटो के साथ एक पोस्टर भी जारी किया, जिसमें लिखा था- ‘मुझे भूल न जाना’। इसके मुक़ाबले भाजपा का नारा था- ‘रिवाज़ बदलेंगे।’ जनता को कांग्रेस का नारा ज़्यादा भाया, क्योंकि वीरभद्र सिंह का क़द इतना बड़ा था कि लोग उनके नाम से ही वोट देते थे। भाजपा ने सन् 2012 में मिशन रिपीट का नारा दिया था; लेकिन तब भी उसे कामयाबी नहीं मिली थी।

कांग्रेस ने जनता की नब्ज़ को समझते हुए वादे किये, जिनमें सबसे लुभावना था- ‘पुरानी पेंशन स्कीम (ओपीएस) लागू करना।’ हिमाचल में कॉरपोरेट (निजी क्षेत्र) नाममात्र का ही है और सरकारी कर्मचारी चुनाव में बहुत प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं। कांग्रेस ने कहा कि उसकी सरकार आयी, तो पहली ही केबिनेट बैठक में इसे पास कर दिया जाएगा। उसका इसे लाभ मिला। इस चुनाव में कांग्रेस ने कांगड़ा, शिमला, सोलन, ऊना, हमीरपुर, और किनौर में लगभग एकतरफ़ा जीत हासिल की। दिवंगत वीरभद्र सिंह के गढ़ शिमला में कांग्रेस ने आठ में से सात सीटें जीत लीं। कांगड़ा में 15 में 10, धूमल के गढ़ हमीरपुर में पाँच में चार (एक कांग्रेस का बा$गी), सोलन में चार में चार, ऊना में चार में तीन, किन्नौर और लाहुल स्पीति में सभी एक-एक सीटों पर जीत हासिल की।

यहाँ दिलचस्प यह है कि कांग्रेस में जो मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे, उनके ज़िलों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा। जैसे शिमला में प्रतिभा सिंह, हमीरपुर में सुखविंदर सुक्खू, ऊना में मुकेश अग्निहोत्री, कांगड़ा में चौधरी चंद्र कुमार और सोलन में कर्नल (सेवानिवृत्त) धनी राम शांडिल मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे।

यदि आँकड़ों पर नज़र दौड़ाएँ, तो ज़ाहिर होता है कि पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के कारण भाजपा का गढ़ रहा हमीरपुर संसदीय क्षेत्र, जिसमें 17 सीटें हैं, जिन पर कभी भाजपा का दबदबा था। इस बार इन 17 सीटों में महज़ पाँच ही सीटें भाजपा को मिलीं। यहाँ दिलचस्प यह है कि धूमल के पुत्र और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और भाजपा के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के गृह क्षेत्र इसी लोकसभा सीट के तहत आते हैं। साफ़ है कि धूमल की लोकप्रियता का मुक़ाबला, न तो उनके बेटे अनुराग ठाकुर कर पाये हैं: न ही जे.पी. नड्डा।

धूमल न सिर्फ़ दो बार मुख्यमंत्री बने, दो बार लोकसभा के लिए भी चुने गये, जिसमें एक बार सर्वश्रेष्ठ सांसद का ख़िताब भी उन्हें मिला था। ज़ाहिर है धूमल की सक्रिय राजनीति का सूर्य अब अस्त हो गया है। पार्टी के कुछ और नेता, जिनमें रमेश ध्वाला भी शामिल हैं; अब शायद ही टिकट हासिल कर सकें। धूमल को लेकर यह ज़रूर कहा जाता है कि पार्टी उनकी सेवाओं को देखते हुए राज्यपाल बना सकती है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि धूमल हमेशा पार्टी के लिए वफ़ादार रहे और जब भी उन्हें चुनाव लडऩे को कहा गया, उन्होंने लोकसभा से लेकर विधानसभा तक पार्टी को जीत दिलायी।

पद की लड़ाई

कांग्रेस ने अच्छी-ख़ासी सीटों से चुनाव तो जीत लिया; लेकिन इसके बाद मुख्यमंत्री पद हासिल करने के लिए पार्टी की ख़ासी छीछालेदर नेताओं ने करवा दी। एक मौक़े पर प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह के समर्थक दिल्ली से भेजे गये आब्जर्वर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कार पर ही चढ़ गये। सुखविंदर सिंह सुक्खू, जो प्रतिभा की ही तरह मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, 9 दिसंबर को शिमला में आलाकमान के दूतों की बुलायी बैठक में तय वक़्त से कई घंटे बाद पहुँचे। अपने समर्थक विधायकों को भी उन्होंने रोके रखा।

यह सब दबाव बनाने के लिए था, जिससे ऑब्जर्वर ख़फ़ा भी हुए। पार्टी दफ़्तर के बाहर इन दोनों के समर्थकों ने हंगामा अलग से किया। एक मौक़े पर प्रतिभा और सुक्खू समर्थक नारे लगाते हुए आपस में ही धक्का-मुक्की तक करने लगे। इन दोनों नेताओं के विपरीत पद के बड़े दावेदार मुकेश अग्निहोत्री शान्त रहे और टीवी चैनलों के सामने कोई दावा भी नहीं किया। अन्य दावेदारों हर्षवर्धन सिंह चौहान, चौधरी चंद्र कुमार, धनी राम शांडिल आदि ने भी कोई हंगामा नहीं किया।

सुक्खू अपने समर्थकों के कन्धे पर बैठकर कांग्रेस भवन पहुँचे, तो प्रतिभा के बेटे विक्रमादित्य सिंह के समर्थक भी उन्हें कन्धे पर बैठाकर ‘शेर आया, शेर आया’ के नारे लगाते हुए दफ़्तर पहुँचे। ‘शेर आया’ का यही नारा वह प्रतिभा सिंह के पति और विक्रमादित्य सिंह के पिता दिवंगत वीरभद्र सिंह के लिए भी लगाया करते थे। इस सारे हंगामे का यह असर हुआ कि 9 दिसंबर को कांग्रेस की बैठक कई घंटे बाद रात 9:00 बजे शुरू हो पायी। इससे आब्जर्वर भी ख़ासे नाराज़ दिखे। चुने विधायकों का फीडबैक लेने आये ऑब्जर्व प्रदेश प्रभारी राजीव शुक्ल, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा बेचैन दिखे।

शायद वह इस बात से हैरान थे कि क़ीमती जीत के बावजूद कुर्सी के लिए पार्टी नेता नेतृत्व की फ़ज़ीहत करवा रहे हैं। कांग्रेस में यह लड़ाई नयी नहीं थी, क्योंकि जनवरी, 2019 में जब सुखविंदर सिंह सुक्खू की जगह कुलदीप राठौर को आलाकमान ने प्रदेश अध्यक्ष बनाया था, तब भी उनकी ताजपोशी के वक़्त पार्टी दफ़्तर में हिंसक प्रदर्शन हुआ था। सुक्खू और वीरभद्र सिंह समर्थकों में लात-घूँसे और कुर्सियाँ चली थीं। यहाँ तक की एक कार्यकर्ता इतना घायल हो गया कि उसे अस्पताल ले जाने की नौबत आ गयी थी।

विपक्ष की रणनीति

इन दो राज्यों के चुनावों के बाद विपक्षी दलों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी और तेज़ी से उस पर काम करना होगा, क्योंकि कुछ ही महीने के बाद 2024 का लोकसभा चुनाव उनके सिर पर आकर खड़ा हो जाएगा। आज की तारीख़ में कांग्रेस सक्रिय दिखने लगी है। भारत जोड़ो यात्रा से उसने काफ़ी कुछ हासिल किया है। इसमें सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि जिन जिन राज्यों से यात्रा गुज़री है, वहाँ कांग्रेस का कार्यकर्ता सक्रिय हो गया है। उसे उम्मीद बँधी है कि पार्टी कमाल कर सकती है। दक्षिण राज्यों के बाद राहुल गाँधी की यात्रा में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान में लोग बड़ी संख्या में जुड़ते दिखे हैं। राहुल गाँधी की यात्रा में शामिल हुईं हिमाचल कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा- ‘सच कहूँ, तो राहुल जी के प्रति जनता का प्यार देखकर मैं हैरान थी। लोग उन्हें देखने और सुनने के लिए उताबले थे, क्योंकि वह सिर्फ़ जान मुद्दों पर बात करते हैं। वह सरल हैं और कोई भी उनसे मिल सकता है। अपनी सहज बातों से वह किसी भी उम्र और लिंग के व्यक्ति को प्रभावित करते हैं।’

टीएमसी की नेता ममता बनर्जी हाल के महीनों में विपक्षी एकता के प्रति काफ़ी सक्रिय दिखी हैं। हालाँकि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव के बाद उनकी सक्रियता घटी है। लेकिन इसके यह मायने नहीं कि उनकी राष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षा नहीं है। देश के कई क्षेत्रीय दलों के नेताओं से उनके व्यक्तिगत रिश्ते हैं और वह उन्हें समर्थन दे सकते हैं। कांग्रेस फ़िलहाल अपना जनाधार बढ़ानी की कोशिश में है। दक्षिण में उसने इसकी शुरुआत की है। यह देखना दिलचस्प होगा कि उत्तर भारत में यात्रा के दौरान उनसे जुड़ रही जनता क्या वोट भी कांग्रेस को देती है।

सुक्खू बने मुख्यमंत्री, मुकेश उप मुख्यमंत्री

पिता सरकारी बस के चालक रहे और कॉलेज में पढ़ते हुए दूध बेचा। यही सुखविंदर सिंह सुक्खू अब मुख्यमंत्री बन गये हैं। राहुल गाँधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े, चुनाव रणनीति में बड़ी भूमिका निभाने वाली पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी की

उपस्थिति में 11 दिसंबर को सुक्खू ने उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री के साथ राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर से पद की शपथ ली। मुकेश का 20 साल पहले पत्रकार के रूप में दिल्ली में कांग्रेस की बीट करते हुए बड़े नेताओं से जो सम्बन्ध बना, वह उन्हें इस बार मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल कर गया। अफ़सरशाही पर मज़बूत पकड़ रखने वाले मुकेश इस सरकार में सबसे दबंग चेहरा होंगे, जबकि सुक्खू भी ज़मीन से यहाँ तक पहुँचे हैं और उनके सामने वित्तीय प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती होगी।

 

दिल्ली नगर निगम में ‘आप’

निगम चुनाव में जीत से बढ़ा केजरीवाल का रुतबा, मगर दिल्ली अभी दूर

दिल्ली में सफ़ाई से लेकर गलियों-सडक़ों तक का ज़िम्मा अब अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) पर है। नगर निगम चुनाव में भाजपा का 15 साल का शासन ख़त्म हुआ और केजरीवाल की पार्टी अब डबल इंजन के साथ दिल्ली के शासन में आ गयी है। विधानसभा में आप और नगर निगम में भी आप। ज़ाहिर है नगर निगम में आकर अब आप को जनता के काम करने होंगे, नहीं तो इसका नुक़सान उसे अगले विधानसभा चुनाव में झेलना पड़ सकता है, क्योंकि डबल इंजन की सरकार के साथ उस पर डबल ज़िम्मेदारी आ गयी है। उसे नगर निगम का भ्रष्टाचार ख़त्म करना होगा और उसकी मशीनरी को सक्रिय करना होगा।

नहीं भूलना चाहिए कि जनता ने निगम चुनाव में उन इलाक़ों में आप को भी वोट नहीं दिया, जहाँ उसके नेताओं पर शराब मामले में आरोप लगे या उन्हें जेल हुई है। आप को कचरे के पहाड़ से लेकर दिल्ली के गली-कूचों में सफ़ाई के साथ उसे वह सभी वादे पूरे करने होंगे, जो उसने निगम चुनाव में किये हैं। अब दिल्ली में साफ़ पानी और हवा और निर्वाध बिजली केजरीवाल की बड़ी ज़िम्मेदारी बन गयी है।

यह तो नहीं कहा जा सकता कि आप के नेता के रूप में केजरीवाल वैसे ही भरोसेमंद नेता की तरह उभरे हैं, जैसे भाजपा में मोदी हैं। लेकिन यह साफ़ है कि आम आदमी पार्टी का लक्ष्य अब राष्ट्रीय फलक पर झंडा फहराना है। यह राह काफ़ी मुश्किल ज़रूर है, क्योंकि आप के पास देश के अधिकतर राज्य नहीं है और कई राज्यों में तो उसका वजूद तक नहीं है। यह कहा जा सकता है, दिल्ली जीतकर भी केजरीवाल के लिए दिल्ली अभी दूर है।

लेकिन एक सच यह भी है कि गुजरात में 12 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट लेकर आप अब राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने में भी सफल रही है। राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए आप को गुजरात या हिमाचल में छ: फ़ीसदी से ज़्यादा वोट लेने की ज़रूरत थी, और गुजरात में उसने 12.9 फ़ीसदी वोट लेकर यह दर्जा पा लिया। हिमाचल में आप के हाथ ज़रूर बड़ी निराशा लगी। इससे पहले आप के पास दिल्ली, पंजाब और गोवा में 6 फ़ीसदी वोट शेयर था। लिहाज़ा उसने चार राज्यों में छ: फ़ीसदी वोट होने की शर्त पूरी कर ली।

यह सच है कि केजरीवाल की राष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षाएँ हैं और उनकी पार्टी के नेता अकसर उन्हें कांग्रेस का विकल्प बताते हैं। जहाँ तक दिल्ली नगर निगम चुनाव की बात है, जिस तरह भाजपा ने इस चुनाव में नरेंद्र मोदी को एक ब्रांड के रूप में सामने रखकर चुनाव लड़ा, उसी तरह आप ने केजरीवाल को सामने रखा। हालाँकि दिलचस्प यह है कि केजरीवाल भले कांग्रेस का विकल्प बताते हों, वह ज़्यादा भाजपा की लाइन पर चलते दिखते हैं। गुजरात का चुनाव इसका सुबूत है, जहाँ केजरीवाल ने मुस्लिम वोट की जगह हिन्दू वोट पर फोकस रखा।

भाजपा की तरह आप भी व्यक्ति केंद्रित राजनीति की राह पर है और उसकी राजनीति के केंद्र में केजरीवाल हैं। दिल्ली नगर निगम चुनाव में भाजपा ने यह रिस्क लिया कि इस चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा आगे किया। लेकिन जनता ने मोदी के नाम के बावजूद भाजपा को जीत की देहरी से दूर रखा और दिल्ली सरकार पर क़ाबिज़ आप को अवसर देने का $फैसला किया।

दिल्ली नगर निगम चुनाव में यह पहली बार है, जब आम आदमी पार्टी ने भाजपा को किसी भी स्तर के चुनाव में हराया है। अभी तक आप ने सिर्फ़ कांग्रेस के ख़िलाफ़ लडक़र चुनाव जीते थे। दिल्ली से लेकर पंजाब तक उसने कांग्रेस को ही हराया। इस लिहाज़ से देखें, तो आप के लिए यह यह एक नयी शुरुआत है। आप ने अब अपने नेता अरविन्द केजरीवाल को भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में सामने करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने इसे लेकर कहा- ‘हम तो बहुत छोटी पार्टी हैं। दिल्ली नगर निगम में भाजपा को हमने हरा दिया। भाजपा हमेशा कहती थी कि आप ने केवल कांग्रेस को हराया है। आज अरविंद केजरीवाल ने उन्हें जवाब दे दिया है।’

आम आदमी पार्टी को यह ख़याल रखना होगा कि उसकी छवि पर भ्रष्टाचार के दा$ग न लगें। निगम चुनाव में जिन इलाक़ों में आप के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप थे, वहाँ उसे जनता ने समर्थन नहीं दिया है। वहाँ भाजपा के लोग जीते हैं।

यह चुनाव कांग्रेस के लिए बड़ा सबक़ है कि बिना मैदान पर सक्रियता दिखाये चुनाव नहीं जीते जा सकते। ‘तहलका’ ने चुनाव के दौरान पाया कि बड़े नेता तो दूर, ख़ुद कांग्रेस के उम्मीदवार तक कई जगह जनता तक नहीं पहुँचे। कांग्रेस ने दिल्ली की राजनीति में जिंदा रहना है, तो उसे नयी शरुआत करनी होगी और जनता तक पहुँचना होगा, थाली में रखकर सत्ता की कल्पना करती रहेगी, तो कुछ भी हाथ नहीं आएगा।

निगम चुनाव में आप ने ‘केजरीवाल की सरकार, केजरीवाल का नगरसेवक’ का नारा दिया था। भाजपा ने अपना पसंदीदा मोदी के डबल इंजन का। लेकिन जनता ने सरकार के साथ जाना बेहतर समझा और इसका एक बड़ा कारण भाजपा के 15 साल के निगम राज से लोगों की नाराज़गी होना था। हालाँकि आप की जीत से केजरीवाल की चुनौती बढ़ेगी; क्योंकि निगम में नाकामी की क़ीमत उन्हें आने वाले विधानसभा चुनाव में झेलनी पड़ सकती है।

केजरीवाल को अब सरकार की योजनाओं के साथ-साथ निगम की बड़ी योजनाओं के लिए भी केंद्र सरकार से सहयोग लेना होगा। टकराव की राजनीति उनके लिए दि$क्क़त पैदा कर सकती है, क्योंकि दिल्ली के उप राज्यपाल के $फैसलों पर केंद्र की छाप रहती है। हाल के वर्षों में कई योजनों को लेकर केजरीवाल और उप राज्यपाल आमने-सामने खड़े दिखे हैं। यह आरोप हमेशा लगते रहे हैं कि केंद्र की भाजपा सरकार दिल्ली में उप राज्यपाल के ज़रिये मनमानी करती है।

वादे पूरे करने की चुनौती

केजरीवाल की सबसे बड़ी चुनौती दिल्ली को सुन्दर बनाने का उनका वादा है। देश की राजधानी होते हुए भी दिल्ली गंदगी के मामले में बड़ा उदाहरण है। ख़ाली प्लॉट कूड़े से भरे रहते हैं। लोगों को सफ़ाई की संस्कृति के प्रति जागरूक करना होगा। कूड़े के तीनों पहाड़ ख़त्म करने का वादा छोटा-वादा नहीं है। कूड़े का उपयोग बेहतर चीज़ के लिए करने की योजना बनानी होगी। नया लैंडफिल साइट नहीं बनने देना, कूड़े से निजात के लिए लंदन, पेरिस और टोक्यो से विशेषज्ञ बुलाने का वादा अच्छा है और केजरीवाल ऐसा कर पाये, तो दिल्ली की सूरत बदलने की क्षमता उनमें है। निगम को भ्रष्टाचार मुक्त बनाना भी बड़ी चुनौती है। लोगों के काम बिना देरी और बिना पैसे हो सकें, यह बड़ी उपलब्धि होगी। नये भवनों और मकानों के नक्शों की प्रक्रिया को सरल करना और नक्शे पास करने की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन करना बड़ा परिवर्तन होगा। दिल्ली में पार्किंग बसी समस्या है, इसका स्थायी और व्यवहारिक समाधान निकालना होगा। सडक़ों पर घूमने वाले पशुओं से मुक्ति दिलाना, निगम की टूटी सडक़ों और गलियों को ठीक करना, निगम के तहत स्कूलों, अस्पतालों और डिस्पेंसरी को शानदार बनाना, सभी पार्कों को सुन्दर बनाना और पूरी दिल्ली को सुन्दर और साफ़-सुथरे पार्कों की नगरी बनाना लुभावना वादे हैं, पर इनके लिए काम करना होगा। और यह सब पाँच साल के भीतर करना होगा। कच्चे कर्मचारियों को पक्का करना, हर महीने की 7 तारीख़ से पहले कर्मचारियों के खाते में तन$ख्वाह डालना, लाइसेंस लेने की प्रक्रिया सरल और ऑनलाइन करना, कन्वर्जन और पार्किंग फीस के अलावा इंस्पेक्टर-राज ख़त्म करना भी वादों में शामिल है। इसके अलावा रेहड़ी-पटरी वालों के लिए वेंडिंग जोन बनाना, उन्हें लाइसेंस देना और भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाना भी केजरीवाल और आप की तरफ़ से किये गये अन्य वादे हैं।

“दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे निगेटिव पार्टी (भाजपा) को हराकर दिल्ली की जनता ने कट्टर ईमानदार और काम करने वाली आम आदमी पार्टी को जिताया है। हम उनका भरोसा टूटने नहीं देंगे। यह महज़ जीत नहीं है, बल्कि हम पर बड़ी ज़िम्मेदारी है।’’

अरविन्द केजरीवाल

मुख्यमंत्री, दिल्ली

किसानों से सौतेला व्यवहार!

लखीमपुर खीरी के तिकोनिया चौराहे पर 3 अक्टूबर, 2021 को किसानों की हत्या मामले में अदालत ने केंद्रीय गृहराज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा समेत 14 आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोप तय कर दिया है। अदालत के इस फ़ैसले का किसानों ने स्वागत किया है; लेकिन किसानों की माँग है कि आरोपियों को कड़ी-से-कड़ी सज़ा होनी चाहिए। हालाँकि इस मामले में केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा और दूसरे भाजपा नेताओं ने चुप्पी साध रखी है। बता दें कि कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ आन्दोलन कर प्रदर्शन कर रहे किसानों के ऊपर केंद्रीय मंत्री के बेटे अजय मिश्रा ने कार चढ़ा दी थी, जिससे चार किसानों समेत क़रीब आठ लोगों की मौत हो गयी थी। अब अदालत ने सभी आरोपियों को हत्या, हत्या का प्रयास समेत कई धाराओं में आरोपी बनाते हुए आरोपियों की इस दलील को ख़ारिज कर दिया कि वे घटना में शामिल नहीं थे। एडीजे फस्र्ट सुशील श्रीवास्तव की अदालत में आरोपियों को धारा-147, 148, 149, 326, 30, 302, 120-बी, 427 और 177 में आरोपी माना गया है। इसके अलावा आरोपी सुमित जायसवाल को धारा 3/25, आशीष मिश्रा, अंकित दास, लतीफ़ व सत्यम को धारा-30, नन्दन सिंह बिष्ट को धारा-5/27 के तहत भी आरोपी माना गया है।

यह घटना खुलेआम हिट एंड रन जैसी थी, जिसमें आरोपी ने ख़ुद के बचाव में हर हथकंडा अपनाया था। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा और उनके बेटे आशीष मिश्रा ने ख़ुद को बेक़सूर बताते हुए किसानों और उनके समर्थकों पर लगातार ज़ुबानी हमले भी किये थे। किसी नेता पर सत्ता में रहने का नशा कितना होता है और वह किस तरह ताक़तवर होता है, यह घटना इसका जीता-जागता उदाहरण है। क्योंकि आज तक न तो केंद्र की मोदी सरकार ने अजय मिश्रा को मंत्री पद से हटाया और न ही उनकी फटकार लगायी। इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान आशीष मिश्रा को जमानत मिल गयी थी, जिसे लेकर सरकार को लोगों ने कटघरे में भी खड़ा किया; लेकिन उसके कान पर जूँ नहीं रेंगी। आशीष मिश्रा की रिहाई का मामला सर्वोच्च न्यायालय भी पहुँचा हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय ने पहले जमानत रद्द कर दी थी और अब निम्न न्यायालय से पूछा है कि वह बताए कि जाँच कब तक पूरी होगी। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय से इस मामले पर नये सिरे से विचार के लिए कहा था। इसके बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी आरोपी की जमानत याचिका रद्द कर दी। आशीष मिश्रा ने फिर जमानत के लिए फिर से सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया; लेकिन सफलता नहीं मिली। अब आशीष और उसके साथियों को आरोपी बनाकर अदालत ने न्याय की एक मिसाल पेश करके यह सन्देश दिया है कि क़ानून में छोटे-बड़े का अन्तर नहीं देखा जाता, बल्कि यह देखा जाता है कि दोष किसका है?

इसके साथ ही किसानों के लिए एक और ख़ुशख़बरी की बात यह है कि किसानों की एकजुटता और विरोध के चलते दिल्ली पुलिस ने भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के कार्यालय प्रभारी अर्जुन बालियान को रिहा कर दिया है, उन्हें किसान आन्दोलन के दौरान पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था। बहरहाल एक साल से ज़्यादा समय के बड़े देशव्यापी किसान आन्दोलन के बाद आन्दोलन रोकने के लिए हर तिकड़म करके हार चुकी केंद्र की मोदी सरकार ने 9 दिसंबर, 2021 को किसानों की कई माँगों को मान लिया, जिसके बाद किसानों ने 11 दिसंबर, 2021 को आन्दोलन स्थगित कर दिया। लेकिन आन्दोलन स्थगित कराने में सफल रही केंद्र की मोदी सरकार ने अभी तक किसानों की कई माँगें पूरी नहीं की हैं। इन माँगों में मुख्य माँग फ़सलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागू करने की है, जिसे लागू करने के कई बहाने सरकार निकाल चुकी है। हालाँकि किसानों को दिलासा देने के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने इस मामले के लिए एक समिति गठित कर रखी है, जिसमें ज़्यादातर किसान विरोधी चेहरे ही शामिल हैं। इधर किसान कई मौक़ों पर सरकार को चेतावनी दे चुके हैं कि अगर उसने किसानों की माँगें नहीं मानीं, तो वे दोबारा आन्दोलन करेंगे और इस बार आन्दोलन पहले से भी बड़ा होगा।

हालाँकि इस बीच संयुक्त किसान मोर्चा (टिकैत) और संयुक्त किसान मोर्चा के दूसरे संगठन कई बैठकें भी कर चुके हैं और छोटे-मोटे प्रदर्शन भी कर चुके हैं। यह बैठकें और प्रदर्शन उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में हो चुके हैं। कई पंचायतें और महापंचायतें भी हो चुकी हैं। लेकिन सवाल यह है कि अगर केंद्र की मोदी सरकार अगर किसानों की माँगें पूरी नहीं करती है, तो क्या दोबारा किसान आन्दोलन उस तरह उठकर खड़ा हो सकेगा, जैसा किसान आन्दोलन 26 नवंबर 2020 को तीन नये कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ उठकर खड़ा हुआ था? दूसरा सवाल यह है कि क्या सरकार अब उस तरह का आन्दोलन खड़ा होने देगी और अगर आन्दोलन हुआ, तो क्या किसानों की माँगों को तत्काल प्रभाव से लागू करने के लिए सरकार मजबूर होगी?

मेरा मानना है कि किसानों ने अगर 9 दिसंबर, 2021 को ही सरकार के आगे शर्त रखी होती कि जब तक सरकार उनकी सभी माँगें पूरी नहीं कर देती, तब तक वे आन्दोलन स्थगित नहीं करेंगे, तो शायद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से लेकर दूसरे सभी मसले कब के हल हो गये होते। दूसरी बात यह है कि पहले की सरकारें किसानों के दबाव में बहुत जल्दी आ जाती थीं। लेकिन अगर केंद्र की मोदी सरकार की बात करें, तो वह किसानों के ही नहीं सभी प्रकार के आन्दोलनकारियों के दबाव में आने के बजाय उन पर उल्टा दबाव बना देती है कि वे अपना आन्दोलन ख़त्म करें। छोटे-मोटे आन्दोलनों की तो केंद्र की मोदी सरकार परवाह भी नहीं करती। अगर नये कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ हुए इस सबसे बड़े किसान आन्दोलन की ही बात करें, तो देखेंगे कि सरकार ने किसानों को उखाड़ फेंकने के लिए क्या-क्या नहीं किया? उसने सडक़ें भी ख़ुदवायीं, मोटे-मोटे पत्थर भी रास्ते में लगवाये, बड़े-बड़े भारी-भरकम बैरिकेड लगवाये, रास्तों में हाईवे पर कीलें ठुकवायीं, किसानों पर आँसू गैस के गोले, पानी की बौछारें पड़वायीं, लाठियाँ बरसायी गयीं और उन पर भाजपा समर्थकों द्वारा हमलों के अलावा कई प्रकार के आरोप भी लगाये। इसके बावजूद भी अगर हर मौसम की मार झेलते हुए किसान बिना हिंसा के आन्दोलन को शान्ति से करते रहे, तो यह उनका हौसला तो था ही, बल्कि उनके धरती पुत्र होने के सच्चे सुबूत थे, जो कि दिन-रात ख़ून-पसीना बहाकर देश के लोगों का पेट भराने का काम करते हैं। दूसरे तरह के लोग इस तरह सरकार के दबाव और एक तरह की प्रताडऩा झेलकर इतना बड़ा आन्दोलन कर सकें, यह नामुमकिन है। लेकिन किसानों में भी अब वो एकता और एक व्यक्ति के पीछे चलकर आगे बढऩे की क्षमता नहीं है।

एक दौर था, जब महेंद्र सिंह टिकैत, चौधरी चरण सिंह, ताऊ देवी लाल और अजय चौटाला जैसे किसान नेता हुआ करते थे और उनकी एक आवाज़ पर पूरे देश के किसान इकट्ठे होकर सरकार की ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ खड़े होकर आन्दोलन पर उतर आते थे और तब तक पीछे नहीं हटते थे, जब तक सरकार हाथ जोडक़र उनकी माँगें नहीं मान लेती थी। आज अगर गन्ना का थोड़ा-बहुत सही भाव मिल रहा है, तो ये महेंद्र सिंह टिकैत की देन है। इसी प्रकार अन्य कई माँगें भी किसानों की इन्हीं दिवंगत नेताओं के दौर में पूरी हुईं।

यह सरकार किसानों को सिर्फ़ वादे ही परोसती रही है। किसानों को सिंचाई के लिए बिजली मुफ़्त, ग़रीब किसानों को सस्ती बिजली, एमएसपी लागू करने, गन्ना का बक़ाया भुगतान, गन्ना 15 दिनों के अन्दर भुगतान, आवारा पशुओं का बंदोबस्त, डीएपी खाद सस्ती और उसकी समुचित उपलब्धता, सूखा और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में मुआवज़ा जैसी तमाम घोषणाएँ सरकार ने आज तक पूरी नहीं की हैं। इन्हीं माँगों को आज किसान राज्य और केंद्र सरकारों के आगे रखकर इंतज़ार कर रहे हैं। अगर यह माँगें पूरी नहीं होती हैं, तो कोई बड़ी बात नहीं कि किसान दोबारा कभी आन्दोलन करें। आज किसानों को न तो डीएपी समय पर मिल पाती है, न ही सस्ती मिल रही है। न बिजली सस्ती मिल रही है और न ही अन्य कोई खेती के ज़रूरी चीज़ सस्ती है। जिन किसानों के खाते में किसान सम्मान निधि के नाम पर 500 रुपये हर महीने देने का दावा सरकार भी करती रही है, उसके भी ठीक-ठीक आँकड़े नहीं हैं कि कितने किसानों को ये पैसा मिलता है।

हालाँकि सरकार देश के 10.45 करोड़ किसानों को यह सहायता देने का दावा करती रही है; लेकिन ज़्यादातर किसान ही इस बात को नकारते रहे हैं कि उन्हें कोई सरकारी मदद मिल रही है। कई किसान तो इसके लिए उनका खाता चेक कर लेने तक की बात कहते हैं। हाल ही में केंद्र की मोदी सरकार के कहने पर आधार से बैंक खाता लिंक करते ही 1.86 करोड़ किसानों को यह पैसा मिलना बन्द हो गया है। ऐसे ही कई अन्य योजनाएँ, जो केंद्र और राज्य सरकारों ने किसानों के हित के लिए चालू कर रखी हैं, उनका भी लाभ पात्र किसानों को नहीं मिल पा रहा है। इसमें कृषि यंत्र योजना से लेकर फ़सल बीमा योजना जैसी कई योजनाएँ शामिल हैं।

बहरहाल मेरा सरकार से इतना ही कहना है कि किसान इस देश के वो सम्मानित नागरिक हैं, जो देश भर का पेट भराने के लिए दिन-रात सर्दी, बारिश और गर्मी में अपने खेतों में खटते रहते हैं। ऐसे में किसानों के हित में सभी सरकारों, ख़ासतौर पर केंद्र की मोदी सरकार को फ़ैसले लेने चाहिए। देश के अन्दर ही एक ऐसे तबक़े के साथ सौतेला व्यवहार ठीक नहीं, जो अपना पेट काटकर दूसरों का पेट भराता है। अपनी और अपने परिवार की ज़रूरतें घटाकर दूसरों की ज़रूरतों पूरी करता है और दूसरों के ऐश-ओ-आराम पर कभी नहीं रोता। देश के लिए समर्पित ऐसे किसानों के साथ यह भेदभाव क्यों?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

दिल्ली नगर निगम: सम्भावनाएँ भी, चुनौतियाँ भी

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

दिल्ली नगर निगम के चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) की जीत के बाद सवाल उठ रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल इस छोटी सरकार को कैसे चलाएँगे? क्या आम आदमी पार्टी दिल्ली से गन्दगी साफ़ कर सकेगी? दिल्ली में हर रोज़ हज़ारों मीट्रिक टन कूड़ा निकलता है। भाजपा के नगर निगम के शासन-काल में गीला कूड़ा और सूखा कूड़ा मुहिम चलायी गयी; लेकिन इसका कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ।

अब दिल्ली नगर निगम को भाजपा के हाथ से छीनकर आम आदमी पार्टी ने नये सिरे से काम का आग़ाज़ कर दिया है। आप सरकार ने दिल्ली नगर निगम के सभी 12 क्षेत्र पार्टी के चार वरिष्ठ नेताओं आतिशी, सौरभ भारद्वाज, दुर्गेश पाठक और वरिष्ठ नेता आदिल को सौंपे हैं। चारों नेता चार भागों में बँटी दिल्ली के तीन-तीन क्षेत्रों से मिलकर बनाये गये एक-एक भाग की ज़िम्मेदारी सँभालेंगे। चार नेताओं की ये नयी टीम नवनिर्वाचित पार्षदों का मार्गदर्शन करेगी और पार्षदों की रिपोर्ट तैयार करेगी। रिपोर्ट के आधार पर पार्षदों को समितियों में शामिल किया जाएगा।

भाजपा इस ताक में बैठी है कि नगर निगम में आप की नवनिर्वाचित दिल्ली की इस छोटी सरकार को उसके काम को लेकर किस तरह घेरा जाए। वास्तव में दिल्ली में साफ़-सफ़ाई और कूड़े का निस्तारण दो ऐसी चुनौतियाँ हैं, जिनसे पार पाना आसान नहीं है। हालाँकि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल नगर निगम चुनाव से पहले ही दिल्ली वालों से यह वादा कर चुके हैं कि वह दिल्ली में जमा हो चुके कूड़े के पहाड़ हटाएँगे। उनसे पहले भाजपा ने भी यही वादा किया था; लेकिन वह अपने वादे पर खरी नहीं उतर सकी। बदबू, गर्मी, कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन गैस समेत कई ज़हरीली गैसें उगलते दिल्ली के कचरे के पहाड़ हटाना दिल्ली से झुग्गी-झोपड़ी हटाने से भी मुश्किल काम है। इसका प्रमुख कारण हर रोज़ पैदा होता हज़ारों मीट्रिक टन कूड़ा है। अकेले ग़ाज़ीपुर में 65 मीटर लगभग 213 फीट ऊँचा कूड़े का पहाड़ है।

रिपोट्र्स बताती हैं कि ग़ाज़ीपुर लैंडफिल से हर घंटे लगभग डेढ़ से दो मीट्रिक टन और कई बार इससे भी अधिक मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है, जो इसके आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य के लिए बहुत ख़तरनाक है। केवल इसी लैंडफिल पर हर रोज़ लगभग 2,300 टन से ज़्यादा कूड़ा पहुँचता है। इसी तादाद में भलस्वा और ओखला लैंडफिल पर हर रोज़ कूड़ा इकट्ठा होता है। कूड़े के पहाड़ों के निस्तारण में सबसे बड़ी समस्या प्लास्टिक है, जिसमें सबसे ज़्यादा ख़तरनाक पॉलिथीन, जिसकी निकासी हर घर से ख़ूब होती है। पिछले दिनों पॉलिथीन पर लगी रोक का कोई असर न होने से पॉलिथीन पर प्रतिबंध का कोई मतलब नहीं रह गया है।

दिल्ली में लगे इन कूड़े के पहाड़ों से कम-से-कम 1,600 फीट के दायरे में भूजल दूषित हो चुका है। भलस्वा साइट के पास तो पानी का टीडीएस 3,000 से 4,000 एमजी/लीटर के आसपास तक पहुँच गया है, जो बहुत ही घातक है। पिछले लगभग चार से पाँच दशक के बीच ही दिल्ली की यह हालत हो चुकी है, तो आने वाले चार-पाँच दशक में क्या हालत होगी? इस सवाल पर केंद्र और दिल्ली सरकारों को गम्भीरता से विचार किया जाना चाहिए।

आप की नगर निगम सरकार ने अगर इस चुनौती से निपट लिया, तो यह मुख्यमंत्री केजरीवाल के दिल्ली को हरित शहर बनाने के सपने की सबसे बड़ी सफलता होगी। विदित हो कि दिल्ली में नगर निगम पर भाजपा के शासनकाल में कूड़े के निस्तारण की गति बहुत धीमी रही है। भाजपा ने इस पर काम करने के बजाय दिल्ली सरकार पर आरोपों और नगर निगम को एक करने में ही समय ख़राब कर दिया। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में कचरे के पहाड़ों की ऊँचाई कम करने के लिए कोई प्रभावी योजना नहीं बनायी गयी है। नगर निगम में भाजपा शासन में कूड़े के निस्तारण के लिए महँगी-महँगी मशीनें तो आयीं; लेकिन उसका काम ऊँट के मुँह में जीरा ही साबित हुआ है।

अब देखना होगा कि दिल्ली में अपने कई कामों की पूरे देश में चर्चा करने वाली आप सरकार नगर निगम में क्या-क्या सुधार करती है? वास्तव में दिल्ली सरकार के सामने कूड़े के निस्तारण के अलावा नगर निगम से सम्बन्धित कार्यों में सुधार की चुनौती भी है, जिसमें नगर निगम के स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, गलियाँ और सडक़ें ठीक करना महत्त्वपूर्ण है। कारण, दिल्ली में हर दिन 2,000 टन ताज़ा कचरा बढ़ रहा है।

आप के नेता और पार्षद इस चुनौती को अगर ज़िम्मेदारी के तौर पर लें, तो ऐसा भी नहीं कि कूड़े के इन पहाड़ों का निस्तारण न हो सके; लेकिन इसके लिए आप की सरकार को पाँच साल कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। दिल्ली नगर निगम की सत्ता हाथ में आने के बाद आप के सामने ख़ुद को काम वाली पार्टी साबित करने का एक ऐसा मौक़ा है, जिसे वह किसी भी हाल में गँवाना नहीं चाहेगी। यही कारण है कि दिल्ली सरकार ने अपने मातहत नगर निगम के हर पार्षद को एक नये तरीक़े से प्रशिक्षित करने की ठानी है, जिससे वह अपने क्षेत्र में आने वाली नगर निगम की समस्याओं से जूझ रहे लोगों को राहत पहुँचा सकें। दिल्ली सरकार की तरह ही दिल्ली नगर निगम में बिना किसी भेदभाव के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का सभी को साथ लेकर चलने का फ़ैसला स्वागत योग्य है। नगर निगम में स्थायी समिति का मतलब ही नगर निगम क्षेत्र में होने वाले विकास कार्यों में तेज़ी लाना होता है, जिसे और गति देने के लिए आप के चारों वरिष्ठ नेता पार्षदों को इन समितियों में शामिल करने का फ़ैसला लेंगे। पार्षदों को उनकी क्षमता के आधार पर समितियों में शामिल करने सम्बन्धी रिपोर्ट तैयार करके ये नेता इन्हीं पार्षदों में से अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य बनाएँगे।

फ़िलहाल तो दिल्ली नगर निगम में अब महापौर (मेयर) का चुनाव होना है, जिसके लिए उप राज्यपाल को प्रस्ताव भेज दिया गया है। अब उप राज्यपाल को इस पर मुहर लगानी है। दिल्ली नगर निगम में हर वर्ष महापौर का चुनाव होता है, जिसके लिए चुनाव परिणाम आते ही दावा किया था कि जीत भले ही आप की हुई हो; लेकिन महापौर तो उनका ही बनेगा। जल्द ही भाजपा अपने इस दावे से मुकर गयी, शायद थू-थू के डर से। अब माना जा रहा है कि आप के नगर निगम के पहले शासन में दिल्ली में पहला महापौर महिला पार्षद को चुना जाएगा। कुल 250 सीटें करके नगर निगम के एकीकरण के बाद पहली बार एकीकृत निगम का पहला मेयर चुना जाएगा। महापौर के चुनाव के लिए सभी चुने गये पार्षदों के अलावा तीन राज्यसभा सांसद, सात लोकसभा सांसद और 13 विधानसभा सदस्य भी मतदान करते हैं।

कुल मिलाकर 273 सदस्य महापौर का चुनाव करते हैं। महापौर के लिए कुल 137 बहुमत का आँकड़ा होगा। आप के 134 पार्षद, तीन राज्यसभा सांसद हैं, जो कि पूरे हैं। दो पार्षद कांग्रेस के भी आप में जा चुके हैं। इस तरह आप के पास अब 136 पार्षद हैं। क़ानून के मुताबिक, दिल्ली में महापौर का चुनाव अप्रैल में ही हो सकता है। हालाँकि केंद्र सरकार चाहे, तो महापौर का चुनाव पहले भी करा सकती है। इस बीच पार्षदों को जोडऩे-तोडऩे की राजनीति चल रही है। भाजपा नेता और दिल्ली से लोकसभा सांसद मनोज तिवारी दावा करते फिर रहे हैं कि आप के कई पार्षद उन्हें फोन करके कह रहे हैं कि उन्हें भाजपा में शामिल कर लिया जाए, आप में तो सब गड़बड़ है। मनोज तिवारी ने कुछ दिन पहले ही एक टेलीविजन चैनल पर यह दावा किया था। उन्होंने कहा था कि उन्होंने आप के पार्षदों से इस बारे में कोई बात करने से मना कर दिया।

मनोज तिवारी का यह दावा कितना सही है, यह तो नहीं पता, लेकिन उनकी पार्टी दूसरी पार्टियों की सरकारों को तोडक़र अपनी सरकार बनाने का जो रिकॉर्ड बना चुकी है, उसे देखकर तो नहीं लगता कि इस मामले में भाजपा नेता इतने ईमानदार भी हो सकते हैं कि विरोधी पार्टी के नेता भाजपा में शामिल होना चाहें और पार्टी का कोई नेता मना कर दे। साफ़ है जो पार्टी आप की जीत के बाद भी अपना पार्षद बनाने का दावा पहले ही कर चुकी हो, वह भला उसके पार्षदों को तोडक़र अपना महापौर बनाने की कोशिश क्यों नहीं करेगी? वह भी तब, जब विरोधी पार्टी के पार्षद ख़ुद उसके साथ आना चाह रहे हों।

भाजपा पर हमेशा झूठ की राजनीति का आरोप लगाने वाले आप के वरिष्ठ नेता भाजपा के दावे के बाद ही कह चुके हैं कि उनके पार्षदों को तोडऩे की कोशिशें हो रही हैं और पार्टी ने अपने पार्षदों से साफ़ कह दिया है कि अगर भाजपा का कोई नेता उन्हें फोन करके भाजपा में शामिल होने का निमंत्रण देता है, तो वे उनकी कॉल को रिकॉर्ड कर लें। फ़िलहाल आप की सतर्कता ही नगर निगम की सत्ता के निर्णायक व्यक्ति महापौर को उसे दिला पाएगी। इसके बाद उसके आगे वे तमाम चुनौतियाँ होंगी, जिन्हें लेकर आप भाजपा को घेरती रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाग्य आजमाने की कोशिश में लगे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए नगर निगम में उनके पार्षदों का काम भी रास्ते में रोशनी की किरण साबित होगा। इसलिए अगर वह नगर निगम के लिए बनायी अपनी योजनाओं को परवाज़ देते हैं, तो इसे बेहतर ही कहा जाएगा।