Home Blog Page 371

राहुल गांधी को मानहानि मामले में 13 अप्रैल तक जमानत, सुनवाई 3 मई को

सूरत की निचली अदालत के फैसले को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोमवार को सूरत की सेशंस कोर्ट में चुनौती दी है। उधर राहुल गांधी को सूरत कोर्ट ने 13 अप्रैल तक जमानत दे दी है। इस मामले में अगली सुनवाई 3 मई को होगी।

राहुल गांधी सुनवाई आज सूरत कोर्ट पहुंचे। उनकी बहन और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के अलावा कांग्रेस की तीन मुख्यमंत्री और अन्य वरिष्ठ नेता भी साथ थे।
कांग्रेस नेता को 13 अप्रैल तक के लिए जमानत मिल गई है। सेशंस कोर्ट ने उन्हें जमानत दी है। उनकी सजा के खिलाफ याचिका पर 3 मई को सुनवाई होगी।

 याद रहे सूरत में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट एचएच वर्मा की कोर्ट ने मोदी सरनेम को लेकर राहुल गांधी की ओर से की गई एक टिप्पणी के संबंध में दायर आपराधिक मानहानि के मुकदमे में उन्हें 23 मार्च को दोषी करार देते हुए दो साल के कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, अदालत ने राहुल गांधी को उसी दिन जमानत भी दे दी थी और उनकी सजा के अमल पर 30 दिन के लिए रोक लगा दी थी, ताकि वह ऊपरी अदालत में अपील दाखिल कर सकें।

इसके बाद लोकसभा सांसद के रूप में उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था। अब आज राहुल गांधी सूरत में अपनी मोदी सरनेम वाली टिप्पणी पर एक आपराधिक मानहानि मामले में दोषी ठहराए जाने के खिलाफ अपील दायर करने पहुंचे थे। इससे पहले सूरत एयरपोर्ट पर पत्रकारों से बातचीत में राहुल गांधी ने कहा – ‘मैं घबराने वालों में से नहीं हूं। मैं देश की आवाज बनकर बोलूंगा। आज नहीं तो कल हमें न्याय मिलेगा। हमें न्यायपालिका पर विश्वास है।’

राहुल गांधी आज अदालत में पेश होंगे, सजा पर दायर कर सकते हैं याचिका  

साल 2019 के जिस मानहानि मामले में सजा होने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकसभा की सदस्यता चली गयी है, उसे राहुल गांधी आज (सोमवार) गुजरात की एक अदालत में पेश होंगे और वे इसे रद्द करने के आग्रह के साथ एक याचिका दायर कर सकते हैं। आज वे अदालत में पेश होंगे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस नेता दोषसिद्धि पर अंतरिम रोक लगाने की मांग  कर सकते हैं। ऐसा होता है तो उनकी लोकसभा सदस्यता बहाल हो सकती है। याद रहे उन्हें निचली अदालत से अधिकतम दो साल की सजा दी गयी है।

राहुल गांधी को सूरत की अदालत के आदेश के बाद सांसद के रूप में अयोग्य घोषित कर दिया गया था। खबर है कि आज अदालत में राहुल गांधी के साथ तीन कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, भूपेश बघेल और सुखविंदर सिंह सुक्खू के अलावा उनकी बहन प्रियंका गांधी भी रहेंगे।

कल राहुल गांधी यूपीए की अध्यक्ष और अपनी माता सोनिया गांधी से मिले थे। उन्हें 2019 के मामले में मानहानि का दोषी पाया गया था, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सरनेम’ पर विवादित टिप्पणी की थी। राहुल गांधी को कोर्ट से सजा मिलने के तुरंत बाद जमानत दे दी गई थी और उन्हें निर्णय के खिलाफ अपील करने के लिए 30 दिन तक उनकी सजा को निलंबित कर दिया गया था।

आईआईटी मद्रास में पीएचडी छात्र ने दी जान, साल में आत्महत्या के तीन मामले

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), मद्रास में एक छात्र ने अपने कमरे में आत्महत्या कर ली है। इस साल में संस्थान में आत्महत्या का यह तीसरा मामला है। इस छात्र ने आत्महत्या करने से पहले व्हाट्सऐप पर एक नोट में लिखा – ‘माफ करना, मैं बहुत अच्छा नहीं हूं।’

पुलिस ने बताया कि 32 साल का यह छात्र सचिन पश्चिम बंगाल का रहने वाला था। वह मद्रास आईआईटी से पीएचडी कर रहा था। अपने कमरे में फांसी पर लटके पाए जाने से कुछ घंटे पहले छात्र ने एक व्हाट्सएप स्टेटस पोस्ट किया में उपरोक्त नोट भी लिखा था।

घटना को लेकर पुलिस ने बताया कि सोशल मीडिया पोस्‍ट देखकर छात्र के दोस्‍त घबरा गए। वे उसके घर पहुंचे तो सचिन को कमरे में लटका पाया। एम्बुलेंस को बुलाया गया तो डाक्टरों ने छात्र को मृत घोषित कर दिया।

इसे लेकर आईआईटी मद्रास ने एक बयान में कहा – ‘रिसर्च स्कॉलर का बेहतर  अकादमिक रिकॉर्ड था। वेलाचेरी, चेन्नई में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के एक पीएचडी रिसर्च स्कॉलर के उसके आवास पर 31 मार्च की दोपहर असामयिक निधन से हमें गहरा दुख हुआ है। बेहतरीन शोध रिकॉर्ड वाले छात्र का जाना अनुसंधान समुदाय के लिए एक बड़ी क्षति है।’

संस्थान ने छात्र की मौत पर छात्र के दोस्तों और परिवार के साथ संवेदना व्यक्त की है। संस्थान ने साथ ही सभी से अनुरोध किया है कि इस कठिन समय में छात्र के परिवार की निजता का सम्मान करें। याद रहे साल की शुरुआत में, बीटेक तृतीय वर्ष के एक छात्र और एक रिसर्च स्कॉलर ने चेन्नई में आईआईटी परिसर में आत्महत्या कर ली थी।

संसद सत्र के दूसरे चरण को लेकर एनडीए मंत्रियों, कांग्रेस की बैठक

बजट सत्र के दूसरे चरण में रणनीति के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में इस समय केंद्रीय मंत्रियों की बैठक हुई है। संसद की कार्यवाही आज से शुरू हो रही है। कांग्रेस ने भी अपने संसदीय दल के एक बैठक की है। सत्र का दूसरा चरण राहुल गांधी की सदस्यता खारिज किये जाने के बीच हो रहा है जिससे इसमें हंगामा होने से इनकार नहीं किया जा सकता है।

एनडीए के मंत्रियों की बैठक संसद भवन में प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैठक की अध्यक्षता की है। बजट सत्र के दूसरे हिस्से में आज की रणनीति पर चर्चा हो रही है।

बैठक में भाग लेने वालों में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर आदि शामिल हैं। पिछले काफी दिन से सत्तापक्ष और विपक्ष के हंगामे के कारण संसद की कार्यवाही बाधित होती रही है।

इस बीच कांग्रेस सांसद भी दिन की रणनीति तय करने के लिए बैठक कर रहे हैं। यह बैठक कांग्रेस कार्यालय में सुबह 10.30 बजे शुरू हुई। बैठक के दौरान पार्टी सांसदों को काले कपड़े पहनने को कहा गया है।

इंदौर का अवैध मंदिर गिराया गया, हादसे में हुई थी 36 लोगों की मौत

मध्य प्रदेश के इंदौर के स्नेह नगर में जिस मंदिर की बावड़ी में गिरकर 36 लोगों की मौत हो गयी थी, प्रशासन ने उस मंदिर को बुलडोज़र से गिरा दिया है। आरोप है कि यह मंदिर अवैध रूप से बना हुआ था। कांग्रेस ने यहाँ का अवैध निर्माण न करने की सूरत में न्यायालय में जाने की धमकी दी थी।

मंदिर में 30 मार्च को रामनवमी पर हवन के दौरान हुए इस हादसे में 21 महिलाओं और दो बच्चों समेत 36 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। अब इस मंदिर को गिरा दिया गया है। अवैध निर्माण को तोड़ने के लिए नगर निगम और पुलिस का बड़ा अमला पहुंचा।

अवैध निर्माण गिराने के लिए बोलडोज़र का इस्तेमाल किया गया। कार्रवाई के दौरान हंगामा या उपद्रव न हो, इसलिए भारी फोर्स भी यहां लगाई गई। मंदिर के अवैध निर्माण को तोड़ने के लिए पांच से अधिक पोकलेन और जेसीबी की मदद ली गई। नगर निगम उपायुक्त और अन्य अधिकारी मौके पर मौजूद रहे।

नगर निगम के मुताबिक अब मंदिर के अहाते में बनी बावड़ी को पूरी तरह बंद किया जा रहा है। बावड़ी के आसपास से अतिक्रमण को हटाया गया है। साथ ही बावड़ी को जेसीबी से मलबे से भर दिया गया है।

घटना के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने भाजपा सरकार पर हमला करते हुए चेतावनी दी थी कि यदि सात दिन के भीतर इस परिसर का अवैध निर्माण नहीं हटाया गया, तो कांग्रेस उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करेगी। कमलनाथ ने हादसे में घायल लोगों से अस्पताल में जाकर मुलाकात भी की थी और पटेल नगर के बेलेश्वर महादेव झूलेलाल मंदिर का दौरा भी किया था।

निशाने पर राहुल

अचानक कांग्रेस के पीछे एकजुट हुआ विपक्ष

राहुल गाँधी की लोकसभा की सदस्यता जाने के बाद देश की राजनीति अचानक गरमा गयी है। विपक्ष कांग्रेस के पीछे एकजुट होता दिख रहा है। भाजपा राहुल गाँधी पर लगातार आक्रामक दिख रही है। कांग्रेस अडानी के मुद्दे को मुख्य मुद्दा बना चुकी है और सरकार पर उनसे मिलीभगत का आरोप लगाकर इसे भ्रष्टाचार से जोड़ रही है। इस साल विधानसभा के चुनावों पर राजनीति के इस बदलते माहौल का असर दिख सकता है। बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

———

डिसक्वालिफ़िएड एमपी (निष्कासित सांसद)। राहुल गाँधी ने अपने ट्विटर हैंडल के बायो को बदलकर लोकसभा एमपी (लोकसभा सांसद) की जगह यह तब लिखा, जब सूरत की निचली अदालत से उनके खिलाफ फैसला आने के अगले ही दिन उनकी लोकसभा की सदस्यता को खत्म कर दिया गया। 7 फरवरी को राहुल गाँधी ने लोकसभा में विवादों में फँसे गुजरात के व्यापारी गौतम अडानी के प्रधानमंत्री से रिश्तों को लेकर जोरदार शब्दों में सवाल पूछे थे, जिन्हें कुछ ही घंटे बाद सदन की कार्यवाही से हटा दिया गया था। इसके दो हफ्ते के बाद राहुल गाँधी की लोकसभा की सदस्यता ही कोर्ट का फैसला आने के बाद खत्म कर दी गयी। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने राहुल गाँधी की सदस्यता खत्म करने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहकर आभार जताया कि ‘उन्होंने इस बहाने पूरे विपक्ष को एकजुट होने का मौका दे दिया है।‘ अब कांग्रेस और विपक्ष सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं। वर्तमान राजनीतिक करवट ने 2024 के लोकसभा चुनाव से एक साल पहले ही राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। इसका असर इस साल होने वाले सभी विधानसभा चुनावों पर दिख सकता है।

सरकार ने अब राहुल गाँधी को सरकारी मकान खाली करने का नोटिस दे दिया है और राहुल गाँधी आरोप लगा रहे हैं कि अडानी को बचाने के लिए उनके मित्र प्रधानमंत्री उनके (राहुल गाँधी) के पीछे पड़ गये हैं। राहुल गाँधी की रणनीति अडानी के मामले को सीधे प्रधानमंत्री मोदी से जोड़कर इसे भ्रष्टाचार का मुद्दा बनाने की है। राहुल गाँधी अदालत से जमानत मिलने के कारण एक महीने तक बाहर हैं और यदि तब तक उनकी याचिका का फैसला नहीं आता, तो उन्हें जेल जाना पड़ सकता है। इससे राजनीतिक माहौल और उबाल खाएगा। वैसे भी राहुल गाँधी की लोकसभा सदस्यता खत्म होने का मसला देश में ही नहीं, विदेश में भी चर्चा का विषय बन चुका है।

कांग्रेस और विपक्ष का एक बड़ा हिस्सा इस मामले में राहुल के साथ खड़ा दिख रहा है, जिससे देश की राजनीति अचानक गरमा गयी है। आज से कुछ दशक पहले इंदिरा गाँधी की लोकसभा की सदस्यता भी ऐसी ही वापस ली गयी थी। तब इंदिरा गाँधी ने कुछ महीने बाद ही सत्ता में जोरदार वापसी की थी। उनके पास जनता में मजबूत पैठ रखने वाले और रणनीति में माहिर नेताओं की बड़ी फौज थी। आज स्थिति तो वैसे ही है; लेकिन पार्टी के पास नेताओं की वैसी ताकत नहीं है। इसके बावजूद कांग्रेस यदि इसे मुद्दा बनाने में सफल हो जाए, तो भाजपा के लिए यह बड़ी परेशानी का सबब बन सकता है। इसमें दो-राय नहीं कि ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद राहुल गाँधी जनता के बीच लगातार चर्चा में बने हुए हैं।

राहुल गाँधी की लोकसभा सदस्यता जाने का यह मामला तब हुआ है, जब देश में अडानी के खिलाफ विपक्ष एकजुट हो चुका है। संसद में विपक्ष लगातार मोदी सरकार पर अडानी से रिश्तों को लेकर हमला कर रहा है। हालत यह हो गयी है कि विपक्ष पर संसद न चलने देने का आरोप लगाने वाला सत्तापक्ष अब खुद संसद चलने से डरता दिख रहा है। लिहाज वह भी हंगामा कर रहा है, जिससे कार्यवाही लगातार स्थगित हुई है।

संसद में बोलने देने की इजाजत माँगने को लेकर राहुल गाँधी ने कहा- ‘मैं संसद में इस विचार के साथ गया था कि मैंने जो कहा है, वह सदन के पटल पर कह सकूँ। चार मंत्रियों ने संसद भवन में मेरे खिलाफ आरोप लगाये हैं। सदन के पटल पर बोलने की अनुमति मिलना मेरा अधिकार है। मैंने स्पीकर से अनुरोध किया। मैं उनके चेंबर में गया और मैंने उनसे रिक्वेस्ट की। मैंने उनसे कहा कि मुझे बोलना बहुत अच्छा लगेगा। मैंने उनसे कहा कि भाजपा के लोगों ने मुझ पर आरोप लगाये हैं और सांसद होने के नाते यह मेरा अधिकार है कि मैं बोलूं; लेकिन वह प्रतिबद्ध नहीं थे।‘

इस दौरान एक चीज हुई। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान श्रीनगर में कुछ पीड़ित महिलाओं ने अपना दर्द राहुल गाँधी से साझा किया था। इस मसले पर दिल्ली पुलिस राहुल गाँधी से पूछताछ करने उनके आवास पर पहुँच गयी। कांग्रेस ने दिल्ली पुलिस की राहुल गाँधी के आवास पर पहुँचने की निंदा की और कहा कि इसके पीछे केंद्र की उन्हें डराने की राजनीति की बू आ रही है।

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इसे लेकर कहा- ‘राहुल को डराने के कोशिश साफ दिख रही है; लेकिन वे डरने वाले नहीं हैं। निश्चित ही राहुल के घर पुलिस जाने का यह आदेश ऊपर से आया होगा। हम इस तरह की कार्रवाई की सख्त निंदा करते हैं। दिल्ली पुलिस ने इससे पहले 16 मार्च को राहुल गाँधी को दो पन्नों की एक प्रश्नावली भेजी थी, जिसमें उनसे छेड़छाड़ और घरेलू हिंसा की शिकार उन महिलाओं का ब्योरा माँगा गया था, जो भारत जोड़ो यात्रा के दौरान उनसे मिली थीं। राहुल गाँधी ने अपनी प्रतिक्रिया प्रस्तुत करने के लिए करीब 10 दिन का समय माँगा था। लेकिन पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी उससे पहले ही उनके आवास पर पहुँच गये। ऐसी भी क्या जल्दी है?’

राहुल गाँधी समझ गये हैं कि अडानी का मुद्दा सरकार की कमजोर कड़ी है। लिहाजा वह इसे अपना बड़ा हथियार बना रहे हैं। लोकसभा की सदस्यता से हटाये जाने के अगले ही दिन उन्होंने जो प्रेस कॉन्फ्रेंस की उसमें सबसे बड़ा सवाल यही रखा कि सरकार बताये कि अडानी की शेल कम्पनियों में जो 20,000 करोड़ रुपये की बड़ी रकम डाली गयी है, वह किसका पैसा है? फिलहाल उनके इस गंभीर आरोप का कोई जवाब नहीं मिल पाया है।

चूँकि यह मुद्दा अब जनता के बीच भी गर्म बहस का मुद्दा बन गया है, सरकार बैकफुट पर दिख रही है। राहुल गाँधी आरोप लगा रहे हैं कि उनकी सदस्यता खत्म करने की पूरी साजिश की गयी है; क्योंकि मोदी सरकार अडानी को बचा रही है और उन (राहुल गाँधी) से डर रही है। क्योंकि वे अडानी और सरकार के रिश्तों को बेनकाब कर रहे हैं। राहुल कह रहे हैं कि उनकी आवाज खामोश करने की कोशिश की जा रही है; लेकिन वह लगातार अडानी और जनता से जुड़े अन्य मुद्दे उठाते रहेंगे।

‘तहलका’ से बातचीत करते हुए कांग्रेस की सांसद प्रतिभा सिंह ने कहा- ‘सरकार जबरदस्त दबाव में है। राहुल गाँधी जनता के बीच लोकप्रिय हो चुके हैं और भाजपा को इसका डर सता रहा है। उन्हें एक षड्यंत्र से चुनाव की राजनीति से बाहर करने की कोशिश हो रही है; लेकिन जनता ऐसा नहीं होने देगी। इंदिरा जी के साथ भी ऐसा किया गया था; लेकिन जनता ने इसका जवाब दिया था। हमारे नेता (राहुल गाँधी) पूरी ताकत से उभरेंगे और 2024 के चुनाव में भाजपा को पटखनी देंगे।‘

भाजपा राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा से परेशान थी। यह तभी साबित हो गया था, जब दिसंबर में उन्हें बाकायदा चिट्ठी लिखकर देश के स्वास्थ्य मंत्री ने यह यात्रा इस आधार पर रोकने का सुझाव दे दिया था देश में कोरोना फैल रहा है। हालाँकि ऐसा कुछ था नहीं। अब अडानी के खिलाफ हिंडनवर्ग की रिपोर्ट आने के बाद राहुल गाँधी ने मोदी सरकार पर हमला किया है, उससे भाजपा परेशानी महसूस कर रही है। भाजपा जानती है कि अडानी का मुद्दा यदि सरकार से जुड़कर भ्रष्टाचार का मुद्दा बना, तो उसके लिए 2024 के लोकसभा चुनाव में बहुत मुसीबत बन जाएगी; क्योंकि भाजपा 2014 के बाद के आठ वर्षों में कांग्रेस को भ्रष्टाचार पर कोस कर ही अपना काम चलाती रही है।

अयोग्य करार और अधिनियम

राहुल गाँधी की लोकसभा सदस्यता चार साल पुराने एक आपराधिक मानहानि मामले में रद्द की गयी। लोकसभा सचिवालय ने एक अधिसूचना जारी कर बताया कि केरल की वायनाड लोकसभा सीट से सांसद राहुल गाँधी को सजा सुनाये जाने के दिन यानी 23 मार्च, 2023 से अयोग्य करार दिया जाता है। ऐसा भारतीय संविधान के अनुच्छेद-102(1) और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 के तहत किया गया है। गाँधी को सूरत की एक अदालत ने चार साल पुराने आपराधिक मानहानि के मामले में दो साल की सजा सुनाने के अलावा 15,000 का जुर्माना भी लगाया था। कोर्ट ने सजा को 30 दिन के लिए स्थगित किया था, जिससे कि राहुल गाँधी ऊपरी अदालत में अपील कर सकें। यह मामला सन् 2019 का था, जब कर्नाटक के कोलार में राहुल गाँधी ने कथित तौर पर कहा था कि ‘सभी चोरों का सरनेम मोदी क्यों है?’

गुजरात में भाजपा के विधायक और पूर्व मंत्री पूर्णेश मोदी ने राहुल गाँधी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया था। पूर्णेश का आरोप था कि राहुल गाँधी की इस टिप्पणी से पूरे मोदी समुदाय की मानहानि की है जिस पर उनके खिलाफ भारतीय दण्ड संहिता की धारा-499 और 500 के तहत मामला दर्ज किया गया था। बता दें धारा-499 में आपराधिक मानहानि के मामलों में अधिकतम सजा दो साल की की है। लिहाजा राहुल गाँधी को जो सजा मिली वह अधिकतम है। सुनवाई के दौरान राहुल गाँधी ने कहा कि वो किसी समुदाय को अपने बयान से ठेस नहीं पहुँचाना चाहते थे।

लोकसभा में राहुल गाँधी का 7 फरवरी का भाषण अहम है। इस भाषण के बाद से 16 फरवरी को याचिकाकर्ता पूर्णेश मोदी ने हाई कोर्ट से स्टे वापस लेने की माँग की और 27 फरवरी को मामले की फिर सुनवाई शुरू हो गयी। स्वराज इण्डिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव कहते हैं- ‘नये जज 27 फरवरी को मामले को सुनना शुरू करते हैं और 23 मार्च को मामले में आदेश आ जाता है। इस मामले में राहुल गाँधी को अधिकतम सम्भव सजा देते हैं, आदेश आने के बाद लोकसभा सचिवालय 24 घंटे के भीतर इस मामले को संज्ञान में लेते हुए राहुल गाँधी की सदस्यता रद्द कर देता है। ये केस एक साल से रुका हुआ था, तब किसी को इसकी चिन्ता नहीं थी। अचानक कैसे इसकी चिन्ता शुरू हो गयी। ये केस ठंडे बस्ते में था, तो अचानक कैसे शुरू हो गया? केस से स्टे क्यों हटाया गया?’

राहुल गाँधी की सजा, जिसे उन्होंने चुनौती दी है; को यदि ऊपरी अदालत नहीं बदलती है, तो उन्हें दो साल की सजा होगी और इस सजा के और छ: साल तक वह चुनाव नहीं लड़ पाएँगे। और यदि सजा का फैसला बदला या अदालत ने सजा कम की तो राहुल की सदस्यता बहाल होने का रास्ता खुल जाएगा। इसके लिए राहुल को फिर अदालत जाना होगा। यहाँ एक पुराने मामले का जिक्र करना जरूरी है, जब मनमोहन सिंह सरकार एक अध्यादेश लायी थी, जिसमें प्रावधान था कि कुछ शर्तों के तहत अदालत में दोषी पाये जाने के बाद भी सांसदों और विधायकों को अयोग्य करार नहीं दिया जा सकेगा।

राहुल गाँधी, जो उस समय कांग्रेस के उपाध्यक्ष थे; ने इस अध्यादेश को बेतुका करार देते हुए इसका यह कहकर विरोध किया था कि प्रतिनिधियों में सुचिता जरूरी है और इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए। उनके उस बयान में कहा गया था- ‘इस देश में लोग अगर वास्तव में भ्रष्टाचार से लड़ना चाहते हैं, तो हम ऐसे छोटे समझौते नहीं कर सकते हैं। जब हम एक छोटा समझौता करते हैं, तो हम हर तरह के समझौते करने लगते हैं।‘

विपक्ष को आयी समझ

दो हफ्ते पहले तक ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल राहुल गाँधी का नाम सुनने तक को तैयार नहीं थे। लेकिन जैसे ही उनकी लोकसभा की सदस्यता गयी, विपक्ष के नेता एक मत से उनके पीछे आ खड़े हुए। राजनीति के जानकार कहते हैं कि विपक्षी दलों को अब समझ आ गया है कि कांग्रेस को साथ लिए बिना काम नहीं चलेगा; क्योंकि जो राहुल गाँधी के साथ हुआ है, वह कल को उनके साथ भी हो सकता है। शायद उन्हें यह भी एहसास हो रहा है कि इन वर्षों में कांग्रेस को किनारे रखने की उनकी रणनीति सही नहीं थी।

राहुल गाँधी की सदस्यता जिस तरह निरस्त की गयी, उस पूरे घटनाक्रम ने उन विपक्षी दलों को भी कांग्रेस के साथ खड़ा कर दिया है, जिन दलों ने कांग्रेस से दूरी बनायी हुई थी। तृणमूल कांग्रेस, भारत राष्ट्र समिति, जनता दल (यूनाइटेड) और समाजवादी पार्टी ने संसद में चल रहे गतिरोध के दौरान अडानी के सवाल पर तो एकजुटता दिखायी थी; लेकिन राहुल गाँधी ने जब संसद में बोलने के सवाल पर सरकार को घेरा था, यह दल उनके साथ खड़े नहीं दिखे थे। कांग्रेस तो पूरी तरह राहुल गाँधी के साथ दिख ही रही है। हालाँकि अब आप भी साथ खड़ी दिख रही है।

‘सावरकर’ वाले राहुल के बयान का समर्थन नहीं करने के बावजूद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे राहुल गाँधी का समर्थन कर रहे हैं। नीतीश कुमार की जद(यू), जो अभी तक चुप थी; राहुल के समर्थन में आ खड़ी हुई है। टीएमसी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में हुई विपक्ष की बैठक में हिस्सा लिया। अब विपक्ष साझी रणनीति बनाता दिख रहा है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों के बीच एकता स्थापित करने के प्रयास जारी हैं। विपक्ष के 18 दलों की सहमति बनी है कि सभी दल किसी अन्य विपक्षी दल और खासकर अपने सहयोगी दल के भावनात्मक मुद्दों (जैसे सावरकर) पर बयानबाजी नहीं करेंगे।

बैठक में फैसला किया गया कि विपक्ष पाँच बड़े मुद्दों की पहचान करेगा। बैठक में साफ कहा गया कि कांग्रेस को आगे आने की जरूरत है, क्योंकि वहीं अभी मुद्दों के बीच में है। कांग्रेस को सक्रियता बढ़ाने की जरूरत पर चर्चा की गयी। बैठक में फैसला हुआ कि कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी विपक्षी नेताओं से मुलाकात करेंगे। जाहिर है विपक्ष कांग्रेस के पीछे एकजुट होता दिख रहा है। भाजपा के लिए यह चिन्ता की बात हो सकती है।

गलत निशाना!

क्या लोकसभा की सदस्यता खत्म होने के बहाने भाजपा की कोशिश राहुल गाँधी को कांग्रेस और विपक्ष में अलग-थलग करने की थी? बहुत-से राजनीतिक जानकार मानते हैं कि भाजपा अगले लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गाँधी को राजनीतिक रूप से कमजोर सम्भव कोशिश कर रही है। भाजपा को पता है कि राहुल गाँधी के अलावा गैर-भाजपा विपक्ष के पास देशव्यापी छवि वाला और कोई नेता नहीं है। भाजपा ने राहुल गाँधी ही नहीं पूरे गाँधी परिवार को किनारे करने की कोशिश हाल के वर्षों में की है।

हालाँकि ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राहुल गाँधी की लोकसभा की सदस्यता खत्म करने का मामला भाजपा को उलटा पड़ सकता है। इसका कारण यह है कि राहुल गाँधी लगातार अडानी का मामला उठा रहे हैं और उन्हें प्रधानमंत्री का मित्र बता रहे हैं। जनता में यह सन्देश गया है कि चूँकि राहुल गाँधी अडानी से जुड़े विवादों को सामने ला रहे हैं, सरकार इससे परेशान है और वह राहुल को निशाना बना रही है। जनता का एक बड़ा वर्ग यह भी मान रहा है कि राहुल गाँधी को परेशान करने का मतलब है कि अडानी को लेकर मोदी सरकार कुछ छिपा रही है। जाहिर है अडानी का मुद्दा एक बड़ा मुद्दा बन रहा है और इससे सरकार की छवि भी प्रभावित हो रही है।

इसमें कोई दो-राय नहीं है कि भाजपा राहुल गाँधी को कमजोर और बदनाम करने की कोई कोशिश नहीं छोड़ती है। हालाँकि इस बार राहुल गाँधी जिस मजबूती से मैदान में डट गये हैं, उससे भाजपा खेमे में चिन्ता है। इसमें कोई दो-राय नहीं है कि एक पखवाड़ा पहले तक जो राहुल गाँधी विपक्ष के कई दलों में स्वीकार्य नहीं थे, उनके लोकसभा सदस्यता जाने के बाद वे सब अचानक राहुल गाँधी के समर्थन में उतर आये हैं। यदि भाजपा की रणनीति राहुल को कांग्रेस के भीतर और विपक्ष में अलग-थलग करने की थी, तो माना जाएगा कि वह इसमें सफल नहीं हुई है; उलटे जनता का समर्थन राहुल गाँधी को मिलता दिख रहा है।

राहुल गाँधी से जुड़े इस सारे प्रकरण में कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी एक अलग भूमिका में दिखी हैं और उन्होंने आगे आकर मोर्चा सँभाल लिया है। प्रियंका गाँधी के शब्द बताते हैं कि वह एक नयी भूमिका की तैयारी में हैं। क्योंकि उन्होंने कहा- ‘लोकतंत्र को मेरे परिवार ने खून से सींचा; न झुकेंगे, न पीछे हटेंगे; उसूलों पर डटे रहेंगे।‘ प्रियंका के यह तेवर नये हैं। प्रधानमंत्री मोदी को उन्होंने सीधे निशाने पर लिया है। वह भाजपा को सीधे चुनौती देती दिख रही हैं। उनका यह अंदाज कांग्रेस को नये तेवर के साथ भाजपा के सामने खड़ा करने में मदद कर सकता है।

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा- ‘कांग्रेस का कार्यकर्ता अब और ताकत के साथ राहुल के साथ खड़ा है। अडानी मुद्दे पर भाजपा सरकार रक्षात्मक है और राहुल गाँधी जनता में एक बड़ी उम्मीद के रूप में उभर रहे हैं। उनके खिलाफ भाजपा के षड्यंत्र नाकाम होंगे और वे 2024 में कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए भाजपा को धूल चटाएँगे।‘ कांग्रेस के सांसद डी.के. सुरेश ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा- ‘इस बार भाजपा का निशाना गलत लग गया है। उन्होंने पहले झूठ बोलकर राहुल गाँधी को का$फी बदनाम किया है; लेकिन अब जनता समझ गया है कि कुछ गड़बड़ है। राहुल गाँधी जनता में लोकप्रिय हुआ है और भाजपा पार्टी एक्सपोज हो गया है। कांग्रेस अगले आम चुनाव में मोदी सरकार के भ्रष्टाचर को सबसे बड़ा मुद्दा बनाएगी।‘

हालाँकि भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर कहते हैं- ‘यह कहना बिलकुल गलत है कि भाजपा राहुल गाँधी को लेकर अति-जुनूनी है। यह कांग्रेस है जो गाँधी परिवार के प्रभाव से बाहर नहीं आ पायी है। कांग्रेस ने संसद के मौजूदा बजट सत्र को पटरी से उतारने की कोशिश की, क्योंकि उसे एहसास हुआ कि भाजपा विदेशी धरती पर भारत को बदनाम करने वाली राहुल गाँधी की टिप्पणी के लिए उनसे मा$फी माँगने पर जोर देगी।‘ 

इसके बावजूद बहुत-से जानकार मानते हैं कि इस बार राहुल गाँधी को जिस तरह संसद से बाहर किया गया है, उससे भाजपा को नुकसान हो सकता है और उन्हें राजनीतिक रूप से घायल करने के लिए लगाया यह निशाना भाजपा को ही नुकसान करने की कुव्वत रखता है। जनता की सहानुभूति यदि राहुल गाँधी को मिली तो भाजपा के लिए स्थितियों को सँभालना मुश्किल हो सकता है। हो सकता है भाजपा राहुल गाँधी को अगले लोकसभा चुनाव तक कानूनी मसले में उलझाये रखने में सफल रहे; लेकिन कांग्रेस को इसका राजनीतिक लाभ मिलने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

भारत में संसद से निष्कासन के मामले

भारत में राहुल गाँधी से पहले पिछले 72 साल में चार बार अलग-अलग कारणों से सांसदों की सदस्यता खत्म की गयी है। इनमें तीन बार एक-एक सांसद, जबकि एक बार 11 सांसदों की सदस्यता खत्म की गयी। इसके अलावा एक और मामले में अपनी ही यूपीए सरकार के समय ‘लाभ का पद’ लेने का आरोप लगने के बाद सोनिया गाँधी ने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था। सन् 1951 में कांग्रेस के एच.जी. मुद्गल देश के पहले ऐसे सांसद बने, जिनकी सदस्यता खत्म की गयी। स्वतंत्रता के बाद गठित अस्थायी संसद के कांग्रेस सदस्य मुद्गल पर 1951 में संसद में सवाल पूछने के बदले पैसे लेने का आरोप लगा। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मामले की जाँच के लिए संसद में एक कमेटी बनाने का प्रस्ताव पारित कराया। कमेटी की जाँच में मुद्गल दोषी पाये गये और उनकी सदस्यता रद्द कर दी गयी। संसद में प्रस्ताव आने से पहले ही मुद्गल ने इस्तीफा दे दिया।

इसके बाद आपातकाल के दौरान सन् 1976 में जनसंघ के राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी पर संसद और देश के अहम संस्थानों को बदनाम करने का आरोप लगा। आरोप के बाद 10 संसद सदस्यों की एक समिति गठित की गयी, जिसने 15 नवंबर को स्वामी को दोषी करार दिया और स्वामी को राज्यसभा से निष्कासित कर दिया। इसके दो साल बाद सन् 1978 में एक साल पहले ही सत्ता गँवाने वाली इंदिरा गाँधी पर जनता पार्टी की सरकार के दौरान विशेषाधिकार हनन और सदन की अवमानना का आरोप लगा। उन पर काम में बाधा डालने, कुछ अधिकारियों को धमकाने, शोषण करने और झूठे मुकदमे में फँसाने का आरोप भी लगाया गया। आरोपों के बाद संसद में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के प्रस्ताव के बाद 20 दिसंबर को उनकी संसद सदस्यता खत्म कर दी गयी। यही नहीं सत्र चलने तक उन्हें तिहाड़ जेल भेजने का आदेश दिया गया।

एक महीने बाद लोकसभा ने उनका निष्कासन वापस ले लिया और 26 दिसंबर, 1978 को इंदिरा गाँधी को जेल से रिहा किया गया। हालाँकि दो साल बाद ही जनता पार्टी की सरकार टूटने के बाद हुए चुनाव में जनता ने इंदिरा गाँधी को जबरदस्त बहुमत देकर फिर सत्ता सौंप दी। एक और मामला संसद के 11 सदस्यों की सदस्यता एक साथ खत्म करने का है। सन् 2005 में सवाल पूछने के बदले पैसे लेने के आरोप में 11 सांसदों की सदस्यता खत्म की गयी। एक निजी टीवी चैनल के स्टिंग में अलग-अलग दलों के 10 लोकसभा और एक राज्यसभा सदस्य संसद में सवाल पूछने के लिए पैसे लेते दिखे। भ्रष्ट और अनैतिक आचरण दिखाने के आरोप में इन सभी को पवन कुमार बंसल के नेतृत्व वाली 5 सदस्यीय विशेष कमेटी ने दोषी पाया। कमेटी में भाजपा के वी.के. मल्होत्रा, सपा के राम गोपाल यादव, माकपा के मोहम्मद सलीम और डीएमके के सी. कुप्पुसामी थे।

उधर राज्यसभा में जाँच का जिम्मा आचार समिति के पास था। कमेटी की लोकसभा में पेश की गयी 38 पृष्ठों की रिपोर्ट में इन सांसदों को दोषी पाया गया, जिसके बाद संसद में एक प्रस्ताव पास कर  इन 11 सांसदों की सदस्यता खत्म कर दी गयी। एक और मामला सन् 2006 का है जब संसद में ‘लाभ के पद’ का मामला उठा। सरकार कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए की ही थी, इसके बावजूद आरोप लगने के बाद उस समय कांग्रेस अध्यक्ष और लोकसभा सदस्य सोनिया गाँधी ने रायबरेली सीट से इस्तीफा दे दिया। चूँकि सोनिया गाँधी यूपीए सरकार की गठित राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) की चेयरमैन भी थीं, इसे ‘लाभ का पद’ बताया गया।

इस्ती$फे के बाद सोनिया गाँधी ने उप चुनाव लड़ा और जनता ने उन्हें 4,17,888 वोटों के बड़े बहुमत से दोबारा जिताकर संसद में भेज दिया। अब उनके पुत्र राहुल गाँधी को मार्च, 2023 में गुजरात के सूरत की एक निचली अदालत से आपराधिक मानहानि मामले में दोषी पाये जाने के बाद लोकसभा से निष्काषित कर दिया गया।

कांग्रेस ने इसके खिलाफ अदालत में याचिका दायर की है। इसके अलावा भ्रष्टाचार के मामलों में सन् 2013 में कांग्रेस के रशीद मसूद की राज्यसभा सदस्यता तब चली गयी, जब उन्हें एमबीबीएस सीट घोटाले में दोषी ठहराया गया। उसी साल आरजेडी के लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में दोषी ठहराये गये और उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म हो गयी। जद(यू)  के जगदीश शर्मा भी चारा घोटाले में दोषी ठहराये गये, उन्हें लोकसभा की सदस्यता छोड़नी पड़ी। 

भारत राज्यों का संघ है। ऐसी संवैधानिक व्यवस्था में ये जरूरी है कि केंद्र सरकार लगातार राज्यों के साथ विचार-विमर्श करती रहे। भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे पर लगातार सरकारी हमले हो रहे हैं। संसद, न्यायपालिका और प्रेस पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। विपक्ष को बोलने से रोका जाता है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में भारत की नीति अच्छी है; लेकिन चीन को लेकर भारत की विदेश नीति बेहतर नहीं। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर को चीन से खतरे का अंदाजा नहीं है।

– राहुल गाँधी (लंदन दौरे के दौरान)

राहुल गाँधी को संसद की सदस्यता से अयोग्य ठहराया जाना गाँधीवादी दर्शन और भारत के गहरे मूल्यों के साथ गहरा विश्वासघात है। यह वह नहीं है, जिसके लिए मेरे दादाजी ने अपनी जिन्दगी के कई साल जेल में कुर्बान कर दिये थे।

– रो खन्ना, सांसद, भारतीय मूल के अमेरिकी (सिलिकॉन वैली)

यह कहना बिलकुल गलत है कि भाजपा सरकार अडाणी मुद्दे पर बचाव की मुद्रा में है। एसबीआई, एलआईसी, आरबीआई, सेबी ने इस मामले पर बयान दिये हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इस मुद्दे पर बयान दिया है और उच्चतम न्यायालय की  नियुक्त की गयी समिति में जाँच चल रही है। कानून की तरफ से दो साल की सजा मिलने के बाद राहुल गाँधी अयोग्य घोषित हुए। आश्चर्य है कि कांग्रेस ने अपने किसी प्रतिष्ठित वकील से गाँधी के खिलाफ मानहानि के मामले में कोई मदद नहीं ली। क्या यह जानबूझकर किया गया था? क्या कांग्रेस के भीतर कोई साजिश है?

– अनुराग ठाकुर, केंद्रीय मंत्री

भारत ने मोदी के आलोचक राहुल गाँधी को संसद से निकाला। पिछले साल राहुल गाँधी ने एक लोकप्रिय ‘एकता मार्च’ निकाला था और मोदी सरकार पर देश को बाँटने का आरोप लगाया था। विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक पार्टी (भाजपा) को हाल के वर्षों में मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ ‘हेट स्पीच’ और हिंसा को बढ़ावा देने का दोषी मानता है। हालाँकि भाजपा इन आरोपों से इनकार करती है और उनके समर्थक कहते हैं कि गुजरात से एक चाय बेचने वाले के बेटे ने देश की स्थिति में सुधार किया है।

– वॉशिंगटन पोस्ट (एक अमेरिकी अखबार)

भारत के विपक्षी नेता राहुल गाँधी को भाजपा एक ‘बच्चे और अनुभवहीन’ शख्स की तरह पेश करती है; लेकिन पिछले साल की 2200 मील की यात्रा से उनकी छवि में विश्वसनीयता और वजन आया है। राजनीतिक शोधकर्ता आसिम अली के हवाले से अखबार ने लिखा कि वो भाजपा के राहुल गाँधी पर ध्यान केंद्रित करने से हैरान हैं। अली कहते हैं कि मुझे नहीं समझ आ रहा है कि ये कैसी रणनीति है; क्योंकि इससे राहुल और कांग्रेस को ही फायदा हो सकता है। वो (कांग्रेस) बता सकती है कि भाजपा राहुल से असुरक्षित है और इससे कांग्रेस की ये बात साबित होती है कि सरकार मोदी की आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकती।

– द गार्डियन (एक ब्रिटिश अखबार)

राहुल गाँधी को मानहानि मामले में सजा मिलने के अगले दिन भारत की संसद से निष्कासित कर दिया गया। हाल के वर्षों में मोदी सरकार के आलोचक रहे विपक्षी नेताओं और संस्थाओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गयी है। राहुल गाँधी पर भी दो मानहानि और एक मनी लॉन्ड्रिंग के मामले चल रहे हैं।

– रेडियो फ्रांस इंटरनेशनल (आरएफआई)

मर्यादा, अपराध और राजनीति

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने सन् 2019 में कर्नाटक के कोलार में चुनाव प्रचार के दौरान तंज कसा था- ‘इन सभी चोरों के नाम में मोदी कैसे है?’ सूरत की एक अदालत ने इसे मानहानि माना और राहुल गाँधी को दो साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनायी, जो कि आईपीसी की धारा-500 के तहत अधिकतम है। इस सज़ा के बाद लोकसभा से राहुल गाँधी को संसद सदस्यता से अयोग्य क़रार दिया गया। ग़ौरतलब है कि आईपीसी की धारा-499 ‘व्यक्तियों के समूह’ की अभिव्यक्ति को संदर्भित करती है, जिन्हें मानहानि के लिए आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए चिह्नित किया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या ‘मोदी’ उपनाम वाले सभी लोग दु:खी हो सकते हैं, न कि केवल वे तीन व्यक्ति, जिन्हें कांग्रेस नेता ने दोषी ठहराया था?

वास्तव में एक वरिष्ठ विपक्षी नेता राहुल गाँधी का नाम के आधार पर कुछ कहना अशोभनीय था; लेकिन सज़ा देने में जल्दबाज़ी और सज़ा की सीमा उनके अपराध के लिए असंगत लगती है और सवाल उठाती है। कानून केवल अपराध की गम्भीरता के अनुपात में जेल की शर्तें निर्धारित करते हैं। क्या एक सामान्य टिप्पणी इतनी गम्भीर थी कि अधिकतम सज़ा का रास्ता खोल दे? आपराधिक मानहानि एक औपनिवेशिक विरासत है और आधुनिक लोकतंत्र में इसका कोई स्थान नहीं होना चाहिए। क्योंकि यह आलोचना और मुक्त आवाज़ को दबाने के लिए एक उपकरण के रूप में कार्य करती है। विपक्ष संसद और बाहर गौतम अडानी मुद्दे पर जेपीसी से जाँच की माँग के लिए दबाव बढ़ा रहा है, जबकि सत्ताधारी दल राहुल गाँधी पर ज़ोर दे रहा था कि उन्होंने लंदन में जो कहा, उसके लिए वह माफ़ी माँगें। इस कटुता को बढ़ाते हुए कांग्रेस ने राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ विशेषाधिकार हनन का नोटिस पेश कर दिया है।

विपक्ष यह कह रहा है कि वायनाड से कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ कार्रवाई अनुचित  है और जल्दबाज़ी में की गयी थी। पहले उन्हें तुरन्त अयोग्य घोषित कर दिया गया। हालाँकि उसी ट्रायल कोर्ट द्वारा 30 दिन के लिए दो साल की सज़ा को निलंबित कर दिया गया। फिर आनन-फ़ानन उन्हें लुटियंस जोन में उनके सरकारी बंगले को 22 अप्रैल तक ख़ाली करने का नोटिस दे दिया गया। हालाँकि चुनाव आयोग ने संयम दिखाया, जब उसने कहा कि वायनाड लोकसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा करने की कोई जल्दी नहीं है, क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने राहुल गाँधी को अपील दायर करने के लिए एक महीने का समय दिया है। सवाल है कि क्या अभियोजन पक्ष राहुल गाँधी को बड़ा नेता बना देगा? क्योंकि इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है कि जब भी किसी नेता को सताया जाता है, तो उसे लोगों की सहानुभूति मिलती है।

इस सारे घटनाक्रम के बाद आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस सहित 18 विपक्षी दल पहले ही साथ आ चुके हैं, जो पहले कांग्रेस से दूरी बनाये हुए थे। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस को लोकतंत्र बचाने की लड़ाई के समन्वय की पहल करने के लिए कहने का निर्णय इस वास्तविकता की स्वीकृति है कि कांग्रेस को विपक्षी एकता के किसी भी प्रयास से अलग नहीं रखा जा सकता है। जब राहुल ने 136 दिन तक 4,080 से अधिक किलोमीटर की भारत जोड़ो यात्रा की थी, तो इसने लोगों को गाँधी परिवार को गम्भीरता से लेने पर मजबूर कर दिया और अब उनकी सज़ा के बाद विपक्षी दल एक साथ आ रहे हैं। हालाँकि राहुल को ‘मेरा नाम सावरकर नहीं है। मैं गाँधी हूँ। मैं माफ़ी नहीं माँगूँगा।’ जैसी विवादित टिप्पणियों से बचना होगा। क्योंकि इससे विपक्षी एकता के प्रयासों को धक्का लग सकता है।

ख़तरनाक साबित होगा बढ़ता गंदा पानी

आज के समय में गंदगी एक ऐसी समस्या है, जिससे छुटकारा पाना एक चुनौती बन चुका है। आमतौर पर लोग इस गंदगी से बचने के लिए जो साफ़-सफ़ाई करते हैं, वो उनके घरों तक ही सीमित है। लेकिन वो भूलते हैं कि वे कई तरह से गंदगी कर रहे हैं, जिसका समाधान महज़ घर में साफ़-सफ़ाई से नहीं हो सकता। ऐसी ही गंदगी जो हर आदमी रोज़-रोज़ करता है, वो है पानी को गंदा करना।

विडंबना यह है कि अभी हाल ही में विश्व जल दिवस पर जल संचय से लेकर जल को साफ़ करने पर दुनिया भर की सरकारों और सरकारी व ग़ैर सरकारी संगठनों ने लम्बे-चौड़े वादे किये और भाषण दिये; लेकिन पानी में बढ़ रही गंदगी को लेकर किसी ने कुछ नहीं बोला।

अब एक रिपोर्ट में ख़ुलासा हुआ है कि भारत में गंदे पानी की मात्रा बढ़ती जा रही है। यह रिपोर्ट डराने वाली भी है और चौंकाने वाली भी। लेकिन विडंबना यह है कि इस रिपोर्ट को लेकर भारत में एक ख़ामोशी छाई हुई है। काउंसिल आन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) की एक अध्ययन रिपोर्ट ‘रियूज ऑफ ट्रीटेड वेस्टवाटर इन इंडिया’ में कहा गया है कि साल 2050 तक देश में गंदे पानी की मात्रा 35,000 मिलियन क्यूबिक मीटर से ज़्यादा हो जाएगी। यह तब है जब देश के विभिन्न इलाक़ों में जल शोधन संयत्रों द्वारा लगातार काफ़ी पानी शोधित करके पीने योग्य बनाया जा रहा है। सीईईडब्ल्यू की रिपोर्ट में कहा गया है कि शोधित गंदे पानी (उपचारित अपशिष्ट जल) की बिक्री की व्यवस्था हो, तो साल 2025 में इसका बाज़ार मूल्य 83 करोड़ रुपये होगा, जो कि 2050 में 1.9 अरब रुपये तक पहुँच जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, अनुमानित सीवेज उत्पादन और शोधन क्षमता के आधार पर साल 2050 तक निकलने वाले बेकार पानी के शोधन से जितना पानी मिलेगा, उससे दिल्ली से 26 गुना बड़े क्षेत्रफल की सिंचाई की जा सकती है। और इसकी संभावनाएँ हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार इसका प्रयास करेंगी?

सीईईडब्ल्यू की रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ़ साल 2021 में निकलने वाले गंदे पानी के दोबारा उपयोग में 28 मिलियन मीट्रिक टन फल-सब्ज़ी उगाने की क्षमता थी। इतना ही नहीं, इससे इस जल शोधन से क़रीब 966 अरब रुपए का राजस्व सरकार को मिल सकता था और 1.3 मिलियन टन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने से लेकर कृषि के लिए उपयोग की जानी वाली उर्वरकों का इस्तेमाल घटाते हुए पाँच करोड़ रुपये की बचत की जा सकती थी।

बता दें कि सीईईडब्ल्यू ने अपनी विश्लेषण रिपोर्ट में केंद्रीय जल आयोग के आकलनों का उपयोग भी किया है। यह आकलन बताता है कि साल 2025 तक भारत की 15 प्रमुख नदियों में से कम-से-कम 11 नदियों में पानी की कमी हो जाएगी, जो कि काफ़ी चिंताजनक तथा पानी की बढ़ती कमी में एक बड़ा इज़ाफ़ा होगा। रिपोर्ट में इसका समाधान बताते हुए कहा गया है कि अगर भारत को इस समस्या को कम करना है, तो उसे पानी की मांग और आपूर्ति में मौज़ूद अन्तर को तेज़ी से भरने के लिए वैकल्पिक जल स्रोतों को खोजना होगा, जो कि उसके लिए बेहद ज़रूरी है।

अगर हम केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के 2021 के आँकड़ों पर नज़र डालें, तो पता चलता है कि भारत में प्रतिदिन जितने सीवेज निकलते हैं, उनके 28 प्रतिशत हिस्से के पानी का ही शोधन हो पाता है, जबकि 72 प्रतिशत सीवेज का पानी अनुपचारित यानी ग़ैर-शोधन के नदियों में जाकर गिरता है। कहने का मतलब यह है कि देश में जितना पानी नालियों से होता हुआ सीवरेज के माध्यम से हर रोज़ निकलता है, उसका 72 प्रतिशत हिस्सा यानी गंदा पानी देश की जीवनदायिनी स्वच्छ नदियों के ताज़े जल स्रोतों में मिलकर उसे दूषित कर रहा है।

सीईईडब्ल्यू की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में से सिर्फ़ 10 राज्यों में ही गंदे पानी को शोधन करके उसे दोबारा उपयोग करने की नीतियाँ बनी हुई हैं। इसका मतलब बाक़ी के 26 राज्यों में अभी भी ज़्यादातर गंदा पानी नदियों में जाकर मिलता है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि जिन 10 राज्यों में से भी ज़्यादातर की नीतियों में गंदे पानी के अंतिम उपयोगकर्ताओं के लिए कोई प्रोत्साहन शामिल नहीं है। मतलब पानी के दोबारा उपयोग के लिए ख़ास गुणवत्ता मानकों को परिभाषित नहीं किया जा रहा है। राज्यों की नीतियों में शोधित बेकार पानी के गुणवत्ता मानकों के प्रविधान सिर्फ़ सुरक्षित डिस्चार्ज मानकों तक ही सीमित हैं। सीईईडब्ल्यू की रिपोर्ट में पानी को शोधित करने के लिए कई सुझाव भी दिये गये हैं। भारत गंदे पानी को जल संसाधनों का अभिन्न हिस्सा बनाये। इसके लिए वह जल शोधन को जल प्रबंधन की सभी नीतियों, योजनाओं और विनियमों में शामिल करे। गंदे पानी के सुरक्षित डिस्चार्ज और दोबारा उपयोग के लिए जल गुणवत्ता मानकों को भी भारत अच्छी तरह से परिभाषित करे और जोखिम को घटाने के दृष्टिकोण के साथ-साथ सही और तय समय पर समीक्षा करे। इसके साथ-साथ भारत गंदे पानी के दोबारा उपयोग के लिए शहरी स्थानीय निकायों की भूमिकाओं और उत्तरदायित्वों को भी साफ़ तौर पर परिभाषित करे, ताकि लोगों को स्वच्छ पानी भी मिल सके और गंदे पानी की मात्रा को कम किया जा सके।

हमें समझना होगा कि आज हर घर से साबुन युक्त गंदा पानी कई सौ लीटर निकलता है, जो नालियों से होता हुआ सीवरेज के ज़रिये सीधे नदियों में जाकर मिलता है। क्या आपने कभी सोचा है कि इस पानी में केवल साबुन ही नहीं होता, बल्कि कई तरह के केमिकल और मानव मल भी मिला होता है। ऊपर से लोग नाले-नालियों में कूड़ा आदि डाल देते हैं।

हाल ही में करौली शहर में गंदे पानी की सप्लाई को लेकर लोगों ने विरोध जताया है। शहर की महिलाओं ने गंदा पानी बोतलों में भरकर प्रशासनिक अधिकारियों को दिखाया कि उन्हें कितना गंदा पानी पीने को मिल रहा है। हमें पता होना चाहिए कि अगर हम गंदा पानी पीते हैं या उसे खाना बनाने के उपयोग में लेते हैं, तो कई बीमारियाँ हमें होती हैं। गंदा पानी न सिर्फ़ पाचन क्रिया को प्रभावित करता है, बल्कि इससे कई भयंकर बीमारियाँ भी होने का ख़तरा रहता है। गंदा पानी हमारे शरीर में बीमारियाँ पैदा करने के साथ-साथ दिमाग पर भी उलटा असर डालता है।

सवाल यह है कि हमारी धरती पर बढ़ती गंदगी हम इंसानों के लिए कितनी घातक है, इसकी चिन्ता कौन करेगा? ज़ाहिर है वे लोग तो नहीं करेंगे, जो सुख से अपने बड़े-बड़े महलों में ठाठ से रह रहे हैं। इस पर आम लोगों को ही विचार करना होगा और पानी को जितना हो सके, कम-से-कम दूषित करने का प्रयास करने होंगे। अगर अभी से इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया, तो यह आने वाले समय में घातक सिद्ध होगा।

बर्बाद किसानों की कौन सुने?

अपनी रबी की फ़सलों को बर्बाद देखकर किसान देवेंद्र गंगवार द्रवित होकर हाथ जोडक़र आँखों में आँसू भरे भरभराई आँखों से बोले- ‘हे भगवान ये कौन से पाप की सज़ा दी है। सब बर्बाद हो गया।’ प्रदेश में ऐसे लाखों किसान हैं, जिनकी हालत देवेंद्र गंगवार जैसी है। जालिम नगला के किसान नत्थू लाल की दो एकड़ गेहूँ की फ़सल बर्बाद हो गयी। नत्थू लाल उदास होकर कहते हैं कि उनकी लगभग 1.5 लाख रुपये की हानि हुई है।

यह हाल केवल उत्तर प्रदेश का ही नहीं है, उत्तर प्रदेश की तरह देश के कई अन्य प्रदेशों में भी बेमौसम वर्षा एवं ओलावृष्टि से लाखों किसान बर्बाद हो चुके हैं। कुछ किसानों ने हाथ जोडक़र सरकार से विनती की है कि वह उनकी मदद करे। देश के किसानों को चिन्ता है कि वे अपना ऋण कैसे चुकाएँगे एवं परिवार का भरण-पोषण कैसे करेंगे। किसान चाहते हैं कि सरकार उन्हें उचित मुआवज़ा दे एवं जिन किसानों का फ़सल बीमा है उन्हें रबी की फ़सल बर्बाद होने से हुई हानि के एवज़ में बीमा राशि मिलनी चाहिए।

किसान राम प्रसाद कहते हैं कि प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ किसानों का दर्द समझते हुए उन्हें उचित मुआवज़ा देने की घोषणा करें, ताकि किसानों के आँसू पुछ सकें। रामवीर किसान कहते हैं कि उनके चार बीघा गेहूँ बर्बाद हो गये। अब उन्हें खाने तक के लिए गेहूँ ख़रीदने पड़ेंगे।

यह माना कि प्राकृतिक आपदाओं को रोकना किसी के वश की बात नहीं है, मगर सरकार को चाहिए कि वो किसानों को मुआवज़ा दे। देश भर के किसानों से सरकारों को जब बड़ी राशि आयकर के माध्यम से मिलती है, तो सरकार का यह दायित्व बनता है कि वो किसानों के बारे में सोचे। किसान हमेशा ही घाटे में रहते हैं। किसानों को न तो उचित मूल्य उनकी फ़सलों का मिलता है तथा न ही आपदा के समय में उनके साथ कोई खड़ा होना चाहता है। सरकारी सूत्रों ने बताया है कि नुक़सान का मुआयना किया जा रहा है। नुक़सान के आधार पर मुआवज़ा राशि  वितरित की जाएगी। प्रदेश के सभी प्रभावित जनपदों की तहसीलों में प्रभावित गाँवों के किसानों की फ़सलों की क्षति का आकलन नियुक्त किये गये सर्वेक्षण दलों द्वारा किया जाएगा। जैसे ही सर्वे पूरे होंगे, किसानों को उनके नुक़सान के एवज़ में मुआवज़ा दिया जाएगा।

किसान हरिओम का कहना है कि अधिकारी सर्वे के नाम पर केवल खानापूर्ति करते हैं। अधिकारियों के पास जिनकी सिफ़ारिश ग्राम प्रधानों एवं पंचायत सदस्यों द्वारा जाती है, उन्हें थोड़ा-बहुत मुआवज़ा मिल जाता है, जिनकी सिफ़ारिश नहीं होती, उन्हें कुछ हाथ नहीं लग पाता। इस काम में भी दलाली का खुला खेल चलता है किसान राजेंद्र कहते हैं कि मुआवज़ा देने में सरकार को कुछ सोचने की आवश्यकता ही नहीं है, उसे इस काम में सीधा-सीधा तरीक़ा यह अपनाना चाहिए कि जिसके जितने खेत में रबी की फ़सल बर्बाद हुई हो, उसे उस फ़सल की एमएसपी के आधार पर मुआवज़ा सीधे बैंक अकांउट में भेज देना चाहिए।

मान लीजिए मेरी 10 बीघा गेहूँ की फ़सल बर्बाद हुई, तो इस आधार पर प्रति बीघा अनुमानित गेहूँ 5 कुंतल निकलता। इस आधार पर मेरे 10 बीघा खेत में 50 कुंतल गेहूँ निकलना था, जो कि कम-से-कम 2,000 रुपये प्रति कुंतल बिकता। इस आधार पर सरकार को 1,00,000 रुपये मुझे देना चाहिए। कुछ किसानों का कहना है कि सरकार को कम-से-कम 1,00,000 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से किसानों को मुआवज़ा देना चाहिए। कुछ किसानों का कहना है कि मौसम बिगडऩे के चलते फ़सलें नष्ट होने से केवल खाद्यान्न का नुक़सान ही नहीं हुआ है, चारा भी नष्ट हुआ है। इससे अधिकारियों को महीनों के सर्वे की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। बेमौसम एवं ओलावृष्टि से केवल गेहूँ की ही फ़सल नष्ट नहीं हुई है, सरसों, जौ, चना, मसूर, अलसी, आलू, मिर्च और अन्य फ़सलें भी बर्बाद हुई हैं। इसके अतिरिक्त फलों की फ़सलों को भी बड़ी हानि हुई है। सरकार को उन सब फ़सलों का मुआवज़ा उनके तय भाव के हिसाब से किसानों को देना चाहिए।

पूरे देश में अब तक किसानों को कितनी हानि हुई है, इसका आकलन अभी तक केंद्र सरकार ने नहीं कराया है। अनुमानित तौर पर कुछ जानकार कह रहे हैं कि 2,00,000 से 2,50,000 करोड़ रुपये की हानि इस बेमौसम की वर्षा एवं ओलावृष्टि से किसानों को हुई है। कृषि के जानकार जयवीर आर्य कहते हैं कि अगर किसी पूँजीपति को हानि होती है, तो सरकार उन्हें कई तरह से लाभ पहुँचाती है, यहाँ तक कि उनका ऋण माफ़ कर देती है। अब देश के अन्नदाताओं पर मुसीबत आयी है। अत: सरकार को अन्नदाताओं को मुआवज़ा देने के अतिरिक्त उनका ऋण माफ़ करना चाहिए।

दुर्भाग्य की बात है कि एक बर बारिश हने के बाद कई क्षेत्रों में दोबारा फिर पारिश हो रही है। डर की बात यह है कि अभी भी बारिश के थमने के आसार नहीं दिख रहे हैं। जहाँ बादल घिरे खड़े हैं, वहाँ किसान डरे हुए हैं। किसान अपनी कच्ची फ़सल उठा नहीं सकती और खेतों से कितनी फ़सल घर तक आ सकेगी, कितनी नहीं? इसका किसी को कुछ पता नहीं है। पशुओं का चारा भी नहीं बचा है।

दुर्भाग्य यह है कि जैसे ही किसानों की फ़सल कटने को तैयार होती है कोई-न-कोई प्राकृतिक आपदा उनकी पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है। इस बार भी जब देश भर के किसान अपनी रबी की फ़सलें काटने की तैयारी में थे, अचानक बेमौसम की वर्षा और ओलावृष्टि ने सभी फ़सलें बर्बाद कर दीं।

कृषि विशेषज्ञ इरफान कहते हैं कि इस बार भी किसानों को रोने के सिवाय कोई चारा नज़र नहीं आ रहा है। इस बेमौसम की वर्षा एवं ओलावृष्टि से किसानों की 40 से 60 प्रतिशत फ़सलें नष्ट हो चुकी हैं। कुछ स्थानों पर इस बेमौसम वर्षा एवं ओलावृष्टि से 50 से 60 प्रतिशत तक, तो कुछ स्थानों पर 75 से 80 प्रतिशत फ़सलें तक बर्बाद हो चुकी हैं। कई किसान इस हानि को सहन नहीं कर सके हैं, जिससे उन्होंने आत्महत्या तक कर ली है। प्रश्न यह उठता है कि किसानों की आत्महत्या के आँकड़े छिपाने वाली केंद्र सरकार, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर वादा पूरा न करने वाली केंद्र सरकार क्या किसानों की इस बड़ी हानि पर ध्यान देगी? उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर इसी प्रकार के कई प्रश्नचिह्न लगे हैं। उदाहरणार्थ प्रदेश के सभी किसान फ़सलों का सही भाव न मिलने से उदास हैं।

आज उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ के किसानों को बेमौसम वर्षा एवं ओलावृष्टि से जिस तरह भारी हानि हुई है, उसे केंद्र सरकार को ध्यान में रखते हुए उसकी भरपाई के लिए तत्परता दिखानी चाहिए। इसके अतिरिक्त इन सभी राज्यों की सरकारों को भी किसानों के लिए राज्य आपदा कोष के द्वार खोल देने चाहिए।

किसान अंगनलाल कहते हैं कि वे हर फ़सल ईंट भट्टे पर काम करके बोते हैं। ईंट भट्टे पर इतनी मज़दूरी नहीं मिलती कि घर ख़र्च भी चल सके, जिसके चलते फ़सल उगाने के लिए उधारी लेनी पड़ती है। उनके केवल दो बीघा खेत है। इस बार दोनों बीघा खेत में गेहूँ बोया था। गेहूँ अच्छा था, मगर अब बर्बाद हो गया। अब उधारी वाले भी टोंकने आ रहे हैं। उन्हें फ़सल पर उम्मीद थी, मगर वो भी जानते हैं कि फ़सल बर्बाद हो चुकी है। ईंट भट्टे पर जितना काम करो, उतना ही पैसा मिलता है। कोई मदद भी नहीं करता। एक पड़ोसी ने बताया कि अंगनलाल एक निर्धन किसान हैं, जिनकी दशा बहुत दयनीय है। 

अनुमानित आँकड़ों के अनुसार, गेहूँ उगाने वाले राज्यों में इस बार कुल लगभग 343.23 लाख हेक्टेयर गेहूँ किसानों ने बोया था। इस आधार पर अगर किसानों का 40 प्रतिशत गेहूँ भी ख़राब हुआ होगा, तो भी लगभग 150 लाख हेक्टेयर के उत्पादन के बराबर गेहूँ की हानि देश के किसानों को होगी। इसका अर्थ यह हुआ कि इस बार गेहूँ की उपज लाखों मीट्रिक टन कम होगी। किसानों का इसी तरह नुक़सान हर साल किसी-न-किसी रूप में होता ही रहता है। बेमौसम वर्षा एवं ओलावृष्टि से मात्र रबी की फ़सल ही बर्बाद नहीं हुई है, वरन् ख़रीफ़ की फ़सल भी देरी से बोयी जा सकेगी, जिससे उसके उत्पादन पर भी बुरा असर पड़ेगा।

क्या होकर रहेगा विश्व युद्ध?

अमेरिका का रूस और चीन से बढ़ता जा रहा तनाव

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का रूस की यात्रा के दौरान रूस-यूक्रेन युद्ध ख़ेत्म करने के लिए दिया 12 सूत्रीय शान्ति प्रस्ताव (बीजिंग पीस प्लान) सार्थक नतीजे नहीं ला पाया, तो क्या दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के दरवाज़े पा आ खड़ी होगी? इस ख़ेतरे से मना नहीं किया जा सकता, चाहे इस बहाने शी जिनपिंग की मंशा वैश्विक शक्ति के रूप में ख़ुद को और मज़बूती से स्थापित करने की ही हो।

भले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 12 सूत्री शान्ति प्रस्ताव रखा है; लेकिन उनके बीजिंग लौटने के 90 घंटे के भीतर ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने पड़ोसी देश बेलारूस में टेक्टिकल न्यूक्लियर हथियारों को तैनात करने की घोषणा कर दी। चीन के विशेषज्ञों ने इस पर चिन्ता जतायी कि यह सब जिनपिंग के प्रयासों को और भी जटिल बना सकता है। ज़ाहिर है वर्तमान की घटनाओं ने दुनिया में फिर परमाणु युद्ध का जोखिम बढ़ा दिया है।

वैसे भी हाल के दशकों में पिछले महीने अमेरिका और रूस के बीच पहली बार तब सीधा तनाव देखने को मिला, जब काला सागर के ऊपर रूसी जेट विमान और अमेरिकी ड्रोन में टक्कर हुई। हालाँकि रूस की घोषणा के बाद व्हाइट हाउस ने कहा कि ऐसा कोई संकेत नज़र नहीं आ रहा, जिससे लगे कि रूस परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की प्लानिंग कर रहा है। पुतिन के हवाले से रूसी न्यूज एजेंसी तास ने 27 मार्च को कहा कि 10 एयरक्राफ्ट बेलारूस में तैनात किये गये हैं, जो टेक्टिकल न्यूक्लियर हथियार ले जाने में सक्षम होंगे। रूसी राष्ट्रपति का दावा है कि बेलारूस में परमाणु हथियार रखने से न्यूक्लियर नॉन प्रॉलिफरेशन एग्रीमेंट का उल्लंघन नहीं होता है। रूस किसी भी तरह की टेक्नोलॉजी या कंट्रोल बेलारूस को नहीं दे रहा है। रूस ने जैसे ही यह ऐलान किया, यूक्रेन आनन-फ़ानन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की शरण में पहुँच गया और क्रेमलिन की परमाणु ब्लैकमेलिंग का मुक़ाबला करने के लिए एक आपात बैठक बुलाने की गुहार लगायी।

हालाँकि रूस का यह क़दम चीन की कोशिशों को भी झटका देता है। दोनों ने मास्को में साझा बयान में कहा था कि सभी परमाणु सम्पन्न देशों को अपने हथियार अपनी सीमा से बाहर तैनात करने से बचना चाहिए। इसके अलावा जिन देशों ने हथियारों को दूसरे देशों में तैनात किया है, उन्हें वापस लेना चाहिए। ज़ाहिर है अब पुतिन की घोषणा से चीनी विशेषज्ञ हैरान हैं। जिनपिंग ने रूस-यूक्रेन के बीच शान्ति कराने की जो कोशिश दिखायी थी, पश्चिमी देश उसे नहीं मान रहे। एक बात तय है कि रूस के इस क़दम के बाद प्रान्त में तनाव बढ़ गया है।

रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया में काफ़ी बदलाव दिखाये हैं और चीन इनमें महत्त्वपूर्व भूमिका में दिखता है। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण जिनपिंग का ईरान और सऊदी अरब को नज़दीक ले आना है। हाल के दशकों में यह बड़ी वैश्विक कूटनीतिक घटना है। फ़िलहाल तो बड़ा ख़ेतरा अमेरिका-रूस और अमेरिका-चीन के बीच बढ़ रहा तनाव है। भारत के साथ चीन के रिश्ते वैसे ही ख़ेराब चल रहे हैं। इसकी पुष्टि विदेश मंत्री एस. जयशंकर के स्वीकृति वाले बयान से होती है कि चीन के साथ तनाव है।

इसके अलावा 13 मार्च को विदेश मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट में भी स्वीकार किया गया है कि भारत के साथ चीन के रिश्ते जटिल हैं और अप्रैल-मई, 2020 के दौरान एलएसी पर यथास्थिति बदलने के लिए चीन की तरफ़ से जो कोशिशें की गयीं, उससे सीमा क्षेत्र की शान्ति को नुक़सान पहुँचा है। विदेश मंत्रालय ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि अप्रैल-मई 2020 में पूर्वी लद्दाख़े में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर एकतरफ़ा ढंग से यथास्थिति बदलने के चीनी कोशिशों के चलते सीमावर्ती क्षेत्रों में अमन शान्ति को गम्भीर रूप से क्षति पहुँची।

जिनपिंग की रूस यात्रा

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ऐसे समय में रूस की यात्रा की है, जब वहाँ हालत बेहद तनावपूर्ण हैं। इसमें कोई कोई दो-राय नहीं कि जिनपिंग पूरी तरह पुतिन के साथ खड़े हैं। यह इस तथ्य से भी ज़ाहिर हो जाता है कि जहाँ अमेरिका समेत कई पश्चिमी देश रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के ख़िलाफ़ युद्ध अपराधों के आरोपों पर गिरफ़्तारी वारंट जारी होने का समर्थन कर रहे हैं, वहीं चीन इसके लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) को आड़े हाथ ले रहा है। जिनपिंग की यात्रा के दौरान पुतिन के बीच मास्को में द्विपक्षीय रिश्तों और यूक्रेन संघर्ष पर चर्चा हुई थी। राष्ट्रपति शी जिनपिंग अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की ओर से पुतिन के ख़िलाफ़ युद्ध अपराधों के मामलों में गिरफ़्तारी का वारंट जारी होने के कुछ दिन बाद ही मास्को पहुँचे। हालाँकि चीन के एकदम उलट रूस के राष्ट्रपति की गिरफ़्तारी से जुड़े मामले पर पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने युद्ध अपराध किया है, और उनकी गिरफ़्तारी वारंट जारी करने का फ़ैसला सही है।

यहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण चीन का रूस और यूक्रेन के बीच साल से जारी युद्ध को ख़ेत्म कराने के लिए 12 सूत्री कार्यक्रम था, जिसे बीजिंग शान्ति योजना (पीस प्लान) का नाम दिया गया है। इस शान्ति योजना में वैसे तो कोई स्पष्ट प्रस्ताव नहीं है; लेकिन इसमें राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान करने की बात कही गयी है। हालाँकि इसमें रूसी सैन्य बलों को यूक्रेन से निकल जाने की बात नहीं कही गयी है। यही कारण है कि यूक्रेन रूस के साथ किसी भी बातचीत से पहले उसके सैन्य बलों के अपने देश से हटने की शर्त रख रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन भी कह चुके हैं कि रूस के यूक्रेन से हटे बग़ैर संघर्ष विराम की बात करना, तो यूक्रेन पर रूसी आक्रमण का समर्थन करने जैसा होगा। यहाँ सवाल उठता है कि रूस की सेना के यूक्रेन से हटे बिना शान्ति की उम्मीद कैसे की जा सकती है? जिनपिंग के साथ बैठक के बाद पुतिन ने जो साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में की उसमें उन्होंने कहा- ‘यूक्रेन में संघर्ष ख़ेत्म करने के लिए चीनी पीस प्लान के कई प्रावधानों को अमल में लाया जा सकता है, जब भी पश्चिमी देश और यूक्रेन इसके लिए तैयार हों। रूस को अब तक दूसरे पक्ष की ओर से इस मुद्दे पर ऐसी तत्परता नहीं दिखी है।’ इस मौक़ै पर जिनपिंग ने कहा- ‘हमारी सरकार शान्ति और संवाद के पक्ष में रही है और इतिहास गवाह है कि चीन सकारात्मकता के साथ इस पर खड़ा था।’ चीनी विदेश मंत्रालय भी कह चुका है कि यूक्रेन संघर्ष का समाधान सि$र्फ संवाद और बातचीत से ही सम्भव है। पुतिन कह रहे हैं कि चीन का 12 सूत्री बीजिंग प्लान यूक्रेन के साथ एक साल से जारी युद्ध ख़ेत्म को कर सकता है। यहाँ यह ज़िक्र करना अच्छा होगा कि चीन इस सारी क़वायद में ख़ुद को शान्ति दूत के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। जिनपिंग का दावा है कि यूक्रेन संघर्ष पर उनके देश का रुख़े निष्पक्ष है।

यह दिलचस्प ही है कि जब शी जिनपिंग जब मास्को दौरे पर थे, ठीक उसी व$क्त जापानी प्रधान मंत्री फूमियो किशिदा अचानक यूक्रेन पहुँच गये। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से किसी संघर्षरत देश का दौरा करने वाले वह पहले जापानी प्रधानमंत्री हैं। राष्ट्रपति वोलोदीमीर जेलेंस्की ने कहा कि वह प्रधानमंत्री किशिदा के निमंत्रण पर इस साल मई में होने जा रही जी-7 देशों के शिखर सम्मेलन में वीडियो लिंक के माध्यम से हिस्सा लेंगे। जेलेंस्की ने कहा कि उन्होंने चीन से बातचीत में शामिल होने के लिए कहा है; लेकिन उन्हें जवाब का इंतज़ार है। उनके मुताबिक, उन्होंने चीन से कहा था कि वह पीस फॉर्मूले के अमल में साझेदार बने। हम आपको संवाद के लिए आमंत्रित करते हैं।

परमाणु युद्ध नहीं

जिनपिंग और पुतिन के बीच बैठक और समझौते के बाद बताया गया कि दोनों नेता इस बात पर राज़ी हुए हैं कि परमाणु युद्ध कभी भी शुरू नहीं किया जाना चाहिए। हालाँकि अमेरिका-रूस में जैसी तनातनी अचानक बनी उसके बाद कुछ भी कहना कठिन है कि भविष्य में हालात क्या मोड़ लेंगे? दोनों नेताओं ने नये ऑकस पैक्ट को लेकर अपनी चिन्ताएँ ज़ाहिर की हैं। याद रहे ऑक्स पैक्ट ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के बीच रक्षा समझौता है। इसके अलावा उन्होंने एशिया में नाटो की बढ़ती मौज़ूदगी पर सैन्य और सुरक्षा के जुड़े मुद्दों को लेकर चिन्ता ज़ाहिर की है। साफ़ है तनाव के कई कारण अभी मौज़ूद हैं।

इसके अलावा चीन की तरफ़ से रूस को हथियार सप्लाई की ख़ेबरें तेज़ी से आयी हैं। पश्चिम मीडिया इसे लेकर लगातार आशंका जता रहा है, भले ही कोई पुख्ता सुबूत सामने न आये हों। नाटो प्रमुख जेन्स स्टॉल्टेनबर्ग ने हाल में कहा कि उनके गठबंधन को अब तक ऐसे सुबूत नहीं मिले हैं, जो ये साबित करते हों कि चीन रूस को हथियार दे रहा है। हालाँकि उन्होंने ये ज़रूर कहा कि इस बात के संकेत मिले हैं कि चीन रूस की ओर से हथियार माँगने के दरख्वास्त पर विचार कर रहा था।

कहने को चीन-रूस ने पुतिन-जिनपिंग बैठक में हुए समझौतों को सैन्य-राजनीतिक गठबंधन मानने से इनकार किया है; लेकिन इसमें कोई दो-राय नहीं कि रूस-चीन की यह जुगलबंदी पश्चिम से दोनों के तनाव का आधार है, जिसे किसी भी कठिन हालत में सैन्य गठबंधन में बदलने में देर नहीं लगेगी। इस बैठक में चीन-रूस के बीच साइबेरिया में एक पाइपलाइन बनाने पर बनी सहमति भी है, जिससे रूसी गैस मंगोलिया से होते हुए चीन पहुँच सकेगी। जहाँ इस यात्रा में जिनपिंग ने चीन और रूस को महान् पड़ोसी शक्तियाँ और व्यापक रणनीतिक साझेदार बताया, वहीं पुतिन ने चीन को रूस का सबसे प्रमुख व्यापारिक साझेदार कहा।

पुतिन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पश्चिमी देशों पर यूक्रेन को न्यूक्लियर कंपोनेंट वाले हथियार देने का आरोप दोहराया। साथ ही पुतिन ने कहा है कि अगर ब्रिटेन ने डिप्लीटेड यूरेनियम (कम रेडियोधर्मी) से बने हुए गोले यूक्रेन भेजे, तो रूस जवाब देने के लिए विवश हो जाएगा। उधर ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि डिप्लीटेड यूरेनियम एक मानक कंपोनेंट है, जिसका परमाणु हथियारों से कोई सम्बन्ध नहीं है। ब्रिटेन ने चैलेंजर दो टैंकों के साथ-साथ कवच में छेद करने वाले गोले भी यूक्रेन भेजने का फ़ैसला किया है। दरअसल डिप्लीटेड यूरेनियम हथियार या रिएक्टर फ्यूल के लिए इस्तेमाल किये गये प्राकृतिक यूरेनियम का बचा हुआ पदार्थ होता है। ठोस स्वरूप में इस पदार्थ की रेडियोधर्मिता अपेक्षाकृत रूप से कम होती है। हालाँकि यह काफ़ी भारी पदार्थ है और शीशे (लेड) की तुलना में ये 1.7 गुना घना पदार्थ है।

तनाव में ड्रोन की भूमिका

दोनों देशों के बीच तब तनाव अचानक बढ़ गया, जब मार्च के दूसरे हफ़्ते काला सागर के ऊपर रूसी जेट विमान और अमेरिकी ड्रोन में टक्कर की घटना हुई। याद कीजिए वह भी एक दुर्घटना ही थी, जिसने पहले विश्व युद्ध की शुरुआत की थी। ऐसे में यदि कोई गम्भीर तनाव उभरता है, तो अंजाम ख़ेतरनाक हो सकते हैं। घटना के बाद रूस ने इसे उकसावे वाली कार्रवाई बताया। उधर अमेरिका का कहना था कि उनका ड्रोन अंतरराष्ट्रीय हवाई क्षेत्र में उड़ रहा था। घटना के बाद अमेरिका ने रूस के राजदूत को तलब कर अपना विरोध दर्ज कराया।

यह घटना निश्चित रूप से सामान्य नहीं थी। इससे अगले ही दिन अमेरिका ने काला सागर क्षेत्र में सर्विलांस ड्रोन की उड़ानें फिर से शुरू कर दीं। रूसी लड़ाकू जेट ने अमेरिकी निगरानी ड्रोन को जब मार गिराया था, तो उसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया था। ज़ाहिर है काला सागर के पास ड्रोन उड़ाने से तनाव और बढ़ सकता है। अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि उनके एक आरक्यू-4 ग्लोबल हॉक ने इस क्षेत्र में एक मिशन के लिए उड़ान भरी जो उस घटना के बाद पहली ड्रोन उड़ान थी। पेंटागन के अधिकारियों ने ज़ोर देकर कहा कि एक घटना वॉशिंगटन को इस तरह के मिशनों को उड़ाने से नहीं रोक नहीं सकती।

अमेरिकी के एमक्यू-9 ड्रोन को रूसी जेट के मार गिराने के बाद रूस ने इसे महज़ एक हादसा बताया था। हालाँकि इसके बाद पेंटागन ने 42 सेकेंड का एक वीडियो जारी किया, जिसमें एक रूसी एसयू-27 लड़ाकू जेट उस ड्रोन के बहुत क़रीब आता दिख रहा था और ड्रोन के पास वह जेट ईंधन भी डंप कर रहा था। वीडियो के आख़िर में ड्रोन के क्षतिग्रस्त होकर काला सागर में गिरने की तस्वीरें हैं। अंतरराष्ट्रीय जल सीमा पर हुई इस घटना से संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस के बीच सीधे टकराहट बढ़ गयी। वैसे दोनों एक साल से तनाव है और रूस कई बार अमेरिका को हमले की धमकी दे चुका है। रूसी अधिकारियों का कहना है कि वे काला सागर से अमेरिकी ड्रोन का मलबा बरामद करने की कोशिश करेंगे।

अमेरिकी सेना ने कहा कि रूसी लड़ाकू विमान ने मानव रहित विमान पर ईंधन डाला, जो इसके ऑप्टिकल (नज़र रखने सम्बन्धी) उपकरणों को देखने से रोकने और इसे क्षेत्र से बाहर निकालने और इसके प्रोपेलर को बाधित करने का स्पष्ट प्रयास था। घटना के बाद रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन और ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल मार्क मिले ने रूसी लड़ाकू जेट विमानों के साथ मुठभेड़ के बाद अमेरिकी ड्रोन के नष्ट होने के बारे में अपने रूसी समकक्षों से बात की।

रूसी रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगू और रूसी जनरल स्टाफ के प्रमुख जनरल वालेरी गेरासिमोव के साथ अक्टूबर के बाद पहली बार कॉल की गयी। विमानों के ख़ेतरनाक तरीक़ै से एक-दूसरे के सामने आने के प्रयास असामान्य नहीं हैं। यूक्रेन में युद्ध के बीच हुई इस घटना ने चिन्ता बढ़ायी है कि ऐसे मामले अमेरिका और रूस को सीधे संघर्ष के क़रीब ला सकते हैं। इस घटना के बाद दोनों देशों के रक्षा और सैन्य नेतृत्व के बीच हुई यह बातचीत इस मामले की गम्भीरता को दिखाती है।

रूसी रक्षा मंत्रालय ने ऑस्टिन के साथ फोन पर हुई बातचीत को लेकर अपनी रिपोर्ट में कहा कि शोइगू ने अमेरिका पर यूक्रेन में उसके (रूस के) सैन्य अभियानों के कारण क्रेमलिन की ओर से लगाये गये उड़ान प्रतिबंधों की अनदेखी करके घटना को भडक़ाने का आरोप लगाया। रूस ने ‘रूसी संघ के हितों के ख़िलाफ़ ख़ुफ़िया गतिविधियों में तेज़ी’ का भी आरोप लगाया। ज़ाहिर है इस घटना को ऐसी ही ख़ारिज नहीं किया जा सकता है।

चीन के ड्रोन यूक्रेन को

रूस पर यूक्रेन से युद्ध करने के लिए अमेरिका और कई पश्चिमी देशों ने कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं। यह माना जाता है कि चीन इसका फ़ायदा कमाने में जुटा है। रिपोट्र्स पर भरोसा किया जाए, तो चीन ने रूस ही नहीं यूक्रेन को भी अपने ड्रोन बेचे हैं। रूस से दोस्ती के साथ-साथ चीन का यूक्रेन से भी रक्षा समझौता है। यह भेद तब खुला जब यूक्रेन ने चीनी कम्पनी पर उसे दिये जाने वाले ड्रोन रूस को भी बेचने का आरोप लगाया।

रिपोट्र्स के मुताबिक, चीनी कम्पनी डीजेआई के बनाये ड्रोन का इस्तेमाल यूक्रेन ने रूस के ख़िलाफ़ युद्ध में किया है। यूक्रेन के उप-प्रधानमंत्री मायखाइलो फेडेरोव के मुताबिक, यूक्रेन ने डीजेआई से 2372 क्वाडकॉप्टर और 11 मिलिट्री अनमैंड एरियल व्हीकल ड्रोन क़रीब 513 अरब रुपये में ख़ेरीदे थे। हालाँकि डीजेआई अपने ड्रोन यूक्रेन युद्ध में इस्तेमाल इनकार करती है और उसका कहना है कि वह सेना के इस्तेमाल वाले ड्रोन नहीं बनाती। यूक्रेन चीन से तुरन्त ही रूस के इन ड्रोन के इस्तेमाल पर बैन लगाने की माँग कर चुका है।

चीन और रूस की दोस्ती का भारत पर असर

यूक्रेन युद्ध के बाद भारत के रूस के नज़दीक आने को लेकर पश्चिम और भारत में अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ आयी हैं, जिनमें एक यह भी थी कि चीन के रूस के नज़दीक जाने से भारत के हितों को नुक़सान होगा। भारत का चीन के साथ तनाव जारी है। ऊपर से जिनपिंग की यात्रा के तुरन्त बाद ही यह ख़ेबर आयी कि रूस की तरफ़ से भारत को मिलने वाले एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम सहित अन्य सैन्य उपकरणों की सप्लाई में और देरी हो सकती है, भले इसका कारण यूक्रेन युद्ध को बताया गया है।

हालाँकि रूस ने जिनपिंग के रूस दौरे का सम्बन्ध भारत से जोडऩे पर तीखी प्रतिक्रिया दी। रूस ने कहा- ‘हमें उन एक्सपट्र्स पर तरस आता है, जो भारत रूस रक्षा सम्बन्धों के बारे में ऐसा सोच रहे हैं। रूस-चीन सम्बन्धों को भारत-रूस सम्बन्धों से जोडक़र नहीं देखा जाना चाहिए।’ दोनों देशों के साथ रूस के रिश्ते अलग-अलग हैं। पश्चिमी देशों का दावा है कि जिनपिंग की यात्रा शान्ति के लिए कम, बल्कि रूस का समर्थन करने के लिए ज़्यादा थी। उधर भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने कहा- ‘जिनपिंग की रूस यात्रा के परिणामों को लेकर इन दिनों विश्लेषणों की बाढ़ आयी हुई है। ऐसा लगता है कि भारत के कई प्रतिष्ठित विशेषज्ञ रूस-चीन के सम्बन्धों को रूस-भारत स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को नुक़सान पहुँचाने वाला मान रहे हैं। यह उनकी निजी सोच का मामला है; लेकिन हमें उन पर तरस आता है।’

दरअसल भारत में भी बहुत-से लोग मानते हैं कि यदि चीन भारत पर युद्ध थोपता है, तो ऐसी स्थिति में रूस निष्पक्ष रहेगा और भारत के साथ खड़ा नहीं होगा। सन् 1962 के युद्ध में ऐसा ही हुआ था, जबकि रूस के साथ भारत के बहुत बेहतर रिश्ते थे।

रूस के साथ कौन?

यह दिलचस्प बात है कि साथ यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के जो देश साथ खड़े हैं, उनमें से ज़्यादातर उसके पुराने साथी हैं; लेकिन यह सभी नेता लम्बे समय से अपने देशों में सत्ता में हैं और उन्हें तानाशाह का दर्जा दिया जाता है। चीन के शी जिनपिंग के अलावा उत्तर कोरिया के किम जोंग उन, ईरान के अली खामेनेई, सऊदी अरब के किंग अब्दुल्लाह, सीरिया के बशर अल असद, बेलारूस के अलेक्जेंडर लुकाशेंको, एरिट्रिया के इसाईस अफवेर्की, वेनेजुएला के निकोलस मादुरो भी शामिल हैं। रूस-यूक्रेन का असर है कि अपनी दुश्मनी भुलाकर सऊदी अरब और ईरान बातचीत के लिए तैयार दिख रहे हैं। माली, सूडान, क्यूबा और निकारागुआ जैसे देश भी रूस के समर्थन में दिख रहे हैं और यह सभी राष्ट्र तानाशाहों के अधीन हैं। उपरोक्त देशों के कुछ ऐसे शासक हैं, जिन पर अपने देश में जनता के असन्तोष और विरोधियों की आवाज़ दबाने के लिए पुतिन की निजी पैरामिलिट्री कम्पनी वैगनर की सेवा लेने के आरोप हैं।

रूस-यूक्रेन युद्ध की क़ीमत

रूस-यूक्रेन युद्ध के मानवीय नुक़सान के दोनों देशों के अपने-अपने दावे हैं। लेकिन आर्थिक नुक़सान के जो आँकड़े सामने आये हैं, उनसे ज़ाहिर होता है कि इसके पुनर्निर्माण अर्थात् सडक़ों, बिजली-पानी की लाइनों की बहाली इमारतों को फिर खड़ा करने और स्थिति को किसी हद तक पुरानी हालत में लाने पर 411 बिलियन डॉलर से ज़्यादा का ख़ेर्चा आएगा। यह विश्व बैंक का अनुमान है और फरवरी के आख़िर तक हुए नुक़सान का है। विश्व बैंक में यूरोप और सेंट्रल एशिया की उपाध्यक्ष एना जेर्डे के मुताबिक, इतने सारे पैसे एक ही दिन में मिल जाएँ, तो भी पुरानी स्थिति बहाल करने में कुछ महीने नहीं बल्कि चार-पाँच साल लग जाएँगे।

विश्व बैंक की इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में ही कीव (यूक्रेन) को क़रीब 14 बिलियन डॉलर की ज़रूरत पड़ेगी, ताकि वह शुरुआती मरम्मत के काम कर सके। यूक्रेन की सरकार ने ख़ुद नुक़सान का ब्योरा विश्व बैंक को दिया था, जिसे आधार पर नुक़सान और मरम्मत के यह अनुमानित आँकड़े बनाये गये हैं।

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, रूस-यूक्रेन संघर्ष के एक साल के भीतर अमेरिका ने यूक्रेन को जो सैन्य सहायता दी उस पर 1965-75 के युद्ध के दौरान वियतनाम में किये ख़ेर्च की वार्षिक औसत के मुक़ाबले आधे से कुछ अधिक ही ख़ेर्च किया था। जर्मनी स्थित कील इंस्टीट्यूट फॉर द वल्र्ड इकोनॉमी (आईएफडब्ल्यू) की एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक, वियतनाम में एक साल में औसतन क़रीब 92 बिलियन डॉलर ख़ेर्च करने वाले अमेरिका ने यूक्रेन में इतने समय में क़रीब 47 बिलियन डॉलर का ख़ेर्च किया है।

रूस की मददगार हैं अमेरिकी कम्पनियाँ

अमेरिका से जबरदस्त तनाव के बाद भी रूस ने कैसे उसकी कम्पनियों में अपनी पैठ बनायी हुई है, यह इस बात को ज़ाहिर हो जाता है कि अमेरिका की कम्पनियों ने हाल के महीनों में रूस को सीक्रेट टेक्नोलॉजी बेची है। कुछ तो ऐसी कम्पनियों को भी चिप दी गयी हैं, जो सीधे तौर पर रूसी सेना के साथ जुड़ी हुई हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह टेक्नालॉजी दूसरे देशों में बैठे बिचौलियों ने ख़ेरीदी, जिससे वह पकड़ में नहीं आयीं।

यूक्रेन के आरोप पर भरोसा करें, तो इंटेल, क्वालकॉम, ब्रॉडकॉम कम्पनियाँ कथित रूप से इसमें शामिल हैं। यह बात सामने आने के बाद कि ये कम्पनियाँ रूस को सीक्रेट चिप दे रही हैं। यूक्रेन ने उनसे ऐसी चिप न बनाने की गुहार लगायी, जो रूस के जीजीएसएनएस (ग्लोनास सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम) को सपोर्ट करती हों। हालाँकि यूक्रेन के आरोप से यह कम्पनियाँ इनकार कर रही हैं। चूँकि यह कम्पनियों अमेरिका में नियमों के मुताबिक, काम कर रही हैं। लिहाज़ा उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।