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समलैंगिकता : सार्वजनिक स्वीकृति की बेजा ज़िद

शिवेंद्र राणा

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष समलैंगिक विवाह की क़ानूनी मान्यता का प्रश्न मौज़ूद है। इन दिनों यह राष्ट्रीय विमर्श का एक आवश्यक भाग बन चुका है। पहले इस मुद्दे की विवेचना के मूल को समझते हैं। धारा-377 में ग़ैर-प्रजनन यौन कृत्यों अर्थात् अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों को अपराध मानते हुए दण्डनीय माना गया है। इस धारा को एलजीबीटी समुदाय अपने प्रति अन्याय समझता है।

नाज़ फाउंडेशन ने वर्ष 2001 में दिल्ली उच्च न्यायालय से धारा-377 को ग़ैर-संवैधानिक घोषित करने की माँग की थी। इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद समलैंगिक समुदाय को राहत तो मिली। लेकिन दिसंबर, 2013 में सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज़ फाउंडेशन मामले में उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए पुन: धारा-377 को मूल स्वरूप में प्रतिष्ठित कर दिया। यह द्वंद्व अभी था ही कि इसी मामले की अगली प्रक्रिया के अंतर्गत पिछले माह समलैंगिक विवाह को क़ानूनी अनुमति देने के मुद्दे पर भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में गठित पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 10 दिन की सुनवाई के पश्चात् अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है।

सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष था कि सम्भव है इसे क़ानूनी मान्यता देने वाली न्यायपालिका की कोई संवैधानिक घोषणा सही कार्रवाई न हो। क्योंकि अदालत इसके परिणाम का अनुमान लगाने, परिकल्पना करने, समझने और इससे निपटने में सक्षम नहीं होगी। केंद्र सरकार के अनुसार, समलैंगिक विवाह के मुद्दे पर सात राज्यों से जवाब प्राप्त हुए हैं, जिनमें असम राजस्थान तथा आंध्र प्रदेश की सरकारों इसे क़ानूनी मान्यता देने का विरोध किया है। जबकि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर और सिक्किम ने इस विषय को संवेदनशील मानते हुए व्यापक विमर्श की बात कही है। ऊपर से आंध्र से लेकर राजस्थान तक के विभिन्न धर्म-सम्प्रदायों के प्रमुखों ने अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप आपत्ति दर्ज करायी है।

भारतीय समाज अभी भी बुद्धत्व की प्रक्रिया के अंतर्गत ऐसे विषयों को अव्यक्तानी मानकर ही चल रहा है। परन्तु न्यायपालिका इस विषय पर अतिसक्रिय है। उसने पहले तो तीसरे लिंग को मान्यता दी, फिर लैंगिक अभिरुचि को निजता का मामला बताते हुए मूल अधिकारों की श्रेणी में ला दिया। पुन: समलैंगिकता को आपराधिक एवं अवैध सम्बन्धों की श्रेणी से मुक्त किया। अब वह समलैंगिक विवाहों को क़ानूनी मान्यता देने की ओर अग्रसर है। अदालती संघर्ष की अपनी व्याख्या होगी। अपना प्रभाव होगा। किन्तु मुख्य प्रश्न यह है कि क्या क़ानूनी लड़ाई और उग्र, भौंडे प्रदर्शनों से समलैंगिक समाज एवं उनका समर्थक वर्ग इसे सामाजिक सहमति दिलवा पाएगा? हो सकता है कि न्यायालय उन्हें क़ानूनी मान्यता प्रदान कर दे। हो सकता है कि इससे समलैंगिक समाज स्वयं को उन्मुक्त एवं स्वतंत्र अनुभव करे। लेकिन इस वर्ग की समस्या की क्या इसी परिधि में सुलझ जाएगी?

इसके दूसरे पहलू देखें- अब तक इस बात के प्रमाण मिलना दुष्कर हैं कि भारत में समलैंगिक वर्ग के लोग लगातार क़ानूनी रूप से प्रताडि़त किये जा रहें हों। तक़रीबन डेढ़ सौ वर्षों पूर्व लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता वाले विधि आयोग के सौजन्य से प्रवर्तित इस क़ानून के तहत अब तक सम्भवत: कुल छ: या सात मुक़दमे दर्ज हुए हैं, जिनमें मात्र सन् 35 में एक व्यक्ति को सज़ा मिली है। इसका सामान्य अर्थ है कि न तो यह क़ानून कभी सख़्ती से लागू हुआ है और न ही इसकी आड़ में किसी चयनित वर्ग का प्रताडि़त किया गया है। अत: इससे सम्बन्धित क़ानूनी उत्पीडऩ की शिकायत वाजिब तो नहीं मानी जा सकती। इसका तात्पर्य है कि समलैंगिक समाज का संत्रास क़ानूनी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एवं सामाजिक है।

अब प्रश्न पुनश्च वही है कि क्या अदालती निर्णय सांस्कृतिक धारणाएँ एवं सामाजिक मान्यताएँ परिवर्तित करने में सक्षम हैं? यदि ऐसा है, तो शारदा एक्ट (1929) के प्रभाव में आने के बाद बाल विवाह एकदम से ख़त्म हो जाने चाहिए थे। लेकिन ऐसा तो नहीं हुआ। बाल विवाह कमोबेश आज भी व्यवहार में हैं। यदि संवैधानिक नियम ही समाज को त्वरित रूप से मर्यादित करने में सक्षम होते, तो संविधान के अनुच्छेद-17 के प्रवर्तित होने के साथ ही समाज को छुआछूत मुक्त हो जाना चाहिए था; लेकिन वह अब भी विद्यमान है। यदि क़ानून ही बदलाव के संवाहक बन सकते, तो मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम-2019 के प्रभावी होते ही इस्लामिक समाज तलाक़-ए-बिद्दत (तीन तलाक़) के दुर्गुण से मुक्त हो जाना चाहिए था; लेकिन यह समस्या तो जस-की-तस है।

समाज के किसी भी वर्ग की निजी रुचि चाहे, वह उसकी यौन अभिरुचि ही क्यों न हो; उसके आधार पर भेदभाव अथवा प्रताडऩा को मर्यादित एवं मानवीयता नहीं माना जा सकता। भारत समेत दुनिया भर समलैंगिक या परालैंगिक हमेशा से मौज़ूद रहें हैं। तात्पर्य यह कि निजी लैंगिक रुचि की एक मर्यादा हमेशा से समाज में मौज़ूद रही है। परन्तु पूर्व में धारा-377 को असंवैधानिक घोषित किये जाने के अदालती निर्णय पर आक्रामक अभिव्यक्तियों की आवश्यकता नहीं थी। ये अभिव्यक्तियाँ अनावश्यक-अवैधानिक उकसावे की क्रिया ही अधिक प्रतीत हुईं, जिसमें समाज के बहुसंख्यक वर्ग को प्रतिक्रिया के उत्तेजित करने का प्रयास किया जा रहा हो। समलैंगिकता को आक्रामकता के साथ सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित करने का प्रयास वैचारिक अतिवादी या जागरूकता का विकृत स्वरूप ही माना जाएगा।

समलैंगिकता के सामाजिक स्वीकृति की ज़िद पश्चिमी अतिवादिता से प्रेरित है। यह संघर्ष एक ऐसे उन्नत आधुनिक समाज के अंतद्र्वंद्व की उपज है, जो सामाजिक असमानता, स्वास्थ्य के अधिकार, गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार जैसे कई मूलभूत पहलुओं से गुज़रकर भौतिकता और उपभोगवाद से लगभग तृप्त हो चुका है। इस अवस्था तक पहुँचने में उसने अपने संवेदनाओं के दृश्य इतने दूषित कर रखे हैं कि अब उसे इसे जीवित करने के लिए नित नये उपायों की तलाश है। यह वास्तव में उसी पश्चिमी विकास का परिचायक है, जहाँ परिवार के ध्वंस पर आधुनिकता की समाज खड़ी की जाए। अत: ऐसे समाज की समलैंगिकता की सामाजिक स्वीकृति की लड़ाई को फिर भी समझा जा सकता है; लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक वंचना, आर्थिक विषमता जैसे जीवन के आधारभूत तत्त्वों को समाज में सर्वव्यापी बनाने एवं सँजोने में लगे एक राष्ट्र के लिए क्या समलैंगिकता की क़ानूनी सिद्धि ही मुख्य विषय है?

सम्भवत: ईसाईवाद एवं चर्च का कड़ा रुख़ भी पश्चिमी जगत में इस प्रतिरोध का एक कारण रहा हो। किन्तु भारत के किसी भी धर्म-शास्त्र, स्मृति या मतवाद में समलैंगिकता को दण्डनीय या वर्जित करने के विशेष उल्लेख नहीं है। इसका अर्थ है कि इसे मानव सहजीवन या निजी रुचि का विषय समझकर अनदेखा किया गया होगा। साथ ही इसके आधार पर प्राचीन या मध्ययुगीन समाज में लक्षित उत्पीडऩ के भी प्रमाण नहीं मिलते। समलैंगिकता को किसी भी समाज में सहवास की सहज प्रक्रिया नहीं माना गया है। यह घातक यौन रोगों का भी बड़ा कारक है। समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने का सबसे ख़राब प्रभाव भारत के सामाजिक ढाँचे पर पड़ेगा। कैसे? आइए, इसे आँकड़ों से समझते हैं- सर्वोच्च न्यायालय में समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता सम्बन्धित सुनवाई के दौरान पुणे की संस्था- दृष्टि स्त्री अध्ययन प्रबोधन केंद्र ने देश भर में 13 भाषाओं को बोलने वाले विभिन्न जाति-धर्मों के 57,614 लोगों के बीच इस विषय पर एक सर्वे कराया। सर्वे में शामिल 83.9 फ़ीसदी लोगों ने समलैंगिक विवाह का विरोध किया। उन्होंने इसे प्राकृतिक और सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध माना, जिसके कारण अगले कुछ दशकों में पूरा सामाजिक ढाँचा चरमरा जाएगा। लोगों का मानना था कि इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव महिलाओं और बच्चों पर होगा।

एलजीबीटीक्यू समुदाय के साथ ही न्यायपालिका को समझना होगा कि क़ानून समाज का नेतृत्वकर्ता नहीं, बल्कि अनुगामी ही हो सकता है। इन्हें समझना होगा कि अदालतों के आदेश और संवैधानिक अध्यादेशों से सांस्कृतिक मान्यताएँ और सामाजिक पूर्वाग्रह नहीं बदलते। क़ानून के ज़रिये समाज को निर्देशित ज़रूर किया जा सकता, किन्तु परिवर्तित नहीं। न्यायपालिका के आदेशों के ज़रिये एलजीबीटीक्यू समुदाय अपने लिए सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित कर लेगा, यह केवल एक भ्रम है। सम्भव है कि उसकी निरंतर कोशिशें लम्बे अर्से में फलीभूत होने की सम्भावना पैदा करें। इसी परिपेक्ष्य में भारतीय मीडिया का एक वर्ग, ख़ासकर अंग्रेजी मिडिया समलैंगिकता की क़ानूनी स्वीकृति को ऐसे प्रस्तुत एवं समर्थन दे रहा है; मानो देश में अब यह आधुनिकता एवं विकास का पैमाना हो एवं समलैंगिकता के विरोधी जैसे पुरातनपंथी एवं मध्ययुगीन बर्बरता के प्रतीक हों। इसे वैचारिक विकृति ही कहा जाना चाहिए। दो व्यक्तियों के अपने निजी रुचि पर आधारित लैंगिक चयन एवं सहमति आधारित गोपनीय यौन सम्बन्धों पर समाज को कभी भी आपत्ति नहीं रही हैं। फिर समलैंगिकता आधारित विवाह को क़ानूनी मान्यता की ज़िद समझ पाना कठिन है। इससे कहीं अधिक ज़रूरी था कि ये बुद्धिजीवी वर्ग किन्नरों को मुख्यधारा में शामिल किये जाने को प्राथमिकता देता। अत: अब भी इस विषय पर आधुनिकता के प्रवर्तकों के न्याय की त्वरा, स्वयं की प्रमाणिकता सिद्धि की उत्तेजना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुंठित प्रदर्शन का औचित्य समझ पाना कठिन है।

यौन अभिरुचि ज़रूरी हो सकती है। परन्तु यौनिकता का नग्न प्रदर्शन एवं उसकी उन्मुक्तता का प्रसार सहज नहीं हो सकता। मान लेते हैं कि हर व्यक्ति को उसकी निजी लैंगिक अभिरुचि के आधार पर जीने का अधिकार होना चाहिए। ऐसे में क्या हो यदि भविष्य में कोई व्यक्ति किसी जानवर के साथ सहवास या विवाह को क़ानूनी मान्यता देने की माँग करे? यौन इच्छा की पूर्ति की मानवीय गरिमा के अनुकूल यदि कोई व्यक्ति स्कूल, कॉलेज, सरकारी द$फ्तरों या सडक़ पर सहमति के साथ सार्वजनिक आधार पर अपने साथी के सहवास का अधिकार माँगे, तो क्या इसकी इजाज़त दी जानी चाहिए? क्या किसी भी समाज में अधिकारों का वितरण स्वेच्छाचारिता के आधार पर किया जाना चाहिए? निजता के अधिकार एवं स्वतंत्रता के मुखर अलम्बदारों को भविष्य की दृष्टि से ऐसे प्रश्नों के उत्तर तलाश ही लेने चाहिए।

पश्चिम में लैंगिक मतवादिता भी वर्तमान दौर में अतिवाद की ओर अग्रसर है। यहाँ तर्कों के अजीब भँवर हैं। कुछ लोगों की माँग है कि स्त्री, पुरुषों के लिए अलग-अलग शौचालय नहीं होने चाहिए। महिलाओं की खेल प्रतियोगिता में पारलैंगिक पुरुषों के शामिल होने की आज़ादी हो साथ में स्कूलों में लैंगिक पहचान को निजी मामला सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है। देर-सवेर आधुनिकता का ये कुचक्र भारत तक भी पहुँचेगा। परन्तु भारतीय समाज को सचेत होना पड़ेगा। पश्चिमी उन्मुक्तता की विद्रूपता से प्रेरित आधुनिकता और मानवीय स्वतंत्रता की अतिवादिता के ये अनर्गल सन्दर्भ कहीं तो रुकने चाहिए।

(लेखक पत्रकार हैं और ये उनके अपने विचार हैं।)

ख़तरनाक मोड़ पर मणिपुर हिंसा

स्थिति से निपटने को लेकर मुख्यमंत्री पर उठ रहे सवाल

मणिपुर में हालात लगातार ख़राब हो रहे हैं। हिंसा ने राज्य में अब तक 100 के क़रीब लोगों की जान ले ली है और समुदायों के बीच पैदा हुई दूरी बढ़ती जा रही है। एक साल पहले ही दोबारा सत्ता में आयी भाजपा की सरकार इस बार इस मसले पर नाकाम साबित होती दिख रही है। मुख्यमंत्री नोंगथोम्बम बीरेन सिंह की छवि पर भी इससे बट्टा लगा है और उनकी कुर्सी ख़तरे में दिख रही है। मणिपुर में एन. बीरेन सिंह को कांग्रेस से भाजपा में आने के बाद 2017 में भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाया था। दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह मैतेई समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं, जो अपने लिए अनुसूचित जनजाति के दर्जे की माँग कर रहा है। सरकार को हिंसा बढऩे के कारण कई क्षेत्रों में कफ्र्यू और इंटरनेट पर बैन लगाना पड़ा है, जिससे आम जनजीवन ठहर-सा गया है।

एक मोटे अनुमान के मुताबिक, राज्य भर में स्थिति से निपटने के लिए 10,000 से ज़्यादा सैन्य और अर्ध-सैन्य कर्मियों को तैनात करना पड़ा है। राज्य का एक बड़ा पहाड़ी हिस्सा है, जो नगालैंड, मिजोरम, असम के अलावा पड़ोसी देश म्यांमार से सटा है; जनजातियों पर आधारित है। यहाँ की बड़ी आबादी राज्य की कुल आबादी का क़रीब 37 फ़ीसदी है। वहाँ तनाव का असली कारण यह है कि बहुसंख्यक मैतेई समुदाय अनुसूचित जनजाति का दर्जा चाहता है। हालाँकि पहाड़ी क्षेत्र की जनजातियाँ, जिनमें कुकी और नगा जनजातियाँ प्रमुख हैं, इसका जबरदस्त विरोध कर रही हैं।

मणिपुर की हिंसा से केंद्र सरकार भी चिन्तित है। इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को तीन दिन तक वहाँ दौरा करना पड़ा। अमित शाह के दौरे के दौरान मणिपुर केबिनेट के साथ 30 मई को हुई बैठक में पाँच अहम फ़ैसले किये गये। इन निर्णयों को शान्ति प्रक्रिया के तहत पूरे राज्य में तुरन्त लागू किया जाएगा। शाह ने कुकी आदिवासी नेताओं के साथ एक बैठक में केंद्रीय जाँच ब्यूरो की तरफ़ से हिंसा की जाँच की भी बात कही है। बैठक में क़ानून व्यवस्था को दुरुस्त करने, राहत कार्यों में तेज़ी लाने, जातीय संघर्ष में मारे गये लोगों के परिवारों को 10 लाख रुपये का मुआवज़ा देने और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने और अफ़वाहों को दूर करने के लिए बीएसएनएल की टेलीफोन लाइन फिर से खोलने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने का निर्णय किया गया। दोनों ही समुदाय विरोध से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। केंद्र सरकार भी इस मायने में नाकाम साबित हुई है कि उसने कई महीनों से सुलग रही आग को समझने में देरी की।

इधर चर्चित पत्रकार और फुटबॉलर रहे बीरेन सिंह को वैसे तो राज्य की ज़मीनी हक़ीक़त का माहिर माना जाता है; लेकिन हिंसा के इस दौर से वह राज्य को बाहर नहीं निकाल नहीं पाये हैं। कुकी और नगा जनजातियों और मैतेई समुदायों के बीच भडक़ी हिंसा को बीरेन सिंह रोकने में सफल नहीं रहे हैं। वहाँ बड़े पैमाने पर आगजनी और हिंसा हुई है। अर्ध सैनिक बलों को क़ानून-व्यवस्था सँभालने का ज़िम्मा दिया गया है। लेकिन असल मसला सि$र्फ क़ानून व्यवस्था का नहीं है, बल्कि समुदायों में बढ़ती दूरी का है, जो राज्य में भविष्य के लिए चिन्ता की बात है। राजनीतिक नेतृत्व सँभालने में फ़िलहाल नाकाम रहा है। राज्य में अब तक हज़ारों लोग बेघर हो चुके हैं। उन्हें शिविरों में रहना पड़ रहा है। मणिपुर में मैतेई समुदाय बहुसंख्यक समुदाय है। वह अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की माँग कर रहा है। कुकी और नगा जनजातियाँ इस माँग के विरोध में और नतीजा यह है कि इससे वहाँ हिंसा भडक़ रही है। मैतेई ट्राइब यूनियन (एमटीयू) ने इसे लेकर मणिपुर उच्च न्यायालय में एक याचिका भी डाली है, जिस पर मई के शुरू में सुनवाई करने के बाद उच्च अदालत ने राज्य सरकार से इस पर विचार करने को कहा था।

हालाँकि उच्च अदालत के सरकार को दिये गये सुझाव के अगले ही दिन ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन (एटीएसयू) ने चुराचांदपुर में एक रैली निकाली, जिसे उसने आदिवासी एकजुटता मार्च का नाम दिया। लेकिन इस मार्च के दौरान हिंसा भडक़ गयी, जिसने अब तक राज्य को अपनी लपटों में ले रखा है। राज्य के जानकारों का कहना है कि इतनी बड़ी हिंसा प्रदेश में पहले कभी नहीं हुई।

हिंसा पूरे राज्य में फैली है। इंफाल से लेकर दूरदराज़ के कांगपोकपी तक। वहाँ बड़ी संख्या में जले हुए मकान और वाहन हिंसा की कहानी ख़ुद कहते हैं। धार्मिक स्थलों पर भी हमले हुए हैं। राज्य में ऐसे बहुत से जानकार लोग हैं, जो मुख्यमंत्री को हिंसा में रोकने के लिए नाकाम रहने पर कठघरे में खड़ा करते हैं। मई के शुरू में जब राज्य में हिंसा भडक़ी थी, उससे पहले मुख्यमंत्री का एक बयान देश भर में सुर्ख़ियाँ बना, जिसमें उन्होंने कहा कि उनका राज्य म्यांमार से अवैध आप्रवासन का बड़ा ख़तरा झेल रहा है। मुख्यमंत्री के मुताबिक, उन्होंने इन अवैध आप्रवासियों की जाँच के लिए को समिति बनायी थी, जिसने 2,000 से ज़्यादा म्यांमार के नागरिकों की पहचान की है। राज्य सरकार ने म्यांमार के ऐसे 410 लोगों को हिरासत में लिया है।

जनजाति समुदायों की आशंका

कुछ रिपोटर्स के मुताबिक, कुकी जनजाति के बीच मुख्यमंत्री के रोल को लेकर नाराज़गी है। मैतेई समुदाय का कहना है कि अनुसूचित जनजाति श्रेणी में शामिल होने से उन्हें आरक्षण का लाभ मिल सकता है, साथ ही वन भूमि तक उनकी पहुँच बढ़ सकती है। यह चीज़ भी कुकी लोगों को परेशान किये हुए हैं, लिहाज़ा वे मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्ज देने के र्ख़िलाफ़ हैं और इसका जबरदस्त विरोध कर रहे हैं।

दरअसल कुकी और नगा जनजातियाँ इस आशंका से भरी हैं कि मैतेयी समुदाय जनजाति का दर्जा मिलने से उनकी वन भूमि तक पहुँच बढ़ जाएगी। इससे उनके इलाक़ों में बाहरी लोगों का दख़ल बढ़ जाएगा और उनकी सम्पदा के लिए ख़तरा पैदा हो जाएगा। लिहाज़ा वे इसका जबरदस्त विरोध कर रहे हैं। मुख्यमंत्री बीरेन सिंह का कहना है कि उन्हें मिली रिपोर्ट के मुताबिक, 40 आतंकवादी मारे गये हैं और उनसे एम-16 और एके-47 असॉल्ट राइफलों और स्नाइपर गन जैसे हथियार मिले हैं। सरकार पहले से ही वहाँ सेना और सुरक्षा बलों को मदद के लिए बुला चुकी है। क़ानून व्यवस्था की समीक्षा के लिए सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे तक मणिपुर का दौरा कर आये हैं।

यह कहा जाता है कि मुख्यमंत्री जिन लोगों के उग्रवादियों के रूप में मारे जाने की बात कर रहे हैं, उनमें काफ़ी लोग जनजातीय कुकी और नगा विद्रोही हैं। एक मौक़े पर लग रहा था कि मणिपुर में हिंसा थम जाएगी; लेकिन मई के आर्ख़िरी पखवाड़े में हालात फिर ख़राब हो गये। स्थिति यह हुई कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मणिपुर दौरे की घोषणा के बाद भी वहाँ हिंसा जारी रही। इस दौरान दूसरे दौर की हिंसा में 28 मई को एक ही दिन में पुलिस कर्मी सहित पाँच लोगों की मौत हो चुकी थी, जबकि कई घायल हुए थे। सम्पत्ति का नुक़सान अलग से हुआ था। कुकी-मैतेई समुदाय से शान्ति बनाने रखने की मुख्यमंत्री बीरेन सिंह की अपील का भी कोई असर होता नहीं दिखा है।

क्या यह दोबारा नोटबंदी है?

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के 2,000 के नोट बंद करने के ऐलान ने देश भर में खलबली मचा दी है। हालाँकि 2,000 का नोट मध्यम वर्ग के पास न के बराबर ही होगा और निम्न वर्ग ने तो महीनों से इसकी शक्ल भी नहीं देखी होगी, बल्कि कितनों ने तो 2,000 का नोट हाथ में लेकर भी शायद न देखा हो। फिर भी देश के इस सबसे बड़े नोट के बंद होने की चर्चा क्यों? क्यों ज़्यादातर लोग इसे ग़लत फ़ैसला बता रहे हैं? क्या यह दोबारा की गयी नोटबंदी है?

दरअसल, महज़ 6.5 साल में 2,000 के नोट को वापस लेने का ऐलान सरकार की नीयत पर सवाल उठा रहा है। 8 नवंबर, 2016 को अचानक नोटबंदी का ऐलान करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को कई आश्वासन दिये थे, जिसमें प्रमुख थे- कालाधन ख़त्म होगा, आतंकवाद की कमर टूट जाएगी और ग़रीबों को राहत मिलेगी; लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि जिन लोगों ने अपनी तिजौरी में 1,000 रुपये के नोट जमा कर रखे थे, उन्होंने उसकी जगह 2,000 के नोट जमा कर लिये। नतीजा यह हुआ कि 2022 आते-आते 2,000 का नोट बाज़ार से ग़ायब हो गया। बाज़ार से ही नहीं, बैंकों और एटीएम से भी यह 2,000 नोट अचानक ग़ायब हो गया। तो क्या सरकार ने पहले ही मन बना लिया था कि 2,000 रुपये का नोट बंद कर देना है? क्या सरकार से मिलकर चलने वाले पूँजीपतियों के 2,000 रुपये के नोट पहले ही बदले जा चुके हैं? इन सवालों के जवाब तो नहीं हैं; लेकिन यह संदेह बरक़रार है कि दोबारा नोटबंदी जैसा यह ऐलान कहीं-न-कहीं किसी गड़बड़ी की ओर इशारा कर रहा है।

कुछ लोग तो यहाँ तक दावा कर रहे हैं कि ये नोटबंदी में हुए घोटाले और नोटबंदी की नाकामी को छिपाने का एक तरीक़ा है, जिसे इस बार प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ऊपर न लेकर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के सिर पर थोप दिया है, ताकि लोग उन पर उँगली न उठा सकें। लेकिन उँगलियाँ प्रधानमंत्री पर ही उठ रही हैं।

अर्थशास्त्रियों का सवाल है कि आख़िर 2,000 के नोट में क्या कमी है? अगर कोई कमी है, तो सरकार को पहले बताना चाहिए, इस तरह अचानक ऐलान का क्या मतलब है? बिना वजह बताये नोटबंद कर देना सवालिया निशान खड़े करता है। तो वहीं कुछ अर्थ शास्त्री यह तर्क दे रहे हैं कि 2,000 के नोट लोगों ने छिपा लिये थे, इसलिए उनकी वापसी एक अच्छा क़दम है। दूसरा फ़र्ज़ी नोटों की जानकारियों के चलते इसे बंद किया गया, ताकि फ़र्ज़ी नोट चलन से बाहर हो सकें। हालाँकि इन दोनों ही तर्कों में कोई दम नहीं दिखता, क्योंकि अगर 2,000 के नोटों को लोगों ने अपनी-अपनी तिजौरियों में भर लिया था, तो क्या वो 500 रुपये के नोट से तिजौरियाँ नहीं भरेंगे। अगर लोगों की तिजौरी से बाहर 2,000 रुपये के नोट निकालने थे, तो एक सीमा तय करनी चाहिए कि इससे ज़्यादा नोट नहीं बदले जाएँगे। हालाँकि इसका भी कोई फ़ायदा तो नहीं होना था, क्योंकि 2016 में जब 500 और 1,000 रुपये के नोट बंद हुए थे, तो भी पूँजीपतियों के अरबों-ख़रबों रुपये बिना उनके लाइन में लगे बदल दिये गये थे। दूसरा तर्क फ़र्ज़ी नोटों का भी कुछ हज़म नहीं होता, क्योंकि अगर सरकार को फ़र्ज़ी नोटों पर रोक लगानी होती, तो वो हिन्दुस्तान में सभी नोटों को और बेहतरीन काग़ज़ पर मज़बूत और टिफिकल टाइप के नोट छापती; लेकिन सरकार ने तो पुराने नोटों से भी हल्के नोट इस बार छापे, जिनका काग़ज़ भी बहुत हल्का है।

मेरा मानना है कि बड़े लोगों के लिए नोट बदलना कोई मुश्किल काम नहीं है, क्योंकि अभी तो रिजर्व बैंक ने 2,000 रुपये एक दिन में बदलने को कहा भी है; लेकिन जब एक व्यक्ति के महज़ 4,000 रुपये ही बदले जा रहे थे, तब वही लोग लाइन में लगे, जो मध्यम वर्गीय या ग़रीब थे; और उन्हीं में सैकड़ों लोगों की मौत भी हुई। देख लेना, अब भी अमीरों को न तो बैंक जाने की ज़रूरत पड़ेगी और न ही उन्हें 2,000 रुपये के नोट बदलने के लिए किसी लिमिट का पालन करना पड़ेगा; लेकिन फिर मरेगा कौन? मुसीबत किसके गले पड़ेगी?

दरअसल मुसीबत उन लोगों के गले पड़ेगी, जिन्होंने नवंबर, 2016 के बाद अपनी ज़मीन बेची, अपना घर बेचा, अपना वाहन बेचा या अपनी कोई अन्य अचल सम्पत्ति बेची और बदले में कालेधन की तरह 2,000 के नोट ले लिए और उन्हें घर में रख लिया। या फिर वो व्यापारी वर्ग दिक़्क़त में फँसेगा, जो हर रोज़ या दूसरे-तीसरे दिन अपने गल्ले से एक या दो नोट 2,000 के निकालकर घर में रखता गया। वो फँसेगा, जिसने अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए या उनकी शादी के लिए घरों में 2,000 रुपये के कुछ नोट जोडक़र रखे थे। क्योंकि एक बार फिर इन लोगों को बैंकों में दौडऩा पड़ रहा है। आप सोच रहे होंगे कि इसमें दिक़्क़त की क्या बात है? रिजर्व बैंक ने कह दिया कि 20,000 रुपये रोज़ के हिसाब से कोई भी पैसे बदल सकता है। लेकिन इसमें भी दिक़्क़त है। क्योंकि आपको याद होगा कि केंद्र की मोदी सरकार पहले ही यह नियम बना चुकी है कि कोई भी नक़द लेन-देन 2,00,000 रुपये से ज़्यादा का नहीं हो सकेगा। इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी के पास 2,00,000 रुपये से ज़्यादा कैश है, तो वह ऐसे फँसेगा कि उसके पास इतना कैश कहाँ से आया? अगर किसी के पास 2,00,000 या उससे ज़्यादा है, तो फिर उसके स्रोत बताने होंगे।

बहरहाल फ़िलहाल जो लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोसने में लगे हैं, वो यह भी जानते होंगे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रिजर्व बैंक की 2,000 के नोट की बंदी की घोषणा से ऐन पहले विदेश यात्रा पर निकल गये और वो भी जापान। आप सोच रहे होंगे कि जापान गये, तो इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है? फ़र्क़ तो नहीं पड़ता; लेकिन आपको याद होगा कि जब उन्होंने 2016 में नोटबंदी का ऐलान किया था, तब भी वह जापान ही गये थे। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने प्रधानमंत्री मोदी को इसी पर घेरा है।

बहरहाल रिजर्व बैंक ने ‘क्लीन नोट पॉलिसी’ के तहत 2,000 रुपये के नोट को बंद करने का फ़ैसला लिया है। और रिजर्व बैंक ने आरबीआई एक्ट-1934 की धारा-24(1) के तहत इस नोट को 2016 में छापना शुरू किया था, जिसमें शुरू में चिप होने तक के कथित दावे किये गये थे। कुछ ही वर्षों में यह नोट बाज़ार में बैंक में और लोगों के पास से दिखना बंद हो गया।

कुछ लोग निश्चिंत हैं कि उन्हें क्या फ़र्क़ पड़ता है, उनके पास तो 2,000 रुपये का एक भी नोट नहीं है। लेकिन वो लोग शायद भूल रहे हैं कि तब भी उन्हें नुक़सान है। क्योंकि जब देश में कोई नोट छपता है, तो उसकी छपाई में एक निश्चित लागत आती है। सरकार ने जब नये नोट छापे, तो इसके बदले में करोड़ों रुपये की लागत नये नोटों को छापने में लगी, और अब जब 2,000 का नोट बंद हो रहा है, तो ज़ाहिर सी बात है कि वह लागत वसूल होने से पहले ही नुक़सान में चली गयी। क्योंकि यह लागत निकालने के लिए इस 2,000 रुपये के नोट को बाज़ार में कम-से-कम 10-15 साल रहना चाहिए था। और अब ज़ाहिर है कि रिजर्व बैंक 2,000 के इस नोट के बदले 500 रुपये के नोट देने के लिए 500 रुपये के नोटों की छपाई बढ़ाएगा। कहने का मतलब यह है कि जितनी क़ीमत के 2,000 रुपये के नोट बैंकों में वापस आएँगे, उतनी क़ीमत के 500, 200, 100 तक के नोट तो रिजर्व बैंक को छापने ही होंगे, वरना नोटों की पूर्ति कैसे होगी? एक शंका यह भी उठ रही है कि कहीं ऐसा तो नहीं रिजर्व बैंक ने पुराने नोटों की क़ीमत से ज़्यादा 2,000 के नोट छाप दिये? और उसे जब इसका एहसास हुआ, तो उसने इन 2,000 के नोटों को वापस लेने का इरादा बना लिया।

साल 2021 में केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने लोकसभा में कहा था कि पिछले दो साल से यानी 2019 से 2,000 रुपये के एक भी नोट नहीं छपे हैं। ऐसे में रिजर्व बैंक द्वारा ज़्यादा नोट छापने का संदेह भी बेबुनियाद ही लगता है। लेकिन इससे यह ज़रूर लगता है कि सरकार ने 2,000 रुपये का नोट बंद करने का मन काफ़ी पहले ही शायद बना लिया था। कुछ लोगों ने इस प्रकार का संदेह काफ़ी पहले ज़ाहिर किया था। कोई छ:-सात महीने पहले 2,000 रुपये के नोट के बाज़ार से अचानक ग़ायब होने की ख़बरें भी ख़ूब छपी हुई थीं; लेकिन तब किसी ने इस ओर $गौर नहीं किया। क्या बैंकों द्वारा 2,000 के नोट न के बराबर देना या बिलकुल न देना, एटीएम और बाज़ार तक से 2,000 के ये नये नोट ग़ायब होना और बीच-बीच में 2,000 रुपये के नोट को लेकर ख़बरें आना इस बात का संकेत थे कि आने वाले समय में इन 2,000 रुपये के नोटों को भी बंद कर दिया जाएगा?

आरबीआई अधिनियम-1934 की धारा-22 के मुताबिक, हिन्दुस्तान में नोट जारी करने का एकमात्र अधिकार रिजर्व बैंक के पास होगा, केंद्र सरकार के पास नहीं। वह एक अवधि के लिए केंद्र सरकार के मुद्रा नोट जारी कर सकता है और नोटों पर नियंत्रण भी कर सकता है। आरबीआई अधिनियम-1934 की धारा-24 रिजर्व बैंक को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह दो रुपये से लेकर 10,000 रुपये तक की क़ीमत के नोट छाप सकता है। लेकिन इसमें कहीं 2,000 रुपये के नोट को छापने का उल्लेख नहीं है। हालाँकि केंद्र सरकार केंद्रीय बोर्ड की सिफ़ारिश पर इसे निर्दिष्ट कर सकती है।

यहाँ सवाल यह है कि अगर इस आधार पर 2,000 रुपये के नोटों को बंद किया जा रहा है, तो फिर पहले इन्हें छापा ही क्यों गया? और अगर इस नोट को छापने की इतनी ही आवश्यकता थी, तो फिर उस क़ानून में इसे छापने के लिए प्रस्ताव पारित क्यों नहीं किया गया? कुछ जानकार कह रहे हैं कि विपक्ष की कमर तोडऩे के लिए एक बार फिर 2,000 के नोट को बंद किया गया है, ताकि 2024 के लोकसभा चुनाव और उससे पहले राज्यों के विधानसभा चुनावों में विपक्ष पैसे से मज़बूत न रह सके। इसके पीछे इस बात को कहने वालों का तर्क है कि भाजपा, ख़ासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के अन्य शीर्ष नेतृत्व वाले नेता कर्नाटक हार से बौखलाये हुए हैं।

हालाँकि कुछ लोग इस बात से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते। उनका कहना है कि दाल में कुछ काला तो है; लेकिन 2,000 के नोट को बंद कर देने से विपक्ष की कमर नहीं टूटेगी, बल्कि मोदी सरकार के ख़िलाफ़ और माहौल बनेगा। बहरहाल रिजर्व बैंक ने कहा है कि 01 अक्टूबर, 2023 से 2,000 रुपये का नोट चलन से बाहर हो जाएगा। इसलिए रिजर्व बैंक ने लोगों से कहा है कि वे अपने पास जमा 2,000 के नोटों को 30 सितंबर, 2023 तक बदल लें, तब तक यह नोट देश में वैध मुद्रा माना जाएगा। लेकिन यहाँ भी दिक़्क़त यह आ गयी है कि अब व्यापारी वर्ग 2,000 रुपये का नोट लेने से कतरा रहा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

संवैधानिक ताक़तों के बीच पिसती जनता

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

भारत की राजधानी दिल्ली संवैधानिक ताक़तों की लड़ाई का केंद्र बनी हुई है। यह लड़ाई दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा दिल्ली के उप राज्यपाल की शक्तियों को लेकर है। दिल्ली का प्रतिनिधित्व करने वाले उप राज्यपाल को केंद्र सरकार दिल्ली का ही नहीं, बल्कि दिल्ली के मुख्यमंत्री का भी बॉस बनाकर रखना चाहती है।

संवैधानिक अधिकारों की यह लड़ाई सन् 2015 से चल रही है। देश के शीर्ष अदालत ने दोबारा बीती 11 मई को दिल्ली का बॉस चुनी हुई सरकार को बताया। परन्तु केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत के ख़िलाफ़ जाकर एक ऐसा अध्यादेश पारित कर दिया, जिसके अनुसार अब दिल्ली के बॉस उप राज्यपाल ही रहेंगे। इस लड़ाई की मुख्य वजह केंद्र की तरफ़ से सारे अधिकार अपने क़ब्ज़े में रखना है, तो दूसरी तरफ़ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का दावा है कि इससे दिल्ली का विकास रुका हुआ है, क्योंकि ज़रूरी फाइलों को उप राज्यपाल अपने पास बिना कारण के बिना कोई कारण बताये रोक लेते हैं, जिससे विकास के कामों में अड़चन आती है। उनका आरोप यह भी है कि उप राज्यपाल ने कई अनावश्यक अधिकारियों की भर्ती कर रखी है, जो दिल्ली के विकास कार्यों में टांग अड़ाते हैं। अब जब अधिकारों की लड़ाई को लेकर केंद्र सरकार तथा दिल्ली की सरकार आमने-सामने हैं। आम आदमी पार्टी के नेता तथा कार्यकर्ता केंद्र के इस अध्यादेश के ख़िलाफ़ सडक़ पर उतरने को तैयार हैं। दिल्ली सरकार दोबारा शीर्ष अदालत जाने की तैयारी में है।

ख़ास बात यह है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शीर्ष अदालत में जाने के ऐलान के तुरन्त बाद केंद्र सरकार शीर्ष अदालत के दरवाज़े पर यह फ़रियाद लेकर पहुँच चुकी है कि शीर्ष अदालत अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करे। परन्तु केंद्र सरकार का शीर्ष अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अध्यादेश लाकर यह साबित करता है कि केंद्र सरकार का शीर्ष अदालत में जाना एक ड्रामा भर है, ताकि इसे अदालत की अवहेलना न कहा जाए। परन्तु अवहेलना तो केंद्र सरकार ने कर दी है, जिसके लिए शीर्ष अदालत को कड़ा संज्ञान लेना चाहिए।

क्या केंद्र को शीर्ष अदालत का फ़ैसला इतना ख़राब लगा कि उसने अदालत के फ़ैसले के 10 दिनों के अन्दर ही अपनी ताक़त के दम पर एक ऐसा अध्यादेश बना दिया, जो पहले नहीं था। लगभग आठ साल की क़ानूनी लड़ाई लडऩे के बाद दिल्ली सरकार को अपने अधिकार शीर्ष अदालत के ज़रिये वापस मिले थे, जो अब केंद्र सरकार के इस क़दम ने छिन रहे हैं। हालाँकि अभी इसे अन्तिम निर्णय नहीं माना जा सकता, जब तक कि शीर्ष अदालत इसे न मान ले। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हमेशा कहते हैं कि अगर केंद्र सरकार तता उनके द्वारा चयनित उप राज्यपाल को ही सारी शक्तियाँ देनी हैं, तो फिर चुनावों की क्या ज़रूरत है? लोकतंत्र के माध्यम से जनता द्वारा सरकार बनाने की ज़रूरत ही क्या है? इन प्रश्नों में तर्क है, जिसका जवाब केंद्र सरकार के पास भी शायद न हो।

राजनीति के कुछ जानकारों का कहना है कि वास्तव में केंद्र सरकार लोकतंत्र की हत्या करके तानाशाही की ओर बढ़ रही है। कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि अगर भाजपा 2024 के चुनाव में केंद्र में आ गयी, तो चुनाव नहीं होने दिये जाएँगे तथा मोदी अधिकृत एक सरकार हमेशा के लिए सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लेगी। यह कोई ऐसा आरोप नहीं है, जो यूँ ही लग रहा है; बल्कि इसकी पुष्टि कुछ भाजपा नेताओं के उन बयानों से होती है, जिनमें उन्होंने कहा था कि आने वाले समय में चुनावों की ज़रूरत नहीं होगी। भाजपा नेता साक्षी महाराज ने तो यहाँ तक कह दिया था कि लगता है 2024 में चुनाव नहीं होंगे। केंद्र सरकार की तानाशाही का दूसरा उदाहरण है कई ऐसे अध्यादेशों को ख़त्म करना, जो राजनीतिक फ़ायदे में अड़चन थे। किसानों ने तीन कृषि क़ानूनों को ख़त्म करा दिया; लेकिन अभी कई ऐसे क़ानून बन चुके हैं, जो जनहित में तो हैं ही नहीं; लोकतंत्र की हत्या के लिए काफ़ी हैं।

दिल्ली में जिस तरह एक चुनी हुई सरकार को अपंग बनाने का काम केंद्र सरकार ने किया है, उससे दिल्ली का विकास संभव ही नहीं है। ऐसा लगता है कि अब केंद्र सरकार दिल्ली के विकास कार्यों में और भी टांग अड़ाने का काम करेगी। हो सकता है कि भविष्य में दिल्ली में हर महीने मिल रही मुफ़्त 200 यूनिट बिजली, मुफ़्त 2000 लीटर पानी, मुफ़्त इलाज, मुफ़्त शिक्षा तथा महिलाओं की मुफ़्त यात्रा पर भी केंद्र सरकार रोक लगा दे। इसकी वजह यह है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत के यही मंत्र हैं। 01 अप्रैल, 2015 से तत्कालीन उप राज्यपाल नजीब जंग के समय से चली आ रही दिल्ली सरकार तथा उप राज्यपाल के बीच की यह लड़ाई इन आठ वर्षों में दिल्ली के तीसरे उप राज्यपाल वी.के. सक्सेना के कार्यकाल में विकट टकराव की स्थिति में पहुँच चुकी है, जिसके बीच जनता पिस रही है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार आने से कई व्यवस्थाएँ सुधरी हैं। सीवर ठीक हुए हैं। गंगा वाटर की सप्लाई बेहतर हुई है। पानी के टैंकरों पर मारामारी का माहौल ख़त्म हुआ है। सीसीटीवी कैमरे लगने से सुरक्षा व्यवस्था में सुधार हुआ है। सडक़ें ठीक हुई हैं। नालियाँ ठीक हुई हैं। चाँदनी चौक जैसी जगह पर सुधार इसका एक बड़ा उदाहरण है, जहाँ कोई नहीं सोच सकता था कि वहाँ की तंग गलियाँ कभी सुधर सकती हैं।

केंद्र सरकार के पेट में दर्द इस बात से भी उठा हुआ है कि दुनिया की सबसे तेज़ी से बढऩे वाली पार्टी आम आदमी पार्टी बन चुकी है, जिसने केवल 11 साल के अन्दर दो राज्यों में अपनी सरकार बनाने के अतिरिक्त तीन राज्यों में अपने सांसद भी बनाये हैं तथा आज राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त कर लिया है। राजनीति के कुछ जानकार कहते हैं कि भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देख रही थी, परन्तु दूसरी ओर एक छोटी पार्टी आम आदमी पार्टी ने उसकी नाक में इतना दम कर दिया कि उसे अब इस छोटी पार्टी से ही डर लगने लगा है। सभी जान चुके हैं कि भारतीय जनता पार्टी अर्थात् केंद्र सरकार अर्थात् नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह सत्ता के लिए अडिय़ल स्वभाव वाले हो चुके हैं।

किसी भी हाल में हर राज्य में अपनी सत्ता स्थापित करना मानो उनका सपना हो चुका है। उनकी यह लालसा राज्यों में राज्य सरकारें स्थापित करने तक सीमित नहीं रह गयी है, बल्कि नगर निगम चुनाव से लेकर ग्राम प्रधानी तक के चुनावों में जीत हासिल करने का उनका एक सपना है, जो उनकी देश पर एक तरफ़ा क़ब्ज़ा करने की सोच को दर्शाता है। दिल्ली में नगर निगम के चुनाव हारने के बावजूद अपना महापौर तथा उप महापौर बनाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाना तथा एल्डरमैन नियुक्त करना इसका एक पुख़्ता उदाहरण है।

अब शीर्ष अदालत के फ़ैसले के हफ़्ते भर बाद ही केंद्र सरकार ने दोबारा जिस तरह दिल्ली सरकार के पर कतर दिये, वह इस केंद्र शासित प्रदेश के लिए ख़तरनाक साबित होगा। केंद्र शासित प्रदेश का अर्थ होना चाहिए प्रदेश में चुनी हुई सरकार को विकास कार्यों के लिए सहयोग करना, न कि उसे ख़त्म करने की साज़िशें करना। केंद्र ने इस अध्यादेश में शीर्ष अदालत के फ़ैसले तबादला तथा नियुक्ति के अधिकार को अपने क़ब्ज़े में ले लिया है, जो शीर्ष अदालत ने दिल्ली की चुनी हुई सरकार को दिये थे। केंद्र की अध्यादेश वाली इस चालाकी से दिल्ली का बॉस उप राज्यपाल को बना दिया गया है तथा दिल्ली सरकार से अधिकार छीन लिये गये हैं। इसी के साथ ही कई ऐसे अधिकारी जो कथित रूप से केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहे थे, अब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के ख़िलाफ़ खुलकर मुखर हो उठे हैं।

अब केंद्र के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) अध्यादेश-2023 के अनुसार ग्रुप-ए के अधिकारियों के तबादले तथा उनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए राष्ट्रीय राजधानी लोक सेवा प्राधिकरण का गठन किया जाएगा। यह प्राधिकरण ग्रुप-ए तथा दानिक्‍स के अधिकारियों के तबादले तथा नियुक्ति से जुड़े फ़ैसले लेगा। परन्तु इस पर आख़िरी निर्णय लेने का अधिकार उप राज्यपाल को ही होगा। इस प्राधिकरण में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अध्यक्ष के रूप में होंगे, परन्तु उन्हें अन्तिम निर्णय लेने का अधिकार नहीं होगा। प्राथिकरण में दिल्ली के मुख्य सचिव तथा प्रमुख गृह सचिव सदस्य होंगे। यहाँ समझने वाली बात यह है कि इस तरह केंद्र सरकार किसी मामले में अधिकारियों तथा मुख्यमंत्री के बीच भी फूट तथा मनमुटाव का तरीक़ा निकाल चुकी है। अक्सर देखा जाता है कि अधिकतर कर्मचारी तथा अधिकारी उसी की तरफ़ होते हैं, जो सबसे ऊपर होता है। ऐसे में उप राज्यपाल के पास सबसे अधिक शक्तियाँ रहेंगी, तो स्पष्ट रूप से अधिकतर अधिकारी उप राज्यपाल की चमचागीरी करेंगे, जिससे दिल्ली के मुख्यमंत्री को काम करने में पहले से भी अधिक अड़चने आ सकती हैं। किसी भी राज्य में किसी भी अधिकारी की हिम्मत नहीं होती कि वह मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ तब मोर्चा खोल दे, जब मुख्यमंत्री ईमानदारी हो; परन्तु दिल्ली में इसकी शुरुआत हो चुकी है।

स्पष्ट है कि यह सब सत्ता के लिए हो रहा है। अब शीर्ष अदालत इस मामले में क्या फ़ैसला सुनाती है, यह देखना होगा। परन्तु केंद्र सरकार के इस पैंतरे से वह भविष्य में औंधे मुँह गिर सकती है, क्योंकि देश भर में भारतीय जनता पार्टी, विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह के ख़िलाफ़ जिस तरह का माहौल बन रहा है तथा जिस तरह से जनता मुखर होती दिख रही है, भविष्य में यह विरोध लम्बी सत्ता के मार्ग में एक डिवाइडर नहीं, बल्कि खाई की तरह काम करेगा।

उत्तराखण्ड में भूमि जिहाद मामला

अतिक्रमण मुक्त अभियान या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण?

बीते कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा का आक्रामक हिन्दुत्व के द्वारा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का मामला बेशक फेल हो गया हो; लेकिन वह इसे हिन्दी पट्टी में तेज़ी से जारी रखना चाहती है। भाजपा शासित राज्यों में आक्रामक हिन्दुत्व के ज़रिये जिस तरह से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का माहौल बनाने की कोशिश हो रही है, उससे प्रतीत होता है कि भाजपा अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव भी इसी मुद्दे के साथ उतरना चाहती है।

इस तरह की ताज़ा बानगी हिन्दी पट्टी के उत्तराखण्ड राज्य में देखने को मिल रही है। जहाँ तेज़ी से आक्रामक हिन्दुत्व के मुद्दे को वृहद स्तर पर हवा दी जा रही है, और राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का माहौल बनाया जा रहा है। उत्तराखण्ड में धर्मांतरण विरोधी क़ानून लागू किया जा चुका है, केंद्र की भाजपा द्वारा समान नागरिक संहिता के ड्राफ्ट तैयार करने को भी राज्य में ज़ोरशोर से प्रचार किया जा रहा है। वहीं अब ‘भूमि जिहाद’ का मुद्दा राज्य की भाजपा सरकार द्वारा बड़े ज़ोर-शोर से लाया गया है।

दरअसल उत्तराखण्ड सरकार द्वारा ‘भूमि जिहाद’ का नाम देकर राज्य के का$फी सारे मज़ारों, धार्मिक स्थलों और घरों को बुलडोजर लगाकर ध्वस्त किया जा रहा है। ख़ासतौर से यह अभियान वनक्षेत्रों के अंतर्गत आने वाले ग्रामों और क़स्बों में चलाया जा रहा है। राजाजी नेशनल पार्क, कार्बेट नेशनल पार्क, विकास नगर, मसूरी, आशारोड़ी समेत राज्य के कई क्षेत्रों में 400 से अधिक मज़ारें और धार्मिक स्थल ध्वस्त किये जा चुके हैं, वहीं वन गुर्जरों तथा वन क्षेत्रों में निवास करने वाले अन्य लोगों के आवासों को भी तोड़ा गया है। विकासनगर क्षेत्र में तो पूरी एक बस्ती को ही बुल्डोजर से ध्वस्त कर दिया गया।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि ‘राज्य में 1,000 से ज़्यादा बनीं मज़ारें बर्दाश्त नहीं की जाएँगी। भूमि जिहाद किसी भी कीमत पर सफल नहीं होने देंगे।’ उन्होंने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिये हैं कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण को न रोकने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। अतिक्रमण हटाने सम्बन्धी शासन से जो आदेश जारी होंगे, उस पर सभी जनपदों को तेज़ी से कार्य करना है।

अभियान पर उठ रहे सवाल

उत्तराखण्ड राज्य के सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने राज्य सरकार की इस कार्यशैली पर सवाल उठाया है।

कार्बेट नेशनल पार्क के कालागढ़ टाइगर रिजर्व में वन विभाग द्वारा अतिक्रमण के नाम पर हटाये गये नौ मज़ारों के मामले पर समाजवादी लोकमंच के मुनीष कुमार अग्रवाल व उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के प्रभात ध्यानी ने साझा बयान जारी कर प्रशासन पर संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने एवं सांप्रदायिक मानसिकता से काम करने का आरोप लगाया।

मुनीष कुमार अग्रवाल और प्रभात ध्यानी के द्वारा जारी संयुक्त बयान में कहा गया है- ‘प्रशासन संविधान के अनुरूप नहीं, बल्कि भाजपा सरकार के टूल के रूप में काम कर रहा है। कार्बेट टाइगर रिजर्व और कालागढ़ टाइगर रिजर्व में एक दर्ज़न धार्मिक संरचनाएँ हैं जिनमें से नौ संरचनाएँ तोड़ी गयी हैं, जो कि सभी मज़ारें हैं। वन प्रभाग द्वारा शासन को भेजी गयी रिपोर्ट में तराई पश्चिमी वन प्रभाग में 24 मंदिर, 14 मज़ारें व 2 गुरुद्वारे होना बताया गया हैं; लेकिन अतिक्रमण के नाम पर सि$र्फ मज़ारों को ही हटाया गया।’

मुनीष कुमार अग्रवाल ने सरकार से पूछा कि ‘जब माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगायी गयी है कि जिन लोगों ने वनाधिकार के दावे किये हैं उनके घरों एवं सामुदायिक हक़ के स्थानों को न हटाया जाए। इसके बावजूद भी सरकार वन गुर्जरों के घरों और सामुदायिक-धार्मिक स्थलों को क्यों तोड़ रही है? जबकि वन गुर्जरों ने वन अधिकार अधिनियम-2006 के अंतर्गत निजी एवं सामुदायिक दावे समाज कल्याण विभाग के समक्ष प्रस्तुत किये हुए हैं। देश के संविधान में दर्ज समानता का मूल अधिकार, जिसमें कहा गया है कि क़ानून के समक्ष किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, लिंग, भाषा, क्षेत्र को लेकर भेदभाव नहीं किया जाएगा; लेकिन उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार द्वारा धर्म विशेष को निशाना बनाकर राज्य के माहौल को ख़राब किया जा रहा है।’

वहीं प्रदेश कांग्रेस ‘भूमि जिहाद’ और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के विरोध में सभी विपक्षी दलों को साथ लेकर मुख्यमंत्री के विरुद्ध मोर्चा खोलने की योजना बना रही है। उत्तराखण्ड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष करन माहरा ने 22 मई, 2023 को पत्रकारवार्ता में कहा- ‘सरकार द्वारा नागरिकों के अधिकारों का हनन एवं संवैधानिक मूल्यों पर किये जा रहे चोट के विरोध में कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल एकजुट हैं। और प्रदेश के सभी ज्वलंत विषयों मिलकर अभियान चलाएँगे।’

अन्य वक्ताओं ने आरोप लगाया कि प्रदेश की भाजपा सरकार अतिक्रमण हटाने के नाम पर राज्य में ग़रीब जनता को बेघर कर रही है। उसे भूमि जिहाद या मज़ार जिहाद का नाम देकर सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है। भाकपा (माले) के राज्य सचिव इंद्रेश मैखुरी ने कहा कि प्रदेश में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को ताक पर रखकर लोगों को उजाड़ा जा रहा है। उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के महासचिव नरेश नौडियाल ने कहा कि सरकार स$ख्त भू-क़ानून पर ख़ामोश है।

भाकपा नेशनल काउंसिल के सदस्य समर भंडारी ने कहा कि शान्तिप्रिय प्रदेश में डर, नफ़रत का वातावरण बनाया जा रहा है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य समिति सदस्य लेखराज ने कहा कि भाजपा राज में पूँजीपतियों को ध्यान में रखकर क़ानून बनाये जा रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि क़ानून ताक पर रखकर बसे-बसाये व्यक्तियों को उजाड़ा जा रहा है।

क्या है भूमि जिहाद?

यूँ तो भाजपा द्वारा पूर्व के तमाम लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में लव जिहाद और जबरन धर्मांतरण का मुद्दा उठाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के प्रयास किये जाते रहे हैं। लेकिन भूमि जिहाद का नाम पहली बार वर्ष 2021 में असम विधानसभा चुनाव के दौरान आया, जब भाजपा ने असम विधानसभा चुनाव घोषणा-पत्र में एक नयी अवधारणा भूमि जिहाद की पेशकश की। उस समय असम भाजपा के उपाध्यक्ष रहे स्वप्ननील बरुआ ने स्पष्ट किया था- ‘भूमि जिहाद लोगों को अपनी ज़मीन बेचने के लिए मजबूर करने का एक तरीक़ा है। यह कहीं भी होता है, जहाँ मिया (मियाँ, -असम में बंगाली मूल के मुसलमान) हैं। मिया लोग भूमि के मालिक को घेर लेते हैं। भूमि को निर्जन बना देते हैं। कभी-कभी मवेशियों की चोरी करके और मवेशियों के कटे हुए सिरों को आँगनों में फेंक देते हैं। मजबूरन ज़मीन मालिक को ज़मीन बेचनी पड़ती है। एक तीसरा पक्ष खेल में आता है और ज़मीन की ख़रीद के लिए मालिक को एक प्रस्ताव दिया जाता है। एक दलाल शामिल हो जाता है, और ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया जाता है।’

लेकिन उत्तराखण्ड के सम्बन्ध में ‘भूमि जिहाद’ का मामला असम राज्य से बहुत-ही अलग है। उत्तराखण्ड में ‘भूमि जिहाद’ के खिलाफ़ अतिक्रमण मुक्त अभियान के नाम पर सबसे ज़्यादा शिकार वन गुर्जर समुदाय हो रहा है, जो एक चरवाहा समुदाय है और उत्तराखण्ड का मूल निवासी हैं तथा वर्षों से जंगलों के बीच अपने मवेशियों के साथ जी रहा है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के साथ ही वन गुर्जरों पर विस्थापन की तलवार लटक रही है। वन्य जीव संरक्षण के नाम पर वन गुर्जरों को विस्थापित करने की पुरज़ोर कोशिश की जा रही है। राजाजी नेशनल पार्क, जौनसार बावर, कार्बेट नेशनल पार्क समेत अनेक क्षेत्रों में वन गुर्जरों की एक बड़ी आबादी विस्थापित होकर अपनी पहचान खो चुकी है।

वर्ष 2021 में राजाजी नेशनल पार्क के रानीपुर और मोतीचूर इला$के में लगभग 3,000 परिवारों को विस्थापित किया गया। इस विस्थापन में वन गुर्जरों को ज़मीन का मालिकाना हक़ भी नहीं मिला, ऐसे में वे किसी नदी के किनारे अस्थायी बसेरा बनाकर जीवन काटने को मजबूर हैं। उनमें से अधिकतर को अभी चले रहे अतिक्रमण मुक्त अभियान में उजाड़ दिया गया है।

बीते सप्ताह नैनीताल ज़िले कि रामनगर तहसील अंतर्गत भी कई वन गुर्जरों के आसियानों को तोड़ दिया गया। वहीं जौनसार बावर क्षेत्र में भी वन गुर्जरों के आवासों को तोडऩे की धमकी कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी संगठनों द्वारा दी जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक, उत्तराखण्ड में वन गुर्जरों की संख्या लगभग एक लाख है। ये लम्बे समय से अनुसूचित जनजाति का दर्जा माँग रहे हैं। फ़िलहाल ये ओबीसी कैटेगरी में सूचीबद्ध हैं।

नहीं गिरेंगे 1980 से पहले के ढाँचें

मुख्यमंत्री के ‘भूमि जिहाद’ वाले बयान के बाद वन विभाग ने कहा है कि 1980 से पहले के बने ढाँचे नहीं गिराये जाएँगे। मुख्य वन संरक्षक पराग धकाते, जिन्हें अतिक्रमण विरोधी अभियान का नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है; ने कहा- ‘राज्य सरकार ने पहले ही उन सभी संस्थानों / व्यक्तियों को एक आदेश जारी कर कह दिया था कि जिनके पास वन क्षेत्रों में सम्पत्ति, पट्टा या अन्य कोई दावा है, उसके दस्तावेज़ हासिल कर लें। वन संरक्षण अधिनियम के तहत दस्तावेज़ों का नवीनीकरण किया गया है, जो लोग इसका पालन नहीं करते हैं और वन भूमि का अतिक्रमण करना जारी रखते हैं, उन्हें कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।’ विदित हो कि वन अधिकार अधिनियम में दिसंबर, 2005 तक वन भूमि पर निवास करने वालों को वन अधिकार के निजी और सामुदायिक पट्टे देने के प्रावधान हैं।

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का आरोप

वन विभाग ने संकेत दिया है कि जंगलों में मज़ारों सहित अन्य संरचनाओं की तुलना में अवैध रूप से निर्मित मंदिरों की संख्या अधिक है। लेकिन 400 से अधिक मज़ारों को ध्वस्त करने और सैकड़ों वनगुर्जरों के आवासों को उजाडऩे के बाद सरकार पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आरोप लगने लगे हैं। हालाँकि सरकार का कहना है कि अतिक्रमण मुक्त अभियान में 42 मंदिरों को भी हटाया गया है। उत्तराखण्ड में हिन्दू आबादी लगभग 83 प्रतिशत है। आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र भाजपा इस बड़ी आबादी के बीच अपनी पैठ बनाकर चुनाव जीतना चाहती है। ऐसे में ‘भूमि जिहाद’ के नाम पर एक धर्म विशेष को टारगेट कर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की कोशिश की जा रही है।

सोशल मीडिया में आरएसएस-भाजपा के अनुषांगिक संगठनों द्वारा ज़ोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा है कि उत्तराखण्ड गठन के समय (एक धर्म विशेष) की संख्या 1.5 प्रतिशत थी, जो अब 18 प्रतिशत हो गयी है। इससे यह बताने की कोशिश की जा रही है, उत्तराखण्ड में डेमोग्राफिक चेंज तेज़ी से हो रहा है। कांग्रेस प्रवक्ता शीशपाल का कहना है कि भाजपा बड़ी चालाकी से इस अतिक्रमण मामले को धार्मिक मान्यताओं से जोड़ रही है, और हल्ला कर रही है कि एक विशेष समुदाय के अवैध धार्मिक स्थलों को हटा रही है। लेकिन लम्बे समय से राज्य में भाजपा की सरकार रही है। यदि कहीं अवैध अतिक्रमण हुआ है, तो भापजा के ही शासनकाल में हुआ है।

अवसर की तलाश में ग्रामीण प्रतिभाएँ

भारत को गाँवों का देश कहा जाता है। यहाँ ग्रामीण इलाक़ों में बसन वाले लोग शहरों का पेट ही नहीं भरते, बल्कि शहरों में आकर अपनी प्रतिभा का लोहा भी मनवाते हैं। लेकिन इन दिनों जो युवा अपने गाँव में ही रहकर तरक़्क़ी करना चाहते हैं, उनके पास अवसरों का बेहद अभाव है। यही वजह है कि गाँवों से शहरों की ओर लगातार पलायन जारी है। अप्रैल में जारी सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडिया इकोनॉमी (सीएमआईई) बेरोज़गारी के आँकड़ों के मुताबिक, गाँवों बेरोज़गारी दर में 0.13 प्रतिशत की मामूली सी गिरावट आयी है। हालाँकि अगर ज़मीनी हक़ीक़त देखें, तो पता चलता है कि गाँवों में 10 में से तीन युवा बेरोज़गार हैं। इतना ही नहीं, गाँवों में 10 युवाओं में से चार खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं। इन युवाओं के पास या तो कोई अच्छा काम नहीं है या बहुत कम काम है, जो गुज़ारे के लिए पर्याप्त नहीं है। जबकि प्रतिभा-संपन्न ग्रामीण युवाओं को अगर अवसर मिले, तो वे काफ़ी कुछ कर सकते हैं। गाँवों से शहरों की ओर युवाओं के पलायन का नतीजा यह निकला है कि शहरों में बेरोज़गारी दर बढक़र 9.81 प्रतिशत हो गयी है, जो कि मार्च में 8.51 प्रतिशत थी। यह भी इसी अप्रैल के आँकड़े हैं, जो यह संकेत देते हैं कि शहरों में रोज़गार के साधन कम हुए हैं या फिर शहरों की ओर बढ़ते पलायन के आगे शहरों में रोज़गार के अवसर कम पड़ गये हैं।

सीएमआईई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के शहरों और गाँवो में बीते महीने 2.21 करोड़ नयी नौकरियाँ बढ़ी थीं; लेकिन इससे कहीं ज़्यादा 2.5 करोड़ बेरोज़गारों की संख्या भी बढ़ी है। रिपोर्ट बताती है कि भारत में अप्रैल महीने में क़रीब 46.7 करोड़ हाथों को रोज़गार की दरकार है, जिसमें से सिर्फ़ 81 प्रतिशत के हाथों में ही काम है। सीएमआईई के मुताबिक, अप्रैल महीने में लेबर पार्टिसिपेशन रेट यानी श्रम भागीदारी दर 41.98 प्रतिशत रही, जो कि तीन साल के उच्चतम स्तर पर है। सीएमआईई के मुताबिक, लेबर पार्टिसिपेशन रेट में बढ़ोतरी के चलते ही देश में बेरोज़गारी दर बढ़ी है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि गाँवों में 94.6 प्रतिशत हाथों को काम मिला है, जबकि शहरों में सिर्फ़ 54.8 प्रतिशत लोगों को ही काम मिला है। सीएमआईई ने यह भी कहा है कि मनरेगा के तहत रोज़गार की माँग घट रही है। ज़मीनी हक़ीक़त देखें, तो मनरेगा में रोज़गार की माँग नहीं घटी है, बल्कि काम घटा है। इसकी वजह वित्त वर्ष 2023-24 के लिए मनरेगा का बजट कम होना है, जो कि 90,000 करोड़ रुपये की प्रस्तावित माँग के बावजूद 60,000 करोड़ रुपये कर दिया गया, जबकि वित्त वर्ष 2022-23 में मनरेगा का बजट 73,000 करोड़ रुपये था। कोरोना-काल में बढ़ी बेरोज़गारी के बाद तो केंद्र सरकार को मनरेगा का बजट बढ़ाना चाहिए था; लेकिन उसने उलटा इसे कम कर दिया, जिसको लेकर पिछले दिनों संसद में भी सवाल उठाये गये थे।

महात्मा गाँधी ने ग्रामीण विकास के लिए खादी ग्रामोद्योग, ग्राम स्वराज्य, पंचायती राज, ग्रामोद्योग, महिला शिक्षा, गाँवों में साफ़-सफ़ाई और ग्रामीण प्रशिक्षण को महत्त्व दिया था। उन्होंने इसके लिए ही स्वदेशी अपनाओ, विदेशी भगाओ का नारा दिया था। महात्मा गाँधी चाहते थे कि गाँवों में ऊँच-नीच और महिला-पुरुष का भेदभाव ख़त्म हो, लोगों को रोज़गार, स्वरोज़गार मिले, ताकि गाँवों का संपूर्ण विकास हो सके। महात्मा गाँधी ने ‘मेरे सपनों का भारत’ में लिखा है कि ‘भारत की स्वतंत्रता का अर्थ पूरे भारत की स्वतंत्रता होनी चाहिए और इस स्वतंत्रता की शुरुआत नीचे से होनी चाहिए। तभी प्रत्येक गाँव एक गणतंत्र बनेगा। अत: इसके अनुसार प्रत्येक गाँव को आत्मनिर्भर और सक्षम होना चाहिए। समाज एक ऐसा पैरामीटर होगा, जिसका शीर्ष आधार पर निर्भर होगा।’

ग्रामीण विकास के पक्षधर बाबा मुरलीधर देवीदास आमटे ने भी कहा था कि ‘हमारे गाँवों के निर्धन और अशिक्षितों को दान नहीं चाहिए। उन्हें तो बस उचित अवसर चाहिए। जहाँ युवावस्था में ही मुरझा रही प्रतिभाओं को खिलने का भरपूर अवसर मिल सके।’ देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी गाँवों के सम्पूर्ण विकास के पक्षधर थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू कहते थे कि ‘ग्रामीण भारत में बेरोज़गारी का सम्बन्ध मूलत: अर्थव्यवस्था की संरचना या ढाँचे से है। बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी से अनेक नवयुवकों का जीवन नष्ट हो जाता है और यह हमारी एक प्रमुख समस्या है।’

भारत की खासियत यह है कि यहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में न कच्चे माल की कमी है और न प्रतिभाओं की। भारत से कच्चा माल दुनिया के कई देशों को निर्यात होता है। अगर ग्रामीण क्षेत्र में पैदा हो रहे इस कच्चे माल को सीधे विदेशों में निर्यात करने की अपेक्षा केंद्र सरकार और राज्य सरकारें मिलकर ग्रामीण प्रतिभाओं को उस कच्चे माल से कुछ निर्मित करने का अवसर प्रदान करें, तो इससे बेरोज़गारी भी कम होगी और देश में देशी-विदेशी धन बढऩे के साथ-साथ ग्रामीण लोगों में ख़ुशहाली भी आएगी। इसके साथ-साथ ग्रामीण रोज़गार के सहारे शहरों में भी रोज़गार के अवसर पैदा होंगे। अक्सर देखा जाता है कि भारतीय सामानों की विदेशों में बहुत माँग रहती है। इसकी आपूर्ति के लिए कई ऐसे रोज़गारों, स्वरोज़गारों को दोबारा जीवित किया जा सकता है, जो ठप हो चुके हैं या ठप होने के कगार पर हैं। इससे खेती को भी बढ़ावा मिलेगा। जैसे पटसन, केला और लकड़ी का उत्पादन कम होने से इनसे जुड़े रोज़गार लगातार घट रहे हैं। इसके साथ ही पहले ग्रामीण महिलाएँ सूत काता करती थीं; लेकिन अब उनके हाथों में यह काम नहीं है। इसके साथ ही सिलाई, कड़ाई, खिलौने बनाना, घास के खिलौने और बर्तन (डलिया, टोकरी, पल्ले, चटाई, रस्सी, मिट्टी के बर्तन आदि बनाने के कामों में भी कमी आयी है, जिन्हें अभी बढ़ावा दिया जा सकता है। गाँवों में हर्बल ब्यूटी उत्पादों के अलावा जैविक खाद्य सामग्री बनायी जा सकती है। इससे मिलावटी चीज़ों का बाज़ार घटेगा और गाँव संपन्न होंगे।

आजकल पूरी दुनिया मिलावट और ज़हरीले खाद्य पदार्थों से जूझ रही है, जिसके चलते जैविक और शुद्ध खाद्य पदार्थों, सूती वस्त्रों की बहुत माँग है। इसके लिए भारत से अच्छा बाज़ार और कहीं नहीं हो सकता है। चीन ने इस दिशा में काफ़ी काम किया है और शहरों से लेकर गाँवों तक हर हाथ को काम देने में वह भारत से आगे निकल चुका है। भारत, जो कभी ग्रामीण उद्योग के लिए दुनिया में ख्यात था, आज अपनी ही ग्रामीण प्रणाली से पंगु हो चुका है। उन सभी पुराने रोज़गार के संसाधनों की पुनस्र्थापना करके केंद्र सरकार गाँवों में फिर से ख़ुशहाली ला सकती है। आजकल तो गाँवों तक सडक़ें हैं, बिजली भी है, ऐसे में गाँवों में शूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को स्थापित किया जा सकता है। आज ऐसी कोई चीज़ नहीं है, जिसकी माँग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कम हो।

ग्रामीण प्रतिभाओं को अवसर देने के लिए केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों को सबसे पहले उन प्रशिक्षण केंद्रों को जीवित करना होगा, जो कभी ग्रामीण प्रतिभाओं को प्रशिक्षण प्रदान करती थीं। इसके साथ ही कुछ ऐसे प्रशिक्षण केंद्र भी खोले जाएँ, जो आज के दौर के हिसाब से आधुनिक और तकनीकी प्रशिक्षण उन्हें दे सकें। इसके साथ ही सभी प्रकार के उद्योगों को स्थापित करके उनमें रोज़गार के अवसर गाँवों के युवाओं को देना चाहिए। इन उद्योगों में जब कच्चे माल की आवश्यकता होगी, तो किसान उसकी आपूर्ति के लिए आगे आएँगे। यह कच्चा माल तैयार होकर शहरों में आएगा, जहाँ उससे रोज़गार के अवसर बढ़ेगे। इस तरह एक चेन की तरह गाँवों से लेकर शहरों तक रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे और बाज़ार में नक़दी बढ़ेगी, जिससे देश का आर्थिक विकास तेज़ी से होगा।

ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण देने के लिए गाँवों में चल रहे आँगनबाडी केंद्रों का विस्तार किया जा सकता है, जिनमें एक साथ कई तरह के प्रशिक्षण महिलाओं के लिए दिये जा सकते हैं। युवाओं के लिए आईआईटी, जीटीआई और अन्य सरकारी प्रशिक्षण केंद्र खोले जा सकते हैं, जहाँ युवक-युवतियाँ दोनों ही प्रशिक्षण ले सकें।

इसके साथ-साथ अनपढ़ और कम पढ़े-लिखे युवक-युवतियों के लिए ऐसे काम सौंपे जा सकते हैं, जिनमें शिक्षा की आवश्यकता नहीं है और वे परंपरागत तरी$के से सीखे जाते हैं। जैसे मिट्टी के बर्तन बनाना, रस्सी और कपड़े बुनना, सिलाई-कड़ाई करना, खिलौने बनाना, मूर्तियाँ बनाना, घास के खिलौने, टोकरे आदि बनाना, गोबर की चीज़ें बनाना, खाद बनाना, खेती करना, अचार, मुरव्वा, जैम, जैली बनाना, चिप्स बनाना, अन्य ऐसे खाद्य पदार्थ बनाना, जो आसानी से बनते हैं, पैकिंग आदि करना। इतना कुछ करने भर से ग्रामीण प्रतिभाओं को रोज़गार और स्वरोज़गार के अनेक अवसर मिलेंगे, गाँवों का तेज़ी से विकास होगा। रोज़गार दर बढ़ेगी, बेरोज़गारी दर घटेगी। आज केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के द्वारा गाँवों में चलायी जा रही अनेक योजनाएँ हैं; लेकिन उन्हें बजट और बढ़ावा देने की ज़रूरत है।

भारत की ताक़त बन रहा रक्षा निर्यात

पिछले वित्त वर्ष में 85 देशों को बेचे 15,920 करोड़ रुपये के हथियार

दशकों से जब भी हमारे देश में अमीर देशों की बात होती है, तो यही बात सामने आती है कि यह देश हथियार बनाते-बेचते हैं, इसलिए अमीर हैं। दुनिया में हथियारों का बाज़ार बहुत बड़ा है और जिस तरह से देशों में तनाव बने हैं, उससे रक्षा उत्पादों का महत्त्व काफ़ी बढ़ गया है। हाल ही में सरकार ने यह बताया है कि देश का रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2023 में 1,06,800 करोड़ रुपये पहुँच गया है, जिसमें निजी रक्षा उद्योग का आँकड़ा शामिल नहीं है।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की एक रिपोर्ट से ज़ाहिर होता है कि 2013 से 2022 के बीच भारत के रक्षा आयात में 11 फ़ीसदी की बड़ी कमी आने के बावजूद भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक है और पिछले पाँच साल में दुनिया में जितने हथियार ख़रीदे गये, उनमें से 11 फ़ीसदी अकेले भारत ने ख़रीदे। लेकिन यहाँ एक और दिलचस्प तथ्य है, वह यह कि भारत आज 85 देशों को हथियार निर्यात भी कर रहा है और वित्त वर्ष 2016-17 में भारत का जो रक्षा निर्यात 1,521 करोड़ रुपये था, वह वित्त वर्ष 2022-23 में बढक़र 15,920 करोड़ रुपये हो गया है।

‘मेक इन इंडिया’ पर ज़ोर देने से देश में रक्षा उत्पादन के मामले में चीज़ें बदली हैं। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, 2023 के माली साल में रक्षा उत्पादन की वर्तमान वैल्यू 2022 के माली साल (94,846 करोड़ रुपये) के मुक़ाबले 12 फ़ीसदी अधिक है। वित्त वर्ष 2020-21 में भारतीय रक्षा उत्पादन 84,643 करोड़ रुपये था।

‘तहलका’ की जुटायी जानकारी के मुताबिक, दुनिया में पिछले पाँच साल में बिके हथियारों में जहाँ भारत ने 11 फ़ीसदी ख़रीदे, वहीं उसके बाद सऊदी अरब का नंबर है, जिसने 9.6 फ़ीसदी हथियार ख़रीदे। जबकि क़तर ने 6.4 फ़ीसदी, ऑस्ट्रेलिया ने 4.7 फ़ीसदी और चीन ने 4.7 फ़ीसदी हथियार ख़रीदे। सिपरी की रिपोर्ट के अनुसार, हथियार निर्यात करने के मामले में सबसे पहला नंबर अमेरिका का है, जो दुनिया के कुल हथियारों के 40 फ़ीसदी का निर्यात करता है। रूस दूसरे नंबर पर है, जो 16 फ़ीसदी हथियारों का निर्यात करता है, जबकि इसके बाद क्रमश: फ्रांस 11 फ़ीसदी, चीन 5.2 फ़ीसदी और जर्मनी 4.2 फ़ीसदी हथियारों के निर्यातक हैं। यहाँ दिलचस्प बात यह है कि जहाँ अमेरिका के हथियार निर्यात में 2013 के बाद 14 फ़ीसदी की उछाल आया है, वहीं रूस ने हथियार निर्यात के मामले में अपना 31 फ़ीसदी बाज़ार खो दिया है।

क्या निर्यात के मुश्किल लक्ष्यों को हासिल कर भारत दुनिया के अग्रणी हथियार निर्यातकों की कतार में खड़ा हो पाएगा? यह एक मुश्किल सवाल है; लेकिन सच यह भी है कि भारत उस दिशा की तरफ़ बढ़ रहा है। मोदी सरकार ने 2020 में पाँच साल के लिए एयरोस्पेस के अलावा डिफेंस गूड्स और सर्विस में 35,000 करोड़ रुपये के निर्यात का चुनौतीपूर्ण लक्ष्य निर्धारित किया था। सरकार ने तब कहा था कि यह रक्षा उत्पादन में पौने दो लाख करोड़ रुपये (25 बिलियन डॉलर) के टर्नओवर का हिस्सा है। भारत 85 देशों को जो रक्षा उत्पाद निर्यात करता है, उसमें अधिकांश एयरोस्पेस क्षेत्र से जुड़े हैं।

भारत वर्तमान में डोर्नियर-228, 155 एमएम एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन्स (एटीएजी), ब्रह्मोस मिसाइल, आकाश मिसाइल सिस्टम्स, रडार, सिमुलेटर, माइन प्रोटेक्टेड व्हीकल्स, आर्मर्ड व्हीकल्स, पिनाका रॉकेट और लॉन्चर, एम्युनिशन, थर्मल इमेजर, बॉडी आर्मर, सिस्टम, लाइन रिप्लेसेबल यूनिट्स और एवियॉनिक्स और स्मॉल आम्र्स जैसे बड़े प्लेटफॉम्र्स का निर्यात करता है। दुनिया में भारत के एलसीए तेजस, लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर और एयरक्राफ्ट करियर की माँग भी बढ़ रही है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट बताती है कि 2018-22 के दौरान पाँच सबसे बड़े हथियार निर्यातक देश अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और जर्मनी हैं।

पिछले सात साल में भारत के रक्षा निर्यात में 10 गुना बढ़ोतरी हुई है। रक्षा उत्पादन बढऩे से इसमें मदद मिली है। मेक इन इंडिया के तहत देश में दो रक्षा औद्योगिक गलियारे स्थापित किये गये हैं, जो उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में हैं। उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर विकसित करने के लिए आगरा, अलीगढ़, चित्रकूट, झांसी, कानपुर और लखनऊ, जबकि तमिलनाडु डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के विकास के लिए चेन्नई, कोयंबटूर, होसुर, सलेम और तिरुचिरापल्ली की पहचान सरकार ने की है। रक्षा निर्माण की गति तेज़ करने की कोशिशों के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल में एक सूची जारी की है, जिसके मुताबिक 928 रक्षा उत्पादों का निर्माण भारत में ही होगा।

ज़ाहिर है निर्भरता हासिल करते ही भारत इनका आयात बंद कर देगा। इनमें रिप्लेसमेंट यूनिट्स, सब-सिस्टम्स, स्पेयर और कंपोनेंट्स, हाई एंड मटीरियल्स और स्पेयर शामिल हैं। भारत ने वित्त वर्ष 2022-23 में रक्षा निर्यात में 16,000 करोड़ रुपये के अब तक के उच्चतम स्तर को छुआ है। यह 2016-17 की तुलना में 10 गुना से ज़्यादा की छलांग है। निश्चित ही सरकार की नीतिगत पहल और रक्षा उद्योग के सहयोग को इसका श्रेय जाता है। पिछले वित्त वर्ष की तुलना में यह निर्यात क़रीब 3,000 करोड़ रुपये ज़्यादा है, जिसे निश्चित ही बेहतर उपलब्धि कहा जाएगा। भारतीय उद्योग ने रक्षा उत्पादों का निर्यात करने वाली 100 कम्पनियों के साथ डिजाइन और विकास की अपनी क्षमता दुनिया के सामने साबित की है और बढ़ता रक्षा निर्यात और एयरो इंडिया-2023 में 104 देशों की भागीदारी देश की बढ़ती रक्षा निर्माण क्षमताओं का प्रमाण है। $खुद प्रधानमंत्री मोदी इसके लिए देश की प्रतिभाओं की तारीफ़ कर चुके हैं।

चीन के साथ लगातार जारी टकराव और क्षेत्र में अस्थिरता के चलते भारत के लिए रक्षा उत्पादन अपनी ज़मीन मज़बूत करने जैसा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, सुरक्षा की इन बढ़ती चिन्ताओं के साथ माँग वृद्धि में तेज़ी की संभावना है। आँकड़ों के मुताबिक, पिछले साल अक्टूबर तक रक्षा क्षेत्र में 366 कम्पनियों को कुल 595 औद्योगिक लाइसेंस जारी किये जा चुके हैं। सरकार के मुताबिक, पिछले पाँच साल में रक्षा निर्यात में 334 फ़ीसदी की वृद्धि हुई। भारत को 2026 तक 15 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के उपकरण निर्यात करने की उम्मीद है। इसे देखते हुए ही सरकार ने रक्षा उद्योग के दरवाज़े निजी क्षेत्र के लिए भी खोल दिये हैं।

रक्षा उत्पादन बढ़ाने और उनकी चुनौतियाँ कम करने के लिए रक्षा-उद्योग और उनके संघों के साथ सरकार काम कर रही है। पिछले क़रीब आठ साल में उद्योगों को जारी किये रक्षा उत्पादन लाइसेंस में क़रीब 200 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इससे रक्षा-उत्पादन उद्योग ईको सिस्टम को तो बढ़ावा मिला ही है, रोज़गार के मौक़े भी पैदा किये हैं। सरकार की कोशिश रक्षा उत्पादन में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के अलावा स्टार्टअप की भूमिका को विस्तार देने की है। रक्षा क्षेत्र में घरेलू कारोबार में सुगमता के लिए सरकार ने नीतिगत बदलाव किये हैं। स्कॉर्पीन श्रेणी में कलावरी क्लास प्रोजेक्ट-75 के तहत छ: पनडुब्बी का फ्रांस की मदद से देश में ही निर्माण किया गया है, जिसमें पाँच- आईएनएस वागीर, आईएनएस कलवरी, आईएनएस खंडेरी, आईएनएस करंज और आईएनएस वेला; को तो नौसेना के बेड़े में शामिल किया जा चुका है।

छठी पनडुब्बी आईएनएस वागशीर का समुद्री परीक्षण 18 मई को शुरू हो गया। सन् 2024 में इसे भी भारतीय नौसेना को सौंपने की उम्मीद है। हिन्द महासागर में चीन के बढ़ते दख़ल को देखते हुए नौसेना का पूरा ध्यान क्षमता को धार देने पर है। युद्धक क्षमता के नज़रिये से देखें, तो भारत रक्षा ज़रूरतों के लिए रूस पर काफ़ी निर्भर रहा है। लेकिन यूक्रेन के साथ रूस के युद्ध के बाद भारत आत्मनिर्भरता के प्रति संजीदा हुआ है। एक रिपोर्ट से ज़ाहिर होता है कि युद्ध के चलते भारत को रूस से टैंक और जंगी जहाज़ों को अपडेट रखने के लिए ज़रूरी कलपुर्जे नहीं मिल पा रहे या काफ़ी देरी हो रही है। यही हाल एयर डिफेंस सिस्टम मिलने का है।

साइबर ठगों का नया खेल सेक्सटॉर्शन

झारखण्ड में मई के पहले सप्ताह से ‘सेक्सटॉर्शन’, ‘हनीट्रैप’ जैसे शब्द ख़ूब चर्चा में हैं। कारण रहा राज्य के एक मंत्री का वीडियो वायरल होना और दूसरा, एक विधायक को अश्लील वीडियो कॉल आना। दोनों ही मामले माननीयों से जुड़े होने के कारण इन पर चर्चा ख़ूब हो रही है। दोनों नेता विरोधी दलों- भाजपा और कांग्रेस के हैं। हंगामे के बाद मामला राज्यपाल तक पहुँचा। जाँच शुरू हो गयी है। सच्चाई जो भी होगी, उम्मीद है सामने आ ही जाएगी।

दरअसल झारखण्ड में सेक्सटॉर्शन के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। आम से लेकर ख़ास लोग हर दिन इसके शिकार हो रहे हैं। इसका अफ़सोसजनक पहलू यह है कि शर्म और बदनामी के डर से कुछ ही मामले पुलिस तक पहुँचते हैं। जिस वजह से साइबर अपराधियों का हौसला बढ़ रहा है।

मंत्री के वीडियो से हंगामा

पिछले दिनों राज्य के कांग्रेसी विधायक और स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह किसी लडक़ी के साथ अश्लील बात करते नज़र आ रहे थे। बन्ना गुप्ता ने कहा कि यह विपक्ष की साज़िश है। वीडियो एडिट करके मुझे बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। जिस लडक़ी की तस्वीर वीडियो में थी, उसने भी दो दिन बाद कहा कि बन्ना गुप्ता को जानती नहीं, मुझे बदनाम किया जा रहा है।

फिर एक और लडक़ी सामने आ गयी, जिसने कहा कि उसका बन्ना गुप्ता के साथ पारिवारिक सम्बन्ध है। बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है। वीडियो में एक लडक़ी थी, सामने दो लड़कियाँ आ गयीं। इन मुद्दों को लेकर विपक्षी दल भाजपा ने ख़ूब निशाना साधा। निर्दलीय विधायक सरयू राय और बन्ना गुप्ता के बीच ख़ूब बयानबाज़ी हुई। सरयू राय ने राज्यपाल सी.पी. राधाकृष्णन से मुलाक़ात कर मामले की जाँच की माँग की, जो स्वीकृत हुई। वीडियो सच है या कोई साज़िश इसकी अभी पड़ताल बाक़ी है। इस मामले में ब्लैकमेल करने की कोशिश नहीं हुई है। इसलिए इसे फ़िलहाल सेक्सटॉर्शन के रूप में नहीं देखा जा रहा। हालाँकि बन्ना गुप्ता विपक्षी दल के बारे में बोल रहे कि ‘उनके (भाजपा) के लिए हनीट्रैप और हमारे लिए फनीट्रैप।’

ट्रैप होने से बचे विधायक

भाजपा के वरिष्ठ विधायक सी.पी. सिंह की कहानी बन्ना गुप्ता से अलग है। बन्ना के वीडियो वायरल होने के दो दिन बाद सी.पी. सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर हनीट्रैप के बारे में जानकारी दी। सी.पी. सिंह ने बताया कि आधी रात को उन्हें व्हाट्स ऐप पर वीडियो कॉल आया। कॉल पर सामने जो महिला थी, वह लगभग नग्न अवस्था में थी और अश्लील बात कर रही थी। कुछ ही सेकेंड में उन्होंने फोन काट दिया और मोबाइल को स्वीच ऑफ कर दिया। सी.पी. सिंह ने जिस नंबर से वीडियो कॉल आया था, वह नंबर देते हुए थाने में मामला दर्ज कराया। पुलिस मामले की छानबीन कर रही है। इस मामले को पुलिस सेक्सटॉर्शन और हनी ट्रैप के रूप में देख रही है।

राज्य में साइबर क्राइम

देश में अगर साइबर क्राइम की चर्चा होती है, तो झारखण्ड का नाम ज़रूर आता है। राज्य का जामताड़ा ज़िला पूरे देश में मशहूर है। जिसे साइबर फ्रॉड का गढ़ कहा जाता है। साइबर फ्रॉड का ही हिस्सा है- हनी ट्रैप और सेक्सटॉर्शन। झारखण्ड के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों में यह अपराध काफ़ी तेज़ी से फैल रहा है।

पुलिस सूत्रों की मानें, तो झारखण्ड में हर दिन सेक्सटॉर्शन के 150-200 लोग शिकार हो रहे हैं। हालाँकि इन सभी के तार केवल जामताड़ा से ही नहीं जोड़े जा सकते, क्योंकि देश के अन्य हिस्सों में भी तेज़ी से साइबर अपराध बढ़ रहा है। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि पाँच में से एक मामले के तार झारखण्ड के जामताड़ा से ज़रूर जुड़े मिलते हैं।

क्या है सेक्सटॉर्शन?

कैम्ब्रिज डिक्शनरी के मुताबिक, सेक्सटॉर्शन का मतलब है किसी व्यक्ति के प्राइवेट कंटेंट को प्रकाशित या वायरल करने की धमकी देकर अपना हित साधना। वहीं क़ानून की दृष्टि में यह एक तरीक़े का अपराध है, जिसमें कोई व्यक्ति किसी की निजी और संवेदनशील सामग्री को वितरित करने की धमकी देकर पैसे की माँग करता है। आँकड़े बताते हैं कि इसके मामले झारखण्ड में लगातार बढ़ रहे हैं। वर्ष 2021 में सेक्सटॉर्शन के 12 मामले दर्ज हुए थे। वहीं 2022 में 14 मामले दर्ज हुए। पुलिस का कहना है कि लोग सेक्सटॉर्शन के मामले में सामने आने से हिचकते हैं। जब अपराधी की माँग बहुत बढ़ जाती है और पीडि़त व्यक्ति पूरा करने में असक्षम हो जाता है, तभी वह पुलिस के पास जाता है। राज्य में निश्चित ही सेक्सटॉर्शन के मामले आँकड़ों से अधिक होंगे।

फ़सर से शिक्षक तक फँसे

डिजिटल युग में हर किसी के पास स्मार्टफोन है। साइबर अपराधियों के लिए यह स्मार्टफोन अब सेक्सटॉर्शन का अच्छा ज़रिया बन गया है। हाल के दिनों में कई ऐसे मामले आये हैं। रांची के एक 50 वर्षीय प्रोफेसर इसके शिकार हुए हैं। पहले फेसबुक पर एक लडक़ी ने दोस्ती की। फिर व्हाट्स ऐप पर वीडियो कॉल किया। प्रोफेसर का अश्लील वीडियो बना लिया। इसके बाद ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू हुआ। प्रोफेसर साहब ने ऑनलाइन 10,000 रुपये का भुगतान किया। जब माँग बढ़ गयी, तो पुलिस के पास पहुँचे। धनबाद ज़िले के एक शिक्षक से भी इसी तरह से 12,00,000 रुपये वसूले गये। बाद में वह पुलिस के पास पहुँचे। इसी तरह इसमें अफ़सर भी फँस रहे हैं।

ख़तरनाक हो रहा खेल

साइबर क्राइम के लिए केवल झारखण्ड का जामताड़ा ही महशूर नहीं रह गया है। देश के अन्य हिस्सों से भी इसकी चर्चा आने लगी है। राजस्थान के भरतपुर ज़िले का मेवात क्षेत्र को मीनी जामताड़ा कहा जाने लगा है। इसी तरह महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों के नाम भी आने लगे हैं। देश में साइबर अपराध बढ़ रहे हैं और इसी का एक बाय-प्रोडक्ट सेक्सटॉर्शन भी है, जो इधर हर हदें पार करने लगा है। सेक्सटॉर्शन के मामलों में अप्रत्याशित हो रही है और यह खेल ख़तरनाक होता जा रहा है। बीते साल अक्टूबर में पुणे के पिंपरी चिंचवाड़ इलाक़े में एक युवक ने आत्महत्या कर ली। उसकी जेब से मिले सुसाइड नोट से सेक्सटॉर्शन का ख़ुलासा हुआ। इसी तरह बीते दिसंबर में गुरुग्राम के 38 साल के एक व्यक्ति ने ब्लैकमेलर को पैसे नहीं दे पाने के कारण आत्महत्या कर ली। वहीं झारखण्ड के रांची ज़िले का एक युवक सेक्सटॉर्शन के कारण अवसादग्रस्त हो गया है। इस तरह की कई आपबीती घटनाएँ हर दिन देखने और सुनने को मिलती हैं।

अपराधी बुनते हैं दोस्ती का जाल

साइबर एक्सपर्ट बताते हैं कि अब तक सामने आये मामलों के अध्ययन से यह निष्कर्ष सामने आया है कि सोशल मीडिया पर अनजान व्यक्ति से दोस्ती सेक्सटॉर्शन में फँसने की मुख्य वजह है। इसमें 54 प्रतिशत लोग सोशल नेटवर्क के ज़रिये ही साइबर अपराधी के संपर्क में आते हैं।

साइबर अपराधियों के ट्रेंड को देखा जाए, तो वह छ: प्रतिशत लोगों से सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करके संपर्क करते हैं। 23 प्रतिशत से व्हाट्स ऐप के माध्यम से, 41 प्रतिशत को मैसेज या फोटो भेजकर, चार प्रतिशत गेमिंग प्लेटफॉर्म के ज़रिये, नौ प्रतिशत डेटिंग एप के माध्यम से और 12 प्रतिशत ईमेल के माध्यम से अपराधी के संपर्क में आते हैं।

क़ानून का नहीं डर

जानकारों का कहना है कि भारत में सेक्सटॉर्शन से निपटने में क़ानून पूरी तरह सक्षम नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी क़ानून-2000 की धारा-67 को ही सेक्सटॉर्शन पर लागू किया जाता है, जो नाकाफ़ी है। मामला कोर्ट में जाए तब भी शायद ज़्यादा राहत न मिले, क्योंकि कोर्ट में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य दिखाना होता है, जो बड़ी चुनौती है। ऐसे मामलों में पुलिस का रवैया भी बहुत ही ढीला होता है। ज़्यादातर मामलों में पुलिस केस दर्ज नहीं करती है। इसलिए अपराधियों के मन में कोई डर नहीं रहता है।

बचाव के रास्ते

एक समय था, जब ओटीपी माँगकर लोगों के साथ ऑनलाइन फ्रॉड होता था। इसे लेकर सरकार ने जागरूकता अभियान चलाया। अब ओटीपी फ्रॉड थोड़ा कम हुआ है। ऐसे ही सेक्सटॉर्शन में भी अभियान चलाने की ज़रूरत है। लोगों को जागरूक करके ही इससे बचाया जा सकता है। इसके लिए लोग भी सोशल मीडिया पर सावधान रहें। व्हाट्स ऐप पर अनजान वीडियो कॉल को रीसीव न करें। अनजान व्यक्ति के साथ अपने निजी बातों, फोटो व वीडियो शेयर न करें। अपरिचित आदमी द्वारा व्हाट्स ऐप, ईमेल आदि पर भेजे लिंक न खोलें। जो वेबसाइट सुरक्षित न हो, उस पर सर्च न करें।

ऐसी थोड़ी-थोड़ी सावधानियों से ट्रैप होने और सेक्सटॉर्शन से बचा जा सकता है। साथ ही अगर कभी फँस जाएँ, तो भूल से भी ब्लैकमेलर को पैसे न दें। एक बार पैसे देने पर अपराधी मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रताडि़त करके जाल में फँसाकर पैसे ऐंठते रहते हैं। पहले तो अनजान वीडियो कॉल से बचें, अगर ग़लती से कॉल रिसीव कर लें, तो अपराधी की गंदी, मीठी बातों में न फँसें। कोई ब्लैकमेल करे, तो तत्काल पुलिस से शिकायत करें।

सरकार को भी साइबर अपराधियों पर नकेल कसने के लिए सख़्त क़ानून बनाने की भी ज़रूरत है, ताकि लोग इससे बच सकें। इस नये अपराध पर क़ाबू पाने के लिए आज हर स्तर पर गंभीरता विचार करने ज़रूरत है।

हरियाणा में ठगी का नेटवर्क ध्वस्त

66 गिरफ़्तार, दर्ज़नों फ़र्ज़ी दस्तावेज़, सैकड़ों बैंक खाते, दर्ज़नों मोबाइल, लेपटॉप और मशीनरी बरामद

विकास में पिछड़े हरियाणा के नूह ज़िले में राज्य पुलिस ने सबसे बड़ी छापेमारी कर ठगी के बड़े नेटवर्क को ध्वस्त किया है। मेवात क्षेत्र का यह ज़िला साइबर ठगी के मामले में राज्य ही नहीं, बल्कि देश के सबसे कुख्यात जामताड़ा (झारखण्ड) बन चुका था। यहाँ ऑपरेशन साइबर मिशन में 5,000 पुलिसकर्मियों ने ज़िले के क़रीब 14 गाँवों में देर रात से सुबह तक दबिश देकर 125 से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया। इनमें से 66 को गिरफ़्तार कर लिया गया।

ठगों से सैकड़ों फ़र्ज़ी आधार कार्ड, पेन कार्ड, एटीएम कार्ड, 66 मोबाइल, 99 सिम कार्ड, स्वाइप मशीनें, स्केनर, प्रिंटर, लेपटॉप और कुछ वाहन बरामद हुए हैं। इसके अलावा 220 से ज़्यादा बैंक खाते और 140 यूपीआई खाते भी मिले हैं। गिरफ़्तार ठगों की आयु 20 से 30 वर्ष की है और ज़्यादातर बहुत कम पढ़े लिखे हैं; लेकिन बावजूद इसके ये ठग बड़े अधिकारियों तक को अपने जाल में फँसा लेते थे। कई ठग तो ठीक से पढ़े-लिखे भी नहीं हैं। बावजूद इसके वे मोबाइल के हर फंक्शन को अच्छी तरह से चलाना जानते हैं। कुछ पढ़े-लिखे हैकर के रूप में ठगी करते हैं। कभी ये बैंक, कस्टम या पुलिस अधिकारी के रूप में ब्लैकमेल करते हैं।

दिल्ली की एक महिला डॉक्टर से ऐसे ही ठगों ने चार करोड़ रुपये से ज़्यादा ऐंठ लिये थे। कई ऐसे ऐप हैं, जिनके ज़रिये लोगों की बहुत-सी जानकारियाँ जुटाना, फ़र्ज़ी आधार और पेन कार्ड गूगल से निकाल लेना इन ठगों के लिए मुश्किल नहीं है। पकड़े गये आरोपियों में ज़्यादातर के मोबाइल फोन फ़र्ज़ी आईडी पर चल रहे थे। नूह क्षेत्र में कोई दफ़्तर आदि नहीं, जहाँ से ठगी का कारोबार चलता था। कहीं दूर-दराज़ जंगल या सुनसान क्षेत्र में मोबाइल के माध्यम से ये लोग ठगी कर रहे थे। साइबर ठगी के बढ़ते मामलों का नूह बड़ा केंद्र बनकर उभर रहा था। पुलिस की साइबर टीमों की जाँच नूह क्षेत्र के आसपास के संदिग्ध नंबरों पर आकर रुक जाती थी। ये नंबर इस क्षेत्र में बराबर सक्रिय रहते थे। राज्य का नूह ज़िला उत्तर प्रदेश और राजस्थान से सटा हुआ है। लिहाज़ा आरोपी पड़ोसी राज्यों में कुछ दिनों के लिए चले जाते और फिर से वहीं अपना काम शुरू कर देते थे। हरियाणा में ही हज़ारों साइबर ठगी के मामले दर्ज हो चुके थे।

राज्य पुलिस पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करना चाहती थी। इसके लिए बाक़ायदा उच्च स्तर पर बैठकें हुईं। जब इस बात के पुख़्ता सुबूत मिल गये कि देश भर में होने वाली साइबर ठगी के बहुत-से मामलों का केंद्र हरियाणा का नूह ज़िला है, तो इसके लिए तैयारी की गयी। पूरी योजना तैयार होने के बाद मुख्यमंत्री को इससे अवगत कराया गया और वहाँ से मंज़ूरी के बाद पुलिस महानिदेशक प्रशांत कुमार ने इसे ऑपरेशन साइबर नाम दिया। यह मिशन बहुत गुप्त रखा गया था, क्योंकि ज़िले के एक बड़े क्षेत्र में बड़े स्तर पर छापेमारी की जानी थी। राज्य के अन्य ज़िलों से पुलिसकर्मियों को बुलाया गया। कोई तीन महीने तक इस मिशन पर गुप्त रूप से काम होता रहा।

पहले मिशन को रमजान माह से पहले अंजाम दिया जाना था; लेकिन तब तक तैयारी पूरी नहीं हो पायी थी। फिर रमजान का माह आ गया। नूह क्षेत्र मुस्लिम बहुल क्षेत्र है और रमजान का माह उनके लिए पवित्र होता है। पुलिस की बड़े स्तर पर कार्रवाई से कहीं सांप्रदायिक तनाव पैदा न हो जाए, इसलिए इसे टाल दिया गया। ऑपरेशन की पूरी तैयारी को इतना गुप्त रखा गया कि चुनिंदा बड़े अधिकारियों के अलावा किसी को भनक तक नहीं थी। यही वजह रही कि मिशन पूरी तरह से सफल रहा और साइबर ठग क़ाबू में आ गये।

ऑपरेशन साइबर का नेतृत्व नूह ज़िले के पुलिस अधीक्षक वरुण सिंगला ने किया। पूरे क्षेत्र की ऐसी नाकेबंदी की गयी कि कोई पुलिस का घेरा तोडक़र भाग न सके। पुलिस की 100 से ज़्यादा टीमों ने 14 गाँवों में घर-घर की तलाशी ली और सर्विलांस पर लगे संदिग्ध मोबाइल नंबर वालों की धरपकड़ करती गयी। साइबर ठगी के मामले में यह हरियाणा का अब तक का सबसे बड़ा मिशन था। अलग-अलग गुटों में बँटे लोग मोबाइल के ज़रिये ठगी का धंधा कर रहे थे, इनमें से ज़्यादातर बेरोज़गार और बेहद कम पढ़े लिखे हैं। इनमें से काफ़ी ऐसे भी हैं, जिन्होंने बाक़ायदा क्षेत्र में ट्रेनिंग ली थी और इसके लिए फीस भी चुकायी। नूह क्षेत्र में ऐसे ट्रेनिंग सेंटर खुल चुके थे, जिसमें चोरी छिपे ठगी करने के तरीक़ों को सिखाया जाता था। इसके लिए साइबर ठग विशेषज्ञों की मदद ली जाती थी।

सोशल मीडिया पर घर बैठे हज़ारों कमाने कमाने, नौकरी दिलाने, लॉटरी निकलने, बिजली बिल कट जाने, केवाईसी कराने से लेकर अश्लील वीडियो से ब्लैकमेल कर ठगी के तरीक़े सिखाये जाते थे। ठगी का क्रैश कोर्स करने वाले कई युवकों ने पकड़े जाने से पहले काफ़ी पैसा भी कमा लिया था। नूह में जामताड़ा की तरह इन ठगों ने पैसा मकान या वाहन आदि पर ख़र्च नहीं किया, क्योंकि उन्हें इससे पकड़े जाने का डर था। पुलिस पूछताछ में ख़ुलासा हुआ है कि नूह क्षेत्र के साइबर ठगों ने देश भर में 100 करोड़ से ज़्यादा की ठगी को अंजाम दिया होगा। इस पूरे नेटवर्क के ध्वस्त होने के बाद हज़ारों मामलों की जाँच पूरे होने की उम्मीद है।

वैसे साइबर ठगी के ज़्यादातर मामलों में पीडि़त को गयी रक़म वापस कम ही मिल पाती है। छोटे मोटी ठगी की शिकायत तो पुलिस के पास पहुँचती ही नहीं है। बड़ी रक़म की प्राथमिकी होती है, तो पुलिस जाँच करती है; लेकिन ज़्यादातर मामले अनसुलझे ही रहते हैं। मोटे अनुमान के अनुसार, साइबर ठगी के कुल दर्ज मामलों में दो प्रतिशत में ही पुलिस आरोप पत्र दाख़िल कर पाती है। हरियाणा में साइबर ठगी के आरोपी पश्चिम बंगाल के किसी दूर-दराज़ क्षेत्र के निकलते हैं, तो उन्हें तलाश पाना आसान नहीं होता। नूह में भी साइबर ठगों ने केवल इसी राज्य के नहीं, बल्कि अंडमान निकोबार और असम जैसे दूर-दराज़ के लोगों को अपना शिकार बनाया था।

नूह क्षेत्र के लोगों के मुताबिक, कोरोना में तालाबंदी के दौरान साइबर ठगी के मामलों की छिटपुट तौर पर शुरुआत हुई थी, उससे पहले इस इलाक़े में कोई भी ठगी का मामला सामने नहीं आया था। उसके बाद से विभिन्न राज्यों की पुलिस यहाँ आती रहती थी। पुलिस यहाँ आरोपियों तक न पहुँच सके, इसके लिए कई तरह की बाधाएँ भी आसपास के लोग करते रहे हैं। पुलिस पर पत्थरबाज़ी करके रास्ता भी रोका जाता रहा है। संचार क्रान्ति ने जहाँ लोगों को घर बैठे कई तरह की सुविधाएँ दी हैं, वहीं इन ठगों ने इसे आसानी से अमीर बनने का रास्ता तलाश लिया है। एक फोन काल या लिंक के माध्यम से पीडि़त का पूरा बैंक खाता ख़ाली करने वाले ये ठग छोटी उम्र में इतने शातिर हो चुके हैं कि घर बैटे मिनटों में लाखों के वारे-न्यारे कर लेते हैं। रोज़ ठगी के नये-नये तरीक़े सामने आ रहे हैं। बिना ओटीपी के भी ठग लोगों को शिकार बना रहे हैं।

सरकारी आँकड़ें के मुताबिक, हर घंटे औसतन छ: घटनाएँ साइबर ठगी की हो रही हैं। मामले लगातार तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं। इससे लोगों में असुरक्षा की भावना पैदा होने लगी है। साइबर ठगी पूरी तरह से बंद नहीं हो सकती, क्योंकि सुरक्षा के उपायों के बावजूद ये ठग नये-नये तरीक़े खोज लेते हैं। साइबर ठगी के लिए जामताड़ा या नूह ही अव्वल नहीं हैं, बल्कि देश भर में 32 ऐसे स्थान चिह्नित किये गये हैं, जहाँ बड़े स्तर पर ठग सक्रिय हैं। इनमें दिल्ली, असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, गुजरात, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना प्रमुख हैं। हरियाणा के भिवानी, नूह और पलवल ज़िलों में साइबर ठग सक्रिय हैं। राजस्थान की सीमांत ज़िला भरतपुर में साइबर ठगी का बड़ा अड्डा बन रहा है। नूह में साइबर ठगी के बड़े नेटवर्क को ध्वस्त करने के बाद क्षेत्र में मामलों में कुछ कमी भी आयी है; लेकिन देश भर में रोज़ नये से नये ठगी के मामले सामने आ ही रहे हैं।

ठगों से कुछ राहत

सरकारी पोर्टल के मुताबिक, नूह में ऑपरेशन साइबर से पहले 01 से 20 अप्रैल तक 5,728 मामले दर्ज हुए; जबकि 01 से 20 मई तक 4,218 मामले ही हुए। यह एक-चौथाई कमी ज़रूर है; लेकिन यह जारी रहेगी? कहना मुश्किल है। साइबर ठगी के बहुत-से मामलों में पीडि़त पुलिस के पास इसलिए नहीं जाते, क्योंकि उन्हें पता है कि इससे हासिल कुछ नहीं होगा; जबकि इसके लिए उसकी मुश्किलें और बढ़ जाएँगी।

“नूह में साइबर ठगी के बड़े नेटवर्क को ध्वस्त किया गया। पूछताछ से हज़ारों मामलों का ख़ुलासा होगा। इतने बड़े ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम देने में सभी का पूरा सहयोग रहा। ठग सभी काम फ़र्ज़ी तरीक़े से कर रहे थे। पुलिस के पास इसकी जानकारी थी; लेकिन किसी नेटवर्क को ख़त्म करने के लिए कुछ पुख़्ता सुबूत जुटाने पड़ते हैं। इस मामले में सब कुछ करने के बाद ऑपरेशन साइबर को अंजाम दिया गया।“

वरुण सिंगला

पुलिस अधीक्षक, नूह

दो हज़ार के नोट बने मुसीबत

New Delhi, May 23 (ANI): People exchange their Rs 2000 currency note at a bank following the RBI's decision to withdraw its circulation, in New Delhi on Tuesday. (ANI Photo/Sanjay Sharma)

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 19 मई को 2,000 का नोट वापस लेने की घोषणा करने से उत्तर प्रदेश में उन लोगों में खलबली है, जिनके पास इन नोटों के बंडल छिपे हैं। कोई 2,000 के नोट को चलन से बाहर करने की निंदा कर रहा है, तो कोई सरकार की प्रशंसा कर रहा है। नोट तो पूरे देश में बदले जा रहे हैं, मगर उत्तर प्रदेश में कुछ अलग ही नज़ारा देखने को मिल रहा है। दुकानदार 2,000 रुपये का नोट नहीं ले रहे हैं, बैंक वाले इन 2,000 के नोटों में से नक़ली नोट निकालने के प्रयास में लगे हैं। जब भी कोई 2,000 के नोटों की गड्डी लेकर बैंक पहुँचता है, तो बैंक वाले उसे ऐसे देखते हैं जैसे वह अपराधी हो, जमाकर्ता से कई सवाल पूछे जाते हैं, नोट बदलने में आनाकानी की जाती है। पहले ही तनाव में आये ग्राहक बैंककर्मियों की आनाकानी पर झगड़े पर उतर आते हैं।

शाही के सरकारी स्कूल के एक अध्यापक ने बताया कि बैंक वाले बड़ी मुश्किल से 2,000 के 10 नोट ही ले रहे हैं। अगले दिन दोबारा अगर कोई 2,000 के नोट लेकर बैंक पहुँचता है, तो उससे आधार कार्ड, पैन कार्ड माँगा जाता है। जमाकर्ता के 2,000 के नोटों को ऐसे बार बार देखा जाता है, जैसे वो घर में छापकर नक़ली नोट ले आया हो। राकेश दिनकर कहते हैं कि उन्हें इस बार की नोटबंदी से कोई असर नहीं हुआ है। वो किसान हैं और किसानों, मज़दूरों के पास 2,000 का नोट तो दूर की बात 500 रुपये का नोट भी क़िस्मत से ही आता है।

किसानों का पैसा खेती एवं ऋण चुकता करने में निकल जाता है और मज़दूर को एक दिन की दिहाड़ी ही 300 से 400 रुपये मिलती है। मज़दूर तो वैसे भी रोज़ कमाकर खाने वाले होते हैं। कुल मिलाकर 2,000 रुपये के नोट की वापसी को लेकर कई तरह के अनुभव हो रहे हैं, जिन्हें बैंककर्मियों एवं सरकार को समझना होगा।

कुछ बैंक माँग रहे पहचान पत्र

जब 2,000 रुपये के नोटों की वापसी की घोषणा हुई, उसके बाद लोगों में हडक़ंप मच गया। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की भारतीय स्टेट बैंक की एक शाखा में 2,000 के नोट बदलवाने आने वालों से आधार कार्ड, वोटर कार्ड में से कोई एक पहचान पत्र माँगा गया। शुरू में इसे लेकर विवाद भी हुआ। लखनऊ की तरह ही गाँवों एवं दूसरे शहरों की कई बैंक शाखाओं में यही हाल है। बैंककर्मी 2,000 रुपये का नोट जमा कराने आने वालों से पहचान पत्र माँग रहे हैं। जो लोग अधिक नोट जमा कराने बैंक में जा रहे हैं, उनसे आधार कार्ड के अतिरिक्त पैन कार्ड भी माँगा जा रहा है। कुछ जगह उच्चाधिकारियों के निर्देश के उपरांत पहचान पत्र की माँग बैंककर्मी नहीं कर रहे हैं। वाराणसी के एक बैंक ने तो बैंक के बाहर सूचना लगा दी थी कि 2,000 के नोट नहीं लिये जाएँगे। बाद में जब बात बढ़ी, तब बैंक ने सूचना हटायी।

बैंककर्मियों की मनमानी

बैंकों को भारतीय रिजर्व बैंक का निर्देश है कि वो 2,000 रुपये के नोट को बदलने का कार्य करें। मगर बैंकों के कर्मचारी नोट बदलने में आनाकानी कर रहे हैं। वो नोट बदलने वाले ग्राहकों से छोटे नोट न होने की बात कहकर 2,000 के नोट जमा करने का दबाव बना रहे हैं। कई जनपदों से ऐसे समाचार सामने आ रहे हैं, जहाँ बैंककर्मी नोट बदलने आ रहे ग्राहकों से नोटों को जमा करने अथवा कुछ बदलने एवं कुछ नोट जमा करने का दबाव बना रहे हैं।

खाता न होने पर आनाकानी

बैंकों में 2,000 का नोट बदलने आने वाले ग्राहकों से अधिकतर बैंकों कर्मचारी पूछ रहे हैं कि उनका खाता कहाँ है। अगर किसी ग्राहक का खाता उस बैंक में नहीं होता, जहाँ वो नोट बदलने गया है, तो बैंककर्मी नोट बदलने से मना करते हैं। अत्यधिक नोकझोंक के उपरांत कहीं कहीं ऐसे ग्राहकों को सहूलत मिल रही है, जिनका खाता उस बैंक में अथवा शाखा में नहीं है। हालाँकि कुछ बैंकों में किसी से कुछ नहीं पूछा जा रहा है, केवल 2,000 रुपये तक एक दिन में जमा करने अथवा बदलने का नियम तय है, जो कि भारतीय रिजर्व बैंक का निर्देश है।

मिल रहे नक़ली नोट

भारतीय मुद्रा जन सामान्य की पहुँच से इतनी दूर होती है कि उसे इसके असली अथवा नक़ली होने की पहचान भी ठीक से नहीं होती। बैंकों में 2,000 के नोट जमा कराने वालों को अब इस परीक्षा का सामना करना पड़ रहा है कि उनके पास सभी नोट असली हों। कई जगह 2,000 के नक़ली नोट निकलने पर झगड़े के समाचार पढऩे-सुनने को मिल रहे हैं। जमाकर्ता सीधे कह देते हैं कि वो घर में नोट नहीं छापते मगर बैंककर्मी ऐसे नोट लेते नहीं, जो नक़ली हों। अन्त में जमाकर्ताओं को ही नक़ली नोट का चूना लगता है। आगरा में एक सोना व्यापारी के बेटे ने जब स्थानी बैंक में 2,000 के 3.85 करोड़ रुपये जमा कराये, तो उसमें तीन नोट नक़ली निकले। इस पर बैंक वालों ने पुलिस बुला ली थी। अत्यधिक झड़प के उपरांत मामला शान्त हुआ।

ख़राब नोट नहीं ले रहा कोई

बैंकों में कटे-फटे नोट बदले जाते हैं। मगर इस समय अगर किसी के पास 2,000 रुपये का नोट कटा-फटा, रंग लगा हुआ, लिखा हुआ अथवा बहुत गंदा है, तो बैंककर्मी भी उसे लेने में आनाकानी कर रहे हैं। दुकानदार तो ऐसे नोट को ले ही नहीं रहे हैं। दुकानदार तो पहले ही 2,000 रुपये का नोट नहीं ले रहे हैं। सुनार, बड़े व्यापारी, अस्पताल वाले 2,000 के नोट लेने में कम आनाकानी कर रहे हैं, मगर अन्य तो ले ही नहीं रहे हैं। 2,000 का नोट देखते ही उनका एक ही बहाना होता है, छुट्टे नहीं हैं। ओमवीर सिंह कहते हैं कि सरकार ने नोटबंदी की दूसरी बार मुसीबत पैदा की है। आम लोगों को इस तरह के आदेशों से कई समस्याएँ आती हैं, जिनका समाधान आसानी से नहीं होता। अगर कोई 2,000 रुपये का नोट नहीं लेता है, तो नोट वाला व्यक्ति कहीं और जाकर प्रयास करता है।

छुट्टे न होने पर निकाला पेट्रोल

जनपद जालौन के एक पेट्रोल पम्प पर जब एक ग्राहक ने अपनी स्कूटी में पेट्रोल डलाकर 2,000 का नोट दिया, तो पेट्रोल पम्प के कर्मचारी ने नोट लेने से मना कर दिया। जब ग्राहक ने 2,000 के अतिरिक्त पैसे न होने की बात कही, तो पेट्रोल पम्प कर्मचारियों ने स्कूटी से पेट्रोल वापस निकाल लिया। इस पेट्रोल पम्प पर ग्राहकों से कहा जा रहा है कि 50-100 रुपये का डीजल अथवा पेट्रोल लेने पर 2,000 का नोट नहीं लिया जाएगा। यही काम कुछ दुकानदार कर रहे हैं। बहेड़ी में एक ग्राहक ने परचून की दुकान से 800 रुपये का सामान लेकर दुकानदार को 2,000 का नोट थमाना चाहा, तो दुकानदार ने छुट्टे पैसे देने का आग्रह किया। जब ग्राहक ने असमर्थता जतायी, तो दुकानदार ने सामान वापस ले लिया।

मंदिरों व मदिरालयों में पहुँच रहे नोट

जिनके पास 2,000 के नोट अधिक हैं, वो गुप्त दान करने में जुटे हैं। कुछ मंदिरों के दान पात्रों में 2,000 रुपये के नोट मिलने से यह स्पष्ट हो गया है कि लोग अब इस बड़े नोट को दानस्वरूप मंदिर में गुप्त रूप से डालकर चले जा रहे हैं। वहीं मदिरा की सरकारी एवं निजी दुकानों पर लोग 2,000 के नोट लेकर पहुँच रहे हैं। हालाँकि मंदिरों तक पहुँचने वाले 2,000 के नोटों की संख्या अधिक नहीं है, मगर बड़े मंदिरों में हर दिन 2-4 नोट 2,000 के आ ही जाते हैं।

कई जगह नोट बदलने की कोशिश

जिन लोगों के पास 2,000 के अधिक नोट हैं, वो बड़ी चतुराई से शीघ्र ही अपने सिर से 2,000 के नोटों को हटाकर सरकार अथवा जो भी ले सके, उसके मत्थे मढऩे के प्रयास में लगे हैं। कई ग्राहकों के बारे में सूचना है कि वो एक ही दिन में कई बैंक शाखाओं में जाकर नोट बदलने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ लोग 100-50 रुपये के सामान के लिए 2,000 का नोट लेकर चलते हैं। जब एक नोट का छुट्टा हो जाता है, तो वो फिर 100-50 के सामान के लिए दूसरी जगह 2,000 का नोट लेकर पहुँच जाते हैं। अधिक नोट एक साथ नहीं बदले जाने के चलते लोग एक नहीं कई जगह जाकर नोट बदलने का प्रयास कर रहे हैं।

समझें आरबीआई के नियम

जिन ग्राहकों को 2,000 के नोट बदलने अथवा जमा करने में समस्या आ रही है, वो बैंककर्मियों को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के निर्देशों से अवगत कराएँ। इतने पर भी बैंककर्मी नोट लेने से मना करता है, तो उसकी शिकायत शाखा प्रबंधक अथवा मुख्य शाखा प्रबंधक से करें। उत्तर प्रदेश के हर जनपद में नोट बदलने के लिए ग्राहक जा सकते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के निर्देशों के अनुसार, ग्राहक 2,000 का नोट बदलने किसी भी बैंक में जा सकते हैं। इसके लिए बैंक अकाउंट होना आवश्यक नहीं है। कोई फार्म भरने की भी आवश्यकता नहीं है। नोट जमा करने की कोई सीमा नहीं है, बदलने के लिए एक दिन में 20,000 रुपये की सीमा निर्धारित है। 30 सितंबर, 2023 तक नोट जमा किये जा सकते हैं; इसलिए आपाधापी / हड़बड़ी की आवश्यकता नहीं है।