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दो हज़ार के नोट बने मुसीबत

New Delhi, May 23 (ANI): People exchange their Rs 2000 currency note at a bank following the RBI's decision to withdraw its circulation, in New Delhi on Tuesday. (ANI Photo/Sanjay Sharma)

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 19 मई को 2,000 का नोट वापस लेने की घोषणा करने से उत्तर प्रदेश में उन लोगों में खलबली है, जिनके पास इन नोटों के बंडल छिपे हैं। कोई 2,000 के नोट को चलन से बाहर करने की निंदा कर रहा है, तो कोई सरकार की प्रशंसा कर रहा है। नोट तो पूरे देश में बदले जा रहे हैं, मगर उत्तर प्रदेश में कुछ अलग ही नज़ारा देखने को मिल रहा है। दुकानदार 2,000 रुपये का नोट नहीं ले रहे हैं, बैंक वाले इन 2,000 के नोटों में से नक़ली नोट निकालने के प्रयास में लगे हैं। जब भी कोई 2,000 के नोटों की गड्डी लेकर बैंक पहुँचता है, तो बैंक वाले उसे ऐसे देखते हैं जैसे वह अपराधी हो, जमाकर्ता से कई सवाल पूछे जाते हैं, नोट बदलने में आनाकानी की जाती है। पहले ही तनाव में आये ग्राहक बैंककर्मियों की आनाकानी पर झगड़े पर उतर आते हैं।

शाही के सरकारी स्कूल के एक अध्यापक ने बताया कि बैंक वाले बड़ी मुश्किल से 2,000 के 10 नोट ही ले रहे हैं। अगले दिन दोबारा अगर कोई 2,000 के नोट लेकर बैंक पहुँचता है, तो उससे आधार कार्ड, पैन कार्ड माँगा जाता है। जमाकर्ता के 2,000 के नोटों को ऐसे बार बार देखा जाता है, जैसे वो घर में छापकर नक़ली नोट ले आया हो। राकेश दिनकर कहते हैं कि उन्हें इस बार की नोटबंदी से कोई असर नहीं हुआ है। वो किसान हैं और किसानों, मज़दूरों के पास 2,000 का नोट तो दूर की बात 500 रुपये का नोट भी क़िस्मत से ही आता है।

किसानों का पैसा खेती एवं ऋण चुकता करने में निकल जाता है और मज़दूर को एक दिन की दिहाड़ी ही 300 से 400 रुपये मिलती है। मज़दूर तो वैसे भी रोज़ कमाकर खाने वाले होते हैं। कुल मिलाकर 2,000 रुपये के नोट की वापसी को लेकर कई तरह के अनुभव हो रहे हैं, जिन्हें बैंककर्मियों एवं सरकार को समझना होगा।

कुछ बैंक माँग रहे पहचान पत्र

जब 2,000 रुपये के नोटों की वापसी की घोषणा हुई, उसके बाद लोगों में हडक़ंप मच गया। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की भारतीय स्टेट बैंक की एक शाखा में 2,000 के नोट बदलवाने आने वालों से आधार कार्ड, वोटर कार्ड में से कोई एक पहचान पत्र माँगा गया। शुरू में इसे लेकर विवाद भी हुआ। लखनऊ की तरह ही गाँवों एवं दूसरे शहरों की कई बैंक शाखाओं में यही हाल है। बैंककर्मी 2,000 रुपये का नोट जमा कराने आने वालों से पहचान पत्र माँग रहे हैं। जो लोग अधिक नोट जमा कराने बैंक में जा रहे हैं, उनसे आधार कार्ड के अतिरिक्त पैन कार्ड भी माँगा जा रहा है। कुछ जगह उच्चाधिकारियों के निर्देश के उपरांत पहचान पत्र की माँग बैंककर्मी नहीं कर रहे हैं। वाराणसी के एक बैंक ने तो बैंक के बाहर सूचना लगा दी थी कि 2,000 के नोट नहीं लिये जाएँगे। बाद में जब बात बढ़ी, तब बैंक ने सूचना हटायी।

बैंककर्मियों की मनमानी

बैंकों को भारतीय रिजर्व बैंक का निर्देश है कि वो 2,000 रुपये के नोट को बदलने का कार्य करें। मगर बैंकों के कर्मचारी नोट बदलने में आनाकानी कर रहे हैं। वो नोट बदलने वाले ग्राहकों से छोटे नोट न होने की बात कहकर 2,000 के नोट जमा करने का दबाव बना रहे हैं। कई जनपदों से ऐसे समाचार सामने आ रहे हैं, जहाँ बैंककर्मी नोट बदलने आ रहे ग्राहकों से नोटों को जमा करने अथवा कुछ बदलने एवं कुछ नोट जमा करने का दबाव बना रहे हैं।

खाता न होने पर आनाकानी

बैंकों में 2,000 का नोट बदलने आने वाले ग्राहकों से अधिकतर बैंकों कर्मचारी पूछ रहे हैं कि उनका खाता कहाँ है। अगर किसी ग्राहक का खाता उस बैंक में नहीं होता, जहाँ वो नोट बदलने गया है, तो बैंककर्मी नोट बदलने से मना करते हैं। अत्यधिक नोकझोंक के उपरांत कहीं कहीं ऐसे ग्राहकों को सहूलत मिल रही है, जिनका खाता उस बैंक में अथवा शाखा में नहीं है। हालाँकि कुछ बैंकों में किसी से कुछ नहीं पूछा जा रहा है, केवल 2,000 रुपये तक एक दिन में जमा करने अथवा बदलने का नियम तय है, जो कि भारतीय रिजर्व बैंक का निर्देश है।

मिल रहे नक़ली नोट

भारतीय मुद्रा जन सामान्य की पहुँच से इतनी दूर होती है कि उसे इसके असली अथवा नक़ली होने की पहचान भी ठीक से नहीं होती। बैंकों में 2,000 के नोट जमा कराने वालों को अब इस परीक्षा का सामना करना पड़ रहा है कि उनके पास सभी नोट असली हों। कई जगह 2,000 के नक़ली नोट निकलने पर झगड़े के समाचार पढऩे-सुनने को मिल रहे हैं। जमाकर्ता सीधे कह देते हैं कि वो घर में नोट नहीं छापते मगर बैंककर्मी ऐसे नोट लेते नहीं, जो नक़ली हों। अन्त में जमाकर्ताओं को ही नक़ली नोट का चूना लगता है। आगरा में एक सोना व्यापारी के बेटे ने जब स्थानी बैंक में 2,000 के 3.85 करोड़ रुपये जमा कराये, तो उसमें तीन नोट नक़ली निकले। इस पर बैंक वालों ने पुलिस बुला ली थी। अत्यधिक झड़प के उपरांत मामला शान्त हुआ।

ख़राब नोट नहीं ले रहा कोई

बैंकों में कटे-फटे नोट बदले जाते हैं। मगर इस समय अगर किसी के पास 2,000 रुपये का नोट कटा-फटा, रंग लगा हुआ, लिखा हुआ अथवा बहुत गंदा है, तो बैंककर्मी भी उसे लेने में आनाकानी कर रहे हैं। दुकानदार तो ऐसे नोट को ले ही नहीं रहे हैं। दुकानदार तो पहले ही 2,000 रुपये का नोट नहीं ले रहे हैं। सुनार, बड़े व्यापारी, अस्पताल वाले 2,000 के नोट लेने में कम आनाकानी कर रहे हैं, मगर अन्य तो ले ही नहीं रहे हैं। 2,000 का नोट देखते ही उनका एक ही बहाना होता है, छुट्टे नहीं हैं। ओमवीर सिंह कहते हैं कि सरकार ने नोटबंदी की दूसरी बार मुसीबत पैदा की है। आम लोगों को इस तरह के आदेशों से कई समस्याएँ आती हैं, जिनका समाधान आसानी से नहीं होता। अगर कोई 2,000 रुपये का नोट नहीं लेता है, तो नोट वाला व्यक्ति कहीं और जाकर प्रयास करता है।

छुट्टे न होने पर निकाला पेट्रोल

जनपद जालौन के एक पेट्रोल पम्प पर जब एक ग्राहक ने अपनी स्कूटी में पेट्रोल डलाकर 2,000 का नोट दिया, तो पेट्रोल पम्प के कर्मचारी ने नोट लेने से मना कर दिया। जब ग्राहक ने 2,000 के अतिरिक्त पैसे न होने की बात कही, तो पेट्रोल पम्प कर्मचारियों ने स्कूटी से पेट्रोल वापस निकाल लिया। इस पेट्रोल पम्प पर ग्राहकों से कहा जा रहा है कि 50-100 रुपये का डीजल अथवा पेट्रोल लेने पर 2,000 का नोट नहीं लिया जाएगा। यही काम कुछ दुकानदार कर रहे हैं। बहेड़ी में एक ग्राहक ने परचून की दुकान से 800 रुपये का सामान लेकर दुकानदार को 2,000 का नोट थमाना चाहा, तो दुकानदार ने छुट्टे पैसे देने का आग्रह किया। जब ग्राहक ने असमर्थता जतायी, तो दुकानदार ने सामान वापस ले लिया।

मंदिरों व मदिरालयों में पहुँच रहे नोट

जिनके पास 2,000 के नोट अधिक हैं, वो गुप्त दान करने में जुटे हैं। कुछ मंदिरों के दान पात्रों में 2,000 रुपये के नोट मिलने से यह स्पष्ट हो गया है कि लोग अब इस बड़े नोट को दानस्वरूप मंदिर में गुप्त रूप से डालकर चले जा रहे हैं। वहीं मदिरा की सरकारी एवं निजी दुकानों पर लोग 2,000 के नोट लेकर पहुँच रहे हैं। हालाँकि मंदिरों तक पहुँचने वाले 2,000 के नोटों की संख्या अधिक नहीं है, मगर बड़े मंदिरों में हर दिन 2-4 नोट 2,000 के आ ही जाते हैं।

कई जगह नोट बदलने की कोशिश

जिन लोगों के पास 2,000 के अधिक नोट हैं, वो बड़ी चतुराई से शीघ्र ही अपने सिर से 2,000 के नोटों को हटाकर सरकार अथवा जो भी ले सके, उसके मत्थे मढऩे के प्रयास में लगे हैं। कई ग्राहकों के बारे में सूचना है कि वो एक ही दिन में कई बैंक शाखाओं में जाकर नोट बदलने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ लोग 100-50 रुपये के सामान के लिए 2,000 का नोट लेकर चलते हैं। जब एक नोट का छुट्टा हो जाता है, तो वो फिर 100-50 के सामान के लिए दूसरी जगह 2,000 का नोट लेकर पहुँच जाते हैं। अधिक नोट एक साथ नहीं बदले जाने के चलते लोग एक नहीं कई जगह जाकर नोट बदलने का प्रयास कर रहे हैं।

समझें आरबीआई के नियम

जिन ग्राहकों को 2,000 के नोट बदलने अथवा जमा करने में समस्या आ रही है, वो बैंककर्मियों को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के निर्देशों से अवगत कराएँ। इतने पर भी बैंककर्मी नोट लेने से मना करता है, तो उसकी शिकायत शाखा प्रबंधक अथवा मुख्य शाखा प्रबंधक से करें। उत्तर प्रदेश के हर जनपद में नोट बदलने के लिए ग्राहक जा सकते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के निर्देशों के अनुसार, ग्राहक 2,000 का नोट बदलने किसी भी बैंक में जा सकते हैं। इसके लिए बैंक अकाउंट होना आवश्यक नहीं है। कोई फार्म भरने की भी आवश्यकता नहीं है। नोट जमा करने की कोई सीमा नहीं है, बदलने के लिए एक दिन में 20,000 रुपये की सीमा निर्धारित है। 30 सितंबर, 2023 तक नोट जमा किये जा सकते हैं; इसलिए आपाधापी / हड़बड़ी की आवश्यकता नहीं है।

घरेलू ज़िम्मेदारियों से मुक्त नहीं कामकाजी महिलाएँ

महिलाओं को आधी दुनिया भी कहा जाता है। विश्व भर में महिलाओं की तरक़्क़ी का लेखा-जोखा हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय दिवस पर मीडिया में छाया रहता है। दुनिया की आधी आबादी में एक तबक़ा कामकाजी महिलाओं का है। हाल ही में डेलॉयट ‘पेशेवर सेवा नेटवर्क’ कम्पनी ने विश्व भर में कामकाजी महिलाओं की समस्याओं के बाबत ‘वीमेन एट वर्क-2023’ नामक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में भारत समेत 10 देशों की 5,000 कामकाजी महिलाओं की असल स्थिति पर रोशनी डाली गयी है। इन 5,000 कामकाजी महिलाओं में 10 फ़ीसदी यानी 500 भारतीय महिलाएँ भी शामिल हैं।

वीमेन एट वर्क-2023 रिपोर्ट अन्य रिपोट्र्स की तरह इस तथ्य की तस्दीक़ करती हैं कि महिलाएँ कार्यालयों में चाहे कितने ही शीर्ष पदों पर क्यों न हो, ज़्यादातर घरेलू ज़िम्मेदारियाँ उन्हीं के कंधों पर हैं। वैश्विक स्तर पर यह रिपोर्ट दर्शाती है कि कार्य सम्बन्धित कई पैमानों पर बीते साल की तुलना में कुछ सुधार हुआ है; लेकिन कामकाजी महिलाओं के अनुभव बोलते हैं कि अभी भी कई ऐसे बिन्दु हैं, जहाँ सुधार नहीं हुआ या हालात और भी बदतर हो गये हैं।

सर्वे में शामिल अधिकतर महिलाओं के लिए सरोकार वाले बिन्दु-अपने अधिकारों को बनाये रखना, वित्तीय सुरक्षा और शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य हैं। ये तीन मुद्दे उनकी शीर्ष प्राथमिकताएँ हैं। 88 फ़ीसदी कामकाजी महिलाओं ने कहा कि वे पूर्णकालिक नौकरी करती हैं; लेकिन इसके बावजूद साफ़-सफ़ाई और परिवार के सदस्यों को देखने की ज़िम्मेदारी उनकी ही है। 46 फ़ीसदी ने कहा कि बच्चों की देख-रेख का पूरा ज़िम्मा उनका ही है। केवल 10 फ़ीसदी ने ही कहा कि उनके जीवनसाथी की अधिक ज़िम्मेदारी है। जहाँ तक भारत का सवाल है, तो केवल 15 फ़ीसदी कामकाजी महिलाओं ने स्वीकारा कि उनके पति / जीवनसाथी घरेलू कामों में हाथ बँटाते हैं। यानी 85 फ़ीसदी महिलाएँ कमाऊ होते हुए भी घर की साफ़-सफ़ाई, बच्चों व बुजुर्गों की देखभाल ख़ुद ही करती हैं। 67 फ़ीसदी मामलों में पार्टनर प्राइमरी आय का स्रोत है। 11 फ़ीसदी महिलाएँ घर में सबसे बड़ी आमदनी का स्रोत हैं।

ग़ौरतलब है कि 21वीं सदी में भी 40 फ़ीसदी ने कहा कि उन्हें पार्टनर के करियर को अधिक प्राथमिकता देनी पड़ती है। घर में अधिक कमाने वाली 20 फ़ीसदी महिलाओं को भी पति की नौकरी पहले देखनी पड़ती है। इससे महिलाओं की ख़ुद की तरक़्क़ी और अधिक कमायी के मौक़े सीमित हो जाते हैं। महिलाएँ चाहे वे कामकाजी हों या घरेलू, सामाजिक नियमों के तहत बच्चों को सँभालने व घरेलू काम करने की ज़िम्मेदारियाँ अक्सर उन्हीं के कंधों पर होती हैं। ऐसा करने वाली महिलाओं को समाज अच्छी महिला का तमग़ा देता है।

इस तमग़े का महिलाओं के शारीरिक व मानसिक सेहत पर प्रभाव पड़ता है। वे अक्सर तनाव में रहती हैं। कार्यालय व घर के काम में सन्तुलन बनाना उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती है। कामकाजी महिलाओं के लिए सबसे बड़ी मुश्किल उनके काम के घंटों को लेकर होती है। इसी कारण बीते साल 14 फ़ीसदी महिलाओं ने महज़ इसलिए नौकरी छोड़ी कि वहाँ काम के घंटों को लेकर सख़्ती थी। 30 फ़ीसदी महिलाएँ ऐसी भी हैं, जो इस कारण के चलते अपनी नौकरी छोडऩे के लिए मन बना रही हैं। यही नहीं, 97 फ़ीसदी कामकाजी महिलाएँ मानती हैं कि अगर काम के घंटों को लेकर किसी तरह की छूट या रियायत माँगी, तो उनकी पदोन्नति अटक जाएगी। 95 फ़ीसदी ने कहा कि उन्हें भरोसा नहीं है कि काम के घंटों में छूट के मुद्दे पर उनकी सुनी जाएगी। 44 फ़ीसदी ने कहा कि कार्यस्थल पर उन्हें उत्पीडऩ झेलना पड़ा।

बीते साल डेलायॅट की वीमेन एट वर्कप्लेस 2022 रिपोर्ट में उत्पीडऩ का आँकड़ा 59 फ़ीसदी था, यानी ऐसे मामलों में 15 फ़ीसदी की कमी आयी है। 14 फ़ीसदी महिलाओं ने कहा कि जिन कम्पनियों में यौन उत्पीडऩ सहन नहीं करते, वहाँ लम्बे वक़्त तक रुकना चाहेंगी। कामकाजी महिलाएँ अपनी नौकरी बचाये रखने के लिए अपनी शारीरिक व मानसिक सेहत पर भी ध्यान नहीं दे पाती हैं। वैश्विक स्तर पर 41 फ़ीसदी कामकाजी महिलाओं ने माना कि पीरियड्स के दर्द में भी काम करना पड़ा। वहीं 19 फ़ीसदी ने माना कि काम से तो अवकाश मिल गया; लेकिन कार्यालय में यह नहीं बता पायी कि पीरियड्स के कारण अवकाश चाहिए।

वैश्विक स्तर पर 41 फ़ीसदी महिलाओं की तुलना में 33 फ़ीसदी भारतीय महिलाओं ने माना कि उन्हें पीरियड्स सम्बन्धित लक्षणों के दौरान काम करना पड़ा। 56 फ़ीसदी महिलाओं ने कहा कि मानसिक ओर शारीरिक स्वास्थ्य उनकी सबसे बड़ी चिन्ता है। 51 फ़ीसदी महिलाओं ने कहा कि बीते साल के मुक़ाबले उनका तनाव बढ़ता जा रहा है। 2021 में ऐसा कहने वाली महिलाओं की संख्या 53 फ़ीसदी थी। 7 फ़ीसदी महिलाओं ने कहा कि मानसिक तनाव के कारण पिछली नौकरी छोडऩी पड़ी। 25 फ़ीसदी महिलाओं ने कहा कि कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करने में वे सहज महसूस करती हैं, जबकि 2021 में यह आँकड़ा 43 फ़ीसदी था। यहाँ गिरावट दर्ज की गयी है, जो कि महिलाओं के साथ-साथ कम्पनियों के लिए भी चिन्ता का मुद्दा है। अगर कर्मचारी मानसिक तौर पर स्वस्थ नहीं होंगे या अपनी ऐसी परेशानियाँ साझा नहीं करेंगे, तो इसका असर सम्बन्धित कर्मचारी पर तो पड़ता ही है; कम्पनी / कार्यालय के काम / उत्पादन पर भी पड़ता है। जबकि वैश्विक व भारत में कार्यस्थल में तनाव व वर्कआउट यानी काम सम्बन्धित मानसिक, शारीरिक थकान का स्तर काफ़ी अधिक है। लेकिन उत्साहजनक यह है कि भारत में युवा कर्मचारी कार्यस्थल में मानसिक सेहत के बारे में बात करने को लेकर सहज हैं।

आश्वस्त करने वाली बात यह है कि कामकाजी महिलाओं ने बीते साल की तुलना में हाइब्रिड व्यवस्था सम्बन्धित बेहतर कामकाजी अनुभव दर्ज कराये हैं। पर भारत में हाइब्रिड व्यवस्था में काम करने वाली कामकाजी महिलाओं में इस व्यवस्था के बाबत पूर्वानुमान में कमी आयी है। वर्ष 2022 में ऐसी महिलाओं की संख्या 15 फ़ीसदी थी, जो बढक़र 2023 में 28 फ़ीसदी तक पहुँच गयी। इसी तरह काम के लचीलेपन को लेकर भी भारतीय महिलाओं में बीते साल की तुलना में कमी देखने को मिली। वर्ष 2022 में ऐसी महिलाओं की संख्या 13 फ़ीसदी थी, जो कि 2023 में बढक़र 32 फ़ीसदी हो गयी। भारत में डेलॉयट की आला अधिकारी सरस्वती कस्तूरीरंजन का कहना है कि ‘संगठनों को निश्चित रूप से लचीलेपन, पूर्वानुमान सरीखे मुद्दों को सम्बोधित करने की ज़रूरत है, क्योंकि इनका कर्मचारियों को जोडऩे व उन्हें रोके रहने जैसे अहम बिन्दुओं पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।’

58 फ़ीसदी महिलाएँ वित्तीय सुरक्षा को लेकर अधिक चिन्तित हैं। 54 फ़ीसदी ने व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर अपनी चिन्ता व्यक्त की। 53 फ़ीसदी कामकाजी महिलाओं ने माना कि सबसे बड़ी चिन्ता यह है कि उनकी नौकरी न चली जाए। 59 फ़ीसदी कामकाजी महिलाओं के लिए कार्यस्थल से इतर महिला अधिकार सबसे बड़ी चिन्ता है। डेलॉयट के वैश्विक सीईओ जोसेफ बी. उकुजोग्लू का कहना है कि कुछ सुधार के बावजूद कामकाजी महिलाओं का बहुत बड़ा वर्ग मानता है कि उन्हें नहीं लगता कि उनके नियोक्ता लैंगिक बराबरी को लेकर की गयी प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए ठोस क़दम उठा रहे हैं। बिजनेस नेताओं की ज़िम्मेदारी है और उनके पास मौक़े हैं किवे कार्यस्थलों पर बदलाव लाएँ, जिनकी बहुत ज़रूरत है। इसमें पहली बड़ी ज़रूरत लैंगिक बराबरी की है।’

दरअसल आज की महिलाएँ महत्त्वाकांक्षी व पेशेवर हैं। हाल ही में भारत में सिविल सेवा 2022 के नतीजे जारी हुए और जारी नतीजों में लड़कियों का दबदबा जारी रहा। लगातार दूसरी बार टॉप पर चार लड़कियाँ आयीं। वर्ष 2000 में सिविल परीक्षा में 85 महिलाओं ने परीक्षा पास की थी और अब 2022 में 320 महिलाओं ने बाज़ी मारी है। इस दौरान महिला आवेदकों की संख्या सात गुणा बढ़ी। सात वर्ष से सिविल सेवा में महिला भागीदारी 23 फ़ीसदी से अधिक है। यह तथ्य भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि यूपीएससी में महिला उम्मीदवारों की संख्या बढऩे के बावजूद देश की नौकरशाही में इनकी संख्या बेहद कम है। एक अध्ययन के मुताबिक, 2020 में देश की ब्यूरोक्रेसी में महिलाओं की हिस्सेदारी महज़ 13 फ़ीसदी थी। विश्व भर में व्याप्त लैंगिक पूर्वाग्रह महिलाओं को आगे बढऩे की राह में कई तरह के व्यवधान पैदा करते हैं। भारत विश्व के सबसे अधिक परम्परागत देशों में से एक है। यही नहीं, यहाँ हर प्रान्त की अपनी विभिन्न प्रथाएँ हैं और महिलाओं, कामकाजी महिलाओं की समस्याएँ भी कई हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि व्यवसायी, व्यावसायिक और सरकारी नीतियाँ कामकाजी महिलाओं की समस्याओं पर रोशनी डालने वाली रिपोट्र्स पर ध्यान देंगे।

हत्यारी कट्टरता

कट्टर व्यक्ति हमेशा घातक होता है। ऐसा व्यक्ति जिसके प्रति समर्पित होता है, उसके लिए न जान देने में सोचता है और न जान लेने में। वहशत उसके ख़ून में होती है। वह सोचने-समझने की क्षमता खो देता है। उसका विवेक ठीक उसी तरह मर जाता है, जिस तरह उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान नहीं रहता। इसलिए हर कट्टर व्यक्ति ख़तरनाक हो जाता है। धर्मों में आज इसी तरह के कट्टर लोगों की भरमार है। लड़ाई-झगड़ा, ख़ून-ख़राबा इस कट्टरता का पैमाना बन चुका है। लेकिन यह कट्टर लोग इसे परम् भक्ति समझते हैं। जबकि यह सिर्फ़ दिखावा और एक ऐस भटकाव है, जिसका अन्त पतन के सिवाय कुछ नहीं है। भक्ति में तो व्यक्ति सिर्फ़ समर्पित होता है, वह अपना अस्तित्व तो मिटाने के लिए तैयार रहता है; लेकिन दूसरे को कष्ट भी नहीं पहुँचाता, उसका अस्तित्व ख़त्म करना तो दूर की बात। जबकि कट्टर लोग पहले दूसरे को कष्ट पहुँचाने और उनका अस्तित्व ख़त्म करने में विश्वास करते हैं।

दुनिया में इसी कट्टरता के चलते सबसे ज़्यादा हत्याएँ होती हैं। कट्टरपंथी जब किसी धर्म की अफ़ीम खा रहे हों, तो वे और भी ख़तरनाक हो जाते हैं। इस दौर में आतंकी संगठन इसी कट्टरता की देन हैं, चाहे वो किसी भी धर्म में पनप रहे हों। धार्मिकता और भक्ति की आड़ में ऐसी कट्टरता को बढ़ाना अब सभी धर्मों में आम बात है। कुछ लोग ख़ुद को पूज्यनीय और धनवान बनाये रखने के लिए इसे बढ़ावा दे रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि संसार के तमाम तथाकथित धर्मों में पनपे ये कट्टरपंथी अपने से विलग धर्म के लोगों के लिए ही ख़तरा हैं। ये कट्टरपंथी तो अपने धर्म के भी उन लोगों के लिए ख़तरा हैं, जो मानवतावादी हैं। दयालु हैं। इन कट्टरपंथियों को अपने धर्म के भी ऐसे लोग रास नहीं आते, जो जीओ और जीने दो की बात करते हैं। वे ऐसे मानवीय लोगों को अपने और अपने धर्म के लिए ख़तरा मानते हैं। जबकि सच्चाई यही है कि यही कट्टरपंथी लोग दूसरे धर्मों के लिए कम, बल्कि अपने-अपने धर्मों के लिए सबसे बड़ा हैं।

सन्त कबीर और ओशो ने ऐसे लोगों को मूर्ख कहा है। वास्तव में ये कट्टरपंथी मूर्ख ही हैं। क्योंकि जो लोग एक विराट स्वरूप ईश्वर को न पहचानकर मानवनिर्मित धर्मों के लिए ख़ून-ख़राबा करते हैं, वे भला धर्म को क्या ख़ाक समझेंगे। ऐसे लोगों को मूर्ख नहीं कहा जाए, तो फिर क्या कहा जाए। विद्वान तो विनम्र होते हैं। सभी का आदर करते हैं। उनके लिए हर प्राणी ईश्वर का स्वरूप है। ऐसे लोगों से बेहतर तरीक़े से धर्म को और कौन समझ सकता है, जिनके लिए न कोई छोटा है और न कोई बड़ा। सारा संसार उनके लिए एक घर है और पूरी सृष्टि ईश्वर की अद्भुत संरचना। फिर ये तुच्छ तथाकथित धर्मों के खाँचों में बँटे लोग किस बलबूते महान् और ज्ञानी होने का दावा करते हैं? जिन लोगों का ज्ञान ही घुटनों में हो। जो लोग चंद किताबों को रटकर ज्ञानी होने का दम्भ भरते हैं; ख़ुद को धर्म का वाहक बताने लगते हैं। जिन्हें अपने धर्म की ठेकेदारी सिर्फ़ इसलिए रास आती है, क्योंकि उन्हें ऐसा करने से सम्मान, सुख, पैसा और ऐश भरी ज़िन्दगी बिना किसी ख़ास मेहनत के मिल जाती है; वे लोग धर्म का मर्म भला क्या जानें। थोथी बातें करने भर से कोई धार्मिक कैसे हो सकता है? धर्मों के नाम पर लिखी गयीं चंद किताबें पढऩे भर से कोई महाज्ञानी कैसे हो सकता है? जिसके अपने अंतस में ज्ञान की एक किरण भी कभी न फूटी हो, जो अपने इस गंदे और नश्वर शरीर को महान् और पूज्यनीय बनाने की इच्छा मन में पाले बैठा हो, वह धार्मिक है ही नहीं, ईश्वर से जुडऩा तो उसके लिए दूर की कौड़ी है। धार्मिक तो वह है, जो दूसरों की पीड़ा समझता है। जो दूसरों को उतना ही सम्मान देता है, जितना कि ख़ुद चाहता है। जो संसार में किसी भी प्रकार के मोह से मुक्त है। जो सुख-दु:ख का स्वागत एक भाव से करता है। जो ऊँच-नीच के भाव से ऊपर उठ चुका है। जो सत्य बोलता है। जो न्यायप्रिय है। जो ख़ुद को भी ग़लती पर क्षमा नहीं करता है और ख़ुद को भी दुश्मन की तरह सज़ा देता है। जो ईश्वर के लिए किसी मानव-निर्मित किसी घर (मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरिजाघर, स्पूत तथा अन्य किसी धार्मिक स्तल) में नहीं भटकता है। जो रुखी-सूखी और स्वादिष्ट भोजन में कोई फ़र्क़ नहीं समझता। जो ईश्वर से कभी कुछ माँगता नहीं, भोगने के लिए मिले हर क्षण के लिए उसे धन्यवाद करता है। जो ईश्वर को विशुद्ध प्रेम करता है। हर सुख-दु:ख के लिए उसे धन्यवाद देता है। साँस-साँस उसे अर्पित करता है।

आज के दौर में इस संसार में ऐसे लोग कितने हैं? क्या आज के धार्मिक ठेकेदारों में ये लक्षण हैं? क्या ये तथाकथित धर्म के ठेकेदार इन नियमों पर खरे उतरते हैं? क्या वे इसके लिए परीक्षा को तैयार हैं? अगर नहीं, तो फिर वे धार्मिक नहीं हैं। बल्कि वे धर्मों की आड़ लेकर दूसरों की मेहनत पर पलने वाले वो परजीवी हैं, जो अपने-अपने तथाकथित धर्मों के सहारे अपनी तोंद बढ़ा रहे हैं।

एक समय मुझे पता था कि मेरा फोन ‘टैप’ किया जा रहा है : राहुल गांधी

कांग्रेस नेता राहुल गांधी, जो इस समय अमेरिका के दौरे पर हैं, ने दावा किया है कि एक  समय था जब उन्हें पता था कि उनका फोन ‘टैप’ किया जा रहा है। राहुल के मुताबिक इसके बाद उन्होंने अपने आईफोन (मोबाइल) पर मजाक में कहा – ‘हैलो ! मिस्टर मोदी।’

अमिदी और फिक्सनिक्स स्टार्टअप के संस्थापक शॉन शंकरन के साथ एक गहन चर्चा में हिस्सा लेते हुए राहुल गांधी ने यह बात कही। राहुल ने कहा – ‘मुझे लगता है कि मेरा आईफोन टैप किया गया। आपको एक राष्ट्र के रूप में और एक व्यक्ति के रूप में भी डेटा सूचना की गोपनीयता के संबंध में नियम बनाने की जरूरत है। यदि कोई राष्ट्र तय करता है कि वह आपका फोन टैप करना चाहता है, तो इसे कोई रोक नहीं सकता है।  यह मेरी समझ है।’

कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि ‘यदि देश फोन टैपिंग में दिलचस्पी रखता है, तो यह लड़ने लायक लड़ाई नहीं है। मुझे लगता है कि मैं जो कुछ भी काम करता हूं, वह सब कुछ सरकार के सामने है।’ प्लग एंड प्ले टेक सेंटर के सीईओ और संस्थापक सईद अमिदी ने कार्यक्रम के बाद कहा – ‘राहुल गांधी ने आईटी क्षेत्र की गहरी समझ दिखाई है और नवीनतम और अत्याधुनिक तकनीकों के बारे में उनका ज्ञान काफी प्रभावशाली है।’

राहुल ने बुधवार को दिन का पहला हिस्सा सिलिकॉन वैली स्थित स्टार्टअप उद्यमियों के साथ बिताया, जिन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अत्याधुनिक तकनीकों के क्षेत्र में अग्रणी काम करने के लिए जाना जाता है।

इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के चेयरपर्सन सैम पित्रोदा और भारत से उनके साथ यात्रा कर रहे कुछ अन्य प्रमुख सहयोगियों के साथ ‘प्लग एंड प्ले’ सभागार की अग्रिम पंक्ति में बैठे, राहुल गांधी को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिग डेटा, मशीन लर्निंग और सामान्य रूप से मानव जाति पर उनके प्रभाव और शासन, सामाजिक कल्याण उपायों और फेक न्‍यूज जैसे मुद्दों के विभिन्न पहलुओं पर विशेषज्ञों की पैनल चर्चा में देखा गया।

कैलिफोर्निया में सनीवेल के आधार पर, प्लग एंड प्ले टेक सेंटर स्टार्टअप्स के सबसे बड़े इनक्यूबेटर में से एक है। इसके सीईओ और संस्थापक सईद अमिदी के अनुसार, प्लग एंड प्ले में 50 प्रतिशत से अधिक स्टार्टअप के संस्थापक भारतीय या भारतीय अमेरिकी हैं।

राहुल गांधी ने डेटा की सोने (गोल्ड) से तुलना की और कहा कि भारत जैसे देशों ने इसकी वास्तविक क्षमता का एहसास किया है। उन्होंने कहा – ‘ऐसे में डेटा सुरक्षा और सुरक्षा पर उचित नियमों की जरूरत है।’ पेगासस ‘स्पाइवेयर’ और इसी तरह की तकनीक के मुद्दे पर राहुल गांधी ने वहां मौजूद लोगों से कहा कि वह इसको लेकर चिंतित नहीं हैं।

टेस्ला इंक के सीईओ एलन मस्क फिर दुनिया के सबसे अमीर बने

हाल के महीनों में खूब चर्चा में रहे टेस्ला इंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एलन मस्क अब फिर दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बन गए हैं। मस्क ने पेरिस ट्रेडिंग में अरनॉल्ट के एलवीएमएच के शेयरों में 2.6 फीसदी की गिरावट के बाद पिछले कल बर्नार्ड अरनॉल्ट को पीछे छोड़ते हुए यह स्थान हासिल किया।

एक रिपोर्ट के मुताबिक मस्‍क ने टेस्ला के चलते एक साल में 55.3 अरब डॉलर से ज्यादा की संपत्ति अर्जित की है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अब मस्क की कुल संपत्ति 192.3 अरब डॉलर हो गई है।

इस बीच लुई वितॉ की पेरेंट कंपनी एलवीएमएच के शेयरों में अप्रैल से अब तक 10 फीसदी की गिरावट दर्ज हो चुकी है। इस कारण अरनॉल्ट की संपत्ति 186.6 अरब डॉलर रह गई और वे दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में दूसरे स्‍थान पर खिसक गए हैं।

एलवीएमएच, जिसे अरनॉल्ट ने स्थापित किया था, लुइस वुइटन, फेंडी और हेनेसी सहित ब्रांडों का मालिक हैं। अरनॉल्ट ने पहली बार दिसंबर में एलन मस्क को पीछे छोड़ दिया था। तब टेक इंडस्ट्री में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहे थे, जिससे एलन मस्क काफी प्रभावित हुए।

पहलवानों के समर्थन में आज यूपी के सोरम में सर्वखाप पंचायत

भारतीय कुश्ती संघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे पहलवानों के समर्थन में गुरुवार (आज) उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के सोरम में सर्वखाप पंचायत बुलाई गई है। पिछले 22 साल में यह दूसरी बार है जब किसी मुद्दे पर समर्थन देने के लिए सर्वखाप पंचायत बुलाई जा रही है। उधर अंतरराष्ट्रीय खेल मंचों से भी भारत के पहलवानों के साथ व्यवहार पर चिंता जताई जाने लगी है।

हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश और अन्य हिस्सों में पहलवानों को लेकर समर्थन जिस तरह बढ़ रहा है उससे लगता है कि यह राजनीतिक रूप से भी अपना प्रभाव डालेगा। देखें तो भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह, जो भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष हैं,  की गिरफ्तारी की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे पहलवानों का समर्थन बढ़ता जा रहा है।

देश के बड़े नेताओं ने भारतीय कुश्ती महासंघ के निवर्तमान अध्यक्ष बृजभूषण सिंह को  जल्द गिरफ्तार करने की मांग करते हुए पहलवानों को समर्थन दिया है। अब आज को खाप महापंचायत भी बुलाई गई है। साफ़ है कि पहलवानों की लड़ाई अब विभिन्न संगठनों की लड़ाई बनती जा रही है।

हरियाणा में खाप नेताओं ने पहले ही पहलवानों के आंदोलन का समर्थन किया हुआ है। अब सोरम की खाप पंचायत के फैसले का असर हरियाणा में भी हो सकता है। इससे पहले पहलवानों ने 30 मई को हरिद्वार पहुंचकर गंगा में अपने मेडल विसर्जित करने की चेतावनी दी थी, हालांकि किसान नेताओं के मनाने पर पहलवान मान गए थे और सरकार को उनकी मांगे मानने के लिए पांच और दिनों का समय दिया था।

आज उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और दिल्ली से विभिन्न खापों के प्रतिनिधि  खाप महापंचायत में हिस्सा लेंगे। किसान नेता नरेश टिकैत ने चेतावनी दी है कि यदि  यहां से कुछ भी माहौल खराब होता है तो सरकार और बृजभूषण की जिम्मेदारी होगी। उन्होंने कहा कि बृजभूषण सिंह भी वहां आएं और अपनी बात रखें।

उधर पहलवानों के समर्थन में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पिछले कल हाजरा मोड़ से रवींद्र सदन तक रैली निकाली। बनर्जी ने अपने हाथ में एक तख्ती ले रखी थी जिस पर लिखा था – ‘हम न्याय चाहते हैं।’ उन्होंने कहा कि हमारी एक टीम पहलवानों से मुलाकात करने जाएगी और उन्हें समर्थन देगी।

इस बीच पहलवानों के प्रदर्शन पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि निश्चित रूप से उसका समाधान निकलेगा। मामले की जांच चल रही है। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा कि पहलवान ऐसा कोई भी कदम न उठाएं जिससे खेल की महत्ता कम हो। कहा कि पहलवानों के आरोपों की जांच पूरी होने के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी।

उधर अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) ने दिल्ली पुलिस की ओर से पहलवानों के साथ किए गए व्यवहार की निंदा की है। समिति ने कहा कि भारतीय पहलवानों के साथ व्यवहार बहुत परेशान करने वाला था। आईओसी ने जोर देकर कहा – ‘पहलवानों की ओर से लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच की जानी चााहिए। हम आग्रह करते हैं कि इस कानूनी प्रक्रिया के दौरान इन एथलीटों की सुरक्षा पर उचित रूप से विचार किया जाए और ये जांच तेजी से पूरी की जाए।’

ज्ञानवापी मसजिद मामला: मस्जिद कमेटी की याचिका हाईकोर्ट में खारिज

ज्ञानवापी मस्जिद मामलें से जुड़े श्रृंगार गौरी कैसे में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को फैसला सुनाते हुए अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें मस्जिद परिसर के अंदर पूजा करने के आधिकार की मांग वाली 5 हिंदू महिलाओं के मुकदमे की सुनवाई को चुनौती दी गई थी।

बता दें, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाराणसी कोर्ट के 12 सितंबर 2022 के फैसले को कायम रखा है। हाईकोर्ट ने वाराणसी के ज्ञानवापी स्थित श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा के आधिकार मामले में दोनो पक्षों की लंबी बहस के बाद इलाहाबाद कोर्ट ने फैसले को 23 दिसंबर 2023 के लिए सुरक्षित रख लिया था। ये आदेश जस्टिस जेजे मुनीर ने अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी, वाराणसी की ओर से दाखिल पुनरिक्षण याचिका पर दिया था। 

आपको बता दें, राखी सिंह और 9 अन्य महिलाओं ने पूजा के आधिकार को लेकर वाराणसी की जिला अदालत में सिविल वाद दायर किया था। वहीं इस मुकदमे में अपनी आपत्ति खारिज होने के खिलाफ़ मस्जिद की इंतजाम कमेटी ने हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की थी। और मुस्लिम पक्ष ने दलील दी है कि 1991 के प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट तहत सिविल और 1995 के सेंट्रल वक्फ एक्ट के तहत सिविल वाद पोषणीय नहीं है। जिला जज द्वारा दिए गए इस फैसले को मस्जिद कमेटी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

खिलाड़ियों का मामला इतना गंभीर हैं, लेकिन प्रधानमंत्री चुप्पी साधे बैठे है – दीपेंद्र हुड्डा

कांग्रेस नेता दीपेंद्र हुड्डा ने पीएम मोदी पर वार कर कहा कि, “बेटियों के साथ हुए अपमान पर प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं? उनके पास इतना भी समय नहीं की देश की बेटियां जब गंगा में अपने मेडल बहाने जा रही थी तो उन्हे सांत्वना देते और रोकते कहते की जांच की जायेगी। लेकिन पीएम के पास ऐसा कहने का समय ही नही था।”

दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए दीपेंद्र हुड्डा कुश्ती प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए कहा कि,  पीएम मोदी और केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्हें अपने पदको को गंगा नदी में विसर्जित करने का निर्णय लेना पड़ा, जो उनके लिए सबसे पवित्र है। साथ ही इस पर पीएम मोदी और बीजेपी की चुप्पी पर भी सवाल उठाए।

केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि, “खेलों इंडिया का ढोल पीट रही है। लेकिन बता दें कि इनके साशनकाल में 2 ओलंपिक खेल हुए है इनमे कुल 8 मेडल आए हैं इन 8 मेडल में से 4 हरियाणा के खिलाड़ी लाए है। और 3 कुश्ती में मिले है।”

राज्यसभा सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने कहा कि, “यदि आप पिछली यूपीए के टाइम से तब से लेकर आज तक देखोगे तो कुल 17 इंडिविजुअल मेडल आए है और इनमे से 10 हरियाणा के खिलाड़ी लाए हैं।”

दीपेंद्र हुड्डा ने आगे कहा कि, “यह वो देश है जहां सभी को सम्मान मिलता है। हमारे देश में महिलाओं और बेटियों का सम्मान किया जाता है। केंद्र सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देेती हैं लेकिन बीजेपी की कथनी और करनी में फर्क है। राजधर्म में बेटियों का सम्मान किया जाता है पर बीजेपी सरकार में अपमान हो रहा है।”

हुड्डा ने कहा कि,  “हरियाणा की बेटियां भी देश की बेटियां हैं 11 मेडल हरियाणा के खिलाड़ी लेकर आए, इन्हे आगे बढ़ाने का प्रोत्साहन हमारे नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने दिया था जिसके बाद से राज्य में खेलों को लेकर रुची बढ़ी और बच्चो ने विदेश में देश का नाम रोशन किया। खेलों में सबसे बड़ा योगदान हरियाणा का हैं।”

सरकार की आलोचना करते हुए उन्होंने आगे कहा कि, वे समान नागरिक संहिता की बात करते हैं, लेकिन क्या यह बीजेपी नेताओं पर लागू नहीं होता हैं? क्या कारण है कि जिस आदमी पर सात पहलवान आरोप लगा चुके हैं, उसे पूरा सरकारी तंत्र बचा रहा है।”

उन्होंने यह भी कहा कि यदि ऐसा कांग्रेस की सरकार में होता तो होता.. 2008 के ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाले सिंह ने कहा कि, कांग्रेस मंत्री को हटा दी। पीएम और खेल मंत्री और खिलाड़ियों से बात करते। साथ ही उन्होंने लोगों व मीडिया से पहलवानों को अपना समर्थन देने की अपील की।

सिखों की मांग पर एनसीईआरटी की 12वीं कक्षा के सिलेबस में किया गया बदलाव

एनसीईआरटी ने बारहवीं कक्षा की राजनीति विज्ञान की पुस्तक में खालिस्तान, या एक अलग सिख राष्ट्र का जिक्र अब पाठ्यक्रम को पुस्तक से हटा दिया है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) व अन्य हितधारकों के एक पत्र के बाद यह फैसला लिया गया है।

शिक्षा मंत्रालय ने कहा कि, इस संबंध में शिकायत पर गौर करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया था। उनकी सिफारिश पर यह निर्णय लिया गया है राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में बदलाव के साथ सॉफ्ट कॉपी एनसीईआरटी की वेबसाइट पर अपलोड कर दी गर्इ है।

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने अपने पत्र में कहा था कि, नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग – एनसीईआरटी ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के बारे में अपनी किताब पॉलिटिक्स इन इंडिया सिंस इंडिपेंडेंस के रीजनल एस्पिरेशंस अध्याय में पंजाब उपशीर्षक के तहत भ्रामक जानकारी दर्ज की है। और इसमें कथित तौर पर सिख समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की बात कही गयी है।

आपको बता दें, यह दावा किया गया था कि 12वीं कक्षा के पाठ्यक्रम में कुछ पुरानी सूचनाओं को हटाकर और कुछ नई जानकारियों को जोड़कर सांप्रदायिक पहलू लिया गया है।

एसजीपीसी ने पत्र में कहा था कि वर्ष 2006 में कुछ बदलाव किया गया। आनंदपुर साहिब प्रस्ताव एक ऐतिहासिक दस्तावेज है, जिसमें कुछ भी गलत नहीं है। किताब में खालिस्तान को लेकर बात की गर्इ थी। इसमें आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का हवाला देकर सिख राष्ट्र और अलगाववाद की दलील बनार्इ गर्इ थी।

डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने पहलवानों के पदकों के गंगा में प्रवाहित आह्वान पर दी प्रतिक्रिया

जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन कर रहे स्टार पहलवान साक्षी मलिक, विनेश फोगाट और बजरंग पूनिया सहित देश के शीर्ष अन्य पहलवान मंगलवार को गंगा नदी में अपने पदक को विसर्जित करने सैकड़ों समर्थकों के साथ पहुंचे।

पहलवानों के इस कदम पर भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि, “दिल्ली पुलिस इस मामले में जांच कर रही हैं। हालांकि प्रदर्शनकारी पहलवानों ने खाप और किसान नेताओं के मनाने पर पदकों को गंगा में प्रवाहित नहीं किया। पहलवानों ने अपनी मांगे मानने के लिये पांच दिन का समय दिया है।“

बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि, “पहलवानों द्वारा अपनी ख्याति को पानी में फेंकने का निर्णय विशुद्ध रूप से उनके द्वारा लिया गया निर्णय था। इस मामले की दिल्ली पुलिस द्वारा जांच की जा रही है यदि आरोपों में कोई सच्चाई है तो गिरफ्तारी की जाएगी।“

बता दें, प्रदर्शन कर रहे पहलवान जैसे अपने विश्व और ओलंपिक पदक गंगा नदी में बहाने को तैयार हुए वैसे ही हर की पौड़ी पर काफी भीड़ इकट्ठा हो गर्इ और 20 मिनट तक चुपचाप वहां खड़े रहने के बाद वहां बैठे रहे। इस बीच खाप और राजनेताओं के अनुरोध के बाद करीब पौने दो घंटे यहां बिताने के बाद पहलवान वापिस लौट आये।

किसान नेता शाम सिंह मलिक और नरेश टिकैत ने मामले को सुलझाने के लिए पहलवानों से पांच दिन का समय मांगा है। पहलवान जितेंदर किन्हा ने कहा कि, खाप नेताओं ने हमारे सामने अपनी पगड़ी रख दी और कहा कि उम्मीद मत छोड़ो। पगड़ी की लाज रखो और लौट चलो।

आपको बता दें, 23 अप्रैल से भारतीय कुश्ती महासंघ के प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह को गिरफ्तार करने की मांग को लेकर आंदोलन फिर से शुरू किया था। बृजभूषण पर एक नाबालिग सहित अन्य पहलवानों के साथ कथित यौन उत्पीड़न का आरोप लगा है।