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भारत चौथी बार जूनियर एशिया कप हॉकी चैम्पियन, पाक को 2-1 को हराया

भारत चौथी बार जूनियर एशिया कप का चैंपियन बन गया है। ओमान में खेले गए फाइनल में भारत ने एक कांटे के मुकाबले में पाकिस्तान को 2-1 से हरा दिया। भारत इससे पहले पाकिस्तान के साथ 3-3 टाइटल जीतकर बराबरी पर था। जीत के बाद हॉकी इंडिया कार्यकारी बोर्ड ने खिलाड़ियों के लिए 2 लाख और सहायक स्टाफ के लिए 1 लाख के नकद पुरस्कार की घोषणा की है।  

भारतीय टीम अब जूनियर एशिया कप की सबसे सफल टीम बन गई है। अभी तक इस टूर्नामेंट के नौ सीजन हुए हैं। भारतीय टीम छठी बार फाइनल में पहुँची थी। खिताबी मुकाबले में भारत ने शुरुआत से ही अपना दबदबा कायम कर लिया था।

भारत को खेल के पहले ही मिनट में पेनल्टी कॉर्नर मिल गया। हालांकि, टीम गोल नहीं कर सकी। मैच के 13वें मिनट में अंगद बीर सिंह ने गोल कर भारत को 1-0 से आगे कर दिया। इसके दो मिनट बाद ही पाकिस्तान को मिले पेनल्टी कॉर्नर पर भारत ने गोल नहीं होने दिया।

मैच के 20वें मिनट में अरिजीत सिंह हुंडल ने गोल कर बढ़त दोगुनी कर दी। इसके बाद पहले हाफ में कोई गोल नहीं हुआ। मैच के 38वें मिनट में पाकिस्तान के बशरत अली ने गोल किया और बढ़त कम कर दी।

इसके बाद दोनों टीमें गोल नहीं कर सकीं और मुकाबला 2-1 से भारत के पक्ष में रहा। भारत ने टूर्नामेंट में कुल 50 गोल किए और सबसे ज्यादा गोल करने वाली टीम रही। हॉकी इंडिया कार्यकारी बोर्ड ने खिलाड़ियों के लिए 2 लाख और सहायक स्टाफ के लिए 1 लाख के नकद पुरस्कार की घोषणा की।

टीम को बधाई देते हुए हॉकी इंडिया के अध्यक्ष पद्मश्री दिलीप टिर्की ने कहा – ‘भारतीय  जूनियर पुरुष टीम ने जूनियर एशिया कप में अपने नाबाद प्रदर्शन से हम सभी को बेहद गौरवान्वित किया है।’ उन्होंने कहा कि सुल्तान में जोहोर कप की ऐतिहासिक जीत के बाद का दबदबा बन गया है। उन्होंने भरोसा जताया कि साल के आखिर में जूनियर विश्व कप में यह जीत भारतीय लड़कों के लिए खुराक का काम करेगी।

हेलीकॉप्टर के दरवाजे से टकराकर चोटिल हो गए राष्ट्रपति जो बाइडेन

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन कोलोराडो में वायु सेना अकादमी में आयोजित एक समारोह में मंच पर किसी वस्तु से टकराकर नीचे गिर गए। हालांकि, उन्हें इससे चोट नहीं आई। इसके बाद जब वे एयर फोर्स वन और मरीन वन से व्हाइट हाउस लौट रहे थे तब उन्हें  हेलीकॉप्टर से बाहर निकलते हुए सिर दरवाजे से टकराने के कारण उन्हें चोट लग गयी।

बाइडेन (80) समारोह में सैन्य अकादमी के स्नातकों को प्रारंभिक भाषण देने पहुंचे थे। वह लड़खड़ाकर तब नीचे गिर गए जब वे एक कैडेट से हाथ मिलाने के बाद अपनी सीट की तरफ जा रहे थे। ऐसे होते ही वायु सेना कर्मियों ने उन्हें उठने में मदद की कोशिश की हालांकि, बाइडेन खुद ही उठ गए।

उठने के बाद उन्होंने मंच पर पडी उस वास्तु की तरफ इशारा किया जिससे टकराकर वे लड़खड़ा गए थे। वह एक छोटा सैंडबैग जैसी कोइ वस्तु थी। बाद में व्हाइट हाउस के कम्युनिकेशन डाइरेक्टर बेन लाबोल्ट ने एक ट्वीट में जानकारी दी कि राष्ट्रपति ठीक हैं। बेन के मुताबिक जब वे हाथ मिला रहे थे वहां एक सैंडबैग था।

बाद में एयर फोर्स वन और मरीन वन से व्हाइट हाउस लौटते हुए, बिडेन को फिर से चोट लग गई। हेलीकॉप्टर से बाहर निकलते हुए उनका सिर दरवाजे से टकराया गया। बाइडेन राष्ट्रपति पद पर 2024 के चुनाव में दूसरा कार्यकाल पाने की कोशिश कर रहे हैं।

रिश्वत दो, नक़्शा पास

उत्तराखण्ड की तबाही की जड़ में भ्रष्टाचार

हाल के वर्षों में पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड में क़ुदरत ने बड़ी तबाही की है। जोशीमठ सबसे ताज़ा उदाहरण है, जहाँ हज़ारों मकानों में दरारें आने के बाद लोगों को सुरक्षित जगह ले जाना पड़ा है। ‘तहलका’ एसआईटी की छानबीन से ज़ाहिर होता है कि राज्य में पैसे के ज़ोर पर आपको तमाम क़ायदे-क़ानून ताक पर रख मकान या अन्य निर्माण का नक़्शा मिल जाएगा। इस भ्रष्टाचार को चिन्ताजनक मानते हुए नैनीताल, मसूरी, कर्णप्रयाग, उत्तरकाशी, गुप्तकाशी और ऋषिकेश के लोग भी अपने लिए आने वाले ख़तरे से भयभीत हैं। कुछ दलालों और अधिकारियों को रिश्वत देकर नियमों के ख़िलाफ़ वहाँ कुछ लोग अवैध निर्माण कर रहे हैं। तहलका एसआईटी की रिपोर्ट :-

‘झील विकास प्राधिकरण (एलडीए) नैनीताल के अधिकारियों की जेब गर्म कर दो और नैनीताल ज़िले में रिसॉर्ट बनाने के लिए ज़मीन से जुड़ी तमाम मंज़ूरियाँ हासिल कर लो। भले इसके लिए आप सरकार के ज़रूरी दिशा-निर्देशों का पालन कर रहे हों या नहीं।’ यह दावा है करण साह का। हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड के एक रियल एस्टेट एजेंट करण साह नैनीताल ज़िले के भवाली में काम कर रहा है।

करण ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को बताया कि उसने ख़ुद एलडीए को रिश्वत देकर पहाड़ी में एक घर के निर्माण का नक़्शा पास करवाया था। करण ने हमें एलडीए के एक अधिकारी का नंबर भी दिया और उसके मुताबिक, जिसके ज़रिये पहाड़ी में हमारे घर के नक़्शे के अनुमोदन का काम उसे तमाम उल्लंघनों के बावजूद नक़द भुगतान करके किया जा सकता है।

जोशीमठ संकट के मद्देनज़र, जहाँ कुछ महीने पहले हज़ारों घरों में दरारें आयी हैं। ‘तहलका’ रिपोर्टर ने उत्तराखण्ड के नैनीताल की यात्रा करने का फ़ैसला किया, ताकि इसका पर्दाफाश किया जा सके कि कैसे अनियोजित और अवैध निर्माण, जो विशेषज्ञ के अनुसार जोशीमठ संकट का प्रमुख कारण है; पहाड़ी राज्य में अभी भी बदस्तूर जारी है। यह सिर्फ़ जोशीमठ नहीं है, जहाँ घरों और गलियों में दरारें आ गयी हैं। विशेषज्ञ यह मानने लगे हैं कि न केवल पवित्र शहर अवैध और अनियोजित निर्माण के कारण धीरे-धीरे धँस रहा है, बल्कि नैनीताल, मसूरी, कर्णप्रयाग, उत्तरकाशी, गुप्तकाशी और ऋषिकेश भी ख़तरे में है। उत्तराखण्ड के अन्य पहाड़ी शहरों के निवासियों का भी कहना है कि वे भी इमारतों और सडक़ों में दरारों के कारण ख़तरे से घिरे हैं।

जोशीमठ की ही तरह उत्तराखण्ड के एक अन्य प्रसिद्ध पर्यटन स्थल नैनीताल भी कुछ ऐसी ही स्थिति दिख रही है। नैनीताल के माल रोड पर दरारें आना ज़िला प्रशासन के लिए ख़तरे की घंटी की तरह है। लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दरारों को भर दिया और सीमेंट लगाकर दरारों की जगह को समतल कर दिया। यह पहली बार नहीं है, जब नैनीताल के माल रोड में दरारें आयी हैं। पिछले दिनों मल्लीताल इला$के में ग्रैंड होटल के पास लोअर मॉल रोड पर कई जगह दरारें देखी गयी थीं।

पीडब्ल्यूडी ने सभी दरारों को मिट्टी और बालू से भर दिया, जो बारिश में बह गयी थी। इससे पहले भी अगस्त, 2018 में माल रोड का एक हिस्सा टूटकर झील में गिर गया था। दरार की तस्वीरें सामने आने के बाद एक बार फिर निचले माल रोड पर ख़तरा मँडराने लगा है। इसके अलावा कुछ मामूली दरारें भी देखी गयी हैं। विभाग ने इसे प्राथमिकता के आधार पर गारे, मिट्टी और बालू से भर दिया है। इस बार माल रोड पर दरारें पिछली बार से ज़्यादा लम्बी और चौड़ी हैं।

विशेषज्ञों ने 10 साल से भी पहले क्षेत्र में ज़मीन धँसने की आशंका जतायी थी। जोशीमठ शहर धँस रहा है, यह चौंकाने वाली बात नहीं; क्योंकि इसमें सुधार के लिए वहाँ कुछ नहीं किया गया। कहा जाता है कि न सिर्फ़ जोशीमठ में कई बहु-मंज़िला निर्माण हाल के वर्षों में हुए थे, बल्कि उत्तराखण्ड के सभी पहाड़ी क़स्बों में ऐसा हुआ है, जहाँ अब इमारतों और गलियों में दरारें आ रही हैं। अगस्त, 2022 में उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) की मीडिया में प्रकाशित एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, जोशीमठ की कमज़ोर ढलान की समस्या अनियोजित निर्माण के परिणामस्वरूप बदतर हो गयी है, क्योंकि इससे इसकी वहन क्षमता पर विपरीत असर पड़ा है। भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र में रिटेनिंग वॉल्स (प्रतिधारक / सुरक्षा दीवार) बनाकर कई अतिरिक्त इमारतों को खड़ा किया जा सकता है। नतीजतन, वहाँ अब कमज़ोर ढलान पर दबाव बढ़ा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि समुचित योजना के बिना बड़े पैमाने पर निर्माण परियोजनाएँ, जनसंख्या वृद्धि, पर्यटक भीड़, अवैध निर्माण और वाहनों का दबाव एक ऐसी स्थिति पैदा कर रहा है, जिससे उत्तराखण्ड में पहाड़ी शहरों को नुक़सान पहुँच रहा है।

‘तहलका’ ने उत्तर भारत के प्रसिद्ध हिल स्टेशन नैनीताल में स्थिति का जायज़ा लेने का निर्णय किया। वहाँ हर नुक्कड़ पर आपको ऐसे एजेंट मिल जाएँगे, जो दावा करते हैं कि वे नैनीताल के ज़िला स्तरीय विकास प्राधिकरण, जिसे झील विकास प्राधिकरण (एलडीए) के नाम से जाना जाता है; से तमाम ज़रूरी मंज़ूरियाँ दिलाने के बाद नैनीताल ज़िले में आपके घर या रिसॉर्ट का निर्माण करने में आपकी मदद कर सकते हैं। एलडीए अधिकारियों को कैसे रिश्वत दी जा सकती है? इसके लिए भी वे आपका ‘मार्गदर्शन’ करेंगे, जिसके बाद हम पर कोई निर्माण नियम लागू नहीं होता।

और ये सब जोशीमठ और अन्य पहाड़ी नगरों के संकट के बाद हो रहा है। इससे यह भी ज़ाहिर होता है हमने अपनी ग़लतियों से कुछ नहीं सीखा है।

इस सिलसिले में ‘तहलका’ की पहली मुलाक़ात ज़िला नैनीताल के भवाली में एक रियल एस्टेट एजेंट करण साह से हुई। करण उत्तराखण्ड के रहने वाले हैं। हमने करण से एक काल्पनिक सौदे की बात की कि हम भवाली में एक कॉटेज बनाना चाहते हैं और जोशीमठ संकट के बाद हमें एलडीए से कॉटेज निर्माण के लिए नक़्शे सहित सभी स्वीकृतियाँ चाहिए। अन्यथा यदि हम भवन निर्माण के नियमों का उल्लंघन करते हैं तो हम कठिनाई में फँस जाएँगे। इस पर करण ने भरोसा दिलाया कि रिश्वत और उसकी फीस चुकाकर एलडीए से हमारा काम करवा दिया जाएगा। इसके बाद करण ने हमें अपने जानकार एलडीए अधिकारी का नंबर दिया, जो उसके अनुसार कुछ पैसे लेकर हमारा काम कर देगा।

रिपोर्टर : अच्छा ये बता, एलडीए का नक़्शा अगर पास करवाना हो, तो ख़र्चा कितना आएगा?

करण : 1 से 1.25 लाख।

रिपोर्टर : इतना क्यूँ?

करण : आता ही है सर!

रिपोर्टर : रिश्वत कितनी होगी इसमें?

करण : रिश्वत पूछकर बताऊँगा।

रिपोर्टर : बताना, …जोशीमठ के बाद डर लगने लगा है।

करण : नहीं ऐसा नहीं है सर! …हाँ, खड़ा प्लॉट लेने में ऐसा रहता ही है।

रिपोर्टर : ये एलडीए के अंडर ही काम करते हैं?

करण : एलडीए के अंडर के ही हैं, नक़्शा पास करवा देंगे। …थोड़ा आप इनका बढिय़ा करवा देना। …ये कम में भी करवा देंगे। …इनको ख़ुश करते रहना।

करण के मुताबिक, एलडीए के अधिकारी भवन निरीक्षण के लिए आते हैं और निर्माण में किये गये सभी उल्लंघनों को नज़रअंदाज़ करके पैसा लेकर वापस चले जाते हैं। और उसके बाद पाँच महीने तक निरीक्षण के लिए नहीं लौटते हैं। करण ने कहा कि एलडीए के जिस अधिकारी का फोन नंबर उन्होंने हमें दिया है, वह सबसे भ्रष्ट व्यक्ति है। वो वह व्यक्ति है, जो एलडीए के अस्तित्व में आने से पहले ग्रामसभा के समय में बने भवन का सारा निरीक्षण करता है।

करण : आपको तो ज़्यादा पैसा लगेगा ना जाने में, इनसे डायरेक्ट करवा लीजिएगा काम…। अब जितने भी ग्राम पंचायत से बने हैं ना, ये बिल्डिंग्स का निरीक्षण ऐसे ही करते हैं। अपना पैसा लेकर चले जाते हैं, …तो 5-6 महीने तक शान्त रहता है मामला; …अब आप इनसे डायरेक्ट बात करके नक़्शा पास करवा लीजिएगा।

रिपोर्टर : अच्छा ग्राम पंचायत की जो बिल्डिंग बनी हैं। …अपार्टमेंट्स बने हैं, …उनका इंस्पेक्शन (निरीक्षण) करते हैं एलडीए वाले?

करण : हाँ, करते हैं; कुछ नहीं करते, बस पैसा लेकर चले जाते हैं।

रिपोर्टर : पैसा लेकर, मतलब रिश्वत लेकर?

करण : रिश्वत लेकर, यही तो लेकर जाते हैं ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग जी, …रिश्वत खाऊ हैं। आदमी अच्छे हैं वैसे।

रिपोर्टर : इंस्पेक्शन यही करते हैं ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग जी…?

करण : हाँ, इंस्पेक्शन यही करते हैं…।

अब करण ने हमें फिर से आश्वासन दिया कि वह एलडीए से हमारे घर के निर्माण का नक़्शा मंज़ूर करवा देगा। अपनी बात को पुख़्ता साबित करने के लिए उसने यह भी बताया कि उसने ख़ुद 1.50 लाख रुपये देकर एलडीए से एक घर का नक़्शा मंज़ूर करवाया था, जिसमें रिश्वत की रक़म भी शामिल थी।

रिपोर्टर : एलडीए से नक़्शा पास हो जाएगा?

करण : मैं करवा दूँगा, पक्का।

रिपोर्टर : रिश्वत कितनी होगी?

करण : रिश्वत वग़ैरह आप बात कर लेना।

रिपोर्टर : तूने करवाये हैं पहले?

करण : हाँ, करवाये हैं; …इनसे नहीं करवाये; जिनसे करवाये हैं, वो अब वहाँ पर हैं…ये रुद्रपुर।

रिपोर्टर : तूने करवाया है नक़्शा पास?

करण : नक़्शा करवाया है पास; जिनका करवाया था, उनके लगभग डेढ़ लगे थे (1.5 लाख)।

रिपोर्टर : रिश्वत मिलाके?

करण : सब मिलाके, …सिम्प्लेक्स बनवाया था उन्होंने।

यह पूछे जाने पर कि क्या निर्माण दिशानिर्देशों का पालन नहीं करने पर भी हमें एलडीए से अपने निर्माण की मंज़ूरी मिल जाएगी, करण ने कहा कि पैसे देने के बाद हमें तमाम मंज़ूरियाँ मिल जाएँगी। उसने हमें सीधे एलडीए अधिकारी से पैसे के बारे में बात करने को कहा, जिसका नंबर उसने हमें दिया है।

रिपोर्टर : अच्छा चाहे पूरी चीज़ें फुलफिल न होती हों, तब भी हो जाएगा?

करण : मतलब?

रिपोर्टर : जैसे एलडीए की कोई गाइडलाइंस हैं कि ये चीज़ें होनी चाहिए और वो अगर नहीं भी हों हमारे प्लॉट में तब भी नक़्शा पास कर देंगे?

करण : नहीं, ऐसा कुछ नहीं है; …तब भी कर देंगे। …उसमें सर ऐसा करवा देंगे, …ये ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग जी। करवा देंगे आपका सारा काम।

रिपोर्टर : ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग जी, …इनको कितना पैसा देना पड़ेगा?

करण : मैं इनको बोल दूँगा, आप बात कर लेना; करवा देंगे। क्या पता 1 लाख से कम में ही करवा दे!

रिपोर्टर : 50के – 1 लाख में? (50,000 से 1,00,000 में)

करण : हाँ, …एक बार आप बात कर लेना; …आपको ख़ुश कर दूँगा, ऐसे करके बात कर लेना।

रिपोर्टर : मैं डायरेक्ट बोल दूँ?

करण : बोल दो, अभी पहले प्लॉट की बात कर लो।

ऐसा लगता है कि जोशीमठ संकट ने उत्तराखण्ड में बेईमान सम्पत्ति एजेंटों पर बहुत कम प्रभाव डाला है। वे अपने ग्राहकों को अनियोजित और अवैध निर्माण के विभिन्न सौदे इस वादे के साथ बाज़ार में दे रहे हैं कि वे एलडीए से हमारे लिए निर्माण का सौदा करवाएँगे।

‘तहलका’ की मुलाक़ात नैनीताल ज़िले के भवाली में एक अन्य रियल एस्टेट एजेंट मोहम्मद ओसामा उर्फ़ चिराग़ से हुई। ओसामा उत्तराखण्ड की एक प्रतिष्ठित निर्माण कम्पनी के साथ बिक्री प्रमुख के रूप में काम कर रहा है। ओसामा को भी हमने एक काल्पनिक सौदा दिया और कहा कि हम नैनीताल में ज़मीन ख़रीदकर इस मशहूर पर्यटन स्थल में एक कॉटेज का निर्माण करना चाहते हैं। हमने एलडीए से निर्माण नक़्शे पास करवाने सहित सभी अनुमोदनों में उसकी मदद माँगी। ओसामा ने हमारी माँग मान ली और हमें बताया कि सभी अनुमोदन के लिए हमें रिश्वत के रूप में कितनी राशि देनी होगी।

रिपोर्टर : और एलडीए से नक़्शा पास?

ओसामा : सारी चीज़ करवा दूँगा।

रिपोर्टर : एलडीए से करवा दोगे नक़्शा पास, कितना ख़र्चा आ जाएगा उसमें?

ओसामा : फॉर एग्जांपल मानकर चलिए 1 लाख रुपये के आस-पास।

रिपोर्टर : उसमें क्या-क्या होगा?

ओसामा : ये मैं लमसम बता रहा हूँ।

रिपोर्टर : मतलब 1-1.25 लाख का रिश्वत होगी?

ओसामा : हाँ, मतलब ये आपका जाएगा पैसा।

रिपोर्टर : मतलब रिश्वत के होंगे ना?

ओसामा : हाँ, अगर जल्दी काम करवाना है।

रिपोर्टर : ये फीस है एलडीए की, या रिश्वत है?

ओसामा : रिश्वत है…। आपका कम भी हो सकती है, 50-60 हज़ार में भी काम हो सकता है।

इसके बाद ओसामा ने एक रियल एस्टेट एजेंट के रूप में अपनी उपलब्धियों का बखान किया, दुर्भाग्य से जिन्होंने उत्तराखण्ड के भीमताल में कई ज़िन्दगियों को ख़तरे में डाला होगा। उसने ख़ुलासा किया कि कैसे घूस देकर उसने एलडीए अधिकारी से एक ऐसी जगह पर आवासीय निर्माण की मंज़ूरी हासिल कर ली, जिसके ऊपर से हाईटेंशन बिजली के तार गुज़र रहे थे। उसने बताया कि उसने ढाई साल पहले एलडीए अधिकारियों को 1.20 लाख रुपये रिश्वत देकर यह डील करवायी थी। ओसामा ने ज़ोर देकर कहा कि ऐसी जगह की मंज़ूरी लगभग नामुमकिन है; लेकिन उसने फिर भी यह करवा दिया।

रिपोर्टर : आपने कराये हैं ऐसे नक़्शे पास?

ओसामा : हाँ, बहुत करवाये हैं; भीमताल में हाई टेंशन वायर जाती है ना, वो वाले भी हमने करवाये हैं।

रिपोर्टर : एलडीए से?

ओसामा : एलडीए से।

रिपोर्टर : होता नहीं है वैसे?

ओसामा : होता नहीं है; …जुगाड़ की बात है; टाइम-टाइम की बात है।

रिपोर्टर : अभी है बंदा आपका एलडीए में, …हो जाएगा सारा काम?

ओसामा : हो जाएगा।

रिपोर्टर : और कितनी रिश्वत गयी भीमताल में?

ओसामा : सर! हमने उसको दिये 1 लाख 20,000 (1.20 लाख।

रिपोर्टर : पूरे रिश्वत के?

ओसामा : पूरे रिश्वत के।

रिपोर्टर : और अगर हाईटेंशन वायर गिर गया उस पर, …फिर?

ओसामा : अब देखिए, उसने कर भी दिया काम हमारा। …बस ये है हो जाएगा, उस काम में कोई टेंशन नहीं है; 2.5 साल हो गये।

ओसामा को इस बात का कोई अफ़सोस नहीं है कि उसने इतने लोगों की जान ख़तरे में डाली है। इसके उलट उसने कहा कि इस तरह की मंज़ूरियाँ लेते हुए उसे 2.5 साल हो गये हैं, और इस दौरान कभी कुछ अप्रत्याशित नहीं हुआ है। ओसामा जैसे लोग भविष्य की बड़ी त्रासदियों की नींव रखते हैं। और उसने अपने क़ुबूलनामे में भीमताल में ऐसी ही एक नींव रखी है। लेकिन कौन जानता है कि जोशीमठ और उत्तराखण्ड के अन्य पहाड़ी क़स्बों का ओसामा कौन है? जहाँ इमारतें और सडक़ें दरारें दिखा रही हैं?

ओसामा ने ‘तहलका’ के सामने जो दूसरी स्वीकारोक्ति की, वह यह कि नैनीताल ज़िले में ऐसी कई इमारतें हैं, जिन्हें किसी प्राधिकरण की मंज़ूरी ही नहीं है; न ग्राम सभा की, न एलडीए की। ओसामा के अनुसार, ज़्यादातर दिल्ली के बाटला हाउस इला$के के लोगों ने इन पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण किया है और इसके लिए प्राधिकरण की कोई मंज़ूरी भी नहीं है। इन लोगों ने ग्राम प्रधानों को रिश्वत देकर भवनों का निर्माण कराया है। इसलिए अवैध निर्माण के ख़िलाफ़ किसी ओर से कोई विरोध नहीं हुआ। निर्माण स्थल पर ग्रामीणों को काम मिला और ग्राम प्रधान को पैसा। ओसामा ने कहा कि इससे सबने इस मामले पर आँखें मूँद लीं।

रिपोर्टर : ये एलडीए 19-20 में आया है, …तो 19 और 20 से पहले; जो ग्रामसभा के थ्रू बन गयी हैं, वो ठीक है?

ओसामा : ठीक हैं, बहुत-सी ऐसी सोसायटी हैं, जिन्होंने ग्रामसभा से भी नक़्शा नहीं पास करवाया।

रिपोर्टर : अच्छा, मतलब ग्रामसभा से भी नक़्शा पास नहीं है?

ओसामा : हाँ, मतलब आपका प्रॉपर एग्रीमेंट होना चाहिए, मोहर लगी हो, ङ्गङ्गङ्गङ्ग वैली का तो में सारा भेज दूँगा, …इसका नहीं है।

रिपोर्टर : मतलब ये ग्राम सभा से भी अप्रूव्ड नहीं है। ये मतलब किसी से भी अप्रूव्ड नहीं है, ये मतलब टोटली इल्लीगल (अवैध) हो गयी?

ओसामा : मतलब, आप ये मानकर चलिए कि आप सेफ नहीं हैं।

रिपोर्टर : अगर ये ग्रामसभा से भी अप्रूव नहीं है, तो बन कैसे गयी?

ओसामा : सर! यहाँ पर क्या है, ज़्यादातर बिल्डर बाटला हाउस के हैं।

रिपोर्टर : दिल्ली के?

ओसामा : हाँ, दिल्ली के; ज़मीन ले ली, 4-5 पार्टनर हुए मिलकर बना ली; …पहले कोई पूछता ही नहीं था, पहाड़ों पर कौन आता था; …बनाकर बेच दिया।

रिपोर्टर : ग्रामसभा के लोग ऑब्जेक्शन नहीं करते थे?

ओसामा : कोई भी नहीं करता था, उन्हें क्या है; उन्हें रोज़गार मिलता था।

रिपोर्टर : ग्रामसभा वालों को?

ओसामा : जैसे गाँव वाले होते थे, उन्हें रोज़गार मिल जाता था।

रिपोर्टर : ग्राम प्रधान को तो रोज़गार नहीं मिल रहा था।

ओसामा : पैसे दे दिये ग्राम प्रधान को, …काम स्टार्ट कर दिया, …उसे पैसे से मतलब था; काम स्टार्ट।

रिपोर्टर : ऐसी तो बहुत बिल्डिंग होंगी?

ओसामा : बहुत हैं।

रिपोर्टर : ग्रामसभा से भी अप्रूव नहीं थी?

कुछ रियल एस्टेट एजेंट पहाडिय़ों में कैसे काम कर रहे हैं। इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि ओसामा ने हमें ख़रीद के लिए एक पेंटहाउस (ओसारा) दिखाया। हमारे पेंटहाउस देखने के 10 मिनट बाद ओसामा ने अपना मन बदल लिया और उसने ख़ुलासा किया कि यह पेंटहाउस अवैध निर्माण है। ज़रा कल्पना कीजिए, ओसामा हमें अवैध रूप से बना पेंटहाउस बेच रहा था। कौन जानता है, कितनी अन्य अवैध रूप से निर्मित इकाइयों को उसने अन्य ग्राहकों को बेचा होगा?

रिपोर्टर : कुछ सोसायटी ऐसी हैं, जो ग्रामसभा से भी अप्रूव नहीं हैं?

ओसामा : ये जो सामने फ्लैट बना हुआ है, ये 2010 से पहले का है।

रिपोर्टर : जो पेंटहाउस आप मुझे दिखाने ले गये थे, …अरे बाप रे! तो ये तो फिर इल्लीगल है, …मुझे क्यूँ बिकवा रहे थे आप इल्लीगल?

ओसामा : मैंने सोचा आप लेना चाह रहे हो।

रिपोर्टर : अरे नहीं भाई! क्यूँ फँसा रहे हो?

ओसामा के बाद ‘तहलका’ ने नैनीताल ज़िले के भवाली में एक और रियल एस्टेट एजेंट संजय पाठक से मुलाक़ात की। संजय दिल्ली स्थित एक रियल एस्टेट फर्म में महाप्रबंधक के रूप में काम कर रहा है, जो नैनीताल सहित उत्तर भारत के विभिन्न हिल स्टेशनों में कई रिसॉर्ट चला रहा है। संजय को भी हमने वही काल्पनिक सौदा दिया कि हम नैनीताल में एक कॉटेज ख़रीदना चाहते हैं; लेकिन एलडीए से पूरी मंज़ूरी के साथ। क्योंकि जोशीमठ के संकट के बाद प्रशासन नियम तोडऩे वालों के ख़िलाफ़ स$ख्ती कर रहा है। संजय ने हमें अपने नैनीताल रिसॉर्ट में 100 वर्ग ग़ज का प्लॉट इस आश्वासन के साथ देने की पेशकश की कि वह एलडीए से कॉटेज के निर्माण के लिए सभी ज़रूरी मंज़ूरियाँ हासिल कर लेगा। उसने हमें यह भी बताया कि सभी अनुमोदनों के लिए हमें कितनी रिश्वत देनी होगी, जो 2.50 लाख रुपये से लेकर 3 लाख रुपये तक है। उसने कहा कि अगर बिल्डर सामने आता है, तो वही राशि 3.50 लाख से 4 लाख रुपये हो जाती है। संजय ने कहा कि चूँकि यह एक व्यक्तिगत स्वीकृति होगी, इसलिए राशि कम होगी।

रिपोर्टर : अच्छा ये बताएँ, एलडीए से हम जो नक़्शा अप्रूव करवाएँगे, उसका कितना ख़र्चा आएगा?

संजय : उसमें कम-से-कम 2.5 से 3 लाख आएगा।

रिपोर्टर : 2.5 से 3 लाख, इतना क्यों सर?

संजय : नक़्शा अप्रूव करते हैं। विजिट करते हैं। कुछ रिसीप्ट्स काटते हैं। कुछ अंडर द टेबल लेते हैं…। ये तो आपका इंडिपेंडेंट होगा। इसलिए 2.5 से 3 लाख लगेगा। हमसे 3.50 से 4 लाख तक ले लेते हैं; क्योंकि बिल्डर का एक स्टैम्प आ जाता है न…।

रिपोर्टर : 3.5 से 4 लाख तक लेते हैं एलडीए के लोग, …तो किस बात का? …फीस तो उनकी कम होगी?

संजय : वो तो ठीक है सर! लेकिन ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग को भी जाता है ना सर! ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग है…; हाहाहा…।

रिपोर्टर : मतलब रिश्वत जाती है?

संजय : खुली है यहाँ पे, …ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग के टाइम पर थोड़ा डर था लोगों को कि कभी भी एंटी करप्शन में आ सकता है। यहाँ पर तो रजिस्ट्रेशन के लिए जो बैठी है लेडी (महिला), या जो बैठा है, वो बोलता है। ऊपर ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग की फोटो लगी हुई है; बोलता है कि वहाँ तक फाइल भेजूँगा।

रिपोर्टर : कहाँ तक जाता है ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग जी तक?

संजय : सभी करप्ट हैं।

रिपोर्टर : अच्छा।

संजय : कोई दूध का धुला थोड़ी है, …वो तो किसी तरह से मैनेज करके रखे गये हैं, जबकि वो डिजर्व नहीं करते।

रिपोर्टर : रजिस्ट्रार कौन है अभी एलडीए का?

संजय : एलडीए का रजिस्ट्रार तो मुझे पता लगाना पड़ेगा।

रिपोर्टर : तो नक़्शा तो आप अप्रूव करवा देंगे, ऐसा तो नहीं कि ‘इफ एंड बट’ करेंगे एलडीए के लोग?

संजय : बिलकुल भी नहीं।

जब संजय से पूछा गया कि 2.50-3 लाख रुपये में से रिश्वत की रक़म कितनी होगी? संजय ने कहा कि वह एलडीए के अधिकारियों की हमारे साथ मेज पर बातचीत करवा देगा। हम उनसे सीधे बात कर सकते हैं।

रिपोर्टर : 2.5 से 3 लाख बता रहे हैं आप; उसमें रिश्वत का कितना होगा?

संजय : अब सर! आपको आमने-सामने बैठा दूँगा, आप ख़ुद बात कर लीजिएगा।

रिपोर्टर : हाँ, ये ठीक है; कुछ कम हो जाए।

संजय ने अब क़ुबूल किया कि उसने एलडीए से अपने नैनीताल रिसॉर्ट के विभिन्न कॉटेज और अपार्टमेंट के निर्माण का नक़्शा मंज़ूर कराया था। उसने कहा कि निर्माण के सभी नियमों का पालन करने के बावजूद एलडीए के अधिकारी पैसा लेंगे। अधिकारियों के लिए इंस्पेक्शन करना जेब भरने का ज़रिया भर है। संजय ने दावा किया कि यह उनका मानक बन गया है।

रिपोर्टर : तो यहाँ करा चुके हैं आप, एलडीए से अप्रूव?

संजय : ये एक, ऊपर के दो; …कॉर्नर में जो कॉटेज बन रहा है तीन, पीछे जो अपार्टमेंट बन रहा है चार, …ऐसे हैं बहुत सारे; …चल ही रहा है काम।

रिपोर्टर : ये सब एलडीए से अप्रूव है?

संजय : सारा, सारा; …मैंने एलडीए की कॉपी भी भेजी थी।

रिपोर्टर : अच्छा नॉर्मल वे में वो करते नहीं होंगे?

संजय : सर! उनको आपकी रजिस्ट्री चाहिए, नक़्शा चाहिए, आपके पैन और आधार चाहिए।

रिपोर्टर : नहीं, …आपके सारे डाक्यूमेंट्स ओके हैं; …तब भी वो रिश्वत लेंगे?

संजय : कुछ-न-कुछ पोर्शन तो लेंगे…।

रिपोर्टर : बिना उसके नहीं करेंगे?

संजय : वो तो सर! एक स्टैंडर्ड है। …आप आमने-सामने बैठ लो; …सब करवा दूँगा। क्योंकि हमारा एक इंजीनियर ही करवाता है। …ही विल वर्क आउट; …मैं सर सामने इसलिए नहीं आता कि मेरे पॉलिटिकल कनेक्शन बहुत हैं। …मुझे फिर हर जगह काम करना है; …तो स्टेट गवर्नमेंट्स (राज्य सरकारें) हर जगह अलग-अलग हैं।

संजय ने हमें आश्वासन दिया कि चूँकि एलडीए अधिकारी हमसे पैसे लेगा, वे (अधिकारी) हमारे द्वारा नैनीताल में हमारे कॉटेज के निर्माण में किये गये सभी उल्लंघनों की ओर आँखें मूँद लेंगे।

संजय : जब आप प्लॉट लेंगे, तब तक मैं सर इसमें रिटेनिंग वॉल लगवा दूँगा। प्लॉट ऐसा कर दूँगा कि वो आ कर देखेंगे, उनको तो बस प्लॉट तैयार दिखना चाहिए।

रिपोर्टर : फिर चाहे उसमें कोई भी कमी हो, वो मना नहीं करेंगे?

संजय : कमी? पैसा ले रहे हैं, तो किस बात की कमी!

रिपोर्टर : हाँ, पैसा ले रहे हैं…।

उत्तराखण्ड की 2013 की त्रासदी आज भी हमारी स्मृति में ताज़ा है; जब केदारनाथ, रामबाड़ा और गौरीकुंड में अचानक आयी बाढ़ ने बस्तियों को मिटा दिया और ज़िन्दगियों को तबाह कर दिया। इस त्रासदी ने 5,700 से ज़्यादा लोगों की ज़िन्दगी लील ली थी। आज दुनिया जोशीमठ में इसका दोहराव देख रही है, जहाँ इस साल जनवरी में कुल 561 प्रतिष्ठान ज़मीन दरकने से तहस-नहस हो गये और अब यह इलाक़ा संकट में घिरा है। दूसरे पहाड़ी शहरों में भी घरों और सडक़ों में भी दरारें आ गयी हैं।

ऐसा लगता है कि हमने 2013 की त्रासदी से कोई सबक़ नहीं सीखा और न ही जोशीमठ से संकट ने हमें समझदार बनाया है। जैसा कि विशेषज्ञ कहते हैं कि अनियोजित, अवैध और भारी निर्माण सभी प्राकृतिक आपदाओं के बड़े कारणों में एक है, जो पहाड़ी राज्य में अब तक देखा गया है।

‘तहलका’ की रिपोर्ट ने यह ख़ुलासा करती है कि कैसे उत्तराखण्ड के नगरों में अब भी भू-माफ़िया की मदद से अवैध और अनियोजित निर्माण जारी हैं, जो प्रशासन और मालिकों के बीच बिचौलियों के रूप में काम कर रहे हैं और तमाम नियमों की धज्जियाँ उड़ाकर प्रलोभन के बदले लोगों की निर्माण नक़्शे और अन्य मंज़ूरियाँ दिलाने में मदद कर रहे हैं।

भ्रष्ट तंत्र से हारता जोशीमठ

‘तहलका’ के जनवरी के अंक में प्रकाशित रिपोर्ट ‘क्या इतिहास बन जाएगा जोशीमठ?’ ने यह उजागर किया था कि कैसे अधिकारियों ने जोशीमठ के गम्भीर संकट में घिरने के शुरुआती चेतावनी संकेतों को नज़रअंदाज़ किया था। इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर की प्रारम्भिक रिपोर्ट में पहले ही कहा गया था कि पूरा जोशीमठ शहर धँस सकता है; जिसे हिमालय में धार्मिक स्थलों का प्रवेश द्वार माना जाता है, जिसका चीन सीमा के पास होने और वहाँ सेना छावनी होने के कारण बड़ा सामरिक महत्त्व है। इसरो की उपग्रह तस्वीरों से ज़ाहिर होता है कि जनवरी, 2023 में भूमि कटाव की एक संभावित घटना के कारण हिमालयी शहर जोशीमठ सिर्फ़ एक पखवाड़े में 5.4 सेंटीमीटर, जबकि अप्रैल और नवंबर, 2022 के बीच 8.9 सेंटीमीटर तक धँस गया था। कई घरों, सडक़ों और दीवारों में दरारें पड़ गयी थीं।

इस अंक में ‘तहलका’ एसआईटी ने इस मामले की आगे जाँच की, क्योंकि ऐसी ख़बरें आ रही थीं कि शंकराचार्य मठ में दरारें पड़ गयी हैं। इसी के साथ जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति ने अपने आन्दोलन को तेज़ करने की धमकी दी, जबकि प्रसिद्ध भू-विज्ञानी नवीन जुयाल ने आशंका ज़ाहिर की थी कि यदि निर्माणाधीन तपोवन-विष्णुगढ़ जलविद्युत और हेलंग बाईपास परियोजनाओं को नहीं रोका गया, तो उत्तराखण्ड का ऐतिहासिक शहर जोशीमठ धँस जाएगा।

‘तहलका’ एसआईटी का मक़सद यह उजागर करना है कि कैसे उत्तराखण्ड के पहाड़ी शहरों में भू-माफ़िया की मदद से अवैध और अनियोजित निर्माण अभी तक चल रहे हैं, जो रिश्वत के बदले भू-स्वामियों और अधिकारियों के लिए मध्यस्थ के रूप में कार्य कर रहे हैं।

इस अंक में हमारी कवर स्टोरी ‘रिश्वत दो, नक्शा पास’ ख़ुलासा करती है कि कैसे जोशीमठ और उसके आसपास अभी तक बेतरतीब निर्माण चल रहा है और उत्तराखण्ड के पहाड़ी शहरों में संभावित सम्पत्ति ख़रीदारों के लिए कुछ भ्रष्ट अधिकारियों के कारण भवन उप नियमों को ताक पर रखना मामूली बात है। ‘तहलका’ एसआईटी ने रियल एस्टेट एजेंटों की बातचीत कैमरे में रिकॉर्ड कि जो यह कह रहे हैं कि ‘बस अधिकारियों को रिश्वत दें और रिसॉर्ट, घर या किसी अन्य परियोजना के निर्माण के लिए तमाम मंज़ूरियाँ हाथों-हाथ हासिल करें।’

‘तहलका’ एसआईटी ने पाया कि नियमों का यह उल्लंघन न सिर्फ़ इस पवित्र शहर तक सीमित है, बल्कि नैनीताल, मसूरी, कर्णप्रयाग, उत्तरकाशी, गुप्तकाशी और ऋषिकेश जैसे अन्य पहाड़ी शहरों के निवासियों में भी इस स्थिति को लेकर भय पसरा है; क्योंकि वहाँ भी इमारतों और सडक़ों में दरारें दिखायी देने लगी हैं। उत्तराखण्ड के मशहूर पर्यटन स्थल नैनीताल का हाल भी जोशीमठ जैसा ही दिख रहा है, क्योंकि वहाँ माल रोड पर भी दरारें आ गयी हैं।

जाँच के हिस्से के रूप में ‘तहलका’ ने कई रियल एस्टेट एजेंटों से मुलाकात की और उन्हें कॉटेज, रिसॉट्र्स और अन्य परियोजनाओं के निर्माण की मंज़ूरियाँ बिना किसी परेशानी के करवाने के बदले फ़र्ज़ी सौदों की पेशकश की। एजेंटों ने न केवल ‘तहलका’ रिपोर्टर को (कैमरे पर रिकॉर्ड) आश्वासन दिया कि वे एलडीए से सभी काम करवाएँगे, बल्कि उन्होंने उन अधिकारियों के सम्पर्क नंबर भी साझा किये, जो हमारे काम करवा सकते हैं। इसमें रिश्वत के बदले में नक़्शे की योजनाओं की स्वीकृति और भवन निरीक्षण शामिल हैं। इन एजेंटों ने रिश्वत के एवज़ में एक ऐसी जगह पर आवासीय निर्माण के लिए प्रशासनिक अनुमति का भरोसा दिलाया, जहाँ हाई टेंशन बिजली लाइनें ऊपर से गुज़र रही थीं। एजेंटों ने ख़ुलासा किया कि राष्ट्रीय राजधानी के ताक़तवर लोगों और बिल्डरों के स्वामित्व वाली कई ऐसी इमारतें हैं, जो बिना प्राधिकरण के अनुमोदन के बनायी गयी थीं। क्या इस अँधेरगर्दी को देखने वाला कोई है?

विश्व दुग्ध दिवस पर विशेष

दूध के नाम पर बिक रहा ज़हर

स्तनधारियों में जन्म के समय हर बच्चे का आहार दूध ही होता है। इंसानों में बुढ़ापे तक सेहत के लिए दूध एक उपयोगी तरल माना गया है। दूध के महत्त्व और इसके फ़ायदों के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से हर साल 01 जून को विश्व दुग्ध दिवस और हर साल 26 नवंबर को राष्ट्रीय दुग्ध दिवस मनाया जाता है।

26 नवंबर को श्वेत क्रान्ति के जनक कहे जाने वाले डॉ. वर्गीज कुरियन की जयंती होती है, जबकि 01 जून, 2001 को स्थापना खाद्य और कृषि संगठन द्वारा विश्व दुग्ध दिवस मनाने की शुरुआत की गयी थी। इस साल यानी 2023 की विश्व दुग्ध दिवस पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की थीम ‘हेल्थ फॉर ऑल’ है। साल 2022 में विश्व दुग्ध दिवस पर डब्ल्यूएचओ की थीम ‘जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को डेयरी क्षेत्र में कम करना’ थी, जिसका मुख्य लक्ष्य ‘डेयरी नेट जीरो’ को पूरा करना था।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूग्ध उत्पादक देश है। इसके बाद भी यहाँ मिलावटी और नक़ली दूध की भरमार है। पूरी दुनिया का 23 से 24 प्रतिशत दूध भारत में पैदा होता है। वित्त वर्ष 1950-51 में भारत में 17 मीट्रिक टन दूध होता था, जो वित्त वर्ष 2020-21 में बढक़र 209.96 मीट्रिक टन हो चुका था। दुग्ध उत्पादन में सबसे बड़ी बाधा पशुओं को होने वाले रोग हैं। पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनएडीसीपी) के तहत एफएमडी और ब्रूसेलोसिस के ख़िलाफ़ जनवरी, 2023 तक भारत के 20.77 करोड़ पशुओं का टीकाकरण हो चुका था। भारत में दुग्ध उत्पादन श्वेत क्रान्ति के बाद तेज़ी से बढ़ा। सन् 1970 में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) ने ऑपरेशन फ्लड के ज़रिये ग्रामीण विकास कार्यक्रम शुरू किया, जिसका काफ़ी असर हुआ। फरवरी, 2014 के बाद से दुनिया भर में केंद्र सरकार ने ‘राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम (एनपीडीडी)’ नामक केंद्रीय योजना का क्रियान्वयन किया। इसमें जुलाई, 2021 में इस योजना को संशोधित किया गया था, जिसे 1790 करोड़ रुपये के बजट से वित्त वर्ष 2021-22 से वित्त वर्ष 2025-26 में कार्यान्वित किया जाएगा। पशुपालन अवसंरचना विकास कोष के तहत कुल 213 परियोजनाएँ स्थापित की गयी हैं।

भारत में वित्त वर्ष 2021-22 में कुल दुग्ध उत्पादन 5.29 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 221.06 मिलियन टन पर पहुँच गया था। इसमें राजस्थान 15.05 प्रतिशत दुग्ध उत्पादन के साथ सबसे आगे है। इसके बाद दूसरे स्थान पर 14.93 प्रतिशत दुग्ध उत्पादन के साथ उत्तर प्रदेश दूसरे, 8.06 प्रतिशत दुग्ध उत्पादन के साथ मध्य प्रदेश तीसरे और 7.56 प्रतिशत दुग्ध उत्पादन के साथ गुजरात चौथे स्थान पर है।

इतना दूध भारत में भले ही होता है; लेकिन दुग्ध उत्पादों को बनाने और 140 करोड़ से ज़्यादा आबादी की पूर्ति के लिए अभी बहुत कम है। भारत में बराबरी का बँटवारा करने पर हर इंसान के हिस्से में एक दिन में महज़ 394 ग्राम ही दूध आएगा। लेकिन इसमें भी असमानता का पैमाना बहुत बड़ा है। क़रीब 40 प्रतिशत आबादी को यहाँ दूध पीने को नहीं मिलता है। सन् 2021 की अपेक्षा सन् 2022 में भारत का दुग्ध उत्पादन तीन प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है, जिसका आकलन अभी तक नहीं किया गया है कि कितना दूध 2022 में भारत में उत्पादन हुआ। लेकिन एफएएस ने 2022 में भारत में दूध की खपत का अनुमान 6,94,000 मीट्रिक टन होने का लगाया है, जो यूएसडीए के 2021 के पहले के आधिकारिक अनुमान 6,80,000 मीट्रिक टन से 2.5 प्रतिशत ज़्यादा है। यह खपत दुग्ध उत्पादन से क़रीब तीन गुनी ज़्यादा है। इसका मतलब देश में दो-तिहाई दूध नक़ली और मिलावटी है। यानी दो-तिहाई लोग दूध नहीं, बल्कि ज़हर पी रहे हैं। आज देश का कोई ऐसा शहर नहीं है, जहाँ मिलावटी या नक़ली दूध न बिकता हो।

सिंथेटिक दूध का निर्माण ग्लूकोज, यूरिया, रिफाइंड तेल, दूध पाउडर, केमिकल और पानी मिलाकर बनाया जाता है। इसमें हाइड्रोजन पेरोक्साइड सहित अन्य रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। दूध के अलावा सिंथेटिक पनीर, सिंथेटिक मक्खन, सिंथेटिक घी, सिंथेटिक, छाछ, सिंथेटिक दही, सिंथेटिक खोया, सिंथेटिक आइसक्रीम आदि की भी धड़ल्ले से बिक्री हो रही है। बड़े शहरों के आसपास के इलाक़ों में दूध के ये नक़ली उत्पाद सबसे ज़्यादा बिकते हैं। ये कारोबार सरकारों और भारतीय खाद्य निगम की लापरवाही से तो फल-फूल ही रहा है, स्थानीय प्रशासन और पुलिस की मिलीभगत से भी फल-फूल रहा है। बिना गाय-भैंस पाले, बिना चारे आदि का ख़र्चा किये महज़ 10 मिनट में नक़ली और मिलावटी दूध बनाने वाले गाय-भैंस पालने वालों से 10 गुना ज़्यादा मुनाफ़ा कमाते हैं। यही वजह है कि मिलावटी और नक़ली दूध बनाने वालों की संख्या देश में तेज़ी से बढ़ रही है।

नक़ली दूध या तो अधिक सफ़ेद या अधिक पीला होता है। हथेली पर रगडऩे पर इसमें झाग नहीं होते और अधिक क्षारीय, अधिक फैट वाला, सॉलिड फैट वाला होता है। हल्का-सा गर्म करने पर इसमें रिफाइंड की पीली बूँदें उभर आती हैं, जबकि असली दूध को काफ़ी गर्म करने पर घी की सफ़ेद बूँदे दिखती हैं।

हाल ही में भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने नक़ली दुग्ध और दुग्ध उत्पादों पर सख़्त कार्रवाई करने का मन बनाया है। एफएसएसएआई इसके लिए देशव्यापी अभियान शुरू करेगा। इसकी मुख्य वजह नक़ली और मिलावटी दूध से लोगों की ख़राब होती सेहत है। बता दें सिंथेटिक दूध से किडनी, लीवर सम्बन्धी बीमारियों के अलावा शरीर में अन्य कई बीमारियाँ लग सकती हैं, क्योंकि यह दूध शरीर में टॉक्सिन की मात्रा बढ़ा देता है। नक़ली दूध के अलावा देश में डेयरी फार्मों में गायों और भैंसों से दूध लेने के लिए ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाया जाता है, जो सेहत के लिए बहुत ही घातक है। यह इंजेक्शन शरीर को फुलाने और कोशिकाओं में कैंसर पैदा करने तक की ताक़त रखता है।

नक़ली और मिलावटी दूध की सप्लाई रोकना आसान नहीं है; लेकिन अगर प्रयास किये जाएँ, तो इसे दो-चार साल में पूरी तरह बन्द कराया जा सकता है। लेकिन इसके लिए देश और राज्य की सरकारों, भारतीय खाद्य निगम, भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, राज्य खाद्य निगमों, पुलिस और हर ज़िला प्रशासन को सख्ती से पेश आना होगा।

हर साल होली और दीपावली पर हज़ारों टन नक़ली खोया और नक़ली पनीर पकड़ा जाता है। लेकिन इसकी कालाबाज़ारी कम होने के बजाय लगातार बढ़ रही है। इसे ध्यान में रखते हुए नक़ली दूध और नक़ली दुग्ध उत्पादकों के ख़िलाफ़ और सख्ती से पेश आने की ज़रूरत है, तभी विश्व दुग्ध दिवस की इस साल की थीम ‘हेल्थ फॉर ऑल’ का सपना साकार हो सकेगा। 

सेंगोल की राजनीति और विपक्षी ध्रुवीकरण

PM bows as a mark of respect before the ‘Sengol’ during the ceremony to mark the beginning of the inauguration of the new Parliament building, in New Delhi on May 28, 2023.

मध्यावधि चुनाव, पाक अधिकृत कश्मीर पर हमला करके उसे अपने साथ मिलाना, संसद की सीटों का परिसीमन कर हिन्दी पट्टी में ज़्यादा सीटों को बढ़ाना जैसी कुछ बड़ी संभावनाएँ हैं, जो देश में चुनाव पर नज़र रखने वाले लोगों के बीच चर्चा है कि भाजपा कर सकती है। संसद के नये भवन को जिस तरह सरकार (भाजपा, एनडीए) ने देश की अस्मिता से जोडऩे और सेंगोल की स्थापना के ज़रिये दक्षिण के राज्य तमिलनाड को साधने की कोशिश की, उससे कई कयास लग रहे हैं।

इन्हीं कयासों के बीच कांग्रेस (यूपीए) और विपक्ष के अन्य दल, जिनमें ज़्यादातर क्षेत्रीय हैं; एक-दूसरे की ढाल बनकर 2024 के आम चुनाव में अपनी जीत की तस्वीर देख रहे हैं। हालाँकि यह क्षेत्रीय दल इस बात से भी भयभीत हैं कि कांग्रेस कहीं राज्यों में उनके वोट बैंक को वापस अपने पाले में न कर ले। लेकिन एक बात साफ़ है कि इस समय भाजपा और विपक्षी दलों के बीच गहरी खाई बन गयी है, जो संसद के नये भवन के उद्घाटन में उनके साझे बायकॉट से ज़ाहिर होती है। क्या यह विरोध 2024 के चुनाव में विपक्षी एकता के रूप में भी सामने आएगा, अभी कहना मुश्किल है।

भाजपा को भय है कि वह आने वाले आम चुनाव में 2019 जैसा प्रदर्शन नहीं कर पाएगी। उसे डर है कि यदि इन 10 महीनों में वह कुछ बड़ा नहीं करती है, तो उसे बड़े बहुमत से हाथ धोना पड़ सकता है। ऐसे में क्या वह समय से पहले लोकसभा के चुनाव करवा सकती है? इस सम्भावना को पूरी तरह ख़ारिज नहीं किया जा सकता। इस साल के आख़िर (नवंबर-दिसंबर) में हिन्दी पट्टी के तीन बड़े राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चुनाव होने हैं और माहौल बनाने के लिए भाजपा उस समय लोकसभा चुनाव भी साथ करवा सकती है। इन तीन राज्यों में भाजपा में 2019 में एक सीट को छोडक़र बाक़ी सभी सीटें जीती थीं।

संसद के नये भवन के उद्घाटन का दृश्य याद करिये। सेंगोल स्थापित करने के बाद उसके सामने प्रधानमंत्री मोदी दंडवत होते हैं। राजनीतिक रूप से निशाने पर था दक्षिण का तमिलनाडु, जहाँ भाजपा अपनी ज़मीन बनाने को उतावली है। दक्षिण के दो राज्यों के बड़े नेता पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी इस कार्यक्रम में पहली पंक्ति में विराजमान थे।

जगन मोहन रेड्डी भले बीच के रास्ते में चल रहे हों, उनकी बहन वाई.एस. शर्मिला इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में तेलंगाना में अपनी वाईएसआर तेलंगाना पार्टी के साथ कांग्रेस के समझौते की तैयारी कर रही हैं। हाल में बधाई देने के बहाने वह पारिवारिक मित्र और कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार से बेंगलूरु में मिली हैं। शर्मिला राजनीतिक रूप से अपने भाई से अलग हो चुकी हैं और राजनीतिक माँ विजयम्मा शर्मीला के साथ हैं।

कांग्रेस की स्थिति

कांग्रेस फ़िलहाल ख़ुद को मज़बूत करने और 2024 के आम चुनाव से पहले ज़्यादा राज्य अपने पाले में करने की जी-तोड़ कोशिश कर रही है। कर्नाटक चुनाव जीतने से पहले उसने चुनाव से बाहर सबसे बड़ी लड़ाई राजस्थान में जीती है, जहाँ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री रहे सचिन पॉयलट के बीच सुलह करवाने में वह सफल रही है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि अशोक गहलोत के तेवरों के बावजूद कर्नाटक की जीत के बाद आलाकमान ने राजस्थान के मामले में अपनी अथॉरिटी का इस्तेमाल किया है और स$ख्ती और कूटनीति दोनों का सहारा लेते हुए गहलोत और पायलट को शान्त करने में सफल रही है।

कांग्रेस अभी अपनी ज़मीन मज़बूत करने में जुटी है। उसे पता है कि 2024 से पहले यदि वह और राज्य जीतती है और सहयोगी दलों वाले राज्यों में सम्मानजनक प्रदर्शन करती है, तो विपक्ष के कुछ दल उसके पीछे जुटने लगेंगे। उनकी मजबूरी होगी कि वह कांग्रेस को नेतृत्व के लिए आगे करें। इससे उसे बड़े चुनाव में सीटों के मोलभाव में भी राज्यों में कुछ हद तक मदद मिलेगी। कांग्रेस का लक्ष्य 2024 के शुरू में ख़ुद को 300-350 के बीच सीटों पर लड़ सकने वाली पार्टी बनाने का है। इसके लिए राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा की तर्ज पर राज्यवार पदयात्राएँ करने की योजना है। प्रियंका इसकी शुरुआत तेलंगाना से कर सकती हैं। दक्षिण में भाई-बहन की यह जोड़ी कांग्रेस के लिए पुराने वोट बैंक का रास्ता खोल सकती है। कर्नाटक में उनके प्रचार के दौरान जनता में उनके प्रति इंदिरा गाँधी के समय वाली झलक दिखी थी। अब कांग्रेस का लक्ष्य देश में पुराने वोट बैंक को पुनर्जीवित करने का है। कर्नाटक से उसे रास्ता मिला है। उसे मालूम है कि यदि वह ऐसा कर पाती है, तो आश्चर्यजनक नतीजे निकल सकते हैं। लेकिन यह रास्ता उतना आसान नहीं है। कांग्रेस के पुराने वोट बैंक के सहारे ही क्षेत्रीय दल आज राज्यों में सत्ता में हैं और का$फी हद तक भाजपा ने भी इसमें सेंध लगायी है।

कर्नाटक के नतीजे देख अब कांग्रेस किसी भी सूरत में दक्षिण को अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहती है। उसे पता है कि दक्षिण में उसकी हवा चली, तो वह दिल्ली की सत्ता के नज़दीक पहुँच सकती है। इसका कुछ असर उत्तर और मध्य भारत में दिखेगा। हालाँकि दिक़्क़त यह है कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना आदि में पिछले चुनावों में वह शून्य रही है, जबकि तमिलनाडु में वह डीएमके की सहयोगी है और उसे लोकसभा चुनाव में सीमित सीटों पर ही लडऩे का अवसर मिल पाएगा। महाराष्ट्र में भी वह गठबंधन में है। केरल की 20 सीटों में से ज़्यादातर कांग्रेस लड़ेगी। असम में भी उसे छोटा-सा ही सही गठबंधन करना होगा। बिहार में भी गठबंधन उसके मजबूरी है।

आंध्र प्रदेश में शून्य पर होने के बावजूद देखना होगा कि क्या वह अकेले जाने का रिस्क लेती है? बंगाल में ममता बनर्जी से कांग्रेस की पटरी बैठी, तो कांग्रेस कुछ पर ही लड़ेगी और गठबंधन नहीं हुआ, तो माकपा के साथ या अकेले उसे मैदान में उतरना होगा। उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस की स्थिति दुविधा वाली है। कर्नाटक में अब उसे अपनी सीटें बढऩे की उम्मीद है। हिन्दी पट्टी के राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड के अलावा अरुणाचल प्रदेश में वह अकेले जाएगी, जबकि झारखण्ड में उसका गठबंधन है ही। ओडिशा में कमोवेश अकेले ही जाना होगा, जबकि गोवा में उसकी सहयोगी पार्टियाँ हैं। इस तरह देखें, तो कांग्रेस गठबंधन सहयोगियों से उसी सूरत में मज़बूत सौदेबाज़ी कर सकेगी, जब वह इस साल के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करेगी।

कांग्रेस मेहनत करे, तो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अपना वोट बैंक पुनर्जीवित कर सकती है। यह वो राज्य हैं जहाँ लोगों का मन बदलते देर नहीं लगती। तेलंगाना को अलग राज्य तो बनाया ही कांग्रेस (यूपीए) ने था। दूसरे कांग्रेस इन राज्यों में करारी हार के बावजूद कभी अछूत नहीं रही है। कांग्रेस को पता है कि भाजपा दक्षिण में पाकिस्तान, हिन्दू-मुस्लिम या धार्मिक ध्रुवीकरण करके चुनाव नहीं जीत सकती। कांग्रेस इसका लाभ लेना चाहती है। इसीलिए उसके सबसे बड़े नेता राहुल गाँधी बार-बार इन राज्यों में देश की एकता और सभी को साथ लेकर चलने की बात करते हैं। यह कहना शायद थोड़ा अतिश्योक्तिपूर्ण हो; लेकिन दक्षिण के लोगों का प्यार कांग्रेस के प्रति कब उमड़ आये, कुछ नहीं कहा जा सकता। यदि 2023 के आख़िर तक देश में माहौल थोड़ा-सा भी भाजपा के ख़िलाफ़ दिखने लगा, तो आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी पाला बदलकर कांग्रेस के साथ आ सकते हैं।

रेड्डी मूल रूप से कांग्रेस संस्कृति के नेता हैं और अपनी पार्टी बनाने से पहले उन्होंने अपने पिता वाईएसआर रेड्डी की पार्टी कांग्रेस में ही रहने की कोशिश की थी; लेकिन उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामलों के चलते सोनिया गाँधी इसके लिए सहमत नहीं हुई थीं। बाद में चुनाव में वे बड़े बहुमत के साथ आंध्र प्रदेश की सत्ता में आ गये, भले इसके पीछे उनकी बहन शर्मिला की अथक मेहनत थी; क्योंकि ख़ुद रेड्डी जेल में थे। शर्मिला अब तेलंगाना में अलग पार्टी बना चुकी हैं और कांग्रेस से हाथ मिलाने को इच्छुक हैं।

विपक्ष की एकता

तमाम बैठकों, मुलाक़ातों के बावजूद विपक्ष के दल अभी दुविधा में हैं। विपक्ष के एकजुट होने पर अभी कोई साफ़ रास्ता बनता नहीं दिखा है। फ़िलहाल यह विपक्षी दल 12 जून को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई में पटना में मंथन करेंगे, जिसमें कांग्रेस नेता राहुल गाँधी भी शामिल हो सकते हैं। यदि हाल के घटनाक्रम पर नज़र डालें, तो 19-20 दल हर हालत में भाजपा या मोदी सरकार के विपक्ष के प्रदर्शनों या मुहिम में मज़बूती से साथ रहे हैं।

बहुत कम सम्भावना है कि यह दल भाजपा के साथ जाएँगे। इनमें कांग्रेस, डीएमके, शिवसेना (उद्धव ठाकरे), सीपीआई, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, आम आदमी पार्टी, सपा, केरल कांग्रेस मानी, विधुथलाई चिरुथाईगल काची, रालोद, टीएमसी, जदयू, एनसीपी, सीपीआई एम, राजद, आईयूएमएल, नेशनल कॉन्फ्रेंस, आरएसपी, एमडीएमके, एआईएमआईएम शामिल हैं। हाँ, इनमें से कुछ दल ऐसे हैं, जो कांग्रेस के साथ नहीं हैं। जैसे कि ओवैसी की एआईएमआईएम आदि। यह वो दल हैं, जो नये संसद भवन के उद्घाटन के वहिष्कार में साथ थे। लिहाज़ा राजनीतिक रूप से विपक्ष के वास्तविक स्वरूप लेने में अभी समय लगेगा।

विपक्ष की पार्टियाँ भले कांग्रेस को सीटों के मामले में दबाव में रखना चाहती हों, यह उन्हें भी पता है कि कांग्रेस के बिना वह भाजपा को सत्ता से बाहर नहीं कर सकतीं। यही कारण है कि जब भी बात सिरे चढ़ेगी, वह सीटों के मोलभाव पर आधारित होगी। क्षेत्रीय दल अपने आधार का वास्ता देकर ज़्यादा-से-ज़्यादा सीटें चाहेंगे। कांग्रेस भी यही कोशिश करेगी कि उसके राष्ट्रीय स्वरूप को देखते हुए उसे पहले से अधिक सीटें मिलें। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जो विपक्ष में बड़ी भूमिका निभाने की क्षमता रखती हैं, कह चुकी हैं कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को सम्मान दे और वे उसे उसकी मज़बूती वाली सीटों पर समर्थन देंगे। हालाँकि जब विपक्षी दलों में तालमेल की बात चल रही है, पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के इकलौते विधायक बायरन बिस्वास को तृणमूल कांग्रेस ने अपने पाले में खींच लिया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस पर नाराज़गी ज़ाहिर की और कहा कि ऐसी हरकत सि$र्फ भाजपा के ही हित में हो सकती है।

कांग्रेस के लिए दिक़्क़त यह कि जहाँ उसका भाजपा से सीधा मुक़ाबला है, वहाँ यह क्षेत्रीय दल प्रभाव ही नहीं रखते। वहाँ कांग्रेस का अपना प्रभाव ही भाजपा को हराने में उसके काम आएगा। बंगाल में टीएमसी से यदि कांग्रेस का मेल नहीं होता, तो वह माकपा-भाकपा का साथ ले सकती है। बंगाल में कई कांग्रेस नेता हैं, जो टीएमसी के साथ गठबंधन नहीं चाहते और अकेले तरजीह देते हैं।

आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू कांग्रेस के संभावित सहयोगी हो सकते हैं; यदि जगन मोहन रेड्डी से तालमेल नहीं होता है या वह भाजपा को कुछ सीटें देकर उसके साथ जाने को तरजीह देते हैं। नायडू अलग-थलग पड़े हैं और कांग्रेस उनको संजीवनी दे सकती है। ऐसे में साफ़ है कि विपक्षी एकता की तस्वीर अभी बहुत धुँधली है। कांग्रेस इस साल होने वाले बाक़ी के विधानसभा चुनावों के नतीजे देखना चाहती है और उसके बाद ही मोल भाव का दौर शुरू होगा। हाँ, इस दौरान विपक्ष जो भी क़वायद करेगा, उससे भाजपा पर दबाव तो बनेगा ही।

सीटों का मोल-भाव

अगले आम चुनाव में भाजपा के ख़िलाफ़ विपक्षी एकता संभव होगी या नहीं, यह कांग्रेस के रु$ख पर निर्भर करेगा। ममता बनर्जी, शरद पवार और नीतीश कुमार चाहते हैं कि समान विचारधारा वाले दल लोकसभा की 543 में से 474 सीटों पर इकलौता उम्मीदवार खड़ा करें और कांग्रेस को वही सीटें दी जाएँ, जहाँ वह 2019 में जीते थी या रनरअप रही थी।

इस स्थिति में कांग्रेस के हिस्से क़रीब 245 सीटें ही आएँगी जबकि कांग्रेस ख़ुद के लिए पूरे देश में 300 सीटें चाहती है। इन दलों, ख़ासकर शरद पवार, ममता बनर्जी और नीतीश कुमार का मानना है कि कांग्रेस को वहीं सीटें माँगनी चाहिए, जहाँ वह पिछले चुनाव में पहले-दूसरे नंबर पर थी। इनमें तेलंगाना, दिल्ली, आंध्र प्रदेश और केरल की 69 सीटें शामिल नहीं है, जहाँ कांग्रेस को अपने बूते कुछ करना है और इन दलों का आधार वहाँ नहीं है। दरअसल पवार, ममता और नीतीश नहीं चाहते कि उनके राज्यों में कांग्रेस के साथ उन्हें सीटों का तालमेल कुछ इस तरह करना पड़े कि उनकी जगह कांग्रेस मज़बूत दिखे।

कांग्रेस इसका तोड़ यह निकालेगी कि वह विधानसभा के इस साल के सभी नतीजों का इंतज़ार करे और उसके बाद सीटों के किसी भी फार्मूले पर बात करे। इससे इन दलों पर भी दबाव रहेगा। दूसरे कांग्रेस को लगता है कि यदि उसकी स्थिति में उभार आता है, तो वह कई अन्य सीटों को जीतने की स्थिति में पहुँच सकती है। ऐसे में उसका दावा 300 से ज़्यादा सीटों का होगा। इस बहाने कांग्रेस देश की ज़्यादा से ज़्यादा सीटों पर लडक़र अपने आधार का विस्तार करना चाहती है। वह ख़ुद को राज्यों में भी क्षेत्रीय दलों के पिछलग्गू के रूप में नहीं दिखाना चाहती।

कांग्रेस पिछले चुनाव में तेलंगाना, दिल्ली, आंध्र प्रदेश और केरल को छोडक़र अन्य हिस्सों में 192 सीटों पर भाजपा से सीधे मुक़ाबले में दूसरे स्थान पर रही थी। यदि नीतीश कुमार की विपक्ष को एकजुट करने की सक्रियता को गहराई से देखें, तो साफ़ होता है कि वह 1980 वाले जनता पार्टी परिवार के ग़ैर संघ (भाजपा) समर्थक दलों को केंद्र में रख रहे हैं। कुछ महीने पहले भाजपा से अलग होने के बाद उनके एकजुटता प्रयासों के केंद्र में दिवंगत अजित सिंह के रालोद, अखिलेश यादव की सपा, देवेगौड़ा की जेडीएस, चौटाला की इंडियन नैशनल लोकदल, और लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल से सबसे ज़्यादा बातचीत हुई है।

हो सकता है कि नीतीश कुमार इस बहाने अपनी ज़मीन मज़बूत करके अपना रास्ता निकालने की भी कोशिश कर रहे हों। राजनीति में बहुत लोग कहते हैं कि नीतीश प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। शरद पवार उम्र का हवाला देकर प्रधानमंत्री बनने से मना कर चुके हैं; लेकिन परिस्थितियाँ राजनीति में बहुत खेल खेलती हैं। ममता बनर्जी भी प्रधानमंत्री बन सकती हैं और उनकी पार्टी के नेता यह कहते हैं।

नीतीश ख़ुद को बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक में इन नेताओं से जुडक़र ताक़त हासिल करना चाहते हैं। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अब कांग्रेस है, जो कर्नाटक में बम्पर जीत के बाद आक्रामक दिख रही है। यह कमोवेश तय है कि आम आदमी पार्टी, केसी राव की बीआरएस और केरल में वामपंथी दलों से वह चुनावी समझौता नहीं करेगी। पटना में 12 जून को होने वाली विपक्षी दलों की बैठक में इन तमाम पहलुओं पर चर्चा होगी। बहुत कम सम्भावना है कि अभी कोई साफ़ तस्वीर उभर कर सामने आएगी। भले राहुल गाँधी के इस बैठक में शामिल होने की सम्भावना है, वे ऐसे किसी फार्मूले पर सहमति की जल्दबाज़ी नहीं दिखाएँगे। हाँ, कांग्रेस विपक्ष की एकजुटता की कोशिशों में साथ रहेगी।

भाजपा की रणनीति

विपक्ष के विपरीत भाजपा (एनडीए) की रणनीति भी कमजोर नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में एनडीए के पास तुरुप का पत्ता है। मोदी शब्दों से अपनी राजनीति के संकेत देते हैं। शब्दों से ही विपक्षियों पर प्रहार करते हैं और शब्दों से ही अपनी ज़मीन मज़बूत करते हैं। उनके इस करिश्मे पर भाजपा ही नहीं, एनडीए के कई सहयोगियों को भी बहुत भरोसा रहा है। राज्यों में भाजपा की हार के बावजूद उन्हें लगता है कि संसदीय चुनाव में आज भी मोदी ही सबसे बड़ा चेहरा हैं। इसलिए मोदी जो भी करते हैं, यह सभी दल उससे अभिभूत रहते हैं।

मोदी, शाह और नड्डा की तिकड़ी की कोशिश एनडीए दलों को एकजुट रखने के साथ-साथ यह है कि ओडिशा में बीजेडी, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और कर्नाटक में जेडीएस को भाजपा अपने पाले में लाना चाहती है। इसके अलावा भाजपा की नज़र चिराग पासवान पर भी है, जिनकी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी फ़िलहाल कठिन दौर में है। रेड्डी ने नयी पार्टी बनाते हुए भी उसके नाम के साथ कांग्रेस रखा है। लिहाज़ा समझा जा सकता है कि उन्हें कांग्रेस नाम पर वोट मिलने की कितनी उम्मीद रही है। भाजपा के निशाने पर आश्चर्यजनक रूप से मायावती की बहुजन समाज पार्टी भी है। उत्तर प्रदेश और अन्य कुछ राज्यों में बसपा का आधार है। भाजपा को लगता है कि यदि कांग्रेस का किसी हद तक उभार होता है, तो उसके साथ दलित और पिछड़े जुड़ सकते हैं। कर्नाटक का नतीजा बताता है कि मुसलमान एकमुश्त कांग्रेस के साथ खड़े हो रहे हैं। कर्नाटक में ख़ुद को मुसलामानों का नेता कहने वाले असदुद्दीन ओवैसी कुछ नहीं कर पाये। ऐसे में भाजपा बसपा के दलित वोट बैंक का लाभ उठाना चाहती है। बसपा भाजपा के साथ आती है या नहीं, अभी नहीं कहा जा सकता है। संसद भवन के उद्घाटन पर एक को छोडक़र बसपा के सांसद ज़रूर आये थे।

चंद्रबाबू नायडू अभी किसी के साथ नहीं; लेकिन भाजपा आंध्र प्रदेश में उनकी पार्टी तेदेपा को पाले में रखने की जुगाड़ में है। यहाँ यह भी सच है कि वाईएसआर कांग्रेस और तेदेपा एक साथ भाजपा के साथ आएँगे, इसकी सम्भावना ज़रूर कम है। नहीं भूलना चाहिए कि नायडू 2019 में विपक्षी एकता के सिलसिले में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के साथ बैठकों के दौर चलाते रहे हैं। भाजपा के लिए सबसे बड़ी उम्मीद ओडिशा में बीजू पटनायक की बीजद से है, जो कांग्रेस और भाजपा दोनों से समान राजनीतिक दूरी बनाकर चलने की अपनी नीति पर क़ायम है। ओडिशा में इतने साल बाद भी पटनायक ताक़तवर बने हुए हैं।

भाजपा की नज़र इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों पर हैं। इन सभी चुनावों में उसके सामने कांग्रेस की कड़ी चुनौती होगी। कम-से-कम मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में तो होगी ही। तेलंगाना में उसे के.सी. राव की बीआरएस और शर्मिला की संभावित जुगलबंदी से पार पाना होगा। संसद के लोकसभा सदन में स्पीकर के कक्ष के पास धार्मिक सेंगोल स्थापित कर उसे दंडवत प्रणाम कर प्रधानमंत्री मोदी ने तमिलनाड की राजनीति साधने की कोशिश की है। कितनी सफलता मिलेगी, कहना कठिन है। क्योंकि संसद के नये भवन के उद्घाटन को लेकर जहाँ भाजपा पक्ष मोदी की वाहवाही कर रहा है, वहीं राष्ट्रपति को न बुलाने जैसे कुछ फैसलों से विवाद भी पैदा हुआ है।

पीओके पर दाँव

क्या मोदी सरकार 2024 के आम चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) को वापस लेने के लिए कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई कर सकती है? भाजपा के भीतर विधायक से लेकर सांसद और केंद्र में मंत्री तक यह बात कहता आपको मिल जाएगा। इस सोच के पीछे आधार यह है कि जिस तरह 2019 ऐन पहले पुलवामा होने पर भारत ने बालाकोट में आतंकी शिविरों को तबाह किया था, उसका भाजपा को जबरदस्त लाभ चुनाव में मिला था।

भाजपा के एक सांसद ने नाम न छापने की शर्त पर कहा- ‘इसमें क्या ग़लत है। हमारे गृह मंत्री साहब (अमित शाह) संसद में कह चुके हैं कि पीओके हमारा है। हमारी संसद इसे लेकर प्रस्ताव पास कर चुकी है। यह देश की अस्मिता से जुड़ी बात है। भाजपा यह सब देश के लिए करती है, राजनीति के लिए नहीं। जैसा कि जम्मू-कश्मीर में धारा-370 $खत्म करके उसने किया है।’

हालाँकि कुछ रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि पीओके पर इस तरह की कार्रवाई इतनी आसान नहीं है, क्योंकि यह बाक़ायदा युद्ध करने जैसा होगा। पाकिस्तान में इस समय आसिफ़ मुनीर सेनाध्यक्ष हैं, जिन्हें कट्टर भारत विरोधी और चीन के नज़दीक माना जाता है। लिहाज़ा ऐसा होने पर चीन भी इस लड़ाई में कूद सकता है।

क्या मध्यावधि चुनाव होंगे?

एक सवाल यह भी है कि क्या राजनीतिक दबाव बढऩे की स्थिति में भाजपा नेतृत्व जल्दी लोकसभा चुनाव करवाने की सोच सकता है? ऐसा हो सकता है। दिसंबर के आख़िर में तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ लोकसभा के चुनाव करवाये जा सकते हैं। भाजपा यदि महसूस करे कि अगले साल मई तक उसकी लोकप्रियता में कमी आ सकती है, तो समय से पहले लोकसभा चुनाव होना संभव है।

हालाँकि कुछ जानकार मानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह शायद ऐसा न करना चाहें। क्योंकि इससे जनता के बीच सन्देश जाएगा कि भाजपा अपनी स्थिति को लेकर चिन्तित है। यह सब कुछ विपक्ष की एकता और आने वाले विधानसभा चुनावों के नतीजों पर भी निर्भर करता है। लिहाज़ा आज इसे लेकर कुछ कहना कठिन है। लेकिन इसकी सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

लोकसभा की सीटें बढ़ेंगी!

नये संसद भवन के उद्घाटन पर अपने भाषण में ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भविष्य में संसद (लोकसभा और राज्य सभा) की सीटों की संख्या बढ़ेगी। यह कितनी होगी और यह कब तक होगा, अभी नहीं कहा जा सकता। भारत में सन् 2002 में वाजपेयी सरकार के समय लोकसभा की सीटें बढ़ाने के लिए परिसीमन की क़वायद की गयी थी; लेकिन राजनीतिक विरोध के चलते उस समय इसे रोक दिया गया था। बाद में एक प्रस्ताव के ज़रिये 2026 तक के लिए परिसीमन पर रोक लगा गयी थी। संसद के नये भवन में लोकसभा सदन में 888 सांसदों की बैठने की क्षमता है और राज्यसभा में 384 सांसदों की।

भारत में अभी लोकसभा की 545 सीटें हैं, जिसमें से 543 सीटों पर चुनाव कराया जाता है और दो एंग्लोइंडियन के मनोनयन से भरी जाती हैं। भारत की जनसंख्या बढ़ी है। सन् 1976 में जब लोकसभा का परिसीमन किया गया, तो उस व$क्त भारत की आबादी 50 करोड़ थी। क़रीब 10 लाख पर एक सीट का फार्मूला उस व$क्त तय किया गया था। अब भारत की अनुमानित आबादी क़रीब 142 करोड़ है, अर्थात् सन् 1976 से क़रीब तीन गुना। सन् 2019 में पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा में 1,000 सीटें करने की माँग की थी। मुखर्जी ने इसके पक्ष में आबादी का तर्क दिया था।

हाल में एक शोध पत्र जारी हुआ था, जिसमें कहा गया था कि अनुपात के मुताबिक लोकसभा में कुल सीटें 848 होनी चाहिए। सीटों की संख्या तय करने का अधिकार परिसीमन आयोग के पास है। परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों में पास कराना ज़रूरी है। सवाल यह है कि क्या 2024 के चुनाव से पहले लोकसभा की सीटें सरकार बढ़ा सकती है? साल 2026 तक परिसीमन पर रोक होने के कारण ऐसा होना मुश्किल दिखता है। लेकिन संसद के मानसून सत्र में सरकार यदि मोदी सरकार संविधान में संशोधन कर भी देती है, तो परिसीमन का काम कुछ ही महीने करना होगा। यह आसान काम नहीं होगा। देश में आबादी का आधिकारिक आँकड़ा नहीं है, क्योंकि 2021 के बाद जनगणना नहीं हुई है। दूसरे विपक्ष भी जल्दबाज़ी में ऐसा करने का विरोध करेगा। लिहाज़ा देखना दिलचस्प होगा कि सरकार क्या इसे चुनाव के बाद करेगी?

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएँ और ख़र्च

PM receives Ceremonial welcome on his arrival at Port Moresby, in Papua New Guinea on May 21, 2023.

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में तीन देशों की छ: दिवसीय यात्रा की। सबसे पहले वह जापान गये। वहाँ जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के निमंत्रण पर उन्होंने हिरोशिमा शहर में उन्होंने जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग लिया, जिसमें 14 प्रशांत द्वीप देश शामिल थे। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पापुआ न्यू गिनी पहुँचे, जहाँ इस देश के उनके समकक्ष जेम्स मरापे ने पैर छुए तथा अपने देश का सर्वोच्च सम्मान दिया। यहाँ उन्होंने फोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स को-ऑपरेशन के तीसरे शिखर सम्मेलन में भी भाग लिया। इसके बाद मोदी ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री अल्बनीस के निमंत्रण पर सिडनी पहुँचे। ऑस्ट्रेलिया की यात्रा के दौरान उन्होंने द्विपक्षीय बैठक की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्रा कोई नयी बात नहीं है। नयी बात यह है कि वह हर बार विदेश यात्रा के दौरान कुछ-न-कुछ ऐसा नया करते हैं, जिससे उनकी पीठ थपथपायी जा सके तथा देश में उनके विरोधियों को यह संदेश दिया जा सके कि देखो, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा दुनिया में कोई दूसरा प्रभावशाली नेता न तो हुआ है तथा न ही हो सकता है। इसके लिए बिकाऊ मीडिया अपनी चाटुकारिता के पूरे ज़ोर लगा देता है तथा वही दिखाया जाता है, जो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं।

पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद जब प्रधानमंत्री मोदी कुछ देशों की यात्रा पर गये, तब उन्होंने भारत में निवेश के लिए विदेशी उद्योगपतियों को मनाने की हर सम्भव कोशिश की। भारत लौटकर इस बात को बड़े गर्व से कहा भी कि विदेशी निवेश से भारत में रोज़गार बढ़ेगा तथा देश को आर्थिक मज़बूती मिलेगी। परन्तु इस बार उन्होंने विदेश जाकर दुनिया के सामने आने वाली चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन, रूस-यूक्रेन युद्ध को रोकने के लिए मदद जैसे मुद्दों पर बातचीत की; विदेश यात्रा का कोई ज़िक्र नहीं किया, सीधे राजदंड के मुद्दे में देश को उलझाने की कोशिश में लग गये तथा नये संसद भवन का उद्घाटन किया।

प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा का भारतीय व्यापारी मीडिया ने जिस तरह से उनका महिमामंडन किया, उसके उलट कुछ तथ्य थे, जो मीडिया ने नहीं दिखाये। पहला यह आस्ट्रेलिया ने बीबीसी लंदन द्वारा जारी प्रधानमंत्री की डाक्यूमेंट्री को अपने संसद भवन में दिखाया। दूसरा आस्ट्रेलिया ने भारत के पाँच राज्यों के छात्रों को अपने यहाँ शिक्षा लेने से प्रतिबंधित कर दिया। यह सब उसी दौरान हुआ, जब प्रधानमंत्री आस्ट्रेलिया गये। व्यापारी मीडिया ने यह भी नहीं दिखाया कि मोदी की इस यात्रा पर कितना अधिक पैसा ख़र्च हुआ। विदेश मंत्रालय ने यात्रा के बाद ट्वीट किया कि एक्शन से भरपूर यात्रा का समापन! प्रधान भागीदारों के साथ दो दिनों के गहन द्विपक्षीय तथा बहुपक्षीय सम्बन्धों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान की अपनी यात्रा समाप्त की।

इसके बाद इसी तरह प्रधानमंत्री की पापुआ न्यू गिनी तथा आस्ट्रेलिया दौरे की तारी$फों के पुल बांधे गये। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट करके अपनी यात्रा में अपनी उपलब्थियों का बखान किया। विदेश यात्रा ही नहीं, देश में प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगते रहे हैं कि वह अपना महिमामंडन करने के लिए ही प्रयासरत रहते हैं; परन्तु अपने विरोध में उठे सुरों तथा छवि को नुक़सान पहुँचाने वाले पहलुओं को वह दिखाना नहीं चाहते, जो वास्तव में घटित होती घटनाओं का अहम हिस्सा होते हैं। उन पर कथित रूप से कैमराजीवी होने का आरोप भी लोगों ने लगाया है।

कई राजनीति के जानकार तथा विपक्षी दलों के नेता उन पर विदेशी समझ न होने के भी कयास लगाते रहते हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केवल इस बात की समझ है कि लाइम लाइट तथा कैमरा लाइट में कैसे रहना है। वह प्रशंसा के भूखे हैं, जबकि आलोचना उन पर बर्दाश्त नहीं होती तथा सवालों को वह पसन्द नहीं करते। आलोचना एवं सवालों के चलते ही उन्होंने विपक्षी दलों के कई ताक़तवर नेताओं को जेल भिजवाया तथा राहुल गाँधी को संसद से बाहर का रास्ता दिखा दिया। उनका वश चले, तो वह विपक्ष का जड़ से सफ़ाया कर दें, जिसके प्रयास में वह तथा उनके दाहिने हाथ अमित शाह लगे हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह की स्वयंभू नीतियों के चलते ही भाजपा में भी अंदरखाते उथल-पुथल है, परन्तु डर तथा मलाई मिलने के चलते कोई बोल नहीं रहा है। ताक़तवरों का साथ देना इन दोनों नेताओं की सबसे बड़ी ख़ासियत है, चाहे वो ताक़तवर किसी भी क़िस्म की आपराधिक पृष्ठभूमि के हों।

अब तक की प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं से पता चलता है कि उन्होंने विदेश यात्राओं से कुछ ख़ास हासिल नहीं किया, परन्तु अरबों रुपये इन विदेशी यात्राओं पर ख़र्च कर दिये हैं। प्रधानमंत्री मोदी की यात्राओं पर हुए ख़र्च से इस देश में करोड़ों लोगों को रोज़गार मिल सकता था। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी 26 मई 2023 तक 90 से अधिक देशों की यात्राएँ कर चुके हैं।

भारत सरकार के एक पोर्टल पर अभी तक 52 विदेश यात्राओं में 59 देशों की यात्रा का ब्योरा दिखाया जा रहा है, जो कि 2022 तक का है। इसके अनुसार, 15 जून से 16 जून, 2014 तक वह भूटान गये, जिसमें 2,45,27,465 रुपये का ख़र्च आया। इसके बाद 13 जुलाई से 17 जुलाई, 2014 के बीच उन्होंने ब्राजील की यात्रा की, जिस पर 20,35,48,000 रुपये ख़र्च हुए। इसके बाद 3 अगस्त से 5 अगस्त, 2014 तक वह नेपाल यात्रा पर गये। यह यात्रा उन्होंने भारतीय वायुसेना का बीबीजे विमान से यात्रा की, जिसके ख़र्च का ब्योरा नहीं दिया गया है। 30 अगस्त से 3 सितंबर, 2014 तक प्रधानमंत्री जापान यात्रा पर थे, जिसमें 13,47,58,000 रुपये का ख़र्च आया। 25 सितंबर से 1 अक्टूबर, 2014 तक प्रधानमंत्री अमेरिका पर रहे, जिसमें 19,04,60,000 रुपये का ख़र्च हुआ। 11 नवंबर से 20 नवंबर, 2014 तक वह म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया तथा फिजी की यात्रा पर रहे, जिसमें 22,58,65,000 रुपये ख़र्च हुए। 25 से 27 नवंबर, 2014 तक वह दोबारा नेपाल गये, जिसमें उन्होंने भारतीय वायुसेना का बीबीजे विमान का इस्तेमाल किया। इसमें भी ख़र्च तो हुआ ही होगा, परन्तु ब्योरा नहीं दिया गया है। 10 मार्च से 14 मार्च, 2015 को प्रधानमंत्री सेशेल्स, मॉरीशस तथा श्रीलंका गये, जिसमें 15,85,25,000 रुपये का ख़र्च आया। 28 मार्च से 29 मार्च, 2015 को वह सिंगापुर गये। इस यात्रा में भी सरकारी वेबसाइट पर भारतीय वायुसेना का बीबीजे विमान का इस्तेमाल दिखाया गया है।

इसके बाद 9 अप्रैल से 17 अप्रैल, 2015 को वह फ्रांस, जर्मनी तथा कनाडा यात्रा पर गये, जिसमें 31,25,78,000 रुपये का ख़र्च आया। 14 से 19 मई, 2015 तक वह चीन, मंगोलिया तथा दक्षिण कोरिया यात्रा पर गये, जिसमें 15,15,43,000 रुपये का ख़र्चा हुआ। 6-7 जून, 2015 को प्रधानमंत्री बांग्लादेश में थे, जिसमें भारतीय वायुसेना के बीबीजे विमान का उपयोग बताया गया है, ख़र्चा नहीं। 6 से 14 जुलाई, 2015 तक वह उज्बेकिस्तान, कज़ाख़स्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, रूस तथा ताजिकिस्तान में रहे, जिसमें 15,78,39,000 रुपये का ख़र्च हुआ।

16-17 अगस्त, 2015 को मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात का दौरा किया, जिसमें 5,90,66,000 रुपये ख़र्च हुए। 23 से 29 सितंबर, 2015 को उन्होंने आयरलैंड तथा अमेरिका की यात्रा की, जिसमें 18,46,95,000 रुपये का ख़र्चा हुआ। 12 से 16 नवंबर, 2015 तक वह ब्रिटेन तथा तुर्की यात्रा पर रहे, जिस पर 9,30,93,000 रुपये का ख़र्च आया। 20 से 24 नवंबर, 2015 तक मोदी मलेशिया तथा सिंगापुर यात्रा पर रहे, जिसमें 7,04,93,000 रुपये का ख़र्च आया। 29 से 30 नवंबर, 2015 तक वह फ्रांस यात्रा पर थे। इसमें 6,82,81,000 रुपये का ख़र्च आया। 23 से 25 दिसंबर, 2015 तक प्रधानमंत्री रूस, अफ़ग़ानिस्तान तथा पाकिस्तान में रहे, जिसमें 8,14,11,000 रुपये का ख़र्च आया। 30 मार्च से 3 अप्रैल, 2016 तक प्रधानमंत्री मोदी बेल्जियम, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सऊदी अरब में रहे, जिसमें 15,85,02,000 रुपये का ख़र्चा आया। 22-23 मई, 2016 में उन्होंने ईरान य़ात्रा की, जिसमें भारतीय वायुसेना का बीबीजे विमान को दिखाया गया, परन्तु ख़र्चा नहीं बताया गया।

4 से 9 जून, 2016 के बीच वह अफ़ग़ानिस्तान, क़तर, स्विट्जरलैंड, अमेरिका तथा मेक्सिको में रहे, जिसमें 13,91,66,000 रुपये का ख़र्च आया। 23-24 जून, 2016 को वह उज्बेकिस्तान गये, जिसमें 6,32,78,000 रुपये का ख़र्च हुआ। 7 से 11 जुलाई के बीच वह मोजांबिक, दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया तथा केन्या गये, जिसमें 12,80,94,000 रुपये का ख़र्चा आया। 2-5 सितंबर. 2016 के बीच वह वियतनाम तथा चीन यात्रा पर गये, जिसमें 9,53,91,000 रुपये ख़र्च हुए। 7-8 सितंबर, 2016 के बीच वह लाओस गये, जहाँ 4,77,51,000 रुपये ख़र्च हुए। 10 से 12 नवंबर, 2016 को वह फिर जापान गये, जिसमें 13,05,86,000 रुपये ख़र्च हुए। 11-12 मई, 2017 के बीच वह श्रीलंका रहे, जिसमें 5,24,04,000 रुपये ख़र्च हुए। 29 मई से 3 जून, 2017 तक मोदी ने जर्मनी, स्पेन, रूस तथा फ्रांस की यात्रा की, जिसमें 16,51,95,000 रुपये ख़र्च हुए। 8-9 जून, 2017 को वह कज़ाख़स्तान गये, जिसमें 5,65,08,000 रुपये ख़र्च हुए। 24 से 27 जून, 2017 के बीच वह पुर्तगाल, अमेरिका तथा नीदरलैंड्स गये, जहाँ उन पर 13,82,81,000 रुपये ख़र्च हुए। 4 से 8 जुलाई, 2017 को वह इजरायल तथा जर्मनी यात्रा पर रहे, जिसमें 11,28,48,000 रुपये ख़र्च हुए। 3 से 7 सितंबर, 2017 के बीच प्रधानमंत्री मोदी चीन तथा म्यांमार यात्रा पर रहे, जिसमें 13,87,80,000 रुपये ख़र्च हुए। 12 से 14 नवंबर, 2017 के बीच मोदी फिलीपींस रहे, जिसमें 10,11,68,000 रुपये ख़र्च हुए।

इसी तरह 22-23 जनवरी, 2018 को मोदी स्विट्जरलैंड गये, जहाँ 13,20,83,000 रुपये ख़र्च हुए। 9 से 12 फरवरी के बीच वह जॉर्डन, फिलिस्तीन, संयुक्त अरब अमीरात तथा ओमान यात्रा पर रहे, जिसमें 9,59,64,000 रुपये का ख़र्चा हुआ।

16 से 20 अप्रैल, 2018 के बीच वह स्वीडन, ब्रिटेन तथा जर्मनी में रहे, जिसमें 10,62,57,000 रुपये का ख़र्चा हुआ। 26 से 28 अप्रैल, 2018 के बीच मोदी चीन गये, जिसमें 6,07,46,000 रुपये ख़र्च हुए। 11-12 मई, 2018 को मोदी फिर नेपाल पहुँचे, जिसमें 1,61,09,298 रुपये ख़र्च हुए। 21-22 मई, 2018 को प्रधानमंत्री ने रूस यात्रा की, जिसमें 7,26,38,000 रुपये ख़र्चा हुए। 29 मई से 2 जून, 2018 के बीच वह इंडोनेशिया, मलेशिया तथा सिंगापुर गये, जिसमें 10,21,84,000 रुपये ख़र्च हुए। 9-10 जून, 2018 को वह फिर चीन पहुँचे, जिसमें 7,83,56,000 रुपये ख़र्च हुए। 23 से 28 जुलाई, 2018 तक वह रवांडा, युगांडा तथा दक्षिण अफ्रीका की यात्रा पर रहे, जिसमें 14,11,76,000 रुपये ख़र्च हुए। 30-31 अगस्त, 2018 को वह फिर नेपाल गये, जिसमें भारतीय वायुसेना का बीबीजे विमान से यात्रा मंत्रालय ने दिखायी है, ख़र्च नहीं बताया है। 27 से 30 अक्टूबर, 2018 तक वह जापान में रहे, जिसमें 8,51,10,000 रुपये का ख़र्च आया। 13 से 15 नवंबर तक वह सिंगापुर यात्रा पर थे, जिसमें 5,20,40,000 रुपये ख़र्च हुए। 17 नवंबर, 2018 को वह मालदीव गये, जिसमें 3,48,42,000 रुपये ख़र्च हुए। 28 नवंबर से 3 दिसंबर, 2018 के बीच प्रधानमंत्री ने अर्जेंटीना की यात्रा की। इस यात्रा में भी उन्होंने 15,59,83,000 रुपये ख़र्च कर दिए। 21 से 22 फरवरी के बीच वह दक्षिण कोरिया गये, जिसमें 9,48,38,000 रुपये ख़र्च हुए।

इसके अतिरिक्त 8-9 जून, 2019 को प्रधानमंत्री मोदी मालदीव तथा श्रीलंका यात्रा पर पहुँचे, जिसमें भारतीय वायुसेना के बीबीजे विमान का उपयोग दिखाया गया है, ख़र्च नहीं। 13-14 जून, 2019 को वह किर्गिस्तान गये, जिसमें 9,37,11,000 रुपये ख़र्च हुए। 27 से 29 जून के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने फिर जापान यात्रा की, जिसमें 9,91,62,000 रुपये ख़र्च हुए। 17-18 अगस्त, 2019 को वह भूटान गये, जिसमें भारतीय वायुसेना के बीबीजे विमान का उपयोग दिखाया गया है, ख़र्च नहीं बताया गया। 22 से 27 अगस्त, 2019 के बीच वह फ्रांस, संयुक्त अरब अमीरात तथा बहरीन यात्रा पर रहे, जिसमें 14,91,68,000 रुपये ख़र्च हुए। 4-5 सितंबर, 2019 को रूस यात्रा की, जिसमें 12,02,80,000 रुपये ख़र्च हुए। 21 से 28 सितंबर, 2019 को फिर मोदी की अमेरिका यात्रा में 23,27,09,000 रुपये ख़र्च हुए। 28 से 29 अक्टूबर, 2019 की सऊदी अरब यात्रा में फिर 5,03,03,000 रुपये ख़र्च हुए। 2 से 4 नवंबर, 2019 के बीच वह थाइलैंड पहुँचे, जहाँ 6,68,34,000 रुपये ख़र्च हुए। 13 से 15 नवंबर, 2019 को प्रधानमंत्री की ब्राजील यात्रा में 20,01,61,000 रुपये ख़र्च हुए।

मंत्रालय ने 26-27 मार्च, 2021 से बांग्लादेश, 22 से 26 सितंबर, 2021 के बीच अमेरिका, 29 अक्टूबर से 2 नवंबर, 2021 की इटली तथा यूके यात्रा, 2 से 5 मई, 2022 की उनकी जर्मनी, डेनमार्क तथा फ्रांस यात्रा, 16 मई 2022 की फिर नेपाल यात्रा, 23-24 मई, 2022 की जापान यात्रा, 26 से 28 जून, 2022 की जर्मनी तथा यूएई यात्रा, 15-16 सितंबर, 2022 की समरकंद, उज्बेकिस्तान यात्रा का, 27 सितंबर, 2022 की फिर जापान यात्रा का, 14 से 16 नवंबर, 2022 की इंडोनेशिया यात्रा ख़र्च का कोई ब्योरा नहीं दिया है। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने देश में यात्राएँ की हैं। कहा जा सकता है कि जितनी यात्राएँ तथा उन पर खर्चे प्रधानमंत्री मोदी ने किए हैं, उतनी यात्राएँ, उतना ख़र्च आज तक किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया। यात्राओं में लगे इन अरबों रुपये से देश का संपूर्ण विकास सम्भव था।

पहलवानों से बदसलूकी की हद पार

भारतीय खेल इतिहास का यह शायद सबसे मार्मिक क्षण रहेगा। दुनिया के सबसे बड़े खेल मंचों पर देश के लिए मेडल जीतकर उसे गौरव दिलाते हुए भावुक होने वाली महिला पहलवान हरिद्वार में गंगा मैया के किनारे अपने यही मेडल बहाने की लिए तैयार खड़ी थीं और फूट-फूटकर रो रही थीं। भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण सिंह, जो भाजपा के एक ताक़तवर सांसद भी हैं; के ख़िलाफ़ यौन उत्पीडऩ के आरोपों पर सही कार्रवाई न होने पर धरना दे चुके ये पहलवान इतने निराश हैं कि उन्हें ख़ून-पसीने से कमाये अपने मेडल गंगा में बहाने का फ़ैसला करना पड़ा। आख़िरी समय में भारतीय किसान यूनियन के नेता नरेश टिकैत ने उन्हें ऐसा करने से रोका और अपने साथ वापस ले गये। लेकिन इस घटना, जिसने दुनिया भर के मीडिया का ध्यान अपनी और खींचा है; ने कई सवाल खड़े दिये हैं।

जिस समय देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नये संसद भवन में सेंगोल स्थापित करते हुए दंडवत हो रहे थे और देश में लोकतंत्र की दुहाई दे रहे थे; लगभग उसी समय बग़ल के जंतर-मंतर पर केंद्र सरकार की पुलिस न्याय के लिए शान्ति से धरने पर बैठीं देश की गौरव कहलाने वाली महिला पहलवानों को अपनी ताक़त दिखाकर जबरदस्ती बसों में ठूँस रही थी। साफ़ लग रहा था कि लोकतंत्र इमारतों के भीतर दुहाई देने या राजनीति करने तक ही सीमित रह गया है। न्याय देना तो दूर, केंद्र की सरकार इन पहलवानों से ताक़त निपटने लगी है। आख़िर वह किसे बचाने के लिए यह सब कर रही है? यह बड़ा सवाल है।

सत्ता की इस निष्ठुरता से न्याय के लड़ रहीं ये पहलवान कितनी ख़फ़ा और निराश हैं, यह इनमें से एक पहलवान साक्षी मालिक के शब्दों से ज़ाहिर हो जाता है। वह अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर कहती हैं- ‘हमने पवित्रता से इन मेडल (पदकों) को हासिल किया था। इन मेडल को पहनाकर तेज़ सफ़ेदी वाला तंत्र सिर्फ़ अपना प्रचार करता है। फिर हमारा शोषण करता है। हम ये मेडल राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को नहीं लौटाएँगे, क्योंकि उन्होंने हमारी कोई सुध नहीं ली। हमें अपराधी बना दिया, शोषण करने वाला ठहाके लगा रहा है। क्या हमने मेडल इसलिए जीते थे कि तंत्र हमारे साथ घटिया व्यवहार करे? हमें घसीटे और फिर हमें ही अपराधी बना दे?’

यह अच्छा ही हुआ कि अपने हितचिंतक लोगों के आग्रह पर धरना देने वाले पहलवानों ने हर की पौड़ी में अपने मेडल गंगा में बहाने का फ़ैसला टाल दिया। अन्यथा दुनिया भर में यह घटना भारतीय खेलों पर एक बड़ा सवाल लगाने की सामथ्र्य रखती थी। पहलवान मेडल बहाने के लिए हरिद्वार पहुँचे गये हैं, यह जानकारी मिलती ही भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत वहाँ पहुँचे थे और उन्होंने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।

टिकैत ने पहलवानों से बात कर केंद्र सरकार को कार्रवाई के लिए पाँच दिन का अल्टीमेटम दिया है। टिकैत ने पहलवानों से मेडल्स और मोमेंटो वाली पोटली भी अपने पास रख ली। इसके बाद सभी खिलाड़ी हरिद्वार से घर के लिए रवाना हो गये। वह दृश्य हर किसी को द्रवित कर रहा था, जब साक्षी मलिक, बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट क़रीब एक घंटे तक हर की पौड़ी पर बैठकर मेडल पकड़े लगातार रोते रहे। इस दौरान मेडल बहाने के पहलवानों के फ़ैसले का गंगा समिति ने विरोध किया और कहा कि ‘हर की यह पौड़ी पूजा-पाठ की जगह है, राजनीति की नहीं।’ यह समझ से बाहर की बात है कि जिस गंगा मैया में वहाँ आये श्रद्धालु अपनी मर्ज़ी से सोने-चाँदी के ज़ेवर अर्पित कर देते हैं, वहाँ मेडल बहाने पर क्यों आपत्ति होनी चाहिए?

महिला पहलवानों के यौन उत्पीडऩ के आरोपों से घिरे भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह, जो अब भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष नहीं रहे हैं; ने 5 जून को अयोध्या में महारैली बुलायी है। इसमें संत भाग लेंगे। बृजभूषण और संतों का कहना है कि पॉक्सो एक्ट का फ़ायदा उठाकर इसका दुरुपयोग किया जा रहा है।

पहलवानों पर किस-किस तरह हमला किया गया इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि केरल के एक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी पूर्व डीजीपी एन.पी. अस्थाना, जो बृजभूषण शरण सिंह का समर्थन कर रहे हैं; ने पहलवानों को पुलिस के जबरदस्ती धरने से उठाने पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की। अस्थाना के ट्वीट कर कहा- ‘ज़रूरत हुई तो गोली भी मारेंगे। मगर, तुम्हारे कहने से नहीं। अभी तो सिर्फ़ कचरे के बोरे की तरह घसीट कर फेंका है। दफ़ा-129 में पुलिस को गोली मारने का अधिकार है। उचित परिस्थितियों में वो हसरत भी पूरी होगी। मगर वो जानने के लिए पढ़ा-लिखा होना आवश्यक है। फिर मिलेंगे पोस्टमॉर्टम टेबल पर।’

अच्छा हुआ कि उनकी ही पुलिस बिरादरी ने उन्हें लताड़ लगा दी। इंडियन पुलिस फाउंडेशन ने अपने ट्वीट में लिखा- ‘एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी का इस तरह का धमकी भरा ट्वीट परेशान करने वाला है। इस तरह का व्यवहार अस्वीकार्य है। यह पूरे पुलिस बल की प्रतिष्ठा की छवि बिगाड़ता है।’ दबाव का ही असर था कि अस्थाना का विवादित ट्वीट अचानक ग़ायब हो गया। शायद उन्होंने डिलीट कर दिया। आरोपी बृजभूषण सिंह कहाँ पीछे रहते। उनकी भाषा देखिये। एक ट्वीट में सिंह ने लिखा- ‘महिला पहलवान विनेश फोगाट आज वही काम कर रही हैं, जो त्रेता युग में मंथरा ने किया था। इससे पहले जंतर-मंतर पर हज़ारों पहलवान धरना दे रहे थे और अब केवल तीन जोड़े (पति-पत्नी) बचे हैं। सातवाँ कोई नहीं है। जिस दिन परिणाम आएगा, हम मंथरा को भी धन्यवाद देंगे।’

एक जनसभा में इन्हीं सिंह ने यह कहा- ‘जो पहलवान प्रदर्शन कर रहे हैं, वे आज तक नहीं बता पाये कि उनके साथ कब, कहाँ और क्या-क्या हुआ? कैसे-कैसे हुआ? आप सौभाग्यशाली हैं कि एक ऐसा मामला आया है, जिसमें फँसकर कभी डोनाल्ड ट्रंप को भी परेशान होना पड़ा था। यह आरोप नहीं, छुआछूत का मामला है। गुड टच-बैड टच का मामला है। मुझ पर झूठे आरोप लगाये गये हैं; लेकिन यह आरोप मुझ पर नहीं आया।’

विपक्ष के नेताओं ने भी पहलवानों से एकजुटता दिखायी। कांग्रेस सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने कहा- ‘मेडल न बहाएँ, ये आपको बृजभूषण की कृपा से नहीं मिले हैं।’ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा- ‘हमारे पहलवानों को पीटा गया और प्रताडि़त किया गया। हम उनके साथ हैं। एक व्यक्ति पर आरोप हैं, उसे गिरफ़्तार क्यों नहीं किया जा रहा?’

किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा- ‘राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से अनुरोध है कि पहलवानों से जल्द बातचीत करें।’ पूर्व क्रिकेटर अनिल कुंबले ने कहा- ‘28 मई को हमारे पहलवानों के साथ हाथापाई के बारे में सुनकर निराशा हुई। उचित बातचीत के ज़रिये कुछ भी हल किया जा सकता है।’ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा- ‘पूरा देश स्तब्ध है। पूरे देश की आँखों में आँसू हैं। अब तो प्रधानमंत्री को अपना अहंकार छोड़ देना चाहिए।’

हमने भारत में पहलवानों से बर्ताव का नोटिस लिया है। हमें प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर, नई दिल्ली से पहलवानों को अस्थायी हिरासत में लेने से निराशा हुई है। यदि 45 दिन के भीतर भारतीय कुश्ती महासंघ के चुनाव नहीं हुए, तो हमें उसे निलंबित करने का फ़ैसला लेना होगा। ऐसा होने पर भारत के खिलाड़ी देश के ध्वज के साथ अंतरराष्ट्रीय मु$काबलों में हिस्सा नहीं ले पाएँगे।’’ यूनाइटेड वल्र्ड रेसलिंग (आधिकारिक बयान)

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को मेडल लौटाने पर मन नहीं माना। राष्ट्रपति कुछ नहीं बोलीं। प्रधानमंत्री ने हमें अपने घर की बेटियाँ बताया था; लेकिन एक बार भी सुध नहीं ली। हमें मुखौटा बना फ़ायदा लेने के बाद हमारे उत्पीडक़ के साथ खड़ा हो जाने वाला हमारा अपवित्र तंत्र अपना काम कर रहा है और हम अपना काम कर रहे हैं। अब लोगों को सोचना होगा कि वे अपनी इन बेटियों के साथ खड़े हैं या इन बेटियों का उत्पीडऩ करने वाले उस तेज़ सफ़ेदी वाले तंत्र के साथ।’’ साक्षी मलिक (एक ट्वीट में)

समलैंगिकता : सार्वजनिक स्वीकृति की बेजा ज़िद

शिवेंद्र राणा

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष समलैंगिक विवाह की क़ानूनी मान्यता का प्रश्न मौज़ूद है। इन दिनों यह राष्ट्रीय विमर्श का एक आवश्यक भाग बन चुका है। पहले इस मुद्दे की विवेचना के मूल को समझते हैं। धारा-377 में ग़ैर-प्रजनन यौन कृत्यों अर्थात् अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों को अपराध मानते हुए दण्डनीय माना गया है। इस धारा को एलजीबीटी समुदाय अपने प्रति अन्याय समझता है।

नाज़ फाउंडेशन ने वर्ष 2001 में दिल्ली उच्च न्यायालय से धारा-377 को ग़ैर-संवैधानिक घोषित करने की माँग की थी। इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद समलैंगिक समुदाय को राहत तो मिली। लेकिन दिसंबर, 2013 में सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज़ फाउंडेशन मामले में उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए पुन: धारा-377 को मूल स्वरूप में प्रतिष्ठित कर दिया। यह द्वंद्व अभी था ही कि इसी मामले की अगली प्रक्रिया के अंतर्गत पिछले माह समलैंगिक विवाह को क़ानूनी अनुमति देने के मुद्दे पर भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में गठित पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 10 दिन की सुनवाई के पश्चात् अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है।

सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष था कि सम्भव है इसे क़ानूनी मान्यता देने वाली न्यायपालिका की कोई संवैधानिक घोषणा सही कार्रवाई न हो। क्योंकि अदालत इसके परिणाम का अनुमान लगाने, परिकल्पना करने, समझने और इससे निपटने में सक्षम नहीं होगी। केंद्र सरकार के अनुसार, समलैंगिक विवाह के मुद्दे पर सात राज्यों से जवाब प्राप्त हुए हैं, जिनमें असम राजस्थान तथा आंध्र प्रदेश की सरकारों इसे क़ानूनी मान्यता देने का विरोध किया है। जबकि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर और सिक्किम ने इस विषय को संवेदनशील मानते हुए व्यापक विमर्श की बात कही है। ऊपर से आंध्र से लेकर राजस्थान तक के विभिन्न धर्म-सम्प्रदायों के प्रमुखों ने अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप आपत्ति दर्ज करायी है।

भारतीय समाज अभी भी बुद्धत्व की प्रक्रिया के अंतर्गत ऐसे विषयों को अव्यक्तानी मानकर ही चल रहा है। परन्तु न्यायपालिका इस विषय पर अतिसक्रिय है। उसने पहले तो तीसरे लिंग को मान्यता दी, फिर लैंगिक अभिरुचि को निजता का मामला बताते हुए मूल अधिकारों की श्रेणी में ला दिया। पुन: समलैंगिकता को आपराधिक एवं अवैध सम्बन्धों की श्रेणी से मुक्त किया। अब वह समलैंगिक विवाहों को क़ानूनी मान्यता देने की ओर अग्रसर है। अदालती संघर्ष की अपनी व्याख्या होगी। अपना प्रभाव होगा। किन्तु मुख्य प्रश्न यह है कि क्या क़ानूनी लड़ाई और उग्र, भौंडे प्रदर्शनों से समलैंगिक समाज एवं उनका समर्थक वर्ग इसे सामाजिक सहमति दिलवा पाएगा? हो सकता है कि न्यायालय उन्हें क़ानूनी मान्यता प्रदान कर दे। हो सकता है कि इससे समलैंगिक समाज स्वयं को उन्मुक्त एवं स्वतंत्र अनुभव करे। लेकिन इस वर्ग की समस्या की क्या इसी परिधि में सुलझ जाएगी?

इसके दूसरे पहलू देखें- अब तक इस बात के प्रमाण मिलना दुष्कर हैं कि भारत में समलैंगिक वर्ग के लोग लगातार क़ानूनी रूप से प्रताडि़त किये जा रहें हों। तक़रीबन डेढ़ सौ वर्षों पूर्व लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता वाले विधि आयोग के सौजन्य से प्रवर्तित इस क़ानून के तहत अब तक सम्भवत: कुल छ: या सात मुक़दमे दर्ज हुए हैं, जिनमें मात्र सन् 35 में एक व्यक्ति को सज़ा मिली है। इसका सामान्य अर्थ है कि न तो यह क़ानून कभी सख़्ती से लागू हुआ है और न ही इसकी आड़ में किसी चयनित वर्ग का प्रताडि़त किया गया है। अत: इससे सम्बन्धित क़ानूनी उत्पीडऩ की शिकायत वाजिब तो नहीं मानी जा सकती। इसका तात्पर्य है कि समलैंगिक समाज का संत्रास क़ानूनी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एवं सामाजिक है।

अब प्रश्न पुनश्च वही है कि क्या अदालती निर्णय सांस्कृतिक धारणाएँ एवं सामाजिक मान्यताएँ परिवर्तित करने में सक्षम हैं? यदि ऐसा है, तो शारदा एक्ट (1929) के प्रभाव में आने के बाद बाल विवाह एकदम से ख़त्म हो जाने चाहिए थे। लेकिन ऐसा तो नहीं हुआ। बाल विवाह कमोबेश आज भी व्यवहार में हैं। यदि संवैधानिक नियम ही समाज को त्वरित रूप से मर्यादित करने में सक्षम होते, तो संविधान के अनुच्छेद-17 के प्रवर्तित होने के साथ ही समाज को छुआछूत मुक्त हो जाना चाहिए था; लेकिन वह अब भी विद्यमान है। यदि क़ानून ही बदलाव के संवाहक बन सकते, तो मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम-2019 के प्रभावी होते ही इस्लामिक समाज तलाक़-ए-बिद्दत (तीन तलाक़) के दुर्गुण से मुक्त हो जाना चाहिए था; लेकिन यह समस्या तो जस-की-तस है।

समाज के किसी भी वर्ग की निजी रुचि चाहे, वह उसकी यौन अभिरुचि ही क्यों न हो; उसके आधार पर भेदभाव अथवा प्रताडऩा को मर्यादित एवं मानवीयता नहीं माना जा सकता। भारत समेत दुनिया भर समलैंगिक या परालैंगिक हमेशा से मौज़ूद रहें हैं। तात्पर्य यह कि निजी लैंगिक रुचि की एक मर्यादा हमेशा से समाज में मौज़ूद रही है। परन्तु पूर्व में धारा-377 को असंवैधानिक घोषित किये जाने के अदालती निर्णय पर आक्रामक अभिव्यक्तियों की आवश्यकता नहीं थी। ये अभिव्यक्तियाँ अनावश्यक-अवैधानिक उकसावे की क्रिया ही अधिक प्रतीत हुईं, जिसमें समाज के बहुसंख्यक वर्ग को प्रतिक्रिया के उत्तेजित करने का प्रयास किया जा रहा हो। समलैंगिकता को आक्रामकता के साथ सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित करने का प्रयास वैचारिक अतिवादी या जागरूकता का विकृत स्वरूप ही माना जाएगा।

समलैंगिकता के सामाजिक स्वीकृति की ज़िद पश्चिमी अतिवादिता से प्रेरित है। यह संघर्ष एक ऐसे उन्नत आधुनिक समाज के अंतद्र्वंद्व की उपज है, जो सामाजिक असमानता, स्वास्थ्य के अधिकार, गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार जैसे कई मूलभूत पहलुओं से गुज़रकर भौतिकता और उपभोगवाद से लगभग तृप्त हो चुका है। इस अवस्था तक पहुँचने में उसने अपने संवेदनाओं के दृश्य इतने दूषित कर रखे हैं कि अब उसे इसे जीवित करने के लिए नित नये उपायों की तलाश है। यह वास्तव में उसी पश्चिमी विकास का परिचायक है, जहाँ परिवार के ध्वंस पर आधुनिकता की समाज खड़ी की जाए। अत: ऐसे समाज की समलैंगिकता की सामाजिक स्वीकृति की लड़ाई को फिर भी समझा जा सकता है; लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक वंचना, आर्थिक विषमता जैसे जीवन के आधारभूत तत्त्वों को समाज में सर्वव्यापी बनाने एवं सँजोने में लगे एक राष्ट्र के लिए क्या समलैंगिकता की क़ानूनी सिद्धि ही मुख्य विषय है?

सम्भवत: ईसाईवाद एवं चर्च का कड़ा रुख़ भी पश्चिमी जगत में इस प्रतिरोध का एक कारण रहा हो। किन्तु भारत के किसी भी धर्म-शास्त्र, स्मृति या मतवाद में समलैंगिकता को दण्डनीय या वर्जित करने के विशेष उल्लेख नहीं है। इसका अर्थ है कि इसे मानव सहजीवन या निजी रुचि का विषय समझकर अनदेखा किया गया होगा। साथ ही इसके आधार पर प्राचीन या मध्ययुगीन समाज में लक्षित उत्पीडऩ के भी प्रमाण नहीं मिलते। समलैंगिकता को किसी भी समाज में सहवास की सहज प्रक्रिया नहीं माना गया है। यह घातक यौन रोगों का भी बड़ा कारक है। समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने का सबसे ख़राब प्रभाव भारत के सामाजिक ढाँचे पर पड़ेगा। कैसे? आइए, इसे आँकड़ों से समझते हैं- सर्वोच्च न्यायालय में समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता सम्बन्धित सुनवाई के दौरान पुणे की संस्था- दृष्टि स्त्री अध्ययन प्रबोधन केंद्र ने देश भर में 13 भाषाओं को बोलने वाले विभिन्न जाति-धर्मों के 57,614 लोगों के बीच इस विषय पर एक सर्वे कराया। सर्वे में शामिल 83.9 फ़ीसदी लोगों ने समलैंगिक विवाह का विरोध किया। उन्होंने इसे प्राकृतिक और सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध माना, जिसके कारण अगले कुछ दशकों में पूरा सामाजिक ढाँचा चरमरा जाएगा। लोगों का मानना था कि इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव महिलाओं और बच्चों पर होगा।

एलजीबीटीक्यू समुदाय के साथ ही न्यायपालिका को समझना होगा कि क़ानून समाज का नेतृत्वकर्ता नहीं, बल्कि अनुगामी ही हो सकता है। इन्हें समझना होगा कि अदालतों के आदेश और संवैधानिक अध्यादेशों से सांस्कृतिक मान्यताएँ और सामाजिक पूर्वाग्रह नहीं बदलते। क़ानून के ज़रिये समाज को निर्देशित ज़रूर किया जा सकता, किन्तु परिवर्तित नहीं। न्यायपालिका के आदेशों के ज़रिये एलजीबीटीक्यू समुदाय अपने लिए सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित कर लेगा, यह केवल एक भ्रम है। सम्भव है कि उसकी निरंतर कोशिशें लम्बे अर्से में फलीभूत होने की सम्भावना पैदा करें। इसी परिपेक्ष्य में भारतीय मीडिया का एक वर्ग, ख़ासकर अंग्रेजी मिडिया समलैंगिकता की क़ानूनी स्वीकृति को ऐसे प्रस्तुत एवं समर्थन दे रहा है; मानो देश में अब यह आधुनिकता एवं विकास का पैमाना हो एवं समलैंगिकता के विरोधी जैसे पुरातनपंथी एवं मध्ययुगीन बर्बरता के प्रतीक हों। इसे वैचारिक विकृति ही कहा जाना चाहिए। दो व्यक्तियों के अपने निजी रुचि पर आधारित लैंगिक चयन एवं सहमति आधारित गोपनीय यौन सम्बन्धों पर समाज को कभी भी आपत्ति नहीं रही हैं। फिर समलैंगिकता आधारित विवाह को क़ानूनी मान्यता की ज़िद समझ पाना कठिन है। इससे कहीं अधिक ज़रूरी था कि ये बुद्धिजीवी वर्ग किन्नरों को मुख्यधारा में शामिल किये जाने को प्राथमिकता देता। अत: अब भी इस विषय पर आधुनिकता के प्रवर्तकों के न्याय की त्वरा, स्वयं की प्रमाणिकता सिद्धि की उत्तेजना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुंठित प्रदर्शन का औचित्य समझ पाना कठिन है।

यौन अभिरुचि ज़रूरी हो सकती है। परन्तु यौनिकता का नग्न प्रदर्शन एवं उसकी उन्मुक्तता का प्रसार सहज नहीं हो सकता। मान लेते हैं कि हर व्यक्ति को उसकी निजी लैंगिक अभिरुचि के आधार पर जीने का अधिकार होना चाहिए। ऐसे में क्या हो यदि भविष्य में कोई व्यक्ति किसी जानवर के साथ सहवास या विवाह को क़ानूनी मान्यता देने की माँग करे? यौन इच्छा की पूर्ति की मानवीय गरिमा के अनुकूल यदि कोई व्यक्ति स्कूल, कॉलेज, सरकारी द$फ्तरों या सडक़ पर सहमति के साथ सार्वजनिक आधार पर अपने साथी के सहवास का अधिकार माँगे, तो क्या इसकी इजाज़त दी जानी चाहिए? क्या किसी भी समाज में अधिकारों का वितरण स्वेच्छाचारिता के आधार पर किया जाना चाहिए? निजता के अधिकार एवं स्वतंत्रता के मुखर अलम्बदारों को भविष्य की दृष्टि से ऐसे प्रश्नों के उत्तर तलाश ही लेने चाहिए।

पश्चिम में लैंगिक मतवादिता भी वर्तमान दौर में अतिवाद की ओर अग्रसर है। यहाँ तर्कों के अजीब भँवर हैं। कुछ लोगों की माँग है कि स्त्री, पुरुषों के लिए अलग-अलग शौचालय नहीं होने चाहिए। महिलाओं की खेल प्रतियोगिता में पारलैंगिक पुरुषों के शामिल होने की आज़ादी हो साथ में स्कूलों में लैंगिक पहचान को निजी मामला सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है। देर-सवेर आधुनिकता का ये कुचक्र भारत तक भी पहुँचेगा। परन्तु भारतीय समाज को सचेत होना पड़ेगा। पश्चिमी उन्मुक्तता की विद्रूपता से प्रेरित आधुनिकता और मानवीय स्वतंत्रता की अतिवादिता के ये अनर्गल सन्दर्भ कहीं तो रुकने चाहिए।

(लेखक पत्रकार हैं और ये उनके अपने विचार हैं।)

ख़तरनाक मोड़ पर मणिपुर हिंसा

स्थिति से निपटने को लेकर मुख्यमंत्री पर उठ रहे सवाल

मणिपुर में हालात लगातार ख़राब हो रहे हैं। हिंसा ने राज्य में अब तक 100 के क़रीब लोगों की जान ले ली है और समुदायों के बीच पैदा हुई दूरी बढ़ती जा रही है। एक साल पहले ही दोबारा सत्ता में आयी भाजपा की सरकार इस बार इस मसले पर नाकाम साबित होती दिख रही है। मुख्यमंत्री नोंगथोम्बम बीरेन सिंह की छवि पर भी इससे बट्टा लगा है और उनकी कुर्सी ख़तरे में दिख रही है। मणिपुर में एन. बीरेन सिंह को कांग्रेस से भाजपा में आने के बाद 2017 में भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाया था। दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह मैतेई समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं, जो अपने लिए अनुसूचित जनजाति के दर्जे की माँग कर रहा है। सरकार को हिंसा बढऩे के कारण कई क्षेत्रों में कफ्र्यू और इंटरनेट पर बैन लगाना पड़ा है, जिससे आम जनजीवन ठहर-सा गया है।

एक मोटे अनुमान के मुताबिक, राज्य भर में स्थिति से निपटने के लिए 10,000 से ज़्यादा सैन्य और अर्ध-सैन्य कर्मियों को तैनात करना पड़ा है। राज्य का एक बड़ा पहाड़ी हिस्सा है, जो नगालैंड, मिजोरम, असम के अलावा पड़ोसी देश म्यांमार से सटा है; जनजातियों पर आधारित है। यहाँ की बड़ी आबादी राज्य की कुल आबादी का क़रीब 37 फ़ीसदी है। वहाँ तनाव का असली कारण यह है कि बहुसंख्यक मैतेई समुदाय अनुसूचित जनजाति का दर्जा चाहता है। हालाँकि पहाड़ी क्षेत्र की जनजातियाँ, जिनमें कुकी और नगा जनजातियाँ प्रमुख हैं, इसका जबरदस्त विरोध कर रही हैं।

मणिपुर की हिंसा से केंद्र सरकार भी चिन्तित है। इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को तीन दिन तक वहाँ दौरा करना पड़ा। अमित शाह के दौरे के दौरान मणिपुर केबिनेट के साथ 30 मई को हुई बैठक में पाँच अहम फ़ैसले किये गये। इन निर्णयों को शान्ति प्रक्रिया के तहत पूरे राज्य में तुरन्त लागू किया जाएगा। शाह ने कुकी आदिवासी नेताओं के साथ एक बैठक में केंद्रीय जाँच ब्यूरो की तरफ़ से हिंसा की जाँच की भी बात कही है। बैठक में क़ानून व्यवस्था को दुरुस्त करने, राहत कार्यों में तेज़ी लाने, जातीय संघर्ष में मारे गये लोगों के परिवारों को 10 लाख रुपये का मुआवज़ा देने और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने और अफ़वाहों को दूर करने के लिए बीएसएनएल की टेलीफोन लाइन फिर से खोलने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने का निर्णय किया गया। दोनों ही समुदाय विरोध से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। केंद्र सरकार भी इस मायने में नाकाम साबित हुई है कि उसने कई महीनों से सुलग रही आग को समझने में देरी की।

इधर चर्चित पत्रकार और फुटबॉलर रहे बीरेन सिंह को वैसे तो राज्य की ज़मीनी हक़ीक़त का माहिर माना जाता है; लेकिन हिंसा के इस दौर से वह राज्य को बाहर नहीं निकाल नहीं पाये हैं। कुकी और नगा जनजातियों और मैतेई समुदायों के बीच भडक़ी हिंसा को बीरेन सिंह रोकने में सफल नहीं रहे हैं। वहाँ बड़े पैमाने पर आगजनी और हिंसा हुई है। अर्ध सैनिक बलों को क़ानून-व्यवस्था सँभालने का ज़िम्मा दिया गया है। लेकिन असल मसला सि$र्फ क़ानून व्यवस्था का नहीं है, बल्कि समुदायों में बढ़ती दूरी का है, जो राज्य में भविष्य के लिए चिन्ता की बात है। राजनीतिक नेतृत्व सँभालने में फ़िलहाल नाकाम रहा है। राज्य में अब तक हज़ारों लोग बेघर हो चुके हैं। उन्हें शिविरों में रहना पड़ रहा है। मणिपुर में मैतेई समुदाय बहुसंख्यक समुदाय है। वह अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की माँग कर रहा है। कुकी और नगा जनजातियाँ इस माँग के विरोध में और नतीजा यह है कि इससे वहाँ हिंसा भडक़ रही है। मैतेई ट्राइब यूनियन (एमटीयू) ने इसे लेकर मणिपुर उच्च न्यायालय में एक याचिका भी डाली है, जिस पर मई के शुरू में सुनवाई करने के बाद उच्च अदालत ने राज्य सरकार से इस पर विचार करने को कहा था।

हालाँकि उच्च अदालत के सरकार को दिये गये सुझाव के अगले ही दिन ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन (एटीएसयू) ने चुराचांदपुर में एक रैली निकाली, जिसे उसने आदिवासी एकजुटता मार्च का नाम दिया। लेकिन इस मार्च के दौरान हिंसा भडक़ गयी, जिसने अब तक राज्य को अपनी लपटों में ले रखा है। राज्य के जानकारों का कहना है कि इतनी बड़ी हिंसा प्रदेश में पहले कभी नहीं हुई।

हिंसा पूरे राज्य में फैली है। इंफाल से लेकर दूरदराज़ के कांगपोकपी तक। वहाँ बड़ी संख्या में जले हुए मकान और वाहन हिंसा की कहानी ख़ुद कहते हैं। धार्मिक स्थलों पर भी हमले हुए हैं। राज्य में ऐसे बहुत से जानकार लोग हैं, जो मुख्यमंत्री को हिंसा में रोकने के लिए नाकाम रहने पर कठघरे में खड़ा करते हैं। मई के शुरू में जब राज्य में हिंसा भडक़ी थी, उससे पहले मुख्यमंत्री का एक बयान देश भर में सुर्ख़ियाँ बना, जिसमें उन्होंने कहा कि उनका राज्य म्यांमार से अवैध आप्रवासन का बड़ा ख़तरा झेल रहा है। मुख्यमंत्री के मुताबिक, उन्होंने इन अवैध आप्रवासियों की जाँच के लिए को समिति बनायी थी, जिसने 2,000 से ज़्यादा म्यांमार के नागरिकों की पहचान की है। राज्य सरकार ने म्यांमार के ऐसे 410 लोगों को हिरासत में लिया है।

जनजाति समुदायों की आशंका

कुछ रिपोटर्स के मुताबिक, कुकी जनजाति के बीच मुख्यमंत्री के रोल को लेकर नाराज़गी है। मैतेई समुदाय का कहना है कि अनुसूचित जनजाति श्रेणी में शामिल होने से उन्हें आरक्षण का लाभ मिल सकता है, साथ ही वन भूमि तक उनकी पहुँच बढ़ सकती है। यह चीज़ भी कुकी लोगों को परेशान किये हुए हैं, लिहाज़ा वे मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्ज देने के र्ख़िलाफ़ हैं और इसका जबरदस्त विरोध कर रहे हैं।

दरअसल कुकी और नगा जनजातियाँ इस आशंका से भरी हैं कि मैतेयी समुदाय जनजाति का दर्जा मिलने से उनकी वन भूमि तक पहुँच बढ़ जाएगी। इससे उनके इलाक़ों में बाहरी लोगों का दख़ल बढ़ जाएगा और उनकी सम्पदा के लिए ख़तरा पैदा हो जाएगा। लिहाज़ा वे इसका जबरदस्त विरोध कर रहे हैं। मुख्यमंत्री बीरेन सिंह का कहना है कि उन्हें मिली रिपोर्ट के मुताबिक, 40 आतंकवादी मारे गये हैं और उनसे एम-16 और एके-47 असॉल्ट राइफलों और स्नाइपर गन जैसे हथियार मिले हैं। सरकार पहले से ही वहाँ सेना और सुरक्षा बलों को मदद के लिए बुला चुकी है। क़ानून व्यवस्था की समीक्षा के लिए सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे तक मणिपुर का दौरा कर आये हैं।

यह कहा जाता है कि मुख्यमंत्री जिन लोगों के उग्रवादियों के रूप में मारे जाने की बात कर रहे हैं, उनमें काफ़ी लोग जनजातीय कुकी और नगा विद्रोही हैं। एक मौक़े पर लग रहा था कि मणिपुर में हिंसा थम जाएगी; लेकिन मई के आर्ख़िरी पखवाड़े में हालात फिर ख़राब हो गये। स्थिति यह हुई कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मणिपुर दौरे की घोषणा के बाद भी वहाँ हिंसा जारी रही। इस दौरान दूसरे दौर की हिंसा में 28 मई को एक ही दिन में पुलिस कर्मी सहित पाँच लोगों की मौत हो चुकी थी, जबकि कई घायल हुए थे। सम्पत्ति का नुक़सान अलग से हुआ था। कुकी-मैतेई समुदाय से शान्ति बनाने रखने की मुख्यमंत्री बीरेन सिंह की अपील का भी कोई असर होता नहीं दिखा है।