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हरी वादियों का चितेरा

अस्सी के दशक की शुरुआत से ही एक अकेले व्यक्ति के शांत प्रयासों ने ऐसे ग्रामीण आंदोलन की नींव रखी जिसने उत्तराखंड की बंजर पहाड़ियों को फिर से हराभरा कर दिया। सच्चिदानंद भारती की असाधारण उपलब्धियों को सामने लाने का प्रयास किया संजय दुबे ने।  

शायद ही कुछ ऐसा हो जो संच्चिदानंद भारती को उफरें खाल के बाकी ग्रामीणों से अलग करता हो। ये तो जब वो हमारा स्वागत गुलाब के फूल से करने के साथ हमें अपने गले लगाते हैं तब हमें एहसास होता है कि इसी असाधारण रूप से साधारण व्यक्ति के महान कृत्य हमें उफरें खाल खींच कर लाये हैं।

औपचारिकताओं से निबटकर जब हम चारो तरफ फ़ैली पर्वत श्रृंखलाओं पर नज़र दौडाते है तो हमें भारती जी की अद्भुत उपलब्धियों की गुरुता का एहसास हो जाता है। दरअसल भारती ने एक समय नग्न हो चुकी उत्तराखंड के पौड़ी ज़िले में स्थित दूधातोली पर्वत श्रृंखला के एक बड़े हिस्से को राज्य के सबसे बढिया और घने जंगलों में तब्दील कर दिया है। उनकी कोशिशों की बदौलत सैंकड़ो पेड़ सरकारी कुल्हाड़ी के शिकार होने से बच गए- ये छोटी सफलता एक बड़े परिवर्तन की नींव बनी। महत्वपूर्ण बात ये थी कि इस घटना ने उफरें खाल और इसके आसपास के लोगों में अपने अधिकारों की समझ और एकता की भावना पैदा कर दी।

साल 1960 के बाद अनियंत्रित औद्योगिकरण ने पहाड़ों के एक लंबे-चौड़े हिस्से को प्राकृतिक संपदा का गोदाम बना डाला। एक ऐसा गोदाम जिसमें मैदान की ज़रूरत के सामान रखे होते थे। 1970 के दशक में वन्य संपदा के विनाश को रोकने के लिए सबसे मशहूर संघर्ष था चिपको आंदोलन, इसकी शुरुआत चमोली ज़िले के गोपेश्वर नाम की जगह से हुई। भारती उस समय गोपेश्वर के कॉलेज में पढ़ रहे थे और इस आंदोलन में उन्होंने भी सक्रिय भुमिका निभाई। भारती जी ने पेड़ों के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए कॉलेज में एक समूह भी बनाया जिसका नाम था ‘डालियों का दागड़िया’ (पेड़ों के मित्र)। पढ़ाई खत्म करके जब वो उफरें खाल पहुंचे तो वहां भी उनका सामना विनाश की कुछ ऐसी ही परिस्थितियों से हुआ। भारती बताते हैं, "उसी दौरान वन विभाग ने डेरा गांव के समीप लगे पेड़ों का एक बड़ा हिस्सा काटने का फैसला किया। चिपको आंदोलन से जुड़ा होने की वजह से मुझे पता था कि इस परिस्थिति से कैसे निपटना है, मैंने गांव वालो को साथ लेकर अभियान शुरू कर दिया।" उनकी कोशिशों की बदौलत सैंकड़ो पेड़ सरकारी कुल्हाड़ी के शिकार होने से बच गए। बाद में ये छोटी सी सफलता एक बड़े परिवर्तन की नींव बनी। महत्वपूर्ण बात ये थी कि इस घटना ने उफरें खाल और इसके आसपास के लोगों में अपने अधिकारों को लेकर समझ और एकता की भावना पैदा कर दी।

पहाड़ों के बुजुर्ग याद करते हैं कि किस तरह से एक समय में यहां के वन, इनमें रहने वाले जंगली जानवरों और इस पर ईंधन और भोजन के लिए आश्रित गाँव वालों, दोनों के लिए पर्याप्त हुआ करते थे। लेकिन, जैसे-जैसे जंगलो की कटाई अनियंत्रित होती गई, गाँव वालो को दोहरी मार झेलनी पड़ गई– एक तरफ़ तो उनके लिए ज़रूरी संसाधनों का अकाल पड़ने लगा, वहीं दूसरी ओर जंगली जानवर भी सिकुड़ते वनों के चलते अपनी ज़रूरतें पूरी न होने से इंसानी रिहाइशों में सेंध लगाने लगे थे। लेकिन भारती की सलाह पर पास के डेरा गांव के लोग इन जानवरों को मारने की बजाय अपने घरों और खेतों के चारो तरफ चारदीवारियां खड़ी करने लगे। 1980 में बननी शुरू हुई दीवार के लिए सिर्फ डेरा गांव के ही नहीं बल्कि दूसरे गांवो के लोगों ने भी आर्थिक सहयोग दिया। आज 9 किमी लंबी इस दीवार के प्रयोग को और जगहों पर भी लागू किया जा रहा है। इसी दौरान भारती ने एक स्थानीय स्कूल में अध्यापन का कार्य भी शुरू कर दिया। उनके पुराने साथी और पेशे से डॉक्टर, दिनेश ने बताया कि ये उनकी सफलता के सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक था। क्योंकि ऐसा करने से वो सीधे-सीधे पर्यावरण सरंक्षण के संदेश को नई पीढी तक पहुंचा पाए। 

1970 के अंत तक जंगलों की कटाई इस स्तर पर पहुंच चुकी थी कि इसने सरकारी अमले में भी इससे निपटने के लिए क़दम उठाने की बेचैनी पैदा कर दी। उन्होंने संरक्षित वनों के खाली पड़े भू-भाग पर चीड़ के पेड़ लगाने शुरू कर दिए। भारती के अनुसार ये क़दम खतरनाक साबित हुआ। वो कहते हैं, "चीड़ के जंगलों ने ज़मीन में नमी का स्तर तेज़ी से कम किया और नमी की कमी के साथ चीड़ के पेड़ों की पत्तियों में मौजूद ज्वलनशील पदार्थ ने  जंगल में आग की घटनाओं को भी बढ़ा दिया। इसके अलावा चीड़ की जड़ों में मिट्टी की बेहतर पकड़ के गुण न होने के चलते भू-स्खलन के खतरे भी बढ़ गए।" 1980 में भारती ने एक दूसरा तरीका निकाला। वन विभाग की मदद से उन्होंने स्थानीय पहाड़ी प्रजाति के पौधे–देवदार, बुरांस, बांच आदि–की नर्सरी खोली। ये कोशिश बाद में दूधातोली लोक विकास संस्थान(डीएलवीएस) के रूप में विकसित हुई जो आज पूरे क्षेत्र में स्थानीय पहाड़ी पौधे लगाने के साथ-साथ अपने अपने साथ जुड़े 150 गांवों मेंइसी समय भारती गांधी शांति प्रतिष्ठान के अनुपम मिश्र के संपर्क में आए, जिन्होंने उन्हें छोटे स्तर की बावड़ियों और पानी के स्रोत तैयार करने के तरीके सुझाए। भारती ने इन सिद्धांतों को अपनी ज़रूरतों के हिसाब से ढाल लिया और पुराने, सूखे पड़े पानी के स्रोतों को पुनर्जीवित करना शुरू कर दिया। सालाना पर्यावरण जागरुकता शिविर का आयोजन भी करता है। डीएलवीएस क्षेत्र की महिलाओं के सशक्तिकरण का भी बड़ा ज़रिया बना है–पहाडों में कामकाज के अभाव में ज्यादातर पुरूष मैंदानो की ओर चले जाते है और घर की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधे पर आ जाती है और इन्हें ही संसाधनों के अकाल की मार झेलनी पड़ती है। इनकी सहभागिता बढ़ाने के लिए भारती ने हर गांव में महिला मंगल दल की नींव डाली और उनके सुरक्षित भविष्य की जिम्मेदारी का थोडा सा बोझा उन्ही के कन्धों पर डाल दिया। पहले वृक्षारोपण अभियान के बाद जितने गांवो ने इसमें हिस्सा लिया था उन्होंने एक सामूहिक फैसला लिया कि अगले 10 सालों तक जंगल में सारी प्रतिकूल गतिविधियां रोक दी जाएंगी। महिला मंगल दल के माध्यम से महिलाओं ने जंगलों के रखरखाव और उनमें किसी के अवांछित प्रवेश को रोकने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली।

एक दशक के भीतर ही दूधातोली के लोगों ने अपने खोए हुए जंगलों का एक बड़ा हिस्सा वापस पा लिया। भारती गर्व से बताते हैं कि पिछले 27 सालों के दौरान पूरे जंगल को लगाने में गांव वालों ने बमुश्किल 5-6 लाख रूपए खर्च किए होंगे। शुरुआती नर्सरी स्थापित करने के लिए मिली सहायता के बाद डीएलवीएस ने कभी कोई और सरकारी सहायता नहीं मांगी। इसकी बजाय नर्सरी के पौधों की बिक्री के जरिए इसने अपने कार्यक्रमों के लिए धन का बंदोबस्त ख़ुद ही किया। असल में भारती वन संरक्षण को लेकर सरकारी रवैये की आलोचना करते हैं। उनके मुताबिक, "वन रिज़र्व करने का अर्थ है पहाड़ी लोगों के वन में प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगना लेकिन पैसे के लालच में वन अधिकारी ठेकेदारों के साथ मिलकर इन्ही कानूनों का खुले आम उल्लंघन करते हैं।"

1987 में पूरा इलाका भीषण सूखे की चपेट में था। चिंतित डीएलवीएस ने हर पेड़ के पास एक छोटा सा गड्ढा बनाने का फैसला किया ताकि इनमें पानी इकट्ठा हो सके और पेड़ों को जीने के लिए कुछ औऱ समय मिल सके। इसी समय भारती गांधी शांति प्रतिष्ठान के अनुपम मिश्र के संपर्क में आए, जिन्होंने उन्हें छोटे स्तर की बावड़ियों और पानी के स्रोत तैयार करने के तरीके सुझाए। भारती ने इन सिद्धांतों को अपनी ज़रूरतों के हिसाब से ढाल लिया और पुराने, सूखे पड़े पानी के स्रोतों को पुनर्जीवित करना शुरू कर दिया। इसके अलावा उन्होंने कई नए जलस्रोतों का भी निर्माण किया। नतीजा, छोटे-बड़े लगभग 12 हजार तालाब अब 40 से ज्यादा गांवों की पानी की जरूरत बखूबी पूरी करते हैं। सिमकोली गांव के सतीश चंद्र नौटियाल एक छोटे से कुएं की तरफ इशारा करके बताते हैं कि 2005 में इसे बनाने में भारती ने उनकी सहायता की थी। वो कहते हैं कि आज ये कुआं ही पूरे गांव के आस्तित्व का आधार है।

भारती से विदा लेते वक्त उनके पुराने साथी रहे पोस्टमैन दीनदयाल धोंडियाल और किराना व्यापारी विक्रम नेगी के चेहरे गर्व से चमक रहे थे। नेगी कहते हैं, "जंगलो की कटाई रोकना तो एक छोटा सा क़दम था। असली चुनौती थी पहाड़ों की खत्म हो चुकी सुंदरता को फिर से वापस लाना।"

निस्संदेह भारती और उनके साथियों ने इस चुनौती पर एक चमकदार जीत अर्जित की है।

थोड़े हिंदू, थोड़े मुसलमां, पूरे इंसां

नसीब खान ने हाल ही में अपने बेटे प्रकाश सिंह की शादी राम सिंह की बेटी गीता से की. तीन महीने पहले हेमंत सिंह की बेटी देवी का निकाह एक मौलवी की मौजूदगी में लक्ष्मण सिंह से हुआ. माधो सिंह को जब से याद है वो गांव की ईदगाह में नमाज पढ़ते आ रहे हैं मगर जब होली या दीवाली का त्यौहार आता है तो भी उनका जोश देखने लायक होता है. 

नामों और परंपराओं के इस अजीबोगरीब घालमेल पर आप हैरान हो रहे होंगे. मगर राजस्थान के अजमेर और ब्यावर से सटे करीब 160 गांवों में रहने वाले करीब चार लाख लोगों की जिंदगी का ये अभिन्न हिस्सा है. चीता और मेरात समुदाय के इन लोगों को आप हिंदू भी कह सकते हैं और मुसलमान भी. ये दोनों समुदाय छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों से मिलकर बने हैं और इनमें आपसी विवाह संबंधों की परंपरा बहुत लंबे समय से चली आ रही है. खुद को चौहान राजपूत बताने वाले ये लोग अपना धर्म हिंदू-मुस्लिम बताते हैं. उनका रहन-सहन, खानपान और भाषा काफी-कुछ दूसरी राजस्थानी समुदायों की तरह ही है मगर जो बात उन्हें अनूठा बनाती है वो है दो अलग-अलग धर्मों के मेल से बनी उनकी मजहबी पहचान.

ये समुदाय कैसे बने इस बारे में कई किस्से प्रचलित हैं. एक के मुताबिक एक मुसलमान सुल्तान ने उनके इलाके पर फतह कर ली और चीता-मेरात के एक पूर्वज हर राज के सामने तीन विकल्प रखे. फैसला हुआ कि वो इस्लाम, मौत या फिर समुदाय की महिलाओं के साथ बलात्कार में से एक विकल्प को चुन ले. कहा जाता है कि हर राज ने पहला विकल्प चुना मगर पूरी तरह से इस्लाम अपनाने के बजाय उसने इस धर्म की केवल तीन बातें अपनाईं—बच्चों को खतना करना, हलाल का मांस खाना और मुर्दों को दफनाना. यही वजह है कि चीता-मेरात अब भी इन्हीं तीन इस्लामी रिवाजों का पालन करते हैं जबकि उनकी बाकी परंपराएं दूसरे स्थानीय हिंदुओं की तरह ही हैं. हर राज ने पहला विकल्प चुना मगर पूरी तरह से इस्लाम अपनाने के बजाय उसने इस धर्म की केवल तीन बातें अपनाईं—बच्चों को खतना करना, हलाल का मांस खाना और मुर्दों को दफनाना. यही वजह है कि चीता-मेरात अब भी इन्हीं तीन इस्लामी रिवाजों का पालन करते हैं।

मगर चीता-मेरात की इस अनूठी पहचान पर खतरा मंडरा रहा है. इसकी शुरुआत 1920 में तब से हुई जब आर्य समाजियों ने इन समुदायों को फिर पूरी तरह से हिंदू बनाने के लिए अभियान छेड़ दिया. आर्यसमाज से जुड़ी ताकतवर राजपूत सभा ने समुदाय के लोगों से कहा कि वो इस्लामी परंपराओं को छोड़कर हिंदू बन जाएं. कहा जाता है कि कुछ लोगों ने इसके चलते खुद को हिंदू घोषित किया भी मगर समुदाय के अधिकांश लोग इसके खिलाफ ही रहे. उनका तर्क था कि उनके पूर्वज ने मुस्लिम सुल्तान को वचन दिया था और इस्लामी रिवाजों को छोड़ने का मतलब होगा उस वचन को तोड़ना.

अस्सी के दशक के मध्य में चीता-मेरात समुदाय के इलाकों में हिंदू और मुस्लिम संगठनों की सक्रियता बढ़ी जिनका मकसद इन लोगों को अपनी-अपनी तरफ खींचना था. अजमेर के आसपास विश्व हिंदू परिषद ने भारी संख्या में इस समुदाय के लोगों को हिंदू बनाया. उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए इस संगठन ने गरीबी से ग्रस्त इस समुदाय के इलाकों में कई मंदिर, स्कूल और क्लीनिक बनाए. विहिप का दावा है कि चीता-मेरात पृथ्वीराज चौहान के वंशज हैं और उनके पूर्वजों को धर्मपरिवर्तन के लिए मजबूर किया गया था.

मगर समुदाय का एक बड़ा हिस्सा अब भी इस तरह के धर्मांतरण के खिलाफ है. इसकी एक वजह ये भी है कि हिंदू बन जाने के बाद भी दूसरे हिंदू उनके साथ वैवाहिक संबंध बनाने से ये कहते हुए इनकार कर देते हैं कि मुस्लिमों के साथ संबंधों से चीता-मेरात अपवित्र हो गए हैं.

इस इलाके में इस्लामिक संगठन भी सक्रिय हैं. इनमें जमैतुल उलेमा-ए-हिंद, तबलीगी जमात और हैदराबाद स्थित तामीरेमिल्लत भी शामिल हैं जिन्होंने यहां मदरसे खोले हैं और मस्जिदें स्थापित की हैं. जिन गांवों में ऐसा हुआ है वहां इस समुदाय के लोग अब खुद को पूरी तरह से मुसलमान बताने लगे हैं. हिंदू संगठनों के साथ टकराव और प्रशासन की सख्ती के बावजूद पिछले दो दशक के दौरान इस्लाम अपनाने वाले इस समुदाय के लोगों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है.

मगर इस सब के बावजूद चीता-मेरात काफी कुछ पहले जैसे ही हैं. हों भी क्यों नहीं, आखिर पीढियों पुरानी परंपराओं से पीछा छुड़ाना आसान नहीं होता. समुदाय के एक बुजुर्ग बुलंद खान कहते हैं, हमारा दर्शन है जियो और जीने दो. लोगों को ये आजादी होनी जाहिए कि वो जिस तरह से चाहें भगवान की पूजा करें. खान मानते हैं कि उनमें से कुछ अपनी पहचान को लेकर शर्म महसूस करते हैं. वो कहते हैं, लोग हमें ये कहकर चिढ़ाते हैं कि हम एक ही वक्त में दो नावों पर सवार हैं. मगर मुझे लगता है कि हम सही हैं. हम मिलजुलकर साथ-साथ रहते हैं. हम साथ-साथ खाते हैं और आपस में शादियां करते हैं. धर्म एक निजी मामला है और इससे हमारे संबंधों पर असर नहीं पड़ता.

खान के भतीजे रोहन सिंह बीच में बोल पड़ते हैं, हम खास हैं. मुझे नहीं लगता कि पूरे भारत में हमारे जैसा कोई दूसरा समुदाय होगा.

उनकी बात में दम है.

योगिंदर सिकंद

असरदार फनकारों के चमत्कार

अपनी तिकड़मों और पहुंच के ज़रिए हर सरकारी ताले को खोलने की क्षमता और हर लाल फीते की काट रखने वाले असरदार लोगों की सर्वव्यापी मगर अदृश्य दुनिया…शांतनु गुहा रे की रिपोर्ट .

पिछले महीने का एक शांत मंगलवार. मध्य दिल्ली के एक पांच सितारा होटल की सबसे ऊपरी मंज़िल. रेस्टोरेंट की दर्जनों मेजों में से सिर्फ चार पर ही लोग नज़र आ रहे हैं. एक मेज पर एक पूर्व वरिष्ठ संपादक एक बड़े कैबिनेट मंत्री के साथ लंच कर रहे हैं. दूसरी पर दिल्ली सरकार के एक संकटमोचक और धन का जुगाड़ करने वाले व्यापारी जमे हुए हैं. तीसरे पर एक प्रभावशाली व्यक्ति और वरिष्ठ राजनेता के बीच गुपचुप बातचीत चल रही है. सिर्फ चौथी मेज ही भोजन के मकसद से यहां आई महिलाओं से भरी है. 

एक ऐसे शहर में, जहां घात और प्रतिघात का खेल चलता ही रहता हो, जहां फाइल पर एक छोटी सी टिप्पणी लाखों-करोड़ों का हेर-फेर करा सकती हो, और जहां सत्ता की कुंजियां कई तरह से घुमाई जा सकती हों, ये एक ऐसा नज़ारा है जो अक्सर कई जगहों पर देखा जा सकता है. दिल्ली जिमखाना क्लब, ओबेरॉय और ताज होटल के निजी क्लबों, दिल्ली गोल्फ क्लब की हरियाली या फिर जाड़ों में इंपीरियल होटल की कॉफीशॉप के बरामदे में ऐसे नज़ारे एक आम सी बात हैं. 

 

दिलीप चेरियन 

असरदार लोगों की इस दुनिया में आपका स्वागत है. पुरुषों और महिलाओं की एक ऐसी छोटी सी प्रजाति जिसे अच्छी तरह से पता है कि सत्ता को साधे बिना पैसे से पैसा नहीं बन सकता और सत्ता साधने के कई तरीके हैं. बातें बनाने से लेकर, जितना ज़रूरी उतना दबाव, मीडिया का इस्तेमाल, जनहित की झूठी-सच्ची कहानियां, करीबियों के ज़रिये सेंध और इस सबके ऊपर ब्रह्मास्त्र यानी कि निजी लाभ का प्रलोभन तक सब कुछ इसमें शामिल है. 

अमेरिका या फिर दुनिया के कई और दूसरे हिस्सों में सत्ता के ऐसे साधकों को वैधता मिली हुई है. वहां इसे लॉबीइंग कहा जाता है. घात-प्रतिघात की बजाय वहां सरकार के निर्णय तंत्र पर लॉबीइंग और इसकी काट का प्रभाव साफ देखा जा सकता सकता है. मगर भारत में स्थितियां ऐसी नहीं हैं. ऊपरी मंज़िल पर मौजूद लंच कर रहे लोग खुद को सुने जाना तो चाहते हैं मगर हर किसी के द्वारा नहीं. 

हाल के दिनों तक भारत में लॉबीइंग सिर्फ संदिग्ध ही नहीं थी बल्कि इसकी सामाजिक स्वीकार्यता भी नहीं थी. इसे हर्षद मेहता जैसे बड़े दलालों और उनके  नोटों से भरे सूटकेसों के रूप में देखा जाता था मगर अब परिस्थितियां बिल्कुल बदल चुकी हैं. आज सूटकेसों के रंगरूप बदल चुके हैं और केवल ये ही पर्याप्त भी नहीं रहे. आज प्रभावकारी होने के लिए एक योजना का होना भी बेहद बहुत जरूरी है, एक ऐसा व्यावसायिक प्रस्ताव जिसमें देश और उपभोक्ताओं के हितों का पाठ भी शामिल हो. एक झूठा पाठ!

ये खेल अब पूरी तरह से पेशेवर लोगों का बन गया है. तिकड़म के इस खेल के माहिर लोगों को पता है कि असर सबसे बढ़िया तब होता है जब इसकी कोशिशें अप्रत्यक्ष तरीकों से की गई हों और ये कोशिशें महत्वपूर्ण लोगों के साथ खाने, पार्टियों और गोल्फ के खेल के दौरान की जाती हैं. मीडिया को भी इसमें इस्तेमाल किया जाता है, खबरों की आड़ में अपने हितों को सामने रखकर.

और ऐसा किसी के लिए फ्री में नहीं किया जाता. इसके लिए डेढ़ लाख डॉलर सालाना से लेकर उपयोगिता के हिसाब से कुछ भी रकम वसूली जा सकती है. तिकड़मबाजी अब भारत में अपयश की वजह नहीं रही…

 

वी बालसुब्रमण्यम

परफेक्ट रिलेशन के कंसल्टिंग पार्टनर दिलिप चेरियन कहते हैं, अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले बहुत से लोग लॉबीइंग को बेहतरीन तरीके से अंजाम देते हैं. आज लॉबीइंग के लिए चैंबर ऑफ कामर्स मौजूद हैं, वकील हैं, चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं, सेवानिवृत्त नौकरशाह हैं जो नीति निर्धारकों को पटाने के काम में लगे रहते हैं.” 

ये बात चेरियन से अच्छी तरह कौन समझ सकता है. वो इस काम को देश में स्थापित करने वाले शुरुआती लोगों में से एक हैं. उन्होंने शिबू सोरेन के लिए इस काम की शुरुआत की थी जो उस समय संसद सदस्य थे. शुरुआत में चेरियन उद्योग मंत्रालय से जुड़े ब्यूरो ऑफ इंडस्ट्रियल कॉस्ट में परामर्श सेवाएं दिया करते थे जिससे उन्हें भारतीय नौकरशाही को गहराई से समझने और लंबे चौड़े स्तर पर लोगों से संपर्क बनाने का मौका मिला. बाद में वे बिजनेस इंडिया और बिज़नेस एंड पॉलिटिकल ऑब्ज़र्वर के संपादक रहे जिसने उनके रसूख को और भी मजबूत बना दिया. 

एक लॉबीइस्ट और मीडिया मैनेजर के रूप में चेरियन की सबसे बड़ी सफलता रही ब्रिटिश अमेरिकन टुबैको (बीएटी) द्वारा आईटीसी के अधिग्रहण को नाकाम करना. लोगों की सोच को प्रभावित करने की मीडिया में चली लड़ाई में उनकी कंपनी परफेक्ट रिलेशन ने अपनी विरोधी और बीएटी द्वारा अनुबंधित एजेंसी गुड रिलेशन के हर दांव को लगातार मात दी. जैसा कि बिज़नेस स्टैंडर्ड ने साफ शब्दों में लिखा कि सिर्फ गुड होना ही पर्याप्त नहीं है आपको परफेक्ट होना पड़ेगा. 

 

शंकर अडवाल

चेरियन भले ही इस बारे में कुछ न बोलें कि किस तरह से उनकी टीम ने फाइलों को सत्ता के गलियारों में सफलता से आगे बढ़ाया लेकिन दिग्गज यूरोपियन पैकेजिंग कंपनी टेट्रा पैक (जो कच्चे सामान के आयात करों में कटौती चाहती थी) के लिए की गई उनकी कोशिशें अख़बारों की ख़बरों में अच्छी तरह से क़ैद हैं. एक तरफ उनके आदमी करों में कटौती के लिए लॉबीइंग कर रहे थे तो दूसरी तरफ चेरियन दूध विक्रेताओं को उकसा रहे थे कि वो अपने सांसदों के जरिये सरकार पर गत्ते के डब्बों के दामों में कटौती का दबाव बनाएं. वित्त मंत्रालय के पास पिघलने के अलावा कोई चारा नहीं था.

इस बारे में पूछने पर चेरियन मुस्करा कर सिर्फ ये कहते हैं, इस तरह के काम के प्रभाव को सबसे बढ़िया तरीके से उड्डयन क्षेत्र में देखा जा सकता है. कई साल पहले एक विदेशी एयरलाइन को भारत में आने से रोकने के लिए की गई लॉबीइंग ने भारत सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव करने के लिए मजबूर कर दिया था. साफ तौर पर उनका इशारा टाटा-सिंगापुर एयरलाइंस गठजोड़ की ओर था जो 90 के दशक की शुरुआत में सिर्फ इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि ये एक निजी ऑपरेटर के हितों के खिलाफ था.

असरकारी लोगों और उनके ग्राहकों का मकसद अक्सर नियामक कानूनों में परिवर्तन करवाना होता है लेकिन इसके लिए सबसे अहम है मीडिया और उससे मिले जनसमर्थन के जरिये माहौल को अपने पक्ष में बनाना. संकर बीजों को लेकर भारतीय बाज़ार में प्रवेश करते वक्त मॉनसैन्टो को इस बात की पूरी जानकारी थी. इसलिए शुरुआती चरण में ही उन्होंने एक जनसंपर्क संस्था की सेवाएं लीं. उन्होंने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए एक ज़ोरदार अभियान छेड़ा. इटालियन फैशन कंपनी एरमैनगिल्डो ज़ेग्ना को लॉबीइंग की अहमियत तब समझ आयी जब पहली बार वाणिज्य मंत्रालय ने भारत में बुटीक खोलने की उनकी अर्जी ठुकरा दी थी. हालांकि बाद में भूलसुधार करने पर उन्हें इसकी अनुमति दे दी गई.

माहौल तैयार करने के इस खेल में चेरियन माहिर हैं. आदर्श संबंध बनाने की गूढ़ कला की समझ में उनका कोई सानी नहीं है. राजधानी में लगे हर सरकारी ताले की मास्टरचाबी उनके पास है. राजस्थान के सांसद अपने राजनीतिक विरोधियों को मात देने के लिए उनके पास आते हैं, होटल मालिक अपनी परियोजनाओं की सफलता के लिए उनकी मदद मांगते हैं और रक्षा उपकरण, निर्माण, हाइड्रोकार्बन व शराब क्षेत्र से जुड़े दिग्गज नीतियों को अपने हित में मोड़ने के लिए उनकी मदद की आस लगाते हैं.हाल ही में बीआरटी कॉरीडोर की असफलता के बाद पिटी भद्द से परेशान दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अपनी छवि चमकाने के लिए इसी संकटमोचक की सेवाएं ली हैं.

चेरियन को इस बात की भी अच्छी समझ है कि अक्सर लोगों को सिर्फ एक दूसरे से मिलाने भर से काम हो जाता है.  अगर कोई किसी से मिलना चाहता है या फिर दिल्ली की ऊंची सोसाइटी में प्रवेश करना चाहता है तो ऐसा करने की जादुई छड़ी चेरियन के पास है. उनकी पहचान ऐसे व्यक्ति के रूप में है जो घर का बना एक सैंडविच खाकर सोने से पहले शहर की पांच अलग अलग पार्टियों में शामिल होता है. 

 

ए एन सेतुरमन 

फिर भी चेरियन या उन जैसे लोगों का एक पूरा झुंड रिलांयस के वी बालासुब्रमण्यम, शंकर अडवाल और एएन सेतुरामन की तिकड़ी के आगे अपनी चमक खो देता है. 

वी बालासुब्रमण्यम उर्फ बालू एक समय अविभाजित रिलांयस के लिए इस तिकड़ी का नेतृत्व कर चुके हैं. 70 के दशक में बालू करोलबाग स्थित अपने घर से धारांगंधा चीनी मिल तक– जहां वो एक छोटे से मैनेजर थे– साइकल से आते-जाते थे. धीरूभाई अंबानी की पारखी नजर ने उनकी प्रतिभा को पहचान उन्हें साउथ और नॉर्थ ब्लॉक के नौकरशाहों के साथ तालमेल बिठाने की जिम्मेदारी सौंप दी. इनमें तमिल ब्राह्मणों की बहुलता थी और इसी वजह से बालू इस काम के लिए बिल्कुल मुफीद थे. वो अलफांसो आम के बक्से और गुलाब के गुलदस्तों के साथ नियमित रूप से मंत्रियों से मिला करते थे. उनकी इस कार्यकुशलता ने उन्हें रिलायंस इंडस्ट्रीज़ का ग्रुप प्रेसीडेंट बना दिया. 

बाकी सब इतिहास का हिस्सा है. वो धीरूभाई के सबसे वफादार लोगों में शुमार थे. एक ऐसा आदमी जो धड़ल्ले से तमिल, कामचलाऊ अंग्रेज़ी और द्विअर्थी हिंदी बोलता था. अक्सर यूएनआई की कैंटीन में दो रूपए वाला दोसा खाने वाले इस शख्स के सटीक व्यवहारकौशल ने नुस्ली वाडिया, टाटा और दूसरे विरोधियों से आगे निकलने में अंबानी परिवार की सहायता की. सत्ता की कुंजियों पर उनकी मजबूत पकड़ की कहानियां मिसाल बन चुकी हैं.

उस जमाने की एक मशहूर पत्रिका संडे ने एक बार एक सनसनीखेज स्टोरी प्रकाशित की थी. इसमें कहा गया था कि वित्त मंत्रालय ने बालू के बजट पूर्व सुझावों को जस का तस वित्तमंत्री के संसद में दिए गए भाषण में लगा दिया. दबी जुबान में चर्चा होती थी कि मेरीडियन टॉवर की पांचवीं मंज़िल पर स्थित उनके ऑफिस में बेहतर विभाग पाने के लिए तमाम मंत्री शीष नवाने जाते हैं. साथ ही ये भी कि वे किसी भी वक्त किसी भी मुद्दे पर पार्टियों से परे जाकर कम से कम 150 सांसदों का समर्थन जुटा सकते हैं. धीरूभाई अंबानी, बालू और रिलांयस के तेज़तर्रार वित्तीय प्रमुख डीएन चतुर्वेदी को अक्सर भारतीय अर्थव्यवस्था की एबीसी कहा जाता था. आज तक कोई भी पेट्रोलियम मंत्रालय पर उनकी पकड़ का मुकाबला नहीं कर सका है. बालू की असाधारण सफलता को 1998 में उस वक्त तगड़ा झटका लगा जब वो रोमेश शर्मा के साथ रियल इस्टेट के धंधे में शामिल पाए गए जो कि बाद में दाउद का आदमी निकला. बालू पर गोपनीयता कानून के उल्लंघन का भी आरोप लगा क्योंकि उनके कुछ नासमझ सहायकों ने सरकारी फाइलों में ही कुछ निर्देश लिख दिए थे. सीबीआई जांच के दौरान बालू ने काफी परेशानियों का सामना किया. बाद में रिलायंस के ही एक अन्य संकटमोचक ने उनकी मदद की.

 

टोनी जेसुदासन

बालू के पतन से शंकर अडवाल के उत्थान का रास्ता तैयार हुआ. इन्हें मुकेश अंबानी अपने टेलीकॉम उपक्रम में मदद के लिए आगे लाए थे. एक समय बालू के नायब रहे अडवाल ने रिलांयस द्वारा 70,000 किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर लाइन बिछाने के रास्ते में विरोधियों द्वारा डाली गई तमाम अड़चनों को सफलतापूर्वक हटा डाला. यद्यपि अडवाल गोपनीयता कानून के मामले में जेल की हवा खा चुके हैं लेकिन सत्ता के गलियारों में उनकी जबर्दस्त धाक अब भी कायम है. अक्सर किसी चलते-फिरते दरबार के साथ (पांच लोग अडवाल के आगे और पांच लोग पीछे) नज़र आने वाले अडवाल फिलहाल ल्यूटेन की दिल्ली में मुकेश अंबानी के सबसे प्रिय योद्धा के रूप में तैनात हैं जो नौकरशाही के ऐसे किसी भी लाल फीते को काटने की कुव्वत रखता है जो उनकी कंपनी की राह का रोड़ा बन रहा हो.

तिकड़ी के तीसरे सदस्य हैं मृदुभाषी ए एन सेतुरमन. बालू के भांजे सेतुरमन अंबानी भाइयों में बंटवारे के बाद चमके. कद के हिसाब से देखा जाए तो आज वो अपने मामा को काफी पीछे छोड़ चुके हैं. रिलायंस की परंपरागत शैली से हटकर सेतुरमन अपना काम साधने के लिए तर्क, पामटॉप और पॉवर प्वॉइंट प्रेजेंटेशन के मेल को उपयोग में लाते हैं. कभी तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में बढ़िया पैठ रखने वाले इस शख्स ने रिलायंस के बंटवारे के बाद अब दूरसंचार मंत्रालय पर अपना ध्यान केंद्रित किया है. अनिल अंबानी के जीएसएम एजेंडे को विभागीय फाइलों की भुलभुलैया में रास्ता दिखाने का श्रेय सेतुरमन को ही जाता है.

विघ्नहर्ता और भी हैं. उदाहरण के लिए टोनी जेसुदासन जिन्हें धीरुबाई अंबानी ने खोजा था और जो लंबे समय से अंबानी परिवार के साथ जुड़े हुए हैं. जेसुदासन दिल्ली में अनिल अंबानी के संकटमोचक और देश के मीडिया समूहों में काम कर रहे ज्यादातर शीर्ष संपादकों के दोस्त हैं. इनके साथ वो लंच या डिनर करते हुए व्यापार के अलावा रॉक संगीत, सिगार, डाइट बीअर की भी चर्चा करते हैं. वो इस बात को बखूबी समझते हैं कि सिर्फ खुशामद से काम नहीं चलता. आपके पास एक सोच भी होनी चाहिए. जेसुदासन कहते हैं, लॉबीइंग में मीडिया एक अहम भूमिका निभाता है.”

तिकड़म के इस खेल के एक और बड़े खिलाड़ी हैं दीपक तलवार. पूर्व कार्गो एजेंट दीपक तलवार की सवारी एक जमाने में लूना मोपेड हुआ करती थी मगर आज उनकी जिंदगी हवाई यात्राओं और पांचसितारा होटलों के इर्दगिर्द घूमती है. कई अहम मंत्रालयों के साथ हॉटलाइन रखने वाले तलवार को भारतीय नौकरशाही में सर्वव्यापी होकर भी अदृश्य रहने की कला के लिए जाना जाता है.

 

दीपक तलवार

सत्ता के गलियारों तक पहुंचने में तलवार की मदद की पीवी नरसिम्हा राव के मुख्य सचिव ए एन वर्मा ने जो उस समय फॉरेन इनवेस्टमेंट प्रोमोशन बोर्ड के भी अध्यक्ष थे. तलवार और वर्मा की निकटता की उस समय खूब चर्चा हुआ करती थी. तलवार को पहली सफलता तब मिली जब उन्होंने ब्रिटश कंपनी यूनाइटेड डिस्टलर्स (यूडी) के लिए एक सौदा पटाया. यूडी को अन्न तकनीक के लिए एक संयंत्र आयात करना था जो कि उस समय के सरकारी नियमों के हिसाब से एक महंगा सौदा होता. तलवार की लॉबीइंग के चलते नियमों में फेरबदल किया गया और यूडी को मुंबई में स्थित बंद पड़े एक संयंत्र के आधुनिकीकरण की इजाजत दे दी गई. इससे कंपनी का काफी पैसा बच गया.

इसके बाद तलवार कोकाकोला के काम आए. दरअसल भारत में कोक के प्रवेश को सुगम बनाने के लिए बिस्किट किंग राजन पिल्लई कोकाकोला के साथ एक संयुक्त उपक्रम स्थापित करने की सोच रहे थे. कई लोग याद करते हैं कि किस तरह तलवार, कोका कोला के शीर्ष अधिकारियों को बड़ी आरामदायी कारों की बजाय एंबेसडर में बिठाकर मंत्रालयों तक ले जाया करते थे. बाद में अज्ञात कारणों से पिल्लई को दरकिनार कर दिया गया और तलवार ने अटलांटा की इस बहुराष्ट्रीय कंपनी के अकेले ही भारत आने का मार्ग प्रशस्त कर दिया. पिल्लई ने इस पर कानूनी कार्रवाई की धमकी दी और अपने काम के लिए एक दूसरी जनसंपर्क कंपनी का सहारा लिया मगर उनकी दाल गली नहीं.

तब से तलवार अमेरिकन इंश्योरेंस ग्रुप, ब्रिटिश अमेरिकन टोबैको (बैट), ड्यू पांट, ग्लैक्सो-स्मिथक्लाइन और जनरल मोटर्स जैसे बड़ी कंपनियों के मामले संभाल चुके हैं. चेरियन की तरह तलवार भी माहौल बनाने की अहमियत को समझते हैं. 90 के दशक में इंटीग्रल पीआर के नाम से एक जनसंपर्क कंपनी खोलने के बाद से वे अक्सर अपने प्रतिस्पर्धियों के खिलाफ मीडिया में खबरें उड़ाते रहते हैं और उनकी ये रणनीति कई बार सफल रहती है. एयरटेल के सुनील मित्तल के व्यापार के शुरुआती दिनों में तलवार उनके काफी काम आए. इसके अलावा बीमाक्षेत्र को खोलने की प्रक्रिया में भी तलवार ने अहम भूमिका निभाई. स्टोन ट्रैवेल्स नामक कंपनी के मालिक तलवार कई एयरलाइंस के जनरल सेल्स एजेंट और मध्य-पूर्व के निवेशकों के लिए भारत में सबसे बड़ी कड़ी भी हैं. इसके अलावा वे एयर इंडिया और जेट एयरवेज के लिए ड्यूटी फ्री उत्पादों के सप्लायर हैं. इन दिनों तलवार एक अग्रणी एयरपोर्ट रेस्टोरेंट कंपनी को भारत में लाना चाहते हैं.

 

नीरा राडिया

आज शायद ही कोई ऐसा व्यापारिक घराना होगा जो इस तरह के तिकड़मी कलाकारों के बिना काम करता हो. टाटा के लिए ये भूमिका नीरा राडिया निभाती हैं. अंतरराष्ट्रीय उड्डयन उद्योग की अच्छी समझ रखने वाली राडिया कई दिवालिया कंपनियों से मुक्ति पाकर इंग्लैंड से भारत आईं थीं. यहां उनका इरादा एक विमान कंपनी स्थापित करने का था. राडिया बंद पड़ी मोदीलुफ्त को खरीदकर उसे मैजिक एयर के नाम से शुरू करना चाहती थीं. मगर वो इसके लिए जरूरी शर्तें पूरी करने में नाकामयाब रहीं. हालांकि इससे उनका उत्साह ठंड़ा नहीं पड़ा. तत्कालीन उड्डयन मंत्री अनंत कुमार की करीबी राडिया ने भारत में उड्डयन उद्योग की बारीकियां सीखी. सिंगापुर एयरलाइंस द्वारा ग्राउंड हैडलिंग का कांट्रेक्ट एयर इंडिया को दिए जाने और टाटा द्वारा वीएसएनएल की खरीद में राडिया की अहम भूमिका थी.

अब राडिया ने नियोसिस के नाम से एक कंपनी खोली है जिसमें वो पूर्व वित्त सचिव सी एम वासुदेव, भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के पूर्व चेयरमैन प्रदीप बैजल और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के पूर्व चेयरमैन एस के नरूला के साथ मिलकर काम कर रही हैं. नौकरशाही में काम कैसे होता है इसे पूर्व नौकरशाहों से ज्यादा कौन जान सकता है. नियोसिस ने एक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन बनाई है जिसमें शीर्ष पदों पर रहे पूर्व नौकरशाहों और अधिकारियों को रखा गया है. इनमें अर्जुन सेन गुप्ता, ब्रजेश मिश्र, जनरल वीपी मलिक शामिल हैं.

सत्ता के गलियारों तक पहुंच रखने वाली ऐसी कई चाबियां हैं जो इस तरह की कंपनियों को अपनी सेवाएं दे रही हैं. दिल्ली स्थित लेक्सिकन पीआर में कृषि मंत्री शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले काम कर रही हैं जबकि महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव प्रेम कुमार गुड़गांव स्थित जेनेसिस पीआर से जुड़े हुए हैं.

लॉबीइंग की दुनिया में एक चर्चित नाम सुहेल सेठ का भी है. विज्ञापन जगत के जाने-माने नाम सेठ को भारत में लॉबीइंग की दुनिया का चेहरा कहा जा सकता है. हालांकि अपने समकालीनों की तुलना में सुहेल का ट्रैक रिकॉर्ड उतना प्रभावशाली नहीं है फिर भी आप उनकी सेवाएं लेकर निराश नहीं होंगे. वाकपटु सेठ एक शाम किसी टीवीशो में कोका-कोला की पैरोकारी करते हुए सुनीता नारायण से लोहा लेते दिखते हैं और अगली ही सुबह नाश्ते पर मुकेश अंबानी की तरफ से तेल नीति के बारे में मुरली देवड़ा से बात कर रहे होते हैं. उन्हें महंगी कारों और भव्य पार्टियों का शौक है. दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम में मुकेश और नीता अंबानी को प्रमोट करने का जिम्मा उनके कंधों पर है. सेठ उन चुनिंदा लोगों में से हैं जो देश के दो सबसे बडे उद्योगपतियों रतन टाटा और मुकेश अंबानी दोनों के साथ भोजन पर आमंत्रित होते हैं. आजकल उनका जुमला है, देरी के लिए माफी चाहता हूं. दरअसल मुकेश के साथ बातचीत जरा लंबी हो गई.

लॉबीइंग का स्वरूप वक्त के साथ बदल गया है मगर इसके विरोधी अब भी इसे भ्रष्टाचार का ही एक स्वरूप करार देते हैं. कोला कंपनियों के खिलाफ अभियान चलाने वाली और दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट की मुखिया सुनीता नारायणन कहती हैं, मैं इसे वैध भ्रष्टाचार कहूंगी. इन एजेंट्स के पास मुख्य मुद्दे को उलझाने की एक खास कला होती है. इससे आखिरकार लोग दुविधा में पड़ जाते हैं और मुद्दा पीछे छूट जाता है. इस बात में सच्चाई है. नारायणन के वैज्ञानिक साक्ष्यों पर कोला कंपनियों द्वारा की गई लॉबीइंग भारी पड़ गई थी.  

 

सुहेल सेठ

मगर कुछ लोगों का मत है कि लॉबीइंग को व्यापार की दुनिया के एक जरूरी हिस्से के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए. सीआईआई के तरुण दास का मानना है कि भारत में निवेश की इच्छा रखने वाली अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां को यहां का माहौल जटिल लगता है और इसलिए लॉबीइंग का पेशा फल-फूल रहा है. वो कहते हैं, रियोडेजिनेरो, बीजिंग या सियोल में जो चीज काम करती है वो जरूरी नहीं कि यहां भी काम करे. भारत की अपनी नियामक नीतियां और बुनियादी ढांचा है. दास का मानना है कि ऐसे में एक लॉबीइस्ट सबसे अच्छा जवाब है क्योंकि उसे स्थानीय और अंतराष्ट्रीय दोनों परिस्थितियों की अच्छी समझ होती है और वो भारत नाम की भुलभुलैया में अपने मुवक्किल को रास्ता दिखा सकता है.

तो अपने एजेंडा को आगे बढ़ाने की खातिर आप के लिए किसकी सेवाएं लेना सबसे अच्छा होगा?  हाल ही में रिटायर हुए किसी राष्ट्रीयकृत बैंक के चेयरमैन की, जल्द ही रिटायर होने वाले पेट्रोलियम सचिव की या फिर शिक्षाविदों और नौकरशाहों के मेल से बने एक थिंक टैंक की? आप सभी की सेवाएं एक साथ ले सकते हैं या फिर किसी एक की. ये इस बात पर निर्भर करता है कि आपका मकसद क्या है और ये कितना बड़ा है.

वरिष्ठ नौकरशाहों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद इतने आकर्षक विकल्प पहले कभी देखने को नहीं मिले. यूपीए सरकार ने जब शिवशंकर मेनन को विदेश सचिव बनाया तो राजीव सीकरी को इस्तीफा देना पड़ा. मगर कुछ समय बाद ही सीकरी जामनगर और मुंबई में रिलायंस के मैनजर्स को लेक्चर दे रहे थे. राडिया की कंपनी नियोसिस से जुड़े ट्राई के पूर्व चेयरमैन प्रदीप बैजल कहते हैं, मैं जो कर रहा हूं वो लॉबीइंग नहीं है. ये भारतीय परिदृश्य को समझने के लिए दी जा रही परामर्श सेवा है.बैजल के ये शब्द उस असहजता और अस्पष्टता की झलक देते हैं जो अब भी इस पेशे के साथ जुड़ी हुई है.

भारतीय अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ ही लॉबीइस्ट्स की संख्या भी बढ़ रही है. वक्त के साथ इसमें नए आयाम भी जुड़ते जा रहे हैं. मसलन अब ये सिर्फ खुशामद और पैसे के बल पर ही नहीं होती. जैसे कि वैष्णवी कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस के सीईओ विशाल मेहता कहते हैं, आज लॉबीइंग में तर्क और बहस की अहम भूमिका होती है. आपके तर्क इतने मजबूत होने चाहिए कि नौकरशाही उनसे सहमत हो जाए.

इसका मतलब ये है कि आप याचना नहीं कर रहे और न ही आप किसी को खरीद रहे हैं. आप बस अपनी बात को तर्क से साबित कर रहे हैं.

मगर तरीका चाहे जो भी हो एक बात याद रखना अहम है. क्रिकेट की तरह लॉबीइंग में सफल होने के लिए भी आपको मैचजिताऊ खिलाड़ी होना चाहिए. यानी बिना सौदे को मुकाम तक पहुंचाए आप किसी काम के नहीं.

बंदरों के वोट

      इधर सारा मीडिया नेताओं की कांव-कांव में बिजी रहा। बंदरों की खौं-खौं पर किसी का ध्यान नहीं गया। उत्तराखंड वालों ने कह दिया कि दिल्ली के बंदर नहीं लेंगे। दिल्ली वाले अपने बंदर अपने ही पास रखें। दिल्ली वाले अब तक करते यह रहे हैं कि आवारा टाइप बंदरों को दूसरे राज्यों में छुड़वाते रहते हैं। दिल्ली सलेक्टिव है। हरियाणा, पंजाब का पानी रख लेती है, पर बंदर आगे छोड़ देती है। 

      पर सवाल यह भी है कि इंडिया भर के छंटे छंटाये नेताओं को दिल्ली मंजूर करती है, इसके बदले दिल्ली के बाहर वाले क्या इसके बंदर नहीं मंजूर कर सकते क्या। 

      बंदर नेता एक्सचेंज आफऱ चलाने का हक तो दिल्ली का बनता है कि नहीं। सवाल सीरियस है।

      इसलिए एक ऐसे एक्सपर्ट से बात की, जो नेताओं और बंदरों को करीब से समझता है। इस एक्सपर्ट ने संसद के बाहर कूदने वाले बंदरों पर स्पेशल रिसर्च की है। बातचीत यूं है-

      सवाल-दिल्ली के बंदरों पर तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं।

      बंदर नेता एक्सपर्ट उर्फ बंनेएक्स-बेहतर है कि सवाल बंदरों पर ही उठें, नेताओं पर सवाल उठते हैं, डेंजर हो जाता है। बंदर पर हद से हद यह आरोप लग सकता है कि खौं खौं करता है, कुछ केले वगैरह उठाकर भाग जाता है। नेता सिर्फ इतने से संतुष्ट नहीं होता। वह पेट्रोल पंप से लेकर ना जाने क्या क्या उठाकर भाग जाता है, और सिर्फ अपने लिये नहीं, पूरी फेमिली के लिए।  कोई बंदर कोलतार खरीद में कट नहीं मारता। मेरी राय में बंदरों के मुकाबले नेता ज्यादा परेशान करते हैं। 

      सवाल-उत्तराखंड वाले कह रहे हैं कि दिल्ली के बंदर नहीं चाहिए। उनके अपने काफी हैं। 

      जवाब-देखिये, एक हिसाब से देखें तो इस बात में भी दम ही है।  उत्तराखंड वाले उत्तराखंड वालों पर खौंखियायें, उनका माल खायें। दिल्ली वाले दिल्ली वालों का माल खायें। मतलब सब अपने अपनों को  झेलें। 

      सवाल-यह बात आप बंदरों के बारे में कह रहे हैं या ….। 

      जवाब-यह सवाल अकसर उठता रहता है कि दिल्ली वाले बहुत परेशान करते हैं। लोकल स्थितियों से वाकिफ नहीं होते, पर ऊपर से आकर रौब गांठते हैं। कहते हैं कि हाईकमान ने भेजा है। 

      सवाल-मैं साफ तौर पर पूछना चाह रहा हूं कि यह बात आप बंदरों के बारे में कह रहे हैं या नेताओं के बारे में। 

      जवाब-देखिये, मैं दोनों का एक्सपर्ट हूं, हो सकता है कि जो बात नेताओँ के बारे में समझ रहे हों, वह बंदरों के बारे में हो। आप दोनों को मिलाकर ही समझिये। मसला यह है कि दिल्ली वाले दिल्ली का नाम लेकर डराते हैं। काम वाम उन्हे कुछ करना नहीं होता। 

      सवाल-पर आप काम की उम्मीद उनसे कर कैसे सकते हैं। 

      जवाब-हां आप ठीक कह रहे हैं कि काम की उम्मीद उनसे नहीं की जानी चाहिए। यह बात मैं बंदरों के बारे में भी कह रहा हूं और नेताओँ के बारे में भी। बंदर काम पर उतर आयें, तो बवाल हो जाता है। सर्कस के एक बंदर से सिगरेट पीने का काम कराया जाता था। फिर वो इतनी सिगरेट की डिमांड करने लगा कि आफत हो गयी। सिगरेट ना देने पर वह खाऊं खाऊं करने लगा, काटने लगा। बंदरों से काम कराया जाये, तो वो खौं खौं से खाऊं खाऊं पर  आ जाते हैं । इसलिए उनसे काम नहीं कराना चाहिए। काम करता बंदर डेंजरस होता है। वैसे यही बात नेता के बारे भी कही जा सकती है। नेता किसी प्रोजेक्ट में एक्टिव हो, तो समझ लो कि विकट घोटाला होने वाला है। 

      सवाल-देखिये आप बंदरों को नेताओँ की बात मिक्स दिये जा रहे हैं। मेरा सवाल यह था कि दिल्ली के बाहर के राज्य दिल्ली के बंदरों को स्वीकार करने से इनकार कर रहे हैं।  हां दिल्ली से गये नेताओं को तो वो मंजूर कर ही लेते हैं। 

      जवाब-देखिये, प्राबलम का एक सोल्यूशन यह भी हो सकता है कि बंदरों को वोटिंग राइट दे दिये जायें। बंदरों के वोट होते ही तमाम पालिटिकल पार्टियां उन्हे दिल्ली से बाहर भेजने पर प्रतिबंध लगवा देंगी। हमारे बंदर हमारे वोट। बल्कि जिस तरह से वोटों को लेकर मारामारी संसद में होने वाली है, उसे देखते हुए कुछ बंदरों को इस वोटिंग में वोट डालने का अधिकार दे दिया जाये। 

      सवाल-पर यह तो बहुत अपमानजनक बात हो जायेगी ।

      जवाब-जी मैं बिलकुल सहमत हूं ऐसे ऐसे नेताओं को वोट देना पड़ेगा, बंदरों के लिए बहुत अपमान की बात हो जायेगी।

      मैं भी यही सोच रहा हूं कि वाकई बंदरों के लिए अपमान की बात हो जायेगी।

आलोक पुराणिक

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आदमी क्या करे

ये करे तो मरे
वो करे तो मरे
आदमी क्या करे

ये नहीं सूझता
वो नहीं बूझता
ये नहीं काम का
वो नहीं दाम का

ये करे गलतियां
और सजा वो भरे
आदमी क्या करे

ये जो हैं आफतें
तो वो हैं शामतें
ये हुआ तो अजब
वो हुआ तो गजब

ये नहीं मिल रहा
और वो भी है परे
आदमी क्या करे

विकास बहुगुणा

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आधा गांव

ठेठ हिंदुस्तानी परंपरा का वाहक ‘आधा गांव’

आज से चार दशक पूर्व यानी 1966 में प्रकाशित राही मासूम रजा का उपन्यास ‘आधा गांव’ पता नहीं मुझे क्यों पसंद है, इसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है. ‘आधा गांव’ को पढ़ते हुए भारतीय समाज के जो चित्र मेरी स्मृति में अंकित होते हैं, वे चित्र राही के गंगोली के नहीं मेरे अपने गांव-समाज के हैं. 

आखिर ‘आधा गांव’ में ऐसा क्या है जो इसे ‘गोदान’, ‘मैला आंचल’, ‘राग दरबारी’ और ‘त्यागपत्र’ के साथ बीसवीं सदी की उन कालजयी कृतियों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देता है जो भारतीय हिंदी कथा साहित्य की धरोहर हैं? कहने को इस उपन्यास में देश-विभाजन की त्रासदी, बदलते हुए आर्थिक संबंध तथा भय एवं संशय के वातावरण का बेहद सूक्ष्म और कलात्मक चित्रण किया गया है या फिर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (तथाकथित) की कुरूपता को बेनकाब किया गया है, मगर मेरा मानना है कि ‘गोदान’ और ‘मैला आंचल’ के बाद ‘आधा गांव’ ऐसा उपन्यास है जो उस दौर की ठेठ हिंदुस्तानी पंरपरा का प्रतिनिधित्व करता है. ये तीनों उपन्यास भारतीय लोक-संस्कृति, सामाजिक सरोकारों, धर्म, राष्ट्र और सांप्रदायिकता से उपजे सवालों का बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में जवाब देने वाले उपन्यास हैं. 

‘आधा गांव’ सच्चे अर्थों में उस ठेठ हिंदुस्तानी पंरपरा का प्रतिनिधित्व करने वाला उपन्यास है जो हमारे तथाकथित राष्ट्रवादियों की हरकतों से लगातार टूट रही है. आज के संदर्भ में ‘आधा गांव’ इस मायने में अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यास है कि यह न केवल सांप्रदायिकता के विभिन्न पहलुओं से साक्षात्कार कराता है अपितु संघर्ष के लिए प्रेरणा देने के साथ-साथ हर तरह के प्रतिक्रियावाद के विरूद्ध भी चुनौती देता है. कहने को ‘आधा गांव’ गंगौली जैसे छोटे से गांव की कहानी है परंतु इसका फलक कई अर्थों में बेहद व्यापक है. एक आम आदमी की मानसिकता और उसके द्वंद्व का बहुत सूक्ष्म चित्रण है इसमें. राही स्वयं कहते हैं कि यह उपन्यास वास्तव में मेरा एक सफर है. यह कहानी न कुछ लोगों की है और न कुछ परिवारों की. यह उस गांव की कहानी भी नहीं है जिसमें इस कहानी के भले-बुरे पात्र अपने आपको पूर्ण बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं. यह कहानी न धार्मिक है न राजनीतिक क्योंकि समय न धार्मिक होता है न राजनीतिक. यह कहानी है समय ही की. इसलिए यह जितनी सच्ची है उतनी ही झूठी भी. एक कालजयी कृति की पहचान ही यह है कि वह उन शाश्वत प्रश्नों से दो-चार होती रहे जो मनुष्य, समाज और किसी भी राष्ट्र की धुरी होते हैं. वास्तव में ‘आधा गांव’ अपनी ठेठ हिंदुस्तानी परंपरा को बचाए और बनाए रखने की कोशिश करने वाली ऐसी कृति है जिसमें पग-पग पर लोक संस्कृति अर्थात साझा संस्कृति के दृश्य रह-रहकर दिखाई पड़ते हैं…

राही मासूम रजा यहां समय को सूत्रधार के रूप में इस्तेमाल करते हैं. पाठकों को याद होगा कि राही ‘महाभारत’ जैसे एपिक सीरियल में इसी समय का इस्तेमाल सूत्रधार के रूप में करते हैं. समय यानी इतिहास, स्मृति, परंपरा और संस्कारों का संवाहक. फुन्नन मियां, अब्बू मियां, झंगरिया-बो, मौलवी बेदार कोमिला, बबरमुआ, बलराम चमार, हकीम अली अकबर,गया अहीर, अनवारूल, हसन राकी जैसे पात्रों के माध्यम से राही मासूम रजा ‘आम आदमी’ के बहाने एक ऐसी यथार्थ की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं जो हमारी अपनी पृष्ठभूमि है. 

दरअसल गंगौली असल रूप में वह राष्ट्र है जिसकी संकल्पना हरेक वह आदमी करता है जिसकी धमनियों में राष्ट्रीयता का गहरा लहू दौड़ता है. अपने एक पात्र के माध्यम से राही कहते हैं, “जंग के मोर्चे पर जब मौत मेरे सामने होती है तो मुझे अल्लाह याद आता है, लेकिन उसके फौरन बाद मुझे काबा नहीं, अपना गांव गंगौली याद आता है क्योंकि वह मेरा घर है….अल्लाह का घर काबा है लेकिन मेरा घर गंगौली है.” इस तरह राही यह स्पष्ट करते हैं कि भारत की लोग सांझी संस्कृति में विश्वास रखते हैं, उसमें जीते हैं. इसे नुकसान पहुंचाना देश के लिए घातक है. वास्तव में ‘आधा गांव’ सांझी संस्कृति को पुख्ता करने का उपन्यास भी है. 

एक कालजयी कृति की पहचान ही यह है कि वह उन शाश्वत प्रश्नों से दो-चार होती रहे जो मनुष्य, समाज और किसी भी राष्ट्र की धुरी होते हैं. वास्तव में ‘आधा गांव’ अपनी ठेठ हिंदुस्तानी परंपरा को बचाए और बनाए रखने की कोशिश करने वाली ऐसी कृति है जिसमें पग-पग पर लोक संस्कृति अर्थात साझा संस्कृति के दृश्य रह-रहकर दिखाई पड़ते हैं चाहे वह मोहर्रम का सजीव चित्रण हो या फिर शादी ब्याह पर दिलवाई जाने वाली गालियां. वास्तव में यहे वे ठेठ हिंदुस्तानी मान्यताएं व परंपराएं हैं जो भारतीय समाज के हर धर्म, हर समुदाय में बराबर देखने को मिलती हैं. मां के दूध के साथ पी हुई भोजपुरी उर्दू के संवादों में पगा आधा गांव समाजशास्त्रीय दृष्टि से भी एक ऐसी उल्लेखनीय कृति है जिसे जितनी बार पढ़ा जाए वह उतनी ही बार गंगा की लहरों सी अपने साथ बहाती ले जाती है. 

‘आधा गांव’ भारतीय समाज की सामाजिक संस्कृति की उस ताकत का नाम है जिसे हम गंगा जमुनी तहजीब से मिली-जुड़ी संस्कृति कहते हैं. इसका एक उदाहरण है मोहर्रम के दौरान ताजिये के नीचे से मासूमों को किसी बला से महफूज रखने का दृश्य. दरअसल ‘आधा गांव’ उस अस्मिता विमर्श पर भी गहरा चिंतन करता है जो हिंदुस्तान से अलग हुए पाकिस्तान बनने के बाद शुरू होता है. इसीलिए इसमें मुस्लिम समाज का ऐसा बहुआयामी और सटीक चित्रण हुआ है जिसमें धार्मिक संकीर्णता के लिए कोई जगह नहीं है. भारतीय समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक व धार्मिक जीवन का चित्रण करने में राही मासूम रजा को अद्भुत सफलता मिली है. इस उपन्यास में राही के जीवन और व्यवहार पर पड़े वैचारिक प्रभाव की बानगी भी जगह-जगह दिखाई देती है. उनके जीवन की दो घटनाओं का उल्लेख करना जरूरी है. पहली है गाजीपुर नगर पालिका के अध्यक्ष पद के लिए खड़े हुए उम्मीदवार अपने ही पिता बशीर हसन आबिदी के खिलाफ दूसरे उम्मीदवार कॉमरेड पब्बर राम के पक्ष में खुलकर प्रचार करना, तथा दूसरी है नय्यर जहां से सख्त विरोधों के बावजूद विवाह करना. राही मासूम रजा के यही विद्रोही तेवर ‘आधा गांव’ में दिखाई देते हैं. वे मोहर्रम के दौरान विभिन्न धार्मिक कर्मकांडों पर अप्रत्यक्ष रूप से व्यंग्य करते हैं. 

‘आधा गांव’ एक ऐसा मील का पत्थर है जिससे हिंदी कथा साहित्य समृद्ध हुआ है. प्रेमचंद के गोदान के बाद सच्चे अर्थों में ठेठ हिंदुस्तानी परंपरा को जिन दो कृतियों ने जीवित रखा उनमें से एक है रेणु का ‘मैला आंचल’ और दूसरा है राही का ‘आधा गांव’. ‘आधा गांव’ को पढ़ते हुए लगता है मानो धीरे-धीरे नौहे (मोहर्रम के दौरान गाया जाने वाला गीत) की आवाज आ रही है. 

नाज़ुक हैं बहुत पांव में पड़ जाएंगे छाले

क़ुरबान मैं, ऐ राहे-नज़फ़ पूछने वाले.

भगवानदास मोरवाल

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गंगा का आखिरी गर्जन ?

बरसात के मौसम में रात के वक्त भागीरथी घाटी में घुप्प अंधेरा नजर आता है. इसमें सुनाई देती है हिमालय की ढलानों से टकराने वाली तूफानी हवा और घनघोर बारिश के थपेड़ों की आवाज. और ऐसे में अगर आप भागीरथी के किनारे बसी किसी जगह पर हों तो नदी की भयानक गर्जना हर दूसरी आवाज को बौना कर देती है. 

मगर दिन निकलने के साथ दृश्य भी बदलने लगता है और आवाजें भी. पहाडों को खोखला करती ड्रिलिंग मशीनों की कर्कश ध्वनि, पीले हेलमेट, कंक्रीट, खोखली सुरंगों में सांय-सांय बहती हवा और ऐसा बहुत कुछ जो बताता है कि यहां मनुष्य प्रकृति पर विजय पाने की लड़ाई लड़ रहा है. नदियों को बांधने की वो लड़ाई जिसका मकसद देश की आर्थिक तरक्की के लिए बिजली पैदा करना है.

भारत में 4,500 बड़े बांध हैं. हाल-फिलहाल तक उत्तरकाशी और गंगोत्री के बीच इनमें से सिर्फ एक यानी मनेरी भाली-1 हुआ करता था. मगर अब 125 किलोमीटर लंबे इस इलाके में पांच बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण अलग-अलग चरणों में है. अगर सब कुछ निर्धारित योजना के मुताबिक चला तो भागीरथी यानी गंगा को अपना वो रास्ता छोड़ना होगा जिस पर वह युगों-युगों से बहती आ रही है. 125 किलोमीटर की इस दूरी में उसे अधिकांश जगहों पर सुरंगों से होकर बहना होगा. गंगा के बारे में कहा जाता है कि वो मुक्तिदायनी है मगर विडंबना देखिए कि वही गंगा अपने ही जन्मस्थल में कैद होकर रह जाएगी.

नदी एक सुरंग से निकलती है और फिर दूसरी सुरंग में घुस जाती है. इसका मतलब ये है कि जब ये सारी परियोजनाएं पूरी हों जाएंगी तो इस पूरे क्षेत्र में अधिकांश जगहों पर गंगा अपना स्वाभाविक रास्ता छोड़कर सिर्फ सुरंगों में बह रही होगी.

भागीरथी घाटी में जो हो रहा है उसे अच्छी तरह से समझने के लिए आपको अपनी यात्रा विवादास्पद टिहरी बांध से शुरू करनी होगी जिससे जुलाई 2006 में विद्युत उत्पादन शुरू हुआ था. बांध से बनी झील की लंबाई करीब 60 किलोमीटर है और इसका पानी नीला और जड़ नजर आता है. गंगा की वह पुरानी जीवंतता फिर से वहीं पर नजर आती है जहां ये झील खत्म होती है. मगर यहां भी गंगा की जिंदगी थोड़े ही दिन की मेहमान है.

टिहरी से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित धरासू नाम की जगह मनेरी भाली जलविद्युत परियोजना का द्वितीय चरण है. यहां जनवरी 2008 से विद्युत उत्पादन शुरू हो चुका है. चूंकि 304 मेगावॉट बिजली बनाने के लिए पानी का टरबाइन पर एक निश्चित ऊंचाई से गिरना जरूरी है इसलिए इस ऊंचाई को हासिल करने के लिए गंगा को 24 किलोमीटर लंबी एक सुरंग से होकर गुजारा जाता है जो उत्तरकाशी से शुरू होती है. यानी 24 किलोमीटर की इस लंबाई में नदी का अस्तित्व लगभग खत्म हो चुका है.

इस क्षेत्र में परियोजनाएं कुछ इसी तर्ज पर बन रही हैं. एक परियोजना की पूंछ जहां पर खत्म होती है वहां से दूसरी परियोजना का मुंह शुरू हो जाता है. यानी नदी एक सुरंग से निकलती है और फिर दूसरी सुरंग में घुस जाती है. इसका मतलब ये है कि जब ये सारी परियोजनाएं पूरी हों जाएंगी तो इस पूरे क्षेत्र में अधिकांश जगहों पर गंगा अपना स्वाभाविक रास्ता छोड़कर सिर्फ सुरंगों में बह रही होगी.

ये बात अलग है कि मनेरी भाली द्वितीय चरण वर्तमान में अपनी निर्धारित क्षमता से काफी कम यानी सिर्फ 102 मेगावॉट बिजली का ही उत्पादन कर रहा है. ये भी गौरतलब है कि इस इलाके में स्थित तीनों बांध—टिहरी और मनेरी प्रथम और द्वितीय—कभी भी अपनी निर्धारित क्षमता के बराबर विद्युत उत्पादन नहीं कर पाए हैं. दिलचस्प है कि सभी जलविद्युत परियोजनाओं को मंजूरी ही इस आधार पर दी गई थी 90 प्रतिशत मौकों पर वे अपनी पूरी क्षमता के हिसाब से बिजली का उत्पादन करेंगे मगर दिल्ली स्थित एक गैरसरकारी संगठन साउथ एशियन नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल (एसएएनडीआरपी) के द्वारा जुटाए गए आंकड़े एक अलग ही तस्वीर पेश करते हैं. संगठन ने अपने अध्ययन में जिन 208 बांधों के आंकड़े जुटाए उनमें से 89 फीसदी निर्धारित क्षमता से कम विद्युत उत्पादन कर रहे हैं. 49 फीसदी में तो कुल क्षमता की आधी से भी कम बिजली बन रही है.

एसएएनडीआरपी के संस्थापक हिमांशु ठक्कर कहते हैं, “इससे पता चलता है कि बड़ी संख्या में अव्यावहारिक परियोजनाओं को मंजूरी दी जा रही है. हमें वास्तविक कीमत और वास्तविक लाभों का एक वास्तविक अध्ययन करने की जरूरत है. ये सुनिश्चित करने के लिए कोई भरोसेमंद तंत्र मौजूद नहीं है कि केवल न्यायसंगत परियोजनाओं को ही मंजूरी मिले.”

धरासू से उत्तरकाशी तक के सफर में नदी आपके साथ चलती है. बारिश के मौसम की वजह से आजकल इसमें काफी पानी है मगर स्थानीय लोगों के मुताबिक सर्दियों में ये पानी की एक पतली लकीर सरीखी नजर आती है क्योंकि तब अधिकांश पानी सुरंगों में चला जाता है. इस दौरान नदी को आसानी से पैदल ही पार किया जा सकता है.

भागीरथी घाटी में जो हो रहा है उसके महत्व को समझने के लिए आपको इस नदी की विशालता, इसकी पारिस्थिकी और इस पर निर्भर मानव जीवन के साथ हो रही छेड़छाड़ को समझना जरूरी है.

वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड ने गंगा को दुनिया की उन 10 बड़ी नदियों में रखा है जिनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. गंगा मछलियों की 140 और उभयचरों की 90 प्रजातियों को आश्रय देती है. इसमें पांच ऐसे इलाके हैं जिनमें पाई जाने वाली पक्षियों की किस्में दुनिया के किसी अन्य हिस्से में नहीं मिलतीं. इसके किनारों पर पाई जाने वाली वनस्पति और जंतुओं की इसके पोषण और जल संरक्षण में अहम भूमिका है और ये भूक्षरण को भी नियंत्रण में रखते हैं. गंगा के बेसिन में बसने वाले करीब 45 करोड़ लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इसपर निर्भर हैं.

पर्यावरणविद कहते हैं कि गंगा के पानी में अनूठे बैक्टीरिया प्रतिरोधी गुण हैं. यही वजह है कि दुनिया की किसी भी नदी के मुकाबले इसके पानी में आक्सीजन का स्तर 25 फीसदी ज्यादा होता है. ये अनूठा गुण तब नष्ट हो जाता है जब गंगा को सुरंगों में धकेल दिया जाता है जहां न ऑक्सीजन होती है और न सूरज की रोशनी. ये जलविद्युत परियोजनाएं नदी के रास्ते का बुनियादी स्वरूप भी बदल देती हैं जिससे पानी में जैविक बदलाव आ जाते हैं. उदाहरण के लिए मनेरी भाली प्रथम चरण के लिए जहां से पानी जलाशय में दाखिल होता है वहां पर इसके नमूने बताते हैं कि गुणवत्ता के हिसाब से इसे साफ कहा जा सकता है. मगर जलाशय के आखिर में पानी के नमूने बताते हैं कि ये बुरी तरह से प्रदूषित है. केंद्रीय औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा पिछले साल मई में जारी एक रिपोर्ट बताती है कि भागीरथी में पारे का स्तर भी बढ़ रहा है.

जहां से पानी जलाशय में दाखिल होता है वहां पर इसके नमूने बताते हैं कि गुणवत्ता के हिसाब से इसे साफ कहा जा सकता है. मगर जलाशय के आखिर में पानी के नमूने बताते हैं कि ये बुरी तरह से प्रदूषित है.

लेकिन ये तो संकट का सिर्फ छोटा सा हिस्सा है. नोबेल पुरस्कार जीतने वाले इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक गंगोत्री ग्लेशियर के आकार में 80 फीसदी तक की कमी आ जाएगी जिससे गंगा, सदानीरा से एक मौसमी नदी में तब्दील हो जाएगी. इसका मतलब है कि सिर्फ 20 साल में इतना पानी ही नहीं बचेगा कि इन बांधों की टरबाइंस चलाई जा सकें.

इसके बावजूद सरकार इन विशाल परियोजनाओं पर अड़ी हुई है. जब तहलका ने पानी की उपलब्धता और व्यावहारिकता से संबंधित डाटा के बारे में केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष ए के बजाज से जानकारी मांगी तो उनका जवाब था, “गंगा जल से संबंधित डाटा गोपनीय है.”

भागीरथी को सुरंगों और बांधों के जरिये कैद करने का विरोध तो स्थानीय लोग छह साल पहले तभी से कर रहे हैं जब इन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी. मगर इस विरोध को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां तब मिलीं जब जाने-माने पर्यावरणविद और आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर जी डी अग्रवाल ने इसके विरोध में उत्तरकाशी में अनिश्चतकालीन भूखहड़ताल की घोषणा की. पर्यावरण की गहरी समझ रखने वाले अग्रवाल ने इन परियोजनाओं को मातृहत्या जैसा बताया. लोग और साधु-संत उनके समर्थन में उमड़ पड़े और नतीजा ये हुआ कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी दो परियोजनाओं को अस्थाई रूप से रोकने पर सहमत हो गए.

बाद में अग्रवाल दिल्ली आ गए और लोहारीनाग पाला में एनटीपीसी की 600 मेगावॉट की परियोजना के विरोध में उनकी भूख हड़ताल जारी रही. कुछ दिन पहले उन्होंने अपना अनशन तब तोड़ा जब ऊर्जा मंत्रालय ने उन्हें आश्वासन दिया कि गंगा के अविरल प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए एक कमेटी बनाई जाएगी.

मगर मुद्दा अभी सुलझने से काफी दूर है. तहलका से बात करते हुए केंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे कहते हैं, “हमने फैसला किया है कि पानी का बहाव अविरल रहना चाहिए. मगर परियोजनाएं भी चलनी चाहिए. तकनीकी रूप से हमें ऐसा करने का रास्ता खोजना होगा. इसलिए हमने तीन महीने का समय मांगा है. एक कमेटी बनाई जा रही है. भागीरथी के साथ भारत के लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं. मैं लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहता. यही वजह है कि हम कोई रास्ता खोजने के लिए सहमत हो गए हैं.”

मगर ये केवल भावनाओं की बात नहीं है और रास्ता खोजना आसान नहीं होगा. शिंदे कहते हैं कि 600 मेगावॉट की परियोजना को पूरी तरह से रद्द नहीं किया जा सकता और विशेषज्ञ कमेटी के साथ निर्माण कार्य भी जारी रहेगा. वे कहते हैं, “2000 करोड़ रुपये की अग्रिम मंजूरी हो चुकी है. अब आप इसे रोकने के लिए कह रहे हैं. जब छह साल पहले ये परियोजनाएं शुरू हुई थीं तो मैं मंत्री नहीं था. जब भाजपा ने इनका शिलान्यास किया था. तब तो किसी ने इनका विरोध नहीं किया.”

विडंबना ये भी है कि भारत में बड़े बांधों की योजनाओं को उस दौर में आगे बढ़ाया जा रहा है जब दुनिया भर में बड़े बांधों को हटाया जा रहा है. अकेले अमेरिका में ही 654 बांध खत्म किए जा चुके हैं और 58 दूसरे बांधों के साथ भी ऐसा ही किया जाना है. इनमें से कई ऐसे हैं जिन्हें इसलिए हटाया जा रहा है ताकि सामन मछलियों के निवास को बहाल किया जा सके. गौरतलब है कि सामन मछलियां प्रजनन के लिए समुद्र से नदी के उद्गम की तरफ जाती हैं. बांध उनके इस सफर को रोककर उनकी प्रजाति को संकट में डालते हैं. दरअसल देखा जाए तो सामन मछलियों की घटती संख्या अमेरिका में कई ऐतिहासिक अदालती फैसलों का कारण बनी है. इनमें से सबसे प्रभावशाली उदाहरण है एलव्हा और ग्लाइंस कैन्यन बांध को खत्म किया जाना जो देश के सबसे ऊंचे बांधों में से एक था. इसे हटाने में 10 करोड़ डालर खर्च हुए.

अमेरिकन रिवर्स नामक एक गैरसरकारी संगठन से जुड़ीं एमी कोबर कहती हैं, “इन बड़े बांधों को हटाया जाना इस बात का सूचक है कि अपनी नदियों को लेकर देश के नजरिये में महत्वपूर्ण बदलाव आया है. इस मुल्क को ये अहसास हो गया है कि एक स्वस्थ, अविरल नदी एक समुदाय के लिए सबसे कीमती संपत्तियों में से एक हो सकती है.”

भारत में बड़े बांधों की योजनाओं को उस दौर में आगे बढ़ाया जा रहा है जब दुनिया भर में बड़े बांधों को हटाया जा रहा है. अकेले अमेरिका में ही 654 बांध खत्म किए जा चुके हैं और 58 दूसरे बांधों के साथ भी ऐसा ही किया जाना है.

मगर भारत का ऊर्जा मंत्रालय इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं है. सवाल ये है कि आखिर जब सारी दुनिया में बड़े बांधों के खिलाफ आंदोलन हो रहा है तो भारत में इन पर अब भी क्यों जोर दिया जा रहा है? शिंदे से पूछिए और जवाब आता है, “भारत में 30 हजार मेगावॉट बिजली की कमी है. हम इतनी बिजली कहां से लाएंगे? चीन को देखिए. उनके थ्री गॉर्जेज डैम को देखिए. जब चीन ये कर रहा है तो हम क्यों नहीं कर सकते? टिहरी में 1000 मेगावॉट की परियोजना के लिए हमें इतनी आलोचना झेलनी पड़ी. अगर आप बिजली चाहते हैं तो आपको कुछ न कुछ बलिदान तो करना ही होगा.”

दरअसल देखा जाए तो टिहरी इसका एक सटीक उदाहरण है कि अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को लेकर भारत की समझ में कितना धुंधलापन है. भारत में किसी भी बांध परियोजना का इसके पूरा होने के बाद मूल्यांकन नहीं किया गया है. टिहरी दुनिया का आठवां सबसे ऊंचा बांध है. मार्च 2008 तक बांध पर कुल 8,298 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे जो उस अनुमानित लागत से कहीं ज्यादा है जो परियोजना के प्रारंभ में तय की गई थी. इसकी प्रस्तावित विद्युत उत्पादन क्षमता 2,400 मेगावॉट थी मगर वर्तमान में यह केवल 1000 मेगावॉट बिजली का उत्पादन कर रहा है. यानी क्षमता के आधे से भी कम.

भागीरथी घाटी में घट रही इस त्रासदी का एक मानवीय पहलू भी है. उसे समझने के लिए आपको प्रेम दत्त जुयाल जैसे किसी व्यक्ति से मिलना होगा. जुयाल के पास धुंधले पड़ते जा रहे कागजों का एक गट्ठर है. ये वो दस्तावेज हैं जिन्हें वे तब से इकट्ठा कर रहे हैं जब से उनके घर के नीचे की जमीन धंसनी शुरू हुई. जुयाल जलवाल गांव के निवासी हैं जो उस जगह से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है जहां कभी पुराना टिहरी शहर हुआ करता था. जलवाल और इसके आसपास के गांवों को पुनर्वास योजना का हिस्सा इसलिए नहीं बनाया गया क्योंकि ये टिहरी झील के 840 मीटर ऊंचाई के स्तर से ऊपर स्थित थे. पिछले साल से उनके खेत दरक रहे हैं और गांववालों की जान लगातार हो रहे भूस्खलन से खतरे में है. ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि टिहरी झील का पानी लगातार उस बुनियाद को कमजोर कर रहा है जिस पर ये गांव बसा है. इससे भी बड़ी त्रासदी ये है कि जिस बाजार में ये लोग अपनी सब्जियां बेचते थे और जिन स्कूलों में इनके बच्चे पढ़ने जाते थे, वे सब झील में दफन हो गए हैं. नये टिहरी शहर जाने के लिए इन्हें 250 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है. यानी इनकी जिंदगी पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गई है. मगर उनके पुनर्वास की मांग पर ध्यान देने वाला कोई नहीं है.

भारतीय लोक प्रशासन संस्थान द्वारा 54 बांधों पर कराया गया एक विस्तृत अध्ययन बताता है कि एक बड़े बांध से विस्थापित होने वाले लोगों की औसत संख्या 44,182 है. भारत में 4,500 बड़े बांध हैं. अगर माना जाए कि एक बांध से कम से कम 10,000 लोग भी विस्थापित होते हैं तो इसका मतलब ये है कि बड़े बांधों के कारण अब तक करीब साढ़े चार करोड़ लोगों को अपनी जड़ों से उखड़ना पड़ा है. उत्तरकाशी के नजदीक बसे जोशियाड़ा और कनसैण नामक गांवों के लोगों को भी अब ये अहसास होने लगा है कि उनकी नियति भी कुछ ऐसी ही होने वाली है.

जोशियाड़ा में मुख्य सड़क पर बद्री सेमवाल अपना हार्डवेयर की दुकान चलाते हैं. दुकान की ऊपरी मंजिल पर ही उनका निवास भी है. उनकी छत से साफ देखा जा सकता है कि मनेरी भाली द्वितीय चरण की झील का पानी धीरे-धीरे उनके घर को निगलने बढ़ा आ रहा है. सेमवाल कहते हैं, “टरबाइन चलाने के बाद ही अचानक उन्हें अहसास हुआ कि हम भी डूब क्षेत्र में आ रहे हैं. अब वे कहीं पहाड़ में हमारे पुनर्वास की बात कर रहे हैं. मगर वहां दुकान कैसे चलेगी. मैं जिंदगी कैसे चलाऊंगा?” जोशियाड़ा के दूसरे परिवारों की भी यही व्यथा है.

उत्तरकाशी से मनेरी भाली प्रथम चरण के लिए जाते हुए हमारी मुलाकात अतर सिंह पंवार से होती है. फैशनेबल जींस और टी शर्ट पहने इस व्यक्ति को देखकर कहीं से भी नहीं लगता कि उसके 38 साल पहाड़ में ही गुजरे हैं. पंवार के हाथ में कुरकुरे का पैकेट और बिसलेरी की बोतल है और वे किसी शहरी बाशिंदे जैसे ही लगते हैं. उन्होंने हाल ही में एनटीपीसी में अनुबंध पर मजदूरी शुरू की है. कभी वे पशु चराते थे और आलू व राजमा की खेती करते थे. वे कहते हैं, “मैं तब कहीं ज्यादा खुश था जब मेरे पास अपनी जमीन थी. तब मैं आजाद था. अब मुआवजे में भले ही लाखों रूपये मिल गए हों मगर जल्द ही ये खत्म हो जाएंगे. पैसा तो आता है और चला जाता है. जमीन हमेशा आपके पास रहती है.”

थोड़ा और आगे चलने पर हम पाला गांव पहुंचते हैं जहां विनाश की शुरुआत हो चुकी है. एक किलोमीटर दूर ही पाला-मनेरी सुरंग की खुदाई की जा रही है. यहां के घरों में दरारें पड़नी शुरू हो गई हैं. पानी के स्रोत सूख रहे हैं क्योंकि सुरंग के मलबे ने प्राकृतिक झरनों का रास्ता रोक दिया है.

अतर सिंह पंवार को कोई ऐसी शक्ति एक शहरी व्यक्ति के रूप में बदल रही है जिस पर उनका बस नहीं चल रहा. अपने जैसे सैकड़ों लोगों की तरह वे शहरी नहीं बनना चाहते. वे गंगा को अविरल बहते देखना चाहते हैं. ठीक वैसे ही जैसे उनकी पीढ़ियां सदियों से देखती आई हैं.

मगर उनके लिए ऊर्जा मंत्रालय का जवाब है कि उत्तरी ग्रिड को और भी ज्यादा बिजली चाहिए. भले ही उनके जैसे लोगों को आसानी से पीने का पानी तक न मिले मगर शहरों के शापिंग मॉल्स का दिन-रात रोशनी में नहाना जरूरी है. 

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