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तारनहार इमोशनल अत्याचार

वाकया हफ्ता भर पहले का है. मुंबई में वरसोवा के एक छोटे से रेस्टोरेंट में बैठी एक लड़की ने पूछा, कौन है ये अनुराग कश्यप? फैशन का डायरेक्टर? ये सुनते ही वहां बैठे कुछ लोगों में खुसुर-फुसुर होने लगी. दरअसल उस महिला ने बड़े दिलचस्प मौके पर ये बात कही थी क्योंकि उसी रेस्टोरेंट में पैशन फॉर सिनेमा के जुनूनी ब्लागर्स के साथ कश्यप भी बैठे हुए थे. पहले तो कश्यप ये सुनकर चौंके मगर फिर हाथ मलते हुए मजाकिया मूड में बोले, ‘नहीं, नहीं, अनुराग कश्यप तो फैशन स्टेटमेंट का डायरेक्टर है.’

 ऐसा भी वक्त रहा जब कश्यप की ज्यादा पूछ नहीं थी. 2003 में उनकी फिल्म पांच को सेंसर ने लटका दिया तो अगले ही साल ब्लैक फ्राइडे के प्रदर्शन पर कोर्ट के एक आदेश ने रोक लगा दीलड़की को अब भी समझ में नहीं आया कि माजरा क्या है. इससे पहले अंधेरी के अपने शांत से ऑफिस में कश्यप की सुबह बधाई के फोन कॉल्स का जवाब देते-देते बीती थी. एक दिन पहले ही उनकी फिल्म गुलाल रिलीज हुई थी और हर कोई उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ रहा था. पहले देव डी और फिर गुलाल ने बतौर निर्देशक उनके नाम का वजन कई गुना बढ़ा दिया था. बड़े स्टार्स जो पहले कश्यप का फोन भी नहीं उठाते थे अब उनके नए प्रोजेक्ट्स में किसी रोल की संभावना तलाश रहे थे. एक प्रोड्यूसर तो फोन पर यहां तक कह गए कि वे अपने दोस्तों को ये साबित करने के लिए गुलाल दिखाने ले गए कि एक नया बॉलीवुड आ पहुंचा है. कश्यप कहते हैं, ‘मैंने इस फिल्म को बनाने के लिए दस साल तक इंतजार किया है और साबित ये जनाब कर रहे हैं.’ हालांकि जैसे-जैसे बधाई भरे फोन्स आने का सिलसिला बढ़ता जाता है कश्यप के मन की ये कड़वाहट भी गायब होने लगती है.

कश्यप ने बॉलीवुड में अपनी शुरुआत 1998 में रामगोपाल वर्मा की फिल्म सत्या के साथ की. इस फिल्म की स्क्रिप्ट उन्होंने सौरभ शुक्ला के साथ मिलकर लिखी थी. वे उर्दू आधारित डॉयलॉग्स की बजाय बोलचाल की हिंदी इस्तेमाल करने वाले शुरुआती लोगों में से थे. अपनी 20 स्क्रिप्ट्स में उन्होंने इसी हिंदी का इस्तेमाल किया जिसमें एक तरफ लुग्दी लेखन के सुपरस्टार सुरेंद्र मोहन पाठक का असर था तो दूसरी ओर इंसानी मन की गहराइयों की थाह रखने वाले प्रेमचंद की भी छाप थी.

फिर कश्यप जब निर्देशन के क्षेत्र में उतरे तो उन्होंने ऐसी फिल्में रचीं जो रटे-रटाए ढर्रे पर नहीं चलती थी. ब्लैक फ्राइडे में पुलिस द्वारा इम्तियाज गवाथे का पीछा करने के दृश्य को इस तरह के सबसे अच्छे दृश्यों में शुमार किया गया तो नो स्मोकिंग के अतियथार्थवाद की भी खूब चर्चा हुई.

मगर इस सफलता के पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी है. ऐसा भी वक्त रहा जब कश्यप की ज्यादा पूछ नहीं थी. 2003 में उनकी फिल्म पांच को सेंसर ने लटका दिया तो अगले ही साल ब्लैक फ्राइडे के प्रदर्शन पर कोर्ट के एक आदेश ने रोक लगा दी. और फिर 80 फीसदी काम पूरा हो जाने के बाद 2006 में गुलाल भी डिब्बे में बंद हो गई. ये वो दौर था जब कई लोगों को लगता था कि कश्यप पर दुर्भाग्य का साया है और कहीं इसकी थोड़ी-बहुत छाया उन पर भी न पड़ जाए. उनसे कहा गया कि उन्हें फिल्में बनाना बंद कर देना चाहिए. उनके साथ कोई था तो हिंदी सिनेमा के कुछ गिने-चुने बुद्धिजीवी प्रशंसक. 2006 में बुरी तरह निराश कश्यप ने फिल्म इंडस्ट्री के सभी लोगों को एक एसएमएस भेजकर मदद की गुहार लगाई जो उनके दोस्तों के लिए एक चौंकाने वाली बात थी. किसी का जवाब नहीं आया सिवाय जॉन अब्राहम के जिन्होंने खुशी से कश्यप को लास एंजेल्स जाने का टिकट खरीदकर दे दिया ताकि उनकी हवाबदली हो जाए. वहां कश्यप ने नो स्मोकिंग की स्क्रिप्ट लिखी. मगर इंसान के कुछ भीतरी कोनों को टटोलती ये फिल्म जब प्रदर्शित हुई तो आलोचकों ने इसे कमजोर आंका और दर्शकों की प्रतिक्रिया भी कोई खास नहीं रही. इन सब ठोकरों ने कश्यप को इतनी गहरी निराशा और कुंठा से भर दिया कि जब यूटीवी स्पॉटब्वॉय की रुचा पाठक ने उनके प्रोजेक्ट्स में दिलचस्पी जताई तो उनका जवाब काफी गुस्से से भरा था.

और फिर देव डी आई और सब कुछ बदल गया. अब हर कोई उनका मुरीद है. आदित्य चोपड़ा जैसे निर्देशक भी जिनके सरसों के खेत के मायने देव-डी की पारो और उसकी साइकिल पर लदे मैट्रेस ने बदल दिए. आज इमोशनल अत्याचार और गुलाल के मुजरे का खुमार सबके सिर चढ़कर बोल रहा है. हालांकि देव-डी के तुरंत बाद कश्यप ने दोस्तों से कहा था कि वे नाकामयाबी के लिए कहीं बेहतर तरीके से तैयार थे.

कश्यप की शुरुआती पढ़ाई बोर्डिंग स्कूल में हुई. राज्य विद्युत बोर्ड में नौकरी करने वाले उनके पिता को लगता था कि बोर्डिंग ही बच्चे के लिए मुफीद जगह है. मगर स्कूल में दोस्तों से मार खाने और कुछ पड़ोसियों द्वारा शारीरिक र्दुव्‍यवहार की कड़वी यादें उनके संवेदनशील मन की जमीन पर कभी न मिटने वाली लकीरें बना गईं. जैसा कि वे बताते हैं, ‘इसके चलते मैं सेक्स के मामले में अक्षमता का शिकार हो गया. साथ ही मैं अक्सर अवसाद में रहने लगा.’ फिर जब कश्यप दिल्ली आए तो उन्होंने शरीर को गठीला बनाया और जल्द ही कॉलेज में मारपीट करने वाले छात्र के रूप में कुख्यात हो गए. वे कहते हैं, ‘मैं फिर से वह सब झेलना नहीं चाहता था.’

कॉलेज के दिनों में जूनियर्स के साथ ज्यादा वक्त बिताने की वजह से कश्यप के क्लासमेट्स उन्हें बच्चों का दादा कहकर चिढ़ाते थे

कुछ साल पहले ही उन्होंने अपने परिवार को अपने साथ हुए शोषण के बारे में बताया. हाल ही में काफी कोशिश करके उन्होंने उन लोगों के साथ भी आंखें मिलाईं जिनके दुर्व्‍यवहार का वे शिकार हुए थे. कश्यप ने उन्हें माफ तो कर दिया मगर एक पिता के रूप में उन्हें हमेशा इस बात का ध्यान रहता है. 10 साल की बेटी आलिया के बारे में बात करते हुए कश्यप कहते हैं, ‘मैं उसे छूते हुए बहुत सावधान रहता हूं.’

अपने बनारस से होने को लेकर कॉलेज में कश्यप असुरक्षा के शिकार थे. मगर उनके आसपास ऐसे लोगों की कमी नहीं थी जिन्हें जिंदगी में किसी बात को लेकर असुरक्षा नहीं थी. इनमें एक लड़की भी थी जिसने ब्वॉयज हॉस्टल में एक लड़के के कमरे में एक रात बिताकर स्कैंडल खड़ा कर दिया था और अगली ही सुबह इससे बेपरवाह वह उस लड़के की शर्ट पहनकर कॉलेज की मेस में नाश्ता करने चली आई थी. उस सहित कई और लड़कियां कश्यप की करीबी दोस्त बनीं जिन्होंने औरत के भीतर के संसार को समझने में उनकी मदद की. उनकी फिल्में भले ही पुरुष प्रधान रही हों मगर उनमें महिलाओं की उपस्थिति खासी सशक्त रही है. भीखू म्हात्रे की पत्नी प्यारी, देव डी की पारो और चंदा, नो स्मोकिंग की डांसर्स और गुलाल के महिला चरित्र इसका सबूत हैं.

उनके माता-पिता भले ही इस बात को लेकर परेशान रहे हों कि अपने इस बेचैन और उपद्रवी बेटे से कैसे निपटा जाए मगर मुंबई में उनका एक करीबी परिवार बन गया है. रुचा पाठक उन्हें अपने भाई जैसा मानती हैं तो अनुभवी थियेटर कलाकार और गुलाल के असाधारण संगीत रचयिता उन्हें अपने पिछले जन्म का बेटा बताते हैं.

कई साल पहले फिल्मकार इम्तियाज अली अपने पुराने कॉलेज हिंदू में आए थे. कश्यप ने जब सुना कि अली एक टेलीविजन सीरियल के लिए एक्टरों के चुनाव में मदद कर रहे हैं तो वे उनसे मिलने जा पहुंचे. सीरियल तो बन नहीं पाया मगर थियेटर में गहरा शौक रखने वाले अली और कश्यप की बढ़िया छनने लगी. बाद में अली ने मुंबई में एक एडवरटाइजिंग कोर्स ज्वॉइन कर लिया और कश्यप से उनका संपर्क टूट गया. एक शाम जब वे जेवियर हॉस्टल लौटे तो उन्होंने पाया कि कश्यप उनका इंतजार कर रहे हैं. दरअसल मुंबई में रहने के लिए उनके पास कोई ठिकाना नहीं था और वे कुछ समय तक अली के हॉस्टल रूम में रहे.

उन दिनों को याद कर कश्यप कहते हैं, ‘नौकरी के बावजूद ऐसे दिन रहे जब मुझे खुले आसमान के नीचे सोना पड़ता था.’ अगले ही पल वे मजाकिया लहजे में कहते हैं, ‘लेकिन मेरा टॉयलेट ताज में था.’ कश्यप की जिंदगी अली के साथ गुंथी रही जो मानते हैं कि कश्यप इतने भी दुर्भाग्यशाली नहीं थे. जैसा कि अली कहते हैं, ‘अनुराग को अपनी फिल्में बनाते वक्त काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा और वे काफी निराश भी रहे. मगर ये होता रहता है. कम से कम उन्हें फिल्में बनाने के मौके तो मिलते रहे.’

अब जब कश्यप की एक खास पहचान बन गई है तो ये खतरा भी बढ़ गया है कि ये सफलता कहीं उन्हें रामगोपाल वर्मा की राह पर न ले जाए. कामयाबी का ये नशा कहीं उन्हें एक ऐसी दुनिया में न पहुंचा दे जहां हर कोई उनसे सहमत दिखे. अगर उनकी अगली फिल्म में जैसा चाहा प्राप्त करने की भावना देव-डी से ज्यादा दिखे तो क्या उनके शुभचिंतक उन्हें चेताने की जहमत उठाएंगे?

जहां तक कश्यप का सवाल है तो सफलता का स्वाद चखने के बाद अब वह धड़ाधड़ फिल्में बनाने की इच्छा नहीं रखते. वे कहते हैं, ‘मुझे डर लग रहा है कि कामयाबी के इस खुमार में मैं पता नहीं कैसी फिल्म बना बैठूं. यही वजह है कि मैं अभी कुछ समय तक कुछ नहीं करूंगा. और मैं जानबूझकर बजट भी कम करने जा रहा हूं.’ पिछले ही हफ्ते उन्होंने पैशन फॉर सिनेमा पर लोगों से उस सिनेमा पर ध्यान देने की अपील की जिसकी वे पैरोकारी करते हैं. उन्होंने लिखा, ‘फिराक और बारहआना जैसी फिल्मों पर चर्चा क्यों नहीं हो रही? ये दोनों ही फिल्में आज मैंने खाली थियेटर में बैठकर देखी हैं.’

फिलहाल कश्यप डोगा की स्क्रिप्ट लिख रहे हैं. उन्हें राज कॉमिक्स का सुपरहीरो डोगा पसंद है जिसके पास सुपरपॉवर्स के बजाय सिर्फ भावनाओं की तीव्रता होती है. ये बड़े बजट की फिल्म होगी और इसमें काफी स्पेशल इफेक्ट्स भी होंगे. आजकल कश्यप काफी शांत हैं और इसका काफी श्रेय उनकी गर्लफ्रेंड कल्कि कोक्लिन को जाता है. अपनी पत्नी आरती बजाज, जो कि एक एडिटर भी हैं, से अलग हुए उन्हें तीन साल हो चुके हैं. कश्यप बताते हैं, ‘वह मेरी पीने की आदत और अवसाद से परेशान हो गई थी. हालांकि हम अब भी साथ-साथ काम करते हैं.’ बीच में उनका संबंध एक्ट्रेस आएशा मोहन से भी रहा मगर ये ज्यादा नहीं चल पाया.

कल्कि का आना उनकी जिंदगी में अप्रत्याशित रहा. दरअसल देव-डी में चंदा की भूमिका के लिए अभिनेत्री की तलाश जोर शोर से चल रही थी. कश्यप ने कल्कि का पोर्टफोलियो देखते ही ये कहते हुए रिजेक्ट कर दिया कि, ‘मैं कोई गोरी मॉडल टाइप लड़की नहीं चाहता.’ उन्होंने कल्कि का ऑडिशन भी नहीं देखा. मगर फिर बाद में हालात कुछ ऐसे बदले कि वही कल्कि कश्यप को चंदा के रोल के लिए सबसे फिट लगीं. फिल्म बनाने के बाद कश्यप अमेरिका चले गए जहां उन्हें ये अहसास हुआ कि उन्हें कल्कि से प्यार हो गया है. उधर, कल्कि का हाल भी कुछ यही था. फिल्म इंडस्ट्री में लोग अक्सर प्रेम संबंधों को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने से कतराते हैं मगर कश्यप और कल्कि इस मामले में काफी खुले मिजाज के रहे हैं. कश्यप के मुताबिक अब वे काफी बदल गए हैं. अब वे पार्टियों में देर रात तक नहीं रहते.

कॉलेज के दिनों में जूनियर्स के साथ ज्यादा वक्त बिताने की वजह से कश्यप के क्लासमेट्स उन्हें बच्चों का दादा कहकर चिढ़ाते थे. आज भी कश्यप फिल्मी दुनिया के जूनियर्स यानी कि नए विचारों से भरे हुए प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी लेखकों और निर्देशकों से घिरे रहते हैं. इस साल उनकी इन प्रतिभाओं की चार सबसे बेहतरीन स्क्रिप्ट्स पर फिल्म बनाने की योजना है.

कश्यप और उनके समकालीन इम्तियाज अली, श्रीराम और श्रीधर राघवन, शिवम नायर और निशिकांत कामत बॉलीवुड की दुनिया में नए सांचे गढ़ रहे हैं. वे हर स्तर पर एक दूसरे को अपनी स्क्रिप्ट दिखाते रहते हैं. यही नहीं, फिल्म के आलोचकों और जनता तक पहुंचने से पहले वे इसे एक दूसरे को दिखाते हैं. ये सभी दोस्त आज इससे खुश हैं कि कश्यप की बेचैनी से उपजी सृजनात्मकता का जादू आखिरकार पूरी तरह से चल गया है.  

खामोशी के उस पार : विदेश

यह तितली सी चंचल चांद (प्रीति जिन्टा) के खूबसूरत सपने की कुरूप यथार्थ से सीधी मुठभेड़ है. चांद का सपना कुछ यूं टूटता है कि चांद हक़ीकत और फसाने के बीच का फर्क खो बैठती है. आगे पूरी फिल्म में इस टूटे सपने की बिखरी किरचें हैं जिन्हें समेटने में उसकी मदद करने वाला कोई नहीं. वो अकेली जितना ऐसा करने की कोशिश करती है उतना ही खुद को लहूलुहान करती है.

अपने देश, अपनी पहचान से दूर दड़बेनुमा घर में कैद अपने पति की बेरहमी की शिकार चांद की लड़ाई अपनी पहचान की लड़ाई है. पति से प्यार और दुलार की अथक चाह उसे एक ऐसी मिथकीय कहानी पर विश्वास करने के लिए मजबूर कर देती है जिसमें एक शेषनाग उसके पति का रूप धरकर आता है और उसे दुलारता है. इस मिथकीय कथा को तर्क की कसौटी पर कसना और फिर नकार देना आसान है लेकिन यान मारटेल का बहुचर्चित लाइफ ऑफ पाई पढ़ने वाले जानते हैं कि असहनीय यथार्थ का सामना करने के लिए काल्पनिक चरित्रों को गढ़ना इंसानी मजबूरी है. गिरीश कर्नाड के नाटक नागमंडलम से लिया गया फिल्म का ये हिस्सा दरअसल उस मनोस्थिति के बारे में है जिससे फिल्म में चांद को गुजारना पड़ता है. उसकी त्रासदी को दीपा मेहता सिनेमा के पर्दे को बार-बार स्याह-सफेद रंगकर और भी तीखेपन से उभारती हैं. प्रीति यहां अपनी मुखर सार्वजनिक छवि के उलट दूर देश में फंसी एक असहाय लड़की के किरदार में जान फूंक देती हैं और बाकी तमाम अनजान चेहरे इस फिल्म को अपनी नैसर्गिक अदायगी से वृत्तचित्र का सा तेवर देते हैं.

ये कहानी बदहाल हो रहे उस पंजाब की कहानी भी है जिसके सपने भी अब किसी दूर देस में मौजूद अनदेखे सुनहरे भविष्य से लगाई उम्मीद के मोहताज हैं. आमतौर से स्त्री पर होती घरेलू हिंसा पर आधारित कहानियों में मुख्य खलनायक पति या घरवाले ही होते हैं लेकिन दीपा की विदेश साफ करती है कि व्याख्याएं हमेशा इतनी सरल नहीं होती. यहां बहू की पिटाई में संतुष्टि पाने वाली सास में एक असुरक्षित मां छिपी है और पत्नी को मारने वाला पति उन एन.आर.आई. सपनों को ढोती जीती-जागती लाश है जिसे फीलगुड सिनेमा के नाम पर हिन्दुस्तानी फिल्मों ने सालों से बुना है.

मिहिर पंड्या 

ढलान का उत्थान

जब कोई व्यक्ति किसी तीखी ढलान पर उतरना शुरू करता है तो शुरुआत में उसे आगे बढ़ने या यूं कहें कि नीचे उतरने के लिए कोई खास प्रयास नहीं करने होते. उसे केवल खुद को थोड़ा ढीला छोड़ना होता है और बाकी का काम धरती का गुरुत्वाकर्षण बल कर देता है. इस प्रकार लगभग बिना ऊर्जा नष्ट किए व्यक्ति आगे बढ़ने लगता है. मगर ये आसानी केवल शुरुआत में ही नजर आती है. यदि उसे अपनी इस यात्रा को निर्बाध जारी रखना है तो गिरने से बचने के लिए अपनी गति को लगातार तेज करते रहना होगा. यदि वो रफ्तार के एक सीमा में रहते अपने गंतव्य तक पहुंच जाता है तो ठीक, अन्यथा संतुलन खोकर उसके औंधे मुंह गिर जाने या किसी बाधा के आ जाने पर उससे टकराने की आशंका आसन्न रहती है.

राजनीति के ककहरे की अभी शुरुआत ही करने वाले वरुण गांधी ने सांप्रदायिकता के क्षत्रज्ञ की हुंकार क्या भरी कि भाजपा के नेता-कार्यकर्ता उन्हें आडवाणी और नरेंद्र मोदी के बाद पार्टी का स्टार प्रचारक बनाने पर तुल गए हैं

हमारे देश में सांप्रदायिक राजनीति का अभ्यास भी कुछ-कुछ ढलान पर नीचे उतरने के अनुभव जैसा ही है. इसके शुरुआती परिणाम इसका अभ्यास करने वालों में जरूरी से कुछ ज्यादा ही आशा का संचार कर देते हैं. जब कोई वरुण गांधी जैसा व्यक्ति इस रास्ते पर चलने की शुरुआत करता है तो न के बराबर मेहनत में उसे वो परिणाम मिलने शुरू हो जाते हैं जिनके लिए महात्मा गांधी जैसे या फिर सिर्फ संविधान के दायरे में रहकर राजनीति करने वाले किसी भी व्यक्ति को दसियों साल पापड़ बेलने पड़ सकते हैं.

राजनीति के ककहरे की अभी शुरुआत ही करने वाले वरुण गांधी ने सांप्रदायिकता के क्षत्रज्ञ की हुंकार क्या भरी कि भाजपा के नेता-कार्यकर्ता उन्हें आडवाणी और नरेंद्र मोदी के बाद पार्टी का स्टार प्रचारक बनाने पर तुल गए हैं. केवल 15-20 दिन पहले तक हमेशा वंशवाद के लिए कांग्रेस को भर-भर के कोसती आई भाजपा में वरुण गांधी की ताकत का एकमात्र स्रोत उनका गांधी उपनाम ही तो था. मगर ऐसा उपनाम होते हुए भी वरुण ने महात्मा गांधी और उनके प्रिय सिद्धांतो को ताक पर रखकर उनपर हर तरह का कीचड़ क्या उलीचा वो संघ, शिवसेना, भाजपा और उनके जैसे तमाम दूसरे लोगों की आंखों का तारा हो गए.

मगर अपने युवा-सुलभ उत्साह और स्टार प्रचारक की मुफ्त में मिली हैसियत के शोरगुल में या फिर पूर्व की अपनी एक प्रकार की गुमनामी की हताशा में शायद वरुण ये भूल गए कि सांप्रदायिकता की ढलान पर उन्होंने अपनी यात्रा प्रारंभ तो कर दी है किंतु उस पर खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए उन्हें लगातार अपनी रफ्तार में तेजी लाती रहनी होगी. मगर उनके सामने परिस्थितियां किसी आखिरी दांव लगाने वाले आडवाणी सरीखे नेता की तो हैं नहीं इसलिए वो कब तक इस ढलान पर अपनी गति को तेज और तेज करते चले जाएंगे. क्या उन्हें इस रास्ते पर कभी कुलांचे भर चुके उमा भारती, विनय कटियार और कल्याण सिंह सरीखे नेताओं का हाल याद नहीं है.

अगर वो इस रास्ते पर थोड़ा आगे कहीं ठहरकर संतुलन साधने का प्रयास करने की सोच रहे हैं तो मुहम्मद अली जिन्ना की मजार पर अपनी छवि सुधारने की जुगत में जो कुछ आडवाणी के साथ हुआ उस नज़ीर को भी तो उन्हें अपने ध्यान में रखना होगा.

संजय दुबे 

एक ही रास्ता

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अफगानिस्तान में 17,000 अतिरिक्त सुरक्षा बल भेज चुके हैं. दिनोंदिन बिगड़ते हालात को संभालने और स्थिरता लाने के लिए अगले पांच साल में जितने अतिरिक्त सैनिक वहां भेजे जाएंगे उनकी ये पहली खेप है. ओबामा को निश्चित रूप से ये अहसास होगा कि मौजूदा हालात में अफगानिस्तान में चल रही लड़ाई में तेजी लाना तो दूर उसे जारी रखना ही मुश्किल होता जा रहा है. कनाडा पहले ही फैसला कर चुका है कि अगले दो साल में उसके सैनिक अफगानिस्तान से लौट जाएंगे. ब्रिटेन की अपने सैनिकों को बढ़ाने की कोई इच्छा नहीं है और नाटो के सेक्रेटरी जनरल जाप दे हूप शेफर भी चेतावनी दे चुके हैं कि एक तो अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी कोई विकल्प ही नहीं है और दूसरे, इस देश में शांति राजनीतिक समझौते के जरिए ही बहाल हो सकती है.

आज फाटा यानी पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम में 27,220 वर्ग किमी के इलाके का अधिकांश हिस्सा और नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर के सात जिले पाकिस्तान सरकार के हाथ से बाहर चले गए हैं मुश्किलें और भी हैं. अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के अमेरिकी तरीके को लेकर समर्थन घट रहा है. इसका सबसे हालिया संकेत है किर्गिस्तान सरकार का वह फैसला जिसमें उसने कहा है कि उसके यहां स्थित अमेरिकी बेस को अगले छह महीने में बंद कर दिया जाएगा. गौरतलब है कि अफगानिस्तान में लड़ाई जारी रखने के लिए अमेरिकी और नाटो सेना प्रत्यक्ष रूप से सबसे ज्यादा उसके पड़ोसी देशों पर ही निर्भर रहती है. उधर, इससे भी गंभीर बात ये है कि पाकिस्तान के रास्ते सैन्य बलों और रसद की आपूर्ति करने वाले रास्ते असुरक्षित होते जा रहे हैं और ऊपर से पाकिस्तानी सेना कबायली इलाकों में अपने और ज्यादा सैनिक भेजने के लिए राजी नहीं है. अब अमेरिका ईरान और उज्बेकिस्तान के जरिए वैकल्पिक रास्तों की सोच रहा है. मगर आशंका ये है कि उन रास्तों से होने वाली आपूर्ति पाकिस्तान स्थित रास्तों से हो रही आपूर्ति का छोटा सा हिस्सा भर ही होगी. उधर, ईरान अगर अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान की सीमा तक पहुंचने के लिए अपना बंदरगाह और रेलमार्ग इस्तेमाल करने की इजाजत दे भी देता है तो वह इसकी ऐसी राजनीतिक कीमत मांग सकता है जिसे चुकाना अमेरिका के लिए महंगा सौदा होगा.

इस बीच आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका को एक के बाद एक झटका लग रहा है. अगर पाकिस्तान की स्वात घाटी में सरकार और तालिबान के बीच हुआ समझौता स्थाई शक्ल अख्तियार कर लेता है तो इसके व्यापक परिणाम होंगे. समझौते से न सिर्फ स्वात में इस्लामिक शरिया कानून लागू हो जाएगा बल्कि तालिबान ने 200 स्कूलों को ढहाने और लोगों के सिर कलम करने जैसी जिन करतूतों को अंजाम दिया है, वे कानूनन सही हो जाएंगी.

इसके अलावा पाकिस्तान के भीतर ही अल कायदा और तालिबान को एक और सुरक्षित पनाह मिल जाएगी. ये समझौता ओबामा द्वारा इस क्षेत्र के लिए नियुक्त किए गए विशेष दूत रिचर्ड हॉलब्रुक के ठीक पीठ पीछे हुआ जो बताता है कि पाकिस्तान और अमेरिका के बीच का आपसी भरोसा कितना असली है.मगर लगता है कि ओबामा के सलाहकार ये सब देखना ही नहीं चाहते कि आतंकवाद के खिलाफ उनकी इस लड़ाई के लिए समर्थन लगातार घटता जा रहा है. वे इन सब घटनाक्रमों में दूसरी वजहें ढूंढ रहे हैं. मसलन किर्गिस्तान के फैसले पर उनका आरोप है उसने ऐसा रूस के कहने पर किया जिसने उसे सहायता के रूप में हर साल 2.15 अरब डॉलर की पेशकश की है. इसी तरह पाकिस्तान के अनमनेपन पर उनमें से कुछ का कहना है कि अगर भारत कश्मीर मसले के हल के लिए और ज्यादा सक्रियता दिखाए तो निश्चित रूप से पाकिस्तान तालिबान के खिलाफ उनकी लड़ाई में और ज्यादा सहयोग करेगा.

अफगानिस्तान में शांति होगी तो पाकिस्तान स्थित तालिबान को कट्टर इस्लामी राष्ट्रवाद की वह खुराक मिलनी बंद हो जाएगी जिस पर पलकर वह अपनी ताकत बढ़ा रहा है

मगर वे यह नहीं देखते कि किर्गिस्तान की संसद में अमेरिकी सैनिक अड्डा बंद करने का प्रस्ताव 78 के मुकाबले दो वोटों से पारित हुआ जो बताता है कि इस देश के लोग अपनी जमीन पर अमेरिका की मौजूदगी को कितना नापसंद करते हैं. उधर, अगर पाकिस्तानी सेना तालिबान से लड़ना नहीं चाह रही है तो इसकी वजह हाल ही में ब्रिटिश अखबार गार्डियन में छपे स्वात घाटी में तैनात सेना के एक कैप्टन के बयान से साफ हो जाती है जिसमें उसने कहा था कि एक सैनिक के लिए इससे पीड़ादायक और कुछ नहीं होता कि वह अपने ही लोगों से लड़े.

दरअसल कड़वा सच ये है कि अमेरिका और नाटो को मिलने वाला समर्थन तेजी से घट रहा है. और ऐसा इसलिए हो रहा है कि अफगानिस्तान में चल रही लड़ाई एक ऐसी लड़ाई में तब्दील हो गई है जिसका कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं दिखता और इसलिए ये अंतहीन लगने लगी है. 2001 में जब ये शुरू हुई थी तो तालिबान को हराने के साथ-साथ इसका मकसद अलकायदा के नेताओं को पकड़ना या फिर खत्म करना भी था. काबुल से तो तालिबान का कब्जा हट गया मगर इसके नेता सीमा पार कर पाकिस्तान के दुर्गम कबायली इलाकों (फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियाज यानी फाटा) में घुस गए. अमेरिकी फौजों ने यहां हमले किए तो उन्होंने पश्तून प्रधान नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर में शरण ले ली.

आज फाटा यानी पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम में 27,220 वर्ग किमी के इलाके का अधिकांश हिस्सा और नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर के सात जिले पाकिस्तान सरकार के हाथ से बाहर चले गए हैं. बीते साल के दौरान अमेरिका पाकिस्तान पर इस बात के लिए दबाव बढ़ाता रहा कि वह भारतीय सीमा से सैनिकों को हटाकर फाटा में आतंकवादियों के खिलाफ लड़ाई तेज करे. मगर पाकिस्तान की सेना ऐसा करने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है. इसकी वजह पूर्वी सीमा पर भारत के हमले की आशंका नहीं है जैसा कि वह दावा करती है, बल्कि दिल ही दिल में वह जानती है कि फाटा में गुरिल्ला लड़ाई लड़ रहे आतंकियों से पार पाना नामुमिकन है. अफगानिस्तान में लड़ रही पश्चिमी फौजों को भी ये अहसास हो गया है कि वे भले ही तालिबान को खदेड़ दे रही हों मगर ऐसा माहौल तैयार नहीं कर पा रहीं जिसमें आम लोग बिना किसी डर के सामान्य तरीके से अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जी सकें.

इसलिए शायद पाकिस्तानी सेना ने मान लिया है कि अफगानिस्तान में छिड़ी लड़ाई में जबर्दस्ती घसीटे जाने से बचने का एकमात्र रास्ता ये है कि भारत से खतरे की आशंका जताई जाए और ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी जाएं कि ये आशंका वास्तविक लगे. पिछले साल काबुल स्थित भारतीय दूतावास और मुंबई पर हुआ हमला इसीलिए हुआ लगता है. अमेरिकी, ब्रिटिश और भारतीय खुफिया एजेंसियों ने इन दोनों हमलों के तार पाकिस्तान स्थित उन संगठनों से जुड़े पाए थे जिन्हें पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का संरक्षण प्राप्त है.

रणनीति में कोई असाधारण बदलाव ही इस गतिरोध को दूर कर सकता है. अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तान के तालिबान को हराया जाए जिससे अफगानिस्तान में मौजूद तालिबान अलग-थलग पड़ जाए. मगर उसके लिए बेहतर ये होगा कि वह अफगानिस्तान के लिए एक सर्वस्वीकार्य शांति समझौता खोजे. अफगानिस्तान में शांति होगी तो पाकिस्तान स्थित तालिबान को कट्टर इस्लामी राष्ट्रवाद की वह खुराक मिलनी बंद हो जाएगी जिस पर पलकर वह अपनी ताकत बढ़ा रहा है. शांति की नई पहल का पहला कदम ये होना चाहिए कि वहां एक ऐसी नयी राजनीतिक व्यवस्था बनाई जाए जिसमें वहां की जातीय और धार्मिक विविधता की भागीदारी हो. ओबामा की टीम इस निष्कर्ष की तरफ बढ़ रही है कि वहां भारत की तर्ज पर केंद्र-राज्य शासन प्रणाली विकसित की जाए.

मगर इससे भी बड़ी चुनौती आपस में लड़ रहे सभी पक्षों को बातचीत की मेज तक लाने की है. सात साल से जारी लड़ाई के बाद इस पर संदेह पैदा होता है कि अफगानी राष्ट्रपति हामिद करजई या फिर पश्चिमी ताकतें अफगानिस्तान के समाज के अलग-अलग धड़ों को बातचीत के लिए एक जगह पर ला सकेंगे. ऐसे में ये जिम्मेदारी पाकिस्तान, ईरान, भारत और उज्बेकिस्तान जैसे उसके पड़ोसियों की बन जाती है. इन देशों में से हर एक का अफगानी समाज के अलग-अलग धड़ों के साथ लंबे समय से जुड़ाव रहा है. इसलिए अगर सभी मिलकर काम करें तो वे इस मकसद को अपना नैतिक और जरूरी हुआ तो सैन्य समर्थन भी दे सकते हैं.मगर इसमें सबसे बड़ी रुकावट है भारत को लेकर पाकिस्तान की सेना और नौकरशाही की कड़वाहट. हालांकि ये अच्छी बात है कि दोनों देशों की सरकारें और लोग आपस में शांति चाहते हैं. तीन साल तक राष्ट्रपति मुशर्रफ और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने सलाहकारों के पूर्वाग्रहों को दरकिनार कर कश्मीर पर एक समझोते की दिशा में आगे बढ़ते रहे. मार्च 2007 में वे इसके काफी करीब पहुंच गए थे लेकिन तब तक मुशर्रफ का वक्त खत्म हो गया. अक्टूबर 2008 में बात फिर आगे बढ़ी जब दोनों देशों ने व्यापार को ध्यान में रखते हुए कश्मीर में दो जगह से सीमापार आवाजाही का रास्ता खोल दिया. मगर मुंबई हमले और इसके तार पाकिस्तान से जुड़ने के बाद इस प्रक्रिया में फिर से गतिरोध पैदा हो गया है.

विश्वासबहाली की कोशिशें जारी हैं. मगर ये पूरी तरह से तब तक बहाल नहीं हो सकता जब तक दोनों देशों की सेनाएं इसके खिलाफ काम कर रही हों. आज दोनों देशों में एक दूसरे के खिलाफ आशंकाओं और अविश्वास का माहौल है. ये एक ऐसी चुनौती है जिससे निपटने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरी मुख्य शक्तियों के सहयोग की जरूरत है.  

 

भगत का अनछुआ जगत

संगीत, कविता और सिनेमा से गहरा जुड़ाव होने के नाते मुझे जिज्ञासा होती है कि क्या मैं भगत सिंह को इतिहास के पन्नों से कुछ देर के लिए उधार लेकर उनके व्यक्तित्व को एक अलग रोशनी में देख सकता हूं.

भगत सिंह की नई तकनीकों में काफी रुचि थी. कहा जाता है कि वो अक्सर क्रांतिकारी साथियों को खाने के पैसे बचाकर सिनेमा देखने के लिए फुसलाते थे

जेल में लिखी गई भगत सिंह की नोटबुक को पलटते हुए मेरी नजर उमर खय्याम की कुछ रुबाइयों के अंग्रेजी अनुवाद पर पड़ती है जिसका मतलब कुछ यूं बनता है –

ओ मेरे प्रियतम वो प्याला भर

जो मिटा दे बीते का अफसोस

और आने वाले कल का डर

यहां एक दरख्त के नीचे रोटी के एक टुकड़े के साथ

शराब की बोतल और शायरी की एक किताब

और इस वीराने में तुम मेरे पास गाती हुई

वीराने को जन्नत बनाती हुई

पहली नजर में ये रुबाइयां देखकर अजीब लगता है. क्या ये वही भगत सिंह हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे एक घोर यथार्थवादी थे? ऐसे आवेगों से दूर, जो तर्क की कसौटी पर खरे नहीं उतरते. लोकप्रिय छवि में भी भगत सिंह ऊर्जावान की बजाय गरिमामयी युवा ज्यादा नजर आते हैं. उनकी लेखन शैली, समझने और पाठकों से संवाद स्थापित करने वाली थी. इसमें युवाओं वाली आक्रामकता भी नजर आती है मगर एक संयत दायरे में रहकर. इसलिए भगत सिंह की नोटबुक में लिखी इन रूबाइयों को देखना कुछ अजीब सा लगा.

भले ही दोनों रुबाइयों में कोई मेल जुड़ता न लगता हो लेकिन इनमें वर्तमान के साथ एक गहरा जुड़ाव झलकता है – जो मिटा दे बीते का अफसोस और आने वाले कल का डर. वर्तमान ही सब कुछ है इसका अहसास दरख्त के नीचे प्याले और प्रियतम के साथ की इच्छा और गहरा कर देती है. एक युवा क्रांतिकारी की कोमल भावनाएं..ऐसा कम ही हुआ है कि भगत सिंह प्रेम से जुड़े सवालों में उलझे हों. इसकी एक हल्की सी झलक उनके द्वारा सुखदेव को लिखे एक पत्र में मिलती है जिसमें एक संभावित आकर्षण की चर्चा की गई थी जिसे वे बाद में पलटते तो प्रतीत होते हैं पर पूरी तरह से नकारते नहीं.

यथार्थ में जीने के बावजूद भगत सिंह की कल्पनाएं मुझे आलंकारिक और भव्य लगती हैं. फांसी से कुछ घंटे पहले लिखी गई उनकी पंक्तियों में वो तल्लीनता से खुद को परिभाषित करते प्रतीत होते हैं.

कामरेड साथियों और सरकार को ये समझना जरूरी था कि क्यों राजगुरू, सुखदेव और उनके लिए मौत का विकल्प चुनना हर तरह से सही है और क्यों बाकी आरोपी साथियों का जिंदा रहकर काम करते रहना

कोई दम का मेहमान हूं अहले महफिल

चराग-ए-सहर हूं बुझना चाहता हूं

मेरी हवा में रहेगी ख्याल की बिजली

ये मुश्त-ए-खाक है फानी, रहे न रहे

अगर ये पंक्तियां वास्तव में भगत सिंह की हैं तो इनमें आत्ममुग्धता का भाव स्पष्ट दिखाई देता है. बाकी जगहों पर वे स्पष्ट रूप से कहते हैं, ‘‘मैं जोर देकर कहना चाहता हूं कि मुझ में महत्वाकांक्षाएं, उम्मीदें और जीवन के प्रति आकर्षण कूट-कूट कर भरा है. लेकिन जरूरत पड़ने पर मैं इन सबका त्याग कर सकता हूं.’’ लोगों के दिमाग में बसी अपनी छवि की क्षणभंगुरता से भी वे अच्छी तरह वाकिफ दिखते हैं. द्वितीय लाहौर षड्यंत्र केस में आरोपियों को पत्र लिखते हुए भगत कहते हैं, ‘‘मेरा नाम भारतीय क्रांति का प्रतीक बन गया है..आज लोग मेरी कमजोरियों के बारे में नहीं जानते.’’

भगत सिंह 23 वर्ष के ही थे जब वे सुखदेव और राजगुरू के साथ निर्भय होकर फांसी के तख्ते पर झूल गए. उनके चेहरे पर एक क्षण के लिए भी मौत का भय या जीवन का मोह नहीं दिखाई दिया. आखिरी वक्त तक उनका व्यवहार कुछ-कुछ परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र जैसा रहा. उनके बारे में मौजूद जानकारियां बताती हैं कि उनका ज्यादातर समय किताबों के साथ बीतता था. ये हक उन्होंने और उनके साथियों ने जेल में एक लंबी और कष्टकारी भूख हड़ताल के बाद हासिल किया था. वे किताबों के ढेर से ढेरों नोट्स बनाते थे और उनकी रुचियों की विविधता अविश्वसनीय थी. जेल में बिताए अपने आखिरी दिनों में उन्होंने पत्र लिखना भी शुरू कर दिया था. कामरेड साथियों और सरकार को ये समझना जरूरी था कि क्यों राजगुरू, सुखदेव और उनके लिए मौत का विकल्प चुनना हर तरह से सही है और क्यों बाकी आरोपी साथियों का जिंदा रहकर काम करते रहना. भगत सिंह को माफी देने की अपील करते हुए उनके पिता ने सरकार को एक पत्र लिखा था. भगत सिंह को जब ये पता चला तो वे बहुत नाराज हुए. उन्होंने पिता की पुत्र के प्रति इस स्वाभाविक कमजोरी का विरोध भी किया. पंजाब सरकार को लिखे एक पत्र में उन्होंने मांग की कि राजगुरू, सुखदेव और उनके साथ युद्धबंदियों जैसा व्यवहार किया जाए और साधारण अपराधी की तरह फांसी देने की बजाय उन्हें गोली से उड़ाया जाए.

असाधारण साहस, असीमित आदर्शवाद और युवा जोश की बहुत सी कहानियां भगत सिंह के इर्द-गिर्द घूमती हैं. कहा जाता है कि फांसी से कुछ देर पहले वे लेनिन पर एक किताब पढ़ रहे थे. जब उनसे फांसी के फंदे तक चलने के लिए कहा गया तो वो फुसफुसाए, ‘‘जरा ठहरो..एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से बात कर रहा है’’

इन संदर्भों की कोई पुष्टि तो नहीं होती लेकिन ये देश की मिट्टी में बस गए हैं. अपने पिता और पंजाबी कवि हरभजन सिंह के एक आत्मकथात्मक निबंध के जरिये मैं उस रात की कल्पना कर सकता हूं जब तीनों क्रांतिकारियों को लाहौर की सेंट्रल जेल के भीतर फांसी दी गई. जेल के सबसे नजदीक स्थित इंसानी बस्ती हमारा पैतृक गांव इच्छरा था. गांव और जेल के बीच तीन मुख्य चीजें थीं – सांपों से भरीं कांटेदार झाड़ियां, एक श्मशान और रेल की पटरी.

मैं 23 मार्च की रात की कल्पना करता हूं. ज्यादातर शांतिपूर्ण रहने वाले इस गांव में आज रोमांच का माहौल है. संभावित फांसी की अफवाहें उड़ रही हैं. शाम रात में ढलती है और गांव धीरे-धीरे अंधेरे की चादर ओढ़ लेता है. दूर से आती इंकलाब जिंदाबाद की आवाजें गांव के सन्नाटे को तोड़ने लगती हैं. क्रांतिकारियों को फांसी दी जा चुकी है. शुरुआती और संकोच भरी खामोशी के बाद छतों पर खड़े लोग भी जवाब में नारे लगाने लगते हैं. उनकी आवाज जेल के कैदियों तक पहुंचती है और वो भी इसका उत्तर देते हैं. माहौल में अब जोश आ जाता है. हिंदू, मुसलमान, सिख एक आवाज में नारे लगाते हैं और रात की खामोशी कई टुकड़ों में बिखर जाती है. दोनों तरफ से एकता का ये प्रदर्शन देर रात तक जारी रहता है. किसी ने भी आज घर में दिया नहीं जलाया है. दूर से दिख रहा जेल का उजाला रोशनी के किसी छोटे से टापू की तरह लग रहा है. लंबी और अंधेरी रात की कोख से एक नई कहानी पैदा हो रही है.

23 साल के भगत सिंह ने एक नास्तिक के रूप में फांसी के फंदे को चूमा था. खुदीराम और अशफाकउल्ला की तरह उन्होंने फांसी के समय गीता या कुरान अपनी छाती से नहीं लगाई थी. चीफ वार्डन छतर सिंह की वाहेगुरू बोलने की प्रार्थना को भी उन्होंने ये कहकर विनम्रता से ठुकरा दिया था, ‘‘नास्तिक होने के लिए मेरी आलोचना की जा सकती है. लेकिन कोई ये तो नहीं कहेगा कि भगत सिंह मौत को सामने देखकर घबरा गया.’’ उनकी नास्तिकता का उनके धर्मनिरपेक्ष आदर्शवाद की तलाश से गहरा संबंध था.

बीसवीं सदी के पहले 25 साल में बदलाव की बयार बड़ी तेजी से बह रही थी. ये सूफी आंदोलनों का दौर था और प्रथम विश्व युद्ध से झटका खाए ब्रिटिश राज की चमक भी फीकी पड़ने लगी थी.

इसी दौर में कहीं हमें 12 साल के उस भगत की कहानी मिलती है जो जालियांवाला हत्याकांड के अगले दिन स्कूल से भागकर अमृतसर पहुंचा था. वो बच्चा जो जालियांवाला बाग की मिट्टी अपने साथ ले जाने के लिए एक छोटा सा डिब्बा साथ लाया था. इस घटना में बालसुलभ कोमलता, भावुकता और बुद्धि की परिपक्वता की झलक मिलती है. कुछ साल बाद ही भगत सिंह डीएवी स्कूल छोड़कर राजनीतिक हलचल का हिस्सा बन गए. ये वो समय था जब गांधीजी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया था.

राज के खिलाफ अब तक बड़ी सीमा तक सांप्रदायिक रहा प्रतिरोध अब संस्कृतियों, धर्मों और सोच से ऊपर उठना शुरू हो चुका था. लाहौर, जालंधर, दिल्ली, इलाहाबाद, कानपुर, कलकत्ता, बंबई और पूना में हो रहे विरोध ने देश को क्रांति के एक सूत्र में गूंथ दिया. क्षेत्रीय पहचान की चमक अब धुंधली पड़ रही थी. दुनिया को दिखने लगा था कि पूरा भारत अब अंग्रेजों का विरोध कर रहा है.

ये वो दौर भी था जब किताबें, विचारधाराएं, कविताएं, संगीत, सिनेमा और रंगमंच जैसे मन बहलाव के कई नए माध्यम उभर रहे थे. भगत सिंह की नई तकनीकों में काफी रुचि थी. कहा जाता है कि वो अक्सर क्रांतिकारी साथियों को खाने के पैसे बचाकर सिनेमा देखने के लिए फुसलाते थे.

राज को योजनाबद्ध तरीके से चुनौती देने का समय आखिरकार आ गया था. विचारधाराओं में तीखा टकराव हो रहा था जिसमें मेल-मिलाप की संभावना नजर नहीं आ रही थी. दूसरे तरीकों से ब्रिटिश राज का विरोध कर रहे गांधी, नेहरू और पटेल एक ऐसी परंपरा से आए थे जो भगत सिंह, सुखदेव और बटुकेश्वर दत्त से काफी अलग थी. ये भी रोचक हैकि इन क्रांतिकारियों को जनसाधारण ने कभी बापू, चाचा, मौलाना या सरदार जैसे संबोधनों से नहीं पुकारा.

भगत सिंह का दौर गुजरे लगभग सौ साल हो चुके हैं मगर जनमानस में उनकी छवि आज भी वैसी की वैसी ही है. ये तो नहीं कहा जा सकता कि वे एक कालजयी व्यक्तित्व बनकर अमर हो गए हैं लेकिन ये भी तय है कि समय और नजरिये में बदलाव के साथ भगत सिंह की प्रासंगिकता और लोगों की सोच पर उनकी पकड़ नित नए सांचों में ढलती रहेगी.

(लेखक, शिक्षक होने के साथ-साथ संगीत, गायन, और अभिनय के क्षेत्र से जुड़े हैं) 

अंतर्जाल की उड़ान को लगाम!

शिवसेना द्वारा कंप्यूटर साइंस के छात्र अजित डी. के खिलाफ दायर मामले की सुनवाई पर रोक संबंधी याचिका सुप्रीम कोर्ट द्वारा ठुकराए जाने के बाद से हिंदुस्तानी ब्लॉगजाल पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी बहसों की बाढ़ सी आ गई है. ऑर्कुट पर शिवसेना विरोधी समुदाय (कम्युनिटी) की शुरुआत करने वाले 19 वर्षीय अजित के ऊपर धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने और धमकी देने के  आरोप लगाए गए हैं. इसकी वजह है उनकी कम्युनिटी पर आई एक गुमनाम टिप्पणी जिसमें शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को जान से मारने की धमकी दी गई थी.

 क्या भारतीय न्याय व्यवस्था को आम आदमी और किसी हस्ती के मामले में अवमानना संबंधी एक ही मानक अपनाना चाहिए, विशेषकर बाल ठाकरे जैसी विवादास्पद हस्ती के मामले में?

मगर भारतीय ब्लॉगर्स इस पर आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर ही अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. यहां बेहद महत्वपूर्ण है कि हम इस मामले को शिवसेना की वैचारिक असहिष्णुता और पत्रकारों, कलाकारों एवं लेखकों के प्रति उनके हिंसक प्रतिरोधों की अनवरत श्रंखला के संदर्भ में देखें. लिहाजा नवंबर 2006 और मई 2007 के बीच मुंबई और पुणे के साइबर केंद्रों में जब शिवसैनिक अपनी आहत धार्मिक भावनाओं की ज्वाला में ऑर्कुट समुदायों को भस्म करने के प्रयास कर रहे थे, तो ये स्थापित परंपरा का निर्वहन करने जैसा ही था.

इस विरोध ने गूगल को अपनी स्थापित नीतियों में बदलाव के लिए मजबूर कर दिया – वो न केवल अपने उपयोगकर्ताओं की निजी जानकारियों को साझा करने बल्कि एक ऐसा तंत्र बनाने पर भी राजी हो गया जिसके जरिए मुंबई पुलिस किसी भी आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के लिए सीधे गूगल को कह सकती थी. साथ ही वो संबंधित सामग्री के लिए जिम्मेदार व्यक्ति का आईपी पता और सर्विस प्रोवाइडर की जानकारी भी मांग सकती थी.

बीते दो सालों में ढेर सारे शिवसेना विरोधी ऑर्कुट समुदायों को डिलीट कर दिया गया है और 16 ऑर्कुट उपयोगकर्ताओं को आपराधिक आरोपों के तहत गिरफ्तार किया गया है. ये बेहद चिंताजनक है जो निश्चित ही भविष्य में और भी भयावह स्वरूप ले लेगा. लिहाजा ढेरों गंभीर सवाल खड़े होते हैं. शुरुआत इस सवाल से कि क्या हमें किसी ऐसे ब्लॉगर, कम्युनिटी धारक या टिप्पणीकार का बचाव करना चाहिए जो किसी आम या खास को हत्या की धमकी चस्पा करता हो या करने की इजाजत देता हो और फिर उसे हटाने से इनकार करता हो

साथ ही क्या भारतीय न्याय व्यवस्था को आम आदमी और किसी हस्ती के मामले में अवमानना संबंधी एक ही मानक अपनाना चाहिए, विशेषकर बाल ठाकरे जैसी विवादास्पद हस्ती के मामले में? शिवसेना को भावनाएं आहत होने जैसी शिकायत करने की छूट भी कैसे दी जा सकती है जबकि बाल ठाकरे की जरा सी भी आलोचना हमेशा ही उनकी भावनाओं को आहत कर देती है. और फिर शिवसेना की पहचान ही एक ऐसे संगठन की है जिसने भड़काऊ धार्मिक बयानों की परंपरा शुरू की और विरोध करने वालो को अपनी हिंसा का निशाना बनाया. सवाल ये भी है कि भारतीय न्याय व्यवस्था को किनारे कर गोपनीय जानकारियां पुलिस को उपलब्ध कराने पर गूगल की सहमति के बाद हमें गूगल की ऑनलाइन सेवाओं का उपयोग करते समय कितना सहज महसूस करना चाहिए?

एक दूसरे स्तर पर हमें इस मामले को भारत और दूसरे लोकतांत्रिक देशों में पनप रही एक परंपरा की कड़ी के रूप में देखना चाहिए. यहां परंपरागत संस्थान इंटरनेट के खिलाफ एक किस्म की लड़ाई लड़ रहे हैं और इसकी आजादी को सीमित करने की कोशिशों में हैं. बरखा दत्त और एनडीटीवी द्वारा ब्लॉगर चेतन कुंटे को मानहानि का दावा करने की धमकी इसी चलन का एक हिस्सा है. श्रीराम सेना द्वारा मंगलोर के पब में लड़कियों की पिटाई के बाद पिंक चड्डी अभियान के लोगों को कानूनी कार्रवाई की धमकी देना भी इसी परंपरा का हिस्सा है.

अमेरिकी सीनेटरों का, इंटरनेट पर बच्चों को खतरा है, ऐसा मानने से इनकार करना भी इसी चलन की बानगी है. अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और भारत की सरकारों द्वारा लागू की गई कठोर बंदिशें और साइबर अपराध कानून भी इसी परंपरा की कड़ी हैं.

एकाकी और सामूहिक तौर पर की गई ये सारी कसरत हमारी व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्वतंत्रता को सीमित करने के साथ-साथ इन अधिकारों के लिए हमारी संघर्ष करने की क्षमता को भी सीमित करती है. अजित के मामले में जो हुआ वो तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही देश और दुनिया में इंटरनेट के साथ जो हो रहा है वो भी उतना ही महत्वपूर्ण है. हमें समय रहते अपनी आंखें खोलकर इसके पीछे के व्यापक परिदृश्य को समझना होगा.

गौरव मिश्रा 2008-09 के दौरान जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय में याहू के फेलो थे 

ये कैसा क्रिकेट?

गद्दाफी स्टेडियम से निकल कर पाकिस्तानी वायु सेना के अज्ञात हवाई अड्डे पर पहुंचने के कुछ ही सेकेंड्स के भीतर सारे श्रीलंकाई खिलाड़ी वहां स्थित एक मात्र टेलीफोन बूथ पर लाइन लगा कर खड़े हो गए, वहां अंतर्राष्ट्रीय काल करने की सुविधा थी. खिलाड़ियों के चेहरे से उड़ रही हवाइयां कुछ देर पहले उनके साथ हुए दिल दहलाने वाले हादसे की चुगली कर रही थीं. उपकप्तान कुमार संगकारा ने तहलका  को बताया, ‘हमें सबको बताना था कि हम जिंदा हैं.’

पाकिस्तान के राष्ट्रीय ताने-बाने को काफी हद तक लील चुकी इस आग ने अब क्रिकेट को भी अपना निशाना बना  लिया है

टीम के कोच ट्रेवर बेलिस ने इससे कुछ देर पहले ही एक क्रिकेट वेबसाइट से बातचीत में  धमाकों और मशीनगन से गोलियां चलने की आवाजों आने के बाद अपनी प्रतिक्रिया का जिक्र करते हुए कहा, ‘मैं जमीन पर लेटा सोच रहा था कि मैं इस वक्त कुछ नहीं कर सकता.’

बेलिस के ये शब्द इस घटना के बाद पूरे उपमहाद्वीप में क्रिकेट के खेल में आने वाले ठहराव का संकेत देते हैं. सरेआम गोलियों की बौछार करते आतंकवादी, ड्यूटी पर मौजूद पुलिसवालों की मौत, खेल के मैदान से खिलाड़ियों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए उतरता हुआ सेना का हेलीकॉप्टर और जहां-तहां बिखरे खाली कारतूस के खोखों की तस्वीरों ने क्रिकेट की दुनिया को सदमे में डाल दिया है. स्टेडियम के भीतर पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान यूनिस खान ने जब पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों से पूछा,  ‘सर, अब हम क्या करें?’  तो कोई कुछ जवाब देने की स्थिति में ही नहीं था.

कुछ देर बाद ही परेशान-हाल यूनिस खान पांव पटकते हुए ऑफिस से बाहर निकले और गोलियों से बिंधी पड़ी बस को देखते हुए घर रवाना होने के लिए अपनी कार में जा बैठे.  उत्सुकतावश वहां खड़े किसी व्यक्ति ने उनसे पूछ लिया कि क्या सच में बस ड्राइवर ने बस का रास्ता बदल दिया था. यूनिस उसकी बात पर ध्यान दिए बिना ही बाहर निकल गए – और पाकिस्तान क्रिकेट अपने सबसे बुरे संकट में फंस गया. 

दुख और दहशत का अनुमान उन ब्लॉग्स से भी लगाया जा सकता है जो तूफान गुजरने के कुछ ही घंटों बाद इंटरनेट पर इस हादसे से जुड़ी चर्चाएं करने लगे थे. कराची के एक अखबार के मुताबिक शाम तक इनकी संख्या 7000 से भी ज्यादा थी और ये लगातार बढ़ती ही जा रही थी. ‘पाकिस्तान के राष्ट्रीय ताने-बाने को काफी हद तक लील चुकी इस आग ने अब क्रिकेट को भी अपना निशाना बना  लिया है,’ कराची के न्यूरोलॉजिस्ट साद शफाक़त भावुक होकर लिखते हैं शफाकत जावेद मियांदाद के जीवनी लेखक भी हैं.

‘क्रिकेट लगभग खत्म हो चुका है, 2011 विश्वकप की मेजबानी अब दूर की कौड़ी है’ पूर्व पाकिस्तानी कप्तान वसीम अकरम कहते हैं

हड़बड़ाए पीसीबी ने पहले तो ये कह कर पल्ला झड़ने की कोशिश की कि हमला रोकना प्रबंधन के नियंत्रण के बाहर था लेकिन बाद में जब ब्रिटिश अखबार गार्डियन ने खबर दी कि सरकारी मशीनरी को स्थानीय पुलिस की तरफ से विशिष्ट जानकारी दी गई थी जिसके मुताबिक आतंकवादी श्रीलंकाई टीम को निशाना बनाने की फिराक में थे, तब उन्होंने चुप्पी साध ली. पेपर ने 22 जनवरी के एक पत्र का हवाला दिया था जिसमें टीम के ऊपर हमले की योजना की बात कही गई थी लेकिन इसी दौरान पंजाब में राजनीतिक संकट खड़ा हो जाने की वजह से इस ओर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. ‘किसी ने भी सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम की परवाह ही नहीं की’  पंजाब की बर्खास्त सरकार के महत्वपूर्ण सदस्य रहे परवेज राशिद ये बात द डॉन से कहते हैं.

अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के अध्यक्ष डेविड मॉर्गन ने पाकिस्तान को वर्तमान में दुनिया का सबसे खतरनाक स्थान बताया है और ये भी कहा है कि अगर पाकिस्तान को कोई अंतर्राष्ट्रीय आयोजन करना है तो उसे अपने यहां स्थितियों में आमूल-चूल बदलाव लाना होगा. ‘पाकिस्तान में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट का तब तक सवाल ही नहीं पैदा होता जब तक कि वहां कोई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को नहीं मिलता’  लंदन के लॉर्ड्स क्रिकेट मैदान में एक खचाखच भरे संवाददाता सम्मेलन में मॉर्गन ये कहते हैं.

क्रिकेट की नियामक इकाइयों में इस तरह के भय का सीधा असर आयोजकों पर भी पड़ रहा है. दुबई में टेन स्पोर्ट्स चैनल का संचालन करने वाले ताज टेलीविजन नेटवर्क (फिलहाल जी टेलीफिल्म्स का हिस्सा) के संचालकों ने आपस में बैठक करके इस पर विचार किया कि क्या पिछले साल पीसीबी के साथ हुए 14 करोड़ डॉलर के समझौते को बचाने का सबसे अच्छा तरीका ये है कि सारे मैच मध्य-पूर्व के किसी देश में आयोजित किए जाएं. ‘क्रिकेट लगभग खत्म हो चुका है, 2011 विश्वकप की मेजबानी अब दूर की कौड़ी है’ पूर्व पाकिस्तानी कप्तान वसीम अकरम कहते हैं.  

अजीब विडंबना है. दक्षिण एशिया – जहां इस खेल के  प्रति लोगों में हद से ज्यादा जुनून है – में ही क्रिकेट संकट में है. यहां बताने की जरूरत नहीं कि इस खेल को चलाने के लिए जरूरी अरबों डॉलर के प्राणदायी ईंधन की आपूर्ति यहीं से होती है. इंडियन प्रीमियर लीग के मुखिया ललित मोदी ने जैसे ही हमले की खबर सुनी वे खाना छोड़कर फोन पर व्यस्त हो गए. एक फोन उन्होंने दक्षिण अफ्रीकी निकोलस स्टाइन को किया जिनकी कंपनी ने आईपीएल के पहले संस्करण के सुरक्षा प्रबंधन का जिम्मा संभाला था. मोदी जानना चाहते थे कि मौजूदा स्थितियों में जब खतरा इस हद तक जा पहुंचा है क्या स्टाइन का दल इससे निपट सकता है.

मोदी की चिंता की और भी वजहें थी. गृहमंत्री पी चिदंबरम ने उनसे पूछा था कि क्या अप्रैल से शुरू होने जा रहे आईपीएल के द्वितीय संस्करण को टाला जा सकता है. मोदी का शुरुआती रुख नकारात्मक था क्योंकि आगे मानसून का महीना है जिसमें टूर्नामेंट कराना संभव नहीं है दूसरे भारत को बीसम-बीस क्रिकेट का चैंपियंस कप भी आयोजित करना है. इसके बाद श्रीलंका में ट्राई सीरीज खेलनी है फिर जून में इंग्लैंड में होने वाला बीसम-बीस विश्व कप भी है. ‘फिर समय ही कहां बचता है?’ मोदी सवाल करते हैं. कोलकाता नाइट राइडर्स के जॉय भट्टाचार्य कहते हैं, ‘1000 करोड़ से ज्यादा रूपए दांव पर लगे हैं, ऐसे में एक झटके में टूर्नामेंट स्थगित कर देना कोई समझदारी नहीं है.’

न्यूजीलैंड क्रिकेट बोर्ड जिसकी 2002 के पाकिस्तान दौरे के समय आतंकवाद से सीधी मुठभेड़ हो चुकी है, ने इस साल के अंत में होने वाले पाकिस्तान दौरे को रद्द कर दिया है. 2002 में कराची में उनके होटल के ठीक बाहर एक जबर्दस्त धमाका हुआ था और न्यूजीलैंड ने दौरा बीच में ही रद्द कर दिया था. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने पाकिस्तान के साथ अगले महीने होने वाली सीरीज को तो यूएई में कराने को सहमति दी है लेकिन वह अगले साल होने वाली टेस्ट श्रंखला को इंग्लैंड में करवाना चाहता है. इससे पहले भारत और वेस्टइंडीज ने भी पाकिस्तान के दौरे रद्द कर दिए थे. अतीत में टीमों का आतंकवाद से पाला दूर-दूर से ही पड़ा था पर श्रीलंकाई टीम को सीधे निशाना बनाने के बाद से पाकिस्तान बहिष्कार के गंभीर खतरे से घिर गया है. एक के बाद एक विदेशी टीमों के दौरा रद्द करने के  चलते अब पाकिस्तानी टीम को लंबे समय तक मेहमान टीम के रूप में ही घूमना पड़ेगा.

सवाल उठता है कि ऐसे में क्रिकेट का क्या होगा? कई तरफ से विरोध के बावजूद 2004 में पाकिस्तान दौरे को संभव बनाने में एक बड़ी भूमिका निभाने वाले बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया इसे बेहद दुविधा की स्थिति मानते हैं, ‘हम फिर से शून्य पर पहुंच चुके हैं और मुझे लगता नहीं कि यहां से वापस लौटना आसान होगा’ वो कहते हैं. 

राह नहीं आसां

श्रीलंका के ताजा हालात दक्षिण एशिया के सुरक्षा परिदृश्य के लिए चुनौती हैं. मुंबई और पिछले दिनों पाकिस्तान में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर आतंकी हमले से इस इलाके में एक नई स्थिति पैदा हो गई है. भारत और दक्षिण एशिया की सुरक्षा के लिहाज से दक्षिण भारत बहुत अहम होता जा रहा है. इसलिए श्रीलंका में शांति स्थापना ऐसा मुद्दा है जिसे भारत के नीतिनिर्माताओं को अपनी प्राथमिकता बनाना ही होगा. इस देश में शांति लाने के लिए आपको यहां के समाज के दो सबसे महत्वपूर्ण तबकों – सिंहली और तमिल – को संतुष्ट करना होगा. जब तक बातचीत या मध्यस्थता के जरिए दोनों पक्ष सौहार्दपूर्ण सहमति पर नहीं पहुंचते तब तक श्रीलंका में अस्थिरता जारी रहेगी.

इस समस्या का समाधान सिर्फ तमिलों से बातचीत और श्रीलंका संविधान के 13 वें संशोधन को लागू करने से ही संभव होगा

तमिलनाडु इस समस्या का एक और महत्वपूर्ण पहलू है. श्रीलंका की अस्थिरता का असर दक्षिण भारत के इस राज्य पर भी पड़ेगा. तमिलनाडु की तटीय रेखा खासी लंबी है और अगर श्रीलंका में शांति स्थापित नहीं होगी तो इस राज्य सहित भारत की समूची दक्षिणी तटीय सीमा पर अस्थिरता का खतरा बना रहेगा.

दावा किया जा रहा है कि श्रीलंका सेना की लिट्टे पर ताजा जीत इस अलगाववादी समूह को जड़ से उखाड़ फेंकेगी और तमिल समस्या का समाधान हो जाएगा. लेकिन सच्चाई इसके उलट है. यदि लिट्टे का पूरी तरह से खात्मा कर भी दिया जाए और इसका मुखिया वी प्रभाकरण मारा जाए तो भी इस समस्या को खत्म नहीं माना जा सकता. असल समाधान तो तब होगा जब तमिलों की समस्याओं को सुलझाया जाएगा.

आज की हालत में श्रीलंका के तमिलों की समस्या भारत के लिए मुश्किलें पैदा कर रही है. इसलिए जरूरी है कि भारत इस मुद्दे के राजनैतिक समाधान के लिए हस्तक्षेप करे. यदि कोई राजनैतिक समाधान नहीं निकलता तो लिट्टे भूमिगत हो सकता है.

श्रीलंका का पूर्वी हिस्सा पिछले एक साल से सेना के नियंत्रण में है लेकिन यहां अभी भी शांति स्थापित नहीं हो पाई है. हाल ही में बट्टी कलोआ के बिशप ने भी कहा था कि उन्हें सेना के नियंत्रण से क्षेत्र में शांति स्थापित होने की उम्मीद थी लेकिन खून-खराबा अब भी लगातार जारी है.

ऐसी और घटनाओं का दोहराव उत्तरी श्रीलंका में भी होगा. इस तमिल बहुल इलाके में यदि श्रीलंका सरकार चुनाव करवाकर अपनी पसंद का उम्मीदवार भी ले आए तो भी यहां स्थिरता लाना मुमकिन नहीं है. इस समस्या का समाधान सिर्फ तमिलों से बातचीत और श्रीलंका संविधान के 13 वें संशोधन को लागू करने से ही संभव होगा.  इस संशोधन पर सहमति 1987 में भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति जेआर जयवर्दने के मध्य बातचीत के बाद बनी थी.

इसके तहत निर्वाचित क्षेत्रीय परिषदों को को धीरे धीरे शक्तिशाली बनाया जाना था. तय किया गया था कि भूमि नियंत्रण, पुलिस आदि से संबंधित अधिकार इन परिषदों को सौंपे जाएंगे. लेकिन इस दुर्भाग्य से इस संशोधन को कभी लागू नहीं किया गया. ये परिषद हमेशा अधिकारों से वंचित रहीं. श्रीलंका का संविधान सिंहला और तमिल भाषाओं को बराबरी का दर्जा देने की बात करता है लेकिन आज तक भाषा की समस्या को भी सुलझाया नहीं जा सका है.

अब सवाल है कि भारत इस समस्या के समाधान के लिए क्या कर सकता है? समस्या के समाधान के लिए श्रीलंका सरकार और तमिलों को बातचीत के लिए एक मंच पर आना ही होगा. भारत का भी अपने पुराने रुख पर लौटते हुए कहना है कि दोनों पक्ष सभी मसले सुलझाने के लिए बातचीत करें. यदि श्रीलंका और लिट्टे बातचीत करते हैं तो अब मुद्दा ये होगा कि संविधान के 13वें संशोधन को किस तरह से लागू किया जाए और किस तरह सफलतापूर्वक सत्ता का स्थानीय हस्तांतरण किया जाए.

भारत की असल भूमिका यही है कि इन दोनों पक्षों को बातचीत के लिए राजी करे और इन मुद्दों को बेहतर तरीके से सुलझने में मदद करे. यदि भारत ऐसा नहीं करता तो श्रीलंका में शांति स्थापना दूर की कौड़ी बनी रहेगी.

कोलंबो स्थित थम्बियाईयाह राजनीतिक विश्लेषक हैं 

इच्छा और क्षमता बिना कैसे लगे लगाम

तीन मार्च को लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हुए दुर्भाग्यपूर्ण हमले के बाद पाकिस्तान के ज्यादातर मीडिया चैनलों पर एक बात रह-रहकर सुनाई दी कि ये पाकिस्तान की छवि खराब करने की साजिश है. भारत पर उंगलियां उठाते हुए इस हमले को पिछले साल नवंबर में मुंबई में घटी उतनी ही दुखद घटना का जवाब बताया गया. पाकिस्तान, भारत और दुनिया के कई लोग भले ही इस बात को एक अपरिपक्व प्रतिक्रिया कहें मगर ये हकीकत है कि भारत और पाकिस्तान, दोनों 1970 से एक दूसरे के खिलाफ ऐसे गैरसरकारी तत्वों का इस्तेमाल करते रहे हैं.

जानकार और नीतिनिर्माता अब भी इस पर एकराय नहीं हैं  कि देश को खाती जा रही आतंकवाद की इस समस्या से किस तरह निपटा जाएअब ये दावा किया जा रहा है कि सीआईडी ने पुलिस को खबरदार किया था कि भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ वहां पर श्रीलंकाई क्रिकेट टीम को निशाना बनाने की योजना बना रही है. मगर पुलिस ने मेहमान टीम की सुरक्षा नहीं बढ़ाई. बढ़ाती भी कैसे, उसके वरिष्ठ अधिकारी और उनके राजनीतिक आका यानी पीपीपी नेता तो अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ अभियान में व्यस्त थे जो अब अपने चरम पर पहुंच चुका है. इसलिए सुरक्षा में चूक हुई और नतीजतन देश को शर्मिदगी झेलनी पड़ी.

लाहौर की घटना साधारण आतंकी हमला कम और कमांडो कार्रवाई ज्यादा थी. बुनियादी तौर पर देखा जाए तो ये हमला मुंबई हमले से अलग लगता है. हमलावरों का एक तय निशाना था और जब उन्हें लगा कि उनका मिशन पूरा नहीं होगा तो वे जितनी आसानी से प्रकट हुए थे उतनी ही आसानी से गायब भी हो गए. साफ है कि ये मुंबई की तरह आत्मघाती मिशन नहीं था. मुंबई की तरह लाहौर के हमलावर यहां मौतों की संख्या ज्यादा से ज्यादा रखने और अपनी जान देने के लिए तैयार होकर नहीं आए थे. दिलचस्प है कि लड़ाई 20 मिनट तक चलती रही मगर इस दौरान वहां पर और पुलिस बल नहीं पहुंचा.

हमलावरों की तलाश अब तक जारी है. 12 के करीब ये आतंकवादी हमले के बाद ऐसे गायब हो गए जैसे वे शहर के चप्पे-चप्पे से अच्छी तरह वाकिफ हों. इस तरह से गायब होना इस बात की ओर साफ इशारा करता है कि उनके स्थानीय मददगार हैं जिनकी  मदद से वे सबकी आंखों में धूल झोंककर भाग निकले.

यही वह विषय है जिस पर चर्चा करने से देश के समझदार लोगों का एक बड़ा हिस्सा कतरा रहा है. जानकार और नीतिनिर्माता अब भी इस पर एकराय नहीं हैं  कि देश को खाती जा रही आतंकवाद की इस समस्या से किस तरह निपटा जाए. बाजौर, वजीरिस्तान और स्वात में तालिबान मजबूत हो चुका है. उधर, पंजाबी जिहादी देश के सबसे बड़े प्रांत पंजाब खासकर दक्षिण पंजाब में अपनी जड़ें फैलाते जा रहे हैं. इस्लामाबाद के मैरिएट होटल पर हुए हमले सहित अतीत में हुए कई हमले दक्षिण पंजाब से ताल्लुक रखने वाले आतंकियों ने किए. सैन्य अधिकारी भी मानते हैं कि जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों ने कबायली इलाकों में सुरक्षा बलों से लड़ रहे तालिबान, खासकर बैतुल्ला मसूद से हाथ मिला लिए हैं. इसके बावजूद पंजाब में सक्रिय कई आतंकवादी संगठनों से निपटने की कोई व्यवस्थित रणनीति कहीं नजर नहीं आती.

ये ऐसे संगठन हैं जो अपना असर छोड़ने के लिए हिंसा को हथियार बनाते हैं इसलिए ये स्वाभाविक ही है कि लोग इनका खुलकर विरोध नहीं करते

इसके पीछे आधिकारिक तर्क ये दिया जाता है कि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के नतीजे बुरे हो सकते हैं जैसा कि लाल मस्जिद पर सेना के अभियान के बाद हुआ था. 2007 में इस्लामाबाद की लाल मस्जिद पर सेना की सख्त कार्रवाई के बाद पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में आत्मघाती हमलों की संख्या बढ़ गई थी. अगर इस तर्क के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो समझ जा सकता है कि सरकार ने स्वात घाटी में तालिबान के साथ समझौता क्यों किया. मगर दूसरी ओर ये समझौता ये भी बताता है कि सरकार के पास आतंकियों से निपटने लायक क्षमता ही नहीं है. इन तत्वों से निपटने में पाकिस्तान की क्षमता और इच्छाशक्ति की कमी जैसी समस्याओं पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भी बहस हो रही है.

देखा जाए तो क्षमता की कमी और इच्छाशक्ति में कमी दो अलग-अलग चीजें हैं. सवाल उठता है कि ये कमी है किस जगह? जवाब आईएसआई के मुखिया ले. जनरल अहमद शुजा पाशा के इस बयान से मिल जाता है, ‘क्या उन्हें (तालिबान को) अपने हिसाब सोचने और कहने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए? वे मानते हैं कि जिहाद उनका फर्ज है. क्या ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है?’  हैरत नहीं कि पाकिस्तान के लोगों को तालिबान से निपटने की सेना की रणनीति पर शंका पैदा होती है. जब मामला राजनीति का होता है तो सेना इतनी उदारता क्यों नहीं दिखाती.

आतंकी तत्वों से निपटने में बरती जा रही उदारता की वजह से पंजाब में आतंकी संगठन फल-फूल रहे हैं. वहां की सरकार ने भी ये बात कही है कि उसने मुंबई हमले के बाद सिर्फ यही किया है कि लश्कर के 60 दफ्तर बंद करवा दिए हैं. इसके अलावा कोई और कदम नहीं उठाए गए हैं. इसलिए दक्षिण पंजाब में आतंकी संगठनों को योजना, इंतजाम और भर्ती, तीनों स्तरों पर मदद मिलनी जारी है.

आतंकी तत्वों से निपटने के लिए जरूरी इच्छाशक्ति तो कम है ही, साथ ही कमी का संकेत क्षमता के स्तर पर भी मिलता है. समस्या तब और भी गंभीर हो जाती है जब इस क्षमता को तकनीक के नजरिए से देखा जाए. सेना मौलवी फजलुल्लाह के एफएम रेडियो चैनल को बंद करना चाहती है मगर ऐसा करने यानी फ्रीक्वेंसी जाम करने के लिए जरूरी तकनीकी क्षमता उसके पास नहीं है उसने अमेरिका से इस दिशा में मदद की गुजारिश की है मगर अमेरिका डर रहा है कि उसने अगर ये तकनीक पाकिस्तान को दे दी तो कहीं इसका इस्तेमाल उसी के खिलाफ न होने लगे. इसका नतीजा ये हुआ है कि सेना ने फजलुल्लाह के रेडियो को बंद करने का विचार छोड़ कर उसके दुष्प्रचार का मुकाबला अपने ही रेडियो कार्यक्रमों से करना शुरू किया है. मगर हो सकता है कि इसका भी कुछ फायदा न हो क्योंकि सेना के पास मुल्ला रेडियो के दुष्प्रचार का मुकाबला कर सकने वाले विशेषज्ञ रेडियो प्रोगामर्स की कमी है.

पंजाब में आतंकी संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई न किए जाने की एक वजह ये मिथ्या धारणा भी है कि इन संगठनों के साथ आम लोगों की सहानुभूति है. जबकि सच्चाई ये है कि ज्यादातर लोग इन संगठनों के खिलाफ आवाज इसलिए नहीं उठाते क्योंकि वे इनसे डरते हैं. ये ऐसे संगठन हैं जो अपना असर छोड़ने के लिए हिंसा को हथियार बनाते हैं इसलिए ये स्वाभाविक ही है कि लोग इनका खुलकर विरोध नहीं करते.

आतंकवाद से सफलतापूर्वक लड़ने के लिए अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय होना बहुत जरूरी है जो नजर नहीं आता. इसकी एक वजह देश की लड़खड़ाती लोकतांत्रिक व्यवस्था भी है. पाकिस्तान में लोकतंत्र संक्रमण काल से होकर गुजर रहा है. यहां राज्य का हर अंग अपनी-अपनी राह चलता दिख रहा है. इसका नतीजा ये हुआ है कि नीति-निर्माण के स्तर पर ही समन्वय से जुड़ी समस्याएं देखने को मिल रही हैं. एक और मुद्दा न्यायपालिका और दूसरी संस्थाओं को मजबूत करने की दिशा में पीपीपी सरकार की अनिच्छा का भी है. हालांकि बहुत से लोग मानते हैं कि आतंकवाद से लड़ने के मामले में राष्ट्रपति जरदारी के इरादे नेक हैं मगर देखा जा रहा है कि उनकी नीतियां मजबूती से ज्यादा टकराव पैदा कर रही हैं और इसी वजह से वो खुद इस समय गहरे राजनीतिक संकट का सामना कर रहे हैं.

आतंकवाद के खिलाफ जंग पर राय काफी बंटी हुई है. सरकार को जहां इस लड़ाई में अमेरिका से सहयोग मिलना जारी है वहीं पाकिस्तान का शासक वर्ग जनता को अमेरिका के साथ अपनी दोस्ती के बारे में विश्वास में लेने की अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़े बैठा है. ड्रोन विमानों के हमलों में कई मौतों के बाद ये धारणा जोर पकड़ने लगी है कि पाकिस्तान पर अमेरिका की पकड़ इतनी है कि वह जो मर्जी आए करता है. इससे कई लोग ये सोचने लगे हैं कि आतंकवाद का मकसद देश का सामाजिक ताना-बाना तार-तार करना नहीं बल्कि एक साम्राज्यवादी दुश्मन के खिलाफ लड़ाई है. आतंकवाद का समर्थन करने वाले ये नहीं मानते कि ऐसा भी एक दिन आ सकता है कि जब पूरे पाकिस्तान में तालिबान का कब्जा हो. जहां तक देश के कुलीन वर्ग का सवाल है तो उसका मानना है कि अगर तालिबान मुख्य शहरों से दूर रहे और सत्ता की कमान थामे लोगों के अधिकारों और उनकी जीवनशैली को चुनौती न दे तो उसके साथ शांति के साथ रहना संभव है.

कुल मिलाकर पाकिस्तान में एक भ्रम की स्थिति बनी हुई है. इसके चलते बाहरी दुनिया भी आतंकवाद से लड़ने की उसकी क्षमता और इच्छाशक्ति को लेकर भ्रम में है. सरकार को चिंता है कि आतंकवाद और इससे पैदा हुई नकारात्मक छवि देश के लिए आर्थिक रूप से भी नुकसानदेह होगी. तो फिर सवाल ये उठता है कि आखिर आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए नीतिगत स्तर पर सहमति क्यों नहीं बन रही? जवाब है कि इन नीतियों को बनाने वाले संस्थानों की दशा ही खराब है और ऊपर से पाकिस्तान में सरकारों की ये आदत रही है कि वे देश की समस्याओं को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पर छोड़ देते हैं. सही मायने में ऐसी नीति तब तक नहीं बन सकती जब तक पाकिस्तान के नीतिनिर्माता देश की जिम्मेदारी खुद अपने कंधों पर नहीं लेते. 

नया निजाम, नई चुनौतियां

आमतौर पर शांत रहने वाले ढाका के धानमंडी इलाके में जब 25 फरवरी की सुबह गोलियों की गूंज सुनाई दी तो शायद ही किसी ने सोचा हो कि बांग्लादेश राइफल्स के मुख्यालय में कुछ ऐसा घट रहा है जो देश का इतिहास बदलने की क्षमता रखता है. अगले दो दिन तक इस अर्धसैनिक बल के करीब 3000 जवान अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर बंदूकें ताने रहे. बगावत खत्म होने तक बीडीआर महानिदेशक जनरल शकील अहमद सहित 77 अधिकारी, आठ बीडीआर जवान और पांच आम लोग अपनी जान गंवा चुके थे. दुस्साहसी बागियों ने कई अधिकारियों के शवों को तो सामूहिक रूप से बीडीआर कंपाउंड के मैदान में दफना दिया गया था.

पाकिस्तान में कहा जा रहा है कि ये बगावत भारत की खुफिया एजेंसी रॉ ने करवाई है

25 और 26 फरवरी की घटनाएं कुछ बड़ी आशंकाओं की तरफ संकेत कर रही हैं. इतनी बड़ी संख्या में अधिकारियों की हत्या कर उन्हें सामूहिक रूप से दफनाया जाना और बगावत की सुनियोजित साजिश साफ इशारा करती है कि ये हमला तनख्वाह के मुद्दे पर नाराज कुछ नौजवान सिपाहियों का आक्रोश भर नहीं था बल्कि इसके पीछे किसी बड़ी ताकत का हाथ था. इस बीच संकट को हल करने के तरीके को लेकर नाराज सशस्त्र बलों को सरकार मनाने की कोशिश कर रही है.  नाराजगी की मुख्य वजह ये है कि सरकार ने फौरन सेना बुलाने की इजाजत नहीं दी. दावा किया जा रहा है कि इस देरी से मौतों की संख्या बढ़ गई. अब दुनिया इस बात का इंतजार कर रही है कि दोषियों को सजा देने के अपने वादे को पूरा करने में प्रधानमंत्री शेख हसीना कितना वक्त लगाती हैं.

भारतीय मीडिया में कहा जा रहा है कि इस बगावत में वहां के एक बड़े व्यवसायी सलाउद्दीन कादिर चौधरी का हाथ है जो बेगम खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का करीबी है. इसके उलट पाकिस्तान में कहा जा रहा है कि ये बगावत भारत की खुफिया एजेंसी रॉ ने करवाई है. जानकार मानते हैं कि एकदम से किसी पर इल्जाम लगा देना जल्दबाजी होगी पर इतना तय है कि इस बगावत के पीछे सिर्फ बीडीआर नहीं है.

बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ पीस एंड सिक्योरिटी के मुखिया मेजर मुनीरुजमान कहते हैं, ‘जो भी हुआ वह किसी ऐसी ताकत के हित में हुआ जो बांग्लादेश को इस हद तक कमजोर करना चाहती है कि वह नाकाम देश हो जाए. मगर इस घटना से संबंधित पुख्ता सूचनाएं ज्यादा नहीं मिल रहीं और बगैर जांच हम किसी पक्के निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते.’

एक और सुरक्षा विशेषज्ञ इस हमले के पीछे आतंकी संगठनों का हाथ होने की आशंका जताते हैं. नाम न बताने की शर्त पर वे कहते हैं, ‘बीडीआर स्नाइपर्स द्वारा पहने गए लाल हेडस्कार्फ, उनके खंजर, गर्दन पर तीन गोलियां मारना और आंखें निकाल लेना सिर्फ संयोग नहीं है. ये ऐसे प्रतीक हैं जिनका इस्तेमाल आतंकी संगठन करते हैं.’ बागियों के साथ बातचीत में मुख्य भूमिका निभाने वाले सहकारिता मंत्री जहांगीर कबीर नानक के मुताबिक ये बगावत एक साजिश थी और अधिकारियों की हत्या को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया. उनका कहना था कि अधिकारियों की हत्या के लिए बीडीआर के जवानों में लाखों रुपए बांटे गए.

अगर वे अगले कुछ हफ्तों में सेना की नाराजगी दूर नहीं कर पाईं तो सेना में असंतोष भड़कने और नतीजतन तख्तापलट का खतरा हो सकता है

हालांकि जहां तक शेख हसीना का सवाल है तो वह अभी तक इस घटना में विदेशी हाथ होने की संभावना वाली बहस में नहीं पड़ी हैं. गृह मंत्री सहारा खातून की अध्यक्षता में इस मामले की जांच के लिए एक छह सदस्यीय टीम गठित तो कर दी गई है मगर आलोचकों की मानें तो इससे ज्यादा उम्मीदें लगाना बेकार है. इसकी वजहें भी हैं. अहम फॉरेंसिक सबूत नष्ट कर दिए गए हैं. मसलन बीडीआर परिसर में स्थित दरबार हाल, जहां ये हत्याकांड कथित तौर पर शुरू हुआ, में 27 फरवरी को ही खून के धब्बे साफ कर दिए गए और सब कुछ व्यवस्थित कर दिया गया.

बीडीआर मुख्यालय में असल में क्या हुआ और किसने किया,  इस बारे में कई तरह के विरोधाभासी विवरण सामने आ रहे हैं. जांच समिति के सामने ये एक बड़ी चुनौती है. इस घटना में जीवित बचे सभी लोग इस पर एकराय हैं कि बगावत सुबह साढ़े नौ बजे के करीब तब शुरू हुई जब दरबार हॉल में मेजर जनरल अहमद बीडीआर के करीब 3000 जवानों को संबोधित कर रहे थे. मगर इसके बाद क्या हुआ इस बारे में कई तरह की जानकारियां सामने आ रही हैं. सेना के करीबी एक सूत्र दावा करता है कि भाषण के दौरान अचानक एक जवान अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और मेजर जनरल से पूछने लगा कि क्या उन्होंने एक दिन पहले प्रधानमंत्री से हुई मुलाकात के दौरान बीडीआर के जवानों की शिकायतों से उन्हें अवगत कराया. अहमद से बैठने के लिए कहा गया और जब उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया तो उन्हें गोली मार दी गई. जीवित बचे एक गवाह कर्नल शम्स कहते हैं कि जवान भागा और उसने मेजर जनरल अहमद के सिर पर बंदूक तानने की कोशिश की. कुछ दूसरे प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक हंगामे के दौरान मुख्य मंच के पीछे खड़े कुछ बंदूकधारी जवानों ने बीडीआर महानिदेशक पर घात लगाकर हमला कर दिया. विवरणों में अंतर इन मुश्किल हालात में और भी जटिलता घोल रहा है.

हसीना के सामने कई चुनौतियां हैं. ऐसे कई दरकिनार सैन्य और खुफिया अधिकारी हैं जिनके कट्टर इस्लामी संगठनों से संबंध हैं. ये संगठन खालिदा जिया के कार्यकाल में मजबूत हुए हैं जिन्होंने 2001 में जमाते इस्लामी के समर्थन से सरकार बनाई थी. बांग्लादेश में कई इससे सहमत हैं कि ये बगावत लोकतंत्रविरोधी ताकतों की कारगुजारी है जिनमें कई इस्लामी संगठन, मुख्यधारा के राजनेता और कट्टरपंथ का समर्थन करने वाले ऐसे सैन्य अधिकारी शामिल हैं.

बांग्लादेशी खुफिया विभाग पर भी कई गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं जो इस बगावत की कोई चेतावनी नहीं दे पाया. यहां तक कि सेना की अपनी खुफिया इकाई भी इसे समय रहते नहीं भांप सकी. ले. कर्नल कमरुजमान जैसे कुछ लोगों का मानना है कि इसके पीछे पक्के तौर पर यही बात हो सकती है कि इस बगावत में खुफिया विभाग की भी मिलीभगत रही हो. शेख हसीना भी कह चुकी हैं कि खुफिया एजेंसियों के फील्ड एजेंट्स इसमें शामिल थे और उन्हें सब कुछ पता था. अब उन पर इसके लिए दबाव बढ़ता जा रहा है कि वे खुफिया एजेंसियों के दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करें. भले ही इसकी मिलीभगत की आशंका आखिर में सच न निकले पर ये बात तो है ही कि ये इस बगावत की पूर्व चेतावनी देने में नाकाम रही.

उधर सेना के लिहाज से देखा जाए तो इस बगावत ने उसके लिए कई चीजें बदल दी हैं. जानकार कह रहे हैं कि इस हत्याकांड ने सेना को अपनी छवि सुधारने का मौका दे दिया है. गौरतलब है कि शेख हसीना के सत्ता में आने से पहले दो साल तक देश में सेना द्वारा समर्थित कार्यवाहक सरकार का शासन था जिसके दौरान सेना की छवि आम जनता के बीच बहुत खराब हो गई थी. इस घटना से लोगों की सहानुभूति उसके साथ हो गई है. हालांकि अब इसके सामने एक अनिश्चित भविष्य खड़ा है. सरकार के साथ इसका संबंध अभी भी उतना सहज नहीं है और दूसरी ओर इसके अधिकारियों का एक बड़ा हिस्सा इस बगावत की भेंट चढ़ चुका है. कुछ का दावा है कि अधिकारियों के लिहाज से सेना को हुआ नुकसान अगर ज्यादा नहीं तो कम से कम उतना ही बड़ा है जितना 1971 में मुक्तिसंग्राम के दौरान हुआ था. इतनी बड़ी चोट के बाद अब सेना में सामान्य हालात की बहाली और उसे पहले से भी बेहतर बनाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं. शेख हसीना ने सुरक्षा बलों में बड़े पैमाने पर बदलाव का संकेत दिया है जिसके तहत अर्धसैनिक बलों की कार्यप्रणाली को भी फिर से व्यवस्थित किया जाएगा.

इसके बावजूद सेना में एक वर्ग अब भी इस बात पर खफा है कि बगावत को कुचलने में देर की गई. 25 फरवरी को ही सुबह 11:30 बजे तक सेना ने बीडीआर मुख्यालय के बाहर अपनी पोजीशन ले ली थी मगर उसे भीतर घुसने की इजाजत नहीं दी गई.

इसके बजाय शेख हसीना ने फैसला किया कि बागियों के साथ बात कर उन्हें मनाने की कोशिश की जाए जबकि इस दौरान भीतर हत्याएं जारी रहीं. अब बंद दरवाजों के पीछे हो रहे विचार-विमर्श के दौरान सेना के अधिकारी इस रणनीति पर सवाल उठा रहे हैं. अफवाह उड़ रही है कि सेना इन हत्याओं का बदला लेने की फिराक में है. सेना के करीबी एक सूत्र का कहना है, ‘ये सच है कि अगर वे (सैनिक) टैंकों के साथ भीतर घुस जाते तो मौतों की संख्या ज्यादा होती. मगर ये मौतें बीडीआर वालों की होतीं. सेना का मानना है कि अधिकारियों की हत्या की कोई जरूरत ही नहीं थी और वह इसके बदले में कुछ न कुछ चाहेगी.’ जाहिर है इससे शेख हसीना पर दबाव बन गया है क्योंकि सेना का भरोसा बहाल करना न सिर्फ देश की सुरक्षा बल्कि उनकी सरकार की स्थिरता के लिहाज से भी अहम है.

उधर, बीडीआर के सामने भी एक नया भविष्य है. ब्रिगेडियर जनरल एम डी मैनुल इस्लाम को इसका नया महानिदेशक बनाया गया है. बगावत के बाद कई तरफ से मांग उठ रही थी कि इसे खत्म कर दिया जाए. ऐसे में लग रहा है कि पहले के मुकाबले अब बीडीआर का स्वरूप काफी बदल जाएगा.

जहां तक शेख हसीना का सवाल है तो इस घटना के संदर्भ में उन्हें किस तरह देखा जाएगा इसका फैसला अभी होना है. अभी तक तो इस संकट को जिस तरह से उन्होंने संभाला, वह भी सरकार बनने के कुछ ही हफ्ते बाद, उसकी कई लोग तारीफ कर रहे हैं. इस संकट सेना की बजाय सरकार द्वारा संभाला जाना ही अपने आप में ये संकेत माना जा रहा है कि अब प्रशासन को वास्तव में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार चला रही है. सेना के एक वर्ग में भले ही नाराजगी हो मगर इससे बाहर संदेश ये गया है कि देश में अब एक स्थिर और लोकतांत्रिक सरकार है जो सेना की कठपुतली नहीं है. शेख हसीना ने इस संकट से निपटने में जिस तरह की सख्ती का परिचय दिया उससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी साख बढ़ी है.

मगर असल इम्तहान अभी बाकी है जिसका फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि इस बगावत की जांच कितने पारदर्शी और विश्वसनीय तरीके से हो पाती है. बीडीआर के नए स्वरूप पर भी सबकी निगाहें रहेंगी और सक्षम और प्रशिक्षित सैनिकों का एक नया भंडार भी जल्द बनाए जाने की जरूरत होगी. इस प्रक्रिया में सरकार और सेना से ये अपेक्षा की जाएगी कि वे निष्पक्ष रहेंगे और सुरक्षा बलों की शिकायतों पर ध्यान देंगे.

इस पर भी सबकी निगाह है कि सेना की तरफ से घटते समर्थन से शेख हसीना किस तरह निपटती हैं. ये एक ऐसी चीज है जिसकी उनकी सरकार की स्थिरता में अहम भूमिका होगी. इस संकट से निपटने में उन्हें बहुत संतुलन साधकर चलना होगा. अगर वे सेना के ज्यादा नजदीक गईं तो इससे उस जनता के बीच उनकी छवि खराब हो सकती है जिसने हाल ही में हुए चुनाव में उन्हें भारी बहुमत से जिताया है. और अगर वे अगले कुछ हफ्तों में सेना की नाराजगी दूर नहीं कर पाईं तो सेना में असंतोष भड़कने और नतीजतन तख्तापलट का खतरा हो सकता है. सवाल ये भी है कि अगर बगावत की जांच पूरी होने पर इसमें ऐसे लोगों की मिलीभगत सामने आती है जो वर्तमान में सत्ता और जिम्मेदारी के बड़े पदों पर बैठे हों तो क्या होगा? शेख हसीना के सामने उन्हें हटाने का कड़ा इम्तहान होगा. फिर भले ही वे पहले उनके मददगार रह चुके हों.

इस तरह से देखा जाए तो इन हालात में शेख हसीना के लिए संतुलन बनाकर चलना सबसे बड़ी चुनौती होगी. शायद उन्होंने सोचा नहीं होगा कि सरकार बनने के बाद इतनी जल्दी उन्हें ऐसे हालात का सामना करना पड़ेगा. मगर उनके पास इन सभी मुद्दों को सुलझने के अलावा और कोई चारा नहीं है.

(करीम बांग्लादेश और ब्रिटेन स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं)