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शिखर की चाह बिखरती राह?

राजनीति का इतिहास बताता है कि इसमें कई बार वह नहीं होता जिसकी सब उम्मीद कर रहे होते हैं. दुनिया के सबसे बुजुर्ग दक्षिणपंथी और अब कुछ-कुछ मध्यमार्गी राजनीतिज्ञ लाल कृष्ण आडवाणी ने बंटवारा देखा है, इमरजेंसी भुगती है, तीन बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में काम किया है, नौ बार वे संसद में चुन कर आए हैं और चार बार एक पार्टी के अध्यक्ष रहे हैं. अब जब उन्होंने सत्ता की सबसे बड़ी गद्दी को अपना लक्ष्य बनाया है तो उनका सफर बीच राह में ही खत्म होता दिख रहा है.

हर ठोकर आडवाणी और एनडीए को नीचे की तरफ धकेल रही है परंतु अतीत की तरह ही आडवाणी निराशा की हालत में लड़ने की बजाय अपने में ही सिमटे पीछे हट रहे हैं

81 साल के आडवाणी के पास यही आखिरी मौका बचा है. कर्नाटक में अपने बूते भाजपा सरकार बनने के बाद कुछ ही महीनों पहले तक लग रहा था कि उनके पास सब कुछ है-दोस्त, सहयोगी, मतदाताओं का समर्थन और इस सबसे ऊपर वह ऊर्जा जिसका अभाव कांग्रेसी खेमे के उनके प्रतिद्वंदियों में साफ झलकता था. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार आडवाणी ने उन सहयोगी दलों के साथ तालमेल की कवायद भी शुरू कर दी थी जिन्हें जरूरत पड़ने पर सरकार बनाने के काम आना था. उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल, असम में असम गण परिषद, हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल और तमिलनाडु में एआईएडीएमके से गठबंधन की प्रबल संभावनाएं दिख रही थीं. मगर 7 मार्च की शाम को उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में हुए एक घटनाक्रम से उनकी उम्मीदों के बांध में दरार पड़ने लगी.

उस शाम राजनीतिक मुलाक़ात करने वाले दो शख्स पुराने दोस्त भी थे. इनमें से एक थे 10 साल से उड़ीसा के मुख्यमंत्री रहे नवीन पटनायक जो पिछले 11 साल से एनडीए के साथ थे – 1997 की सर्दियों में तत्कालीन यूनाइटेड फ्रंट को छोड़ने वाले पटनायक पहले नेता थे और उनके इस कदम ने कई दूसरे दलों के भी भाजपा के साथ लामबंद होने की शुरुआत कर दी थी. पिछले 10 सालों से उड़ीसा में उनकी सरकार भाजपा के समर्थन से ही चल रही थी और अक्सर शांत दिखने वाले पटनायक बिना किसी दबाव के अपने फैसले खुद करने के लिए जाने जाते रहे हैं.

पटनायक से मुलाकात करने आने वाले शख्स थे चंदन मित्रा. पेशे से पत्रकार मित्रा ने भाजपा में तेजी से तरक्की की है और अब उन्हें आडवाणी का खासा विश्वासपात्र माना जाता है. पटनायक की तरह वे भी अपने हिसाब से सोचने और करने वाले व्यक्ति के तौर पर जाने जाते हैं. मित्रा यहां आडवाणी के विशेष दूत के तौर पर आ रहे थे और इस मुलाकात में पिछले कुछ समय से चल रही बातचीत को एक फैसले की शक्ल दी जानी थी. उन्हें उम्मीद थी कि वे आडवाणी के लिए अच्छी खबर लेकर दिल्ली जाएंगे – मित्रा का काम था पटनायक के साथ एक ऐसा समझौता करना जिससे आम चुनाव में एनडीए को ज्यादा से ज्यादा फायदा हो सके. दांव पर लगी थीं उड़ीसा की 21 लोकसभा और 147 विधानसभा सीटें. पटनायक और मित्रा को बातचीत कर फैसला करना था कि चुनाव लड़ने के लिए इन सीटों का बंटवारा किस तरह से होगा.

तरुण विजय जैसे लोगों ने कई मौकों पर आडवाणी की व्याख्या एक ऐसे व्यक्ति के रूप में की है जो लड़ाई के मैदान से भाग खड़ा होता है मगर बातचीत थोड़ी ही देर में खत्म हो गई. सबको हैरान करते हुए पटनायक ने भाजपा से किनारा कर वाममोर्चे का दामन थाम लिया. उनका कहना था कि भाजपा के साथ उनकी पार्टी का गठबंधन खत्म हो गया है. ऐसा ही कुछ 1997 में भी हुआ था जब पटनायक ने अचानक ही संयुक्त मोर्चा छोड़ दिया था.

भाजपा के लिए ये बड़ा गहरा धक्का था. इससे अचानक ही आडवाणी की चुनावी गाड़ी जो पिछले विधानसभा चुनावों में दिल्ली और राजस्थान की हार के बाद थोड़ी लड़खड़ाती सी चल रही थी एकदम से मानो पटरी से उतर गई.

सवाल था कि आखिर ऐसा हुआ क्या? मित्रा बताते हैं, ‘तीन महीने तक हमारे बीच बातचीत के कई दौर चले. राज्य स्तर पर भाजपा और बीजू जनता दल (बीजद) नेताओं के दरम्यान और व्यक्तिगत स्तर पर मेरे और पटनायक के बीच. कुछ-कुछ ऐसा लग भी रहा था कि पटनायक की योजना कुछ और है क्योंकि वे बार-बार कह रहे थे कि भाजपा को और यथार्थवादी होना पड़ेगा और जीत को ध्यान में रखकर चलना होगा. विश्वास कीजिए कोई और मुद्दा ही नहीं था. कंधमाल की तो बात भी नहीं हुई. पटनायक मुझसे काफी अच्छे से मिले. हम लोग 20 साल से अच्छे दोस्त हैं और उन्होंने कोई बेरुखी नहीं दिखाई. मगर हम इस पर सहमत नहीं हो सके कि हमारी भलाई किस में है. उन्होंने पहले मुझसे कहा था कि वे हमें पांच लोकसभा और 35 विधानसभा सीट देंगे. मैंने दिल्ली आकर भाजपा नेतृत्व को ये बात बताई. हमें लगा ये पेशकश व्यावहारिक नहीं है. इस मुलाकात में मैंने पटनायक से कहा कि भाजपा विधानसभा सीटों के मामले में तो कमी के लिए तैयार है पर हमें एक और लोकसभा सीट चाहिए. उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भाजपा जीत सकती है. उनका ये कहना था कि वो ये समझते हैं कि 5 और 35 सीटें शायद भाजपा को मंजूर न हों. लेकिन फासला बहुत ज्यादा है और इतने कम वक्त में ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता. हम इस असहमति पर सहमत हो गए.’

हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि क्षेत्रीय पार्टी बीजद, एक राष्ट्रीय पार्टी भाजपा को छोड़ने को तो तैयार है मगर उसे सिर्फ एक अतिरिक्त लोकसभा सीट देने को तैयार नहीं. गौरतलब है कि पटनायक ने कुछ समय पहले दो सर्वेक्षण करवाये थे जिसके नतीजे बताते थे कि भाजपा तीन लोकसभा और 15-20 विधानसभा सीटों पर जीत सकती है. माना जा रहा है कि पटनायक के फैसले का आधार यही सर्वेक्षण रहा.

मित्रा दिल्ली लौटे और आडवाणी को स्थिति से अवगत कराया. वे कहते हैं, ‘राजनीति के मामले में आडवाणी की सहज बुद्धि आज भी पहले जैसी तीक्ष्ण है. उन्होंने कहा कि पार्टी के झुकने की एक सीमा है और हम अपने सहयोगियों के आगे नाक नहीं रगड़ सकते. उनकी प्रतिक्रिया लचीली थी मगर उन्होंने माना कि अबकी बार पार्टियां लूटपाट पर उतारू हैं.’

ऐसा लगता भी है कि यहां कुछ ऐसा हो रहा है जो राजनीतिक सौदेबाजी से भी ज्यादा गंभीर है. मगर सत्ता के लिए चुनावी कवायद शुरू हो चुकी है और अब छोटी से छोटी बात पर भी ध्यान दिया जा रहा है. किसी सहयोगी दल का अलग होना, किसी नेता का दूसरे पाले में चले जाना, जोश में थोड़ी सी भी कमी जैसी चीजें माहौल को बदल रही हैं. हर ठोकर आडवाणी और एनडीए को नीचे की तरफ धकेल रही है परंतु अतीत की तरह ही आडवाणी निराशा की हालत में लड़ने की बजाय अपने में ही सिमटे पीछे हट रहे हैं.

विश्वास और आदर्शवाद की जिस कमी की तरफ आडवाणी संकेत कर रहे हैं उसने भाजपा में नेताओं के आपसी सौहार्द को भी प्रभावित किया है. आडवाणी और  संघ या आडवाणी और राजनाथ सिंह के बीच के रिश्ते इसका गवाह हैं

उदाहरण के लिए उड़ीसा में आडवाणी ने कुछ भी करने की कोशिश नहीं की. न उन्होंने पटनायक से बात की न ही एनडीए संयोजक शरद यादव से मदद मांगी. यहां तक कि उन्होंने भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह या संघ से भी कोई सहायता नहीं मांगी. यादव कहते हैं, ‘उन्होंने इस मामले में मुझे शामिल ही नहीं किया. राजनाथ सिंह ने मुझसे तब बात की जब सब कुछ खत्म हो चुका था’ (साक्षात्कार देखें).

ऐसा लगता है कि एक बार फिर से आडवाणी का चिरपरिचित अनिच्छा वाला गुण देखने को मिल रहा है. राजनीतिक सफर के अलग-अलग पड़ावों पर पार्टी और संघ के नेता आडवाणी से इस बात को लेकर बहस करते रहे हैं कि उन्हें और भी ज्यादा आक्रामक होने की जरूरत है. संघ के थिंक टैंक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के मुखिया तरुण विजय जैसे लोगों ने कई मौकों पर आडवाणी की व्याख्या एक ऐसे व्यक्ति के रूप में की है जो लड़ाई के मैदान से भाग खड़ा होता है. पार्टी के पुराने लोग कहते हैं कि आडवाणी आमतौर पर अपने साथ एक त्यागपत्र लेकर चलते हैं ताकि वह किसी भी ऐसी स्थिति से बचकर निकल सकें जिसे वे पसंद नहीं करते.

अपनी आत्मकथा मेरा देश मेरा जीवन में आडवाणी अपनी इस विशेषता का जिक्र भी करते हैं कि किस तरह वह पार्टी अध्यक्ष बनने के इच्छुक ही नहीं थे. ‘मैं सबसे ज्यादा अनिच्छुक पार्टी अध्यक्ष था. 1972 की शुरुआत में अटल बिहारी वाजपेयी ने मुझसे कहा कि अब आप पार्टी अध्यक्ष बन जाइए. जब मैंने उनसे पूछा कि क्यों, तो उनका जवाब था, मैं इस पद पर अपने चार साल पूरे कर चुका हूं. अब समय आ गया है कि कोई नया व्यक्ति इस पद को संभाले.’

मैंने कहा, ‘अटल जी, मैं तो किसी बैठक को भी ठीक से संबोधित नहीं कर सकता. मैं पार्टी का नेतृत्व कैसे कर सकता हूं? उन दिनों मैं ये सोचते हुए मंच पर बोलने से डरता था कि मैं कमजोर वक्ता हूं..मैंने कहा, ‘नहीं, मैं पार्टी अध्यक्ष नहीं बन सकता. कृपया आप इसके लिए किसी और व्यक्ति को ढूंढें.’

इसके बाद आडवाणी इस बारे में विस्तार से बताते हैं कि किस तरह फिर वे और वाजपेयी इस पद के लिए किसी दूसरे व्यक्ति की तलाश में लगे रहे. आडवाणी कहते हैं कि जब कोई इस पद के लिए तैयार नहीं हुआ तो उन्हें जबर्दस्ती इस पद पर बिठा दिया गया.

आडवाणी लिखते हैं, ‘सबसे पहली बात तो ये थी कि अटल जी के मुझ पर विश्वास ने मेरे मन को छू लिया था. दूसरी ये कि उम्र और अनुभव में मुझसे वरिष्ठ पार्टी के दूसरे नेता तुरंत मेरी उम्मीदवारी पर सहमत हो गए थे’ वे आगे लिखते हैं, ‘दुख की बात ये है कि आज जब मैं उस वक्त को याद करता हूं तो मुझे ये देखकर चिंता होती है कि पारस्परिक तालमेल, विश्वास और पार्टी कार्य के लिए आदर्शवादी और लक्ष्य आधारित दृष्टिकोण की भावना समय बीतने के साथ छीजती गई है.’

विश्वास और आदर्शवाद की जिस कमी की तरफ आडवाणी संकेत कर रहे हैं उसने भाजपा में नेताओं के आपसी सौहार्द को भी प्रभावित किया है. आडवाणी और  संघ या आडवाणी और राजनाथ सिंह के बीच के रिश्ते इसका गवाह हैं. उदाहरण के लिए कुछ ही दिन पहले राजनाथ सिंह मध्य भारत में किसी ऐसी जगह फंसे हुए थे जहां से रात को हवाई यात्रा नहीं की जा सकती थी. उन्होंने दिल्ली संदेश भेजा कि आडवाणी को सूचना दी जाए कि वे समय पर नहीं पहुंच पाएंगे. साथ ही उन्होंने ये भी जोड़ा कि आडवाणी बैठक को कुछ समय के लिए टाल दें ताकि वे भी इसमें शामिल हो सकें. लेकिन जब सिंह दिल्ली पहुंचे तो उन्हें पता चला कि बैठक शुरू हो चुकी है और आडवाणी इसकी अध्यक्षता कर रहे हैं. इसके बाद हाल ही में पूर्वोत्तर राज्यों के लिए सुधांशु मित्तल को चुनाव सहप्रभारी बनाए जाने पर राजनाथ और जेटली में ठन गई. इसे कठोर अनुशासन या पार्टी हित का नाम देकर तर्कसंगत ठहराया जा सकता है मगर इससे ये भी समझ जा सकता है कि पारस्परिक सौहार्द किस स्तर पर है.

इस तरह असहज आडवाणी अपने सहारे ही चल रहे हैं. उन्होंने इंटरनेट पर एक बडा अभियान छेड़ा हुआ है. साथ ही उन्होंने पार्टी पैनल में अहम जगहों पर अपने लोगों को नियुक्त किया है. चुनाव के लिए भाजपा की पॉलिसी फॉर्मूलेशन कमेटी में नौ सदस्य हैं-अरुण जेतली, बाल आप्टे, बलबीर पुंज, तरुण विजय, सुधींद्र कुलकर्णी, एस गुरुमूर्ति, स्वपन दासगुप्ता और दीपक चोपड़ा. जेतली खुद कभी चुनाव नहीं लड़े हैं. आप्टे को संघ की बदौलत ये नियुक्ति मिली है. कुलकर्णी और गुरुमूर्ति विचारक हैं. पुंज, दासगुप्ता और विजय पत्रकार हैं और चोपड़ा पिछले 20 साल से उनके सचिव हैं. यानी किसी को भी आम राजनीति का अनुभव नहीं है और ये सभी इन पदों पर आडवाणी की वजह से हैं.

आडवाणी अपनी उम्र के हिसाब से फिट हैं. उनके पास जरूरी नैतिक ताना-बाना भी है मगर उनके मित्र और सहयोगी मानते हैं कि वे इस बार पूरा जोर नहीं लगा रहे हैं

ये ऐसे गुण नहीं लगते जिनसे मिलकर नेतृत्व बनता है. जो भी अगला प्रधानमंत्री बनेगा उसे कई तरह की समस्याओं से जूझना होगा. जो हालात दिख रहे हैं उनसे लग रहा है कि आडवाणी भाजपा को ही उतने आकर्षक नहीं लग रहे. उदाहरण के लिए पार्टी ने पटनायक का जवाब देने के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को चुना है. जाहिर है मुश्किल स्थितियों में आडवाणी पर मोदी को प्राथमिकता दी जा रही है.

उधर, एनडीए में स्थितियां और भी ज्यादा जटिल हैं. बिहार, जहां पार्टी जल्द ही जेडी(यू) के साथ एक समझौते पर पहुंचने की उम्मीद कर रही है, में आकर्षण का मुख्य केंद्र मुख्यमंत्री नीतिश कुमार हैं. राज्य के भाजपा नेताओं ने हाल ही में नागपुर में हुई पार्टी बैठक में काफी समय ये विचार करने पर खर्च किया कि किस तरह कुमार जनता में लोकप्रिय होते जा रहे हैं. भाजपा की बिहार इकाई का मानना है कि नीतिश की पारदर्शी प्रशासन शैली उनकी स्वीकार्यता को बढ़ा रही है. चुनावी संदर्भ में देखा जाए तो इसका मतलब ये है कि जनता दल (यूनाइटेड) भी जरूरत पड़ने पर बीजू जनता दल जैसा फैसला ले सकता है. अंदर ही अंदर भाजपा नेता कह भी रहे हैं कि चुनाव के बाद उन्हें गठबंधन के एक और बुरे दौर का सामना करना पड़ सकता है.

इस तरह फिलहाल तो एनडीए कांग्रेसनीत यूपीए और यहां तक कि हालिया बने तीसरे मोर्चे से भी पीछे चल रहा है. माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी कहते हैं, ‘एनडीए एक बुनियादी विरोधाभास से पीड़ित है और इसकी वजह है हिंदुत्व का एजेंडा. भाजपा सोचती है कि वह हिंदुत्व के मुद्दे पर जितना आक्रामक होगी उसे उतना ही ज्यादा समर्थन मिलेगा. मगर वह इस पर जितना आक्रामक होगी उतना ही उसके सहयोगी उससे दूर होते जाएंगे. एनडीए में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इसे आपस में जोड़े रख सके.’

हालांकि भाजपा उम्मीद कर रही है कि बिछड़े हुए दोस्त वापस लौट आएंगे. उदाहरण के लिए पार्टी नेतृत्व की बातों से संकेत मिल रहा है कि चुनाव के बाद नवीन पटनायक को फिर से अपने पाले में किया जा सकता है. पार्टी नेतृत्व मानकर चल रहा है कि तब तक तीसरे मोर्चे के लिए पटनायक का प्रेम ठंडा पड़ जाएगा. कुछ को अब भी उम्मीद है कि भाजपा उम्मीद से कहीं अच्छा प्रदर्शन करेगी और एनडीए फिर एकजुट हो जाएगा.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और बिहार से चुनाव लड़ रहे भाजपा नेता राजीव प्रताप रूड़ी कहते हैं, ‘जहां तक पार्टियों का सवाल है तो हमारे पास सहयोगी हैं मसलन शिव सेना, अकाली दल, असम गण परिषद, इंडियन नेशनल लोकदल, राष्ट्रीय लोकदल. सिर्फ बीजू जनता दल अलग हो गया है तो हवा बनाई जा रही है कि एनडीए बिखर रहा है. लोग बदलाव चाहते हैं और ये दिख भी रहा है. एनडीए अब भी पहले की ही तरह मजबूत है. सब कुछ भाजपा के प्रदर्शन पर निर्भर करता है और हमारा ध्यान अपने प्रदर्शन को सुधारने पर केंद्रित है.’

नजरिया चाहे जो भी हो, पर एक पल ऐसा होता है जब हर शख्स को ये अहसास हो जाता है कि ये उसका समय है. आडवाणी अपनी उम्र के हिसाब से फिट हैं. उनके पास जरूरी नैतिक ताना-बाना भी है मगर उनके मित्र और सहयोगी मानते हैं कि वे इस बार पूरा जोर नहीं लगा रहे हैं. वे ज्यादातर समय सोच-विचार में ही गुजार रहे हैं और सब कुछ खुद या अपने चुने हुए सिपहसालारों से ही कराना चाहते हैं मगर अब सोचने के लिए ज्यादा वक्त बचा नहीं है और करने के लिए इतना कुछ है कि केवल चुनिंदा सिपहसालारों से ही काम नहीं चलने वाला. 

गुलाल : ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है!

गुलाल क्रोध, दुख और सच का सिनेमा है। अनुराग कश्यप शेक्सपियराना हो गए हैं इसलिए आख़िरी आधे घंटे में मक़बूल और ओमकारा भी याद आती हैं। गुलाल वहीं ख़त्म होती है जहाँ आधी सदी पहले प्यासा ख़त्म हुई थी। अनुराग की ख़ासियत है कि वे आपको जीवन में पूरी तरह डुबाकर उसकी निस्सारता की बात करते हैं। हमारे हाथों में जो अच्छी किताबें और रंगीन गुब्बारे चाचा नेहरु दे गए थे, गुलाल बदतमीज़ी से उन्हें फाड़ और फोड़ देती है। जिसे
‘दिल्ली 6’ का फ़कीर लिए फिरता था, यह वही बेशर्म आईना है, जिसके सामने बाल सँवारते सँवारते हम अपने चेहरे भूल गए हैं। हमें केवल अपने सिर याद हैं, जो भीड़ बनकर लोकतंत्र की खुराक बन गए हैं। 

महान फ़िल्में कभी आपको चकित या सम्मोहित नहीं करती। वे आपको शादियों और उत्सवों की चकाचौंध से उठाकर सीलन भरी अँधेरी गलियों में ले जाकर छोड़ देती हैं। यह बुद्धिजीवियों के समकालीन महानगरीय सिनेमा के साथ खड़ा ठेठ  रेगिस्तानी सिनेमा है जिसके करघे पर कई कहानियाँ इतनी कुशलता से एक साथ  बुनी गई हैं कि यह समय और स्थान की सीमाएँ लाँघकर व्यापक हो जाता है।  मसलन एक छोटी सी यूनिवर्सिटी के जनरल सेक्रेटरी के चुनाव और उसके पीछे  परत दर परत छिपी राजनीति पूरे देश की राजनीति की नंगी झलक दिखला जाती है  और अपनी जाति के हित और गौरव के लिए युद्ध पर उतारू राजपूत राजस्थान को  राजपूताना बनाना चाहते हैं तो वह महाराष्ट्र या तेलंगाना भी हो सकता है।

 यह ख़ून के भ्रम में गुलाल पोतकर लाल किए गए चेहरों की थोथी क्रांति है,  जिसकी मध्यकालीन महत्वाकांक्षाएँ तालिबानी हैं। साहिर और दिनकर की ऊँचाई  को छू जाने वाले पीयूष मिश्रा के गीत अफ़गानिस्तान और ईराक में जमकर बैठे  अंकल सैम को भी नहीं बख़्शते। देव डी की तरह यहाँ भी गीत फ़िल्म की नींव में हैं। फ़िल्म के कई महत्वपूर्ण सीक्वेंस को बीच में रोकने का ख़तरा  उठाकर अनुराग पीयूष से कुछ ज़्यादा ज़रूरी बातें कहलवाते हैं, जो पागलपन के  आवरण में लिपटी हैं, लेकिन वही तीखी बातें हैं जिनके लिए फ़िल्म बनाई गई है।

बीच बीच में अनुराग के स्टाइल की तेज लाइटें, कमरे की दीवारों पर बने  चित्र और उनके रंग तथा सड़क के साइनबोर्ड फ़िल्म के मूड को सम्पूर्णता देते  हैं,  इस दौरान तेजी से इधर उधर भागता बेचैन कैमरा हो या लम्बा क्लोज़ अप, राजीव रवि के छायांकन में उतनी ही वास्तविकता दिखती है। वाशबेसिन में पानी के  साथ बहते बालों में छिपा अवसाद दिखाने के लिए कैमरे को आँखों के साथ साथ  मन की भी ज़रूरत पड़ी होगी। हाँ, अनुराग और राजीव के भटकाव को आरती बजाज की  सतर्क एडिटिंग कई ज़गह थाम लेती है। वे अनुराग को अपने आप में खोने नहीं देती। बाकी काम के लिए उनके पास के के, राजा चौधरी, अभिमन्यु सिंह, आयशा  मोहन और दीपक डोबरियाल जैसे अच्छे अभिनेताओं की पूरी फ़ौज है ही।  यह खिलौनों से खेलते रहे उस मासूम बच्चे की कहानी है जिसके लिए दुनिया अमर चित्रकथाओं की तरह सरल और पवित्र है। गुलाल उस बच्चे के साथ साथ हम  सबके हाथों में खंजर थमाकर सडाँध भरे गहरे कुएँ में कूदने को मज़बूर करती  है जिसमें काले रिश्ते हैं, छलती हुई और छली जाती स्त्रियाँ हैं, अबोला, बड़बोला और झूठा प्रेम है और सबके पीछे सहमकर बैठा आज़ाद भारत का घायल स्वप्न है। गुलाल एक लम्बा दुख है, जिसे पर्दे पर अनुभव करना सौभाग्य है।  

गौरव सोलंकी

चुनाव से बड़ी आईपीएल

बस यही यही नहीं लिखा कि आईपीएल के मैच समय पर होने चाहिए भले ही आम चुनाव आगे बढ़ाने पड़ें. नहीं तो उनने सब लिख दिया कि आईपीएल समय पर करवाना और उसके सभी मैचों और खिलाड़ियों को पक्की सुरक्षा देना किस तरह आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब देना और साबित करना है कि भारत एक शक्तिशाली मजबूत राष्ट्र है और वह आतंकवादियों से डर कर अपनी प्रतिष्ठा और शक्ति के प्रतीकों को कतई नष्ट नहीं होने देगा.

अपने को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बता कर गर्वित होने वाला देश क्या आम चुनावों से ज्यादा महत्व बीसमबीस क्रिकेट को देगा जिसे क्रिकेट देखने और समझने वाले बराबर क्रिकेट मानने को भी तैयार नहीं होतेउनने यह भी बताया कि अप्रैल-मई में नहीं हुए तो आईपीएल-2 के मैच हो ही नहीं पाएंगे. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का कैलेंडर इतना भरा हुआ है कि भारत भले ही जुलाई से सितंबर तक खाली हो लेकिन दूसरी सभी टीमें आपस में खेल रही होंगी. लगभग सभी बड़े अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी राष्ट्रीय ड्यूटी बजा रहे होंगे. उनके बिना तो लीग हो ही नहीं सकती. इसलिए इस साल लीग रद्द करनी पड़ेगी. (इससे महज एक साल की बच्ची इस कमाऊ लीग का भविष्य ही खतरे में पड़ जाएगा). निवेशकों के करीब दो हजार करोड़ रूपए डूब जाएंगे. टीमें खरीदने वालों ने आगे कमाई की ही उम्मीद में पैसे लगाए हैं. प्रसारकों ने प्रसारण के अधिकार खरीदे हैं. बड़ी-बड़ी कंपनियों ने विज्ञापन और प्रायोजन के बजट बनाए हैं. सब पर पानी फिर जाएगा. लेकिन सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि क्रिकेट और इस लीग के चलने पर निवेशकों का विश्वास टूट जाएगा. मंदी के इस जमाने में यह बहुत बुरा होगा, क्योंकि निवेशकों का विश्वास ही तो अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने और मंदी के उतरने का रास्ता है.

इसलिए तारीखों में जैसा भी तालमेल बैठाना हो, बैठाओ. मतदान के 24 घंटे पहले और 24 घंटे बाद मैच हो सकते हैं. गृहमंत्रालय अगर मतदान और आईपीएल के मैच दोनों को एक साथ सुरक्षा नहीं दे सकता तो मैच मतदान के पहले और बाद में करवाए जा सकते हैं. केंद्रीय बल सुरक्षा के लिए सुलभ नहीं हो सकते तो हम राज्यों की पुलिस से काम चला लेंगे. वे भी जिम्मेदारी लेने को तैयार न हों तो हम निजी सुरक्षा एजेंसियों को लगा लेंगे. दक्षिण अफ्रीका की एक सुरक्षा एजेंसी से बात हो ही रही है. गृहमंत्रालय और राज्य सरकारों ने हाथ खड़े कर दिए हैं तब भी निजी सुरक्षा और स्वयंसेवकों से काम चलाया जा सकता है. लेकिन आईपीएल-2 होना तो 10 अप्रैल से 24 मई के बीच ही जायज है. गृहमंत्रालय की चिंता यह है कि क्रिकेट मैचों पर हमले के बहाने हमारे लोकतंत्र की प्रक्रिया में पलीता लगाया जा सकता है. जिस देश में क्रिकेट इतना लोकप्रिय हो और उसमें इतने लोग शामिल होते हों चुनाव के समय उसकी सुरक्षा को लेकर कोई खतरा मोल नहीं लिया जा सकता.

लेकिन बाजार और धंधे के अंधसमर्थक एक अंग्रेजी अखबार के एक स्तंभकार ने तो यहां तक लिख दिया कि यदि आईपीएल- यानी इंडियन प्रीमियर लीग और आईपीएल यानी इंडियन पोलिटिकल लीग- में से जनता को चुनने का मौका दिया जाए तो जनता बीसमबीस के क्रिकेट मैच देखना पसंद करेगी. राजनीति और राजनेताओं से जनता इस कदर ऊबी हुई है कि उसके आदर्श व्यक्तियों की सूची में एक भी राजनेता नहीं आता. सिनेमा के महानायक आते हैं लेकिन उन्हें भी मात देते हैं क्रिकेट खिलाड़ी. राजनीति और चुनाव लोगों को बांटते और लड़ाते हैं. बीसमबीस क्रिकेट उन्हें एक करके उनका मनोरंजन करता है. चुनाव और संसद पैसे की बरबादी है. इन पर खर्च किए गए पैसे से जनता का कोई भला नहीं होता. बीसमबीस क्रिकेट पैसा कमाता है और जनता को मनोरंजित और सुखी रखता है. बताइए आप किस आईपीएल को वोट देंगे? अपने को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बता कर गर्वित होने वाला देश क्या आम चुनावों से ज्यादा महत्व बीसमबीस क्रिकेट को देगा जिसे क्रिकेट देखने और समझने वाले बराबर क्रिकेट मानने को भी तैयार नहीं होते.

ये सब बातें मैंने इसलिए लिखीं कि बीसमबीस क्रिकेट की आईपीएल लीग को समय पर करवाने के जितने भी कारण और जितनी भी अनिवार्यताएं बताई गईं हैं उनमें एक भी क्रिकेट के खेल की नहीं हैं. आईपीएल के समर्थक नहीं बताते कि इस साल लीग नहीं हुई तो भारत और संसार में क्रिकेट का क्या नुकसान हो जाएगा.

लोकतंत्र रहेगा तो क्रिकेट तो बहुतेरा हो जाएगा. लेकिन क्या क्रिकेट अराजकता और तानाशाही में पनप और चल सकता है?

मुंबई पर आतंकवादी हमला उसी रात हुआ था जब भारत कटक में इंग्लैंड से पांचवां वनडे खेल रहा था. इस हमले के कारण बाकी के दो मैच रद्द हुए और इंग्लिश टीम भारत से चली गई. तब किसी ने सचिन तेंदुलकर से पूछा, जो अपने घरनगर पर हमले से बुरी तरह हिल गए थे. भारत में पैदा हुए सबसे बड़े क्रिकेट खिलाड़ी ने कहा- क्रिकेट जीवन से बड़ा नहीं है. ऐसे हमले के बाद हम क्रिकेट कैसे खेल सकते हैं? फिर भारत ने पाकिस्तान का क्रिकेट दौरा रद्द कर दिया तो कप्तान धोनी और दूसरे खिलाड़ियों से पूछा गया. सभी ने कहा कि सरकार ने ठीक किया. मुंबई हमले के बाद हम वहां जा कर क्रिकेट नहीं खेल सकते.

किसी खिलाड़ी ने नहीं कहा कि आतंकी हमले के कारण क्रिकेट नहीं होगा तो यह खेल आतंक से हार जाएगा. किसी ने नहीं कहा कि वनडे और पाकिस्तान का दौरा रद्द हुआ तो हमारी इतनी कमाई मारी गई. बाद में अंग्रेज टीम ने आकर दो टेस्ट खेले और दौरा पूरा किया लेकिन किसी खिलाड़ी ने दावा नहीं किया कि क्रिकेट खेलकर हमने आतंक को परास्त किया है. मुंबई पर आतंकी हमले का घाव हमारे खिलाड़ियों पर अब भी है और तीन मार्च को लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम के बाहर श्रीलंकाई टीम पर हुए आतंकी हमले से दुनिया भर के खिलाड़ियों को सदमा और दुख पहुंचा है. भारतीय उपमहाद्वीप में वनडे विश्वकप पर सवाल लग गया है. क्रिकेट को सभी बचाना चाहते हैं खासकर भारत में क्योंकि विश्व क्रिकेट का 80 प्रतिशत पैसा भारत से आता है. क्रिकेट के सबसे ज्यादा दर्शक भारतीय उपमहाद्वीप में हैं.

लेकिन लोकतंत्र की अनिवार्य प्रक्रिया- आम चुनाव और बीसमबीस क्रिकेट के मुकाबलों में से किसी एक को सुरक्षा देनी होगी तो क्या आप कहेंगे कि चुनाव बाद में भी हो सकते हैं. पहले लीग मुकाबले होने चाहिए क्योंकि वे बाद में नहीं हो सकते? लोकतंत्र और क्रिकेट के खेल में से किसी को आपको पहले सुरक्षित करना होगा तो क्या आप पहले क्रिकेट को बचाएंगे? लोकतंत्र रहेगा तो क्रिकेट तो बहुतेरा हो जाएगा. लेकिन क्या क्रिकेट अराजकता और तानाशाही में पनप और चल सकता है?

दरअसल यह सवाल ही वाहियात है. लेकिन फिर भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पूछा जा रहा है. क्योंकि हम ऐसे धंधे और ऐसे पूंजीवाद को पिछले बीस सालों से लगातार बढ़ावा दे रहे हैं जो लोकतंत्र और राजनीति को फालतू और विध्वंसक बता कर पैसे को सबसे महत्वपूर्ण बताने में लगा हुआ है.

जो लोग संसद के चुनावों को बीसमबीस क्रिकेट लीग से कम महत्व और अनिवार्यता का बता रहे हैं वे कोई क्रिकेट के खेलप्रेमी नहीं हैं. वे बीसमबीस को धंधा मानते हैं. जानते हैं कि भारत में क्रिकेट मंदी के कारण घाटे का सौदा नहीं हुआ है. फ्लिंटॉफ और पीटरसन आठ करोड़ में खरीदे गए हैं जो कि गए साल की सबसे बड़ी कीमत से भी ज्यादा है. बीसमबीस क्रिकेट अगर इतना कमाऊ धंधा है तो उसे तो सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी ही चाहिए. जी हां पांच साला चुनाव से भी ज्यादा. कोई इनका इलाज करो भाई! 

 

जय हो और कजरारे

कहा जा रहा है कि जय हो गीत को आज पूरी दुनिया गुनगुना रही है. इसे विश्व के सबसे प्रतिष्ठित अमेरिकी फिल्म पुरस्कार – ऑस्कर या अकादमी पुरस्कार – से नवाजा जा चुका है, वो भी एक नहीं बल्कि दो-दो श्रेणियों में – एक सर्वश्रेष्ठ संगीत के लिए और दूसरा सर्वश्रेष्ठ बोलों के लिए. और इसे एक बेहद मशहूर अमेरिकी पॉप संगीत समूह द्वारा अपने ही तरीके से गाने की तैयारियां भी चल रही हैं.

बकौल कांग्रेस प्रवक्ता वीरप्पा मोइली आशा का संचार करने वाला ‘जय हो’ अब केवल कांग्रेस की सभाओं में आने वाले उसके संभावित मतदाताओं में ही आशा का संचार कर सकता है

 जय हो को लिखने वाले संपूरण सिंह कालरा उर्फ गुलजार की पैदाइश आज के पाकिस्तान की है मगर उन्होंने भारत में आकर दुनिया भर में मशहूरी पाई. दूसरी ओर इसके संगीतकार ए आर रहमान पहले दिलीप कुमार हुआ करते थे और उन्होंने न केवल दक्षिण और उत्तर भारतीय संगीत के बीच के अंतर को पाटा है बल्कि व्यावसायिक संगीत के क्षेत्र में देश और दुनिया के बीच भी एक पुल बनाया है.

जिस फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर का ये गाना है वो एक अमेरिकी निर्माता और ब्रितानी निर्देशक द्वारा भारतीय कलाकारों को लेकर भारत के ही एक शहर पर बनाई फिल्म है जिसे कोई भी वजह हो पर पूरी दुनिया में सराहना और प्रतिष्ठा मिल चुकी है. मेरे एक मित्र मजाक में कह रहे थे कि ये गाना तो यार अंतर्राष्ट्रीय एकता का प्रतीक जैसा बन चुका है.

परंतु अब इस गाने पर हाथ के पंजे की छाप लग चुकी है. इसके अधिकार हमारे देश की सबसे बड़ी और पुरानी कांग्रेस पार्टी खरीद लिए हैं. काहे भई? क्योंकि, पार्टी के मुताबिक, ये गाना लोगों में आशा का संचार करता है. पार्टी ने दूसरे दलों को गाना इस्तेमाल करने पर नोटिस भी भेज रखे हैं.

अजीब बात है कि बकौल मेरे मित्र अंतर्राष्ट्रीय एकता का प्रतीक ‘जय हो’ अब केवल कांग्रेस के वोटरों में एकता स्थापित कर सकता है और बकौल कांग्रेस प्रवक्ता वीरप्पा मोइली आशा का संचार करने वाला ‘जय हो’ अब केवल कांग्रेस की सभाओं में आने वाले उसके संभावित मतदाताओं में ही आशा का संचार कर सकता है. मतलब शिक्षा, संगीत, कला आदि को सभी तरह के राजनीतिक, सांप्रदायिक, जातीय और अन्य दुराग्रहों से दूर रखने की वकालत करती आई देश की सबसे बड़ी धर्मनिरपेक्ष पार्टी ने एक गाने को कुछ लोगों के लिए अछूत बनाने का काम कर डाला है.

2004 में मेरे एक मित्र, जो आईटी उद्योग में बढ़िया जॉब करते थे, इंडिया शाइनिंग की वेब साइट और विज्ञापन देख कर हमारी तरक्की पर जबर्दस्त गर्व महसूस किया करते थे. पर उनके जैसे कुछ करोड़ लोगों के अलावा ज्यादातर लोगों का भारत उतना क्या कहीं से भी चमकीला नहीं था. भारत में स्लमडॉग.. ने एक औसत दर्जे की हिंदी फिल्म से भी काफी कम व्यापार किया है. जाहिर है जब फिल्म भारत में देखी ही नहीं गई तो इसके किसी गाने का मूल्य यहां के ज्यादातर लोगों की निगाह में किसी कजरारे-कजरारे जैसे धूम-धमाके वाले गाने से अलग क्या हो सकता है.

कहीं इंडिया शाइनिंग था तो कहीं जय हो है. कहीं संप्रदायवादी राजनीति है तो कोई जातिवादी, भाई-भतीजावादी राजनीति का पोषक है. अब जिम्मेदारी हमारी है कि हम बिना किसी बहकावे में आए, अपने नीर-क्षीर विवेक का, कैसे देश और अपनी किस्मत बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं? 

संजय दुबे

मैं आभारी हूं आपका

मैं आभारी हूं आपका,

कि आपने मुझे शहीद मानकर

एक सुंदर पत्थर पर मेरा बारीक नाम

मेरे साथियों के साथ लिखवा दिया है.

पर मुझे सैल्यूट कर,

नम आंखों से मेरा बारीक धुंधला नाम पढ़कर,

मुझे शर्मिदा ना करें,

उसे साफ पढ़ने की कोशिश,

आपकी आंखों में कई परेशान सवाल खड़े कर देगी,

और उनके जवाबों में,

पसीना, अचकचाहट, लरजती जबान,

और झंकती बगलों के सिवा कुछ और नहीं मिलेगा,

आप नाहक परेशान ना हों.

मेरे सवाल, मेरा मकान, मेरी पेंशन,

और मेरे बच्चों की पढ़ाई नहीं हैं.

मैं इनके जवाब तो वैसे भी उम्रभर नहीं ढूंढ़ पाया था,

पर इनसे बेखौफ आंखें मिलाकर,

मैंने जी हल्का कर लिया था.

मेरे पास कुछ और सवाल हैं,

जो मेरे सहमे हुए बच्चों से भी ज्यादा मासूम हैं,

कि जैसे कौन तय करता है कि मरेगा कौन,

और किस कीमत पर,

कौन तय करता है कि बचेगा कौन,

और उसकी बोली कैसे लगती है,

किसके हाथ में है कि बचे हुओं को,

रोज तिल-तिल मारा जाए,

कौन है जो किसी का मरना और किसी का मारना,

दूरबीन लगाकर बस देखता रहता है,

किसने चुना उसके लिए ये किरदार,

और चुनकर चुप क्यूं नहीं,

जीते जी मैं इनको भाता क्यूं नहीं,

मैं सचमुच अपना भाग्य विधाता क्यूं नहीं.

आपके जुलूस आपके उबाल,

आपकी मोमबत्ती और आपका लिखवाया,

मेरा बारीक नाम,

मैं शत शत आभारी हूं आपका,

पर मुझे चाहिए मेरे जवाब.

और भी हैं लेकिन,

मैं ज्यादा सवाल पूछकर,

आपको शर्मिदा नहीं करना चाहता.

                               तजेन्द्र लूथरा

 

 

लेखक दमन दीव और दादरा नगर हवेली के उप पुलिस महानिरीक्षक हैं

इस वर्ग की अन्य रचनाएं

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जानी सी जगह पर अजनबी लोग

नाव से उतरकर तमिलनाडु के धनुषकोडि में कदम रखते ही सहाया मलार को ऐसा लगा कि जैसे उनके सर से कोई बोझ उतर गया हो. बावजूद इसके कि वो अपना घर पीछे छोड़ आई थीं और ये दूसरे देश की जमीन थी जहां उन्हें और उनके परिवार को शरणार्थी की तरह रहना था. वो जानती थीं कि उनसे पहले आए हजारों लोगों की तरह उन्हें भी अब शरणार्थी कैंप में सरकार द्वारा दी जाने वाली मामूली राहत राशि के सहारे जिंदगी बसर करनी है. फिर भी सहाया को आजादी जैसा अहसास होता था. होता भी क्यों नहीं, यहां श्रीलंकाई सेना द्वारा उनके पति को परेशान किए जाने का खतरा तो था ही नहीं साथ ही लोग उनकी भाषा भी बोलते हैं. पिछले कई दिनों से सेना की नजरों से बचते-बचाते किसी तरह ये परिवार भारत आने में सफल हो सका. सहाया कहती हैं, ‘इस देश में हम भले ही शरणार्थी हों पर सुरक्षित तो हैं.’

 तमिलनाडु में अलग-अलग जगहों पर 100 शिविरों में इस समय करीब 80,000 शरणार्थी रह रहे हैं. जबकि इसी साल अब तक भारत में करीब 150 तमिल शरणार्थी आ चुके हैंश्रीलंकाई के वावुनिया की रहने वालीं 37 साल की सहाया उन 26 श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों में से एक हैं जो हाल ही में रामेश्वरम के दक्षिण में बसे तटीय गांव धनुषकोडि पहुंचे हैं. अपने पति और छह बच्चियों के साथ यहां पहुंची सहाया की कहानी उन तमिलों की विपदा को बयां करती है जो श्रीलंका में उन इलाकों में रह रहे हैं जहां सरकार का नियंत्रण है और जहां लिट्टे ने एक अलग तमिल राष्ट्र के लिए सरकार के साथ संघर्ष छेड़ रखा है. सहाया का परिवार उत्तरी श्रीलंका में वावुनिया जिले के पूर्वसंकुलम गांव में रहता था. उनके पति शिवलिंगम किसान थे.

वावुनिया में तमिलों का अपहरण और उनकी गुमशुदगी एक आम बात हो चली थी. लिट्टे के लड़ाके अक्सर जंगलों से बाहर आते और सेना पर हमला करते. बदले में सेना कई बार अपना गुस्सा स्थानीय तमिलों पर निकालती. सहाया कहती हैं, ‘हमें हमेशा सेना का डर बना रहता था. तमिल युवाओं को पकड़कर सेना के कैंप में ले जाया जाता. पूछताछ करके सेना तो उन्हें छोड़ देती मगर बाद में कुछ अज्ञात लोग उनका अपहरण कर लेते. इसके बाद वे कभी नहीं दिखते थे.’

एक दिन उनके पति की भी बारी आई. एक सुबह शिवलिंगम अपने खेत की तरफ जा रहे थे कि एक शख्स ने उन्हें पकड़ लिया. शोर मचाने पर उसने कहा कि वह लिट्टे से है. इस बीच आस-पास के काफी लोग इकट्ठा हो गए थे. उस आदमी ने शिवलिंगम से पूछा कि क्या वे सिंहली जानते हैं. शिवलिंगम ने झूठ बोलते हुए कहा कि नहीं. इसके बाद वो शिवलिंगम को कुछ दूर खड़ी सेना की एक वन तक ले गया जिसमें कुछ और लोग भी बैठे हुए थे. उन्होंने आपस में बात की और फैसला किया कि क्योंकि कई लोगों ने इस घटना को देखा है इसलिए शिवलिंगम को फिलहाल छोड़ दिया जाए और बाद में फिर कभी पकड़ा जाए. बातचीत सिंहली में हो रही थी और शिवलिंगम को इसका ज्ञान था इसलिए उन्हें सब समझ में आ गया. इसके कुछ ही दिन बाद ही शिवलिंग और उनका परिवार उत्तर-पश्चिमी तट पर स्थित मन्नार जिले की तरफ चल दिया. पिछले साल तक यहां के कुछ इलाके लिट्टे के कब्जे में थे मगर अब इस पर पूरी तरह से सरकार का नियंत्रण है. यहां से भारत जाने के लिए नाव मिल जाती है जिससे आम परिस्थितियों में धनुषकोडि तक पहुंचने में करीब तीन घंटे लगते हैं. हाल में भारत पहुंचने वाले शरणार्थी बताते हैं कि श्रीलंकाई नौसेना ने इस इलाके में चौकसी बढ़ा दी है जिससे मन्नार से भारत जाने के लिए किराए पर नाव मिलना बहुत मुश्किल हो गया है. जो नौका ये खतरा उठाने के लिए तैयार हो जाती है उसका किराया 15,000 से 20,000 श्रीलंकाई रुपए होता है. ‘अगर श्रीलंका की नौसेना ने शरणार्थियों से भरी कोई नौका पकड़ ली तो इसके मालिक का जेल जाना तय होता है. यही नहीं, उसका मछली पकड़ने का परमिट भी रद्द हो जाता है’ तमिलनाडु में शरणार्थी शिविर चलाने वाले एक गैरसरकारी संगठन से जुड़े स्वयंसेवक जॉनसन कहते हैं.

अगर उसी नौका को भारतीय नौसेना पकड़ ले तो शरणार्थियों को तमिलनाडु के किसी कैंप में भेज दिया जाता है. नौकामालिक को या तो गिरफ्तार कर लिया जाता है या फिर राज्य में चल रहे एक विशेष कैंप में भेजा जाता है जहां तमिल उग्रवादियों को हिरासत में रखा गया है. शरणार्थियों के मुताबिक कई तमिल अब भी भारत आने के लिए सही मौके के इंतजार में हैं. तमिलनाडु में अलग-अलग जगहों पर 100 शिविरों में इस समय करीब 80,000 शरणार्थी रह रहे हैं. जबकि इसी साल अब तक भारत में करीब 150 तमिल शरणार्थी आ चुके हैं.

श्रीलंका से सबसे पहले इनका आना 1980 के दशक में तब शुरू हुआ जब इस देश में जातीय तनाव भड़क उठा था. 2002 में जब लिट्टे और सरकार के बीच युद्ध विराम हुआ तो इनकी संख्या में काफी कमी आई. मगर 2006 में फिर से संघर्ष शुरू होने के बाद ये सिलसिला फिर से शुरू हो गया.

श्रीलंका में अलग-अलग जगहों से ताल्लुक रखने वाले इन शरणार्थियों को उनकी दुखभरी कहानी की समानता आपस में जोड़ती है. इनमें से ज्यादातर लोगों को सेना के दबाव के चलते अपना घर छोड़ना पड़ा है. दरअसल पहले ये लोग लिट्टे के कब्जे वाले इलाकों में तमाम मुसीबतें ङोलते हुए रह रहे थे और अब जब ये इलाके सेना के कब्जे में हैं तो उन्हें इस आतंकवादी संगठन के मददगारों के तौर पर देखा जा रहा है.

मैं अपनी जान बचाने के लिए भाग आया. सेना ने मुझ पर लिट्टे को खाना पहुंचाने का आरोप लगाया

अधिकांश शरणार्थी धनुषकोडि में उतरते हैं या फिर रामेस्वर के पास मौजूद छोटे से किसी टापू पर. यहां से स्थानीय मछुआरे या भारतीय नौसेना उन्हें अरिचलमुनाई तक ले आती है जो धनुषकोडि के दक्षिणपूर्वी किनारे पर स्थित जमीन की एक संकरी सी पट्टी है. ऐसे कई लोगों को देख चुकीं स्थानीय निवासी मुनियम्मा याद करती हैं, ‘मैंने तमाम शरणार्थियों को यहां आते देखा है. छोटे बच्चों को सीने से लगाए औरतों को और उनके साथ चल रहे डर से रोते बच्चों को.’

अरिचलमुनाई से शरणार्थी रेतीले रास्ते पर पैदल चलते हुए धनुषकोडि पहुंचते हैं जो 1964 में आए समुद्री तूफान के बाद एक भुतहा कस्बे में तब्दील हो गया था. उस समय आई ऊंची लहरों ने यहां की हर चीज को तबाह कर दिया था. इस हादसे में कुछ ही लोग जिंदा बचे थे. इनमें मछुआरों के कुछ 300 परिवार भी थे जो बिजली और दूसरी बुनियादों के बगैर आज भी यहां रहते हैं. शरणार्थियों को भारतीय जमीन पर पहला भोजन इन्हीं मछुआरों से मिलता है. 16 साल का स्थानीय किशोर विनोद कहता है, ‘जितनी हो सकती है, हम उनकी पैसे से भी मदद करते हैं.’

धनुषकोडि से शरणार्थियों को पंजीकरण के लिए वन द्वारा मूनराम छठीराम स्थित नौसेना आउटपोस्ट तक ले जाया जाता है. इसके बाद धनुषकोडि पुलिस स्टेशन में उनसे राज्य और केंद्र की खुफिया एजेंसियां कड़ी पूछताछ करती हैं. फिर उन्हें रामेश्वरम से 20 किमी दूर स्थित मंडपम ट्रांजिट कैंप ले जाया जाता है.

मंडपम में रह रहे हर शरणार्थी के पास सुनाने के लिए कई भयावह कहानियां हैं. पिछले साल नवंबर में अपने चार साल के बेटे के साथ यहां आने से पहले 34 साल के बूमिनाथन मन्नार में परचून की दुकान चलाते थे. पिछले साल अगस्त में लिट्टे के एक हमले के बाद श्रीलंकाई सैनिकों ने उनकी दुकान लूटकर उसमें आग लगा दी. बूमिनाथन याद करते हैं, ‘आग में मेरा दो लाख का सामान जल कर खाक हो गया. मैं उस घाटे से उबर नहीं सका.’ बूमिनाथन इस घटना की रिपोर्ट करवाने पुलिस के पास गए मगर इंसाफ मिलना तो दूर उल्टे उन्हें अपने बेटे के साथ सेना के शिविर में जाना पड़ा. दो हफ्ते बाद उन्हें इस शर्त पर छोड़ा गया कि वो हर हफ्ते पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करेंगे. बूमिनाथन कहते हैं, ‘जब मैं हर हफ्ते पुलिस स्टेशन जाता था तो मेरे साथ मारपीट की जाती थी और उन लिट्टे छापामारों की पहचान करने को कहा जाता था जिन्होंने सेना पर हमला किया था.’ बस बूमिनाथन ने देश छोड़ने का फैसला कर लिया.

वावुनिया जिले के चेट्टिकुलम के निवासी एस. राजन और उनकी पत्नी थिरुकलानिधि ने सेना के डर से अपने दो बेटों को पिछले साल ही भारत भेज दिया था. सेना को शक था कि वे लिट्टे में शामिल हो गए हैं और वह इस दंपत्ति को परेशान करती रहती थी. पेशे से कारपेंटर उनके तीसरे बेटे को भी अक्सर पूछताछ के लिए पकड़ लिया जाता था. राजन कहते हैं, ‘बेटे की जान बचाने के लिए हमने भारत भाग जाने का कठिन फैसला लिया.’ राजन के पास खेती की 33 एकड़ जमीन थी और वे इस सीजन में बढ़िया फसल और बढ़िया कमाई की उम्मीद कर रहे थे. मगर परिवार ने खेती की जगह अपनी जान को तरजीह दी और 19 जनवरी को भारत जाने के लिए नौका में सवार हो गया. थिरुकलानिधि कहती हैं, ‘हमने बहुत सी चीजें खो दीं मगर हम यहां शांति से सो सकते हैं. वहां तो कुतों के भौंकने या घर के पास से किसी मोटरसाइकिल के गुजरने की आवाज से ही हमें रात भर जागना पड़ता था.’

चित्रा देवी और सी. चंद्रशेखरन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. चंद्रशेखर के तीन जवान बेटे हैं और वे तमिल युवाओं के गायब होने के कई किस्से सुनते रहते थे. चित्रा कहती हैं, ‘सेना के जवान रात में नकाब लगाए हुए आते और नौजवानों को पकड़ कर ले जाते. पिछले एक साल में हमारे इलाके से कई नौजवान गायब हो चुके थे जिनका कोई पता नहीं चला. इससे पहले ये हमारे बच्चों के साथ होता, हमने वह जगह छोड़ दी.’

अपनी बीवी को वहीं छोड कर अपनी दो बेटियों के साथ भारत आ गए सेल्वाकुमार कहते हैं, ‘मैं अपनी जान बचाने के लिए भाग आया. सेना ने मुझ पर लिट्टे को खाना पहुंचाने का आरोप लगाया था. अगर मैं वहां रहता तो वे मुझे मार देते.’

हताश जिंदगियां, टूटे सपने और बिखरे परिवार..तमिल शरणार्थियों की जिंदगी का यही सार है. ’   

 

पड़ोस में पांव पसारता शैतान

कभी पर्यटकों से गुलजार रहने वाली खूबसूरत स्वात घाटी में अब डर पसरा हुआ है. पिछले डेढ़ साल के दौरान यहां के 15 लाख लोगों की जिंदगी की डोर ढाई हजार तालिबानी आतंकियों के हाथ में आ गई हैं. उनका नेता है मौलवी फजलुल्लाह या मुल्ला रेडियो जो अपना एमएफ रेडियो स्टेशन चलाता है और उसी के जरिए लोगों को अपने मध्यकालीन फरमान सुनाता है. फजलुल्लाह के लड़ाकों और पाकिस्तानी सेना के बीच दो साल से लड़ाई छिड़ी हुई थी. पिछले साल के दौरान तालिबान ने स्वात के ज्यादातर हिस्से पर कब्जा जमा लिया है. इस लड़ाई में अब तक 1200 से भी ज्यादा बेगुनाहों की जान जा चुकी है और साढ़े तीन लाख से भी ज्यादा लोगों को घाटी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है. पैसे वाले लोग तो पेशावर या इस्लामाबाद के पॉश इलाकों का रुख कर गए और तालिबान का कहर भुगतने के लिए बचे वे गरीब जिनके पास जाने के लिए कोई ठिकाना नहीं था.

स्वात में एक एयरपोर्ट भी था और इसके आकर्षण में बंधे पर्यटक दुनिया भर से यहां आते थे

तालिबान ने अपना निशाना खास तौर पर उन्हें बनाया जो कानून और व्यवस्था से जुड़े विभागों में नौकरी कर रहे थे. उनका अपहरण किया गया, उन्हें अपंग बनाया गया और उनकी हत्या तक कर दी गई. हत्या को एक सार्वजनिक आयोजन में तब्दील कर क्रूरता का ऐसा प्रदर्शन किया गया जिससे लोगों को संदेश मिल जाए कि तालिबान की बात न मानने वालों का हश्र क्या हो सकता है.

खूनी चौक इस आतंक का एक प्रतीक बन गया. स्वात के मुख्य शहर मिंगोरा में स्थित इस चौराहे पर देर रात तालिबान आतंकियों का एक झुंड आता और कुछ शवों को चौक के बीच में स्थित एक खंभे पर लटका देता. इन शवों में से कई का सिर गायब होता और उन पर एक नोट लगा होता जिसमें उनका नाम और इस्लाम के खिलाफ किया गया उनका जुर्म लिखा होता. शवों को एक तय दिन तक वहां रखा जाता था. संदेश साफ था कि तालिबान के फरमान के खिलाफ जाने वालों के साथ क्या हो सकता है.

ये उस स्वात घाटी में हो रहा था जिसके बारे में कहा जाता था कि वहां न सिर्फ फ्रंटियर प्रोविंस बल्कि पूरे पाकिस्तान में सबसे ज्यादा शांतिप्रिय और शिक्षित लोग रहते हैं. 1969 में पाकिस्तान में सम्मिलित होने वाली इस पूर्व रियासत में पाकिस्तान के बाकी हिस्सों की तुलना में बेहतर स्कूल, अस्पताल और पुलिस थाने थे. स्वात में एक एयरपोर्ट भी था और इसके आकर्षण में बंधे पर्यटक दुनिया भर से यहां आते थे.

मगर अब हालात बदल गए हैं. कानून- व्यवस्था पूरी तरह से खत्म हो चुकी है. ज्यादातर पुलिसकर्मी या तो भाग गए हैं या उन्होंने इस्तीफा दे दिया है या फिर वे काम पर ही नहीं आ रहे. स्थानीय अखबारों में ऐसे विज्ञापनों की भरमार है जिनमें पुलिसकर्मी ये घोषणा कर रहे हैं कि उन्होंने नौकरी छोड़ दी है और उनके छोटे-छोटे बच्चों की खातिर उन्हें बख्श दिया जाए. इन हालात से निपटने और तालिबानी आतंकियों से मुकाबला करने के लिए 600 स्थानीय युवाओं को खास कमांडो ट्रेनिंग के लिए चुना गया था. मगर इनमें से 450 तो ट्रेनिंग के दरम्यान ही गायब हो गए जबकि बाकी 148 नौकरी ज्वॉइन करने वाले दिन पहुंचे ही नहीं. 

लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध लग चुका है और इसके चलते स्वात की 100000 से भी ज्यादा लड़कियों की शिक्षा और भविष्य अधर में लटक गए हैं

ऐसे में स्वात के लोग मजहब की हिफाजत के नाम पर दरिंदगी करने वाले भेड़ियों के रहमोकरम पर रह गए. सरेआम लोगों का सिर कलम किया गया और उन्हें फांसी दी गई. तालिबान के फरमान के खिलाफ जाने वालों को बंदूकधारी नकाबपोशों ने भीड़ के सामने गोलियों से छलनी कर दिया गया. ऐसी घटनाओं के वीडियो भी बनाए गए ताकि लोगों में ज्यादा से ज्यादा डर पैदा किया जा सके. पहले ही बेरोजगारी और भूख से परेशान आबादी के दिलोदिमाग पर इसका काफी गहरा असर हुआ.

स्वात के 80 फीसदी लोगों की कमाई पर्यटन से जुड़ी हुई थी. इन लोगों के लिए जिंदगी थम सी गई है. न बगीचों में काम करने के लिए मजदूर हैं और न फसल के लिए खरीदार. लोगों को कई दिन तक ईंधन, खाने और बिजली जैसी चीजों के बिना गुजारा करना पड़ रहा है. मिंगोरा के एकमात्र सिनेमा हॉल को बंद कर दिया गया है. टीवी और संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. यहां तक कि बाल काटने की दुकानें भी बंद करवा दी गई हैं क्योंकि तालिबान का मानना है कि दाढ़ी बनवाना गैरइस्लामी है.

इन हालात की सबसे ज्यादा मार औरतों, बच्चों और अपंगों पर पड़ रही है. 200 से भी ज्यादा स्कूल बम से उड़ा दिए गए क्योंकि तालिबान के मुताबिक वे लड़कियों को पश्चिमी शिक्षा दे रहे थे. लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध लग चुका है और इसके चलते स्वात की 100000 से भी ज्यादा लड़कियों की शिक्षा और भविष्य अधर में लटक गए हैं. ये उस जगह पर हो रहा है जहां शिक्षा और नौकरियों के क्षेत्र में महिलाओं का अनुपात पूरे प्रांत में सबसे ज्यादा था. तालिबान के नए आदेश में लड़कियों को चौथी क्लास तक पढ़ने की इजाजत मिल सकती है मगर उनका पाठ्यक्रम बदला जाएगा. इसके साथ ही उन्हें हमेशा सिर को स्कार्फ से ढके रहना होगा. हालांकि इसमें भी कुछ वक्त लगेगा क्योंकि ज्यादातर स्कूल बमबारी से बर्बाद कर दिए गए हैं.

स्वात में महिलाएं अपने ही घर में कैदी बनकर रह गई हैं क्योंकि उन्हें बाहर निकलने की इजाजत नहीं है. कॉस्मेटिक्स और चूड़ियों की दुकानों वाला सेंट्रल बाजार अब किसी भुतहा जगह जसा लगता है. महिलाओं को नौकरी करने की इजाजत भी नहीं है. यहां तक कि महिला डॉक्टरों को भी घर बैठने का फरमान सुना दिया गया है. डॉक्टरों के न होने से बच्चों की मौत के किस्से आम हो चले हैं. कई दूसरे लोग दवाओं और इलाज की कमी के चलते दम तोड़ चुके हैं.

सवाल उठता है कि आखिर 15 लाख लोगों ने चंद तालिबानी गुंडों के उन अमानवीय फरमानों को कैसे मान लिया जिनका इस्लाम समर्थन ही नहीं करता? जवाब है कि ये लोगों की गलती नहीं है. वे तो पिछले चुनाव में उदारवादी ताकतों को वोट देकर सत्ता में लाए थे. पर लगता है कि तालिबान नाम के शैतान से लोगों को बचाने के लिए इन पार्टियों के पास या तो राजनीतिक ताकत नहीं थी या फिर इच्छाशक्ति.

मगर फिर दूसरा सवाल उठता है कि तालिबान ने इतनी ताकत कैसे हासिल कर ली? असल में रियासत के दौरान यहां की न्याय व्यवस्था काफी बेहतर थी लेकिन पाकिस्तान में विलय के बाद इसमें काफी भ्रष्टाचार फैल गया. इसलिए लोग चाहते थे कि शरीयत अदालतों की स्थापना हो ताकि न्याय जल्द से जल्द मिल सके. तालिबान इस स्थिति का फायदा उठाकर ताकत बढ़ाता चला गया. आम लोगों के लिए ये दो बुरे विकल्पों से से कम बुरे वाले को चुनने जैसा था.

अब सारी उम्मीदें मौलाना सूफी मोहम्मद यानी फजलुल्लाह के ससुर पर टिकी हैं. सूफी हाल में में छह साल जेल की सजा काटकर रिहा हुआ है. उस पर 2001 में दस हजार पश्तूनों को साथ लेकर अफगानिस्तान पर हमला करने वाली अमेरिकी फौज से लड़ने का आरोप था. इस लड़ाई में 7000 पश्तून मारे गए थे और सूफी जान बचाकर भाग निकला था. मारे गए उन लोगों के रिश्तेदार आज भी सूफी से नफरत करते हैं. उसी सूफी का सहारा लेकर फजलुल्लाह को इसके लिए राजी करने की कोशिशें हो रही हैं कि वह सरकार द्वारा की गई युद्धविराम की पेशकश मान ले. फजलुल्ला आंशिक तौर इसके लिए राजी हो गया है इसलिए फिलहाल स्वात में शांति है मगर कोई नहीं जानता ये कितने दिन कायम रहेगी.

तालिबान के साथ युद्धविराम समझौते से कई सवाल खड़े होते हैं. पहला ये कि क्या मान लिया जाए कि पाकिस्तान सरकार ने उन तालिबानी आतंकियों के सामने घुटने टेक दिए हैं जो देश को मध्ययुगीन इस्लामी व्यवस्था में ले जाना चाहते हैं? या फिर ये सेना की सोची-समझी रणनीति है?

ये भी एक विडंबना है कि इस समझौते पर फ्रंटियर प्रोविंस के मुख्यमंत्री अमीर खान होती ने दस्तखत किए हैं जो अहिंसावादी और सीमांत गांधी के नाम से मशहूर खान अब्दुल गफ्फार खान के पड़पोते हैं. इस समझौते को सही बताते हुए उनके शब्द थे, ‘मैंने ऐसा इसलिए किया ताकि हिंसा रुक जाए. मैंने चुनाव के दौरान अपने वोटरों से शांति बहाल करने का वादा किया था.’ उनके चाचा और प्रांत में सरकार चला रही अवामी नेशनल पार्टी के मुखिया अफसंद यार वली तालिबान आतंकियों के निशाने पर हैं. उन पर तीन महीने पहले आत्मघाती हमला हो चुका है और उनकी पार्टी के ज्यादातर नेता जान के डर से भागते फिर रहे हैं.

जहां तक केंद्र की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) सरकार का सवाल है तो वह काफी सावधानी बरत रही है. राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का कहना है कि वह इस मामले पर फैसला तब करेंगे जब समझौता दस्तखत के लिए उनके सामने आएगा. वाशिंगटन के दौरे पर गए विदेश मंत्री शाह महमूद अमेरिका को शांत करने के लिए कह गए कि ये समझौता एक स्थानीय बीमारी की स्थानीय दवा है. पीपीपी ने न तो इस समझौते को स्वीकार किया है और न ही ठुकराया है. आधिकारिक रूप से कोई फैसला लेने से पहले पीपीपी सरकार कम से कम कुछ महीनों तक ये देखना चाहेगी कि इस समझौते का नतीजा क्या होता है. इस दौरान पीपीपी के नेता ये तर्क दे रहे हैं कि शरीयत अदालतों और सख्त इस्लामी अदालतों में फर्क है. उदाहरण के लिए नया कानून महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध नहीं लगाएगा और न ही ऐसे सख्त नियमों को थोपेगा जिनका तालिबान, पाकिस्तान या अफगानिस्तान में समर्थन करते रहे हैं.

उधर, पाकिस्तान के उदारवादी वर्ग में इस समझौते पर भारी नाराजगी है. उसका मानना है कि सरकार आतंकी तत्वों के हाथ बिक गई है. मानवाधिकार कार्यकर्ता इकबाल हैदर इसे शैतान के साथ समझौता करार देते हुए कहते हैं, ‘आप उन्हीं लोगों के साथ कैसे खड़े हो सकते हैं जिन्होंने सैकड़ों बेगुनाहों की जान ली हो. ये सिद्धांतों का मामला है जिनकी जगह सबसे ऊपर है. इन लोगों पर इंसानियत के खिलाफ अपराध के लिए मुकदमा चलना चाहिए.’ पाकिस्तानी सेना को भारत के साथ लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया है और आतंकवाद से लड़ने में ये शायद उतनी सहजता महसूस नहीं करती

उदारवादी वर्ग का तर्क है कि ये समझौता दूसरे तालिबानी आतंकियों के लिए मिसाल बन जाएगा और वे इस प्रांत के दूसरे हिस्सों में भी शरीयत व्यवस्था की मांग करने लगेंगे. वरिष्ठ विश्लेषक सलीम खिलजी कहते हैं, ‘अब उन्हें मालूम है कि सरकार को झुकाने का तरीका आतंकवाद है.’ खिलजी की बात में दम है क्योंकि समझौता तालिबान को अपनी ताकत बढ़ाने का मौका देता है. सरकार ने ये मांग मान भी ली है कि स्वात के अलावा मलाकंद डिविजन के पांच दूसरे जिलों में भी नई शरीयत व्यवस्था का विस्तार किया जाएगा.

उधर, पाकिस्तान की सेना ने इस मसले पर सरकार की आड़ ले ली है. उसका कहना है कि वह सरकार के उस आदेश का पालन कर रही है जिसमें उसे अगले नोटिस तक इलाके से बाहर रहने को कहा गया है. अगर इस समझौते से शांति बहाल हो जाती है तो सबसे ज्यादा राहत सेना को ही मिलेगी क्योंकि इस लड़ाई की सबसे ज्यादा मार उस पर भी पड़ी है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सेना ने अपने सौ जवान गंवाए हैं मगर तालिबान का दावा है कि ये संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है.

मुद्दा ये है कि पाकिस्तानी सेना को भारत के साथ लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया है और आतंकवाद से लड़ने में ये शायद उतनी सहजता महसूस नहीं करती. ऐसा इसलिए है क्योंकि इसे भारतीय सेना की तरह इस तरह की लड़ाई का ज्यादा तजुर्बा नहीं है जिसने लगातार कश्मीर, नागालैंड और मिजोरम जैसी जगहों पर ऐसे हालात का सामना किया है.

हालांकि किसी भी तरह की स्थिति से निपटने के लिए सेना स्वात पर नजर रखेगी. माना जा रहा है कि सूफी मोहम्मद या तो शांति बहाल करवा देगा या फिर अपने दामाद के साथ भिड़ जाएगा. इसमें सेना का ही फायदा होगा क्योंकि तब लड़ाई सेना बनाम तालिबान की जगह आतंकवादी बनाम आतंकवादी की होगी.

मगर इसके उलट ये भी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि इस वक्त का इस्तेमाल ये दो धड़े आपस में संगठित होकर अपनी ताकत बढ़ाने और बाद में बड़े स्तर पर हमला करने में कर सकते हैं. ऐसा होने के संकेत मिलने भी लगे हैं. इस इलाके में हथियारों के दाम बढ़कर दोगुने हो गए हैं क्योंकि उनकी मांग बहुत ज्यादा हो गई है.

वैसे भी लगता नहीं कि ये समझौता लागू हो पाएगा. ऐसा इसलिए है क्योंकि हर पक्ष इसकी अपनी-अपनी तरह से व्याख्या कर रहा है. फ्रंटियर और इस्लामाबाद की सरकारें सोचती हैं कि शरीयत अदालतें नई बोतल में पुरानी शराब जैसी हैं. उधर, सूफी मोहम्मद का मानना है कि इस समझौते के तहत धार्मिक विद्वान स्वतंत्र जज होंगे और उनकी भूमिका महज दीवानी अदालतों को सुझाव देने की नहीं होगी. जैसा कि सूफी मोहम्मद के प्रवक्ता मौलाना क्षत का कहना है, ‘जजों के मामले में पसंद हमारी होगी और सारी ताकतें उनके(जजों के) पास होंगी.’

फजलुल्लाह न्यायपालिका के अलावा बाकी सारे क्षेत्रों में भी शरीयत व्यवस्था लागू करना चाहता है. उसके दूसरे प्रवक्ता मुस्लिम खान के शब्दों में ‘हम इस पूरे इलाके को पाक किताब के हिसाब से चलाएंगे. हमें अपने अलावा किसी और की व्यवस्था मंजूर नहीं और अल्लाह ने चाहा तो हम जल्द ही इसे पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में भी फैला देंगे.’

कम पढ़ा-लिखा फजलुल्लाह कभी लिफ्ट ऑपरेटर हुआ करता था. खास बात ये है कि उसने पहले अपने दम पर अपनी ताकत बढ़ाई और बाद में तालिबान और अल-कायदा ने उसे अपनी तरफ मिलाकर इस इलाके का कमांडर बना दिया. स्वात अकेली ऐसी जगह है जहां पर पूरी तरह से तालिबान का कब्जा हो गया है. ऐसा इसकी भौगोलिक स्थिति के कारण भी है. ये घाटी चारों तरफ से दुर्गम पहाड़ियों से घिरी हुई है और बाकी देश से इसका संपर्क मुख्य रूप से संकरी घाटी से गुजरती एक सड़क के जरिए होता है जिसे आसानी से बाधित किया जा सकता है. इसलिए संख्या बल में कम होने के बावजूद यहां तालिबान के लिए अपना कब्जा बनाए रखना आसान है. बाजौर, खैबर और वजीरिस्तान में भी तालिबान ताकतवर है मगर वहां स्वात की तरह व्यवस्था पर इसका कब्जा नहीं है.

स्वात की सीमा अफगानिस्तान से नहीं लगती और परंपरागत रूप से ये एक शांत इलाका रहा है जहां देश-विदेश से सैलानियों को आना-जाना लगा रहता था. बाजौर, खैबर और वजीरिस्तान जसे इलाकों में कबीलों की आपसी लड़ाई का इतिहास पुराना है मगर स्वात में स्थितियां कभी भी ऐसी नहीं थीं. इसलिए इस समझौते का संदेश अगर तालिबान की जीत के रूप में बाहर जाता है तो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में भी आतंकवाद की आग को हवा मिल सकती है. व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो ये और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि वजीरिस्तान में पाकिस्तान समर्थक मुल्ला नाजिर, सरकार विरोधी बैतुल्ला मसूद और हाजी गुल बहादुर जैसे लड़ाके अपने मतभेद भुलाकर एक हो गए हैं. बाजौर में भी तालिबान अब ऐसी ही शरीयत अदालतों उम्मीद कर रहे हैं. उधर, खैबर में हमीमुल्लाह ने नाटो सेनाओं की रसद आपूर्ति रोक रखी है. इन सारे तत्वों, जिनमें कश्मीर के आतंकवादी भी शामिल हैं, के तार आपस में जुड़े हुए हैं तालिबान नाम के शैतानी जिन्न की ताकत बढ़ती जा रही है और ये सिर्फ पाकिस्तान के लिए नहीं बल्कि पूरे इलाके 

छाया वीर

Manmohan_Singh_277983249पांच साल का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का विश्लेषण दूसरे किस तरह कर रहे हैं इससे ज्यादा दिलचस्प ये जानना होगा कि खुद मनमोहन अपना आकलन कैसे करेंगे. मन के दर्पण में झांकने पर उन्हें किस तरह का अक्स नजर आएगा? क्या ये अक्स ऐसे प्रोफेसर और अर्थशास्त्र का होगा जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री बनकर संभावना की हर उड़ान के परे निकल गया या फिर असाधारण नम्रता वाले एक भले आदमी का जो असाधारण नम्रता वाले एक भले नेता में तब्दील हो गया? क्या ये छवि अपने मालिक के आदेश पर जीने और मरने के लिए तैयारे सक्षम सेवक की होगी या फिर चतुराईविहीन अनुयायी के आवरण में छिपे एक चतुर नेता की?

कहा जाता है कि इतिहास सबका निष्पक्ष फैसला करता है. मगर सच ये है कि इतिहास के जरिए भी घटनाओं को समझना कई बार मुश्किल हो जाता है. आखिर कौन कह सकता था कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन जाएंगे और वह भी एक गठबंधन सरकार के. और उससे भी बढ़कर ये कि वे अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा कर जाएंगे.

मनमोहन की सज्जनता और कार्यकुशलता पर दोराय नहीं हो सकती. मगर कितने भी प्रशंसनीय होने पर भी सिर्फ इन गुणों का होना ही काफी नहीं. ये तो कई दूसरे लोगों में भी मिल जाते हैं. एक अरब की आबादी के नेता में लोग इससे कहीं ज्यादा खूबियों मसलन दृष्टि, प्रेरणा, साहस, इच्छाशक्ति, कूटनीति और जनता के मन में झांकने व इतिहास की धारा को बदलने की क्षमता की उम्मीद करते हैं. योजनाओं का कार्यान्वयन अहम गुण है मगर इसके लिए भी व्यवस्था में योग्य लोग मौजूद होते हैं उदाहरण के लिए ब्यूरोक्रेट्स, अर्थशास्त्री आदि.

कुछ लोग दावा करते हैं कि मनमोहन को देखकर उनके बारे में कोई निष्कर्ष बना लेना भूल होगी. उनमें आम भारतीय नेताओं जैसी ठसक और वाकपटुता न होने का मतलब ये नहीं कि वे कमान नहीं साध सकते. बल्कि प्रशंसक तो मानते हैं कि किसी तरह का सतही दिखावा न करना ही मनमोहन को राजनीति के खेल में दूसरों से ज्यादा मंझा हुआ खिलाड़ी साबित करता है. यही वजह है कि वे आज प्रधानमंत्री हैं और वे नहीं जो इस पद के लिए धक्कामुक्की कर रहे थे.

मगर इतिहास की रोशनी में देखने पर मनमोहन के मंझे हुए राजनीतिक होने का ये तर्क लड़खड़ाने लगता है. हर बार ये साफ नजर आता है कि अपनी मर्जी से काम करने की बजाय उन्होंने वही किया जो उनसे करने को कहा गया. नरसिम्हा राव की सरकार में वित्तमंत्री का उनका कार्यकाल इसका उदाहरण है. प्रधानमंत्री के तौर पर भी उन्होंने वही किया जो उनसे पार्टी या सीधे-सीधे कहा जाए तो सोनिया गांधी ने करने को कहा. दिशानिर्देश सोनिया के रहे और पालन करने के तरीके शायद उनके अपने. ये भी हो सकता है कि उनके विचार काफी हद तक सोनिया से मिलते थे मगर फिर उन पर अमल भी इसीलिए हुआ क्योंकि उन्हें मनमोहन के नहीं बल्कि सोनिया के विचारों के तौर पर देखा गया. बड़े फैसले आम सहमति के आधार पर लिए गए मगर अक्सर ऐसे मौकों पर सिंह मार्गदर्शन के लिए सोनिया की तरफ ताकते रहे. शायद एक तरह से ये उनके लिए फायदेमंद ही रहा. मनमोहन की विशेषज्ञता का क्षेत्र राज की बजाय अर्थनीति रहा है इसलिए हो सकता है कि जनता की नब्ज को समझने के मामले में सोनिया की छाया ने उन्हें अमूल्य मार्गदर्शन प्रदान किया हो.

[box]जब मीडिया सहित हर कोई पाकिस्तान के खून का प्यासा हो रहा था तो प्रधानमंत्री संतुलित रहे. उनकी प्रतिक्रिया में किसी अपरिपक्व देश के गुस्से की बजाय एक महान राष्ट्र की दूरदर्शिता दिखी[/box]

पांच साल के कार्यकाल के बाद अगर मनमोहन का मूल्यांकन किया जाए तो शायद उन्हें एक विशुद्ध नौकरशाह के तौर पर देखा जाएगा जो सिर झुकाए अपना काम करता रहा और अपने लिए तय दायरे से बाहर कभी भी नहीं गया, जिसने कभी किसी के साथ पंगा नहीं लिया और जो हमेशा दिशानिर्देशों का इंतजार करता रहा. एक ऐसा शख्स जिसका सम्मान उसके व्यक्तित्व की नहीं बल्कि उसके पद की वजह से ज्यादा हुआ और जो शायद प्रधानमंत्री न होता तो 100 करोड़ क्या 100 लोगों का भी नेता नहीं हो सकता था.

मनमोहन सिंह के कार्यकाल को कॉरपोरेट जगत और अमीरों के राज के रूप में देखा जाएगा जिसमें आम आदमी का जिक्र दो बार हुआ. पहली बार तब जब सभी पूर्वानुमानों को धता बताते हुए यूपीए सत्ता में आया और उसने अति कृतज्ञता जताते हुए आम आदमी का राग अलापा. और दूसरी बार पिछले नौ महीनों के दौरान, जब उसे ये अहसास हुआ कि अब वापस उसी परेशान मतदाता की देहरी पर जाना है. इसके अलावा प्रधानमंत्री के कार्यकाल का ज्यादातर हिस्सा इस देश के अमीरों को समर्पित रहा. वे अक्सर व्यापारिक घरानों और मीडिया हाउसों के उन आयोजनों में दिखते रहे जिनका कोई खास मकसद नहीं होता था. पैसे की बोली बोलने वालों से मिलने के लिए हमेशा उनके पास वक्त रहा जबकि जनता की भाषा बोलने वालों को जंतर-मंतर पर धरना देकर या 10 जनपथ के आगे लाइन लगाकर संतोष करना पड़ा.

अमीर वर्ग के लिए उनका ये झुकाव अजीब था. ऐसा लगा जैसे उन्होंने उस अहम सबक पर ध्यान नहीं दिया जो भारत के हर नेता को कंठस्थ होना चाहिए. वह सबक ये है कि अपनी हर बात और काम से भारत के प्रधानमंत्री को देश के गरीबों और वंचितों का प्रतिनिधि लगना चाहिए. ये एक ऐसा नियम है जिसका कम से कम तब तक अनिवार्य रूप से पालन होना ही चाहिए जब तक हमारे देश में हर बच्चे को पर्याप्त शिक्षा और भोजन न मिलने लगे या जब तक कुल गरीबों का आंकड़ा गिरकर एक करोड़ तक न आ जाए. रिकार्ड के लिए बता दें आज ये आंकड़ा पचास करोड़ के करीब है.

हालांकि इस विशुद्ध नौकरशाह ने इस देश की असल बीमारियों को दूर करने के मकसद से भी कुछ काम किए मगर तभी जब हाईकमान ने ऐसा करने के लिए कहा. सूचना के अधिकार और राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना इसके उदाहरण हैं. मगर ज्यादातर मौकों पर वे खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करने में विफल रहे जो मुश्किलों से जूझ रहे देश के लोगों में उम्मीद पैदा कर सके. नक्सल समस्या पर उनके बयान बुरे सुझाव का नतीजा दिखे, गुजरात पर उनकी खामोशी भयावह रही और किसानों को आत्महत्या करने से रोकने के उनके उपाय बेअसर साबित हुए. और सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरण को बचाने के मुद्दे पर तो उनका कार्यकाल शायद विपरीत प्रभावकारी रहा. जनता बनाम पूंजीपतियों की हर लड़ाई में वे जनता के साथ खड़े नहीं दिखे.हां, एक मुद्दे पर उन्होंने जरूर दृढ़ता दिखाई मगर इसने उनकी साख बढ़ाने के बजाय उनकी प्राथमिकताओं और जुड़ाव पर नए सवाल खड़े कर दिए. परमाणु करार के फायदे और नुकसान क्या होंगे ये तो सही मायनों में आने वाला वक्त ही बता सकता है मगर फिलहाल तो इस करार ने मनमोहन की विश्वबैंक और अमेरिका समर्थक छवि को बिल्कुल पक्का कर दिया है.

एक मुद्दा ऐसा भी रहा जिस पर उन्होंने राजनेता जैसे धैर्य का परिचय दिया और इसका श्रेय हमेशा उन्हें दिया जाएगा. पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई में हुए हमले के बाद जब मीडिया सहित हर कोई पाकिस्तान के खून का प्यासा हो रहा था तो प्रधानमंत्री संतुलित रहे. उनकी प्रतिक्रिया में किसी अपरिपक्व देश के गुस्से की बजाय एक महान राष्ट्र की दूरदर्शिता दिखी.

यही शांतचित्तता उनकी स्थायी विरासत का एक भाग हो सकती है. उन्होंने कोई आवरण नहीं ओढ़ा और जैसे थे वैसे ही बने रहे. इस तरह उन्होंने शीर्षस्तर पर राजनीति के ओछेपन का स्तर कम किया. इसके लिए हमें उनका शुक्रगुजार होना चाहिए कि अगर उन्होंने सार्वजनिक आचरण के गिरते मानदंडों को अगर उठाया नहीं तो और गिराया भी नहीं.

विडंबना ये है कि इतिहास आखिरकार उनके बारे में फैसला इस आधार पर नहीं करेगा कि वे क्या थे और उन्होंने क्या किया. ये फैसला इस आधार पर होगा कि उनके जाने के बाद क्या परिदृश्य बनता है. अगर हिंदू दक्षिणपंथी ताकतें मजबूत होकर सत्ता में वापसी करती हैं तो उन्हें ऐसे नेता के तौर पर देखा जाएगा जिसने तूफान को रोकने के लिए पर्याप्त कोशिश नहीं की. उधर, राहुल गांधी अगर कांग्रेस में नई जान फूंकने में कामयाब हो गए तो मनमोहन को नेहरू-गांधी खानदान की कहानी में उस फुटनोट के तौर पर देखा जाएगा जिसने एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में सत्ता हस्तांतरण को सुगम बनाया. लेकिन यदि इसके बाद देश और भी ज्यादा अवसरवादी गठबंधनों, संकीर्ण राजनीति और प्रशासकीय अराजकता के दौर में धंसता है तो उन्हें समझदार और संतुलित नेताओं के दौर के आखिरी व्यक्तित्व के रूप में याद किया जाएगा.

एक बार फिर से वही सवाल. अपने मन के आइने में झांकने पर मनमोहन को किस तरह का अक्स नजर आएगा? शायद उन्हें एक ईमानदार और परिश्रमी व्यक्ति का प्रतिविंब दिखेगा जिसने ऐतिहासिक संयोग से मिले हर मौके पर अपनी नम्रता और कृतज्ञता बनाए रखी, जो महान नहीं तो सही मायनों में असाधारण तो रहा ही और जिसमें साहस से ज्यादा सज्जनता और इच्छाशक्ति से ज्यादा इच्छापालन की भावना रही. देखा जाए तो उनका प्रदर्शन ठीक-ठाक रहा. जैसे हालात थे उनमें मनमोहन इतना ही कर सकते थे.

तरुण तेजपाल

कलाई से निकली जादुई तान को सम्मान

ईएसपीएन के कमेंटेटर हर्षा भोगले को गुंडप्पा रंगनाथ विश्वनाथ के साथ अपनी पहली मुलाकात आज भी याद है, हालांकि वो मुलाकात आमने-सामने की नहीं थी. 1969 में सिकंदराबाद के सेंट जॉन स्कूल की चौथी कक्षा के छात्र हर्षा ने किसी तरह से अपने प्रधानाचार्य को कानपुर में चल रहे टेस्ट मैच की कमेंट्री छात्रों को सुनाने के लिए तैयार कर लिया था. उनके  उतावलेपन की वजह एक युवा बल्लेबाज था जो मैच की दूसरी पारी में रनों की बारिश किये जा रहा था. आकाशवाणी के उस जमाने में श्रोताओं के लिए उस कलात्मक बल्लेबाज की मजबूत कलाइयों से निकलने वाले ताकतवर शॉट देख पाना संभव नहीं था जिसने अपनी रफ्तार से बल्लेबाजों को कंपा देने वाली ऑस्ट्रेलियाई चौकड़ी – मैकेंजी, ग्लीसन, कोनोली और मैलेट की हालत पतली कर दी थी. उस पारी में विशी ने 25 बार गेंद को सीमा रेखा के पार पहुंचा कर भारतीय टीम में अपनी जगह पक्की की थी. वो बिल्कुल जादू जैसा थाहर्षा याद करते हैं, वहीं उनके जोड़ीदार रहे सुनील गावस्कर, गुंडप्पा को एक ही गेंद को कई तरीके से खेल सकने वाला इकलौता खिलाड़ी मानते हैं.

ये बेहद दुखद है कि टेलीविजन का युग शुरू होने से पहले ही उनका युग खत्म हो चुका था. कल्पना कीजिए 15 कैमरों के सामने उन्हें बल्लेबाजी करते देखना कितना सुखद होता

चाहे जिस तरह की भी गेंदबाजी रही हो विशी के पास हमेशा शॉट्स के ढेरों विकल्प रहते थे. सिर्फ 91 टेस्ट मैचों में 6080 रन और प्रथम श्रेणी की बात करें तो कुल 17,970 रन उनकी बेहतरीन प्रतिभा की कहानी बयान करते हैं. 1975 में चेन्नई के चेपक स्टेडियम में उनकी नाबाद 97 रनों की पारी ने पूरी श्रंखला में आग उगलते रहे एंडी रॉबर्ट्स को शांत करके एक समय श्रंखला में 0-2 से पीछे चल रहे भारत को सीरीज में बराबरी तक पहुंचा दिया था.

विशी इंग्लिश खिलाड़ी बॉब टेलर को दोबारा मैदान में बुलाए जाने के लिए भी याद किए जाते हैं. वाकया 1979 के बीसीसीआई स्वर्ण जयंती टेस्ट मैच का है जब अंपायर हनुमंत राव ने उन्हें आउट करार दिया था. गावस्कर के बाद भारत के दूसरे सबसे बड़े मैच-जिताऊ खिलाड़ी को अब जाकर वाजिब सम्मान दिया गया है’ 60 वर्षीय विश्वनाथ को बीसीसीआई द्वारा सीके नायडू लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार दिए जाने पर क्रिकेट इतिहासकार बोरिया मजूमदार कहते हैं. विशी की तारीफ करने वाले लोगों में सिर्फ भोगले और मजूमदार नहीं हैं. उनके लाखों प्रशंसक हैं और उनसे जुड़ी हजारों कहानियां हैं. एक दिलचस्प कहानी है गणपति होटल के मालिक की जो कपिल, अजहर, वेंगसरकर और श्रीकांत के खराब खेल से आजिज आकर अपना फिलिप्स का रेडियो कैश काउंटर पर दे मारते थे – ये सब बेकार खिलाड़ी हैं. आज अगर विश्वनाथ खेल रहा होता तो हम मैच जीत जाते या कम से कम मैच में रोमांच तो रहता.

इस तरह की घटनाओं पर विश्वनाथ हंस देते हैं. सामान्यत: वो अपने क्रिकेट जीवन की यात्रा के बारे में ज्यादा बात नहीं करते लेकिन थोड़ा दबाव डालने पर वो अपनी बेहतरीन पारियों की सूची में दो-चार नाम और जोड़ देते हैं.

1976 में न्यूजीलैंड दौरे पर क्राइस्टचर्च टेस्ट की 83 और 79 रनों की पारियों को वो अपनी बेहतरीन पारियों में मानते हैं. तब उनके सामने हेडली और आरओ कोलिंज जैसे स्तरीय तेज गेंदबाज थे. हम इस टेस्ट को ड्रॉ कराने के साथ-साथ तीन मैचों की श्रंखला में 1-0 की बढ़त बनाने में भी कामयाब रहे,’ विश्वनाथ तहलका को बताते हैं.

उस मैच में विकेट पर टिके रहने में कामयाब रहे सैयद किरमानी याद करते हैं, ‘सन्नी 22 रन बना कर आउट हो चुके थे, वेंगी 16, ब्रजेश 8 और सुरिंदर अमरनाथ 11 रन बनाकर पैवेलियन में लौट चुके थे. अब सारा दबाव विशी के कंधों पर था. मुझे नहीं पता कि वो कितनी देर तक बैटिंग करते रहे. 178 मिनट का खेल बाकी था. लेकिन मोहिंदर के 45 रनों और मेरे 27 रनों की सहायता से उन्होंने जो 83 रन बनाए उसके सहारे भारत 270 रन बनाने में कामयाब रहा.

वो अद्भुत थे. उनके शॉट्स का कोई जवाब नहीं थाये भी विडंबना ही है कि खेल से जुड़े हर व्यक्ति ने कभी न कभी उनकी लंबाई को लेकर उन पर निशाना साधा. लेकिन विशी के बल्ले से निकलने वाले रनों की बाढ़ नें सभी विरोधियों का मुंह बंद करने के साथ ही पहले कर्नाटक और फिर राष्ट्रीय टीम में उनकी जगह पक्की कर दी.

उस समय मुख्य चयनकर्ता रहे मंसूर अली खान पटौदी ने एक बार मजाक में कहा, असल में कर्नाटक अकेले ही पूरी टीम बना सकता है.उन दिनों दक्षिण भारत का भारतीय क्रिकेट टीम में दबदबा हुआ करता था और अकेले कर्नाटक से उस वक्त टीम में छह खिलाड़ी हुआ करते थे- विश्वनाथ, बृजेश पटेल, आर. सुधाकर राव, बीएस चंद्रशेखर, सैयद किरमानी और ईएएस प्रसन्ना. कई मायनों में इसने भारतीय क्रिकेट के मक्का की मुंबई की छवि को खत्म कर दिया था. विशेषकर 1973-74 में कर्नाटक द्वारा पहली बार रणजी ट्रॉफी जीतने के बाद. हमने बेहतरीन क्रिकेट खेलीपूछने पर अपने खिलाड़ियों और अपने राज्य के बारे में विश्वनाथ बस इतना ही कहते हैं.

विशी के टीम के जोड़ीदार और मित्र बृजेश पटेल एक कदम और आगे जाकर कहते हैं, ‘विशी हम सभी से बेहतर था, कोई भी उससे बढ़िया नहीं था.उनकी शख्सियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब कर्नाटक सरकार ने राज्य का नाम रौशन करने वाली प्रतिभाओं पर एक किताब लिखवाई तो उसमें विश्वेस्वरैया, जनरल करियप्पा और थिम्मैया, प्रोफेसर हिरियन्ना और शांता राव जैसी महान हस्तियों के साथ गुंडप्पा विश्वनाथ को भी राज्य की महान विभूतियों में शामिल किया गया था.

विश्वनाथ के बारे में कहा जाता है कि उन्हें कभी कोई झुका-दबा नहीं सका, यहां तक कि आम बल्लेबाजों के दिलों में सुरसुरी दौड़ा देने वाली कैरेबियाई पेस चौकड़ी भी नहीं. उनकी लयबद्ध 112 रनों की पारी के सहारे ही भारत पोर्ट ऑफ स्पेन के ऐतिहासिक टेस्ट मैच में 403 रनों के रिकॉर्ड लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल कर 6 विकेट की एक संपूर्ण जीत अर्जित कर पाया था. सिर्फ साहस की बदौलत ही उनसे निपटा जा सकता थाविशी याद करके हंसते हैं कि कैसे उन समेत पांच भारतीय बल्लेबाज शॉर्ट गेंदों और बाउंसर से जख्मी होकर एक टेस्ट में खेल ही नहीं सके थे.

उन्होंने उन काले दिनों के दौरान हमारी नैया पार लगाई थीगायकवाड़ याद करते हैं. ये बेहद दुखद है कि टेलीविजन का युग शुरू होने से पहले ही उनका युग खत्म हो चुका था. कल्पना कीजिए 15 कैमरों के सामने उन्हें बल्लेबाजी करते देखना कितना सुखद होता.

गायकवाड़ की बात सोलह आने सही है. विशी को अपनी जादुई कलाइयों से अपना पसंदीदा   शॉट – स्क्वेयर कट – लगाते देखना वाकई एक अलग ही अनुभव होता जिसे सुनकर नहीं, देख कर ही महसूस किया जा सकता था.   

लोकल ट्रेन से लिमोजीन तक

पिछले साल इन दिनों तक फ्रेदा पिंटो मलाड स्टेशन पर लोकल ट्रेन में चढ़ने के लिए धक्का-मुक्की करने वाली अनगिनत गुमनाम लड़कियों में से एक हुआ करतीं थीं. हालांकि तब तक उन्होंने मॉडलिंग शुरू कर दी थी और वे एक ट्रैवेल शो में एंकर भी रह चुकीं थी इसलिए वे ये सफर फस्र्ट क्लास में किया करतीं थीं. मगर मुंबई में लोकल ट्रेन से चलने वाला हर शख्स जानता है कि इस डिब्बे में भीड़ का बर्ताव सेकेंड क्लास के डिब्बा गैंग से भी ज्यादा क्रूर हो सकता है.

जानी-मानी फैशन पत्रिका वोग ने ऑस्कर पुरस्कारों से पहले आयोजित होने वाली पार्टियों में फ्रेदा के परिधानों के आधार पर उन्हें दस सबसे ज्यादा स्टाइलिश हस्तियों में पहले नंबर पर रखा

तब शाम को फ्रेदा अपने ब्वाय फ्रेंड रोहन अंताओ के साथ लोकल कॉफी शॉप में फ्रेप (बर्फ और फलों के रस से तैयार एक पेय) का लुत्फ उठाया करतीं या फिर सप्ताहांत पर उनके साथ मनोरी आइलैंड पर कुछ रूमानी पल बिताया करतीं. इससे बचा फ्रेदा का ज्यादातर वक्त या तो सेंट जेवियर कॉलेज के वक्त के उनके दोस्तों के साथ घूमने-फिरने में बीतता या फिर घर – जहां वे मेंगलौर से ताल्लुक रखने वाले माता-पिता और बहन के साथ रहती हैं – के बाथरूम में लगे आइने के सामने अपने उच्चारण का अभ्यास करते हुए.

इसी दौरान उन्हें पता चला कि डैनी बोएल अपनी फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर की शूटिंग के लिए हिंदुस्तान आ रहे हैं और फिल्म की हीरोइन लतिका की भूमिका के लिए उन्हें एक अभिनेत्री की भी तलाश है. छह महीने तक चले ऑडिशन के बाद आखिरकार फ्रेदा को ये भूमिका मिल गई. अब उनका सारा वक्त निर्देशक डैनी बोएल और फिल्म में या फिल्म के लिए काम कर रहे लोगों के साथ बीतने लगा. इसके बाद क्या हुआ ये सभी जानते हैं. एक साल पहले तक लगभग गुमनाम फ्रेदा का नाम आज सभी की जुबान पर है. मलाड से लोकल ट्रेन में खड़े-खड़े काम पर जाने से लेकर लिमोजीन में बैठकर ऑस्कर के रेड कारपेट तक का उनका सफर किसी परीकथा से कम नहीं. फ्रेदा के स्टाइल की तारीफ आज हर कोई कर रहा है और आज उन्हें वोग, वेनिटी फेयर और एल जैसी दुनिया की सबसे बड़ी पत्रिकाओं के प्रमुख पन्नों पर देखा जा सकता है. उनका हेयर स्टाइल और कपड़े आज इतने लोकप्रिय हैं कि ब्रिटेन का चर्चित टेबलॉयड सन अपने पाठकों को टिप्स दे रहा है कि फ्रेदा जसा लुक किस तरह हासिल किया जाए.

जानी-मानी फैशन पत्रिका वोग ने ऑस्कर पुरस्कारों से पहले आयोजित होने वाली पार्टियों में फ्रेदा के परिधानों के आधार पर उन्हें दस सबसे ज्यादा स्टाइलिश हस्तियों में पहले नंबर पर रखा तो टाइम.कॉम ने ऑस्कर समारोह में पहनी उनकी ड्रेस को इस अवसर पर पहने गए सबसे खूबसूरत परिधानों में से एक बताया. उनके स्टाइलिस्ट जॉर्ज कोट्सिपोउलस के लिए ये फा की बात होगी और अब शायद ऐश्वर्या रॉय को भी उनके फोन नंबर की जरूरत हो.

लॉस एंजेल्स में आयोजित एक पार्टी में फ्रेदा ने जब जानी-मानी हॉलीवुड अभिनेत्री एंजेलीना जोली को पहली बार अपने सामने देखा – दूसरी बार जोली से वो ऑस्कर समारोह में मिलीं – तो उनके लिए ये किसी सपने जैसा था. फ्रेदा इतनी नर्वस हो गईं कि जोली से बात करने की हिम्मत तक नहीं जुटा सकीं. बाद में जब वो खाने में मशगूल थीं तो उन्होंने देखा कि जोली उनके ही पास आ रही हैं. एक इंटरव्यू के दौरान इस बारे में बताते हुए फ्रेदा कहती हैं, ‘इसे आप गलत टाइमिंग ही कह सकते हैं, मेरा मुंह पेस्ट्री से भरा हुआ था, तभी जोली मेरे पास आईं और कहने लगीं कि आपने बढ़िया काम किया.’ जोली ने फ्रेदा को सलाह दी कि वे कामयाबी के इन पलों का आनंद लें और अपने पांव जमीन पर ही रहने देने की कोशिश करें. भरे मुंह से किसी तरह बुदबुदाते हुए फ्रेदा ने जोली का शुक्रिया अदा किया.

सवाल उठता है कि उनका अगला मुकाम क्या होगा? क्या स्लमडॉग मिलियनेयर  का बुखार थमने के बाद फ्रेदा एक बार फिर से अपनी दुनिया में मस्त हो जाएंगी या फिर वे अपने लिए नए क्षितिज तलाशेंगीं? प्रशंसकों को उनके जवाब का इंतजार है.