Home Blog Page 216

असमंजस में बॉलीवुड

मम्मी ने अपनी सबसे बढ़िया सिल्क की साड़ी पहनी थी और उनके बालों का जूड़ा बहुत खूबसूरत लग रहा था. मैंने भी 1970 के दशक के फैशन से मेल खाते कपड़े पहने थे. मुझे ये तो याद नहीं कि वो दिन इतना खास क्यों था पर इतना याद है कि पापा उस दिन जल्दी घर आ गए थे. तैयार होकर हम सब उस सिनेमा हॉल पहुंचे थे जहां राजकपूर की फिल्म बॉबी लगी हुई थी. वैसे तो इसे लगे कई हफ्ते हो चुके थे मगर शो अब भी हाउसफुल जा रहा था.

फिल्म इंडस्ट्री में अब ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो कांटेट के मामले में जोखिम उठाने से झिझकते नहीं. ये बदलाव बड़े बजट वाली फिल्मों में भी दिख रहा है

सिनेमा का ये मेरा पहला अनुभव था. सैकड़ों लोगों और शोर-शराबे से भरी उस अंधेरी गुफा में मुझ जैसे किसी भी बच्चे को बेचैन हो जाना चाहिए था मगर अगले कुछ घंटों तक मेरी नजरें स्क्रीन से हिली तक नहीं. इस दौरान मेरे लिए सिनेमा के परदे पर आती तस्वीरों के अलावा किसी और चीज की कोई अहमियत नहीं थी. ऋषि कपूर के दर्द और डिंपल कपाड़िया की तड़प को मैं भी महसूस कर पा रही थी.

ये पहला मौका था जब मुझे अहसास हुआ कि दुनिया सिर्फ वही नहीं है जिसके केंद्र में मैं हूं बल्कि न जाने कितनी दूसरी दुनियाएं भी हैं जिनमें जिंदगी अनगिनत तरीके से खुद को जी रही है. हिंदी फिल्मों से मेरे जुनूनी लगाव की ये शुरुआत थी. मेरी किशोरावस्था के दौरान फिल्म इंडस्ट्री अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी. हालांकि तब भी फिल्मों के प्रति लोगों की दीवानगी कम नहीं हुई थी. उस दौर में वीडियो लाइब्रेरीज का बोलबाला था जहां फिल्मों के शौकीनों के लिए पायरेटेड वीडियो कैसेट्स किराए पर मिलते थे. मि. इंडिया  और परिंदा जैसी इक्का-दुक्का फिल्मों को छोड़ दिया जाए तो ये वो दौर था जब ज्यादातर फिल्मों को देखना एक बोझिल अनुभव हो जाता था. फिल्मउद्योग के बारे में माना जाता था कि इसमें लगा ज्यादातर पैसा अंडरवर्ल्ड का है और जो इसके हिसाब से नहीं चलता उसका अंजाम बुरा होता है.

अभिनेता, स्क्रिप्ट लेखक और निर्देशक सौरभ शुक्ला कहते हैं, ‘80 का दशक हिंदी सिनेमा का सबसे बुरा दौर था. मेरे हिसाब से ऐसा अपराध की दुनिया के साथ इसके रिश्ते की वजह से हुआ. जब माफिया इस धंधे में दाखिल हुए तो वैसी ही फिल्में बनीं जैसी वे देखना चाहते थे.’ शुक्ला ने रामगोपाल वर्मा की बहुचर्चित फिल्म सत्या में कल्लू मामा का चर्चित किरदार तो निभाया ही था, साथ ही उन्होंने अनुराग कश्यप के साथ मिलकर इस फिल्म की पटकथा भी लिखी थी. वे कहते हैं, ‘सत्या  ने कई सांचे तोड़े. इस पर आर्ट फिल्म का ठप्पा नहीं लगा और इसने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़ दिए. ये फिल्म मील का पत्थर थी.’

आज 60 फीसदी कारोबार मल्टीप्लेक्सेज के जरिए हो रहा है. वहां जाने वाले लोगों को दुनिया भर के सिनेमा की खबर रहती है और वे नियमित रूप से टीवी देखते रहते हैं

11 साल बाद आज आर्ट और कमर्शियल जैसे शब्द अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं. एक जमाना था जब हिंदी फिल्में फॉर्मूलों के हिसाब से बनती थी मगर अब वे फॉर्मूले किनारे रख दिए गए हैं. शुक्ला के शब्दों में ‘90 के दशक के मध्य में कॉरपोरेट्स इस धंधे में कूदे, पैसे का लेनदेन कानूनी तरीके से होने लगा और हमें इंडस्ट्री का दर्जा मिल गया.’ आज शुक्ला, कश्यप और रजत कपूर जैसे फिल्मकार ऐसी फिल्में बनाने में जुटे हैं जो कांटेंट के मामले में तो अलग हैं ही, साथ ही उनका बजट भी दूसरी फिल्मों की बनिस्बत कम है.

शुक्ला, जिनकी तीन कॉमेडी फिल्में जल्द ही रिलीज होने वाली हैं, कहते हैं, ‘रजत की भेजा फ्राई की रिकॉर्डतोड़ सफलता के बाद अब नई कहानियां सुनाना थोड़ा आसान हो गया है. भेजा फ्राई  ने अपार सफलता हासिल की और लोगों को लगा कि संभावनाएं दूसरी तरह के सिनेमा में भी हैं. मेरी फिल्म आई एम 24, 42 साल के एक व्यक्ति के बारे में है जो इंटरनेट पर एक लड़की को अपनी उम्र 24 साल बताता है. मेरी दूसरी फिल्म एक रात के रिश्ते पर आधारित है जिसमें आदमी को इस बारे में कुछ भी याद नहीं रहता कि रात को हुआ क्या था. मैंने पहले भी ये आइडिया कमर्शियल सिनेमा के कुछ बड़े नामों को दिया था मगर उनकी प्रतिक्रिया अच्छी नहीं रही. उनका मानना था कि ये भूमिकाएं हीरो के परंपरागत खांचों में कहीं भी फिट नहीं होती थीं.

जानकार मानते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री में अब ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो कांटेट के मामले में जोखिम उठाने से झिझकते नहीं. ये बदलाव बड़े बजट वाली फिल्मों में भी दिख रहा है जहां कहानी के मामले में नए प्रयोग देखने को मिल रहे हैं. चक दे इंडिया और दिल्ली 6 जैसी फिल्में इसका उदाहरण हैं.

जानकारों का ये भी कहना है कि अलग तरह की फिल्मों की सफलता में मल्टीप्लेक्सेज का भी योगदान रहा है. जैसा कि यूटीवी मोशन पिक्चर्स के सीईओ सिद्धार्थ रॉय कपूर कहते हैं, ‘आज 60 फीसदी कारोबार मल्टीप्लेक्सेज के जरिए हो रहा है. वहां जाने वाले लोगों को दुनिया भर के सिनेमा की खबर रहती है और वे नियमित रूप से टीवी देखते रहते हैं. यही वजह है कि उनका सामना इस तरह की चीजों से होता रहता है जिन्हें भारतीय सिनेमा के लिहाज से अपारंपरिक कहा जा सकता है.’

यूटीवी, इरोज, टीवी18, बिग और अष्टविनायक जैसे कॉरपोरेट्स के फिल्म उद्योग में आने का असर ये हुआ है कि फॉर्मूले की तर्ज पर फिल्में बनाने वाले लोगों के दिन लद चुके हैं. नतीजा ये हुआ है कि आरके फिल्म्स, मनमोहन देसाई की एमकेडीफिल्म्स और सुभाष घई की मुक्ता आर्ट्स का जलवा अब पहले जैसा नहीं रहा. अब वह जमाना भी नहीं रहा जब कभी-कभार एक तरफ तो अमर अकबर एंथनी जैसी बेमिसाल फिल्म बन जाती थी और उसी वक्त नागिन जैसी कोई उबाऊ फिल्म भी रिलीज हो रही होती थी. अब काम कॉरपोरेट शैली में होने लगा है जहां अनुशासन की अहमियत पहले से कहीं ज्यादा हो गई है.

दसविदानिया  के लिए भी आप दर्शक से 250 रुपए मांग रहे हैं और गजनी के लिए भी. ये ठीक बात नहीं है क्योंकि पहली फिल्म दो करोड़ में बनी है जबकि दूसरी के बनने में 50 करोड़ मेंरॉक ऑन और लक बाय चांस जैसी चर्चित फिल्मों के निर्माता एक्सेल फिल्म्स के रितेश सिधवानी कहते हैं, ‘अब आप सिर्फ ये नहीं सोच सकते कि ठीक है, मेरे पास ये कहानी है और मैं इस पर फिल्म बनाऊंगा. कुछ साल पहले तक आलम ये था कि डायलॉग्स और सीन्स भी शूटिंग के दिन ही लिखे जाते थे. अब हर अभिनेता आपसे स्क्रिप्ट मांगता है. इसीलिए पुराने फिल्मकार, जिन्हें इसकी आदत नहीं है, परेशानी महसूस कर रहे हैं. अब दर्शक कूड़ा हजम नहीं कर सकता. फिल्मों की सफलता अकेले उनके कांटेंट की मजबूती पर निर्भर करती है. रॉक ऑन के साथ यही हुआ! जनता कहानी में गहराई चाहती है. बड़ा मुद्दा यही है.’ ये बात अक्षय कुमार को शायद ठोकर खाकर समझ में आई. कहा जाता है कि निखिल आडवाणी की चांदनी चौक टू चाइना  के लिए अक्षय ने इस फिल्म से जुड़ा एक आकर्षक पोस्टर देखकर ही हां कर दी थी.

आईनॉक्स लेजर लिमिटेड में वाइस प्रेसीडेंट (प्रोग्रामिंग एंड डिस्ट्रीब्यूशन) उत्पल आचार्य भी इससे सहमत हैं कि आज कांटेंट की अहमियत सबसे ज्यादा है. वे कहते हैं, ‘अगर निर्माता अच्छे अभिनेता लेता है पर अच्छे कांटेंट की उपेक्षा करता है तो उसे नाकामयाबी ही मिलती है. टशन, चांदनी चौक टू चाइना, दिल्ली 6 और द्रोणा जैसी फिल्में इसका उदाहरण हैं.’ आचार्य के मुताबिक निर्माताओं-वितरकों और थियेटर मालिकों के बीच चल रहे टकराव की जड़ दरअसल वह अवास्तविक मेहनताना है जो स्टार्स को दिया जा रहा है. वे कहते हैं, ‘आर्थिक तेजी के वक्त जब सिंग इज किंग और वेलकम जैसी फिल्में हिट हुईं तो स्टार्स को मुंहमांगा पैसा मिलने लगा. अब यशराज फिल्म्स को छोड़कर सारे कॉरपोरेट्स शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं इसलिए उन्हें हर तिमाही अपने नतीजे घोषित करने होते हैं. इसके लिए उन्हें मजबूत कांटेंट की जरूरत होती है. उस समय हर कोई अक्षय कुमार या शाहरुख खान के पीछे भाग रहा था इसलिए उनकी कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ गईं. अगर फिल्म की लागत 50 करोड़ थी तो अकेले अभिनेता ही 35 करोड़ ले रहा था! अब वे ये पैसा थियेटर मालिकों से वसूलना चाहते हैं.’ आचार्य के मुताबिक इसका सबसे बढ़िया हल है निर्देशक या अभिनेता के मेहनताने को लाभ के साथ जोड़ देना.

हालांकि ऐसा करना इतना आसान नहीं है. आचार्य कहते हैं, ‘इंड्स्टी में एक ही अक्षय कुमार है और एक ही शाहरुख खान भी. अगर कोई प्रोड्यूसर कहे कि वह इतना पैसा नहीं दे सकता तो उनके लिए कोई समस्या नहीं होती. उन्हें पता है कि कोई दूसरा इतना पैसा दे ही देगा. मुझे नहीं लगता कि हॉलीवुड के सितारे इकट्ठा इतना पैसा लेते हैं. रंग दे बसंती के लिए आमिर खान ने नाममात्र का पैसा लिया था और इसके बाद उनका मेहनताना फिल्म के प्रदर्शन पर तय हुआ था. केवल वही एक स्टार हैं जो आखिर तक फिल्म के साथ रहते हैं और कांटेंट के प्रति बेहद गंभीर रहते हैं. जब फिल्म सफल हो जाती है तब जाकर वे अपने हिस्से के फायदे की मांग करते हैं.’ आचार्य के मुताबिक इन सब दबावों का ही नतीजा ये है कि पिछले दो साल में फिल्म इंडस्ट्री के कॉरपोरेट्स को कोई खास फायदा नहीं हुआ है. बल्कि कहा जाए तो वे बस किसी तरह खुद को नुकसान से बचा पा रहे हैं.

आदर्श स्थिति तो ये है कि बॉक्स ऑफिस यानी सिनेमाघरों में होने वाली कमाई निर्माताओं-वितरकों और थियेटर मालिकों में बराबर-बराबर बंटे. मगर तब विवाद इस बात पर फंस जाता है कि छोटे बजट वाली उन फिल्मों के मामले में आनुपातिक बंटवारा कैसे हो जिनकी अच्छी ओपनिंग की गारंटी नहीं होती. आचार्य कहते हैं, ‘जब आप कूड़ा बनाते हैं तो यही होता है. थियेटर मालिकों ने अपने न्यूनतम खर्चे तय कर दिए हैं. लाभ का बंटवारा तो तभी हो सकता है जब दर्शक फिल्म देखने आएं. बतौर प्रोड्यूसर आप अपना पैसा सैटेलाइट, ओवरसीज और म्यूजिक राइट्स के जरिए कमा सकते हैं. ज्यादा मामलों में छोटी फिल्में मार्केटिंग कवायदों की तरह होती हैं. मैं चल चला चल जैसी फिल्म देखने के लिए ढाई सौ रुपए खर्च नहीं करूंगा. कांटेंट सही मायने में अलग होना चाहिए. ऐसे में सारी मार थियेटर मालिक पर पड़ती है.’

जैसा कि संभावित था निर्माता-वितरक भी अपनी जिद पर अड़े हैं. रॉय कपूर कहते हैं, ‘हमें एक-दूसरे का सहारा बनने की जरूरत है. 50-50 की हिस्सेदारी सही हल है और हम उम्मीद कर रहे हैं कि थियेटर मालिक इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेंगे ताकि हम हर गुरुवार की रात को आपस में लड़ने की बजाय इंडस्ट्री के विस्तार के लिए मिलकर काम कर सकें.’

फिलहाल हालात इतने खराब हैं कि निर्माताओं-वितरकों ने अप्रैल से कोई भी फिल्म रिलीज न करने का फैसला किया है. मगर थियेटर मालिक भी अपने रुख से हटने को तैयार नहीं. रॉय कपूर कहते हैं, ‘वास्तव में देखा जाए तो परीक्षाओं और आईपीएल की वजह से अप्रैल में कुछ भी नहीं होगा. मई के बाद से ये मसला सुलझ जाएगा. मेरे हिसाब से ये फिल्म के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा. यदि ऐसा हो जाता है तो कांटेट की समस्या खुद ही सुलझ जाएगी.’ संबंधों में कितनी कड़वाहट आ गई है इसका उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि अक्सर तीसरा हफ्ता आते-आते फिल्में मल्टीप्लेक्सेज से उतार दी जाती हैं.  

हैडमेंड फिल्म्स के सुनील दोशी, जिनकी भेजा फ्राई के बनने में अहम भूमिका रही है, का मानना है कि इंडस्ट्री को अपनी सोच का दायरा बड़ा करने की जरूरत है. वे कहते हैं, ‘हालात पर गौर कीजिए, दसविदानिया  के लिए भी आप दर्शक से 250 रुपए मांग रहे हैं और गजनी के लिए भी. ये ठीक बात नहीं है क्योंकि पहली फिल्म दो करोड़ में बनी है जबकि दूसरी के बनने में 50 करोड़ की लागत आई है. उधर, टिकटों की कीमतों के मामले में भी आपने एक वर्ग को फिल्म देखने से पूरी तरह वंचित कर दिया है. फिलहाल हालात बहुत खराब हैं. यूरोप और अमेरिका की तरह हमें भी डेस्टिनेशन सिनेमाज की जरूरत है जहां कम कीमत पर छोटी फिल्में दिखाई जाएं.’ दोशी मानते हैं कि आजकल चल रहे इस टकराव की एक वजह ऐसे थियेटरों का अभाव भी है. कॉरपोरेट्स के फैलते दायरे को लेकर उनमें कोई उत्साह नजर नहीं आता. वे कहते हैं, ‘हिंदी फिल्म उद्योग में कॉरपोरेट्स के बढ़ते प्रभाव का नतीजा ये होगा कि अमेरिकी स्टूडियोज के लिए देश में घुसना आसान हो जाएगा और वे यहां की कंपनियों को खरीद लेंगे.’

दोषी का मानना है कि इंडस्ट्री को अपने काम के तरीके में निश्चित रूप से बदलाव लाने की जरूरत है. वे कहते हैं, ‘कई फिल्मों के डीवीडी और टेलीविजन पर रिलीज होने से हालात में बहुत से बदलाव आएंगे. हमारी फिल्मों की एडवरटाइजिंग और प्रोमोशन के तरीके को भी फिर से परिभाषित किए जाने की जरूरत है. बांबे, दिल्ली और सीपीसीआई जैसी पुरानी टेरिटरीज खत्म हो रही हैं. हमें नई टेरेटरीज पर ध्यान देने की जरूरत है जो काल सेंटर्स और आईटी उद्योग में काम करने वाले लोगों और स्कूल और कालेजों के छात्रों से मिलकर बनती हैं. हमें इस नए बाजार की तरफ ध्यान देना होगा.’

आज बॉलीवुड में हर तरह की फिल्में बन रही हैं. दर्शकों ने गजनी को भी पसंद किया है और इससे बिल्कुल अलग देव-डी को भी. पक्के तौर पर कोई भी नहीं कह सकता कि फिल्म-निर्माण की कौन सी शैली ज्यादा सफल रहेगी. न ही कोई ये बता सकता है कि मौजूदा विवाद में जीत निर्माता-वितरक गुट की होगी या थियेटर मालिकों की. मगर ये पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि हिंदी सिनेमा का जादू पहले की तरह ही लोगों के सिर चढ़कर बोलता रहेगा.

गावस्कर को शाहरुख की नसीहत

सुनील गावस्कर उन विरले खिलाड़ियों में से हैं जो पैसे का खेल खूब समझते हैं. लेकिन बॉलीवुड के सुपर स्टार शाहरुख खान ने उन्हें कहा कि बीसमबीस का खेल आप नहीं खेले हैं. यह नया खेल है. कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम खरीदने में मैंने खूब पैसा लगाया है. अगर इसे चलाने के तरीके से किसी को कोई समस्या है तो वह अपनी टीम खरीदे और उसे जैसा चाहे चलाए. मैं तो चलाने की कोशिश किए बिना इसे नहीं छोड़ूंगा.

गावस्कर न सिर्फ क्रिकेट इतिहास के सबसे महान ओपनर हैं बल्कि सब जानते हैं कि उनने इस खेल और इसके प्रशासन पर बहुत विचार किया है

अब बीसमबीस नया खेल है और गावस्कर इसे नहीं खेले हैं. ये दोनों ही बातें सही हैं. लेकिन शाहरुख खान तो न टैस्ट खेले हैं न वन डे न बीसमबीस. वे तो प्रथम श्रेणी का क्रिकेट भी नहीं खेले हैं. और उनकी टीम के कोच जॉन बुकानन ऑस्ट्रेलिया टीम के कोच जरूर रहे हैं लेकिन वे भी टैस्ट, वन डे और बीसमबीस नहीं खेले हैं. दरअसल बीसमबीस को अभी जुम्मा-जुम्मा सात दिन भी नहीं हुए हैं. इसलिए उस पर बड़े जानकार की तरह बात करने का अधिकार किसी को नहीं है.

जो भी बात कही जाएगी वह कुल क्रिकेट के अनुभव और ज्ञान पर ही होगी और इस हालत में दुनिया में कहीं भी शाहरुख खान और जॉन बुकानन की तुलना में सुनील गावस्कर की ही बात को ज्यादा अहमियत दी जाएगी. गावस्कर न सिर्फ क्रिकेट इतिहास के सबसे महान ओपनर हैं बल्कि सब जानते हैं कि उनने इस खेल और इसके प्रशासन पर बहुत विचार किया है. वे क्रिकेट के बहुत सम्मानित कमेंटेटर और बहुत पढ़े जाने वाले लेखक हैं.

शाहरुख खान भी इस बात को जानते हैं. लेकिन यह कि बीसमबीस नया खेल है और गावस्कर इसे खेले नहीं हैं जैसी बात वे इसलिए कह गए हैं कि वे नहीं चाहते कि कोलकाता नाइट राइडर्स में जो अनेक कप्तान बनाने का प्रस्ताव आया है उसे क्रिकेट की कसौटी पर परखा जाए. शाहरुख का कहना है कि इस टीम को खरीदने में मैंने बहुत पैसा लगाया है. इसे मैं कैसे चलाता हूं यह मेरी मर्जी है. अगर आपको मेरे इसे चलाने से कोई एतराज है तो मैं उसे नहीं मानूंगा. गावस्कर पैसे लगाएं टीम खरीदें और उसे जैसा चाहे चलाएं. मेरे चलाने में दखल न दें.

यानी गावस्कर साब बीसमबीस का आईपीएल नया खेल है. इसमें क्रिकेट के खेल की नहीं चलेगी. इसमें पैसे की चलेगी. इसमें पैसे की ही लाठी चलेगी और जिसकी लाठी चलेगी वही भैंस को हकाल ले जाएगा. मैं कोलकाता नाइट राइडर्स की भैंस को अपनी लाठी से हकालूंगा. इस लाठी और भैंस को मैंने खूब पैसा लगा कर खरीदा है. बीसमबीस का जो आईपीएल इस पखवाड़े दक्षिण अफ्रीका में शुरू हो रहा है उसका यही सत्य शाहरुख खान ने समझा है. जो जितना पैसा लगाता है वैसी ही उसकी समझ बनती है.

सुनील गावस्कर चूंकि जीवन भर क्रिकेट खेले हैं इसलिए अनेक कप्तान रखने के कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम के प्रस्ताव पर उनने एक क्रिकेट पंडित की तरह ही लिखा. टीम में यह प्रस्ताव जॉन बुकानन की तरफ से आया है जो कि टीम के कोच हैं. गावस्कर ने लिखा कि अनेक कप्तान प्रस्ताव पर विचार करना जॉन बुकानन को ऐसा महत्व देना है

गावस्कर की शिकायत यह है कि आईपीएल की टीमों के कोच और उनका सहायक स्टाफ सब ज्यादातर विदेशी हैं खास कर ऑस्ट्रेलियाई 

जिसके योग्य वे नहीं हैं. सब जानते हैं कि बुकानन विश्व विजेता ऑस्ट्रेलियाई टीम के कोच थे. लेकिन उन्हें कोई पूछता नहीं था. ऑस्ट्रेलिया में खेल और खिलाड़ी को जितना महत्व दिया जाता है कोच और उसके स्टाफ को नहीं मिलता. गावस्कर ने पूछा है कि कभी आपने वॉर्न, मेकग्रा या गिलक्रिस्ट को कहते सुना है कि हमने ऐसा इसलिए किया कि हमारे कोच ने करने को कहा था? गावस्कर ने यह भी कहा कि बुकानन अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों से वे उम्मीदें करने की खाते रहे जो उनसे खुद से प्रथम श्रेणी क्रिकेट में भी कभी बनी नहीं. बुकानन टैस्ट नहीं खेले हैं और इसलिए इयन चैपल जैसे पुराने कप्तान और महान लेग स्पिनर शेन वॉर्न उनकी बातों को यों ही खारिज कर देते थे. गावस्कर का कहना है कि उस ऑस्ट्रेलियाई टीम में ऐसे और इतने महान खिलाड़ी थे कि बुकानन जैसे कोच की उन्हें जरूरत ही नहीं पड़ती थी. बुकानन के क्रिकेट ज्ञान और ऑस्ट्रेलियाई टीम को उनके योगदान की जाहिर है कि गावस्कर कोई इज्जत नहीं करते. वे मानते हैं और उनने लिखा भी है कि बुकानन को भारतीय मीडिया और प्रशासक नाहक भाव दिए रहते हैं.

गावस्कर ने बुकानन के अनेक कप्तान प्रस्ताव को तो विचार के लायक भी नहीं माना है. लेकिन इसका मूल उनने बुकानन की इस कारगुजारी में माना है जिसमें उनने कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम के लिए एक सहायक कोच और सहायक कोच का भी एक सहायक नियुक्त कर लिया है. एक फील्डिंग कोच है, एक बॉलिंग कोच और शायद दो विकेटकीपरों के लिए भी एक कोच है. टीम को शारीरिक ट्रेनिंग दिलवाने के लिए दो ट्रेनर हैं जिनमें एक बुकानन का बेटा है. चौदह खिलाड़ियों की टीम के लिए इस तरह छह कोच और दो ट्रेनर हैं और गावस्कर का कहना है कि ये सब ज्यादातर बुकानन के राज्य क्वींसलैंड के हैं. टीम के मालिकों को अंदाजा भी नहीं है कि उन्हें किस तरह चूना लगाया जा रहा है – गावस्कर ने लिखा है. और यह बात शाहरुख खान को सबसे ज्यादा चुभी होगी क्योंकि इन छह कोचों और दो ट्रेनरों को पैसा तो वही देते हैं. इन अनेकों कोचों से ही क्या अनेक कप्तान का प्रस्ताव निकला है? गावस्कर ने पूछा है और मालिकों पर तरस खाया है.

गावस्कर की शिकायत यह है कि आईपीएल की टीमों के कोच और उनका सहायक स्टाफ सब ज्यादातर विदेशी हैं खास कर ऑस्ट्रेलियाई. अब आईपीएल भारतीय बोर्ड करवाता है और बोर्ड ही बंगलूर में नेशनल क्रिकेट अकादमी भी चलाता है. इस अकादमी से हर साल कई कोच और सहायक स्टाफ ट्रेनिंग ले कर निकलते हैं. इन्हें अगर भारतीय टीमों को कोच करने और टीमों की मदद करने का मौका नहीं मिलेगा तो वे जाएंगे कहां? इन्हें रख कर टीमों के मालिक न सिर्फ अपना पैसा बचा सकते हैं बल्कि भारतीय टीमों की मदद करने और उन्हें बेहतर करने का भी देसी प्रबंध कर सकते हैं. गावस्कर का मानना है कि हमारे टीम मालिक विदेशी के ग्लैमर के चक्कर में न तो खेल की ठीक से सेवा कर रहे हैं न भारतीयों को मौका दे रहे हैं. गावस्कर का यह भी मानना है कि बीसमबीस इतना तेज खेल है कि उसमें कोच और रणनीति की बहुत गुंजाइश ही नहीं है.

गावस्कर का यह लेख दरअसल अनेक कप्तान थ्योरी पर नहीं बुकानन की क्रिकेटीय क्षमता और शाहरुख खान के अपनी टीम को चलाने के तरीके पर है. इसलिए शाहरुख खान और बुकानन का बिदकना समझ जा सकता है. फिर भी शाहरुख का अपनी टीम का मालिक होने का अहंकार और पैसों के बल पर क्रिकेट खेलने के विचार और परंपराओं की कोई परवाह न करना क्रिकेटप्रेमियों को चेताने के लिए काफी होना चाहिए. गए साल भी बंगलूर के रॉयल चैलेंजर्स के मालिक विजय माल्या को शिकायत थी कि क्रिकेट के खेल में कप्तान की बहुत चलती है. वे अपने कप्तान राहुल द्रविड और उनकी बनवाई ‘टैस्ट टीम’ से बहुत दुखी थे. उनने टीम के सीईओ चारू शर्मा की छुट्टी की और राहुल द्रविड़ की आलोचना की. उनकी टीम चौदह में से सिर्फ चार मैच जीती दस में हारी और आठ टीमों में से सातवें नंबर पर रही. इस साल माल्या ने कोच और कप्तान दोनों बदल दिए हैं और सीधे टीम की कमान संभाल ली है.

कोलकाता नाइट राइडर्स में भी कप्तान नाम की संस्था पर ही सीधा हमला किया गया है. क्रिकेट में अब भी कप्तान ही टीम का मुखिया होता है वही सारे फैसले लेता है और उसी का आदेश चलता है. टैस्ट टीम हो या वन डे की या बीसमबीस की. सोच बुकानन के जरिए शाहरुख खान और उनके मार्केटिंग सलाहकार कप्तान को फुटबॉल और बेसबॉल का कप्तान बना देना चाहते हैं जो कोच और मालिक के निर्देशों को मैदान में अमल में लाता है. सौरभ गांगुली के साथ ऐसा बरताव वे कोलकाता में नहीं कर सकते थे इसलिए उनने प्रयोग दक्षिण अफ्रीका में करने का तय किया. वहां सौरभ गांगुली का वैसा समर्थन और दबदबा नहीं होगा जैसा कोलकाता में होता. फिर दक्षिण अफ्रीकी दर्शकों के सामने अलग-अलग कप्तान रखना और कोच को सबसे शक्तिशाली बना देने में टीम के स्थानीय समर्थन खोने का भी कोई खतरा नहीं होगा.

बुकानन क्रिकेट की परंपराओं से खेल करने को तैयार हैं क्योंकि उन्हें नाइट राइडर्स में जो पैसा, मौका और समर्थन मिला है दुनिया में कहीं और, और किसी दूसरी टीम में तो अब मिलेगा नहीं.

गए साल नाइट राइडर्स से कुछ बना नहीं था. ‘चक दे इंडिया’ फिल्म में उनने कोच का रोल किया था और भारत की महिला हॉकी टीम को विश्व कप दिला लाए थे. लेकिन अपना सारा जोर लगा कर भी शाहरुख खान अपनी टीम को सेमी फाइनल भी खेला नहीं पाए. इस साल वे बीसमबीस के नए खेल में अनेक कप्तान का प्रयोग करना चाहते हैं और चाहते हैं कि कोई जानकार, विशेषज्ञ, पंडित उनके प्रयोग में दखल न दे. यानी इस प्रयोग को क्रिकेट के खेल और उसकी परंपरा में न देखे. मैंने पैसे लगाए हैं और टीम को कमाऊ बनाने के लिए जो मुझे करना ठीक लगेगा करूंगा. ऐसा करने में क्रिकेट के कप्तान की संस्था से खिलवाड़ होती है तो हो. मैं क्रिकेट के खेल की गरिमा के लिए नहीं अपने पैसे से कमाई करने के धंधे में आया हूं. और कमाई के लिए मुझे जो भी प्रयोग करने होंगे करूंगा. शाहरुख खान ने यह संदेश गावस्कर और बाकी खिलाड़ियों को दे दिया है. आईपीएल क्रिकेट का धंधा है यह तो सब जानते थे. लेकिन इसमें पैसा क्रिकेट का यह भी करेगा शाहरुख ने बता दिया है.

आईपीएल में गावस्कर क्रिकेट के खेल और उसकी परंपराओं की चिंता न करें. मालिक और कोच खेल को कैसे चलाते हैं इसकी आलोचना करने का उन्हें अधिकार नहीं है. वे चाहें तो पैसा लगा कर टीम खरीदें और उसे चाहे जैसा चलाएं. इस खेल में पैसा ही सब कुछ लाएगा. बोल भी वही सकेगा जो पैसा लगाएगा. आईपीएल का यही खेल है. इसमें क्रिकेट पंडित गावस्कर की नहीं बॉलीवुड के अभिनेता शाहरुख खान की चलेगी. 

रण से जुदा नीति

आज तक किसी अमेरिकी राष्ट्रपति से दुनिया ने इतनी उम्मीदें नहीं पालीं जितनी बराक ओबामा से. ओबामा युवा हैं, उदारवादी हैं और आदर्शों में यकीन रखते हैं. अब तक उन्होंने जो भी कहा और किया है उससे लगता है कि तरह-तरह की उथल-पुथल से जूझ रही इस दुनिया में स्थिरता लौटेगी. ये काफी हद तक इस पर निर्भर करता है कि अपनी कोशिशों में वे कितने सफल हो पाते हैं.

अफगानिस्तान में पहले गुलबुद्दीन हिकमतयार और फिर तालिबान को भेजकर इस देश को जंग के मैदान में तब्दील करने वाली आईएसआई ही थी

मगर लगता है कि अफगानिस्तान, जहां से आतंक के खिलाफ अमेरिका की जंग शुरू हुई थी, में ओबामा नाकामयाबी की तरफ बढ़ रहे हैं. आतंक के खिलाफ युद्ध को लेकर 27 मार्च 2009 को उन्होंने जिस नई रणनीति का ऐलान किया था वह काफी हद तक उनके पूर्ववर्ती जॉर्ज डब्ल्यू बुश की नीति से मेल खाती है. यही वजह है कि इसका भी वही हश्र हो सकता है जो पिछली नीति का हुआ.

बुश की तरह ओबामा भी शिद्दत से ये मानते हैं कि अफगानिस्तान में चल रही लड़ाई तब तक नहीं जीती जा सकती जब तक पाकिस्तान, तालिबान और अलकायदा को उखाड़ फेंकने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध न हो इसलिए पाकिस्तान को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करना सबसे अहम है.

ओबामा प्रशासन पाकिस्तान के साथ लंबी सामरिक साझेदारी की संभावनाएं तलाश रहा है. इस साझेदारी की शर्त ये होगी कि पाकिस्तान अल कायदा के खिलाफ युद्ध और आंतरिक सुधारों के लिए अमेरिका को पूरा सहयोग देगा. मगर ओबामा ये भी जानते हैं कि पाकिस्तानी सेना को पाकिस्तान के भीतर ही तालिबान और अलकायदा से लड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. इसके लिए पहले उसे ये यकीन दिलाने की जरूरत होगी कि ऐसा करना उसके हित में है. यहीं पर ओबामा की रणनीति सबसे कमजोर लगती है.

एशिया सोसाइटी टास्क फोर्स, जिसमें रिचर्ड होलब्रुक और ओबामा के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जनरल जेम्स जॉन्स भी शामिल हैं, की एक हालिया रिपोर्ट कहती है,‘ये बात सही हो या गलत, मगर पाकिस्तान का सुरक्षा तंत्र ये मानता है कि इसके वजूद पर खतरा है और इस खतरे का सामना करने के लिए इसने जो व्यवस्था विकसित की है उसे खत्म करना तब तक बहुत मुश्किल है जब तक इसकी उस बुनियादी चिंता को दूर नहीं किया जाता – ये है पाकिस्तान के अस्तित्व और इसकी संप्रुभता को खतरा.’

इस उपाय की सरलता देखकर हैरानी होती है. कौन नहीं जानता कि अफगानिस्तान हो या कश्मीर, पिछले दो दशक में यहां जो भी आतंकी कार्रवाई हुई है उसे पाकिस्तानी सेना ने अपनी खुफिया एजेंसी आईएसआई के जरिए अंजाम दिया है. अफगानिस्तान में पहले गुलबुद्दीन हिकमतयार और फिर तालिबान को भेजकर इस देश को जंग के मैदान में तब्दील करने वाली आईएसआई ही थी. मुजफ्फराबाद में यूनाइटेड जिहाद काउंसिल को खाद-पानी देने वाली और इसके मुजाहिदीनों को कश्मीर भेजने के पीछे भी इसी खुफिया एजेंसी का हाथ रहा. लश्कर-ए-तैयबा को भी ये समर्थन देती रही है. अब टास्क फोर्स की रिपोर्ट की मानें तो ऐसा इसने सिर्फ इसलिए किया ताकि पाकिस्तान की सीमाएं सुरक्षित रहें. तो फिर इसका विस्मयकारी निष्कर्ष ये निकलता है कि अलकायदा के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तानी सेना अमेरिका का साथ देगी या नहीं ये अफगानिस्तान और भारत पर निर्भर करता है. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अमेरिका ये मान रहा है कि जो भी पाकिस्तानी सेना को चाहिए उसे दे दीजिए और वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पूरी तरह से उसके साथ होगी.

ओबामा को समझना होगा कि ऐसा नहीं होता कि आप एक हाथ से वार करें और दूसरे हाथ से दोस्त बनाने की कोशिश

बड़ी हैरानी की बात है कि टास्क फोर्स की रिपोर्ट में उन भावनाओं का कोई जिक्र नहीं है जिनसे पाकिस्तानी अखबार भरे पड़े हैं. न्यूयार्क टाइम्स ने भी छह अप्रैल को लिखा कि सभी पाकिस्तानी अब भी मानते हैं कि ये उनकी लड़ाई नहीं है और इसमें अपनी सेना को झोंकना अपने भाइयों की हत्या करने जैसा होगा. टास्क फोर्स की रिपोर्ट में कहीं इसका जिक्र नहीं कि पाकिस्तानी सेना का एक बड़ा हिस्सा भी इस बात से इत्तफाक रखता है. इसलिए रिपोर्ट ये नहीं बता पाती कि अगर क्षेत्रीय संप्रभुता को बनाए रखना ही पाकिस्तानी सेना का एकमात्र लक्ष्य है तो फिर क्यों ये भारतीय सीमा पर तैनात 18 डिविजंस और 20 ब्रिगेड्स में एक को भी हटाने से लगातार इंकार करती रही है और क्यों अफगानिस्तान सीमा पर इसने सिर्फ दो डिविजंस तैनात की हैं. न ही रिपोर्ट ये बता पाती है कि 2007-08 में जब पाकिस्तान में चल रहा गृहयुद्ध दिनों-दिन और भी वीभत्स रूप अख्तियार कर रहा था और नियंत्रण रेखा पर भारत की तरफ से कोई खतरा नहीं था तो भी पाकिस्तान ने वहां तैनात तीन इंफैंट्री डिविजंस और पांच इंफैंट्री ब्रिगेड्स में से किसी को भी हटाकर अफगानिस्तान सीमा पर तैनात नहीं किया.

दरअसल सच्चाई ये है कि भारत से खतरे का हौव्वा सिर्फ इसलिए खड़ा किया गया है कि इसकी आड़ में तालिबान से लड़ने की अनिच्छा को छिपाया जा सके. दरअसल पाकिस्तानी सेना तालिबान से मुकाबला नहीं करना चाहती क्योंकि उसे ये भरोसा नहीं है कि वह इस लड़ाई में जीत जाएगी. इसकी सीधी सी वजह ये हो सकती है कि सूदूर कबायली इलाकों में तालिबान आदिम तरीकों से लड़ रहे हैं जिनमें आम नागरिकों को बलि का बकरा बनाया जाता है. वे छोटी सी बात पर भी लोगों की हत्या कर देते हैं. फिर लोग सरकार से मदद की गुहार लगाते हैं मगर सरकार उन्हें सुरक्षा नहीं दे पाती. ऐसा इसलिए क्योंकि सुरक्षा बल हर समय हर जगह मौजूद नहीं हो सकते. हताशा में लोग या तो उस जगह से भाग जाते हैं या फिर तालिबान की हुकूमत स्वीकार कर लेते हैं. किसी जगह पर अपना नियंत्रण स्थापित करने का ये सबसे पुराना तरीका है.

इस लड़ाई में पाकिस्तानी सेना को जीत तभी मिल सकती है जब वह आम लोगों को सुरक्षा दे सके. मगर वह जानती है कि उसके पास सैनिक इतनी संख्या में नहीं हैं कि वे पूरे इलाके में फैलकर एक ऐसा माहौल तैयार कर सकें जिसमें आम आदमी बिना डर के जी सके. यही वजह है कि तालिबान को लेकर उसने दोहरा रुख अपना रखा है. उसे पता है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान में शांति की पहली शर्त ये है कि अफगानिस्तान में उदार तालिबान को मुख्य धारा में शामिल करने के लिए कोई राजनीतिक समझौता हो जाए. मगर ओबामा के आने से पहले अमेरिकी प्रशासन में कोई ये बात सुनने के लिए तैयार नहीं था.

पाकिस्तान जानता है कि उसके पास अपनी मर्जी से लड़ाई से पीछे हटने का कोई विकल्प नहीं है. इधर कुआं उधर खाई वाली हालत में इसके पास एक ही विकल्प बचता था और वह था भारत को किसी सैन्य कार्रवाई के लिए उकसाना. पिछले साल काबुल में भारतीय दूतावास और फिर मुंबई पर हुआ हमला इसी की कोशिश थी.

शायद ओबामा भी ये समझने लगे हैं. इसलिए अब वे कट्टर तालिबान को अलग-थलग करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. मगर किसी राजनीतिक हल की उनकी रणनीति दिशाहीन लगती है. ओबामा को समझना होगा कि ऐसा नहीं होता कि आप एक हाथ से वार करें और दूसरे हाथ से दोस्त बनाने की कोशिश. इस मुद्दे के हल के लिए सिर्फ अफगानिस्तान और पाकिस्तान को शामिल करना और अफगानिस्तान के दूसरे पड़ोसियों की उपेक्षा करने से काम नहीं चलने वाला.

जरूरत इस बात की है कि नया राजनीतिक समझौता बनाने की जिम्मेदारी किसी ऐसे तीसरे पक्ष को सौंपी जाए जो लड़ाई में शामिल न हो. जैसा कि हेग में पिछले महीने हुई संयुक्त राष्ट्र की बैठक में ईरान के विदेश मंत्री ने संकेत दिया भी था कि लड़ रहे गुटों को इस बात का भरोसा दिया जाए कि अगर वे अपने मतभेद भुला दें और एक व्यावहारिक संविधान बनाकर सरकार चलाने लगें तो विदेशी फौजें वहां से चली जाएंगी. ईरान और उजबेकिस्तान के साथ पाकिस्तान की भी इस समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए. मगर यदि पाकिस्तान तालिबान से लड़ने लगा तो वह ये अधिकार खो देगा.

सैन्य कार्रवाई तेज किए जाने से पहले राजनीतिक समझौते की पेशकश होनी चाहिए. आदर्श यही रहेगा कि इस समझौते की रूप रेखा अफगानिस्तान के पड़ोसी और भारत से मिलकर बना क्षेत्रीय गुट बनाए. पाकिस्तान भारत को इस मामले में शामिल किए जाने का तीखा विरोध करता है. मगर ओबामा प्रशासन को ये समझना होगा कि अगर शांति प्रक्रिया से भारत को बाहर रखा जाता है तो अफगानिस्तान में कोई शांति समझौता होना मुमकिन नहीं है. इसकी वजह ये है कि ऐसा करने से पाकिस्तानी सेना को पश्चिमी सीमा पर अल कायदा और तालिबान से समझौता कर शांति बहाल करवाने और इसके बदले में पूर्वी सीमा पर जिहाद जारी रखने में उनकी मदद करने का मौका मिल जाएगा. अगर भारत पर हमले जारी रहते हैं तो वह पाकिस्तान में चल रहे आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई करने के लिए मजबूर हो जाएगा. इसका हवाला देकर पाकिस्तानी सेना भारतीय सीमा से एक भी सैनिक नहीं हटाएगी. इस तरह से ओबामा की नई रणनीति अपने मूल में ही असफल हो जाएगी.

प्रेम शंकर झा

वरिष्ठ पत्रकार 

एक और ओसामा का उदय

कहा जाता है कि गुरिल्ला लड़ाई में उसका कोई सानी नहीं. उसके पास न सिर्फ कैलेश्निकोव से लैस अनुशासित लड़ाके हैं बल्कि ऐसे समर्पित आत्मघाती हमलावर भी हैं जो उसके एक इशारे पर अपने शरीर को मानव मिसाइल बनाने के लिए तैयार रहते हैं. पाकिस्तान के नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस के हिस्से वजीरिस्तान में पले-बढ़े इस शख्स का नाम आज पूरी दुनिया में कुख्यात हो चुका है. ये शख्स है बैतुल्ला महसूद जिसे नया ओसामा भी कहा जा रहा है.

आखिर कौन ये ये बैतुल्ला और आखिर क्यों उसकी उस शख्स से तुलना की जा रही है जिसने आठ साल पहले अमेरिका पर हमला कर सारी दुनिया को स्तब्ध कर दिया था?

करीब 35 साल के बैतुल्ला ने जिस तरह पाकिस्तान में एक के बाद एक आतंकी हमले करवाए हैं वह बताता है कि उसके पास कितनी ताकत है. अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी भी ये बात मानती है. टाइम मैगजीन ने दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली नेताओं और क्रांतिकारियों की जो सूची बनाई है उसमें बैतुल्ला का भी नाम है. एक दूसरी मशहूर मैगजीन न्यूजवीक ने उसे ओसामा से भी ज्यादा खतरनाक करार दिया है. हाल ही में अमेरिकी विदेश विभाग ने तहरीक-ए-तालिबान के इस बड़े नेता पर पचास लाख डॉलर का ईनाम घोषित किया है. यूएस ब्यूरो ऑफ पब्लिक अफेयर्स में कहा गया है,‘महसूद को पाकिस्तान में दक्षिण वजीरिस्तान के कबायली इलाकों में अल कायदा के अहम मददगारों में से एक माना जाता है. पाकिस्तानी अधिकारी मानते हैं कि जनवरी 2007 में इस्लामाबाद के मैरिएट होटल पर आत्मघाती हमला करने वाले लोग भी बैतुल्ला के लोग थे. पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या के पीछे भी उसका हाथ बताया जाता है. इसके अलावा बैतुल्ला अमेरिका पर हमला करने की बात भी कह चुका है. उसने सीमापार से अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों पर हमले करवाए हैं और इस क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों और हितों के लिए वह खतरा है.

पचास लाख डॉलर छोटी रकम नहीं होती. बैतुल्ला भी छोटा आदमी नहीं है. पाकिस्तान का ओसामा कहे जाने वाले इस शख्स पर घोषित ईनाम अलकायदा के मुखिया जितना ही है. पेशावर में बिकने वाली माचिसों पर ओसामा की तस्वीर छपी होती है और उर्दू में ये लिखा होता है कि अमेरिकी सरकार ओसामा का पता बताने वाले को 50 लाख डॉलर देगी.

आखिर कौन ये ये बैतुल्ला और आखिर क्यों उसकी उस शख्स से तुलना की जा रही है जिसने आठ साल पहले अमेरिका पर हमला कर सारी दुनिया को स्तब्ध कर दिया था? बैतुल्ला की निजी जिंदगी के बारे में ज्यादा कुछ आज भी पता नहीं है. जो थोड़ी-बहुत जानकारियां मिलती हैं उनसे पता चलता है कि वह कुछ समय के लिए एक जिम में इंस्ट्रक्टर रहा. ये भी कहा जाता है कि उसे डायबिटीज है और वह पब्लिसिटी पसंद नहीं करता. शायद यही वजह है कि उसके एकाध फोटो ही उपलब्ध हो पाते हैं.

मगर उसकी आतंकी गतिविधियों के बारे में जानकारियों की कोई कमी नहीं. बैतुल्ला 9/11 के बाद फरार आतंकी मुल्ला उमर से काफी प्रभावित था. जिहाद का रास्ता उसने तब चुना जब अमेरिका ने आतंक के खिलाफ अपनी लड़ाई छेड़ी और इसमें पाकिस्तान भी उसके साथ हो गया. जब जॉर्ज बुश ने मुशर्रफ से कहा कि आप या तो हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ तो घबराए मुशर्रफ ने तुरंत अफगानिस्तान और तालिबान को लेकर अपनी नीति से यू टर्न ले लिया. अब पाकिस्तान उसी तालिबान से लड़ रहा था जिसे कभी उसने ही जन्म दिया था. मुशर्रफ के इस कदम से अपने देश में उनकी लोकप्रियता गिरती चली गई और आखिरकार उन्हें गद्दी छोड़नी पड़ी. यही वह वक्त था जब बैतुल्ला ने दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा.

बैतुल्ला को मिलने वाले मजबूत समर्थन की वजह ये भी है कि वह जिस कबीले से ताल्लुक रखता है वह दक्षिणी और उत्तरी वजीरिस्तान की कुल आबादी के 70 फीसदी हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है 

बैतुल्ला का ताल्लुक दक्षिणी वजीरिस्तान से है. ये हिस्सा 1980 के जमाने से ही आतंकियों का अहम सप्लाई रूट रहा है जब वे सोवियत फौजों का मुकाबला करने के लिए यहां से अफगानिस्तान की सीमा में दाखिल होते थे. बैतुल्ला को मिलने वाले मजबूत समर्थन की वजह ये भी है कि वह जिस कबीले से ताल्लुक रखता है वह दक्षिणी और उत्तरी वजीरिस्तान की कुल आबादी के 70 फीसदी हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है.

कबीलाई वफादारी के अलावा बैतुल्ला ब्रांड जिहाद के कुछ और पहलू भी हैं. तालिबान का जनक कहे जाने वाले पूर्व आईएसआई मुखिया हामिद गुल कहते हैं, ‘9/11 से पहले तक उसे कोई नहीं जानता था मगर अब वह किसी विश्व स्तर के कमांडो जैसा लगता है जिसमें वे क्षमताएं भी हैं जो कबीलों के लड़ाकों में होती हैं. वह पश्तून है और पश्तूनों की जिंदगी में अपना सम्मान कायम रखने के लिए बदले का बड़ा महत्व होता है. वह बदले की भावना को आधार बनाकर अफगानिस्तान में मौजूद अमेरिकी फौजों से लड़ रहा है. पश्तून हमलावरों के लिए बहुत क्रूर साबित होते हैं.’

पाकिस्तानी पत्रकारों के मुताबिक बैतुल्ला ने औपचारिक तौर पर पढ़ाई नहीं की और उसकी शिक्षा-दीक्षा मदरसे में ही हुई जहां वह तालिबान की विचारधारा से प्रेरित हुआ. इस्लाम की तालिबानी व्याख्या का उस पर बहुत गहरा असर पड़ा. ये उसके द्वारा दिए गए कई साक्षात्कारों से साफ हो जाता है. वह अक्सर कहता है, ‘पवित्र कुरान में 480 मौकों पर अल्लाह ने मुसलमानों से जिहाद छेड़ने को कहा है. हम सिर्फ अल्लाह के आदेश का पालन करते हैं. सिर्फ जिहाद ही दुनिया में अमन कायम कर सकता है.’

सवाल उठता है कि सभी तालिब तो यही पढ़ते हुए बड़े होते हैं तो फिर बैतुल्ला में ऐसा क्या खास था कि बराक ओबामा की टीम आज उस पर ध्यान देने को मजबूर हो गई है. जवाब है कि वह राजनीति और रणनीति में भी माहिर है. स्थानीय होने की वजह से वह इस क्षेत्र अच्छी तरह वाकिफ है. पाकिस्तान स्थित एक रणनीतिक विश्लेषक ले. जनरल(सेवानिवृत्त) तलत मसूद कहते हैं, ‘उसमें नेतृत्व के गुण हैं. अमेरिकी मौजूदगी ने राष्ट्रवादी भावनाओं का एक ज्वार उमड़ा है और बैतुल्ला इस मौजूदगी के विरोध का एक लोकप्रिय चेहरा बन गया है. ड्रोन हमलों का पाकिस्तानियों की भावनाओं पर काफी बुरा असर पड़ा है.’

बैतुल्ला ने इन भावनाओं को भुनाया. अब वह न सिर्फ अमेरिकी और नाटो फौजों के खिलाफ हमलों की अगुवाई कर रहा है बल्कि पाकिस्तान के लिए ही सबसे बड़ा खतरा बन गया है. वह कहता है कि अगर अमेरिका के पास हवाई ताकत है तो हमारे पास फिदायीन हैं. हाल ही में उसने एक नाटकीय चेतावनी दे डाली कि पाकिस्तान में हर हफ्ते दो हमले होंगे. ऐसे कई उदाहरण हैं जो बताते हैं कि उसके पास समर्पित कैडर और पर्याप्त संख्या में फिदायीन हैं. कुछ समय पहले लाहौर स्थित पुलिस अकादमी पर हुए हमले में 20 लोगों की मौत और 100 अन्य के घायल होने के बाद आंतरिक मामलों में प्रधानमंत्री के सलाहकार रहमान मलिक ने जब कहा कि बैतुल्ला पांच से 15 लाख रुपए देकर आत्मघाती हमलावरों को भर्ती कर रहा है तो हर कोई चौंका था.

तहरीक-ए-तालिबान का औपचारिक मुखिया बनने के बाद बैतुल्ला अब सिर्फ पाकिस्तान की ही चिंता नहीं है जो धीरे-धीरे अराजकता की तरफ बढ़ रहा है

बैतुल्ला का जिहाद का सफर शरीया लागू करने की कोशिश से शुरू हुआ था. इसके बाद उसने अलकायदा से लड़ रही अमेरिका की अगुवाई वाली पश्चिमी फौजों से मुकाबला करने के लिए अपने लड़ाकों को वजीरिस्तान से अफगानिस्तान भेजा और आज वह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का नेतृत्व कर रहा है. अगर दक्षिण एशिया में अब भारत-पाकिस्तान की जगह अफगानिस्तान-पाकिस्तान की बात हो रही है तो इसके लिए बैतुल्ला और उसके करीब 18,000 लड़ाके जिम्मेदार हैं. विडंबना देखिए कि पाकिस्तानी तालिबान की औपचारिक स्थापना दिसंबर 2007 यानी सिर्फ डेढ़ साल पहले ही हुई थी.

मगर तहरीक-ए-तालिबान का जन्म होने से पहले ही बैतुल्ला की तूती बोलने लगी थी. सेना के दबाव में नॉर्थवेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस की सरकार ने कई ऐसे शांति समझौते किए जिनमें दूसरे पक्ष की तरफ से बैतुल्ला की अहम भूमिका थी. वह इन समझौतों के लिए सौदेबाजी करता था और इन पर उसके दस्तखत भी होते थे. वजीरिस्तान में अलकायदा के सदस्यों को शरण देने के लिए वांछित बैतुल्ला ने 2005 में सरकार के साथ एक समझौते पर दस्तखत किए. इस समझौते में उसने वादा किया था कि न वह अलकायदा को शरण देगा और न ही पाकिस्तानी सेना के खिलाफ अभियान चलाएगा. सरकार, बैतुल्ला के साथ समझौता कर रही थी इस बात ने ही उसे इस कबायली इलाके का अगुवा नेता बना दिया. जैसा कि हामिद गुल कहते हैं, ‘मसूद का रसूख बढ़ गया क्योंकि कबायली इलाके में उसे एक ऐसे शख्स के तौर पर देखा जाने लगा जो सरकार जितनी ही हैसियत रखता था.’

मगर बैतुल्ला ने अपना वादा नहीं निभाया. दरअसल देखा जाए तो इस तरह के शांति समझौतों का इस्तेमाल वह अपने फायदे के लिए करता था. समझौते के बाद उसे ढील मिल जाती थी और वह अपनी ताकत बढ़ा लेता था.

बैतुल्ला के उत्थान का मुशर्रफ की खुल्लमखुल्ला अमेरिकापरस्ती से गहरा संबंध है. इस्लामाबाद की लाल मस्जिद पर सेना की कार्रवाई के बाद मुशर्रफ अपने ही लोगों के बीच अलग-थलग पड़ गए. यही वह वक्त था जब बैतुल्ला ने अपना कुछ ध्यान अफगानिस्तान से हटाकर पाकिस्तानी सरकार की तरफ केंद्रित किया. जून 2007 में लाल मस्जिद पर सैन्य कार्रवाई हुई थी. इसका बदला लेने के लिए दो महीने के भीतर ही बैतुल्ला ने दक्षिण वजीरिस्तान में करीब ढाई सौ पाकिस्तानी सैनिकों को बंधक बना लिया. समझौता बैतुल्ला की शर्तों पर हुआ और पाक सरकार को सैनिकों के एवज में उन 25 आतंकियों को छोड़ना पड़ा जो मुशर्रफ के ही शब्दों में प्रशिक्षित आत्मघाती हमलावर थे. मुशर्रफ के लिए ये काफी बड़ी शर्मिंदगी थी. इसके बाद दिसंबर 2007 में आयोजित पाकिस्तानी तालिबान की बैठक में बैतुल्ला का मुखिया चुना जाना सिर्फ औपचारिकता ही रह गया था. इस बैठक में बैतुल्ला ने एक बार फिर अपने एजेंडे को जोरदार तरीके से सामने रखा. ये एजेंडा था अफगानिस्तान से गठबंधन सेनाओं को खदेड़ना. एक आंख पाकिस्तान पर रखते हुए उसने ये भी मांग की कि लाल मस्जिद के मौलवी सहित सभी कैदियों को छोड़ दिया जाए. उसकी ये भी मांग थी कि पाकिस्तानी सेना स्वात घाटी से हट जाए जिसे कभी पाकिस्तान का स्विटजरलैंड कहा जाता था.

आईएसआई के रिटायर्ड अधिकारी पाकिस्तानी तालिबान की मदद कर रहे हैं और वे लश्कर से बड़े लश्कर बन गए हैं.तहरीक-ए-तालिबान का औपचारिक मुखिया बनने के बाद बैतुल्ला अब सिर्फ पाकिस्तान की ही चिंता नहीं है जो धीरे-धीरे अराजकता की तरफ बढ़ रहा है. पूर्व अमेरिकी विदेशमंत्री मैडलिन अलब्राइट के शब्दों में कहें तो बैतुल्ला आज सबसे भयंकर अंतर्राष्ट्रीय सिरदर्द है. 2007 में जारी हुई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि अफगानिस्तान में होने वाले आत्मघाती हमलों में से 80 फीसदी के पीछे बैतुल्ला का हाथ होता है. बैतुल्ला से जुड़ी कई बातें बड़ी चर्चित हैं. मसलन कहा जाता है कि पत्थरों या कोड़ों से पिटाई कर मौत की सजा सुनाना उसके लिए आम है. उसके राज में संगीत, टीवी और फोटोग्राफी पर प्रतिबंध है. इतना ही नहीं लोगों के मुताबिक सरकारी जासूसों को वह एक सुई और धागा भिजवाकर वह उन्हें 24 घंटे का नोटिस देता है ताकि वे अपने कफन का बंदोबस्त कर सकें.

पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा खतरा ये है कि वहां की सेना में ही बैतुल्ला के लिए बहुत ज्यादा सहानुभूति है. गुल इसके पीछे की वजह ये बताते हैं कि पश्तून पाकिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा समुदाय हैं. इसका मतलब ये है कि कहीं न कहीं पाकिस्तानी सेना न सिर्फ बैतुल्ला का समर्थन करती है बल्कि वह अपने लोगों से लड़ना भी नहीं चाहती. 2005 के विफल शांति समझौते के बाद बैतुल्ला और उसके लड़ाकों ने सेना को दक्षिणी वजीरिस्तान से लगभग बाहर खदेड़ दिया है. तालिबान पर किताब लिखने वाले सामरिक विशेषज्ञ अहमद राशिद कहते हैं, ‘आईएसआई के रिटायर्ड अधिकारी पाकिस्तानी तालिबान की मदद कर रहे हैं और वे लश्कर से बड़े लश्कर बन गए हैं.’ यहां तक कि आईएसआई के वर्तमान मुखिया भी पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में बैतुल्ला को देशभक्त पाकिस्तानी बताते हैं.

साफ है कि बैतुल्ला का तालिबान पाकिस्तान के लिए बड़ा खतरा है. उधर, जरदारी के नेतृत्व वाली पीपीपी की सरकार अपना साल भर पूरा करने के बावजूद आतंकवाद से ठीक से निपटने में विफल रही है. तलत मसूद कहते हैं, ‘कई सरकारें मैसूद से बात कर चुकी हैं मगर बात नहीं बनी. सरकार को इस दिशा में मजबूती दिखाने की जरूरत है मगर समस्या ये है कि हमारा नेतृत्व बहुत कमजोर है. सैन्य शासन ने संस्थाओं ने लोकतंत्र को मजूबत बनाने वाली संस्थाओं को पंगु बनाया और अब जिहादी सरकार को पंगु बना रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय नीति निर्माता भी बहुत मददगार साबित नहीं हो रहे क्योंकि वे आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए पाकिस्तान पर कुछ ज्यादा ही दबाव डाल रहे हैं.’ साफ है कि अमेरिका द्वारा छेड़ी गई ये लड़ाई, जो अब ओबामा के एजेंडे में सबसे ऊपर है, पाकिस्तान में कट्टरपंथ की आग को हवा दे रही है. तहलका को दिए गए विशेष साक्षात्कार में पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ कहते हैं, ‘ड्रोन हमले तुरंत बंद होने चाहिए’ (देखें इंटरव्यू).

अगर पाकिस्तान में किसी बात पर सहमति है तो वह बात ये है कि किस तरह इसका अमेरिका को समर्थन अब देश को भीतर से ढहता जा रहा है. मसूद कहते हैं, ‘पाकिस्तान कभी भी इतना संवेदनशील नहीं लगा था.’ अमेरिका की लड़ाई लड़ता पाकिस्तान अब अपने आप को खुद के साथ लड़ता पा रहा है. हल क्या हो इस पर हामिद गुल कहते हैं, ‘हमें अपनी अमेरिकापरस्त नीति को बदलना होगा.’

पाकिस्तान में ज्यादातर लोग उनसे इत्तफाक रखते होंगे और यही वजह भी रही कि लोगों ने मुशर्रफ को सत्ता से उखाड़ फेंका. अब और भी अहम सवाल ये है कि क्या जरदारी या कोई लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री (या फिर तानाशाह ही सही), इतने बड़े नीतिगत बदलाव को झेल पाएगा?

सरकार इस नीति को लागू नहीं कर सकती. ये सच से मुंह चुराने की आदत हो, दुनिया की महाशक्ति के खिलाफ न जा सकने की मजबूरी या इच्छाशक्ति की कमी, यही बैतुल्ला मैसूद के वजूद को ताकत देती है. रही उसकी बात तो उसके पास तो इच्छाशक्ति भी है और आत्मघाती दस्ते भी. 

बहस पर बहस

कुछ दिन पहले राजग के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी ने कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मनमोहन सिंह को कमोर बताते हुए अमेरिकी स्टाइल में टीवी पर डिबेट के लिए ललकारा. सामने से इस मांग को तो नकारा गया ही, आडवाणी पर भी कुछ इल्जाम ठोंक दिए गए. आडवाणी ने जवाब में सुझाव दे डाला कि यदि मनमोहन ऐसा करने में अक्षम हैं तो जिसके पास असली ताकत है वो बहस कर ले. इसके बाद दोनों तरफ से न जाने क्या-क्या कहा गया. प्रधानमंत्री भी आडवाणी पर एक के बाद एक प्रहार किए जा रहे हैं. मजे की बात ये है कि हो ये सब टीवी पर ही रहा है मगर आमने सामने की बहस के लिए न तो प्रधानमंत्री तैयार हैं और न ही उनकी पार्टी.

अमेरिकी बहसों के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि कई बार बहुत नजदीक वाले चुनावों को इस या उस पार करने में टीवी बहसों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है

देश में शायद ही कोई ऐसा हो जो ऐसी बहस होते नहीं देखना चाहेगा. मगर इसमें अमेरिका का उदाहरण देने की क्या तुक है! भारत और अमेरिका दोनों भले ही लोकतंत्र हो किंतु इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर हैं. अमेरिका में राष्ट्रपति शासन प्रणाली है और वहां का संविधान राजनीतिक दलों की तो बात ही नहीं करता. यानी कि आदर्श स्थिति में वहां कहीं से भी राष्ट्रपति के उम्मीदवार निकल कर आ सकते हैं और उनके बारे में पहले से ज्यादा पता न होने की स्थिति में वो कैसे हैं, जानने का टीवी पर बहस एक अच्छा जरिया हो सकती है. मगर व्यावहारिक रूप में वहां एक बेहद मजबूत दो-पार्टी-तंत्र – डेमोक्रेट और रिपब्लिकन – विकसित हो चुका है. किंतु दोनों की नीतियों और योजनाओं में कोई खास अंतर तो है नहीं. तो ऐसे में जीत काफी-कुछ उम्मीदवारों के निजी व्यक्तित्व, सोच आदि पर भी निर्भर करती है. इसके अलावा चूंकि अमेरिका में कोई भी व्यक्ति अधिकतम दो बार ही राष्ट्रपति बन सकता है इसलिए अक्सर चुनावों में दो बिल्कुल ही नये चेहरे दिखाई दे जाते हैं जैसे कि इस बार ओबामा और जॉन मैक्केन थे. ऐसे में पहले से उनके बारे में ज्यादा कुछ न पता होना टीवी डिबेट की जरूरत को अच्छे से रेखांकित कर देता है.

हमारे यहां की बात की जाए तो यहां राजनीतिक दलों पर आधारित संसदीय लोकतंत्र है जिसमें इन दलों की एक निश्चित विचारधारा और नीतियां होती हैं. ऐसे में ज्यादातर इन राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों की व्यक्तिगत सोच आदि का कोई खास महत्व नहीं होता. और अगर किसी उम्मीदवार में कुछ चुंबकीय आकर्षण होता भी है तो उसके और उसकी सोच के बारे में पहले से ही समूचे देश को पता होता है. ऐसे में आमने-सामने की बहस से उनके मूल्यांकन की जरूरत शायद ही रह जाती हो.

अमेरिकी बहसों के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि कई बार बहुत नजदीक वाले चुनावों को इस या उस पार करने में टीवी बहसों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इस परिप्रेक्ष्य में कैनेडी और रीगन की जीत को देखा जा सकता है. शायद यही वजह है कि कांग्रेस पार्टी टीवी पर मनमोहन बनाम आडवाणी के लिए तैयार नहीं हो रही.

मगर अमेरिका में तो दोनों दलों के उम्मीदवार भी ऐसी ही बहसों से चुने जाते हैं. परंतु हमारे यहां एक पार्टी को अपना उम्मीदवार विरासत में या उसके द्वारा थोपा हुआ मिलता है और दूसरी का फैसला नागपुर में होता है.

संजय दुबे 

बढ़िया प्रोफेसर मगर क्लास खाली

16 मई को चुनाव परिणामों का लेखा-जोखा कुछ भी हो, मनमोहन सिंह को कम से कम ये संतोष तो होगा ही कि वे अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने वाले प्रधानमंत्रियों की फेहरिस्त में जगह बनाने में कामयाब रहे. ये कोई छोटी बात नहीं है. अंतरात्मा की आवाज सुनने के बाद जब सोनिया गांधी ने सात रेसकोर्स रोड से दूर रहने का फैसला कर मनमोहन को प्रधानमंत्री मनोनीत किया था तो कम ही लोगों ने सोचा था कि यूपीए सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी और अगर करेगी भी तो पूरे कार्यकाल के दौरान मनमोहन प्रधानमंत्री बने रहेंगे. बल्कि सरकार बनने के शुरुआती महीनों में तो भाजपा में कुछ ने इस भविष्यवाणी पर बड़ी उम्मीद लगा रखी थी कि सितंबर या अक्टूबर 2004 तक सरकार गिर जाएगी. विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने तो जोरदार तरीके से डॉएचे बैंक की एक रिपोर्ट भी दिखाई थी जिसका कहना था कि सरकार साल भर से ज्यादा मुश्किल से ही टिक सकेगी.

मनमोहन ने हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि वे नेताओं के लिए किसी तरह का खतरा न लगें और बदले में उन्हें भी किसी ने परेशान नहीं किया

इसलिए मनमोहन के कार्यकाल के किसी भी आकलन में इस उपलब्धि को जरूर स्थान दिया जाना चाहिए कि अब तक हुए प्रधानमंत्रियों में से सबसे ज्यादा अराजनीतिक ये प्रधानमंत्री अपने सामने खड़ी सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती से पार पाने में सफल रहा. मनमोहन ने पूरी पारी खेली और वह भी नॉट आउट. ये माना जा सकता है कि ऐसा होने की सबसे बड़ी वजह रही रोजमर्रा की राजनीति से ज्यादा सरोकार न रखने की पूर्वनियोजित नीति से उनका न भटकना. मनमोहन ने हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि वे नेताओं के लिए किसी तरह का खतरा न लगें और बदले में उन्हें भी किसी ने परेशान नहीं किया. अगर बीच राह उनमें कुछ राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पैदा हो जातीं, जो कि ऐसी कुर्सी तक पहुंचने पर अक्सर पैदा हो जाती हैं, तो निश्चित रूप से उनका नाम अपना कार्यकाल पूरा न कर सकने वाले प्रधानमंत्रियों की सूची में होता.

मनमोहन के मनोनयन और कार्यकाल की अनोखी परिस्थितियों पर नजर डाली जाए तो पिछले पांच साल को उनका दौर कहना ठीक नहीं होगा. उनके कार्यकाल के लगभग बीच की अवधि के दौरान एक ब्रिटिश पत्रिका ने टिप्पणी की थी कि प्रधानमंत्री के पास कार्यालय तो है पर सत्ता नहीं. देखा जाए तो ये सही बात थी. मनमोहन के पास कभी भी पूरी ताकत या अधिकार नहीं रहे. कमान हमेशा यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी के पास रही और कैबिनेट के मंत्री एक तरह से अपनी मर्जी के मालिक रहे. दूसरी सरकारों में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण प्रधानमंत्री कार्यालय इस सरकार के दौरान महत्वहीन हो गया. यहां तक कि महत्वपूर्ण नियुक्तियां करने का काम, जो इससे पहले तक सिर्फ प्रधानमंत्री का अधिकार होता था, भी 10 जनपथ को समर्पित कर दिया गया.

मनमोहन का अनूठा योगदान ये भी है कि उन्होंने केंद्र सरकार वाली शासन प्रणाली को एक विकेंद्रित व्यवस्था बना दिया. रेल भवन में लालू प्रसाद यादव अपना एजेंडा चलाते रहे तो प्रफुल्ल पटेल सार्वजिनक क्षेत्र की सुध लेना छोड़ प्राइवेट एयरलाइंस पर ज्यादा ध्यान देते रहे. इस मामले में कांग्रेसी मंत्री भी पीछे नहीं रहे. मानव संसाधन मंत्रालय में अर्जुन सिंह नवमंडल और मुस्लिम तुष्टिकरण का अपना एजेंडा चला रहे थे तो कुछ समय के दौरान पेट्रोलियम मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर अपनी स्वतंत्र ऊर्जा नीति पर चल रहे थे.

राजनीतिक संकट को टालने के लिए सोनिया और उनकी राजनीतिक टीम ने समाजवादी पार्टी से मदद ली. ऐसा कभी नहीं हो सकता था अगर मनमोहन ने जिद नहीं ठानी होती मनमोहन के पास कुछ ऐसे गुण थे जो देश में सबसे महत्वपूर्ण इस राजनीतिक पद पर बैठने वाले व्यक्ति के लिए अनूठे कहे जा सकते हैं. उनमें न दंभ था और न किसी तरह का अहम. मनमोहन जसे दिखते थे वैसे ही थे भी. वे नम्र थे, चुनावी राजनीति के मामले में अनुभवहीन थे और जानते थे कि कमान उनके हाथ में नहीं है. इन्हीं गुणों ने उनमें अनुकूलन पैदा किया. दागी मंत्रियों और ओतावियों क्वात्रोकि को क्लीन चिट मिलने जैसे मसलों से उन्होंने नजरें फेरे रखीं. यहां तक कि उन्होंने इराक में तेल के बदले अनाज घोटाले में शामिल पूर्व विदेश मंत्री के नटवर सिंह को दोषमुक्त कर दिया. सही-गलत का फैसला मनमोहन अपने आप नहीं करते थे और उनमें ये खासियत न होती तो यूपीए सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर ही नहीं पाती. ये दिलचस्प है कि जैसे ही आम चुनावों में सीटों के बंटवारे पर कांग्रेस ने अपनी चलानी चाही तो तुरंत ही यूपीए बिखरना शुरू हो गया.

हां, एक मुद्दा जरूर ऐसा था जिस पर मनमोहन अड़ गए. ये था भारत-अमेरिका परमाणु समझौता. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल के दौरान भारत और अमेरिका करीब आए थे और इस प्रक्रिया का अगला स्वाभाविक कदम था जुलाई 2005 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के साथ हुआ ये समझौता. मनमोहन को लगा कि इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाने का यही मौका है. अगर मनमोहन ने इसे अपनी इज्जत का सवाल न बनाया होता तो ये समझौता बीच राह ही पटरी से उतर जाता. उन्होंने तो यहां तक संकेत दे दिया था कि अगर यूपीए प्रकाश करात के साम्राज्यवाद विरोध के आगे झुका तो वे प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे. राजनीतिक संकट को टालने के लिए सोनिया और उनकी राजनीतिक टीम ने समाजवादी पार्टी से मदद ली. ऐसा कभी नहीं हो सकता था अगर मनमोहन ने जिद नहीं ठानी होती.

भारत-अमेरिका परमाणु समझौते में मनमोहन की महत्वपूर्ण भूमिका को इतिहास निश्चित तौर पर याद रखेगा. मगर सवाल ये है कि अपने स्वभाव से विपरीत रुख दिखाते हुए आखिर मनमोहन इस समझौते के लिए कैसे अड़ गए? कुछ लोग कहते हैं कि मनमोहन सिंह इस बात से पूरी तरह सहमत थे कि ये समझौता भारत के हित में ही है. मगर इस जवाब से उनके इस रुख की पूरी व्याख्या नहीं होती. मनमोहन तो इससे भी सहमत थे कि बढ़ता राजकोषीय घाटा दीर्घावधि में देश के लिए काफी नुकसान का सबब होगा. इसके बावजूद वे बैठे रहे और अब हालत ये है कि ये घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 13 फीसदी तक पहुंच गया है. प्रधानमंत्री को ये भी पता था कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) की बनावट में ही खामियां हैं और इसमें पैसे का व्यर्थ खर्च हो रहा है मगर उन्होंने इन्हें दूर करने के लिए कुछ नहीं किया. बल्कि इसके उलट अपने चुनावी घोषणापत्र में कांग्रेस वादा कर रही है कि सभी कल्याणकारी योजनाओं को नरेगा के अंतर्गत लाया जाएगा.

सही और गलत को लेकर मनमोहन का कोई अपना रुख नहीं था मगर इसके बावजूद उन्होंने परमाणु समझौते को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद इस मोर्चे पर सफल रहे. भविष्य में अगर इस समझौते पर ठीक तरह से आगे बढ़ा गया तो इससे न सिर्फ क्षेत्रीय ताकत के रूप में भारत का कद बढ़ेगा बल्कि वह इस इलाके में चीन का संभावित विकल्प भी बन सकता है.

मनमोहन आज एक ऐसी सरकार के मुखिया हैं जिसने ये मान लिया है कि भारत में भी हालात पाकिस्तान जितने ही खराब हैं हालांकि परमाणु समझौते को सिर्फ इसी नजरिए से देखना गलत होगा. अगर ये वैश्विक ताकत के रूप में भारत के उभरने का माहौल तैयार कर सकता है तो हमारी नीतियों में अमेरिकी दखलअंदाजी को भी न्यौता दे सकता है. ये इस बात पर निर्भर करेगा कि आगे देश के भीतर किस तरह के बदलाव आते हैं.

सबसे बड़ी असफलता रही राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर. मुंबई हमले से पहले चार साल तक सरकार इस मामले पर लापरवाही और उदासीनता का परिचय देती रही. इसके पीछे की खतरनाक सोच ये थी कि आतंकवाद के खिलाफ किसी पूर्वनिर्धारित कार्रवाई से कांग्रेस और उसके साथियों के मुस्लिम वोट छिटक सकते हैं. बाटला हाउस में आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन पर अर्जुन सिंह और कपिल सिब्बल जैसे कैबिनेट मंत्री बयानबाजी करते रहे और मनमोहन खामोश रहे. मुंबई हमले के बाद पूर्व गृहमंत्री शिवराज पाटिल को आखिरकार जाना पड़ा था मगर इससे मनमोहन दोषमुक्त नहीं हो जाते. इससे उनकी प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े होते हैं. ऐसा लगता है कि अमेरिका के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए मनमोहन अपने लिए तय दायरे से भी बाहर जाने को तैयार थे और उनके इस रुख को गलत भी नहीं कहा जा सकता. मगर वे खुद को इस बात के लिए झकझोर नहीं पाए कि अपनी स्थिति का इस्तेमाल कर यूपीए के कर्ताधर्ताओं को बताएं कि आम लोगों को सुरक्षा को इतने हल्के में नहीं लिया जा सकता. यूपीए आतंकवाद विरोध को सांप्रदायिक राजनीति के चश्मे से देखता रहा और मनमोहन खामोश रहे.

लगातार राष्ट्रीय सुरक्षा की उपेक्षा करने का ही ये नतीजा हुआ है कि आज इंडियन प्रीमियर लीग को देश से बाहर करवाना पड़ रहा है. मनमोहन आज एक ऐसी सरकार के मुखिया हैं जिसने ये मान लिया है कि भारत में भी हालात पाकिस्तान जितने ही खराब हैं. उनकी सरकार की लापरवाही के चलते आतंकवाद के खिलाफ सफलतापूर्वक लड़ने का भारत का दावा कमजोर हुआ है.

बात यहीं खत्म नहीं होती. एनडीए सरकार ने विरासत में यूपीए को एक स्वस्थ विकास दर से दमकती एक ऊर्जावान अर्थव्यवस्था सौंपी थी. पांच साल बाद मनमोहन ने एक ऐसी अर्थव्यवस्था छोड़ी है जिसकी बुनियाद साफ तौर पर लड़खड़ा रही है. यूपीए के समय अर्थव्यवस्था का स्वास्थ्य चरम को छू रहा था मगर इससे होने वाले फायदे को भविष्य में निवेश करने की जगह उसने व्यर्थ के व्यय का रास्ता चुना. वाजपेयी सरकार के समय राजमार्गों और ग्रामीण इलाकों में सड़कों के निर्माण जैसे जो अहम काम शुरू किए गए थे उनकी रफ्तार नाटकीय रूप से धीमी हो गई. ग्रामीण इलाकों में कर्ज और खुदकुशी जैसे मोर्चे पर नरेगा नाकाम रही. सरकार ने खचरें में जो लापरवाही दिखाई उसके चलते बाजारों में तरलता का अभाव हो गया. ब्याज दरें बढ़ीं और अपना घर और बेहतर जीवन जीने की एक मध्यवर्गीय भारतीय की उम्मीदें चौपट हो गईं. 2004 में कांग्रेस ने चुनावी घोषणापत्र जारी किया था उसमें हर साल एक करोड़ नई नौकरियां देने का वादा किया गया था. 2009 में हाल ये है कि भारतीय कंपनियों की धार कुंद होने के चलते डेढ़ करोड़ भारतीय अपनी नौकरी गंवा चुके हैं. इसकी प्रतिक्रिया में मनमोहन ने ये कहकर अपना पिंड छुड़ा लिया है कि फैसले उन्होंने नहीं किए थे.

कुछ दिन पहले कांग्रेस का चुनाव घोषणापत्र जारी करते हुए मनमोहन ने दावा किया कि उनकी पार्टी ने अपने 80 फीसदी वादे पूरे किए हैं. ये पूरी तरह से अतर्कसंगत और हास्यास्पद बात थी. इससे 1999 की याद ताजा हो जाती है जब दक्षिण दिल्ली से कांग्रेस के उम्मीदवार मनमोहन ने आरोप लगाया था कि 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार था.

1996 से भारत गठबंधन राजनीति के मुश्किल दौर में दाखिल हुआ. अब राष्ट्रीय पार्टियों के पास वह ताकत नहीं कि वे अपने बूते केंद्र में सरकार बना सकें. छोटी पार्टियों से समर्थन लेना अब उनकी मजबूरी है. इन मुश्किलों के बावजूद वाजपेयी और मनमोहन, दोनों ने गठबंधनों का नेतृत्व कर अपना कार्यकाल पूरा किया. मगर इन दोनों नेताओं की कार्यशैली बिल्कुल अलग रही. वाजपेयी के समय केंद्र सरकार सही मायनों में केंद्र सरकार थी जिसने अपना मुखिया खुद चुना था और जिसकी अपनी प्राथमिकताएं थीं. मनमोहन ने एक विकेंद्रीय व्यवस्था का नेतृत्व किया जहां हर मंत्री अपनी चला रहा था और सरकार का मुखिया सिर्फ एक प्रतीक बनकर रह गया था. वाजपेयी का जनता में अपना एक कद था और वे इसके बूते सरकार के मुखिया बने थे. मनमोहन ने तो प्रधानमंत्री के पद को ही महत्वहीन बना दिया. दूसरी तरह से कहा जाए तो उनका कार्यकाल ऐसा रहा जैसे कोई बर्फ के खेत पर पांवों के निशान छोड़े बगैर चला हो.

स्वपन दासगुप्ता

लेखक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं  

एकतरफा मनमोहनी नीति

विदेश मामलो में बेहद कम रुचि और उससे भी कहीं कम अनुभव होने के बावजूद मनमोहन सिंह इस क्षेत्र में असाधारण रूप से स्पष्ट और दृढ़ तथा विवादित भी रहे. एक अनिर्वाचित और निर्देशों के लिए दस जनपथ की ओर ताकने वाले मनमोहन सिंह को हर वक्त इस बात का अहसास रहा कि एक राजनेता के तौर पर अपनी छाप छोड़ने की वो ज्यादा उम्मीद नहीं कर सकते. शायद इसीलिए मनमोहन सिंह ने खुद को विदेश नीति के मामलों में ही सीमित कर लिया. ये ऐसा क्षेत्र है जिससे देश के हर प्रधानमंत्री का पाला पड़ता ही है और शायद यही वो क्षेत्र भी रहेगा जहां वो अपनी कोई छाप छोड़ कर जाएंगे.

अमेरिका और इजराइल के बेहद नजदीक खड़ा करके मनमोहन सिंह ने भारत को अल-कायदा और दूसरे आतंकी गुटों के स्वाभाविक निशाने पर ला खड़ा किया है

जब पूरी दुनिया आपको सर आंखों पर बिठा रही हो तो ऐसे में बहक जाना कोई बड़ी बात नहीं. एक ऐसे समय में, जब एक बेहद चतुर रणनीतिक सक्रियता की आवश्यकता थी, पूरे एक साल तक बिना किसी विदेश मंत्री के काम चलाना मनमोहन सिंह के अति-आत्मविश्वास का ही द्योतक था. पर लोग शायद उन्हें ये बताना भूल गए कि भारत के प्रधानमंत्री को सार्वजनिक रूप से चीनी नेताओं के सामने ज्यादा सिर झुकाए नजर नहीं आना चाहिए. या अमेरिका के प्रति हमारा दृष्टिकोण खाटी राष्ट्रीय हितों पर आधारित होना चाहिए. पर ऐसे किसी प्रधानमंत्री के लिए ये बेहद सामान्य सी बात हो सकती हैजिसकी पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता ही पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को भारत रत्न से सम्मानित करने की बात करता हो.

भारत के सतत मजबूत आर्थिक विकास ने इसे दुनिया भर के देशों की आंख का तारा बना दिया है. अवसरों की इस खिड़की से अपनी विदेश नीति का दायरा व्यापक करने की बजाए प्रधानमंत्री ने खुद को अमेरिकी मोह के दायरे में सीमित कर लिया. उनकी बचकानी सोच रही कि अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी और झूठ सच के घालमेल से खड़ा हुआ नागरिक परमाणु समझौता अपनी झोली में डालकर भारत महानता की दहलीज पर पहुंच जाएगा. अपने घोषणापत्र में कांग्रेस पार्टी द्वारा इसे प्रमुखता न देना ही ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि समझौते के संदर्भ में कांग्रेस के दावों में कितना दम था. मुंबई के आतंकवादी हमले और बराक ओबामा की अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में विजय ने हमें असलियत के दर्शन करा दिए है.   

अमेरिका और इजराइल के बेहद नजदीक खड़ा करके मनमोहन सिंह ने भारत को अल-कायदा और दूसरे आतंकी गुटों के स्वाभाविक निशाने पर ला खड़ा किया है. भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझीदारी की ख़बरों की छाया भारत के रूस और चीन के साथ रिश्तों पर भी पड़ी है. साल 2005 और 2006 में आईएईए में ईरान के खिलाफ वोट ने इस महत्वपूर्ण देश के साथ हमारे संबंधों पर भी असर डाला.

अपने पड़ोसियों के साथ हमने क्या किया? खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि यूपीए सरकार ने अपने पड़ोसियों को यही संदेश दिया कि उसे अपने पड़ोसियों में ज्यादा रुचि या उन्हें समझने की ज्यादा जरूरत नहीं है. मनमोहन सिंह के ज्यादातर विदेशी दौरे गरीबी-गंदगी वाली दक्षिण एशियाई राजधानियों की बजाय मनोरम पश्चिमी देशों में ही हुए. पाकिस्तान और बांग्लादेश संबंधी विदेश नीति अमेरिका से, नेपाल नीति सीपीएम से, श्रीलंका नीति डीएमके से आयात करने वाले प्रधानमंत्री ने खुद को कभी भी अपने पड़ोसियों के साथ जोड़ने की जरूरत महसूस नहीं की. लिहाजा कोई आश्चर्य नहीं कि पड़ोसी देशों में भारत द्वारा खाली किए गए स्थान पर तुरंत ही अमेरिका, चीन और पाकिस्तान ने कब्जा जमा लिया.

विदेशी मामलों में मनमोहन की संदिग्ध विरासत में विदेश नीति से जुड़ी राष्ट्रीय आम सहमति की परंपरा का विध्वंस, संसद की भूमिका का तिरस्कार, राजनीतिक पार्टियों और जनता की राय का अपमान जैसी चीजें शामिल हैं. कुछेक सफलताओं के बावजूद मनमोहन सिंह के रिपोर्ट कार्ड में असफलताओं के लाल निशान सफलता के इक्का-दुक्का हरे निशानों की तुलना में कहीं ज्यादा हैं.

राजीव सीकरी

(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं और चैलेंज एंड स्ट्रेटजी: रीथिंकिंग इंडियाज फॉरेन पॉलिसी नामक पुस्तक के लेखक हैं)      

बदलाव का सारथी

मनमोहन सिंह को हमेशा एक बदलाव पुरुष के रूप में जाना जाएगा. उन्होंने 1991-96 में और 2004-08 में भारतीय अर्थव्यवस्था में आमूलचूल बदलाव लाए. 90 के दशक के मध्य से पहले भारत ने कभी भी लगातार तीन साल तक सात फीसदी विकास दर का मुंह नहीं देखा था. और 2006-08 से पहले देश की अर्थव्यवस्था ने लगातार तीन साल तक नौ प्रतिशत की विकास दर के दर्शन नहीं किए थे

डॉ सिंह की वजह से भारत में उदारीकरण के दौर की शुरुआत हुई मगर उन्होंने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में दुनिया के हरसंभव मंच से समावेशी वैश्वीकरण का झंडा भी बुलंद किया

ये तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब ये ध्यान में रखा जाए कि 1991 में भारत दिवालिया होने के कगार पर खड़ा हुआ था और विश्व में इसका सबसे बड़ा सामरिक सहयोगी सोवियत संघ खंड-खंड होकर बिखर चुका था. देश में राजनीतिक उथल-पुथल चरम पर थी और हाल ही में राजीव गांधी की मृत्यु के बाद कांग्रेस जैसे-तैसे अल्पमत वाली सरकार बना पाई थी. और ये सब इंदिरा गांधी की हत्या के मात्र छ साल बाद ही हो रहा था. उस समय कोई भी विश्लेषक भारत को 21वीं सदी की एक उभरती विश्वशक्ति के रूप में नहीं देख रहा था.

लेकिन इसके बावजूद 1991 में संसद में अपना पहला बजट पेश करते वक्त मनमोहन सिंह ने ये कहने की हिम्मत दिखाई कि भारत के एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभरने का विचार एक ऐसा विचार है जिसका समय अब आ चुका है. इसके बाद जो हुआ वो जैसा कि कहा जाता है कि इतिहास बन गया.

1991 में मनमोहन सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नई पटरी पर रखा. साल 2008 में एक परमाणु शक्ति संपन्न शक्ति का दर्जा दिलवा कर एक उन्होंने देश को एक बार फिर से एक नई राह का राही बना दिया. आधुनिक भारत के राजनीतिज्ञों में शायद ही किसी के पास जनता के सामने रखने के लिए इस तरह की विरासत होगी.

अर्थव्यवस्था

एक वित्तीय प्रबंधक के रूप में सफलता ने मनमोहन सिंह की राष्ट्रीय और वैश्विक कीर्ति में असीम बढ़ोत्तरी की और इसी वजह से वे स्वाभाविक रूप से 2004 में प्रधानमंत्री के पद के लिए चुन लिए गए.

इस तथ्य को भी रेखांकित करना होगा कि भारत की आर्थिक वृद्धि दर में बढ़ोत्तरी घरेलू बचत और निवेश में वृद्धि के चलते संभव हुई है. और ये वृद्धि देश के मध्य वर्ग की प्रगति, अधिक गतिशील व्यापारी वर्ग, ज्यादा सक्षम सार्वजनिक उपक्रम तथा विदेशी पूंजी निवेश में बढ़त के चलते संभव हुई थी जिनको डॉक्टर सिंह की ‘नई आर्थिक नीतियों’ की विरासत कहा जा सकता है.

पिछले कुछ महीनों में भारत को बाहर से देखते हुए मुझे बार-बार ये लगता रहा कि अपनी अर्थव्यवस्था के प्रबंधन के लिए भारत सरकार की देश से बाहर कितनी जबर्दस्त साख है. मगर घरेलू मोर्चे पर सभी मुद्दों का राजनीतिकरण और मीडिया की चर्चा के बजाय विवाद पैदा करने में रुचि होने की प्रवृत्ति हमें ये सोचने ही नहीं देती कि मंदी के इस दौर में हम आज दुनिया के दूसरे ज्यादातर देशों से कहीं बेहतर स्थिति में हैं.

मुझे याद आता है कि रिजर्व बैंक  के पूर्व गवर्नर बिमल जालान के साथ वो उन कुछ चुनिंदा लोगों में से थे जिन्होंने आसन्न वैश्विक आर्थिक संकट को काफी पहले ही भांप लिया था. इसके बाद जहां पूर्व आरबीआई गवर्नर वाईवी रेड्डी ने भारतीय बैंकों और वित्त व्यवस्था को इसके लिए तैयार करने से संबंधित कदम उठाए वहीं डॉ सिंह ने 2008-9 के बजट में विकास दर को सुचारू बनाए रखने के लिए राजकोषीय नीतियों को चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत को रेखांकित किया.

मुद्रास्फीति की बढ़ती दर पर ज्यादा कुछ न करने की आलोचना के जवाब में डॉ सिंह का कहना था कि ये बाहर से आयातित है क्योंकि ऐसा पेट्रोलियम उत्पादों के बढ़े हुए दामों की वजह से हो रहा था और इन परिस्थितियों में भी भारत को अपने विकास की गति को कमजोर नहीं पड़ने देने के प्रयास करने चाहिए. परंपरागत बुद्धिमत्ता के उलट डॉ सिंह ऐसा करने की हिम्मत शायद इसलिए दिखा सके क्योंकि वे बीसवीं सदी के महान अर्थशास्त्री जॉन मेनॉर्ड केन्स से अत्यधिक प्रभावित रहे हैं. इस बात का पता मुझे तब चला जब मैं अक्टूबर 2006 में उनके साथ मुंबई की हवाई यात्रा पर था. प्रधानमंत्री को ‘द इकनॉमिक टाइम्स’ के एक पुरस्कार समारोह में बोलना था. मेरे पास उनका भाषण था जिसे पढ़ने का समय उन्हें पहली बार हवाई जहाज में ही मिल पाया था. उन्होंने भाषण में कुछ छिटपुट परिवर्तन तो किए ही साथ ही केन्स की किताब द इकनॉमिक कन्सीक्वेन्सेज ऑफ द पीस में से एक काफी लंबा उद्धरण भी भाषण में जोड़ दिया. वो चाहते थे कि ये उद्धरण पूरी तरह से सही है या नहीं इसकी जांच कर ली जाए. मुंबई पहुंचने के बाद हमने किताब की एक प्रति बांबे यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी से मंगवाई और ये देखकर हम आश्चर्यचकित रह गए कि उनके द्वारा लिखा उद्धरण शत-प्रतिशत सही था

वो उद्धरण था- यदि धनी अपने नए धन को अपने मौज-मजे के लिए ही खर्च करते तो दुनिया इसे कतई स्वीकार नहीं करती. लेकिन मधुमक्खियों की तरह उन्होंने धन बचाया और इकट्ठा किया जिससे सभी का किसी-न-किसी रूप में फायदा हुआ..उन्हें केक के सबसे बढ़िया हिस्से को अपना कहने की छूट थी और सिद्धांतत: वो इसे खा भी सकते थे. मगर एक अनकही सहमति ये थी कि वे असल में इसमें से बहुत थोड़ा सा ही खाएंगे..

उन्होंने समारोह में मौजूद भारतीय व्यवसायियों से बचत करने, निवेश करने और ‘समावेशी विकास’ की प्रक्रिया को अपनी कंपनियों की बेहतरी के लिए इस्तेमाल करने की अपील की. कुछ महीनों के बाद उन्होंने सीआईआई की सालाना बैठक में कहा कि भारतीय व्यवसायियों को अपने विकास की प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाने के लिए ज्यादा चुस्ती दिखानी होगी. उनकी ‘समावेशी वैश्वीकरण’ की अवधारणा को दुनिया भर में सराहा गया है, विशेषकर एशिया और अफ्रीका में और अब इसका असर जी-20 की चर्चाओं में भी देखा जा सकता है.

डॉ सिंह की वजह से भारत में उदारीकरण के दौर की शुरुआत हुई मगर उन्होंने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में दुनिया के हरसंभव मंच से समावेशी वैश्वीकरण का झंडा भी बुलंद किया. यही दक्षिण आयोग का भी तो संदेश था जिसके 80 के दशक में वो महासचिव थे.

संप्रग के मुख्य कार्यक्रम

बतौर प्रधानमंत्री डॉ सिंह ने अपनी सरकार का फोकस तीन मुख्य क्षेत्रों पर रखा – मूलभूत ढांचा, कृषि और ग्रामीण विकास और शिक्षा. विकास पर जोर देने के साथ-साथ वो इसे ज्यादा से ज्यादा समावेशी भी बनाना चाहते थे. इन तीन क्षेत्रों में निवेश करने से ऐसा किया जाना संभव था.

डॉ सिंह ने सामाजिक विकास के जिस क्षेत्र में सबसे गहरी रुचि दिखाई वो था शिक्षा. उन्होंने एक ऐसे गांव में अपना बचपन बिताया था जहां न बिजली थी और न ही स्कूल. पढ़ने के लिए उन्हें रोज मीलों पैदल चलना पड़ता था. इसलिए डॉ सिंह ने शिक्षा के क्षेत्र में एक नई क्रांति लाने को अपना लक्ष्य बना लिया. उन्होंने 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) को ‘राष्ट्रीय शिक्षा योजना’ का नाम दिया क्योंकि इसमें शिक्षा के लिए धन के आवंटन में काफी बढ़ोत्तरी की गई थी. हजारों नये स्कूल, सैकड़ों नये कॉलेज और कम से कम 30 नये केंद्रीय विश्वविद्यालयों को इस योजना से धन मुहैया कराया गया.

उन्होंने छात्रवृत्ति और फेलोशिप के अब तक के सबसे बड़े कार्यक्रम को चलाया जिसमें मुख्य जोर अनुसूचित जाति और जनजाति, पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों – खासकर मुस्लिम समुदाय – बालिकाओं और महिलाओं पर था.

सांप्रदायिक सद्भाव

राजनीतिक चर्चाओं में इस बात को ज्यादा तवज्जो नहीं दी जाती है कि पिछले पांच साल सांप्रदायिक सद्भाव के लिहाज से शांति के वर्ष रहे हैं. पिछले पांच सालों में करीब-करीब हर आतंकी हमला सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने को लक्ष्य बनाकर किया गया. मगर शायद ही कभी आतंकी ऐसा करने में सफल रहे हों. जब भी कहीं आतंकवादियों ने हमला किया तो डॉ सिंह ने तुरंत सभी लोगों से शांति और एकता बनाए रखने की अपील की. उनकी पहली प्राथमिकता ये सुनिश्चित करने की रही कि लोगों की हताशा और गुस्सा किसी तरह के सांप्रदायिक ज्वार में न तब्दील हो जाए. वो अक्सर कहा करते हैं कि जो कुछ गुजरात में हुआ वो दुबारा नहीं होना चाहिए.

हालांकि कई बार सांप्रदायिक तनाव की स्थितियां जरूर बनीं मगर उन्हें विस्फोटक होने से पहले ही नियंत्रित कर लिया गया. यहां तक कि बनारस, अयोध्या और नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय पर हमलों के बाद भी – जो कि सांप्रदायिक दंगे और गुजरात जैसा भयानक नरसंहार कराने के उद्देश्य से किए गए थे – सरकार ने ऐसा कुछ नहीं होने दिया गया. सभ्य समाज के सक्रिय योगदान ने भी इसमें सरकार की काफी मदद की.

विदेश नीति

भारत में विदेश नीति हमेशा प्रधानमंत्री के कार्यक्षेत्र का हिस्सा रही है. इसलिए विदेशनीति से संबंधित ज्यादातर उपलब्धियों और मसलों पर प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छाप होती है. मनमोहन सिंह को कम से कम उनकी विदेश नीति से संबंधित दो पहलों के लिए याद किया जाएगा. पहला, अमेरिका और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा संगठन के साथ हुआ नागरिक परमाणु ऊर्जा सहयोग समझौता और दूसरा भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझोता जो मुकाम पर पहुंचने की कगार पर खड़ा हुआ है.

परमाणु समझौता, जैसा कि इसे मीडिया ने नाम दिया है, भारत के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने वाला है. इसके माध्यम से विश्व समुदाय ने एक तरफ तो एक तरह से भारत को परमाणु हथियार संपन्न देश का दर्जा दे दिया है वहीं दूसरी ओर परमाणु अप्रसार के क्षेत्र में भारत के बेदाग रिकॉर्ड को भी स्वीकार कर लिया है. परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों और अमेरिका के साथ हुए समझौते ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा भारत के साथ किए जा रहे भेदभावपूर्ण व्यवहार, जो कि कोल्ड वार के समय की याद दिलाता था, को खत्म कर दिया है. अगर डॉ सिंह इस मामले में दृढ़ न रहते तो ज्यादातर नेताओं में दूरगामी दृष्टि के अभाव के चलते ऐसा होना हर्गिज संभव नहीं हो पाता.

डॉ सिंह ने अरब देशों के साथ संबंध में नई नीतियों की बुनियाद डाली. उन्होंने पहले के राजनीतिक एजेंडे की प्रधानता वाले संबंधों के उलट उन्हें भारत की ऊर्जा और निवेश की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आर्थिक एजेंडे पर संतुलित करने का प्रयास किया. भारत और गल्फ देशों के बीच मुक्त व्यापार का समझौता अपने अंतिम चरण में है और सऊदी अरब के किंग की भारत यात्रा ने इस अतिमहत्वपूर्ण इस्लामी देश के साथ हमारे संबधों में एक नए युग का सूत्रपात किया.

दो बेहद महत्वपूर्ण कदम, जिनका अभी तक कोई नतीजा नहीं निकल सका है, – चीन के साथ सीमा विवाद को सुलझने का प्रयास और कश्मीर को लेकर पाकिस्तान से चल रहे विवाद पर बातचीत. दोनों ही मुद्दों पर डॉ सिंह ने नये, निर्भीक और मौलिक विचारों को मेज पर रखा. लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि पाकिस्तान और चीन के नेताओं की अंदरूनी बाधाओं ने उन्हें भी ऐसा ही करने की इजाजत नहीं दी. जब इन विवादों के अंतिम हल निकल आएंगे तो मुझे यकीन है कि वो डॉ सिंह द्वारा सुझाए हलों से बहुत ज्यादा अलग नहीं होने वाले.

डॉ सिंह ने सार्क की ढाका, दिल्ली और कोलंबो की शिखर बैठकों में कई पहलें कर क्षेत्रीय संबंधों में एक नई जान फूंकी. उनके, कम विकसित देशों को करों के जरिये रियायतें देने वाले ‘असमान उदारीकरण’ को बढ़ावा देने के फैसले ने – जिसे उन्होंने पहली बार 2008 की शुरुआत में भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन में दिल्ली में दुनिया के सामने रखा था – दक्षिण-दक्षिण सहयोग के क्षेत्र में एक नये अध्याय की शुरुआत की है.

गठबंधन प्रबंधन

हालांकि ज्यादातर प्रेक्षक डॉ सिंह को उनके आर्थिक और विदेश नीति से संबंधित कदमों का श्रेय देंगे मगर राजनीतिक विश्लेषकों को उन्हें पांच साल तक एक बेहद नाजुक गठबंधन को सुचारू रूप से चलाने के लिए भी सराहना होगा. ये यात्रा आसान तो बिल्कुल भी नहीं थी. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि कांग्रेस खुद भी कई प्रतिस्पर्धी मंचों का गठबंधन है. उनके और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीच बढ़िया रिश्तों ने उन्हें पार्टी और गठबंधन में समय-समय पर आ खड़ी हुईं तमाम मुश्किल परिस्थितियों से उबरने के लायक बनाया. दोनों में एक-दूसरे के प्रति गहरे सम्मान की भावना है. उनमें मौजूद आपसी विश्वास ने दोनों को मिलकर तमाम तरह के तूफानों का मुकाबला करने की ताकत दी. एक विभिन्नताओं से भरे गठबंधन के नेता के तौर पर कई बड़े नीतिगत फैसले लेने और आतंकवाद, चरमपंथ, मुद्रास्फीति और सांप्रदायिक और क्षेत्रीय तनाव जैसी घरेलू चुनौतियों से निपटने के लिए अत्यधिक बुद्धिमत्ता, सहनशीलता और राजनीतिक कौशल की जरूरत होती है. और उन्होंने दिखा दिया कि ये उनमें प्रचुर मात्रा में है.

एक गठबंधन के नेता के तौर पर उन्होंने हमेशा अपने सहयोगियों और वरिष्ठ साथियों को अपने हर नीतिगत निर्णय में साथ लेकर चलने के हरसंभव प्रयास किए. एक ऐसे व्यक्ति के लिए जो फुर्ती से काम करने में यकीन रखता हो, ये कभी-कभी काफी हताशाजनक हो सकता था. मगर उन्हें हमेशा इस बात का एहसास रहा कि किसी भी नीतिगत निर्णय पर अंदरूनी एकमतता उसकी बाहरी सफलता के लिए बेहद जरूरी है.

भारत अमेरिका परमाणु समझौते पर चलीं लंबी वार्ताएं सहमति बनाने की उनकी चाह के सबसे स्पष्ट प्रमाण हैं. लेकिन और भी मद्दे हैं जिनपर उन्होंने गठबंधन के अपने सहयोगियों, पार्टी और मंत्रिमंडल के अपने साथियों और सरकार से बाहर के महत्वपूर्ण प्रेक्षकों को निजी तौर पर फोन करने में जरा भी संकोच नहीं किया.

ये दुर्लभ सहनशीलता और सभी को सुनने की उनकी अभिलाषा ही है जो एक मुश्किल गठबंधन के प्रधानमंत्री के तौर पर उनकी और पांच साल तक बखूबी चले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सफलता के मूल में है. उनका कोई राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ये नहीं कह सकता कि उसके साथ प्रधानमंत्री ने सही बर्ताव नहीं किया. चाहे संसद हो या राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक या कभी खत्म न होने वाली मंत्रिमंडल की समितियों की बैठकें या जम्मू कश्मीर पर गोलमेज सम्मेलन – यहां तक कि युवा नेता और प्रशासनिक अधिकारी भी इनमें ऊंघते या इनसे बचते देखे गए मगर डॉ सिंह इनमें शुरुआत से अंत तक पूरे मनोयोग से लोगों को सुनते, नोट्स बनाते और जहां जरूरी हो जवाब देते देखे जा सकते थे.

दिल और दिमाज की यही वो विशेषताएं हैं जो उन्हें भारत के लोगों के दिलों के नजदीक ले जाती हैं और इसका एक उदाहरण हमें तब देखने को मिला जब वो अपने हृदय की शल्य चिकित्सा के लिए अस्पताल में भर्ती हुए थे.

संजय बारू

लेखक प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार रह चुके हैं और वर्तमान में सिंगापुर स्थित ली क्वान यू स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में अध्यापनरत हैं  

 

 

कितनी लंबी यात्रा

(तहलका की पांच वर्षों की सरोकारी पत्रकारिता पर विशेष)

हम जिस दौर में जी रहे हैं उसमें स्मरण करने की कोई अहमियत ही नहीं रही है. हमारे चारों ओर तमाम पुरस्कार समारोह, सालाना समारोह, गोष्ठियां और दूसरे किस्म के ‘इस या उस स्मृति में’ वाले आयोजन हो रहे हैं. सभी का दावा है कि ऐसा करके वो इतिहास के किसी-न-किसी हिस्से को समृद्ध करने का कार्य कर रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि मानो जानकारी की सूनामी में दबीं स्मृतियों को झड़ने-पोंछने के बाद इन आयोजनों की खूंटियों से टांगकर उन्हें थोड़ा जीने का मौका दिया जा रहा है. मगर दुखद सच्चाई ये है कि हो ऐसा भी नहीं रहा है. इनमें से कोई ही आयोजन शायद ऐसा हो जो वर्तमान को संवारने और बेशकीमती भूत को संरक्षित करने का काम करता हो. ज्यादातर समारोह विशुद्ध व्यावसायिक हैं जो कुछ ऐसा करने के प्रयास में लगे होते हैं जिससे फायदा उठाया जा सके.जाहिर है कि कैमरे के फ्लैश के जैसे एक क्षण तो इनकी उपस्थिति आंखों में चौंध पैदा करती है और दूसरे ही क्षण घटाटोप छा जाता है. बाजार द्वारा हर चीज को अमूल्य, अनोखा और ऐतिहासिक बनाने की कोशिश, ये सुनिश्चित करती है कि कुछ भी वैसा नहीं बन पाता.

भारत के 30 करोड़ भरे-पूरे लोग यहां के 80 करोड़ भूखे-प्यासों के साथ एक जटिल डोर से बंधे हुए हैं, और इस जुड़ाव का अपनी बुद्धिमत्ता और दयालुता के साथ आदर करने की जिम्मेदारी भरे पेट वालों की है ऐसे में तहलका की अंग्रेजी पत्रिका के पांच साल का होने का आयोजन (हिंदी तो अभी महज 6 महीने पुरानी ही है), भी कुछ-कुछ इन्ही आयोजनों जैसा ही लगकर दंभ भरने का सा आभास दे सकता है. लेकिन तहलका के इतिहास पर नजर डालें तो ये नितांत जरूरी प्रतीत होता है. दुनिया को अचंभित करने के लिए नहीं बल्कि खुद को ये विश्वास दिलाने के लिए कि हम तय रास्तों पर न चलकर सही रास्तों पर चलते रहे हैं.

यदि आपने तहलका के किन्हीं दो अंकों को भी पढ़ा है तो आपको ये बताने की जरूरत ही नहीं कि तहलका किस चीज में यकीन रखता है मगर यदि आप इसे पहली बार देख रहे हैं तो मैं इसका एक रेखाचित्र बनाने का प्रयास करता हूं.

मूलत: तहलका, खुद को, हमारे देश के निर्माताओं की धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, बहुलतावादी और उदार भारत की सोच से जुड़ा हुआ पाता है. इसी मोटी सी परिभाषा के दायरे में इसकी प्रतिबद्धताएं बिल्कुल साफ हैं. इसको अपने काम के लिए धनी और अभिजात्य लोगों के संसाधन तो चाहिए मगर उनके हितों को साधने की इसकी मंशा कभी नहीं रही. ये तो चुपचाप सब-कुछ झेल रहे, दबे-कुचलों के साथ खड़े होने की मंशा रखता है. ये, जो हमारी पत्रिका कभी नहीं पढ़ सकते या पढ़ेंगे, उनकी कहानियों को उन तक पहुंचाने के प्रयास करता है, जो इसे पढ़ते हैं. इसलिए नहीं कि ये मंदिर में मंच पर बैठकर उपदेश देने का इरादा रखता है बल्कि ये बताने के लिए कि भारत के 30 करोड़ भरे-पूरे लोग यहां के 80 करोड़ भूखे-प्यासों के साथ एक जटिल डोर से बंधे हुए हैं, और इस जुड़ाव का अपनी बुद्धिमत्ता और दयालुता के साथ आदर करने की जिम्मेदारी भरे पेट वालों की है. इस रिश्ते की मर्यादा निभाए जाने पर ही भारत राष्ट्र के होने का मौलिक विचार टिका हुआ है. इस बात को लगातार ध्यान में रखने पर ही देश का भविष्य निर्भर करता है. कुलीनों के पास भी अंतत: तभी एक देश रह सकता है जब वो इसमें औरों की हिस्सेदारी को स्वीकार कर सकते हैं.

तहलका, वर्ग, जाति, भाषा, धर्म या किन्हीं ऐसी ही दूसरी चीजों पर आधारित हर तरह की कट्टरता की खिलाफत करता है. हमारे उपमहाद्वीप में मौजूद तरह-तरह की असंख्य दरारों में से एक सबसे नुकसानदेह हिंदू और मुसलमानों के बीच शत्रुता की भावना है. इसने हमें कई बार बुरी तरह तबाह किया है और ये हमारे टुकड़े-टुकड़े करने की क्षमता रखती है. इसे दुनिया के सामने कुछ और एकांत में कुछ जैसे किसी दोगलेपन की नहीं बल्कि एक सीधी और मजबूत नजर से देखे जाने की जरूरत है. पूर्वाग्रह और अन्याय का हल ढूंढ़ने और आधुनिकता के वरदानों, जो कि नई तकनीक वाले नये-नये खिलौने नहीं बल्कि सहिष्णुता और शांतचित्त वाली समझ है, को फिर से मजबूत किए जाने की आवश्यकता है. मगर ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा. इन परिस्थितियों के कोलाहल में विवेक और समझदारी के लिए लड़ते तहलका का तंबू मजबूती से तना हुआ है.

एक पत्रिका जिसका अंग्रेजी संस्करण – यदि सब कुछ ठीक रहे तो – मात्र 1 लाख ही बिकता हो और संसाधनों को गवारा न हो तो महज 50 हजार से कुछ ज्यादा तथा जिसका हिंदी संस्करण अभी हर 15 दिन में करीब 50 हजार की संख्या ही पार कर पाता हो, उसके द्वारा ये सब कहा जाना काफी बड़े बोल लग सकता है. किंतु विनम्रता के साथ में इतना जरूर कह सकता हूं कि इतनी कम क्षमताओं के साथ तहलका ये अच्छे से समझता है कि इसका काम हर व्यक्ति को हिलाना नहीं बल्कि उन्हें हिलाना है जो जनता को गति, दिशा और बेहतर भविष्य दे सकने की क्षमता रखते हैं. तरह-तरह के रहस्यों को सामने लाकर, आम लोगों में तर्क-वितर्क की स्थितियां और बुद्धिजीवियों में उद्वेलन उत्पन्न कर तहलका समाज की दो सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों – राजनीतिक और आर्थिक – को उनके सुंदरतम रूपों में सीमित रखने के प्रयास में लगा रहता है. ये शक्तियां एक हाथी की तरह हैं और मीडिया एक अंकुश की तरह जिसका मुख्य काम इस हाथी को सही रास्ते पर चलने को विवश करते रहने का है.

हमने कहीं से ईंट कहीं से रोड़ा इकट्ठा कर लेख की इमारत बनाने और नितंब और वक्षस्थल वाली पत्रकारिता औरों के लिए ही छोड़े रखी. क्योंकि हमारे पास पहले से ही इतना कुछ करने को हमेशा ही रहा

इससे कुछ और आगे जाते हैं. हो सकता है कि अब तक ये भी कुछ स्पष्ट हो गया हो कि तहलका केवल एक निरपेक्ष इतिहासकार की भूमिका निभाने में विश्वास नहीं रखता. जैसा कि चलन है कि किसी स्टोरी के लिए दोनों तरफ के संस्करणों को लिया और उनकी सत्यता जांचने की कड़ी मेहनत किए बिना उन्हें छाप डाला. तहलका अपने निर्णय और राय को किसी भी स्टोरी में शामिल करने से गुरेज नहीं करता. उदाहरण के तौर पर अर्थ और व्यापार जैसे एक ऐसे क्षेत्र में जिसमें तहलका को कोई विशेषज्ञता हासिल नहीं है, तहलका पहली समाचार पत्रिका थी, जिसने शेयर बाजार में कुछ बहुत ज्यादा गड़बड़झाला चल रहा है, ऐसी घोषणा कर दी थी. और ये सब बाजार के ढह जाने के काफी पहले किया गया था. हालांकि तहलका ने कभी भी निजी प्रकृति के अभियान चलाने में भरोसा नहीं किया परंतु मगर हर सार्वजनिक लड़ाई में ये किस जगह खड़ा है इसे लेकर कभी संदेह की कोई गुंजाइश भी इसने कभी नहीं छोड़ी. तहलका मानता है कि एक पत्रकार का काम केवल जानकारी देना भर नहीं बल्कि जनहित के लिए एक योद्धा की तरह लड़ने का भी है जो हर सभ्य कदम, हर मानवीय मूल्य को अपना कंधा देता रहता है.

जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है तो निस्संदेह इससे लड़ने की जरूरत है मगर ये असमानता और अन्याय के साथ लड़े जाने वाले एक बहुत बड़े और महत्वपूर्ण युद्ध का एक छोटा सा हिस्सा ही है. भ्रष्टाचार एक असमान और अन्यायी समाज का लक्षण भर है और बिना झिझक ये कहा जा सकता है कि ये आकलन संपूर्ण विश्व में सत्य साबित हो चुका है. अगर सबको बराबरी का अधिकार और विरोध करने की क्षमता मिल जाती है तो भ्रष्टाचार झेली जा सकने वाली हदों में सीमित किया जा सकता है.

इससे पहले कि हम अत्यधिक गंभीर सुनाई-दिखाई पड़ने लगें, मैं कहना चाहता हूं कि तहलका को कला और संस्कृति पर किए गए अपने काम पर भी खूब मान है. यहां पर उद्देश्य सिर्फ इतना ही रहा है कि चाटुकारिता और पक्षपातपूर्ण व्यवहार से बचा जाए जिससे आज शायद ही कोई अछूता हो. जैसे कि किसी के काम की समीक्षा उसके मित्र या उससे अतिरिक्त सहानुभूति रखने वाले किसी व्यक्ति से करवाना या फिर किसी ऐसे से करवाना जो लेखक या कलाकार के प्रति हद दर्जे की दुर्भावना या शत्रुता रखता हो. तहलका हमेशा बिल्कुल ही हवाई चीजों की अनदेखी और तथ्यात्मक आलोचना में विश्वास रखने के साथ जन-संस्कृति से जुड़ी चीजों को भी सारगर्भित बनाने का प्रयास करता रहा है. सिनेमा से जुड़े इसके कई साक्षात्कार नई जमीन ढूंढ़ने वाले साबित हुए. हमने कहीं से ईंट कहीं से रोड़ा इकट्ठा कर लेख की इमारत बनाने और नितंब और वक्षस्थल वाली पत्रकारिता औरों के लिए ही छोड़े रखी. क्योंकि हमारे पास पहले से ही इतना कुछ करने को हमेशा ही रहा.

जो कुछ ऊपर लिखा है वो पांच साल पहले और भी ज्यादा बड़बोलापन और डींग हांकना कहलाता. मगर 250 से ज्यादा अंग्रेजी और 12 हिंदी के संस्करणों की वजह से हमारे दावे में लोगों को अब सच्चाई की एक छोटी सी झलक जरूर दिख रही होगी. एक ओर जहां हमें अपनी गुजरात 2002, सिमी, जेसिका, निठारी की इन्वेस्टिगेशंस पर गर्व है वहीं दूसरी ओर अपने काम की सामाजिक प्रतिबद्धता पर गहरा संतोष भी है. चाहे वो दलितों और जनजातियों से जुड़े मुद्दे हों या विकास और पुनर्वास से जुड़े या भोपाल, सिंगूर, बंत सिंह और अरावली में अवध खनन या फिर बांधों और किसानों की आत्महत्याओं की दिल दहलाने वाली सच्चाइयां, तहलका हमेशा इनमें अपनी जिम्मेदारियां को तलाशने और उन्हें निबाहने की कोशिश में लगा रहा.

हालांकि तहलका के बढ़िया काम का श्रेय इसके संपादकों को जाता है. मगर इसको सही मायनों में प्रेरणा देने वाले इसमें काम कर रहे युवा पत्रकार हैं – जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं – जो बेहद प्रतिभाशाली, ईमानदार, मजबूत और तहलका की सरोकारी पत्रकारिता से पूरी तरह जुड़ा हुआ महसूस करने वाले हैं.

हर उम्मीद जगाने वाली कहानी में एक अंधेरा कोना भी होता ही है. पांच साल पहले कोई भी हमसे उबरने और पत्रिका निकालने की जरा भी उम्मीद नहीं कर रहा था. जब हमने ऐसा कर लिया तो लोगों का कहना था कि हम ज्यादा से ज्यादा एक साल के मेहमान हैं. मैं ये कहना चाहता हूं कि उनकी आशंका बिल्कुल सही थी. ये एक बेहद दुर्गम यात्रा रही है – सप्ताह दर सप्ताह, महीना दर महीना. प्रशंसाएं और शाबाशी तो दुनिया भर से खूब मिलीं लेकिन संसाधनों का हमेशा टोटा पड़ा रहा.

मीडिया के इस स्वर्णिम काल में हर कोई सोचता होगा कि निवेशक हमसे जुड़ने के लिए कुछ भी कर सकने को तैयार होंगे जिससे हम और भी भाषाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें, एक टेलिविजन चैनल ला सकें. हालांकि कुछ अद्भुत लोग आगे आए भी किंतु कहते हुए दुख सा होता है कि ये नाकाफी से भी कुछ कम ही रहे. शायद ऐसा हमारी कारोबारी अक्षमताओं या देश के धनी लोगों की ऐसे कामों के प्रति अनिच्छाओं या फिर जिस गाड़ी को हम चला रहे हैं उसकी प्रकृति की वजह से हुआ होगा.

फिर भी अगर आज मैं कुछ कह सकता हूं तो ये कि हम अब न केवल पांच साल के हो गए हैं बल्कि आगे बढ़ने के लिए दृढ़निश्चयी भी हैं. हो सकता है आगे हम आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंच जाएं और हो सकता है कि हम औंधे मुंह गिरकर ढ़ेर हो जाएं. मगर उम्मीद है कि हम कभी अपनी सोच और विश्वास को पैदा करने वाली मशीनरी में कोई बदलाव नहीं करेंगे.

तारनहार इमोशनल अत्याचार

वाकया हफ्ता भर पहले का है. मुंबई में वरसोवा के एक छोटे से रेस्टोरेंट में बैठी एक लड़की ने पूछा, कौन है ये अनुराग कश्यप? फैशन का डायरेक्टर? ये सुनते ही वहां बैठे कुछ लोगों में खुसुर-फुसुर होने लगी. दरअसल उस महिला ने बड़े दिलचस्प मौके पर ये बात कही थी क्योंकि उसी रेस्टोरेंट में पैशन फॉर सिनेमा के जुनूनी ब्लागर्स के साथ कश्यप भी बैठे हुए थे. पहले तो कश्यप ये सुनकर चौंके मगर फिर हाथ मलते हुए मजाकिया मूड में बोले, ‘नहीं, नहीं, अनुराग कश्यप तो फैशन स्टेटमेंट का डायरेक्टर है.’

 ऐसा भी वक्त रहा जब कश्यप की ज्यादा पूछ नहीं थी. 2003 में उनकी फिल्म पांच को सेंसर ने लटका दिया तो अगले ही साल ब्लैक फ्राइडे के प्रदर्शन पर कोर्ट के एक आदेश ने रोक लगा दीलड़की को अब भी समझ में नहीं आया कि माजरा क्या है. इससे पहले अंधेरी के अपने शांत से ऑफिस में कश्यप की सुबह बधाई के फोन कॉल्स का जवाब देते-देते बीती थी. एक दिन पहले ही उनकी फिल्म गुलाल रिलीज हुई थी और हर कोई उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ रहा था. पहले देव डी और फिर गुलाल ने बतौर निर्देशक उनके नाम का वजन कई गुना बढ़ा दिया था. बड़े स्टार्स जो पहले कश्यप का फोन भी नहीं उठाते थे अब उनके नए प्रोजेक्ट्स में किसी रोल की संभावना तलाश रहे थे. एक प्रोड्यूसर तो फोन पर यहां तक कह गए कि वे अपने दोस्तों को ये साबित करने के लिए गुलाल दिखाने ले गए कि एक नया बॉलीवुड आ पहुंचा है. कश्यप कहते हैं, ‘मैंने इस फिल्म को बनाने के लिए दस साल तक इंतजार किया है और साबित ये जनाब कर रहे हैं.’ हालांकि जैसे-जैसे बधाई भरे फोन्स आने का सिलसिला बढ़ता जाता है कश्यप के मन की ये कड़वाहट भी गायब होने लगती है.

कश्यप ने बॉलीवुड में अपनी शुरुआत 1998 में रामगोपाल वर्मा की फिल्म सत्या के साथ की. इस फिल्म की स्क्रिप्ट उन्होंने सौरभ शुक्ला के साथ मिलकर लिखी थी. वे उर्दू आधारित डॉयलॉग्स की बजाय बोलचाल की हिंदी इस्तेमाल करने वाले शुरुआती लोगों में से थे. अपनी 20 स्क्रिप्ट्स में उन्होंने इसी हिंदी का इस्तेमाल किया जिसमें एक तरफ लुग्दी लेखन के सुपरस्टार सुरेंद्र मोहन पाठक का असर था तो दूसरी ओर इंसानी मन की गहराइयों की थाह रखने वाले प्रेमचंद की भी छाप थी.

फिर कश्यप जब निर्देशन के क्षेत्र में उतरे तो उन्होंने ऐसी फिल्में रचीं जो रटे-रटाए ढर्रे पर नहीं चलती थी. ब्लैक फ्राइडे में पुलिस द्वारा इम्तियाज गवाथे का पीछा करने के दृश्य को इस तरह के सबसे अच्छे दृश्यों में शुमार किया गया तो नो स्मोकिंग के अतियथार्थवाद की भी खूब चर्चा हुई.

मगर इस सफलता के पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी है. ऐसा भी वक्त रहा जब कश्यप की ज्यादा पूछ नहीं थी. 2003 में उनकी फिल्म पांच को सेंसर ने लटका दिया तो अगले ही साल ब्लैक फ्राइडे के प्रदर्शन पर कोर्ट के एक आदेश ने रोक लगा दी. और फिर 80 फीसदी काम पूरा हो जाने के बाद 2006 में गुलाल भी डिब्बे में बंद हो गई. ये वो दौर था जब कई लोगों को लगता था कि कश्यप पर दुर्भाग्य का साया है और कहीं इसकी थोड़ी-बहुत छाया उन पर भी न पड़ जाए. उनसे कहा गया कि उन्हें फिल्में बनाना बंद कर देना चाहिए. उनके साथ कोई था तो हिंदी सिनेमा के कुछ गिने-चुने बुद्धिजीवी प्रशंसक. 2006 में बुरी तरह निराश कश्यप ने फिल्म इंडस्ट्री के सभी लोगों को एक एसएमएस भेजकर मदद की गुहार लगाई जो उनके दोस्तों के लिए एक चौंकाने वाली बात थी. किसी का जवाब नहीं आया सिवाय जॉन अब्राहम के जिन्होंने खुशी से कश्यप को लास एंजेल्स जाने का टिकट खरीदकर दे दिया ताकि उनकी हवाबदली हो जाए. वहां कश्यप ने नो स्मोकिंग की स्क्रिप्ट लिखी. मगर इंसान के कुछ भीतरी कोनों को टटोलती ये फिल्म जब प्रदर्शित हुई तो आलोचकों ने इसे कमजोर आंका और दर्शकों की प्रतिक्रिया भी कोई खास नहीं रही. इन सब ठोकरों ने कश्यप को इतनी गहरी निराशा और कुंठा से भर दिया कि जब यूटीवी स्पॉटब्वॉय की रुचा पाठक ने उनके प्रोजेक्ट्स में दिलचस्पी जताई तो उनका जवाब काफी गुस्से से भरा था.

और फिर देव डी आई और सब कुछ बदल गया. अब हर कोई उनका मुरीद है. आदित्य चोपड़ा जैसे निर्देशक भी जिनके सरसों के खेत के मायने देव-डी की पारो और उसकी साइकिल पर लदे मैट्रेस ने बदल दिए. आज इमोशनल अत्याचार और गुलाल के मुजरे का खुमार सबके सिर चढ़कर बोल रहा है. हालांकि देव-डी के तुरंत बाद कश्यप ने दोस्तों से कहा था कि वे नाकामयाबी के लिए कहीं बेहतर तरीके से तैयार थे.

कश्यप की शुरुआती पढ़ाई बोर्डिंग स्कूल में हुई. राज्य विद्युत बोर्ड में नौकरी करने वाले उनके पिता को लगता था कि बोर्डिंग ही बच्चे के लिए मुफीद जगह है. मगर स्कूल में दोस्तों से मार खाने और कुछ पड़ोसियों द्वारा शारीरिक र्दुव्‍यवहार की कड़वी यादें उनके संवेदनशील मन की जमीन पर कभी न मिटने वाली लकीरें बना गईं. जैसा कि वे बताते हैं, ‘इसके चलते मैं सेक्स के मामले में अक्षमता का शिकार हो गया. साथ ही मैं अक्सर अवसाद में रहने लगा.’ फिर जब कश्यप दिल्ली आए तो उन्होंने शरीर को गठीला बनाया और जल्द ही कॉलेज में मारपीट करने वाले छात्र के रूप में कुख्यात हो गए. वे कहते हैं, ‘मैं फिर से वह सब झेलना नहीं चाहता था.’

कॉलेज के दिनों में जूनियर्स के साथ ज्यादा वक्त बिताने की वजह से कश्यप के क्लासमेट्स उन्हें बच्चों का दादा कहकर चिढ़ाते थे

कुछ साल पहले ही उन्होंने अपने परिवार को अपने साथ हुए शोषण के बारे में बताया. हाल ही में काफी कोशिश करके उन्होंने उन लोगों के साथ भी आंखें मिलाईं जिनके दुर्व्‍यवहार का वे शिकार हुए थे. कश्यप ने उन्हें माफ तो कर दिया मगर एक पिता के रूप में उन्हें हमेशा इस बात का ध्यान रहता है. 10 साल की बेटी आलिया के बारे में बात करते हुए कश्यप कहते हैं, ‘मैं उसे छूते हुए बहुत सावधान रहता हूं.’

अपने बनारस से होने को लेकर कॉलेज में कश्यप असुरक्षा के शिकार थे. मगर उनके आसपास ऐसे लोगों की कमी नहीं थी जिन्हें जिंदगी में किसी बात को लेकर असुरक्षा नहीं थी. इनमें एक लड़की भी थी जिसने ब्वॉयज हॉस्टल में एक लड़के के कमरे में एक रात बिताकर स्कैंडल खड़ा कर दिया था और अगली ही सुबह इससे बेपरवाह वह उस लड़के की शर्ट पहनकर कॉलेज की मेस में नाश्ता करने चली आई थी. उस सहित कई और लड़कियां कश्यप की करीबी दोस्त बनीं जिन्होंने औरत के भीतर के संसार को समझने में उनकी मदद की. उनकी फिल्में भले ही पुरुष प्रधान रही हों मगर उनमें महिलाओं की उपस्थिति खासी सशक्त रही है. भीखू म्हात्रे की पत्नी प्यारी, देव डी की पारो और चंदा, नो स्मोकिंग की डांसर्स और गुलाल के महिला चरित्र इसका सबूत हैं.

उनके माता-पिता भले ही इस बात को लेकर परेशान रहे हों कि अपने इस बेचैन और उपद्रवी बेटे से कैसे निपटा जाए मगर मुंबई में उनका एक करीबी परिवार बन गया है. रुचा पाठक उन्हें अपने भाई जैसा मानती हैं तो अनुभवी थियेटर कलाकार और गुलाल के असाधारण संगीत रचयिता उन्हें अपने पिछले जन्म का बेटा बताते हैं.

कई साल पहले फिल्मकार इम्तियाज अली अपने पुराने कॉलेज हिंदू में आए थे. कश्यप ने जब सुना कि अली एक टेलीविजन सीरियल के लिए एक्टरों के चुनाव में मदद कर रहे हैं तो वे उनसे मिलने जा पहुंचे. सीरियल तो बन नहीं पाया मगर थियेटर में गहरा शौक रखने वाले अली और कश्यप की बढ़िया छनने लगी. बाद में अली ने मुंबई में एक एडवरटाइजिंग कोर्स ज्वॉइन कर लिया और कश्यप से उनका संपर्क टूट गया. एक शाम जब वे जेवियर हॉस्टल लौटे तो उन्होंने पाया कि कश्यप उनका इंतजार कर रहे हैं. दरअसल मुंबई में रहने के लिए उनके पास कोई ठिकाना नहीं था और वे कुछ समय तक अली के हॉस्टल रूम में रहे.

उन दिनों को याद कर कश्यप कहते हैं, ‘नौकरी के बावजूद ऐसे दिन रहे जब मुझे खुले आसमान के नीचे सोना पड़ता था.’ अगले ही पल वे मजाकिया लहजे में कहते हैं, ‘लेकिन मेरा टॉयलेट ताज में था.’ कश्यप की जिंदगी अली के साथ गुंथी रही जो मानते हैं कि कश्यप इतने भी दुर्भाग्यशाली नहीं थे. जैसा कि अली कहते हैं, ‘अनुराग को अपनी फिल्में बनाते वक्त काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा और वे काफी निराश भी रहे. मगर ये होता रहता है. कम से कम उन्हें फिल्में बनाने के मौके तो मिलते रहे.’

अब जब कश्यप की एक खास पहचान बन गई है तो ये खतरा भी बढ़ गया है कि ये सफलता कहीं उन्हें रामगोपाल वर्मा की राह पर न ले जाए. कामयाबी का ये नशा कहीं उन्हें एक ऐसी दुनिया में न पहुंचा दे जहां हर कोई उनसे सहमत दिखे. अगर उनकी अगली फिल्म में जैसा चाहा प्राप्त करने की भावना देव-डी से ज्यादा दिखे तो क्या उनके शुभचिंतक उन्हें चेताने की जहमत उठाएंगे?

जहां तक कश्यप का सवाल है तो सफलता का स्वाद चखने के बाद अब वह धड़ाधड़ फिल्में बनाने की इच्छा नहीं रखते. वे कहते हैं, ‘मुझे डर लग रहा है कि कामयाबी के इस खुमार में मैं पता नहीं कैसी फिल्म बना बैठूं. यही वजह है कि मैं अभी कुछ समय तक कुछ नहीं करूंगा. और मैं जानबूझकर बजट भी कम करने जा रहा हूं.’ पिछले ही हफ्ते उन्होंने पैशन फॉर सिनेमा पर लोगों से उस सिनेमा पर ध्यान देने की अपील की जिसकी वे पैरोकारी करते हैं. उन्होंने लिखा, ‘फिराक और बारहआना जैसी फिल्मों पर चर्चा क्यों नहीं हो रही? ये दोनों ही फिल्में आज मैंने खाली थियेटर में बैठकर देखी हैं.’

फिलहाल कश्यप डोगा की स्क्रिप्ट लिख रहे हैं. उन्हें राज कॉमिक्स का सुपरहीरो डोगा पसंद है जिसके पास सुपरपॉवर्स के बजाय सिर्फ भावनाओं की तीव्रता होती है. ये बड़े बजट की फिल्म होगी और इसमें काफी स्पेशल इफेक्ट्स भी होंगे. आजकल कश्यप काफी शांत हैं और इसका काफी श्रेय उनकी गर्लफ्रेंड कल्कि कोक्लिन को जाता है. अपनी पत्नी आरती बजाज, जो कि एक एडिटर भी हैं, से अलग हुए उन्हें तीन साल हो चुके हैं. कश्यप बताते हैं, ‘वह मेरी पीने की आदत और अवसाद से परेशान हो गई थी. हालांकि हम अब भी साथ-साथ काम करते हैं.’ बीच में उनका संबंध एक्ट्रेस आएशा मोहन से भी रहा मगर ये ज्यादा नहीं चल पाया.

कल्कि का आना उनकी जिंदगी में अप्रत्याशित रहा. दरअसल देव-डी में चंदा की भूमिका के लिए अभिनेत्री की तलाश जोर शोर से चल रही थी. कश्यप ने कल्कि का पोर्टफोलियो देखते ही ये कहते हुए रिजेक्ट कर दिया कि, ‘मैं कोई गोरी मॉडल टाइप लड़की नहीं चाहता.’ उन्होंने कल्कि का ऑडिशन भी नहीं देखा. मगर फिर बाद में हालात कुछ ऐसे बदले कि वही कल्कि कश्यप को चंदा के रोल के लिए सबसे फिट लगीं. फिल्म बनाने के बाद कश्यप अमेरिका चले गए जहां उन्हें ये अहसास हुआ कि उन्हें कल्कि से प्यार हो गया है. उधर, कल्कि का हाल भी कुछ यही था. फिल्म इंडस्ट्री में लोग अक्सर प्रेम संबंधों को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने से कतराते हैं मगर कश्यप और कल्कि इस मामले में काफी खुले मिजाज के रहे हैं. कश्यप के मुताबिक अब वे काफी बदल गए हैं. अब वे पार्टियों में देर रात तक नहीं रहते.

कॉलेज के दिनों में जूनियर्स के साथ ज्यादा वक्त बिताने की वजह से कश्यप के क्लासमेट्स उन्हें बच्चों का दादा कहकर चिढ़ाते थे. आज भी कश्यप फिल्मी दुनिया के जूनियर्स यानी कि नए विचारों से भरे हुए प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी लेखकों और निर्देशकों से घिरे रहते हैं. इस साल उनकी इन प्रतिभाओं की चार सबसे बेहतरीन स्क्रिप्ट्स पर फिल्म बनाने की योजना है.

कश्यप और उनके समकालीन इम्तियाज अली, श्रीराम और श्रीधर राघवन, शिवम नायर और निशिकांत कामत बॉलीवुड की दुनिया में नए सांचे गढ़ रहे हैं. वे हर स्तर पर एक दूसरे को अपनी स्क्रिप्ट दिखाते रहते हैं. यही नहीं, फिल्म के आलोचकों और जनता तक पहुंचने से पहले वे इसे एक दूसरे को दिखाते हैं. ये सभी दोस्त आज इससे खुश हैं कि कश्यप की बेचैनी से उपजी सृजनात्मकता का जादू आखिरकार पूरी तरह से चल गया है.