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शहनाई के छंदों की कहानी

पुस्तक :     सुर की बारादरी

लेखक :     यतींद्र मिश्र

कीमत :     99 रुपए

प्रकाशक:     पेंगुइन बुक्स

हालांकि लेखक यतीन्द्र मिश्र कहीं भी ऐसा दावा नहीं करते और वे इसे बिस्मिल्ला खां की कला और उनके व्यक्तित्व को अपनी छोटी सी भेंट भर मानते हैं, फिर भी सुर की बारादरी पेंग्विन की जीवनी श्रंखला की पुस्तक है. जीवनियों की अक्सर खासियत होती है कि वे अपने नायक को इतना महान मान लेती हैं कि उनके बचपन की आम घटनाएं भी किशोर पत्निकाओं के प्रेरक प्रसंगों वाला स्तम्भ भरने के काम आ सकती हैं. कुछ अपेक्षाकृत अधिक तटस्थ जीवनियां कुछ अँधेरे कोनों पर से भी पर्दा उठाती हैं. यदि सुर की बारादरी के आकार को हम भूल भी जाएं और उम्मीद करें कि बिस्मिल्ला खां साहब से मुलाकातों के आधार पर लिखी गई यह किताब, जीवनी जैसी कुछ हो सकती है तो भी इसमें ऊपर लिखी दूसरी विशेषता तो है ही नहीं. यह आपके सामने कोई रहस्य नहीं खोलती और ऐसी ही कुछ बातें और यादें आपके साथ बांटती है, जिनकी बिस्मिल्ला खां के स्तर के किसी भी फ़नकार से आप अपेक्षा करते होंगे. चलिए, इसे निबंधों का एक संकलन मान लेते हैं. तब भी ये इतने आदर से भीगे हैं (वैसे यदि आप बिस्मिल्ला खां पर लिख रहे हैं तो यह स्वाभाविक भी है) कि आप आसानी से लेखक की निष्पक्षता को चुनौती दे सकते हैं. मगर अपनी विषयवस्तु में पारंपरिक होते हुए भी ये निबंध अपनी भाषा और शैली में इतने नए और स्वतंत्न हैं कि कहीं कविता जैसे हो जाते हैं, कहीं कहानी जैसे और कहीं अचानक सिर्फ साक्षात्कार बन जाते हैं. यतीन्द्र दशकों पुरानी बातें वर्तमान काल में लिखने लगते हैं और तब चौदह साल के अमीरुद्दीन का रसूलनबाई के कोठे की सीढियों पर बैठकर संगीत की वर्णमाला सीखना किसी दिलचस्प कहानी सा रसीला हो जाता है. किताब की खास बात यह है कि यह अपनी सीमायें नहीं बनाती और न ही क्रम से घटनाएं सुनाती है. अध्यायों का आकार भी निश्चित नहीं है और प्रवाह में बहते हुए कहीं अनीस के मर्सिए बीच में आ जाते हैं और कहीं कबीर के दोहे. बीच में एक फ़कीर चला आता है, जो अमीरुद्दीन को आशीर्वाद देता है, ‘बजा, बजा, जा बेटा मजा करेगा- बजा!और फिर बिस्मिल्ला खां की शहनाई अपने सुरों से दुनिया जीतती चली जाती है.

सन सैंतालीस की पंद्रह अगस्त को आंसुओं में भीगे बिस्मिल्ला लालकले पर राग काफ़ी बजाते हैं और यह सब बताते हुए यतीन्द्र कोशिश करते हैं कि वे भी एक सुर से दुसरे सुर तक बिना टूटे जा सकें. यही बिस्मिल्ला खां का भी सर्वाधिक सशक्त पक्ष था और इस तरह यतीन्द्र अपने नायक की शैली में ही उसकी कथा लिखते हैं. यतीन्द्र यादों को ईमानदारी से क्रमबद्ध करने की कोशिश में थे और वे सफल भी रहे हैं. हां, इस चक्कर में कई बातों का दोहराव जरूर हुआ है क्योंकि यादें फिल्टर होकर नहीं आती, गड्ड-मड्ड होकर ही आती हैं. बिस्मिल्ला खां अपना पूरा काम बनारस और परवरदिगार को

इस तरह समर्पित कर गए हैं और लेखक भी उसमें कोई अवरोध नहीं डालता इसलिए कहीं-कहीं लगता है कि यह पुस्तक संगीत और अध्यात्म के संबंध पर तो नहीं है. आप संगीत का ककहरा जानते हैं तो इस किताब का ज्यादा आनंद ले सकते हैं और नहीं जानते, तो भी पढ़ सकते हैं. कुछ-कुछ जान जायेंगे.

गौरव सोलंकी

खुशी प्रायोजित की जाएगी

खुशी प्रायोजित की जाएगी

ठंडे चूल्हे के पास बैठी हुई

एक बीमार औरत मुस्कराएगी

लंबी गाड़ी से उतरेगी

एक गदराई हुई औरत

और बनावटी फूल

बीमार औरत को सौंपकर

नए साल की शुभकामनाएं देगी

हताश चेहरे जादुई शीशे में

खिले हुए नजर आएंगे

सरकार जादुई शीशों का

मुफ्त वितरण करेगी

असफलताओं की वीरानी में

एक उत्सव का मंजर होगा

मरघट जगमगा उठेंगे

खोमचेवाले बेचेंगे सपने

जिन्हें ठीक से नींद नहीं आती

जो देश के बारे में इतिहास के बारे मेंअधिक सोचते हैं

उन्हें अफीम चाटने के लिए

मुहैया कराई जाएगी

पदवियां दी जाएंगी, पुरस्कार दिए जाएंगे

दुनिया देखेगी

खुशी से दमकते चेहरे

समाचार चैनलों पर

इंटरनेट पर

दिनकर कुमार
(गुवाहाटी निवासी कुमार पत्रकारिता से जुड़े हैं)
  

                                       

 

 

 

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‘साहित्य की कोपलें ‘ उभरते हुए अंकुरों को खाद-पानी देने का एक छोटा सा प्रयास है. आप भी इस वर्ग के लिए अपनी रचनाएं (फोटो और संक्षिप्त परिचय के साथ) mailto:hindi@tehelka.comपर ईमेल कर सकते हैं या फिर नीचे लिखे पते पर भेज सकते हैं.  

तहलका हिंदी, एम-76, एम ब्लॉक मार्केट, ग्रेटर कैलाश-2, नई दिल्ली-48

सरोकारी आविष्कार

प्रति घंटे 120 नैपकिन का उत्पादन करने वाली ऐसी करीब 100 मशीनें अब तक पूरे देश में लगाई जा चुकी हैं जिनमें से 29 तो सिर्फ हरियाणा में ही हैंकुछ दिन पहले तक विजया और लता नाम की बहनें कोयंबतूर में नाममात्र की तनख्वाह पर नौकरी किया करती थीं. पिछले साल नवंबर में उन्होंने जैसे-तैसे 85,000 रूपए इकट्ठा किए और उनसे एक स्थानीय कारीगर द्वारा ईजाद की गई मशीन खरीद डाली. बस तभी से मानो उनकी सारी आर्थिक परेशानियां छूमंतर हो गईं. इसका मतलब ये नहीं कि ये कोई नोट छापने की मशीन है. दरअसल इससे महिलाओं की सैनिटरी नैपकिन बनाई जाती है. ‘हमने एक तमिल पत्रिका में इसके बारे में पढ़ा था और तभी हमने इसे खरीदने का फैसला कर लिया था,’ लता कहती हैं. आज वो नैपकिन बेचकर महीने में 5000 रुपए से ज्यादा आसानी से कमा लेती हैं और उनका उत्पाद कोयंबतूर और आस पास के ग्रामीण क्षेत्रों में खासा सफल है. उनकी नैपकिन ‘टच फ्री’ के नाम से बाजार में उपलब्ध है. दोनों बहनें महीने में 7-8 हजार पैकेटों का उत्पादन करती हैं और एक पैकेट में आठ नैपकिन होते हैं. उनके आस-पास रहने वाली महिलाएं जहां सीधे-सीधे ही उनसे खरीददारी कर लेती हैं वहीं घरों, दफ्तरों और कॉलेजों में इसकी बिक्री करने के लिए उन्होंने कुछ सेल्सगर्ल्स भी रखी हुई हैं.

उनके घर से थोड़ी ही दूरी पर रहने वालीं अवकाशप्राप्त शिक्षिका राजेश्वरी ने भी इसी तरह का अपना एक छोटा सा कारखाना लगा रखा है. ‘हमारी नैपकिन बाजारों में बिकने वाली आम नैपकिन से मोटी होती है’ वो कहती हैं, ‘ये उन ग्रामीण महिलाओं को ध्यान में रखकर बनाई गई है जिन्हें दिन-भर खेतों में काम करना पड़ता है, जिससे कि एक ही पैड पूरे दिन चल सके.’

 

ए मुरुगनंथम 

बेहद कम लागत में तैयार होने वाली इस सैनिटरी नैपकिन को बनाने वाली मशीन 47 वर्षीय ए मुरुगनंथम का आविष्कार है जिन्हें दसवीं कक्षा में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी. प्रति घंटे 120 नैपकिन का उत्पादन करने वाली ऐसी करीब 100 मशीनें अब तक पूरे देश में लगाई जा चुकी हैं जिनमें से 29 तो सिर्फ हरियाणा में ही हैं. इसके अलावा इन मशीनों को उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड में भी लगाया जा रहा है. एक मोटे-मोटे अनुमान के मुताबिक मुरुगनंथम की ये मशीन आज देश भर में करीब ढाई लाख महिलाओं के काम आ रही है.

मुरुगनंथम को इस बात की जानकारी होने में ही दो साल लग गए कि सैनिटरी नैपकिन में प्रयोग होने वाली पैडिंग चीड़ के पेड़ के गूदे से बनती है न कि साधारण कपास सेअपने आविष्कार की जबर्दस्त सफलता के बावजूद मुरुगनंथम ने अपनी इस मशीन का पेटेंट अधिकार बेचने से साफ इनकार करते हुए एक निजी कंपनी का ब्लैंक चेक वापस कर दिया. उनका कहना था कि वो अपनी मशीन का उपयोग ग्रामीण और गरीब शहरी महिलाओं के बीच सफाई और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए करना चाहते हैं. मुरुगनंथम के मुताबिक देश के ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादातर महिलाएं सैनिटरी पैड के रूप में कपड़े का इस्तेमाल करती हैं जो कि असुरक्षित है और इससे तमाम तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है.

2006 में आईआईटी मद्रास ने मुरुगनंथम को ‘समाज के स्तर में सुधार के लिए किए गए आविष्कार’ की श्रेणी में प्रथम पुरस्कार से नवाजा था. उन्हें अक्सर बिजनेस स्कूलों में व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया जाता है. पिछले साल उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद में देश भर से उपस्थित हुए आविष्कारकों की बैठक को भी संबोधित किया था. मगर सफलता के इस मुकाम तक का संघर्ष आसान नहीं रहा. पिता के स्वर्गवास के बाद मुरुगनंथम के परिवार को काफी समय तक भीषण संघर्ष करना पड़ा था. उस दौरान कुछ सालों तक एक वेल्डिंग की दुकान में एक साधारण मैकेनिक का काम करने के बाद उन्होंने कोयंबटूर में अपनी खुद की खराद की दुकान खोली. चार सालों की अथक मेहनत के बाद उन्हें सैनिटरी नैपकिन बनाने वाली मशीन बनाने में सफलता मिली. उन्हें इस बात की जानकारी होने में ही दो साल लग गए कि सैनिटरी नैपकिन में प्रयोग होने वाली पैडिंग चीड़ के पेड़ के गूदे से बनती है न कि साधारण कपास से.

जैसे कि मुरुगनंथम बताते हैं, ‘जब मैंने शोध करना शुरू किया तो मेरे परिवार वालों को लगा कि मैं पागल हो गया हूं. यहां तक कि इस दौरान मेरी मां मुझे छोड़ कर चली गई और मेरी बहन ने मुझे नजरअंदाज करना शुरू कर दिया.’ लेकिन आज मुरुगनंथम की सफलता पर सभी को बेहद गर्व का अनुभव होता है.       

चौपट राजा

अपनी अक्षमता और असुरक्षा की भावना के चलते भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भाजपा को इस हालत में ला खड़ा किया है कि आज उसके अस्तित्व पर ही संकट मंडरा रहा है. वे और कब तक फूट डालकर राज करते रहेंगें? वरिष्ठ पत्रकार स्वपन दासगुप्ता का आलेख

भारत में किसी भी तरह का राजनीतिक संवाद एक पारंपरिक किस्म की शिष्टता से संचालित होता है. मगर 24 अगस्त को एनडीटीवी पर शेखर गुप्ता को दिए इंटरव्यू में अरुण शौरी अनौपचारिकता की हर सीमा लांघ गए. बिना कोई रहम दिखाए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और उसके शीर्ष नेतृत्व की बखिया उधेड़कर रख दी. उन्होंने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को टारजन, एलिस इन ब्लंडरलैंड, लापरवाह ठाकुर और एक ऐसा शख्स कहा जिसकी अकेली खासियत उसकी आल इंडिया रेडियो वाली आवाज है.

राजनाथ के पास जरूरी बौद्धिक आत्मविश्वास की कमी थी इसलिए उन्होंने फूट डालो और राज करो वाली नीति अपनाने की कोशिश की और अक्सर कोर कमेटी को पूरी तरह से नजर अंदाज कर दिया

अपने समूचे राजनीतिक करिअर में राजनाथ ने एक ऐसे राजनीतिक कपट का प्रदर्शन किया है जिससे भाजपा को तो नुकसान हुआ मगर उन्हें लगातार फायदा होता रहा और वे नेतृत्व की सीढ़ियां चढ़ते रहेशौरी राजनीति में नए नहीं हैं. इंटरव्यू देखते समय मुझे ऐसा लगा कि जैसे उन्होंने भाजपा के छोटे से इतिहास में सबसे लंबा राजनीतिक ‘सुइसाइड नोट’ लिख दिया हो. मगर मंगलवार की शाम मैं तब बुरी तरह से गलत साबित हुआ जब राजनाथ सिंह ने शौरी के निष्कासन से इंकार करते हुए लगभग क्षमापूर्ण मुद्रा में उनसे उनकी टिप्पणियों का आधार पूछने की बात कही, वो भी, अगर वे ऐसा करना चाहें और जब उनकी सुविधा हो तब. राजनाथ के करीबी सूत्रों द्वारा ये प्रचारित किया गया कि शौरी ने राजनाथ पर व्यक्तिगत हमला नहीं किया था और जसवंत सिंह के उलट ये हमला विचारधारा पर नहीं बल्कि राजनीति पर था इसलिए ये मोहम्मद अली जिन्ना को एक महान व्यक्ति करार देने से कहीं छोटा अपराध है.

शौरी से निपटने के इस तरीके पर नजर डाली जाए तो भाजपा अध्यक्ष का व्यवहार देखकर ऐसा लगता है जसे कोई हैडकांस्टेबल शराब पीकर लापरवाही से गाड़ी चलाते किसी राजा के खिलाफ कार्रवाई करने की कोशिश कर रहा हो. उनका ढुलमुल रवैया अनुशासन पर उनके उस सख्त रूख के बिल्कुल उलट था जो शिमला में तीन दिन तक हुई पार्टी की चिंतन बैठक में देखा गया था.

अगर बहुत दयानतदारी दिखाई जाए तो कहा जा सकता है कि राजनाथ की इस कमजोरी की वजह ये भी हो सकती है कि टारजन और एलिस जैसे चरित्रों से जो उनकी तुलना की गई थी वो हिंदी में अनुवाद के बाद उतनी असरकारी नहीं रह गई होगी. ये कहना कि राजनाथ को ये समझने की कोशिश की गई कि टारजन से उनकी तुलना करके शौरी ने एक तरह से उनकी तारीफ ही की है क्योंकि टारजन कुलीन वंश से ताल्लुक रखने वाला एक अंग्रेज था जिसने जंगल की अराजकता को खत्म कर वहां एक व्यवस्था कायम की, कुछ दूर की हांकने जैसा ही होगा.

दोहरे मापदंडों के इस निर्लज्ज प्रदर्शन ने उस नेता के काम करने की शैली को उजागर करने का काम किया है जो 2006 से भाजपा संगठन की पतवार थामे हुए है और जो अगले साल जुलाई या अगस्त तक इस पद पर बने रहने की योजना बना रहा है. पार्टी के 29 साल के इतिहास को देखा जाए तो राजनाथ सिंह अब तक के सबसे विवादित पार्टी अध्यक्ष रहे हैं. उनके नाम का जिक्र हो तो मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं. जसवंत सिंह उन्हें एक ऐसा प्रांतीय नेता कहकर खारिज कर चुके हैं जो इस पद के लायक नहीं है. उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ विधायक ने मुझसे कहा था कि उनकी उपलब्धियां उनके प्रदर्शन से मेल खाने वाली नहीं हैं. उन पर जातिवाद या दूसरे शब्दों में कहें तो ठाकुरवाद के आरोप तो नियमित तौर पर लगते ही रहे हैं.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में बुरी तरह हार के बाद राजनाथ ने किसी भी तरह की चर्चा इसलिए नहीं होने दी क्योंकि उन्हें डर था कि इससे उठने वाले सवालों के घेरे में वे भी आ सकते हैंइसके बावजूद राजनाथ दृढ़ता से जमे रहे और हर संकट के पार निकलते रहे. उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि उनकी प्रासंगिकता हमेशा बनी रहे. इतनी उथल-पुथल के बावजूद अपनी खास भूमिका कायम रखने की राजनाथ सिंह की योग्यता को समझने के लिए उन हालात पर नजर डालना जरूरी है जिनमें उनकी नियुक्ति हुई थी. जब 2005 के मध्य में संघ ने आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने का फैसला किया तो उनके उत्तराधिकारी की खोज बड़ी मुश्किल साबित हो रही थी. जिन लोगों को आडवाणी ने नेतृत्व वाले पदों तक पहुंचाया था उनमें से ज्यादातर ऐसी विवादित परिस्थितियों में पद संभालने को लेकर सशंकित थे. ऐसे में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में वेंकैय्या नायडू को फिर से चुने जाने पर आम-सहमति बनी जिन्होंने 2004 के आम चुनाव में पार्टी की हार के बाद कार्यकाल के बीच में ही अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था. लेकिन फिर संघ ने हस्तक्षेप करते हुए राजनाथ सिंह को चुना और सुनिश्चित किया कि वे सबकी सहमति से अध्यक्ष पद के लिए चुने जाएं. अटल बिहारी वाजपेयी पूरी तरह से राजनाथ के साथ थे. हालांकि आडवाणी उन्हें लेकर उत्साहित नहीं थे.

2005 में राजनाथ अगर वाजपेयी को भाने लगे थे तो इसके अपने कारण थे. वाजपेयी जब किसी को पसंद करते थे तो बुरी तरह पसंद करते थे और नापसंदगी के मामले में भी ऐसा ही होता था. पिछले कुछ समय से उन्हें कल्याण सिंह से अरुचि हो गई थी जो उत्तर प्रदेश में निर्विवादित रूप से पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेता थे. वाजपेयी ने कल्याण को अस्थिर करने के हर कदम का मजबूती से समर्थन किया. अब ये कुछ अगड़ी जाति के नेताओं की लगातार चुगली के चलते हुआ या फिर पिछड़ों की राजनीति को लेकर कल्याण सिंह के भेदभाव की वजह से, ये अनुमान का विषय है. वाजपेयी ने कल्याण को अस्थिर करने के हर कदम को अपना जबर्दस्त समर्थन दिया.

इसका परिणाम ये हुआ कि उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में राजनाथ एक समानांतर सत्ता केंद्र के रूप में उभरे और 1999 में कल्याण के निष्कासन और रामप्रकाश गुप्त के छोटे से कार्यकाल के बाद उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई. फिर 2003 में विधानसभा चुनाव हुए. ये चुनाव पार्टी राजनाथ के नेतृत्व में लड़ रही थी. पार्टी को मुंह की खानी पड़ी और वह सत्ता खोकर तीसरे स्थान पर पहुंच गई. मगर राजनाथ पर कोई दोष नहीं मढ़ा गया. उन्हें चुपचाप राज्य की राजनीति से केंद्र की राजनीति में स्थानांतरित कर कैबिनेट मंत्री बना दिया गया. 2004 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की हार के बाद उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया. मगर वे कभी भी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति के मुख्य किरदारों में नहीं रहे.

सुशील मोदी को बिहार के उपमुख्यमंत्री पद से हटाने के अभियान के पीछे भी दिल्ली से की गई इसी तरह की कोशिश थी. ये बगावत, जिसे राष्ट्रीय अध्यक्ष के दफ्तर से जुड़े लोगों का खुला समर्थन हासिल था

संघ ने अगर राजनाथ को आडवाणी का उत्तराधिकारी बनाया तो ऐसा उसने कुछ बुनियादी कारणों के चलते किया. पहला, राजनाथ तुलनात्मक रूप से एक पहचानविहीन चेहरा थे जिनका राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा वजन नहीं था. इसके अलावा राजनाथ खुद को संघ का वफादार साबित कर चुके थे और उनसे अपेक्षा थी कि वे पार्टी पर संघ की पकड़ और भी मजबूत करने में सहयोग देंगे. चूंकि वे आडवाणी के खेमे से नहीं थे इसलिए उनसे ये भी उम्मीद की जाती थी कि वे पार्टी में आडवाणी की मजबूत पकड़ का मुकाबला करेंगे.

संगठन की कमान संभाले राजनाथ को तीन साल हो गए हैं और इस दौरान उन्होंने भाजपा पर पकड़ मजबूत करने में संघ की काफी मदद की भी है. संघ द्वारा नियुक्त किए गए संगठन सचिवों को केंद्र और राज्यों में जो अधिकार दिए गए उसने राजनीति और राजनेताओं की अहमियत कम करने का रास्ता प्रशस्त किया.

पार्टी पर संघ की पकड़ मजबूत करने की प्रक्रिया में मददगार बनते समय राजनाथ ने इस बात का काफी ध्यान रखा कि पार्टी पर उनकी खुद की पकड़ भी मजबूत हो. इस कोशिश में उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीतिक शैली पर चलना शुरू किया जो उस हर चीज के उलट थी जो पार्टी अब तक करती आ रही थी. इस वजह से उनपर ये आरोप लगे हैं कि उन्होंने एक विस्तृत आधार वाले राजनीतिक दल को एक संप्रदाय में तब्दील करके रख दिया है.

राजनाथ की शैली की पहली विशेषता है फूट डालकर राज करने के दृष्टिकोण की तरफ उनका झुकाव. भाजपा हमेशा इस बात पर गर्व करती थी कि ये एक जीवंत लोकतांत्रिक प्रक्रिया से संचालित होने वाली पार्टी है जिसमें सभी मुद्दों और फैसलों पर बहस होती है और उन पर समग्रता से विचार किया जाता है – कम से कम शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर. परंपरा के मुताबिक हमेशा पार्टी अध्यक्ष का फैसला अंतिम होता था मगर उस आखिरी फैसले पर पहुंचा सामूहिक सहमति से जाता था. राजनाथ ने इस प्रक्रिया को कई तरीकों से ध्वस्त कर डाला. चूंकि अपने फैसलों पर बहस के लिए उनके पास जरूरी बौद्धिक आत्मविश्वास की कमी थी इसलिए उन्होंने फूट डालो और राज करो वाली नीति अपनाने की कोशिश की और अक्सर कोर कमेटी को पूरी तरह से नजर अंदाज कर दिया. उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में बुरी तरह हार के बाद राजनाथ ने किसी भी तरह की चर्चा इसलिए नहीं होने दी क्योंकि उन्हें डर था कि इससे उठने वाले सवालों के घेरे में वे भी आ सकते हैं.

पार्टी को ‘हम’ और ‘वे’ में बांटने की इस कोशिश का नतीजा ये हुआ कि राज्यों से जुड़े मसलों में एकतरफा हस्तक्षेप बढ़ने लगा. 2007 की शुरुआत में संघ के एक धड़े के सहयोग से नरेंद्र मोदी और वसुंधरा राजे को अस्थिर करने और अगर मुमकिन हो तो गद्दी से हटाने का अभियान शुरू हुआ. खासतौर से मोदी के खिलाफ तो एक तरह से जाति आधारित विद्रोह शुरू हो गया और उन्हें 2007 का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा. वसुंधरा बागियों से निपटने के मामले में कम माहिर साबित हुईं और 2008 में हुए विधानसभा चुनावों में भितरघात उन्हें ले डूबा. ये देखना दिलचस्प है कि आज वसुंधरा के खिलाफ चल रहे अभियान में जो सबसे आगे खड़े दिख रहे हैं वे वही हैं जो भाजपा की सत्ता के दौरान भी वसुंधरा की जड़ें खोदने में सबसे ज्यादा सक्रिय थे. 2008 की हार के बाद भाजपा सही नतीजे पर पहुंची कि हार और जीत के बीच का अहम फर्क पार्टी की भीतरी कलह रही. मगर जब इसके तुरंत बाद ही भितरघात के दोषियों को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा पुरस्कृत करने की कोशिश हो तो इस आरोप में दम नजर आता है कि गुटबाजी और अंतर्कलह को केंद्रीय इकाई द्वारा प्रायोजित किया गया था.

सुशील मोदी को बिहार के उपमुख्यमंत्री पद से हटाने के अभियान के पीछे भी दिल्ली से की गई इसी तरह की कोशिश थी. ये बगावत, जिसे राष्ट्रीय अध्यक्ष के दफ्तर से जुड़े लोगों का खुला समर्थन हासिल था, कामयाब भी हो जाती अगर इस मसले पर मतदान के जरिए पार्टी विधायकों की राय नहीं ली गई होती. मतदान में मोदी खासे अंतर से जीत गए.

इसी तरह उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूड़ी को ज्यादातर पार्टी विधायकों का समर्थन हासिल था. मगर उनमें इतनी दक्षता नहीं था कि वे बागियों और दिल्ली में बैठे उनके समर्थकों से निपट सकें. आखिरकार उन्हें बेइज्जत होकर जाना पड़ा. अपनी गुटीय संघर्षों के लिए जो फायदेमंद हो उसे पार्टी-हित से जोड़ देने की प्रवृत्ति राजनाथ की खास पहचान रही है. गहन विश्लेषण से ये नतीजा निकलता है कि भाजपा 2009 का आम चुनाव हार गई क्योंकि वोटर को आडवाणी के नेतृत्व पर पर्याप्त भरोसा नहीं था. मगर हार इतनी बडी होगी ये सुनिश्चित करने में राजनाथ की भी भूमिका रही. कल्याण सिंह के साथ उन्होंने रिश्ते इतने कड़वे कर लिए कि एक छोटी सी बात पर कल्याण ने भाजपा से किनारा कर लिया. राजनाथ ने झारखंड में बाबूलाल मरांडी के लौटने की हर संभावना समाप्त कर दी. उड़ीसा में ऐसी स्थितियां उत्पन्न कर दी गईं कि नवीन पटनायक ने भाजपा से गठबंधन तोड़ अपने बूते लड़ने का फैसला किया. वरुण गांधी का समर्थन करने में उन्होंने जरूरत से ज्यादा सक्रियता दिखाई और शहरी क्षेत्रों में वोटरों को पार्टी से दूर भगा दिया. यही नहीं उत्तर प्रदेश में उन्होंने सुनिश्चित कर दिया कि पार्टी संगठनात्मक स्तर पर पूरी तरह निष्क्रिय हो जाए.

चुनावों के बाद उन्होंने फैसला किया कि अब अरुण जेतली को ठिकाने लगाने का वक्त है. इसके लिए उन्होंने कई नेताओं को उनके खिलाफ बोलने के लिए उकसाया. इसके पीछे का विचार ये था कि जेतली विवादों में घिर जाएं और अध्यक्ष पद के लिए उनकी उम्मीदवारी की हर संभावना का अंत हो जाए. कहा ये भी जा रहा है कि हार के कारणों पर अहस्ताक्षरित दस्तावेज बाल आप्टे द्वारा सौंपे जाने की बात भी राजनाथ के खासमखास लोगों ने लीक की थी. अब राजनाथ का कार्यकाल खत्म होने जा रहा है तो उन्होंने काफी राज्यों में संगठन की चुनाव प्रक्रिया को पटरी से उतारकर अगले साल जुलाई या अगस्त तक अपने पद पर जमे रहने की संभावना को पक्का कर लिया है.

यहां पर ये भी कहना उचित होगा कि 2009 की हार की जिम्मेदारी के अपने हिस्से से राजनाथ बच गए क्योंकि आडवाणी ने लोकसभा में विपक्ष का नेता बने रहने का दुर्भाग्यपूर्ण फैसला लिया. अगर आडवाणी इससे इस्तीफा देने के अपने पुराने फैसले पर कायम रहते तो निश्चित था कि नैतिक आधार पर उनके पास पार्टी में अपनी बात मनवाने की सर्वोच्च ताकत होती. ऐसे में जब कमान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के हाथ में जाती तो आडवाणी इस प्रक्रिया को बेहद आसान बनाने की स्थिति में होते. मगर विपक्ष के नेता के पद जमे रहकर उन्होंने खुद को आलोचना और उपहास का पात्र बना लिया है जिससे उनकी राजनीतिक सत्ता का क्षय हुआ है. आडवाणी के इस कदम का कुल जमा लाभ राजनाथ को हुआ है. इससे न सिर्फ उन्हें अपनी जिम्मेदारी से बचने का मौका मिला है बल्कि अब वे उन सभी की अहमियत को भी कम कर सकते हैं जिन्हें आडवाणी ने आगे बढ़ाया है.

अपने समूचे राजनीतिक करिअर में राजनाथ ने एक ऐसे राजनीतिक कपट का प्रदर्शन किया है जिससे भाजपा को तो नुकसान हुआ मगर उन्हें लगातार फायदा होता रहा और वे नेतृत्व की सीढ़ियां चढ़ते रहे. आज अगर भाजपा इस हालत में पहुंच गई है जहां इसके अब एक सार्थक संगठन के रूप में जीवित रह पाने की क्षमता पर ही सवाल उठने लगे हैं तो इसकी कुछ जिम्मेदारी संघ की भी है. अगर संघ ने नैतिक मार्गदर्शक की अपनी भूमिका सही तरह से निभाई होती तो राजनाथ की ये हिम्मत ही नहीं होती कि वे हर कदम पर केले के छिलके फेंककर मासूम दिखने का नाटक कर पाते.

मगर ऐसा करने की बजाय संघ अपनी अचूकता पर भरोसा करता रहा और ये मानने को तैयार ही नहीं था कि 2006 में इससे बहुत बड़ी चूक हुई. यहां तक कि अब भी संघ के कुछ पदाधिकारी इस बात के लिए दबाव डाल रहे हैं कि पार्टी संविधान में बदलाव कर दिया जाए जिससे राजनाथ को फिर से पार्टी अध्यक्ष बनाने का रास्ता साफ हो सके. अगर ऐसा होता है तो फिर आने वाले वक्त में राजनाथ अपने उत्तराधिकारी को जो भाजपा सौंप रहे होंगे वह पार्टी की बजाय एक लेटरहेड मात्र होगी. अगर वे अब भी विदा ले लें तो भी उनके उत्तराधिकारी को भाजपा का खोया गौरव बहाल करने के लिए किसी चमत्कार से कम की जरूरत नहीं होगी.        

विपक्षी दल में झगड़ा

 चक्र सुदर्शन

 

 

क्या आज्ञा आका बता, झुककर बोला जिन्न,

देख जिन्न को सामने, मन हो गया प्रसन्न.

मन हो गया प्रसन्न, मिटा दे मन का रगड़ा,

आज विपक्षी दल में, तू करवा दे झगड़ा.

चक्र सुदर्शन, जिन्न कहे, कांग्रेसी आका!

हूं अदना सा जिन्न, मुझे जिन्ना समझा क्या?

 

अशोक चक्रधर

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मरे जिन्ना लाख के

एक्सप्रेस के लोगों से विचार विनिमय में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी जी ने कहा मुझे सचमुच बिल्कुल समझ नहीं आता कि भाजपा नेता जिन्ना का मूल्यांकन करने में इतने उत्सुक क्यों हैं? मैं जानना चाहता हूं कि इस मामले में इतनी गहराई से लगने को उन्हें प्रोत्साहित क्या कर रहा है?

सावरकर को लगता था या ऐसा वे चाहते थे कि अंग्रेज जाते जाते मुसलमानों को अगर पाकिस्तान दे कर जाएंगे तो हिंदुस्तान हिंदुओं को यानी उनकी हिंदू महासभा को देकर जाएंगे

प्रणब बाबू की उत्सुकता को शांत करने की कोशिश अपन आगे करेंगे. फिलहाल देख लें कि वे क्या और कह रहे हैं. उनने कहा- मुझे यह भी बिल्कुल समझ नहीं पड़ता कि जिन्ना की धरोहर को जानने बताने में वे इतनी गहराई तक क्यों जा रहे हैं जबकि इसका आज की भारतीय राजनीति से कोई लेना देना नहीं है. राजनैतिक पार्टियों को इतिहास में जिन्ना की जगह का मूल्यांकन करने की ऐसी क्या और क्यों पड़ी हुई है? जिन्ना के मामले में भाजपा का बार-बार संकट में पड़ना भी मेरी समझ में नहीं आता. इतिहास जहां है उसे वे वहीं क्यों नहीं रहने देना चाहते? आज की भारतीय राजनीति में जिन्ना के मूल्यांकन की क्या प्रासंगिकता है? मूल्यांकन का काम इतिहासकारों को करने दीजिए. आप इतिहासकार की भूमिका में आना चाहते हैं तो ठीक है आइए. लेकिन तब आपको वस्तुनिष्ठ होना पड़ेगा.

जसवंत सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, शेषाद्रि, सुदर्शन आदि कहेंगे कि हम तो अपने आकलन में वस्तुनिष्ठ हैं. गड़बड़ तो वामपंथी और कांग्रेसी इतिहासकारों ने की है. वे सच बोल रहे हैं कि नहीं इसका अंदाज लगाने में आपकी उमर बीत जाएगी. इसलिए इस बात को छोड़कर अपन प्रणब बाबू के सवाल पर आ जाएं कि संघी लोगों को जिन्ना के आकलन में इतनी गहराई से पड़ने को कौन और क्या लगा रहा है और इस मामले में वे इतने उत्सुक क्यों हैं?

आप जानते हैं कि हिन्दुत्व पर अपना निबंध विनायक दामोदर सावरकर ने सन तेईस में लिख दिया था. दो साल बाद केशव बलिराम हेडगेवार ने उस विचार को मूर्त करने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की. उनसे पूछा गया कि राष्ट्रीय क्यों हिन्दू क्यों नहीं? तो डाक्टर साब ने कहा हिंदू ही राष्ट्रीय है. यह सावरकर के हिंदू राष्ट्रवाद का सटीक उदाहरण है. लेकिन आप देखिए कि सन पच्चीस से सैंतालीस तक यानी भारत के आजाद होने तक राष्ट्रीय जीवन में संघ बाईस रहा. लेकिन देश की आजादी में उसने अपनी चींटी उंगली भी नहीं चलाई. सन बयालीस में अंग्रेजों ने सभी तरह की सैनिक-अर्धसैनिक गतिविधियों पर रोक लगा दी. गुरू गोलवरकर ने शाखा का सैनिक विभाग तत्काल बंद कर दिया. संघ की गांधी की अहिंसा में निष्ठा नहीं थी तो सशस्त्र क्रांतिकारियों के साथ हो सकता था, लेकिन सशस्त्र कार्रवाई में भी वह नहीं पड़ा. आजादी का आंदोलन उसकी गतिविधियों में रहा ही नहीं.

जिन्ना का लाठी की तरह इस्तेमाल करते हुए ये गांधी और नेहरू की पिटाई कर सकते हैं. जसवंत सिंह और सुदर्शन ने तो कह ही दिया है कि जिन्ना को कट्टर मुस्लिम राष्ट्रवादी कांग्रेस, गांधी और नेहरू ने बनाया 

क्योंकि अंग्रेज, संघ और हिंदुत्ववादियों के शत्रु नंबर एक नहीं थे. शत्रु नंबर एक भारतीय मुसलमान थे. सावरकर ने स्थापित किया था कि भारत में राष्ट्र सिर्फ हिन्दू है. मुसलमान और ईसाई सिर्फ समुदाय हैं क्योंकि वे बाहरी और विदेशी धर्मो को मानते हैं. उनकी पुण्य-भू विदेश में है इसलिए भारत के प्रति वफादार वे कभी हो ही नहीं सकते. जब तक वे इन धर्मों को छोड़ कर वापस हिंदू धर्म में नहीं आते उन्हें हिंदुत्व प्राप्त नहीं हो सकता. इसलिए संघ वालों ने सांप्रदायिक दंगों में मुसलमानों से हिंदुओं को बचाना अपना पहला काम माना. सन सत्ताईस के नागपुर दंगे से लेकर सन सैंतालिस के भारत विभाजन तक संघ दंगों में हिंदुओं की तरफ से लड़ता और उन्हें बचाता रहा. जिन वर्षों में भारत विभाजन की साजिश हुई और योजना बनी उसे रोकने या होने देने में संघ ने कुछ नहीं किया. भारतीय जनसंघ विभाजन के चार साल और भाजपा तैंतीस साल बाद बनी.

इस तरह संघ और उसकी राजनैतिक पार्टी का आजादी के आंदोलन और भारत विभाजन से कोई संबंध नहीं था. हां हिंदू राष्ट्रवाद और द्विराष्ट्रवाद ने मुसलिम राष्ट्रवाद और अलगाववाद की आंच में घी जरूर डाला. संघ और हिंदू महासभा के हिंदू राष्ट्रवाद ने भारत विभाजन में बड़ी भूमिका निभाई. वे अखंड भारत की बात करते रहे और विभाजन के लिए जिन्ना की तरह ही गांधी, नेहरु और पटेल को कोसते रहे लेकिन उसे रोकने के लिए उनने कुछ नहीं किया. पूछना चाहिए कि इस दुखद इतिहास में अगर उनका योगदान नहीं है तो भारत की आजादी और विभाजन पर संघियों के मन में इतनी गांठे क्यों हैं?

वे अकर्मण्य रहे इस कारण? नहीं वे खूब और पूरी तरह सक्रिय थे. भारत में मुसलमान अलग राष्ट्र हैं इसकी बात अगर पहली बार सन 1888 में सर सय्यद अहमद ने की थी तो तब के आर्य समाजी लाला लाजपत राय ने उसी साल उनकी आलोचना की. आर्य समाज के ही लोगों ने पंजाब के ऊपर के इलाके को अफगानिस्तान और उत्तर पश्चिम सीमाई राज्य से मिलाकर अलग मुसलिम राज बनाने की बात कही थी. अंग्रेजों की बनवाई मुसलिम लीग और उसके जवाब में हिंदू सभा तो बाद में बनी. हिंदू राष्ट्रवाद एक अन्तर्धारा तो ब्रिटिशराज के असर में बंगाल के पुनर्जागरण के समय से ही चल निकली थी. उसे एक व्यक्तिगत विचारधारा का रूप भले ही सावरकर ने सन तेईस में दिया हो. हिंदू राष्ट्रवाद की जननी हिंदू महासभा थी जिसने सावरकर के नेतृत्व में राजनैतिक आंदोलन का रूप दिया.

मुसलिम लीग का मुसलिम राष्ट्रवाद और हिंदू महासभा का हिंदू राष्ट्रवाद एक दूसरे से होड़ करते हुए एक दूसरे को पुष्ट करते थे. अंग्रेज बांटो और राज करो के हित में जब जैसी जरुरत होती इन दोनों का उपयोग करते. ये दोनों एक दूसरे के विरूद्ध तो थे लेकिन अंग्रेजों के तो साथ ही रहते और उनकी कृपा पाने की जुगत करते रहते. अंग्रेजों को सन सत्तावन के बाद सबसे बड़ा डर हिंदू-मुसलिम एकता से लगता था. लीग और सभा का इस्तेमाल वे हिंदुओं को मुसलमानों से लड़ाने के लिए करते थे. इनका उपयोग वो कांग्रेस को मुश्किल में डालने में भी करते क्योंकि वही उनकी असल दुश्मन थी और उनका राज खत्म करने में लगी थी.

सावरकर को लगता था या ऐसा वे चाहते थे कि अंग्रेज जाते जाते मुसलमानों को अगर पाकिस्तान दे कर जाएंगे तो हिंदुस्तान हिंदुओं को यानी उनकी हिंदू महासभा को देकर जाएंगे. अंग्रेज ऐसा चाहते भी तो कर नहीं सकते थे. कांग्रेस बीच में थी और हिंदुओं और मुसलमानों दोनों की पार्टी थी और वही आजादी के आंदोलन का नेतृत्व कर रही थी. जिन्ना ने अगस्त छियालिस में सीधी कार्रवाई कर के जो कत्ले आम बंगाल में मचाया था उसके बाद अलग पाकिस्तान की मांग अंग्रेज पूरी किए बिना नहीं जाते. जिन्ना जैसा पाकिस्तान बनाना चाहते थे हिंदू महासभा और संघ भी वैसा ही हिंदुस्तान बनाना चाहते थे. लेकिन जिन्ना तो अलग होना चाहते थे इसलिए हिंसा का ताण्डव भी कर सकते थे. सावरकर को अखंड भारत चाहिए था जिससे वे मुसलमानों और ईसाइयों को बाहर करते. हिंदू राष्ट्रवादियों को कांग्रेस से निपटना था जिन्ना को किसी की फिकर नहीं थी. 

जिन्ना पाकिस्तान बनाने में सफल हुए. हिंदू राष्ट्रवादी गांधी की हत्या से आगे नहीं जा सके. बल्कि गांधी की हत्या ने ही भारत में उनके हिंदू राष्ट्रवादी भविष्य का अंत कर दिया. हिंदू महासभा देखते देखते समाप्त हो गई. सावरकर गांधी हत्या की साजिश में पकड़े गए. संघ पर पाबंदी लगाई गई जो सरदार पटेल की कुछ शर्तें मानने के बाद ही उठाई गई. लोकतांत्रिक भारत में अपनी रक्षा के लिए संघ को भारतीय जनसंघ नाम का राजनैतिक दल बनाना पड़ा. कांग्रेस से होड़ करने के लिए इस दल के पास आजादी की लड़ाई की पुण्याई नहीं थी. हिंदुत्ववादियों पर गांधी की हत्या का कलंक था. हिंदू राष्ट्र न बनवा पाने का चिर स्थाई दुख और भारत विभाजन रोकने में कुछ न कर पाने का पछतावा. धीरे-धीरे जिन्ना और भारत विभाजन संघ-भाजपा के कुंठित मन की ग्रंथियां हो गई. 

जिन्ना को ये लोग भारत विभाजन का कर्ता नंबर एक मानते हैं. लेकिन ऐसा मानने से न उनकी खुंदक निकलती है न भारतीय राजनीति में इसका कोई लाभ मिलता है. जिन्ना में उन्हें एक सफल सावरकर भी दिखता है. आखिर जिन्ना का राष्ट्रवाद हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतिरूप ही था. कोई साठ साल से ये एक दूसरे से होड़ करते हुए एक दूसरे जैसे हो गए थे. हिंदू राष्ट्रवादी गांधी, नेहरू और पटेल और उनकी कांग्रेस को अपने सफल न हो पाने का मुख्य कारण मानते हैं. इसलिए इन तीनों को भारत विभाजन का जिम्मेदार बताकर जनता के मन में इनकी छवि बिगाड़ने और फिर खलनायक बनाने में लगे रहते हैं. 

जिन्ना इनके बड़े काम के हैं. जिन्ना का लाठी की तरह इस्तेमाल करते हुए ये गांधी और नेहरू की पिटाई कर सकते हैं. जसवंत सिंह और सुदर्शन ने तो कह ही दिया है कि जिन्ना को कट्टर मुस्लिम राष्ट्रवादी कांग्रेस, गांधी और नेहरू ने बनाया. जिन्ना तो पाकिस्तान की धौंस मुसलमानों के लिए बहुसंख्यक हिंदू भारत में स्थाई रियायतें पाने के लिए कर रहे थे. नेहरू पटेल और गांधी ने तो उन्हें पाकिस्तान दे ही दिया. इनको सत्ता की जल्दी न होती तो भारत खंडित नहीं होता.

आज की राजनीति में जिन्ना न भारत में प्रासंगिक है न पाकिस्तान में. लेकिन संघियों की सड़ी गांठ उनके बिना नहीं खुलती. समझे कि नहीं प्रणब बाबू.

लौहपुरुष, जो था ही नहीं?

जिस पार्टी को दो सांसदों से करीब दो सौ तक उन्होंने कभी अकेले के दम पर पहुंचाया था आज उसकी और उनकी जमकर दुर्गति हो रही है लेकिन न तो वो कुछ करते ही दिख रहे हैं और न ही इस-सबसे अपने को अलग ही दिखा पा रहे हैं 

कुछ ही बरस पहले जब केंद्र में एनडीए की सरकार थी तब भाजपा के नेताओं-कार्यकर्ताओं द्वारा अटलजी को विकास पुरुष और लाल कृष्ण आडवाणी को लौहपुरुष के विशेषणों से संबोधित किया जाता था. जब सरकार ने अपना आधे से ज्यादा कार्यकाल पूरा कर लिया तो आडवाणी का महत्व भाजपा में कुछ और भी बढ़ने लगा. चूंकि उस समय अगली केंद्र सरकार भी एनडीए की बनना लगभग तय लग रहा था और खराब सेहत के चलते अटलजी कम-से-कम पूरे समय तक तो इसका नेतृत्व करने वाले थे नहीं, इसलिए भाजपाइयों को 75 साल के आडवाणी उगते सूरज सरीखे लग रहे थे. होना शायद ये था कि अटल जी के उदारवादी नेतृत्व में चुनाव जीता जाता, आसानी से गठबंधन बनता और थोड़ा आगे-पीछे सत्ता आडवाणी संभाल लेते. मगर हुआ इसका बिलकुल उल्टा. एनडीए हार गया, वाजपेयी अगले चुनाव तक सक्रिय राजनीति के लायक रहे नहीं इसलिए खुद को प्रधानमंत्री बनाने की सारी जिम्मेदारी आडवाणी के ही सर पर आ गयी.

चूंकि पुरानी, संकीर्ण सन्दर्भों में लौहपुरुष वाली छवि आडवाणी की खुद की और भाजपा की नैय्या पार लगाने में आड़े आने वाली थी इसलिए इसके पुनर्निर्माण के चक्कर में उन्होंने कई गलतियां कर डालीं: पहले तो जिन्ना को धर्म-निरपेक्ष बता अप्रासंगिकता के बोध से जूझ रहे संघ को और नाराज़ कर उन्होंने अपनी ताकत और पार्टी की अध्यक्षता खोई, फिर शायद अपने दरबारियों की सलाह पर आतंकवाद से मजबूती से निपट सकने वाले की छवि गढ़ने के चक्कर में कुछ ग़लतबयानी भी कर डाली – चुनाव से ठीक पहले उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी ही नहीं थी कि जसवंत सिंह भी रिहा किये आतंकियों के साथ कांधार जा रहे हैं जबकि सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति के कुल जमा पांच में से तीन सदस्य ये बात झुठला चुके हैं. जो चुनाव हाल ही में भाजपा ने हारा वो भी आडवाणी ने अपनी इसी खोई-पाई ताकत पर अकेले-दम लड़ा था.

अब यही बातें उनके गले की हड्डी बनी हुई हैं. सवाल उठ रहे हैं कि जसवंत सिंह को जिन्ना के ऊपर लिखने पर पार्टी-निकाला क्यों जबकि आडवाणी खुद भी कुछ-कुछ ऐसा ही कह चुके हैं. और एक उपप्रधानमंत्री रह चुका, प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति देश को सरेआम गुमराह कैसे कर सकता है? लोकसभा चुनावों में हार के बाद उनका पहले पार्टी के संसदीय दल के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना और बाद में नेता-विपक्ष बनकर ये कहना कि वो पूरे पांच साल तक इस पद पर रहने वाले हैं, भी उनकी खूब किरकिरी करवा रहा है. जिस पार्टी को दो सांसदों से करीब दो सौ तक उन्होंने कभी अकेले के दम पर पहुंचाया था आज उसकी और उनकी जमकर दुर्गति हो रही है लेकिन न तो वो कुछ करते ही दिख रहे हैं और न ही इस-सबसे अपने को अलग ही दिखा पा रहे हैं.

आश्चर्य की बात है कि अपनी किताब के विमोचन के बाद इसे लोकप्रिय बनाने के लिए पचासों साक्षात्कार देने वाला और चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को टीवी पर खुली बहस के लिए ललकारने वाला शख्स इतना सब हो जाने के बाद, अपने राजनीतिक जीवन की सांध्य बेला पर भी मौनव्रत धारे हुए है. अब इस निष्क्रियता और चुप्पी को क्या कहा जाए! 

संजय दुबे 

बाबा घनानंद घाना वाले

घाना अफ्रीका के पश्चिमी तटीय इलाके में स्थित है. लगभग सवा दो करोड़ की आबादी वाले इस देश में मुझे अंतरनस्लीय शादियों पर आधारित एक फोटो फीचर पर काम करते हुए पता चला कि यहां पर एक ठेठ अफ्रीकी हिंदू मठ भी है. वैसे घाना किसी भी लिहाज से एक ही धर्म को मानने वाला देश नहीं है. सारे देश की बात करें तो यहां ईसाई धर्म की प्रधानता है लेकिन उत्तरी घाना में इस्लाम सबसे ज्यादा प्रभावी है. धर्म से इतर अधिकांश घाना निवासी अब तक अपनी जनजातीय परंपराओं जैसे पूर्वजों की पूजा और ‘दूसरी दुनिया’ में यकीन रखते हैं. घाना में बाहर से आए धर्मों में हिंदू धर्म सबसे नया है, जिसकी जड़ें यहां बसने वाले सिंधी व्यापारियों से जुड़ी हैं. अप्रवासी भारतीयों में इन्हीं सिंधी व्यापारियों का दबदबा है.

अफ्रीकी हिंदू अनुयायियों को अपने परंपरागत अफ्रीकी नाम रखने की पूरी आजादी है. मगर यहां पर कई ऐसे अनुयायी भी हैं जिन्होंने अपने बच्चों को राम और कृष्ण जैसे परंपरागत हिंदू नाम दिए हुए हैं

पहली बार जब मैंने यहां अफ्रीकी हिंदू समुदाय की मौजूदगी के बारे में सुना तो ये मेरे लिए चौंकाने वाली बात थी. मैंने तय किया कि मैं खुद उस जगह जाकर देखूंगी कि आखिर अफ्रीकी हिंदू समुदाय है कहां और कैसा है?

इस समुदाय की तलाश मुझे घाना की राजधानी अक्रा के उपनगरीय इलाके ऑडोरकोर ले गई. यहीं एक सफेद रंग का भवन, अफ्रीकी हिंदू मठ (एएचएम) स्थित है. मठ के प्रमुख स्वामी घनानंद सरस्वती ने 1975 में इसकी स्थापना की थी. कोमल आवाज वाले स्वामी घनानंद का जन्म एक ठेठ अफ्रीकी परिवार में हुआ था. उनके जन्म के बाद मां-बाप ने ईसाई धर्म अपना लिया. घनानंद भी ईसाई बन गए लेकिन, उनके खुद के मुताबिक, उन्होंने अपनी सत्य की खोज जारी रखी. इस बीच हिंदू मान्यताओं का आकर्षण उन्हें भारत ले आया. यहां वे देश भर में घूमे और योग सीखा. वे हिंदू धर्म से इतना प्रभावित हुए कि ऋषिकेश में स्वामी शिवानंद के आश्रम में रहते हुए उन्होंने हिंदू धर्म अपना लिया लिया. 35 साल की उम्र में वे वापस घाना आ गए और जल्द ही घाना वासियों को इस प्राचीन पूर्वी धर्म की शिक्षाओं पर व्याख्यान देने लगे. शुरुआत में उनके व्याख्यानों की तरफ कुछ ज्यादा पढ़े लिखे लोग, जैसे वकील और विश्वविद्यालय के अध्यापक आदि अफ्रीकी मूल के लोग ही आकर्षित हुए, लेकिन जल्द ही उन्हें सुनने भारतीय परिवार भी आने लगे. घाना में हिंदू मठ खोलने की प्रेरणा उन्हें स्वामी कृष्णानंद से मिली जो उस समय भारत से घाना की यात्रा पर थे. कृष्णानंद का कहना थी कि मठ में वे लोगों को वो सब कुछ बता सकते हैं जो उन्होंने भारत में सीखा था.

 

स्वामी घनानंद

आज घाना में तकरीबन 12,500 हिंदू हैं जिनमें से लगभग 10 हजार घनानंद सरस्वती की तरह अफ्रीकी मूल के हैं. हालांकि राजधानी अक्रा में इस समय एक सिंधी और एक सत्य साईं मंदिर है और यहां आनंदमार्गी, इस्कॉन और ब्रह्मकुमारी जैसे हिंदू धार्मिक संगठन भी सक्रिय हैं लेकिन हिंदू धर्म का यहां का सबसे बड़ा उपासना स्थल एएचएम ही है. इस मठ की गतिविधियों में आपको मिश्रित संस्कृति की झलक बड़ी आसानी से देखने को मिल सकती है. मठ के पूजाघर में हिंदू देवी-देवताओं के साथ ईसा की तस्वीर भी लगी हुई है, इसके अलावा दूसरे धर्मो के धार्मिक नेताओं की तस्वीरें भी यहां आपको देखने को मिल जाएंगी. भारत के कुछ धर्म निरपेक्ष नेताओं की तस्वीरें भी यहां पर हैं.

मठ के अनुयायी मानते हैं कि परमसत्ता को यावे (यहूदियों के आराध्य) और अल्लाह जैसे दूसरे नामों से भी जाना जाता है. मुख्य रूप से वैदिक दर्शन को मानने वाले इस मठ के मुख्य देवता विष्णु हैं लेकिन यहां एक शिवमंदिर भी है और दिन की शुरुआत शिवजी के अभिषेक से होती है. इसके बाद आरती होती है. आरती स्वामी घनानंद या उनका कोई शिष्य कराता है. इसके बाद हवन होता है फिर हनुमान चालीसा. अधिकांश भारतीय मंदिरों के उलट हवन में यहां उपस्थित हर व्यक्ति आहुति दे सकता है. हवन के बाद भजन होते जो ज्यादातर हिंदी में ही होते हैं मगर इनमें स्थानीय भाषा का पुट इन्हें असल भजनों से काफी अलग सा बना देता है. सबसे आखिर में वेदों पर चर्चा होती है. यह चर्चा अंग्रेजी या स्थानीय भाषा में होती है.

इस मठ की सबसे बड़ी खूबी ये है कि ये अपने भीतर न केवल कई धार्मिक परंपराओं को समोए हुए है बल्कि हर नस्ल, समुदाय और धर्म का व्यक्ति यहां बेरोकटोक आ सकता है. यहां के धार्मिक आयोजनों में सिंधी ही नहीं बल्कि हाल ही में घाना आए अप्रवासी भारतीय जिनमें प्रबंधकों से लेकर मजदूरों तक की जमात शामिल होती है. लेकिन मठ आने वालों में सबसे ज्यादा संख्या अफ्रीका के मूल निवासियों की ही है. इनमें भी अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग शामिल हैं. जब मैंने मठ के एक अनुयायी से हिंदूओं में पाई जाने वाली वर्णव्यवस्था पर उसकी राय जाननी चाही तो उसका कहना था कि दुनिया में ऐसा कोई समाज नहीं है जिसमें लोगों से भेदभाव न किया जाता हो, फिर चाहे इसका आधार व्यवसाय हो, जन्म-संबंधी हो या फिर नस्ल को लेकर हो. लेकिन घाना में उसके जैसे हिंदुओं का साफतौर पर मानना है कि हर इंसान को शिक्षा, बेहतर जिंदगी और खासतौर पर अपने धर्म को मानने का अधिकार है.

समन्वयवादी और उदार विचारधारा को मानने वाले इस मठ में सिर्फ एक ही व्यक्ति सन्यासी है. इसके बार में घनानंद कहते हैं, ‘यहां हिंदू धर्म एक नई चीज है और मैं नहीं चाहता कि किसी को दीक्षा दी जाए और वो बाद में सन्यास के रास्ते से हट जाए. इससे हिंदू धर्म बदनाम होगा.’ हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले जो लोग अनुयायी बनना चाहते हैं उन्हें यहां छह सप्ताह रह कर एक कोर्स करना पड़ता है. इसके बाद धीरे-धीरे हिंदू धर्म में दीक्षित किये जाने की प्रक्रिया शुरू होती है.

उदाहरण के तौर पर अफ्रीकी हिंदू अनुयायियों को अपने परंपरागत अफ्रीकी नाम रखने की पूरी आजादी है. मगर यहां पर कई ऐसे अनुयायी भी हैं जिन्होंने अपने बच्चों को राम और कृष्ण जैसे परंपरागत हिंदू नाम दिए हुए हैं, ये भी खास बात है कि ये नाम हिंदू रीति से नामकरण संस्कार के बाद रखे गए हैं. शादियों और अंतिम संस्कार में भी ये लोग हिंदू रीतियों का पालन करते हैं हालांकि ऐसा करना अनिवार्य नहीं है. मठ के हिसाब से हर हिंदू अनुयायी को अपने घर में पूजा और प्रार्थना करनी चाहिए. कभी-कभी उत्साह के अतिरेक में नए अनुयायी इस तरह समर्पित होकर धार्मिक क्रियाएं करते हैं कि लगने लगता है कि ये लोग सिर्फ अभिनय तो नहीं कर रहे. मगर आस्था को लेकर इस तरह के क्रियाकलाप हमारे देश में भी होते हैं, होते रहेंगे. क्योंकि आस्था से जुड़ी हर चीज को समझ पाना शायद संभव ही नहीं है.      

‘क’ से कन्नी काटना क्यूं

क्या ये कहना कि नई दिल्ली और श्रीनगर में बैठी सरकारों ने कश्मीर के हालात खराब किए और आईएसआई ने इसका फायदा उठाया राष्ट्रविरोधी है?8 दिसंबर 2009 को कश्मीर में अलगाववादी विद्रोह के 20 साल पूरे हो जाएंगे.1989 में इसी दिन मुफ्ती मोहम्मद सईद की युवा बेटी को दिन दहाड़े एक बस से अगवा कर लिया गया था. मुफ्ती ने उन्हीं दिनों वीपी सिंह की सरकार में गृहमंत्रालय संभाला था. जल्द ही उन्होंने घुटने टेक दिए और आतंकियों की मांग पूरी कर दी गई. उस वक्त पहली बार श्रीनगर की सड़कों पर आजादीका नारा गूंजा था. पहली बार ऐसा हुआ था कि सड़कों पर इकट्ठा 60-70 हजार लोगों की भीड़ में मिले हुए आतंकवादी खुलेआम क्लाशनिकोव लहराते दिखे थे.

इन 20 वर्षों के दौरान कश्मीर का राजनीतिक और हिंसक ताना-बाना काफी बदल चुका है. हालात बद से बदतर हुए हैं. मुद्दा अब भी उतना अहम बना हुआ है जैसा पहले था. भारत-पाक जब आपस में बातचीत करते हैं और जब नहीं करते तब भी कश्मीर के मसले पर ध्यान सबसे ज्यादा रहता है. सार्क सम्मेलन में कश्मीर छाया रहता है, राजनयिकों को संयुक्त वक्तव्यों का मजमून बार-बार बदलना पड़ता है और दिल्ली में बैठे नीति निर्माताओं का पारा चढ़ाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा सिर्फ कश्मीर शब्द का जिक्र करना ही काफी होता है.

वाशिंगटन में कश्मीरी-अमेरिकन कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डा गुलाम नबी फाई द्वारा आयोजित एक सेमिनार-जिसमें मैं भी आमंत्रित थी- पर भारतीय पक्ष की बेहद कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आई. कहा गया कि ये आईएसआई द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम था. क्या यही वजह रही कि अमेरिका में भारतीय राजदूत ने खुद को इस कार्यक्रम से दूर रखा? आखिर भारतीय अधिकारियों के दल से किसी ने भी जिम मोरान, डैन बर्टन और येट क्लार्क के साथ मंच साझा करने की उत्सुकता क्यों नहीं दिखाई? अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत मलीहा लोदी, पाकिस्तानी सीनेट के विदेशी मामलों की समिति के अध्यक्ष

मुशाहिद हुसैन और पाक अधिकृत कश्मीर के राष्ट्रपति राजा जुल्कारनैन खान आदि के साथ मंच साझा करने कोई क्यों नहीं आयासवाल ये है कि भारत हमेशा कश्मीर शब्द से मुंह क्यों चुराता है? आखिर हम दुनिया की नजरों में आने या फिर छोटी सी भी आलोचना से इतना क्यों डरते हैं? हम शोपियां में जवान महिलाओं के बलात्कार और हत्या पर पर्दा डालने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? आखिर क्यों हम घूमफिरकर हमेशा उसी घिसी-पिटी लाइन पर चले आते हैं, ‘कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा हैया फिर कश्मीर द्विपक्षीय मसला है.’ 

दो दिवसीय सेमिनार के उद्घाटन भाषण में डा फाई ने जो बातें कही वो हर लिहाज से अहानिकर और सटीक थीं. उन्होंने कहा, इस बैठक का उद्देश्य कश्मीरियों के लक्ष्य को हासिल करना है, ‘टकराव से नहीं बल्कि मेल-मिलाप से, शोषण से नहीं बल्कि बराबरी से और निराशा से नहीं बल्कि आशा के साथ.क्या ये भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक भाषा हैक्या ये कहना कि नई दिल्ली और श्रीनगर में बैठी सरकारों ने कश्मीर के हालात खराब किए और आईएसआई ने इसका फायदा उठाया राष्ट्रविरोधी है? क्या ये बात कहना राष्ट्रद्रोह या सरकार के खिलाफ है कि पिछले दो दशकों से भारत ने अपनी पूरी ऊर्जा वहां कब्जा जमाने में झोंक दी? वो इसे मानवीय समस्या मानने या फिर कश्मीरियों को इसमें शामिल करने की बजाए इसे साधारण कानून व्यवस्था की समस्या या फिर संपत्ति के विवाद के रूप में देखता है. 

ये सवाल इस समय और भी महत्वपूर्ण हो गया है और ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कि इस समस्या को दो दशक हो चुके हैं. राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला राज्य से सेना हटाने की बात कर रहे हैं. इसके पीछे की जमीनी सच्चाई के दो पहलू हैं जो बताते हैं कि 500 आतंकवादियों (ये आधिकारिक आंकड़ा है) को नियंत्रित करने के लिए लाखों सैनिकों की जरूरत नहीं है. इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है इस साल शोपियां और पिछले साल अमरनाथ यात्रा को लेकर हुई उथल-पुथल जो बताती है कि कश्मीरियों ने एक नया हथियार विकसित कर लिया है- अहिंसक विरोध का हथियार.

आईएसआई को 26/11 जैसे हमलों के लिए जितना भी जिम्मेदार ठहरा लीजिए पर क्या कश्मीर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को भी आईएसआई आयोजित करवा रही है? कैपिटल हिल की चर्चा का विषय यही था. उम्मीद है दिल्ली में बैठे नीति-नियंता इस पर ध्यान देंगे?   

मणिपुर की मौन त्रासदी

फर्जी मुठभेड़ का सच सामने आने के बाद सुलगते मणिपुर का दौरा करके आईं शोमा चौधरी इस राज्य में चल रहे जटिल टकराव और उसमें छिपी उससे भी जटिल सच्चाइयों की थाह ले रही हैं. सभी फोटो: शैलेंद्र पांडेय

23 जुलाई 2009, मणिपुर की राजधानी इंफाल, बीटी रोड के एक व्यस्त बाजार में दिन रोज की तरह ही शुरू हो रहा था. असम राइफल्स में राइडर (डाक और सामान इधर-उधर पहुंचाने वाले) पी लुखोई सिंह ने अभी-अभी सीआईडी के एसपी तक एक पैकेट पहुंचाया था और अब वो सड़क के किनारे खड़े अपने एक दोस्त से बातें कर रहे थे. चतुर्थ श्रेणी के एक कर्मचारी गिमामगल अपनी साइकिल पर सवार होकर दफ्तर की तरफ जा रहे थे. उनसे कुछ ही दूर तीन बच्चों की मां निंगथोंजम केशोरानी अपनी फलों की रेहड़ी लगाकर ग्राहकों का इंतजार कर रही थीं. पास ही डॉक्टर से मिलकर आ रहीं डब्ल्यू गीता रानी एक ऑटोरिक्शा की तलाश में थीं. थोड़ी ही दूर पांच महीने की गर्भवती रबिना देवी अपने दो साल के बच्चे रसेल का हाथ पकड़े केले खरीद रही थीं. इसके बाद उन्हें मोबाइल की दुकान पर काम कर रहे अपने पति से मिलने जाना था. और 22 साल के चोंगखम संजीत (मुठभेड़ की आड़ में कत्ल) अस्पताल में भर्ती अपने एक रिश्तेदार के लिए दवाइयां खरीदने के लिए जा रहे थे. तभी अचानक एक नौजवान तलाशी ले रहे पुलिस के जवानों के चंगुल से निकल भागा. जब तक कोई कुछ समझ पाता माहौल गोलियों की आवाज से गूंज उठा. लुखोई सिंह ने खुद को बचाने के लिए अपनी मोटरसाइकिल की आड़ लेने की कोशिश की. मगर उन्हें गोली लगी और वो घायल हो गए. उन्होंने देखा कि दो पुलिसवाले भीड़ में फायरिंग करते हुए भाग रहे हैं.

डर यहां के लोगों की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुका है. कहा जाता है कि मणिपुर में अकेले इस साल ही विद्रोहियों और सुरक्षा बलों के टकराव में अब तक 300 लोग अपनी जान गंवा चुके हैंगिमामगल ने भी धमाकों की आवाज सुनी मगर वो साइकिल चलाते रहे. कुछ देर तक तो उन्हें ये अहसास तक नहीं हुआ कि वो भी गोली का निशाना बन चुके हैं. उन्हें तो ये तब पता चला तब उन्होंने अपने बदन से खून बहता देखा और पाया कि उनका बायां हाथ बुरी तरह घायल हो चुका था. एन केशोरानी ने फायरिंग की आवाज सुनकर रेहड़ी को वहां से हटाने की कोशिश की. मगर इससे पहले कि वो ऐसा कर पातीं उनकी पीठ में गोली लगी और वो गिर गईं.  

गीतारानी ने भी गोलियों की आवाज सुनी और जब तक वो कुछ समझ पातीं उन्हें अहसास हुआ कि उनकी छाती से खून बह रहा है. एक गोली ने उन्हें भी अपना शिकार बना लिया था. रबिना देवी को कुछ सोचने का मौका ही नहीं मिला. गोली सीधे उनके माथे पर लगी और वो ढेर हो गईं. खून में डूबी अपनी मां को देखकर दो साल का रसेल चीखने लगा.

संजीत एक पीसीओ के पास खड़े थे. कुछ ही मिनट में पुलिस के कमांडो दस्ते ने उन्हें घेर लिया. चार लोग घायल हो गए थे और एक गर्भवती महिला की मौत हो गई थी. अब उन्हें ऐसा होने के पीछे की वजहें पैदा करने की जरूरत थी. इसलिए भीड़ भरे उस बाजार में, लोगों की नजरों के सामने दिन दहाड़े संजीत को एक मेडिकल स्टोर के भीतर ले जाया गया और फिर उसे बेहद नजदीक से गोली मार दी गई. इसके बाद उसका शव बाहर लाया गया और उसे रबिना देवी के शव के साथ एक ट्रक में डाल दिया गया.

ये सब और इसके बाद जो कुछ हुआ वो ऐसे हुआ मानो कुछ हुआ ही न हो. न तो इलाके की घेरेबंदी की गई और न ही फोरेंसिक विशेषज्ञों को बुलाया गया. जब ये घटना हुई तो राज्य विधानसभा का सत्र भी चल रहा था. दोपहर बाद मुख्यमंत्री इबोबी सिंह ने सदन में बयान दिया कि प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन पीएलए के सदस्य संजीत ने तलाशी ले रही पुलिस से भागने की कोशिश में पांच लोगों को गोली मार दी मगर मणिपुर के बहादुर कमांडोज ने मुठभेड़ में उसे मार गिराया. मुख्यमंत्री के मुताबिक उससे 9 एमएम का एक माउजर भी बरामद हुआ. उनका ये भी कहना था कि विद्रोहियों की समस्या से निपटने के लिए उन्हें खत्म करने के सिवा कोई और चारा नहीं है (हालांकि बाद में वो इस बयान से मुकर गए). विपक्ष ने इस बयान पर कोई सवाल नहीं उठाया और बात आई-गई हो गई.

कल्पना कीजिए उस दादी की मनोदशा की जिसकी गर्भवती पोती को गोली मार दी गई हो और इसका विरोध करने की सूरत में जिस पर स्मोक बम फेंके जा रहे हों

मणिपुर ऐसी जगह बन चुकी है जहां ज्यादातर चीजें जैसी दिखती हैं या बताई जाती हैं वैसी असल में होती नहीं. डर यहां के लोगों की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुका है. कहा जाता है कि अकेले इस साल ही विद्रोहियों और सुरक्षा बलों के टकराव में अब तक 300 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. मगर यहां सवाल उठाने की हिम्मत कोई नहीं करता. लोगों को कई बार शक तो होता है मगर सबूतों की गैरमौजूदगी में वो ज्यादा ध्यान नहीं देते. अक्सर जब भी कोई मरता है तो आस-पड़ोस वाले लोग एक ज्वाइंट एक्शन कमेटी बनाते हैं, प्रतीकात्मक प्रदर्शन किए जाते हैं, जिनके बाद कभी-कभी प्रतीकात्मक मुआवजा भी मिल जाता है. इसके बाद जिंदगी फिर से पहले वाले ढर्रे पर चलने लगती है. हर कोई अपने काम में व्यस्त होने की कोशिश करने लगता है.

इस बार भी ऐसा ही होना था अगर एक गुमनाम फोटोग्राफर ने संजीत की मौत के पलों को अपने कैमरे में कैद न किया होता. इस फोटोग्राफर को डर था कि स्थानीय अखबारों में ये तस्वीरें प्रकाशित होने से उसकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है. इसलिए उसने तहलका से संपर्क किया. पिछले पखवाड़े इस घटना की पूरी रिपोर्ट तस्वीरों के साथ तहलका में प्रकाशित होते ही मानो भूचाल आ गया. राज्य में विरोध प्रदर्शन होने लगे. क्या नौजवान क्या बूढ़े क्या महिलाएं, हर तरफ लोगों की भीड़ सड़कों पर उतर पड़ी. जनता की मांग थी कि मुख्यमंत्री इस्तीफा दें और घटना की न्यायिक जांच की जाए.

जैसा कि विरोध प्रदर्शन के दौरान घायल हुईं और अब एक अस्पताल में अपना इलाज करा रहीं ए ग्यानेश्वरी कहती हैं, ‘तहलका ने हमारे भीतर दबी हुईं भावनाओं को रास्ता दिखा दिया है. इन हत्याओं का सच हम हमेशा से जानते थे. मगर हमारे पास कभी सबूत नहीं होता था इसलिए हम कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे. अब हममें वो हिम्मत आ गई है. अगर एक सब्जीवाला रबिना देवी के बैग को अपने पास न रख लेता तो कमांडोज उसमें भी एक पिस्टल रख देते और रबिना को भी उग्रवादी करार दे देते.’

इरेपक नामक स्थानीय अखबार के संपादक अरुण इरंगेबाम कहते हैं, ‘तहलका ने मणिपुर को जगा दिया है. लोगों में बहुत गुस्सा है.’ सामाजिक संगठन अपुनबा लुप के संयोजक दयानंद चिंगथम कहते हैं, ‘जिस तरह से तहलका सच्चाई को सामने लाया है उसके लिए उसका जितना धन्यवाद किया जाए कम है.’

‘काश आप ऐसी रिपोर्ट दो साल पहले छापते. हमारी पुलिस अब बेहद बेशर्म हो चुकी है.’ विडंबना देखिए कि ये शब्द एक ऐसे शख्स के हैं जो मणिपुर पुलिस के डीजीपी जॉय कुमार के दफ्तर में काम करता है. जैसा कि तय था, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन शुरू होते ही राज्य सरकार अपनी चिरपरिचित सख्ती पर उतर आई. हर तरफ कमांडोज तैनात कर दिए गए. कर्फ्यू का ऐलान भी कर दिया गया और प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पानी की बौछारों और आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया. रबिना देवी की दादी एमआरके राजेसना सहित कुछ बूढ़ी महिलाओं का एक दल राज्यपाल के घर की तरफ बढ़ रहा था. कमांडोज ने उन्हें रोक लिया. वे नारे लगाने लगीं, ‘अरेस्ट अस’ (हमें गिरफ्तार करो). इसकी बजाय पुलिसवालों ने उन पर स्मोक बम फेंकने शुरू कर दिए. कुछ महिलाएं इनसे बचने के लिए एक चिकन शॉप में घुस गईं और उन्होंने शटर बंद कर दिया. एक पुलिसवाले को शटर में एक दरार दिख गई. उसने उसी से तीन स्मोक बम भीतर फेंक दिए.

मणिपुर में आधिकारिक व्यवस्था का इस कदर सैन्यीकरण हो चुका है कि वह किसी भी समस्या को हल करने का सिर्फ एक ही तरीका जानती है-हिंसक दमन. टकराव वाली दूसरी जगहों की तरह यहां भी स्थितियां बड़ी जटिल हैं

कल्पना कीजिए उस दादी की मनोदशा की जिसकी गर्भवती पोती को गोली मार दी गई हो और इसका विरोध करने की सूरत में जिस पर स्मोक बम फेंके जा रहे हों. राजेसना कहती हैं, ‘मणिपुर की महिलाओं ने 1904 और 1939 में अंग्रेजों से मुकाबला किया था. एक और लड़ाई का वक्त आ चुका है. मैं सभी महिलाओं से आगे आने और लड़ाई में कूदने की अपील करती हूं.’

मणिपुर के सेंट्रल हॉस्पिटल में इस तरह की कहानियों की भरमार है. ऑटोरिक्शा चलाने वाले केएच लोखेन सिंह प्रदर्शनकारियों से अलग अपने काम से कहीं जा रहे थे कि पास से गुजर रहे एक कमांडो ने उन पर एक स्मोक बम फेंक दिया. उनका चेहरा बुरी तरह जल गया. झुलसे चेहरे और अंधी आंखों के साथ अब वे अस्पताल में पड़े हैं. उनके बिस्तर के नीचे एक चटाई बिछी है जिस पर उनकी दो साल की मासूम बच्ची संगीता सोई हुई है. रिपोर्ट के प्रकाशित होने के एक हफ्ते बाद पांच अगस्त 2009 को आखिरकार मुख्यमंत्री इबोबी सिंह ने एक प्रेस कॉंफ्रेंस बुलाई. इसमें उन्होंने माना कि इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बारे में उन्हें गलत जानकारी दी गई थी जिसके आधार पर उन्होंने अपना पिछला बयान दिया था. उन्होंने वादा किया कि घटना की न्यायिक जांच होगी. एक सब इंस्पेक्टर सहित छह कमांडोज को निलंबित कर दिया गया.

23 जुलाई की फर्जी मुठभेड़ मणिपुर की उस तस्वीर को बयां करती है जिसका रंग पूरी तरह से स्याह हो चुका है. ये उन भावनाओं की तहें खोल कर रख देती है जो मणिपुर के लोगों के दिल और दिमाग का अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं. एयरपोर्ट पर मिठाई की दुकान के मालिक से लेकर टैक्सी ड्राइवर, इतिहासकार, आम महिलाओं, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, डॉक्टरों तक किसी से भी बात कीजिए और आप पाएंगे कि यहां के लोगों ने वक्त के बेहतर होने की आस तक छोड़ दी है. हर किसी के पास अपनी कहानियां हैं. फिरौती, अपहरण, धमकियों, भ्रष्टाचार और हत्याओं की कहानियां.

मणिपुर का अर्थ है रत्नों की भूमि. बादलों को चूमते पहाड़ों के बीच बसे इस राज्य की खूबसूरती बताती है कि इसका ये नाम बेवजह नहीं पड़ा. मगर आज मणिपुर पूरी तरह से ढहने की कगार पर है. मणिपुर में चल रहे संकट की जडें खोजने के लिए हमें इतिहास में जाना होगा. इस राज्य का जब भारत में विलय हुआ तो ये काफी हद तक इसकी अनिच्छा के बावजूद हुआ था. यहां के मुख्य समुदाय – जिसे मेइती कहा जाता है – का 2000 साल पुराना इतिहास है. 1947 में जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए तो मणिपुर के महाराजा ने इसे एक संवैधानिक राजतंत्र घोषित कर दिया और यहां की अपनी संसद के लिए चुनाव करवाए. 1949 में महाराजा भारत में इसका विलय करने पर सहमत हो गए हालांकि मेइती दावा करते हैं कि उन पर दबाव डालकर उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया. इसके बाद पहले इसे सबसे निचले राज्य यानी सी स्टेट का दर्जा दिया गया. 1963 में ये केंद्र शासित प्रदेश बना और आखिरकार 1972 में इसे राज्य बना दिया गया.

भारत सरकार के खिलाफ बगावत मणिपुर में 1964 में ही शुरू हो गई थी जब आजादी के लिए वहां पर यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट नाम का भूमिगत आंदोलन शुरू हुआ था. फिर 70 के दशक में पीएलए, प्रीपाक, केसीपी और केवाईकेएल जसे दूसरे संगठन भी अस्तित्व में आ गए जिनकी राष्ट्रवाद को लेकर अपनी-अपनी विचारधाराएं थीं. सांस्कृतिक और सामुदायिक नजरिए से देखें तो मणिपुर काफी विविधताओं वाला राज्य है. यहां की आबादी का 57 फीसदी मेइती हैं. ये परंपरागत वैष्णव हिंदू हैं और इनकी रिहाइश मुख्य रूप से घाटी में है. पहाड़ी इलाके में नागा, कूकी और मिजोचिन जनजातियों का बसेरा है. नागा और कूकी समुदाय, जिनमें कई उप-समुदाय भी हैं, में ज्यादातर ईसाई हैं. राज्य की आबादी में सात फीसदी मुसलमान भी हैं. पंगल कहे जाने वाले ये लोग घाटी के एक जिले थूबल में रहते हैं.

ऐतिहासिक रूप से मेइती हमेशा से खुद को पहाड़ी जनजातियों से ज्यादा श्रेष्ठ मानते और उसी तरह से व्यवहार करते रहे हैं. ऐसे में ये अलग-अलग समुदायों से अलग-अलग उग्रवादी संगठनों का पैदा होना स्वाभाविक ही है. हालत ये है कि महज 25 लाख की आबादी वाले इस राज्य में आज 40 के करीब उग्रवादी संगठन हैं. कुछ की लड़ाई भारत सरकार से है और ज्यादातर की एक-दूसरे से. गौर करने वाली एक बात ये भी है कि केंद्र से विकास के लिए जो पैसा आया वह घाटी में ही खर्च हुआ और पहाड़ियों तक नहीं पहुंच सका इसलिए धीरे-धीरे लड़ाई पहचान के लिए कम और पैसे के लिए ज्यादा हो गई. पैसे की इस लड़ाई में कई संगठन अनगिनत छोटे-छोटे धड़ों में टूट गए. जैसा कि मणिपुर का हर व्यक्ति दुख के साथ आपको बताएगा, ‘मणिपुर के हर उप-समुदाय का अपना ही एक उग्रवादी संगठन है और ऐसे हर संगठन का अपना अवैध वसूली का कारोबार चल रहा है.’

‘अगर कसाब पर मुंबई में हुए आतंकी हमले के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है तो कानून के तहत मणिपुरी नौजवानों के साथ भी यही तरीका क्यों नहीं अपनाया जाना चाहिए?’

मणिपुर में अवैध वसूली की कहानियां आम हैं. जिस किसी के पास भी पैसा है उसे नियमित रूप से इसका सामना करना ही पड़ता है. इसके लिए धमकी भरे फोन कॉल्स, अपहरण या दुकानों और घरों पर हथगोले या चीनी बम फेंके जाना आम है. कभी-कभी तो ये संगठन इसके लिए हत्या भी कर डालते हैं. पैसे देने का ये खेल सिर्फ व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है. हर सरकारी ठेके या विकास के फंड में एक तय हिस्सा भी इन संगठनों की भेंट चढ़ जाता है. ये हिस्सा अब कुल रकम के 38 फीसदी तक पहुंच चुका है. इस साल की शुरुआत में यहां पर राज्य सिविल सेवा के अधिकारी डॉ किशन को इसलिए गोली मार दी गई थी क्योंकि वे एक विकास फंड में वसूली का विरोध कर रहे थे. जैसा कि इतिहासकार लोकेंद्र अरमबम बताते हैं, ‘विचारधारा के स्तर पर उग्रवादी संगठनों में लगातार गिरावट आ रही है.’

हालात इतने खराब हो चुके हैं कि जो संगठन सिर्फ बड़ी संस्थाओं से ही वसूली कर रहे हैं और आम लोगों को परेशान नहीं कर रहे, उन्हें यहां सम्मान की नजरों से देखा जाने लगा है और उन्हें सिद्धांतवादी संगठन कहा जाता है. मणिपुर में हर तरफ इन संगठनों का बोलबाला है. इनमें से ज्यादातर अपनी एक समानांतर सरकार चलाते हैं जिसमें फाइनेंस इंचार्ज, ऑडिटर जनरल और सैन्य और सांस्कृतिक मामलों के सचिव भी होते हैं. इन संगठनों में आपसी टकराव भी होते रहते हैं. कुछ समय पहले हाइरोक नाम के एक गांव में दीवाली के उत्सव के दौरान केवाईकेएल नामक संगठन के उग्रवादियों ने एक लड़के और लड़की को गोलियों से भून दिया. ये संगठन चाहता था कि मेइती हिंदू धर्म से पूर्व के अपने इतिहास को अपना लें और ये घटना उन्हें सबक सिखाने के लिए अंजाम दी गई.

फिर भी ये संगठन और उनकी करतूतें मणिपुर में पसरी डर की छाया की सिर्फ एक वजह हैं. इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण वजह है उस सरकार के काम करने का तरीका जिसे लोग अपनी जिंदगी की बेहतरी के लिए चुनते हैं. पूर्वोत्तर के लिए भारत सरकार का रवैया शुरुआत से ही राष्ट्रवाद को थोपने जैसा रहा है. पहचान के मुद्दे से जुड़ी जटिलताओं को हल करने में धैर्य या बातचीत की बजाय यहां पर दमन से काम लिया गया. 1958 में जब नागा आंदोलन चला तो इससे निपटने के लिए केंद्र सरकार ने औपनिवेशिक काल के एक कानून का इस्तेमाल किया जिसे सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून कहा जाता है. ये कानून ऐसा है कि सेना के किसी नॉन कमीशंड अधिकारी जैसे कि हवलदार को भी सिर्फ शक के आधार पर किसी को भी गिरफ्तार या टॉर्चर करने या अनिश्चित काल तक हिरासत में रखने की छूट मिल जाती है. इस कानून की आड़ में बिना सर्च वारंट के किसी के घर की तलाशी ली जा सकती है. कानून ये भी कहता है कि केंद्र सरकार की मंजूरी के बगैर किसी भी अधिकारी या जवान को सजा नहीं दी जा सकती. बीतते समय के साथ मणिपुर के अलग-अलग जिले इस कानून के तहत लाए गए और 1980 तक ये पूरे मणिपुर में लागू हो चुका था.

कल्पना कीजिए एक ऐसी जगह की जहां आए दिन कोई न कोई इंसान गोली का शिकार होता रहता है. जहां लोगों को पता है कि गोलियां चलाने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं होने वाली, उन्हें कोई सजा नहीं मिलने वाली. कैसी होती होगी वहां के लोगों की मनोदशा. मणिपुर में इस बर्बर कानून के अमल में आने के बाद पिछले तीस सालों में गुमशुदगी, प्रताड़ना, बलात्कार और हत्या के सैकड़ों मामले खबरों में आते रहे हैं. दर्जनों मानवाधिकार रिपोटरें के बावजूद सेना के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई. 2004 में दशकों से यहां के निवासियों के भीतर उबल रहा लावा पहली बार तब फूट निकला जब मनोरमा नाम की एक महिला को असम राइफल्स के जवान जबर्दस्ती उसके घर से उठाकर ले गए. अगले दिन उसका शव मिला जो उसके साथ हुए बलात्कार और प्रताड़ना की कहानी कहता था. मणिपुर में इस घटना से एक भूचाल आ गया. राज्य में हर जगह विरोध प्रदर्शन हुए. करीब एक दर्जन महिलाओं ने निर्व होकर असम राइफल्स के मुख्यालय के सामने प्रदर्शन किया. उनके हाथ में तख्तियां थीं जिन पर लिखा हुआ था ‘इंडियन आर्मी रेप अस’.

इससे एक छोटा सा फर्क पड़ा. इस बर्बर कानून की समीक्षा के लिए जीवन रेड्डी कमेटी बनाई गई. इसकी सिफारिशें तो अब भी लागू नहीं हुई हैं पर इतना जरूर हुआ है कि राजधानी इंफाल से इस कानून और सेना को हटा लिया गया है. शहर से सेना भले ही हट गई हो मगर पिछले पांच साल में उसकी जगह एक दूसरे डर ने ले ली है इस डर का नाम है मणिपुर पुलिस कमांडोज या एमपीसी. दरअसल सेना के हटने के बाद राज्य और केंद्र सरकार ने राज्य पुलिस की एक ऐसी शाखा बनाने का फैसला किया जिससे विद्रोही तत्वों से सख्ती से निपटा जा सके. नतीजतन एमपीसी अस्तित्व में आया. चूंकि इसके और सेना के काम करने के तरीकों में कोई बुनियादी फर्क नहीं है इसलिए हालात अभी भी पहले जैसे ही हैं. जैसाकि इरेपक के संपादक अरुण इरेंगबाम कहते हैं, ‘एमपीसी को अपने खिलाफ किसी कार्रवाई का डर नहीं है इसलिए उसका रवैया भी वैसा ही है जैसा सैन्य बलों का था.’

मणिपुर के पूर्व राज्यपाल वेद मारवाह कहते हैं, ‘किसी भी राज्य की पुलिस का रिकॉर्ड मणिपुर पुलिस से ज्यादा खराब नहीं होगा. उस पर तो ये तक आरोप लग चुका है कि एक बार उसने फर्जी मुठभेड़ में अपने ही अधिकारियों की हत्या कर दी’

बात सही है. मणिपुर में आधिकारिक व्यवस्था का इस कदर सैन्यीकरण हो चुका है कि वह किसी भी समस्या को हल करने का सिर्फ एक ही तरीका जानती है-हिंसक दमन. टकराव वाली दूसरी जगहों की तरह यहां भी स्थितियां बड़ी जटिल हैं. एक तरफ उग्रवादियों की अति है जो वसूली और हत्या जैसी चीजों को अंजाम दे रहे हैं. जैसा कि पुलिस के एक बड़े अधिकारी कहते हैं, ‘या तो हम हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहें या फिर कुछ करने का फैसला करें. सच्चाई ये है कि पिछले दो साल में हम और भी तेजी से जवाबी हमले कर रहे हैं. पंजाब में देखिए समस्या कैसे दूर हुई. मैं मानता हूं कि हमारे लड़के कभी-कभी कुछ ज्यादा ही कर देते हैं मगर आप उनकी मानसिकता को भी तो समझें. वे भी किसी भी समय गोली का शिकार हो सकते हैं. वे भी तनाव में रहते हैं. हमारे पुलिस स्टेशनों में सुधार की जरूरत है. हमारे पास सिर्फ 10-15 लोग होते हैं जबकि हर पुलिस स्टेशन में ये आंकड़ा कम से कम 58 होना चाहिए. हमें और भी लोगों और हथियारों की जरूरत है.’

मगर ताकत की अधिकता ज्यादातर मामलों में इंसान का दिमाग खराब कर देती है. दो साल पहले जब मणिपुर पुलिस ने जवाबी हमले करने का फैसला किया तब से पुलिसिया अत्याचारों की घटनाओं में काफी बढ़ोतरी हो गई है. दिन-दहाड़े भीड़ भरे बाजार में संजीत की हत्या समस्या का सिर्फ एक लक्षण है. अकेले 2008 में ही हुई ऐसी हत्याओं (जो साबित नहीं हुईं) की सूची काफी लंबी है.

एक पल के लिए ये मान लेते हैं कि ये सभी लोग उग्रवादी थे. जैसा कि अपुंबा लप से जुड़े जॉनसन एलंगबाम कहते हैं, ‘अगर कसाब पर मुंबई में हुए आतंकी हमले के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है तो कानून के तहत मणिपुरी नौजवानों के साथ भी यही तरीका क्यों नहीं अपनाया जाना चाहिए?’

कानून की गैरमौजूदगी ने मणिपुर की हवा में डर और शक घोल दिया है. इंफाल में घूमते हुए आप इस डर और शक को हर जगह महसूस कर सकते हैं. हथियारों से लैस कमांडोज से भरी जीपें शहर में घूमती रहती हैं जो मर्जी के मुताबिक किसी से भी बदसलूकी कर सकते हैं या उस पर गोली चला सकते हैं. सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि 2005 में पीएलए के एक उग्रवादी विकास ने लोखोन सिंह नाम के एक कमांडो को गोली मार दी थी. जवाबी हमले में विकास भी मारा गया. सिंह के अंतिम संस्कार के समय पुलिस विकास के घर में घुस गई और उसके परिवार के हर सदस्य को गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद उसकी गर्लफ्रेंड नाओबी के साथ कथित तौर पर पुलिसवालों ने बलात्कार किया. जब नाओबी ने कोर्ट में बयान दिया तो एक अधिकारी ने मजिस्ट्रेट के सामने ही उसे धमकी दी. मगर उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई.

व्यवस्था ने मणिपुर के मानस में किस कदर डर बैठा दिया है इसका अंदाजा हमें तब भी हुआ जब मुठभेड़ की आड़ में संजीत की हत्या की खबर तहलका में छपने के बाद इंफाल में पत्रकारों और कार्यकर्ताओं ने हमें यहां आने से रोकने की काफी कोशिश की. उनका कहना था, ‘हम आपकी सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकते. कमांडोज उस फोटोग्राफर को हर जगह ढूंढ़ रहे हैं जिसने आपको तस्वीरें दीं.’ जिन पत्रकारों ने इंफाल में हमारी मदद की थी उन्होंने भी हमसे आग्रह किया हम मुख्यमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस में उनसे कोई बात न करें क्योंकि इससे उनके लिए खतरा पैदा हो सकता है.

कभी पुलिस के शीर्ष अधिकारी रहे मणिपुर के पूर्व राज्यपाल वेद मारवाह कहते हैं, ‘किसी भी राज्य की पुलिस का रिकॉर्ड मणिपुर पुलिस से ज्यादा खराब नहीं होगा. उस पर तो ये तक आरोप लग चुका है कि एक बार उसने फर्जी मुठभेड़ में अपने ही अधिकारियों की हत्या कर दी. यहां पुलिस सामुदायिक आधार पर बंटी हुई है और ये सत्ताधारी पार्टी के सशस्त्र उग्रवादी दल की तरह काम करती है. यानी मणिपुर में एक बड़ी सीमा तक जंगलराज चलता है.’

एमपीसी अगर डर का एक नया नाम बन गया है तो इसके कारण साफ हैं. पहला और मुख्य कारण ये है कि इसे अपने खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई का डर नहीं है. दूसरा अब सरकार की नीति ये है कि पुलिस और सेना की दोहरी ताकत का इस्तेमाल कर विद्रोहियों के पांव उखाड़े जाएं. इस वजह से पुलिस का तेजी से विस्तार किया जा रहा है. शुरुआत में एमपीसी में 300 लोग थे मगर जल्द ही ये संख्या 1000 तक जा पहुंची और अब सूत्रों के मुताबिक 1600 नए कमांडोज की भर्ती के लिए मंजूरी मिल गई है.

स्थानीय पत्रकार और कार्यकर्ता बताते हैं कि राज्य में कमांडोज आदि की जरूरत पैदा कर इनकी भर्ती की आड़ में एक अलग ही गड़बड़-घोटाला चल रहा है. बताया जाता है कि एक सब इंस्पेक्टर बनने के लिए आपको 10-15 लाख रुपए देने पड़ते हैं. कमांडो के लिए ये आंकड़ा पांच लाख और राइफलमैन के लिए एक से दो लाख के बीच होता है. इस घूस का एक हिस्सा बड़े नेताओं तक भी जाता है. सूत्र भी इस बात की पुष्टि करते हैं. अब जो इतना पैसा खर्च करेगा जाहिर है वो जल्दी से जल्दी  इसकी भरपाई भी करना चाहेगा. यही वजह है कि जिस अनुपात में पुलिस बल का विस्तार हो रहा है उसी अनुपात में पुलिस द्वारा वसूली की घटनाएं भी बढ़ रही हैं. पुलिस बल में पूर्व उग्रवादियों को भर्ती करने और उग्रवादियों को मार गिराने वाले कमांडोज को बहादुरी पुरस्कार देने का नतीजा ये हुआ है कि ये बल कुछ हद तक लालच, बदले और निरंकुश ताकत के मिश्रण से काम करने लगा है.

नाम न छापने की शर्त पर एक पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘मैं मानता हूं कि हमारे लड़कों में से 10-20 फीसदी खराब हो सकते हैं. मगर हमें उनके व्यवहार को दुरुस्त करना होगा और उन्हें ज्यादा मानवीय बनाना होगा. मैं ये भी मानता हूं कि विशेषाधिकार कानून में सुधार लाए जाने की जरूरत है, खासकर इसकी धारा चार और छह में जो लड़कों को किसी भी हालत में टॉर्चर करने या हत्या करने की छूट देती है. मगर देखा जाए तो हिंसा में जल्द कमी आने की उम्मीद कम ही है. हमें सफाई के लिए कम से कम दो साल चाहिए. जो शुरू हो चुका है हमें उसे खत्म करना होगा. और आप स्थानीय मीडिया में छपने वाली हर चीज पर यकीन न करें. पहले ये पता करें कि संबंधित अखबार किस संगठन का मुखपत्र है.’

वाकई में मणिपुर में सच को खोजना बहुत मुश्किल काम है. ये एक भ्रमित कर देने वाली दुनिया है जिसमें कदम रखते ही आप चकरा जाते हैं. आपको पता चलता है कि उग्रवादी और नेता दोस्त हैं. कमांडोज और फिरौती वसूलने वालों की भी आपस में साठगांठ है. दोस्त मुखबिर हैं. कानून का पालन सुनिश्चित करने वाले हत्याएं कर रहे हैं. यानी अप्रत्यक्ष रूप से हर हाथ एक दूसरे से कहीं न कहीं जुड़ा हुआ है. 2008 की शुरुआत में पुलिस ने बाबुपुरा में एक औचक छापा मारा. बाबुपुरा वो वीआईपी इलाका है जहां मंत्री और सरकारी अधिकारी भारी सुरक्षा में रहते हैं. एक शीर्ष पुलिस सूत्र के मुताबिक कांग्रेस के एक विधायक के घर में केवाईकेएल के 12 उग्रवादी पाए गए. सूत्र ने ये भी बताया कि एमपीसी के एक सदस्य के घर में यूएनएलएफ के कुछ लोग मिले. लोग बताते हैं कि नेता खुद ही उग्रवादी संगठनों को राज्य में आने वाली नई योजनाओं के बारे में बता देते हैं और इसके बदले में उनकी कृपादृष्टि की अपेक्षा करते हैं.

इस पुलिस सूत्र की मानें तो मणिपुर का मीडिया भी वहां फैली कई मरीचिकाओं का एक हिस्सा है. अलग-अलग अखबारों के अलग-अलग झुकाव हैं जिनके हिसाब से उनका रुख तय होता है. उदाहरण के लिए चार अगस्त को द संगाई एक्सप्रेस नामक एक अखबार ने एक प्रतिबंधित अलगाववादी संगठन केसीपी(एमसी) की तीसरी वर्षगांठ की खबर बड़ी ही प्रमुखता के साथ छापी. फिर अगले ही दिन इस अखबार ने खबर के नाम पर इस संगठन की तरफ से वोदाफोन कंपनी को दी गई धमकी छाप दी. खबर के शब्दों पर गौर कीजिए, ‘केसीपी की क्रांतिकारी सरकार के सेक्रेटरी इंचार्ज ताबुंगा मेइती ने कहा है कि वोदाफोन के दफ्तर पर हुआ बम हमला पहली और आखिरी चेतावनी थी क्योंकि कंपनी संगठन को कुछ वित्तीय मदद देने की अपील पर ध्यान नहीं दे रही है..देश के लिए लड़ते केसीपी जैसे महत्वपूर्ण संगठन को चलाने के लिए पैसे की जरूरत होती है.’

इरेपक के अरुण कहते हैं, ‘ये सही है कि भूमिगत संगठन हमारे अखबारों को अपने नोटिस बोर्ड की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं.’ अरुण ने कुछ साल पहले केवाईकेएल के हिसाब से चलने से इनकार कर दिया था जिसके लिए उन्हें धमकियां मिलने लगीं और फिर उन्हें छह महीने तक भूमिगत होना पड़ा. इसके बाद उन्होंने फैसला किया कि भगोड़े जैसी जिंदगी से तो मौत भली और वे पहले की तरह अपना काम करने लगे.

मगर सब ऐसे नहीं होते. ऐसे ही एक संपादक बेबाकी से कहते हैं, ‘मैं यूएनएलएफ की विचारधारा को काफी पसंद करता हूं.’ खुरई में संजीत की मां इनाओतोंबी सफेद कपड़ों में चुपचाप बैठी हैं. उन्होंने फैसला किया है कि वे अपने बेटे के श्राद्ध की रस्म तब तक पूरी नहीं करेंगी जब तक इस घटना की न्यायिक जांच शुरू नहीं होती और मुख्यमंत्री इस्तीफा नहीं दे देते.

इनाओतोंबी ने काफी दर्द ङोला है. उनके काफी रोकने के बावजूद संजीत 13 साल की उम्र में प्रतिबंधित संगठन पीएलए में शामिल हो गया था. 20 साल की उम्र में उसे छाती में कोई चोट लगी और उसने संगठन छोड़ दिया. इसके बाद वो दो साल ही और जी सका. इनाओतोंबी के तीन और बेटे हैं और उनकी चिंता ये है कि वे अपने इन बेटों के गुस्से और डर पर किस तरह काबू पाएंगी. जब आस-पड़ोस वाले पत्थर से एक लोहे के खंबे को बजाते हैं जो इस बात का सूचक है कि कर्फ्यू के बावजूद लोग विरोध प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हों तो वो अपने बेटों को इन प्रदर्शनों में जाने से रोक लेती हैं.

संजीत की हत्या में कई सबक छिपे हैं. पहला ये कि अगर राज्य अपने सुरक्षा बलों को कानून से ऊपर रखेगा तो ऐसा करके वह नई समस्याओं के बीज ही बोएगा. मणिपुर में तीन पीढ़ियों से हिंसा और डर का ऐसा माहौल बना हुआ है कि हालात सामान्य होने की वहां के लोग दूर-दूर तक कल्पना तक नहीं कर सकते. हालात ऐसे हैं कि किसी खाकी वर्दी वाले को देखते ही निर्दोष बच्चों का भी भागने का मन करता है और किसी बच्चे को भागता देख खाकी वर्दी वालों का उस पर गोलियां चलाने का. सवाल ये है कि 13 साल का एक बच्चा क्यों पीएलए में शामिल हुआ? जवाब न तो कानून के पास है न ही इसके रखवालों के. अलग-अलग गुटों की लड़ाई झेल रहे मणिपुर के दिल का जख्म अब नासूर बन चुका है. और इस घाव को न तो सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून भर सकता है और न एमपीसी.

सवाल ये भी है कि प्रदेश को मुख्यधारा से अलग-थलग रखे जाने के उस तर्क में कितना दम है जो पिछले तीस सालों से अलगाववादी संगठनों के समर्थन को जिंदा रखे हुए है? अरुण पूछते हैं, ‘क्या भारतीय मानस में हमारे लिए कोई जगह है?. भारत में तो कभी हमारा स्वागत नहीं हुआ.’ पूर्वोत्तर मामलों के पूर्व मंत्री मणिशंकर अय्यर इस बात को आधारहीन बताते हुए कहते हैं, ‘दसवीं और बारहवीं पंचवर्षीय योजना में पूर्वोत्तर में निवेश के लिए चौदह लाख करोड़ रुपये रखे गए हैं. पूर्वोत्तर में भारत की चार फीसद आबादी बसती है मगर केंद्रीय विकास फंड का दस फीसदी नियमित तौर पर इसके लिए रखा जाता है. मणिपुर में तात्कालिक जरूरत इस बात की है कि इसके सारे समुदाय एकजुट हों. इसे समावेशी सरकार के साथ समावेशी विकास की जरूरत है.’

मगर केंद्र सरकार इस मामले पर इतनी संवेदनशील नहीं दिखती. पूर्वोत्तर मामलों के मंत्री बीके हांडिक से जब हमने मणिपुर संकट के बारे में बात करनी चाही तो उनका जवाब था, ‘कानून-व्यवस्था हमारी जिम्मेदारी नहीं है.’ मगर ये होनी चाहिए क्योंकि मणिपुर में सेना केंद्र सरकार की मंजूरी से ही भेजी गई है. प्रसिद्ध लेखक डेविड फ्रीडमैन ने कहा है, ‘सीधे ताकत का इस्तेमाल किसी भी समस्या को हल करने का कमजोर तरीका होता है जो आमतौर पर या तो छोटे बच्चे अपनाते हैं या बड़े देश.’

उम्मीद की जानी चाहिए कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग बच्चे नहीं हैं. वे इस बात को समझेंगे.