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यूं रंगमंच की राह चला मैं

सिनेमा की तरह थियेटर के प्रति भी मेरा लगाव जिस माहौल में पनपा वो ऐसा था जिसे इस तरह की चीजों के लिए जरा भी माकूल नहीं कहा जा सकता. पेशे से प्रशासनिक अधिकारी मेरे वालिद बेहद कड़कमिजाज थे. वो चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं और इज्जत कमाऊं. लेकिन मुझे एक्टिंग पसंद थी जो उनकी नजर में घटिया दर्जे का काम था. यही वजह थी कि मुझे शुरू से ही बर्बाद करार दे दिया गया था. उन्हें मैं एक ऐसा लड़का लगता था जो किसी काम का नहीं था.

अलीगढ़ जैसे शहर में चेयर्स जैसे नाटक का मंचन या तो बहादुरी की सबसे बड़ी मिसाल कहा जा सकता है या फिर बेवकूफी की. मेरी कोशिश इन दोनों के कहीं बीच की रहीऐसा कई सालों तक चलता रहा. मैं किसी भी हालत में एक्टिंग के जरिये मशहूर होने के अपने ख्वाब को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था. नतीजा घर में खूब लड़ाई होती. गुस्सा, लानत, बेइज्जती..हर तरह के हथियार से काम लिया जाता. मगर क्या मजाल कि मैं टस से मस हो जाऊं. लगता था जैसे मुझ पर कोई साया हो.

मैंने कम उम्र में ही घर छोड़ दिया था. इसके बाद कई साल तक मेरे वालिद से मेरी बात नहीं हुई. फिर मेरी पहली फिल्म निशांत आई. उन्होंने भी ये देखी और उन्हें ये अच्छी लगी. मगर हमारा रिश्ता पूरी तरह से पटरी पर आता उससे पहले ही वो गुजर गए. उनका जाना मेरी जिंदगी में एक ऐसा खालीपन छोड़ गया जो आज तक नहीं भर पाया है. उनकी मौत के बाद मैंने उनके एक जोड़ी जूते अपने पास रख लिए थे, स्टैंडर्ड बाटा नॉटी ब्वॉय शूज जिनकी उम्र अब कम से कम पचास साल हो चुकी होगी. कभी-कभी मैं इन्हें अपने नाटकों के दौरान पहन लेता हूं और सोचता हूं कि क्या वो मुझे कहीं से देख रहे होंगे. थियेटर से लगाव का बीज मुझमें सेंट जोजेफ के दौरान पड़ा जो नैनीताल में मेरा बोर्डिंग स्कूल था. वहां पर नाटक, ऑपरा वगैरह होते रहते थे. वैसे तो ये स्कूल था मगर यहां पर नाटकों का मंचन बड़े ही भव्य स्तर पर किया जाता था. हालांकि मुझे वहां कभी भी मंच पर आने का मौका नहीं दिया गया. मैं पढ़ने-लिखने में भी होशियार नहीं था और इसका मतलब था हर चीज में पीछे रहने का दर्द ङोलना. मैं खामोशी से इस दर्द को सहता रहा.

फिर भी नाटकों का जादू मेरे सर चढ़कर बोला करता था. स्कूल में हमें बहुत सी बढ़िया फिल्में देखने को भी मिलीं. और कहा जाए तो मेरी असली शिक्षा बुनियादी रूप से यही फिल्में और नाटक रहे. मेरी जिंदगी के सांचे को इन्होंने ही ढाला. साल में एक बार ज्योफरी केंडल का ब्रिटिश थियेटर ग्रुप शेक्सपियराना भी वहां आता था. मैंने अपनी जिंदगी में केंडल से महान अभिनेता और इंसान नहीं देखा. उनका काम मुझे अब भी राह दिखाता है. थियेटर के काम को उन्होंने नए मायने दिए. वो हमेशा कहा करते थे, ‘मैं कोई एक्टर या डायरेक्टर नहीं हूं, मैं एक मिशनरी हूं और मेरा मिशन है शेक्सपियर के काम को फैलाना.’

रिहर्सल के लिए जुगाड़ टेक्नॉलॉजी से काम चलाना पड़ता था. ये डबल डेकर बस के ऊपरी फ्लोर पर होती थी या फिर दोपहर के वक्त लोकल ट्रेन में जब वे खाली चलती थीं

केंडल के मंचन का एक पहलू मुझे हमेशा बड़ा चकित करता था. हमारे स्कूल में जो नाटक होते थे उनमें जंगल, नदी, ड्राइंग रूम जसी चीजों को दिखाने के लिए गत्ते से बने सेट्स इस्तेमाल होते थे. मगर केंडल के नाटकों में ऐसा कोई सेट नहीं होता था. बल्कि उनके नाटकों के दौरान मंच की पृष्ठभूमि काली होती थी और वे एक कुर्सी और हैट जैसी कम से कम चीजों के साथ मंच पर प्रकट होते थे. मुझे इसकी वजह समझने में कई साल या कहिए कि दशक लग गए. और जब मैं इसे समझा तो मुझे इस बात की खुशी हुई कि सौंदर्यबोध की अपनी यात्रा में मैं खुद ही उस नतीजे पर पहुंच गया हूं जिस पर कभी केंडल भी पहुंचे होंगे.

स्कूल के बाद घरवालों के दबाव में मैं अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी गया. यहां फिर से मुझे कुछ ऐसे लोग मिले जिन्होंने मुझे निराशा से उबारा और जिनका मैं जिंदगी भर शुक्रगुजार रहूंगा. ये थे बेकेट, चेखव, शॉ और खासकर एक जाहिदा जदी जिन्होंने मुझे न सिर्फ वेटिंग फॉर गोडॉट और चेयर्स जैसे नाटक पढ़वाए (जिनका मुझे न सर समझ में आता था न पैर) बल्कि जो इस पर भी अड़ी रहीं कि मैं मंच पर उनका हिस्सा भी बनूं. अलीगढ़ जैसे शहर में चेयर्स जैसे नाटक का मंचन या तो बहादुरी की सबसे बड़ी मिसाल कहा जा सकता है या फिर बेवकूफी की. मेरी कोशिश इन दोनों के कहीं बीच की रही.

अलीगढ़ के बाद अगला पड़ाव था नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा यानी एनएसडी. यहां इब्राहीम अलकाजी की शानदार मंच प्रस्तुतियां थीं जिनकी भव्यता सम्मोहित करने वाली थी. बारीकी उनके काम की खासियत थी और नाटक के हर पहलू से जुड़ी छोटी से छोटी चीज पर भी बेहद ध्यान दिया जाता था फिर चाहे वो किसी चरित्र के जूते हों या पृष्ठभूमि में किसी पेड़ की पत्तियों का रंग.

एनएसडी के बाद बारी थी पुणे के एफटीआईआई की. यहां आने के बाद पांच साल तक मैं थियेटर से कटा रहा. फिर एक दिन बेंजामिन गिलानी और मैं जुनून  के सेट पर बैठे बातें कर रहे थे कि अचानक बेंजामिन बोले, ‘मैं तुम्हारे साथ एक नाटक करना चाहता हूं. चलो एक कोशिश करते हैं.’ बेंजामिन भी एफटीआईआई से ही निकले थे और मेरी और उनकी पहली मुलाकात के वक्त से ही जमने लगी थी. हमारे शौक भी मिलते-जुलते थे मगर हमारा स्वभाव बिल्कुल जुदा था. शायद यही वजह है कि तीन दशक बाद आज भी हम अच्छे दोस्त हैं.

ग्रोतोवस्की का कहना था कि थियेटर का मतलब ज्यादा ताम-झाम नहीं हैं. दो लोग मिलें और बात करने लगें तो इसी को थियेटर कहा जा सकता है

बेंजामिन की राय थी कि हमें वेटिंग फॉर गोडॉट करना चाहिए. मैं अपनी कुर्सी से लगभग उछलता हुआ बोला, ‘अरे नहीं! मुझे तो इसका एक भी शब्द समझ में नहीं आता.’ मगर बेंजामिन अपनी जिद पर अड़े रहे और हम आगे बढ़ चले. हम यानी टॉम ऑल्टर, बेंजामिन, एफटीआईआई में हमारे प्रोफेसर तनेजा और मैं. हमने एक साल तक इसकी तैयारी की. इसमें पढ़ना और रिहर्सल जैसी चीजें शामिल थीं. हौसला कायम रखने के लिए हमने इसके कुछ दूसरे मंचन भी देखे. इनमें से एक गुजराती में भी था जिसे देखकर हमारा आत्मविश्वास बढ़ा. गोडॉट और वो भी गुजराती में, यानी इस तरह की चीजें भी मुमकिन थीं.

तो इस तरह तीस साल पहले 29 जुलाई 1979 को हमने गोडॉट का पहला शो किया. ये बुरी तरह फ्लाप रहा. इसके बाद हमने इसे इसके हाल पर छोड़ दिया. छह महीने बाद हमने एक बार फिर इसके बारे में सोचा. उन दिनों ओमपुरी का मजमा के नाम से अपना एक ग्रुप था. हमने उनसे कहा कि वे हमारे प्रायोजक बन जाएं. आखिर एक साल बाद हमें बांबे के सोफिया कालेज से इस नाटक के प्रदर्शन का निमंत्रण मिला. हमें दो हजार छात्रों की भीड़ के सामने दो शो करने थे. दर्शकों की प्रतिक्रिया शानदार रही. पहली बार हमें लगा कि हम कुछ अच्छा कर रहे हैं. मंचन में हमने मुश्किल से 1000 रुपए खर्च किए होंगे. इस तरह से इन प्रदर्शनों से जो भी पैसा मिला वह हमारा शुद्ध लाभ था. इस सफलता के बाद हमारा अपना ग्रुप वजूद में आया. बेंजामिन ने इसका नाम रखा मॉटली वक्त के साथ प्रोफेसर तनेजा और टॉम की राह अलग हो गई और रत्ना (पाठक शाह), बेंजामिन, आकर्ष खुराना और मैं मॉटली प्रोडक्शंस के अहम सदस्य बन गए.

आज मॉटली विदेश में शो करता है और कभी-कभी तो हमें एक शो के 15 हजार डॉलर तक मिल जाते हैं. मगर जब तीस साल पहले हमने अपने सफर की शुरुआत की थी तो हालात ऐसे नहीं थे. एनसीपीए के पास 50 दर्शकों की क्षमता वाला एक छोटा सा थियेटर था जिसमें सिर्फ हिंदी के नाटक होते थे. इसके अलावा दादर के छबील दास हाईस्कूल के पास एक छोटा सा ऑडिटोरियम था जिसे वो किराए पर देता था. बांबे का सारा प्रयोगवादी थियेटर, चाहे वो मराठी हो, गुजराती या हिंदी, यहीं पैदा हुआ. यहीं पर अरविंद और सुलभा देशपांडे ने आविष्कार की शुरुआत की और यहीं से नाना पाटेकर और रोहिणी हटंगड़ी जैसे कलाकार भी निकले. यही वो जगह थी जहां उन दिनों हम 10-12 दर्शकों के सामने शो करते थे. रिहर्सल के लिए जुगाड़ टेक्नॉलॉजी से काम चलाना पड़ता था. ये डबल डेकर बस के ऊपरी फ्लोर पर होती थी या फिर दोपहर के वक्त लोकल ट्रेन में जब वे खाली चलती थीं. रिहर्सल की जगह पर एक हैट उल्टा करके रखा होता था और किसी दुर्लभ दिन कोई उसमें 100 रुपये का नोट डाल देता था. हालांकि ज्यादातर दिन इसके नसीब में एक, पांच या फिर ज्यादा से ज्यादा दस रुपये के नोट होते थे.

तो वो भी दिन थे. और आज ये दिन हैं कि मॉटली में शामिल होने की चाह में नौजवान एक मील लंबी लाइन लगा देते हैं. मैं उन सब से कहता हूं कि जाइए और अपने बूते कुछ करिए. हर एक में कुछ न कुछ खास होता है और इंसान उसे तभी पा सकता है जब वो अपने मकसद के जुनून और उसके रास्ते में आने वाली मुश्किलों से दोचार हो. मॉटली में हमने शुरुआत से ही ये फैसला कर लिया था कि हम कलाकारों की संख्या कम से कम रखेंगे. इसकी वजह सिर्फ यही नहीं थी कि ज्यादा कलाकारों को ज्यादा पैसा देना पड़ता बल्कि ये भी थी कि ज्यादा कलाकारों को एक साथ रखने में बड़ी मुश्किलें होती थीं. अक्सर कोई बीमार हो जाता या किसी को कोई बहुत जरूरी काम पड़ जाता. हमारे नाटक भी छोटे-छोटे होते थे जिनमें ज्यादा ताम-झाम नहीं होता था. ताम-झाम के लिए पैसे की जरूरत होती थी और हम कोई ब्रॉडवे तो थे नहीं.

मगर एक दिन मेरे भीतर छिपा हुआ इब्राहिम अलकाजी का सपना बाहर निकल आया और मैंने जूलियस सीजर करने का फैसला किया. ये 1992 की बात है. विक्रम कपाड़िया इसके सहनिर्देशक थे. हमारे पास 70 कलाकारों की कास्ट थी. इसमें केके मेनन भी थे जो भीड़ में खड़े एक्स्ट्राज में से एक थे. हमने इसमें काफी पैसा खर्च किया मगर कोई इसे देखने नहीं आया. इस नाटक ने हमारी जेब की हालत खस्ता कर दी. मुझे लगा था कि जूलियस सीजर तो हर स्कूल में पढ़ाया जाता है और कम से कम छात्र तो इसे देखने के लिए उमड़ेंगे ही. मगर आए तो सिर्फ कुछ टीचर्स और वो भी दूसरे दिन. और वो भी इस बात से बेहद नाराज हुए कि हमने नाटक में बदलाव कर दिया था. हमारी खूब हूटिंग हुई.

जूलियस सीजर के सदमे से उबरने के बाद हमने डियर लायर नाम का एक नाटक किया. इसमें सिर्फ दो कलाकार थे. आज 20 साल बाद भी इसका मंचन हो रहा है. गोडॉट को चलते हुए 30 साल हो गए हैं और इस्मत आपा के नाम को 10. धीरे-धीरे हम अपने मुकाम तक पहुंच गए हैं. मुख्यधारा के सिनेमा से ऊबकर मैं 1981 में अपनी गाढ़ी कमाई के 35 हजार रुपये खर्च कर पोलैंड चला गया था ताकि थियेटर जगत के दिग्गज जेर्जी ग्रोतोवस्की के साथ काम कर सकूं. उनकी किताब टुवर्ड्स अ पुअर थियेटर पढ़कर मैं उनका मुरीद हो गया था और आज भी मुझे लगता है कि थियेटर पर मैंने जितनी भी किताबें पढ़ी हैं उनमें से ये सबसे ज्यादा गहराई से इस दुनिया के बारे में कहती है. हालांकि उनसे मेरी मुलाकात थोड़ी निराशाजनक रही मगर इसने मुझे खोज की एक अहम राह पर धकेल दिया.

ग्रोतोवस्की ब्रॉडवे के बहुत बड़े आलोचक थे. उनका सवाल था कि जब विशेष प्रभाव पैदा करने के मामले में थियेटर कभी भी सिनेमा की बराबरी नहीं कर सकता तो फिर ये इस मामले में सिनेमा से मुकाबला करने पर क्यों आमादा है? वो कहते थे कि आदमी को अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने की जरूरत होती है और इसी जरूरत से थियेटर का जन्म हुआ है इसलिए अपनी बात पहुंचाने के लिए हमें मंच पर बड़े-बड़े किले, हेलीकॉप्टर आदि जैसी भव्यताओं की जरूरत नहीं होनी चाहिए. ग्रोतोवस्की का तर्क था कि थियेटर का असली जादू दर्शक की कल्पना को जगाने में है इसलिए संसाधनों की कमी हमारी कमजोरी नहीं ताकत होनी चाहिए. उनके मुताबिक अगर आप हर ऊपरी चीज को हटा दें – सेट्स, लाइट्स, कॉस्ट्यूम्स – तो आपको बस साधारण कपड़े पहने एक अभिनेता की जरूरत है जो मेहनत करने के लिए तैयार हो और बस हो गया थियेटर तैयार. ग्रोतोवस्की का कहना था कि थियेटर का मतलब ज्यादा ताम-झाम नहीं हैं. दो लोग मिलें और बात करने लगें तो इसी को थियेटर कहा जा सकता है. बाद में वो अपने इस तर्क को इतना आगे ले गए कि उन्होंने इसमें से संवाद की जरूरत को भी हटा दिया.

मगर मुझे ये सब चीजें धीरे-धीरे ही समझ में आईं. ग्रोतोवस्की की वजह से ही मैं केंडल के थियेटर के उस अंदाज को समझ पाया जो कभी मैंने सालों पहले अपने स्कूली दिनों में देखा था. केंडल भी अपने सेट पर ज्यादा ताम-झाम नहीं रखते थे और इसके बावजूद मैंने अपनी जिंदगी में उससे ज्यादा जादुई थियेटर नहीं देखा. इसलिए जब हमने अपना थियेटर ग्रुप बनाया तो हमने किस्सागोई की उस कला पर ज्यादा जोर रखा जो हमेशा से हमारे समाज में रही है. मॉटली प्रोडक्शंस में हमारी कोशिश ये रहती है कि हम दर्शकों की कल्पना को जगाएं. इस्मत चुगताई, मंटो और मोहन राकेश की कहानियों पर आधारित श्रंखला और हाल ही में दास्तानगोई के जरिए हम यही कर रहे हैं.

दास्तानगोई का हिस्सा बनने के बाद मुझे लगता है जैसे मैंने अपना घर पा लिया है. कला के नजरिये से देखा जाए तो इससे बड़ी चुनौती कोई नहीं और अब मैं बाकी की जिंदगी यही करना चाहता हूं. महमूद फारुकी ने सिनेमा की वजह से खत्म हो चुकी इस महान कला को जिलाने के लिए जो काम किया है इसके लिए उनका जितना शुक्रिया किया जाए कम है. अलकाजी की शैली वाले थियेटर के लिए मेरा जो पागलपन था दास्तानगोई ने उसे खत्म कर दिया. अब मेरी इस तरह का थियेटर करने की कोई इच्छा नहीं. बल्कि मुझे तो अब इसे देखने में भी मजा नहीं आता.

अब मेरा सिर्फ एक ही सपना है कि मॉटली मेरे बाद भी जिंदा रहे. बदकिस्मती से इसे अब मेरे साथ ही जोड़कर देखा जाने लगा है मगर मैं चाहता हूं कि ये मेरे बगैर भी चले. मैं चाहता हूं कि लोग मॉटली को इसके काम के लिए जानें, नसीरुद्दीन शाह की वजह से नहीं.     

भारत देश के तालिबान

कभी ऐसी संसदों सा बर्ताव जहां के कानून लड़कियों को लुप्तप्राय और पति-पत्नी को भाई-बहन बना देते हैं और कभी ऐसी अदालतों सा जहां सच के मायने हैं निर्दोषों की हत्या, बलात्कार और दर-दर की ठोकरें. खाप पंचायतों के तालिबानी कहर पर नेहा दीक्षित की ये रिपोर्ट; फोटो तरुण सहरावत 

राजधानी दिल्ली से महज कुछ किलोमीटर की ही दूरी पर जगह-जगह ऐसी संस्थाएं अस्तित्ववान हैं जिनके लिए संविधान और नियम-कानूनों का कोई मतलब ही नहीं. ये प्यार और शादी करने वाले जोड़ों की हत्या का फरमान सुनाती हैं और उनका आदेश नहीं मानने वालों के बच्चों को बेच भी देती हैं. ये प्यार में पड़कर घर से भाग जाने वाले लड़कों को दंड देने के लिए उनकी मां का सामूहिक बलात्कार भी करवा सकती हैं. इन संस्थाओं के तालिबानी फ़रमान औरतों को सिर्फ लड़के ही पैदा करने की अप्राकृतिक सीमाओं में भी बांध सकते हैं. विचित्रताओं की इस धरती पर ये भी गजब का विरोधाभास है कि एक ओर तो हमारे प्रधानमंत्री तालिबान के सफाए के लिए जी-8 सम्मेलन में पूरी दुनिया को एकजुटता का संदेश देते हैं वहीं संसद भवन की चारदीवारियों से महज कुछ फासले पर मौजूद ऐसी अवैध ताकतों की ओर हम अपनी आंख मूंदे रहते हैं.

9 मई 2008 को ओम प्रकाश ने कथित रूप से गांव वालों के साथ मिल कर अपनी गर्भवती बेटी सुनीता और उसके पति जसबीर के हाथ-पैर बांध कर उनके ऊपर ट्रैक्टर चला दिया था. इसके बाद उन्होंने दोनों के मृत शरीर उनके घरों के बाहर लटका दिए गए

23 जुलाई को जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक अन्य अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया को तालिबान के जुल्म से मुक्त करवाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर रहे थे तो उसी दिन हरियाणा के जींद जिले में सर्व खाप पंचायत के आदेश पर एक पागल भीड़ द्वारा एक युवक की नृशंस हत्या की जा रही थी. उसका गुनाह सिर्फ इतना था कि उसने अपने ही गोत्र की एक लड़की से शादी करने की जुर्रत की थी. तमाम गैर सरकारी संगठनों और मीडिया रिपोर्टों की मानें तो खाप पंचायतों ने पिछले छह महीनों में हर हफ्ते औसतन चार जोड़ों के हिसाब से समान गोत्र में शादी करने वालों को मौत की सजा सुनाई है. दरअसल हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के एक बड़े हिस्से में खापें किसी जाति के अलग-अलग गोत्रों(उपजातियों) की पंचायतें होती हैं. ये एक ही गोत्र के भीतर होने वाले किसी विवाद के निपटारे या उससे संबंधित नियम तय करने का काम करती हैं. मगर जब कोई मसला एक खाप या गोत्र या फिर इससे भी बढ़कर किसी जाति के दायरे से बाहर का होता है तब सभी संबंधित खापों की एक मिली जुली बैठक बुलाई जाती है जिसका प्रधान सर्वसम्मति से तय किया जाता है. इस मिली-जुली पंचायत को ही सर्व खाप कहते हैं.

बीते पांच सालों के दौरान खाप पंचायतों ने संविधानेत्तर संस्था की छवि बना ली है जो लगातार गंभीर परेशानी में डालने वाले फैसले सुना रही हैं. खाप पंचायतों की पहचान हत्या, बलात्कार और मानव तस्करी करने, पीड़ितों की संपत्ति हड़पने और लोगों के ऊपर प्रतिबंध थोपने वालों की बन गई है. और ये सब अपने समुदाय का गौरव और सम्मान को बचाए रखने के नाम पर हो रहा है. बहुत से मामलों में स्थानीय प्रशासन भी खाप पंचायतों की इच्छा के आगे सिर नवाता नजर आता है.

सजा-ए-मौत

मिशा एक हाथ में हाई कोर्ट का आदेश और दूसरे हाथ में मेरा हाथ पकड़े हुए पूछती हैं, ‘तुम यहां किसलिए आई हो?’ वो चिल्लाती है, ‘तुम सभी नपुंसक हो. तुम उन्हें नहीं बदल सकते. वो तुम्हें भी मार देंगे. हमें उनके इशारों पर ही जीना-मरना है.’ इसी साल मार्च में उनके 26 वर्षीय बेटे आयुर्वेदिक चिकित्सक वेद पाल और 22 वर्षीय सोनिया ने परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ घर से भाग कर शादी कर ली थी. जब बनवाला खाप को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने एक आदेश जारी कर दिया जिसके मुताबिक जोड़ा एक ही गोत्र का है इसलिए वो भाई-बहन हुए और उनकी शादी अवैध है. क्योंकि उनका अपराध ‘अक्षम्य’ था इसलिए पूरे समुदाय का सिर नीचा करने के जुर्म में पंचायत ने उन्हें पकड़ कर जान से मार देने का आदेश दे दिया.

तेवतिया खाप ने आदेश दिया कि प्रेमी जोड़े को खोजा जाए और चेतन की मां सिया दुलारी के साथ यादव परिवार के सदस्य बारी-बारी से बलात्कार करेंगे क्योंकि उसके बेटे ने यादव परिवार की प्रतिष्ठा खराब की हैइस फरमान के दो महीने के भीतर ही 22 मई को इस जोड़े को पकड़ लिया गया और दोनों को अलग कर दिया गया. वेद पाल इस अन्याय को बर्दाश्त नहीं कर सका और उसने कानून की शरण ली. उसने हरियाणा हाईकोर्ट से संपर्क किया और अपने लिए पुलिस सुरक्षा का आदेश पाने में सफल रहा. 23 जुलाई को रात में 9 बजे नरवाना सदर थाने के एसएचओ बलवंत सिंह और हरियाणा हाईकोर्ट के वारंट अधिकारी सूरज भान पुलिस दल के साथ मातौर गांव स्थित वेद पाल के घर पहुंचे. उन्होंने वेद पाल को सिंहवाला गांव तक सुरक्षा देने का वादा किया जहां उसकी बीवी सोनिया को जबर्दस्ती रखा गया था. जैसे ही वेदपाल सिंहवाला पहुंचा उसके ऊपर हमला कर दिया गया. उसे सोनिया के घर की छत पर लेजाकर पहले नंगा किया गया फिर लाठियों से पीटा गया, उसके गले और कंधे पर हंसिए और कुल्हाड़ी से वार किए गए. सूरज भान को छत से नीचे फेंक दिया गया. इससे घबराए 15 पुलिस वाले वहां से भाग खड़े हुए. ‘मेरे बेटे के शरीर में एक भी हड्डी सलामत नहीं बची थी. वो उसकी मौत के बाद भी काफी देर तक उसे पीटते रहे’ वेद पाल की मां बताती हैं. मातौर गांव में रहने वाले उसके परिवार को – जो कि सिंहवाला से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर है- इसकी जानकारी 14 घंटे बाद हुई. यहां तक कि उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट की प्रति भी नहीं मिली है. हालांकि इसके बाद बलवंत सिंह को निलंबित कर दिया गया है और चार ग्रामीणों को गिरफ्तार किया गया है. मगर तब से सोनिया के बारे में किसी को कुछ पता नहीं. नाम न छापने की शर्त पर सोनिया की सहेलियां तहलका को बताती हैं कि उसके परिजनों ने उसकी ईंटों से बुरी तरह से पिटाई की थी. किंतु सोनिया के चाचा सूरत सिंह कहते हैं, ‘उसकी फिर से शादी हो गई है और वो अपने परिवार में खुश है.’ उधर उसकी सहेलियों का कहना है कि ये सब इसलिए कहा जा रहा है ताकि कोई उसकी खोजबीन न करने लग जाए. उन्हें सोनिया की सलामती को लेकर भी तरह-तरह की आशंकाएं सता रही हैं. 

‘इस तरह के बच्चों के साथ और क्या किया जा सकता है?’ कमल पूछती हैं. करनाल जिले के बल्ला गांव में रहने वाले उनके पति ओम प्रकाश और नौ दूसरे लोग पिछले एक साल से जेल में हैं. 9 मई 2008 को ओम प्रकाश ने कथित रूप से गांव वालों के साथ मिल कर अपनी गर्भवती बेटी सुनीता और उसके पति जसबीर के हाथ-पैर बांध कर उनके ऊपर ट्रैक्टर चला दिया था. इसके बाद उन्होंने दोनों के मृत शरीर उनके घरों के बाहर लटका दिए गए ताकि आगे से कोई इस तरह का काम करने की हिम्मत नहीं कर सके. दोनों एक ही गोत्र के थे. उन दोनों की हत्या का फरमान जारी करने वाली कालीरमन खाप के एक सदस्य जगत सिंह कहते हैं, ‘समान गोत्र में शादी करने वाले हरामी हैं. बिरादरी को बचाने के लिए ऐसे आवारा लोगों को मार देना चाहिए.’ गांव वालों ने इन हत्याओं का जश्न बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया. ‘इस तरह के लड़कों के घरवालों को चुपचाप अपने बच्चों को मार देना चाहिए. बिरादरी के प्रति अपनी निष्ठा साबित करने का ऐसा मौका ज्यादा लोगों को नहीं मिलता’ कालीरमन खाप के ही एक और सदस्य जय सिंह कहते हैं.

कालीरमन खाप के एक सदस्य जगत सिंह कहते हैं, ‘समान गोत्र में शादी करने वाले हरामी हैं. बिरादरी को बचाने के लिए ऐसे आवारा लोगों को मार देना चाहिए.’कानून व्यवस्था लागू करने वाली संस्थाओं की घोर अनुपस्थिति में स्वाभिमान और प्रतिष्ठा के नाम पर की जा रही हत्याओं का खेल बेरोकटोक जारी है. संविधान, कानून और प्रशासन जैसी संस्थाएं मानो यहां के लिए अभी अस्तित्व में आईं ही नहीं हैं. ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि जसबीर की हत्या के मामले की गवाह उसकी बहन अचानक ही अपने बयान से पलट जाती है. खाप के ही एक सदस्य नाम न छापने की शर्त पर तहलका को बताते हैं, ‘खाप ने जसबीर के परिवार से कहा कि अगर उसने केस वापस नहीं लिया तो उन्हें बिरादरी और गांव दोनों से बाहर कर दिया जाएगा.’

जांहिर है आरोपी जल्द ही छूट जाएंगे जिसका अर्थ ये होगा कि सामाजिक मान्यता पा चुकी इस बर्बरता में कोई कमी नहीं आने वाली. बनवाला खाप के एक कार्यकर्ता अजित सिंह कहते हैं, ‘खापों ने हमारे जीवन का एक ढर्रा तय किया है. यहां प्रेम विवाह की इजाजत नहीं है. हमारे बुजुर्गों ने ये नियम लागू किए हैं. हम भी ऐसा ही करेंगे.’

इसीलिए बनवाला खाप ने जून 2007 में कैथल के करौंरा गांव के रहने वाले 23 वर्षीय मनोज और 19 वर्षीय बबली को मौत की सजा सुनाई थी. मनोज और बबली ने 18 मई को घर से भागकर शादी कर ली थी. मगर पुलिस सुरक्षा के बावजूद करनाल के पास बबली के परिवार वालों ने उन्हें एक रोडवेज की बस में धर-दबोचा. बाद में उनकी हत्या कर उन्हें हिसार में एक नहर में बहा दिया गया. ‘जो मेरे पिता ने किया वो औरों के लिए उदाहरण बनेगा. हमारी इज्जत सबसे बड़ी है और हम अपनी इज्जत के लिए ऐसे काम करते रहेंगे’ बबली का 17 वर्षीय चचेरा भाई जिसके पिता भी इस मामले में आरोपी हैं, ठेठ हरियाणवी लहजे में कहता है. मगर न्याय अभी पूरा कहां हुआ है. मनोज के परिवार वालों से किसी भी तरह का रिश्ता रखने वालों के लिए खाप ने ग्यारह सौ रुपये का जुर्माना मुकर्रर कर दिया है. ‘हमारे घर में रोजी-रोटी कमाने वाला केवल मनोज ही था. मेरे पिता पहले से ही नहीं थे. अब अब सारे गांव ने हमारा बहिष्कार कर दिया है. दिन-प्रतिदिन हमारा जीना मुश्किल होता जा रहा है.’ अपनी मां के साथ बैठी मनोज की बहन सीमा रुंधे गले से कहती है.

ग्रामीणों के साथ हफ्तों, महीनों बिताने और बातचीत करने से एक बात बेहद साफ होती है कि खाप पंचायतों द्वारा मौत के फरमान जारी करना कोई दुर्लभ नहीं बल्कि एक बेहद आम बात है. लेकिन जटिल सामाजिक संरचना और बिरादरी से बहिष्कार के डर से ये मौते पुलिस या मीडिया की जानकारी में ही नहीं आती. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के पास प्रतिष्ठा के नाम पर की गई हत्याओं की कोई श्रेणी ही नहीं है इसलिए इनसे जुड़े कोई आधिकारिक आंकड़े नहीं मिलते. खाप पंचायतों के आदेशों पर की गई हत्याओं के कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं होने की सूरत में इन पर किसी तरह का शोध आदि भी संभव नहीं हो पाता.

लैंगिक असंतुलन

21 जुलाई को काद्यान खाप ने 23 वर्षीय रवींद्र और उसके परिवार पर एक लाख रूपए का जुर्माना और परिवार के 15 सदस्यों को स्थाई रूप से गांव से बहिष्कृत करने का फरमान सुनाया

हरियाणा में लैंगिक अनुपात के इतने विकराल असंतुलन में भी पुरुष प्रधान रूढ़िवादी खाप पंचायतों की बेहद अहम भूमिका रही है. राज्य में लैंगिक अनुपात पूरे देश में सबसे कम है और ये दूल्हों की मंडी के तौर पर भी बदनाम है. 2004 में तेवतिया खाप दुलेपुर गांव में संपत्ति के विवाद की सुनवाई कर रही थी. खाप ने फैसला दिया कि जिन परिवारों में दो से कम बच्चे होंगे वो संपत्ति विवाद के लिए खाप से सहायता मांगने के अधिकारी नहीं होंगे. इसकी वजह भी उन्होंने बहुत दिलचस्प बताई. ऐसे बदकिस्मत लोगों के मामलों में खानदान का नाम रोशन होने या फिर परिवार की संपत्ति में वृद्धि होने की संभावनाएं बहुत कम होती हैं. यानी सीधे-सीधे वो कम हिस्से के लायक हैं.

इस आदेश के बहुत विनाशकारी परिणाम हुए. दो बेटों की अनिवार्यता को पूरा करने के लिए व्याकुल परिवारों ने हर उन हथकंडों का इस्तेमाल किया जिससे लड़की का जन्म होने से रोका जा सके. प्रतिष्ठित अखिल भारतीय आयर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की एक रिपोर्ट से पता लगता है कि बल्लभगढ़ ब्लॉक के 28 गांवों में लैंगिक अनुपात में भयंकर गिरावट आई है. ये सभी गांव तेवातिया खाप के न्याय क्षेत्र में आते हैं. रिपोर्ट से लिंग निर्धारण जांच और कन्या भ्रूण हत्याओं के बीच सीधा संबंध भी देखने को मिलता है. हैरत की बात ये रही कि राज्य सरकार द्वारा भ्रूण लिंग निर्धारण तकनीक कानून को नोटीफाई न किये जाने की वजह से राज्य में अदालतों को कई ऐसे डॉक्टरों को बरी करना पड़ा जो इस तरह की जांच करते थे. जबकि ये कानून बाकी पूरे देश में  लागू है और लिंग निर्धारण जांच को प्रतिबंधित करता है.

सितंबर 2006 से एम्स के बल्लभगढ़ स्थित ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा केंद्र के प्रमुख रहे डॉ आनंद के कहते हैं, ‘ऐसे परिवार बहुत ही कम हैं जिनमें लड़का होने से पहले दूसरी या तीसरी लड़की पैदा हुई हो. इसका समाधान सिर्फ सामाजिक हस्तक्षेप से ही संभव है.’ 2004 में तेवतिया खाप की तरफ से आया बयान इस भयंकर लैंगिक असंतुलन की वजह को स्पष्ट कर देता है. तेवतिया खाप के सदस्य कांता सिंह जो कि तीन बेटों और एक बेटी के बाप हैं कहते हैं, ‘बेटे तो आदमी की संपत्ति होते हैं. मेरे बेटे मेरा नाम रौशन करेंगे और मेरे खेतों का दायरा बढ़ाएंगे. ये मेरी बेटी की शादी और दहेज के लिए पैसे कमाएंगे.’ जब उनसे पूछा गया कि लड़कियों की इतनी कमी होगी तो आपके बेटों के लिए दुल्हनें कहां से आएंगी? इस पर वे अहंकार के साथ कहते हैं, ‘वो इतनी कमाई करेंगे कि उन्हें इसकी चिंता करने की जरूरत ही नहीं है.’ सिंह का ये कहना हरियाणा में दुल्हनों की देश की सबसे बड़ी मंडियों में से एक के होने की ओर इशारा करता है जहां तस्करी के जरिए लड़कियां लाईं जाती हैं और बिकने के बाद वे महज बच्चा पैदा करने की मशीन भर बन कर रह जाती हैं.

खाप की पुरुषवादी मानसिकता सिर्फ महिला भ्रूण हत्या तक ही सीमित नहीं है. वो आज भी पूरे परिवार को सजा देने के लिए बलात्कार जैसा मध्ययुगीन तरीका अपनाते हैं. 2004 में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में स्थित भवानीपुर गांव का 20 वर्षीय चेतन, पिंकी के साथ घर से भाग गया था. पिंकी इलाके के प्रभावशाली यादव परिवार की बेटी थी जबकि चेतन जाति का नाई था. तेवतिया खाप ने आदेश दिया कि प्रेमी जोड़े को खोजा जाए और चेतन की मां सिया दुलारी के साथ यादव परिवार के सदस्य बारी-बारी से बलात्कार करेंगे क्योंकि उसके बेटे ने यादव परिवार की प्रतिष्ठा खराब की है. ‘उन्होंने उसके साथ सिर्फ बलात्कार ही नहीं किया बल्कि सबूतों को नष्ट करने के लिए उसे जिंदा जला दिया. पुलिस को सब पता है पर उसने कुछ नहीं किया’ चेतन के चाचा राज नरायण कहते हैं. बाद में कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के हस्तक्षेप से कुछ लोगों की गिरफ्तारी तो हुई पर जल्द ही उन्हें जमानत मिल गई. 

नाच नहीं, क्रिकेट नहीं

तालिबानी तर्ज पर रूहल खाप ने मार्च 2007 में शादियों में डीजे चलाने पर ये कहते हुए रोक लगा दी कि इससे दुधारू पशुओं पर असर पड़ता है. पर असल वजह थी लड़कियों को डांस फ्लोर पर चढ़ने से रोकना. जल्द ही तीन और खाप इस मुहिम में शामिल हो गईं और रोहतक के करीब 83 गांव इसके दायरे में आ गए. रूहल खाप के कार्यकर्ता पंकज रूहल, कहते हैं, ‘युवक तेज संगीत पर शराब पीकर नाचते रहते हैं. इससे रात में गाएं सो नहीं पाती जिसकी वजह से सुबह उन्हें दुहना बहुत मुश्किल हो जाता है. घरों में रहने वाली औरतों ने भी बाहर निकल कर नाचना शुरू कर दिया था. ये हमारी परंपरा के खिलाफ है.’

मई 2001 में तालिबान ने फतवा जारी किया था कि मुस्लिम देशों में क्रिकेट नहीं खेला जाना चाहिए. बिल्कुल इसी तर्ज पर अप्रैल 2007 में जिंद जिले की दादन खाप के मुखिया तेवा सिंह ने 28 गांवों में क्रिकेट खेलने और टीवी पर क्रिकेट देखने पर प्रतिबंध लगा दिया. दादन खाप के सदस्य जोगी राम कहते हैं, ‘जवान लड़के बर्बाद हो रहे थे. बड़े बुजुर्गो को अपने बच्चों से कबड्डी, खो-खो और कुश्ती खेलने के लिए कहना चाहिए. क्रिकेट भी कोई खेल है.’ और इस नियम को तोड़ने वालों के लिए खाप की चेतावनी है कि उनकी ‘सात पुश्तों’ को दंड मिलेगा. एक अपुष्ट खबर के मुताबिक करनाल जिले की एक खाप ने टेलीविजन और रेडियो तक पर प्रतिबंध लगा रखा है.

कमाई का आसान जरिया

परंपराओं के इन तथाकथित पहरुओं द्वारा समान गोत्र के जोड़ों की हत्या तो आम बात है ही इसके अलावा इन्होंने अपनी इस भूमिका को कमाई का जरिया भी बना लिया है. सितंबर 2006 को पवन अपनी पत्नी कविता के साथ करनाल जिले के काटलेहरी गांव स्थित अपनी ससुराल गया था जहां अगले ही दिन कविता ने एक बेटे को जन्म दिया. दस दिन बाद बॉम्बक खाप ने घोषणा की कि लड़का और लड़की दोनों एक ही गोत्र के हैं इसलिए ये बच्चा अवैध है और उनके साथ नहीं रह सकता. पवन की साली उमा ने बताया, ‘दस दिन के बच्चे को खाप के सदस्यों ने जबरन छीन लिया.’ इसके बाद जो हुआ वो तो और भी शर्मनाक था. पंचायत की बैठक में कविता को बेरहमी से तब तक पीटा गया जब तक कि वो अपने पति के हाथ में राखी बांधने के लिए तैयार नहीं हो गई. यानी पति-पत्नी अब भाई-बहन हो गए थे. तीन महीने तक उनका बच्चा गायब रहा. खाप ने कहा कि बच्चा एक संतानहीन दंपत्ति को दे दिया गया है. पवन की मां बीरमती कहती हैं, ‘हमें पता लगा कि खाप ने 50,000 रूपए में बच्चे को बेच दिया था.’ जबर्दस्त हंगामे और मीडिया के हस्तक्षेप के बाद खाप थोड़ा नरम पड़ी और उनके बच्चे को वापस कर दिया गया, लेकिन खाप ने इसके बदले में भी पवन और कविता से 65,000 रूपए वसूले. ये जोड़ा अब मुंबई में रहता है और कभी भी अपने गांव वापस नहीं लौटना चाहता.

यद्यपि खापें अपने सम्मान और स्वाभिमान के सर्वोपरि होने का दावा करती हैं लेकिन अपने इस तथाकथित सम्मान का अपने फायदे के लिए सौदा करने से पहले वे शायद ही सोचती हों. 21 जुलाई को काद्यान खाप ने 23 वर्षीय रवींद्र और उसके परिवार पर एक लाख रूपए का जुर्माना और परिवार के 15 सदस्यों को स्थाई रूप से गांव से बहिष्कृत करने का फरमान सुनाया. ये झर जिले के धराना गांव की घटना है. रवींद्र (गहलावत गोत्र) ने शिल्पा (काद्यान गोत्र) से शादी की थी. दोनों के गोत्र अलग होने के बावजूद रवींद्र का परिवार काद्यान गोत्र के गांव में पीढ़ियों से रहता आया था इसलिए खाप ने उन्हें एक ही गोत्र का अंश मानकर उनकी शादी को अवैध घोषित कर दिया. काद्यान खाप के मुखिया छत्तर प्रधान ने परिवार को 72 घंटे के भीतर अपनी संपत्ति का निपटारा कर गांव से चले जाने या फिर मौत के लिए तैयार रहने का हुक्म सुना दिया. निर्धारित समयसीमा खत्म होने से कुछ घंटे पहले रवींद्र की 90 वर्षीय दादी बिरना का तहलका से कहना था, ‘मैंने रात-दिन अपने खेतों में काम किया है. तब जाकर खेतों को इतना बढ़ा पाई हूं. इस धरती पर अब मैं कहां जाऊं?’ रवींद्र की चचेरी दादी तो और ज्यादा बदहवास हैं. ‘वो केवल रवींद्र और उसकी बीवी को ही गांव-निकाला दे सकते थे. पर पूरा परिवार क्यों?’ वो पूछती हैं. पुलिस सुरक्षा हासिल होने के बावजूद रवींद्र के परिवार ने गांव छोड़ने का फैसला किया. जैसे ही उन्होंने घर छोड़ा उनके घर में पिंडारियों जैसी लूटपाट शुरू हो गई. उनके पशुओं को पत्थर मारे गए. तहलका से उनकी आखिरी मुलाकात के वक्त वो लोग अपना घर-बार सिर पर लादे रोहतक जिले के जुगना गांव की ओर जा रहे थे. चूंकि खाप का ये भी आदेश था कि रवींद्र के परिवार से किसी भी तरह का लेन-देन नहीं किया जा सकता इसलिए औने-पौने दामों में भी उनकी जमीन खरीदने की हिम्मत किसी की नहीं हुई. अब बेहद कीमती 53 एकड़ जमीन पर खाप का कब्जा है. 

पुलिस को ये सब किये जाने में कुछ भी गलत नजर नहीं आता. बेरी थाने के थानाध्यक्ष पूरन सिंह कहते हैं, ‘वो पड़ोस के गांव में संबंधियों से मिलने गए हैं. सबकुछ नियंत्रण में हैं.’  धराना गांव के निर्वाचित सरपंच जयवीर भी ये कहते हुए रवींद्र के परिवार का पक्ष लेने से इनकार कर देते हैं कि, ‘मैं समाज के कानूनों से ऊपर नहीं हूं. अगर समाज ने उन्हें बाहर करने और संपत्ति पर कब्जा करने का आदेश दिया है तो उन्हें  फैसला मानना पड़ेगा.’

मगर इस तरह की जमीन-मकान या उनसे मिलने वाला पैसा आखिर जाता कहां है? अखिल भारतीय आदर्श जाट महासभा के अध्यक्ष परमजीत बनवाला कहते हैं, ‘सारा पैसा सामाजिक कार्यों, मंदिरों और नई गोशालाओं के निर्माण में लगता है.’ जब उनसे पूछा गया कि इन गोशालाओं से होने वाली आमदनी कौन रखता है तो उनका जवाब था, ‘खाप सदस्यों के अलावा और कौन रखेगा?’

खापों को जबर्दस्त राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त है. चुनावों के दौरान खाप अपने पंसदीदा उम्मीदवार का चयन करती हैं और पूरी बिरादरी उसी को वोट देती है. ये जानकर कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए कि बीते लोकसभा चुनाव के दौरान नरवाना जिले की 46 खापों ने एक सुर से बिना किसी झिझक हिंदू विवाह अधिनियम को खारिज कर दिया. उन्होंने ऐलान किया कि जो भी नेता वोट मांगने आएगा पहले उसे नए कानून का वादा करना होगा जिसमें समान गोत्र और एक ही गांव में विवाह को वर्जित किया जाए. खापों की ताकत का अंदाजा उस वक्त भी लगाया जा सकता था जब वेद पाल की हत्या के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री भुपिंदर सिंह हुड्डा ने ये कहते हुए हस्तक्षेप से इनकार कर दिया कि, ‘ये एक सामाजिक मसला है और समाज को ही इस पर फैसला करने का हक है.’ एक भी राजनीतिक पार्टी ने इसे सम्मान के नाम पर की गई हत्या और खाप की बर्बरता नहीं कहा. असंध के सामाजिक कार्यकर्ता राज सिंह चौधरी कहते हैं, ‘इस तरह के मामलों में पुलिस को भी कार्रवाई के लिए तैयार करना मुश्किल है क्योंकि वो खुद ही इन खापों में यकीन करती है.’

नतीजतन खापों के अत्याचार के खिलाफ कोई राजनीतिक आंदोलन भी सफल नहीं हो पाता. पूर्व पंचायती राजमंत्री मणि शंकर अय्यर कहते हैं, ‘ये पूरी तरह से अवैध हैं. खाप अलग-अलग जातियों के स्वघोषित ठेकेदार हैं जिन्होंने समय के साथ ही नैतिक ताकत भी हासिल कर ली है. उनके साथ सीधे टकराव करना तो मुश्किल है लेकिन सती प्रथा की तरह ही इसका भी उन्मूलन किया जा सकता है.’ 28 जुलाई को राज्यसभा में अपने लिखित बयान में गृहमंत्री पी चिंदबरम का कहना था, ‘सम्मान के नाम पर हो रही हत्याओं से हमें अपना सिर शर्म से झुका लेना चाहिए.’ उन्होंने ये भी कहा कि सरकार इस तरह के अपराध को अलग श्रेणी में डाल सकती है.

समाजशास्त्री रणबीर सिंह हरियाणा में खापों के प्रभुत्व को लेकर एक दिलचस्प राय देते हैं. अपने एक शोध पत्र में उन्होंने लिखा है, ‘जाट छोटे किसान थे, आर्थिक विकास की उन पर चौतरफा मार पड़ी. एक तो उन्हें हरित क्रांति का ज्यादा फायदा नहीं हुआ क्योंकि उनके पास छोटे-छोटे खेत थे, दूसरे वे आधुनिक पेशों में भी नहीं जा पाए क्योंकि उनके भीतर शिक्षा-दीक्षा का बहुत अभाव था. कई दूसरे पेशों में जाने में उनकी जातिगत श्रेष्ठता की भावना आड़े आ गई. उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण ने उनके लिए स्थितियां और दुरूह कर दीं. राजनीतिक नेतृत्व से उनके मोहभंग ने उन्हें आगे बढ़ाने की बजाए और पीछे धकेलने का काम किया.’

कहा जा सकता है कि जब तक कानून पूरी तरह से स्पष्ट नहीं होंगे, अपराधियों को दंड नहीं मिलेगा और साथ ही राजनीतिक नेतृत्व में इन मध्ययुगीन परंपराओं के उन्मूलन की इच्छा शक्ति नहीं होगी तब तक खाप पंचायतें अपराध, अज्ञानता और कट्टरता का जहरीला घालमेल बनी रहेंगी.

न्याय के आंगन से अन्याय की आहट!

करीब चार साल पहले ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल और दिल्ली की एक शोध संस्था सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज ने भारत में भ्रष्टाचार की स्थिति पर एक सर्वे करवाया था. रिपोर्ट में कहा गया कि भारतीय प्रतिवर्ष 20,000 करोड़ रूपए की रिश्वत देते हैं और इसमें हर स्तर के सरकारी कर्मचारी लिप्त हैं. सर्वेक्षण में न्यायपालिका में फैले भ्रष्टाचार का बेहद बारीकी से विश्लेषण किया गया था और इसमें सुधार के लिए कुछ बहुमूल्य सुझाव भी दिए गए थे. रिपोर्ट के मुताबिक हमारा न्यायिक तंत्र बेहद खर्चीला और सुस्त रफ्तार है जिसकी वजह से आम आदमी के लिए न्याय पाना टेढ़ी खीर हो जाता है. लिहाजा लोग न्याय के जाम पड़े पहिए में रिश्वत का तेल डाल देते हैं. इसका लाभ उठाने वालों में वकील और कोर्ट कर्मचारियों से लेकर जज तक शामिल हैं.

पूर्व मुख्य न्यायाधीश भरूचा के उस बयान पर कोई हैरत नहीं होनी चाहिए कि 20 फीसदी के करीब जज भ्रष्ट हैं. सवाल उठता है कि अपने इस पांचवें हिस्से को सुधारने के लिए बाकी बचे 80 फीसदी लोगों ने क्या किया?

लोगों के जेहन में जज वी रामास्वामी का बहुचर्चित मामला अभी भी ताजा है. संसद द्वारा बनाई गई तीन जजों की जांच समिति ने उन्हें भ्रष्टाचार के कई मामलों में दोषी पाया इसके बावजूद सत्ताधारी दल ने उन्हें बाहर का रास्ता नहीं देखने दिया और वोट न देने की आसान सी जुगत का इस्तेमाल करते हुए उनके खिलाफ संसद में महाभियोग की कार्रवाई को औंधे मुंह गिरा दिया. सर्वोच्च न्यायालय में भ्रष्टाचार के एक सीधे-सपाट मुद्दे को मतलबी राजनेताओं ने उत्तर और दक्षिण की प्रतिद्वंदिता का मुद्दा बना दिया. संसदीय भ्रष्टाचार ने न्यायपालिका के भ्रष्टाचार का जमकर सहयोग किया.

राजस्थान हाईकोर्ट के एक जज और उनके रजिस्ट्रार ने एक महिला डॉक्टर के यौन शोषण का प्रयास किया. सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति ने उन्हें दोषी पाया लेकिन जज ने सिर्फ त्यागपत्र दिया. मैसूर में कुछ जज सेक्स स्कैंडल में लिप्त पाए गए. मगर इसे भी गंभीर नहीं माना गया. दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज पर प्रॉपर्टी डीलरों के साथ अवैध लेन-देन का आरोप लगा, पर एक दशक से भी ज्यादा हो गया, इस पर सुनवाई तक शुरू नहीं हुई है. ऐसे में सम्माननीय पूर्व मुख्य न्यायाधीश भरूचा के उस बयान पर कोई हैरत नहीं होनी चाहिए कि 20 फीसदी के करीब जज भ्रष्ट हैं. सवाल उठता है कि अपने इस पांचवें हिस्से को सुधारने के लिए बाकी बचे 80 फीसदी लोगों ने क्या किया?

रिपोर्ट इस तथ्य की ओर भी ध्यान खींचती है कि अपने न्यायिक फैसलों के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने खुद को पुलिस द्वारा की जाने वाली किसी भी आपराधिक जांच से सुरक्षित कर लिया है जबकि बाकी सभी दूसरे सरकारी कर्मचारी इस जांच के दायरे में आते हैं. रिपोर्ट में राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन पर जोर दिया गया है जिसके पास जजों की नियुक्ति और उन्हें बर्खास्त करने का अधिकार हो, ये एक सही कदम है. जिस तरह से न्यायपालिका ने एक मायने में अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाते हुए राजनीतिक उम्मीदवारों को अपनी संपत्ति सार्वजनिक करने का आदेश दिया था उसी तरह से ये सुझाव भी दिया जा रहा है कि जजों को भी अपनी और परिवारजनों की संपत्तियां सार्वजनिक करनी चाहिए.

सांसद या विधायक बनने की इच्छा रखने वाला कोई उम्मीदवार अगर अपनी और अपने परिजनों की संपत्ति सार्वजनिक कर सकता है तो क्या ये और जरूरी नहीं हो जाता कि न्यायाधीश के पद पर बैठने की इच्छा रखने वाला या फिर इस पद पर पहले से आसीन व्यक्ति भी ऐसा ही करें?संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय अपराध निरोधक संस्था तमाम अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रही है. अप्रैल 2000 में इस समूह ने उचित न्यायिक व्यवहार के लिए एक आचार संहिता बनाने का फैसला किया था और नवंबर 2002 में हेग में इस संहिता को स्वीकार कर लिया गया. इस संहिता के मुताबिक, हालांकि न्यायपालिका के बर्ताव के उच्च मानकों को बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी न्यापालिका की ही है, हर समाज ये मानता है कि कानून का राज स्थापित करने के लिए न्यायिक शुचिता एक मूलभूत आवश्यकता है. किसी जज का व्यवहार और उसका कामकाज हर हाल में ऐसा होना चाहिए जिससे आम लोगों का विश्वास न्यायपालिका में और मजबूत हो सके. सभी, उन राष्ट्रीय कानूनों से भी इत्तेफाक रखते हैं जिनके मुताबिक हर जज को अपनी वित्तीय संपत्तियों को सार्वजनिक करना चाहिए.

भ्रष्टाचार का मुद्दा जिसमें न्यायपालिका से जुड़ा भ्रष्टाचार भी शामिल है अगले संसदीय चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बनने वाला है. लोगों को पता है कि जज संपत्ति के खुलासे को अपनी निजता में दखल मानकर खुश नहीं हैं. दुर्भाग्य से जजों को ये एहसास नहीं है कि जनता मजबूती से ये मानती है कि संपत्तियों को सार्वजनिक किया जाना भ्रष्टाचार, हितों के टकराव और जनता के पैसे के दुरुपयोग को हतोत्साहित करने का एक प्रभावी जरिया है. आम नागरिक, सामाजिक संगठन और मीडिया इस बात पर एकराय है कि जजों की संपत्ति सार्वजनिक करने का प्रावधान लागू होना चाहिए और इनका कड़ाई से पालन भी किया जाना चाहिए.

ब्राजील, मेक्सिको और अर्जेन्टीना जैसे तमाम लातिन-अमेरिकी देशों ने सरकारी कर्मचारियों की संपत्ति सार्वजनिक करने के लिए विशेष कानून बनाए हैं. कुछ खुलकर न्यायाधीशों के भी इन कानूनों के दायरे में आने की बात करते हैं. अमेरिका जैसे देशों को छोड़ भी दिया जाए तो अल सल्वाडोर और युगांडा जसे देशों में भी संपत्ति सार्वजनिक करना एक विधायी जरूरत है.

मेरी राय में हमारे यहां न्यायाधीशों द्वारा संपत्ति घोषित करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि संविधान का 14वां अनुच्छेद कानून के समक्ष सबको बराबरी का और समान सुरक्षा का मूलभूत अधिकार देता है. अत: इसके लिए हमें किसी अतिरिक्त कानून की जरूरत ही नहीं है. इस बात में कोई विवाद नहीं है कि भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत जज भी एक जनसेवक हैं. 1988 में सासंद और विधायक भी जनसेवक भी श्रेणी में आ गए. जज भी हमेशा से इसी श्रेणी में रहे हैं इसलिए उनके साथ दूसरे सरकारी कर्मचारियों के जैसा ही बर्ताव होना चाहिए. उनके साथ विशेष बर्ताव के लिए कोई भी दलील स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए.

सांसद या विधायक बनने की इच्छा रखने वाला कोई उम्मीदवार अगर अपनी और अपने परिजनों की संपत्ति सार्वजनिक कर सकता है तो क्या ये और जरूरी नहीं हो जाता कि न्यायाधीश के पद पर बैठने की इच्छा रखने वाला या फिर इस पद पर पहले से आसीन व्यक्ति भी ऐसा ही करें? जजों के प्रति आम जनता के मन में विश्वास और निष्ठा ही न्यायिक व्यवस्था का आधार है. न्यायालय की अवमानना का कानून जजों को एक व्यक्ति के तौर पर सुरक्षा प्रदान नहीं करता बल्कि उनके कार्यों के निष्पादन के संदर्भ में ऐसा करता है.

हमारे संविधान ने जजों को बेहद असीमित अधिकार दिए हैं, विशेषकर शीर्ष न्यायालय के जजों को. वो नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति जसे मामलों में तो दखल रखते ही हैं साथ ही उनके पास नौकरशाहों, मंत्रियों और सरकारों के काम-काज को भी सिर्फ इस आधार पर अवैध घोषित करने का अधिकार है कि उन्होंने संविधान का उल्लंघन किया है और न्याय के मूल सिद्धांतों की अवहेलना की है. इसके अलावा वो संसद के दोनों सदनों और राष्ट्रपति द्वारा पास किए गए किसी भी कानून को ये कह कर अवैध घोषित कर सकते है कि वो कानून संविधान की मूल भावनाओं से मेल नहीं खाता. चूंकि संसद देश की आम जनता की भावनाओं का प्रतिबिंब मानी जाती है इस आधार पर कुछ लोग कोर्ट के इस विशेषाधिकार को जनता की संप्रभुता का हनन मानते हैं. सांसदों विधायकों को जहां नियमित अंतराल पर जनता के बीच जाना होता है वहीं जज रिटायर होने तक इस तरह की किसी भी जांच, सुरक्षा अथवा नियंत्रण से मुक्त होते हैं. इसके बावजूद वे सरकार और संसद द्वारा पास किए गए कानूनों को ये कहते हुए निरस्त कर सकते हैं, ‘हम उस संविधान को आप से कहीं ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं जिसे आप लोगों ने 60 साल पहले लागू किया था.’ संविधान निर्माताओं ने जजों को ये अधिकार उस दौर के जजों की काबिलियत और उनकी क्षमता को देखते हुए प्रदान किए थे. आज ये देख कर बहुत दुख होता है कि उनका स्तर कितना गिर चुका है. ये जरूरी है कि अब जजों को जनता के विश्वास को और कम करने के लिए कुछ नहीं करना चाहिए. संपत्ति घोषित करने से उनका इनकार करना इस भरोसे को चकनाचूर कर देने की ताकत रखता है.

मार्च 2003 में चुनाव आयोग ने विस्तार से इस बात की जानकारी दी कि उम्मीदवारों को अपनी संपत्ति की घोषणा करना क्यों जरूरी है. उसने बताया कि उम्मीदवार की पारदर्शिता के लिए संपत्ति की घोषणा एक जरूरी शर्त है. मतदाताओं को अपना वोट डालने के लिए उम्मीदवार से जुड़ी हर जानकारी पाने का अधिकार है. किसी लोकतंत्र में इस तरह की सूचना पाने का अधिकार राजव्यवस्था के लोकतांत्रिक स्वभाव से पैदा होती है. आयोग ने कहा कि विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता के मूल अधिकार के तहत ही सूचना पाने का अधिकार भी शमिल है. इसने 2 मई 2002 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस आदेश का भी हवाला दिया जिसमें उसने सभी उम्मीदवारों की संपत्ति सार्वजनिक करवाने का चुनाव आयोग को निर्देश दिया था.

बहुत से न्यायाधीशों का कहना है कि वे बिना किसी कानून के भी अपनी संपत्तियों की घोषणा करने के लिए तैयार हैं. मुख्य न्यायाधीश ने बिल्कुल सही कहा कि स्वेच्छा से अपनी संपत्ति सार्वजनिक करने वाले जजों का स्वागत है. यदि सुप्रीम कोर्ट जजों की संपत्ति सार्वजनिक करने की जरूरत को किसी अजीबोगरीब आधार पर ठुकरा देता है तो वो खुद को ढोंगियों जैसा नजर आने से नहीं रोक सकेगा.

मुझे उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए माननीय  मुख्य न्यायाधीश जल्द ही अपना विचार बदलेंगे और सभी जजों की संपत्ति सार्वजनिक करना अनिवार्य करेंगे. सिर्फ मुख्य न्यायाधीश के समक्ष संपत्ति की घोषणा ही पर्याप्त नहीं है बल्कि पूरे देश के नागरिकों को इसके बारे में जानने का अधिकार है. अगर वो इस दिशा में आगे बढ़ते हैं तो दिल्ली उच्च न्यायालय में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुख्य सूचना आयुक्त के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खुद-ब-खुद निरर्थक हो जाएगी. इस देश में तमाम ऐसे लोग हैं, जो स्पष्ट तौर पर मानते हैं कि हाईकोर्ट में मुकदमेबाजी करके सुप्रीम कोर्ट अपनी प्रतिष्ठा खुद ही मिट्टी में मिला रहा है. देश के प्रतिष्ठित न्यायविद फाली एस नरीमन, जिनसे हाईकोर्ट ने इस मामले में सहायता मांगी थी, ने ये कह कर ऐसा करने से इनकार कर दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के जजों को ये बात साबित करनी ही होगी कि कानून सबके लिए एक-समान है. ये घटना काफी कुछ सिखा सकती है.

निजता को बेचने का झूठा धंधा

एनडीटीवी वाले उस दिन उन सांसदों को गरिया रहे थे जो संसद में एक टीवी कार्यक्रम ‘सच का सामना’ के खिलाफ उठ खड़े हुए थे. इन भ्रष्ट, झूठे और अपराधी सांसदों को क्या अधिकार है कि वे एक टीवी कार्यक्रम पर नैतिकता की कसौटियां लगाएं और मांग करें कि व्यक्तियों के निजी जीवन की गोपनीय मानी जाने वाली बातें ऐसे सरेआम उघाड़ कर न दिखाई जाएं. सार्वजनिक जीवन में शुचिता की चिंता इन गैरजिम्मेदार सांसदों को कैसे होने लगी. ये खुद तो कभी अपने राजनैतिक जीवन में लोकलाज और शोभनीयता की फिकर नहीं करते.

यह कार्यक्रम लोगों को सच का सामना करने को तैयार करने के लिए बनाया गया है. सच क्या किसी की निजी भावना है जो उससे जुड़े किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों की भावनाओं से बिल्कुल निरपेक्ष वस्तुनिष्ठ सत्य हो जाता है?

अपने सांसद कितने भ्रष्ट, कितने झूठे और कैसी अपराधी प्रवृत्तियों के लोग हैं यह सच्चाई किसी से छुपी नहीं है. वे अपना नैतिक अधिकार खुद अपने जीवन और आचरण से प्राप्त करें यह अपेक्षा भी सही है. लेकिन सार्वजनिक जीवन में क्या हो रहा है इस पर बहस संसद में क्यों नहीं हो? वे कैसे भी हों जनता ने उन्हें चुन कर भेजा है. वे इस देश के लोगों के निर्वाचित और लोकप्रिय प्रतिनिधि हैं और जनता की लोकप्रिय नैतिकता की कसौटी पर चीजों को तौलना और विचार करना उनका संसदीय कर्तव्य है. ऐसा करने के उनके अधिकार और जिम्मेदारी पर सवाल नहीं उठाया जा सकता.

फिर कौन सवाल उठा रहे हैं? निजी चैनल! सांसद कम से कम पंद्रह से बीस लाख वोटरों के निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए हैं. उनके पास जनादेश है. इन चैनलों के पास किसका जनादेश है? किसने उन्हें कहा कि पैसा लाओ, पत्रकार इकट्ठे करो और चैनल चलाओ? उन्हीं लोगों ने जिनके पास पैसा है. इस देश में एक सीमा के बाद किस तरह और कैसे पैसा जमा होता है यह यब जानते हैं. मेहनत से कमाया गया शुद्ध और धौला पैसा ही चैनलों में लगता है इसका दावा तो किसी ने किया नहीं है. फिर ऐसा पैसा भी लोकहित के काम में लगाया गया है ऐसा दावा भी किसी चैनल ने नहीं किया.

सब कहते और जानते हैं कि चैनल मुनाफा कमाने और पव्वा चलाने के लिए चलाए जाते हैं. ऐसे चैनलवालों को क्या अधिकार है कि वे सांसदों के बहस करने के नैतिक अधिकार को चुनौती दें. सांसद अगर भ्रष्ट, झूठे और अपराधी हैं तो चैनल क्या दूध के धुले हैं? हरिश्चंद्र के वंशज हैं कि दूसरों के झूठ और पाखंड को बर्दाश्त न करें? आचरण की जिस शुचिता का आग्रह वे सांसदों से करते हैं उसी की कसौटी पर वे कहां खड़े होंगे? और सांसदों को अगर समाज में नैतिक पुलिसगिरी करने का अधिकार नहीं है तो मुनाफे के लिए कुछ भी करने वाले चैनल सांसदों के जीवन आचरण पर कैसे निगरानी कर सकते हैं ? सांसदों का मकसद किसी भी तरह सत्ता में आना है तो चैनलों का प्रयोजन किसी भी तरह लाभ कमाना है. किसी भी तरह सत्ता में आना अगर पाप है तो किसी भी तरह लाभ कमाना कैसे पुण्य हो जाएगा?

देखिए ये दलीलें इसलिए नहीं हैं कि सांसदों को आलोचना से बचाया जाए. वे शायद किसी तरह के बचाव के लायक हैं भी नहीं. लेकिन चैनलों को भी आलोचना का सच्चा अधिकार और लोक विश्वसनीयता तभी मिल सकती है जब वे लोकहित में काम कर रहे हों. सच बात तो यह है कि चैनलों ने लोकहित कब का छोड़ दिया है. वे मुनाफे के लिए लोकहित और लोकलाज से कोई भी छूट लेने की होड़ में लगे हुए हैं. सांसद अगर अपने धतकरमों को संसदीय व्यवस्था और विशेषाधिकारों में ढंकते हैं तो चैनल अभिव्यक्ति की संवैधानिक आजादी का इस्तेमाल लाभ कमाने के जायज-नाजायज तरीकों को चलाए रखने के लिए.

सांसद अगर अपने धतकरमों को संसदीय व्यवस्था और विशेषाधिकारों में ढंकते हैं तो चैनल अभिव्यक्ति की संवैधानिक आजादी का इस्तेमाल लाभ कमाने के जायज-नाजायज तरीकों को चलाए रखने के लिए

दूर जाने की जरूरत नहीं. इसी ‘सच का सामना’ को लीजिए. क्या यह कार्यक्रम लोगों को सच का सामना करने को तैयार करने के लिए बनाया गया है? सच क्या किसी की निजी भावना है जो उससे जुड़े किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों की भावनाओं से बिल्कुल निरपेक्ष वस्तुनिष्ठ सत्य हो जाता है क्योंकि कोई उसे बताने या मंजूर करने का सार्वजनिक दम भर रहा है? विनोद कांबली का ही उदाहरण लीजिए. मैंने उसी को लिया तो इसलिए नहीं कि उसका कार्यक्रम देखा है. सच तो यह है कि मैंने ‘सच का सामना’ का कोई एपिसोड नहीं देखा. मैं मानता हूं कि अपने टीवी पर रिएलिटी शोज में जितना झूठपाठ और पाखंड है असली जीवन में वैसा नहीं होता. शो दिखाने के लिए बनाया जाता है यथार्थ या असलियत को समझने के लिए नहीं. बिना नाटक के कोई शो नहीं होता और सब जानते हैं कि नाटक असल जीवन नहीं है.

विनोद कांबली के ‘सामना’ के सिर्फ प्रोमो मैंने देखे हैं. इस या उस चैनल पर उसके कटे छंटे टुकड़े देखे हैं. लेकिन विनोद कांबली को मैं जानता हूं. उसने सचिन तेंदुलकर के साथ मिल कर स्कूल के एक मैच में रेकॉर्ड 664 रनों की भागेदारी की थी तब से मैं उसके क्रिकेट कैरियर को नजदीक और बड़ी रुचि से देख रहा हूं. देश में जहां तहां उसे खेलते देखा है. सन् इंकानवे में आस्ट्रेलिया के दौरे और फिर विश्व कप में मैदान पर खेलते और उसके बाहर होटलों में और समारोहों में बरतते देखा है. आस्ट्रेलिया के तो उस दौरे पर सचिन, विनोद और सौरभ तीनों थे और तीनों अभी लड़के थे. तब इन्हें देख कर कोई भी अंदाज लगा सकता था कि क्रिकेट में कौन कितनी दूर जाएगा. विनोद तब भी खेलने के साथ उन सब शगल और धींगामुश्ती में पड़ा रहता था जिनमें महानगरों के बिगड़ैल लड़के लगे रहते हैं. शाम वह लड़कियों और लाड़ लड़ाने वाले प्रवासी भारतीय परिवारों में बिताता और देर से होटल लौटता.

शुरूआती वर्षो में विनोद कांबली का प्रदर्शन सौरभ गांगुली से तो अच्छा था ही सचिन से भी बेहतर था. लेकिन सफलता उसके माथे में घुस गई और उसका दिमाग खराब कर दिया. अब क्रिकेट पर उसका ध्यान कम और एक्स्ट्रा करिक्यूलर एक्टिविटी में ज्यादा लगता था. वह कहीं से भी उस अनुशासन को मानता दिखता नहीं था जिसके बिना कोई भी लड़का या युवक गंभीर या बड़ा खिलाड़ी नहीं हो सकता. यह कोई नहीं कहता कि एक खिलाड़ी को बाकी जीवन को निलंबित कर देना चाहिए. लेकिन अगर आपका जीवन आपके खेल पर केंद्रित नहीं है तो आप खेलते तो रह सकते हैं बड़े या महान खिलाड़ी नहीं हो सकते. सभी खेलों के बड़े खिलाड़ियों के जीवन और शैली को देखिए. वे खेल और कैरियर से खेल नहीं करते. विनोद कांबली जितना खेलता था उससे ज्यादा अपने खिलाड़ी होने की प्रसिद्धि पर खेल करता था. समझदार लोग बहुत पहले कहने लगे थे कि वह अपने को बरबाद कर रहा है.

आप स्कूल में उस रेकॉर्ड भागेदारी से अब तक सचिन और विनोद के कैरियर को देखिए. सचिन अगर ब्रेडमन के बाद का सबसे महान बल्लेबाज और आदर्श खिलाड़ी माना जाता है तो सिर्फ क्रिकेट की प्रतिभा पर नहीं. सचिन को सचिन तेंदुलकर उसके एकाग्र और एकांतिक समर्पण ने बनाया है. विनोद कांबली में यह समर्पण किसी भी चीज पर नहीं है. वह बेचारा फुदकने वाला पतिंगा है. उसने प्रसिद्धि की शमा पर अपने को जला दिया. इसके लिए सिर्फ वह और वही जिम्मेदार है. पिच पर आप जब गेंद का सामना कर रहे होते हैं तो कोई सचिन क्या भगवान भी आपकी मदद नहीं करता. इसलिए जब विनोद कांबली कहता है कि उसे लगता है कि सचिन उसकी ज्यादा मदद कर सकता था तो वह

सरासर झूठ बोल रहा है. वह अपनी विफलता की जिम्मेदारी एक ऐसे खिलाड़ी पर डाल रहा है जिसने अपने किए-अनकिए के लिए सिर्फ खुद अपने को जिम्मेदार माना. विनोद कांबली की बहानेबाजी को कोई सच कह सकता है?

विनोद की झूठी बहानेबाजी को सच बता कर इसलिए प्रचारित किया गया कि सचिन महान खिलाड़ी और महान आदमी है. कांबली उसका दोस्त है और एक लंगोटिया जिगरी दोस्त उस पर लांछन लगा रहा है. इससे सनसनी मचती है और लोग शो देखने को लालायित होते हैं. यह न कांबली का सच है न सचिन का न उनकी दोस्ती का. प्रोग्राम को बेचने के लिए खेला गया हथकंडा है. यह कहीं से भी विनोद का सच नहीं है कि उसने इसका सामना किया है. यह निजी विकृति, बहानेबाजी और शोशेबाजी को बेचने की कोशिश है. लोगों में निंदा करने और दूसरों को बुरा बताने की इच्छा होती है. जितनी बुरी बातें और जितनी वाहियात निंदा उतनी ही लोगों को ताक-झांक करने की इच्छा. इसे आप सच कैसे कह सकते हैं? यह निजता को बेचने का धंधा है. सच का सामना बनाने वाले सिद्धार्थ बसु से प्रणय रॉय ने पूछा – हम कितना गिर सकते हैं? बसु ने कहा – इस देश का ध्येय सत्यमेव जयते है. सच से कैसा डरना? वाह! विनोद कांबली का तो सत्यमेव जयते हो गया! सिर पीट लीजिए.

ऐसे ही राखी का स्वयंवर. राखी बेचारी टीवी पर बिकने के लिए कुछ भी कर सकती है. अपनी किसी भी प्रायवसी के सार्वजनिक र्धुर्रे बिखेर सकती है. उसके लिए अपनी निजता पवित्र और महत्वपूर्ण नहीं है. वह प्रसिद्ध होना चाहती है और प्रसिद्धि से कमाने में लगी है. आज तो उसने स्वयंवर किया है. कल वह अपनी सुहागरात दिखाएगी. फिर राखी का तलाक नहीं तो राखी का प्रसव दिखाना. लोग टेलीविजन छोड़ कर भाग जाएंगे. ऐसी कौन सी रिएलिटी है जिसे हम सब आम तौर से नहीं जानते. हमाम में हम सब नंगे नहाते हैं. बेडरूम में फिर भी कुछ कपड़े पहनते हैं. और जैसे बेडरूम में होते हैं वैसे बैठक में नहीं रहते. बाथरूम, बेडरूम और बैठक में भेद हम कानून के कारण नहीं करते. अपनी निजता और सभ्यता के कारण करते हैं. इसलिए सच का सामना निजता को बेचने का झूठा धंधा है.

प्रभाष जोशी 

देर आयद लगभग दुरुस्त आयद

ज्यादातर मामलों में  आम आदमी की जेब के दायरे से बाहर ये आयकर कानून, दिमाग के दायरे से भी बाहर चले जाते हैं 

हाल ही में आयकर रिटर्न फाइल करने की आखिरी तिथि आकर गई है. प्रक्रियाओं की जटिलताओं में उलझे कामकाजी लोग परेशान इधर-उधर दौड़ते नजर आ रहे थे. मगर ये अकेला मौका नहीं होता, एक कामकाजी आयकरदाता को साल में कम से कम तीन बार ऐसी जटिलताओं से दो-चार होना पडता है. अब ये उसके ऊपर है कि वो आयकर के गूढ़ रहस्यों से पार पाने के लिए जरूरी माथापच्ची खुद करे या फिर अपनी जेबें थोडी और ढीली करके विशेषज्ञों का सहारा ले. तमाम दूसरे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करदाताओं की भी परेशानियां कमोबेश कामकाजियों सरीखी ही है.

दरअसल प्रत्यक्ष करदाताओं की ज्यादातर हैरानियों-परेशानियों के मूल में हमारे पुरातात्विक महत्त्व के दो कानून हैं – आयकर कानून 1962 और समृद्धि कर कानून 1957, जो उदारीकरण के दौर में कहीं लंगडाते और कहीं सरपट भागते देश की जरूरतों से कतई मेल नहीं खाते. ऊपर से इन कानूनों की लगातार झीनी होती चादरों में लगातार ही लगाए जाते संशोधनों और सुधारों के पैबंदों ने इन्हें हद से ज्यादा पेंचदार बना दिया है. नतीजा ये कि ज्यादातर मामलों में आम आदमी की जेब के दायरे से बाहर ये कानून, दिमाग के दायरे से भी बाहर चले जाते हैं. ऐसी स्थितियों में एक आम करदाता को सामान्यत: दो-तीन तरह की मानसिक अवस्थाओं से गुजरना होता है – या तो वो एक अच्छे भारतीय के कर्तव्यों का पालन करे और सभी मुश्किलों से पार पाते हुए पूरा आयकर जमा कर खुद को अपनी ही सरकार से ठगा महसूस करे; या आयकर में कुछ रियायतें लेने के लिए, दुनिया भर की मशक्कत और बचत कर, वर्तमान की कीमत पर अपना भविष्य बनाए; या ईमानदारी के बजाय तथाकथित व्यावहारिकता दिखाते हुए अपना टैक्स और वर्तमान दोनों तो बचा ले किंतु एक अपराधी बनकर रह जाए.

वित्त मंत्री ने हाल ही में प्रत्यक्ष कर संहिता जनता और जानकारों के सुझावों के लिए जारी की है. इसे संसद के आगामी शीत-सत्र में पेश करने के बाद 2011 से लागू किये जाने की योजना है. ये नया कानून प्रत्यक्ष करों के तमाम बिखरे पड़े प्रावधानों को समेटने का प्रयास तो है ही, इसमें रियायतों आदि के प्रावधानों को कम करके इसकी पेचीदगियों तथा भाषाई जटिलताओं को मिटाने की कोशिश भी की गयी है. इसके अलावा कर ढांचे को आज की परिस्थितियों के अनुरूप बनाना भी इस कानून में शामिल है. इसका कुल प्रभाव ये होगा कि आम करदाताओं पर करों और इन्हें सरकार को देने में पेश आने वालीं मुश्किलों का बोझ कुछ कम होगा जिससे आशा है कि ज्यादा-से-ज्यादा लोग करों को देने के लिए आगे आयेंगे.

मगर संहिता में भविष्य निधि पर कर लगाने और न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) देने वालीं कंपनियों के लाभ की बजाय कुल संपत्ति पर 2 फीसदी कर जैसे कई सुझाव हैं जिन पर पुनर्विचार की जरूरत है. चूंकि भविष्य निधि बचत और सामाजिक सुरक्षा का एक अनिवार्य उपकरण है इसलिए उस पर कर लगाना जबर्दस्ती बचत कराके कर वसूलने जैसा होगा और कंपनियों के लाभ की बजाय उनकी संपत्ति पर कर लगाना घाटे में चल रहीं और निवेश की अधिकता की जरूरत वाली कंपनियों के लिए अभिशाप साबित हो सकता है.

संजय दुबे 

मुठभेड़ की आड़ में कत्ल

 

 

 

 

 

 

 

(1) 27 वर्षीय चोंग्खम पीसीओ में है जहां एमपीसी के जवान उसे घेरे हुए हैं. कुछ जवान फॉर्मेसी के पास खड़े हैं

(2)  जवानों से घिरे होने के बाद भी संजीत किसी तरह का प्रतिरोध या भागने की कोशिश करता हुआ नही दिख रहा है

 

 

 

 

 

 

 

 

 

(3) एमपीसी जवानों के साथ जाता हुआ संजीत

(4) एमपीसी का एक जवान अपनी रिवॉल्वर निकाल रहा है जबकि संजीत चुपचाप खड़ा है

(5) संजीत पहले विद्रोही   संगठन पीएलए का सदस्य था लेकिन बाद में वो उससे अलग हो गया 

 

 

 

 

 

 

 

 

(6) एमपीसी जवानों ने अचानक संजीत को एक तरफ धकेलना शुरू कर दिया

(7) संजीत को फॉर्मेसी के भीतर खींच कर ले जाते एमपीसी के जवान

 

 

 

 

 

 

 

 

 

(8) कुछ देर के बाद संजीत के शव को फॉर्मेसी से बाहर लाया गया

(9) शव को बाहर खड़े ट्रक में डाल दिया गया, इस समय भी कैमरे से फोटो ली जा रही थीं लेकिन एमपीसी जवानों ने फोटो खींचने का कोई प्रतिरोध नहीं किया

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

(10, 11) ट्रक में संजीत के साथ रबीना देवी का भी शव पड़ा है जिसके बारे में पुलिस का बयान है कि यह महिला आतंकवादी का पीछा करते समय पुलिस फायरिंग में मारी गई, रबीना उस समय गर्भवती थी.

 

 

 

 

 

 

कहते हैं कि एक तस्वीर हजार शब्दों को बयां करने की ताकत रखती है. इस लिहाज से देखा जाए तो तहलका में छपीं ये तस्वीरें हजार सच्चाइयां उजागर कर रही हैं. ये तस्वीरें हैं भारत के सुदूर उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर की जहां पिछली 23 जुलाई को पुलिस ने एक ‘मुठभेड़’ को अंजाम दिया. ‘मुठभेड़’ मणिपुर विधानसभा से बमुश्किल 500 मीटर दूर हुई. तस्वीरों में मणिपुर रैपिड एक्शन फोर्स जिसे राज्य में मणिपुर पुलिस कमांडोज (एमपीसी) कहा जाता है, के जवान और उनसे घिरा हुआ एक 27 वर्षीय भारतीय नागरिक चोंग्खम संजीत है. ये तस्वीरें नागरिकों पर गोली के बर्बर कानून की एक मिसाल भर हैं, वे नागरिक जो नहीं जानते कि वे कब इस कानून के शिकार बन जाएंगे.

सबूतों के अभाव में पुलिस बयानों को गलत ठहराना मुश्किल होता है. लेकिन इस मामले में संयोग से घटना के समय एक स्थानीय फोटोग्राफर वहां पहुंच गया था. उसने इस ‘मुठभेड़’ की हर सच्चाई अपने कैमरे में कैद कर ली

 पिछले कई साल से मणिपुर में सुरक्षा बलों पर मानवाधिकार उल्लंघन और सैन्य बल विशेषाधिकार कानून (एएफएसपीए) की आड़ में की गईं हत्याओं के आरोप लगते रहे हैं. इसी दौरान राज्य में इस कानून का विरोध भी बढ़ता जा रहा है. साल 2000 में दस नागरिकों जिनमें 1988 में राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार पाने वाला एक 18 साल लड़का भी शामिल था, को असम राइफल के जवानों ने मार गिराया. इस हत्याकांड के विरोध में राज्य की एक 28 वर्षीय महिला इरोम शर्मिला ने भूख हड़ताल शुरू की जो आज भी जारी है.

2004 में असम राइफल्स के जवानों ने थांग्जम मनोरमा नाम की एक 32 वर्षीय मणिपुरी महिला की कथित रूप से बलात्कार कर हत्या कर दी गई थी. घटना वाले दिन से ही मणिपुर में भारी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे. घटना के विरोध में राजधानी इंफाल में मणिपुरी महिलाओं के निर्वस्त्र विरोध प्रदर्शन से एक पल के लिए तो सारा देश ही भौचक्का रह गया था. ये महिलाएं बैनर उठाए हुए थीं जिन पर लिखा था ‘इंडियन आर्मी रेप अस.’ भारी विरोधप्रदर्शन के चलते अगस्त 2004 में केंद्र सरकार को इंफाल नगर पालिका क्षेत्र से एएफएसपीए कानून हटाना पड़ा. मनोरमा मामले के बाद मणिपुर में सेना का प्रभाव तो कुछ हद तक कम हो गया लेकिन सेना की उपस्थिति वाला आतंक कायम रहा. मणिपुर में सेना की जगह अब एमपीसी ने ले ली है. मणिपुर पुलिस कमांडोज (एमपीसी) का गठन त्वरित कार्यवाही बल के रूप 1979 में किया गया था. राज्य के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक थांग्जम करुणमाया सिंह कहते हैं, ‘एमपीसी के जवानों को खास ऑपरेशंस के लिए प्रशिक्षित किया गया है. उन्हें तभी गोली चलाने के निर्देश हैं जब उन पर गोलीबारी हो रही हो. उन्हें बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं का ध्यान रखने के लिए कहा जाता है.’

जहां तक एएफएसपीए कानून की बात है तो एमपीसी इसके दायरे में नहीं आती. फिर भी यह बल राज्य भर में काफी बदनाम हो चुका है. एमपीसी राज्य के सिर्फ चार जिलों में तैनात है- इंफाल पूर्व, इंफाल पश्चिम, थाउबल और बिष्णुपर. एमपीसी के जवान आबादी से अलग कमांडों बैरकों में रहते हैं और आम नागरिकों से इनका संपर्क कम ही रहता है. हालांकि इस सैन्य बल के जवान यहां के स्थानीय नागरिक ही हैं.

पुलिस का दावा है कि संजीत पीएलए का सदस्य था. उल्लेखनीय है कि उसी दिन राज्य के मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह ने विधानसभा में यह विवादास्पद बयान दिया कि विद्रोहियों को मारने के अलावा कोई चारा नहीं है

फर्जी मुठभेड़ों और हत्याओं के मामले में एमपीसी पर आरोप लगना मणिपुर में अब आम बात हो चुकी है. 2008 में उत्पीड़न और हत्या के 27 मामलों में एमपीसी का नाम आया था. पहले जहां यह बल सुनसान जगहों पर मुठभेड़ करता था अब वो भीड़भाड़ भरे शहरी इलाकों में भी मुठभेड़ क रने से नहीं हिचकता. कई मामलों में तो ऐसा हुआ है एमसीपी के जवानों ने निर्दोष नागरिकों, जो कीमती सामान या रुपया पैसा लेकर जा रहे थे, के साथ लूटमार की और उनकी हत्या कर दी. हालांकि इस तरह के इक्का-दुक्का मामलों में जवानों पर कार्रवाई भी गई है. मसलन इसी जुलाई में पांच पुलिस कमांडो को लूटपाट के आरोप में निलंबित किया गया है. लेकिन अधिकांश मामलों में इस तरह की न्यायिक कार्रवाई नहीं हो पाती.

पिछले 23 जुलाई की सुबह 10: 30 पर कथित मुठभेड़ में संजीत के मारे जाने पर एमपीसी का आधिकारिक बयान कहता है कि एमपीसी जवान 23 जुलाई को इंफाल के ख्वरम्बंड बाजार में तलाशी अभियान चला रहे थे. तभी उन्होंने एक संदिग्ध आदमी दिखा. जब उसे रुक ने का इशारा किया गया तो उसने बंदूक निकाल ली और वहां से भागने लगा. पुलिस से बचने की कोशिश में उसने भीड़ पर गोलियां चलाना शुरू कर दीं.

पुलिस का बयान आगे बताता है कि इस व्यक्ति को गंभीर शापिंग ऑरकेड के पास मैमू फार्मेसी में घेर लिया गया. उसे आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया. लेकिन उसने पलटकर पुलिस पर फायर किए. पुलिस की जवाबी फायरिंग में यह व्यक्ति मारा गया. इस आधिकारिक बयान में यह भी कहा गया है कि इस युवक  के पास से 9 एमएम माउजर पिस्टल भी बरामद की गई. चोंग्खम संजीत नाम के इस युवक की पहचान उसके  ड्राईविंग लायसेंस से हुई.

यह जानते हुए भी कि इस तरह की मुठभेड़ अक्सर फर्जी होती हैं, सबूतों के अभाव में पुलिस बयानों को गलत ठहराना मुश्किल होता है. लेकिन इस मामले में संयोग से घटना के समय एक स्थानीय फोटोग्राफर वहां पहुंच गया था. उसने इस ‘मुठभेड़’ की हर सच्चाई अपने कैमरे में कैद कर ली. इन तस्वीरों से साफ जाहिर होता है कि पुलिस का बयान किस हद तक झूठा है. तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि संजीत एक तरफ खड़ा था, तब पुलिस वालों ने उससे बात की और तलाशी ली. इसके  बाद उसे फार्मेसी के स्टोर रूम में ले जाकर नजदीक से गोली मार दी गई और बाद में शव बाहर लाया गया. घटना से फोटोग्राफर इस कदर डर गया था कि  उसने मणिपुर के  स्थानीय मीडिया में इन तस्वीरों को प्रकाशित नहीं किया.

घटना के दूसरे चश्मदीदों के बयान भी कुछ हद तक पुलिस के बयान से मेल खाते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि चश्मदीदों ने अपने बयानों में संजीत का नाम नहीं लिया. उनके लिए वो कोई युवक था जो पुलिस की तलाशी टीम देखकर भाग रहा था. और जहां संजीत मारा गया गया वो जगह पुलिस टीम से तकरीबन सौ मीटर दूर है. उसके बाद पुलिस ने युवक का पीछा किया और युवक पर गोली चलाईं, जिसमें रबीना देवी नाम की एक गर्भवती महिला मारी गई और पांच अन्य लोग घायल हो गए. तथाकथित मुठभेड़ के बाद एमपीसी जवानों ने मीडिया के सामने 9 एमएम माउजर पिस्टल भी दिखाई. आधिकारिक बयान के मुताबिक यह पिस्टल ‘आतंकवादी’ ने भागने से पहले फेंकी थी. पुलिस का दावा है कि संजीत प्रतिबंधित विद्रोही संगठन पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) का सदस्य था. उल्लेखनीय है कि उसी दिन राज्य के मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह ने विधानसभा में यह विवादास्पद बयान दिया कि विद्रोहियों को मारने के अलावा कोई चारा नहीं है.

संजीत के बारे में ये दावा सही है कि वो पीएलए को सदस्य था. इस आरोप में उसे साल 2000 में हिरासत में लिया गया था, बाद में रिहा भी कर दिया गया. साल 2006 में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के चलते संजीत संगठन से अलग हो गया था. 2007 में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत उसे फिर से हिरासत में लिया गया और एक साल बाद छोड़ा गया. इसके बाद से वह अपने परिवार के साथ खरई कोंग्पाल सजोर लीकेई में रह रहा था. संजीत यहां के एक प्राइवेट अस्पताल में अटेंडेंट का काम करता था.

इस मुठभेड़ से सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि संजीत कभी किसी आतंकवादी संगठन का सदस्य रहा भी था तो क्या इससे सरकार द्वारा गठित किसी विशेष पुलिस संगठन को ये अधिकार मिल जाता है कि वो उसे फर्जी मुठभेड़ में मार गिराए? तस्वीरों से साफ जाहिर होता है कि संजीत बिना किसी प्रतिरोध के पुलिस के जवानों से बातचीत कर रहा था.

पीएलए से पूर्व में संबंध होने के कारण संजीत को अदालत में समय-समय पर उपस्थित होना पड़ता था. लेकिन बाद में अदालत ने संजीत को इस प्रक्रिया से मुक्त कर दिया था. गुवाहाटी उच्च न्यायालय की इंफाल खंडपीठ के वकील एम राकेश का कहना है, ‘कानूनी तौर पर कहा जाए तो संजीत पर कोई प्रतिबंध नहीं था.’

इस मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पुलिस ने हथियार बरामदगी को लेकर अपने बयान लगातार बदले. पहले उन्होंने दावा किया कि आतंकवादी ने भागते समय पिस्टल फेंक दी थी. इसके बाद का आधिकारिक बयान कहता है कि पिस्टल मुठभेड़ के बाद संजीत से बरामद की गई. पुलिस के पहले दावे की पोल भी तस्वीरों में खुल जाती है जिनके मुताबिक संजीत भागते हुए फार्मेसी के स्टोर रूम में नहीं पहुंचा था बल्कि उसे वहां ले जाया गया था. इसके अलावा जहां तक उसके पास पिस्टल होने की बात है तो ये तलाशी के दौरान ही मिल जानी चाहिए थी.

कानून कहता है कि किसी सरकारी बल द्वारा मुठभेड़ में किसी की हत्या को आपराधिक दण्ड संहिता (सीपीसी) की धारा 46 के अंतर्गत यदि तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सके तो संबंधित अंधिकारी को मानव हत्या का दोषी माना जाएगा. इस मामले में विस्तृत और सधी हुई जांच से ही असलियत लोगों के सामने लाई जा सकती है. मगर राज्य सरकार इस मामले में न्यायायिक जांच की बजाय विभागीय जांच कराने की बात कह रही है, जिससे मामले की सच्चाई का सामने आना अभी से संदिग्ध लग रहा है. संजीत के परिवारवालों का कहना है कि उसने आतंकवादियों से अपने रिश्ते पहले ही खत्म कर लिए थे और वो एक सामान्य जिंदगी जी रहा था. संजीत के परिवार के मुताबिक जिस दिन ये घटना हुई उस दिन वो अपने एक रिश्तेदार जिनका इलाज इंफाल के जेएन अस्पताल में चल रहा है, के लिए दवा लेने बाहर गया था. संजीत की मौत से बुरी तरह टूट चुकीं उसकी मां कहती हैं, ‘मणिपुर में आपकी जिंदगी की कोई कीमत नहीं है.’ असल में राज्य में इस तरह की घटनाएं अब आम बात हो चुकी हैं. राज्य के एक पूर्व विधायक 78 वर्षीय सरत सिंह का बेटा सतीश सिंह भी इसी तरह से सेना के हाथों मारा जा चुका है. अपने बेटे की मौत के बाद सरत सिंह ने सतीश का नाम अपराधियों की सूची से हटाए जाने की मांग करते हुए उसका अंतिम संस्कार करने से इंकार कर दिया था. मामले और भी हैं. गुवाहाटी उच्च न्यायालय की इंफाल बेंच के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी 39 वर्षीय निंगोम्बम गोपाल सिंह को उस वक्त गोली मार दी गई जब वे एक होटल में चाय पी रहे थे. सादे कपड़ों में एक व्यक्ति ने गोपाल सिंह को होटल के बाहर खींचा और उन्हें गोली मारकर इसे मुठभेड़ बता दिया.  इलंग्बम जॉन्सन सिंह नाम का एक 24 वर्षीय छात्र जो कि खाली समय में सेल्समैन का काम करता था, जब अपने दोस्त के साथ घूम रहा था तब एमपीसी के जवानों ने उसे गोली मार दी थी.

मुठभेड़ों की ऐसी कई कही-अनकही कहानियां हैं जिनका अंत मणिपुर में लोगों के लिए इस छिपे संदेश के साथ होता है कि यदि आप जिंदा बचे हुए हैं तो यह कुछ और नहीं महज आपकी किस्मत है.

देश अडिग है

 चक्र सुदर्शन

 

 

जाएंगे सौ बार हम, खूब करेंगे बात,

मसलों को सुलझायेंगे, क्यों हो घूंसा-लात.

क्यों हो घूंसा-लात, देश यह बहुत बड़ा है

अपने मूल्यों आदर्शों पर अडिग खड़ा है.

चक्र सुदर्शन, आतंकी को खा जाएंगे

कौन कह रहा हम दबाव में आ जाएंगे

 अशोक चक्रधर

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अपना सिनेमा

लेह में अगर आप किसी से मिलें तो इसकी अच्छी-खासी संभावना होती है कि वो फिल्म स्टार निकले. किसी जमाने में लद्दाख राज्य की राजधानी रहा ये शहर अब भारत की नवीनतम फिल्म इंडस्ट्री का केंद्र है. लद्दाखी सिनेमा पर बन रही आउट ऑफ थिन एअर  नाम की डॉक्यूमेंट्री फिल्म के निर्देशकों में से एक समीरन फारुकी कहते हैं, ‘जब हमने पहली बार लद्दाखी फिल्मों के बारे में सुना तो हम हैरान हो गए. जिस होटल में हम ठहरे हुए थे हमने उसके मालिक डेविड सोनम से पूछा, कौन देखता है ये पिक्चर? उनका जवाब आया, कौन नहीं देखता. बाद में पता चला कि डेविड प्रोडक्शन कंट्रोलर भी हैं.सह निर्देशक शबानी हसनवालिया आगे जोड़ती हैं, ‘जब हमने गौर करना शुरू किया तो पता चला कि लद्दाखी फिल्मों से हर कोई जुड़ा हुआ है. आप किसी रेस्टोरेंट में खाना खा रहे हैं और पता चलता है कि रेस्टोरेंट का मालिक पिछले साल की सबसे सुपरहिट फिल्म में कोई भूमिका निभा चुका है.

यहां के लोग आम मुंबइया मसालों से भरी इन फिल्मों को भी परंपराओं को सुरक्षित रखने का जरिया मानते हैं

सात साल और 26 फिल्मों पुराने लद्दाखी फिल्मोद्योग को आम लोगों ने बनाया है. आम लोग यानी टैक्सी ड्राइवर, दुकानदार, भिक्षु और गृहणियां. प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, डांसर्स, एडिटर, कैमरामैन, एक्टर..सब यही आम लोग हैं. काम का हुनर इन्होंने काम करते-करते ही सीखा है. आप सोच सकते हैं कि जब बड़े बजट वाली हिंदी फिल्मों में से कुछ फीसदी ही कमाऊ साबित हो रही हों तो लद्दाखी फिल्मों का क्या होता होगा. मगर आपको हैरत होगी कि ये फिल्में खूब फायदे का सौदा साबित हो रही हैं. डिजिटल वीडियो कैमरे से बनाई गई एक फिल्म का बजट औसतन पांच लाख रुपए होता है. लेह में एक ही हॉल है और हिट फिल्म इसमें रोज तीन शो के हिसाब से तीन महीनों तक चल सकती है. 250 दर्शक क्षमता वाले इस हॉल में एक टिकट की कीमत 50 रुपए है. यानी तीन महीने में 33 लाख रुपए से भी ज्यादा का कारोबार.

हालांकि बाकी चीजों की तरह लद्दाख में सिनेमा भी एक मौसमी कारोबार है. फिल्में गर्मियों में बनकर तैयार हो जानी चाहिए ताकि जब सर्दियां आएं और लोगों के पास वक्त हो तो वे उन्हें देख सकें. गर्मियों में शूटिंग करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसी मौसम में लद्दाख घाटी में हरे रंग की थोड़ी सी बहार दिखाई देती है जिसमें यशराज फिल्म्स मार्का गाने फिल्माए जा सकते हैं.पर गर्मियों में लोगों के पास पर्यटन और खेती-बाड़ी जैसी दूसरे काम भी होते हैं इसलिए फिल्मकारों को थोड़ा अडजस्टकरना पड़ता है. शबानी बताती हैं, ‘अगर हीरो कोई परीक्षा देने जम्मू गया हो तो शूट तय करते वक्त इसका ख्याल रखना पड़ता है.

सदियों से अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखे हुए ये इलाका अब मनोरंजन के नए माध्यमों के जरिये नये दौर में प्रवेश कर रहा है. वैसे यहां के लोग आम मुंबइया मसालों से भरी इन फिल्मों को भी परंपराओं को सुरक्षित रखने का जरिया मानते हैं. सेंसर बोर्ड की जगह यहां एक बौद्ध असोसिएशन है और अगर उसे कोई भी दृश्य परंपरा के विपरीत लगता है तो उस पर कैंची चल जाती है. उदाहरण के लिए उसने कुछ समय पहले एक फिल्म के उस दृश्य को काट दिया था जहां एक लामा को किसी महिला का सपना देखते हुए दिखाया गया था.

तो क्या परंपराओं को सुरक्षित रखने की ये जद्दोजहद पर्यटकों की बढ़ती भीड़ से उपजी असुरक्षा से तो पैदा नहीं हुई है? हो सकता है. शबानी कहती हैं, ‘इन दिनों लेह में आधुनिक कपड़ों में नजर आने वाले सिर्फ पर्यटक ही नहीं होते. मगर ये भी सही है कि मनोरंजन और मुनाफा भी इसकी इतनी ही मजबूत वजह है जितना अपनी संस्कृति से जुड़े रहने का सरोकार.

भूख से हारी जिंदगी और नाम अन्नदाता

तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है 
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

जिस तरह की आंकड़ेबाजियां पिछले कुछ सालों में विदर्भ के किसानों को लेकर की जा रही हैं, उस पर अदम गोंडवी का ये शेर हर तरह से मौजूं बैठता है. आंकड़े बताते हैं कि अब तक राज्य और केंद्र द्वारा दिए जा रहे राहत पैकेज के तहत किसानों को 82 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा की रकम आवंटित हो चुकी है. ज्यादातर पैसा खर्च भी किया जा चुका है. इससे होने वाले राजनीतिक लाभ की फसल काटी जा चुकी है. इसके बावजूद आज भी विदर्भ में औसतन पहले जितनी ही आत्महत्याएं हो रही हैं. 2001 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 52 थी. 2008 में ये आंकड़ा 1267 रहा.

विदर्भ में सिर्फ 11 फीसदी किसानों के पास सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है. इसके बावजूद प्रधानमंत्री राहत पैकेज का तीन-चौथाई हिस्सा ऐसे किसानों के लिए रखा गया है जिनके पास ये सुविधा उपलब्ध हो

वागधा गांव के मंदिर का चबूतरा किसानों से भरा हुआ है. सभी की निगाहें झुकी हैं और माहौल में खामोशी पसरी हुई है. इस साल विदर्भ में किसी किसान की खुदकुशी की ये 117वीं घटना है. 117वीं बार ऐसा हुआ है कि किसी किसान ने अपनी बर्बाद कपास की खेती और झुलसाते आसमान की तरफ देखा और फैसला किया कि बस अब बहुत हुआ. 117वीं बार एक हताश जिंदगी असमय काल का ग्रास बन गई है.

लोग बताते हैं कि 35 वर्षीय मंगलचंद प्रताप के लिए हालात बर्दाश्त के बाहर हो चुके थे. करीब 15 साल पहले विरासत में ढेर सारा कर्ज छोड़ उसके पिता चल बसे थे. दो भाई काम की तलाश में नजदीकी कस्बों में चले गए और खेती की सारी जिम्मेदारी प्रताप के कंधों पर आ गई. पिछले साल उसकी पांच हेक्टेयर के खेत पर बोई कपास की फसल कीड़ा लगने से बर्बाद हो गई. कमाई तो कुछ हुई नहीं, ऊपर से बीज के लिए जो बैंक से कर्जा लिया था उस पर ब्याज भी सुरसा के मुंह सरीखा बढ़ता जा रहा था. स्वभाव से हंसमुख उनके पति किस कदर निराशा के भंवर में डूब गए थे, याद करते हुए सुरेखा कहती हैं, ‘पिछले साल हमें जब भी रोटी नसीब हो जाती थी तो ये एक चमत्कार ही लगता था.’

मगर प्रताप ने दिल के किसी कोने में थोड़ी हिम्मत बचाकर रखी थी. इस साल अच्छी फसल की उम्मीद में उन्होंने बीज खरीदने के लिए बैंक से 30,000 रुपये का कर्ज लिया. मगर 24 जून की सुबह जब वे अपने खेतों में गए तो देखा कि हाल ही में बोए गए बीज ‘छोटा पानी’ यानी हल्की बूंदाबांदी के चलते खराब हो गए हैं. उसी शाम उन्होंने कीटनाशक दवा की एक पूरी बोतल पी ली. उनके भाई ध्यानेश्वर को अब भी प्रताप का जमीन पर गिरना, मुंह से निकलता झग और उनकी पथराई आंखें याद आती हैं. अपने भाई की आठ साल की बच्ची का हाथ पकड़े ध्यानेश्वर कहते हैं, ‘जब बच्चे भूखे सो रहे हों तो कोई इंसान कितने दिन तक हालात से लड़ सकता है? मेरा भाई तो उन कई किसानों में से सिर्फ एक है जो इस साल आत्महत्या करने वाले हैं.’

प्रधानमंत्री राहत पैकेज में भी तमाम तरह की गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार के मामले देखने को मिल रहे हैं. पैकेज में पीड़ित परिवारों को कम कीमत पर गाय दिए जाने की जो योजना थी उसका फायदा विधायक और तमाम दूसरे नेता उठा रहे हैं

ध्यानेश्वर की भविष्यवाणी दुर्भाग्य से विदर्भ का सबसे काला सच है. महाराष्ट्र की कपास बेल्ट कहा जाने वाला ये इलाका 2001 से ही किसानों की खुदकुशी के लिए कुख्यात रहा है. सामाजिक संगठनों और मीडिया की चीख-पुकार के बाद सरकार हरकत में आई और जुलाई 2006 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दो दिन के लिए विदर्भ के दौरे पर गए. उस साल तब तक वहां 1448 किसान आत्महत्या कर चुके थे. सिंह ने सूखे से प्रभावित विदर्भ के छह जिलों के लिए 3750 करोड़ रुपये के विशेष राहत पैकेज का ऐलान किया. इसके बाद 2008 में प्रधानमंत्री ने देश भर के किसानों के लिए 71,860 रुपए की कर्जमाफी योजना की घोषणा की. 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस की जीत में इस योजना की एक अहम भूमिका रही.मगर इस सबके बावजूद विदर्भ के किसानों की  त्रासदी अंतहीन क्यों लग रही है?

केदापुर गांव में लोग हमें चंद्रकला मिश्र के घर का पता बताते हैं. एक पड़ोसी के शब्दों में, ‘पति की मौत के बाद अक्सर उनकी विधवाएं या तो मजदूरों से खेती का काम करवाती हैं या फिर जमीन ही बेच देती हैं. मगर चंद्रकला ग़जब की हिम्मतवाली महिला हैं.’ तीन साल पहले एक सुबह जब चंद्रकला जागीं तो उन्होंने पाया कि उनके पति गंगाराम मिश्र फांसी लगाकर खुदकुशी कर चुके हैं. हिम्मत हारने की बजाय उन्होंने हल चलाना सीखा. ये काम परंपरागत रूप से पुरुष करते हैं क्योंकि बैलों को हांकना आसान नहीं होता. जब हम चंद्रकला से मिलते हैं तो वे कहती हैं, ‘अगर आप मुझसे किसी मदद का वादा करने यहां आये हैं तो ये जान लीजिए कि मैं बेवकूफ नहीं हूं. मैं जब भी सरकारी अधिकारी, मीडियावाले या एनजीओ से मिली, मुझे कोरे आश्वासनों के अलावा और कुछ नहीं मिला.’

आज चंद्रकला के 12-15 घंटे बड़े जमींदारों और अपने खेतों में मजदूरी का काम और तीन घरों में चूल्हा-चौका करने में गुजरते हैं. उन्होंने अपनी दो बच्चियों को स्कूल में भर्ती कर दिया है. वे बताती हैं कि इसके लिए उन्होंने साहूकार से काफी कर्ज भी ले रखा है. चंद्रकला की जिंदगी और प्रताप की मौत इस बात का सबूत हैं कि अरबों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद मदद का ज्यादातर हिस्सा उन तक नहीं पहुंच पाया है जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है. किसानों की विधवाओं को एक लाख रुपए का मुआवजा दिए जाने की घोषणा हुई थी. मगर जब चंद्रकला इस मुआवजे के लिए तहसीलदार के पास पहुंचीं तो उनकी अपील ठुकरा दी गई. वे बताती हैं, ‘कुछ सरकारी बाबू आए थे. मुझसे पूछा कि पैसा चाहिए या बाच्चों की पढ़ाई-लिखाई. मैंने कहा दोनों. कुछ भी नहीं मिला.’

विधवा किश्ताबाई कहती हैं, ‘कपास उगाने पर फसल बेचने से ज्यादा खर्चा हो गया था. इसलिए उनकी खुदकुशी से मुझे हैरत नहीं हुई.’

यवतमाल के जिला मुख्यालय में तैनात एक अधिकारी बताता है कि चंद्रकला के पति की मौत के पीछे या तो शराब रही होगी या फिर कोई घरेलू विवाद. पीड़ित परिवारों को मुआवजा न दिए जाने के लिए जो वजहें गिनाई जाती हैं उनमें से ये दो सबसे आम हैं. जहां तक कर्जमाफी का सवाल है तो चंद्रकला कहती है, ‘ये तो उन लोगों के लिए है जिन्होंने बैंक से कर्ज ले रखा हो. शुरुआत में बैंक हमें कर्ज देने से मना करते रहे और मजबूरी में हमें साहूकारों से कर्ज लेना पड़ा.’

आज चंद्रकला की पांच हेक्टेयर जमीन पर साहूकारों के कब्जे में चले जाने का खतरा मंडरा रहा है. वह कहती है, ‘अब मेरी समझ में आ रहा है कि मेरे पति क्यों हिम्मत हार बैठे.’ चंद्रकला जैसे लोगों के लिए ही राहत पैकेज बनाए गए थे मगर उन्हीं को ये राहत नहीं पहुंच पाई. 2008 में केदापुर गांव के भुजन्न विट्ठल का पूरा कर्ज माफ करने से इसलिए इनकार कर दिया गया क्योंकि उनके पास पांच हेक्टेयर जमीन थी. तर्क ये था कि उन्हीं लोगों का पूरा कर्ज माफ होगा जिनके पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है. विट्ठल पर 50 हजार रुपये का कर्ज था जिसमें से 20 हजार बाद में माफ कर दिए गए. दो महीने बाद वे कपास की अपनी फसल (जिसका ज्यादातर हिस्सा बर्बाद हो चुका था) को बेचने बाजार में पहुंचे. इससे जो पैसा मिला उससे उन्होंने एक किलो चावल, कुछ टमाटर और चूहे मारने की दवा की एक बोतल ली. अगली ही सुबह चारपाई पर उनकी लाश मिली जिसका रंग उनके घर की दीवारों की तरह नीला हो चुका था. उनकी विधवा किश्ताबाई कहती हैं, ‘कपास उगाने पर फसल बेचने से ज्यादा खर्चा हो गया था. इसलिए उनकी खुदकुशी से मुझे हैरत नहीं हुई.’

किश्ताबाई का 20 वर्षीय बेटा गजानंद कहता है, ‘मैं फुल स्कॉलरशिप पर एक इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था मगर खेती के लिए मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी. क्योंकि अब घर की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई है.’ मगर आंशिक कर्जमाफी पाने वाले गजानंद जैसे विदर्भ के छह लाख किसानों के लिए हालात और भी बदतर हो गए हैं. बैंकों ने उन्हें सूचित किया है कि अगर उन्होंने नौ जुलाई 2009 से पहले बकाया कर्ज की रकम वापस नहीं की तो इस कर्जमाफी को भी रद्द कर दिया जाएगा. कुछ किसान कह चुके हैं कि वे बकाया भुगतान नहीं करेंगे. कुछ इस उम्मीद में बैठे हैं कि फिर से किसी राहत पैकेज की घोषणा होगी. चूंकि विदर्भ में एक किसान के पास औसतन पांच हेक्टेयर से ज्यादा की जोतें होती हैं इसलिए यहां के ज्यादातर किसानों को आंशिक कर्जमाफी ही मिल सकी है. वे इस बात से अनजान थे कि अगर उन्होंने बाकी का कर्ज जल्द नहीं चुकाया तो ये भी रद्द हो जाएगी. वाशिम जिले के हीरासिंह चव्हाण कहते हैं, ‘जून से दिसंबर तक पसीना बहाते हुए हम कर्ज का पैसा खेती में लगाते हैं. मगर जब बारिश नहीं होती और फसल चौपट हो जाती है तो हमारे पास खाने तक के लिए कुछ नहीं होता. मैं 23,000 रुपये का बकाया कर्ज कैसे चुकाऊं? और अगर मैं ये नहीं चुकाता हूं तो 20,000 रुपये का जो कर्ज माफ हुआ है वह भी रद्द हो जाएगा. ये कैसा पैकेज है?’

मानसून दगा देता लग रहा है और बैंक अल्टीमेटम लेकर खड़े हैं. राज्य सरकार का खुद का सर्वे बताता है कि कपास उगाने वाले हर चार में से तीन किसान संकट में हैं

हर साल बुआई के समय यानी मई-जून में कर्ज लेने की एक नई प्रक्रिया शुरू होती है. इस समय विदर्भ के किसानों को एकमुश्त पैसे की जरूरत होती है. प्रति एकड़ जमीन के लिए कपास या सोयाबीन के बीज खरीदने का खर्च करीब 1000 रुपये आता है. इतना पैसा प्रति एकड़ जुताई पर भी खर्च होता है. हर एकड़ में 3000 रुपये का खर्च खाद और कीटनाशकों पर भी आता है. कई साल से हो रही औसत से कम बारिश और फसल का नतीजा ये हुआ है कि ज्यादातर किसानों के पास जमापूंजी जैसी कोई चीज ही नहीं है. पिछले कर्जे न चुकाने की वजह से बैंक भी उन्हें नया कर्ज देने से इनकार कर देते हैं. हालांकि 2006 में घोषित प्रधानमंत्री राहत पैकेज में बैंकों को ये निर्देश दिए गए थे कि कर्ज न चुका पाने वाले किसानों को भी नया कर्ज दे दिया जाए. उस साल दस लाख से भी ज्यादा किसानों ने कर्ज लिया. ये संख्या उससे पिछले साल कर्ज लेने वालों से दोगुनी थी. मगर लगातार तीन साल तक फसल खराब रहने का नतीजा ये हुआ कि हालात फिर से ढाक के तीन पात जैसे हो गए.

यवतमाल जिले के पहपाल में स्थित बैंक ऑफ महाराष्ट्र के मैनेजर आरजी महाजन कहते हैं, ‘हमने घोषणा की है कि 75 फीसदी किसान कर्ज दिए जाने लायक नहीं हैं.’ अमरावती जिले में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एक अधिकारी बताते हैं कि विदर्भ में हमेशा से ही कर्ज न चुका पाने वालों की संख्या सबसे ज्यादा रही है. वे कहते हैं, ‘इस साल हमें आशंका है कि ये संख्या और बढ़ेगी.’

प्रधानमंत्री राहत पैकेज में भी तमाम तरह की गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार के मामले देखने को मिल रहे हैं. यवतमाल में एक सामाजिक कार्यकर्ता विलास वानखेड़े ने 2008 में सूचना का अधिकार कानून के तहत एक याचिका दाखिल की तो पता चला कि इस पैकेज में पीड़ित परिवारों को कम कीमत पर गाय दिए जाने की जो योजना थी उसका फायदा विधायक और तमाम दूसरे नेता उठा रहे हैं. विदर्भ में राहत पैकेज किस तरह लागू किया जा रहा है इसकी समीक्षा के लिए 2007 में एक समिति बनाई गई थी. सात महीने बाद इस समिति के अध्यक्ष और अर्थशास्त्री डा. नरेंद्र यादव ने अपनी 102 पन्नों की रिपोर्ट में बेलगाम भ्रष्टाचार और राहत सामग्री की सामान्य से ऊंचे दामों पर आपूर्ति की बात कही. मसलन प्रधानमंत्री पैकेज के तहत सोयाबीन के बीज 3500 रुपए प्रति क्विंटल बेचे जा रहे हैं जबकि पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में यही बीज 2700 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत पर उपलब्ध हैं. वाशिम के किसान नारायण विभूति कहते हैं, ‘ऊपर से कोढ़ में खाज ये कि सरकार हमसे सोयाबीन केवल 2160 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदती है.’

राहत पैकेज में भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों का शोर मचने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने इसकी जांच करने के लिए एक समिति का गठन किया. साल की शुरुआत में इस समिति ने अपनी रिपोर्ट और सुझाव सरकार को सौंपे जिन्हें अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है. जब हमने समिति के एक सदस्य डा. प्रफुल्ल काले से संपर्क किया तो उन्होंने इसमें बड़े पैमाने पर घोटाले, जिसमें कई प्रभावशाली लोग भी शामिल हैं, का संकेत दिया और माना कि जांच के दौरान उन पर कई तरफ से दबाव भी पड़ा. हालांकि उनके मुताबिक वे, ‘निष्पक्ष और तार्किक रहे.’

कई सरकारी अधिकारी भी मानते हैं कि कर्जमाफी और प्रधानमंत्री पैकेज बड़ी सीमा तक दिखावा ही रहे हैं. अमरावती में राहत पैकेज के क्रियान्वयन के इंचार्ज और डिविजनल कमिश्नर सुधीर गोयल खुद ही कहते हैं, ‘विदर्भ में इस तरह के पैकेज की जरूरत क्या है? आत्महत्याएं एक गहरे कृषि संकट का लक्षण हैं. सिंचाई के लिए बारिश पर निर्भर रहने वाले विदर्भ जैसे इलाकों के किसानों की मुख्य चिंता तो मानसून और कीमतें हैं. नकदी फसल को उगाने पर इतना पैसा खर्च करने के बाद फसल को बेचने पर जो मिलता है उससे तो लागत भी वसूल नहीं होती..ऐसी योजनाओं में पैसा झोंकने की क्या जरूरत है जो मूल समस्याओं पर ध्यान नहीं देतीं?’ राज्य के कृषि मंत्री बालासाहेब थोरत भी मानते हैं कि राहत पैकेज से सिर्फ अस्थाई राहत ही मिली है. वे कहते हैं, ‘इस साल भी मानसून आने में देरी हुई है और मुझे आशंका है कि स्थिति और भी खराब होगी.’

जब प्रधानमंत्री राहत पैकेज का ऐलान हुआ था तो योजना आयोग, वाम दलों और कृषि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि इसमें विदर्भ से जुड़ी उन समस्याओं की उपेक्षा की गई है जिनसे ये इलाका 1970 के जमाने से ग्रस्त रहा है. उनकी चेतावनी में दम था. वर्धा स्थित कृषि विशेषज्ञ विजय जावंदिया कहते हैं, ‘जो भी पैकेज दिए गए उनके दायरे से 80 फीसदी किसान बाहर ही रह गए. जिन्हें राहत मिली उन्हें भी पर्याप्त नहीं मिली. इन योजनाओं को बनाते हुए ग्रामीण भारत और खेती से जुड़ी परंपरागत सच्चाइयों से आंखें मूंद ली गईं.’

जावंदिया की बात सही है. कर्जमाफी सहित तमाम दूसरी योजनाएं उन्हीं किसानों के लिए थीं जिनके पास पांच हेक्टेयर से कम जमीन हो. मगर ज्यादातर गांवों में परिवार के पास जो जमीन होती है उसका स्वामित्व सबसे बड़े पुरुष सदस्य के नाम पर होता है. इसलिए असलियत में काश्तकारों के पास काफी कम जमीन होती है मगर तकनीकी रूप से वह राहत के दायरे में नहीं आते. इसी तरह विदर्भ में खेती हमेशा से मानसून के भरोसे चलती रही है और इस इलाके के सिर्फ 11 फीसदी किसानों के पास सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है. इसके बावजूद प्रधानमंत्री राहत पैकेज का तीन-चौथाई हिस्सा ऐसे किसानों के लिए रखा गया है जिनके पास ये सुविधा उपलब्ध हो. विदर्भ किसान आंदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी कहते हैं, ‘इलाके की तीन नदियां सूख चुकी हैं. भूजल का स्तर भी तेजी से नीचे जा रहा है. बारिश भी इतनी कम होती है. ऐसे में सिंचाई किसी सुखद स्वप्न जैसी लगती है.’

पहपाल की मीरा काचरू छटाले विधवा हैं. उनके पति ने साहूकारों से तंग आकर 2005 में खुदकुशी कर ली थी. 2006 में जब प्रधानमंत्री राहत पैकेज का ऐलान हुआ तो एक गैरसरकारी संगठन ने उनकी तरफ से इसके लिए आवेदन किया. वे बताती हैं कि किस तरह उनके खेत में कुआं खोदने के लिए सरकारी अधिकारी एक टीम को लाए थे. ‘उन्होंने मुझे बधाई देते हुए कहा कि मेरी जिंदगी बदल जाएगी, पानी मिलने से मेरे खेतों में अच्छी फसल लहलहाएगी और मैं सफल किसान बन जाऊंगी’ मीरा बताती हैं, ‘दो दिन तक तो उन्होंने तेजी से खुदाई की. फिर उनका काम धीमा होने लगा. एक हफ्ते बाद वे जाने लगे और मुझसे कहा कि पानी आ चुका है. मैं खेत की तरफ भागी और कुएं में झंककर देखा तो इसमें एक बूंद भी पानी नहीं था.’

इस क्षेत्र के लिए बनने वाली योजनाओं ने बार-बार उन लोगों की उपेक्षा की है जिन्हें सही मायने में मदद की जरूरत है. महाराष्ट्र के कृषि विभाग में कार्यरत एक वरिष्ठ सचिव कहते हैं, ‘71,680 करोड़ के पैकेज में महाराष्ट्र का हिस्सा 14,000 करोड़ रु. का था. इसका ज्यादातर हिस्सा (लगभग 7000 करोड़ रु.) सिंचाई की सुविधा पाने वाले पश्चिमी महाराष्ट्र के उन किसानों को मिला जो तुलनात्मक रूप से बेहतर हालत में थे. विदर्भ को सिर्फ 2000 करोड़ रु. से काम चलाना पड़ा.’ यानी जिस इलाके में हो रही आत्महत्याओं से चिंतित होकर सरकार को इतना बड़ा पैकेज देना पड़ा था उसके हिस्से सिर्फ बची-खुची रकम ही आई.

इस साल भी हालात वैसे ही हैं. मानसून दगा देता लग रहा है और बैंक अल्टीमेटम लेकर खड़े हैं. राज्य सरकार का खुद का सर्वे बताता है कि कपास उगाने वाले हर चार में से तीन किसान संकट में हैं. जिन पांच दिन तहलका इस इलाके की यात्रा पर रहा उस दौरान ही यहां कम से कम दो आत्महत्याएं हुईं.अपने पिता की तस्वीर पर लगी माला को ठीक करते हुए 20 साल का गजानंद हमसे कहता है कि हम एक महीने बाद विदर्भ वापस आएं और पता करें कि क्या वो तब भी जिंदा है. 

गुजर जाने के बाद का तूफान

ईरान में राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आने के महीना भर बाद, अभी भी कुछ प्रदर्शनकारियों के हौसले की मशाल जल रही है. लेकिन ईरानी सरकार अपनी फाइल बंद कर चुकी है. उसका दावा है कि सरकारी टेलीविजन पर, दस प्रतिशत वोटों की गिनती का सीधा प्रसारण कर उसने साबित कर दिया है कि चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रही है. विरोध, तेहरान की सड़कों से गायब हो रहा है लेकिन पश्चिमी मीडिया, ख़ासकर अमेरिकी चैनल सीएनएन और उसी की पर्शियन सर्विस इस शमा को बुझने नहीं देना चाहती. तेहरान की सड़कें न सही, सीएनएन तो है, जो कि एक ख़ास रणनीति के तहत, सिर्फ राष्ट्रपति महमूद अहमदीनिजाद से हार चुके उम्मीदवार मीर हुसैन मूसावी के समर्थकों से ही फोन पर लाइव बात करता रहा हैं.

राजनीति में धर्म के दुरुपयोग के उदाहरण तो पाकिस्तान से लेकर अफ़ग़ानिस्तान और भारत तक में मिलते हैं लेकिन किसी समाज में धर्म का उपयोग भी हो सकता है ये ईरान सिखाता है

अपने काम में माहिर ईरानी खुफिया तंत्र भी जुट गया है, पता लगा रहा है कि  प्रदर्शनकारियों को उकसाने में अमेरिका का हाथ ज्यादा था या ब्रिटेन का. खुफिया विभाग के मंत्री गुलाम इजाई साफ़तौर पर आरोप लगा रहे हैं कि उनके पास पक्के सबूत हैं कि किस तरह पश्चिमी ताकतों ने एक ‘स्थाई ईरान’ को हिलाने की हर मुमकिन कोशिश की. एक-एक करके अहमदीनिजाद के तमाम विरोधी भी अब ऐसे बयान दे रहे हैं जिससे नहीं लगता कि अब उनकी तरफ़ से किसी विरोध की गुंजाइश बाकी है. समूचा ईरान एक दिखने की कोशिश कर रहा है ताकि सारा आरोप बाहरी ताकतों पर मढ़ा जा सके.

इस्लामिक ईरान के इतिहास के सबसे विवादित चुनाव के आकलन की सबसे बड़ी बाधा है सही सूचना का अंतर्राष्ट्रीय समुदाय तक न पहुंच पाना. सूचना के उपलब्ध दोनों मुख्य माध्यमों – ईरानी सरकारी टीवी और पश्चिमी न्यूज चैनलों (सीएनएन, बीबीसी) – पर ही पूरी तरह विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि जहां ईरानी सरकार ने विदेशी पत्रकारों को एक ह़फ्ते के बाद वहां टिकने की अनुमति नहीं दी वहीं विदेशी चैनल बिना संवाददाताओं के ही ख़बरें दिखाते रहे हैं. कितने लोग अहमदीनिजाद के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे? कितनों की जानें गईं, कितने जख्मी हुए, कितने लापता कर दिये गये हैं? और कितने अभी जेल में बंद हैं? किसी भी सवाल का कोई विश्वसनीय जवाब नहीं है.

इस सब के बीच ईरान अपने नुकसान का हिसाब भी लगा रहा है. हालांकि अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, सीरिया से लेकर रूस और चीन ने जिस तरह अहमदीनिजाद की जीत का स्वागत किया है, उसे ईरान एक बड़ी जीत के तौर पर पेश कर रहा है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इस पूरे बवाल से, पश्चिमी एशिया में क्षेत्रीय नेतृत्व की ईरान की आकांक्षाओं को जरूर धक्का पहुंचा है.

ईरान की सड़कों पर निकलें तो यहां नेताओं की नहीं शहीदों की तस्वीरें नजर आती हैं. ईरान के लिये इस्लामिक क्रांति को हर दिन याद रखना, देशभक्ति तो है ही जरूरत और मजबूरी भी हैईरान की सड़कों पर निकलें तो यहां नेताओं की नहीं शहीदों की तस्वीरें नजर आती हैं. ईरान के लिये इस्लामिक क्रांति को हर दिन याद रखना, देशभक्ति तो है ही जरूरत और मजबूरी भी है. देश के सबसे ताकतवर मजहबी नेता अयातुल्लाह ख़ुमैनी से लेकर राष्ट्रपति अहमदीनिजाद तक, इस समय ईरान का लगभग पूरा नेतृत्व उन लोगों के हाथों में है जिन्होंने इस्लामिक क्रांति और उसके बाद ईराक के साथ आठ साल तक चली जंग में सीधे तौर पर हिस्सा लिया. इससे न सिर्फ इन नेताओं को बने रहने का परमिट मिलता है बल्कि ये लगातार सक्रिय बाहरी ताकतों के बीच देश को एक बनाए रखने का तरीका भी है.

इस सबके बावजूद यदि विरोध प्रदर्शन अभी भी जारी हैं तो इसलिए कि मुद्दा सिर्फ इस या उस राष्ट्रपति का चुना जाना भर नहीं है बल्कि  70 प्रतिशत युवाओं का ये देश एक नये ईरान की मांग कर रहा है. वो 1979 की क्रांति से अपने को नहीं जोड़ पा रहा है. सड़कों पर आजादी की मांग कर रहे ज्यादातर युवा या तो 30 साल पहले की क्रांति के समय पैदा ही नहीं हुए थे या फिर इतने छोटे थे कि उन्हें कुछ याद नहीं. इसीलिये शायद ईरान विरोधाभासों का देश है. मुश्किल ये है कि क्रांति से पहले और बाद की आबादी के बीच पुल कैसे बने.

तेहरान की सड़कों पर, ख़ूबसूरत कपड़े, ब्रांडेड चश्मे और डिजाइनर पर्स के साथ इठलाती लड़कियां मुश्किल से ‘जबरदस्ती का स्कार्फ’ संभालती चलती हैं – ईरानी सरकार का फरमान है 9 साल से ऊपर कोई भी लड़की घर से बाहर बिना स्कार्फ के नहीं निकल सकती. लेटेस्ट फैशन की जींस टी-शर्ट और बालों को स्पाइक बनाये नौजवान लड़कों को देखकर सहज ही पता चलता है कि आज का ईरानी अपने आज के लिये जीता है.

तेहरान में ईरान की 20 फ़ीसद आबादी बसती है, भौगोलिक रूप से यूरोप से बहुत नजदीक न होकर और विचारधारा में अमेरिका से बिल्कुल मेल न खाने के बावजूद यहां युवाओं को उनका फैशन और लाइफ़-स्टाइल अपनाने से कोई परहेज नहीं. जब वो नाइकी, रीबॉक पहनकर, कोक से गला तर करते हुए जेनिफ़र लोपेज के गानों पर नाचता है तो अमेरिका से अपनी दुश्मनी को याद नहीं रखना चाहता. वो सियासत से अपनी जिंदगी को बोझिल नहीं बनाता.

ईरान इस्लामिक है लेकिन अफ़ग़ानिस्तान नहीं है. पाकिस्तान भी नहीं है. ईरान ने 1979 के बाद जिस तरह धर्म की चादर ओढ़ी उससे न सिर्फ पश्चिमी ताकतें बल्कि दूसरे देशों में भी लोगों की भवें चढ़ती हैं. राजनीति में धर्म के दुरुपयोग के उदाहरण तो पाकिस्तान से लेकर अफ़ग़ानिस्तान और भारत तक में मिलते हैं लेकिन किसी समाज में धर्म का उपयोग भी हो सकता है ये ईरान सिखाता है.

इस्लामिक क्रांति के समय 30 साल पहले, इस्लामिक गणतंत्र की संरचना करने वाले अयातुल्लाह ख़ुमैनी ने फ़तवा दिया था कि बेटी को पढ़ाना हर ईरानी का पहला धर्म है (ईरान में सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह की बात को सिर्फ एक सरकारी आदेश नहीं बल्कि आकाशवाणी की तरह लिया जाता है. ईरान से बाहर भी दुनिया भर के शिया समुदाय के लोग ईरानी अयातुल्लाह को अपना इमाम मानते हैं और किसी भी देश में होने के बावजूद उनका धार्मिक नेतृत्व स्वीकार करते हैं). एक फ़तवे ने सिर्फ 20 सालों में महिला साक्षरता की दर 22 से 94 प्रतिशत पहुंचा दी. एक अनुमान के मुताबिक ईरान में कॉलेज जाने वाली लड़कियों की तादाद ब्रिटेन से भी ज्यादा है.

भारत में जरूर इस बात पर बहस जारी है कि बच्चों को सेक्स शिक्षा दी जाये या नहीं लेकिन इस इस्लामी गणतंत्र में सेक्स न सिर्फ शिक्षा का हिस्सा है बल्कि शादी से पहले जोड़ों को फैमिली प्लानिंग की पूरी ट्रेनिंग दी जाती है. जिससे महिला का अपने शरीर पर पूरा नियंत्रण हो.

हर विकासशील समाज की तरह ईरान के गांव और शहर भी अलग तस्वीर पेश करते हैं. तेहरान से कुछ ही दूर सबसे बड़े धार्मिक शहर कुम – फिलहाल विश्व में शिया धार्मिक शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र  – जैसे इलाकों में जहां सर से पैर तक काली चादरों में लिपटी महिलायें और पारंपरिक चोग़े पहने पुरुष नजर आते हैं वहीं तेहरान में बड़ी तादाद में महिलायें नौकरी करती हैं, स्वतंत्र रूप से जिंदगी गुजारती हैं और अपना जीवन साथी भी चुनती हैं.

पर्दे के मामले में दिल पत्थर कर लेने वाले इस फारसी समाज में, मोहब्बत के फूल बरसते हैं. तेहरान की सड़कों पर हाथों-में-हाथ लेकर चलने और कंधे पर सर रखकर बैठने वाले नौजवान जोड़े किसी भी विदेशी को ईरान के बारे में दोबारा सोचने पर मजबूर करते हैं. यहां ज्यादातर लोग कॉलेज में पढ़ने के दौरान ही शादी कर लेते हैं और इनमें से 90 फीसदी प्रेम-विवाह करते हैं. लेकिन बच्चों के मामले में अक्सर औरत को ही फैसला लेने का हक दिया जाता है. शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक का खर्च सरकार के जिम्मे होता है लेकिन ये सुविधा तीन बच्चों तक ही सीमित है.

बहरहाल, कहा नहीं जा सकता कि इन प्रदशर्नों के बाद ईरानी नेता अपने युवाओं का दिल पढ़ पाये होंगे और 10 हजार साल पुरानी फ़ारसी तहजीब को बचाने के साथ-साथ, 21वीं सदी के आधुनिक ईरान का निर्माण भी करेंगे.

आरफ़ा ख़ानम शेरवानी, वरिष्ठ पत्रकार