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पत्नकारों के वेश में पुलिस?

रविवार रात यह खबर आई और उतर गई. दिल्ली नक्सलियों को बहुत दूर की चीज समझती है. लेकिन यह खतरनाक नक्सलवादी क्या होता है? अगले दिन पता चला कि कोबाड गांधी नाम का यह शख्स झारखंड का छत्तीसगढ़ का तीर-धनुष या बंदूक उठाने वाला कोई तथाकथित खूंखार आदिवासी नहीं है. उसने दून स्कूल में पढ़ाई की है, मुंबई के सेंट जेवियर्स से कॉलेज किया है और लंदन जाकर चार्टर्ड अकाउंटेंट का कोर्स किया है. एक बड़े घर का बेटा है जो चाहता तो कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बोर्ड में होता.

पुलिस पत्नकारों के वेश में जाती है तो एक बेहद संवेदनशील पेशे को अविश्वसनीय बनाती है. लेकिन एक खतरनाक आतंकवादी को देखने में व्यस्त पत्नकारिता इस वास्तविक खतरे से बेखबर है

मंगलवार को लगभग इन्हीं शब्दों के साथ दिल्ली के अंग्रेजी अखबारों में इस खतरनाक नक्सली का परिचय छपा. साथ में कुछ संस्मरणों से भीगी टिप्पणियां भी जो बताती थीं कि कोबाड कभी कितने जीवंत शख्स हुआ करते थे और ख़ास लोगों की महिफल में कैसे दिलचस्प मुहावरे उछाला करते थे. यह भी कि लंदन की ट्यूब्स में वे भारत से आए प्रोफेसरों से किस तरह क्रांति की संभावना और उसके संकट पर बात किया करते थे.

बस इतना ही. और इसके बाद देखते-देखते खतरनाक नक्सली एक रोमानी क्रांतिकारी हो गया. कोबाड गांधी तिहाड़ के अंधेरे में अपनी बीमारी के साथ छोड़ दिए गए और नक्सलवाद फिर छत्तीसगढ़ और झारखंड के जंगलों में चला आया. पता चला कि देश के गृहमंत्नी पी चिदंबरम इन राज्यों के दौरे पर हैं और नक्सलियों पर एक निर्णायक हमले की साझा योजना का जायजा ले रहे हैं. 

लेकिन असली खबर छत्तीसगढ़ या झरखंड से नहीं, बंगाल से आई. लालगढ़ में पुलिस अत्याचारों के ख़िलाफ़ संघर्ष समिति बनाने वाले छत्नधर महतो को गिऱफ्तार कर लिया गया है. इस भूमिगत ख़तरनाक नक्सली की पुलिस को अरसे से तलाश थी. लेकिन पुलिस ने इसे पकड़ा कैसे? पत्नकार बनकर. किसी स्थानीय संवाददाता को पुलिसवालों ने पत्नकार के वेश में अपने भरोसे में लिया और छत्नधर महतो का इंटरव्यू करने पहुंचे. किसी भूमिगत नेता से मुलाकात का यह जाना-पहचाना तरीका है जो बाहर से गए पत्नकार अख्तियार करते हैं.

लेकिन पुलिस की इस कार्रवाई पर क्या कोई सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए? क्या यह वही तरीका नहीं है जो तालिबानी आतंकवादियों ने एक बड़े अफगान नेता अहमद शाह मसूद को मारने के लिए इस्तेमाल किया था? वे भी पत्नकार बन कर गए और उन्होंने अहमद शाह मसूद को मार डाला. 

यह एक खतरनाक चलन है जिसका विरोध होना चाहिए. पुलिस पत्नकारों के वेश में जाती है तो एक बेहद संवेदनशील पेशे को अविश्वसनीय बनाती है. लेकिन एक खतरनाक आतंकवादी को देखने में व्यस्त पत्नकारिता इस वास्तविक खतरे से बेखबर है. अखबारों में इस कार्रवाई के तौर-तरीके पर उठे छिटपुट एतराज को भूल जाएं तो किसी को इस बात से फर्क नहीं पड़ रहा कि संगीनें कलम की स्याही को बदनाम कर रही हैं. 

क्या इसलिए कि हमारे भीतर यह आम राय बन गई है कि नक्सलवाद देश की सबसे ख़तरनाक चुनौती है और इससे किसी भी ढंग से निबटना नाजायज नहीं है? खुद इस देश के प्रधानमंत्नी कई मौकों पर यह राय दुहरा चुके हैं. लेकिन वे यह कभी नहीं बताते कि ये नक्सलवादी कौन हैं, कहां से आए हैं, कहां से उन्हें ताकत मिलती है? निश्चित तौर पर नक्सली हिंसा समर्थन योग्य नहीं है, लेकिन अगर हिंसा को गिनती के पैमानों पर आंका जाए तो हम पाते हैं कि सबसे खौफ़नाक राज्य की मशीनरी है जो पूरे देश में सबसे ज्यादा बेगुनाहों का खून बहा रही है- कहीं उन्हें नक्सलवादी बता कर, कहीं उन्हें आतंकवादी बताकर. इशरत जहां सिर्फ गुजरात में नहीं मारी जाती, उसे झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी फर्जी मुठभेड़ का शिकार होना पड़ता है. राज्य की यह हिंसा बहस के दायरे से बाहर है, इसलिए कोई इस पर सवाल नहीं उठाता. अगर उठाता है तो नक्सलियों का हमदर्द माना जाता है.

पत्नकारिता को यह पूछने की फुरसत नहीं है. उसके पास गृहमंत्नी का दिया हुआ बयान है और पुलिस के दिए हुए आंकड़े हैं.  इन बयानों और आंकड़ों के बीच कोई कोबाड गांधी पकड़ा जाता है तो मीडिया हैरान रह जाता है, क्योंकि नक्सलवाद का ऐसा संभ्रांत चेहरा उसकी कल्पना से परे है. शायद यह बात भी कि इस जमाने में ऐसे नादान लोग भरे पड़े हैं जो अपना सुख छोड़ दूसरों की लड़ाई लड़ते हैं.

फिलहाल याद आ रही हैं धूमिल की पंक्तियां, ‘एक ही संविधान के नीचे / भूख से रिरियाती हुई / फैली हथेली का नाम दया है / और भूख से तनी हुई मुट्ठी का नाम / नक्सलबाड़ी है.’  क्या राहत के नाम पर बांटे जाने वाले सरकारी पैकेजों और कानून के नाम पर चल रही सरकारी हिंसा के बीच यह पंक्तियां बार-बार याद नहीं आनी चाहिए?

प्रियदर्शन

लेखक एनडीटीवी इंडिया में समाचार संपादक हैं 

किस्सा कुर्सी का: संजय गांधी

भारत में फिल्म-निर्माण जिस गति से बढ़ा उसी तेजी से फिल्मों से जुड़े विवाद और विरोध-प्रदर्शन भी बढ़ते रहे हैं. लेकिन 1975 के दौरान बनी फिल्म किस्सा कुर्सी का से जुड़ा विवाद अपने आप में खासा दिलचस्प है. शबाना आजमी की मुख्य भूमिका वाली यह फिल्म एक राजनीतिक व्यंग्य थी. कांग्रेस के सांसद रहे अमृत नाहटा फिल्म के निर्माता-निर्देशक थे. 1975 में जब यह फिल्म रिलीज होनी थी उससे पहले देश में आपातकाल लगाया जा चुका था. चूंकि फिल्म का मुख्य किरदार इंदिरा गांधी से मिलता-जुलता चरित्र था इसलिए सरकार के दबाव में सेंसर बोर्ड ने फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी. सेंसर बोर्ड के इस निर्णय के खिलाफ नाहटा ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. अदालत ने फैसला दिया कि सार्वजनिक प्रदर्शन के पहले ये फिल्म न्यायाधीशों को दिखाई जाएगी. इससे पहले कि अदालत के सामने फिल्म का प्रदर्शन होता, उसका मूल प्रिंट गायब हो गया. कहा जाता है कि संजय गांधी के  इशारे पर तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने मुंबई से फिल्म के प्रिंट जब्त करवाकर उन्हें दिल्ली के पास गुड़गांव स्थित मारुति फैक्टरी परिसर में रखवा दिया जहां बाद में इन्हें नष्ट कर दिया गया.

1977 के चुनावों में अमृत नाहटा जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर सांसद बने. उन्होंने संसद में मांग की कि आपातकाल के दौरान जब्त की गई उनकी फिल्म के प्रिंट उन्हें वापस किए जाएं. तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और तब के सूचना और प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने यह केस सीबीआई को सौंपने का फैसला किया. सीबीआई के संयुक्त सचिव निर्मल कुमार सिंह ने इस मामले की जांच की और संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल के खिलाफ इस मामले में मुकदमा दर्ज कराया. केस की सुनवाई हुई और दिल्ली की एक सत्र अदालत ने दोनों आरोपियों पर जुर्माना लगाते हुए सजा सुनाई. गांधी और शुक्ल की तरफ से बाद में सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई. इस वक्त तक मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री पद छोड़ चुके थे. चौधरी चरणसिंह कांग्रेस के  समर्थन से प्रधानमंत्री थे. बदली राजनीतिक परिस्थितियों में फिल्म को लेकर नाहटा अपने आरोपों से मुकर गए. अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव में संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल को बरी कर दिया.

किस्सा कुर्सी का  मामला इस मायने में भी खास है कि देश में पहली बार अदालत द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद भी आरोपियों को चुनाव लड़ने की अनुमति मिली और दोनों उम्मीदवार चुनाव जीते भी. 1977 में अमृत नाहटा ने फिर उसी कहानी पर किस्सा कुर्सी का फिल्म बनाई जो बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल साबित हुई. 

पवन वर्मा 

‘एक फोटो के आधार पर मीडिया ने आधारहीन खबरें छापीं’

विरेंदर सहवाग वैसी ही पारी बार-बार खेलना चाहते हैं जिसकी वजह से उन्हें मुल्तान का सुल्तान कहा जाने लगा. वह पारी उन्होंने 2004 में खेली थी. आज पांच साल बाद ये विस्फोटक बल्लेबाज जिसे क्रिकेट के महानायक तेंदुलकर ने अपनी शैली के सबसे करीब बताया था, रिबन काटने वाले आयोजनों और फिटनेस पर बार-बार पूछे जाने वाले सवालों से थक चुका है. हाल में स्थानीय खेल प्रशासकों द्वारा दिल्ली की टीम में अपने नाते-रिश्तेदारों को थोपने के विरोध में राज्य की टीम छोड़ने की धमकी देने वाले सहवाग को भरोसा है कि ऑस्ट्रेलिया सीरीज तक वे पूरी तरह से फिट हो जाएंगे. वे इसी महीने हो रही ईरानी ट्रॉफी में मुंबई के खिलाफ शेष भारत की अगुवाई के लिए भी तैयार हैं. शांतनु गुहा रे से बातचीत में उन्होंने जोर देकर कहा कि अभी उनके सामने सिर्फ दो ही लक्ष्य हैं-कुछ बड़े स्कोर और राष्ट्रीय टीम में पक्की जगह. उन्हें पता है कि कप्तान धोनी उनकी विस्फोटक बल्लेबाजी की कमी शिद्दत से महसूस कर रहे हैं.

आपने दिल्ली डेयरडेविल्स की कप्तानी क्यों छोड़ दी?

मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मीडिया ने इस फैसले पर इतना बखेड़ा क्यों खड़ा कर दिया. ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब खिलाड़ी ने अपने प्रदर्शन को सुधारने के लिए कप्तानी छोड़ी है. इस तरह के ढेरों उदाहरण भरे पड़े हैं तो फिर मेरे ही ऊपर उंगली क्यों? कुछ लोग तो ये तक पूछ रहे हैं कि क्या मैं कभी भी राष्ट्रीय टीम का कप्तान बनने के बारे में नहीं सोचूंगा. ये बड़ी ही अजीब और बेतुकी बात है. मुझे कप्तान बन कर खुशी होगी लेकिन टीम धोनी के नेतृत्व में बढ़िया प्रदर्शन कर रही है. इसलिए कोई मेरे बारे में विचार क्यों करेगा और मैं इस दौड़ में क्यों शामिल होऊं? मैं वरिष्ठता में जिस स्तर पर हूं वहां मैं भला क्यों धोनी के बाद कमान संभालने के बारे में सोचूंगा? मेरे लिए कप्तानी की इच्छा रखना महत्वपूर्ण नहीं है. बल्कि मेरी चाह उस टीम का हिस्सा बनने की है जो पूरी दुनिया को हराने में सक्षम हो. देखा जाए तो उपकप्तानी की भूमिका भी उसी खिलाड़ी को दी जानी चाहिए जिसे भविष्य में कप्तान बनाने के लिए तैयार किया जा रहा हो ताकि वो लंबे समय तक इस भूमिका को निभा सके. किसी वरिष्ठ खिलाड़ी को उपकप्तानी सौंपना ठीक नहीं.

मेरा रिलायंस से कोई करार नहीं हुआ है. मैं सिर्फ जेपी अत्रे टूर्नामेंट के लिए रिलायंस की टीम से खेला था. वहां मेरी और नीता अंबानी की साथ-साथ फोटो खींच ली गई और इसी फोटो के आधार पर मीडिया ने आधारहीन खबरें छापीं. मैं इस पर कुछ नहीं कर सकताये अजीब नहीं है कि आप कप्तानी के बोझ से बल्लेबाजी खराब हो जाने से डर रहे हैं? अगर ऐसा होता तो सारे कप्तान खराब बल्लेबाज नहीं होते?  

नहीं, मैं एक उदाहरण दे रहा हूं. दिल्ली डेयरडेविल्स की कप्तानी से मेरे इस्तीफे को ही लीजिए. ये अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार करने वाला कदम है. दो सीजन कप्तानी करने के बाद भी मेरी टीम फाइनल में नहीं पहुंच सकी. इसलिए मैंने मालिकों से कहा कि वो किसी और आजमा सकते हैं क्या पता उसकी किस्मत काम कर जाए क्योंकि मेरी तो नहीं कर रही थी. मेरा फैसला काफी सोचा-समझ था. मेरी सोच है कि जरूरत पर रन बनाओ, टीम के लिए निर्धारित लक्ष्य हासिल करो और मैच जीतो. मेरी सोच में क्या असामान्य है. मैं तो बिल्कुल सीधे-सरल तरीके की बात कर रहा हूं.

आपने खुद को भारतीय टीम की कप्तानी की दौड़ से बाहर क्यों रख दिया है?

आप फिर से वही बात करने लगे. मैंने ऐसा नहीं किया है. परिस्थितियों के संदर्भ में देखिए. जब राहुल द्रविड़ ने इस्तीफा दिया तो मैं कहां था? मैं तो टीम में अपनी जगह बचाने के लिए संघर्ष कर रहा था. तो फिर कप्तान बनने का सवाल ही कहां पैदा होता है. उसके बाद से टीम लगातार बढ़िया प्रदर्शन कर रही है. तो फिर बार-बार मेरी व्यक्तिगत इच्छाओं की बात क्यों? मुझे इसमें मत फंसाइए. फिलहाल भारत धोनी की अगुवाई में दुनिया की सबसे मजबूत टीम नजर आ रही है. इसके पास नंबर एक बनने और उस पायदान पर लंबे समय तक जमे रहने की काबिलियत है. मैं कहना चाहता हूं कि गौतम के अंदर क्लब, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कप्तानी करने की क्षमता है. चैंपियंस ट्रॉफी में वो उपकप्तानी कर भी रहे हैं. ये इस बात का साफ संकेत है कि वो एक दिन भारतीय टीम की कप्तानी कर सकते हैं. वो अच्छे और चतुर खिलाड़ी हैं और उनके नेतृत्व में दिल्ली रणजी ट्रॉफी (2007-08) भी जीत चुकी है. 

रिलायंस के साथ करार की क्या वजह रही?

मीडिया को अटकलें लगाने का बहुत शौक है क्योंकि उन्हें हमेशा खबरों की जरूरत रहती है. लेकिन उन्हें इस तरह की फूहड़ कहानियां लिखने से पहले सोचना चाहिए. मेरा रिलायंस से कोई करार नहीं हुआ है. मैं सिर्फ जेपी अत्रे टूर्नामेंट के लिए रिलायंस की टीम से खेला था. वहां मेरी और नीता अंबानी की साथ-साथ फोटो खींच ली गई और इसी फोटो के आधार पर मीडिया ने आधारहीन खबरें छापीं. मैं इस पर कुछ नहीं कर सकता.

क्या आपके दिल्ली छोड़कर मुंबई की टीम से जुड़ने की कोई संभावना है?

मैंने पहले ही इसका जवाब दे दिया है. दिल्ली छोड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं है और आईपीएल में मैं दिल्ली डेयरडेविल्स का प्रतिनिधित्व करता रहूंगा.

आप आईपीएल में डेयरडेविल्स का प्रतिनिधित्व करें और कार्पोरेट टूर्नामेंट में रिलायंस का. क्या इसमें हितों का टकराव नहीं होता?

भारत में खेलों का क्षेत्र इस तरह के विरोधाभासों से भरा पड़ा है. एक टूर्नामेंट में रिलायंस का प्रतिनिधित्व करने भर से दिल्ली डेयरडेविल्स में मेरी भूमिका पर फर्क नहीं पड़ता. अगर ऐसा होता तो इसका निश्चित रूप से विरोध होता.

आप करीब चार महीने से कंधे में चोट के कारण क्रिकेट से बाहर हैं. इस चोट से आप कैसे निपट रहे हैं?

मैं इलाज के लिए फिजियो का सहारा ले रहा हूं और खुद को चुस्त-दुरुस्त रखने की कोशिश कर रहा हूं और बोरियत से बचने के लिए भिन्न-भिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहा हूं. आज कल मैं शारीरिक व्यायाम पर बेहद ध्यान दे रहा हूं. कोई और चोट न लग जाए इसके लिए मैं बेहद सावधानी बरत रहा हूं.

आप इंग्लैंड में हुए टी-ट्वेंटी विश्वकप, वेस्टइंडीज के साथ हुई एकदिवसीय सीरीज, श्रीलंका में हुई त्रिकोणीय सीरीज और चैंपियंस ट्रॉफी से बाहर रहे. काफी क्रिकेट छूट गया. इस नुकसान की भरपाई कैसे करेंगे?

मुझे बहुत बुरा लग रहा है. कोई भी इतने समय के लिए क्रिकेट से बाहर नहीं रहना चाहता विशेषकर तब जब वो इतने लंबे समय तक टीम का स्थायी हिस्सा रह चुका हो. पर चोट ऐसा मुद्दा है जिससे क्रिकेटर को वापसी से पहले पूरी तरह निजात पाना जरूरी होता है अन्यथा ये बार-बार परेशान करती रहती है. मुझे पता है कि अभी भी मैं बाउंड्री से गेंद नहीं फेंक पाऊंगा, ईरानी ट्रॉफी और चैंपियंस लीग के दौरान मुझे घेरे के भीतर ही फील्डिंग करनी होगी. लेकिन ऑस्ट्रेलियाई टीम के दौरे तक मैं पूरी तरह से फिट हो जाऊंगा. मुझे इस बात का अहसास है कि मैंने बहुत से मैच गंवा दिए हैं लेकिन मुझे उम्मीद है कि मैं और भी नए रिकॉर्डस बनाऊंगा. 

कत्ल की राजकीय ‘अ’व्यवस्था?

7 सितंबर 2009 की शाम. गुजरात उच्च न्यायालय के अधिवक्ता मुकुल सिन्हा अपने हाथ में एक स्थानीय जज की रिपोर्ट लिए तेजी से एक पत्रकार वार्ता की ओर दौड़े जा रहे थे मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट एसपी तमांग द्वारा हाथ से लिखी गई ये रिपोर्ट उसके थोड़ी ही देर बाद समाचार चैनलों और अगले दिन अखबारों की सबसे बड़ी सुर्खी बनने जा रही थी. रिपोर्ट में कहा गया था कि लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों का 15 जून 2004 को अहमदाबाद पुलिस द्वारा किया गया एनकाउंटर सोच-समझकर किया गया एक फर्जी एनकाउंटर था.

‘हमने तब तक रिपोर्ट को पढ़ा नहीं था इसलिए जैसे ही हमने इसे गुजराती से अनुवाद करके पढ़ना शुरू किया, हम भौचक्के रह गए’ सिन्हा कहते हैं. उनके मुताबिक तीन सप्ताह में तैयार की गई रिपोर्ट ने उस सच को उघाड़ कर सामने रख दिया था जिसे वो सालों से सामने लाने का प्रयास कर रहे थे. अगले दिन गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति कल्पेश झवेरी ने तमांग की रिपोर्ट पर ये सवाल उठाते हुए रोक लगा दी कि जब वे पहले से ही इशरत जहां की मां शमीमा की सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका की सुनवाई कर रहे हैं तो इस जांच की जरूरत ही क्या थी? शमीमा ने उच्च न्यायालय के इस स्थगनादेश के खिलाफ अब देश की सर्वोच्च अदालत में गुहार लगाई है.

तमांग रिपोर्ट के निष्कर्ष 

तीन सप्ताह चली जांच से उजागर हुआ कि पांच साल पहले हुई इस मुठभेड़ की असलियत क्या थी

1- शरीर से गोली निकलने के निशान, गोली घुसने के निशान से बड़े थे, इसका मतलब है कि चारों लोगों को गोली बेहद नजदीक से मारी  गई. हालांकि गोली लगने के कुछ निशान, बाहर निकलने के निशान से बड़े भी पाए गए

निष्कर्ष: जिन लोगों को गोली मारी गई वे उस समय बैठे हुए थे. और गोली चलाने वालों ने उनके पास खड़े होकर उन्हें गोली मारी

2- पुलिस ने 70 गोलियां चलाने का दावा किया लेकिन घटनास्थल से सभी गोलियां नहीं मिलीं. पुलिस का कहना है कि उन्होंने कार   पर बाईं ओर से गोलियां चलाईं. इससे कार का बायां टायर फट गया गया. बाद में कार दाईं तरफ से डिवाइडर से टकरा गई

निष्कर्ष: पुलिस का दावा झूठा है क्योंकि बायां टायर फटने से कार बाईं ओर से ही डिवाइडर से टकराती

3- मारे गए लोगों के शरीर पर एके-56 और 9-एमएम पिस्टल की गोली के घाव थे. जबकि पुलिस इनका प्रयोग नहीं करती. बाद में यही हथियार मृतकों के पास से बरामद किए गए. मृतकों के शरीर पर बारूद के कोई अवशेष नहीं मिले

निष्कर्ष: पुलिस ने जिन हथियारों से मुठभेड़ को अंजाम दिया बाद में उन्हें ही मृतकों की कार में रख दिया

4- मृतकों की जेब से उनके पहचान पत्र बरामद किए गए. जबकि इशरत जहां का पहचान पत्र गले में लटका पाया गया था, जिसका कोई स्पष्टीकरण नहीं है. मृतकों के पास कोई पैसा बरामद नहीं हुआ. कार की डिक्की से बिना ताला लगा ब्रीफकेस मिला जिसमें दो लाख रुपए थे

निष्कर्ष: पुलिस ने हत्या के बाद मृतकों के पास पहचान पत्र और ब्रीफकेस रख दिया

5- मृतकों के शव 15 जून को दोपहर 3:40 बजे पोस्टमार्टम के लिए लाए गए तब तक इनमें अकड़न शुरू हो चुकी थी. यह स्थिति मृत्यु के 12 से 24 घंटे के बीच होती है, इसका मतलब है कि मुठभेड़ सुबह 3:40 बजे से पहले हुई होगी. लेकिन पुलिस ने मुठभेड़  का वक्त सुबह 4 बजे बताया

निष्कर्ष: पुलिस ने चारों लोगों को कहीं और मारा, बाद में उन्हें घटनास्थल पर लाया गया 

तमांग रिपोर्ट पर उच्च न्यायालय द्वारा लगाई रोक ने निश्चित ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राहत पहुंचाई है. इसमें और भी इजाफा तब हुआ जब 14 सितंबर को भाजपा ने गुजरात विधानसभा की सात सीटों के उपचुनाव में पांच पर जीत हासिल कर ली. भाजपा नेता अरुण जेतली का तुरंत ही बयान आया कि इशरत जहां का साथ देना कांग्रेस को भारी पड़ गया जिसने पिछले विधानसभा चुनावों में जीतीं 3 सीटों को भाजपा के हाथों गंवा दिया था. लेकिन अहमदाबाद के रहने वाले राजनीतिक विश्लेषक अच्युत याग्निक जेतली के इस दावे को खारिज कर देते हैं. ‘ये दुष्प्रचार है. भाजपा ये साबित करना चाहती है कि गुजराती मध्य वर्ग और दूसरे लोग उसके साथ हैं’ वो कहते हैं, ‘सच तो ये है कि कांग्रेस अति-आत्मविश्वास और उम्मीदवारों के गलत चयन की वजह से हारी न कि तमांग रिपोर्ट के चलते मतदाताओं के भाजपा का साथ देने की वजह से.’

गुजरात पुलिस का पूर्व उपमहानिरीक्षक डीजी वंजारा 2007 से ही एक मुस्लिम व्यवसायी सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी के कत्ल की साजिश रचने के आरोप में जेल में है. राज्य में हुए ज्यादातर एनकाउंटर्स के दौरान मोदी के काफी नजदीक माने जाने वाले वंजारा, अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के मुखिया हुआ करते थे

अपने चिर-परिचित अंदाज में मोदी ने ऐलान किया कि उनकी पार्टी विकास के मुद्दे पर जीती है. उन्होंने इन उपचुनावों के प्रचार अभियान में बिल्कुल भी भाग नहीं लिया था इसलिए मोदी ने ये भी दावा किया कि अब उनकी पार्टी गुजरात में केवल उनपर ही निर्भर नहीं रही है. मगर प्रेक्षकों का मानना है कि लोकसभा चुनावों में हार से अपनी छवि को लगे धक्के के बाद मोदी कानूनी अड़चनों के चलते इस समय अपने राजनीतिक जीवन की सबसे तल्ख सच्चाइयों से रूबरू हैं. हाल ही में शिमला में हुई चिंतन बैठक के दौरान जब तमाम तरह के हंगामे हो रहे थे तो मोदी कहीं नजर ही नहीं आ रहे थे. उससे कुछ ही समय पहले सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष जांच दल (एसआईटी) को 2002 के गुजरात दंगों के दौरान हुईं मुस्लिमों की हत्याओं में मोदी की भूमिका की जांच करने के आदेश दिये थे.

तमांग की रिपोर्ट ने राज्य के तमाम पुलिस अधिकारियों में भय का संचार करने का काम किया है. अपनी रिपोर्ट में तमांग ने 21 पुलिसवालों के नाम लिए हैं जिनमें अहमदाबाद के तत्कालीन पुलिस आयुक्त केआर कौशिक (जो बाद में राज्य पुलिस के महानिदेशक भी बने) और अपराध शाखा के संयुक्त आयुक्त पीपी पांडेय सहित कई बड़े पुलिस अधिकारी शामिल हैं. सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी आरबी श्रीकुमार जो कि 2002 में मुसलमानों के नरसंहार में मोदी की तथाकथित भूमिका का पर्दाफाश करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ते रहे हैं, कहते हैं कि अब इन पुलिस अधिकारियों को अपने भेद खुल जाने का डर सता रहा है. ‘कुछ पुलिस अधिकारियों ने – जिनका नाम तमांग ने अपनी रिपोर्ट में लिया है – मोदी तक अपनी ये बात पहुंचा दी है कि वे वंजारा की तरह खामोश नहीं बैठने वाले’ अपनी पहचान जाहिर न करने के अनुरोध के साथ एक सूत्र का कहना था, ‘उनका कहना है कि यदि अदालत उन्हें दोषी ठहराती है तो वे ये बताने में जरा भी नहीं हिचकेंगे कि निर्दोष मुसलमानों का कत्ल राज्य की एक अघोषित नीति रही है.’

गुजरात पुलिस का पूर्व उपमहानिरीक्षक डीजी वंजारा 2007 से ही एक मुस्लिम व्यवसायी सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी के कत्ल की साजिश रचने के आरोप में जेल में है. राज्य में हुए ज्यादातर एनकाउंटर्स के दौरान मोदी के काफी नजदीक माने जाने वाले वंजारा, अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के मुखिया हुआ करते थे. तमांग ने इशरत जहां के एनकाउंटर के साजिशकर्ताओं में वंजारा का भी नाम लिया है.

जहां तमांग की रिपोर्ट में क्या है वो आज पूरी दुनिया को पता है वहीं इसके पीछे की कहानी क्या है ये कम ही लोगों को पता है. तमांग की रिपोर्ट के सार्वजनिक हो जाने के बाद गुजरात सरकार के प्रवक्ता जयनारायण व्यास ने मजिस्ट्रेट की कड़ी आलोचना की – जिसे अदालत की अवमानना के दायरे में भी रखा जा सकता है क्योंकि तमांग एक न्यायिक अधिकारी हैं – और मुठभेड़ को सही करार दिया. उनका ये भी कहना था कि जब उच्च न्यायालय के आदेश पर पहले से ही एक उच्च स्तरीय जांच चल रही है तो एक मजिस्ट्रेट इस मामले की जांच कैसे कर सकता है. गुजरात सरकार का अदालत में ये भी कहना था कि वो ये नहीं जानती कि इस जांच का आदेश किसने दिया था.

सच ये है कि ये गुजरात सरकार ही थी जिसने अहमदाबाद के चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (सीएमएम) डीएम पटेल को न्यायिक जांच की रफ्तार बढ़ाने का निर्देश दिया था. ‘12 अगस्त को गृह मंत्रालय से किसी अधिकारी का फोन आया था’ कोर्ट का एक कर्मचारी हमें बताता है, ‘उसी दिन सीएमएम नें तमांग को ये जांच सौंप दी.’ पटेल ने तत्काल ही मामले से संबंधित सभी काग़जात तमांग को तुरंत कार्रवाई करने के निर्देश के साथ सौंप दिए. उल्लेखनीय ये भी है कि तमांग रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के दो दिन बाद ही पटेल को स्थानांतरित कर दिया गया. तो गुजरात सरकार ने मुठभेड़ के पांच साल बाद इसकी जांच कराने का मन कैसे बना लिया. दरअसल शमीमा ने गुजरात उच्च न्यायालय में इशरत जहां मामले की सीबीआई जांच को लेकर एक याचिका दायर की हुई थी जिस पर 26 जून को न्यायमूर्ति झवेरी ने सीबीआई को इस मामले में एक पार्टी बनाने का आदेश दिया था. इससे डरे मुठभेड़ में भूमिका निभाने वाले पुलिस अधिकारियों ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया. इसके बाद दो तरह की रणनीतियां अपनायीं गईं.

एसआईटी का काम अब और ज्यादा मुश्किल हो चुका है. मुठभेड़ को जायज ठहराने के लिए इसे तमांग रिपोर्ट की बखिया उधेड़ने की जरूरत होगी जो कि मुठभेड़ की तमाम परतों को फॉरेंसिक सबूतों की रोशनी में उघाड़ती हैपहली रणनीति केंद्रीय गृह मंत्रालय पर उच्च न्यायालय को ये बताने के लिए दबाव डालने की थी कि एनकाउंटर सही था. जानकारी के मुताबिक पुलिस अधिकारियों द्वारा इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) के एक उच्च पदस्थ अधिकारी राजेंद्र कुमार से संपर्क साधा गया जो कि 2004 में एनकाउंटर के वक्त गुजरात में आईबी के संयुक्त निदेशक हुआ करते थे. मानवाधिकारकर्ता शबनम हाशमी के मुताबिक वो काफी पहले ही केंद्र सरकार को राजेंद्र कुमार के मोदी तथा वंजारा से संबंधों को लेकर चेता चुकी हैं. राजेंद्र कुमार की निगरानी में ही आईबी ने लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों के गुजरात में मोदी को लक्ष्य बनाने के लिए आने से संबंधित विवादित खुफिया ‘इनपुट’ भेजी थी. सूत्रों के मुताबिक इस बार भी राजेंद्र कुमार ने ही गृह मंत्रालय को उच्च न्यायालय में हलफनामा दायर करने के लिए तैयार किया.

इस दौरान उच्च न्यायालय में ये मामला बड़ी तेजी से आगे बढ़ा रहा था और न्यायमूर्ति झवेरी 12 अगस्त को मामले की सुनवाई करने वाले थे. मगर इससे पहले ही केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार और पुलिस के दावे को समर्थन करने वाला हलफनामा अदालत में पेश कर दिया जिसमें मुठभेड़ को सही बताने के साथ ही सीबीआई जांच को गैरजरूरी बताया गया था. सूत्र बताते हैं कि अहमदाबाद में केंद्र सरकार के वकील असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल पीएस चंपानेरी ने पहले-पहल इस हलफनामे का साथ देने में असमर्थता जाहिर की थी क्योंकि उन्होंने पिछली एक सुनवाई के दौरान अदालत से कहा था कि केंद्र सरकार इस मामले में सीबीआई जांच कराने की इच्छुक है.

दूसरी रणनीति मुठभेड़ से संबंधित सभी लंबित पड़ी जांचों को तेजी से पूरा करके अदालत के जेहन में ये बिठाना था कि राज्य सरकार इस मामले में अपनी जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन कर रही है. 2004 में मुठभेड़ की मजिस्ट्रीरियल जांच के आदेश भी दिए गए थे जो कभी पूरी नहीं हुई थी. उस समय जांच अहमदाबाद के एसडीएम गौरव प्रजापति कर रहे थे जो कि न्यायिक अधिकारी न होकर राज्य सरकार के अधीन काम करने वाले अधिकारी थे. बाद में 2006 में भारतीय अपराध संहिता में संशोधन के बाद ये जांच न्यायिक अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में आ गई. इसके बाद तीन साल तक किसी को इस जांच का कोई अता-पता तक नहीं था. 12 अगस्त को जब झवेरी मामले की सुनवाई करने वाले थे ठीक उसी दिन इस जांच को पुनर्जीवित कर तमांग को सौंप दिया गया.

जस्टिस झवेरी ने मामले की सुनवाई 12 की बजाय 13 अगस्त को की और बिना देर किए तीन आला पुलिस अधिकारियों के एक विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन का फैसला सुना दिया. एसआईटी को अपनी जांच रिपोर्ट 30 नवंबर से पहले देनी थी. इस दौरान राज्य सरकार ने न तो उच्च न्यायालय को मजिस्ट्रीरियल जांच के बारे में ही कुछ बताया और न ही तमांग की रिपोर्ट और सीबीआई जांच की मांग की तरह एसआईटी के गठन का ही जरा भी विरोध किया. क्या ये इसलिए था क्योंकि जस्टिस झवेरी ने राज्य के महाधिवक्ता द्वारा सुझए पुलिस अधिकारियों में से ही तीन को चुन लिया था? अगर गुजरात सरकार को लगता था कि एनकाउंटर फर्जी नहीं तो उसने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में गुहार क्यों नहीं लगाई.

एक महीना से ज्यादा हो चुका है मगर उचित आदेशों के अभाव में एसआईटी अभी तक अपना काम शुरू तक नहीं कर पाई है. वैसे इसमें भी कोई शक नहीं कि एसआईटी का काम अब और ज्यादा मुश्किल हो चुका है. मुठभेड़ को जायज ठहराने के लिए इसे तमांग रिपोर्ट की बखिया उधेड़ने की जरूरत होगी जो कि मुठभेड़ की तमाम परतों को फॉरेंसिक सबूतों की रोशनी में उघाड़ती है.

‘अगर तमांग रिपोर्ट न होती तो एसआईटी आसानी से खुफिया जानकारियों की बिना पर एनकाउंटर को असल करार दे देती’ , मामले से जुड़े एक वकील कहते हैं, ‘लेकिन अब एसआईटी को तमांग द्वारा सामने लाए फॉरेंसिक जांच के बिंदुओं में झोल तलाशने होंगे.’ मगर यदि एसआईटी तमांग की रिपोर्ट को सही करार दे देती है – कि 21 पुलिस वालों ने  तसल्ली से सोच-विचार कर इशरत जहां और तीन अन्य लोगों के कत्ल की साजिश रची थी तो ये नरेंद्र मोदी के लिए एक बहुत बड़ी परेशानी का सबब बन सकता है क्योंकि ये सोहराबुद्दीन के बाद दूसरा ऐसा मामला होगा.

तब ये सवाल खुलकर गुजरात सरकार के सामने खड़ा हो सकता है कि क्या मुसलमानों के फर्जी एनकाउंटर मोदी के गुजरात की अघोषित नीति रहे हैं? अप्रैल-सितंबर 2002 में गुजरात के मुखिया रहे आरबी श्रीकुमार के मुताबिक गुजरात के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक के चक्रवर्ती ने एक मई 2002 को फोन करके उनसे कहा था कि ‘सुब्बाराव (तत्कालीन मुख्य सचिव) ने उनसे कहा है कि कुछ मुसलमान खत्म किए जाने चाहिए’. ‘मैंने सुब्बाराव से कहा कि यदि कोई एनकाउंटर होता है तो मैं उसकी जांच करूंगा और यदि वो एनकाउंटर फर्जी होगा तो मैं अपने सहयोगियों के खिलाफ कार्रवाई करूंगा’ श्रीकुमार कहते हैं कि उन्होंने ऐसी तमाम छोटी-छोटी बातें एक डायरी में लिखना शुरू कर दीं और बाद में उसे एक सुरक्षित स्थान पर रख दिया है. श्रीकुमार को सितंबर में बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और अगले ही महीने इस तरह के एनकाउंटर की राज्य में पहली घटना हुई. अगले चार सालों में राज्य की अपराध शाखा ने करीब 17 कथित आतंकवादियों को मार गिराया. ज्यादातर मामलों में दावा किया गया कि आतंकवादी या तो मोदी या आडवाणी या फिर वीएचपी नेता प्रवीन तोगड़िया की हत्या करने के लिए राज्य में आए थे. इन एनकाउंटरों की बाढ़ तब जाकर रुकी जब वंजारा और कुछ दूसरे पुलिस अधिकारियों को सोहराबुद्दीन फर्जी मठभेड़ के मामले में गिरफ्तार कर लिया.

मुखिया की मुहर या इसके इतर

फीरोजाबाद सीट पर डिंपल यादव की उम्मीदवारी के साथ अब सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के कुनबे का पांचवां सदस्य संसद जाने की तैयारी में है. मुलायम की बहू होने के अलावा क्या है डिंपल की पहचान, बता रही हैं नेहा दीक्षित 

इसी साल नौ जून को महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करते हुए समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव यहां तक कह गए कि ये लोकसभा को नेतृत्वविहीन करने की साजिश है और जो लोग आज इसके समर्थन में मेजें थपथपा रहे हैं वे जल्द ही घर पर बैठकर चारपाई थपथपाते नजर आएंगे. तब अगर मुलायम को पता होता कि तीन महीने बाद ही वे अपनी ही बहू डिंपल यादव की लोकसभा उम्मीदवारी का ऐलान कर रहे होंगे तो शायद उन्होंने ये बात दिल में ही रख ली होती. 32 साल की डिंपल मुलायम के बेटे और सपा की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी हैं. इस साल आम चुनाव में अखिलेश ने कन्नौज और फीरोजाबाद से चुनाव लड़ा था और दोनों सीटों पर जीत गए थे. बाद में उन्होंने फीरोजाबाद सीट छोड़ दी जिस पर अब उनकी पत्नी अपनी किस्मत आजमा रही हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि ये फैसला एक चतुर रणनीति का हिस्सा है. डिंपल जन्म से ठाकुर हैं और उनकी उम्मीदवारी से सपा को यादवों के साथ ठाकुर वोटों का भी एक हिस्सा मिल जाएगा जिससे उसकी स्थिति मजबूत ही होगी

डिंपल की उम्मीदवारी के हालिया ऐलान से एक बार फिर उन बने-बनाए खांचों की तरफ ध्यान जाता है जिनमें भारत की महिला राजनीतिज्ञों को अक्सर रखकर देखा जाता रहा है. इनमें एक तरफ इंदिरा गांधी और मायावती जैसी बेटियां हैं जिन्होंने महिलाओं के प्रति समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों से बाहर निकलते हुए अपनी अलग पहचान बनाई. दूसरी तरफ सोनिया गांधी और राबड़ी देवी जैसी बहुएं हैं जो पार्टी और जनमानस पर अपनी पकड़ को लगातार मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं.

जब हम पूछते हैं कि उत्तर प्रदेश की टेढ़ी राजनीति में क्या डिंपल राम मनोहर लोहिया की समाजवादी विरासत के मानदंडों को पूरा कर सकेंगी तो चट से समाजवादी पार्टी के एक कार्यकर्ता का जवाब आता है, ‘वे भारत के प्रथम समाजवादी परिवार की बहू हैं और उन्होंने खुद को इस परिवार के मूल्यों और इसकी संस्कृति के अनुरूप ढाल लिया है.’

हालांकि जहां तक अपनी अलग पहचान का सवाल है तो इस बारे में अभी यही कहा जा सकता है कि सार्वजनिक तौर पर मुलायम की बहू के इतर फिलहाल डिंपल की कोई पहचान नहीं है. सेना के पूर्व कर्नल एससी रावत की तीन बेटियों में से वे मंझली हैं और उनके परिवार के ज्यादातर लोग सेना में हैं. यादव परिवार की बहू बनने से पहले राजनीति में हाथ आजमाने की बात तो दूर वे किसी राजनीतिक रैली में तक नहीं गई थीं. पिता चूंकि सेना में थे तो उनकी उम्र का एक बड़ा हिस्सा एक से दूसरे कैंटोनमेंट में घर बदलते हुए गुजरा है और इसलिए खुद को जल्दी से नई जगहों और परिस्थितियों के हिसाब से ढालने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती. लखनऊ यूनिवर्सिटी से ह्यूमैनिटीज में ग्रेजुएशन करने के बाद उनकी मित्रता अखिलेश से हुई जो मैरीन इंजीनियरिंग करने के बाद उन्हीं दिनों ऑस्ट्रेलिया से लौटे थे. तब वे 21 साल की थीं और अखिलेश 25 के. मित्रता प्रेम संबंध में बदली और दोनों ने शादी करने का फैसला किया. मुलायम पहले इस रिश्ते के पक्ष में नहीं थे और उन्होंने इसका काफी विरोध किया भी. मगर आखिरकार उन्हें झुकना पड़ा और नवंबर 1999 में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन जैसी शख्सियतों की मौजूदगी वाले एक भव्य समारोह में डिंपल और अखिलेश परिणयसूत्र में बंध गए. तब से डिंपल चुपचाप एक ऐसे परिवार की गृहणी का किरदार निभा रही हैं जहां समाजवादी आंदोलन के दिग्गज उठते-बैठते रहते हैं.

हालांकि कहा जा रहा है कि पार्टी के कुछ जूनियर नेता डिंपल की उम्मीदवारी से खुश नहीं हैं और उनका कहना है कि समाजवादी पार्टी एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह हो गई है. वे राजनीति में डिंपल के सिफर तजुर्बे का मजाक भी उड़ा रहे हैं

आज बहू और पत्नी के साथ-साथ डिंपल एक आठ साल की बेटी और चार साल के जुड़वां बच्चों की मां भी हैं. उनके पति अखिलेश यादव कहते हैं, ‘मातृत्व और राजनीति, दोनों के लिए बलिदान की जरूरत होती है. मुझे भरोसा है कि राजनीति में अपना रास्ता तलाशने में मातृत्व उनकी मदद करेगा.’ बलिदान शब्द का प्रयोग अखिलेश ने शायद ठीक ही किया है क्योंकि पहला बलिदान यही है वे खुद मीडिया से कोई बात नहीं करेंगी. डिंपल की बजाय उनकी तरफ से अखिलेश बात करते हैं. जब हमने उनसे पूछा कि डिंपल मीडिया से कब मुखातिब होंगी तो सपाट लहजे में उनका कहना था कि समाजवादी पार्टी बेवजह मीडिया का ध्यान खींचने में यकीन नहीं रखती और इसलिए उनकी पत्नी तभी बोलेंगी जब उपचुनाव की तारीखों का ऐलान हो जाएगा.

डिंपल के मातृत्व को समाजवादी पार्टी अपनी निकटतम प्रतिद्वंदी और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ एक दांव की तरह इस्तेमाल कर रही है. जैसा कि अखिलेश कहते हैं, ‘अपनी मूर्तियां लगवाने को लेकर मायावती की सनक बताती है कि उनका दिल, उनके आंख-कान और उनकी सोच भी पत्थर से बनी है. उनके मन में दलितों के लिए भी कोई संवेदना नहीं है जिनका वे प्रतिनिधित्व करती हैं. डिंपल का मातृत्व उन्हें जनता से सीधे जुड़ने की क्षमता प्रदान करता है.’ तो इस तरह से देखा जाए तो घर के इन मुखियाओं के लिए डिंपल एक आदर्श भारतीय बहू की तीनों बुनियादी शर्तें पूरी करती हैं- एक आदर्श पत्नी, बलिदान की प्रतिमूर्ति और सबसे अहम आज्ञा मानने को तत्पर. 

कहा जा रहा है कि जब अखिलेश ने कन्नौज को तरजीह देकर फीरोजाबाद सीट छोड़ने का फैसला किया तो उनके वोटर निराश हो गए थे. इसलिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने संयुक्त रूप से फैसला किया कि उपचुनाव में डिंपल को उतारा जाए. अखिलेश कहते हैं, ‘उपचुनाव सबसे मुश्किल होते हैं. इसके अलावा हमारी पार्टी से बगावत करके निकले लोग भी हमारे खिलाफ मैदान में हैं.’ उनका इशारा शायद राजबब्बर की तरफ है जो कभी समाजवादी पार्टी के सांसद थे मगर अब कांग्रेस के टिकट पर फीरोजाबाद से चुनाव लड़ रहे हैं. पार्टी को डर था कि बागी उम्मीदवार और विरोधी पार्टियां उसके वोटों में सेंध लगा सकती है इसलिए उसके नेतृत्व को लगा कि ऐसे में सपा के मुखिया की बहू और पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष की पत्नी डिंपल एक मजबूत उम्मीदवार होंगी. खबर ये भी उड़ रही है कि मुलायम पहले इसके लिए राजी नहीं थे मगर बाद में मान गए.

हालांकि कहा जा रहा है कि पार्टी के कुछ जूनियर नेता डिंपल की उम्मीदवारी से खुश नहीं हैं और उनका कहना है कि समाजवादी पार्टी एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह हो गई है. वे राजनीति में डिंपल के सिफर तजुर्बे का मजाक भी उड़ा रहे हैं. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि ये फैसला एक चतुर रणनीति का हिस्सा है. डिंपल जन्म से ठाकुर हैं और उनकी उम्मीदवारी से सपा को यादवों के साथ ठाकुर वोटों का भी एक हिस्सा मिल जाएगा जिससे उसकी स्थिति मजबूत ही होगी.

कहा जाता है कि जब डिंपल को ये फैसला सुनाया गया तो पहले-पहल वे घबरा गईं और उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया. मगर जब उनसे कहा गया कि वे अखिलेश की अर्धागिनी हैं तो वे मान गईं. अखिलेश बताते हैं, ‘जब मैं फीरोजाबाद में नहीं रहूंगा तो वे मेरी प्रतिनिधि के तौर पर काम कर सकती हैं. इससे जनता को यही लगेगा कि मैं उनके बीच ही हूं.’

यानी संकेत ये है कि 1997 में जेल जाते वक्त राबड़ी को कुर्सी पर बैठाकर जैसे लालू प्रसाद यादव ने बिहार की सत्ता चलाई थी अखिलेश भी वही काम छोटे स्तर पर दोहराने की तैयारी में हैं. जब हम पूछते हैं कि डिंपल किन मुद्दों पर चुनाव लड़ेंगी तो अखिलेश जवाब देते हैं, ‘मैं उनकी तरफ से जवाब कैसे दे सकता हूं? मैं बस यही कह सकता हूं कि वे उसी समाजवाद का पालन करेंगी जिस पर पार्टी टिकी हुई है.’

डिंपल का असली व्यक्तित्व दक्ष गृहणी, समर्पित मां और उत्साही सामाजिक कार्यकर्ता की उस सार्वजनिक छवि से काफी जुदा भी है जो उनकी बनाई जा रही है. वे एक प्रतिभावन चित्रकार हैं और पढ़ने में उनकी काफी दिलचस्पी है. पार्टी के कई लोग मानते हैं कि उनके जैसी युवा नेता की मौजूदगी सपा में एक ऊर्जा का संचार करेगी और उनकी उम्मीदवारी से पार्टी को अपनी महिला विरोधी छवि तोड़ने में भी मदद मिलेगी.

पार्टी के अंदरूनी लोग बताते हैं कि डिंपल नम्र और गंभीर हैं और भले ही पार्टी के मंच पर उन्होंने कभी अपने विचार जाहिर नहीं किए हों मगर महिला सशक्तिकरण और शिक्षा जैसे मुद्दों पर वे काफी गहराई से सोचती हैं. लोकसभा चुनावों के दौरान मुलायम के चुनाव क्षेत्र सैफई में हर घर का दौर किया और हर उम्र की महिलाओं से सपा को वोट देने की अपील की. दमकते हुए अखिलेश बताते हैं, ‘उनके लिए हर कोई काका-काकी था. वे उनमें से हर एक का हाथ पकड़कर उसे पोलिंग बूथ तक ले गईं.’

क्या डिंपल पार्टी लाइन पर चलने वाली एक आज्ञाकारी बहू बनकर रह जाएंगी? या वे उन चंद महिला नेताओं में से एक निकलेंगी जिन्हें शुरुआत में सभी ने कम करके आंका मगर जिन्होंने बाद में सारे सांचे बदल डाले? जवाब मिलने में वक्त लगेगा. अभी तो यही देखना दिलचस्प होगा. कि वे अपनी तरफ से खुद बोलना कब शुरू करती हैं?         

लंका में ही रहिए


चक्र सुदर्शन

दीजे हमको आज्ञाआज अयोध्या जायं,

मित्र विभीषण,  अब हमें पुष्पक से पहुंचायं.

पुष्पक से पहुंचायंजानकी संग हमारे,

बोले राम- राक्षस हमने सब संहारे.

चक्र सुदर्शनदृश्य हुआ ऐसा बेदरदी,

पुष्पक के पायलेटों ने स्ट्राइक कर दी.  

                                                   अशोक चक्रधर

इस वर्ग की अन्य रचनायें

सादगी इनके लिए पाखंड क्यों है

आपने अखबारों में सादगी पर बहस पढ़ी होगी. और यह भी देखा होगा कि अंग्रेजीवाले तो उसे पाखंड बता कर खारिज कर रहे हैं लेकिन हिंदी वालों का सुर यह है कि सादगी होनी चाहिए पर वह दिखनौटी नहीं होनी चाहिए. क्या हिंदी वालों के पास ऐसे बौद्धिक औजार नहीं हैं जिनसे वे कांग्रेस और उसकी सरकार के चलाए जा रहे सादगी के अभियान के आर-पार देख सकें ? या वे स्वभाव से भोले और विश्वासी हैं और नेता लोग और सत्तारूढ़ पार्टियां जो करती या दिखाती हैं उसमें सहज ही भरोसा कर लेते हैं. अंग्रेजी वाले राजनीति के प्रति एक असम्मान का रवैया रखते हैं और नेताओं और पार्टियों के करने धरने को चीड़-फाड़ कर के जांचते और उसमें बंडलबाजी पाते हैं तो बिना लागलपेट के साफ साफ कहते हैं. इसलिए सादगी के अभियान के प्रति बहस में यह फर्क साफ साफ दिखाई देता है.

आप शाही अंदाज में खर्च करने के आदी भी हों तो भी यह कैसे भुलाया जा सकता है कि आप जनता के प्रतिनिधि हैं और यह जनता पांच सितारा क्या मामूली झोंपड़ी में भी नही रहती. आप उसके प्रतिनिधि हैं तो आपको कुछ तो उसकी हालत का सम्मान करना चाहिए 

सोनिया गांधी की तरफ से सादगी के अभियान की बात मानसून में गड़बड़ी और इस कारण कई इलाकों में सूखे की स्थिति पर विचार के बाद कांग्रेस की तरफ से आई. कांग्रेसी सांसदों, विधायकों और कार्यकर्ताओं को फिजूलखर्ची से बचने और अपने वेतन भत्तों में से कुछ न कुछ देने की बात हुई. सबसे ठाठ का जीवन मंत्री लोग जीते हैं, इसलिए उनके बर्ताव और रवैये पर स्वाभाविक ही सादगी के अभियान का सबसे ज्यादा ध्यान था. तभी इंडियन एक्सप्रेस में खबर आई कि विदेश मंत्री एसएम कृष्णा और विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर मई में मंत्री बनने के बाद से पांच सितारा होटलों में रह रहे हैं क्योंकि उन्हें जो सरकारी आवास दिया गया है वह अभी रहने के लायक नहीं है.

सब जानते हैं कि मंत्री बनने के बाद सांसद अपने को मिले आवास में अपनी पसंदगी से कई फेरबदल करवाते हैं. अपने दफ्तरों को भी वे अपनी मर्जी और शौक के मुताबिक बार-बार बनवाते हैं. इनमें निजी पसंदगी से लेकर अपने अपने ज्योतिष और वास्तुशास्त्री का भी कहा बताया चलता है और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग को इन सब बातों को एडजस्ट करना पड़ता है. इसमें लाखों बल्कि कुल मिलाकर करोड़ों का खर्च होता है. मंत्री पहले से चले आ रहे बंगलों और दफ्तरों में फिट नहीं होना चाहते. वे उन्हें अपने मुताबिक करना चाहते हैं. शायद अपने निजी निवासों और कार्यालयों पर वे उतने दिल खोल कर खर्चे नहीं करते जितने सरकारी आवासों पर करवा लेते हैं. इसे वे अपने मंत्री होने का विशेषाधिकार मानते हैं. सार्वजनिक धन के प्रति उनका यह रवैया और दूसरी चीजों और जगहों पर भी खुल कर प्रकट होता है. 

इसे देखते समझते हुए विदेश मंत्री कृष्णा और उनके सहायक शशि थरूर का पांच सितारा होटलों में रहना कोई बड़ी बात नहीं थी. लेकिन सवाल यह है और सही है कि जब आपकी पार्टी और सरकार सादगी का अभियान चला रही हो तब आप मंत्री की हैसियत से पांच सितारा होटलों के सूट में कैसे रह सकते हैं? मंत्रियों की तरफ से कहलवाया गया कि हम तो वहां अपने निजी खर्च से रह रहे हैं सार्वजनिक फंड से नहीं. बाद में यह दावा गलत निकला क्योंकि मंत्री कोशिश कर रहे थे कि उनके रहने का खर्च सरकार उठाए. पर मान लीजिए कि आपके पास पांच सितारा होटलों में महीनों तक रहने के पैसे हों भी और आप शाही अंदाज में खर्च करने के आदी भी हों तो भी यह कैसे भुलाया जा सकता है कि आप जनता के प्रतिनिधि हैं और यह जनता पांच सितारा क्या मामूली झोंपड़ी में भी नही रहती. आप उसके प्रतिनिधि हैं तो आपको कुछ तो उसकी हालत का सम्मान करना चाहिए.

हमारा अंग्रेजी मीडिया को यह चिंता थोड़े है कि इस देश के अस्सी प्रतिशत से ज्यादा लोग दो जून दाल-रोटी भी नहीं पा सकते. उनके लिए निर्बाध उपभोग का तो कोई मतलब ही नहीं है

इंडियन एक्सप्रेस की खबर पक्की थी और निश्चित ही सरकारी सूत्रों से मिली होगी. इसके बाद वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने इन मंत्रियों को सलाह दी और वे पांच सितारा होटल छोड़ने पर लोकमत के कारण मजबूर हुए. तभी अंग्रेजी अखबारों और टीवी चैनलों को बुरा लगा कि एक अखबार की खबर के कारण इन मंत्रियों को डांट पड़ी और अपमानित होना पड़ा. लेकिन अगर आप अफोर्ड कर सकते हैं और वैसी जीवन शैली के आदी हैं तो आपको क्यों नहीं पांच सितारा होटलों में रहना चाहिए. आखिर जो सरकारी आवास और सुविधाएं मंत्रियों और सांसदों को मिलती हैं उन सब को बाजार के व्यापारिक दामों से आंका जाए तो वे पांच सितारा रहन-सहन से भी महंगी पड़ेंगी. लुटियन की दिल्ली के घरों में रहना और सुविधाएं भोगना कोई सादगी में जीना नहीं है. इसलिए मंत्रियों को पांच सितारा होटलों से निकलवाना और सादगी का आग्रह करना पाखंड है. मंत्री के नाते काम करने और रहने के लिए जो भी जरूरी हो उसे मान लेना चाहिए और सादगी की झूठी कसौटियां नहीं लगानी चाहिए.

इस बहस में वे सरोजिनी नायडू की वह प्रसिद्ध टिप्पणी भी लेकर आए कि गांधीजी को गरीबी और सादगी में रखने के लिए व्यवस्था को कितना खर्च करना पड़ता है. शशि थरूर ने ट्वीटर पर इकॉनामी क्लास को कैटल क्लास और सोनिया गांधी और राहुल गांधी को होली काउज कह दिया. उनसे कांग्रेसियों ने इस्तीफा मांगा और सोनिया गांधी ने नसीहत दे कर माफ कर दिया. देश में सार्वजनिक जीवन में सादगी और पारदर्शिता और जवाबदेही के नाते महात्मा गांधी आदर्श कायम कर चुके हैं. उन्हीं को इस बहस में पाखंडी बताने की कोशिश की गई. और कहते हैं कि ट्वीटर पर थरूर को लाखों लोगों ने अच्छा मजाक करने वाला कहा और माना कि राजनीति में ऐसे लोग होने चाहिए.

सवाल यह है कि इस देश में विमान की इकॉनामी क्लास में भी कितने लोग यात्रा कर पाते हैं जो उसकी भीड़ को केरल से निर्वाचित एक सांसद ने कैटल क्लास कह दिया. और अगर वह मवेशी की तरह यात्रा करना है तो हमारी रेलगाड़ियों और बसों में जो ठूसमठूस होती है उसे तो आप कीड़े-मकोडों से भी बदतर बता देंगे. और अगर इस देश के आम लोग कीड़े-मकोड़े और मवेशी हैं तो आप उनके कैसे तीस मार खां प्रतिनिधि हो गए जो पांच सितारा होटल के बिना रह नहीं सकते और जो विमान में खूब जगह में सुख-सुविधाओं के साथ यात्रा करें तभी यात्रा पर जाएंगे. एक गरीब देश के आप कैसे राजशाही प्रतिनिधि हो सकते हैं? यह लोकतंत्र है या राजतंत्र?

लेकिन आप देखिए कि इस देश के अंग्रेजी मीडिया में बहस यह नहीं है कि सूखे और मंदी के जमाने में सादगी से रहना चाहिए या नहीं? भारत जैसे गरीब लोकतंत्र के प्रतिनिधि राजकीय ठाठ और विलासिता में कैसे रह सकते हैं? भारत जैसे देश में जहां चौरासी करोड़ लोगों को छह से बीस रुपए रोज भी नहीं मिलते आप अमेरिकी या यूरोपीय जीवन-शैली कैसे अपना सकते हैं? भारत में सच्चा जीवन तो सादगी का जीवन ही हो सकता है. अगर सूखे और मंदी के साल में मंत्रियों और सरकार से आप सादगी की उम्मीद करें तो यह पाखंड कैसे हो सकता है?

अंग्रेजी मीडिया इसे नहीं मानता. उसका आग्रह है कि सादगी अपने आप में कोई सार्वजनिक मूल्य नहीं हो सकता. सरकार का काम चलाने और मंत्रियों की जिम्मेदारियों को देखते हुए उन्हें वे तमाम सुविधाएं दी जानी चाहिए जो उनके काम और दक्षता के लिए जरूरी हैं. ऐसी ही सुख-सुविधाएं वे उद्योगपतियों, व्यापारियों और नौकरशाहों के लिए भी जरूरी मानते हैं. सादगी को वे पाखंड कहते हैं क्योंकि सभी क्षेत्रों में राज करने वाले लोगों को सुख-सुविधाओं के बिना वे सक्षम और स्मार्ट नहीं मानते. सक्षमता और स्मार्टनेस वे उपभोग के स्तर से तय करते हैं. आखिर विकसित देश अपना जीवन स्तर उपभोग के अपने स्तर से निश्चित करते हैं. हमारा अंग्रेजी मीडिया उस बाजार का एजंट है जो उपभोग को लगातार बढ़ाते जाने को ही बेहतर अर्थव्यवस्था और बेहतर जीवन मानता है. उसे यह चिंता थोड़े है कि इस देश के अस्सी प्रतिशत से ज्यादा लोग दो जून दाल-रोटी भी नहीं पा सकते. उनके लिए निर्बाध उपभोग का तो कोई मतलब ही नहीं है.

भारत का उपभोगी मध्यवर्ग अमेरिका की कुल आबादी से भी बड़ा है. इन्हीं का उपभोग वह बाजार है जिस पर अमेरिका समेत सभी विकसित देशों की आंखें टिकी हैं. इस मध्यवर्ग ने भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया के अमीरों के साथ अपना भूमंडलीकरण किया है. पहले इसकी राष्ट्रीय चेतना हुआ करती थी जिसने हमारे महान नेता पैदा किए. अब यह इस गरीब देश को दमघोटू बोझ मानता है. उपभोग में कटौती इसे पसंद नहीं. अगर नेता सादगी में रह कर थोड़े में गुजारा करें तो लोकमत निर्बाध उपभोग के खिलाफ जाएगा और खाते-पीते मध्यवर्ग की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी. इसलिए सादगी पाखंड है. भ्रष्ट उपभोगी नेता इस वर्ग को चाहिए. गरीब हिंदीवालों को नहीं. समझे कि नहीं आप?’

प्रभाष जोशी  

पोखरण: एक अनावश्यक विवाद

संथानम न तो पश्चिमी विश्लेषकों की राय को नकारने वाले परमाणु आयोग के जवाब के बिंदुओं पर ही कुछ कह रहे हैं और न ही परीक्षण से संबंधित डीआरडीओ के किन्हीं आंकड़ों को ही अपनी बात के समर्थन में रख रहे हैं 

कुछ ही दिन हुए हैं डीआरडीओ के एक पूर्व अधिकारी के संथानम – जो कि मई 1998 में पोखरण में किये गए शक्ति श्रंखला के परमाणु परीक्षणों से करीब से जुड़े हुए थे – का ये बयान आया कि उस समय किया गया सबसे महत्वपूर्ण थर्मोन्यूक्लियर या हाइड्रोजन बम परीक्षण बुरी तरह असफल रहा था और इसलिए भारत को सीटीबीटी पर हस्ताक्षर करने के बारे में अभी सोचना तक नहीं चाहिए.

वो अकेले नहीं हैं जिन्होंने भारत के पोखरण-2 परीक्षणों पर सवाल खड़े किये हैं. परीक्षणों के तुरंत बाद ही तमाम पश्चिमी विश्लेषक भी ऐसा ही कर चुके हैं. मगर ये भी उतना ही सच है कि परमाणु ऊर्जा आयोग के वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने यथासंभव उन विश्लेषकों की आलोचनाओं के जवाब भी दे दिये थे. अब संथानम न तो पश्चिमी विश्लेषकों की राय को नकारने वाले परमाणु आयोग के जवाब के बिंदुओं पर ही कुछ कह रहे हैं और न ही परीक्षण से संबंधित डीआरडीओ के किन्हीं आंकड़ों को ही अपनी बात के समर्थन में रख रहे हैं. वे तो बस पश्चिमी विशेषज्ञों की राय का हवाला देते हुए परीक्षणों को असफल बताए जा रहे हैं.

चूंकि भारत का जरूरी परमाणु क्षमता होने का दावा, उसका परमाणु परीक्षणों पर लगाया गया एकतरफा प्रतिबंध और सीटीबीटी को लेकर पड़ रहे चौतरफा दबाव पर उसकी प्रतिक्रिया, ये सारी चीजों इसी बात पर निर्भर करती हैं कि पोखरण-2 परीक्षण पूरी तरह सफल थे या नहीं, इसलिए इन परीक्षणों पर खुले दिमाग से विचार किया जाना जरूरी है.

थोड़ा विज्ञान को समझने की कोशिश करें तो भारतीय परीक्षणों पर पश्चिमी वैज्ञानिकों की राय इनसे पैदा हुई भूगर्भीय तरंगों की माप पर आधारित थी. इन तरंगों को दुनिया के विभिन्न हिस्सों में स्थित भूकंप-मापी केंद्रों द्वारा मापा गया था. इसके अलावा विश्लेषकों का ये भी तर्क था कि चूंकि 1974 में हुए पोखरण-1 से पोखरण-2 की अपेक्षा ज्यादा बड़ा गड्ढा हुआ था इसलिए भी पोखरण-2 पूर्णतया सफल होने के भारतीय दावे सही नहीं हैं.

भारतीय वैज्ञानिकों का कहना है कि 11 मई को किये गए तीन परीक्षणों में से दो एक साथ एक-दूसरे से मात्र एक किमी की दूरी पर किए गए थे. चूंकि दोनों परीक्षणों से पैदा हुई तरंगों के बीच कई तरह की क्रियाएं हुई होंगीं इसलिए विभिन्न केंद्रों द्वारा की गईं इन तरंगों की माप का गलत होना स्वाभाविक है. दूसरा इन तरंगों की माप से परमाणु विस्फोट की क्षमता का आकलन करते समय विश्लेषकों ने पोखरण के बारे में ज्यादा जानकारी न होने की स्थिति में दूसरे परमाणु परीक्षण स्थलों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया. इसके अलावा पोखरण-2 से ज्यादा बड़ा गड्ढा न होने की वजह ये थी कि इसमें विस्फोट जमीन से 230 मीटर नीचे ग्रेनाइट की चट्टानों के बीच किया गया था जबकि पोखरण-1 में गहराई मात्र 107 मीटर ही थी.

अमेरिका भी सही क्षमता आंकने के लिए परीक्षण स्थल पर परमाणु परीक्षण के बाद किये गए परीक्षणों पर ही भरोसा करता है मगर पोखरण-2 के बारे में ऐसे परीक्षण केवल परमाणु आयोग ही कर सकता था, संथानम या पश्चिमी विश्लेषक नहीं. तो फिर क्यों न हम अपने प्रधानमंत्री, और कलाम, चिदंबरम जैसे योग्य वैज्ञानिकों की राय से इत्तेफाक रखें.

संजय दुबे  

‘आडवाणी को उस माइक्रोफोन तक जाने से किसने रोका था?’

5 दिसंबर 1992 को मैं आडवाणी की रैली कवर करने के लिए लखनऊ में था. रात को भाषण के बाद जब पत्रकारों की भीड़ छंटने लगी थी तो मैं न जाने क्या सोचकर वहीं रुक गया. आडवाणी के पीछे-पीछे चलते हुए मैं सीधे कल्याण सिंह के घर जा पहुंचा. वहां अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी सहित भाजपा के तमाम बड़े नेताओं की बैठक हो रही थी. माहौल काफी तनाव भरा था.

अब बहुत हो चुका उन्हें नीचे उतारें.लेकिन दूसरे नेता इतने से ही संतुष्ट नहीं थे. जैसे ही पहले गुम्बद में दरार पड़नी शुरू हुई उमा भारती, साध्वी तंभरा और सिंधिया ने नारा लगाया –एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो’ 

आधी रात को जब आडवाणी बाहर निकलने लगे तो मैंने उनसे यूं ही पूछ लिया, ‘कल अयोध्या के लिए कब निकलेंगे.उन्होंने जवाब दिया, ‘अभी’. अचानक ही वाजपेयी भी बाहर आए और दिल्ली के लिए रवाना हो गए. मैंने अपने सहयोगी रिपोर्टर को फोन किया और हम भी अयोध्या की तरफ निकल पड़े. 

अयोध्या में जब आडवाणी महंत परमहंस के आश्रम से निकले तो मैं उनके पीछे हो लिया. तमाम भाजपा और विहिप नेताओं के साथ वो उस मंच पर आ गए जो कि विवादित ढांचे के ठीक सामने ही बना था. मैं इस समय भी उनके पीछे था. संघ और भाजपा के तमाम दूसरे नेता भी वहीं मौजूद थे. उन्हें लगा होगा कि शायद मैं विहिप का फोटोग्राफर हूं इसलिए मुझे मंच से नहीं हटाया गया. ज्यादातर दूसरे फोटोग्राफर पूजा के लिए बने शामियाने में थे. पूजा और नेताओं के भाषण शुरू हो गए थे. 11.30 बजे के करीब लोग गुम्बद पर चढ़ने लगे. फोटोग्राफरों ने उनके चित्र लेने शुरू किए तो कारसेवक उन पर टूट पड़े. उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया गया और जिसने भी विरोध किया उसे पीटा भी गया.

लेंस के जरिए मैंने देखा कि हाथों में लोहे की रॉड लिए लोग एक गुम्बद को तोड़ रहे थे. मैंने मुड़ के देखा तो आडवाणी और शेषाद्री के चेहरों पर परेशानी के भाव साफ नजर आ रहे थे. मगर मंच पर मौजूद दूसरे काफी नेता खुश लग रहे थे. ऐसा लगा कि आडवाणी विहिप नेताओं को ये समझने की कोशिश कर रहे हैं कि, ‘अब बहुत हो चुका उन्हें नीचे उतारें.लेकिन दूसरे नेता इतने से ही संतुष्ट नहीं थे. जैसे ही पहले गुम्बद में दरार पड़नी शुरू हुई उमा भारती, साध्वी तंभरा और सिंधिया ने नारा लगाया –एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो’. 

इसी समय मुझे खबर मिली कि बाकी फोटोग्राफरों की पिटाई हुई है. मुझे अहसास हुआ कि मैं सिर्फ अकेला फोटोग्राफर हूं जो गुंबदों के गिरने की तस्वीरें खींच सकता हूं. मैंने आडवाणी को प्रमोद महाजन से ये कहते हुए सुना, ‘जाओ देखो वहां क्या हो रहा है.आडवाणी एक बार भी मंच से हटे नहीं जबकि दूसरे नेता आते-जाते रहे. महाजन के वापस लौटने पर मैंने उन्हें ये कहते सुना – कुछ नहीं किया जा सकता. उन्होंने पीछे से रस्से बांध दिए हैं. वो गुम्बद को गिरा देंगे.

चूंकि मैंने पूरे दिन से कुछ खाया-पिया नहीं था इसलिए मुझे याद है एक कुर्सी पर बैठे-बैठे अचानक ही मेरा सिर एक ओर ढुलक गया था. तभी एक स्वामीजी मेरे पास आए और पूछने लगे तुम्हारा सिर क्यों झुका हुआ है? क्या तुम खुश नहीं हो?’ शाम 4.30 बजे तक दो गुम्बद धराशायी हो चुके थे. मैंने इनकी तस्वीरें ले ली थीं. शुरुआत में काफी अफरा-तफरी थी लेकिन जैसे-जैसे दिन चढ़ा

तोड़-फोड़ में भी कुछ व्यवस्था बनने लगी थी. इस बीच कुछ फोटोग्राफर भागकर मंच पर आ पहुंचे. उनमें से एक से मैंने लंबा वाला लेंस उधार मांग लिया. उसका कैमरा टूट गया था. मैंने आखिरी गुम्बद को झुकते हुए देखा, कुछ पलों तक वो झुका रहा और फिर जमीन से जा मिला. आखिरी गुम्बद का झुकते हुए कुछ देर के लिए रुकना और फिर भरभराकर गिर जाना, आज भी मेरे जेहन में ताजा है. मंच पर उल्लास का माहौल था. जल्द ही मुझे शहर के छोर पर धुआं दिखाई दिया. एक संत माइक पर चिल्लाए, ‘इन मुसलमानों को देखो, हमें बदनाम करने के लिए ये अपना घर खुद फूंक रहे हैं.बस कारसेवक उन्मत और अनियंत्रित हो गए.

जब मैं मंच से नीचे उतरा तो सड़कों पर चारों तरफ लकड़ी के लट्ठे और आग दिखाई दे रही थी. लोग हाथों में लाठियां और रॉड लहरा रहे थे. 7.30 बजे तक ज्यादातर पत्रकार वहां से जा चुके थे. मैं भी एक कार की व्यवस्था करके फैजाबाद लौट गया. अगले दिन जब मैं फिर से घटना के बाद के चित्र खींचने के लिए अयोध्या लौटा तो मैंने पाया कि वो टीला जहां मस्जिद खड़ी थी अब गुलाबी रंग की पट्टी से ढका हुआ था. वहां अस्थायी मंदिर बनना शुरू हो गया था.

आज 17 सालों बाद भी जो चीज मेरे मन में अमिट है वो गुम्बदों का एक के बाद एक गिरना नहीं बल्कि  उस संत के शब्द हैं जो उसने मुसलमानों के घरों से उठते धुंए को देखकर कहे थे. मैं आज भी सोचता हूं कि आखिर आडवाणी को उस माइक्रोफोन तक जाने से किसने रोका था? शायद उस समय उनकी एक अपील कई जानें बचा सकती थी.    

प्रशांत पंजियार
 
जाने-माने फोटोग्राफर प्रशांत पंजियार कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से संबद्ध हैं 

जसवंत का झटका बीजेपी हलाल

24 घंटे किसी मुद्दे की तलाश में लगे टीवी चैनलों के हाथों जैसे बैठे-बिठाए एक खजाना लग गया है. बीजेपी ने पिछले छह साल में इतने ब्रेकिंग न्यूज नहीं दिए जितने बीते एक महीने में दे चुकी है. सबसे पहले जसवंत के जिन्ना प्रेम की पट्टी लहराई- इस सवाल के साथ कि जिन्ना पर किताब लिखने के बाद क्या जसवंत का वही हाल होगा जो आडवाणी का हुआ था. सबको लग रहा था, शायद ऐसा न हो, क्योंकि जसवंत की आडवाणी जैसी हैसियत नहीं है, फिर जसवंत ने आडवाणी की तरह इस मुद्दे पर पार्टी में किसी बहस की मांग तक नहीं की.

इतने बड़े-बड़े धमाकों के बीच सुधींद्र कुलकर्णी, वसुंधरा राजे और भुवनचंद्र खंडूड़ी छोटे पटाखे साबित होकर रह गए. जब दिमाग में कैंसर का अंदेशा हो तो हाथ के फोड़े पर कौन ध्यान दे 

लेकिन बीजेपी चौंकाने पर जुटी थी. शिमला की चिंतन बैठक की पहली ही सुबह लहराई दूसरी पट्टी- जसवंत सिंह पार्टी से निकाले गए. इसके बाद का ड्रामा जसवंत सिंह का रहायाद दिलाते हुए और अफसोस जताते हुए कि बीजेपी ने तो उनकी किताब पढ़ी तक नहीं और उन्हें बाहर कर दिया. अगला दिन बीजेपी की साफ-सफाई में गुजरा- पार्टी की मूल विचारधारा से समझौता नहीं हो सकता. इस बीच पार्टी जसवंत का एक और गुनाह निकाल चुकी थी- पटेल की आलोचना का. जसवंत ने ही याद दिलाया कि सरदार पटेल ने तो संघ को प्रतिबंधित किया था.

लेकिन बीजेपी के लिए निरुत्तर कर देने वाले प्रश्न बचे हुए थे. अगले दिन संघ के पुराने नेता एचवी शेषाद्रि की किताब सामने आ गई जो कई साल से गुजरात में संघ से जुड़ी दुकान पर बिकती रही है. पटेल की लगभग वही आलोचना वहां है जैसी जसवंत सिंह की किताब में है. जैसे यह काफी न हो, पुराने सरसंघचालक केएस सुदशर्न इतिहास की गली में उतर गए और जिन्ना, नेहरू, पटेल और गांधी को भी साथ लिए टीवी चैनलों पर प्रगट हुए. इतिहास ने सुदशर्न को बताया था कि जिन्ना राष्ट्रवादी थे जो पटेल और नेहरू की अनदेखी से भटक गए. यही नहीं, उनके मुताबिक विभाजन के असली जिम्मेदार तो गांधी जी थे जो नेहरू की वजह से कमजोर पड़ गए. जो लोग कम पढ़ते हैं, वे जब इतिहास पढ़ते हैं तो क्या होता है, इसकी मिसाल बीजेपी और संघ परिवार है. इन सबके बीच एक पढ़ने वाले ने अपने गुस्से का इजहार किया. अरुण शौरी ने जो उपमाएं दे डालीं वे राजनाथ को ठीक से समझ में भी नहीं आई होंगी. हंप्टी-डंप्टी और एलिस इन ब्लंडरलैंड का मतलब ठीक से समझ पाते तो शायद अरुण शौरी के ख़िलाफ भी कार्रवाई कर डालते. बात यहीं नहीं रुकी. हल्ले के सबसे बड़े शिकार आडवाणी हो गए. पता चला कि कांधार मामले पर झूठ बोला था और 2002 के दंगों के बावजूद गुजरात में मोदी का बचाव किया था. यशवंत सिन्हा और बृजेश मिश्र तक हां हां करने लगे. इतने बड़े-बड़े धमाकों के बीच सुधींद्र कुलकर्णी, वसुंधरा राजे और भुवनचंद्र खंडूड़ी छोटे पटाखे साबित होकर रह गए. जब दिमाग में कैंसर का अंदेशा हो तो हाथ के फोड़े पर कौन ध्यान दे.

अंत में मोहन भागवत आए. कैमरों के फ्लैश चमकते रहे, टीवी चैनल इंतजार करते रहे, लेकिन भागवत की मूंछों के नीचे खिल रही मंद-मंद मुस्कान सारे राजों पर परदा डाले बैठी रही. अगले दो दिन में पता चला, संघ उत्तराधिकार का झगड़ा निबटाने में जुटा है. दूसरी पीढ़ी के नेता झंडेवालान में बैठे हैं और आडवाणी के लिए देर-सबेर गद्दी छोड़ने का आदेश है.

जसवंत सिंह ने ठीक कहा- यह कू क्लक्स क्लान है. ऐसा संगठन जो छुप कर काम करने और फैसले लेने में भरोसा करता है. लेकिन जसवंत से सहानुभूति क्यों हो? यही काम वे भी करते रहे. अब समझ पा रहे हैं कि संघ ऐसा संगठन है तो इसके पीछे भोलापन नहीं, कुछ और है. 

बहरहाल, टीवी चैनलों को बीजेपी का शुक्रिया अदा करना चाहिए. अरसे बाद टीवी पर राजनीतिक रिपोर्टिंग को इतनी महत्त्वपूर्ण हैसियत हासिल हुई. इस पूरे प्रकरण में सिर्फ बीजेपी के नहीं, दूसरे दलों के नाराज नेताओं के लिए भी एक संदेश है. अगर आपको यह शिकायत है कि राजनीतिक दलों में अंदरूनी लोकतंत्न नहीं है और पार्टी आपकी नहीं सुन रही तो कोई बात नहीं. मीडिया की शरण में चले जाएं. आपके गुस्से को आपकी उम्मीद से ज्यादा जगह मिलेगी. मीडिया के शानदार प्रबंधन के लिए जानी जाने वाली बीजेपी के होंठ सिले हुए हैं. उसके एक राष्ट्रीय प्रवक्ता बोल चुके हैं कि वे सिर्फ सूखे, स्वाइन फ्लू और महंगाई पर बोलेंगे, क्योंकि वास्तविक राष्ट्रीय समस्याएं यही हैं.

अपने संकट को छुपाने की, उससे आंख मिलाने से बचने की यह बेचारी सी कोशिश बताती है कि उन्हें अब भी मीडिया और लोकतंत्न पर नहीं, कू क्लक्स क्लान पर भरोसा है.

प्रियदर्शनलेखक एनडीटीवी इंडिया में समाचार संपादक हैं