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दिवाले के बावजूद दिवाली

गरीब आदमी दिया जलाता है तो अंबानी बनने के लिए नहीं. और अंबानी भी दिवाली का दिया जलाता है तो बफेट या बिल गेट्स से आगे निकलने के लिए नहीं. लक्ष्मी ईर्ष्या बढ़ाने वाली देवी तो कही गई है लेकिन वह मात्र धन की देवी नहीं हैमंदी हो कि महामंदी. और दिवाली का त्योहार मनाने के लिए सभी जरूरी चीजों के दाम मेहनतकश आदमी की पहुंच से भले ही बिल्कुल ऊपर निकल गए हों. भारत के गरीब आदमी ने फिर भी दिवाली की रात दिया जलाया. कवियों और आध्यात्म वालों ने इसे अंधेरे पर आदमी की अटूट और अमर उजियारी आत्मा की विजय आदि कहा है. लेकिन भावना और आत्मा की बातें एक बार आप छोड़ दें और दिए को आप लक्ष्मी और समृद्धि की भौतिक कामना ही मानें तो भी यह कम महत्व की बात नहीं है कि अपने देश में दिवाली धनपतियों का विशिष्ट त्योहार नहीं है. एक कहावत में अपने यहां त्योहारों का कुछ वैसा ही जातिगत बंटवारा चला आ रहा है जैसा साहित्य की विधाओं का कहते हैं कि राजेन्द्र यादव ने हाल ही में किया है. जैसे रक्षा बंधन ब्राम्हणों का, विजयादशमी क्षत्रियों का दिवाली वैश्यों का और होली शूद्रों का त्योहार कहा जाता है. लेकिन लोक जीवन में तो ऐसा बंटवारा और जातिवाद अपन ने कहीं और कभी देखा नहीं. राखी भाई बहन का, दशहरा राम रावण का, दिवाली दियों का और होली रंगों का त्योहार है कहीं भी चले जाइए.

गरीब आदमी दिया जलाता है तो अंबानी बनने के लिए नहीं. और अंबानी भी दिवाली का दिया जलाता है तो बफेट या बिल गेट्स से आगे निकलने के लिए नहीं. लक्ष्मी ईर्ष्या बढ़ाने वाली देवी तो कही गई है लेकिन वह मात्र धन की देवी नहीं है. ऐसा होता तो धन तेरस और लक्ष्मी पूजन दो अलग-अलग दिनों पर नहीं होता. धन और लक्ष्मी एक ही  होतीं तो उनकी पूजा एक ही दिन होती. ऋग्वेद का श्री सूक्त पढ़ें और मनन करें – जिससे कि लक्ष्मीउपासना का चलन चला तो आप पाएंगे कि श्री, धन से कहीं अधिक है. बल्कि श्री के ऐसे कई रूप हैं जो धन से खरीदे ही नहीं जा सकते.

धन और लक्ष्मी को एक किया है पूंजीवाद ने. श्रम को पूंजी से ज्यादा महत्व देने वाले मार्क्सवाद या साम्यवाद या समाजवाद ने भी लक्ष्मी को गाय के खुर या गोबर में रहते हुए नहीं दिखाया है जैसा कि धन धान्य को लक्ष्मी बताने वाली भारतीय परंपरा ने. मार्क्स को पूंजी के अकूत भंडारण या जमाव से कोई एतराज नहीं है. वे बस उस पर नियंत्रण कुछ पूंजीपतियों का नहीं समाज या राज्य का चाहते हैं. उन्हें उत्पादन की ऐसी ही टेक्नॉलॉजी चाहिए जो खूब और अतिरिक्त पूंजी बनाती हो. इस माने में पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों ही औद्योगिक क्रांति की देन हैं. एक ही सिक्के के दो पहलू. दोनों ही मानने से इनकार करते हैं कि असमानता और अन्याय पूंजी के इस भंडारण से अनिवार्य है और वही समता, न्याय, बंधुत्व और स्वतंत्रता का सपना पूरा नहीं होने देता.

औद्योगिक क्रांति से यह सब संभव हुआ और औद्योगिक सभ्यता ने खेती को जीवन शैली और संस्कृति नहीं रहने दिया. अनाज पैदा करने का साधन मात्र बना दिया. धरती माता नहीं रह गई अनाज पैदा करने की मशीन बना दी गई

लेकिन यहां मेरी चिंता पूंजीवाद या साम्यवाद नहीं है. मैंने बात दिवाली की रात जले गरीब के दिए से की थी. गरीब का दिया हर आदमी की सर्वव्यापी, सार्वकालिक और सर्व विद्यमान इच्छा है जो लक्ष्मी पर अपने मनुष्य होने भर से अधिकार जताती है. इस इच्छा को आप नकार नहीं सकते और इसलिए अपको ऐसी व्यवस्था बनानी पड़ेगी जो हर घर को जगमगाए और सब में लक्ष्मी का वास हो. ऐसी व्यवस्था पूंजी का कुछ तिजोरियों में भंडारण होने से नहीं बन सकती. इसके लिए तो आपको विकेंद्रित उत्पादन और विकेंद्रित वितरण चाहिए. केंद्रित उत्पादन और केंद्रित वितरण लक्ष्मी को हर घर में पहुंचने नहीं देता. विषमता उसके मूल में और अनिवार्य है.

जिस व्यवस्था में से दिवाली का त्योहार निकला और चला वह कृषि संस्कृति है. खेती में से पूंजीवाद नहीं निकला है. खेती में से उतनी तेजी से और इतना विशाल उत्पादन नहीं हो सकता है कि खूब पूंजी जमा हो सके. औद्योगिक क्रांति से यह सब संभव हुआ और औद्योगिक सभ्यता ने खेती को जीवन शैली और संस्कृति नहीं रहने दिया. अनाज पैदा करने का साधन मात्र बना दिया. धरती माता नहीं रह गई अनाज पैदा करने की मशीन बना दी गई. यूरोप से किसान निकले और एशिया, अफ्रीका, अमेरिका जहां कहीं भी जमीन दिखी उस पर कब्जा कर के वहां के किसानों को गुलाम और मजदूर बना लिया. कारखाने की तरह खेती करवाने वाले नए मालिकों को अपनी नई जमीन से वह लगाव नहीं था जो उनके मूल निवासियों का था. इसलिए खेती तो रही किसानी धीरे धीरे समाप्त हुई. डेढ़ सौ साल में मशीन और उद्योग ने अपनी कोई संस्कृति तो बनाई नहीं कृषि संस्कृति को नष्ट जरूर कर दिया.

साम्राज्यवादियों के कोई डेढ़ सौ साल तक किए गए औद्योगीकरण के बावजूद भारत में किसानी और कृषि संस्कृति बची रह गई. आजादी के साठ साल में खुद हमने अपने पुराने शासकों की नकल में जो कुछ औद्योगीकरण किया है उससे खेती और किसानी की जितनी हानि हुई है पिछले दो सौ साल में नहीं हुई थी. खास कर पिछले अठारह साल में जब से हम नवउदार पूंजीवाद के रास्ते पर चल निकले हैं. इन वर्षों में खेती और किसानी दोनों ही बरबाद हुए हैं. गांव उजड़ रहे हैं. महानगरों में भीड़ बढ़ रही है. गांवों से उजड़ कर आए ज्यादातर लोग महानगरों के अवैध नागरिक हैं. उनकी बस्तियां गंदी और अवैध हैं. वे कथित औद्योगिक सभ्यता की खुरचन पर जी रहे हैं.

नव उदार वाद में पूंजी को तो कहीं भी आने जाने और कमाने गंवाने की छूट है लेकिन मजदूर और किसान यूरोप के पुराने किसानों की तरह दुनिया में कहीं भी जा कर उपनिवेश नहीं बना सकते. ऐसे में आप अपनी खेती किसानी को बरबाद कर के उसे उद्योग बनाने के लिए उद्योग घरानों को दे तो सकते हैं लेकिन कोई सत्तर करोड़ लोगों का क्या करेंगे. वे यूरोप, अमेरिका आदि विकसित देशों की कुल आबादी से भी ज्यादा हैं. दुनिया भर के सारे उद्योग मिल कर भी इतने लोगों को उत्पादक रोजगार और इज्जत की जिन्दगी नहीं दे सकते. फिर नव उदारवाद ने दुनिया भर में जो ग्रोथ की है वह रोजगार को तो घटा कर ही की है. जॉबलेस ग्रोथ. इस ग्रोथ से जो दौलत बनी है उसके समान वितरण की तो कोई व्यवस्था है नहीं. इसलिए भारत में ही नहीं दुनिया में सब जगह अमीर और अमीर और गरीब और गरीब हुए हैं. यह व्यवस्था अमीर को तो हड़प कर तेजी से बल्कि रातों रात कुबेर होने का इंतजाम और छूट देती है. लेकिन अमीरी के रिस कर नीचे तक जाने के लिए धीरे धीरे रिसने का धीरज रखने को कहती है. लेकिन यह भी गरीबों का दिल बहलाने के लिए है. दरअसल इस व्यवस्था में ऐसा कुछ नहीं है कि जो ग्रोथ हो रही है वह अपने आप समान रूप से नहीं तो न्यायिक रूप से ही सब में बंट जाए. पूंजी वाले उसी और उतने ही पानी को रिसने देते हैं जो उनके अमीरी के तालाब में समा ही नहीं सकता है.

इसलिए खेती किसानी को उजाड़ कर और औद्योगीकरण से डबल डिजिट ग्रोथ कर के इकनॉमिक सुपर पॉवर बनने का जो सपना हमारे शासक और मध्यवर्ग के लोग देख रहे हैं वह दरअसल अपने ही देश को अपना उपनिवेश बनाने की तैयारी है. इसमें अपने ही दस प्रतिशत लोग नए अंग्रेज बन कर बाकी के नब्बे प्रतिशत लोगों पर राज करेंगे. दस प्रतिशत लोगों की सुपर अमीरी किसी देश को आर्थिक सुपर पॉवर तो बना नहीं सकती. गरीबी के पिरामिड पर अमीरी का त्रिशूल या गरीबी के समुद्र में अमीरी के टापू कब तक टिके रह सकते हैं? दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आने के साल भर बाद ही इलाहाबाद के म्योर कॉलेज की इकनॉमिक सोसायटी को महात्मा गांधी ने कहा था कि एक देश की सुव्यवस्था और समृद्धि उसके खरबपतियों की गिनती से नहीं आंकी जा सकती बल्कि ये उसमें किसी के भी भूखे न रहने से तय होती है. इस कसौटी को लगाएं तो अपनी असलियत बिना बताए उजागर हो जाती है.

हम अमेरिकी पत्रिकाओं फोर्ब्स और फॉरचून के चक्कर में अपने खरबपतियों की दौलत और कंपनियों के तल ढूंढ़ते रहते हैं. देखना नहीं चाहते कि गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी कितनी बढ़ रही है. कई बार लगता है कि मीडिया और सोच-समझ वालों का ध्यान अमीरों पर है भले ही वे गिनती के हों और उन अनगिनत लोगों की जैसे जानबूझ कर अनदेखी की जाती है जिनके पास कुछ नहीं है. न खोने के लिए न पाने के लिए. लेकिन इस से इस देश की वास्तविकता तो बदल नहीं जाती. जब तक सब लोगों के पास लक्ष्मी नहीं आती यह देश लक्ष्मीपति नहीं हो सकता. इंग्लैण्ड में जा बसे लक्ष्मी मित्तल के लक्ष्मीपति होने से भारत के खरब लोगों की समृद्धि नहीं हो सकती. यूरोप और अमेरिका उद्योग से बन गए होंगे लेकिन भारत में तो खेती किसानी और औद्योगिकता का सुखद और सुनहरा समन्वय करना होगा नहीं तो यह देश बन नहीं सकता. इसके लिए खेती और किसानी को अलग होना होगा और औद्योगीकरण का  चला आ रहा साम्राज्यवादी मॉडल भी बदलना होगा. गए साल जब पन्द्रह सितम्बर को वॉल स्ट्रीट में वित्तीय नव उदार पूंजीवाद का दिवाला निकला तब मौका था कि हम अपनी आर्थिक नीतियों को रीगन-थैचर की वाशिंगटन सहमति से निकाल कर नई भारतीय सहमति से जोड़ें. पर अपने लिए अपना नया रास्ता निकालने की इच्छा और हिम्मत अपने शासकों में नहीं है.

दिवाली की रात जला गरीब का दिया मगर अब भी टिमटिमा रहा है. न उसने अंधेरे से हार मानी है न अपने नीति निर्धारकों के अंधत्व से. गरीब के उस दिए ने ही भारत को अंधेरे में डूबने से बचाया है. महानगरों के मॉलों और सुपर बाजारों की चकाचौंध तो यों भी उतर गई है. टिका तो वही गरीब का दिया है. तुम न देखो उसकी ओर. तुम्हें अंधेरे से बचाने की ग्यारंटी तो वही दे रहा है.  

अभी बहुत कुछ किया जाना है

कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनकरन का प्रकरण न्यायपालिका में सुधार की तीन सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों की ओर हमारा ध्यान खींचता है: पहली, उच्च स्तर की न्यायिक व्यवस्था की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार की; दूसरी, न्यायपालिका के किसी सदस्य पर भ्रष्ट आचरण का संदेह होने पर उसकी जांच के लिए उचित व्यवस्था के निर्माण की और तीसरी, भ्रष्टाचार के आरोप सही पाए जाने पर उचित कार्रवाई हो सके ऐसी प्रक्रियाओं और व्यवस्था की स्थापना की.

क्या कानून के मुताबिक चलकर देश के 100 करोड़ से ज्यादा लोगों की किस्मत का फैसला करने वाले खुद भी कानून से बंधे हैं?

जस्टिस दिनकरन पर आरोप हैं कि वे वेल्लौर और तिरुवल्लूर जिले में कानूनन निर्धारित सीमा से दसियों गुना ज्यादा भूमि के स्वामी हैं (तमिलनाडु में एक परिवार अधिकतम 15 एकड़ जमीन का मालिक हो सकता है जबकि अकेले वेल्लौर जिले के कावेरीराजपुरम में ही कथित तौर पर उनके परिवार की 400 एकड़ से ज्यादा भूमि है). बताया जाता है कि इसके भी एक बड़े हिस्से पर उनका कब्जा पूरी तरह से अवैध है और इस अवैध कब्जे में से भी कुछ ऐसी सरकारी भूमि है जो केवल गरीब भूमिहीन ग्रामीणों को ही दी जा सकती थी और कुछ पर कभी आम जनता द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले रास्ते, झील और पानी की धाराएं हुआ करती थीं. दिनकरन पर अनुचित न्यायिक आदेश देने के भी आरोप हैं.

मगर सुप्रीम कोर्ट के 5 वरिष्ठतम न्यायाधीशों के समूह (सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम) ने अगस्त 2009 में जस्टिस दिनकरन को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाए जाने की सिफारिश सरकार से कर दी. आम तौर पर इस तरह के निर्णयों की जानकारी राष्ट्रपति द्वारा नोटिफिकेशन जारी होने के बाद ही होती है मगर जस्टिस दिनकरन की पदोन्नति की भनक किसी तरह अखबारों को लग गई और उसके बाद उनसे संबंधित तमाम बातें सामने आ गईं. अब कॉलेजियम ने उनकी नियुक्ति के निर्णय पर रोक लगाकर उनसे इस मामले में स्पष्टीकरण मांगा है. मगर सवाल ये उठता है कि यही कार्य पहले क्यों नहीं किया जा सकता था? इसका मतलब नियुक्ति की वर्तमान व्यवस्था ठीक नहीं है जो सर्वोच्च न्यायालय ने 1993 में एक निर्णय के जरिए कार्यपालिका से अपने हाथ में ले ली थी. वैसे भी सर्वोच्च न्यायालय के अति-व्यस्त पांच जजों से नियुक्तियों में हर चीज का ध्यान रखे जाने की उम्मीद रखना कतई तर्कसंगत नहीं है.

इस तरह के मामलों में इसके आगे यदि मुख्य न्यायाधीश को जरूरत महसूस होती है तो वे जांच के लिए जजों की एक समिति बना सकते हैं और आरोप सही पाए जाने पर न्यायाधीश महोदय से पहले तो खुद ही अपना पद छोड़ देने का निवेदन और ऐसा न होने पर उनके खिलाफ संसद में महाभियोग चलाए जाने की संस्तुति कर सकते हैं. या फिर 100 सांसदों द्वारा संसद में प्रस्ताव पारित किए जाने पर ऐसा किया जा सकता है. मगर पक्का कुछ नहीं है. हो सकता है जज साहब को केवल पदोन्नति न देने को ही दंड मान लिया जाए या फिर जस्टिस रामास्वामी की तरह महाभियोग का मामला ही टांय-टांय फिस्स हो जाए या फिर..

क्या कानून के मुताबिक चलकर देश के 100 करोड़ से ज्यादा लोगों की किस्मत का फैसला करने वाले खुद भी कानून से बंधे हैं? सोचना होगा!

संजय दुबे 

रूहानी आवाज

लता मंगेशकर, उम्र: 80,  लोकप्रिय गायिका

उम्र का सफर भले ही आठ दशक पूरे कर चुका हो मगर लता मंगेशकर की आवाज सुनकर ऐसा नहीं लगता. वे आज भी गाती हैं और लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते हैं. जितना वे अपनी सम्मोहक आवाज के लिए जानी जाती हैं उतना ही अपने संकोची स्वभाव के लिए भी. पिछले कुछ साल से उनकी दुनिया अपने और संगीत तक ही सीमित हो गई है. जाने-माने गायक सुरेश वाडकर कहते हैं, ‘उनका गाया हर गीत ईश्वर के साथ संवाद जैसा है.’ गायक और संगीतकार शंकर महादेवन कहते हैं, ‘इतनी तजुर्बेकार होने के बावजूद लताजी में कभी भी अतिआत्मविश्वास नहीं दिखता.’

शायद काम के प्रति इस तरह समर्पण और श्रोताओं का प्यार ही लताजी को रिटायर नहीं होने देता.

ईशा मनचंदा

अविरत योगी

‘काम से रिटायर होने के बाद कुछ लोग ताश तो कुछ गोल्फ खेलकर वक्त बिताते हैं. ईश्वर की कुछ ऐसी कृपा रही है कि मेरे लिए मेरा काम ही मेरा शौक रहा है. हर कोई ये नहीं कर सकता’

बीकेएस अयंगार, उम्र: 92

जाने-माने योग शिक्षक 

 

 

 

 

 

 

 

14 किताबें लिख चुके हैं.पश्चिमी दुनिया को योग से परिचित कराने का श्रेय इन्हें ही दिया जाता है. रोज आधे घंटे तक शीर्षासन और 20 मिनट तक सर्वांगआसन करते हैं. योग की शिक्षा के लिए आज भी उनका विदेश आना-जाना होता रहता है

लेखन कार्य और पत्रों का जवाब देने के लिए योगाचार्य बीकेएस अयंगार हर दोपहर पुणे स्थित अपनी लाइब्रेरी में बैठते हैं. नजदीक ही पड़ी मेजों पर कुछ छात्र भी होते हैं. इनमें से कुछ जब अयंगार से कोई सवाल पूछते हैं तो योगाचार्य के गंभीर चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ जाती है. वे हर तरह के सवाल का जवाब मुस्कराते हुए देते हैं. अयंगार का काफी बड़ा परिवार है. उनका दिन तड़के ही शुरू हो जाता है. सबसे पहले स्नान करने के बाद वे कॉफी पीते हैं और फिर प्राणायाम करते हैं. सवा नौ बजे उनका निजी योगाभ्यास शुरू होता है. दिन और रात के भोजन में वे सादी दाल, चावल और दही लेते हैं. सोने से पहले उन्हें टीवी पर खबरें देखने की आदत है.

अयंगार और योग का साथ बचपन से ही रहा है. औपचारिक रूप से उन्होंने योग प्रशिक्षण 1984 में छोड़ दिया था मगर उनके निजी योगाभ्यास के घंटों में आज भी कोई कमी नहीं आई है. जैसा कि वे कहते हैं, ‘पहले मैं योग करता था और सिखाता भी था. योग अब भी करता हूं मगर अब सिखाने की जगह ऐसी नई चीजें सीखने की गतिविधि ने ले ली है जो मैं अपने छात्रों तक पहुंचा सकूं.’ उम्र के नौ दशक पूरे कर लेने के बाद भी उनकी आवाज और चाल में कोई बदलाव नहीं आया है. कुछ महीने पहले वे रूस में थे जहां उन्होंने 840 छात्रों की एक कक्षा को योग सिखाया. उनकी याद्दाश्त बहुत तेज है. वे कहते हैं, ‘अगर मैं कहने लगूं कि मुझसे चला नहीं जा रहा या मैं खड़ा नहीं हो सकता तो ये नकारात्मक तनाव होगा. मैं अब भी यही कहता हूं कि मैं युवा हूं और यही सोच मुझे सुखी रखती है.’

वेद अग्रवाल 

हरियाली का हरकारा

अगर आपने अपने अहं को बढ़ने दिया तो ये आपका नाश कर देगा. ये आपके विकास में रोड़े अटकाता है. मैं अपनी 19 साल की पोती से भी काफी कुछ सीखता हूं

एमएस स्वामीनाथन, उम्र: 84
कृषि वैज्ञानिक

 

श्रीलंका की सरकार ने हरित क्रांति के जनक स्वामीनाथन को अपने यहां आमंत्रित किया था ताकि वह उनकी विशेषज्ञता का लाभ उठा सके. मगर तमिलनाडु में इसके विरोध में प्रदर्शन हुए जिसके बाद उन्होंने वहां जाने से मना कर दिया. भारतीय हरित क्रांति के जनक एमएस स्वामीनाथन से जब कोई सफलता का मंत्र पूछता है तो उनका एक ही जवाब होता है, जो भी करें, उसमें अपने प्रयास को सर्वश्रेष्ठ रखें, कोई भी काम सिर्फ पुरस्कार या पैसे के लिए न करें.

गीता से निकला यह दर्शन 84 की उम्र में भी स्वामीनाथन को युवाओं जैसा गतिमान रखे हुए है. राज्य सभा सांसद और चेन्नई स्थित एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन के इस मुखिया का दिन सुबह तड़के चार बजे शुरू हो जाता है. सुबह वे आधे घंटे तक सैर करते हैं और इस दौरान वे श्लोकों का पाठ करते रहते हैं जो कि उनके मुताबिक उनके अहं पर लगाम लगाकर रखता है. वे कहते हैं, ‘अगर आपने अपने अहं को बढ़ने दिया तो ये आपका नाश कर देगा. ये आपके विकास में रोड़े अटकाता है. मैं अपनी 19 साल की पोती से भी काफी कुछ सीखता हूं.

स्वामीनाथन की दिनचर्या बहुत व्यस्त रहती है. कई आयोजनों में हिस्सा लेने के लिए उन्हें नियमित रूप से अंतर्राष्ट्रीय यात्राएं भी करनी पड़ती हैं. इसके बावजूद उन्होंने कामकाजी और निजी जीवन के बीच तालमेल बनाकर रखा है. ज्यादा मात्रा में भोजन करने से बचने वाले स्वामीनाथन बताते हैं, ‘मैं शाम अपने परिवार के साथ बिताता हूं. मेरी जीवन-शैली सादी है.

इस जाने-माने कृषि वैज्ञानिक के बारे में सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात है काम के प्रति उनका जुनून. हम उनसे उनके जीवन-दर्शन के बारे में पूछते हैं और उनका जवाब आता है, ‘मुझे जिंदगी में किसी से कोई शिकायत नहीं रही. मेरे मन में किसी के लिए कोई कड़वाहट नहीं.

पीसी विनोज कुमार

मूल आलेख के लिए क्लिक करें अक्षय घट ऊर्जा के 

 

सुर और सुंदरता का साधक

पंडित जसराज, उम्र: 79   शास्त्रीय गायक

रियाज करते वक्त वे टीवी चलाकर उसकी आवाज बंद कर देते हैं, ताश के पत्ते बिस्तर पर बिछा देते हैं और फिर गाने बैठ जाते हैं. देश के वरिष्ठतम शास्त्रीय संगीतकारों में से एक पंडित जसराज मंच पर आते ही आशीर्वाद की मुद्रा में दोनों हाथ ऊपर उठा देते हैं. मगर उनका भाव ये नहीं होता. जैसा कि वे कहते हैं, ‘लोग सोचते हैं कि मैं साधु बनने की कोशिश कर रहा हूं. पर ऐसा कुछ नहीं है. ये मुद्रा तो उस ईश्वर के आलिंगन का संकेत है जो सबके अंदर उपस्थित है और ये स्वभाव मुझमें अनजाने में ही आ गया है.’ पं. जसराज अपनी धीरता और संगीत की ताकत का ज्यादातर श्रेय अपनी अगाध श्रद्धा को देते हैं. वे बताते हैं, ‘युवावस्था में मैं हनुमान भक्त था,’ मगर अब वे खुद को गहराई से कृष्ण के साथ जुड़ा हुआ महसूस करते हैं. उनके व्यक्तित्व में कृष्ण जैसे लक्षण भी हैं. वे विनोदप्रिय हैं और शांतचित्त भी. वे कहते हैं, ‘सुंदरता देवत्व का एक रूप है. सुंदर युवा नारी अधखिले फूल की तरह होती है. सुंदरता का आंखों से रसपान आपको युवा बनाए रखता है.’ 

पंडित जसराज के मुताबिक निजी तौर पर उनकी जिंदगी किसी अविवाहित व्यक्ति की तरह है. वे कहते हैं, ‘बेडरूम में मैं अपने कपड़े इधर-उधर फेंक देता हूं.’ वे स्वीकार करते हैं कि शास्त्रीय संगीतकार बदलावों के साथ तालमेल बिठाने में वक्त लेते हैं. वे बताते हैं, ‘लेकिन बदलाव ही जीवन है. जो खुद को इसके हिसाब से बदल लेता है वही जिंदा रहता है. मैं किस्मत वाला हूं कि उम्र बढ़ने के साथ मेरी आवाज में बहुत कम बदलाव आया है. ये जरूर है कि अब मैं वे चमत्कार नहीं कर सकता जो मैं अपनी जवानी के दिनों किया करता था मगर ये बात भी अपनी जगह है कि उन दिनों मुझे उन करामातों की जानकारी भी नहीं थी जो मैं अब किया करता हूं.’  

तृषा गुप्ता    

काम अविराम

रोज एक घंटे की साइकिल सैर करना कभी नहीं भूलते. ये बात अलग है कि बंदूकों से लैस कमांडो से घिरे इस शख्स को ये सैर मजबूरी में घर के लॉन में ही करनी पड़ती है

केपीएस गिल उम्र: 75  पंजाब पुलिस के पूर्व  महानिदेशकगिल की जिंदगी अब उस गोली वाली रफ्तार से तो नहीं भाग रही जिसका अनुभव उन्हें असम और पंजाब में तैनाती वाले दिनों में होता था. मगर उम्र के 75 पड़ाव पूरे कर चुका ये शख्स अब भी इसका उतना ही आनंद ले रहा है पंजाब पुलिस के मुखिया वाले दौर के बाद घर-घर में चर्चित केपीएस गिल से जब हम पूछते हैं कि क्या उन्हें लगता है कि वे बूढ़े हो रहे हैं तो वे कहते हैं, ‘बिल्कुल नहीं.’ जब हम उनसे पूछते हैं कि इस उम्र में भी उनकी ऊर्जा का राज क्या है, तो वे चीजों की एक लंबी लिस्ट गिना देते हैं-कविता से लगाव, अच्छी संगत, समय-समय पर मिलने वाली चुनौतियां, मानसिक मजबूती वगैरह वगैरह.

गिल को उस शख्स के तौर पर जाना जाता है जिसने पंजाब में आतंकवाद पर उस वक्त लगाम लगाई जब ये अपने सबसे हिंसक दौर में था और जब खालिस्तान के नाम पर राज्य में हिंदुओं की नृशंस हत्याएं हो रही थीं. हालांकि वे विवादों में भी खूब रहे. कभी मानवाधिकारों के उल्लंघन, कभी एक वरिष्ठ महिला नौकशाह के चिकोटी काटने तो कभी 2002 नरसंहार के बाद नरेंद्र मोदी का एडवाइडर  बनने के लिए. भारतीय हॉकी संघ के अध्यक्ष के तौर भी उनका कार्यकाल विवादों का विषय रहा है.छह फीट लंबे इस पूर्व पुलिस अधिकारी के लिए रिटायरमेंट विराम बनकर नहीं आया है. उनकी रफ्तार अब भी कायम है. वे बताते हैं कि जब वे एक दैनिक अखबार के लिए नक्सलवाद पर लेख नहीं लिख रहे होते तो वे वृंदावन में होते हैं जहां वे गरीब बच्चों के साथ वक्त बिताते हैं. गिल इन बच्चों को मुफ्त चिकित्सा सहायता भी देते हैं. गाहे-बगाहे अलग-अलग मुद्दों पर वे खबरिया चैनलों के पर्दे पर भी प्रकट होते रहते हैं.हां, ये बात जरूर है कि उनकी जिंदगी अब उस गोली वाली रफ्तार से नहीं भाग रही जैसी असम और पंजाब पुलिस के मुखिया के तौर पर तैनाती के दौरान भागा करती थी. इस रफ्तार में थोड़ी सी कमी जरूर आई है. मगर फिर भी गिल इसका आनंद ले रहे हैं. हालांकि दिल्ली के लुटियन जोन स्थित उनके बंगले में उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच रहना पड़ता है.

वे दुश्मनों के निशाने पर हैं और इसलिए बंदूक थामे कमांडो हर पल उनकी सुरक्षा में तैनात रहते हैं. उस दौरान भी जब वे अपने घर के हरे-भरे लॉन में एक घंटे की साइकिल सैर कर रहे होते हैं जो कि उनकी दिनचर्या का एक अभिन्न हिस्सा है.गिल आज भी जिंदगी को पूरी जिंदादिली के साथ जी रहे हैं. लोग अब भी उनसे मिलने आते रहते हैं. एक वक्त था जब दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में उनका नियमित आना-जाना हुआ करता था मगर अब वे इसकी बजाय किताबों को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं और उनके वक्त का अच्छा-खासा हिस्सा इनकी संगति में बीतता है. वे कहते हैं, ‘किताबें हमेशा मुझे उत्साहित करती हैं.’वैसे गिल अगर पीछे मुड़कर देखें तो कई किताबें तो अपनी यादों के आधार पर ही लिख सकते हैं. 

हरिंदर बवेजा 

मूल आलेख के लिए क्लिक करें अक्षय घट ऊर्जा के

जो देखा सो लिखा

लिखने का काम वे रात के 11 से सुबह के साढ़े चार बजे तक करती हैं, अखबार का संपादकीय पढ़ने के लिए जागती हैं और फिर दोपहर का ज्यादातर वक्त सोने में बिताती हैं.

कृष्णा सोबती, उम्र:84   साहित्यकार

कृष्णा सोबती इस सवाल का जवाब तो नहीं देतीं कि क्या उन्होंने इस उम्र के बारे में सोचा था मगर उनके असाधारण उपन्यास ए लड़की, जो कि मुख्य रूप से कभी भ्रम और कभी वास्तविकता में जीने वाली एक बूढ़ी महिला के नजरिए से लिखा गया है, से इसका ठीक-ठाक संकेत मिल जाता है कि वे इस बारे में क्या सोचती थीं. और शायद उन्होंने इसके लिए खूब कोशिश भी की है कि उनका हाल इस किरदार के जैसा न हो.

इसलिए सोबती 84 साल की उम्र में भी जीवंतता से भरपूर हैं. बीजेपी की उठापटक से लेकर दूसरे तमाम मुद्दों पर वे खुशी से बात करने के लिए तैयार रहती हैं और उनमें किसी छोटी बच्ची जैसा रोमांच दिखता है. उनकी उत्सुकता भी एक वजह है कि वे समय के साथ तालमेल बनाने में कामयाब हैं. पहाड़ों से उन्हें बहुत लगाव है. वे कहती हैं, ‘लिखते-लिखते जब कभी मैं अटक जाती हूं तो किसी हिल स्टेशन पर चली जाती हूं और फिर साफ सोच के साथ वापस आती हूं.’

हालांकि उम्र के साथ उनकी जिंदगी में कुछ बदलाव भी आए हैं. जैसा कि वे बताती हैं, ‘मुझे पता है कि अब मैं लद्दाख में ट्रैकिंग करने नहीं जा सकती जबकि मैंने 65 साल की उम्र तक भी इसका लुत्फ उठाया है. पहले मैं रोज सैर के लिए जाया करती थी मगर अब मैं मुश्किल से ही ऐसा कर पाती हूं. लेकिन हर मौसम खत्म होता है. ये सब सोचने का कोई फायदा नहीं. मैंने बहुत अच्छा वक्त बिताया है.’

उनकी बात सही है. आज के पाकिस्तान में पैदा हुई सोबती शिमला और दिल्ली में बड़ी हुईं. उनके पिता सिविल सेवा में थे. वे बताती हैं, ‘मैं इस मायने में खुशकिस्मत रही हूं कि मैंने तीनों दौर देखे – ब्रिटिश राज, आजादी और आधुनिक. और मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि मैं सिर्फ एक प्रत्यक्षदर्शी हूं.’ 1920 की दिल्ली को बयां करते दिलोदानिश  से लेकर पंजाब की मिट्टी में घुले जिंदगीनामा तक सोबती का काम उनकी इस बात की पुष्टि करता है कि वे इतिहास में सिर्फ एक प्रत्यक्षदर्शी नहीं बल्कि भागीदार रही हैं. उनकी आने वाली किताब मार्फत दिल्ली 1950 से 1970 तक शहर के साहित्यिक परिदृश्य पर है.

सोबती हमेशा से खुद को महिला साहित्यकार के खांचे तक सीमित किए जाने का विरोध करती रही हैं. उनका मानना है कि रचनात्मक होने के लिए आपको अपने भीतर छिपे पुरुष और स्त्री, दोनों पहलुओं तक पहुंचने की जरूरत होती है. निजी जीवन में वे उन घरेलू कामों से दूर रही हैं जिन्हें सिर्फ स्त्रियों की जिम्मेदारी माना जाता है. अपनी नर्म मगर स्पष्ट आवाज में वे कहती हैं, ‘रोजमर्रा के घरेलू काम औरत की ऊर्जा छीन लेते हैं. अगर आपके संसार की सीमा परिवार से आगे नहीं जाती तो आप की सोच बड़ी नहीं हो सकती.’

दुनिया की नब्ज को समझते रहना सोबती को अहम लगता है. वे कहती हैं, ‘बतौर लेखक कभी-कभी आपको कटे रहने की जरूरत होती है मगर जब रात को आप लिखने बैठते हैं तो मेज पर आपके साथ सारी दुनिया होनी चाहिए.’

तृषा गुप्ता

रंगरसिया

मकबूल फिदा हुसैन की पेंटिग्स भले ही करोड़ों में बिकती हों मगर वे जमीन पर बिछे एक साधारण से गद्दे पर सोते हैं. कूची लेकर चलने वाले हुसैन की उंगलियां लगातार किसी काल्पनिक तबले पर थिरकती रहती हैं.

मकबूल फिदा हुसैन, उम्र: 94 चित्रकार

1968 में राममनोहर लोहिया के सुझाव पर उन्होंने आठ साल की अवधि में रामायण पर 160 पेंटिग्स बनाईं. किसी भी बड़े प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले गणेश की तस्वीर बनाने वाले हुसैन इन दिनों अरबी भाषा सीख रहे हैं. एमएफ हुसैन क्या हैं इसका जवाब वे खुद ही दे देते हैं. तहलका को दिए एक इंटरव्यू में वे कहते हैं, ‘भारत एक विशाल सरकस है और मैं इसका रंगीला जोकर हूं.’ उम्र के 94वें पड़ाव पर भी हुसैन मजाक का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते. अब भी उनकी जादुई उंगलियां किसी काल्पनिक तबले पर लगातार थिरकती रहती हैं. लगता है जैसे थकान जैसी कोई चीज उन्हें छू तक नहीं गई. आज आबू धाबी में हैं तो कल कतर में. गर्मियां लंदन में बीत रही हैं तो सर्दियां दुबई में. समय के साथ उनकी अनवरत यात्रा जारी है. आजकल वे अरबी भाषा सीख रहे हैं और साथ ही तीन विशाल प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहे हैं. उन्हें अरबी और भारतीय सभ्यता व भारतीय सिनेमा पर चित्रों की एक श्रंखला बनानी है.

हुसैन बड़े दिलचस्प इंसान हैं. उनकी एक-एक पेंटिंग भले ही करोड़ों में बिकती हो मगर अकूत संपदा का ये स्वामी अपने ड्राइंग रूम में जमीन पर बिछे एक साधारण से गद्दे पर सोता है और नंगे पैरों से अकेले ही दुनिया भर की यात्रा करता है. उनकी भतीजी साबिहा कहती है, ‘जब चाचा घर पर होते हैं तो सांस लेने का भी वक्त नहीं होता.’ उनके चाचा ने उनकी जिंदगी का कायापलट कर दिया है. उनके भतीजे फिदा बताते हैं कि जब हुसैन दुबई में होते हैं तो उन सबका वक्त फिल्मों, पॉपकॉर्न, संगीत और खाने-पीने में ही बीतता है.

हुसैन का दिन सुबह सात बजे शुरू होता है और इसकी समाप्ति कभी-कभार तो रात के एक बजे होती है. ऐसा लगता है जैसे उनकी रग-रग में जीवन का अमृत दौड़ रहा हो. हम उनसे पूछते हैं कि उनकी इस लंबी दौड़ का राज क्या है और जवाब आता है, ‘मैं तस्वीरें बनाने के लिए जीता हूं.’

शोमा चौधरी 

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जीवट का धनी

राम जेठमलानी, उम्र: 86,   पूर्व कानून मंत्री और  जाने-माने वकील

सुबह साढ़े पांच बजे उठना, नियमित रूप से बैडमिंटन कोर्ट पर पसीना बहाना और कभी-कभी सिर्फ एक ग्लास जूस के सहारे दिन में 14 घंटे तक काम करना..अब ऐसे में तो राम जेठमलानी को 86 साल का जवान ही कहा जा सकता है. रोज 65 बार महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने वाले जेठमलानी को समझना मुश्किल है. हाल ही में उन्होंने ऐलान किया कि वे वकालत छोड़ रहे हैं. मगर इसी साल उन्होंने बिनायक सेन और संजीव नंदा जैसी दो बिल्कुल जुदा शख्सियतों को जेल की सलाखों से बाहर निकलवाया है. स्विस बैंकों में जमा भारतीय काले धन को वापस लाने के लिए जनहित याचिका हो या फिर गैस विवाद की अदालती लड़ाई में अनिल अंबानी का पक्ष मजबूत करने का, जेठमलानी चर्चा में बने रहते हैं. वे खूब यात्रा करते हैं और किसी जगह पर उनका लगातार दो दिन तक टिकना मुश्किल से ही होता है. वे कहते हैं, ‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि जिंदगी के आखिरी दिनों में देश का इतना बुरा हाल देखना पड़ेगा’ उनका सपना है कि नैतिक मूल्यों में पतन का ये दौर खत्म हो और यही सपना उन्हें चलते रहने की ताकत देता है.

शोमा चौधरी

दलनायक खलनायक

‘मैं कभी भी ऐसा बूढ़ा नहीं बनना चाहता था जो सबको अपने बलिदानों की अनंत कथा सुनाता रहे, दिन भर खिच-खिच करता रहे, महिला रिश्तेदारों के पीछे पड़ा रहे.

राजेन्द्र यादव, उम्र: 80 
साहित्यकार और नई कहानी आंदोलन के प्रणेता

 

 

 

 

 

 

हंस के संपादक उन्होंने 25 साल तक टाइपराइटर का इस्तेमाल किया. बाद में वे हाथ की लिखाई पर लौट आए इतिहास और बुढ़ापे पर राजेंद्र यादव के विचार आपस में जुड़े हुए हैं. वे कहते हैं, ‘अतीत मुझे कभी नहीं सताता. जो लोग बीते कल की महानता और स्वर्णयुग की बात करते हैं वे सब झूठ बोलते हैं. आदमी इतिहास से नहीं बल्कि सिर्फ अपनी गलतियों से सीखता है. मैं पीछे मुड़कर नहीं देखता.’ 

लोगों को झटके देते रहने वाली हिंदी साहित्य की इस चर्चित हस्ती के लिए मूल्य सिर्फ यथास्थिति बनाए रखने का एक अनुशासनात्मक तरीका हैं. बात चाहे जाति की हो या सेक्स की, यादव हमेशा से पाखंड के मुखर विरोधी रहे हैं. उन पर स्त्रीविरोधी होने और ओछी राजनीति करने के आरोप लगते रहे. 2004 में उनकी जीवनी, हमारे युग का खलनायक आई. यादव कहते हैं, ‘मैं कभी भी ऐसा बूढ़ा नहीं बनना चाहता था जो सबको अपने बलिदानों की अनंत कथा सुनाता रहे, जो दिन भर खिच-खिच करता रहे, महिला रिश्तेदारों के पीछे पड़ा रहे.’ पैरों में साइटिका की परेशानी से चलने-फिरने अब उन्हें थोड़ी मुश्किल होती है पर मानसिक रूप से वे पूरी तरह सक्रिय हैं. प्रेमचंद द्वारा स्थापित ‘हंस’ पत्रिका को उन्होंने 1986 में फिर से जिंदा किया था. उनकी शामें साहित्यिक बैठकों, दोस्तों के साथ गपशप और पीने-पिलाने में बीतती हैं. टीवी देखना उन्हें बहुत पसंद है और ‘सच का सामना’ देखने में उन्हें काफी मजा आया. बुढ़ापे के बारे में पूछने पर वे तुरंत एक चुटकुला सुनाते हैं, ‘किसी ने 80 साल की बूढ़ी औरत से पूछा, अम्मा, क्या ढलती उम्र में सेक्स की इच्छा खत्म हो जाती है? उस महिला ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, ‘मैं कैसे बता सकती हूं? मैं तो अभी सिर्फ 80 की हूं!’ 

तृषा गुप्ता  

रफ्तार का सवार

हर हफ्ते वे अपने बेटों को ये कहना नहीं भूलते कि वे अपने कर्मचारियों और डीलरों के साथ मजबूत संबंध बनाएं. इसके अलावा वे सबको एक सफल व्यवसायी बनने के लिए प्रेरित करते हैं.

 डा. बीएम मुंजाल, उम्र: 86
 हीरो समूह के संस्थापक

 

  

 

 

 

 

मुंजाल आज भी विज्ञापनों में ध्यान खींचने वाली लाइनों के दीवाने हैं. 80 के दशक में हीरो होंडा का फिल इट, शट इट, फॉरगेट इट मशहूर हुआ था तो आज इसकी जगह धक धक गो, देश की धड़कन ने ले ली है.

‘मैं हमेशा लोगों से कहता रहता हूं, सपने मत देखिए अगर आप उन्हें हकीकत में नहीं बदल सकते,’ ये शब्द हैं 2.8 अरब डॉलर के व्यापारिक साम्राज्य के मुखिया और हीरो समूह के संस्थापक डा. बृजमोहन लाल मुंजाल के. दुनिया की नंबर एक दुपहिया निर्माता कंपनी का ये 86 वर्षीय मुखिया आज भी बोर्ड के सदस्यों द्वारा किसी नई तकनीक के बारे में बताए जाने पर उत्साह से भर जाता है. छह साल की उम्र में एक बार वे कमालिया (अब पाकिस्तान में) में नए-नए खुले एक गुरुकुल में सिर्फ ये जानने चले गए थे कि पारंपरिक स्कूल में आखिर होता क्या है. वे हर नई चीज में दिलचस्पी लेते हैं.

1947 में अमृतसर आने के बाद उनके परिवार ने अपना व्यवसाय शुरू किया. बाद में वे लुधियाना आ गए जहां उन्होंने साइकिल बेचने का काम शुरू किया. तीन दशक बाद उन्होंने अपने बेड़े में मोटरसाइकिल का कारोबार भी शामिल कर लिया.  ‘क्रांतिकारी तकनीकें आज भी मुझे प्रेरणा देती हैं’ 1980 के दशक में फोर-स्ट्रोक्स तकनीक के दम पर टू-स्ट्रोक्स मोटरसाइकिलें बनाने वाले अपने प्रतिस्पर्धियों को पटखनी देने वाला ये शख्स कहता है.

व्यावसायिक प्रबंधन की जापानी व्यवस्था- जिसे कीरेत्सु सिस्टम के नाम से जाना जाता है- से मुंजाल बेहद प्रभावित हैं. हर हफ्ते वे अपने बेटों से ये कहना नहीं भूलते कि वे अपने कर्मचारियों और डीलरों के साथ मजबूत संबंध बनाएं और सभी को एक सफल व्यवसायी बनाने पर जोर दें. उन्होंने खुद अपने 40 डीलरों को बड़े कारोबारियों में बदला है और उनके बेटों ने उनसे एक कदम आगे बढ़कर इस आंकड़े को दोगुना और फिर तिगुना कर दिया है. आज भारत की सड़कों पर हीरो के 2 करोड़ के करीब दुपहिया दौड़ रहे हैं. और लगता नहीं कि मुंजाल का इस आंकड़े के दोगुना या शायद तीन गुना होने से पहले रुकने का कोई इरादा है.

शांतनु गुहा रे 

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नब्बे पार का नौजवान

खुशवंत सिंह

उम्र: 94 ‘मैं टिके रहना चाहता हूं लेकिन मुझे पता है कि अब मेरा वक्त करीब है,’ चार साल पहले मनमौजी सरदार खुशवंत सिंह ने मौत के जिक्र पर ये बात कही थी. उस दुर्लभ मौके पर उन्होंने घंटे भर से ज्यादा मौत के दर्शन पर बातचीत की थी. खिड़की के बाहर देखते हुए उन्होंने कहा था, ‘मैं अक्सर उस पेड़ को देख कर सोचा करता हूं कि मैं इसे कब तक देख पाऊंगा. मैंने इसे अपने साथ ही बढ़ते हुए देखा है. मैं मानसिक तौर पर फिट हूं मगर मेरी शक्ति खत्म हो रही है. मैंने अपनी पत्नी को मानसिक तौर पर असंतुलित होते हुए देखा और बाद में उसकी बहुत दुर्दशा हुई. मुझे भी उस स्थिति के लिए तैयार रहना होगा.’

शायद भारत के सबसे चर्चित लेखक. उनका स्तंभ न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर आज भी पाठकों के बीच लोकप्रिय है इन दिनों वे एक और किताब लिख रहे हैं, इसका विषय क्या है, ये जानने का एक ही तरीका है और वह है इंतजारहालांकि सेक्स के कलेवर में लिपटी हुई मजेदार फंतासियों का ये किस्सागो और 30 से ज्यादा किताबों का ये लेखक जीवन के प्रति आज भी पूरी तरह से केंद्रित है. उनके बेटे राहुल सिंह से पूछने पर कि आखिर क्या चीज उनके पिता को अभी भी चलायमान रखे हुए है, तुरंत ही उत्तर मिलता है, ‘हर शाम व्हिस्की के दो पेग और उनकी तमाम महिला मित्र जो अपनी रूमानी जिंदगी को और मजेदार बनाने के लिए हर दिन उनसे सलाह लेने के लिए इकट्ठा होती हैं.’ हर शाम, बेनागा, 7 से 8 बजे के बीच इलस्ट्रेटेड वीकली का ये पूर्व संपादक अपने लिविंग रूम में बैठक जमाता है जिसमें गिने-चुने लोग ही शामिल होते हैं. उनके मुख्य दरवाजे पर हमेशा एक बोर्ड टंगा होता है- ‘अगर आप आमंत्रित नहीं है तो घंटी न बजाएं’.

इस एक घंटे का भरपूर लुत्फ उठाने के लिए खुशवंत सिंह बेहद अनुशासित दिनचर्या का पालन करते हैं. वे तड़के चार बजे ही उठ जाते हैं और रोज सभी अखबारों के क्रॉसवर्ड्स हल करते हैं. इसके बाद उनकी दिनचर्या में शामिल होता है, कॉलम लिखना, दोपहर में दो घंटे झपकी लेना, शाम के सात से आठ बजे का इंतजार और 8.30 बजे डिनर करके 9 बजे तक सो जाना. अगले दिन वे फिर से 4 बजे उठ जाते हैं. उन्हें चलने-फिरने के लिए दीवार का सहारा लेना पड़ता है, अक्सर वे फोन सिर्फ ये कहने के लिए उठाते हैं, ‘मैं बहरा हूं. मैं आपकी आवाज सुन नहीं सकता, मुझे पत्र लिख कर भेजें.’ खुशवंत सिंह के मानसिक स्वास्थ्य का राज सिर्फ उनकी महिला मित्र ही नहीं बल्कि शायरी और हंसी-मजाक भी है जिसकी खुराक वे आज भी रोजाना लेते हैं.

चार साल पहले तहलका के साथ साक्षात्कार में ये पूछे जाने पर कि वे सबसे ज्यादा किस चीज की कमी महसूस करते हैं, उनका जवाब था, ‘बढ़िया सेक्स. मैं काफी समय से बढ़िया सेक्स का आनंद नहीं ले पा रहा हूं. कोई आदमी जिस दिन बढ़िया सेक्स न कर पाए समझ लीजिए उसके जाने का वक्त हो गया है. लेकिन हां, मैं रूमानी कल्पनाएं करता हूं.’

व्यंग्य और कटाक्ष उनके जीवन का हिस्सा रहा है, यहां तक कि उम्र के बीसवें दशक के दौरान ही उन्होंने खुद की श्रद्धांजलि लिख डाली थी. उनका साप्ताहिक स्तंभ ‘न काहू से दोस्ती न काहू से बैर’ इस बात का सबूत है कि उन्हें जिंदगी से अब भी उतना ही प्रेम है. उन्होंने सब कुछ दान कर दिया है. वे कहते हैं, ‘मेरे पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं है.’ बावजूद इसके उनके पास देने के लिए बहुत कुछ है जिसे वे हफ्ता दर हफ्ता अपने पाठकों तक पहुंचाते रहते हैं.

हरिंदर बवेजा 

नावक के तीर

‘मुझे अपने काम से प्रेम है. मुझे कार्टून बनाना अच्छा लगता है. भला हो हमारे नेताओं का कि आलोचना और व्यंग्य के लिए ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं पड़ती’ 

आरके लक्ष्मण

उम्र: 85

कार्टूनिस्ट

 

उन्हें मुंबई के जेजे कॉलेज ऑफ आर्ट्स में एडमिशन इसलिए नहीं मिल सका क्योंकि कॉलेज के डीन के मुताबिक उनकी ड्राइंग्स इतनी बढ़िया नहीं थी कि उन्हें इस संस्थान में दाखिला लेने के योग्य समझा जाता85 वर्षीय के आरके लक्ष्मण ज्यादा बात नहीं करते. लेकिन इस मितभाषिता की पूर्ति उनके पांच दशक लंबे करियर के दौरान बनाए गए अनगिनत कार्टूनों से हो जाती है क्योंकि उनका हर कार्टून काफी-कुछ कह देता है. उनका जग प्रसिद्ध भौचक्का ‘आम आदमी’ चांद पर जाने के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार है. क्योंकि लक्ष्मण के ही शब्दों में ‘वह भोजन, पानी, हवा, रोशनी या छत बिना भी जी पा रहा है.’ कुछ ऐसा ही है लक्ष्मण की व्यंग्यात्मक सोच और हल्के-फुल्के  अंदाज का स्वभाव. चुटकी लेते हुए वे कहते हैं ‘मुझे अपने काम से प्रेम है. मुझे कार्टून बनाना अच्छा लगता है. भला हो हमारे नेताओं का कि आलोचना और व्यंग्य के लिए ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं पड़ती.’

अपनी उम्र के तमाम दूसरे लोगों की तरह इस कार्टूनिस्ट के पास सुबह की सैर के लिए वक्त नहीं है. वे कहते हैं, ‘मैं ये सब नहीं करता.’ बजाय इसके वे हर दिन आराम से 8.30 बजे उठते हैं. हल्का नाश्ता करने के बाद वे हर दिन 1 से 2 बजे तक दिमाग के घोड़े दौड़ाते हुए दिन के कार्टून का खाका अपने दिमाग में बनाते हैं. इसके बाद वे अपनी सोच को कागज पर उकेरने में घंटा भर लेते हैं और फिर इसे टाइम्स ऑफ इंडिया को भेज देते हैं.

2003 में उनके शरीर का बायां हिस्सा आंशिक रूप से लकवे का शिकार हो गया था. बावजूद इसके हर दिन तंज गढ़ने की उनकी क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ा. लक्ष्मण कहते हैं, ‘इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. मैं आज भी पहले की तरह ही काम कर रहा हूं.’ इन दिनों वे नियमित रूप से दो घंटे तक फिजियोथिरैपी करवाते हैं. ये पूछने पर कि क्या उनके व्यंग्य का कोई फार्मूला है, वो कहते हैं, ‘ऐसा कुछ नहीं है. ये खुद-ब-खुद हो जाता है.’ अगर दुरूह चुनौतियों का सामना करने का एक तरीका व्यंग्य है तो आरके लक्ष्मण इस विधा के पुरोधा हैं.

दिव्या गुप्ता   

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अक्षय घट ऊर्जा के

तीन साल पहले की बात है. एक सुबह मेरे पिता घर से निकले तो कभी वापस नहीं लौटे. वे मेरे तीन साल के बेटे को स्कूल छोड़ने जा रहे थे कि एक हल्की सी कराह के साथ अचानक उनका सिर एक तरफ लटक गया और वे चेतना खोकर हमारे घर के सामने खड़े आम के पेड़ के नीचे गिर गए. डॉक्टरों का कहना था कि उन्हें ब्रेन हेमरेज हुआ था. उनकी उम्र 75 के करीब थी.

जिन लोगों को आप आगे के पन्नों पर देखेंगे उन्होंने साबित कर दिया है कि सच सिर्फ यही नहीं है और कमजोरी, बीमारी और यहां तक कि मौत भी जिंदगी के खेल में बड़ी तुच्छ चीजें है. सभी लोगों ने अपनी इस ऊर्जा के राज के बारे में पूछने पर कई बातें बताई हैं 

इस घटना ने हमें स्तब्ध कर दिया. ये सब अचानक ही हो गया था. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिससे हमें इसका कोई पूर्वाभास हो सकता. न कोई बीमारी, न कमजोरी. मेरे पिता कोई मशहूर शख्सियत तो नहीं थे मगर उन्होंने अपने पीछे एक असाधारण विरासत छोड़ी थी. 40 साल तक बतौर डा¬क्टर वे उन इलाकों में काम करते रहे थे जिन्हें भारत के सबसे उपेक्षित हिस्से कहा जा सकता है. इनमें पं. बंगाल के चाय बागान और बिहार का मधेपुरा जिला शामिल है. ये ऐसे इलाके थे जहां चिकित्सा सुविधाओं जैसी कोई चीज नहीं होती थी.

इन सुदूर इलाकों में मेरे पिता अपने मरीजों के लिए हर मर्ज की दवा होते थे. वे खांसी-जुकाम के भी डॉक्टर थे और हड्डियों के भी, बच्चों के भी और स्त्रियों के भी. उनकी सबसे खास बात ये थी कि उनमें एक डॉक्टर के सहज ज्ञान के साथ एक मानवतावादी की बुद्धि भी थी. इसी का कमाल था कि उन्होंने दुष्कर हालात में उतने ही दुष्कर काम अंजाम दिए. गर्भ में (सामान्य स्थिति में बच्चे का सिर नीचे और पैर ऊपर होते हैं) असामान्य स्थिति में पल रहे बच्चे का सुरक्षित जन्म करवाना, हाथी के हमले में घायल किसी आदमी का पेट सिलना और 95 फीसदी जल चुके किसी व्यक्ति की जिंदगी बचाने जैसे काम उनके हाथों कई बार हुए. सुविधाओं के नाम पर उनके पास होता था एक कामचलाऊ ऑपरेशन टेबल और टेबल लैंप. एयर कंडीशनर तो कल्पना से बाहर की चीज थी.

मेरे पिता का एक छोटा सा सिद्धांत था, वे कहते थे कि इच्छाशक्ति के आगे कोई बाधा नहीं टिकती. इसी छोटे से सिद्धांत के बूते उन्होंने कई बड़े-बड़े काम कर डाले. अजीब सी बात ये है कि कुछ महीने गुजरते-गुजरते मेरे मन में उनकी मौत का दुख कम होता गया. अब जब भी मैं उनके बारे में सोचती मेरे होठों पर एक मुस्कराहट आ जाती. मुझे आम और उबले अंडों के प्रति उनकी रुचि याद आती, उनका अचानक जोर से हंस पड़ना, जानवरों और आदिवासियों से जुड़े उनके कई किस्से..अचानक ही मौत की जैसे कोई अहमियत नहीं रह गई थी. खोने के दुख की जगह एक अजीब सी शांति ने ले ली थी. ये शांति उस अहसास की थी कि मेरे पिता ने अपनी जिंदगी पूरी जिंदादिली और बिना किसी दुख के जी.

तहलका का ये विशेष परिशिष्ट उम्र और मौत के हमलों के बीच जिंदगी की जीत का उत्सव है. इसमें हमने उन असाधारण लोगों को स्थान दिया है जो उम्र के 75वें पड़ाव के बाद भी युवाओं सरीखी ऊर्जा के साथ जिंदगी की राह पर आगे बढ़ रहे हैं. ऐसे लोग जिनका उत्साह और जिनकी ऊर्जा आज भी वैसी ही है जैसी 50 साल पहले हुआ करती थी.

मिसाल के तौर पर 94 साल के एमएफ हुसैन को ही लें जो किसी आधुनिक बंजारे की तरह नंगे पांव पूरी दुनिया घूमते हुए नए-नए चित्र बना रहे हैं. 86 वर्षीय राम जेठमलानी आज भी भ्रष्ट शक्तियों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए तो हैं ही, साथ ही वे अपनी उम्र से कहीं छोटे लोगों को बैडमिंटन के मैदान पर भी धूल चटा रहे हैं. 85 साल के आरके लक्ष्मण आज भी भारत पर रोज एक नए व्यंग्य के साथ लोगों को सोचने पर मजबूर कर रहे हैं.

79 साल के एम बालमुरलीकृष्ण की आवाज आज भी लोगों को सम्मोहित कर रही है तो 82 वर्षीय सुंदरलाल बहुगुणा आज भी हिमालय को बचाने की अलख जगा रहे हैं. उधर, उम्र के 101वें पड़ाव पर भी उस्ताद अब्दुल राशिद खान अपने सुरों से समां बांध रहे हैं और 92 साल के बीकेएस अयंगार आज भी रोज आधा घंटे तक शीर्षासन करने के साथ देस-परदेस में अनगितन लोगों के लिए योग सीखने की प्रेरणा बने हुए हैं.

ये लोग उम्र के जिस दौर में हैं वहां अकेलापन, निराशा, अवसाद जैसी चीजों का जिक्र बार-बार होता है. थकावट और हड्डियों में दर्द जैसे शब्द बार-बार सुनाई देते हैं. मगर जिन लोगों को आप आगे के पन्नों पर देखेंगे उन्होंने ये साबित कर दिया है कि सच सिर्फ यही नहीं है और कमजोरी, बीमारी और यहां तक कि मौत भी जिंदगी के खेल में बड़ी तुच्छ चीजें है. सभी लोगों ने अपनी इस ऊर्जा के राज के बारे में पूछने पर कई बातें बताई हैं. सुबह उठना, नियमित व्यायाम, स्वस्थ खानपान आदि. मगर सबकी बातों पर गौर करने पर पता चलता है कि इसका सबसे बड़ा राज है जीवन के प्रति उनका प्रचंड जोश. हर चीज से आनंद का असीम रस खींचने का इन लोगों का गुण प्रेरणादायी है. शांति भूषण बालिका वधू जैसे धारावाहिकों के शौकीन हैं तो भानु अथैया अपने हेयरबैंड्स की. जुनून, उत्सुकता, काम में तल्लीनता और शिकायत न करने की प्रवृत्ति जैसी चीजें इन सभी को निरंतर गतिमान रखे हुए हैं.

94 साल के हुसैन में किसी बच्चे जैसी जिज्ञासा है. इन दिनों वे अरबी भाषा सीख रहे हैं. वे नई तकनीक, नए आविष्कारों और युवाओं के विचारों से काफी रोमांचित होते हैं. जीवन की सांध्य बेला में उन्हें अपने देश से दूर रहने को मजबूर होना पड़ा मगर उन्होंने शिकायत करने में वक्त बर्बाद नहीं किया. उन्होंने अपनी एक नई दुनिया बनाई और आगे बढ़ चले. वे इस तरह जी रहे हैं जैसे जिंदगी का कोई अंत न हो. और यही वजह है कि वह अंत जब आएगा तो वे उसकी अहमियत को खत्म कर चुके होंगे.

ये परिशिष्ट भले ही 75 से ऊपर के लोगों पर केंद्रित हो मगर इसकी प्रेरणा का लक्ष्य युवा हैं. हमने मशहूर लोगों को इसलिए चुना ताकि उनकी कहानियां हर किसी के भीतर एक अनुगूंज पैदा करें. मैंने कभी भी ये महसूस नहीं किया कि मेरे पिता उम्रदराज हो रहे हैं. उन्होंने इसका कोई संकेत नहीं दिया था. यहां तक कि उन्होंने अपनी मौत का भी कोई संकेत नहीं दिया. इसलिए जब वे गए तो हमारे पास उस समृद्ध व्यक्ति की याद और उसकी जिंदगी के आनंद का तेजस्वी अमृत बचा था. साल गुजरते रहते हैं. वक्त का चलते रहना अनिवार्य है. मगर ये कतई अनिवार्य नहीं है कि बुढ़ापे को एक अभिशाप के तौर पर ही जाना जाए. ये सभी लोग इस बात का सबूत हैं.

शोमा चौधरी 

नीरो की वापसी

वो पोस्टरों से गायब थे, लंबे समय से उन्होंने लोगों के सामने वाइब्रैंट गुजरात की हुंकार नहीं भरी थी, न ही मंदिरों के नगर अंबाजी में आने वाले श्रद्धालुओं को ही स्वागत करते उनके आदमकद पोस्टर दिख रहे थे. विधानसभा सत्र में भी वो बिल्कुल शांत नजर आए. ऐसा लगता था मानो उनकी पकड़ ढीली पड रही है – डॉक्टर हड़ताल पर चले गए थे, जहरीली शराब का विवाद उठ खड़ा हुआ था, पार्टी स्थानीय निकाय के चुनाव हार गई, अमूल सहकारी संघ से भी उनका कब्जा जाता रहा.

मोदी का जादू फैलाने में गुजरात कांग्रेस की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. वो खुद को मोदी की बी टीम के रूप में देखकर ही खुश है 

शिमला में जब उनकी पार्टी उथल-पुथल से बेहाल थी तो वे मॉल में घूम रहे थे. आम चुनावों में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का जुमला उछाल कर पार्टी और आडवाणी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को धक्का पहुंचाने वाले मोदी किसी आम क्षेत्रीय नेता जैसा व्यवहार कर रहे थे. मीडिया और विपक्षी कांग्रेस से लेकर उनके समर्थक तक उनकी हताशा को लेकर खुसर-फुसर करने लगे थे. ये तब और मुखर हो गई जब उन्होंने विधानसभा के उपचुनावों में पार्टी के प्रचार से दूर रहने की घोषणा की. ऐसा लगा कि उनकी किस्मत अब ढलान की ओर है. सुप्रीम कोर्ट ने भी 2002 के दंगों में उनकी भूमिका की जांच के लिए एसआईटी को आदेश दे दिया था और गुजरात हाई कोर्ट ने जसवंत सिंह की पुस्तक से प्रतिबंध हटा दिया था. मगर तभी विधानसभा के उप चुनावों में उनकी पार्टी सात में से पांच सीटें जीत गई. उन्होंने इसका श्रेय कार्यकर्ताओं को देने में कोई देरी नहीं लगाई. कहा गया कि मोदी वापस आ गए हैं. पर वो गए कहां थे?

बीते कुछ महीने जवाबदेही के थे. जब उनके सहयोगी उनको लेकर बड़बोलापन दिखा रहे थे तो उन्होंने रणनीतिक चुप्पी साध रखी थी. हालांकि गुजरात पर उनकी पकड़ पर किसी को शंका नहीं थी. बल्कि लोकसभा चुनाव में उन्होंने एक सीट बढ़ाने के साथ अपने धुर विरोधी शंकर सिंह वघेला को भी मात दी थी. सवाल राष्ट्रीय राजनीति में उनके प्रभाव को लेकर उठ रहे थे. इन सब पर चुप्पी साध कर उन्होंने न केवल भाजपा के अंदर छीज रही अपनी प्रतिष्ठा को बचाया बल्कि कुछ ऐसा भी किया जिससे उन्हें जबर्दस्त फायदा हुआ. उन्होंने बिना देरी किए जसवंत सिंह की किताब पर प्रतिबंध लगा दिया और वजह जिन्ना नहीं बल्कि सरदार पटेल के ऊपर की गई टिप्पणी को बताया गया. पटेल ही वो राष्ट्रीय नेता हैं जिन्हें भाजपा अपना मानने का दावा करती है, पर उनकी खूबियों के लिए कम और एक ऐसे व्यक्ति के रूप ज्यादा जिसके साथ नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने बहुत अन्याय किया था. वो एक ऐसे प्रतीक हैं जिनसे मोदी अपनी भी तुलना करते हैं – एक ऐसा नेता जो अपनी सियासत और जनता के प्रति समर्पित रहा लेकिन जिसे कांग्रेस और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों द्वारा बदनाम किया जाता रहा. जसवंत सिंह की किताब पर प्रतिबंध इसी प्रतीकात्मक राजनीति की उपज था. मोदी पटेल की विरासत और गुजरात की अस्मिता के संरक्षक के रूप में उभरे. गुजरात कांग्रेस ने भी उनकी नकल की. एक केंद्रीय मंत्री ने भी पुस्तक पर प्रतिबंध की वकालत की. जब तक ये ठीक किया जाता, नुकसान हो चुका था. हर बहस में भाजपा द्वारा गुजराती अस्मिता के सवाल और कांग्रेसी मंत्री के बयान को खूब उछाला गया. प्रतिबंध भले हटा हो लेकिन मकसद तो पूरा हो ही गया था.

मोदी का जादू फैलाने में गुजरात कांग्रेस की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. वो खुद को मोदी की बी टीम के रूप में देखकर ही खुश है. 2007 के चुनाव में इसने भाजपा के असंतुष्टों के इर्द-गिर्द अपनी रणनीति बुनी थी, जिससे पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को काफी निराशा हुई. असहिष्णुता के मामले में – चाहे वो पुस्तक पर प्रतिबंध का मामला हो या फिर फिल्म पर – तो ये मोदी से स्पर्धा करती नजर आई. इससे उस नागरिक समाज का कांग्रेस से मोहभंग हुआ जो असहिष्णुता का विरोधी है. गुजरात में प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी समाजिक संगठनो ने उठा रखी है. ये संगठन कानूनी लड़ाइयां तो लड़ सकते हैं लेकिन राजनैतिक जिम्मेदारी के लिए तो राजनीतिक पार्टी को ही आगे आना होगा. 2002 के दंगों के पीड़ितों के न्याय की लड़ाई में कांग्रेस मूक दर्शक ही बनी रही और उसकी राजनीतिक अक्षमता इशरत जहां के मामले में भी उजागर हुई.

देखा जाए तो विधानसभा के उपचुनाव नरेंद्र मोदी की भाजपा का नहीं बल्कि कांग्रेस का इम्तिहान थे. जो सात सीटें दांव पर लगी थी उनमें से छह पर उसका कब्जा था.इस बीच मोदी को एक बार फिर से राष्ट्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षाओं को साकार करने का अवसर हाथ लग चुका है. 14 सितंबर को मोदी आम सहमति से गुजरात क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष चुन लिए गए. अब मोदी का नया नारा है –क्रिकेट, सामाजिक परिवर्तन के लिए!’. मोदी आईपीएल की नई टीम के माध्यम से एक बार फिर से गुजरात का गौरवपुनर्स्थापित करने वाले हैं और ‘‘वाइब्रैंट गुजरात’’ से बढ़िया इस टीम का और बला क्या नाम हो सकता है.   

त्रिदिप सुहृद 

पहचान की लड़ाई का विजेता

दुविधाग्रस्त बचपन से लेकर असल पहचान पाने और अपने जैसे तमाम लोगों के प्रेरणा स्रोत बनने तक देश के पहले घोषित शाही समलैंगिक मानवेंद्र सिंह गोहिल एक मुश्किल और लंबे सफर के राही रहे हैं, बता रही हैं मंजुला नारायण 

खुद को सार्वजनिक रूप से समलैंगिक घोषित करने वाले किसी भारतीय शाही खानदान के पहले सदस्य से मिलने की उत्सुकता लिए मैं मुंबई के मलाड स्थित उस फ्लैट की घंटी बजाती हूं. दरवाजा खुलता है और 44 साल के मानवेंद्र सिंह प्रकट होते हैं. ऊंचा कद, चूड़ीदार सूट, कानों में हीरे के कुंडल और लंबा तिलक.. राजपीपला घराने के इस राजकुमार को देखकर एक पल के लिए मैं जैसे ब्रिटिश राज के दिनों में पहुंच जाती हूं. उनका अभिवादन किस तरह से किया जाए इस असमंजस में कुछ सोच ही रही होती हूं कि वे हाथ पकड़कर मुझे घर के भीतर ले जाते हैं और इस दुविधा को खत्म कर देते हैं.

वह जिंदगी को नया मोड़ देने वाला अनुभव था. मुझे अहसास हुआ कि मुझमें कुछ तो गड़बड़ है. लगा कि मुझे खुद के बारे में जानने की जरूरत है.

ये मानवेंद्र सिंह की अपनी दुनिया है जहां वे अपने हमराही प्रज्वल मिस्किन के साथ रहते हैं. 27 साल के प्रज्वल एक फार्मा कंपनी में काम करते हैं. उनका व्यक्तित्व खासा आकर्षक है और कहा जा सकता है कि अगर उनका झुकाव इस तरह का नहीं होता तो कोई भी लड़की उन पर आसानी से फिदा हो सकती थी. दीवारों पर नजर दौड़ाने पर मुझे अगल-अलग मुद्राओं में पुरुषों की निरावृत तस्वीरें नजर आती हैं. मानवेंद्र कहते हैं, ‘ये घर में आने वाले लोगों को इस बात के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए हैं कि ये एक समलैंगिक का घर है. जब डिलीवरी ब्वॉयज घंटी बजाते हैं तो हम उन्हें जान-बूझकर भीतर आने देते हैं ताकि वे ये सब देख सकें.

मानवेंद्र बताते हैं कि जब वे छोटे थे तो उन्हें ये बताने के लिए कोई नहीं था कि वे औरों से कुछ अलग हैं. वे बताते हैं, ‘मैं 12 साल का था जब मुझे अहसास हुआ कि बांबे स्कॉटिश स्कूल के दूसरे लड़कों की तरह मैं लड़कियों की तरफ आकर्षित नहीं होता था. इसकी बजाय मेरा आकर्षण अपने शिक्षकों और दोस्तों के प्रति था.मगर बचपन में मानवेंद्र की भावनाएं समझने वाला कोई नहीं था. वे कहते हैं, ‘राजसी परिवारों में माता-पिता के साथ हमारे रिश्ते बेहद औपचारिक ही होते हैं. हमें उनसे नजरें मिलाने की इजाजत नहीं होती. वे मुझे महाराजकुमार कहकर बुलाते थे और मैं उन्हें महाराज कहकर.’  

मानवेंद्र बताते हैं कि नौ साल तक वे अपनी आया को ही अपनी मां समझते थे. चूंकि वे शाही घराने के उत्तराधिकारी थे इसलिए सुरक्षा के लिए उनके चारों तरफ नौकरों का जमावड़ा लगा रहता था. वे कहते हैं, ‘इसका नतीजा ये हुआ कि स्कूल के दौरान मेरा कोई दोस्त ही नहीं था. कोई ऐसा नहीं था जिस पर मैं भरोसा कर सकूं.काफी समय तक मानवेंद्र को समझ में ही नहीं आता था कि ऐसा क्यों है. वे बताते हैं, ‘मैं ये सोचते हुए बड़ा हुआ कि समलैंगिक झुकाव वाला मैं दुनिया का अकेला इंसान हूं. मुझे ये भी लगता था कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा.

यही सोचकर उन्होंने झाबुआ की राजकुमारी चंद्रिका के साथ विवाह के लिए हामी भर दी. उन्हें लगा कि शादी के बाद उनका ये झुकाव खत्म हो जाएगा. पत्नी के साथ उनकी जमी तो मगर ऐसी नहीं कि इस शादी को पूर्ण कहा जा सकता. नतीजतन 15 महीने के बाद ही दोनों अलग हो गए. मानवेंद्र कहते हैं, ‘वह जिंदगी को नया मोड़ देने वाला अनुभव था. मुझे अहसास हुआ कि मुझमें कुछ तो गड़बड़ है. लगा कि मुझे खुद के बारे में जानने की जरूरत है.

इसके बाद मानवेंद्र ने समलैंगिकों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे अशोक राव कवि से संपर्क किया. 1995 में वे समलैंगिक पुरुषों के लिए काम करने वाले देश के पहले संगठन हमसफर ट्रस्ट से जुड़ गए. राव कवि के प्रोत्साहन से उन्होंने लक्ष्य की स्थापना की. वडोदरा, अहमदाबाद और राजकोट में समलैंगिकों के लिए काम करने वाले इस संगठन में आज 120 डॉक्टर, काउंसलर और लैब टेक्नीशियन हैं.

मानवेंद्र अब तक खुद को समझ चुके थे इसलिए उन्होंने अपनी पहचान को सार्वजनिक करने का फैसला किया. जैसा कि वे बताते हैं, ‘जब मैंने 2006 में खुद को समलैंगिक घोषित किया तो समलैंगिकता को तो छोड़िए ज्यादातर लोगों को एचआईवी/एड्स के बारे में भी ज्यादा जानकारी नहीं थी. मुझे भरोसा था कि मेरे ऐसा करने से लोगों का ध्यान इन मुद्दों की तरफ भी जाएगा.मगर इसकी प्रतिक्रिया में जो हुआ उसकी मानवेंद्र ने कल्पना भी नहीं की थी. राजपूत समुदाय के लोगों ने उनकी तस्वीरें और पुतले जलाए. उनके माता-पिता ने उन्हें जायदाद से बेदखल करने की धमकी दी और विश्व हिंदू परिषद की राज्य इकाई ने चेतावनी दी कि इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे.

लेकिन मानवेंद्र सिंह सच्चे योद्धा की तरह डटे रहे. जायदाद से बेदखल करने की प्रतिक्रिया में तो वे शांत रहे मगर कट्टरपंथियों को उन्होंने एक ही वार में चित कर दिया. उन्होंने धमकी दी कि वे विहिप के ऐसे सदस्यों को बेनकाब कर देंगे जो दबे-ढके तौर पर समलैंगिक हैं. हंसते हुए मानवेंद्र कहते हैं, ‘बात वहीं खत्म हो गई.वे आगे जोड़ते हैं कि खासकर हिंदू धर्म में समलैंगिक संस्कृति को काफी पहले ही स्वीकार किया जा चुका है. जैसा कि वे कहते हैं, ‘हमारे कई प्राचीन मंदिरों जैसे कि खजुराहो, दहोद और मोधरा में समलैंगिकता को दर्शाती मूर्तियां हैं. अहमदाबाद के पास बहुचाराजी देवी का मंदिर है जो समलैंगिकों की देवी हैं और ढाई हजार साल पुराने कामसूत्र में समलैंगिकों के लिए विभिन्न स्थितियों का वर्णन मिलता है. जो लोग समलैंगिकता को पश्चिम से आयातित संस्कृति बताते रहते हैं उन्हें पता ही नहीं कि वे क्या कह रहे हैं.

उधर, राजपीपला में लोगों को शुरू में ये जानकर झटका लगा मगर फिर वे अपने महाराजकुमार के साथ हो गए. बुजुर्गों ने उनकी ईमानदारी के लिए उन्हें सराहा और कई कॉलेजों के प्रधानाचार्यों ने उन्हें अपने यहां सेक्शुएलिटी पर भाषण देने के लिए आमंत्रित किया. मानवेंद्र दुनिया भर में चर्चित नाम हो गए. वे ऑपरा विनफ्रे के मशहूर शो में मेहमान के तौर पर नजर आए और अब उनके माता-पिता को भी उनसे कोई शिकायत नहीं है.

आज मानवेंद्र की जिंदगी सरपट रफ्तार से भाग रही है. हाल ही में उन्होंने एक ब्रिटिश रियलिटी टीवी शो में हिस्सा लिया. वे एड्स पीड़ितों और समलैंगिकों के लिए एक वृद्धाश्रम बनाने और देश में समलैंगिक पर्यटन को बढ़ावा देने की योजना पर भी काम कर रहे हैं. मानवेंद्र हारमोनियम बजाना भी सीख रहे हैं और साथ ही राजपीपला के किसानों को जैविक खाद का इस्तेमाल करने के लिए भी प्रोत्साहन दे रहे हैं. और मिस्किन तो उनके साथ हैं ही.

विदा लेने से पहले आप ये पूछने से खुद को नहीं रोक पाते कि समलैंगिकों की प्रेम कहानी एक सामान्य प्रेम कहानी से किस तरह अलग होती है. मानवेंद्र जवाब देते हैं, ‘हमारे भीतर भी उसी तरह की रूमानी भावनाएं होती हैं. फर्क सिर्फ यही होता है कि ज्यादातर मामलों में पति और पत्नी की भूमिका स्पष्ट नहीं होती.’