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‘बिना दर्द का हार्ट अटैक!’

स्वास्थ्योपदेश – डायबिटीज के रोगी को ‘पेनलेस’ हार्ट अटैक भी हो सकते हैं

शिक्षाप्रद कहानियों का लंबा इतिहास रहा है. खूब लिखी, पढ़ी गई हैं. दरअसल, इतनी लिखी गई हैं कि यदि इनसे लोग वास्तव में ही शिक्षा लेने बैठ जाते तो यह दुनिया अब तक ऐसी बदल गई होती कि इसे शिक्षाप्रद कहानियों की आवश्यकता ही न रह जाती. पर दुनिया नहीं बदली मगर इसके बदलने की आशा हमेशा रहती है और इसी आशा के चलते ये कहानियां अभी भी लिखी जा रही हैं. मैं खुद भी लिख रहा हूं. कोशिश है कि ये कहानियां अपने पाठकों को बीमारियों, स्वास्थ्य, जांचों, दवाइयों, गलतियों, गलतफहमियों, अंधविश्वासों, ढकोसलों के विषय में एक नए कोण से समझ सकें. शायद इन स्वास्थ्योपदेशों से आप कुछ सबक लें. आशा तो यही है. तो इस बार की कहानी कुछ यूं है :

कहानी

यह कहानी हिंदी के एक मूर्धन्य संपादक, आलोचक, कवि की है. बेहद सुलझे व्यक्ति उम्र सत्तर के पार. डायबिटीज के पुराने रोगी. नियमित दवाएं. नियम से जांचें. अपनी डायबिटीज को पूरा कंट्रोल में रखते हैं – इस बात पर संतोष तथा गर्व भी. व्यायाम नियमित. कोई नशा नहीं. तंबाकू नहीं. ऐसे सात्विक मरीज हैं जैसे हिंदी लेखकों में देखने को तरस जाओ. ये अभी हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार के एक कार्यक्रम में उज्जैन में थे. वहां (शायद मंच पर ही) पेट में बेचैनी और गैस-सी लगी. बढ़ी तो उठे. उठे तो आंखों के सामने अंधकार सा आया. गिरते-गिरते बचे. डॉक्टर को दिखाया. दो ईसीजी लिए गए और अंतत: गैस तथा ऐसिडिटी की दवाएं लेकर दिल्ली अपने घर आ गए. दिल्ली पहुंचकर भी वही गैस और पेट में बेचैनी. गैस इतनी कि पेट में अफारा-सा मचा है. पेट ऐसा फूला हुआ कि लेटना कठिन. रात इसी बेचैनी में उठते-बैठते बिताई. डॉक्टर का बताया एंटासिड लेते रहे. फिर सुबह छह बजे मुझे भोपाल फोन कर पूरा किस्सा बताया. मैंने फोन पर ही उन्हें तीन बातें कही –

1- कि लगता है कि उज्जैन में जो हुआ वह गैस की प्रॉब्लमन होकर हार्ट-अटैक था.

2- कि लगता है कि हार्ट अटैक में दिल का पंप अचानक कमजोर हुआ है और बेचैनी इस कारण है कि हृदय खून को आगे पंप नहीं कर पा रहा तो खून पीछे फेफड़ों, लीवर आदि में कंजेशनकर रहा है.

3- कि पहले ही गैस मानकर बहुत देर की जा चुकी है, तुरंत आईसीयू में भर्ती तथा एंजियोग्राफी आदि की आवश्यकता है.

वे दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में तुरंत भर्ती हुए. वहां के चीफ हार्ट सर्जन – जो मेरे मित्र हैं – ने बाद में बताया कि थोड़ी और देर जानलेवा होती. यह हार्ट अटैक ही था. दवाइयों से स्थिति नियंत्रण में करके पहले उनकी एंजियोग्राफी की गई. तीनों नलियां बंद निकलीं. बाईपास सर्जरी हुई. ईश्वर ने जैसी उनकी जान बचाई, वैसी सबकी बचाए.

शिक्षा

डायबिटीज के रोगी को प्राय: हार्ट अटैक होने पर इसी तरह के अजीब-से लक्षण हो सकते हैं जिनके बारे में यदि सचेत न हों तो डॉक्टर होते हुए भी इसे आप कुछ और ही बीमारी समझ सकते हैं. वास्तव में फिल्मों, कहानियों, नाटकों, उपन्यासों आदि में हमने हार्ट अटैक को हमेशा ही सीने में भयंकर दर्द होने, पसीने से तरबतर हो जाने, आदमी के तड़पने से जोड़ा है. ऐसे हार्ट अटैक भी होते हैं. पर याद रहे कि डायबिटीज के रोगी को दर्द के बिना’ (पेनलेस) हार्ट अटैक भी हो सकते हैं क्योंकि उनकी दर्द की नसें सूख जाती हैं.

तब तो मर गए भय्या. हमें भी डायबिटीज हैं साहब, कभी ऐसा वाला हार्ट अटैक हो गया तो पता कैसे चलेगा? तो जो मैं डायबिटीज के रोगियों को हमेशा कहता हूं, वह आपको बताता हूं.

याद रखें कि यदि डायबेटिक रोगी की तबीयत अचानक ही खराब हो जाए उसे कुछ नयी चीज होने लगे, कि देखो अभी दस मिनट पहले तक तो एकदम बढ़िया थे और अभी यह होने लग गया – यह यानी चक्कर, पेट में अफारा – गैस-सी जैसे पहले कभी नहीं हुई हो, आंखों के सामने अंधकार छाना, दम सा घुटना, श्वास में अनजानी-सी ऐसी दिक्कत जो समझाई न जा सके, जरा-सा तेज चलने या सीढ़ी चढ़ने पर हांफना या दम घुटना या ऐसा लगना मानो कोई गर्दन पकड़ रहा हो, अचानक ही बेहद कमजोरी का अहसास, चलें तो अंधेरा सा लगे, पसीना आए, धड़कन तेज हो – तो याद रखें कि इस बात की आशंका है कि यह या तो हार्ट अटैक है या फिर ब्लड शुगर कम हो गई है. तुरंत डॉक्टर से मिलें, वह भी ऐसे से जो इस शिक्षा को भूल न चुका हो. हो सकता है कि हार्ट ठीक निकले और पेट में गैस, एसिडिटी आदि ही निकले परंतु यह निर्णय डॉक्टर को ही लेने दें. लक्षणों को नजरअंदाज करके घरेलू दवाइयां स्वयं ही लेकर न बैठे रहें. कितने डायबिटीज के रोगी इसी भ्रम में हार्ट अटैक होने पर भी सही डॉक्टर तक नहीं पहुंच पाते और अचानक मर जाते हैं.

तो याद रखें

1- डायबिटीज के मरीज को बिना छाती में दर्द के भी हार्ट अटैक हो सकता है. सो यदि अचानक ही, नया कुछ ऐसा लक्षण हो जो पहले कभी न हुआ हो तो सतर्क हो जाएं.

2- हिंदी आलोचक के पास भी दिल होता है.

कब कटेगी चौरासी: चेहरे की धूल दिखाता आईना

पुस्तक :     कब कटेगी चौरासी

लेखक  :     जरनैल सिंह

कीमत :     99 रुपए

प्रकाशक:     पेंगुइन बुक्स

लेखन की सार्थकता अगर संवेदना को छूने में है तो कब कटेगी चौरासी इससे कुछ आगे निकल जाती है. इसलिए क्योंकि यह हमारी संवेदना को सिर्फ छूती ही नहीं बल्कि झकझोर देती है, सावधान भी करती है कि सभ्यता के विकास के तमाम दावों के बावजूद हम अब भी काफी हद तक अपनी आदिम पाशविक प्रवृत्तियों से बंधे हुए हैं. इसे पढ़ते हुए लगातार लगता है कि हमने इतिहास से कुछ नहीं सीखा और बरबस ही नाजी कैंपों और बंटवारे पर लिखी गई किताबों के अंश या इन घटनाओं पर बनी फिल्मों के दृश्य मन में कौंधते हैं. किताब की प्रस्तावना में चर्चित लेखक खुशवंत सिंह लिखते हैं कि यह उन सभी लोगों को पढ़नी चाहिए जो चाहते हैं कि ऐसे भयानक अपराध दोबारा न हों. उनकी बात बिल्कुल सही है. अगर इसे पढ़कर बतौर समाज हमें अपना अक्स धुंधला नजर आए तो कसूर इस आईने का नहीं बल्कि हमारे चेहरे पर पड़ी धूल का होना चाहिए.

कब कटेगी चौरासी के लेखक हैं कुछ समय पहले एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान गृहमंत्री पी चिदंबरम की तरफ जूता उछालकर चर्चा में आए पत्रकार जरनैल सिंह. उनके मुताबिक इसे लिखने का उद्देश्य 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिखों के नरसंहार की बर्बरता और उसके बाद भी अब तक लगातार जारी अन्याय का सच सामने लाना है. वे लिखते भी हैं, ‘जूते से विरोध प्रकट कर दुनिया को इस अन्याय की याद तो दिला दी पर इस अन्याय को किताब के तौर पर सामने लाकर दोषियों को शर्मिंदा करना होगा.’ इसके बाद जरनैल लिखते हैं,‘सिखों के साथ हुए अन्याय के खिलाफ उनके दर्द और रोष को अपने सांकेतिक विरोध के जरिए प्रकट करने के बाद मुझे तिलक विहार और गढ़ी में 1984 के पीड़ितों की विधवा कॉलोनियों में जाने का मौका मिला. उनकी दयनीय स्थिति को देखकर और दर्दनाक कहानियों को सुनकर दिल और ज्यादा दुख से भर गया. मैंने देखा कि 1984 के कत्लेआम को उस तरह से कवर ही नहीं किया गया जिस तरह से किया जाना चाहिए था..लगा कि इस दास्तान को दुनिया के सामने लाना बेहद जरूरी है.

इस तरह देखा जाए तो यह एक तरह से भुक्तभोगियों द्वारा अपनी व्यथा का मार्मिक वर्णन है जिसके जरिए कुछ अहम सवाल उठाए गए हैं. चूंकि जरनैल पत्रकार हैं और बेहद आहत भी, इसलिए इस काम में उन्होंने अपनी पत्रकारीय प्रतिभा के साथ निजी भावनाओं का मेल भी कर दिया है जो किताब पढ़ते हुए महसूस भी होता है. दंगा पीड़ितों की जिंदगी के दुखद अध्याय के साथ चलती गई उनकी कलम ने अपने दिल का गुबार भी जी-भर उड़ेला है. उन्हीं के शब्दों में अगर किसी भूकंप या तूफान में लोग मारे गए हों तो अलग बात है पर कत्लेआम को कैसे भूल जाएं? खासकर जब तक न्याय न हुआ हो..भूल जाना कोई हल नहीं है. इतिहास से सबक लिया जाता है न कि उसे भूला जाता है. सबक इसलिए ताकि वैसी गलतियां फिर न दोहराई जाएं. जरूरत भूलने की नहीं, न्याय करने की है.

84 के पीड़ितों की कहानियां अखबारों या पत्रिकाओं के जरिए टुकड़ों-टुकड़ों में पहले भी कही गई हैं मगर हिंदी में उन्हें एक किताब के रूप में सामने लाने का शायद यह पहला प्रयास है. समीक्षा के लिहाज से देखा जाए तो इसमें कुछेक दोष जरूर हैं मगर जब त्रासदी इतनी विकराल और हृदयविदारक हो तो उसके वर्णन में हुए चंद भाषागत और भावनात्मक दोष ज्यादा मायने नहीं रखते.

महान कथाकार शैलेश मटियानी कभी कह गए थे कि समाज की संवेदना को बचाए रखने का काम ईश्वर और प्रकृति ने लेखक पर छोड़ा है. जरनैल ने अपनी यह जिम्मेदारी सच्चे मन और अच्छे ढंग से निभाई है.     

विकास बहुगुणा     

अच्छे गाने और इमरान हाशमी: तुम मिले

फिल्म  तुम मिले

निर्देशक कुणाल देशमुख

कलाकार इमरान हाशमी, सोहा अली खान

इस फिल्म में सोहा अली खान कुछ बड़ी दिख रहीं हैं. वैसे वे रोती अच्छा हैं, जो उनके हीरो इमरान हाशमी ठीक से नहीं कर पाते. इसी तरह वे खुश भी अच्छे से नहीं हो पाते. वे हताशा का अभिनय अच्छा करते हैं और इसके लिए उनकी प्रशंसा भी होनी चाहिए. भट्ट साहब के प्रोडक्शन की फिल्मों का संगीत बहुत मधुर होता है और तुम मिलेका नायक भी उसका संगीत ही है. जहां का भी, जिसका भी संगीत हो, हम इसे प्रीतम का ही मानते हैं और दिल से शुक्रिया कहते हैं.

आप अगर भट्ट कैंम्प की पिछले कुछ सालों की फिल्में देखें, कसूर से लेकर मर्डर, जहर, जन्नत और तुम मिले तक, तो आप यह नहीं बता पाएंगे कि इनमें से कौन-सी, किस निर्देशक की है. इन ज्यादातर फिल्मों की संरचना में एक तरह के अच्छे गीतों और इमरान हाशमी के अलावा कुछ और भी कॉमन है. परिवारों की अनुपस्थिति, स्त्नी-पुरुष के सनातन रिश्ते का प्रेम और तनाव, उसमें शरीर का मुखर अस्तित्व और साथ में चलती एक और अतिरिक्त कहानी जो फिल्म की गहराई बढ़ाने की कोशिश करती है.

तुम मिलेमें 26 जुलाई, 2005 को मुंबई की भारी बारिश की कहानी केवल बैकग्राउंड की तरह है. मुख्य कहानी प्यार, तकरार और महत्वाकांक्षाओं की ही है. इमरान हाशमी की एक और खूबी है कि वे आम लड़के जैसे दिखते हैं जिसमें कोई खूबी न हो. फिल्म में वे एक गरीब चित्नकार हैं और सोहा अमीर पिता की बेटी. प्रेम शुरु होने का ढंग भी वही है और टूटने का भी वही. यानी पहली नजर का प्यार, वह भी दोनों तरफ से और बाद में अहं के कारण अलगाव. एक दोस्त है, जो इमरान से अच्छा अभिनेता है और हैंडसम भी, लेकिन किन्हीं अज्ञात कारणों से फिर भी हीरो नहीं है. वह खुशमिजाज है और हमारा हीरो सदा की तरह धीर-गंभीर. कुछ भी नया नहीं. इमरान-सोहा लिव-इन में रहते हैं और अफसोस कुणाल देशमुख साहब, अब तो यह भी नया नहीं रह गया है. फिर भी तुम मिलेउतना मनोरंजन तो आपको दे ही देती है, जितने का वह दावा करती जान पड़ती है. यह उन फिल्मों की तरह नहीं है जो अच्छे ट्रेलर का जाल बिछाकर आपको फांस लेती हैं और हॉल में पहुंचकर आप ठगे-से रह जाते हैं.

गौरव सोलंकी

औघट घाट का कबीर

प्रभाषजी राजनीति के धर्मनिरपेक्ष होने को ही इसका सबसे बड़ा धर्म माना करते थे और इससे जरा-सी भी आड़ी-तिरछी जाने वाली राजनीति को देश के लिए कतई शुभ नहीं मानते थे

प्रभाषजी के अंतिम दर्शन के बाद उनके वसुंधरा वाले घर से लौटते हुए मुझे वहां जाने-आने का सबसे आसान रास्ता मिला. सूर्या मार्बल्स के बाद जैन मार्बल्स और फिर तुरंत ही दाएं मुड़ कर करीब एक किमी चलने पर बाबूजी (मैं उन्हें बाबूजी ही कहता था) का घर आ जाता है. मैं पिछले दो सालों से वहां भूल-भुलैया रास्तों से जाता रहा और अब जब वहां जाने की एक प्रकार से वजह ही खत्म हो गई तो वहां का रास्ता मेरे लिए आसान हो गया था. प्रभाष जी अपने निर्माण विहार वाले घर से वसुंधरा ज्यादातर तब जाते थे जब उन्हें कोई लेख लिखना या एकाग्रचित्त होकर कुछ करना होता था. 5 नवंबर को भी वे वहां इसीलिए गए थे. पहले तो वहां उन्हें अपने बड़े और बढ़िया से सोनी के होम थियेटर पर भारत-ऑस्ट्रेलिया का मैच देखना था, फिर बाद में उसके बारे में अपने खड़े किए अखबार ‘जनसत्ता’ में लिखना भी था.

छह तारीख का जनसत्ता मेरी याद में शायद पहला होगा जिसमें इतने कांटे के मैच के बाद पहले पन्ने पर क्रिकेट की कोई खबर ही नहीं थी. होती भी कैसे! उस खबर को लिखने वाला खुद ही खबरों में विलीन हो गया था.

प्रभाषजी को नजदीक से या उनके लेखों के जरिए जानने वाले तमाम लोगों में दो बातों को लेकर हमेशा काफी उत्सुकता, उलझन और हैरानी रही – इतने बड़े पत्नकार, इतनी उम्र और समझदारी के बाद भी वे एक खेल – क्रिकेट – के पीछे इतने दीवाने क्यों थे? और राजनीति या धर्म से संबंधित कोई भी लेख क्यों न हो उसमें संघ और भाजपा की बखिया उधेड़े बिना उन्हें चैन क्यों नहीं आता था?

प्रभाष जी मूलत: इंदौर के रहने वाले थे जहां क्रिकेट की गौरवशाली परंपरा रही थी और सीके नायडू, मुश्ताक अली तथा चंदू सरवटे जैसे कई दिग्गज खिलाड़ी भी यहीं के थे. प्रभाष जी को भी क्रिकेट खेलने-देखने का बड़ा शौक था और जैसा कि वे अपने कई लेखों और साक्षात्कारों में लिखते और बताते भी रहे हैं कि यदि वे एक पत्नकार न बनते तो निश्चित ही खेल की बारीक समझ रखने वाले एक महान क्रिकेट खिलाड़ी होते. साथ ही वे केवल वही काम किया करते थे जिनमें उनका जी लगता था और ऐसे कार्यों को वे पूरा रस लेकर किया करते थे, फिर चाहे वह खाना-पीना हो, या लिखना या फिर संगीत सुनना, मैच देखना और कभी-कभी संगीत सुनते-सुनते क्रिकेट मैच देखना, या फिर अपने सामाजिक दायित्वों को निबाहना. क्रिकेट के लिए उनकी दीवानगी का आलम यह था कि जो वे खुद नहीं कर सके वह अपने बेटे संदीप, जो कि एक रणजी खिलाड़ी रहे हैं, और पोते माधव के जरिए पूरा करने की कोशिश करते रहे.

बाद में उनके लेखों और भाषणों के प्रमुख विषयों में दो और जुड़ गए थे – अमेरिकावादी पूंजीवाद और बिल्कुल ही हाल में जुड़ा हिंदी मीडिया का चारित्निक पतन

जहां तक हिंदुत्व, संघ और भाजपा के विरोध की बात है तो प्रभाषजी धर्म और उससे जुड़ी परंपराओं और कर्मकांड के बिल्कुल भी विरोधी नहीं थे. उन्होंने ही नीतू (मेरी पत्नी) को पिछली दीपावली पर यह समझाया था कि उसे लक्ष्मी-गणेश की पूजा करते समय मंदिर में कुछ चांदी के सिक्के भी रखने चाहिए. वे अपने घर में हर साल गणपति की स्थापना किया करते थे, पितरों की शांति के लिए हर साल श्राद्धों का आयोजन करते थे और अपने छोटे भाई सरीखे अनुपम मिश्र जी की मां के देहावसान पर पिछले साल अनुपमजी के लाख मना करने पर भी उन्होंने ही सारे कर्मकांड संपन्न कराए थे.

मगर इतना धार्मिक होने के बावजूद वे धर्म के राजनीति में घालमेल के जबर्दस्त विरोधी थे. वे राजनीति के धर्मनिरपेक्ष होने को ही इसका सबसे बड़ा धर्म माना करते थे और इससे जरा-सी भी आड़ी-तिरछी जाने वाली राजनीति को देश के लिए कतई शुभ नहीं मानते थे.

बाद में उनके लेखों और भाषणों के प्रमुख विषयों में दो और जुड़ गए थे – अमेरिकावादी पूंजीवाद और बिल्कुल ही हाल में जुड़ा हिंदी मीडिया का चारित्निक पतन. पिछले लोकसभा चुनावों में हिंदी के अखबारों में पैसा लेकर छापी गई खबरों और इसके देश पर पड़ने वाले असर को लेकर वे इतना सशंकित थे कि भारतीय प्रेस परिषद से लेकर हर उपलब्ध मंच से इसके खिलाफ जमकर अभियान चला रहे थे. इस संदर्भ में वे अक्सर मुझसे कहा करते थे कि महापंडित (उनके द्वारा मुझे दिया गया संबोधन), अपन ने सफलता से बड़ों-बड़ों को बदलते देखा है मगर तहलका से पूरे देश को बड़ी उम्मीदें हैं इसलिए बड़े ध्यान से मगर बहुत तेजी से अपना काम करने की जरूरत है.

पत्नकारिता में प्रभाष जी के सबसे बड़े अवदानों में से एक शायद यह रहा कि उन्होंने पत्नकारीय लेखन को वह भाषा दी जो हमारी जरूरतों के लिए जरूरी तेवरों वाली रोजमर्रा की हिंदी थी. कई बार जब मैं उनसे बात करता तो लगता कि जैसे मैं उन्हें सुन नहीं बल्कि पढ़ रहा हूं और कई बार उन्हें पढ़ते-पढ़ते उनके सामने होने का एहसास भी होता रहता था. उन्होंने लिखने और पढ़ने वाली हिंदी का एक तरह से फर्क ही खत्म कर दिया था.

करीब एक-सवा साल पहले किसी अमेरिकी विश्वविद्यालय के हिंदुस्तानी मूल के हिंदी के प्रोफेसर का पत्न मेरे पास आया था जिसमें उन्होंने प्रभाष जी के लिखे इनने-उनने, अपन-तुपन और ओडीशा और अमदाबाद सरीखे शब्दों के गलत होने पर अपना तीखा विरोध जताया था. जब मैंने यह बात प्रभाषजी से कही तो उनका कहना था – हाल ही में इसपर उन्होंने एक लेख भी लिखा था – कि विभिन्न बोलियों और भाषाओं के हिंदी से पारिवारिक संबंध हैं और लोग अपने स्थान और संस्कृति से जुड़ी चीजों को जैसा उच्चारित करते हैं उसे वैसा ही लिखना गलत कैसे हो सकता है? बल्कि  गलत तो तब होगा जब इन शब्दों को अंग्रेजों द्वारा अपनी सुविधानुसार दिए उच्चारणों के मुताबिक लिखा-बोला जाए.

अगर क्रिकेट की बात करें तो उन्होंने इसके लेखन में भी हिंदी के मिजाज से मेल खाते तमाम नए और आसानी से जुबान पर चढ़ जाने वाले शब्दों को ईजाद किया. इनमें से सबसे ताजा उदाहरण है, ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट को उनका दिया नाम – बीसमबीस क्रिकेट. कम लोगों को पता है कि तहलका की हिंदी पत्निका आज जैसी है उसे वैसा बनाने में प्रभाष जी का बहुत बड़ा योगदान है. पत्निका के पहले संस्करण से पहले जब अपने कम अनुभव और लांच के बहुत जल्दी होने की वजह से अक्सर मेरे पसीने छूटे रहते थे, वे अक्सर कहा करते थे – महापंडित, चिंता मत करो जरूरत पड़ी तो पत्निका के पचास-साठ पन्ने अपन अकेले ही भर देंगे. अपने स्तंभ शून्यकाल सहित पत्निका के कई स्तंभों के अनोखे नाम उन्होंने ही सुझाए थे.

15 अक्टूबर 2008 को जब मैं तहलका का पहला अंक लेकर उनके पास गया तो खूब उलट-पुलटकर पत्रिका को देखने के बाद जो सबसे पहले शब्द उन्होंने कहे, वे थे – यार, यह तो मेरी उम्मीद से कहीं बढ़िया निकली है.

जिस दिन प्रभाषजी ने यह असार-संसार छोड़ा उस दिन सुबह-सुबह उन्होंने मुझे फोन किया था. वे बड़े मस्ती-मजाक के मूड में थे. मेरे बारे में पूछा, फिर तहलका के और फिर नीतू के बारे में. फिर उससे बात भी की और फोन पर ही मालवा का एक लोकगीत जैसा कुछ सुनाया जो सास अपनी बहू के आने पर गाया करती है. वे एक दिन पहले ही पटना, बनारस और आखिर में लखनऊ की यात्ना से लौटे थे और अगले दिन ही उनका मणिपुर जाने का कार्यक्रम था मगर कहा कि अब कुछ थक-से गए हैं इसलिए वहां नहीं जाएंगे और एक सप्ताह दिल्ली में ही रहेंगे. लखनऊ के बारे में मजाक-मजाक में बोले – यार, इस बार तो अपने को बिल्कुल पत्थरों का शहर लगा लखनऊ. अब कोई बहन मायावती से कह दे कि वे इसका नाम बदल कर माया नगरी रख दें और जान छोड़ें बेचारे शहर की. फोन रखने से पहले कहा कि वे आने वाले रविवार यानी कि 8 तारीख को हमारे घर आएंगे और मैं अनुपमजी को भी उस दिन अपने घर आने के लिए कह दूं.

मगर वे शायद अपने सबसे प्रिय मित्नों – राजेंद्र माथुर, शरद जोशी, रामनाथ गोयनका और कुमार गंधर्व से मिलने की शीघ्रता में थे. वे हमारे घर नहीं आए.

अब उनके जैसा कभी कोई आएगा भी नहीं. 

संजय दुबे  

राजनीति और राजधर्म

किसी राजनीतिक दल को स्थापित करने के लिए जिन लोकतांत्रिक तकाजों की आवश्यकता होती है वे काफी श्रम और धैर्य की मांग करते हैं. तो ऐसे में अपने चाचा बाल ठाकरे के पहले से ही परिचित रास्तों पर उनसे प्रतियोगिता करना राज ठाकरे को ज्यादा सुगम लग सकता है 

महाराष्ट्र विधानसभा में 9 नवंबर को जो हुआ वह सही था या गलत, इसका फैसला करने के लिए क्या संसदीय आचार-विचार की संहिता, भारतीय लोकतंत्र के विभिन्न स्तरों पर केंद्रीय राजभाषा हिंदी या मराठी जसी राज्य स्तर की राजभाषाओं की संवैधानिक स्थिति और राज्यों के गठन में भाषा की भूमिका का इतिहास खंगालने की कोई आवश्यकता नजर आ सकती है? गांव का कोई नितांत अपढ़ व्यक्ति भी अपनी सहज बुद्धि पर जरा भी जोर डाले बिना उस दिन लोकतंत्र के सबसे बड़े से छोटे मंदिर में जो हुआ उसको सही तौर पर गलत ठहरा सकता है.

इतिहास पर नजर डालें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि स्थानीय भाषाओं की 50-60 के दशक में राज्यों के पुनर्गठन में सबसे बड़ी भूमिका रही. इसी आधार पर मद्रास प्रेसीडेंसी को विभाजित कर आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु बने; मद्रास, बॉम्बे और हैदराबाद सूबों के कन्नड़भाषी इलाकों को मैसूर प्रांत में मिलाने से कर्नाटक और खुद महाराष्ट्र भी बॉम्बे प्रांत के बचे-खुचे हिस्सों से गुजरात को अलग करने से अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुआ. आजादी से पहले सन् 1921 और 1925 में कांग्रेस ने भी अपने संविधान में स्थानीय भाषा के महत्व को अभिव्यक्ति देने वाले दो संशोधन किए थे. पहले के मुताबिक कांग्रेस को अंग्रेजों द्वारा उनकी सुविधानुसार गठित राज्यों की तर्ज पर चलते रहने की बजाय अपने सांगठनिक ढांचे को भाषायी आधार पर पुनर्गठित करना था और दूसरे के मुताबिक उसके राष्ट्रीय स्तर पर कामकाज की आधिकारिक भाषा हिंदोस्तानी और प्रांतीय कांग्रेस समितियों की भाषा स्थानीय या हिंदोस्तानी रखना तय किया गया था. गांधीजी ने भी अपनी मृत्यु से 4-5 दिन पहले दिए अपने भाषण में विभिन्न प्रांतों को भाषा के आधार पर पुनर्गठित करना यह कहकर जरूरी बताया था कि ऐसा होने पर ही शिक्षा का तीव्रता से विस्तार और राज्यों-लोगों का तीव्र गति से विकास संभव है. यानी कि राज्यों में स्थानीय भाषा के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने के आग्रह को उक्त तथ्यों की रोशनी जायज ठहरा देती है. मगर 9 तारीख सरीखे दुराग्रहों को नहीं.

वैसे भी संविधान का अनुच्छेद 210 इस बात की इजाजत देता है कि राज्य विधायिका के कार्यों का संपादन या तो राज्य की आधिकारिक भाषा या हिंदी या अंग्रेजी में से किसी भी भाषा में किया जा सकता है. पर यह बहस भाषा या संस्कृति से जुड़ी है ही नहीं. किसी राजनीतिक दल को स्थापित करने के लिए जिन लोकतांत्रिक तकाजों की आवश्यकता होती है वे काफी श्रम और धैर्य की मांग करते हैं. तो ऐसे में अपने चाचा बाल ठाकरे के पहले से ही परिचित रास्तों पर उनसे प्रतियोगिता करना राज ठाकरे को ज्यादा सुगम लग सकता है. इसी का नतीजा विधानसभा और सड़क पर मनसे और शिवसेना की तमाम उलटीपुलटी कारगुजारियों में दिखाई देता है.

चूंकि महाराष्ट्र और देश में कांग्रेसी सरकारें बन चुकी हैं और इसलिए मनसे की जरूरतें फिलवक्त कुछ कम हो चुकी हैं और हिंदीभाषी इलाकों में चुनाव भी सर पर हैं इसलिए हम और आप फिलहाल उम्मीद के कुछ हवाई पुल बांध सकते हैं. हो सकता है इस बार मनसे की कारगुजारियों पर महाराष्ट्र सरकार के राजनीतिधर्म की बजाय उसका राजधर्म जाग जाए.

संजय दुबे  

‘उस कच्चे पलस्तर में गौतम सर ने कुछ अच्छी लकीरें खींच दी थीं’

उम्र का पलस्तर जब कच्चा होता है तो उसमें पड़ने वाली लकीरें हमेशा के लिए आपमें रह जाती हैं. 1993 की बात है. शिक्षक दिवस के दिन की. मैं तब दसवीं में था. हर विशेष दिन की तरह इसे मनाने के लिए भी स्कूल में एक औपचारिक आयोजन रखा गया था. सबको पता था कि इसमें क्या होगा. जीवन में गुरू की भूमिका, डा. राधाकृष्णन, शिक्षा के क्षेत्र में भारत की महान विरासत जैसे विषयों पर वही उबाऊ भाषण होने थे जो इससे पिछले और उससे भी पिछले साल हुए थे.

दौलत, शोहरत और जवानी के बदले में बचपन की चाह वाली नई तरह की गजल मेरी समझ में ज्यादा तो नहीं आई मगर ये जरूर लगा कि इसे लिखने वाले और गौतम सर ने कुछ ऊंची बात कही हैअक्सर ऐसे मौकों पर ज्यादातर छात्र अपनी-अपनी प्रतिभा के हिसाब से टाइमपास के तरीके ईजाद कर लेते. खुसुर-फुसुर संवाद, एक-दूसरे के हाथ पर पेन और जमीन पर लकड़ी के छोटे से टुकड़े से कलाकारी, दूब की ज्यादा से ज्यादा गांठें बिना तोड़े उखाड़ने की प्रतियोगिता इनमें शामिल थे. उस दिन भी यही हो रहा था कि संचालक जी के शब्द गूंजे, ‘श्री गौतम जी इस अवसर पर एक गजल सुनाना चाहते हैं. मैं अनुरोध करता हूं कि वे मंच पर आएं और गजल पेश करें.टाइमपास में व्यस्त छात्र चौंके. बात थी ही ऐसी. हम सभी के लिए शिक्षकों के साथ भाषण शब्द अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था. मौका कोई भी हो, स्वतंत्रता दिवस, गांधी जयंती.. और मौका न भी हो तब भी हमें उनसे भाषण ही सुनने को मिलते. ऐसे में कोई टीचर अगर गजल सुनाने जा रहा हो तो छात्रों की जिज्ञासा जागनी स्वाभाविक थी.

आलोक गौतम यानी गौतम सर को नौकरी ज्वाइन किए ज्यादा समय नहीं हुआ था. वे इंटर की कक्षा को फिजिक्स पढ़ाते थे और उन्हें देखकर यकीन करना मुश्किल था कि वे टीचर हैं. उनका व्यक्तित्व शिक्षक के उन खांचों में कहीं फिट नहीं होता था जो हमारे दिमाग में बरसों से गड़े हुए थे. वे 27-28 साल के थे, स्मार्ट थे और उन्हें देखकर डर नहीं लगता था. कस्बे का न होने की वजह से उनके बारे में कई बातें उड़ती थीं. कपिल थपलियाल का कहना था कि पढ़ाई में तेज होने की वजह से उन्हें इतनी जल्दी नौकरी मिल गई तो विक्रम गुसाईं के मुताबिक वे आरक्षित कोटे से थे इसलिए एमएससी के तुरंत बाद ही नौकरी पा गए. खैर, गौतम जी मंच पर आए और खुद ही हारमोनियम थामते हुए उन्होंने गजल सुनानी शुरू की, ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो..

मेरे लिए यह बिल्कुल नई तरह का अनुभव था. दौलत, शोहरत और जवानी के बदले में बचपन की चाह वाली नई तरह की गजल मेरी समझ में ज्यादा तो नहीं आई मगर ये जरूर लगा कि इसे लिखने वाले और गौतम सर ने कुछ ऊंची बात कही है. उम्र के उस पड़ाव पर मेरी जिज्ञासा अनंत थी. मुझे लगा, कितना अच्छा हो अगर ऐसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी टीचर से बात करने का मौका मिल जाए.

मगर इंटर में जाने में अभी पूरा साल लगना था और यहां तो हाल यह था कि अपने ही टीचर्स से पढ़ाई के अलावा कोई और बात करने की हिम्मत नहीं हो पाती थी. पर शायद अपनी किस्मत अच्छी थी. कुछ दिन बाद ही पता चला कि गौतम सर एक नुक्कड़ नाटक करवा रहे हैं और उन्हें उसके लिए लोग चाहिए. मैं फौरन उनके पास पहुंच गया. रोल मिल गया और डायलॉग्स लिखे कुछ पन्ने भी. अब हर रोज आखिरी पीरियड में नाटक की प्रैक्टिस होती. जब वे समझते कि इस डायलॉग को ऐसे बोलना है तो मुझे बड़ा अच्छा महसूस होता. मेरे लिए इस तरह के व्यक्तित्व की नजर में होना ही अपने आप में बड़ी बात थी.

देखते ही देखते मैं 11वीं में भी पहुंच गया. अब गौतम सर हमें पढ़ाने लगे थे. फिजिक्स में ठीक-ठाक होने पर भी मैंने पापा से जिद करके उनसे ट्यूशन पढ़ना शुरू कर दिया. रोज सुबह मैं गौतम सर के घर पहुंचता. वे अकेले ही रहते थे. पढ़ाई से ज्यादा मेरी दिलचस्पी उनके कैसियो कीबोर्ड और कैसेट प्लेयर में थी जिसके पास जगजीत सिंह की गजलों के कैसेट पड़े रहते थे. मैं उनके घर कुछ पहले पहुंच जाता और सबके आ जाने और ट्यूशन शुरू होने तक ध्यान से गजलें सुनता हुआ उनके मायने समझने की कोशिश करता. गौतम सर चलता-फिरता एनसाइक्लोपीडिया भी थे. कंप्यूटर, किताबों, फिल्मों से लेकर भूत-प्रेत तक मैं उनसे हर तरह के सवाल पूछा करता और उनके पास मेरी हर जिज्ञासा को शांत करने वाला जवाब होता. काफी हद तक ये उनकी सोहबत का ही नतीजा था कि मैं जगजीत सिंह की गजलों, अच्छी फिल्मों और किताबों का मुरीद हो गया. गनीमत रही कि ये सब करते हुए भी फिजिक्स में बुरे नंबर नहीं आए.

आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि उम्र के उस को पलस्तर में गौतम सर ने अनजाने ही कुछ अच्छी लकीरें खींच दी थीं जिनकी छाप हमेशा के लिए मुझमें रह गई है.                                                                            

विकास बहुगुणा

30 वर्षीय विकास पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं  

कर्मन की गति न्यारी

कर्ज की हमको दवा बताई 

कर्ज ही थी बीमारी

साधो!

कर्मन की गति न्यारी.

गेहूं उगे शेयर नगरी में

खेतों में बस भूख उग रही

मूल्य सूचकांक पे चिड़िया

गांव शहर की प्यास चुग रही

कारखानों में हाथ कट रहे

मक़तल में त्यौहारी,

साधो!

कर्मन की गति न्यारी.

बढ़ती महंगाई की रस्सी

ग्रोथ रेट बैलेन्स बनाए

घट-बढ़ के सर्कस के बाहर

भूखों का दल खेल दिखाए

मेहनत-किस्मत-बरकत बेचे

सरकारी ब्योपारी,

साधो!

कर्मन की गति न्यारी.

शहर-शहर में बरतन मांजे

भारत माता ग्रामवासिनी

फिर भी राशन कार्ड न पाए

हर-हर गंगे पापनाशिनी

ग्लोबल गांव हुई दुनिया में

प्लास्टिक की तरकारी,

साधो!

कर्मन की गति न्यारी.

अंशु मालवीय 

                                       

 

 

 

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एक कलम बापू के नाम

जब तक कोई उनके नाम का उपयोग उनके विचारों के बिल्कुल ही उलट न करे तब तक उनकी छवि और नाम का उपयोग करने वालों से मुझे कोई दिक्कत नहीं है 

मैं बापू के नाम का ठेकेदार नहीं हूं. जब तक कोई उनके नाम का उपयोग उनके विचारों के बिल्कुल ही उलट न करे तब तक उनकी छवि और नाम का उपयोग करने वालों से मुझे कोई दिक्कत नहीं है. जब तक कोई बंदूक निर्माता या फिर शराब कंपनी वाला उनके नाम का इस्तेमाल नहीं कर रहा है तब तक सब ठीक है. मो ब्लां कंपनी उच्चस्तरीय उत्पादों का निर्माण करती है और लेखकों, चित्रकारों और दुनिया भर के नेताओं का सम्मान करने की उसकी पुरानी परंपरा रही है. 11.39 लाख रुपए कीमत वाली ये संग्रहणीय कलम उनकी बापू को श्रद्धांजलि है. कलम की कीमत को लेकर लोगों की भावनाओं को समझ जा सकता है लेकिन किसी को उन लोगों को रोकने का अधिकार नहीं है जो बापू के नाम का इस्तेमाल कर उन्हें सम्मानित करना चाहते हैं. ये मेरे लिए भी एक अनुभव है कि कोई कलम इतनी महंगी भी हो सकती है. जब मो ब्लां ने मेरी संस्था को चंदा देने की पेशकश की तो मैंने दिलीप दोषी, जिनकी कंपनी भारत में इन कलमों का वितरण करती है, से मजाक में पूछा था – क्या आप मुझे एक कलम देंगे?’ इसकी कीमत की जानकारी मुझे काफी बाद में हुई. ये भी एक विवाद का विषय बन गया कि मैंने उनका उपहार स्वीकार कर लिया.

मो ब्लां ने, बिना मेरे कहे निर्धन बाल श्रमिकों के स्कूल का भवन बनाने के लिए अच्छी खासी रकम भी दान में दी है. महात्मा गांधी फाउंडेशन ने पहले से ही महाराष्ट्र के कोल्हापुर में इन बच्चों के लिए एक बढ़िया आवासीय परिसर बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन खरीद रखी है. इसके लिए उन्होंने हमें 72 लाख रुपए का अनुदान दिया है.

अब सेंटर फॉर कंज्यूमर एज्यूकेशनने केरल हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दी है. मामले को तेजी से निपटाया जा रहा है. ऐसा कैसे किया जा सकता है जबकि हत्यारे यहां आजाद घूम रहे हों, निर्दोष लोग याचिकाओं के लटकने के कारण जेलों में सड़ रहे हों? ‘सेंटर फॉर कंज्यूमर एज्यूकेशनका तर्क है कि कलम पर बापू के नाम का इस्तेमाल राष्ट्रीय प्रतीक कानून का उल्लंघन है. यहां बापू की छवि वाले टी-शर्ट से लेकर तमाम उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं, यहां तक कि यादगार के रूप में सोने के सिक्के भी. लोग उनका तहे दिल से सम्मान करते हैं यहां तक कि उनके जीवनकाल में भी ऐसा ही था. विरोध करने वालों का तर्क उस हालत में समझा जा सकता था जब मो ब्लां बापू को अपने ब्रांड अंबेसडरके रूप में पेश करती. लेकिन कंपनी का महात्मा गांधी से जुड़ाव सिर्फ एक विशेष श्रंखला की कलम के लिए है. जो लोग ऐसा मानते हैं कि बापू का उपयोग सिर्फ भारतीय उत्पादों लिए किया जाना चाहिए किसी विदेशी कंपनी के लिए नहीं उन्हें ये भी याद रखना चाहिए कि बापू भारतीय सीमाओं से परे जा चुके हैं. आज पूरी दुनिया उन्हें अपना मानती है. एक इतालवी टेलीकॉम कंपनी ने अपने विज्ञापन में बापू का इस्तेमाल किया था और उसे हाल ही में पुरस्कार मिला है. एप्पल कंप्यूटर्स अपने विज्ञापनों में उनका इस्तेमाल करती है. इसकी वजह यही है कि कोई भी बड़ी आसानी से खुद को बापू से जोड़ सकता है. उनकी मशहूर रेखाचित्र वाली छवि की चर्चा पूरी दुनिया में हुई और इसे पूरी दुनिया में कहीं भी पहचाना जा सकता है. यही चीजें कंपनियों को आकर्षित करती हैं. लोगों की स्मृतियों में उनके विचारों को जिंदा रखने के लिए हमें सभी संभव माध्यमों का इस्तेमाल करना चाहिए. ध्यान सिर्फ इस बात का रहे कि वो बापू के विचारों के खिलाफ न हों. भ्रष्ट नेता अपनी छवि चमकाने के लिए लगातार उनका इस्तेमाल करते रहते हैं. मो ब्लां ने तो इसकी तुलना में कुछ भी नहीं किया है.

शुद्धतावादी गांधीवादी हमेशा मेरे पीछे पड़े रहते हैं. ये लोग बापू से भी बड़े महात्मा बन गए हैं और गांधीवाद के प्रति उन्होंने अपनी सोच को जड़ कर लिया है. बापू अंतिम क्षणों तक खुद को परिमार्जित करते रहे. अनुभवों के साथ उनके विचार भी बदलते रहे. इसलिए वो लोगों से कहा करते थे कि अगर मेरे विचारों में कोई विरोधाभास हो तो मेरे आखिरी विचार को मानें. जबकि ऐसे गांधीवादी उन्हें 30 और 40 के दशक में ही समेटे रखना चाहते हैं. उन्हें इस तरह की बंदिशों में समेटना अनैतिक होगा. जब बापू की मर्यादा के साथ खिलवाड़ हो रहा था तब तो इन लोगों ने कोई विरोध नहीं जताया. ये कहने का अधिकार किसको है कि महंगी वस्तुएं बनाने वालों को बापू की छवि का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए?

तुषार गांधी 

लेखक महात्मा गांधी के प्रपौत्र और महात्मा गांधी फाउंडेशनके मुखिया हैं

  

यह बिग बॉस कौन है?

चैनलों को कवि नहीं, अभिनेता चाहिए. क्योंकि कवि बाजार के साथ नहीं है अभिनेता बाजार के साथ है. कवि मुश्किल सवाल पूछता है, अभिनेता आसान सपने बेचता है 

11 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन का जन्मदिन पड़ता है, मेरे सामान्य ज्ञान में यह इजाफा पिछले कुछ वर्षों में टीवी चैनलों की सक्रियता ने किया है. अमिताभ भले उकता जाएं, वे मनाएं न मनाएं, टीवी चैनल धूमधाम से उनका जन्मदिन मनाते हैं. बताने की जरूरत नहीं कि यह अमिताभ या हिंदी फिल्मों के प्रति उनकी संवेदनशीलता का नहीं, टीआरपी होड़ का नतीजा है.

लेकिन इन वर्षों से टीवी चैनल जो अमिताभ बच्चन बनाते और बेचते रहे हैं, क्या यह वही नाराज नौजवान है जो करीब तीन दशक पहले जंजीर’, ‘दीवार’, ‘शोले’, ‘त्निशूल’, ‘लावारिस’, ‘डॉनया मुकद्दर का सिकंदरजैसी फिल्मों के सहारे उत्तर भारत के मध्यवर्गीय नौजवान की हसरतों और उम्मीदों को, उसकी हताशा और गुस्से को आवाज दिया करता था?

बदकिस्मती से हमारे जाने-अनजाने इन्हीं वर्षों में हिंदी फिल्मोद्योग बॉलीवुड में बदलता चला गया है और अमिताभ बच्चन बिग बी हो चुके हैं. पहले कभी जब मुंबई के फिल्मोद्योग को बॉलीवुड पुकारा जाता था तो एक क्षीण सा प्रतिरोध सुनाई पड़ता था कि इस नाम में हॉलीवुड की सतही नकल की छाप दिखती है. अब न मौलिकता का ऐसा कोई दावा बचा है न वह देशज अभिमान, जो हिंदी फिल्मों की दुनिया के बॉलीवुड कहलाने पर एतराज करे.

यही स्थिति हमारे अमिताभ बच्चन की हुई है. यह वह नायक नहीं है जो गिरे हुए सिक्के उठाने से इनकार करता था, यह वह नायक है जो करोड़पति बनाने का धंधा करता है. यह वह नायक नहीं है जो अपनी खुद्दारी और अपने ईमान को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानता था, यह वह बिग बॉस है जो अपने घर से रियलिटी शो का दैनिक तमाशा बेचता है, यह वह लावारिस या नमकहलाल नहीं है जो सिर्फ अपने होने से एक भरोसा जगाता था, यह वह गॉडफादरहै, जिसे अपनी फैमिलीकी फिक्र है. निश्चय ही यह अमिताभ सच नहीं है जैसे पिछला अमिताभ सच नहीं था. दोनों एक अवास्तविक दुनिया रचते हैं. पिछला अमिताभ एक झूठी उम्मीद बेचता था, नया अमिताभ एक नकली सपना बेचता है. अमिताभ बच्चन अक्सर यह कहते भी रहे हैं कि वे बस कलाकार हैं और उनका काम मनोरंजन करना है.

लेकिन किसी कला या मनोरंजन में हम क्या खोजते हैं, उसे किस रूप में ढालना चाहते हैं, इस बात में कुछ हमारी समझ भी झांकती है, कुछ हमारा समाज भी बोलता है. मनोरंजन के उद्योग में आज बिग बी अमिताभ बच्चन पर इसलिए भारी है क्योंकि वक्त बदल गया है, देश बदल गया है. मेहनतकश हिंदुस्तान दौलतमंद हिंदुस्तान होने का सपना देख रहा है. संकट यह है कि इस सपने की भी कोई देसी शक्ल नहीं है. यह उधार का सपना है जो बाहर से आया है. हम इस सपने को जी रहे हैं, बिना यह जाने कि यह हमारी मौलिकता पर कितना भारी पड़ रहा है, किस बुरी तरह हमें इस भूमंडलीकृत दुनिया में दूसरे दर्जे का सांस्कृतिक नागरिक और छिछला उपभोक्ता बनाकर छोड़ रहा है.

हमारे समाचार चैनलों में भी यह छिछलापन दिख जाता है. इसलिए अमिताभ के जन्मदिन की खबर उतरने का नाम नहीं लेती तो हिंदी के कवि कुंवरनारायण को देश का सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान मिलने की ख़बर कहीं दिखती तक नहीं. अमिताभ हिंदी के एक बड़े कवि के बेटे हैं. अपने जन्मदिन पर भी पिता हरिवंश राय बच्चन को उन्होंने याद किया. वे मानते रहे हैं कि उनके बाबूजी उनसे काफी बड़े थे. लेकिन चैनलों को कवि नहीं, अभिनेता चाहिए. क्योंकि कवि बाजार के साथ नहीं है अभिनेता बाजार के साथ है. कवि मुश्किल सवाल पूछता है, अभिनेता आसान सपने बेचता है.

सवाल है, कवि अगर टीआरपी नहीं ला सकता तो टीवी उसे क्यों दिखाए? जवाब है कि टीआरपी के आखिरी सत्य तक पहुंचने के रास्ते में भी बहुत सारे घुमावदार मोड़ हैं. आप शॉर्टकट लेते हैं तो उन बहुत सारे रास्तों और वास्तों को काट भी देते हैं जो आपके और आपकी व्यावसायिक सफलता के भी काम आ सकते हैं. संकट यह है कि अपने समाज के घुमावदार मोड़ों को पहचानने का, उसके साथ खड़ा हो पाने का आत्मविश्वास टीवी चैनलों में नहीं है. इसलिए उन्हें देसी कवि हरिवंश राय बच्चन का बेटा अमिताभ नहीं, बेटे-बहू और पत्नी के साथ अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के छोरों को छूती एक ग्लोबल फैमिली का बिग बॉस चाहिए. 

प्रियदर्शन

लेखक एनडीटीवी इंडिया में समाचार संपादक हैं 

मौन कान्हा की बंसी


चक्र सुदर्शन

 

यमुना लाखों वर्ष सेथी जीवन की डोर,

लहराती हरियालियां,  खुशहाली चहुं ओर.

खुशहाली चहुं ओरहो गई अब विध्वंसी,

मछली तक मर जांयमौन कान्हा की बंसी.

चक्र सुदर्शनकंसों ने वो कचरा डाला,

यमुना मैयातुझको बना दिया यमुनाला. 

                                                 अशोक चक्रधर

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