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भांति-भांति के भूत

जैसे भांति-भांति के लोग होते है, वैसे ही भांति-भांति के भूत. इसलिए एक भूत गंभीर है तो दूसरा हंसोड़. दोनों का नेचर अलग, मगर समस्या एक ही. टाइम पास नहीं होता था. सो टाइम पास करने के लिए वे खंडहर की खिड़की से आने-जाने वाले राहगीरों को देखा करते थे. गंभीर भूत का इतने से काम चल जाता था. लेकिन हंसोड़ भूत का मन नहीं भरता था इसलिए वह कभी-कभी शहर के चक्कर मार आता. चुपके से बबलगम भी खाता. 

आज बैठे-बैठे हंसोड़ भूत बोर हो गया. मन बहलाने के लिए वह कहीं जाने की सोचने लगा, तभी हवा के तेज झोंके के साथ लहराता हुआ अखबार का एक टुकड़ा उससे टकराया. वह समय काटने के लिए अखबार पढ़ने लगा. पढ़ते-पढ़ते हंसोड़ भूत जोर से हंसा. वह हंसता ही रहा. गंभीर भूत ने मन ही मन सोचा कि ऐसा कौन-सा चुटकला पढ़ लिया है इसने! उसकी हंसी रोके न रुक रही थी. वह अपने स्वभाव से हंसोड़ तो था ही, लेकिन अब ऐसा भी क्या! हंसी का रहस्य जानने के लिए गंभीर भूत ने अखबार उसके हाथों से छीन लिया.

जब उसने वह खबर पढ़ी तो समझ पाया कि क्यों हंसोड़ भूत के सिर पर हंसी का भूत सवार हो गया है. वह बोला, ‘तुम ऐसी गंभीर बात पर हंस कैसे सकते हो? मरे हुए लोगों के नाम से पेंशन जारी हो रही है. यह तो धांधली है.’ हंसोड़ भूत ने किसी तरह से अपनी हंसी रोकी और बोला, ‘नहीं…इसे कहते हैं योजना का फली…भूऽऽऽत होना.’  यह कहकर हसोड़ा भूत खी-खी करके फिर हंसने लगा.

हंसते-हंसते हंसोड़ भूत बोला, ‘लगता है कि आज मैं हंसते-हंसते मर जाऊंगा!’  यह सुनते हुए गंभीर भूत अतिगंभीर हो गया. बोला, ‘मर कर भी चैन कहां मिला? भूत होकर भी हम तो एक अदद आशियाने के लिए भटक रहे हैं.’ हंसोड़ भूत की हंसी यकायक थम गई. बोला, ‘यार, फिर भी हम अच्छे हैं, वहां तो न जाने कितने, जीते जी भटक रहे हैं.’ ‘हां, मगर उनके पास अपनी काया तो है… काश हम भी…’,  गंभीर भूत ने यह कह कर लंबी सांस खींची.

हंसोड़ भूत बोला ‘भूतकाल को भूल जाओ… वैसे देखा जाए तो हम जिस देश के भूत हैं वहां के अधिकांश जन हमारे जैसे ही हैं, कोई खास फर्क नहीं हैं, हम भी बेचैन आत्माएं हैं और वे भी!’ ‘ फर्क  कैसे नहीं है.. माना कि उनकी आत्मा भी बेचैन है, मगर उनके पैर सीधे और हमारे पैर उल्टे हैं, दिखता नहीं…’, गंभीर भूत ने कहा. ‘अगर मैंने सिद्ध कर दिया कि हमारे और उनके बीच कोई मूलभूत अंतर नहीं है तो…’ हंसोड़ भूत किसी दार्शनिक की तरह बोला. ‘तो… जो तू बोल…’ गंभीर भूत उचक कर बोला. ‘फिर मेरे साथ खूब हंसेगा!’  हंसोड़ भूत एक आंख दबाकर बोला. ‘ठीक है पहले तू सिद्ध कर,’ गंभीर भूत ने चुनौती दी.

फिर क्या था! हंसोड़ भूत गंभीर भूत का हाथ पकड़ कर सायं-सायं उड़ने लगा. उड़ने से पहले उसने गंभीर भूत की आंख पर काली पट्टी बांध दी थी. थोड़ी देर उड़ने के बाद एक जगह रुक कर हंसोड़ भूत बोला, ‘शांत हो कर सब कुछ सुनता जा!’ गंभीर भूत सुनने लगा; ‘चले आते हो मुंह उठाएं मेरे पास… मेरे पास और दूसरा काम नहीं है क्या, हूंऽऽऽ’ ‘कल आना.’ ‘कल, कल, कल करके आज महीनों हो गए!’ ‘हैं कि नहीं है!’ ‘बिना चढ़ावा चढ़ाए काम नहीं होगा.’ ‘इतने दिनों से भटक रहा हूं.’ ‘किसी से कहलवाओ न!’ ‘हद है यार, इत्ते से काम के लिए एडि़यां घिस गईं.’ ‘ले लो… ले लो…बडे़ बाबू, भागते भूत की लंगोटी ही सही!’ ‘लातों के भूत बातों से नहीं मानेंगे!’ 

अब गंभीर भूत से रहा नहीं गया.  झट से उसने अपनी आंखों से पट्टी उतार दी. उसने खुद को विकास भवन में पाया. उसने वहां जो देखा तो सहसा विश्वास नहीं हुआ. वहां से बहुत सारे लोग उल्टे पांव लौट रहे थे. हंसोड़ भूत बिना हंसते हुए बोला, ‘माना हमारे पांव उल्टे हैं, मगर यहां तो रोज न जाने कितने उल्टे पांव लौटाए जाते हैं. तभी तो हम जैसे भूतों को पेंशन मिलती है और अपने जीते जी आम आदमी को अपने हक-हकूक के लिए भूत बन कर भटकना पड़ता है.’

गंभीर भूत अपने भूत बनने पर अभिभूत था. हंसोड़ भूत के कहे की आधारभूत बात उसकी समझ में आ चुकी थी.    

-अनूप मणि त्रिपाठी

खतरा बाकी है

कोकराझार की आग भले ही अब शांत पड़ती दिखती  हो, लेकिन अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर पूर्वोत्तर के दूसरे हिस्सों में पारा चढ़ने लगा है. रतनदीप चौधरी की रिपोर्ट.

दो सितंबर को यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के एक धड़े ने असम के तिनसुकिया जिले में एक रैली की. लोगों को संबोधित करते हुए इसके नेता जतिन दत्ता का कहना था, ‘ऊपरी असम में अवैध रूप से आए बांग्लादेशियों के खिलाफ हम आंदोलन करेंगे. हमने तिनसुकिया जिला प्रशासन से निवेदन किया है कि अवैध प्रवासियों को किसी भी हाल में जिले में न घुसने दिया जाए. यदि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लेती तो यहां के मूल निवासियों का उस पर से भरोसा उठ जाएगा.’ जवाब में तालियों की इतनी तेज गड़गड़ाहट गूंजी जो केंद्र से वार्ता के समर्थक उल्फा के इस धड़े को पहले कभी नसीब नहीं हुई थी.

यह सिर्फ एक उदाहरण है जो बताता है कि असम के कोकराझार और इससे सटे इलाकों में अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर भड़की आग भले ही अब शांत हो रही हो मगर राज्य के दूसरे हिस्सों और पूर्वोत्तर के कई दूसरे राज्यों में अब यह मुद्दा गरम होने लगा है. ऊपरी असम के सभी प्रमुख संगठन इस मुद्दे पर एकजुट होते दिख रहे हैं. अवैध घुसपैठ के खिलाफ छात्र संघों और युवाओं के मंचों ने उल्फा के पूर्व कमांडर प्रबल नोग के साथ हाथ मिला लिए हैं. उल्फा के वार्ता समर्थक धड़े की मूल मांगों में अवैध प्रवासियों की पहचान करके उन्हें वापस भेजना हमेशा से ही शामिल रहा है. ऐसे में इस बार मिलने वाला जनसमर्थन उसे मजबूती दे सकता है. पिछले सप्ताह ऊपरी असम के शिवसागर जिले में लगभग 15,000 और जोरहाट जिले में लगभग 12,000 लोग एक प्रदर्शन में हिस्सा लेते हुए अवैध रूप से आए बांग्लादेशियों के तुरंत निर्वासन की मांग उठा चुके हैं. 

असम आंदोलन में सक्रिय रहे बुजुर्ग नृपेन चौधरी कहते हैं कि लोगों के इस विरोध को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए. समस्या के कारणों के बारे में बताते हुए वे कहते हैं, ‘यदि असम समझौते को पूरी तरह लागू किया जाता तो आज हालात ऐसे नहीं होते. सभी राजनीतिक दल इसके लिए दोषी हैं जिन्होंने असम समझौते और अवैध प्रवासियों से जुड़े सवालों को राजनीतिक मुद्दा बनाकर इसे अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया है.’ उनका आरोप है कि सत्ताधारी कांग्रेस और असम गण परिषद इसमें अपना राजनीतिक लाभ ढूंढ़ रहे हैं. 

मणिपुर सरकार ने 30 अगस्त से अवैध प्रवासियों की पहचान का अभियान शुरू किया है. इस अभियान के तहत बांग्लादेश और म्यांमार से अवैध रूप से आए 43 लोगों को पूर्वी इम्फाल और थोउबाल जिले से गिरफ्तार भी किया गया है. विरोध का रुख सिर्फ असम तक सीमित नहीं है. मणिपुर के सीमावर्ती शहर जिरिबाम में बीते दिनों लगभग 100 अवैध प्रवासियों को सीमा से ही वापस भेज दिया गया. मणिपुर सरकार ने 30 अगस्त से अवैध प्रवासियों की पहचान का अभियान शुरू किया है. इस अभियान के तहत बांग्लादेश और म्यांमार से अवैध रूप से आए 43 लोगों को पूर्वी इम्फाल और थोउबाल जिले से गिरफ्तार भी किया गया है. मणिपुर पुलिस की स्पेशल ब्रांच के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, ‘असम में हुए दंगे के बाद एक ही दिन में असम-मणिपुर सीमा के पास 60  अवैध प्रवासियों की पहचान हुई है. हमें शक है कि असम से कई लोग भाग कर मणिपुर में घुसने की कोशिश में हैं. हमने असम पुलिस से भी इस बारे में बात की है.’  

उधर, एक और राज्य मेघालय में भी इस मुद्दे पर विरोध शुरू हो चुका है. प्रदेश के 10 प्रभावशाली संगठनों ने विदेशी प्रवासियों के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी है. वे राज्य सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि वह राज्य में इनर लाइन परमिट की व्यवस्था लागू करे. गौरतलब है कि इससे राज्य से बाहर का कोई व्यक्ति बिना यह परमिट लिए राज्य में दाखिल नहीं हो सकता. फेडेरेशन ऑफ खासी-जैंतिया एंड गारो पीपल के कार्यकारी अध्यक्ष जो मार्वेन तहलका से बातचीत में कहते हैं, ‘हमें चाहिए कि आने वाले विधान सभा सत्र में राज्य के सभी 60 जनप्रतिनिधि इनर लाइन परमिट के मुद्दे को सदन में उठाएं और उसे लागू किए जाने पर चर्चा हो.’ वर्तमान में उत्तर-पूर्व के तीन राज्यों में ही इनर लाइन परमिट लागू किया गया है. ये राज्य हैं अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड. उधर, मेघालय के मुख्यमंत्री मुकुल संगमा ने शिलांग में पत्रकारों से वार्ता करते हुए कहा, ‘हमारी सरकार इनर लाइन परमिट के खिलाफ नहीं है बल्कि हम एक मजबूत कानून बनाना चाहते हैं जो इनर लाइन परमिट से भी ज्यादा प्रभावशाली होगा.’

पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में सामाजिक संगठनों ने स्थानीय व्यापारियों, ठेकेदारों और होटल मालिकों से अनुरोध किया है कि वे अवैध रूप से आए प्रवासियों को काम न दें. नागालैंड में नागा काउंसिल नामक एक सामाजिक संगठन ने तो बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की भी मांग उठाई है. गुवाहाटी के एक दैनिक अंग्रेजी समाचारपत्र के प्रबंध संपादक राजीव भट्टाचार्य कहते हैं, ‘स्थानीय और बाहरी लोगों के बीच जमीन और अधिकारों की लड़ाई का यहां पुराना इतिहास रहा है. समस्या यह है कि अगर मणिपुर या मेघालय में कोई हादसा होता है तो प्रवासी यहां असम में आ जाएंगे और अगर यहां उनको रोका गया तो वो देश के किसी और राज्य की तरफ कूच कर जाएंगे.’

बांग्लादेश सीमा से लगते त्रिपुरा में राज्य पुलिस की एक इकाई द्वारा करीब दो लाख लोगों की पहचान की गई है जो बांग्लादेश से अवैध रूप से आए हैं. गौरतलब है कि त्रिपुरा और बांग्लादेश के बीच 856 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है. वैसे बाकी राज्यों में भी अवैध घुसपैठियों की संख्या कम नहीं है. 

कोकराझार के हालात तो देश कुछ दिनों पहले तक देख ही चुका है. अब मूल निवासी बनाम प्रवासी की यह लड़ाई फैलती जा रही है. समय रहते इसका स्थायी समाधान नहीं किया गया तो देश में कई इलाके कोकराझार की राह जाते दिख रहे हैं.

सही है जो, क्यों न हो

जीवित रहने के लिए हर समाज को खुश रहने और भूलते रहने की आवश्यकता होती है. हल्की-फुल्की बेवकूफियां और स्मृतिलोप न हों तो जीवन एक बोझ बनकर बस काटने भर का रह जाएगा जीने लायक नहीं.

मगर याद रखना और दुखों से दो-चार होना भी कम जरूरी नहीं. कुछ दुख ऐसे होते हैं जिन्हें भूलना उचित नहीं और कुछ घाव ऐसे होते हैं जिन्हें खुला रखने की हिम्मत करनी ही चाहिए, ताकि उनके पीछे की कहानियों से जरूरी सबक लिए जा सकें. अगर ये दुख और घाव अन्याय होने और न्याय पाने के संघर्ष का हिस्सा हों तब ऐसा किया जाना और भी जरूरी है. जब कोई व्यक्ति सभ्यता के मान्य सिद्धांतों के बाहर जाकर कुछ भी अमानवीय करता है तो फिर उसे अपने ऐसे किए का दंश भुगतना ही चाहिए. जब कोई अपनी पाश्विक वृत्तियों के चलते दूसरों के साथ गलत करता है तो उसे शर्म और पछतावे के ताप को अनुभव करना ही चाहिए.

जो सामाजिक सौहार्द को बढ़ाने या बिगड़ने से रोकने के नाम पर हमें 2002 के गुजरात या 1984 की दिल्ली को भूल जाने को कहते हैं, वे गलत हैं. हम अपनी गलतियों को दुरुस्त नहीं करते हैं, इसलिए उन्हें दोहराते रहते हैं. गलतियों का यह दोहराव हमें कभी सुधरने नहीं देता.

यहूदी अपने भीषण दुखों को बड़े जतन से सहेजते हैं और उन्हें ऐसे हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं जो उनकी सुरक्षा करता है और कुछ करने के लिए उकसाता है. हमें अपनी विविधताओं-जटिलताओं के चलते और वैसे भी ऐसे किसी उकसावे की जरूरत नहीं, लेकिन जो कुछ नरौदा-पाटिया मामले में हुआ वैसा तो किया ही जाना चाहिए. मायाबेन कोडनानी (तस्वीर में) और बाबू बजरंगी को उनके अपराधों की सजा अदालत ने दी है न कि किन्हीं ऐसों ने जो संविधान के दायरे के बाहर जाकर काम कर रहे थे. हमें अपने दुखों को याद करने, उन्हें दूर करने और खुद को सुधारने के लिए ऐसे ही रास्तों को अपनाना होगा. थका देने वाले कानून के ऐसे रास्ते जिन पर गवाहियों और सबूतों के पहाड़ों को काटकर हमें बिना थके आगे बढ़ना होता है.

वर्ष 2002 में तीन दिन तक गुजरात पर मानो कहर बरपा. 10 साल में ही सही न्याय की किताब के कुछ पन्नों को बंद करने का काम शुरू हो गया है. हम सभी को इस पर गर्व होना चाहिए. 2002 में तीन दिन तक हजारों हिंदू अपने बारे में एक बाहरी और खतरनाक विचार के बहकावे में रहे. मगर पिछले 10 साल में सैकड़ों हिंदू – वकील, सामाजिक कार्यकर्ता पत्रकार, राजनेता – पीड़ित और मारे गए मुसलमानों के न्याय और अधिकार की लड़ाई भी लड़ते रहे. हम सभी को इस पर भी अभिमान होना चाहिए.

भले ही गुजरात, संघ परिवार की अतियों का परिणाम हो, राजधर्म के बोध का खत्म होना एक बड़ी समस्या है और इससे कोई भी दल या सरकार अछूती नहीं है. हमारे चारों ओर कानून के मुताबिक चलने वाले ऐसे शासन का वायदा, जो आंखों और दिल दोनों को ठीक लगे, तार-तार पड़ा नजर आता है. हद दर्जे की धूर्तता और लालच के दो पैरों पर खड़ा शासन हमें हर बीते दिन के साथ कुछ और भी छोटा किए जा रहा है. यहां भी हमें गुजरात के अभियान से ही अपने पाठ सीखने होंगे. हमें असंवैधानिक तरीकों की बजाय कानून के दायरे में रहकर, जरूरी तर्कों और संयमित भाषा में, सिद्धांतों न कि छुद्र पहचान के आधार पर जुटाए लोगों के बल पर अपनी लड़ाई लड़नी होगी.

‘दारु-विमर्श तथा अन्य स्वास्थ्यवर्धक बातें’

क्या दारू स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हो सकती है? क्या शुगर फ्री टाइप की चीजें या जीरो कैलोरी ड्रिंक्स वगैरह लेने से वजन नहीं घटता? आपका लेख पढ़कर तो ऐसा ही लगा. कभी एंटीऑक्सीडेंट्स क्या होते हैं, यह भी तो बतला दें. कहते हैं कि स्वस्थ रहने में इनका भी बड़ा रोल होता है, साहब.

मेरे पिछले कॉलम (मेटाबॉलिक सिंड्रोम) के छपने के बाद बहुतों ने मुझे फोन करके ये बातें कीं. विशेष तौर पर अल्कोहल को लेकर तो कई पाठक आश्चर्य प्रकट करने लगे कि दारू भी क्या स्वास्थ्यप्रद हो सकती है? एक-दो ने तो इसे मेरे व्यंग्यकार पक्ष से जोड़ने की कोशिश की और माना कि बात मजाक में लिखी गई होगी. कॉलम की अपनी सीमा होती है. मेटाबॉलिक सिंड्रोम में कदाचित ये बातें इस विस्तार से नहीं बता पाया तभी इतने भ्रम तथा प्रश्न उठे हैं. आज मैं दारू, बनावटी मिठास वाले प्रॉडक्ट्स और एंटीऑक्सीडेंट नाम की बला के बारे में कुछ ऐसी बातें बताता हूं कि आप भी कहेंगे कि वाह, क्या बात है.

दारू लाभदायक भी हो सकती है.

दारू से हमारा तात्पर्य है- बीयर, वाइन और व्हिस्की जैसी अन्य कोई भी दारू. सुना तो यही था कि दारू पीना बुरी बात है. इससे अल्सर, लीवर सिरोसिस और न जाने क्या बीमारियां हो जाती हैं. यह भी पता था. पी के नाली में घुस जाते हैं, यह तो स्वयं देखा भी था, बल्कि एकाध बार तो स्वयं ही घुस गए थे. फिर? फिर कोई कैसे कह सकता है कि यह स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है, मेटाबॉलिक सिंड्रोम कंट्रोल करती है, डायबिटीज, हार्ट अटैक आदि खतरे भी कम कर सकती है?

हां, यह सत्य है.

दारू यदि कंट्रोल डोज में ली जाए तो ये सारे फायदे हो सकते हैं, ऐसा कई अध्ययनों से सिद्ध हो चुका है. पर यह कंट्रोल डोज क्या है? फिर कब लेना ठीक कहाएगा? यह माना गया है कि रात के खाने से ठीक पहले यदि दो (पुरुषों के लिए) या डेढ़ (महिलाओं के लिए) ड्रिंक्स लिए जाएं तो यह फायदा पहुंचाएगी. अब आप पूछोगे कि एक ड्रिंक का क्या मतलब? तो सुनिए, एक ड्रिंक्स का मतलब है 360ml बीयर, 150ml वाइन या फिर 45ml की तथाकथित हार्ड ड्रिंक्स. अब इसे डेढ़ से दो ड्रिंक्स के हिसाब से लगा लें. बस इतना लें. वाइन में भी रेड वाइन.

हां! इस डोज को पार किया कि दारू के उल्टे असर शुरू. वहां फिर वे सारी बीमारियां शुरू जिनके कारण दारू बदनाम है. यदि दारू को नशे या किक प्राप्त करने के लिए न पीकर स्वास्थ्यवर्धक दवाई के तौर पर पीना चाहते हैं तो पी सकते हैं. नशे के लिए पीने वाला कुछ समय बाद ही इस सुरक्षित डोज को पार कर जाता है और कहीं का नहीं रह जाता. गड़बड़ बस इतनी है. वर्ना इस सुरक्षित डोज में दारू क्या-क्या लाभ पहुंचा सकती है, इसकी लिस्ट लंबी है. बताता हूं:

क्या आप जानते हैं कि इस मात्रा में दारू एक बेहतरीन इंसुलिन सेसीटाइजर है?

तात्पर्य यह कि दारू का डोज इंसुलिन के प्रभाव को बढ़ाता है जिसके कारण ब्लड शुगर बेहतर कंट्रोल होता है. देखा गया है कि रात में खाने से ठीक पहले यदि ‘रेड  वाइन’ का एक ग्लास पी लें तो एक स्वस्थ व्यक्ति में भोजन के बाद का  ’ब्लड शुगर लेवल’ 30% तक कम हो सकता है. यही प्रभाव डायबिटीज और मेटालॉजिक सिंड्रोम में भी देखा गया है. बीयर और अन्य दारूओं से भी यह 20 % तक कम हो सकता है. 

खाना खाने के बाद की ’ब्लड शुगर’ कम होने से क्या फायदा है? फायदा है न. फायदा समझने के लिए पहले यह वैज्ञानिक तथ्य समझें कि जब हम भोजन करते हैं तो खाना खाने के बाद का ’ब्लड शुगर’ लेवल बढ़ सकता है जो शरीर चलाने के लिए जरूरी भी है. पर यह बढ़ा लेवल शरीर में ’फ्री रेडिकल्स’ नामक हानिकारक पदार्थ भी पैदा करता है. अचानक बढ़ी शुगर से पूरे शरीर में ऊतकों में ‘इन्फ्लेमेशन’ (एक किस्म की सूजन कह लें) भी हो जाता है. यह होता बहुत कम समय के लिए है पर होता तो है. ये फ्री रेडिकल्स और यह ‘सिस्टेमिक इन्फ्लेमेशन’ हार्ट अटैक, स्ट्रोक, डायबिटीज, हार्ट फेल्योर और डेमेंशिया आदि खतरनाक बीमारियों की जड़ में माने जाते हैं. कई स्टडीज से यह सिद्ध हुआ है कि यदि रात के खाने से ठीक पूर्व, बताए गए डोज में दारू ली जाए तो डायबिटीज होने का खतरा 30% से 40% तक कम किया जा सकता है. कहा तो यहां तक जाता है कि इससे हार्ट अटैक का खतरा भी लगभग 30% और ‘ओवर ऑल’ मृत्यु को लगभग 20% तक कम किया जा सकता है. अब और क्या चाहिए, यार? 

परंतु मैं पुन: कहूंगा कि दारू के साथ दिक्कत यही है कि आदमी तय डोज पर रुकने को राजी नहीं होता. यही वह खतरा है जिसकी वजह से डॉक्टर लोग इस इलाज का जिक्र ही नहीं करते जिसकी चर्चा मैंने ऊपर विस्तार से की. 

‘आर्टिफिशियल स्वीटनर्स’ वजन बढ़ा सकते हैं.

हम या तो मिठाइयां  भकोसते हैं या एकदम से सैकरीन-एस्पार्टेम आदि कृत्रिम मिठास वाली चीजों पर उतर आते हैं. याद रखें कि हमारी जीभ को मीठा स्वाद पता तब चलता है जब 200 में से 1 पार्ट भी शक्कर का हो. जबकि कृत्रिम स्वीटनर्स मिठास का इतना ‘स्ट्रोग सेंसेशन’ पैदा कर सकते हैं कि हमारी जीभ को 1,000 में से एक पार्ट भी पता चल जाएगा. नतीजा? नतीजे दो हैं. विशेष तौर पर ऐसी ’जीरो कैलोरी’ ड्रिंक्स जो मीठी तो हैं पर कैलोरीज से खाली हैं. लोग इन्हें पीते हैं. सोचते हैं, कितना भी पिओ इनमें कैलोरीज तो हैं नहीं! पर इन्हें पीने, पीते रहने से हमारे शरीर में एक अनोखा बदलाव हुआ जाता है. अब हमारा शरीर मिठास और कैलोरी भक्षण के संबंध को समझना बंद कर देता है. यह महाखतरनाक है. इससे हार्मोंस तथा दिमाग के ‘न्यूरोबिहेवियर’ कनेक्शनों में गड़बड़ पैदा हो जाती है. ज्यादा खाते हैं और दिमाग के सेटइटी (तृप्ति) सेंटर को पता ही नहीं चलता. तृप्ति का भाव दब जाता है. आदमी पतले के बजाए मोटा हो सकता है. स्टडीज से पता चला है कि ये ’कृत्रिम मिठास’ वाले पदार्थ कोकीन के नशे से भी ज्यादा आदी बनाने वाले पदार्थ हैं. इनकी जीरो कैलोरी ड्रिंक्स के आप आदी भी हो सकते हैं. 

देखिए कि फिर भी एंटीऑक्सीडेंट्स आदि के बारे में इस बार भी बताने को रह ही गए. क्या करें? कॉलम की सीमा पर खड़े होकर वायदा ही कर सकते हैं कि फिर कभी!

कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी

asheem

क्या है असीम त्रिवेदी से जुड़ा विवाद?
वर्तमान राजनीति पर तीखा कटाक्ष करते कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के कार्टून अन्ना हजारे के आंदोलन से लोकप्रिय होना शुरू हुए. बढ़ती लोकप्रियता के साथ ही असीम के कार्टून विवादों से भी घिरते गए. दिसंबर 2011 में मुंबई के एक स्थानीय अधिवक्ता द्वारा असीम पर राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करने और आईपीसी की धारा 124ए के तहत देशद्रोह का आरोप लगाया गया. 10 सितम्बर 2012 को उन्हें देशद्रोह के आरोप में हिरासत में ले लिया गया जिसका चौतरफा विरोध शुरू हो गया. उनके ऊपर से धारा 124ए को हटाने की मांग की गई. असीम ने अपने मामले की पैरवी के लिए न तो कोई वकील रखा और न ही उन्होंने जमानत की अर्जी दी. बाद में हाईकोर्ट ने खुद ही उन्हें जमानत दी.

क्या है आईपीसी. की धारा 124 ए?
धारा 124ए के तहत देशद्रोह की परिभाषा में वर्णित है कि यदि कोई भी व्यक्ति सरकार विरोधी सामग्री लिखता है, प्रसारित करता है या उसका समर्थन करता है तो उसे आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है. यह कानून 1857 के विद्रोह के बाद आंदोलनकारियों को दबाने के लिए अंग्रेजों ने बनाया था. बाद में इसे भारतीय दंड संहिता में शामिल कर लिया गया. आज़ादी के बाद से ही इस क़ानून को हटाए जाने की मांग उठती रही है.

क्यों है 124 ए को खत्म करने की जरूरत?
आईपीसी की यह धारा संविधान में वर्णित ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ का अतिक्रमण करती है. इसके जरिए वर्षों से आंदोलनकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और कार्टूनिस्टों का दमन करने की कोशिश होती रही हैं. आज़ादी से पहले महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक पर भी इस धारा के अंतर्गत मुकदमा चल चुका है. 124ए के जरिए सरकार को निरंकुश होकर अपने खिलाफ बोलने/लिखने वाले को जेल में डालने का मौका मिलता है. आशीष नंदी, विनायक सेन, अरुंधती रॉय के साथ ही कई राज्यों में आन्दोलनकारियों के खिलाफ इस धारा का इस्तेमाल होता रहा है. इस धारा को शुरू करने वाले आंग्रेजों के देश इंग्लैंड में भी इस धरा को समाप्त कर दिया गया है.

-राहुल कोटियाल

बिहार का बहुचर्चित चारा घोटाला

जब चारा घोटाला उजागर हुआ तो इसकी आंच बिहार के कुछ मुख्यमंत्रियों से होते हुए उस समय के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव तक पहुंची थी. इसके बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था. दरअसल, बिहार के पशुपालन विभाग में कुछ गड़बड़ चल रही है, इसे उस वक्त के सीएजी टीएन चतुर्वेदी ने पकड़ा था. चतुर्वेदी ने जब 1985 में यह देखा कि विभाग अपने खर्चे का हिसाब सही ढंग से नहीं दे रहा तो उन्होंने बिहार के उस समय के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह को पत्र लिखा. लेकिन बिहार सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. बाद में सीएजी और राज्य के ऑडिटर की तरफ से सरकार को कई बार चेतावनी दी गई लेकिन इन्हें नजरअंदाज किया गया. इससे यह संदेह गहराया कि इस गड़बड़ी में बिहार के आला नेताओं और अधिकारियों की मिलीभगत है.

1992 में राज्य विजिलेंस के सब इंस्पेक्टर बिधू भूषण द्विवेदी ने इस मामले में एक रिपोर्ट सौंपी जिसमें बताया गया कि इसमें अन्य नेताओं और अधिकारियों समेत मुख्यमंत्री स्तर तक पर गड़बड़ी है. इसके बाद पहले तो द्विवेदी का स्थानांतरण हुआ और बाद में निलंबन. मामले ने तूल तब पकड़ा जब पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त अमित खरे ने जनवरी, 1996 को चाईंबासा में पशुपालन विभाग के कार्यालय पर छापेमारी की. इससे पता चला कि खेल बड़े स्तर पर चल रहा है. लालू यादव ने मामले की जांच के लिए एक समिति बनाई. लेकिन विपक्ष ने निष्पक्षता को आधार बनाते हुए सीबीआई जांच की मांग की. इस मांग को लेकर उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई.

  • 1985 में पहली बार यह मामला सीएजी की निगाह में आया
  • 1997 में मुख्यमंत्री लालू यादव के इस्तीफे की वजह यह घोटाला बना
  • बिहार के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों पर सजा की तलवार लटक रही है

सर्वोच्च अदालत के निर्देश पर उच्च न्यायालय ने मार्च में जांच का काम सीबीआई को सौंप दिया. 23 जून, 1997 को सीबीआई ने लालू यादव और अन्य 55 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर दिए. इनमें राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र, पूर्व केंद्रीय मंत्री चंद्रदेव प्रसाद वर्मा समेत कई विधायक, अधिकारी और कारोबारी शामिल थे. हर ओर से खुद को घिरा देख लालू यादव को 25 जुलाई को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा. 30 जुलाई को उन्हें सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया. 

900 करोड़ रुपये से अधिक के चारा घोटाले में कुल 61 मामले दर्ज किए गए. 42 में निर्णय सुनाए जा चुके हैं. इन्हीं मे से एक मामले में बीते मई में 34 लोगों के खिलाफ सजा सुनाई गई. लालू यादव और जगन्नाथ मिश्र चारा घोटाले से संबंधित पांच मामलों में अभियुक्त हैं. विशेष अदालत ने इनके खिलाफ आरोप तय कर लिए हैं. माना जा रहा है कि दोनों को सजा हो सकती है. पिछले दिनों सामाजिक कार्यकर्ता मिथिलेश सिंह ने विशेष अदालत में याचिका दायर करके इस मामले में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जनता दल यूनाइटेड के नेता शिवानंद तिवारी को भी अभियुक्त बनाने की मांग की है. उनका आरोप है कि इन दोनों को पशुपालन विभाग के उस समय के निदेशक एसबी सिन्हा ने क्रमशः एक करोड़ रुपये और 60 लाख रुपये दिए थे. याचिका पर फैसला होना बाकी है.

-हिमांशु शेखर

संथानम समिति

लाल बहादुर शास्त्री द्वारा गठित समिति जिसकी सिफारिशों के आधार पर केंद्रीय सतर्कता आयोग का गठन हुआ

भारत में आजादी के तुरंत बाद 1948 में भ्रष्टाचार के मामलों की शुरुआत सेना के जीप खरीद घोटाले से हुई तो सरकारी स्तर पर इसे रोकने की कोशिशें भी शुरू हुईं. इस कड़ी में भ्रष्टाचार निरोधक कानून-1947 की समीक्षा के लिए बख्शी टेकचंद समिति के गठन को पहली कोशिश माना जा सकता है. इसके बाद 1950 में गोरवाला समिति का गठन हुआ जिसने पाया कि भारत में मंत्री और सांसद-विधायक भारी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं.

हालांकि ऐसी समितियों और उनकी सिफारिशों के बावजूद भारत में भ्रष्टाचार की गति कभी थमी नहीं. 1957 का मूंदड़ा घोटाला भ्रष्टाचार का ऐसा बड़ा मामला था जिसमें केंद्रीय मंत्री शामिल पाए गए थे. इस मामले में तत्कालीन वित्तमंत्री टीटी कृष्णमचारी को इस्तीफा तक देना पड़ा. इन परिस्थितियों में तत्कालीन गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भ्रष्टाचार रोकने के तात्कालिक तंत्र की समीक्षा और सुझाव के लिए तमिलनाडु के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के संथानम (ऊपर तस्वीर में) की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया. 1962 में गठित इस समिति की सिफारिशों के आधार पर ही प्रथम और द्वितीय श्रेणी के सरकारी अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए 1964 में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की स्थापना हुई.

पहली बार लोकपाल नामक संस्था का विचार भी संथानम की रिपोर्ट से  ही निकला हुआ माना जाता है. अपनी सिफारिशों में संथानम समिति ने कहा था कि भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए जो सर्वोच्च संस्था बनाई जाए वहां तक आम आदमी की पहुंच होनी चाहिए ताकि वह उसके समक्ष अपनी शिकायतें दर्ज करवा सके. संसद ने उस वक्त यह माना था कि इस शक्ति के आते ही संबंधित संस्था काम के बोझ से दब जाएगी और अप्रभावी होने लगेगी,  इसलिए आम नागरिकों के लिए अलग से संस्था गठित करने की आवश्यकता महसूस की गई. यह मूल रूप से लोकपाल के गठन का बीज विचार था.

-पवन वर्मा

अगर हो ही गया होता तो क्या होता

रविवार की दोपहर थी. मैं रसोई में थी. पति ने खबर दी कि संगीतकार खय्याम नहीं रहे. वे नब्बे वर्ष के होकर चल बसे. सुनकर मैं उदास हो गई. कुछ साल पहले वे एक कार्यक्रम में जोधपुर आए थे. तब मैं उनके कार्यक्रम में थी. उनसे साक्षात्कार किया था. कई फोटो लिए थे. 

शाम को मैं शहर में हुए एक साहित्यिक आयोजन में चली गई. लौटी तो पति ने फिर याद दिलाया कि तुमने खय्याम जी से बात की थी, क्यों नहीं वह बातचीत  किसी पत्रिका को भेज देती. मैंने पत्रिका में काम कर रहे अपने पत्रकार मित्र को फोन किया और बाद में खय्याम से हुई मेरी बातचीत के कुछ अंश और दो फोटो मेल कर दिए. थोड़ी देर बाद ही पत्रिका से फोन आया कि आपने कैसे और कहां से जाना कि  खय्याम नहीं रहे.  हमारे अखबार में तो कहीं से भी खय्याम की ऐसी कोई खबर नहीं आई है. मैंने कहा मुझे मेरे पति ने बताया है. आप उनसे बात करिए. मैंने फोन उन्हें पकड़ा दिया. वे कहते रहे कि उन्होंने यह खबर टीवी पर देखी है.

‘सुबह खबर आती खय्याम नहीं रहे. उनके साथ मेरा फोटो होता. लोग मुझ पर हंसते और कहते बहुत चाव है छपने का’

मैं समझ गई कि जरूर कहीं कुछ गड़बड़ हो गई है. मैंने टीवी ऑन किया. लगातार एक घंटे तक देखती रही पर खय्याम से जुड़ी कोई भी खबर नजर नहीं आई. मुंबई में रह रहे अपने भतीजे को फोन किया. उसे भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी. बात साफ हो चुकी थी कि खबर सच नहीं थी. पति ने शायद खय्याम पर कोई कार्यक्रम देखा था और आइडिया लगा लिया कि खय्याम नहीं रहे. वे बता रहे थे कि कार्यक्रम में बार बार उनके लिए ‘थे’ बोला जा रहा था. तो जो बीत गया उसकी बात तो ‘थे’  से ही की जाएगी न. भूतकाल में ही होगी. उनके तर्कों से अब हालत मेरी खराब थी. मैंने अखबार के दफ्तर फोन करके कहा कि लगता है खबर गलत है. वहां से जवाब था कि हां गलत ही है. हम कब से टीवी न्यूज देख रहे हैं. न कोई खबर न कोई पट्टी न कुछ और. अगर ऐसा कुछ होता तो चैनलों पर न्यूज बार-बार दिखाई जाती. यह बड़ी खबर है उनके लिए.

बाद में पत्रकार मित्र ने कहा जब तक आंखों से देख न लो कानों से सुन न लो तब तक खबर पर भरोसा मत करो. उसने सवाल किया, ’अगर यह खबर छप जाती तो?’ पत्रिका के संपादक की समझदारी की वजह से यह खबर नहीं छपी. छप  जाती तो… सुबह खबर आती खय्याम नहीं रहे. उनके साथ मेरा फोटो होता. लोग मुझ पर हंसते और कहते बहुत चाव है छपने का. छपने के लिए किसी को मरने के पहले ही मार दिया आपने. पत्रिका की साख पर बट्टा लगता सो अलग. बेटी कह रही है आपको ऐसी खबरें कन्फर्म करनी चाहिए. ऐसी गलती कैसे हो गई आपसे. 

सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा करने का नतीजा भुगत रही हूं. रात भर नींद नहीं आई. करवटें बदल रही हूं. जो होते-होते रह गया, उसको लेकर बेचैन हूं कि अगर हो ही गया होता तो क्या होता. मैं अपनी बेवकूफी और मूर्खता को यह सोचकर भुलाने की कोशिश कर रही हूं कि अब खय्याम जी की उम्र लंबी ही होगी. मां कहा करती हैं कि किसी की मृत्यु की झूठी खबर उड़े तो समझो कि उसकी उम्र बढ़ गई है.

हमारा बनाम उनका आंदोलन

मुख्यधारा के न्यूज मीडिया में आंदोलनों को लेकर पक्षपाती रवैया हावी है

ऐसे समय में जब देश आजीविका, हक-हुकूक और राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक बदलाव के छोटे-बड़े हजारों जन आंदोलनों (मिलियन म्यूटनीज) के बीच से गुजर रहा है, मुख्यधारा के न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की इस बात के लिए बहुत आलोचना हो रही है कि वे शहरी और मध्यवर्गीय सरोकारों से जुड़े मुद्दों और उन पर आधारित आंदोलनों (उदाहरण के लिए हालिया भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन) को बहुत ज्यादा कवरेज देते हैं. वहीं दूसरी ओर, ग्रामीण गरीबों, आदिवासियों, श्रमिकों, किसानों, विकास योजनाओं के विस्थापितों के मुद्दों और आंदोलनों खासकर रैडिकल जन आंदोलनों को अक्सर अनदेखा करते हैं या कई बार जब अनदेखा करना मुश्किल हो जाए तो मजबूरी में आधे-अधूरे मन से चलते-चलाते थोड़ा-मोड़ा कवरेज दे देते हैं.  यही नहीं, कई मामलों में मुख्यधारा का न्यूज मीडिया इन आंदोलनों को हिंसक, अलोकतांत्रिक, विकास विरोधी या नक्सली/माओवादी संगठनों द्वारा संचालित या विदेशी एजेंसियों की साजिश बताकर उनके खलनायकीकरण में भी जुट जाते हैं.

निश्चय ही, इससे सत्ता के लिए इन्हें कुचलना आसान हो जाता है. यहां तक कि इन आंदोलनों को दबाने की कोशिश में होने वाले मानवाधिकार हनन के मामलों को भी न्यूज मीडिया अनदेखा करता है. हालांकि रैडिकल खासकर अति वाम नेतृत्व वाले जन आंदोलनों के प्रति उसका यह रवैया नया नहीं है. बड़ी पूंजी से संचालित कॉरपोरेट न्यूज मीडिया का इन जन आंदोलनों के प्रति यह रवैया स्वाभाविक तौर पर उनके वर्गीय हितों और विचारों से प्रेरित है. लेकिन ऐसा लगता है कि जन आंदोलनों के प्रति उसकी इस वैचारिक चिढ़ और उपेक्षा भाव का शिकार वे शांतिपूर्ण-लोकतांत्रिक और गैरपार्टी आंदोलन भी होने लगे हैं जो मौजूदा नव उदारवादी आर्थिक नीतियों और उस पर आधारित विकास के मौजूदा मॉडल को चुनौती दे रहे हैं. 

अन्यथा क्या कारण है कि भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन को 24×7 और लगातार दसियों दिनों तक व्यापक कवरेज और एक तरह का खुला नैतिक समर्थन देने वाले न्यूज मीडिया ने मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में ओंकारेश्वर बांध की ऊंचाई कम करने जैसी कई मांगों को लेकर नर्मदा नदी में गर्दन तक पानी में खड़े होकर जल सत्याग्रह कर रहे पचासों महिलाओं और पुरुषों की तब तक कोई सुध नहीं ली, जब तक उनके हाथ-पैर गलने नहीं लगे और सोशल मीडिया से लेकर दूसरे मंचों पर विरोध के सुर तेज होने लगे? अगर मध्य प्रदेश और केंद्र सरकार 16 दिन तक सोई रही तो राष्ट्रीय न्यूज मीडिया भी शुरुआती 12-14 दिन तक सोया रहा. अगर उसने इस आंदोलन को शुरू से कवरेज दी होती तो उन महिलाओं को शायद 17 दिन तक पानी में खड़ा नहीं रहना पड़ता.   

कॉरपोरेट न्यूज मीडिया का यह रवैया पिछले कई महीनों से तमिलनाडु के कुडनकुलम में परमाणु बिजलीघर लगाने के विरोध में चल रहे शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक जन आंदोलन के प्रति भी देखा जा सकता है. सरकार के साथ-साथ न्यूज मीडिया का बड़ा हिस्सा भी इस आंदोलन को विकास विरोधी और विदेशी ताकतों की साजिश साबित करने में जुटा है. लेकिन मुद्दा सिर्फ नर्मदा बचाओ और कुडनकुलम आंदोलन नहीं हैं. सच यह है कि देश भर में विकास के मौजूदा मॉडल के खिलाफ जल-जंगल-जमीन और अपनी आजीविका बचाने के लिए जारी सैकड़ों आंदोलनों के प्रति कॉरपोरेट न्यूज मीडिया का कमोबेश यही रवैया है. सवाल यह है कि जन आंदोलनों के प्रति कॉरपोरेट न्यूज मीडिया का यह रवैया भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बना रहा है या कमजोर?

बेबसी और क्षोभ की नर्मदा

अगर नर्मदा के किनारे बसे लोग नहीं उजड़ेंगे तो दिल्ली और मुंबई की इमारतें बनाने वाले सस्ते मजदूर कहां से आएंगे?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर सिविल सोसाइटी का आंदोलन देखकर द्रवित हो जाने वाले लोगों को खंडवा में गले भर पानी में डूब कर आंदोलन कर रहे कार्यकर्ताओं को देखना चाहिए था. पूरे 17 दिन यह आंदोलन चलता रहा और इसके लिए कई गांवों से जुटे आंदोलनकारी अपने अंग गलाते रहे. 17 दिन बाद सरकार ने घुटने टेके और आंदोलनकारियों को भरोसा दिलाया कि उनकी मांगें सुनी जाएंगी. हालांकि जिस मोटी भाषा में यह आश्वासन दिया गया है, उसमें आगे अगर-मगर का अंदेशा बना हुआ है, पर फिलहाल इतनी भर आश्वस्ति जरूर है कि सरकार तत्काल इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर जलाशयों का जल स्तर बढ़ाने से बचेगी. अब तक कई गांवों को डुबो चुके और हजारों लोगों को पहले ही विस्थापित कर चुके इन जलाशयों से कई और गांवों के डूबने का खतरा बताया जा रहा था. 

लेकिन यह इस आंदोलन का एक पहलू है, दूसरा और ज्यादा अहम पहलू पुनर्वास के उस मुद्दे से जुड़ा है जिसकी सरकार उपेक्षा करती रही है. सुप्रीम कोर्ट के बहुत सख्त निर्देशों के बावजूद पहले से विस्थापित लोगों के पुनर्वास का दायित्व, उन्हें कायदे की जमीन देने का काम अभी तक पूरा नहीं हुआ है. सच तो यह है कि अब इस आंदोलन की कहानी लिखते हुए तकलीफ भी होती है और भारतीय राष्ट्र राज्य की अन्यमनस्कता से डर भी लगता है. 80 के दशक में जब यह आंदोलन शुरू हुआ था तब लगता था कि इसके दबाव में नर्मदा को बांधने और काटने-छांटने चली सरकारों के पांव कुछ कांपेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. तब कम लोगों को मालूम था कि अमरकंटक से निकल कर सतपुड़ा और विंध्य से जंगलों से गुजरती हुई, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र पार कर गुजरात के अरब सागर में गिरने वाली करीब 1,300 किलोमीटर लंबी इस नदी पर छोटे-बड़े 3,000 बांध बनेंगे. अगर यह पूरी हो पाई तो दुनिया की सबसे विराट नदी-घाटी परियोजना होगी जो पता नहीं कितनी बिजली पैदा करेगी और कितने कंठों की प्यास बुझा पाएगी, क्योंकि हमारी नदी घाटी परियोजनाओं के लक्ष्य आम तौर पर अधूरे नहीं, चौथाई भी पूरे नहीं होते रहे हैं. ताजा मिसाल टिहरी बांध परियोजना है जहां 2,500 मेगावाट बिजली पैदा करने का दावा 600 मेगावाट बिजली उत्पादन से आगे नहीं बढ़ पाया है, जबकि पुरानी टिहरी डुबो कर एक नई टिहरी खड़ी कर दी गई है. 

                   

बहरहाल, नर्मदा घाटी जैसी विराट परियोजना से विस्थापित होने वाले लोगों की तादाद कम से कम एक करोड़ होगी जिसका मार्मिक और दारुण सिलसिला कई साल पहले से शुरू हो चुका है. इतनी विराट परियोजना हमारे पर्यावरण को जिस तरह तहस-नहस करेगी, इसकी कल्पना और मुश्किल है. ये सारे तर्क आज के नहीं, बहुत पुराने हैं. इससे जुड़ी लड़ाई भी बहुत पुरानी है. लेकिन सरकारें जैसे कुछ भी देखने-सुनने को तैयार नहीं हैं. आंदोलन चलता रहा, थकता रहा, फिर खड़ा होता रहा, सरकारों के दमन और उत्पीड़न झेलता रहा, हताश भी हुआ, मेधा पाटकर मणिबेली में जलसमाधि के लिए भी उतरीं, गुजरात ने उनके बाल खींचे, दिल्ली ने उन्हें 20 दिन भूखा रखा- इस सिलसिले को न जाने कितने साल हो गए. दूसरी तरफ बांध बनते रहे, बड़े होते रहे, गांव डूबते रहे, लोग बेदखल होते रहे. डूबने वाले गांवों और कस्बों की कहानी कुछ दिन खबरों में डूबती-उतराती रही और फिर नर्मदा की धारा के साथ बह गई. विस्थापितों को उचित मुआवजा और पुनर्वास के लिए जगह देने का अदालती फैसला और सरकारी वादा झूठ और फरेब की फाइलों में गुमा हुआ है और सारी सरकारें देसी-विदेशी कॉरपोरेट घरानों के लिए सेज बना-सजा रही हैं. 

इतनी चोटों के बावजूद नर्मदा आंदोलन इसलिए बचा हुआ है कि वह बहुत सारे लोगों के लिए बिल्कुल जीने और मरने का मामला है. खंडवा के घोगलगांव में जो लोग गंदे पानी में गले भर डूब कर इस अंधी-बहरी व्यवस्था को आवाज देने की कोशिश करते रहे, उन्हें पता था कि उनके सामने और कोई रास्ता नहीं बचा है. इस आंदोलन को मीडिया में जो आवाज मिली, शायद उसका कुछ असर रहा कि फिलहाल मध्य प्रदेश सरकार ने इनकी मांगें मान लीं, क्योंकि वह किसी भी सूरत में यह संदेश जाने नहीं दे सकती थी कि वह एक हत्यारी सरकार है जिसने अपने लोगों को गले भर पानी में डुबो कर मार डाला, लेकिन सच्चाई यही है कि इन उजड़े हुए, बेदखल हो रहे लोगों के सामने ऐसी विकल्पहीनता बढ़ती जा रही है. सिर्फ नर्मदा की घाटी नहीं, जैसे पूरा देश करोड़ों बेदखल और बेसहारा लोगों के लिए ऐसी अंधी गली में बदलता जा रहा है जहां आत्मघाती रास्ते अंतिम रास्तों की तरह बचे हुए हैं. 

क्या दिल्ली को इस बेबस और बेदखल आबादी के बारे में कुछ मालूम नहीं है? क्या यह सिर्फ केंद्र और हाशियों के बीच की दूरी का मामला है जिसकी वजह से इस आंदोलन की आवाज सत्ता के कंगूरों तक नहीं पहुंचती या देर से पहुंचती है?  दरअसल नर्मदा घाटी ही नहीं, दूसरी तमाम ऐसी बड़ी योजनाओं में बेदखल और विस्थापित होने वाली 90 फीसदी आबादी उन आदिवासियों और दलितों से बनती है जो बाकी हिंदुस्तान के लिए- नए बनते इक्कीसवीं सदी के सुपरपावर इंडिया के लिए- औपनिवेशिक प्रजा का काम करते हैं. अगर नर्मदा के किनारे बसे लोग नहीं उजड़ेंगे तो दिल्ली और मुंबई की इमारतें बनाने वाले सस्ते मजदूर कहां से आएंगे, कौन यहां की सड़कों पर रिक्शा खींचेगा या महानगरों का कूड़ा उठाएगा? यानी यह नादानी नहीं चालाकी है जो इतनी बड़ी आबादी के विस्थापन को लेकर बरती जा रही खामोशी में निहित है. कभी-कभी गले तक पानी में डूबे लोग इस चालाक व्यवस्था को कुछ देर के लिए डरा देते हैं, लेकिन वादों का खेल खेलने में सरकारें कहीं ज्यादा माहिर हैं. इसके बावजूद खंडवा की कामयाबी नर्मदा बचाओ आंदोलन के बचे-खुचे वजूद के लिए उम्मीद और ताकत दोनों जुटाती है.