बृज खंडेलवाल द्वारा

आज तमीज़ हार रही है, रसूख जीत रहा है!
क्योंकि घट गए इंसां, बढ़ गए साए!!
रात के अँधेरे में शहर डराते नहीं। डर तब लगता है, जब उजाले में इंसानियत खोने लगे। डर तब लगता है, जब किसी अस्पताल की कतार में खड़ी बीमार माँ को पीछे धकेलकर कोई सीना तानकर कहे, “जानते नहीं, मैं कौन हूँ?” डर तब लगता है, जब बच्चों को किताबों से पहले यह सबक मिल जाए कि नियम सबके लिए नहीं होते। हमारे शहर बड़े हो गए हैं। इमारतें आसमान छू रही हैं। गाड़ियाँ चमक रही हैं। जेबें भर रही हैं। लेकिन दिल सिकुड़ते जा रहे हैं। सवाल सीधा है। क्या तरक़्क़ी का मतलब सिर्फ़ दौलत, ओहदा और शोहरत है? या तमीज़, तहज़ीब और इंसानियत भी उसकी पहचान हैं?
हर नई पीढ़ी, पिछली पीढ़ी को पुरातनपंथी और दकियानूसी मानती रही है। यह सिलसिला सदियों पुराना है। मगर पहली बार ऐसा लगता है कि नई पीढ़ी का एक हिस्सा बदतमीज़ी को आत्मविश्वास और अभद्रता को आधुनिकता समझ बैठा है। लखनऊ के एक सरकारी अस्पताल का मंज़र याद आता है। ओपीडी के बाहर एक महिला घंटों से अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। हाथ में रेफ़रल पर्ची थी। चेहरे पर थकान थी। आँखों में उम्मीद। तभी एक साहब आए। झकाझक कुर्ता। साथ में दो लोग। उन्होंने अटेंडेंट से कुछ कहा और सीधे डॉक्टर के कमरे में दाख़िल हो गए। लाइन में खड़े एक व्यक्ति ने एतराज़ किया। जवाब आया, “जानते नहीं, मैं कौन हूँ?” महिला चुपचाप फिर अपनी कुर्सी पर बैठ गई।
यह सिर्फ़ एक अस्पताल की कहानी नहीं है। यह आज के समाज का आईना है। अस्पताल हो, हवाई अड्डा हो, स्कूल हो या सरकारी दफ़्तर। हर जगह एक अनकहा नियम चलता दिखता है। क़ानून सबके लिए बराबर है, लेकिन कुछ लोग ख़ुद को क़ानून से ऊपर समझते हैं। आज हैसियत सिर्फ़ पैसे से तय नहीं होती। पहचान, रसूख, संपर्क, उपनाम और दिखावा मिलकर ऐसा नशा पैदा करते हैं, जिसमें इंसान अपनी असली औक़ात भूल जाता है। हमने एक नया मुहावरा गढ़ लिया है: “जुगाड़ है, तो सब मुमकिन है।” वीआईपी संस्कृति इसी सोच का सबसे बदसूरत चेहरा है। सड़क पर किसी काफ़िले की सायरन बजाती गाड़ी दिखते ही ट्रैफ़िक थम जाता है। एम्बुलेंस रास्ता तलाशती रह जाती है। सड़क, जो सबकी है, कुछ लोगों की जागीर बन जाती है। आलीशान सोसायटियों में घरेलू कामगारों के लिए अलग गेट और अलग लिफ्ट होती हैं। इसे सुरक्षा का नाम दिया जाता है, लेकिन सच यह है कि यह भेदभाव का नया लिबास है। विडंबना देखिए। जिन हाथों से हमारा घर चलता है, हम उन्हीं हाथों को सम्मान देने में कतराते हैं।
स्कूलों में दाख़िला भी अब कई बार योग्यता से ज़्यादा पहुँच और पहचान का खेल बन गया है। सिफ़ारिशी ख़त, ऊँची जान-पहचान और मोटे दान के दम पर सीटें हासिल की जाती हैं। बच्चे बहुत जल्दी सीख जाते हैं कि नियम कमज़ोरों के लिए होते हैं। हम अक्सर मान लेते हैं कि अच्छी शिक्षा इंसान को बेहतर बना देती है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? ऊँची डिग्रियाँ तहज़ीब की गारंटी नहीं होतीं। फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी, अच्छे व्यवहार का प्रमाणपत्र नहीं है। हम सबने ऐसे पढ़े-लिखे लोग देखे हैं, जो ड्राइवर से बदतमीज़ी करते हैं, फुटपाथ पर गाड़ी चढ़ा देते हैं और सफ़ाई कर्मचारियों को नाम से नहीं, इशारों से बुलाते हैं। हमारे स्कूल और कॉलेज प्रतियोगिता तो सिखाते हैं, मगर हमदर्दी नहीं। आगे निकलना सिखाते हैं, साथ लेकर चलना नहीं। सच तो यह है कि बराबरी का एहसास छोटी-छोटी बातों से पैदा होता है।
लाइन में लगना।
अपनी बारी का इंतज़ार करना।
दूसरों की सुविधा का ख़याल रखना।
सार्वजनिक स्थानों के नियमों का सम्मान करना।
तहज़ीब की शुरुआत यहीं से होती है।
जब लोग यह मान लेते हैं कि व्यवस्था ताक़तवरों के आगे झुक जाती है, तब उनका भरोसा टूटने लगता है। अस्पताल की लाइन में खड़ा व्यक्ति अगली बार किसी अजनबी की मदद करने से पहले सोचेगा। कॉलोनी के गेट पर रोकी गई घरेलू सहायिका ख़ुद को अपमानित महसूस करेगी। बदतमीज़ी संक्रामक होती है। एक बुरा व्यवहार, कई और बुरे व्यवहारों को जन्म देता है। कहा भी गया है,
“अदब इंसान का सबसे ख़ूबसूरत ज़ेवर है।”
बदलाव की शुरुआत घर से होगी। बच्चों को सिखाइए कि सफ़ाई कर्मचारी, चौकीदार, ड्राइवर और घरेलू सहायिका सिर्फ़ सेवा देने वाले लोग नहीं, बल्कि सम्मान के हक़दार इंसान हैं। उन्हें लाइन में लगना सिखाइए। अपनी बारी का इंतज़ार करना सिखाइए। हर किसी से आँख मिलाकर बात करना और शुक्रिया कहना सिखाइए। याद रखिए, किसी समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसके लोगों के बर्ताव से होती है। जिस समाज में दौलत इंसानियत से बड़ी हो जाए, वहाँ दीवारें तो बहुत खड़ी होती हैं, लेकिन दिलों के बीच पुल नहीं बन पाते।
तमीज़ कमज़ोरी नहीं है।
तहज़ीब दिखावा नहीं है।
विनम्रता किसी ओहदे की मोहताज नहीं होती। आपकी असली हैसियत आपके बैंक बैलेंस से नहीं, आपके व्यवहार से झलकती है। और शायद यही सबक हम सबसे ज़्यादा भूलते जा रहे हैं।

