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नाम के प्रधानमंत्री!

पिछले साल के आखिरी दिनों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को रूस के दौरे पर जाना था. वहां उन्हें भारत और रूस की प्रमुख कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लेना था. इस कार्यक्रम का आयोजन इंडो-रशिया सीईओज़ काउंसिल के बैनर तले होना था. भारत की तरफ से इस संगठन की अध्यक्षता रिलायंस इंडस्ट्रीज के कर्ताधर्ता मुकेश अंबानी करते हैं. लेकिन आखिरी वक्त पर मुकेश अंबानी ने प्रधानमंत्री के साथ रूस के दौरे पर जाने से मना कर दिया. हालांकि, प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों ने मुकेश अंबानी को मनमोहन सिंह के साथ रूस चलने के लिए मनाने की काफी कोशिश की, लेकिन बड़े अंबानी समय की कमी की बात कहकर रूस दौरे पर नहीं गए.

इस घटना से संकेत मिल जाता है कि प्रधानमंत्री की संस्था आज किस कदर कमजोर हो चुकी है. दरअसल, मनमोहन सिंह पर प्रधानमंत्री की संस्था के अवमूल्यन के आरोप तब से ही लग रहे हैं जब से उन्होंने यह पद संभाला है. तब से ही लोग मानते रहे हैं कि वे सिर्फ एक कठपुतली प्रधानमंत्री हैं और कई फैसले सोनिया गांधी के दबाव में करते हैं. मनमोहन सिंह पार्टी के आदमी तो कभी रहे नहीं हैं. इसलिए संगठन में उनको महत्व न मिलना अस्वाभाविक नहीं लगता. लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति को देश का सबसे बड़ा राजनीतिक पद अगर कोई पार्टी देती है तो साफ है कि वह प्रधानमंत्री नाम की संस्था की मर्यादा को लेकर गंभीर नहीं है.

कांग्रेस ने सरकार के ऊपर सोनिया गांधी की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) बना रखी है. इस वजह से सरकार जो भी अच्छा कर रही है उसका श्रेय एनएसी यानी सोनिया गांधी को मिल रहा है और उसकी हर गलती का ठीकरा मनमोहन सिंह के सर फूट रहा है. संप्रग सरकार की कामयाबी के तौर पर रोजगार गारंटी योजना, सूचना के अधिकार और शिक्षा के अधिकार के तौर पर गिना जाता है.

लेकिन इसका श्रेय मनमोहन सिंह को न देकर एनएसी को दिया जाता है. मनमोहन सिंह की इस स्थिति पर पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा कहते हैं, ‘ताकत सोनिया गांधी के पास है लेकिन उनके पास कोई जिम्मेदारी नहीं है. मनमोहन सिंह के पास जिम्मेदारी है लेकिन ताकत नहीं है. मनमोहन सिंह के पास न नैतिक ताकत है, न राजनीतिक ताकत और न सरकारी ताकत. इस वजह से जिस नेतृत्व की आवश्यकता इस देश को अभी है, वह नहीं मिल पा रहा है.’ 

हालांकि, प्रधानमंत्री का बचाव करते हुए मनमोहन सिंह के पहले मंत्रिमंडल में उनके सहयोगी रहे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर कहते हैं, अगर मनमोहन सिंह राय-मशविरा नहीं करें तो उन पर यह इल्जाम लगेगा कि वे विचार-विमर्श नहीं करते, ‘अगर वे विभिन्न मामलों को लेकर राय-सलाह करते हैं तो उन पर विपक्ष के लोग यह आरोप लगाते हैं कि ये तो बलहीन प्रधानमंत्री हैं. तो आखिर मनमोहन सिंह करें क्या?’

सेना और सरकार

मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही आजाद भारत ने पहली बार सरकार और सेना के टकराव को इस स्तर पर देखा. हालांकि, इससे पहले भी कुछ मौकों पर सेना और सरकार आमने-सामने दिखे हैं, लेकिन ये टकराव कुछ व्यक्तिगत किस्म के और बहुत छोटे स्तर के थे. पहला मामला 50 के दशक के आखिरी दिनों का है. उस वक्त के सेनाध्यक्ष केएस थिमैया और रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन के बीच 1959 में टकराव इस कदर बढ़ा था कि सेनाध्यक्ष ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अपना इस्तीफा सौंप दिया था. सरकार और नौ सेना 1998 में उस वक्त आमने-सामने दिखे जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी. नौसेना प्रमुख विष्णु भागवत ने सरकार के उस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था जिसमें हरिंदर सिंह को नौ सेना का नंबर दो बनाने का फैसला किया गया था.

लेकिन हाल ही में सेवानिवृत्त हुए सेनाध्यक्ष वीके सिंह के मामले में जो कुछ हुआ वह न केवल सेना और सरकार के बीच का टकराव था बल्कि सरकार के अक्षम और गैरपेशेवराना रवैये से यह सेना के भीतर का भी टकराव बन गया. ऊपर से यह सब एक-दो दिन नहीं चला बल्कि कई महीनों तक इसकी चर्चा मीडिया और आम जनता के बीच होती रही. इस दौरान आज कैबिनेट में नंबर दो की हैसियत रखने वाले केंद्रीय रक्षा मंत्री इस मसले को निपटाने में बिलकुल अक्षम नजर आए.

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेना बेहद अहम होती है. जब भी कोई मुश्किल परिस्थिति आती है तो सेना को याद किया जाता है. यहां तक कि आपातकाल में भी सेना को विशेष अधिकार मिलता है. ऐसे में सरकार और सेना के बीच टकराव की नौबत क्या लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक नहीं है? सेना और सरकार के बीच टकराव के नतीजे क्या हो सकते हैं, इसे जानने के लिए हमें सिर्फ अपने पड़ोसी मुल्क को देखने भर की जरूरत है.

अखिलेश सरकार के छह माह: चौपट राज

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से ढेरों उम्मीदें तो जनता को थीं, लेकिन जैसे हालात हैं, उनसे लगता है कि अखिलेश दंगाइयों, बलात्कारियों और डकैतों की ही उम्मीदों पर खरा उतर रहे हैं. प्रियंका दुबे की रिपोर्ट.

15 मार्च, 2012 को ‘बदलाव के वाहक’ के तौर पर उत्तर प्रदेश की कमान संभालने वाले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार को छह महीने पूरे हो चुके हैं. एक ओर जहां विपक्षी पार्टियों, राजनीतिक विश्लेषकों और आलोचकों की अखिलेश के कार्यकाल पर कड़ी नजर थी वहीं उत्तर प्रदेश की जनता भी विलायत से पढ़ कर आए अपने नौजवान मुख्यमंत्री से हजारों उम्मीदें लगाए बैठी थी. अब तक के सबसे युवा मुख्यमंत्री से सभी को यह उम्मीद थी कि हमेशा ऊंचे महलों की ऊंची दीवारों के पीछे छिपे रहने वाले लखनवी दरबार तक आखिरकार उनकी आवाज भी पहुंच सकेगी.

लेकिन विधानसभा चुनावों के नतीजों की शुरुआती लहर समाजवादी पार्टी (सपा) के पक्ष में जाते ही सपाइयों द्वारा हुड़दंग मचाए जाने की खबरें भी सामने आने लगी थीं. उसी वक्त साफ हो गया था कि सूबे के अगले सदर के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘गुंडाराज को बढ़ावा देने वाली पार्टी’ की अपनी छवि को बदलने की होगी. लेकिन बीते छह महीने  के दौरान हुए घटनाक्रमों ने न सिर्फ प्रदेश में गुंडाराज की वापसी को और पुख्ता किया है बल्कि अखिलेश के ‘बहुप्रतीक्षित सुशासन’ के सारे चुनावी वादों को भी धता बता दिया है. पिछले छह महीने में यूपी पांच सांप्रदायिक दंगे देख चुका है. यहां अलग-अलग हिस्सों में हुए दंगों में कुल सात लोगों की मृत्यु हुई और सैकड़ों जख्मी हुए. आम लोगों को जबर्दस्त नुकसान हुआ और बाजार महीनों बंद रहे.

सपा की सरकार आते ही राज्य के बुंदेलखंड क्षेत्र में डकैतों के पुराने गिरोहों ने भी फिर से सर उठाना शुरू कर दिया है. आठ अगस्त को चित्रकूट से बांदा जिला जेल की ओर जाते वक्त 13 डकैत पुलिस की गिरफ्त से भाग निकले. पुलिस कस्टडी में पेशी से लौटते वक्त फरार हुए इन कैदियों में दुर्दांत डकैत ठोकिया के बहनोई चुन्नी लाल पटेल के साथ-साथ शिवमूरत कोल, रम्मू कोल, हरी कोल और दिनेश नाई जैसे ददुआ गैंग के पुराने सदस्य भी शामिल थे. वहीं सुदेश पटेल उर्फ बालखड़िया के गैंग ने अगली ही रात यानी नौ अगस्त को चित्रकूट के डोडा गांव में सामूहिक नरसंहार को अंजाम दिया. बांदा रेंज के महापुलिस निरीक्षक पीके श्रीवास्तव ने तहलका से बातचीत में स्वीकार किया कि डकैतों के फरार होने में वहां मौजूद छह पुलिसकर्मियों का हाथ था. सूत्रों के अनुसार अब सभी फरार डकैत बालखड़िया गैंग के साथ मिलकर तराई में कुछ बड़ी वारदातों को अंजाम देने की फिराक में हैं.

पिछले छह महीने में प्रदेश पांच सांप्रदायिक दंगे देख चुका है. पुलिस थानों में छह बलात्कार हुए हैं और पिछले महीने ही 13 डकैत पुलिस हिरासत से फरार हुए हैं

डकैतों और दंगों के अलावा आए दिन पुलिस कस्टडी में हो रहे बलात्कारों या शारीरिक उत्पीड़न की खबरों से भी सरकार की खासी किरकिरी हुई है. इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने ऐसे बढ़ते मामलों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सरकार को महत्वपूर्ण पुलिस स्टेशनों पर सबसे बेहतर रिकॉर्ड वाले ‘सभ्य’ पुलिस अफसरों को तैनात करने के निर्देश भी दिए हैं. राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह दिन-प्रतिदिन बिगड़ती कानून-व्यवस्था के पीछे प्रभावहीन नेतृत्व को जिम्मेदार मानते हैं. वे कहते हैं, ‘कानून-व्यवस्था ठीक बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी है ऊपर के नेतृत्व से उर्जा और प्रेरणा का नीचे की तरफ बहना. अखिलेश से सभी को बहुत उम्मीदें थीं. उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद मैं खुद उनसे मिलने गया था, हमने कानू-व्यवस्था सुधारने से संबंधित कई बातें की थीं. उन्होंने आश्वासन भी दिया था कि प्रदेश की सूरत बदलेगी. लेकिन हुआ कुछ नही’. राज्य में हो रहे सांप्रदायिक दंगों और डकैतों की बढ़ती समस्या को गंभीर बताते हुए वे आगे जोड़ते हैं, ‘बांदा क्षेत्र में बहुत मुश्किल से डकैती की समस्या पर काबू पाया गया था. राज्य में डकैतों का फिर से उभरना और आए दिन सांप्रदायिक दंगे होना साफ तौर पर यह बताता है कि कानून-प्रशासन पहले से कई कदम पीछे जा चुके हैं.’

राज्य सरकार द्वारा सदन में पेश किए गए हालिया आंकड़ों पर नजर डालें तो मालूम पड़ता है कि प्रदेश में प्रतिदिन 15 हत्याओं, छह बलात्कारों और कम से कम पांच लूट की घटनाएं दर्ज हो रही हैं. राज्य के प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक प्रमोद कुमार बताते हैं कि प्रदेश की ठप नौकरशाही और अनियंत्रित पुलिसिया खेमा मुसीबत की असली जड़ हैं. ‘यूं तो हमेशा से ही इस पार्टी को गुंडाराज को पालने-पोसने वाली पार्टी के तौर पर जाना जाता रहा है लेकिन इस बार फर्क सिर्फ इतना था कि मुलायम की जगह मुख्यमंत्री नौजवान अखिलेश थे. जाहिर है, लोग युवाओं से परिवर्तन की कुछ ज्यादा उम्मीदें बांध भी लेते हैं. लेकिन आज छह महीने बाद, इस सरकार से लगभग हर कोई असंतुष्ट है और इसके नतीजे लोकसभा चुनावों में साफ नजर भी आ जाएंगे.’ ‘आज सब यही सोच रहे हैं कि अगर चीजें मायावती के समय से बेहतर नहीं हो सकतीं तो कम से कम बुरी तो न हों. लेकिन कानून-व्यवस्था का आलम देखकर तो यही लगता है कि अखिलेश का प्रशासनिक अमला उनके नियंत्रण से बाहर है’,  प्रमोद कुमार कहते हैं. राज्य में कानून-व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का जायजा लेने के लिए तहलका ने राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों का दौरा किया. आगे के पन्नों पर लिखी रिपोर्ट उत्तर प्रदेश की लचर कानून-व्यवस्था की कलई खोलने के साथ ही अखिलेश के बहुप्रतीक्षित सुशासन की अनवरत प्रतीक्षा में डूबे उत्तर प्रदेश की आम जनता की नाउम्मीदी को भी रेखांकित करती है.

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दंगे 

बलात्कार

डकैती

दंगे…

पिछले साढे़ तीन महीने में उत्तर प्रदेश पांच दंगे झेल चुका है. मूक प्रशासन और सरकार के ढुलमुल रवैये  के बीच मथुरा, बरेली, प्रतापगढ़, इलाहाबाद के साथ-साथ राजधानी लखनऊ भी कई दिनों तक सांप्रदायिकता की आग में झुलसती रही. एक ओर जहां बरेली और कोसीकलां जैसे शहरों के बाजारों के कई दिन बंद रहने से यहां के रहवासियों को भारी नुकसान झेलना पड़ा, वहीं इन दंगों में कुल सात लोगों ने अपनी जान गंवाई और सैकड़ों जख्मी भी हुए.

राज्य के दंगा प्रभावित क्षेत्रों के जमीनी दौरे और स्थानीय लोगों से बातचीत से इन दंगों के कई अनछुए पहलू हमारे सामने आते हैं.  लाखों के माली नुकसान से उबरने की कोशिश कर रहे दुकानदार और बेवजह गुस्साई भीड़ की भेंट चढ़ गए परिजनों का शोक मनाते पीड़ितों के परिवारों की मानें तो उत्तर प्रदेश में हुए इन दंगों की जड़ें दो समुदायों के बीच पनपे किसी फसाद में नहीं छिपी हैं. असल में ये सभी दंगे राजनीतिक कारणों से प्रेरित दो समूहों के चंद फसादियों की लड़ाई भर थे. प्रतापगढ़ को छोड़कर अन्य सभी जिलों में राजनीतिक कारणों से प्रेरित मुट्ठी भर दंगाइओं ने मामूली फसाद को बढ़ाकर सांप्रदायिक दंगे की शक्ल दे दी. ज्यादातर मामलों में मसला धार्मिक वैमनस्य से ज्यादा अफवाहों से उपजी भ्रामक परिस्थितियों की वजह से बिगड़ा. उस पर प्रशासन की आपराधिक अनुपस्थिति ने स्थानीय रहवासियों में भय और असुरक्षा की भावना को और बढ़ा दिया. इस भगदड़ और दहशत के बीच देखते ही देखते कई निर्दोष लोगों की हत्याएं हो गईं और  व्यापारिक प्रतिष्ठानों को आग के हवाले कर दिया गया. 

उत्तर प्रदेश में दंगों की शुरुआत ठीक साढ़े-तीन महीने पहले मथुरा से लगभग 45 किलोमीटर की दूरी पर बसे छोटे-से कस्बे कोसीकलां से हुई. एक जून की दोपहर को शहर की मुख्य मस्जिद के सामने शरबत पिलाने का कार्यक्रम था. पास के ही एक दुकानदार देवंेद्र उर्फ देबू ने शरबत के पानी से हाथ धो लिए. स्थानीय निवासी और दंगों के प्रत्यक्षदर्शी सुभाष गोयल बताते हैं कि इस बात पर दोनों समुदाय के कुछ लोगों में हल्की कहासुनी हो गई. गोयल आगे जोड़ते हुए कहते हैं, ‘दरोगा जमादार सिंह घटनास्थल पर आए तो थे लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया. अगर तभी कुछ किया जाता तो फसाद आगे ही न बढ़ता. लेकिन उनके जाते ही भीड़ भड़क उठी और आधे घंटे में ही पूरा शहर दंगों की चपेट में आ गया. ऐसा लग रहा था मानो प्रशासन नाम की कोई चीज ही नहीं है.’

पीड़ित परिवारों की मानें तो ये दंगे दो समुदाय के वैमनस्य की वजह से नहीं भड़के बल्कि इनके पीछे राजनीतिक स्वार्थों की भूमिका थी

शाम होते-होते कोसीकलां के आस-पास मौजूद जाट बहुल गांवों से हजारों की तादाद में लोग शहर पहुंचने लगे. घटनाक्रम बताते हुए गोयल जोड़ते हैं, ‘असल में मोबाइल की वजह से कई अफवाहें फैलीं. लोगों को बताया गया कि दूसरे समुदाय वालों ने उनकी महिलाओं के साथ छेड़खानी की है. पुलिस प्रशासन पूरी तरह मूकदर्शक बना हुआ था. न ही रबर की गोलियां छोड़ी गईं, न आंसू गैस और न ही दंगाइयों पर पानी मारा गया. लाठी चार्ज भी नहीं हुआ. सब लोग एक दूसरे को मारते रहे, जलाते रहे. इस बीच 4 लोगों की हत्याएं हो गईं और करोड़ों का सामान स्वाहा हो गया.’ 

दंगे रात के लगभग 12 बजे तक चलते रहे और 16 दिनों तक शहर में कर्फ्यू  लगा रहा. तहलका की टीम जब हताहतों के परिजनों से मिलने पहुंची तो दोनों ही समुदायों के लोगों ने एक सुर में प्रशासन की आपराधिक निष्क्रियता को दोष देते हुए दंगों को राजनीति से प्रेरित बताया. कोसीकलां के दंगों में मारे गए 22 वर्षीय भूरा और कलुआ के बड़े भाई सलीम अपने जुड़वां भाइयों की तस्वीर दिखाते हुए बताते हैं, ‘भूरा को गोली लग गई थी और कलुआ उसे रिक्शे पर लाद कर अस्पताल ले जा रहा था. तभी उसे दंगाइयों ने पकड़ लिया और मारकर जलती हुई दुकान में फेंक दिया. लेकिन पुलिस- प्रशासन हमारी मदद को नहीं आए.’दंगों के तुरंत बाद मथुरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक धर्मवीर यादव और कलेक्टर संजय यादव का ट्रांसफर कर दिया गया और 54 एफआईआर दर्ज की गईं. इनमें कुल 54 लोग नामजद थे और 1,200 अज्ञात. अलग-अलग धाराओं के अंतर्गत मामले दर्ज किए गए.

कोसीकलां दंगों में क्षेत्र के पूर्व बसपा विधायक चौधरी लक्ष्मी नारायण और उनके दो भाइयों लेखराज और नरदेव चौधरी पर भी मामले दर्ज किए गए हैं. तहलका से बातचीत के दौरान वे सारी जिम्मेदारी मौजूदा सपा सरकार और सुस्त पुलिसिया कार्यवाई पर डालते हुए कहते हैं, ‘प्रशासन और पुलिस ने लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया था. किसी ने लाठी चार्ज करके या आंसू गैस के गोले छोड़कर भीड़ को तितर-बितर करने की कोशिश नहीं की. मामले को चार महीने होने को हैं पर अभी तक कोइ चार्जशीट तक फाइल नहीं हुई है.’ थोड़ी और पड़ताल करने पर दंगों के पीछे छिपा राजनीतिक तानाबाना और साफ होने लगता है. नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर एक स्थानीय पत्रकार बताते हैं, ‘असल में कोसीकलां में हमेशा राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का ही बोलबाला रहा है. इस विधानसभा चुनाव में भी यहां आरएलडी के ठाकुर तेजपाल सिंह ही जीते. दंगों के समय निकाय चुनाव सर पर थे और एक खास समुदाय के लोगों को मार कर जनता को उकसाने और जनमत अपने पक्ष में करने की कोशिश की जा रही थी.’  मगर सभी इस बात पर सहमत हैं कि अगर प्रशासन थोड़ा-सा सतर्क होता तो कोसीकलां में इतने बड़े पैमाने पर मारकाट और लूटपाट न हुई होती.

कभी राज्य के सबसे शांतिपूर्ण शहरों में शुमार बरेली भी पिछले तीन महीने में  दो बार सांप्रदायिक दंगों का शिकार हुआ. इन दंगों में एक ही समुदाय के तीन लोगों की हत्याएं हुईं, बाजार 35 दिन तक बंद रहे और करोड़ों की संपत्ति आग के हवाले कर दी गई. उत्तर प्रदेश में दंगों के एक खास पैटर्न के अनुसार ही बरेली के तुरंत बाद जिले के प्रमुख अफसरों के तबादले हुए, 38 एफआईआर दर्ज की गईं और 293 लोग गिरफ्तार किए गए. मठ की चौकी और शहामतगंज पर दंगाइयों से पिट चुके अपने पुलिसिया अमले की साख बचाने की कोशिश में जिले के नए कलेक्टर अभिषेक प्रकाश बस इतना कहते हैं, ‘सभी मामलों में जांच चल रही है. शुरुआती तहकीकात के खत्म होते ही आरोप पत्र दाखिल कर लिए जाएंगे.’

यहां भी शहर के आम लोगों के साथ-साथ पीड़ितों के परिवारों का भी यह स्पष्ट मानना है कि दंगे उन पर सियासी ताकतों ने जबरन थोपे थे. 23 जुलाई और फिर 11 अगस्त को भड़के दंगों के बारे में बताते हुए शहर के प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर एसी त्रिपाठी कहते हैं, ‘इस शहर में  बरेलवी पंथ के आला हजरात साहब, सूफी समुदाय की खान काह-ए-नियाजिया के साथ-साथ हिंदुओं के कई प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर भी मौजूद हैं. और यहां धर्म को सही मायने में जीने वाले लोग रहते हैं. शहर की जनसंख्या भी हिंदू-मुसलमानों के इतने घने मिक्स के तौर पर बसी है कि अगर सच में दोनों संप्रदायों के लोग एक-दूसरे से लड़ जाएं तो जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है. इसलिए यह तो साफ हो जाता है कि ये सारे दंगे शहर पर आरोपित थे. असल में शहर के राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व के पूरी तरह समाप्त हो जाने की वजह से राजनीतिक स्पेस में एक रिक्तता आ गई है. इसी रिक्तता का फायदा उठाने के लिए कुछ छोटी-मोटी गुमनाम राजनीतिक ताकतें फसादियों को तैनात करवाकर दंगे भड़का रही थीं. और धर्म इसका सबसे आसान जरिया है. मगर यह सब हो सिर्फ इसीलिए पाया क्योंकि मौजूदा राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था से जवाबदेही पूरी तरह गायब हो चुकी है.’

पिछले तीन दंगों ने बरेली जैसे धार्मिक रूप से सहिष्णु शहर को इस हालत में पहुंचा दिया है कि एक छोटी-सी घटना भी अब यहां भयंकर रक्तपात को जन्म दे सकती है

सूत्रों के अनुसार बरेली के हालिया दंगों की पृष्ठभूमि 2010 में हुए दंगों के दौरान ही बन गई थी. बरेली से छह बार लोकसभा चुनाव जीत चुके भाजपा के वरिष्ठ नेता संतोष गंगवार तहलका से बातचीत में कहते हैं, ‘सपा मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के लिए यहां फसाद करवा रही है. ये लोग अगले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर अभी से माहौल बना रहे हैं.’  

मोटे तौर पर बरेली भाजपा का पुराना गढ़ रहा है. 2012 के विधानसभा चुनावों में भी बरेली शहर की दोनों सीटें भाजपा की झोली में गईं. लेकिन 15 वें लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रवीण सिंह आरोन ने संतोष गंगवार को हरा दिया. फिर हालिया निकाय चुनावों में भी सपा समर्थित प्रत्याशी डॉ आईएस तोमर की ही जीत हुई.  जानकार बताते हैं कि भाजपा के इस गढ़ में लगी राजनीतिक सेंध और शहर के सांप्रदायिक दंगों में गहरा संबंध है. दंगों के पीछे की इन राजनीतिक परतों पर बात करते हुए शहर के एक प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, ‘इतिहाद-ए-मिलात काउंसिल (आईएमसी)  के अस्तित्व में आने से यहां की राजनीति में बड़े परिवर्तन आए.

इसके मुखिया तौकीर राजा खान शहर के प्रमुख धार्मिक परिवार से आते हैं, इसलिए स्थानीय मुसलमानों में उनका बड़ा सम्मान है. पिछले विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने बरेली से एक सीट पर जीत भी हासिल की. आज शहर का हर राजनेता जानता है कि अब यहां का मुसलिम समुदाय आईएमसी की मर्जी पर ही अपना वोट डालेगा. बीच में चंद किराये के फसादियों से दंगा करवा कर लोगों को धार्मिक तौर पर उकसाया गया है. फिर मौजूदा राज्य सरकार में इतनी इच्छा शक्ति नहीं थी कि इन दंगों पर काबू पा पाती.’ 

जमीनी पड़ताल के दौरान बरेली के दंगों के पीछे मौजूद इन तमाम राजनीतिक कारणों से इतर एक और महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है. पिछले कई दशकों से हर साल 320 शांतिपूर्ण धार्मिक जुलूसों का साक्षी बनने वाला यह शहर अब सांप्रदायिक बारूद के ढेर पर खड़ा है. पिछले तीन राजनीतिक दंगों ने यहां की जनता को उकसा कर उस स्तर तक पहुंचा दिया है जहां गलती की एक जरा सी चिंगारी भी भारी जनहानि में तब्दील हो सकती है.

सांप्रदायिक दंगों ने कोसीकलां और बरेली के साथ-साथ प्रतापगढ़, इलाहाबाद और राजधानी लखनऊ को भी अपनी चपेट में लिया. एक नाबालिग दलित लड़की के सामूहिक बलात्कार और हत्या की घटना के बाद प्रतापगढ़ के अस्थान गांव में भड़के सांप्रदायिक दंगों में बस्ती के 46 मुसलमानों के घर जला दिए गए थे. मामले में बरती गई पुलिस की निष्क्रियता की प्रतिक्रिया के तौर पर भड़के इस दंगे के दौरान दंगाइयों पर काबू पाने में पुलिस को कई घंटे लग गए. हाल ही में असम के मुसलमानों पर हुए अत्याचारों के विरोध में इलाहाबाद और लखनऊ में भी दंगे भड़के. राजधानी लखनऊ में जहां दंगाइयों ने बुद्ध पार्क में तोड़-फोड़ करने के साथ-साथ मीडियाकर्मियों की भी पिटाई की, वहीं इलाहाबाद में दो घंटे चले उत्पात के बाद कर्फ्यू लगाना पड़ा.

बलात्कार…

कुठोंद के सनगढ़ गांव की राम कटोरी के पोते का पुलिस थाने में शारीरिक उत्पीड़न हुआ था.

राज्य के जालौन जिले के कुठौंद थाना क्षेत्र में 8 साल के एक बच्चे के साथ पुलिस चौकी में हुए शारीरिक उत्पीड़न का एक वीभत्स मामला कमोबेश कम चर्चा में रहा. क्षेत्र की शंकरपुर चौकी में हुई इस घटना की पड़ताल के लिए तहलका की टीम पीड़ित परिवार के गांव सनगड़ पहुंची. गांव के हरिजन टोले में मनोज लाल उर्फ पप्प्पू की  छोटी-सी झोपड़ी में हमारी मुलाकात उनकी मां राम कटोरी से होती है.

पूछने पर राम कटोरी बताती हैं कि उनके बहू-बेटे सब मजदूरी करने के लिए औरैया जा चुके हैं. कुछ और इधर-उधर की बातें करने के बाद जब हम उनके आठ वर्षीय पोते ओमू के बारे में उनसे पूछते हैं तो वे चुप हो जाती हैं. कुछ देर की खामोशी और दो-तीन बार पूछने के बाद राम कटोरी धीरे से बताती हैं कि उनका पोता पास ही के सरकारी स्कूल में पढ़ने गया है. हमारे आगे पूछने पर पुलिसिया अत्याचारों से परेशान अपने परिवार के बारे में बताते हुए वे कहती हैं, ‘उस दिन ओमू दो और बच्चों के साथ खेल रहा था. वे दोनों भी मेरे ही बेटे केशवचंद के लड़के हैं. लड़कों ने खेलते हुए पास की दुकान से 10 रुपये उठा लिए. दुकानवाले ने लड़कों को उठाकर शंकरपुर चौकी के सिपाही कृपासिंधु भारती को दे दिया. उसने मेरे बच्चों को दो दिन चौकी में बंद करके रखा. उनसे झाड़ू-पोछा करवाया और फर्श धुलवाया. फिर उनसे मालिश भी करवाई.’

इसके बाद आस-पास खड़ी भीड़ को देखकर वे खामोश हो जाती हैं. गावंवालों को पीछे हटाने के बाद वे धीरे से आगे जोड़ती हैं, ‘मैडम, उन्होंने हमारे पोते के साथ बहुत गलत काम किया. घर वापस आने के बाद उसके पूरे गाल सूज गए थे. जब उसने आठ दिन तक खाना नहीं खाया तो हम लोग परेशान हो गए. हमेशा घबराया-घबराया सा रहता था. बहुत पूछने पर उसने बताया कि सिपाही ने उसके साथ गलत काम किया है. उसकी तबीयत ज्यादा खराब होने लगी तो उसके मां-बापू उसे औरैया ले गए इलाज करवाने.’ पिछले 6 महीने में जुलाई के मध्य में हुई इस घटना के कुछ दिन बाद राम कटोरी के परिवार को अपने बच्चे के साथ हुए शारीरिक उत्पीड़न का पता चला तो वे इसकी शिकायत करने पुलिस के पास गए.

राज्य में पुलिसिया हिरासत में हुए शारीरिक उत्पीड़न के चर्चित मामले :-

  • मई 2012- बदायूं जिले की लालपुर चौकी में 17 वर्षीया लड़की के साथ बलात्कार
  • जून 2012 – लखनऊ जिले के मॉल पुलिस स्टेशन में एक सब इंस्पेक्टर द्वारा एक महिला के साथ बलात्कार का प्रयास
  • जुलाई 2012- कुशीनगर जिले के खड्डा पुलिस थाने में 35 वर्षीया महिला के साथ सामूहिक बलात्कार 
  • सितंबर 2012- महोबा जिले की बजरिया पुलिस चौकी में तैनात एक दरोगा ने अपने थाना क्षेत्र की एक दलित महिला के साथ बलात्कार किया
  • सितंबर 2012- 5 सितंबर की सुबह गोंडा जिले में एक पुलिस कांस्टेबल ने 14 वर्षीया नाबालिग लड़की का बलात्कार किया

मामले के सामने आते ही पीड़ित परिवार पर राजीनामा के लिए दबाव बढ़ने लगा. राम कटोरी कहती हैं, ‘पिछले महीने सिपाही रात को शराब पीकर हमारे घर आया था. वह हमें राजीनामा करने की धमकी देने लगा. हम गरीब हरिजन लोग हैं,  इसलिए हमारी कहीं कोई सुनवाई नहीं है. लेकिन हमने राजीनामा नहीं किया. हमारे बच्चों के साथ इतना बुरा हुआ है. हमारे अंदर जितनी हिम्मत है उसमें हम पूरी तरह लड़ेंगे.’

घटना के सामने आने के बाद गांव के लोग सिपाही के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाने जालौन पुलिस अधीक्षक के दफ्तर भी गए थे. इसके बाद कार्रवाई के नाम पर भारती का तबादला करके उसे सिर्फ लाइन-अटैच कर दिया गया. यहां यह रेखांकित करना जरूरी है कि बाल न्याय अधिनियम के तहत किसी भी नाबालिग बच्चे को सामान्य पुलिस अपनी हिरासत में नहीं रख सकती. तहलका से बातचीत में जिले के वर्तमान पुलिस अधीक्षक आरपी चतुर्वेदी सिर्फ इतना कहते हैं कि मामले की तहकीकात जारी है. सिपाही को निलंबित करके उसके खिलाफ मामला दायर करने के बारे में पूछने पर वे कहते हैं, ‘देखिए मैं अभी यहां नया आया हूं और मेरे सभी साथी भी नए हैं. लेकिन मैं मामले की जांच करवा रहा हूं. आगे मामला दायर किया जाएगा.’

राज्य में पुलिस कर्मचारियों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का यह अकेला मामला नहीं है. बीते छह महीने के दौरान उत्तर प्रदेश में पुलिस हिरासत में होने वाले बलात्कारों और शारीरिक उत्पीड़न के कम से कम छह शर्मनाक मामले सामने आ चुके हैं (बॉक्स देखें). पुलिसिया हिरासत में होने वाले इन बलात्कारों से इतर राज्य में होने वाले सामान्य बलात्कारों के सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो मालूम पड़ता है कि यहां रोजाना करीब 6 बलात्कार दर्ज हो रहे हैं. यौन उत्पीड़न की इन बढ़ती घटनाओं  की वजह से एक ओर जहां राज्य के पुलिसिया महकमे की किरकिरी हो रही है वहीं समाजवादी पार्टी की सरकार की भी कड़ी आलोचना हो रही है.

 (पहचान छुपाने के लिए पीड़ित का नाम बदल दिया गया है)

डकैती…

  

8 अगस्त, 2012 को चित्रकूट की एक अदालत से लौटते हुए 13 खूंखार डकैत उत्तर प्रदेश पुलिस की हिरासत से फरार हो गए. अभी राज्य सरकार का पुलिसिया महकमा इस घटना से इलाके में बढ़ने वाले डकैतों के आतंक का आकलन भी नहीं कर पाया था कि 9 अगस्त, 2012 को चित्रकूट के एक गांव में सुदेश पटेल उर्फ बालखड़िया के गैंग ने पांच लोगों की निर्मम हत्या कर दी. मारकुंडी पुलिस थाना क्षेत्र में हुई इस घटना में जिन लोगों की हत्या हुई उनमें दो महिलाएं सहित एक आठ वर्षीया बच्ची भी शामिल थी.

फरार कैदियों में ठोकिया का बहनोई और 75 हजार का इनामी डकैत चुन्नी लाल पटेल प्रमुख है. साथ ही शिवमूरत कोल, रम्मो कोल, सिनेश नाई, हरी कोल और काली कोल जैसे ददुआ गैंग के पुराने सदस्य भी शामिल हैं. पिछले पांच साल में अंबिका प्रसाद पटेल उर्फ ठोकिया और सुंदर पटेल उर्फ रागिया जैसे दुर्दांत डकैतों के एनकाउंटर के बाद से माना जाने लगा था कि बुंदेलखंड क्षेत्र की डकैती समस्या पर काफी हद तक काबू पा लिया गया है. चूंकि फरार हुए सभी डकैत और तराई में सक्रिय बालखड़िया गैंग की जड़ें ददुआ की पुरानी गैंग से जुड़ती हैं,  इसलिए जानकारों का कहना है कि कैद से फरार डकैतों का समूह अब बालखड़िया गैंग के साथ मिलकर तराई में बड़ी वारदातों को अंजाम देने की योजना बना रहा है.

बांदा रेंज के पुलिस उप-महानिरीक्षक  पीके श्रीवास्तव तहलका से बातचीत में यह स्वीकार करते हैं कि बांदा जेल से फरार हुए कैदी और बालखड़िया गैंग के सदस्य चित्रकूट के जंगलों में एक नया गैंग बना सकते हैं. इससे उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर बसे दस्यु-प्रभावित क्षेत्र के लगभग 80 गांवों पर डकैती की बड़ी वारदातों का खतरा बढ़ गया है. वे विवरण देते हुए कहते हैं, ‘हमारे सूत्र बता रहे हैं कि उन लोगों ने जंगल में मिलकर एक नई गैंग बना ली है, पर अभी उसकी आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है. अभी हम डकैतों की गतिविधियों के बारे में जानकारी इकट्ठा कर रहे हैं और हमने बालखड़िया गैंग के तीन सदस्यों को गिरफ्तार भी कर लिया है. पर फिलहाल मैं अपनी फोर्स को ठीक करने पर ध्यान दे रहा हूं. हमारी टीम में ऐसे लोग हैं जो डकैतों को हमारी सूचनाएं पहुंचा रहे हैं. इसलिए हम बार-बार उन्हें पकड़ने से चूक जाते हैं. सबसे पहले मैं इन लोगों को ढूंढ़ कर अपनी रेंज से बाहर करना चाहता हूं.’

एक फरार डकैत की गिरफ्तारी के बाद हुई पुलिस पूछताछ में पता चला कि बांदा में डकैतों के पुलिस हिरासत से फरार होने की पूरी योजना में खुद पुलिसवाले ही शामिल थे.

बांदा जेल से 13 डकैतों के फरार होते ही घटना को समाजवादी पार्टी (सपा) की नई सरकार और लचर कानून-व्यवस्था के प्रभाव के तौर पर भी देखा जाने लगा. सपा पर डकैतों को संरक्षण देकर उनका राजनीतिक इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे हैं. दुर्दांत डकैत ददुआ के बेटे वीर सिंह आज चित्रकूट जिले से समाजवादी पार्टी के विधायक हैं. ददुआ के भाई बाल कुमार पटेल मिजपुर से सपा के सांसद हैं और उनके बेटे रामसिंह प्रतापगड़ से सपा के विधायक. उत्तर प्रदेश पुलिस की दस्यु-विरोधी सेल से जुड़े एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताते हैं कि राज्य में सरकार के बदलते ही डकैतों का मनोबल बढ़ गया है. वे आगे जोड़ते हैं, ‘नई सरकार आने के बाद से हमारे लिए चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं. जंगल में घूम रहे डकैतों के बढ़ते आतंक के साथ-साथ पुलिसिया अमले में भी अपराध और डकैतों से सहानुभूति रखने वाला वर्ग सामने आ रहा है.’  

तमाम अटकलों के बीच फरार कैदियों में से एक का सुराग मिलते ही इस घटना में उत्तर प्रदेश पुलिस की भूमिका साफ होने लगी. 16 अगस्त को बांदा पुलिस ने काली कोल नामक एक फरार डकैत को गिरफ्तार कर लिया और पूछताछ के दौरान पता चला कि डकैतों को भगाने की इस पूरी योजना में उत्तर प्रदेश पुलिस बराबर की भागीदार थी. इसलिए स्थानीय पुलिस ने भागने की इस योजना में उसका शुरू से साथ दिया. यहां तक कि जिन चार डकैतों की पेशी घटना वाले दिन नहीं थी उन्हें फरार करवाने के लिए पुलिस ने उनके फर्जी कागजात भी बनवाए. श्रीवास्तव बताते हैं, ‘यह पुलिस के लिए बहुत ही शर्म की बात है. यह पूरी घटना हमारे सिपाहियों की मूक सहमति से हुई. पुलिस वैन की खिडकियों के शीशे तोड़ने और जालियों को काटने का नाटक भी सिर्फ हमें गुमराह करने के लिए किया गया था और डकैतों को फरार करने की योजना एक महीने पहले ही बंद जेल में बनाई जा चुकी थी. मैंने सभी आरोपी पुलिस अफसरों को निलंबित करके उन्हें जेल भेज दिया है. अब उन पर भी दस्यु अधिनियम के तहत धाराएं लगाई जाएंगी.’  

रहनुमाई या खुदनुमाई?

समाजवादी पार्टी में कभी नंबर दो की हैसियत रखने वाले आजम खान को हाशिए पर धकेलने की प्रक्रिया चल रही है और जामा मसजिद के इमाम अहमद बुखारी इस काम के लिए सबसे बड़े हथियार बन गए हैं. हिमांशु बाजपेयी की रिपोर्ट.

उत्तर प्रदेश में सत्तासीन समाजवादी पार्टी को इन दिनों एक रस्साकशी से दो-चार होना पड़ रहा है. इसमें एक तरफ पार्टी के मुसलिम चेहरे आजम खान हैं और दूसरी तरफ दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी.  खींचतान जिस तरह से हो रही है उससे साफ लगता है कि लड़ाई मुसलमानों के अधिकारों के लिए कम और निजी अधिकारों के लिए ज्यादा है. 

 आजम और बुखारी के बीच तकरार यूं तो बहुत पुरानी है लेकिन इस साल उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के ठीक पहले यह नए सिरे से शुरू हो गई थी. जनवरी में इमाम बुखारी ने मुलायम सिंह के साथ मिलकर एक प्रेस कांफ्रेंस की और मुसलमानों से मुलायम का साथ देने की अपील की. बदले में सपा सुप्रीमो ने कहा कि सरकार बनी तो मुसलमानों को हर जगह समुचित प्रतिनिधित्व दिया जाएगा और इमाम साहब का मान रखा जाएगा. लेकिन इसके तुरंत बाद आजम खां ने रामपुर में बयान दे दिया कि बेहतर होगा बुखारी इमामत ही करें और सियासत हमें करने दें. 

इसके बाद ऐन चुनावी माहौल में बुखारी ने आजम पर यह कहकर निशाना साधा कि आजम की खुद रामपुर की एक सीट के बाहर कोई हैसियत नहीं है. वार आजम भी कर रहे थे, यह कहकर कि बुखारी के दामाद की हार तय है क्योंकि एक भी मुसलमान बुखारी की अपील पर वोट नहीं करता. बात सच निकली. तकरीबन सत्तर फीसदी मुसलमान वोटरों वाली सहारनपुर की बेहट सीट पर उमर बुखारी बुरी तरह से चुनाव हार गए. इसके फौरन बाद आजम ने बुखारी को दोबारा ललकारा कि इमाम साहब में दम है तो अपनी ससुराल मुरादाबाद से मेयर का चुनाव लड़ें और जीत कर दिखाएं. 

अप्रैल में राज्यसभा चुनाव के नामांकन शुरू हुए जिसमें सपा ने आजम खेमे के मुनव्वर सलीम को भेजा जबकि यह जगह इमाम बुखारी अपने भाई यहिया बुखारी के लिए चाहते थे. बुखारी इससे बेहद नाराज हुए, लेकिन मुलायम ने उनको सहयोग का आश्वासन देकर शांत कर दिया. आजम के सख्त एतराज के बावजूद बाद में विधानसभा चुनाव हारे हुए उनके दामाद को विधान परिषद भेज दिया गया. आजम उमर को एमएलसी बनाने के खिलाफ थे उन्होंने कहा कि इमाम साहब के मुताबिक मुसलमानों की सारी समस्याएं उनके रिश्तेदारों के पद पा जाने से ही सुलझ जाएंगी. इसके बाद बुखारी ने मुलायम सिंह को एक चिट्ठी लिखी जिसका मजमून यह था कि आजम खान मुसलमानों के दुश्मन हैं और अल्पसंख्यक मंत्रालय उनसे छीन लेना चाहिए. सूत्रों के मुताबिक बुखारी यह मंत्रालय आजम की जगह अपने दामाद उमर को दिलवाना चाहते हैं. 

पूरे मामले पर मुलायम सिंह और सपा के किसी भी नेता ने कोई और प्रतिक्रिया नहीं दी. आजम इस बात से नाराज थे कि पार्टी के बाहर का आदमी उन्हे गालियां दे रहा था और उनके बचाव में पार्टी का कोई भी व्यक्ति आगे नहीं आया. साफ था कि पार्टी में न होते हुए भी बुखारी का कद आजम से बड़ा होने लगा था. इसीलिए आजम का चिर-परिचित बेबाक स्वर धीमा पड़ रहा था. यह इशारा था कि अब उनकी हैसियत पिछले दौर वाली नहीं रही.  मई में बुखारी जब दोबारा लखनऊ आए तो एक बार फिर अपने करीबी वसीम खां को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का अध्यक्ष बनवा कर लौटे. मीडिया ने खूब लिखा कि बुखारी अपनों को सरकार में एडजस्ट करवा रहे हैं. लेकिन इस मामले पर आजम ने कोई बयान नहीं दिया क्योंकि पार्टी के रवैये से नाखुश होने के बावजूद वे अब कुछ भी ऐसा नहीं करना चाहते थे जिससे आगे उनके लिए मुश्किल खड़ी हो. आज भी स्थिति वैसी ही है. बुखारी के बारे मे सवाल पूछे जाने पर उन्होंने साफ कहा, ‘माफ कीजिए लेकिन बुखारी के न हक में कुछ कहूंगा न मुखालफत में.’ 

जगजाहिर है कि आजम खान सपा में बुखारी की हैसियत बढ़ने से नाखुश हैं. दरअसल आजम-बुखारी की लड़ाई शुरू होने के बाद सपा ने आजम को न सिर्फ अकेला छोड़ दिया है बल्कि उनकी नाज-बरदारी भी कम कर दी है. वहीं बुखारी की हर मांग पर  पार्टी अमल करती गई, इस तरह से पार्टी ने आजम को साफ संदेश दिया गया कि अखिलेश के निजाम में चीजें वैसी नहीं हैं जैसी नेताजी के समय हुआ करती थीं. 

वैसे आजम की उपेक्षा की शुरुआत विधानसभा चुनाव से पहले डीपी यादव  प्रकरण से ही हो गई थी जब आजम की घोषणा को खारिज करते हुए अखिलेश ने डीपी को पार्टी में दाखिला नहीं दिया. इसके बाद मंत्रालय बांटे जाते वक्त भी आजम खुश नहीं थे क्योंकि सपा नेतृत्व उन्हें स्पीकर बनाने पर आमादा था. इसके बाद मेरठ के प्रभारी पद से भी आजम को हटा दिया गया. हालांकि बाद में यह उन्हें वापस मिल गया. यही नहीं उनकी वह चिट्ठी भी पार्टी के लोगों ने लीक करवा दी जिसमें उन्होने इस्तीफे की पेशकश की थी. इसके अलावा आजम मुख्यमंत्री की तरफ से आयोजित इफ्तार पार्टी में भी शरीक नहीं हुए जबकि वे उस दिन लखनऊ में ही थे. इसके अलावा आजम ने पिछले दिनों नगर विकास विभाग की जो समीक्षा बैठक बुलाई उसमें अधिकारी पहुंचे ही नहीं. आजम ने गुस्से में यहां तक बयान दे डाला कि अनुशासनहीनता उन्हे बर्दाश्त नहीं लेकिन अफसोस कि वे कुछ कर नहीं सकते. साफ है कि आजम का कद पार्टी में पहले जैसा नहीं रहा. पर वे  इस मुद्दे पर खुल कर बोलने की स्थिति में भी नहीं हैं. वे कहते हैं, ‘मेरी नाराजगी मीडिया की बनाई हुई है. मै इफ्तार पार्टी में क्यों नहीं गया इसकी निजी वजहें हो सकती हैं, इनका जिक्र मीडिया में करने के लिए मै बाध्य नहीं हूं. मीडिया को सिर्फ अपनी स्टोरी से मतलब होता है, वह सियासी मामलों की नजाकत और अपनी जिम्मेदारी नहीं समझती.’

हालांकि बुखारी आजम पर वार का कोई मौका नहीं चूक रहे. वे कहते हैं, ‘आजम खान का दिमाग खराब हो गया है. मै मान रहा हूं कि मैने कई पार्टियों का साथ दिया.  तब मुझे उनसे कौम की बेहतरी की उम्मीद थी. मै किसी पार्टी का सदस्य तो हूं नहीं जो पार्टी का पाबंद रहूं. उमर बुखारी के अलावा मेरा कोई रिश्तेदार पार्टी में नहीं है. इस बार सपा के साथ था इसलिए सरकार बनने के बाद लोग मेरे पास उम्मीद लेकर आते हैं.’

आजम खां सपा के संस्थापक सदस्य रहे हैं, आठ बार के विधायक हैं. पार्टी की हर सरकार में उनकी नंबर दो की हैसियत रही है. पार्टी के मुस्लिम चेहरे रहे हैं. उधर, इमाम बुखारी को अवसरवादिता का प्रतीक कहा जाता रहा है. अतीत में बसपा, कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा जैसी पार्टियों से  भी जुड़ चुके हैं. यह बात भी साबित हो चुकी है कि उनके धार्मिक अनुयायी चाहें जितने हों लेकिन राजनैतिक जनाधार बिल्कुल नहीं है. तो फिर क्या वजह है कि सपा को वे आजम खान से ज्यादा मुफीद लग रहे हैं? इसका जवाब वरिष्ठ उर्दू पत्रकार हसन कमाल देते हैं, ‘बुखारी राजनैतिक रूप से आजम खान के सामने कहीं नहीं ठहरते. लेकिन एक राजनीति पार्टी के अंदर भी चल रही है.

उसके लिए अपने आजम की बजाय बाहरी बुखारी एकदम मुफीद हैं. मुलायम सिंह, अखिलेश के भविष्य की राह अपने सक्रिय रहते ही एकदम साफ कर देना चाहते हैं, जिसमें प्रभुत्व की राजनीति करने वाले आजम सबसे बड़ा रोड़ा साबित हो सकते हैं. साथ ही मुलायम मुसलमान वोटों के लिए लंबे समय तक आजम पर निर्भर नहीं रहना चाहते. इसलिए वे आजम पर नकेल रखना चाहते हैं. वे जानते हैं कि बुखारी को साथ लाने से उनकी मुस्लिम छवि भी बनी रहेगी और आजम को भी एक असुरक्षा बनी रहेगी.’ इसके बाद हसन कमाल व्एक और बेहद अहम बात कहते हैं, ‘उलेमा को साथ लाना पार्टी की अंदरूनी राजनीति में तो फायदेमंद साबित हो सकता है लेकिन चुनाव में इसका कोई फायदा पार्टी को नहीं मिलता. और जिस मुसलिम समुदाय की बेहतरी के नाम पर यह सब किया जाता है उसे तो इससे फकत नुकसान ही हासिल होता है.’

फरारी की होशियारी

नटवरलाल या शोभराज जैसे शातिर ठगों के किस्से बताते हैं कि जेल से भागने वाले कैदी डुप्लीकेट चाबी से ताला खोलते हैं, सुरंग बनाते हैं या फिर प्रहरियों को नशे में धुत्त कर देते हैं. लेकिन छत्तीसगढ़ में कैदी इसके इतर भी कई देसी और हैरान करने वाले तरीकों से रफूचक्कर होते हैं. राजकुमार सोनी की रिपोर्ट.

ऐ मालिक तेरे बंदे हम, ऐसे हो हमारे करम

नेकी पर चले और बदी से टले ताकि हंसते हुए निकले दम……

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 95 किलोमीटर दूर मौजूद गरियाबंद जिले की जेल में कैदी जब हर सुबह व्ही शांताराम की फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ का यह गीत लय और ताल के साथ गाते थे तो वहां तैनात महिला जेलर डी बारा और उनके सहयोगियों को यह लगता था कि उनकी जेल में अनुशासन कायम है. लेकिन एक रोज उनका भ्रम तब टूट गया जब लूट, हत्या तथा अन्य कई गंभीर आरोपों में सजा काट रहे छह कैदी लोहे की सलाखें काटकर भाग निकले. जांच में पता चला कि बैरक की छड़ों को काटने के लिए कैदियों ने जिस ब्लेड का इस्तेमाल किया था उसकी पहुंच एक टूथपेस्ट के जरिए हुई थी.  कैदियों को उनके मुलाकाती समय-समय पर ऐसा टूथपेस्ट पहुंचा देते थे जिसकी ट्यूब के भीतर तेजधार ब्लेडों को पनाह देने की पूरी गुंजाइश बनी रहती थी. ब्लेडों को ट्यूब के पिछले भाग से घुसाया जाता था जिसकी भनक बारीक से बारीक जांच-पड़ताल के बाद भी नहीं लग पाती थी. पहले एक चिकित्सक रहीं और थोड़े समय के लिए जेल प्रभारी बनाई गईं डी बारा कहती हैं, ‘मैं सोचती थी कि कैदी नेकी के रास्ते पर चलने और बदी से दूर रहने का संकल्प ले रहे हैं. पर मुझे क्या मालूम था कि प्रार्थना के साथ जो लय और ताल सुनाई दे रही है वह छड़ों पर ब्लेड चलाकर पैदा की जा रही है.’ 

तो इस तरह 26 मार्च 2007 को रविकिशन, घनश्याम, श्यामसुंदर, चोमेश्वर, सौरभ दिनमणी, धर्मेंद्र जैसे खूंखार कैदी जेल से भागने में सफल हो गए. कैदियों की फरारी के बाद डी बारा की सेवाएं अस्पताल को लौटा दी गईं. लापरवाही बरतने के आरोप में जेल प्रहरी मोहनलाल और रविप्रकाश की वेतनवृद्धि रोक दी गई और एक अन्य प्रहरी मन्नू सिंह को नौकरी से हाथ धोना पड़ा. फरार कैदियों में चार फिर गिरफ्त में आ चुके हैं. दो कैदी रविकिशन और श्यामसुंदर अब तक पुलिस की पकड़ से बाहर हैं.

छत्तीसगढ़ में कैदियों के जेल तोड़कर भागने की यह कोई अकेली घटना नहीं है. 2005 से लेकर 20 जून 2012 तक जेल ब्रेक की 21 एवं विभिन्न न्यायालयों में पेशी के लिए लाने- ले जाने के दौरान कैदियों के फरार होने की 116 घटनाएं हो चुकी हैं. जेल महकमे के रिकार्ड के मुताबिक इस अवधि में कुल पांच सौ एक कैदी फरार हो चुके हैं. फरार होने के लिए ये कैदी जिन तरकीबों का सहारा लेते हैं वे काफी दिलचस्प हैं. 20 अगस्त 2012 को रायगढ़ जेल से एक कैदी हारून नमाज पढ़ने के दौरान फरार हो गया था. हारून ने जेल प्रबंधन से मांग की थी उसे नमाज पढ़ने के लिए एकांत चाहिए. प्रबंधन ने उसकी मांग मानते हुए उसे जेल के स्कूल में ठहरा दिया था. हारून ने यहां मौका देखकर नए-पुराने गमछों की मदद से स्कूल के चैनल गेट की छड़ों को खींचकर उनके बीच कामचलाऊ जगह बना ली. फिर वह गेट से बाहर निकला और शौचालय के पाइप से चढ़कर 20 फीट ऊंची दीवार लांघते हुए रफूचक्कर हो गया. 

छत्तीसगढ़ को देश की सबसे बड़ी जेल ब्रेक ( दंतेवाड़ा ) की घटना का गवाह भी माना जाता है. इस घटना का मास्टर माइंड कैदी सुजीत कुमार था जिसने अपने अच्छे व्यवहार की वजह से जेल प्रभारी बीएस मानेकार और कैदियों का दिल जीत रखा था.16 दिसंबर 2007 की शाम जब कैदियों को भोजन परोसा जा रहा था तब सुजीत ने जेल के प्रशासनिक कक्ष, जहां उसकी आवाजाही सामान्य ढंग से बनी हुई थी, में दवाई लेने के बहाने प्रवेश किया और सबसे पहले उन तमाम चाबियों पर कब्जा जमाया जिसके जरिए कैदियों के बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त हो सकता था. इसके बाद सुजीत के इशारे पर कैदियों ने जेल की चादरों और कंबलों को चीरकर रस्सियां बनाई और फिर प्रहरियों को बंधक बना लिया. इस घटना में एक ही दिन में 299 कैदी फरार हुए थे. फिलहाल सुजीत आंध्र की एक जेल में बंद है, घटना के पांच सालों के बाद भी पुलिस 195 कैदियों का पता नहीं लगा पाई है. 

वैसे छत्तीसगढ़ में जेल ब्रेक की यही एक घटना ऐसी थी जिसमें इंसास और थ्री नाट थ्री जैसे हथियारों से कैदियों ने गोलियां भी दागी थी. नहीं तो ज्यादातर मौकों पर कैदी सीमित और देसी संसाधनों को ही अपना काम चलाते रहे हैं. कभी कुम्हड़े और लौक के भीतर रखकर जेल में पहुंचाई गई आरी से लोहे की छड़ें काटी गई हैं तो कभी चादरों और कंबलों को चीरकर रस्सी बनाने के बाद कैदियों ने दीवार फांदी है. 

आंखों में धूल झोंकने वाली कहावत को छत्तीसगढ़ में कैदियों ने लगभग शब्दश: चरितार्थ कर दिखाया है. लगभग इसलिए कहा जा रहा है कि क्योंकि यहां आंखों में धूल की जगह मिर्ची झोंककर पुलिस को चकमा दिया गया. 19 जुलाई 2007 की सुबह कोरबा जिले की कटघोरा जेल में जब कैदियों के बीच हाथापाई होने लगी तो प्रहरियों को हथियार लेकर बैरक का दरवाजा खोलना पड़ा. लेकिन इससे पहले कि प्रहरी आपस में भिड़े कैदियों को अलग-थलग करते, कैदियों ने अचानक एक साथ मिलकर प्रहरियों पर ही धावा बोल दिया. हथियारों के साथ बंधक बना लिए गए प्रहरियों की आंखों में अदरक नींबू- मिर्ची का घोल फेंका गया और उनसे मेनगेट की चाबियां छीन ली गई. घटना के बाद आंखों में मिर्ची की चुभन झेल रहे कर्मियों ने जैसे-तैसे सायरन बजाया लेकिन तब तक दिलीप, राजू, बोधराम, चिंटू, दीपक, गणेशू पटेल, कमेंद्र पुरी, हीरा पटेल और परमेश्वर नाम के खूंखार कैदी रफूचक्कर हो चुके थे. हालांकि जल्द ही ये सभी पुलिस के हत्थे चढ़ गए. बाद में उन्होंने बताया कि उन्होंने जेल के रसोइए को विश्वास में लेकर नींबू- मिर्च अदरक की अच्छी- खासी मात्रा हासिल की थी. इसके चार साल बाद जांजगीर जिले की जेल में भी कुछ यही हुआ. लूट और हत्या के आरोप में बंद पुष्पेंद्र, वीरेंद्र, विजयकुमार और चंद्रशेखर चंद्रा नाम के कैदी 27 मई 2011 को प्रहरी तुलसीराम नेताम और मोहनराम भगत की आंखों में हरी मिर्ची का घोल फेंककर भाग खड़े हुए.

आंखों में धूल झोंकने वाली पुरानी कहावत को छत्तीसगढ़ में कैदियों ने कई मौकों पर लगभग शब्दश: चरितार्थ कर दिखाया है

राजधानी रायपुर से 456 किलोमीटर आदिवासी बहुल जिले जशपुर में भी जेल ब्रेक की दो घटनाएं हो चुकी है. दोनों ही घटनाओं में कैदियों की ओर देसी नुस्खे आजमाए गए थे. बताते हैं कि जेल के कैदी प्रहरियों के सामने अक्सर बच्चों की एक कविता दोहराते. यह कविता थी–अक्कड़-बक्कड़ बंबे बो. अस्सी नब्बे पूरे सौ, सौ से निकला धागा, चोर निकलकर भागा. पहले-पहल तो प्रहरियों को यह समझ में नहीं आया कि कैदी इस कविता का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं, लेकिन जब कैदियों ने जेल में प्रशिक्षण के दौरान चरखे में काते गए सूत से बनाई गई रस्सियों से प्रहरियों को बंधक बनाया तब इस रहस्य से पर्दा उठा कि कविता में धागे का इस्तेमाल कौन सा लक्ष्य हासिल करने के लिए किया जा रहा था.

15 मई 2008 को हुई इस घटना में लूट और हत्या के आरोप में सजा काट रहे अशोक कुमार, धनेश्वर, दीपक कुजूर, निर्मल केरकेट्टा, कमलेश टोप्पो, सविमल तिग्गा, नरेंद्र सिंह, दशरथ, बाबूलाल, नान्हू महली और रतन लकड़ा फरार हो गए थे. इसके बाद जेल प्रशासन ने जेलर अलौइश कुजूर, जेल प्रहरी सुधीर एक्का और धनमोहन भगत को निलंबित कर दिया था. इसी जेल से 18 जून 2012 को कैदी निर्मल खेपइ, नरेश यादव, तुलेश्वर, रंजीत जेना और आस्कर तिर्की भी फरार हो चुके हैं. इन कैदियों ने भी सलाखें काटने के लिए छोटी-छोटी आरियों का इस्तेमाल किया था. उन्हीं दिनों जेल में रंगाई-पुताई भी चल रही थी. बैरक की ऊपरी और निचली सतह पर आरी चलाने के दौरान इस बात का ध्यान रखा जाता था कि किसी भी सूरत में कोई चमक किसी को नजर न आए. इसके लिए कैदी ऊपरी छड़ों पर आरी चलाने के बाद चमक को ढकने के लिए शरीर की मैल उपयोग में लाते थे जबकि निचले हिस्से में अलसुबह चूना पोत दिया जाता था.

सरगुजा जिले के अंबिकापुर में जेल ब्रेक की तीन घटनाएं हो चुकी हैं.  23 नवम्बर 2007 को हुई पहली घटना में कैदी विनोद प्रजापति, मोहम्मद शमीम और जमुना सिंह ने भोजन करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली थाली को चीरकर धारदार ब्लेड बना लिया था. उधर, एक अगस्त 2010 को हुई दूसरी घटना में कैदी भोट वशिष्ठ और छोटू ने फरार होने के लिए पहले तो चादर, गमछे और शाल को जोड़कर रस्सी बनाई. इसके बाद उन्होंने रस्सी के एक सिरे पर वह पत्थर बांधा जो जेल में फूलों की क्यारियों के बीच बेतरतीब ढंग से पड़ा रहता था. फिर एक दिन मौका देखकर उन्होंने इस जुगाड़ का इस्तेमाल वैसे ही किया जैसे पुराने जमाने में सिपाही चोरी छिपे दुश्मन के किले पर चढ़ने में करते थे. रस्सी इस तरह से फेंकी गई कि इसके सिरे पर बंधा पत्थर जेल की दीवारों के एक जोड़ पर बनी दरारनुमा जगह पर फंस जाए. इसके बाद वे रस्सी के सहारे दीवार फांदकर भाग निकले.  

केंद्रीय जेल रायपुर की एक महिला बंदी अमरीका बाई ने तो सबको पीछे छोड़ दिया. हत्या के जुर्म में सजा काट रही अमरीका बाई जिस बैरक में बंद थी उसके पास केले के झाड़ थे. बताते है कि अमरीका बाई प्रायः केले तोड़ने के बहाने झाड़ पर चढ़कर दीवार पर नुकीले पत्थरों के जरिए ग्रिप बनाया करती थी. 25 अक्टूबर 2008 की रात प्रहरियों ने देखा कि दीवार पर कोई छिपकली की तरह रेंग रहा है. इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते अमरीका बाई दीवाल फांदकर जेल के बाहर हो चुकी थी. हालांकि परिवार से मिलने की भावुक कमजोरी की वजह से वह उसी दिन पकड़ भी ली गई थी. जेल में दोबारा आने के बाद जब अमरीका बाई ने अफसरों के सामने अपनी फरारी के तौर-तरीके का प्रदर्शन किया तो सभी भौचक्के रह गए थे. अमरीका बाई लंबे समय तक रायपुर जेल में रही और अफसर, प्रहरी व जेल कर्मचारी उसे स्पाइडरलेडी ही कहते रहे.

केंद्रीय जेल रायपुर में जेल उपमहानिरीक्षक केके गुप्ता ‘यहां कैदी बेकार से बेकार चीज काम में ले आते हैं’

केंद्रीय जेल रायपुर में जेल उपमहानिरीक्षक केके गुप्ता ने देश के नामचीन पाकेटमारों के साथ रहकर और कई बार तो उनके चक्कर में लात-घूंसे खाकर भी पाकेटमारी पर पीएचडी हासिल की है. वे इन दिनों कैदियों की फरारी के तौर-तरीकों को लेकर शोधकार्य में जुटे हुए हैं. उनसे हुई बातचीत के अंश.

छत्तीसगढ़ में जेल ब्रेक की बढ़ती घटनाओं पर क्या कहेंगे.

जेल में पहुंचने वाले हर बंदी का एक रूटीन तय हो जाता है. कई बार रूटीन से निराश हो चुके कैदियों को लगता है कि बाहरी दुनिया में चाहे जितनी आपाधापी हो वह मजेदार तो है. यदि कैदी ठान लेता है कि वह भागेगा तो फिर चाहे जितनी चौकसी कर दी जाए, वह अपने सपने को हकीकत में बदलने की कोशिश करता ही है. लेकिन यदि प्रहरी भी यह ठान ले कि कैदियों को फरार नहीं होने देना है तो फिर कैदी भाग ही नहीं सकता.

क्या कैदियों के फरार होने की और कोई वजह नहीं है?

एक वजह सुरक्षाबलों की कमी भी है. छत्तीसगढ़ की 25 जेलों में फिलहाल 14 हजार 225 लोग विभिन्न मामलों में सजा काट रहे हैं. राष्ट्रीय मानक के तहत छह कैदियों की देखरेख के लिए एक सिपाही का होना अनिवार्य है. लेकिन छत्तीसगढ़ में महज 18 सौ सुरक्षाकर्मियों से काम चलाया जा रहा है. अब भी 571 कर्मचारियों की कमी है.

आपकी जानकारी में क्या कोई इसलिए भी जेल से भागा क्योंकि उसे किसी से बदला लेना था?

ऐसा मैंने केवल फिल्मों में ही देखा है.

कैदियों के फरार होने के तौर-तरीकों को लेकर चल रहे अपने शोध के बारे में कुछ बताएं.

अभी काम चल रहा है, लेकिन मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि छत्तीसगढ़ के कैदियों की फरारी का तरीका अनूठा है. यहां के कैदी बेकार से बेकार चीज से काम निकाल लेते हैं. कोई कंबल के एक-एक रेशे से मोटी रस्सी तैयार करते हुए पकड़ा गया है तो कोई जेल की मल निकासी व्यवस्था से भी भागा है. कुछ समय पहले एक जेल की पूरी पाइप लाइन का इस्तेमाल ही सीढ़ी बनाने के लिए किया गया था.

बिहार: गलत गुरुदीक्षा, चौपट शिक्षा

सरकार की जेब ढीली हुई, बच्चों की पढ़ाई का नुकसान हुआ और यह सब जिस मकसद के लिए हुआ वह आखिर में अधूरा ही रहा. प्राथमिक स्कूलों में तैनात अप्रशिक्षित शिक्षकों को प्रशिक्षित बनाने के लिए बिहार सरकार की कवायद का हाल फिलहाल कुछ ऐसा ही नजर आ रहा है. निराला की रिपोर्ट.

सितंबर की पहली तारीख को बिहार में शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव की तरफ से राज्य के सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों के नाम एक चिट्ठी जारी हुई. इसमें कहा गया था,  ‘22/06/2006 को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय एवं बिहार सरकार के शिक्षा विभाग के बीच एमओयू के बाद राज्य के नियोजित शिक्षकों को दो वर्षीय डीपीई कार्यक्रम में नामांकित करवाया गया. चार वर्षों के अंदर इसमें उत्तीर्ण होना अनिवार्य है. कतिपय शिक्षक चार वर्षों तक उत्तीर्ण नहीं हो सके हैं. ऐसे अनुत्तीर्ण शिक्षकों को सेवा में बनाए रखने के लिए विभाग जिम्मेवार नहीं है. ऐसे शिक्षकों को एक मौका और देते हुए अगली परीक्षा में उत्तीर्ण होना अनिवार्य है. उसमें भी जो पास नहीं होंगे, उन्हें सेवा से हटाने हेतु संबंधित नियोजन इकाई को निर्देश दिया जाएगा.’  इस पत्र से शिक्षकों के एक बड़े खेमे में हड़कंप का माहौल बन गया. दरअसल पिछले दो दशक के दौरान बिहार के प्राथमिक शिक्षा तंत्र में अप्रशिक्षित शिक्षकों की एक बड़ी फौज दाखिल हो चुकी है. नियमों के अनुसार इन शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के दबाव में कुछ साल पहले बिहार सरकार ने एक कवायद शुरू की थी. लेकिन यही कवायद अब इसके गले की हड्डी बन गई है. उधर, मसले से जुड़ा हर पक्ष जवाबदेही के सवाल पर गेंद दूसरे के पाले में फेंक रहा है.  

शिक्षक, सूचनाधिकार कार्यकर्ता और आंदोलनकारी रंजन कुमार बताते हैं, ‘बिहार में एक शिक्षक के जिम्मे 57 विद्यार्थी हैं जबकि शिक्षा का अधिकार कानून कहता है कि 30 बच्चों पर एक होना चाहिए. देश में इस कदर नाजुक हाल शायद ही कहीं मिले.’ प्रधान सचिव के पत्र की बाबत बात करने पर बेगूसराय निवासी कुमार का जवाब आता है, ‘जिस डिप्लोमा इन प्राइमरी एजुकेशन यानी डीपीई कोर्स का हवाला देते हुए और इसे पास नहीं करने पर नौकरी गंवाने का फरमान जारी किया गया है, वह कोर्स ही पिछले कई सालों से अंधेरे में रखकर संचालित हो रहा है.’ रंजन की मानें तो इग्नू का यह कोर्स नेशनल काउंसिल फॉर टीचर्स एजुकेशन यानी एनसीटीई के मानदंडों के अनुसार बिहार के लिए मान्य है ही नहीं.  इस मुद्दे पर न तो इग्नू जवाब दे पा रहा है और न ही एनसीटीई खुलकर कुछ बताने को तैयार है. उधर, साल 2007 से शिक्षकों को इस प्रशिक्षण कोर्स में जोते जाने की कवायद के चलते स्कूलों में शिक्षण कार्य भी बाधित हुआ है. रंजन हमें कुछ कागजात देते हैं. ये सूचनाधिकार से मिली जानकारी के होते हैं. इनमें पहला इग्नू के पटना सेंटर से मिली सूचना से संबंधित है. इस सेंटर से इसी साल 18 जून को यह सूचना मांगी गई थी कि बिहार के नियोजित शिक्षकों को इग्नू द्वारा जो डीपीई का कोर्स कराया जा रहा है, क्या उसकी मान्यता बिहार के लिए एनसीटीई से है और अब इस कोर्स के बाद भी इग्नू के सहयोग से जो छह माह के लिए एक और क्षमतावर्धक प्रशिक्षण कोर्स की तैयारी है, उसका प्रारूप क्या है? सवाल यह भी था कि 2007 से अब तक कितने शिक्षकों को डीपीई में प्रशिक्षित किया जा चुका है?

07 जुलाई 2012 को इग्नू के पटना सेंटर से डीपीई कार्यक्रम की समन्वयक विभा जोशी का जवाबी पत्र मिलता है कि ‘बिहार में डीपीई कार्यक्रम 2007 में बिहार सरकार के साथ इग्नू के द्वारा एक एमओयू के अंतर्गत चलाया गया था और इस कार्यक्रम को एनसीटीई से मान्यता प्राप्त करने की जिम्मेदारी बिहार सरकार की थी. अतः एनसीटीई से मान्यता के संबंध में कोई सवाल मानव संसाधन विकास मंत्रालय, बिहार सरकार अथवा बिहार शिक्षा परियोजना के निदेशक से करें. जहां तक आगामी क्षमतावर्द्धक प्रशिक्षण कोर्स की बात है तो वह भी बिहार सरकार के अनुरोध पर हो रहा है, उसके बारे में भी वही जानकारी देगी.’ यह जवाब अजीब किस्म का होता है. जिस इग्नू द्वारा 2007 से बिहार में यह कोर्स हजारों शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए चल रहा है, वही इग्नू इस कोर्स की मान्यता के बारे में भी खुलकर नहीं बता पाता और जिम्मेदारी बिहार सरकार के मत्थे मढ़ देता है. हमारी बात पटना में इग्नू सेंटर के प्रमुख क्यू. हैदर से होती है. वे कहते हैं, ‘मैं अभी नया हूं और बिहार सरकार से यह करार पहले का है. इसका क्या आधार था, अभी नहीं बता सकता.’ वे आगे बताते हैं कि डीपीई मान्य हो, इसीलिए इग्नू और एनसीटीई के संयुक्त तत्वावधान में छह माह का अतिरिक्त कोर्स डिजाइन किया गया है, जो क्षमतावर्धक कोर्स होगा. इसे कर लेने से डीपीई मान्य हो जाएगा.

रंजन से मिला दूसरा कागज इसी संदर्भ में एनसीटीई से मिले जवाब का होता है. 23 सितंबर, 2011 को एनसीटीई के दिल्ली स्थित मुख्यालय से पूछा गया था कि बिहार में इग्नू द्वारा जिस डीपीई कोर्स का संचालन करके बिहार में नियोजित शिक्षकों को द्विवर्षीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है, क्या उसको एनसीटीई द्वारा बिहार के लिए मान्यता दी गई है. बकौल रंजन, दिल्ली एनसीटीई से यह पत्र भुवनेश्वर कार्यालय भेजा गया, फिर भुवनेश्वर से जयपुर. दो माह पहले एनसीटीई के जयपुर कार्यालय ने जवाब में वर्ष 2000 में जारी एक नोटिफिकेशन की कॉपी भेजी, जिसमें उक्त कोर्स के पूर्वोत्तर भारत में संचालित होने से संबंधित सूचना दर्ज है. यानी एनसीटीई भी गोलमोल जवाब में उलझा देता है.  सूचना के अधिकार से मिले इन दो कागजों से यह साफ हो जाता है कि बिहार में 2007 से ही इग्नू के सौजन्य से डीपीई नाम से जो शिक्षकों को दीक्षित करने का कोर्स चल रहा है, वह रहस्यमयी है. इसी बाबत हमारी बात राज्य के शिक्षा मंत्री पीके शाही से होती है. वे कहते हैं,  ‘यह इग्नू की करनी है कि वह अब तक इसकी मान्यता नहीं ले सका है. हम तो इसके लिए 15 दफा केंद्रीय शिक्षा मंत्री सिब्बल से मिल चुके हैं. जब इग्नू से इस प्रशिक्षण के लिए करार हुआ था, तब मैं शिक्षा मंत्री नहीं था, लेकिन इग्नू यह कागज पर दिखाए कि बिहार सरकार ने उसे किस रूप में और कब आश्वासन दिया था कि डीपीई की मान्यता वह ले लेगा.’ 

शाही के जवाब से साफ होता है कि बिहार में शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए पिछले पांच वर्षों से संचालित डीपीई कोर्स मान्य नहीं है. हमारा सवाल होता है कि बिना मान्यता वाले कोर्स के साथ भला क्योंकर राज्य सरकार ने हजारों शिक्षकों को प्रशिक्षण के लिए जोड़ दिया था. शाही कहते हैं कि विद्यार्थी का काम मान्यता लेना नहीं होता और यह तो इग्नू को चाहिए था कि वह इतने दिनों में मान्यता ले लेता. डीपीई को मान्य बनाने के लिए अब छह माह का एक क्षमतावर्धक प्रोग्राम तैयार हुआ है. शाही कहते हैं , ‘देखिए, वह भी तो इतने दिनों से एनसीटीई और इग्नू द्वारा सिर्फ कहा जा रहा है. ठोस रूप में तो उसका स्वरूप अभी मिला नहीं है.’ 

यह किसी से छिपा नहीं कि बिहार में प्राथमिक शिक्षा फिलहाल सबसे बुरे दौर में है. इस स्थिति से पार पाने के लिए यहां वर्षों से जैसे-तैसे और भारी अनियमितता से शिक्षकों को बहाल करने की पंरपरा बनी है. जब बहाल गुरुओं को दीक्षित यानी प्रशिक्षित करने की मजबूरी सामने आई तो उसके नाम पर एक किस्म का भद्दा मजाक किया गया. अब तर्क-वितर्क और कुतर्क से इग्नू, बिहार सरकार आदि अपनी बातों को सही ठहराने में लगे हुए हैं. इससे प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के प्रति बिहार में शासन का नजरिया सामने आता है. साथ ही यह सवाल भी उठता है कि कैसे सरकारी खजाने से एक अमान्य कोर्स के लिए पैसे जारी कर दिए गए थे.

शिक्षा विभाग के संयुक्त निदेशक आरएस सिंह से हम जानना चाहते हैं कि राज्य सरकार ने कितना शुल्क अदा किया. वे कहते हैं, ‘यह मामला मेरे अंतर्गत तो नहीं आता, लेकिन लगभग पांच हजार रुपये प्रति शिक्षक लगा है.’  बताया जा रहा है कि लगभग 1,20,000 शिक्षकों को इसी कोर्स के जरिए दीक्षित करने का जिम्मा दिया गया है. सीधा गणित लगाया जाए तो 60 करोड़ रु का हिसाब है.

 प्राथमिक शिक्षा पर काम कर रहे और बिहार लोक अधिकार मंच से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता उदय कहते हैं, ‘बिहार में न तो शिक्षा की कोई ठोस नीति है, न शिक्षकों की बहाली की और न ही उनके प्रशिक्षण की. ऐसे में यही सब होगा. जैसे-तैसे शिक्षकों को भर्ती करके शिक्षा का बंटाधार पहले ही किया जा चुका है, अब गुणवत्ता साबित करने के लिए सर्टिफिकेट बांटने पर ही सरकार का सारा जोर है.’ 

बिहार के अपने शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थानों की स्थिति बात करें तो पहले ये संस्थान ही बिहार में शिक्षकों की बहाली का प्रमुख जरिया हुआ करते थे. इन ट्रेनिंग कॉलेजों में दाखिला लेने वाले प्रतिभागियों को दो साल का प्रशिक्षण दिया जाता था. फिर सफल प्रतिभागियों को शिक्षक बनने का मौका मिलता था. लालू प्रसाद यादव के जमाने में यह प्रक्रिया बदली. बिहार राज्य प्रारंभिक विद्यालय शिक्षक नियुक्ति अधिनियम 1991 बना और बिहार लोक सेवा आयोग से सीधे शिक्षकों की नियुक्ति हुई. इससे भारी संख्या में अप्रशिक्षित शिक्षक आ गए. इसी बीच केंद्र सरकार ने 1995 में एनसीटीई का गठन किया. बिहार सरकार को अप्रशिक्षित शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का आदेश मिला.

जैसे-तैसे प्रशिक्षण की प्रक्रिया पूरी हुई. बाद में एक-एक कर बिहार के ट्रेनिंग कॉलेजों की स्थिति खस्ता होती चली गई. इस दरमियान शिक्षकों की बहाली जारी रही. 2003 में पंचायत शिक्षा मित्रों की एक व्यवस्था बनी. 100 रुपये के नॉन ज्यूडिशियल स्टांप पेपर  पर 11 माह का इकरारनामा करके 1,500 रुपये महीना पगार में शिक्षा मित्र बहाल हो गए. तीन बार इकरारनामे की अवधि बढ़ी. सत्ता में नीतीश कुमार आए तो 2006 में नियोजन की नई नियमावली बनी जिसे बिहार प्रारंभिक पंचायत, प्रखंड, नगर शिक्षक नियोजन नियमावली 2006 कहा गया. इसके तहत अंकों के आधार पर 35 से 40 हजार शिक्षक बहाल हुए. 2008 और 2010 में भारी संख्या में नियोजन पर शिक्षक बहाल हुए. इस तरह आए शिक्षकों में 80 प्रतिशत से अधिक अप्रशिक्षित ही थे. 2010 से पूरे देश में शिक्षा का अधिकार कानून भी लागू हो गया. एनसीटीई ने बिहार सरकार पर शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का दबाव बनाया. सरकार ने इसके लिए इग्नू से करार किया. एक-एक प्रखंड में तीन-तीन स्टडी सेंटर तक तैयार किए गए. साल में औसतन 200 दिन तक स्कूल चलता है. इस दौरान प्रशिक्षण में उलझे शिक्षक स्कूल छोड़कर मान्यतारहित कोर्स के जरिए प्रति माह दस-दस दिन दीक्षित होने में लगे रहे. नतीजा यह हुआ कि बच्चों की पढ़ाई चौपट होती रही.

अब एक बार फिर नियोजित होने के लिए शिक्षकों की बड़ी फौज लिखा-पढ़ी की परीक्षा पास करके जिला-जिला, प्रखंड-प्रखंड घूमकर आवेदन जमा करने में लगी हुई है. दूसरी ओर डीपीई के बाद गुरुजी लोगों की क्षमता और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए सरकार एक और प्रशिक्षण की दस्तक दे चुकी है. दिखावे के लिए यह क्षमतावर्धन न का छह माह वाला प्रशिक्षण होगा, हकीकत में यह डीपीई के सर्टिफिकेट को मान्य कराने की प्रक्रिया होगी. इसके लिए भी राज्य सरकार इग्नू की शरण में ही पहुंची है. कहा जा रहा है कि यह कोर्स अगले माह शुरू हो जाएगा लेकिन अभी इसके स्वरूप की ही स्थिति अस्पष्ट है. क्या दाल में फिर कुछ काला है या पूरी दाल ही काली है?

फैसले की फांस

प्रोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर उत्तराखंड सरकार इधर कुआं-उधर खाई वाली स्थिति में फंसी नजर आ रही है. मनोज रावत की रिपोर्ट.

प्रोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर उत्तराखंड में चल रहा सरकारी कर्मचारियों का आंदोलन शांत होने की बजाय राजनीतिक रंग लेता जा रहा है. 10 अक्टूबर को होने वाले टिहरी लोकसभा उपचुनाव पर भी इस आंदोलन की छाया पड़ती दिख रही है. आरोप लग रहे हैं कि इस मामले में कहीं पर भी राजनीतिक स्तर पर निर्णय नहीं लिया गया.  दोनों वर्गों को खुश करने के लिए बनाए गए नौकरशाही के फॉर्मूले को प्रोन्नति में आरक्षण चाहने और उसका विरोध करने वाले दोनों ही नकार रहे हैं. दरअसल 10 जुलाई, 2012 को नैनीताल उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि राज्य सेवाओं में प्रोन्नति में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण समाप्त कर दिया जाए. सामान्य वर्ग के कर्मचारी इस निर्णय के बाद वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नतियों की उम्मीद लगाए बैठे थे. लेकिन 19 जुलाई को राज्य सरकार ने प्रोन्नतियों को अंजाम देने वाली सभी विभागीय प्रोन्नति समितियों पर रोक लगा दी. सरकार के निर्णय से सामान्य वर्ग के कर्मचारी भड़क गए. उन्होंने पहले इसके विरोध में अलग-अलग जगहों पर प्रदर्शन और क्रमिक अनशन किया जो सरकार द्वारा ध्यान न दिए जाने के बाद हड़ताल में बदल गया.           

दूसरी ओर उत्तराखंड अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति कर्मचारी फेडरेशन प्रोन्नति में आरक्षण खत्म करने के किसी भी संभावित निर्णय का विरोध करने की रणनीति बना रहा था. इससे सरकार के लिए इधर कुआं- उधर खाई वाली स्थिति हो गई. इससे बचने की कोशिश में तीन अगस्त को राज्य कैबिनेट ने विभागीय प्रोन्नति समितियों पर लगी रोक हटाने का निर्णय लिया. सरकार ने तय किया कि उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार प्रोन्नतियों को बिना आरक्षण के और वरिष्ठता व योग्यता के आधार पर भरा जाएगा. लेकिन एससी और एसटी वर्ग के कर्मचारियों की नाराजगी से बचने के लिए साथ ही उसने यह फैसला भी किया कि प्रोन्नति में मिलने वाले आरक्षण से उन्हें जितने पद मिलने थे उसके बराबर अतिरिक्त पद एक्स कैडर में सृजित किए जाएंगे और उन पर इस वर्ग के कर्मचारियों को प्रोन्नत किया जाएगा.

इस आंदोलन ने जातियों को लगभग भुला चुके कर्मचारियों को उनकी जातियां याद दिला दीं.  इस विवाद से उपजी खटास मिटने में बहुत वक्त लगेगा

इसके साथ सरकार ने राज्य सेवाओं में आरक्षित वर्ग के लोगों का प्रतिनिधित्व और उनकी सामाजिक स्थिति जांचने के लिए एक सदस्यीय जस्टिस इरशाद हुसैन आयोग का गठन कर दिया. आयोग को तीन महीने में अपनी रिपोर्ट देनी है. सरकार को लगा कि इन निर्णयों से दोनों वर्गों के अधिकारी और कर्मचारी शांत हो जाएंगे. पर हुआ उल्टा. एक्स कैडर के निर्णय से सामान्य और एससी-एसटी, दोनों ही कर्मचारी संगठन भड़क गए. इसी दौरान राजधानी दिल्ली में कैबिनेट ने प्रोन्नति में कोटे पर मुहर लगाकर संविधान संशोधन विधेयक को संसद में लाने वाले प्रस्ताव पर मुहर लगा दी. केंद्र सरकार के निर्णय से सामान्य वर्ग और उत्तराखंड में सरकार के अधकचरे निर्णय से दोनों वर्ग के कर्मचारी असंतुष्ट थे.

मुश्किल से निकलने के लिए सरकार ने पांच सितंबर को आरक्षण रोस्टर बगैर प्रोन्नति के शासनादेश के एक्स कैडर के पदों वाला शासनादेश भी जारी कर दिया. इन शासनादेशों से नाराज होने के बावजूद अगले दिन एससी और एसटी कर्मचारी काम पर लौट गए, लेकिन वे एक्स कैडर के बजाय पहले की ही तरह रोस्टर से प्रमोशन में आरक्षण की अपनी मांग पर कायम थे. 10 सितंबर को राज्य भर से आए इस वर्ग के कर्मचारियों ने सचिवालय का घेराव किया. इस आंदोलन को बसपा के विधायक हरि दास, रक्षा मोर्चा के नेता और पूर्व नौकरशाह एसएस पांग्ती सहित एससी-एसटी समाज के कई राजनेताओं ने समर्थन दिया. इन शासनादेशों से सामान्य वर्ग के कर्मचारी भी खुश नहीं थे.

पांच सितंबर को ही मुख्यमंत्री द्वारा खाली की गई टिहरी लोकसभा की सीट पर उपचुनाव की अधिसूचना जारी हो गई. सामान्य वर्ग के कर्मचारियों के नेता चुनाव आचार संहिता के कारण सरकार को समय देते हुए हड़ताल समाप्त करना चाहते थे पर इस निर्णय को ज्यादातर कर्मियों ने नहीं माना और इन नेताओं को अलग-थलग करके आंदोलन जारी रखा. इस पर सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए 11 सितंबर की रात सचिवालय सुरक्षा से जुड़े 18 कर्मियों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया. प्रमुख सचिव (सचिवालय प्रशासन) ओमप्रकाश के अनुसार प्रोबेशन अवधि में चल रहे नव नियुक्त कर्मियों को नोटिस दिया जाना शुरू हो चुका है. लेकिन सरकार का यह दांव और भी उल्टा पड़ता नजर आ रहा है. बर्खास्त हुए 18 कर्मियों में से 13 टिहरी लोकसभा के निवासी हैं जहां एक महीने बाद उपचुनाव होना है. इस उपचुनाव में मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा दांव पर है. इस इलाके में सरकार के इस निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया हुई है.   

अब सामान्य वर्ग के कर्मचारियों की बनी संघर्ष समिति का कहना है कि एक्स कैडर के पदों वाला निर्णय जब तक वापस नहीं लिया जाता तब तक उनकी हड़ताल जारी रहेगी. इस समिति के संयोजक एसएस वाल्दिया कहते हैं, ‘सामान्य वर्ग के कर्मचारी इस बार आर-पार की लड़ाई लड़ने के मूड में हैं. वे सरकार की बर्खास्तगी की गीदड़ भभकी से डरने वाले नहीं हैं. बर्खास्तगी के जवाब में हम सामूहिक इस्तीफा देंगे.’ संयोजक मंडल के संतोष बडोनी का मानना है कि सरकार को 2006 के उच्चतम न्यायालय में एम नागराज  केस (जिसमें अदालत ने कहा था कि जहां प्रोन्नति में आरक्षण दिया जाना है वहां पहले इस बात का समुचित आकलन हो कि एससी और एसटी का प्रतिनिधित्व बहुत कम है) का फैसला आने के बाद ही उत्तराखंड में प्रोन्नति में आरक्षण समाप्त कर लेना चाहिए था. पर उसने ऐसा नहीं किया. वे बताते हैं कि इससे राज्य में हर स्तर पर सामान्य वर्ग के अधिकारियों और कर्मचारियों को नुकसान पहुंचा है. राज्य में प्रमोशन में रोस्टर की व्यवस्था के अनुसार प्रमोशन में पहला पद एससी वर्ग के लिए आरक्षित था जिस कारण अधिकांश वरिष्ठ पदों पर सामान्य वर्ग की तुलना में कनिष्ठ एससी व एसटी वर्ग के विभागाध्यक्ष पहुंच गए हैं. बडोनी बताते हैं कि इन विभागाध्यक्षों से पहले नौकरी में आए सामान्य वर्ग के लोग उनसे पांच स्तर नीचे के पदों पर हैं. उनके अनुसार इससे सामान्य वर्ग के कर्मियों के भीतर सालों से कुंठा पनप रही है.

                                         

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि एससी-एसटी वर्ग की उत्तराखंड की जनसंख्या में करीब 20 फीसदी भागीदारी है. अनु-सचिव एनएस डुंगरियाल के मुताबिक उत्तराखंड सचिवालय में सेक्शन ऑफिसरों से लेकर अपर सचिव तक के स्तर के लगभग 180 पदों में से 52 पर एससी या एसटी वर्ग के अधिकारी हैं. यह संख्या कुल अधिकारियों के 28 फीसदी के करीब है. अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के प्रतिनिधित्व के लिए बनी इंदु कुमार पांडे कमेटी के अनुसार राज्य की अन्य सेवाओं में क, ख और ग, तीनों श्रेणियों के पदों पर इन दोनों वर्गों के कर्मियों की संख्या कुल कर्मचारियों के 15 प्रतिशत के लगभग है.

उत्तराखंड सचिवालय अनुसूचित जाति जनजाति अधिकारी/ कर्मचारी संगठन के अध्यक्ष करम राम कहते हैं कि सरकार को इंदु कुमार कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर प्रोन्नति में आरक्षण का निर्णय लेते हुए उच्च न्यायालय को अवगत कराना चाहिए था, लेकिन सरकार ने इस रिपोर्ट को बिना अपने निर्णय के उच्च न्यायालय भेज दिया जिससे मामला कमजोर हो गया. वे कहते हैं, ‘निर्णय में साफ है कि राज्य सरकार चाहे तो जरूरत पड़ने पर प्रोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था कर सकती है.’ उनके अनुसार एससी-एसटी वर्ग के कर्मचारी अपने हक पर डाका नहीं पड़ने देंगे. करम राम अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के राज्य सेवाओं में प्रतिनिधित्व और उनकी सामाजिक स्थिति जानने के लिए इरशाद हुसैन कमेटी गठित करने के निर्णय को भी बेतुका बताते हैं. वे कहते हैं, ‘इन सारे मामलों में  तीन सदस्यीय इंदु कुमार पांडे कमेटी पहले ही अपनी रिपोर्ट दे चुकी है. यदि राज्य सरकार सकारात्मक रूप से सोचती तो राज्य में पहले से ही काम कर रहे अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग से संख्यात्मक प्रतिनिधित्व के आंकड़े मंगा सकती थी.’

करम राम का मानना है कि इस पूरे प्रकरण में सरकार ने दोहरी नीति अपना कर कर्मचारियों को बांटने की जो कोशिश की वह गलत है. वे कहते हैं, ‘सरकार के गलत निर्णय से कर्मचारियों में दरार पैदा हो गई है जिसे पाटने में बहुत समय लग जाएगा.’ उनका आरोप है कि अभी सरकार ने  एससी-एसटी वर्ग के बैकलॉग के हजारों पद ही नहीं भरे हैं. इस विवाद में सत्ता दल कांग्रेस से दोनों ही पक्षों का भरोसा टूटा है. उधर, भाजपा केंद्र की तरह ही वेट एंड वॉच की राजनीति कर रही है. समाजवादी पार्टी ने इस आंदोलन में सबसे पहले शिरकत करके प्रोन्नति में आरक्षण का विरोध करने वाले पक्ष को खुला समर्थन दिया. राज्य निर्माण आंदोलन और मुजफ्फरनगर कांड के बाद से राज्य की राजनीति में शून्य पर पहुंच गई सपा को इस आंदोलन से ऊर्जा और समर्थन मिलता देख क्षेत्रीय दल उक्राद का पंवार धड़ा भी आंदोलन के समर्थन में कूद गया है. आने वाले टिहरी लोकसभा चुनाव पर इस आंदोलन का क्या प्रभाव पड़ेगा, पूछने पर एसएस वाल्दिया बताते हैं, ‘यदि सरकार 80 प्रतिशत जनसंख्या वाली सामान्य जातियों की भावनाओं को अपने राष्ट्रीय एजेंडे के कारण नकारेगी तो चुनाव पर उसका प्रभाव दिखेंगा ही.’ इस आंदोलन ने जातियों को लगभग भुला चुके कर्मचारियों को उनकी जातियां याद दिला दीं. जातिहित के नाम पर हो रहे इस संघर्ष की खटास मिटने में कितना समय लगेगा, यह कोई नहीं जानता.