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ये चिराग बुझ रहे हैं…

मद्धम उजाले में डूबी बुरहानपुर की एक उमस भरी शाम. मुगलिया दौर में छिपी अपनी जड़ों को आज भी इलाके के जर्जर कोठों में संजोए 20 साल के इमरान शहर की तंग गलियों में तांगा हांकते हुए हमें अपने अलग हो चुके माता-पिता के बारे में बताते हैं. उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में रहने वाले उनके पिता दशकों पहले उनकी मां का मुजरा सुनने बुरहानपुर आया करते थे. शहर में मशहूर कालीन मिल से सटी एक अंधेरी गली की तरफ तांगा मोड़ते हुए इमरान कहते हैं, ‘शुरुआत में हमारे वालिद लगातार यहां आते थे और कुछ साल पहले तक अम्मी को खर्च के पैसे भी देते थे. फिर धीरे-धीरे उन्होंने आना पूरी तरह बंद कर दिया. अब पैसे भी नहीं भेजते.’  

इस बीच लकड़ी के छोटे-छोटे बंद-बदरंग दरवाजों, टूटते झरोखों, गिरते छज्जों और बिजली के तारों के उलझे झोलों से पटी संकरी गलियों में सरकते हुए तांगा धीरे-धीरे आगे बढ़ता है. घोड़े के पैरों की चाप के बीच इमरान बात आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ‘मुजरा पिछले साल तक तो खूब होता था यहां, परंपरा ही है हमारी. मैंने तो आंखें ही गजलों, कव्वालियों और मुजरों की गूंज के बीच खोलीं. पर अब पुलिस की सख्ती की वजह से माहौल पहले की तरह नहीं रहा. मैंने 9वीं के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और फिर तांगा चलाने लगा. अम्मी तो नानी, बहनों और मौसियों के साथ रहती हैं. अब घर के सभी लोग कोई न कोई  काम करते हैं ताकि खर्च निकल सके.’

इस दौरान, आगे बढ़ते हुए हमें घरों के छज्जों पर लटकी पुराने कव्वालों की रंगीन नाम-तख्तियां दिखाई देने लगती हैं.

शुरुआत में तो पीले बल्बों की रोशनी में डूबे पर्दों के पीछे से आती घुंघरुओं की आवाज आपको अचानक से मुगल काल में ले जाती है. पर अगले ही पल, ‘दिल मेरा मुफ्त का’ जैसी खांटी बॉलीवुड धुनों पर होते मुजरों की आवाज झकझोर कर बताती है कि यह गालिब की गजलों पर थाप जमाने वाले पैरों का नहीं, नए जमाने के डिस्को-मुजरे का दौर है. हम एशिया की सबसे पुरानी मुजरा बस्ती ‘बोरवाड़ी’ में हैं. मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी छोर पर बसे बुरहानपुर शहर के बीचोबीच मौजूद बोरवाड़ी मोहल्ला मुगल बादशाह शाहजहां के दौर से ही केंद्रीय भारत में शास्त्रीय रक्कास (नृत्य) कला का मुख्य केंद्र रहा. इतिहास टटोलने पर पता चलता है कि दक्षिण भारत की यात्राओं के दौरान अक्सर बुरहानपुर में रुकने वाले मुगल बादशाहों ने यहां अपने मनोरंजन के लिए मुजरा कलाकारों और तवायफों का यह बोरवाड़ी मोहल्ला बसाया था. लेकिन लगभग 350 साल पहले कुरैशी नवाबों और मुगल शहजादों का दिल बहलाने के लिए बसाई गई बुरहानपुर की यह मुजरा बस्ती आज अपनी चमक खोती जा रही है.   

लगभग उजड़ चुकी बोरवाड़ी के इन झरोखों में जब-तब खामोशी से रोशन होने वाले चिरागों को खुद महसूस करने के लिए और इन गलियों के बारीक अनुभव के लिए हम इमरान से यहीं विदा लेते हैं और पैदल ही घूमना शुरू करते हैं. एशिया की सबसे पुरानी मुजरा बस्ती के तौर पर पहचानी जाने वाली  बोरवाड़ी के रास्ते कभी घुंघरुओं की गूंज से आबाद रहते थे. लेकिन आज यहां के मशहूर मुजरे की खामोशी के साथ-साथ लोक रक्कास कला और मुजरा कलाकारों की एक पूरी आबादी भी खात्मे के कगार पर है. इन गलियों में घूमते वक्त इमरान की कहानी बार-बार याद आ जाती है.  लगभग दो साल पहले तक उनके घर दूर-दूर से मुजरा सुनने आने वाले कद्रदानों की भीड़ लगी रहती थी, लेकिन ‘माहौल’ धीमा होने की वजह से अब घर के ज्यादातर सदस्य रोजगार के दूसरे विकल्पों की तरफ मुड़ चुके हैं. दशकों से मुजरे की कमाई पर पल रहे इस मातृसतात्मक परिवार के पुरुषों ने भी अब पान की गुमटियां खोलने से लेकर तांगे चलाने जैसे नए काम शुरू कर दिए हैं.

मध्य भारत के इस अनजाने और गुमनाम-से शहर में सैकड़ों साल पहले मुजरेवालियों की एक बस्ती बसने की वजहों की तलाश में हमें कई लोक-कहानियों के साथ-साथ बोरवाड़ी से जुड़े कई रोचक ऐतिहासिक तथ्य भी मिलते हैं. शहर के मशहूर इतिहासकार होशंगसोराबजी हवालदार बताते हैं कि मुजरेवालियों की एक मशहूर बस्ती के तौर पर बोरवाड़ी का आकर्षण और प्रसिद्धि मुगल बादशाह शाहजहां के दौर में चोटी पर थी. वे आगे कहते हैं, ‘यूं तो कुरैशी शासकों के दौर में ही बोरवाड़ी बसने लगा था लेकिन बाद में आए मुगल शासकों का दौर उसका स्वर्णिम काल था. असल में दक्षिण की ओर जाते वक्त मुगल बादशाहों के ज्यादातर काफिले बुरहानपुर से होकर ही गुजरते थे. ऐसे ही एक सफर के दौरान बादशाह शाहजहां ने गुलारा बाई नामक एक रक्कासा का नृत्य देखा और उस पर फिदा हो गए. गुलारा बाई बहुत अच्छा गाती भी थीं और शाहजहां उनके सौन्दर्य और समझदारी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनसे शादी कर ली. गुलारा बाई के नाम पर उन्होंने बुरहानपुर से लगभग 21 किलोमीटर दूर ‘महल गुलारा’ नाम का एक महल भी बनवाया. बस यही वह वक्त था जब पहली बार बोरवाड़ी मोहल्ला एक भव्य और प्रतिष्ठित मुजरा बस्ती के तौर पर स्थापित हुआ.’ फिर वक्त गुजरता गया लेकिन बोरवाड़ीकी शान में कोई कमी नहीं हुई. आजादी के बाद भी यहां मुजरेवालियों के साथ-साथ सारंग वादक, कव्वाल, बन्नाट वाले, गजल गायक, मृदंग वादक और लोक नृत्य जैसी अलग-अलग शैलियों के फनकार मौजूद हुआ करते थे.’

होशंगसोराबजी आगे बताते हैं, ‘लेकिन पिछले एक साल के दौरान बढ़ी पुलिसिया निगरानी, सामाजिक बहिष्कार और प्रशासनिक उदासीनता की वजह से यह ऐतिहासिक मुजरा बस्ती लगभग उजाड़ सी हो गयी है’.  पिछले साल तक बुरहानपुर में लगभग 20 कोठे हुआ करते थे, जिनमें लगभग 50 मुजरा कलाकार नृत्य किया करती थीं. आम दिनों में ये लड़कियां रोजाना 500 से 1000 रुपए तक कमा लिया करती थीं. इनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा महफिलों में वाद्य यंत्र बजाने वाले साजिंदों को जाता था. बाकी रकम मुजरा कलाकारों के हिस्से आती थी. बोरवाड़ी के स्थानीय लोग बताते हैं की यहां की मुजरा कलाकार अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा दान में भी दिया करती थीं. मोहल्ले के एक निवासी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘यहां के कई मदरसे मुजरेवालियों के दान से ही चला करते थे. इसके सिवा बाढ़ या भूकंप आने पर भी राष्ट्रीय राहत कोशों में इनका दान जाता था. आपको यह जानकर भी अचरज होगा की राष्ट्रीय शोक के दिनों में यहां कभी मुजरा नहीं होता था’.

जून, 2011 के दौरान बुरहानपुर से सटे खंडवा जिले में प्रतिबंधित संगठन ‘सिमी’ के 10 संदिग्धों की गिरफ्तारियों के बाद से ही बुरहानपुर के मुजरे पर एक तरह का अघोषित प्रतिबंध लग गया. स्थानीय सूत्रों की मानें तो जिला पुलिस-प्रशासन को संदेह था कि बोरवाड़ी में सिमी आतंकियों को पनाह दी जा रही है. मोहल्ले के ‘डेरेदार संगीत संघ’ के उपाध्यक्ष अल्ताफ खान का मानना है कि पुलिसिया प्रतिबंधों की वजह से आज बोरवाड़ी का मुजरा आखिरी सांसें ले रहा है. तहलका से बातचीत में वे कहते हैं, ‘2011 की सिमी गिरफ्तारियों के बाद से यहां रजिस्टर रखा जाने लगा है. उन्हें लगा कि यहां आतंकवादी आकर योजनाएं बनाते हैं. इसलिए हर घर के बाहर एक सिपाही तैनात करवा दिया गया और कहा गया कि जो भी मुजरा सुनने आएगा वह रजिस्टर में अपना नाम-पता दाखिल करेगा, तभी अंदर जाएगा.

शुरुआत में कुछ पुराने कद्रदान आए भी मगर पता चला कि उनके भी घरों पर फोन जाने लगे. अब ऐसे में कौन आता मुजरा सुनने? साल भर से ऊपर हो गया तलाशियों और तहकीकातों से दौर से गुजरते-गुजरते. हमारा मुजरा तो बंद हो ही गया पर उन्हें आज तक कुछ नहीं मिला.’

हालांकि जानकारों का मानना है कि प्रशासनिक कड़ाई से इतर, कुछ दूसरे कारणों ने भी बुरहानपुर के मुजरे को धीरे-धीरे खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.  खान बताते हैं, ‘पुराने जमाने में यहां का माहौल बिल्कुल अलग था. फारुखी नवाबों से लेकर मुगलों के दौर तक यहां बादशाहों का डेरा लगा रहता था. आजादी के बाद भी महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे दूर-दराज के राज्यों से लोग यहां मुजरा सुनने आते रहे. बड़े-बड़े इज्जतदार घरानों के लोग अपने बच्चों को हमारे यहां तहजीब सीखने भेजा करते थे. तब यहां ठुमरी, दादरा, केरवा और अलग-अलग रागों पर आधारित गजलें गाई जाती थीं. सुनने वाले भी गालिब और मीर के शेरों की फरमाइशें करते थे और गानेवालियां रियाज करके नज्में पेश किया करती थीं. पर अब सब बदल गया है. आज तो ठुमरियों की जगह बॉलीवुड के गानों ने ले ली हैं. अब आप ही बताइए, ‘धूम मचाले’ पर कोई मुजरा कैसे पेश कर सकता है. पर हमारे कलाकार करते हैं क्योंकि सुनने वाले यही सुनना चाहते हैं.’

पुलिसिया सख्ती की वजह से बोरवाड़ी के ज्यादातर लोग हमसे बात करने को तैयार नहीं होते. मोहल्ले में थोड़ा और आगे जाने पर हमें इस जर्जर-से मकान के आगे ‘सायरा रंगीली कव्वाल’ नाम की तख्ती लटकी दिखाई देती है. पूछने पर मालूम होता है कि इस घर की पिछली सात पुश्तें मुजरा और कव्वाली से जुड़ी हुई हैं. घर में हमें सायरा की बड़ी बहन शमीम बानो मिलती हैं. सायरा एक सफल कव्वाल के तौर पर क्षेत्र में काफी शोहरत कमाने के बाद अब शादी करके जा चुकी हैं. परिवारवाले बताते हैं कि अब वे सिर्फ बड़े कार्यक्रमों में कव्वाली गाती हैं. लगभग 40 वर्षीया शमीम अपना पूरा जीवन एक मुजरा कलाकार के तौर पर बिताने के बाद अब प्रस्तुति देना छोड़ चुकी हैं. थोड़ी कोशिश के बाद वे बातचीत के लिए तैयार हो जाती हैं. हम उनके घर की पहली मंजिल पर मुजरे के लिए बनाए गए एक खास कमरे में बैठते हैं. कमरे में मौजूद एक झरोखेनुमा खिड़की के किनारे बैठ कर शमीम हमें उनकी पुरानी तस्वीरें दिखाती हैं और कुछ नज्में भी गाकर सुनाती हैं.

फिर बोरवाड़ी के सबसे पुराने मुजरा-परिवारों में से एक अपने परिवार और एक मुजरा कलाकार के तौर पर अपने जीवन के बारे में बताते हुए कहती हैं, ‘यह तो पेशा ही जवानी का है. अब सिर्फ तभी गाती हूं जब कोई बहुत पुराना सुनने वाला आ जाए. खैर, हमने आठ बरस की उम्र से ही रियाज शुरू कर दिया था. लगभग आठ  साल की ट्रेनिंग के बाद ही हमें कद्रदानों के सामने पेश किया गया. असल में हमारे वालिद ‘थिरकवा काहा’ (चर्चित स्थानीय कलाकार) के शागिर्द रहे. वे बहुत ही अच्छा तबला बजाते थे. उनको चार मुंह वाले तबले याद थे. दिन भर रियाज करते रहते और तबला खुला रहता. पूरे माहौल में ही संगीत था तो हमें भी शौक चढ़ा. एक दीवानगी-सी थी उस वक्त सीखने की. तो हमें गाना और नाचना सिखाने वाले उस्ताद और कव्वाल, सभी आने लगे. हम सुबह दो घंटे गाने का रियाज करके ही दिन शुरू करते. बड़ी-बड़ी नज्में याद करते और कभी-कभी तो शाम को ही उन्हें सुनाना पड़ जाता था.’

बोरवाड़ी के मुजरे की एक पूरी पीढ़ी को अपनी आंखों के सामने देख चुकी शमीम कहती हैं कि फिल्मी दुनिया ने मुजरे को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है. वे कहती हैं, ‘पहले कद्रदान बड़े-बड़े शायरों की गजलों की फरमाइशें किया करते थे. और अगर हमें याद न हो तों यह बहुत शर्मिंदा होने वाली बात हुआ करती थी. पर अब तो लोग फिल्मी गाने ही सुनना चाहते हैं. पहले राजे-रजवाड़े हमें पेंशन दिया करते थे. मौजूदा सरकार हमारी कला को सहेजने के लिए कुछ नहीं कर रही है. हमारे दौर में तो महफिल में शराब की सख्त मनाही थी और कोई गानेवाली के साथ बदतमीजी नहीं कर सकता था. सब हमें एक कलाकार की हैसियत से मिलने वाला सम्मान देते थे. पर पाकीजा और उमराव जान जैसी फिल्मों ने भी माहौल बहुत बिगाड़ दिया. अरे आज मुजरे वालियों के पास मीना कुमारी या रेखा जैसे महंगे अनारकली सूट और जेवर नहीं होते. हमारी महफिलों में महंगे झाड़-फानूस भी नहीं होते. हमारे पास कभी इतना पैसा ही नहीं रहा. फिल्मी मुजरे और असली मुजरे में जमीन-आसमान का फर्क है.’

धीरे-धीरे गुमनामी के अंधेरे में खो रही बुरहानपुर की इस ऐतिहासिक मुजरा बस्ती के खात्मे के पीछे कुछ सामाजिक कारण भी जिम्मेदार हैं. बोरवाड़ी की रक्कासाओं की व्यथा बताते हुए होशंग सोराबजी आगे जोड़ते हैं, ‘रक्कासाएं आज अपने आखिरी दौर में हैं. पुलिस और सिनेमा के साथ-साथ समाज भी इनकी समाप्ति की एक बड़ी वजह है. इन रक्कासाओं के पास हमेशा से एक विशेष नृत्यकला रही जिसका आनंद तो सभी ने उठाया पर इन्हें एक कलाकार का दर्जा कभी नहीं दिया गया. फिल्मी दुनिया में भी जितने मशहूर मुजरे हुए उन सभी की पैदाइश बुरहानपुर के मुजरों से हुई. उन गीतों का बीज बोरवाड़ी बस्ती ही है लेकिन आज वे फिल्मी गीत इतने मशहूर हैं जबकि यहां के कलाकार अपने दिन गिन रहे हैं. हालांकि मुजरा कुछ ऐसी पुरानी कलाओं में से है जिन्हें सहेजा जाना चाहिए था लेकिन ‘मुजरा’ शब्द सुनते ही समाज इसे एक अलग नजर से देखने लगता है–एक ऐसी कला के तौर पर जिसे देखना तो सभी चाहते हैं, पर कोई स्वीकार नहीं करना चाहता.’ 

रात के लगभग 12 बज चुके हैं. अब हम बोरवाड़ी से विदा ले रहे हैं. अभी भी चुनिंदा घरों से पीले बल्बों की रोशनी फूट रही है और फिल्मी गानों पर थिरकते कुछ आखिरी घुंघरुओं की आखिरी धुनें हमारे कानों में गूंज रही हैं.  

‘राष्ट्रीय हित में संसद को बाधित करना सही संसदीय रणनीति है’

कोयला घोटाला सरकार की नीतिगत असफलता है या प्रधानमंत्री का निजी घोटाला?

लोगों के मन में एक गलत धारणा है कि सिर्फ घूस लेना ही निजी भ्रष्टाचार होता है. अगर एक सरकारी कर्मचारी गलत तरीके से जान-बूझकर किसी को लाभ पहुंचाता है और खजाने की बर्बादी करता है तो वह भी निजी घोटाले की श्रेणी में आता है.

तो इस मामले में प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत गलती क्या है?

मेरे ख्याल से उनकी पहली गलती है उस नीति को लागू करने में की गई अनावश्यक देरी जिसकी घोषणा उनकी सरकार ने पहले ही कर दी थी. जून, 2004 में सरकार ने घोषणा की कि निजी कंपनियों को कोल ब्लॉक का आवंटन बोली के आधार पर होगा क्योंकि तमाम ऊर्जा कंपनियों को कोयले की सख्त जरूरत है. और फिर उन्होंने उस नीति को छह साल तक लटकाए रखा. एक बात और ध्यान रखिए, मुख्य खनिजों पर निर्णय लेने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होता है. राज्य सरकारों का अधिकार सिर्फ छोटे-मोटे (माइनर) खनिजों पर है. कोयला मुख्य खनिज है. आप यह कहकर पीछा नहीं छुड़ा सकते कि दो-चार लोगों की राय इसके खिलाफ थी इसलिए आपने मनमाना आवंटन किया. आपको बहुमत के साथ जाना चाहिए था.

घूसखोरी की अफवाहें भी उड़ रही हैं?

मुझे नहीं पता. अफवाहों के आधार पर मैं कोई बयान नहीं दे सकता, लेकिन जो बातें उड़ रही हैं वे बेहद चिंताजनक हैं मसलन पसंदीदा लोगों को कोल ब्लॉक आवंटन के लिए पार्टी की तरफ से मंत्रालय में पर्चियां भेजी गईं. 2जी मामले में भी सरकार निरंतर इनकार करती रही थी. एक मंत्री तो हास्यास्पद ‘जीरो लॉस’ फॉर्मूला लेकर भी आए और कैग को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की. अब उन्हीं लोगों ने 2जी स्पेक्ट्रम की बेस कीमत 14,000 करोड़ रुपए रखी है, जबकि उस समय इन्होंने पूरी नीलामी 1,658 करोड़ रुपये में कर डाली थी. इससे साबित होता है कि कैग की रिपोर्ट सही थी.

आप साफ कर चुके हैं कि प्रधानमंत्री के इस्तीफे से कम आपको कुछ मंजूर नहीं होगा. तो उन्हें पद से हटाने की आपकी रणनीति क्या है?

मैं यहां पर अपनी रणनीति उजागर नहीं कर सकता. हम संसद के भीतर और बाहर उनके ऊपर दबाव बनाए रखेंगे.

नियमत: प्रधानमंत्री को हटाने के लिए आपको संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाना चाहिए. पर आप इसकी बात नहीं कर रहे हैं?

असाधारण मामलों में विरोध करने के कई वैकल्पिक संसदीय तरीके उपलब्ध हैं. संसद में अवरोध पैदा करना भी उसी का हिस्सा है. हमारी आपसी राय है कि अविश्वास प्रस्ताव के विकल्प पर विचार नहीं करना चाहिए. हमने देखा है कि यह सरकार जनता के बीच भले ही अलग-थलग पड़ जाती हो लेकिन राजनीतिक जमात को अपने साथ खड़ा करने में इसे महारत हासिल है. इस काम में इसने जांच एजेंसियों का भी इस्तेमाल बड़ी चतुराई से किया है. इसलिए हम ऐसा कोई भी काम नहीं करेंगे कि सरकार को बच निकलने का मौका मिले.

संसद ठप पड़ी है, लोग इस बात से चिंतित हैं.

लोग इस बात से ज्यादा चिंतित हैं कि इस सरकार में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा है. भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए संसद भवन को ठप करना मेरे ख्याल से सही संसदीय तरीका है. एनडीए के शासनकाल में जब तहलका कांड हुआ था तब कांग्रेस ने भी यही किया था. इसलिए वे यह नहीं कह सकते कि यह गलत तरीका है.

यदि प्रधानमंत्री पद नहीं छोड़ते हैं तब क्या होगा? आपने इतनी बड़ी शर्त रख दी है. क्या आप पीछे हट जाएंगे, कुछ दिन बाद स्थितियां सामान्य हो जाएंगी?

हम पीछे नहीं हटने वाले. हम एक के बाद एक कदम आगे बढ़ाते जाएंगे. उन कदमों का खुलासा मैं अभी नहीं कर सकता.

आपने ममता बनर्जी को यूपीए से अलग करने की कोशिश की है?

इस संबंध में मैं कुछ नहीं कह सकता. हम हर व्यक्ति तक पहुंचने की कोशिश करेंगे.

कैग रिपोर्ट में 2004 से पहले एनडीए के शासनकाल की यह कह कर आलोचना की गई है कि उस दौरान कोयला ब्लॉक आवंटन का कोई स्पष्ट ढांचा ही नहीं था.

2004 से पहले आवंटित किए गए कोल ब्लॉकों की संख्या नाममात्र की है और वे भी ज्यादातर सरकारी कंपनियों को हुए हैं. इसलिए इस तरह की समस्या कभी उत्पन्न नहीं हुई. समस्या तब खड़ी हुई जब आपने इतनी बड़ी संख्या में निजी कंपनियों को इसमें शामिल किया.

सारे सवाल, जवाब, आरोप, सफाई संसद के बजाय मीडिया के जरिए दिए जा रहे हैं. क्या यह सही परंपरा है?

संसद में किसी मुद्दे पर बहस कर उसे भूल जाने से अक्सर कोई नतीजा नहीं निकलता. इसीलिए मैंने कहा कि कुछ असाधारण मामलों में संसद में अवरोध पैदा करके सरकार पर कहीं ज्यादा बड़ा नैतिक दबाव बनाया जा सकता है.

साउंडबाइट की सीमाएं

कोयला घोटाले पर खबरों के शोर में स्पष्टता कम और भ्रम ज्यादा है.

कोयला खदानों में आवंटन में धांधली पर सीएजी की रिपोर्ट और उस पर संसद में मचे हंगामे के बाद से देश भर में कोयला घोटाला सुर्खियों में है. प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग पर अड़े विपक्ष ने संसद का मॉनसून सत्र ठप कर दिया. नतीजा, इस मुद्दे पर बहस का मंच न्यूज चैनलों का स्टूडियो हो गया और वहीं कांग्रेस और भाजपा के नेता और मंत्री ‘तू-तू-मैं-मैं’ और एक-दूसरे को नंगा करते नजर आने लगे. इसमें कोई नई बात नहीं है. संसद चले या नहीं, संसद सत्र हो या नहीं लेकिन चैनलों पर बिला नागा इस या उस मुद्दे पर बहस से लेकर महाबहस चलती रहती है.

यह भारतीय राजनीति के संपूर्ण टीवीकरण का एक और उदाहरण है. सच पूछिए तो राजनीति टीवी के जरिये ही हो रही है. राजनेता और पार्टियां टीवी को ध्यान में रखकर चलने लगे हैं. टीवी का पर्दा राजनीति का असली अखाड़ा बन गया है. वहीं शह और मात होने लगी है. 24 घंटे के न्यूज चैनलों के कारण राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों का संवेदी सूचकांक (पोल्सेक्स) घंटे-घंटे में चढ़ने-उतरने लगा है. प्रधानमंत्री संसद में बयान नहीं दे पाते तो वे टीवी के कैमरों पर बोलते हैं. उसका जवाब तुरंत विपक्ष के नेता देते हैं. सब कुछ लाइव है. 

सचमुच, न्यूज चैनलों ने भारतीय राजनीति को बदल दिया है. उनके कारण राजनीति ज्यादा गतिशील और त्वरित हुई है और एक हद तक जवाबदेह और पारदर्शी भी. लेकिन इससे कहीं ज्यादा उसमें ड्रामे का महत्व बढ़ा है, तर्क और तथ्य की जगह वाक्पटुता या कहें कि गले की ताकत और प्रदर्शन क्षमता ने ले ली है और बहस का मतलब शोर-शराबा होता जा रहा है. इन सबके बीच राजनीतिक पत्रकारिता का ‘चाल-चरित्र-चेहरा’  काफी बदल-सा गया है और वह चाहे-अनचाहे साउंडबाइट और पीआर पत्रकारिता में बदलती जा रही है. यही नहीं, साउंडबाइट, लाइव और स्टूडियो बहस के बीच फाइलों-दस्तावेजों और स्रोतों पर आधारित खोजी पत्रकारिता तो जैसे अतीत की बात हो गई है.

चैनलों की ‘आरामतलब पत्रकारिता’  साउंडबाइट और स्टूडियो बहसों से बाहर निकलने के लिए तैयार नहीं दिख रही

कोयला घोटाले को ही लें. इस मुद्दे पर चैनलों ने दिनों-घंटों का एयर टाइम खर्च किया है, खूब हंगामी बहसें हुई हैं, लाइव प्रेस कॉन्फ्रेंसों में आरोप-प्रत्यारोप हुए हैं लेकिन इन सबके शोर-शराबे के बीच स्पष्टता कम और भ्रम ज्यादा बढ़ गया है. कोयला आवंटन पर सीएजी की रिपोर्ट, विपक्ष के आरोपों, सरकार के बचाव और सिविल सोसाइटी की ओर से दोनों पर लगाए आरोपों ने भारी भ्रम पैदा कर दिया है. इसके कारण राष्ट्रीय राजनीति में भी भ्रम का  माहौल है. दर्शक हैरान हैं. लेकिन न्यूज चैनल इस भ्रम को दूर करने के बजाय और बढ़ाने में लगे हुए हैं.

असल में, चैनलों पर छा गई साउंडबाइट पत्रकारिता की यह सबसे बड़ी विफलता है. वह राष्ट्रीय राजनीति की मौजूदा गुत्थियों को सुलझाने और सच्चाई को सामने लाने में नाकाम रही है. चैनलों से यह अपेक्षा थी और है कि वे कोयला घोटाले की बारीकियां खोलेंगे, उसकी स्वतंत्र पड़ताल करेंगे, उसे एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखेंगे और दर्शकों के लिए उसके मायने बतलाएंगे उदाहरण के लिए, जिन 57 कोयला ब्लॉकों का आवंटन हुआ है, उनकी लाभार्थी कंपनियां कौन-सी हैं, उनकी किस योग्यता पर यह आवंटन हुआ, उसका उन्हें क्या फायदा हुआ, वे कोयले की खुदाई क्यों नहीं शुरू कर पाईं और विभिन्न राज्य सरकारों की इसमें क्या भूमिका रही है?

ऐसे बहुतेरे सवालों का उत्तर मिलना अभी बाकी है. लेकिन चैनलों की ‘आरामतलब पत्रकारिता’  पार्टी कार्यालयों की साउंडबाइट और स्टूडियो बहसों से बाहर निकलने और मेहनत करने के लिए तैयार नहीं दिख रहीं. नतीजतन देश की बेशकीमती प्राकृतिक संपदा की लूट पर राजनीति तो बहुत हो रही है लेकिन अफसोस कि साउंडबाइट के बढ़ते शोर में चोर को भाग निकलने का मौका मिल जा रहा है.

सरकार नहीं अखबार चाहिए

समस्याओं के मूल कारणों से आंख मिलाने और इनकी काट ढूंढ़ने की जगह सरकार सीमा पार की वेबसाइटें ढूंढ़ रही है.

पिछले दिनों बर्मा ने अपने यहां प्रेस पर 48 साल से चली आ रही सेंसरशिप खत्म करने की घोषणा की. इसी दौरान इक्वाडोर ने विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज को राजनीतिक शरण देने का फैसला किया. बर्मा और इक्वाडोर ऐसे देश नहीं हैं जो अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करने के लिए जाने जाते रहे हों. लेकिन अगर बर्मा के शासक भी अपने यहां खुली खबरों की जरूरत महसूस कर रहे हैं और अगर इक्वाडोर भी जूलियन असांज जैसी शख्सियत से इस तरह मोहित है कि उसने कई देशों से दुश्मनी लेने का खतरा मोल लेते हुए उन्हें राजनीतिक शरण दी है तो इसीलिए कि धीरे-धीरे यह समझ हर जगह बन रही है कि अभिव्यक्ति की आजादी कई दूसरी चीजों के मुकाबले कहीं ज्यादा जरूरी है.

लेकिन जब दुनिया भर में अभिव्यक्ति की आजादी नए क्षेत्रों में दाखिल हो रही है, तब हमारे यहां सरकार उन वेबसाइटों और सोशल साइटों के खातों की फेहरिस्त बना रही है जिन पर पाबंदी लगाई जानी है. निस्संदेह असम की हिंसा के पीछे कुछ वेबसाइटों और कुछ सोशल साइटों से जुड़े खातों की गैरजिम्मेदार ही नहीं, बदनीयत भूमिका भी रही है और सरकार की यह बात भी मान लेते हैं कि इनमें से कुछ का संचालन सीमा पार से भी हो रहा था. लेकिन अगर सरकार यह मानने या समझाने में लगी है कि असम की हिंसा और बाद में महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक तक की दक्षिणी -पश्चिमी पट्टी से रातों-रात पूर्वोत्तर के लोगों के पलायन के पीछे सिर्फ सोशल वेबसाइटों का खड़ा किया गया हंगामा है, तो या तो वह खुद को ज्यादा चालाक या फिर लोगों को ज्यादा नादान समझ रही है.

असम में हिंसा और विस्थापन हो या दक्षिणी राज्यों से लोगों का पलायन- इन सबके बीज दरअसल हमारे समाज में बढ़ती सांप्रदायिकता और कुछ समूहों के प्रति लगातार बढ़ाए जा रहे नस्ली परायेपन के एहसास में है. इन मूल कारणों से आंख मिलाने और इनकी काट ढूंढ़ने की जगह सरकार सीमा पार की वेबसाइटें ढूंढ़ रही है.

इस आभासी संसार को ऐसी सामग्री के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाकर ही हम समस्या की काट खोज सकते हैं

निस्संदेह हम सब अपने अनुभव से जानते हैं कि बहुत सारे सांप्रदायिक तत्व और संगठन सोशल साइटों का इस्तेमाल अफवाह और नफरत फैलाने से लेकर लेखकों को डराने-दबाने के लिए भी कर रहे हैं. फेसबुक पर ऐसे कई कमेंट और टैग मिल जाते हैं जो बिल्कुल खौलती हुई नफरत की भाषा बोलते हैं, तर्कातीत और भावुक ढंग से राष्ट्र और धर्म पर बहस करते हैं और लोगों को सबक सिखाने, उनसे बदला लेने और उन्हें उनकी औकात बता देने तक की हुंकार भरते हैं. ऐसे लोगों की शिनाख्त भी जरूरी है और उनसे वैचारिक मुठभेड़ भी. लेकिन वे फेसबुक पर इसलिए हैं कि हमारे समाज में हैं, और समाज में भी बिल्कुल कहीं साथ-साथ हैं, वरना जिस फेसबुक पर आप अपनी मर्जी से अपना मित्र पड़ोस बसाते हैं, वहां ये लोग कैसे चले आते?

जाहिर है, सरकार इस समाज की विडंबना को नहीं देख रही, उसका सच बता रही सोशल साइटों को देख रही है. कहीं इसलिए तो नहीं कि वह दरअसल अपने समाज के असामाजिक और सांप्रदायिक तत्वों से नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति के उन माध्यमों से लड़ना चाह रही है जो उसके लिए असुविधाजनक हैं? वरना एक साथ तीन सौ से ज्यादा वेबसाइटों और ट्विटर अकाउंट बंद करने का आग्रह वह क्यों करती? वह भी तब, जब इनके विरुद्ध शिकायत करने और ऐसी आपत्तिजनक सामग्री हटवाने के विकल्प उसके पास पहले से सुलभ हैं और इनका वह भरपूर इस्तेमाल करती रही है? इसका एक प्रमाण यह है कि सरकार की फेहरिस्त में ऐसी साइटों और उन अकाउंटों के नाम भी हैं जहां से उस पर कभी व्यंग्य में और कभी सीधे हमले होते हैं, कभी उसका मजाक बनाया जाता है और कभी उसका कार्टून दिखाई पड़ता है.

इसमें ज़रा भी शक नहीं कि सोशल साइटों का संसार- या पूरा का पूरा नेट संसार- ऐसी आपत्तिजनक सामग्री से पटा पड़ा है जो सतही है, बदनीयत है, अश्लील है और खतरनाक भी है और जिसे रोकने, जिस पर नियंत्रण रखने की जरूरत है. लेकिन यह आभासी संसार हमारे असली संसार ने ही बनाया है इस संसार को ऐसी सामग्री के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाकर ही हम इसकी काट खोज सकते हैं. लेकिन इसकी जगह फेसबुक या ट्विटर या दूसरे माध्यमों या इनसे जुड़े खातों पर बहुत सपाट किस्म की पाबंदी बेमानी साबित होगी- बल्कि यह एक ख़तरनाक चलन को जन्म देगी, जब हर किसी बड़े हादसे के बाद सरकारी तंत्र नई वेबसाइट्स, नए अकाउंट खोजने में लग जाएगा जिन्हें प्रतिबंधित किया जाए- और बहुत संभव है, तब भी इसके स्रोत सीमा पार ही खोज निकालेगा. यह अनायास नहीं है कि असम के 4 लाख से ज्यादा बेघर बताए जा रहे लोगों के पुनर्वास या महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से हजारों लोगों के पलायन का सवाल पीछे छूट गया है, सोशल साइटों पर पाबंदी की ख़बर बड़ी हो गई है. साफ तौर पर ये दोनों सिरे वास्तविक लोकतंत्र के प्रति हमारे राजनीतिक तबकों की उदासीनता से ही जुड़ते हैं- न वे लोगों को न्याय दे पा रहे हैं और अपने अन्याय पर दूसरों की टिप्पणी सह पा रहे हैं. अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति और अमेरिका के संविधान निर्माताओं में एक थॉमस जेफरसन ने सवा दो सौ साल पहले लिखा था, ‘अगर मुझे तय करना पड़े कि हमें सरकार चाहिए या अखबार तो मुझे अखबार चुनने में एक लम्हे की भी हिचक नहीं होगी.

'पीएम के उम्मीदवार की घोषणा से एनडीए को फायदा होगा.’

नीतीश जी, सबसे पहले तो बिहार के उस बदलाव के बारे में कुछ बताएं जिसकी आप सत्ता में आने के बाद से ही बात कर रहे हैं.

बिहार को बैड गवर्नेंस का क्लासिक केस कहा जाता रहा है. लेकिन यह बात को कम करके कहने जैसा है. दरअसल बिहार में गवर्नेंस जैसी चीज थी ही नहीं. लोगों की जरूरतों के हिसाब से न नीतियां बन रही थीं और न काम हो रहे थे. केंद्र सरकार की कुछ योजनाएं जरूर थीं जिन्हें कुछ जगहों पर लागू किया गया था मगर उसके अलावा कुछ था ही नहीं. सोच यह थी कि कुछ करने की जरूरत नहीं है, लोग तो आखिर में जाति के आधार पर ही वोट देंगे. दूसरे, बिहार कभी भी किसी नई चीज का हिस्सा नहीं रहा. कानून का राज दिखता ही नहीं था. एक वक्त था जब रोज बलात्कार हो रहे थे. दुनिया भर से पत्रकार बिहार के गुंडाराज को रिपोर्ट करने के लिए यहां आ रहे थे. अब लोगों में एक सुरक्षा का भाव है. कभी-कभी छोटी-मोटी आपराधिक घटनाएं जरूर होती रहती हैं. भारत में कोई ऐसा राज्य है जहां अपराध बिल्कुल नहीं है? तब और अब में फर्क यह है कि पहले अपराधियों पर लगाम नहीं कसी जाती थी और अब तेजी से कार्रवाई होती है. जब हम सत्ता में आए तो हमारा एजेंडा कानून-व्यवस्था बहाल करना था. अब भले ही वह कोई भी हो, अगर उसने अपराध किया है तो कानून अपना काम करता है. पुलिस आजादी से अपना काम करती है. यह हुआ है. हमने सुनिश्चित किया कि सरकारी गवाह बयान से पलटें नहीं, अपनी बात पर कायम रहें. इसका असर यह हुआ कि दूसरे गवाहों ने भी आगे आना शुरू कर दिया. 2006 से लेकर अब तक 74 हजार अपराधियों को दोषी करार दिया जा चुका है. यह तब हुआ है जब ब्यूरोक्रेट वही हैं, पुलिस वही है और जज भी वही हैं.

तो क्या आप यह दावा कर रहे हैं कि आपने बिहार से गुंडाराज का सफाया कर दिया?

मैं यह दावा नहीं कर रहा कि बिहार हर तरह से अपराधमुक्त हो गया या कल बिहार में कोई वारदात नहीं होगी. मुझे नहीं लगता कि देश का कोई भी राज्य इसकी गारंटी दे सकता है. लेकिन यह जरूर है कि बिहार में कानून का राज स्थापित हो गया है. पहले लोग रात में सड़क पर चलने से डरते थे. इस स्थिति में काफी सुधार हुआ है. कोई सांप्रदायिक तनाव या सामाजिक टकराव नहीं है. और यह बात मैं सहजता से कह सकता हूं.

लेकिन क्या आप ऐसा विकास ला पाए हैं जो सर्वसमावेशी हो? क्या राज्य में अल्पसंख्यक खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं? जद यू सत्ता में अकेला नहीं है. भाजपा के साथ इसका गठबंधन है. मुसलमान अब भी नीतीश कुमार के प्रति सशंकित हैं जो सेकुलरिज्म की बात तो करते हैं लेकिन साथ ही उस भाजपा से भी जुड़े रहते हैं जिससे अल्पसंख्यक अब भी छिटकते हैं.

देखिए, यह उस विकास का एक हिस्सा है जिसकी मैं बात करता हूं. हम इसे सर्वसमावेशी विकास कहते हैं. न्याय के साथ विकास. जब कानून-व्यवस्था स्थापित हुई तो विकास आया. ग्रोथ आई. और इसके साथ ही सर्वसमावेशी विकास आया. पिछले साल चुनाव से पहले अक्टूबर-नवंबर में हम न्याय यात्रा पर निकले थे. हमने ज्यादा बड़े वादे नहीं किए लेकिन कहा कि हम न्याय के साथ विकास देंगे. राज्य में किसी समुदाय के साथ भेदभाव नहीं होगा. इसलिए जब आप कहते हैं कि हमारा भाजपा के साथ गठबंधन है और लोगों के मन में शंका है तो हमने इस पर 2005 में अपने चुनाव अभियान में काम करने की कोशिश की थी. अल्पसंख्यकों की सोच होती है कि जो भी भाजपा के साथ जुड़ता है वह सांप्रदायिक है. उन्होंने हमसे ज्यादा अपेक्षाएं नहीं की थीं. लेकिन जब उन्होंने देखा कि हम तो सबके लिए काम कर रहे हैं, अल्पसंख्यकों के साथ-साथ अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े वर्गों और समाज के हर वर्ग के लिए योजनाएं बना रहे हैं तो लोगों को समझ में आ गया कि यह सरकार सबके लिए है. मैं दावा कर सकता हूं कि मुझे सबका समर्थन है. हमने शून्य से शुरुआत की थी. हमें पता था कि संसाधनों का उनकी क्षमता के हिसाब से इस्तेमाल नहीं हुआ है. जब हम सत्ता में आए थे तो वित्तीय वर्ष समाप्त होने में बस तीन महीने बाकी थे, लेकिन हमारे पास चार हजार करोड़ रु का योजना आकार था. और आज हमारे पास 28,000 करोड़ रु का योजना आकार है. सड़कें बन रही हैं. पहले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ कागजों पर वजूद में थे. आज वे लाखों लोगों की सेवा कर रहे हैं. पहले औसतन 39 लोग ही एक स्वास्थ्य केंद्र की सुविधा का लाभ उठा रहे थे. आज यह आंकड़ा 9,000 हो गया है. जन स्वास्थ्य व्यवस्था फिर से बहाल हो गई है. आज अल्पसंख्यक हमारे साथ हैं. इसलिए नहीं कि हम किसके साथ चल रहे हैं बल्कि उस काम की वजह से जो हमने उनके लिए किया है.

इतना बदलाव हुआ है तो बड़े कारोबारी बिहार में निवेश क्यों नहीं कर रहे? आलोचक कहते हैं कि बिहार के विकास का बुलबुला फूट चुका है.

देखिए, निवेश एक ऐसी चीज है जो कारोबारी तब करते हैं जब उन्हें कुछ चीजों के बारे में भरोसा हो जाए. पहला मुद्दा तो बिहार में कानून-व्यवस्था का था. कानून-व्यवस्था ठीक हुई तो उन्हें लगा कि देखें यह स्थिति कितने दिन चलती है. अब हम दूसरे कार्यकाल में प्रवेश कर चुके हैं और निवेश शुरू हो चुका है. लेकिन बड़ा निवेश हमारे यहां कैसे आए? मेरा मतलब है कि हमारे पास न खनिज संसाधन हैं और न ही कच्चा माल. जमीन कहां है? आदमी के अनपात में बिहार में जमीन बहुत कम है. अभी जो स्थिति है उसके हिसाब से आबादी का घनत्व देश में सबसे ज्यादा हमारे यहां है. 94 हजार वर्ग किलोमीटर में हमारे यहां स्कूल भी हैं, उद्योग भी हैं और 10 करोड़ 38 लाख लोग भी हैं. जब बिहार का बंटवारा हुआ तो इसके हिस्से मूल इलाके की 52 फीसदी जमीन आई और 75 फीसदी जनसंख्या. हालांकि अच्छी चीज यह है कि जमीन उपजाऊ है. अगर आप झारखंड से लगती पट्टी को छोड़ दें तो हमारी 94 फीसदी जमीन उपजाऊ है. अब अगर कोई हमसे 5,000 हजार हेक्टेयर जमीन आवंटित करने को कहे जो उपजाऊ है और जिसमें इतनी जनसंख्या रहती है तो बताइए हम क्या करें? इसलिए हमारे जैसे राज्य में जो चारों तरफ से जमीन से घिरा हुआ है और जिसके पास कोई समुद्र तट नहीं है, दूसरे राज्यों की तरह बड़े-बड़े उद्योगों की उम्मीद नहीं की जा सकती. तब फिर हमसे इस सवाल के जवाब की उम्मीद कैसे की जा सकती है कि बिहार में बड़े निवेश क्यों नहीं हो रहे? बिहार में कृषि आधारित उद्योग होंगे. हमने सिंगल विंडो क्लीयरेंस के साथ एक औद्योगिक प्रोत्साहन नीति बनाई है जो उन कंपनियों की चिंताओं का समाधान करेगी जो बिहार आना चाहती हैं और यहां अपने कारखाने लगाना चाहती हैं. हम उन्हें रियायतें भी दे रहे हैं. मैंने नए आंकड़े देखे हैं और राज्य में 5,000 करोड़ रु का निवेश हो रहा है. प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. इसमें समय लगेगा. चमत्कार एक दिन में नहीं होते.

फिर बिहार से लोग अब भी दूसरे राज्यों में पलायन क्यों कर रहे हैं?

बिहार से लोग आज से नहीं कई साल से दूसरी जगहों पर पलायन करते रहे हैं. लेकिन अब उनकी संख्या में काफी कमी आई है. जो दिहाड़ी मजदूर दूसरे राज्यों में जाया करते थे, उन्होंने अब वापस बिहार आना शुरू कर दिया है. यही वजह है कि मजदूरों पर निर्भर उद्योग जैसे कि चमड़े का सामान बनाने वाली कंपनियां महाराष्ट्र से बिहार आ रही हैं.

कुछ समय पहले रणवीर सेना के ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या हो गई. वाम दलों और कांग्रेस ने आरोप लगाया कि जदयू ने रणवीर सेना को पहले इस्तेमाल किया और फिर फेंक दिया. और यह भी कि यह हत्या एक षड्यंत्र थी. मोदी और संघ ने इसे बिहार में खुल्लमखुल्ला हो रही जाति की राजनीति बताया. आप इस आलोचना पर क्या कहेंगे?

इन सारे मुद्दों की बिहार में कोई अहमियत नहीं है. एक राज्य के रूप में बिहार इन मुद्दों से आगे बढ़ चुका है. ऐसी ताकतें हमेशा रहेंगी जो चाहेंगी कि यह वापस उसी दौर में चला जाए. इसमें उनके निहित स्वार्थ हैं. लेकिन ऐसा नहीं होगा. गंगा से पानी अब ऊपर चला गया है.

क्या ऐसे बयान आपके लिए महत्व रखते हैं?

किसी बयान से फर्क नहीं पड़ता. लोगों से पड़ता है और आखिरकार विकास से फर्क पड़ता है. बिहार के लोग गलत और सही का अंतर जानते हैं. वे खोखले शब्दों पर यकीन नहीं करते. लोग कानून-व्यवस्था की स्थिति देखते हैं. लोग देखते हैं कि गलत करने वाले डीजी और कलेक्टरों की संपत्तियां राज्य में पहली बार जब्त हो रही हैं. पिछले सप्ताह, एक पूर्व डीजीपी गिरफ्तार हुए थे. मैंने सभी ब्यूरोक्रेट्स से कहा है कि वे सरकार के पास अपनी आय और संपत्तियों का ब्योरा जमा करें. पिछले साल हमने सेवा का अधिकार कानून बनाया. इसे ही हम विकास के साथ न्याय कहते हैं. केंद्र महिला आरक्षण की योजना बना रहा है. हम यह कर चुके हैं. महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देने वाला बिहार देश का पहला राज्य है. पंचायत चुनाव में 50 फीसदी उम्मीदवार महिलाएं थीं. बिहार के लोग यह जानते हैं. बिहार के बाहर रहने वाले भी जानते हैं मगर ऐसा दिखाते हैं जैसे नहीं जानते. राष्ट्रीय मीडिया में यह खबर नहीं बनती. अगर कोई और राज्य होता तो मीडिया ने तारीफों के पुल बांध दिए होते. हमें देखकर दूसरे ‘विकसित’ राज्य भी इस रास्ते पर चल रहे हैं.


क्या आप इसे भाजपा-जदयू की सामूहिक सफलता कहेंगे क्योंकि दबी जुबान में कहा जा रहा है कि आप गठबंधन के प्रदर्शन का श्रेय अकेले ले रहे हैं, यह देखते हुए कि आंकड़ों के हिसाब से भाजपा ने जदयू से बेहतर प्रदर्शन किया है?

अब इस सबमें मत पड़िए. लोग जानते हैं किसकी सफलता की दर बढ़ी है. आंकड़े के विशेषज्ञों और आलोचकों के लिए आसान है कि एक कमरे में बैठिए और बात करते रहिए कि भाजपा ने जदयू से बेहतर प्रदर्शन किया है. आप सड़कों पर निकलिए, गांवों में जाइए और लोगों से मिलिए तो आपको पता चल जाएगा कि आंकड़े और लोकप्रियता क्या होती है. इनके बोलने से कुछ बदल नहीं जाएगा.

क्या यही वजह है कि नीतीश कुमार जो खुद को मैन विद अ विजन कहते हैं, राष्ट्रीय स्तर पर जाना चाहते हैं? क्या यही वजह है कि नीतीश कुमार और 2012 के राजनीतिक परिदृश्य को लेकर चर्चा बढ़ती जा रही है?

राष्ट्रीय स्तर पर जदयू का एनडीए के साथ गठबंधन है और रहेगा. जदयू एनडीए का एक अहम सहयोगी होगा मगर हम गठबंधन का नेतृत्व नहीं कर सकते. हालांकि क्षेत्रीय पार्टी के रूप में भी एक पूरे राज्य को अराजकता से बाहर निकालकर हमने अपना काम कर दिया है.

लेकिन लालकृष्ण आडवाणी ऐसा नहीं सोचते. आपकी अपनी पार्टी के लोगों ने उनके विचारों का समर्थन किया है और आपको प्रधानमंत्री पद का सक्षम उम्मीदवार बताया है.

हां, मैंने उनका ब्लॉग बढ़ा है. लेकिन उन्होंने मुझे पीएम नहीं कहा है. (हंसते हैं)

हां, लेकिन उन्होंने साफ-साफ कहा है कि एक गैरकांग्रेसी, गैरभाजपाई प्रधानमंत्री की संभावना है.

ठीक बात है. उन्होंने कहा है कि संभावना है. लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि तीसरा मोर्चा एक व्यावहारिक विकल्प नहीं होगा और यह ज्यादा नहीं चल पाएगा. अब देखिए कि इस ब्लॉग के आखिर में क्या कहा गया है. ऐसा नहीं है कि वे तीसरे मोर्चे का रास्ता खोल रहे हैं. उन्होंने कहा है कि 2014 में सरकार का नेतृत्व भाजपा करेगी और भाजपा ही गठबंधन का भी नेतृत्व करेगी.

तो आप मानते हैं कि तीसरे मोर्चे की बात व्यावहारिक नहीं है.

हम आडवाणी जी के ब्लॉग पर ही बात कर रहे हैं. है न? (हंसते हैं). उन्होंने कहा है कि यह संभव है मगर ज्यादा नहीं चल पाएगा. उन्होंने इतिहास से पांच उदाहरण दिए हैं: चंद्रशेखर जी, चरण सिंह जी, देवगौड़ा जी, गुजराल जी और वीपी सिंह जी. इनमें वीपी सिंह का प्रयोग अलग था. उनका समर्थन सिर्फ भाजपा ही नहीं बल्कि वामदल भी कर रहे थे.

ये लास्ट प्वाइंट आपके फेवर में है?

अरे नहीं.

क्या आप यह कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री या तो भाजपा से होगा या कांग्रेस से?

हां, मैं यही कह रहा हूं.

मगर आप यह भी कह चुके हैं कि प्रधानमंत्री का उम्मीदवार धर्मनिरपेक्ष छवि का होना चाहिए.

आधार यही होगा. मैंने कहा है कि गठबंधन राजनीति के इस दौर में प्रधानमंत्री बड़ी पार्टी का होना चाहिए. हमारी मांग यह है कि प्रधानमंत्री एक ऐसा व्यक्ति हो जिसे पिछड़े वर्गों की चिंता हो—एक ऐसा व्यक्ति जो सबको साथ लेकर चले. जो पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष हो, जो हम सबको स्वीकार्य हो, जो समाज के हर वर्ग को स्वीकार्य हो, ऐसा व्यक्ति जिसकी छवि सर्वसमावेशी हो.

अगर आपने पहले ही यह साफ कर दिया था तो फिर आपने नितिन गडकरी से मिलकर उनसे यह वादा क्यों लिया कि नरेंद्र मोदी एनडीए की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होंगे?

मैं नितिन गडकरी से मिलने नहीं गया था. वे मुझसे बात करना चाहते थे. हमारी उनके साथ नियमित रूप से चर्चा होती रहती है.

लेकिन उन्होंने कहा कि आप नरेंद्र मोदी को लेकर आशंकित थे.

जो भी गडकरी जी ने कहा वह मीडिया में आ चुका है. मैं फिर से किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहता क्योंकि हर कोई मेरी छवि एक विवादित व्यक्ति की बनाना चाहता है. जो भी मैंने गडकरी जी या भाजपा से कहा, वह देश के हित में था; हमारे गठबंधन के हित में था. मुझे अपनी नापसंद या इच्छा बार-बार बताने की क्या जरूरत है? मेरी कुछ चिंताएं हैं जिनके बारे में मैं मानता हूं कि वे जायज हैं और वही मैंने बताई थीं.

दबी जुबान में चर्चाएं हो रही हैं कि भाजपा और जदयू की आपस में बन नहीं रही. केंद्र में ही नहीं बल्कि राज्य में भी. राज्य में भाजपा के मंत्रियों ने आपके खिलाफ बयान दिए हैं. क्या गठबंधन में टूट की कोई संभावना है?

नहीं. ऐसी संभावना नहीं है. भाजपा से मुझे जो कहना था मैं कह चुका हूं. और जो भी मैंने कहा है वह सिर्फ मेरा ही नहीं बल्कि मेरी पार्टी का भी रुख है.

तो एनडीए से प्रधानमंत्री पद केmउम्मीदवार संबंधी बयान सुनकर आपको गुस्सा नहीं आता?

नहीं, मुझे गुस्सा नहीं आता. मेरी उकसाने वाले बयान देने की आदत नहीं है. न ही ऐसे बयान मुझे उकसाते हैं. लेकिन हां, एक राजनीतिक पार्टी का नेता होने के नाते मैं अपना और अपनी पार्टी का नजरिया बताऊंगा. लोगों को उकसाने के लिए नहीं, केवल फिर से अपना यह रुख स्पष्ट करने के लिए कि हम झुकेंगे नहीं. और हां, यह बात मैं किसी व्यक्ति विशेष के संदर्भ में नहीं कह रहा हूं चाहे वह कोई भी हो.

पिछले कुछ समय से यूपीए के प्रमुख सहयोगियों में एक मोहभंग की स्थिति है. ममता बनर्जी सहयोगियों को सम्मान देने की बात कह रही हैं. शरद पवार ने भी पिछले दिनों तहलका से बात करते हुए कुछ इसी तरह की भावनाएं व्यक्त कीं. क्या आपको भी कुछ ऐसा लगता है खासकर तब जब एनडीए और यूपीए दोनों में ही काफी उलट-पुलट हो रही है?

शरद पवार और ममता बनर्जी दोनों ही यूपीए के अहम सहयोगी हैं. जिस तरह से यूपीए चल रहा हंै, उससे साफ लगता है कि आपसी भरोसे की कमी हो गई है. इसलिए सहयोगी इस तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं. वहां घमंड है और कांग्रेस शुरुआत से ऐसा व्यवहार कर रही है जैसे उसे पूर्ण बहुमत मिला हो. उनके पास सिर्फ 200 सीटें हैं. उन्हें देखकर ऐसा नहीं लगता कि वे गठबंधन को एकजुट रख रहे हैं. अगर सरकार में कोई समन्वय नहीं होगा तो ऐसा होना ही है. आप नेताओं को नाराज करेंगे और वे असंतुष्ट होंगे. वे आपके सहयोगी हैं और आपको सहयोगियों और उनके विचारों को साथ लेकर चलना होता है.

आपने प्रणब मुखर्जी का समर्थन क्यों किया?

क्या हमारे पास कोई विकल्प था? पहली बात तो यह है कि हम प्रणब मुखर्जी का सम्मान करते हैं. उनका कद बहुत ऊंचा है. वे कांग्रेस पार्टी की पहली पसंद नहीं थे. वहां कई मुद्दे थे. जदयू राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार पर कोई विवाद नहीं चाहता था. यह एक गरिमा का पद है. हमें एक आम सहमति के साथ जाना चाहिए था. कांग्रेस ने भी गलती की. कोई उम्मीदवार तय करने से पहले उन्हें सभी पार्टियों के साथ बात करनी चाहिए थी. लेकिन हमने सोचा कि ठीक है. कम से कम उन्होंने उम्मीदवार तय करने के बाद तो हमसे बात की. दूसरी बात यह है कि नतीजा सबको पता था. हमें मालूम था कि चुनाव कौन जीत रहा है. तो फिर अलग क्यों जाना? भाजपा का अपना कोई उम्मीदवार नहीं था. पीए संगमा भाजपा के नहीं थे. हम इस नाम की लड़ाई का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे. अगर यह प्रतीकात्मक लड़ाई लड़ी ही जानी थी तो मेरा मानना है कि भाजपा से कोई उम्मीदवार होना चाहिए था. प्रणब बाबू एक योग्य उम्मीदवार थे.

भाजपा और इसके सहयोगियों के बीच भी तो कोई खास समन्वय नहीं है. यूपीए से ज्यादा आपके सांसद और प्रवक्ता भाजपा के खिलाफ बयान देते हैं. हाल ही में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के मसले पर तो आपने एनडीए को लगभग बंधक बनाकर रखा.

जैसा कि मैंने पहले भी कहा, इस मांग में कुछ भी गलत नहीं है कि हम प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का एलान करने के बाद ही चुनाव में उतरें. इससे जनता का मूड अपने पक्ष में करने में मदद मिलती है. अगर एनडीए अभी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का एलान कर देता है तो इससे उसे फायदा होगा. एनडीए इसी तरह चलता रहा है. वाजपेयी जी ने सभी सहयोगियों को इकट्ठा करके रखा. समन्वय बैठकें होती थीं और सभी अटल जी के कहे पर यकीन करते थे.

लेकिन अब कमान अटल जी के हाथ में नहीं है.

अभी हम सत्ता में नहीं हैं, लेकिन हम कोशिश कर रहे हैं कि गठबंधन काम करे. देखते हैं.

चाहे वह लोकपाल का मुद्दा हो या बाबा रामदेव का, भाजपा खुद भी बंटी हुई दिखती है. आपका क्या रुख है? आपकी पार्टी के अध्यक्ष शरद यादव मंच पर रामदेव के साथ मौजूद थे.

यह शरद यादव और जदयू का फैसला था. और हम लोकपाल या काला धन वापस लाने के खिलाफ नहीं हैं. बिहार में हमारे पास एक बढ़िया लोकायुक्त है और इसकी चयन प्रक्रिया में मुख्यमंत्री की भूमिका नहीं होती. हमें एक मजबूत लोकपाल की जरूरत है. यह सबका अधिकार है. इसलिए जब तक अन्ना और रामदेव सही भावना के साथ यह काम करते हैं, इसमें कोई नुकसान नहीं है. मैं उनके व्यक्तिगत स्वार्थों और एजेंडों पर टिप्पणी नहीं करूंगा. और ईमानदारी से कहूं तो इसकी बजाय मैं बिहार पर ध्यान केंद्रित करूंगा. मुझे लगता है कि हमने जो व्यवस्था यहां बनाई है वह एक उदाहरण है. यह अलग बात है कि मैं हर दिन मीडिया में इसका ढोल नहीं पीटता. यह मेरा चरित्र नहीं है. मुझे यह सब नहीं आता. दूसरे ऐसा कर सकते हैं.

जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मोहन भागवत को लगता है कि बिहार गुजरात से आगे है?

(हंसते हैं) अब हम क्या कहें, उनकी राय है.

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ

कामकाजी महिलाओं के यौन उत्पीड़न के मामले आए दिन समाचार माध्यमों में दिखते रहते हैं. इसके खिलाफ अलग से एक कानून बनाने का काम पिछले कुछ साल से चल रहा है. 2010 में प्रोटेक्शन ऑफ वूमन अगेंस्ट सेक्सुअल हरासमेंट एट वर्कप्लेस बिल का मसौदा तैयार किया गया था. संसद के चालू सत्र में इसके संशोधित मसौदे को संसद में पेश करके पारित करवाने की योजना है,  लेकिन यह योजना कोयला ब्लॉक आवंटन पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच उभरे गतिरोध की वजह से टल रही है.

इस विधेयक के पहले मसौदे को संसद में 7 दिसंबर, 2010 को पेश किया गया था. इसके बाद इसे 30 दिसंबर, 2010 को स्थायी संसदीय समिति के पास भेजा गया. समिति ने संसद को इस विधेयक का मसौदा अपने सुझावों के साथ 8 दिसंबर, 2011 को लौटाया. इस प्रस्तावित कानून का जब शुरुआती मसौदा जारी हुआ था तो कई लोगों ने इसकी कमियों की वजह से इस पर आपत्ति जताई थी. सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि सरकार इस कानून के तहत उन महिलाओं या लड़कियों को शामिल नहीं कर रही थी जो घरेलू नौकरानी की तरह काम करती हैं. लेकिन जब हर तरफ से दबाव बढ़ा तो सरकार इन्हें भी प्रस्तावित कानून के दायरे में लाने के लिए तैयार हो गई.

  • कानून का मसौदा 2010 में संसद में पेश हुआ था
  • कानून से महिलाओं की कामकाजी परिस्थितियों में सुधार होगा
  • संसद में गतिरोध के चलते बिल लटका हुआ है

विशाखा के मामले में 15 साल पहले उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया फैसला इस कानून की जड़ में है. उस फैसले में न सिर्फ विशाखा के आरोपों को सही माना गया था बल्कि उच्चतम न्यायालय ने यौन उत्पीड़न से कामकाजी महिलाओं के बचाव के लिए कई निर्देश भी जारी किए थे. अभी इन्हीं दिशानिर्देशों के आधार पर महिलाओं की कामकाजी परिस्थितियों संबंधी शिकायतों की सुनवाई होती है. पिछले पंद्रह साल में कामकाजी महिलाओं की संख्या काफी तेजी से बढ़ी है. इसलिए नए कानून को बहुत जरूरी माना जा रहा है. कई बार कामकाजी महिलाओं पर ऐसी शर्तें थोपी जाती हैं कि उनके लिए काम करना मुश्किल हो जाता है. जैसे कि हरियाणा के पूर्व गृह राज्य मंत्री रहे गोपाल कांडा की कंपनी में काम करने वाली गीतिका के अनुबंध में यह शर्त डाली गई थी कि हर शाम उसे कांडा को दिन भर के काम की रिपोर्ट देनी है.

प्रस्तावित कानून में यह प्रावधान है कि नियोक्ता को अनिवार्य तौर पर महिलाओं के लिए ऐसी कामकाजी परिस्थितियां सुनिश्चित करनी होंगी जिसमें उनके यौन उत्पीड़न का जोखिम नहीं हो. अगर कोई नियोक्ता ऐसा नहीं करता तो उसे सजा देने का प्रावधान किया गया है. हालांकि, जानकार प्रस्तावित कानून की एक बड़ी खामी की ओर भी इशारा करते हैं. प्रस्तावित कानून के मसौदे में कृषि क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की चर्चा नहीं की गई है. उम्मीद है कि जब संशोधित मसौदा संसद में पेश होगा तो इस खामी को दूर करने की कोशिश होगी.

हिमांशु शेखर

नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया

भारत में शीर्ष राजनेताओं के फिल्म कलाकारों से संबंध कभी अजूबा नहीं रहे. इसकी सबसे बड़ी मिसाल पंडित नेहरू के राज कपूर, दिलीप कुमार और देव आनंद के साथ मित्रवत संबंधों में देखी जा सकती है. लेकिन उस दौर में कोई भी जाना-माना फिल्म कलाकार सक्रिय राजनीति में भागीदारी नहीं करता था. न ही राजनेता अपनी जनसभाओं के लिए ही फिल्म कलाकारों को बुलाते थे. इसके विपरीत दक्षिण भारत में एमजी रामचंद्रन और एनटी रामाराव जैसे दिग्गज कलाकार थे जो न सिर्फ सक्रिय राजनीति में आए बल्कि मुख्यमंत्री भी बने.

हिंदी फिल्म कलाकारों के राजनीति से जुड़ाव की शुरुआत अस्सी के दशक से मानी जाती है. इसकी पृष्ठभूमि में 1975 के आपातकाल की काफी महत्वपूर्ण भूमिका रही. उस दौरान फिल्म उद्योग के एक तबके ने इसका बड़ा जबर्दस्त विरोध किया था. देव आनंद इन फिल्म कलाकारों में सबसे आगे थे. आपातकाल जब खत्म हुआ तब उन्होंने संजीव कुमार सहित फिल्म उद्योग के कुछ और दिग्गज लोगों के साथ एक राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा कर दी. नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया (एनपीआई) नाम से बनी इस पार्टी के पहले अध्यक्ष खुद देव आनंद चुने गए. 1977 में जब इस राजनीतिक पार्टी की पहली रैली मुंबई के शिवाजी पार्क में हुई तो आम लोगों सहित मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां भी यहां जुटी भीड़ को देखकर हैरान थीं. इस रैली में फिल्म अभिनेता देव आनंद, संजीव कुमार सहित प्रसिद्ध निर्माता एफसी मेहरा और जीपी सिप्पी (शोले) शामिल थे. यह पहला मौका था जब हिंदी फिल्म उद्योग से जुड़ी हस्तियां राजनीति की बात कर रही थीं और उनको सुनने के लिए भारी भीड़ जमा थी. हालांकि इन लोगों में से किसी व्यक्ति को राजनीति का पूर्व अनुभव नहीं था, इसलिए जब लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवार तय करने की बारी आई तो पार्टी यह काम नहीं कर पाई. इसके कुछ महीनों बाद देव आनंद ने इस पार्टी को भंग करने की घोषणा कर दी.

एनपीआई से जुड़े कलाकारों में से किसी ने बाद में सक्रिय राजनीति में कदम नहीं रखा, लेकिन इसका गठन बाकी राजनीतिक पार्टियों के लिए एक सबक साबित हुआ. पार्टियों को एहसास हो गया कि राजनीतिक मुद्दों पर भी फिल्म कलाकार भीड़ जुटा सकते हैं. इसी के बाद कांग्रेस ने प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री नरगिस दत्त को राज्यसभा में भेजा था और सुनील दत्त को टिकट देकर लोकसभा का चुनाव लड़वाया था.

-पवन वर्मा

आरक्षण कथा, अध्याय घ

सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण के मसले पर हाल ही में एक सर्वदलीय बैठक हुई. मीडिया ने बताया कि सपा को छोड़कर सभी दल मानते हैं कि अनुसूचित जातियों-जनजातियों के लिए ऐसा आरक्षण होना चाहिए और इसके लिए जल्द ही संविधान संशोधन लाया जाएगा.

मगर अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए प्रोन्नतियों में आरक्षण का प्रावधान संविधान में कई संशोधनों के चलते पहले से ही है. बस सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने के लिए 2006 में दिए अपने निर्णय के माध्यम से कुछ शर्तें रखी हैं. इनमें से एक है कि इस बात का समुचित आकलन हो कि एससी और एसटी का प्रतिनिधित्व जहां आरक्षण दिया जा रहा है वहां बहुत कम है. और इसमें प्रशासनिक कार्यकुशलता का भी ध्यान रखा जाए. इन्हीं शर्तों का ध्यान न रखने के लिए कोर्ट ने मायावती द्वारा राज्य की नौकरियों में लाए गए आरक्षण के प्रावधान को खारिज कर दिया था. अब सभी पार्टियां मिलकर कुछ ऐसा करने की जुगत भिड़ा रही हैं जिससे कि बिना किसी जवाबदेही और न्यायिक हस्तक्षेप के वे जहां चाहें दलितों-आदिवासियों के लिए प्रोन्नतियों में आरक्षण का कायदा बना सकें.

प्रोन्नतियों में आरक्षण के समर्थन में जो लोग हैं उनका तर्क है कि शीर्ष पदों पर दलितों और आदिवासियों की संख्या न के बराबर है इसलिए ऐसा किया जाना जरूरी है. मगर इसकी एक वजह यह भी है कि उनकी तमाम सरकारी नौकरियों में प्रवेश की ऊपरी आयु सीमा सामान्य आयु सीमा से थोड़ी ज्यादा होती है. इस वजह से नौकरी की शुरुआत में सामान्य और आरक्षित उम्मीदवारों के बीच 5-6 साल की आयु का अंतर आ जाता है. उधर इस तरह के आरक्षण के कई विरोधी शिक्षा और नौकरियों में प्रवेश के लिए तो आरक्षण को जरूरी मान लेते हैं लेकिन प्रोन्नतियों में आरक्षण को वे संस्थान के क्षरण, उसकी कार्यकुशलता में कमी आने से लेकर उसमें स्थायी बंटवारे की स्थितियां उत्पन्न हो जाने तक से जोड़ते हैं.

हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में कुछ ऐसे प्रावधान डाले थे जिनके आधार पर, भविष्य के राजनेता पिछड़े समुदायों को आगे लाने की व्यवस्था निर्मित कर सकते थे. मगर कुछ अपवादों को छोड़कर ज्यादातर मामलों में इसके लिए राजनीति को आधार बनाकर आसान रास्तों का ही चुनाव किया गया. उदाहरण के तौर पर अन्य पिछड़ा वर्ग को पहले केंद्रीय नौकरियों में आरक्षण दिया गया, फिर करीब 17 साल बाद उच्च शिक्षा में और उसके बाद शिक्षा के अधिकार के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा की तरफ जरूरी ध्यान दिया गया. हमने नीचे की सीढ़ियां तैयार नहीं कीं और लोगों से सीधे ऊपर के डंडे पर चढ़ने के लिए कहने लगे. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने देवीलाल की चुनौती से निपटने के लिए मंडल आयोग की रपट को आधा लागू कर दिया तो अर्जुन सिंह ने अपने ढलते राजनीतिक करियर को पिछड़ों के लिए उच्च शिक्षा में आरक्षण की बैसाखी का सहारा देने की कोशिश की. अब कई राजनीतिक दल प्रोन्नतियों में आरक्षण को 2014 के लोकसभा चुनाव के चश्मे से देखने की कोशिश कर रहे हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि दलितों और आदिवासियों को आज भी सकारात्मक भेदभाव की बेहद आवश्यकता है. पर इसके लिए कुछ दूसरे नए और प्रभावी उपाय भी तो खोजे जा सकते हैं. और जहां प्रोन्नतियों में ऐसा किए जाने की सचमुच आवश्यकता है वहां तो सुप्रीम कोर्ट भी सरकारों को ऐसा करने से नहीं रोकता.

अंतत:…

नवंबर, 2007 के दौरान गुजरात दंगों पर की गई तहलका की पड़ताल की पुष्टि करते हुए अहमदाबाद की विशेष अदालत ने नरोदा पाटिया में हुए जनसंहार के लिए 32 लोगों को दोषी करार दिया. सजा पाए लोगों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की नेता और नरोदा की तत्कालीन विधायक माया कोडनानी के साथ-साथ बजरंग दल का बाबू बजरंगी भी शामिल है. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुकी कोडनानी गुजरात दंगों में अपराधी घोषित होने वाली पहली भाजपा नेता हैं. उन्हें और बाबू बजरंगी को भारतीय दंड संहिता की धारा 120 (बी) (आपराधिक षड्यंत्र) और 302 (हत्या) के तहत दोषी ठहराया गया है. इसी मामले में अदालत ने 29 अन्य अभियुक्तों को बरी कर दिया है.

पहली बार तहलका के संवाददाता आशीष खेतान ने अपनी पड़ताल के दौरान बाबू बजरंगी और माया कोडनानी का पर्दाफाश किया था. उनके खुफिया कैमरे पर बाबू बजरंगी ने खुद माया कोडनानी के साथ मिलकर नरोदा पाटिया हत्याकांड की योजना बनाना स्वीकार किया था (अगला पन्ना देखें). तहलका के कैमरे पर बजरंगी का कहना था कि गोधरा में ट्रेन को जलता देखकर वह नरोदा वापस आया और उसी रात हत्याकांड की योजना बनाई. 27 फरवरी की रात ही उसने  29 -30 लोगों की एक टीम को संगठित किया और सैकड़ो मुसलिम परिवारों को मौत के हवाले कर दिया.

सुरेश रिचर्ड और प्रकाश राठौड़ नामक बाबू बजरंगी की ‘टीम’ के दो सदस्यों ने तहलका के सामने कैमरे पर यह स्वीकार किया था कि कोडनानी सारा दिन नरोदा में गाड़ी लेकर घूमती रहीं और लोगों को मुसलमानों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर उनकी हत्या करने के लिए उकसाती रहीं.  मामले की पड़ताल के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने तहलका की पड़ताल से जुड़े सभी वीडियो टेपों को विशेष अदालत में सबूत के तौर पर पेश किया था. आशीष खेतान भी गवाही और जिरह के लिए 4 दिन तक अदालत में मौजूद रहे.

2002 के गुजरात दंगों के दौरान दंगाइयों ने अहमदाबाद के नरोदा पाटिया नामक इलाके में अल्पसंख्यक समुदाय के 97 लोगों की हत्या कर दी थी. इसके अलावा गोधरा हत्याकांड के ठीक अगले दिन, 28 फरवरी 2002 को हुए इस नरसंहार में 33 लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए थे. रिहायशी इलाकों में हुई आगजनी की वजह से 800 मुसलिम परिवार बेघर हो गए थे. शुरूआती जांच के बाद गुजरात पुलिस ने 46 लोगों को गिरफ्तार किया, मगर 2008 में मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त की गई ‘विशेष जांच टीम’ के हवाले कर दिया गया. इसके बाद 24 और लोगों को गिरफ्तार किया गया. चार्जशीट दाखिल होने से पहले ही कुल 70 आरोपितों में से छह की मृत्यु हो गयी थी और दो फरार घोषित कर दिए गए.

अगस्त 2009 में विशेष जांच टीम द्वारा कुल 62 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होते ही विशेष अदालत में मुकदमा शुरू हुआ. मुकदमे के दौरान इन 62 लोगों में से एक आरोपित की मृत्यु हो गई. लगभग 327 गवाहों के बयानों और तमाम सबूतों को संज्ञान में लेने के बाद अदालत ने 29 अगस्त, 2012 को अपना फैसला सुनाया. एक दशक पुराने नरोदा पाटिया जनसंहार को गुजरात दंगो के दौरान हुआ सबसे वीभत्स नरसंहार माना जाता है. 

बाबू बजरंगी …मुसलमानों को मारने के बाद मुझे महाराणा प्रताप जैसा महसूस हुआ.  मुझे अगर फांसी भी दे दी जाए तो मुझे परवाह नहीं. बस मुझे फांसी के दो दिन पहले छोड़ दिया जाए. मै सीधे जुहापुरा (अहमदाबाद का एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र) जाऊंगा जहां इनके 7-8 लाख लोग रहते हैं. मैं इन सबको खत्म कर दूंगा. इनके और लोगों को मरना चाहिए. कम से कम 25 -50 हजार लोगों को तो मरना ही चाहिए… जब मैंने साबरमती में हमारी लाशें देखीं, हमने उन्हें उसी वक्त चैलेंज कर दिया था कि इससे चार गुना लाश हम पटिया में गिरा देंगे. उसी रात आकर हमने हमले की तैयारी शुरू कर दी थी. हिंदुओं से 23 बंदूकें ली गईं. जो भी देने से मना करता, हमने उसे कह दिया था कि अगले दिन उसे भी मार दूंगा, भले ही वो हिंदू हो. एक पेट्रोल पंप वाले ने हमें तेल भी मुफ्त में दिया. और हमने उन्हें जलाया…’

बाबू बजरंगी, तहलका के खुफिया कैमरे पर

 

 

 

सुरेश रिचर्ड ‘…जब उन्होंने सुबह 10 बजे हमारे पहले हमले का जवाब दिया तो हमने छर्रों (बंजारा जनजाति) को बुलाया. फिर सुबह 10.30 बजे के हमलों में कई छर्रे हमारे जुलूस में शामिल हुए. उन्होंने नरोदा पाटिया की नूरानी मस्जिद को जला दिया. तेल का एक टैंकर मस्जिद में घुसा दिया था. फिर आग लगा दी. उसी तेल का इस्तेमाल और दूसरे मुसलमानों को जलाने के लिए भी किया. देखो, जब भूखे लोग घुसते हैं तो कोई न कोई तो फल खाएगा न. ऐसे भी फल को कुचल के फेंक देंगे. मैं झूठ नहीं बोल रहा हूं, माता मेरे सामने हैं. कई मुसलिम लड़कियों को मार कर जला दिया गया. तो कई लोगों ने फल भी खाए ही होंगे. मैंने भी खाया था, एक बार. लेकिन सिर्फ एक बार, क्योंकि उसके बाद हमें फिर से मारने जाना पड़ा…’  

 सुरेश रिचर्ड, तहलका के खुफिया कैमरे पर

 

 

 

 

‘…मायाबेन (तत्कालीन स्थानीय एमएलए) दिन भर नरोदा पाटिया की सड़कों पर घूमती रहीं. वो चिल्ला-चिल्ला कर दंगाइयों को उकसा रही थीं और कह रही थीं कि मुसलमानों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर मारो…’

प्रकाश राठोड़ , तहलका के खुफिया कैमरे पर

 

 

पी चिदंबरम को राहत

चिदंबरम पर क्या आरोप थे?

जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी और गैर सरकारी संस्था सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन ने 2जी मामले में दो अलग याचिकाएं दायर कर रखी थीं. याचिकाकर्ताओं की अदालत से मांग थी कि 2जी घोटाले में तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम को भी आरोपित बनाया जाए क्योंकि जिस समय 2जी स्पेक्ट्रम का आवंटन हुआ था उस समय वित्त मंत्रालय पी चिदंबरम के पास था. उस दौरान दूरसंचार विभाग और वित्त मंत्रालय के बीच कई बार पत्राचार भी हुआ था. इससे पहले चार फरवरी को सीबीआई की विशेष अदालत ने भी इस संबंध में दोनों याचिकाकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी थी.

सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्या है?

24 अगस्त को आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला पी चिदंबरम के पक्ष में था. कोर्ट ने पाया कि प्रथम दृष्टया इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने अपने पद का दुरुपयोग किया और तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा के साथ 2जी घोटाले में सांठ-गांठ की. कोर्ट ने पी चिदंबरम पर लगे सभी आरोपों को खारिज करते हुए दोनों याचिकाएं निरस्त कर दीं. याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों की पड़ताल करने के बाद कोर्ट ने कहा, ‘सिर्फ इस आधार पर पी चिदंबरम और ए राजा के आपराधिक षड्यंत्र में शामिल होने का दोष नहीं लगाया जा सकता कि वित्त मंत्रालय और दूरसंचार विभाग के अधिकारियों के बीच आधिकारिक बातचीत हुई थी या दोनों नेताओं की आपस में बात हुई थी.’ कोर्ट ने यह भी कहा कि इस बात का भी कोई सबूत नहीं है कि पी चिदंबरम ने अपने पद का दुरुपयोग कर खुद को या किसी अन्य व्यक्ति को किसी तरह का आर्थिक फायदा पहुंचाया हो.  

फैसले के राजनीतिक परिणाम क्या हैं?

कोर्ट का यह फैसला भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी यूपीए सरकार के लिए संजीवनी की तरह है. चिदंबरम के आरोपित बनाए जाने की सूरत में 2जी घोटाले के तार सीधे कांग्रेस से जुड़ जाते. चिदंबरम के लिहाज से भी यह फैसला खुशी का सबब है, लेकिन अब भी मामला संयुक्त संसदीय समिति में है जहां उनके लिए एक बार फिर मुसीबत खड़ी हो सकती है. अभी पुनर्विचार याचिका का विकल्प भी खुला है.