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संकट और सवाल

कांग्रेस का कहना है कि वह पीछे नहीं देखेगी, आगे बढ़ेगी. लेकिन मुश्किल यह है कि न उसके पास पीछे देखने लायक कुछ बचा है और न आगे बढ़ने लायक. तो फिर?

पांच राज्यों में अपने खराब प्रदर्शन के बाद कांग्रेस आत्मनिरीक्षण की तरह-तरह की मुद्राएं दिखा रही है. नतीजों के कुछ दिन बाद राहुल गांधी ने बड़ी सख्त भाषा में कहा था कि इस प्रदर्शन की जिम्मेदारी तय होगी और बड़ी कुर्बानियां होंगी. सोनिया गांधी ने कहा था कि पार्टी में नेता ज्यादा हो गए हैं और कार्यकर्ता कम. यह खबर भी आई कि सरकार के चार मंत्रियों ने पद छोड़कर संगठन में काम करने की इच्छा जताई है. अब इस प्रदर्शन के कारणों की समीक्षा के लिए बैठाई गई ऐंटनी कमेटी की रिपोर्ट के हिस्से बाहर आए हैं.

लेकिन इन हिस्सों से भी यही लग रहा है कि कमेटी आधा सच बोल रही है और उसे पूरा करते-करते सहम जा रही है. वह बता रही है कि पार्टी में भाई-भतीजावाद के आधार पर टिकट नहीं बांटे जाने चाहिए, लेकिन जिन लोगों ने बांटे उनके खिलाफ कोई कार्रवाई हो या नहीं, इस पर खामोश है. वह बता रही है कि नेता और कार्यकर्ता के बीच बढ़ती दूरी उत्तर प्रदेश में हार की वजह बनी, लेकिन वह उन नेताओं की शिनाख्त नहीं कर रही जो इसके लिए जिम्मेदार हैं. रिपोर्ट में कुल मिलाकर जो एक ठोस आरोप दिखता है, वह मुसलिम आरक्षण के सवाल पर कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के बयान से और बटला हाउस के सवाल पर महासचिव दिग्विजय सिंह के बयान से होने वाले नुकसान का है. बाकी रिपोर्ट भ्रष्टाचार, महंगाई और कमजोर सांगठनिक ढांचे के वे जाने-पहचाने तर्क जुटाती है जो पहले से सबको मालूम हैं.

बहरहाल, सवाल है कि कांग्रेस इसके आगे क्या करेगी. इस सवाल का जवाब सोनिया गांधी ने दे दिया है. पिछले दिनों कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में उन्होंने आह्वान किया कि कांग्रेसी आपस में लड़ना छोड़ें और विरोधियों का मुकाबला करें. यही नहीं, उन्होंने यह भी इशारा किया कि 2014 के चुनाव बहुत दूर नहीं रह गए हैं और पार्टी को अब उनकी तैयारी शुरू कर देनी चाहिए.

यानी साफ है कि न राहुल गांधी के कहे मुताबिक बड़ी कुर्बानियां हो रही हैं और न ही ऐंटनी कमेटी की सिफारिशों के बाद किसी पर कार्रवाई होने जा रही है. पार्टी पीछे नहीं देखेगी, आगे बढ़ेगी. लेकिन मुश्किल यह है कि न उसके पास पीछे देखने लायक कुछ बचा है न आगे बढ़ने लायक. कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल यह है- एक पार्टी के तौर पर उसका जो भी जीर्ण-शीर्ण ढांचा बचा हुआ है, वह पूरी तरह सोनिया और राहुल गांधी को समर्पित है, उनके किसी अनजाने जादू से अपने पुनरुद्धार की उम्मीद पाले बैठा है. संगठन अपने नेताओं को ताकत देने की जगह उनका परजीवी होने की जिद पर अड़ा  है. इसका खमियाजा जितना पार्टी को भुगतना पड़ रहा है, उतना ही नेताओं को भी.

लेकिन क्या यह संकट सिर्फ इस बात का है कि नेता कांग्रेस को जमीन पर फैलाने की जगह नेहरू-गांधी परिवार के आसमान से उम्मीद लगाए बैठे हैं? या इसका वास्ता कांग्रेस के किसी अंदरूनी संकट से भी है? दरअसल एक पार्टी के तौर पर कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका पूरे भारत और भारतीयता को जोड़ने की रही. उसके भीतर सभी विचारों और क्षेत्रों के हित जैसे सुरक्षित रहा करते थे- वह कई बार परस्पर विरोधी लक्ष्यों का साझा मंच भी दिखा करती थी. लेकिन जैसे-जैसे उसमें नेतृत्व की केंद्रीयता बढ़ी, यह लोकतांत्रिकता तार-तार होती गई, उसका लचीलापन क्षार-क्षार होता गया. 2004 में जब कांग्रेस सत्ता में लौटी तो उसकी एक वजह यह भी थी कि पहली बार उसने एकला चलो की नीति छोड़कर गठजोड़ की राजनीति का दामन थामा था. सोनिया गांधी अलग-अलग पार्टियों को जोड़कर उस लोकतांत्रिक सर्वानुमति को वापस लाने में कामयाब रही थीं जो कांग्रेस का पुराना चरित्र हुआ करती थी. 2009 में कांग्रेस की फिर से वापसी में इस चरित्र का भी हाथ रहा और इसकी वजह से पैदा हुए उन जनपक्षीय रुझानों का भी जिनके असर में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और सूचना का अधिकार जैसे कानून संभव हुए और अमल में लाए गए.

लेकिन 2009 के बाद अचानक कांग्रेस की चाल बदलती दिखती है.बल्कि इसकी शुरुआत 2008 में ऐटमी करार के सवाल पर वामदलों से चला आ रहा रिश्ता तोड़ने के साथ ही होती है. यही वह दौर है जब कांग्रेस के भीतर उदारीकरण की हामी शक्तियां निर्णायक ढंग से सिर उठाने को बेकरार हैं. इसके आस-पास वे घोटाले परवान चढ़ रहे हैं जिनकी मार अब कांग्रेस भुगत रही है. यही वह दौर है जब सरकार महंगाई और मुद्रास्फीति को विकास का अनिवार्य नतीजा बता रही है, माओवाद को देश का सबसे बड़ा दुश्मन व विदेशी निवेश के विस्तार को हमारी अपरिहार्य जरूरत.

देखा जाए तो अभी तक यह साफ ही नहीं है कि कांग्रेस की लाइन क्या है- वह देश के गरीबों के साथ खड़ी है या अमीरों के साथ

कहने को इसी दौर में राहुल गांधी दलितों और आदिवासियों के बीच पहचान और अस्मिता की नई राजनीति करने की कोशिश में हैं. लेकिन इस कोशिश के साथ न पार्टी की नीतियां दिखती हैं न सरकार का रवैया. अभी तक यह साफ ही नहीं है कि कांग्रेस की लाइन क्या है- वह देश के गरीबों के साथ खड़ी है या अमीरों के साथ.

कांग्रेस को इस दुविधा के पार जाना होगा. एक बड़ी अखिल भारतीय पार्टी के रूप में उसकी भूमिका खत्म हो चुकी है. नेताओं के पास नया एजेंडा नहीं है, इसलिए वे या तो सतही लोकलुभावन राजनीति के चक्कर में पड़ते हैं या फिर राहुल-सोनिया की तरफ देखते हैं. अब यह इन दोनों को तय करना है कि वे कोई नया राजनीतिक खाका तैयार करते हैं या पार्टी को लुंजपुंज यथास्थितिवाद के उसी दलदल में छोड़ देते हैं जो उसे राजनीतिक समझौतों के लिए वेध्य बनाता है और जनता की निगाह में अविश्वसनीय.

हार के नतीजों पर फौरी रिपोर्ट देखने-बांचने से पार्टी आगे नहीं जाएगी. उसके लिए वैचारिक और सांगठनिक दोनों स्तरों पर एक पूरी लड़ाई की जरूरत पड़ेगी. यह लड़ाई खाते-पीते नेता-पुत्रों के सहारे नहीं, वंचितों के बीच उभरने वाले नए नेतृत्व के साथ ही मिल कर लड़ी जा सकती है.

भाजपा-कांग्रेसः आवाज 2 हम 1

 

स्वीडन के पूर्व पुलिस प्रमुख स्टेन लिंडस्टोर्म ने बोफोर्स मामले में तत्कालीन रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस को पत्र लिखकर फरवरी, 2004 में ही सब कुछ बता दिया था. मगर उनके हालिया बयान पर हो-हल्ला करने वाली भाजपा ने तब इस पर कुछ नहीं किया. हिमांशु शेखर की रिपोर्ट

स्वीडन में बोफोर्स मामले की जांच करने वाले और स्वीडन पुलिस के प्रमुख रहे स्टेन लिंडस्टोर्म ने बीते दिनों जब एक साक्षात्कार दिया तो बोफोर्स का मसला एक बार फिर संसद और मीडिया में जोर-शोर से उठा. मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने संसद में इस मामले को बड़ी मजबूती से उठाया और नए सिरे से पूरे मामले की जांच कराने की मांग की. लेकिन कम लोगों को पता है कि लिंडस्टोर्म ने जो बात अपने साक्षात्कार में कही हैं, वही बात उन्होंने देश के रक्षा मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडिस को फरवरी, 2004 में ही पत्र लिखकर बताई थीं. इसके बावजूद इस मसले पर कोई कार्रवाई नहीं की गई.

इस मामले की जांच से संबंधित तथ्य और घटनाक्रम बताते हैं कि देश के प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस मामले की तह तक जाकर दूध का दूध और पानी का पानी करने की बजाए अपनी सुविधानुसार इसके सियासी इस्तेमाल को तरजीह दी. इस मसले के सियासी इस्तेमाल को समझने के लिए 4 फरवरी, 2004 के बाद के घटनाक्रम को जानना और समझना जरूरी है. यह वही तारीख है जिस दिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने बोफोर्स मामले में आरोपित सभी अभियुक्तों को घूस और भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त कर दिया था. इनमें इस घोटाले का मुख्य किरदार माना जाने वाला ओतावियो क्वात्रोकी भी शामिल था.

जिस दिन दिल्ली उच्च न्यायालय का बोफोर्स के अभियुक्तों को आरोपों से बरी करने का फैसला आया, उसके हफ्ते भर के अंदर ही उस समय के रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस के पास एक पत्र आया. यह पत्र लिखा था स्टेन लिंडस्टोर्म ने. लिंडस्टोर्म स्वीडन पुलिस के प्रमुख रहे हैं और उनकी अगुवाई में ही स्वीडन में बोफोर्स मामले की जांच हुई थी. लिंडस्टोर्म ने फर्नांडिस को भेजे अपने पत्र में साफ-साफ और काफी विस्तार में लिखा कि बोफोर्स मामले की जांच में किस तरह से उनके साथ असहयोग किया गया और किस तरह से बड़े-बड़े नामों पर इस मामले में शामिल होने के संदेह की सुई घूमती है.

उस वक्त जॉर्ज फर्नांडिस एक ऐसे गठबंधन वाली केंद्र सरकार के रक्षा मंत्री थे जिसकी सियासत का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस के विरोध पर टिका था. इसलिए लिंडस्टोर्म को उम्मीद थी कि वे और उनकी सरकार इस मामले से रहस्य का पर्दा उठाना चाहेंगे ही. लेकिन इस पत्र के बावजूद उस वक्त जॉर्ज फर्नांडिस ने इस मामले में कुछ नहीं किया और चुप्पी साध ली. बोफोर्स मामले में कांग्रेस कुछ नहीं करे, यह तो सबकी समझ में आता है क्योंकि इस घोटाले के आरोपों के छींटे उसके प्रथम परिवार के दामन पर भी हैं. लेकिन इस पर भाजपा की अगुवाई वाली सरकार की चुप्पी हैरान करने वाली थी.

सवाल यह उठता है कि आखिर फर्नांडिस ने रक्षा मंत्री रहते हुए उस वक्त कुछ क्यों नहीं किया? इसका जवाब आया तीन साल बाद. 11 मार्च, 2007 को दिए एक साक्षात्कार में फर्नांडिस ने कहा कि वाजपेयी ने उन्हें बोफोर्स मामले को छूने से मना किया था. फर्नांडिस के करीबी सहयोगी रहे एक सज्जन इसके आगे-पीछे की बात को समझाते हुए बताते हैं, ‘जब फर्नांडिस ने इस पत्र के बाद रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी को बोफोर्स की फाइल लाने का निर्देश दिया तो उसने पहले तो काफी टालमटोल की. इसके बाद एक दिन फर्नांडिस के पास प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात एक बड़े ताकतवर व्यक्ति का फोन आया. इस व्यक्ति ने फर्नांडिस को कहा कि प्रधानमंत्री चाहते हैं कि बोफोर्स की फाइल से आप दूर ही रहें.’

यहां से दो बातें साफ हैं. पहली बात तो यह कि भाजपा की अगुवाई वाली उस वक्त की केंद्र सरकार भी यह नहीं चाहती थी कि बोफोर्स मामले की सच्चाई दुनिया के सामने आए. दूसरी यह कि देश के रक्षा मंत्री ने प्रधानमंत्री कार्यालय के ‘ताकतवर व्यक्ति’ की बात मानकर इस मामले में चुप्पी साध ली.

बोफोर्स का सच सामने लाने को लेकर भाजपा की अनिच्छा का एक और प्रमाण इसके बाद के घटनाक्रम से मिलता है. फरवरी, 2004 में दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद केंद्र की भाजपानीत सरकार के पास करीब 60 दिन का समय था मगर उसने इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करवाने में कोई दिलचस्पी नहीं ली. मई में भाजपा की सरकार चली गई और कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार आ गई. इसके बाद सीबीआई ने अपील ही नहीं की.

लिंडस्टोर्म के हालिया साक्षात्कार के बाद जब नए सिरे से बोफोर्स का मामला गरमाया तो राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेतली ने इस मामले की फिर से जांच कराने की मांग की. जब 2004 में अदालत का फैसला आया था तब जेतली देश के कानून मंत्री थे और अगर वे चाहते तो ऊपरी अदालत में फैसले के खिलाफ समय रहते अपील की जा सकती थी. इस बारे में पूछे जाने पर जेटली का एक साक्षात्कार में कहना था, ‘सीबीआई ने अपील करने की पूरी तैयारी कर ली थी. लेकिन अदालत की छुट्टियों और लोकसभा चुनावों की वजह से हमारी सरकार समय रहते अपील नहीं कर पाई. इसके बाद नई सरकार आ गई और उसने पुरानी सरकार के फैसले को बदलते हुए कहा कि अपील नहीं की जानी चाहिए.’

मगर सच यह है कि उच्च न्यायालय के फैसले की कॉपी मिलने के बाद अपील करने की 90 दिन की समय सीमा 20 जून, 2004 के आसपास पूरी हो रही थी. सरकार को कॉपी मिलने से पहले भी अदालत के फैसले की जानकारी तो थी ही. इसका मतलब जेतली जिस सरकार के कानून मंत्री थे उसके पास अपील करने के लिए तकरीबन तीन महीने का वक्त था. 13 मई, 2004 को लोकसभा चुनावों के परिणाम आए और जनादेश वाजपेयी सरकार के खिलाफ था. इसके बाद 21 मई, 2004 को मनमोहन सिंह की अगुवाई में केंद्र में कांग्रेस की गठबंधन सरकार बनी. इसके बाद सीबीआई ने फैसले के खिलाफ अपील न करने का फैसला किया. यानी अपील करने की मियाद के दौरान केंद्र में दोनों प्रमुख दलों की सरकार रही लेकिन दोनों की दिलचस्पी बोफोर्स के रहस्य से पर्दा उठाने में थी ही नहीं.

एक तरफ भारत के दो प्रमुख राजनीतिक दल हैं जो बोफोर्स घोटाले को रहस्य बनाकर ही रखना चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ स्वीडन के एक पुलिस अधिकारी हैं जो पत्रों और साक्षात्कारों के जरिए इस मामले की पूरी जांच कराने और इसमें अपना पूरा सहयोग देने का प्रस्ताव दे रहे हैं. लिंडस्टोर्म के पत्र और साक्षात्कार को पढ़ने से पता चलता है कि उन्हें भारत के विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के प्रमुख लोगों ने आश्वासन तो खूब दिए लेकिन किया कुछ नहीं. चित्रा सुब्रमण्यम को दिए साक्षात्कार में लिंडस्टोर्म कहते हैं कि आज उनका देश कई मामलों में दुनिया में शीर्ष पर है लेकिन सैद्घांतिक भटकाव भी आया है और इस वजह से भ्रष्टाचार जैसी बुराइयां बढ़ी हैं. एक तरफ लिंडस्टोर्म एक दूसरे देश से संबंधित मामले में हुए भ्रष्टाचार को लेकर इस कदर चिंतित हैं और सच्चाई को सामने लाना चाहते हैं लेकिन दूसरी तरफ भारत का राजनीतिक वर्ग है जो हो-हल्ला तो खूब मचाता है लेकिन जब कार्रवाई करने की बात आती है तो तकनीकी बहानों का आवरण ओढ़ लेता है.

लिंडस्टोर्म द्वारा जॉर्ज फर्नांडिस को लिखे पत्र के अंश

फरवरी, 2004

… बोफोर्स मामले का मैं प्रमुख जांच अधिकारी था. मुझे नहीं पता कि क्यों मैं भूत काल का प्रयोग कर रहा हूं क्योंकि अब तक मामले की जांच पूरी नहीं हुई. लगता है जांच कभी पूरी भी नहीं होगी. ऐसा इसलिए कि स्वीडन और भारत के लोग ऐसा ही चाहते हैं…..

… इस मामले की जांच का जिम्मा मुझे 18 साल पहले सौंपा गया था. पुलिस अधिकारी होने के नाते मुझे इस बात का भरोसा है कि सच एक दिन जरूर सामने आएगा. क्योंकि सच्चाई के साथ बुरी बात यह है कि जब हम बिल्कुल नाउम्मीद हो जाते हैं तो सच सामने आ जाता है….

… बोफोर्स मामले की जांच के दौरान हर तरह से मेरे काम को मुश्किल बनाने की कोशिश की गई. भारत से बने दबाव का नतीजा यह हुआ कि स्वीडन में एक जांच बंद हो गई. फिर जब दबाव बना तो स्वीडिश नैशनल ऑडिट ब्यूरो ने आधी-अधूरी रिपोर्ट भारत भेजी. मूल रिपोर्ट के वे महत्वपूर्ण हिस्से हटा दिए गए जिनमें पैसों के लेन-देन का ब्योरा था. मेरे पास पूरी रिपोर्ट थी और यह देखकर मुझे बड़ा दुख हुआ कि किस तरह से अधूरी रिपोर्ट के आधार पर राजनीतिज्ञ यह दावा कर रहे थे कि पैसे का कोई लेन-देन नहीं हुआ….

… बोफोर्स के वरिष्ठ अधिकारियों की टीम जब भारत की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के सामने अपना पक्ष रखने आई तो उन्हें ऐसा करने से रोका गया. उनकी मुलाकात अधिकारियों के एक छोटे समूह से कराई गई जिसे उन लोगों ने कोई नाम नहीं दिया. मुझे बताया गया कि वहां अगर नाम बताया भी जाता तो उन पर कोई यकीन नहीं करता….

…इतालवी बिचौलिए ओतावियो क्वात्रोकी से पूछताछ होनी चाहिए क्योंकि उसी ने एई सर्विसेज के जरिए राजनीतिक रिश्वत तय की थी. सोनिया गांधी से अवश्य पूछताछ होनी चाहिए….

… बोफोर्स सौदे के मुख्य मध्यस्थ मार्टिन अर्डबो ने मुझसे कहा था कि रिश्वत की सच्चाई उसके साथ ही कब्र में दफन हो जाएगी. वह आखिरी वक्त पर एई सर्विसेज के साथ हुए करार पर बिलकुल शांत था जो उसने खुद अपनी देख-रेख में किया था. स्पष्ट था कि यह राजनीतिक रिश्वत थी….

… अर्डबो इस बात को लेकर बेहद चिंतित था कि लोगों को इस बात का पता चल रहा था कि ‘क्यू’ और ‘आर’ कौन है और उनके आपसी संबंध क्या हैं. ‘क्यू’ क्वात्रोकी के लिए और ‘आर’ राजीव गांधी के लिए लिखा गया था. अर्डबो ने मुझे बताया कि बड़े लोगों को बचाने के लिए मुझे बलि का बकरा बनाया जा रहा है. …

… जिन आपराधिक मामलों में राजनीतिक रिश्वत चुकाई जाती है उनमें पूरी कहानी किसी के पास नहीं होती. लोग आते हैं, अपनी भूमिका निभाते हैं और चले जाते हैं. यह कभी कोई समस्या पैदा होने पर बचाव के लिहाज से किया जाता है. बोफोर्स मामले में ऐसा ही हुआ है. इस पूरे मामले के सारे रहस्यों को जानने वाला सिर्फ एक ही आदमी है और वह है मार्टिन अर्डबो….

… इस घोटाले में शामिल भारतीय राजनीतिज्ञों ने हमेशा इससे इनकार किया, नोट्स भेजे, अधिकारियों को भेजा और वहां भ्रम पैदा किया जहां इसकी कोई जरूरत ही नहीं थी. पुलिस अधिकारी आपको बताएंगे कि किसी मामले की लीपापोती का यह पुराना तरीका है. जहां आरोप से ज्यादा जोरदार ढंग से उनका विरोध किया जा रहा हो वहां आप यकीन के साथ कह सकते हैं कि बोलने वाला ही अपराधी है. उस समय के भारत के प्रधानमंत्री ने भारतीय संसद में यह कहा कि न ही वे और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य ने इस मामले में रिश्वत ली है. मेरी समझ से यह उनकी पहली सबसे बड़ी गलती थी जिसने हमें कई सुराग दिए. उन्हें यह पता नहीं था कि जिस वक्त वे बोल रहे थे उसी वक्त स्वीडन की एक एजेंसी कई दस्तावेजों को खंगाल रही थी. इनमें इस बात का प्रमाण था कि कैसे आखिरी वक्त में क्वात्रोकी की एजेंसी एई सर्विसेज को रिश्वत दी गई. अर्डबो की चुप्पी और राजीव गांधी का इनकार साथ-साथ चल रहे थे….

… यह कहना भी गलत नहीं होगा कि मैं उन गिने-चुने लोगों में से एक हूं जिसने इस मामले से संबंधित सारे दस्तावेजों को देखा है. सोनिया गांधी से अनिवार्य तौर पर पूछताछ होनी चाहिए. मुझे पता है कि मैं क्या बोल रहा हूं.

ज्ञानपीठ अपमान !

अपने पत्र में गौरव ने ज्ञानपीठ से यह आग्रह भी किया है कि वह खुद को कुछ लोगों की संकीर्ण राजनीति का गढ़ न बनने दे और अपनी प्रतिष्ठा बचाए.

 

आदरणीय …… ,

भारतीय ज्ञानपीठ

खाली स्थान इसलिए कि मैं नहीं जानता कि भारतीय ज्ञानपीठ में इतना ज़िम्मेदार कौन है जिसे पत्र में सम्बोधित किया जा सके और जो जवाब देने की ज़हमत उठाए. पिछले तीन महीनों में मैंने इस खाली स्थान में कई बार निदेशक श्री रवीन्द्र कालिया का नाम भी लिखा और ट्रस्टी श्री आलोक जैन का भी, लेकिन नतीजा वही. ढाक का एक भी पात नहीं. मेरे यहां सन्नाटा और शायद आपके यहां अट्टहास.

 खैर, कहानी यह जो आपसे बेहतर कौन जानता होगा लेकिन फिर भी दोहरा रहा हूं ताकि सनद रहे.

 पिछले साल मुझे मेरी कविता की किताब सौ साल फिदाके लिए भारतीय ज्ञानपीठ ने नवलेखन पुरस्कार देने की घोषणा की थी और उसी ज्यूरी ने सिफारिश की थी कि मेरी कहानी की किताब सूरज कितना कमभी छापी जाए. जून, 2011 में हुई उस घोषणा से करीब नौ-दस महीने पहले से मेरी कहानी की किताब की पांडुलिपि आपके पास थी, जो पहले एक बार अज्ञातकारणों से गुम हो गई थी और ऐन वक्त पर किसी तरह पता चलने पर मैंने फिर जमा की थी.

मां-बहन को कम से कम यह तो खुद तय करने दीजिए कि वे क्या पढ़ें या क्या नहीं. उन्हें आपके इस उपकार की ज़रूरत नहीं है. उन्हें उनके हाल पर छोड़ दीजिए. उन्हें यह ‘अश्लीलता’ पढ़ने दीजिए कि कैसे एक कहानी की नायिका अपना बलात्कार करने वाले पिता को मार डालती है. लेकिन मैं जानता हूं कि इसी से आप डरते हैं

ख़ैर, मार्च में कविता की किताब छपी और उसके साथ बाकी पांच लेखकों की पांच किताबें भी छपीं, जिन्हें पुरस्कार मिले थे या ज्यूरी ने संस्तुत किया था. सातवीं किताब यानी मेरा कहानी-संग्रह हर तरह से तैयार था और उसे नहीं छापा गया. कारण कोई नहीं. पन्द्रह दिन तक मैं लगातार फ़ोन करता हूं और आपके दफ़्तर में किसी को नहीं मालूम कि वह किताब क्यों नहीं छपी. आखिर पन्द्रह दिन बाद रवीन्द्र कालिया और प्रकाशन अधिकारी गुलाबचन्द्र जैन कहते हैं कि उसमें कुछ अश्लील है. मैं पूछता हूं कि क्या, तो दोनों कहते हैं कि हमें नहीं मालूम. फिर एक दिन गुलाबचन्द्र जैन कहते हैं कि किताब वापस ले लीजिए, यहां नहीं छप पाएगी. मैं हैरान. दो साल पांडुलिपि रखने और ज्यूरी द्वारा चुने जाने के बाद अचानक यह क्यों? मैं कालिया जी को ईमेल लिखता हूं. वे जवाब में फ़ोन करते हैं और कहते हैं कि चिंता की कोई बात नहीं है, बस एक कहानी ग्यारहवीं ए के लड़केकी कुछ लाइनें ज्ञानपीठ की मर्यादा के अनुकूल नहीं है. ठीक है, आपकी मर्यादा तो आप ही तय करेंगे, इसलिए मैं कहता हूं कि मैं उस कहानी को फ़िलहाल इस संग्रह से हटाने को तैयार हूं. वे कहते हैं कि फिर किताब छप जाएगी.

 लेकिन रहस्यमयी ढंग से फिर भी कभी हां कभी ना कभी चुप्पीका यह बेवजह का चक्र चलता रहता है और आख़िर 30 मार्च को फ़ोन पर कालिया जी कहते हैं कि ज्ञानपीठ के ट्रस्टी आलोक जैन मेरे सामने बैठे हैं और यहां तुम्हारे लिए माहौल बहुत शत्रुतापूर्ण हो गया है, इसलिए मुझे तुम्हें बता देना चाहिए कि तुम्हारी कहानी की किताब नहीं छप पाएगी. मैं हैरान हूं. शत्रुतापूर्णएक खतरनाक शब्द है और तब और भी खतरनाक, जब देश की सबसे बड़ी साहित्यिक संस्थाका मुखिया पहली किताब के इंतज़ार में बैठे एक लेखक के लिए इसे इस्तेमाल करे. मुझसे थोड़े पुराने लेखक ऐसे मौकों पर मुझे चुप रहने की सलाह दिया करते हैं, लेकिन मैं फिर भी पूछता हूं कि क्यों? शत्रुतापूर्ण क्यों? हम यहां कोई महाभारत लड़ रहे हैं क्या? आपका और मेरा तो एक साहित्यिक संस्था और लेखक का रिश्ता भर है. लेकिन इतने में आलोक जैन तेज आवाज में कुछ बोलने लगते हैं. कालिया जी कहते हैं कि चाहे तो सीधे बात कर लो. मैं उनसे पूछता हूं कि क्या कह रहे हैं सर‘?

तो जो वे बताते हैं, वह यह कि तुम्हारी कहानियां मां-बहन के सामने पढ़ने लायक कहानियां नहीं हैं. आलोक जी को मेरा फ्रैंकनैसपसंद नहीं है, मेरी कहानियां अश्लील हैं. क्या सब की सब? हां, सब की सब. उन्हें तुम्हारे पूरे एटीट्यूडसे प्रॉब्लम है और प्रॉब्लम तो उन्हें तुम्हारी कविताओं से भी है, लेकिन अब वह तो छप गई. फ़ोन पर कही गई बातों में जितना अफसोस आ सकता है, वह यहां है. मैं आलोक जी से बात करना चाहता हूं लेकिन वे शायद गुस्से में हैं, या पता नहीं. कालिया जी मुझसे कहते हैं कि मैं क्यों उनसे बात करके खामखां खुद को हर्ट करना चाहता हूं? यह ठीक बात है. हर्ट होना कोई अच्छी बात नहीं. मैं फ़ोन रख देता हूं और सन्न बैठ जाता हूं.

 जो वजहें मुझे बताई गईं, वे थीं अश्लीलताऔर मेरा एटीट्यूड.

अश्लीलता एक दिलचस्प शब्द है. यह हवा की तरह है, इसका अपना कोई आकार नहीं. आप इसे किसी भी खाली जगह पर भर सकते हैं. जैसे आपके लिए फिल्म में चुंबन अश्लील हो सकते हैं और मेरे एक साथी का कहना है कि उसे हिन्दी फिल्मों में चुम्बन की जगह आने वाले फूलों से ज़्यादा अश्लील कुछ नहीं लगता. आप बच्चों के यौन शोषण पर कहानी लिखने वाले किसी भी लेखक को अश्लील कह सकते हैं. क्या इसका अर्थ यह भी नहीं कि आप उस विषय पर बात नहीं होने देना चाहते. आपका यह कृत्य मेरे लिए अश्लील नहीं, आपराधिक है. यह उन लोकप्रिय अखबारों जैसा ही है जो बलात्कार की खबरों को पूरी डीटेल्स के साथ रस लेते हुए छापते हैं, लेकिन कहानी के प्लॉट में सेक्स आ जाने से कहानी उनके लिए अपारिवारिक हो जाती है (मां-बहन के पढ़ने लायक नहीं), बिना यह देखे कि कहानी की नीयत क्या है.

 मां-बहन को कम से कम यह तो खुद तय करने दीजिए कि वे क्या पढ़ें या क्या नहीं. उन्हें आपके इस उपकार की ज़रूरत नहीं है. उन्हें उनके हाल पर छोड़ दीजिए. उन्हें यह अश्लीलतापढ़ने दीजिए कि कैसे एक कहानी की नायिका अपना बलात्कार करने वाले पिता को मार डालती है. लेकिन मैं जानता हूं कि इसी से आप डरते हैं.मेरा एक पुराना परिचित कहता था कि वह खूब पॉर्न देखता है, लेकिन अपनी पत्नी को नहीं देखने देता क्योंकि फिर उसके बिगड़ जाने का खतरा रहेगा. क्या यह मां-बहन वाला तर्क वैसा ही नहीं है? अगर हमने उनके लिए दुनिया इतनी ही अच्छी रखी होती तो मुझे ऐसी कहानियां लिखने की नौबत ही कहाँ आती? यह सब कुछ मेरी कहानियों में किसी जादुई दुनिया से नहीं आया, न ही ये नर्क की कहानियां हैं. और अगर ये नर्क की, किसी पतित दुनिया की कहानियां लगती हैं तो वह दुनिया ठीक हम सबके बीच में है. मैं जब आया, मुझे दुनिया ऐसी ही मिली, अपने तमाम कांटों, बेरहमी और बदसूरती के साथ. आप चाहते हैं कि उसे इगनोर किया जाए. मुझे सच से बचना नहीं आता, न ही मैंने आपकी तरह उसके तरीके ईज़ाद किए हैं. सच मुझे परेशान करता है, आपको कैसे बताऊं कि कैसे ये कहानियां मुझे चीरकर, रुलाकर, तोड़कर, घसीटकर आधी रात या भरी दोपहर बाहर आती हैं और कांच की तरह बिखर जाती हैं. मेरी ग़लती बस इतनी है कि उस कांच को बयान करते हुए मैं कोमलता और तथाकथित सभ्यता का ख़याल नहीं रख पाता. रखना चाहता भी नहीं. 

आख़िर 30 मार्च को फ़ोन पर कालिया जी कहते हैं कि ज्ञानपीठ के ट्रस्टी आलोक जैन मेरे सामने बैठे हैं और यहां तुम्हारे लिए माहौल बहुत शत्रुतापूर्ण हो गया है 

 लेकिन इसी बीच मुझे याद आता है कि भारतीय ज्ञानपीठ में अभिव्यक्तिकी तो इतनी आज़ादी रही कि पिछले साल ही नया ज्ञानोदयमें छपे एक इंटरव्यू में लेखिकाओं के लिए कहे गए छिनालशब्द को भी काटने के काबिल नहीं समझा गया. मेरी जिस कहानी पर आपत्ति थी, वह भी नया ज्ञानोदयमें ही छपी थी और तब संपादकीय में भी कालिया जी ने उसके लिए मेरी प्रशंसा की थी. मैं सच में दुखी हूं, अगर उस कहानी से ज्ञानपीठ की मर्यादा को धक्का लगता है. लेकिन मुझे ज़्यादा दुख इस बात से है कि पहले पत्रिका में छापते हुए इस बात के बारे में सोचा तक नहीं गया. लेकिन तब नहीं, तो अब मेरे साथ ऐसा क्यों? यहां मुझे खुद पर लगा दूसरा आरोप याद आता है- मेरा एटीट्यूड.

मुझे नहीं याद कि मैं किसी काम के अलावा एकाध बार से ज़्यादा ज्ञानपीठ के दफ़्तर आया होऊं. मुझे फ़ोन वोन करना भी पसंद नहीं, इसलिए न ही मैंने कैसे हैं सर, आप बहुत अच्छे लेखक, संपादक और ईश्वर हैंकहने के लिए कभी कालिया जी को फ़ोन किया, न ही आलोक जी को. यह भी गलत बात है वैसे. बहुत से लेखक हैं, जो हर हफ़्ते आप जैसे बड़े लोगों को फ़ोन करते हैं, मिलने आते हैं, आपके सब तरह के चुटकुलों पर देर तक हँसते हैं, और ऐसे में मेरी किताब छपे, पुरस्कार मिले, यह कहाँ का इंसाफ़ हुआ? माना कि ज्यूरी ने मुझे चुना लेकिन आप ही बताइए, आपके यहाँ दिखावे के अलावा उसका कोई महत्व है क्या?

ऊपर से नीम चढ़ा करेला यह कि मैंने हिन्दी साहित्य की गुटबाजियों और राजनीति पर अपने अनुभवों से तहलकामें एक लेख लिखा. वह शायद बुरा लग गया होगा. और इसके बाद मैंने ज्ञानपीठ में नौकरी करने वाले और कालिया जी के लाड़ले राजकुमारलेखक कुणाल सिंह को नाराज कर दिया. मुझे पुरस्कार मिलने की घोषणा होने के दो-एक दिन बाद ही कुणाल ने एक रात शराब पीकर फ़ोन किया था और बदतमीजी की थी. उस किस्से को इससे ज़्यादा बताने के लिए मुझे इस पत्र में काफ़ी गिरना पड़ेगा, जो मैं नहीं चाहता. ख़ैर, यही बताना काफ़ी है कि हमारी फिर कभी बात नहीं हुई और मैं अपनी कहानी की किताब को लेकर तभी से चिंतित था क्योंकि ज्ञानपीठ में कहानी-संग्रहों का काम वही देख रहे थे. मैंने अपनी चिंता कालिया जी को बताई भी, लेकिन ज़ाहिर सी बात है कि उससे कुछ हुआ नहीं.   

वैसे वे सब बदतमीजी करें और आप सहन न करें, यह तो अपराध है ना? वे राजा-राजकुमार हैं और आपका फ़र्ज़ है कि वे आपको अपमानित करें तो बदले में आप सॉरीबोलें. यह अश्लील कहाँ है? ज्ञानपीठ इन्हीं सब चीजों के लिए तो बनाया गया है शायद! हमें चाहिए कि आप सबको सम्मान की नज़रों से देखें, अपनी कहानियां लिखें और तमाम राजाओं-राजकुमारों को खुश रखें. मेरे साथ के बहुत से काबिल-नाकाबिल लेखक ऐसा ही कर भी रहे हैं. ज्ञानपीठ से ही छपे एक युवा लेखक हैं जिन पर कालिया जी और कुणाल को नाराज़ कर देने का फ़ोबिया इस कदर बैठा हुआ है कि दोनों में से किसी का भी नाम लेते ही पूछते हैं कि कहीं मैं फ़ोन पर उनकी बातें रिकॉर्ड तो नहीं कर रहा और फिर काट देते हैं. अब ऐसे में क्या लिक्खा जाएगा? हम बात करते हैं अभिव्यक्ति, ग्लोबलाइजेशन और मानवाधिकारों की.

ख़ैर, राजकुमार चाहते रहे हैं कि वे किसी से नाराज़ हों तो उसे कुचल डालें. चाहना भी चाहिए. यही तो राजकुमारों को शोभा देता है. वे किसी को भी गाली दे सकते हैं और किसी की भी कहानी या किताब फाड़कर नाले में फेंक सकते हैं. कोलकाता के एक कमाल के युवा लेखक की कहानी आपकी पत्रिका नया ज्ञानोदयके एक विशेषांक में छपने की घोषणा की गई थी, लेकिन वह नहीं छपी और रहस्यमयी तरीके से आपके दफ़्तर से, ईमेल से उसकी हर प्रति गायब हो गई क्योंकि इसी बीच राजकुमार की आंखों को वह लड़का खटकने लगा. एक लेखक की किताब नवलेखन पुरस्कारों के इसी सेट में छपी है और जब वह प्रेस में छपने के लिए जाने वाली थी, उसी दिन संयोगवश उसने आपके दफ़्तर में आकर अपनी किताब की फ़ाइल देखी और पाया कि उसकी पहली कहानी के दस पेज गायब थे. यह संयोग ही है कि उसकी फ़ाइनल प्रूफ़ रीडिंग राजकुमार ने की थी और वे उस लेखक से भी नाराज़ थे. किस्से तो बहुत हैं. अपमान, अहंकार, अनदेखी और लापरवाही के. मैं तो यह भी सुनता हूं कि कैसे पत्रिका के लिए भेजी गई किसी गुमनाम लेखक की कहानी अपना मसाला डालकर अपनी कहानी में तब्दील की जा सकती है.

लेकिन अकेले कुणाल को इस सबके लिए जिम्मेदार मानना बहुत बड़ी भूल होगी. वे इतने बड़े पद पर नहीं हैं कि ऊपर के लोगों की मर्ज़ी के बिना यह सब कर सकें. समय बहुत जटिल है और व्यवस्था भी. सब कुछ टूटता-बिगड़ता जा रहा है और बेशर्म मोहरे इस तरह रखे हुए हैं कि ज़िम्मेदारी किसी की न रहे.

नामवर जी, आप सुन रहे हैं कि मेरी सम्मानितकी गई किताब क्या है? वह जिसके बारे में अखबारों में बड़े गौरवशाली शब्दों में कुछ छपा था और जून की एक दोपहर आपने फ़ोन करके बधाई दी थी, वह ख़ालिस गंदगी है.

मैं फिर भी आलोक जैन जी को ईमेल लिखता हूं. उसका भी कोई जवाब नहीं आता. मैं फ़ेसबुक पर लिखता हूं कि मेरी किताब के बारे में भारतीय ज्ञानपीठ के ट्रस्टी की यह राय है. इसी बीच आलोक जैन फ़ोन करते हैं और मुझे तीसरी ही वजह बताते हैं. वे कहते हैं कि यूं तो उन्हें मेरा लिखा पसंद नहीं और वे नहीं चाहते थे कि मेरी कविताओं को पुरस्कार मिले (उन्होंने भी पढ़ी तब प्रतियोगिता के समय किताब?), लेकिन फिर भी उन्होंने नामवर सिंह जी की राय का आदर किया और पुरस्कार मिलने दिया. (यह उनकी महानता है!) वे आगे कहते हैं, “लेकिन एक लेखक को दो विधाओं के लिए नवलेखन पुरस्कार नहीं दिया जा सकता.” लेकिन जनाब, पहली बात तो यह नियम नहीं है कहीं और है भी, तो पुरस्कार तो एक ही मिला है. वे कहते हैं कि नहीं, अनुशंसा भी पुरस्कार है और उन्होंने ‘कालिया’ को पुरस्कारों की घोषणा के समय ही कहा था कि यह गलत है. उनकी आवाज ऊंची होती जाती है और वे ज्यादातर बार सिर्फ ‘कालिया’ ही बोलते हैं. 

वे कहते हैं कि एक बार ऐसी गलती हो चुकी है, जब कालिया ने कुणाल सिंह को एक बार कहानी के लिए और बाद में उपन्यास के लिए नवलेखन पुरस्कार दिलवा दिया. अब यह दुबारा नहीं होनी चाहिए. तो पुरस्कार ऐसे भी दिलवाए जाते हैं? और अगर वह ग़लती थी तो क्यों नहीं उसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया जाता और वह पुरस्कार वापस लिया जाता? मेरी तो किताब को ही पुरस्कार कहकर नहीं छापा जा रहा. और यह सब पता चलने में एक साल क्यों लगा? क्या लेखक का सम्मान कुछ नहीं और उसका समय?

यह सब पूछने पर वे लगभग चिल्लाने लगते हैं कि वे हस्तक्षेप नहीं करेंगे, कालिया जी जो भी गंदगीछापना चाहें, छापें और भले ही ज्ञानपीठ को बर्बाद कर दें. नामवर जी, आप सुन रहे हैं कि मेरी सम्मानितकी गई किताब क्या है? वह जिसके बारे में अखबारों में बड़े गौरवशाली शब्दों में कुछ छपा था और जून की एक दोपहर आपने फ़ोन करके बधाई दी थी, वह ख़ालिस गंदगी है. इसके बाद आलोक जी गुस्से में फ़ोन काट देते हैं. ज्ञानपीठ का ही एक कर्मचारी मुझसे कहता है कि चूंकि तकनीकी रूप से मेरे कहानी-संग्रह को छापने से मना नहीं किया जा सकता, इसलिए मुझे उकसाया जा रहा है कि मैं खुद ही अपनी किताब वापस ले लूं, ताकि जान छूटे.

सब कुछ अजीब है. चालाक, चक्करदार और बेहद अपमानजनक. शायद मेरे बार-बार के ईमेल्स का असर है कि आलोक जैन, जो कह रहे थे कि वे कभी ज्ञानपीठ के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करते, मुझे एक दिन फ़ोन करते हैं और कहते हैं, “मैंने कालिया से किताब छापने के लिए कह दिया है. थैंक यू.” वे कहते हैं कि उनकी मेरे बारे में और पुरस्कार के बारे में राय अब तक नहीं बदली है और ये जो भी हैं – बारह शब्दों के दो वाक्य – मुझे बासी रोटी के दो टुकड़ों जैसे सुनते हैं. यह तो मुझे बाद में पता चलता है कि यह भी झूठी तसल्ली भर है ताकि मैं चुप बैठा रहूं.

फ़ोन का सिलसिला चलता रहता है. वे अगली सुबह फिर से फ़ोन करते हैं और सीधे कहते हैं कि आज महावीर जयंती है, इसलिए वे मुझे क्षमा कर रहे हैं. लेकिन मेरी गलती क्या है? तुमने इंटरनेट पर यह क्यों लिखा कि मैंने तुम्हारी किताब के बारे में ऐसा कहा? उन्हें गुस्सा आ रहा है और वे जज्ब कर रहे हैं. वे मुझे बताते जाते हैं, फिर से वही, कि मेरी दो किताबों को छापने का निर्णय गलत था, कि मैं खराब लिखता हूं, लेकिन फिर भी उन्होंने कल कहा है कि किताब छप जाए, इतनी किताब छपती हैं वैसे भी. मैं अपना पक्ष रखना चाहता हूं कि मेरी क्या गलती है, मुझे आप लोगों ने चुना, फिर जाने क्यों छापने से मना किया, फिर कहा कि छापेंगे, फिर मना किया और अब फिर टुकड़े फेंकने की तरह छापने का कह रहे हैं. और जो भी हो, आप इस तरह कैसे बात कर सकते हैं अपने एक लेखक से? लेकिन मैं जैसे ही बोलने लगता हूं, वे चिल्लाने लगते हैं- जब कह रहा हूं कि मुझे गुस्सा मत दिला तू. कुछ भी करो, कुछ भी कहो, कोई तुम्हारी बात नहीं सुनेगा, कोई तुम्हारी बात का यक़ीन नहीं करेगा, उल्टे तुम्हारी ही भद पिटेगी. इसलिए अच्छा यही है कि मुझे गुस्सा मत दिलाओ. यह धमकी है. मैं कहता हूं कि आप बड़े आदमी हैं लेकिन मेरा सच, फिर भी सच ही है, लेकिन वे फिर चुप करवा देते हैं. बात उनकी इच्छा से शुरू होती है, आवाज़ें उनकी इच्छा से दबती और उठती हैं और कॉल पूरी. 

कभी तू, कभी तुम, कभी चिल्लाना, कभी पुचकारना, सार्वजनिक रूप से सम्मानित करने की बात करना और फ़ोन पर दुतकारकर बताना कि तुम कितने मामूली हो- हमारे पैरों की धूल. मुझे ठीक से समझ नहीं आ रहा कि नवलेखन पुरस्कार लेखकों को सम्मानित करने के लिए दिए जाते हैं या उन्हें अपमानित करने के लिए. यह उनका एंट्रेंस टेस्ट है शायद कि या तो वे इस पूरी व्यवस्था का कुत्ताबन जाएं या फिर जाएं भाड़ में. और इस पूरी बात में उस गलतीकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता, जब आप अपने यहां काम करने वाले लेखक को यह पुरस्कार देते हैं, दो बार. और दूर-दराज के कितने ही लेखकों की कहानियां-कविताएं-किताबें महीनों आपके पास पड़ी रहती हैं और ख़त्म हो जाती हैं. बहुत लिख दिया. शायद यही एटीट्यूडऔर फ्रैंकनैसहै मेरा, जिसकी बात कालिया जी ने फ़ोन पर की थी. लेकिन क्या करूं, मुझसे नहीं होता यह सब. मैं इन घिनौनी बातचीतों, मामूली उपलब्धियों के लिए रचे जा रहे मामूली षड्यंत्रों और बदतमीज़ फ़ोन कॉलों का हिस्सा बनने के लिए लिखने नहीं लगा था, न ही अपनी किताब को आपके खेलने की फ़ुटबॉल बनाने के लिए. माफ़ कीजिए, मैं आप सबकी इस व्यवस्था में कहीं फिट नहीं बैठता. ऊपर से परेशानियां और खड़ी करता हूं. आपके हाथ में बहुत कुछ होगा (आपको तो लगता होगा कि बनाने-बिगाड़ने की शक्ति भी) लेकिन मेरे हाथ में मेरे लिखने, मेरे आत्मसम्मान और मेरे सच के अलावा कुछ नहीं है. और मैं नहीं चाहता कि सम्मान सिर्फ़ कुछ हज़ार का चेक बनकर रह जाए या किसी किताब की कुछ सौ प्रतियाँ. मेरे बार-बार के अनुरोध जबरदस्ती किताब छपवाने के लिए नहीं थे सर, उस सम्मान को पाने के लिए थे, जिस पर पुरस्कार पाने या न पाने वाले किसी भी लेखक का बुनियादी हक होना चाहिए था. लेकिन वही आप दे नहीं सकते. मैं देखता हूं यहाँ लेखकों को – संस्थाओं और उनके मुखियाओं के इशारों पर नाचते हुए, बरसों सिर झुकाकर खड़े रहते हुए ताकि किसी दिन एक बड़े पुरस्कार को हाथ में लिए हुए खिंचती तस्वीर में सिर उठा सकें. लेकिन उन तस्वीरों में से मुझे हटा दीजिए और कृपया मेरा सिर बख़्श दीजिए. फ़ोन पर तो आप किताब छापने के लिए तीन बार हांऔर तीन बार नाकह चुके हैं, लेकिन आपने अब तक मेरे एक भी पत्र का जवाब नहीं दिया है. आलोक जी के आख़िरी फ़ोन के बाद लिखे गए एक महीने पहले के उस ईमेल का भी, जिसमें मैंने कालिया जी से बस यही आग्रह किया था कि जो भी हो, मेरी किताब की अंतिम स्थिति मुझे लिखकर बता दी जाए, मैं इसके अलावा कुछ नहीं चाहता. उनका एसएमएस ज़रूर आया था कि जल्दी ही जवाब भेजेंगे. उस जल्दी की मियाद शायद एक महीने में ख़त्म नहीं हुई है.

मैं जानता हूं कि आप लोग अपनी नीयत के हाथों मजबूर हैं. आपके यहां कुछ धर्म जैसा होता हो तो आपको धर्मसंकट से बचाने के लिए और अपने सिर को बचाने के लिए मैं ख़ुद ही नवलेखन पुरस्कार लेने से इनकार करता हूं और अपनी दोनों किताबें भी भारतीय ज्ञानपीठ से वापस लेता हूं, मुझे चुनने वाली उस ज्यूरी के प्रति पूरे सम्मान के साथ, जिसे आपने थोड़े भी सम्मान के लायक नहीं समझा. कृपया मेरी किताबों को न छापें, न बेचें. और जानता हूं कि इनके बिना कैसी सत्ता, लेकिन फिर भी आग्रह कर रहा हूं कि हो सके तो ये पुरस्कारों के नाटक बन्द कर दें और हो सके, तो कुछ लोगों के पद नहीं, बल्कि किसी तरह भारतीय ज्ञानपीठ की वह मर्यादा बचाए रखें, जिसे बचाने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.

सुनता हूं कि आप शक्तिशाली हैं. लोग कहते हैं कि आपको नाराज़ करना मेरे लिए अच्छा नहीं. हो सकता है कि साहित्य के बहुत से खेमों, प्रकाशनों, संस्थानों से मेरी किताबें कभी न छपें, आपके पालतू आलोचक लगातार मुझे अनदेखा करते रहें और आपके राजकुमारों और उनके दरबारियों को महान सिद्ध करते रहें, या और भी कोई बड़ी कीमत मुझे चुकानी पड़े. लेकिन फिर भी यह सब इसलिए ज़रूरी है ताकि बरसों बाद मेरी कमर भले ही झुके, लेकिन अतीत को याद कर माथा कभी न झुके, इसलिए कि आपको याद दिला सकूं कि अभी भी वक़्त उतना बुरा नहीं आया है कि आप पच्चीस हज़ार या पच्चीस लाख में किसी लेखक को बार-बार अपमानित कर सकें, इसलिए कि हम भले ही भूखे मरें लेकिन सच बोलने का जुनून बहुत बेशर्मी से हमारी ज़बान से चिपककर बैठ गया है और इसलिए कि जब-जब आप और आपके साहित्यिक वंशज इतिहास में, कोर्स की किताबों में, हिन्दी के विश्वविद्यालयों और संस्थानों में महान हो रहे हों, तब-तब मैं अपने सच के साथ आऊं और उस भव्यता में चुभूं.

तब तक शायद हम सब थोड़े बेहतर हों और अपने भीतर की हिंसा पर काबू पाएँ.

गौरव सोलंकी

11/05/2012

मसखरी का अंत

किशोर कुमार। फिल्मफेयर, १९६०

कुछ महीने पहले काम से थोड़ी फुरसत लेकर मैं कश्मीर गया. बहुत पहले मैंने अपनी पत्नी और खुद से भी वादा किया था कि मैं कश्मीर जाऊंगा. मुझे खुशी है कि आखिरकार मैंने वह वादा निभाया. खुशी इसलिए भी है कि बर्फ से ढकी चोटियों, गहरी घाटियों और इस जगह की शांति ने मुझ पर अनोखा असर किया. अचानक ही मुझे अहसास हुआ कि मैं कौन था और क्या हो गया हूं. मैंने यह भी देखा कि मैं कहां बढ़ा जा रहा हूं. मैंने कई चीजें साफ-साफ अनुभव कीं. इसने मुझे हिलाकर रख दिया.

पर इससे पहले कि मैं आगे बढ़ूं, यह जरूरी है कि थोड़ा पीछे लौटा जाए और जो बात मैं कह रहा हूं उसकी पृष्ठभूमि समझी जाए.

यह एक नौजवान की कहानी है. एक ऐसे संजीदा नौजवान की जिसे एक जोकर बना दिया गया. वह कहानी सुनाने का वक्त आ गया है. इसलिए क्योंकि अब वह नौजवान उस पड़ाव पर पहुंच गया है जहां उसकी यह मसखरी खत्म होनी चाहिए.

यह किशोर कुमार की कहानी है. मेरी कहानी.

एक आदर्शवादी लड़का जल्द ही एक मगरूर और दूसरों में दोष ढूंढ़ने वाला नौजवान बन गया. परंपराओं के लिए अब मेरे मन में सम्मान नहीं था. मैं हर चीज का मजाक उड़ाने लगा था. कुल मिलाकर कहूं तो मैं बहुत तेजी से वह किशोर कुमार बन रहा था जिसे आप सब जानते हैं

सालों पहले जब मैंने फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था तो मैं एक दुबला-पतला गंभीर नौजवान था. मुझमें अच्छा काम करने का जुनून था. मैं गाता था. मेरे आदर्श केएल सहगल और खेमचंद प्रकाश थे. ऐसे नाम जिनकी गूंज तब तक रहेगी जब तक फिल्म इंडस्ट्री का वजूद रहेगा. मैं हमेशा इन दोनों हस्तियों को अपने लिए मिसाल के तौर पर देखता.

एक प्लेबैक सिंगर के तौर पर मेरी शुरुआती कोशिशें खासी कामयाब रहीं थी. खेमचंद प्रकाश के साथ मैंने जो गाने गाए वे गंभीर और सहज थे. इनमें कोई जटिलता नहीं थी. खेमचंद प्रकाश को मैं एक ऐसा नौजवान लगता था जो एक दिन बहुत अच्छा गाने लगेगा. उनका सोचना गलत नहीं था.

यहीं मेरी डोर ‘दूरदृष्टि’ वाले कुछ लोगों के हाथ में आ गई. उन्होंने फैसला किया कि इस नौजवान को कुछ सलीका सिखाना चाहिए. उन्हें लगता था कि मैं खुद को एक ऐसी शैली में ढाल रहा हूं जो जल्द ही किसी काम की नहीं रहेगी. उसी तरह जैसे कल का अखबार आज के लिए बेकार की चीज हो जाता है. उन्हें लगा कि कि मुझे आने वाले कल के हिसाब से ढलना चाहिए.

उनमें से एक ने मुझे सलाह दी, ‘ऐसे मत गाओ. यह कुछ ज्यादा ही सादा है. इसमें थोड़ा मसाला डालो. कुछ बूम चिक टाइप चीज करो. इसमें जैज और यॉडलिंग डालो.’

दूसरे ने कहा, ‘प्लेबैक सिंगिग में कोई भविष्य नहीं है. एक्टिंग में आ जाओ. पैसा इसी में है.’

तो सलाहें आती गईं और मैं उन पर अमल करता गया. खुद को बदलने में मुझे ज्यादा वक्त नहीं लगा. गंभीर और आदर्शवादी लड़का जल्द ही एक मगरूर और दूसरों में दोष ढूंढने वाला नौजवान बन गया. परंपराओं के लिए अब मेरे मन में सम्मान नहीं था. मैं हर चीज का मजाक उड़ाने लगा था. कुल मिलाकर कहें तो मैं बहुत तेजी से वह किशोर कुमार बन रहा था जिसे आप सब जानते हैं.

उस दिन को मैं जिंदगी भर नहीं भूल पाऊंगा जब मैं अपने गुरु खेमचंद प्रकाश पर हंसा था. मैंने उनसे कहा था, ‘इन गंभीर चीजों को भूल जाइए खेमराज जी. अब ये नहीं चलेंगी. अब लोग जैज चाहते हैं. उन्हें यॉडलिंग अच्छी लगती है.’

यॉडलिंग के लिए मैंने उनके सामने एक नमूना भी पेश किया था. वे बहुत नाराज हुए. उन्होंने मुझे न सिर्फ खूब फटकारा बल्कि चेताया भी कि मैं एक दिन पछताऊंगा.

आज समझ में आया है कि वे सही थे. लेकिन तब मुझे इसमें कोई शक नहीं था कि वे गलत हैं. हालात ने भी तो मेरा साथ दिया था. इसलिए मैंने गानों में यॉडलिंग और जैज के प्रयोग किए. गाने भी हिट रहे.

प्रयोग का यह भूत सिर्फ गाने तक ही नहीं रहा. अभिनेता के तौर पर भी मैंने इसे दोहराया. अब तक मैं सामान्य तरीके से ही अभिनय करता आ रहा था. मुझे वह दिन याद है जब एक जाने-माने निर्माता-निर्देशक ने एक दिन सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए कहा था, ‘तुम जो कर रहे थे वह 25 साल पुरानी चीज है. अब जब तुम्हें बात समझ में आ गई है तो मैं तुम्हें कुछ बनाकर ही रहूंगा.’

मेरे दिमाग में ये रहस्यमयी शब्द गूंज रहे थे. शूटिंग के दिन जब मैंने अपने डायलॉग बोले तो निर्देशक साहब बोले, ‘ऐसे नहीं बच्चे. इसमें कुछ स्पेशल डालो.’

मैं एक ऐसा बंदर बन गया जिसे भारी मेहनताना मिलता था. मैं भी पैसा कमा रहा था और मेरे प्रोड्यूसर भी. मेरी फिल्में हिट हो रही थीं और जनता खुश थी

शॉट फिर से हुआ. निर्देशक साहब अब भी संतुष्ट नहीं थे. सारा दिन रीटेक में ही चला गया. हर बार मैं पहले से ज्यादा घबरा जाता. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह शख्स मुझसे डायलॉग कैसे बुलवाना चाहता है.

जब दिन खत्म हुआ तो मेरी हालत देखकर सेट पर मौजूद एक कर्मचारी ने मेरे पास आकर कहा, ‘उनके दिमाग में चार्ली चैप्लिन घूम रहा है. डायलॉग उसी स्टाइल में बोलो.’

किस्मत से मैंने चार्ली चैप्लिन की कई फिल्में देखी हुई थीं. अगले दिन जब शूटिंग शुरू हुई तो मैंने उसी अंदाज में अपने डायलॉग बोल दिए.

‘बहुत अच्छे’, निर्देशक साहब चिल्लाए और मुझे गले लगाते हुए बोले, ‘मेरा सपना पूरा हो गया है.’

फिर तो एक के बाद एक फिल्में मेरे पास आती गईं और मैं अपनी कॉमेडी भूमिकाओं को जोश से निभाता गया. फॉर्मूला यही था कि मुझे बेवकूफाना से बेवकूफाना हरकतें करनी होती थीं. कूदना-फांदना, धड़ाम से गिरना, चेहरे बनाना और कुल मिलाकर कहें तो एक बंदर की तरह बर्ताव करना. मुझे यकीन था कि जनता भी यही चाहती है. मेरी फिल्में हों या गीत, लगातार हिट हो रहे थे. मुझे लगता था कि आलोचक कौन होते हैं यह कहने वाले कि अभिनय की मेरी शैली खराब है. आखिर मैं तो वही कर रहा हूं जो जनता चाहती है.

समय के साथ मुझे और भी लोग मिलते गए जो इस शैली को समर्पित थे. उनमें मेरे साथी भी थे और निर्माता-निर्देशक भी. इस तरह मैं एक ऐसा बंदर बन गया जिसे भारी मेहनताना मिलता था. मैं भी पैसा कमा रहा था और मेरे प्रोड्यूसर भी. मेरी फिल्में हिट हो रही थीं और जनता खुश थी. इससे ज्यादा किसी को क्या चाहिए?

एक फिल्म का उदाहरण याद आ रहा है. इस फिल्म में कुछ ऐसे दृश्य थे जिनमें मेरा किरदार अपने बड़े भाई को गालियां दे रहा है. उसे जलील कुत्ते जैसे शब्द कह रहा है. मुझे लगा कि जनता निश्चित तौर पर इसे पसंद नहीं करेगी. छोटा भाई अपने बड़े भाई को गालियां दे, यह भला किसे अच्छा लगेगा. मैंने निर्देशक से यह बात कही. उसका कहना था, ‘चिंता मत करो किशोर. तुम जो भी करोगे जनता उसे स्वीकार कर लेगी.’

और जब फिल्म के प्रीमियर के दौरान ये दृश्य स्क्रीन पर आए तो दर्शकों ने तालियां बजाईं.

मुझे पक्का यकीन हो गया था कि एक्टिंग का मेरा यह स्टाइल सही है, इसलिए मैं इसमें पूरी तरह से डूब गया. वह ऐसा वक्त था जब मैं कहा करता था कि पैसा ही सब कुछ है.

फिर एक दिन मैंने अपनी ही फिल्म लांच की. इसका नाम था चलती का नाम गाड़ी. अपने सही होने पर मुझे इतना यकीन था कि जब संगीतकार एसडी बर्मन ने इसके लिए बनाई हुई कुछ मौलिक धुनें मुझे सुनाईं तो मैंने उन्हें हड़का दिया. मैंने कहा, ‘क्या आपको लगता है जनता यह सुनना चाहती है? कृपा करके आप किसी म्यूजिक स्टोर में जाएं और कुछ रॉक एंड रोल रिकॉर्ड्स खरीदें. लेकिन

ध्यान रखें कि ऐसे रिकॉर्डस न खरीद लीजिएगा जो दूसरे संगीतकार भी खरीद रहे हों.’

इसके बाद एक बड़ी अजब चीज हुई. इस फिल्म में मैं एक गायक का किरदार निभा रहा था. मेरे एक गीत के लिए संगीतकार ने कहा कि इसे मेरी नहीं बल्कि किसी प्लेबैक सिंगर की आवाज में रिकॉर्ड किया जाएगा. मैंने एतराज किया तो जवाब आया कि यह शास्त्रीय गीत है और मैं शास्त्रीय गीत नहीं गा सकता. यह बात उस शख्स के लिए कही जा रही थी जिसने अपना करियर ही शास्त्रीय गीतों से शुरू किया था. सफलता और घमंड से बनी मेरी दुनिया की बुनियाद पर यह पहली चोट थी.

फिर मेरी फिल्म बंदी आई. ईमानदारी से कहूं तो इसे लेकर मैं सशंकित था क्योंकि इसके दूसरे हिस्से में मुझे एक बूढे़ व्यक्ति की भूमिका अदा करनी थी. यह एक गंभीर भूमिका थी. मुझे लगा कि जनता को यह पसंद नहीं आएगी. इसलिए इसकी भरपाई के चक्कर में मैंने फिल्म के पहले हिस्से में अपनी चिरपरिचित एक्टिंग की अति कर दी. लेकिन मुझे हैरानी हुई जब पहले हिस्से की आलोचना और दूसरे हिस्से की तारीफ हुई.

हो सकता है कि मैं असफल हो जाऊं और मुझे इंडस्ट्री छोड़नी पड़े. पर मुझे इस बात के लिए तो याद किया जाएगा कि मैंने कुछ अच्छा करने की कोशिश की

इसके बाद आंखें खोलने वाली एक और घटना हुई. मेरी एक फिल्म आई थी आशा. यह इस सिद्धांत के साथ बनाई गई थी कि जितनी अति उतना अच्छा. इसमें वह सब कुछ था जो जनता चाहती थी. रिलीज होने के बाद यह उम्मीदों पर बमुश्किल आधी ही खरी उतर पाई. इसके बाद एक आलोचक ने लिखा कि अगर मैं इसी रास्ते पर चलता रहा तो मेरे लिए अपना दायरा बढ़ाना और दूसरी तरह की भूमिकाएं करना मुश्किल होगा. मुझे लगा कि उसकी बात सही है.

फिर कश्मीर में मैंने खुद को अपने असली रूप में देखा. मुझे लगा कि मैं एक बेमतलब मसखरा हूं. ऐसा आदमी जिसे बस मसखरी के लायक ही समझा जाता है. मुझे लगा कि मैं पैसे के पीछे भागने वाला एक ऐसा इंसान हूं जिसने इस यकीन में अपना स्तर सबसे नीचे कर दिया है कि उसकी फिल्में लोगों द्वारा सराही जाती हैं. मुझे अहसास हुआ कि मैं एक ऐसा कलाकार हूं जिसने इतना काम सिर पर ले लिया है कि वह लगभग पागल हो गया है. वह मानसिक रूप से अशांत रहता है. चिंता करता रहता है. उसे नींद नहीं आती.

मैं उस असीम मूर्खता के बारे में सचेत हो गया था जो मैं और मुझसे जुड़े लोग फिल्म निर्माण के नाम पर रच रहे थे. मुझे महसूस हुआ कि समकालीन फिल्म संगीत एक तमाशा बन कर रह गया है. मुझे यह  अहसास हुआ कि मैं ही नहीं मेरे बड़े भाई अशोक कुमार भी उस नाव पर सवार हैं. उन्हें ऐसी फिल्में दी जा रही हैं जो उनकी महान प्रतिभा के साथ न्याय नहीं करतीं.

मुझे एक किस्सा और याद आता है. मैं एक म्यूजिक स्टोर में था. सेल्समैन ने मुझे बताया कि आजकल विदेशी जब पूछते हैं कि इंडियन रिकॉर्ड्स में क्या नई चीज आई है तो उसे समझ में नहीं आता कि वह क्या करे. उसका कहना था, ‘मैं उन्हें क्या दिखाऊं? नए के नाम पर या तो मशहूर उस्तादों की कुछ रिकॉर्डिंग्स हैं या फिर केएल सहगल के गानों के रिकॉर्ड. मैं उन्हें फिल्म संगीत वाले रिकॉर्ड कैसे दिखाऊं? उन्हें तो झटका लग जाएगा.’

इसलिए जब मैं अपनी छुट्टी से लौटा तो तब तक मैं फैसला कर चुका था. मैंने सोच लिया था कि अगर अब मुझे ऐसी भूमिकाओं के प्रस्ताव आते हैं तो मैं सीधे उन्हें ठुकरा दूंगा.

बांबे वापस आने के बाद जल्द ही दो फिल्मकारों ने यह कहते हुए मुझसे संपर्क किया कि वे मुझे अपनी फिल्म में लेना चाहते हैं. वे सुबह-सुबह मेरे घर आए. मेरा सेक्रेटरी भी घर पर था. मेरी पत्नी पोर्च में एक सब्जीवाले से सब्जियां खरीद रही थीं. इन निर्देशकों ने बात मेरी तारीफ से शुरू की. उनका कहना था कि मैं एक जीनियस हूं और उनके पास मेरे लिए एक भूमिका है. उनमें से एक ने कहा, ‘आप सिचुएशन सुनिए. आप हीरोइन के बेडरूम में घुसते हैं. आपको पता है किस तरह? हा हा हा…आप एक साड़ी पहनकर कमरे में घुसते हैं. है न शानदार? इसके बाद आपको पता है क्या करना है?’

मैंने उनको बीच में रोकते हुए कहा, ‘एक मिनट. मैं आपको बताता हूं कि मैं क्या करूंगा.’

वे कुछ समझते इसके पहले मैंने छलांग लगाई और दो कलाबाजियां खाते हुए पोर्च में पहुंच गया. दोनों लोग चकरा गए. मैंने अपने सेक्रेटरी से कहा कि आगे वह उन दोनों से बात कर ले. फिर मैं बिना कुछ कहे भीतर चला गया. थोड़ी देर बाद जब मैं बाहर आया तो दोनों लोग जा चुके थे.

मैंने सेक्रेटरी से पूछा, ‘क्या हुआ?’

‘उन्हें लगा कि आप पागल हो गए हैं. वे बहाना बनाकर निकल गए.’, सेक्रेटरी ने कहा.

मुद्दा यह है कि मेरे लिए बेकार की चीज के पीछे भागने की यह अंधी और गलत दौड़ छोड़ने का वक्त आ गया है. मैं अब सीधा चलना चाहता हूं. अगर कॉमेडी है तो वह गूढ़ होनी चाहिए. संगीत

वास्तव में भारतीय होना चाहिए. फिल्मों का कोई मतलब होना चाहिए.

मैं खुद एक फिल्म बनाना चाहता हूं. मैं इस पर जल्द ही काम शुरू करूंगा. मैं खुद इसे निर्देशित करूंगा और इसमें संगीत भी दूंगा. यह मेरी उन फिल्मों से बिल्कुल अलग होगी जिनके दर्शक आदी हो चुके हैं. मुझे पता है कि मेरे कई दोस्त और शुभचिंतक यह सुनते ही मेरी तरफ दौड़ेंगे और सलाह देंगे कि मैं ऐसी बेवकूफी न करूं. वे मुझे मनाने की कोशिश करेंगे कि मैं वही करता रहूं जो मैं अब तक सफलतापूर्वक करता आ रहा हूंं. पूरी कोशिश करूंगा कि उनकी बात न सुनूं.

अगर फिल्म चल जाती है तो बहुत अच्छा. अगर नहीं चली तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता. एक फिल्म फ्लॉप हो सकती है, दूसरी भी और फिर तीसरी-चौथी भी. हो सकता है मैं अपना सारा पैसा गंवा दूं. वह पैसा जिसकी कभी मैंने इतनी पूजा की है. हो सकता है कि मैं असफल हो जाऊं और मुझे इंडस्ट्री छोड़नी पड़े. पर कम से कम मुझे इस बात के लिए तो याद किया जाएगा कि मैंने कुछ अच्छा करने की कोशिश की. लोग शायद कहेंगे कि ‘बेचारा किशोर कुमार, जोकर बनकर अच्छा-खासा चल रहा था. फिर उसने कुछ अलग और अच्छा करने की कोशिश की. देखो क्या हाल हो गया उसका.’

भले ही ऐसा हो जाए मगर मुझे लगता है कि मेरे लिए यह भी अच्छा होगा.

आर्यसमाजी अध्यापक का बेटा. मैं…

 

धर्मेन्द्र । माधुरी

अस्सी रुपये महीना? मैंने यह देखा बाबू जी को यह देखकर सदमा पहुंचा. उनका बेटा जवान था, तंदुरुस्त था, खूबसूरत था. उनके कहने पर ही उसने सूट पहना था, टाई लगाई थी. जब शहर में आई ट्यूबवैल कंपनी के अधिकारियों ने कह दिया कि उनके पास मजदूरी का काम है और उसमें अस्सी रुपये से ज्यादा नहीं मिल सकते, तो बाबू जी को सचमुच में बुरा लगा.

और उनसे ज्यादा बुरा मुझे लगा. मैंने सोचकर देखा तो लगा कि मैंने उनके साथ बहुत ज्यादती की है, उनकी उम्मीदों पर पानी फेरा है, तमन्नाओं पर ठेस लगाई है. वे पक्के आर्यसमाजी, तिस पर अध्यापक. दुनिया भर की सेवा करना और समाज हित कर गुजरना उनका एकमात्र ध्येय था; कहीं पाठशाला, कहीं धर्मशाला, कहीं गुरुद्वारा, कहीं समाजभवन, जहां जो सुधार हो सके वे करने को तैयार थे और आज उन्हें लगता होगा कि सब किया-धरा व्यर्थ है, अपने बेटे को तो वे सुधार नहीं पाए. दो कौड़ी का लड़का निकला! मुझे याद आया कि हाई स्कूल तक तो मैं भी आर्यसमाज मंदिर में सुबह-शाम प्रार्थना करता था, झाड़ू-बुहारी तक बड़ी श्रद्धा से कर आता था! फिर पढ़ने बाहर गया और फिल्म का भूत सिर पर चढ़ गया. इंटर और बीए में फिर फेल, फिर फेल, फिर फेल…, और अब काम मिल रहा है तो मजदूरी का! मैं यह काम करूंगा?

मैंने एक बार बाबू जी की तरफ देखा, एक बार अधिकारियों की तरफ. कोट टाई निकाल दी, कहा, ‘मुझे मंजूर है. मैं मजदूरी का काम करूंगा.’

उस एक पल को जो चमक बाबूजी की आंखों में आई, मैं उससे धन्य हो गया. खुशी-खुशी काम पर चला गया. दूसरे दिन मैंने ट्यूबवैल लगाए जाते देखा. तीसरे दिन मैंने खुद एक ट्यूबवैल फिट कर दिखाया. अधिकारी बहुत खुश हुए. बोले, ‘मजदूरों का काम करने के लिए बहुत से हैं. तुम फिटिंग में लगो. हमारे साथ जगह-जगह चलोगे और काम सुपरवाइज करोगे. तंदुरुस्त हो, खूबसूरत हो!… आं… तुम्हारी तनख्वाह तीन सौ रुपये होगी. मंजूर? ‘

मैं फिर कोट-टाई पहन कर बाबूजी के पास आया. उनके पांव छुए. बताया कि मुझे तीन सौ महीना मिलेगा. बाबू जी हैरत से देखते रहे- कौन-सा जादू जानता है उनका लड़का, जो तीन दिन में तीन सौ की तरक्की ले आया? उस पल उनके चेहरे का संतोष नहीं भूलता. मेरी वह पहली तरक्की जिंदगी की सबसे बड़ी तरक्की थी, आज की लाखों की तरक्की से भी बड़ी.

मगर फिर बाबूजी ने ही मुझे रोक लिया, वे लोग बहुत तरक्की देने को तैयार हो गए थे और अपने साथ विदेश ले जाने को कहते थे. उनके घरों में मेरा आना-जाना था. बाबूजी डरते होंगे कि कही विदेश जाकर उनका आर्यसमाजी बेटा रंग-ढंग न बदल ले. लेकिन यहां रह-रहकर फिल्म के सपने करवटें बदलने लगते. बाबूजी की पसंद नहीं थी यह सब. अपनी जान उन्होंने मेरा नशा उतारने की तरकीब निकाल ली. मेरी शादी कर दी. एक बार मुझे भी लगा कि अब स्थिर होना चाहिए, घर-गृहस्थी है, जिम्मेदारियां हैं, जुआ खेल पाने का वक्त गया. बहुतेरी कोशिश की कि कहीं जम जाऊं, पर तभी ‘फिल्मफेयर-यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स’ के प्रतिभा चुनाव की घोषणा पढ़ी. एक बार फिर मन उछला. एक स्टूडियो में जाकर फोटो खिंचवा आया, भेज दिए. बाबूजी को अच्छा नहीं लगा और मां को भी शायद, क्योंकि उनके लिए सब अच्छा-बुरा वही था, जो बाबूजी के लिए था. एक बार सोच में पड़ा, इन्हें दुख पहुंचाकर क्या अच्छा कर रहा हूं? मगर मुझ पर मेरा बस न था. साक्षात्कार के लिए बुलाया गया, तो चला गया. चुन लिया गया तो खुशी से फूला न समाया. पर जल्दी ही लगने लगा कि वह खुशी झूठी थी.

जिन लोगों ने चुना था, उन्हीं ने काम नहीं दिया. कितना तो वक्त और कितना सारा आत्मविश्वास गल गया, गलता गया. निराशा ने घेरा और काली छाया चहुं ओर नजर आने लगी. चक्कर काटते चेहरा हताश और बदन फीका होने लगा. एक बार और आखिरी बार फैसला कर लिया – यह दुनिया मेरे लिए नहीं है, मैं वापस खेतों में चला जाऊंगा. तभी वह मोड़ आ गया, जिसने मेरा रास्ता तय कर दिया, जिस पर अब तक चल रहा हूं. मुझे ‘ दिल भी तेरा, हम भी तेरे ‘ के लिए बुलाया गया और वह काम मिल गया. फिर विमल दा ने ‘बंदिनी’ के लिए बुला लिया.

खैर, यह सारा किस्सा पहले ही आपको मालूम होगा. क्यों न किस्से को किस्से की तरह कहूं, जो सुनने में मजेदार लगे? तब एक बात है, किस्से में नाम नकली होते हैं, इसलिए आगे से मैं सब नाम नहीं लूंगा, माफी चाहता हूं.

शुरू-शुरू का एक वाकया सुनिए. एक फिल्म के तीन भागीदार निर्माता थे. मुझे बुलाकर साक्षात्कार किया. एक बोला, ‘लड़का तो अच्छा है.’

दूसरा बोला, ‘हीरा है हीरा!’

तीसरा बोला, ‘लाखों का’

एक बोला, ‘तो अनुबंध कर लो, साइनिंग पैसा दे दो- एक हजार एक रुपया’

दूसरा बोला, ‘क्या करते हो! एक हजार एक? नहीं, नहीं, पांच सौ एक ठीक हैं.’

तीसरा बोला, ‘ चलो तो तुम जल्दी से पैसे दे दो.

‘दूसरा बोला, ‘मेरे पास तो इतने नहीं हैं.’

तीसरा बोला, ‘सब मिलकर निकालो.’

सबने पैसे निकाले, कुल इक्यावन रुपये. हीरो साइन हो गया- इक्यावन रुपये में.

जिनके यहां पेइंग गेस्ट था वे उकता गए थे. अच्छा लड़का है! खाता-पीता है और धेला नहीं देता! कुछ भी करके इसे अब जाना चाहिए. या काम पा कर पैसा देना चाहिए. कायदे की बात है!

तभी विमल दा का बुलावा आया. जाकर मिला. वे बोलते बहुत कम थे, धर्मेंद्र की जगह धर्मेंदु पुकारते थे. उस दिन भी कुछ न बोले. आते वक्त एक वाक्य कहा, ‘जो काम किया है उसकी रीलें दिखाओ.’

निर्माता से कहूंगा तो बिगड़ जाएगा! लैबोरेटरी में जाकर एडीटर को मक्खन लगाया. किसी तरह स्मगल करके अपने काम की रीलें ले जा कर विमल दा को दिखाईं. उन्होंने देख लीं, बोले कुछ नहीं.

फिर एक दिन बुलावा आया. वे मिले, वैसे ही चुपचाप. कहा, ‘बाहर बैठो.’ दिन भर बैठा रहा. शाम हताश होकर लौट रहा था कि वे नीचे उतरे. बोले, ‘तुम को हीरो लिया है, साइनिंग एक हजार एक, ऊपर से चैक ले लो.’

क्रॉस चैक लेकर उड़ा-उड़ा घर पहुंचा. मालूम हुआ, इसके पैसे भुनाने के लिए तो बैंक में खाता चाहिए! वो तो नहीं है. फिर…?

फिर तो ‘बंदिनी’ के बनते-बनते मैं चल निकला. एक छोटी ‘फिएट’ गाड़ी ले ली. रंग हरा, नंबर ‘एमआरएक्स- ९१४४’ भागा-भागा स्टूडियो आया, विमल दा से कहा, ‘दादा, मैंने गाड़ी ली है!’

वे कुछ नहीं बोले. बाहर चले गए. दिल दुखा. लगा कि न मेरे दुख का कोई हिस्सेदार है, न सुख का. पहली बार गाड़ी ली है, कितने चाव से बताने लगा था और वे सुने बिना ही चले गए? घंटों उदास फिरता रहा. तभी किसी ने कंधे पर हाथ रखा, विमल दा थे, ‘तुम कुछ कह रहे थे धर्मेंद्र?’

‘जी, नहीं तो!’

‘झूठ. तुम कह रहे थे, गाड़ी ली है? कहां है? दिखाओ!’

मैंने उन्हें गाड़ी दिखाई और उन्होंने इतना उत्साह दिखाया, जैसे उन्होंने पहली बार गाड़ी देखी हो. इसके बाद मालूम हुआ कि इन घंटों में वे कितने बड़े मानसिक तनाव में से गुजर कर आए थे- वह मैं कहना नहीं चाहता. पर तब बिमल दा के आगे सर झुक गया था. वे छोड़ गए तो मैं फूट-फूट कर रोया था. इधर-उधर देखा, सब तो नहीं रो रहे! क्या केवल मुझसे ही उनका नाता था, या मैं ही अतिभावुक हूं?

एक किस्सा और सुनाता हूं. एक दिन सुबह-सुबह एक आदमी चिट्ठी दे गया, लिखा था, ‘ शाम के सात बजे, सात लाख रुपये एक थैले में रखकर अपने दरवाजे पर मिलना. घर की बत्तियां बुझी हों. मैं आऊंगा और थैली ले जाउंगा. जरा भी मामला इधर-उधर हुआ या पुलिस को इसकी खबर मिली तो पूरे परिवार को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा.’

मैंने वह चिट्ठी अपने सहयोगी को दे दी कि पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दे. पर मुझे पता था कि होनाहवाना क्या है. ऐहतियात के तौर पर ये जरूर किया कि घरवालों को इसके बारे में बता दिया. फिर मैं इसे भूल गया. घरवालों ने भी गंभीरता से नहीं लिया.

… और रात को मैं देर से लौटा तो एक सरदार जी दरवाजे पर मिले. बोले, ‘मेरी चिट्ठी मिली?’

ओह तो ये महाशय थे! मैं ठहरा जाट आदमी. घुमाकर एक दिया तो महाशय नाली में जा गिरे. घर के और लोग भी आ गए और उन्हें पीटने लगे. मैंने बहुत रोका, कहा, ‘ बहुत हुआ. ‘ लेकिन कौन सुनने वाला था वहां. सरदार जी को पुलिस में दे आए.

वह बेवकूफ इतना कि पुलिस ने कहा चिट्ठी की नकल करो तो उसने चिट्ठी की हूबहू उसी लिपि में नकल कर दी. और बराबर कहता रहा कि उसकी पूरी टोली है. उसके साथ ठीक नहीं हो रहा.

बाद में पता लगाकर उसके घर गया. उसके पिता जी ने कहा कि हमारे मुंडे को छुड़वा दो… पुलिस वालों ने मेरे कहने पर भी उसे नहीं छोड़ा. मुझे उसकी जमानत लेनी पड़ी.

खूब ऊंच-नीच देखे, रोचक लगती है- फिल्मी दुनिया. क्या नहीं है यहां. लोग हैं, प्रतिभा है, जोश है, दिलीप, राज, शशि कपूर, मीना कुमारी, शर्मिला, लीना (लीना का नाम लिया तो चौंकिए मत आगे-आगे देखिए… मुझे उनकी प्रतिभा पर पूरा यकीन है) हैं… और मैं नाचीज भी हूं जिसे आप सबने इतना प्यार दिया. मैं कैसे आपका शुक्रिया         अदा करूं.

 

एक सहेली का शिकायतनामा

­­­­बबीता। माधुरी, १ मई १९७०

चिट्ठी किसी लड़की की थी. फोटो साथ नहीं भेजा था, वरना अंदाज लगाती कि सुंदर कहने लायक है या नहीं. भाषा से लगता था विद्रोहिणी है. लिखावट उसके संयत और सुसंस्कृत होने का भास देती थी. फिल्में देखने की वह बहुत शौकीन थी और फिल्म कलाकारों के बारे में जानकारी हासिल करना अपनी ‘हॉबी’ बनाई थी.

चिट्ठी पढ़कर मुझे उस पर प्यार आ गया. उसकी सारी ईर्ष्या, सारी जलन इस बात पर थी, मैं जो अपनी प्रसिद्धि की कैदी आप हूं, जिसे फिल्मों में काम करने के अपराध में नजरबंद किया गया है.

चंद्रमा का सा पहलू

आसमान पर चमकता हुआ चंदा हमें सिर्फ एक पहलू से दिखाई देता है. वैसे ही जैसे दूसरे जो कलाकार हैं, इसी चंद्रमा की तरह सिर्फ एक पहलू से पहचाने जाते हैं- चमकने वाले; पैसा, प्रसिद्धि, शान और ऐश आराम में डूबे हुए. दूसरी तरफ क्या हैं, चांद के बारे में चाहे लोगों को न मालूम हो, कलाकारों के बारे में कई लोग जानते हैं. वही सब मैं अपनी इस बहन को बताना चाहती हूं जो मुझ पर खफा है.

इन्होंने लिखा है,’ ईश्वर का इंसाफ अंधा है. उसने आपको खूबसूरती बख्शी, ठीक किया. बंबई जैसी महानगरी में पढ़ने-पनपने का मौका दिया, वह भी ठीक. लेकिन क्या आपके घर में पैसे की कमी थी, जो उसने आपको लाखों रुपया कमाने वाली हीरोइन बना दिया? क्या पहनने को कपड़ा पूरा नहीं पड़ता था, जो खूबसूरत से खूबसूरत लिबास आपके होने लगे? खाने-पीने की बात छोड़ दीजिए- रोज-रोज नई जगहें घूमने का हक उसने आपके ही भाग्य में क्यों लिखा?…’

जाकर भी न जाने की मजबूरी

चिट्ठी बहुत लंबी है. भगवान की और बहुत-सी शिकायतें उन्होंने उससे की हैं, जिसने उसकी मर्जी के आगे सिर झुका रखा है. मैं अभिनेत्री बनी, यह मैं भगवान की ही मर्जी मानती हूं, वरना मेरी मर्जी, मेरा इरादा यह नहीं था. मेरे कहने का यह मतलब नहीं कि जो हुआ, गलत है. पर जो हुआ उतना ही नहीं, जितना उन्होंने समझा है. मैं सुंदर हूं, यह उन्होंने समझा है. इसके लिए मैं धन्यवाद ही दे सकती हूं. वरना सौंदर्य तो मैंने वह देखा है कि बस देखते ही रहो, पलक झपकना भी समय की बरबादी मालूम पड़े. वह सौंदर्य यहां बंबई में मैंने नहीं देखा, जहां रहने के लिए वे मुझे सौभाग्यशाली मानती हैं. यहां तो बंबई की सजी-संवरी पाउडरी खूबसूरती भर नजर आती है. वह सौंदर्य उसकी तरह की दूरदराज जगहों में मिलता है. जहां से उनकी शिकायत आई है.

कोई बताए मुझे कि किस्मत वाली वे हैं या मैं? मैं तो चाह कर भी वहां नहीं जा सकती, जहां, जिस बस्ती में ऐसा सौंदर्य बसता है. वहीं की क्यों कहूं? मैं जब तक कश्मीर नहीं गई थी, गुलमर्ग, खिलनमर्ग, चश्मेशाही, जाने कितने नाम थे, जो मैंने रट लिए थे. पर हुआ क्या है? हुआ यह है कि कश्मीर मैं कई बार हो आई हूं और ये नाम मेरे लिए आज भी उतने ही अजनबी हैं, जितने तब थे. किसी बढ़िया होटल में मुझे ठहरा दिया जाता है, जिसके अहाते तक में घूमना मुझे मना होता है. होटल से मैं तब निकल पाती हूं जब शूटिंग की हर तैयारी हो चुकी होती है. होटल के दरवाजे तक आई हुई कार मुझे ले जाती है और फिर रिफ्लैक्टरों, माइक, कैमरा और कंटीन्यूटीइटी का यही सिलसिला दिन भर चलता रहता है, जिससे बंबई में निजात नहीं. जब तक सूरज की उमंग में पीलापन नहीं आता, निर्देशक की ‘स्टार्ट’ और ‘कट’ गूंजती रहती है. फिर गाड़ी में छिपकर होटल पहुंच जाओ और खाना खाकर जल्दी ही सो जाओ, ताकि अगली सुबह जब मेरी क्रोधित सहेली जैसी लड़कियां सुबह-सुबह के कश्मीरी जाड़े काे धता बताकर मीठी नींद में सपने बुन रही हों, मैं शीशे से सामने बैठ कर चेहरे पर बर्फ घिस सकूं, जिससे मेकअप सारे दिन खराब न हो!

रुई के फाहों-सी नर्म बर्फ जब बेआवाज गिर कर पेड़, पत्ती, सड़क और मकान सब का एक जैसा श्रृंगार करती जाती है तो मेरा मन दौड़-दौड़ कर हर गिरते हुए फाहे को पकड़ लेने का करता है. दूर तक बिछी उस सफेद चादर पर चलते हुए हर कदम अपना निशान गहरा छोड़ता जाता है. एक समय के बाद तय कर लिया कि कदमों के निशान छोड़ते हुए दूर तक निकल जाऊं. लेकिन हुआ यह कि मुझे बाहर जाने की तैयारी करता देख निर्माता, निर्देशक घबराकर मुझे रोकने लगे. क्योंकि अगले दिन शूटिंग थी और मुझे कुछ हो जाता तो? प्रसिद्धि के समंदर ने मेरे सपनों को निगल लिया.

एक बुलावा उस पार से

गनीमत की बात है कि मैं सिर्फ सपने निगल जाने तक सीमित रही, वरना एक बार यहीं काल ने अपना विकराल गाल मुझे लील जाने को खोल लिया. बर्फ पर ही दृश्य लिया जा रहा था. फिसलकर गिर जाना था. जब तक रिहर्सल चल रही थी. पर जब दृश्य फिल्माया जाने लगा, मैं सचमुच फिसल-फिसल कर भुरभुरी बर्फ पर कलाबाजियां खाती हुई लुढ़कती चली गई और यूनिट के लोग खड़े वाह-वाह कर रहे थे कि क्या शॉट दिया है. पहाड़ी ज्यादा खड़ी थी., लुढ़के तो फिर भगवान मालिक. पता नहीं कहां रुकें और रुकें तो पता चले कि तब आप अनंत यात्रा शुरू कर चुके हों. मेरी ये यात्रा रोकने के लिए देहाती की शक्ल वाले भगवान ने अपना प्रतिनिधि भेजा. वह पगडंडी पर चढ़ा आ रहा था. उससे टकराकर रुक न जाती तो कई शिकायतें छोड़कर चली जाती. किसी की सफाई देने का मौका भी न मिलता.

यह तो शहर से दूर की बात है. दिल्ली शायद हर डेढ़ दो महीने में चक्कर लग जाता है, पर कुतुब मीनार मैंने उतनी ही देखी, जितनी हवाई जहाज से दिखाई देती है. लाल किले के बारे में जानकारी अब भी किताबी है. चांदनी चौक ओर चांदनी का फर्क देखने का मौका कभी नहीं मिला. दिल्ली तो खैर दूर की बात है, बंबई के मेरे वे प्रिय रेस्तरां जो स्कूल-कॉलेज के जमाने में सहेलियों के साथ गपबाजी के अड्डे थे, पराए हो गए. जिन दुकानों के बाहर बार-बार सिर्फ इसलिए चक्कर काटा करती थी कि उनका सामान मुझे बहुत पसंद था, आज पैसा होने पर भी मेरे लिए पहुंच से बहुत दूर हो गई हैं.

मेरी अनजान सहेली, अब भी तुम्हें मुझे से ईर्ष्या है? माना कि मेरे पास पहले की अपेक्षा पैसा ज्यादा है, पर मैं उसका क्या करूं? मैं उससे कोई शौक पूरा नहीं कर सकती. मैं कई जगह जाती हूं, घूम-फिर नहीं सकती. मेरी हस्ती वैसी ही है, जैसी किसी आर्क लैंप, कैमरा सोलर या दूसरी किसी भी प्रॉपर्टी की. उसकी भी तो खूब देख-रेख, साज-संभाल होती है! कीमती पोशाकों का क्या लालच? वे स्टूडियो पहुंच कर पहनी जाती हैं, वहीं उतार कर रख दी जाती हैं. उन्हें बबीता कहां पहनती हैं?  कहानी का चरित्र पहनता है.

संकट अविश्वास का

संजीव कुमार। माधुरी

अकबर बादशाह कब हुए और गर्मियों में आगरा का तापमान कितना रहता है, इन दाे सवालों के बीच सिवा इसके क्या फर्क है कि दोनों मास्टर जी का खाैफ पैदा करते हैं. मुझे आज तक ठीक से नहीं मालूम. ठीक इसी तरह मुझे यह भी मालूम नहीं कि किसी फिल्म में हीरो की भूमिका के बीच मूल भेदभाव क्या होता है. मैं पढ़ने में बहुत तेज होता, प्रथम श्रेणी में पास हुआ करता तो आज प्रोफेसर, वकील, इंजीनियर या डॉक्टर हो जाता. मेरे शौक ने मुझे अभिनेता बना दिया. आज मेरे पास बहुत सी फिल्में हैं,  बहुत सा काम है. लोग इसे मेरी सफलता मानते हैं. मुझे बधाई देते हैं. मैं मन ही मन संकोच अनुभव करता हूं.

मैंने इतिहास को भूगोल में औैर साइंस को संस्कृत में न मिलाया होता, मन लगा कर पढ़ा होता तो हर बरस पास होने का गर्व होता. यहां मैं पास हुआ तो कुछ इस तरह कि पांचवीं की बेसिक परीक्षा और बीए के यूनिवर्सिटी वाले इम्तहान में बैठने को साथ-साथ पढ़ा औैर एक ही पढ़ाई से दोनों पास कर गया.

मैं फिल्मों में आया था तो एक्स्ट्रा बनाया गया, जिसे भीड़ में खड़े रहकर अभिनय का अपना शाैक पूरा करना पड़ता है. अब इसे किस्मत ही कहना चाहिए कि उस भीड़ से उठ कर मुझे कुछ छोटी-छोटी भूमिकाएं करने का मौका मिला. यहां मेरी हालत उन क्लासों जैसी थी जिनमें हिस्ट्री और ज्योग्राफी, अर्थशास्त्र और समाज शास्त्र सभी कुछ पढ़ाया जाता है और जिनमें मास्टर जी कुछ सवाल पूछ कर चपत या छड़ी रसीद कर सकते हैं. पढ़ाई के समय में कुछ भी बता नहीं पाता था पर यहां मैं आसानी से छोड़ने वाला नहीं था क्योंकि यह काम मेरे शौक का था. इसमें मेरी तबीयत अनायास ही लगती थी. इसलिए फिर मुझे कुछ और बड़ी भूमिकाएं मिलने लगीं. जब पांच-सात फिल्मों में छोटा काम था तब तीन-चार फिल्में अपेक्षाकृत बड़े काम की भी मेरे पास थीं. यानी मैं छोटे-बड़े दाेनों तरह के काम के लिए साथ ही अनुबंधित किया जा रहा था.

कोई काम छोटा नहीं होता

एक बात, जिसका मैंने शुरू से ध्यान रखा, यह थी कि किसी भी तरह के काम को छोटा समझ कर इंकार न करो. काम न करके नाम बढ़ेगा यह तर्क मेरी समझ में नहीं आ सका. इसकी वजह यह भी हो सकती है कि औैर बहुत से लोगों की तरह मुझे शुरू में ही बड़ा काम पाने का सौभाग्य नहीं मिल सका. मैं छोटे रोलों के लिए ही चुना गया. मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं थी. मगर मुझे हैरत तब से होने लगी जब मुझे बड़ी फिल्में मिलने लगीं. अर्थात उसी स्तर का अभिनय मैं छोटी भूमिका में भी कर रहा था, बड़ी में भी. तब इस बात की कसौटी क्या है कि कौन अच्छा अभिनेता है, कौन नहीं? यहीं से मेरे मन में यह सवाल भी उठने लगा कि चरित्र कलाकार की भूमिका और नायक की भूमिका के बीच क्या मूल भेद है? अगर सचमुच कुछ भेद है तो विदेशों में प्रसिद्ध अभिनेता एक फिल्म में नायक, दूसरी में खलनायक औैर तीसरी में कोई चरित्र अभिनेता बने कैसे दिखाई देते हैं? और अगर नहीं है तो नायक की जगह चरित्र प्रधान फिल्में हमारे यहां क्यों नहीं बनतीं?

यह सवाल मैंने अपने यहां अनेक लोगों के सामने अनेक ढंग से रखा पर कोई निश्चित उत्तर मुझे कहीं से नहीं मिल सका. मैंने सोचा है कि विदेश में जहां ऐसा होता है वहां की रुचि, वहां की परिस्थितियांे का अध्ययन करके कोई नतीजा निकालने की कोशिश करूंगा. लोगबागों से जब मैं यह कहता हूं कि अमरीका में मुझे हालीवुड के अलावा और कुछ देखने की चाह नहीं और इंग्लैंड में मेरे लिए सिर्फ एक आकर्षण है स्टेज तो उन्हें मेरी बातें दिखावा लगती हैं. फिल्मों में अाने के पहले मैं नाटकों में काम करता रहा. जो लेश मात्र अभिनय मैं सीख पाया वह यहीं से. उस समय से मेरी इच्छा यह रही है कि दुनिया के श्रेष्ठ नाटक देखूं, रंगमंच के मशहूर कलाकारों से मिलूं. इसलिए किसी फिल्म की सिलवर जुबली की खबर से मुझे उतनी प्रसन्नता नहीं हुई जितनी किसी ड्रामे के सौ बार खेले जाने की खबर से होती है.

कोई भी यह पूछ सकता है कि इतनी फिल्में मैं स्वीकार क्यों करता हूं, जो मुझे ज्यादा व्यस्त कर देती हैं. सामान्य आदमी के मुकाबले कलाकारों की, सिर्फ फिल्मों में अभिनय करने वाले कलाकारों की हालत एकदम उलटी है. पढ़-लिख कर मैं प्रोफेसर बना होता तो आगे बढ़ कर यूनिवर्सिटी का बड़ा पद पाता, मेरे नाम का दूसरों पर प्रभाव पड़ता. डॉक्टर होता तो गंभीर रोगी मेरे हाथों अच्छे होते. वकालत में उलझे हुए केस मैं सुलझाने में माहिर होता जाता. अब ज्यों ज्यों मैं अभिनय जैसी गूढ़ कला को समझता जाऊंगा मेरी कद्र कम होती जाएगी. आज मुझे नायक लिया जाता है. कल चरित्र अभिनेता बना दिया जाऊंगा.  हो सकता है इसके योग्य भी न गिना जाऊं. यहां हर कलाकार का यही हश्र होता है. इसलिए जो थोड़ा-बहुत समय मिलता है, उसके हर मिनट का सदुपयोग कर लेने की इच्छा होना स्वाभाविक ही है. इसी प्रयत्न में यह कमी काम में आ जाती है कि कई फिल्मों में अभिनय एक सा लगता है.

चरित्रों का अभाव

इस कमी को दूर रख सकने का एक तरीका यह है कि कहानियों में विविधता हो ताकि अलग-अलग तरह के चरित्र अलग-अलग फिल्मों में मिलें. हमारी फिल्मों का नायक हर फिल्म में एक ही सा काम करता है. कहानी अगर ‘ऑफ बीट’, सही अर्थों में फिल्म लीक से हटी हुई, न हो तो नायक को कुछ करने को नहीं रह जाता. गा दो, मुस्करा दो, छेड़ो-रूठो-मनाओ. इसलिए नायक बनने के साथ-साथ मैं वह सब भी बन लिया जिसका मुझे मौका मिल सका-हास्य कलाकार, खलनायक, सहनायक और तलवारबाज. अपनी ओर से मैंने कभी किसी भूमिका को छोटी नहीं माना और न कभी किसी फिल्म को छोटी-बड़ी के पैमाने पर रखा. मेरा ख्याल है कि जहां कहीं भी कला का सवाल आता है, कोई वर्गीकरण बेमानी ही है. हर कोई अपनी और से सर्वश्रेष्ठ करने का प्रयत्न करता है लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं ही हो सकता कि कोरी कला कहीं जीवित नहीं रह सकती जब तक उसे व्यापार का आश्रय प्राप्त न हो.फिल्म जगत में यह बात सामने खुलकर ही नजर आती है.

नयों को अवसर की जरूरत

जिस तरह छोटी-बड़ी फिल्मों का वर्गीकरण किसी भी कलाकार के लिए किसी महत्व का नहीं होना चाहिए उसी तरह सहकलाकारों को भी किसी भी सीमा से मुक्त रखा जाना जरूरी है. आज नया हीरो नयी नायिका के साथ काम करने से हिचकिचाता है औैर नामवर नायिका नये आए अभिनेता को नायक लेने पर आपत्ति करती है. कलाकार नये निर्देशक से घबराते हैं, नामी निर्देशकों को नए कलाकार फिजूल मालूम देते हैं. यह परस्पर नहीं बल्कि स्वयं पर अविश्वास का प्रतीक है, अौर कुछ नहीं. यह दूसरों के सहारे खड़े होने का प्रयत्न है. इस बातों को भूलकर बस अपना काम मजबूत करने की काेशिश करनी चाहिए. ऐसा होगा तो कोई असफलता असफलता नहीं गिनी जाएगी. कोई हतोत्साहित नहीं हो सकेगा. फिल्म उद्योग का जो संकट है वह अविश्वास का संकट है. फिल्मों की कमियां ठीक तरह से समझने वाले लोगों की संख्या कम नहीं है. छोटे बजट की फिल्में बनाने के इच्छुक औैर नयों के हिमायती अनेक हैं पर परिस्थितिजन्य अविश्वास उन्हें मन की करने नहीं देता. विश्वास पैदा होने पर ही परिवर्तन आ सकेगा.

 

तू क्यों रोती है दुल्हन…

प्रदीप। माधुरी, १ ० जनवरी १९६८

 मीना कुमारी के बाग में मैंने – मुझे उसका नाम नहीं मालूम – वह पौधा देखा था, जिसके पत्तों का रंग मुस्कराहट की तरह दिलकश था और कोरे दुलहन की साड़ी की गोट की याद दिलाती थीं; बेसाख्ता खिंच कर मैं उस पौधे के करीब चला गया और तब…तब मैंने देखा कि उस पौधे के कलेजे में छलनी की तरह छेद थे.

हर जख्म के साथ तो ऐसा होता है कि बार-बार कुरेदा जाकर वह दुखना बंद हो जाता है! मीना के साथ क्यों ऐसा नहीं होता? क्यों हर बार वह फिर पूरे अपनापे से दुख को पलक-पांवड़े बिछाती है. जैसे यही अब प्राप्य है, यही उद्देश्य है, जीना अगर यही है तो आत्मा उड़ेल कर क्यों न जिएं?

क्या कुछ उसने नहीं झेला? सफेद कपड़े पहने और मुस्कराहट और अदब के मुखौटे पहने लोगों को अपनी तारीफ में शेर पढ़ते भी देखा है और – आखिर तो इन मुखौटों के पीछे आदमी भी जानवर है, प्राकृतिक, स्वाभाविक – यह बात भी दीवारों, कानों-जबानों, हवाओं से टकरा कर मीना के पास से गुजरी है कि ‘माफ कीजिए, पर मीना जी में अब वह बात नहीं रही.’ ‘अल्लाह! क्या हुआ है इन्हें! जब देखो, नशे में डूबी रहती हैं! लोगों से मिलने तक में कतराती हैं!’ ‘सुना आपने, अब मीना जी का फलां’ से चल रहा है! कम से कम अपनी पोजीशन का तो ख्याल करतीं!’ और भी न जाने क्या कितना कुछ कि जिसे सुनने के बाद हर कान बहरा हो जायेगा और दिल पत्थर. इतना होने के बाद कोई बर्फ की सिल पर लिटा दे, नाखून के पोरों में कीलें ठोक दे, तो ‘उफ’ नहीं निकलेगी. काश! मीना के साथ भी ऐसा होता!

पर हुआ तो है! अब उस पर बिजली गिरे तो उसकी आंख नहीं झपकेगी, मगर उसकी आया को कोई नींद से लगा भी दे तो वह बिगड़ खड़ी होगी. अब सहेली के पांव में कांटा लगने से और स्टूडियो के कारीगरों के मीना की गाड़ी के आगे नारियल फोड़ने से और किसी दिवंगत दोस्त का जिक्र छिड़ने से मीना की आंखों में आंसू छलछला जाते हैं. दर्द को महसूस करने का मीना का माद्दा इतना बड़ा है कि सर्वकालीन, सार्वजनीन हो गया है. और फिर कानों-जबानों से टकराकर लौटी खुसर-पुसर मीना सुनती है – ‘इतनी भी क्या भावुकता? कोई इतनी-इतनी बात पर रोता है! खुदा झूठ न बुलवाये, हमें तो भई, ढोंग लगता है!’

आपके दुख के लिए

ढोंग और मीनाकुमारी! चार साल की उम्र में जिसे घर के फाकों ने कैमरे के आगे ला खड़ा किया, जिसके रोने पर लाखों आंखे रोयीं और जिसके मुस्कराने का इंतजार उन्हीं लाखों आंखों ने तीस लंबे सालों तक किया, वह अब ढोंग कर रही है? किसी ने यह सोच कर नहीं देखा कि नशे में आदमी हंसता है तो हंसता जाता है, बात- बेबात; और नशा है होश खोने का नाम. और तीस साल तक रो कर भी होश खो जाता है और आदमी बात-बेबात पर रो पड़े तो… यह क्या ढोंग है?

इस सारे नाम और शोहरत (बस, इसके अलावा और कुछ नहीं) की वजह मीना कुमारी की कला नहीं है, न ही उसकी शकल. इसकी वजह आप हैं, जो सभ्य हैं, सुसंस्कृत हैं, जो खुले आम हंस तो सकते हैं, रो नहीं सकते. हंसना कमजोरी नहीं है, रोना कमजोरी है. आपने अपनी सारी कमजोरियों को जीतने का संकल्प किया है और इसलिए आप अपने दुख के लिए भी कोई और रोने वाला चाहते हैं – आप का यह काम मीनाकुमारी ने किया है और मेहनताने के तौर पर आपने उसे इतना नाम शोहरत, इज्जत दी है; बस न? इससे ज्यादा तो कुछ नहीं दिया? वह कुछ, जो उसे चाहिए था, जिसकी तलाश अब भी उसे है – जिसका नाम तो वह नहीं जानती, मगर- जिसके लिए वह रातों जागती है, जिसके लिए वह क्या से क्या हो गयी?

क्या चाहिए तुम्हें? हमसे कहो

ओह! माफ कीजिए, मैं भूल गया कि आपने मीना की मदद करनी तो चाही थी. उसकी सरपरस्ती की आत्म-प्रवंचना का सुख पाने के लिए आपने हमदर्दी दिखाते हुए मीना से पूछा था, ‘क्यों परेशान हो? क्या चाहिए तुम्हें? किस चीज की तलाश है, हमसे कहो!’

मीना ने कहा था, ‘जो भी तलाश मुझे है, है. मैं आपको क्यों बताऊं?’

आपने बड़प्पन का गौरव लेकर कहा था,

‘क्योंकि हम तुम्हारी मदद करने को तैयार हैं. तुम कह कर तो देखो!’

मीना ने पहले कुछ नहीं कहा था, क्योंकि जो तलाश उसे है, वह मांग कर हासिल करने की चीज नहीं है. फिर आपके बहुत उकसाने पर उसने बजाय आपके मुंह पर थप्पड़ मारने के कहा था, ‘नहीं, यह मर्द की तलाश नहीं है. मर्द की तलाश वह चीज ही नहीं, जिसके लिए कोई औरत परेशान होती है.’

मर्द और औरत

आपने समझने की कोशिश की? मर्द उस दोपाये जानवर का नाम नहीं है, जो बहुतायत से जरा सी कीमत पर प्राप्य है, जिसे आप रात-दिन देखते हैं. मर्द एक भावना का नाम है. और मर्द और औरत के बीच का रिश्ता? वह भी एक ‘फीलिंग’ है. न कि तौर-तरीका.

एक बार मीना ने कहा था, ‘पुराने जमाने से मर्द ने औरत को बराबरी का दर्जा देने की बखानी है, जबकि मैं नहीं मानती कि औरत किसी तरह से मर्द से कम होती हैं. ज्यादा होती है, यह कहूंगी तो फिर उलझाव पैदा होगा, इसे टाल ही जाऊं. और बराबरी का दर्जा देने के दंभ के पीछे की गयी जो साफ बेइज्जती है कि यूं तो औरत छोटी है ही…, उसका भी अर्थ कोई नहीं. कम से कम मैं किसी तरह खुद को मर्द से छोटा महसूस नहीं करती. मगर फिर भी मैं औरत हूं, जिसने हमेशा यह चाहा है कि मर्द उससे बड़ा हो. मेरा मर्द अगर कभी मेरे आगे रो दे तो मुझे उस पर बहुत प्यार आयेगा, पर अगर वह किसी और के आगे रो पड़े तो मुझे कभी बर्दाश्त नहीं होगा!’ आपने समझा? मीना का मतलब शरीर से मर्द या औरत होने से नहीं है, और जो भी हो. और मीना ने कहा भी उसकी तलाश, जिसके लिए वह रातों जागती है, मर्द की तलाश नहीं है. तो फिर? आपने अक्ल लगा कर कहा, ‘बच्चे की तलाश?’ (हा, हा! जैसे यह आपके बस की बात हो!)

नहीं. वह भी नहीं. मीना ने कहा, ‘मैं सारी दुनिया को झुठला सकती हूं, जो कहती कि औरत को ‘अपना’ बच्चा चाहिए होता है. मेरे घर में बच्चों की कमी नहीं और वे मुझे अपने बच्चों की तरह प्यारे हैं और उन्हें उनकी मां की तरह प्यारी हूं. इसमें शक नहीं कि अगर मेरे बच्चे होते…’

मीना चुप होकर सोचने लगी हैं… बेशकीमती शीशा हाथ से छूट गया. इंतजार ही रहा कि वह झन्ना कर दिल हिला देने वाली आवाज करेगा, मगर वह बेआवाज ही टूट गया. उस रात मीना कुमारी ने सपना देखा था; वहीं –मां सामने खड़ी है, हर बार की तरह चुपचाप, सर पर चूनर लिये, सफेद कपड़े पहने. निकाह के बाद वाली रात भी मां सपने में दिखी थी, मगर तब उसने सर पर लाल चूनर डाल रखी थी और कुरान शरीफ पढ़ रही थी. आज की तरह दीवार से सटी सिर झुकाये नहीं खड़ी थी. मां को इस तरह खड़ा देख कर मीना को घबराहट हुई. बत्ती जलाने की कोशिश की, मगर बेकार, मीना उठ कर मां के पास गयी – ‘मां! नहीं, यह मां नहीं है, यह तो मीना खुद है, और उसके मुंह पर लहू पुता हुआ है. मीना चीख कर बेहोश हो गयी और वहीं गिर पड़ी… सुबह लोगों ने उसे वहां से उठाया – मां बनने का हौसला टूट गया था, बेआवाज!

देखो मुन्ना! तुम्हारा दूल्हा आ गया

 फिर उस हौसले का सर बार-बार कुचला गया और फिर मीना ने अपने दरवाजे पर उसकी दस्तक पहचानी भी तो दरवाजा नहीं खोला. अब मीना को वह ख्वाब नहीं आता कि वह सफेद कपड़े पहने हुए बड़े-बड़े नक्काशीदार खंभों और प्राचीन मूर्तियों वाले विशाल मंदिर में चकित सी घूम रही है और मंदिर की छत खुली है, जिसमें से गिरते हुए आबशार में वह भीग रही है, उसका मन भी भीग रहा है. अब ख्वाब नहीं आते. अब नींद ही नहीं आती, वरना मीना की तमन्ना तो है कि एक बार फिर वह ख्वाब देखे और इस बार उसकी आंख न खुले ः एक बार उसने देखा था – सफेद संगमरमर का फैला हुआ फर्श, संगमरमर के सीधे-सपाट खंभे, संगमरमर की ऊंची आसमान जैसी छत, मीना सीधी बढ़ती हुई उस कोने में बैठे यहूदी जैसे शख्स के करीब चली जा रही है, जो एक मेज कुर्सी लगाये बैठा है… लो, उसकी मेज पर बहुत से फल रखे हैं, उसने मीना को एक सेब उठा कर दिया और इशारा किया, ‘वहां बैठ कर खाओ!’ वहां एक लाल रंग का कोच रखा है. मीना यंत्रचालित सी फल ले कर वहां बैठ गयी और तब देखा, मां भी पास बैठी है. ‘मां’ मीना ने कहा. मां कभी सपने में बोली न थी. आज पहली बार बोली, ‘वो देखो, मुन्ना तुम्हारा दूल्हा आ गया…’ मीना ने देखा, दूर दरवाजे के बाहर घोड़े पर उसका दूल्हा बैठा है… उसकी पीठ मीना की तरफ है, घोड़ा मचल रहा है…अभी वह घूमेगा और मीना को दूल्हे की शकल दिखेगी…, मगर तभी आंख खुल गयी. अपने ‘दूल्हे’ का मुंह ही मीना नहीं देख पायी, …और इस देखने न देखने में फल भी नहीं खा सकी – स्वप्न में फल खाना; शास्त्रों के अनुसार जिसका अर्थ गर्भ धारण करना होता है.

पर मीना ने कहा तो कि उसकी तलाश यह भी नहीं है ! ‘यह’ कभी तमन्ना थी, अब हसरत ही रह गयी है. मगर हसरतों का पूरा न होना कोई नहीं जीता, वह कुछ और जीता है, कोई आशा, कोई महत्वाकांक्षा.

बेशकीमती शीशा हाथ से छूट गया. इंतजार ही रहा कि वह झन्ना कर दिल हिला देने वाली आवाज करेगा, मगर वह बेआवाज ही टूट गया

एक बेचैन कस्तूरी मृग की तलाश

 कहते हैं, हम जिस तरह जीते हैं उससे अलग कुछ नहीं होते ः मीना ने अपनी जिंदगी यूं जी, जैसे वह उसकी अपनी न थी. कहते हैं, अभिव्यक्ति का भाषा से अच्छा माध्यम नहीं हैः मीना ने चुप रह कर भाषा को करारी मात दी है. कहते हैं, विरोधियों के खेमे में हिम्मत टूटती है, अपने घर में पैदा होती है. मीना ने उस घर में अपना आप न खोया, जहां उसका कोई न था और उस घर से निकल आयी, तो उसे लगता है, अब तो वह खुद भी अपनी नहीं है, बल्कि कोई बताये, क्या यह है भी – अगर उसकी तलाश न हो..!

अब यह बड़ी मुश्किल बात है कि वह कुछ खोज रही है, जिसका नाम-पता नहीं जानती. जानती तो है, पर यूं नहीं जानती कि किसी तरह बता सके – जैसे कस्तूरी मृग बेचैन सा किसी गंध को ढूंढ़ता फिर रहा हो… ; फिर यह कस्तूरी सिर्फ मीना के भीतर नहीं है – यह किसी रासायनिक प्रतिक्रिया की तरह किसी और कस्तूरी के संयोग से रंग लायेगी…

आपने मीना को बहुत सम्मान दिया – उसके बिना शायद उसका काम चल जाता ; उसे बहुत यश और धन मिला – धन कभी उसके पास नहीं रहा और यश को अपयश में बदलते पल भी नहीं लगता; उसकी ‘इमेज’ मीना कुमारी नहीं है, मीना कुमारी एक नाम विशेष, व्यक्ति विशेष है, जो प्यार करने की पहुंच के बहुत बाहर, बहुत बड़ा नजर आया या बहुत छोटा, बहुत अनुपयुक्त. मीना की तलाश यही है – अपनेपन की तलाश, स्नेह की, तादात्म्य की तलाश, जो मांगने की चीज नहीं है और मांगने पर मिलती है तो अहसान होती है…मीना अहसान नहीं उठा सकती.

वो लोग, जिन्होंने उस पर बेशुमार इल्जाम लगाये हैं, जज की तरह ऊपर की कुर्सी पर बैठे हुए लोग हैं, उन्होंने कहा कि मीना बहुत किताबी बातें करती है, शराब पीकर होश खोये रहती है, लोगों से मिलने में कतराती है, पुरुषों की तरफ जरा में झुक आती है, उसमें मातृत्व की क्षमता नहीं है

इन लोगों का कसूर नहीं, उस कुर्सी पर से मोटा हिसाब ही लग सकता है. सच पूछिए, तो गणित केवल सिद्धांत है, गणित कला नहीं है, जीवन या मुद्दा या भावना भी नहीं है. जज की कुर्सी से उतर कर वे लोग कठघरे में आ कर खड़े हों तो मैं उनसे पूछूं – उनमें कौन ऐसा है, जिसने किताब से व्यवहार नहीं सीखा है, जिसने शराब पी हो और खुद को न महसूसा हो, जो मीना के कतराने पर खुद कतरा कर नहीं निकल आया, उनमें से कौन वह पुरुष है, जिसकी तरफ मीना ने झुकाव दिखाया, या कौन है वह, जिसने खुद मीना की कोख से जन्म लेना चाहा?

सबसे बड़ी शिकायत

 पर मीना को शिकायत नहीं है. इस जिंदगी ने उसे जो दिया, वह मामूली से बहुत अलग था. उसे आदमी को पहचानने का मौका मिला है, जो सफेद कपड़े पहन कर हंसता मुखौटा लगाये हुए भी आदिम है, जो बड़ी मछली से डरता है और छोटी को निगल जाता है, जो प्यार भी ‘देने’ के दंभ से करता है और परायी आग पर ‘च् च् !’ करते हुए भी हाथ सेक लेता है. मीना ने यह सभी कुछ जी कर देखा है, और जब मैंने उससे पूछा, ‘अगर तुम्हें यह जिंदगी फिर से एकदम अपनी मर्जी के मुताबिक जीने का अख्तियार मिल जाये तो?’

मीना ने कहा था, ‘तो मैं फिर एक बार बिल्कुल इसी तरह जीना चाहूंगी. मुझे कोई शिकायत नहीं.’

इससे बड़ी कोई शिकायत आपने सुनी है? मीना मुस्करायी. उसके बगीचे में मैंने – मुझे उसका नाम नहीं मालूम – वह पौधा देखा था, जिसके पत्तों का रंग मुस्कराहट की तरह दिलकश था और जिसकी कोरें दुलहन की साड़ी की गोट की याद दिलाती थीं और जिसके कलेजे में छलनी से छेद थे – मैं यकीन के साथ कह सकता हूं, इस तरह मुस्कराना उसने मीना कुमारी से सीखा है.

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‘सेक्सुअलिटी से पुरुषों को ही क्यों परेशानी होती है?’

‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ के समय सब बोल रहे थे कि क्यों बना रहे हो. मत बनाओ. मुझे जितने ज्यादा लोग बनाने से मना करते हैं मुझे उतना ही लगता है कि मुझे यह फिल्म जरूर बनानी चाहिए.

एक समय था, जब सब लोग चाहते थे कि मैं कुछ और करूं. जितने लोग चाहते थे कि मैं रास्ता बदल दूं, मैं उन लोगों को छोड़कर अलग हो गया. आरती भी तभी छूट गई. उस समय मैं दबाव में फालतू-फालतू फिल्में लिखता था, सिर्फ इसलिए कि गाड़ी की किस्त भर सकूं. मैं तो गाड़ी में घूमता नहीं हूं. लाइफ स्टाइल वही था. घर भी उतना ही बड़ा चाहिए. अगर घर छोटा होता तो दबाव कम होता. मैं जितना फालतू काम करता, जितनी घटिया फिल्म लिखता, अंदर गुस्सा उतना बढ़ जाता. मैं अंदर ही अंदर ब्लेम करने लग गया था अपने चारों तरफ लोगों को. घर पर कोई काम नहीं करता था. सब लोग बैठे रहते थे, सब इंतजार करते थे कि मेरी फिल्म कब शुरू होगी. कोई काम नहीं करता था. ‘सरकार’ हुई तो उसमें केके निकल गया. मैं तो सबकी जिम्मेदारी लेकर चल रहा था. अंदर वो गुस्सा आ जाता है फिर. सब लोगों का अपना-अपना वजूद बन गया तो वही होता है. केके के पास पैसे तो मेरे पास क्यों नहीं? मैंने कहा, यार मैं तो इतने साल लेकर घूमा. नारियल पानी का बोझ मैं अपने कंधे पर लेकर घूमा. फिर धीरे-धीरे मैंने वे सब चीजें उठा कर फेंक दीं जो पीठ पर लेकर घूमता था.

हर फिल्म के साथ जो ग्रुप बना है, उससे मैं हर बार निकल गया. बाद में सब का कंसर्न एक जैसा हो जाता है. सब इस बात के लिए लड़ने लगते हैं कि हमारा पैसा कोई और खा रहा है. मैं कहता हूं कि खाने दे न यार, पिक्चर बनाने को मिल रही है.

जब मैं राइटर एसोसिएशन का मेंबर बनने जाता था तो वहां पर एक सरदार जी हुआ करते थे. वो मुझसे एक्स्ट्रा पैसा मांगते थे, ‘अच्छा बेटा, आपका ‘सत्या’ का नॉमिनेशन हमारे हाथ में है. ‘शूल’ का अगले साल आपको आठ हजार देना पड़ेगा.‘मैं बोलता था, भाड़ में जाओ, मुझे नहीं चाहिए अवॉर्ड. उस समय सब बोलते थे कि मैं बेवकूफ हूं. और तो और, कितनी बार मुझसे मेरा क्रेडिट तक ले लिया गया, लेकिन जिन लोगों ने क्रेडिट लिया, आज वे लोग कहां हैं? मेरी तो जिंदगी की आधी चीजें इसीलिए हुई हैं कि पैसा या ऐसी बाकी चीजें मुद्दा ही नहीं बनीं. अगर मुद्दा बनतीं तो मेरी आधी फिल्में नहीं बनतीं.

मेरे साथ दूसरी समस्या थी कि मैं बहुत ही बिखरा हुआ आदमी था. शादी जब हुई तो एक ही लड़की थी जो पसंद भी करती थी और शादी भी करना चाहती थी. जिस लड़की का पहली बार हाथ पकड़ा, उसी से शादी भी की. और शादी के बाद से ही गड़बड़ चालू हो गई. आरती की तरफ से कम, मेरी तरफ से ज्यादा. मैं थोड़ा बिखरने लगा था और बहुत ज्यादा बिखरने लगा था. मैं कनफ्यूज हो गया था. ‘सत्या’ तक सब ठीक था. मेरा वो केस तब से चालू हुआ जब ‘पांच’ बनी . मेरी जो ऐंठ थी, न जाने कहां-कहां ले गई. आरती तो मेरे हिसाब से हमेशा बहुत खयाल रखने वाली थी लेकिन इमोशनल कनेक्ट एक अलग होता है. मेरा कुछ चीजों को महत्व नहीं देना भी बहुत बड़ी समस्या रहा. पता नहीं, वही छोटे शहर से आना, ब्वॉयज हॉस्टल में पढ़ना, अचानक लड़कियों को देखना, ऐसा लड़का रहना जो अठारह-उन्नीस साल की उम्र में लड़की सिगरेट पिए तो कहे कि गलत बात है, हाथ पकड़े, कहे शादी कर लें, कहे नहीं करनी चाहिए. ऐसे आदमी से ऐसा आदमी बना जिसने ‘देव डी’ बनाई. मिडिल क्लास के एक छोटे शहर के आदमी ने अचानक एक ऐसी चीज को काबू किया जो खतरा भी थी और आकर्षण भी और रहस्य भी थी. आधी जिंदगी निकल गई वो रहस्य सुलझाने में कि क्या है, आखिर है क्या ये चीज.

उसी आधी जिंदगी में 2000-2001 था, जब मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था और कोई मुझे समझने वाला भी नहीं मिल रहा था. फिर ये होता है न कि कहीं मैं ही तो गलत नहीं हूं. रामू से मिलने से पहले मैं कहां शराब पीता था. सिगरेट भी नहीं पीता था. एकदम क्लीन था. तब मैं दुबला-पतला सा था. वो अलग ही है जोन, बहुत मुश्किल है अब वहां जाना. इतना जरूर बोल सकता हूं कि मैं वफादार नहीं रहा था. बहुत बुरी तरह बिखरा था. इमोशन चला जाता है. इमोशनली बिखरा हुआ था. मेरा ये था कि कोई ट्रेन की घटना होती थी कि ये आदमी गया, कहीं किसी के साथ सो के आ गया. मैं कहीं चला जाता था तो चला जाता था. मैं लौटता नहीं था. फिर लौटता था तो लौट के आ जाता था. फिर कब तक ऐसे कोई डील करेगा? फिर शराब में मैं बहुत बुरी तरह जा चुका था. तब मैं कहां होता था, मुझे नहीं मालूम. यह अंदर काम को लेकर भी था और आदमी को लेकर भी. वो हर चीज को लेकर था. मैं वो समझ नहीं पा रहा था. एक ही चीज मुझे पकड़े हुए थी, वो थी मेरी बेटी आलिया. आलिया थी, इसीलिए हम लोग इतना लंबा ला सके. एक होता है पति-पत्नी का रिश्ता, वो तो आलिया के जन्म के बाद ही खत्म हो गया था. हम वहीं अलग कमरे में रहते थे. वहीं गद्दे पर सोया रहता था, वहीं दारू पीता था, वहीं बातें करता था. लेकिन उससे पहले भी शायद आरती को मैंने कभी उस तरह से प्यार नहीं किया जिस तरह से उसने मुझे किया. तकलीफ भी उसकी थी, पैशन भी उसका था, प्यार भी उसका था मेरे प्रति. मेरा सब कुछ सिनेमा ही था.

कल्कि का महत्व यह रहा कि उसकी जिंदगी भी लगभग मुझ जैसी ही थी. वो भी बिखरी हुई थी. उसके मां-बाप का तलाक हुआ था बारह साल की उम्र में. वह अपनी मां की मां बनी हुई थी. मां को खाना खिलाना, मां को संभाल के बैठाना. कल्कि ने वो सब देखा है. कल्कि मेरी जिंदगी में आई तो उसमें क्या दिख रहा है? उसमें मुझे लगता है कि उसको ऐसा कोई चाहिए था जो उसका विरोध करे. मुझे कोई ऐसा चाहिए था जो मुझमें स्थायित्व लाए. उसने धीरे-धीरे मेरे सिस्टम से ड्रग्स और बाकी चीजों को निकाला, संयम लाई. यह निर्भरता निकालते ही मैं आजाद हो गया. फिर कल्कि की भी ऐंठ थी क्योंकि वो भी ऐसी चीजों से डील कर रही थी. सब उसको गोरी की तरह देखते हैं. वो गोरी भले ही है लेकिन पली-बढ़ी तो तमिलनाडु के गांव में ही. वो तो गोरी चमड़ी में ठेठ देहाती है. कोई तमिल बोलने वाला मिल जाए तो ऐसे घुलमिल जाती है कि जैसे उसके गांव का हो. वो तो फिट ही नहीं होती हाई सोसायटी में. न हाई सोसायटी में फिट होती है, न आम समाज में फिट होती है. वह इन सब चीजों से जूझ रही थी. उसकी ऐंठ को कंट्रोल करने में मेरी ऐंठ खत्म हो गई.

मेरी फिल्मों के लिए लोग कहते हैं कि कोई समाधान तो दिखाओ. मैं कहता हूं, आप समाधान किसके लिए ढूंढ़ रहे हो? समाधान दुनिया के लिए ढूंढ़ रहे हो तो मैं दुनिया को तो संतुष्ट नहीं कर सकता. क्या मैं खुद संतुष्ट होना चाहता हूं? नहीं. तब क्यों दिखाऊं? मुझे समस्या ज्यादा दिखानी है. मैं चाहता हूं कि लोग उसके बारे में सोचें और ज्यादा बहस करें. मैं नहीं चाहता कि मैं चैप्टर को वहीं बंद कर दूं और किताब खत्म होने पर आप बोलें कि अंत में अच्छा सॉल्यूशन था. वो मुझे नहीं करना है. ‘यलो बूटस’ में हमने शूट किया था कि वो किरदार अंत में मरता है. पिक्चर एडिट हुई तो हमने निकाल दिया उसका मरना. वो भीड़ में खो जाता है. लोग बोलते हैं, यार ऐसे आदमी को, साले को मारना चाहिए. मैं कहता हूं कि ऐसे आदमी अक्सर मरते नहीं हैं. उसी मोड़ पर मैं फिल्म को खत्म करना चाहता था. अगर उस किरदार को मार दिया तो कहानी उस लड़की की रह गई. जहां उस कैरेक्टर को नहीं मारा, वहां वो एक अलग लेवल पर चली गई कि ये सबकी प्रॉब्लम हैं और ऐसे लोग हैं अभी भी. यह डराता है. फिर वो एक आदमी की कहानी नहीं लगती, लोग उसको भूलते नहीं. वो बहुत जरूरी है मेरे लिए कि आदमी अपने अंदर ढूंढ़े. अपने अंदर का पाप ढूंढ़े या समस्या ढूंढ़े या समाधान ढूंढ़े.

मैं नहीं चाहता कि मैं चैप्टर को वहीं बंद कर दूं और किताब खत्म होने पर आप बोलें कि अंत में अच्छा सॉल्यूशन था. वो मुझे नहीं करना है

बाहर के दर्शकों की मेरे काम के प्रति जो प्रतिक्रिया रही है, वो हिंदुस्तान से ज्यादा अच्छी रही है. मेरी ‘देव डी’ सबसे ज्यादा सफल रही है लेकिन वो बाहर उस तरह नहीं सराही गई जिस तरह ‘ब्लैक फ्रायडे’ या ‘नो स्मोकिंग’ सराही गई थीं या ‘गुलाल’ भी.

पश्चिम में चीजों को देखने का तरीका अलग है. उनकी काम करने की पूरी संस्कृति भी हमसे अलग है. वहां पर निर्देशक अपना मॉनीटर खुद लेकर चलता है. उसके पास पांच स्पॉट ब्वॉय नहीं होते जो उसका सामान उठाएं और चाय पिलाएं. चाय भी लेनी होती है तो खुद जाकर लेता है. कैमरामैन अपना कैमरा खुद लेकर चलता है. चार अटैंडेंट नहीं चलते, फोकस कूलर नहीं चलता. साउंड वाला अपना साउंड का सामान खुद साथ लेकर चलता है. बारह लोगों की टीम होती है. जब मैं इंग्लैंड गया था और डैनी बॉएल को फोन किया तो वह बोला, ‘यार कल घर की टंकी ठीक करूंगा, इसलिए कल नहीं मिल पाऊंगा.’ मैंने पूछा, ‘आप ठीक करोगे? बोला, हां कौन ठीक करेगा?’ उसका ‘कौन करेगा’ इतना स्वाभाविक था कि मेरा घर है तो मैं ही ठीक करूंगा न. हमारे यहां ऐसा नहीं होता. मैं मुरारी को फोन करूंगा कि एक प्लंबर ढूंढ़ कर लाओ और टंकी ठीक करवा दो. ठीक करवाते समय भी मुरारी खड़ा रहेगा और मेरा सर्वेंट खड़ा रहेगा. वहां पर आदमी खाना खुद बनाता है, घर खुद साफ करता है. और जो घर साफ करते हैं या ड्राइविंग करते हैं, लोगों के काम करते हैं, वो हर घंटे 20 पाउंड मतलब 1400 रुपए एक घंटे के लेते हैं. यहां जितने भी बड़े लोग हैं, उनके घर में बाई आती है कपड़े धोने के लिए. अगर वो इतना ही आसान काम है तो खुद धो लें. वे पाले ही इसी तरह गए हैं. हमारे देश की समस्या यह है. यहां कोई भी कोई बात खड़े होकर समझना नहीं चाहेगा, चाहे उसे कैसे भी समझाया जाए. हर आदमी लाट साहब है. वो होटल में आकर चुटकी बजा कर वेटर को बुलाने वाला. वहां पर जाकर देखिए कि कोई भी वेटर को चुटकी बजा कर नहीं बुलाएगा. वहां वेटर का अपना व्यक्तित्व होता है. वो आपके ऊपर कमेंट भी करेगा, आपके जोक पर हंस भी देगा और आपके ऊपर जोक भी कर देगा.

यहां पर तो वेटर मतलब ऐसे ही मक्खी है, उसे फाड़ देते हैं हम लोग. यहां पर रिक्शा अगर ब्लॉक कर दे तो लड़ जाते हैं कि रिक्शा आ गया मेरी गाड़ी के सामने. वहां पर जो पब्लिक ट्रांसपोर्ट की गाड़ी होती है उसके लिए अलग लेन होती है. वे कहीं से भी यू टर्न ले सकते हैं. आम आदमी नहीं ले सकता. यह सब बहुत अंतर है हमारी संस्कृति में, सोच में और इसीलिए दर्शकों और समाज में भी.

प्रॉब्लम यह है कि हमारे यहां जब कोई बच्चा नहीं सीख रहा है तो उससे बच्चे को तोला क्यों जाता है? प्रॉब्लम मेरा वहां है. प्रॉब्लम यह है कि आप ने मापदंड तय कर लिया है और चाहते हैं कि सब उसमें फिट हों. मुझे उसमें दिक्कत नहीं है कि बच्चा जा रहा है और जाकर सीख रहा है. वो तो अच्छी बात है, बहुत बढ़िया बात है. लेकिन जो बच्चा नहीं सीख रहा है, वो मेरा विषय है. जो अपनी जिन्दगी ढर्रे पर चला रहा है, उसमें मुझे दिलचस्पी नहीं है. उसमें है, जो आदमी लीक से हट के जा रहा है और वो कुछ भी नहीं कर रहा है जो उससे उम्मीद की जा रही है. हम क्यों तय कर लेते हैं कि यह कुछ करेगा ही नहीं.

चीजों में परफेक्शन क्यों होना चाहिए? जैसे मेरी फिल्मों के गानों के लिए कुछ लोग बोलते हैं कि गाने एकदम सधे हुए नहीं है, और अच्छे गाए जा सकते थे. सबसे बड़ा प्रोडयूसर बोलता है, यार ये गाना वडाली ब्रदर से गवाओ तो एक अलग लेवल पर जाएगा. मैं कहता हूं कि लेवल पर नहीं ले जाना है मुझे. तानसेन थोड़े न बैठा हुआ है. तानसेन होता तो मैं गवाता किसी आज के तानसेन से. ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में हम लोगों ने एक हाउस वाईफ से गाना गवाया है, वहां के लोकल सिंगर से गाना गवाया है.

एक और दिक्कत है कि सब को हर बार सामाजिक क्रांति वाला कटाक्ष ही चाहिए. उन्हें कठोरता हजम नहीं होती. वो जो पहले था, वो गुस्सा था. ‘शूल’ का मनोज बाजपेयी हो या जो ‘पांच’ में था, वो गुस्सा था, जिससे युवा जुड़ते हैं. युवाओं को बार-बार वही चाहिए कि कोई उनके इतिहास पर बोले. उन्हें ‘यलो बूट्स’ की कठोरता हजम नहीं होती है क्योंकि उस में कोई सामाजिक स्टैंड लेने वाली चीज या क्रांति नहीं है. उसमें ऐसी सच्चाई है जिसे लोग स्वीकार नहीं करना चाहते. बहुत सारे दर्शकों को दिक्कत यही रही है कि आप अपनी फिल्मों में सेक्स को लेकर इतना असहज करने वाली बातें क्यों करते हैं? ऐसे लोग हमेशा पूछते हैं कि आपकी सेक्स लाइफ कैसी है? तो दमन उनके अंदर इतना भरा पड़ा हुआ है कि वे स्वीकार नहीं कर पाते. कहते हैं कि यह आपका चरित्र है. मैं कहता हूं कि हम विस्थापित हैं और हमारे विस्थापन में जिस तरह की सेक्सुएलिटी है, वही आएगी. बाहर ये चीजें इतनी नॉर्मल है कि चीजें बाहर आती नहीं है. वह मेरी फिल्मों में है क्योंकि हमारी जिन्दगी में है. आप सड़क पर चले जाइए, आप मंदिर-मस्जिद जाएंगे, आप देखेंगे कि कोई लडक़ी वहां से निकली या कुछ हुआ तो अचानक लोगों की नजरें कैसे घूम जाती हैं. आप गुजर रहे होते हैं तो देखते हैं लड़की को. क्यों देखते हैं? वो क्या चीज है, जिसे आपने दबाया है लेकिन फिर भी आप आकर्षित होते हैं. कहीं न कहीं वो आपके अंदर है. मुझे लगता है कि सेक्सुअली मैं बाकी लोगों से ज्यादा भाग्यशाली हूं क्योंकि मैं इस बारे में खुल कर बात कर सकता हूं.

जब आप चीजों को ऐसे देखते हैं कि यह गंदा है तो प्रॉब्लम हमेशा रहेगी. लेकिन एक बात देखिए, सेक्सुअलिटी के बारे में हमेशा आदमी को क्यों परेशानी होती है? औरतों ने कभी सवाल नहीं किया. ‘देव डी’ या ‘गुलाल’ देखने के बाद मुझे औरतों ने कहीं पर आकर पकड़ कर यह नहीं बोला कि ये क्या दिखाया तुमने और क्यों दिखाया? हमेशा आदमियों ने बोला है. यह एक तरह का तालिबान है.

 

‘आने वाला पल जाने वाला है’

सौ साल की कोई भी यात्रा शुरू तो शून्य से ही होती है. तब बंबई था पर बॉलीवुड नहीं. अरब सागर के तट पर बसी इस बस्ती में कुछ हजार किलोमीटर दूर से आने वाली लहरें टकरा रही थीं. अमेरिका के पश्चिमी तट से उठी कुछ लहरें उसके लिए कुछ संदेशा ला रही थीं. ये बर्बादी की सुनामी नहीं, हॉलीवुड जैसी नामी जगह से आ रही थीं. रचना का, प्यार का, सर्जना का एक बेहद रंगीन, मगर बस दो रंग में रंगा- काले-सफेद में रंगा एक सुंदर सपना लेकर. यह सपना खूब मुखर था पर था मौन. ये लहरें बड़े हौले-हौले, आहिस्ता-आहिस्ता कोई छह बरस में हॉलीवुड से बंबई आई थीं.

हॉलीवुड की इन नामी लहरों के कोमल स्पर्श से बंबई का अनाम घराना एक नया नाम पाने जा रहा था. उसे एक नया काम मिलने वाला था – काम नए नित गीत बनाना, गीत बनाकर जहां को हंसाना.

हॉलीवुड से लहरें चलीं सन 1906 में. सन 1912 में वे बंबई के किनारे लगीं. कैमरे का आविष्कार कुछ पहले हो ही गया था. पर वह निश्चल ठहरे हुए चित्र खींचता था. चलती-फिरती जिंदगी के चित्रों को यह कैमरा निश्चल रूप में कैद कर लेता था. और फिर उन चित्रों को स्मृतियों के विशाल संसार में आजाद छोड़ देता था. अब यही कैमरा हॉलीवुड में जीवन की गति को और आगे दौड़ाने लगा था.

यह धरती एक बड़ा रंगमंच है. इस पर अवतरित होने वाला विविधता भरा जीवन खुद एक विशाल नाटक है. इस नाटक में शास्त्रों की गिनती के नौ रसों से ज्यादा रस हैं, रंग हैं, भदरंग भी हैं. नायक-नायिका, खलनायक-नायिका जैसे पात्र-कुपात्र, खरे से लेकर खोटे गोटे सब कुछ है. कोई चार-पांच हजार बरसों से लोगों ने इस जीवन नामक लंबे धारावाहिक की न जाने कितनी कड़ियां देखी होंगी. उन्हें अपनी कुशलता से छोटे-छोटे नाटकों में बदला होगा. इन नाटकों को देखते, पढ़ते, सुनते हुए समाज ने अपने वास्तविक जीवन के नाटक की कथा को थोड़ा-बहुत ठीक-ठाक भी किया ही होगा.

देववाणी के नाटक ज्यादा नहीं होंगे. लिखे भी कम गए, खेले भी कम ही गए. पर एक अच्छे बीज की तरह देववाणी के इन नाटकों ने लोकवाणी के नाटकों की एक अच्छी फसल खड़ी कर दी. नाटकों में जैसे पंख लग गए. वे नौटंकी, जात्रा, यशोगान, भवई, कथककली, रासलीला, रामलीला बन कर जगह-जगह उड़ने लगे, जाने लगे.  नाटकों का यह रूप लोकरंजन, मनोरंजन के देवता का अंशावतार ही था.

इस देवता का पूर्णावतार हुआ 1912 में – जब हॉलीवुड की लहरों ने बंबई को बॉलीवुड में बदल दिया. लोक के मनोरंजन को ऐसी पांख लगी कि देखने वालों की आंखें खुली की खुली रह गई. फिर इन पंखों से किस्से कहानी की कल्पना ने ऐसी गति, ऐसी ऊंचाई पकड़ी कि उसने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

मनमोहक मनमोहन बॉलीवुड का गठबंधन राजनीति के गठबंधन से ज्यादा गोरा नहीं तो ज्यादा काला भी नहीं है. वह एक क्षण तक को पहचानता है

तब तक साहित्य को समाज का आईना कहा जाता था. बॉलीवुड ने इस आईने के आगे एक और आईना रख दिया. इन दो आईनों के बीच खड़े समाज को अब सचमुच अनगिनत छवियां दिखने लगी थीं. राजा हरिश्चंद्र से लेकर रावण और तो और रा.वन तक की छवियां सामने थीं. इसने समाज को पूरी दुनिया दिखा दी और फिर यह खुद पूरी दुनिया घूम आया. देश के दक्षिण से लेकर सात समंदर पार पश्चिम में, उत्तर में, पूरब में, और तो और तरह-तरह की खटपट में लगे पड़ोसी पाकिस्तान तक में इस बॉलिवुड ने झटपट अपनी धाक जमा ली.

आप चाहें तो चोरी-चोरी, चुपके-चुपके इस बॉलीवुड के दोष देखने निकलेंगे तो न जाने कितने दोष मिलते जाएंगे. सामने दोषों का पहाड़ खड़ा हो जाएगा. मुंबई में जमीन के ऊपर लोकल रेल की जितनी पटरियां दौड़ती हैं, उससे ज्यादा पटरियां बॉलीवुड के भीतर ‘अंडरवर्ल्ड’ की मिल जाएंगी. लेकिन गुण देखने चलेंगे तो गुणों की एक सुंदर नदी भी दोषों के इस पहाड़ में अविरल बहती मिल जाएगी.

साहित्य, संगीत, कला, छाया, विज्ञापन के सबसे सधे हाथों ने इस बॉलीवुड को न भूल सकने वाली सेवाएं दी हैं. यह बॉलीवुड का अचूक व्याकरण ही तो है, जो हमारे देश के प्यारे बच्चों को हिंदुस्तान की झांकी दिखाते हुए उन्हें ‘प्यारे बच्चो’ कहता है, ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ कहता है. उसे पता है कि हिंदी में संबोधन के बहुवचन में अनुस्वार या बिंदी नहीं लगती. व्याकरण के इस छोटे-से सबक में हमारे आज के कई बड़े पत्रकार, संपादक, साहित्यकार और सरकारी अधिकारी भी चूक कर जाते हैं.

किसी भी कैनवास पर एक करोड़ रुपये का कीमती दस्तखत कर देने वाले मकबूल फिदा हुसैन जैसे बड़े कलाकार भी बॉलीवुड के छोटे-छोटे पोस्टर पोतने से ही ऊपर उठे थे. यहीं के संगीत में पीछे बजने वाले दस-बीस सेकंड के सरोद और सितार बंबई की इस छोटी-सी गुड़िया की इतनी लंबी कहानी कह जाते हैं कि आज ‘सैम्संग गैलेक्सी’ जैसे महंगे गैजट, यंत्रों में रिकॉर्ड हो सकने वाले डेढ़ लाख गाने दो कौड़ी के साबित हो सकते हैं. गाने तो गाने यहां की पटकथाओं में लिखे गए संवाद तक गली मोहल्लों में लाउडस्पीकरों से शोलों की तरह बरसते रहे हैं.

इस बॉलीवुड में अंगों का प्रदर्शन मिलेगा तो आत्मा का दर्शन भी. वह जानता है कि ‘आने वाला पल जाने वाला है.’ उसने इन सौ बरसों में वह सब देखा-समझा है जो उसे बनाता है, बिगड़ता है. उसने खुद चोरी भी की है, अंग्रेजी, हॉलीवुड की फिल्मों से तो उसकी खुद की कीमती धरोहर भी चोरी गई है. वीडियो और फिर डीवीडी ने उसे तरह-तरह के झटके दिए हैं. इन सबको उसने गा-बजा कर ही सहा है.

इसे सबके साथ मिल कर काम करना आता है और इसे आता है सबसे काम भी लेना. निर्देशक तरह-तरह के नखरे वाले नायक-नायिका, कलाकार, गुमनाम एक्सट्रा, हाथी, घोड़े कुत्ते अपनी ढफली अलग न बजाने वाले संगीतकार, परदे के पीछे से, बिना दिखे अपनी सुनहरी आवाज देने वाले प्लेबैक सिंगर, परदे पर ओंठ चलाने वाले मुंह – वहां सब लोग एक बेहतर गठबंधन में काम करना जानते हैं. उनके लिए यह गठबंधन मजबूरी नहीं है. इस मनमोहक मनमोहन बॉलीवुड का गठबंधन राजनीति के गठबंधन से ज्यादा गोरा नहीं तो ज्यादा काला भी नहीं है. हमारे नेता, सामाजिक नेता भी आने वाले पल को तो क्या आने वाले कल को भी नहीं समझ पाते. वे तो आज को भी कल में बदलता नहीं देख पाते और जब वह बदल ही जाता है तो वे इस बदलाव को समझ नहीं पाते.

सौ साल का बॉलीवुड एक क्षण तक को पहचानता है. वह जानता है कि आने वाला पल (कल) जाने वाला है.