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परिणीति की परीकथा

अहमदाबाद, इंदौर, जयपुर और फिर दिल्ली. वे अपनी फिल्म प्रोमोशन के लिए धुआंधार दौरे करके इन जगहों से लौटी हैं. यह यशराज फिल्म स्टूडियो है- सपने देखने वालों का तीर्थ और 24 साल की परिणीति चोपड़ा फिलहाल इसी जगह अपने सपने सच होते हुए देख रही हैं.

प्रियंका चोपड़ा की यह चचेरी बहन एक साल पहले लंदन से मुंबई लौटी थीं. वे भी उन हजारों भारतीय प्रवासियों में शामिल थीं जिन्हें वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते भारत वापस लौटना पड़ा. इसे संयोग माना जाए या अच्छी किस्मत, उन्हें तुरंत ही यशराज फिल्म्स की मार्केटिंग टीम में मिड लेवल एक्जिक्यूटिव की नौकरी मिल गई. फिल्मों में काम करने के सपने देखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए परिणीति से जलन की यह पर्याप्त वजह हो सकती है कि मार्केटिंग में नौकरी करने वाली इस लड़की को कुछ ही दिनों बाद आदित्य चोपड़ा की तीन फिल्मों के लिए अनुबंधित किया गया है. परिणीति के लिए सुखद संयोगों का चक्र शायद अभी रुका नहीं है क्योंकि इसी महीने की 11 तारीख को उनकी फिल्म इशकजादे रिलीज हो चुकी है.

आज के व्यस्त दिन में वे 18 इंटरव्यू दे चुकी हैं और 19 वें में हमारे साथ हैं. इसके बाद भी उनमें हम वह झलक नहीं देख पा रहे जो आम तौर पर बॉलीवुड सेलीब्रिटियों में देखने के आदी हैं. परिणीति उस खूबसूरत लड़की की तरह हैं जिसे अपने किशोरवय में अचानक किसी दिन एहसास होता है कि वह खूबसूरत है और ढेरों लोग उसकी तरफ ध्यान देते हैं. हर इंटरव्यू के बाद वे कॉन्फ्रेंस रूम से बाहर भागते हुए जाती हैं. कॉरीडोर में पुरानी हिंदी फिल्मों के गाने गाती हैं. इसी उत्साह के साथ वे इशकजादे की टीम के सदस्यों के साथ हंसी-मजाक करती हैं और बाहर उनका इंतजार कर रहे पत्रकारों के साथ हंसते-मुस्कराते हुए बात भी. उनकी एजेंट पारुल हमें बताती हैं, ‘परिणीति को आप हमेशा इतने ही अच्छे मूड में देखेंगे.’

यशराज फिल्म की पूरी मशीनरी प्रतिभावान युवाओं के हाथ में है. इनके साथ पूरी तरह से घुल-मिलकर काम कर रही परिणीति को देखकर यह यकीन करना मुश्किल होता है कि वे फिल्मों में नई हैं. हालांकि उनके सहयोगी मानते हैं कि वे कुछ समय पहले तक खुद को ऑफिस के माहौल में ढाल नहीं पाती थीं. बेसिरपैर यहां-वहां घूमने की प्रवृत्ति, सहयोगियों से बेहतर काम लेने के लिए उनके काम में हस्तक्षेप और कहीं भीतर लाइमलाइट में आने की इच्छा उन्हें अक्सर चलायमान रखती थी.

‘मार्केटिंग की लड़की और फिल्म की हीरोइन?’ आदित्य चोपड़ा को पहली बार में यह निहायत ही बेतुकी सलाह लगी

लगभग छह महीने पहले की बात है जब परिणीति ने यशराज फिल्म्स की नौकरी छोड़ने का फैसला कर ही लिया था. वे एक एेक्टिंग स्कूल में दाखिला लेना चाहती थीं. तभी बैंड, बाजा, बारात के निर्देशक मनीश शर्मा ने आदित्य चोपड़ा को यह सलाह दी कि उन्हें यशराज की किसी फिल्म में परिणीति को लेना चाहिए. ‘मार्केटिंग की टीम से कोई हीरोइन!’ आदित्य चोपड़ा के लिए तब  यह एक बेतुकी सलाह ज्यादा कुछ नहीं थी. यह समझने के बाद की इस नई लड़की को फिल्म में काम करने का मौका तभी मिल सकता है जब वह फिल्म की रील में दिख जाएं, मनीष ने परिणीति को सलाह दी कि वे यशराज फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर से मिले और उनसे अपने एक्टिंग करियर पर ‘सलाह’ मांगे. परिणीति चहकते हुए बताती हैं, ‘ उस दिन हम कैमरे के सामने बस यूं ही घूम रहे थे. मैंने जब वी मैट की कुछ लाइनें कैमरे के सामने बोलीं और फिर वहां से निकल गई. अगले दिन मुझे बुलाया गया और मनीष ने बताया कि यशराज के साथ तीन फिल्मों के लिए मुझे चुना गया है. मेरी समझ में नहीं आया कि क्या करूं. मैंने पूछ भी लिया कि, अब मैं क्या करूं?’ परिणीति हंसती हैं. वे हमें कैमरे के सामने किए अपने एेक्ट को दोहराकर बताती हैं. वे खुद अंबाला की रहने वाली हैं इसलिए उन्होंने जब वी मैट  की गीत- एक पंजाबी लड़की जो बेहद बातूनी है, का किरदार ऑडिशन के लिए चुना था. लेडीज वर्सेज रिकी बहल में डिंपल चड्ढा की भूमिका के लिए गीत के किरदार का चुनाव काफी चतुराई भरा फैसला साबित हुआ. लेडीज वर्सेज रिकी बहल  में अपनी भूमिका पर बात करते हुए परिणीति कहती हैं, ‘आप मुझे आत्मकेंद्रित समझ सकती हैं लेकिन रिकी बहल… फिल्म का मैं महज पांचवां हिस्सा नहीं थी.’ वे यह बात समझती हैं कि उनका किरदार किसी स्टार के लिए नहीं लिखा गया था. परिणीति मुस्कुराते हुए बताती हैं, ‘ इस बात का मुझे कोई तनाव नहीं था कि सिर्फ एक पखवाड़े पहले तक मैं अनुष्का और रणवीर के लिए पब्लिसिटी का काम संभाल रही थी या यह कि मेरे अलावा फिल्म में तीन और खूबसूरत महिलाएं हैं, जिनमें मुझे एक छोटे शहर की लड़की का किरदार निभाना है. मार्केटिंग के पेशे से ऐक्टिंग में घुसना एक अजीब बदलाव था लेकिन मुझे यह पता था कि यशराज के साथ काम कर रही हूं.’

इस फिल्म में डिंपल चड्ढा का गंवईपन इतनी सहजता के साथ उनके अभिनय में दिखता है कि सीन में आते ही दर्शक उनके संवादों को सुनने का इंतजार करते हैं. और यही वजह रही कि अपनी पहली फिल्म में ही उन्हें पिछले साल की सर्वश्रेष्ठ नवोदित कलाकार श्रेणी के 11 पुरस्कार मिले. और इशकजादे  की मुख्य भूमिका भी. अब तक अपने करियर के प्रति उतनी गंभीर नहीं हो पाई परिणीति के लिए इशकजादे  की जोया का किरदार बेहद महत्वपूर्ण था, यह बात उन्हें तुरंत ही समझ में आ गई. इस फिल्म के लिए अपने नए लुक पर बात करते हुए वे बताती हैं, ‘ मुझसे किसी ने नहीं कहा था कि जोया को हॉट दिखना चाहिए लेकिन मैंने इस रोल के लिए अपना वजन कम किया क्योंकि यह किरदार बहुत एनर्जेटिक है. जोया एक मजबूत लड़की है. परमा (अर्जुन कपूर) जब उसे बंदूक दिखा रहा है तब आप इस लड़की के घूरने के अंदाज से ही समझ सकते हैं कि वह किरदार कैसा है. अब ऐसी लड़की कुछ मोटी हो तो कितनी अजीब लगेगी.’

लेडीज वर्सेज रिकी बहल  की सफलता के बाद परिणीता का सबसे बड़ा खर्च एक नए अपार्टमेंट में शिफ्ट होने पर आया है. ऐसा अपार्टमेंट जहां से समंदर दिखाई दे. यानी मुंबई में एक मुकाम पर पहुंचने की निशानी. हालांकि बाहरी दुनिया के लिए उनके फिल्म इंडस्ट्री में पहुंचने की सबसे बड़ी निशानी ये हो सकती थी कि वे हिंदी फिल्मों की बाकी हीरोइनों जैसे रटे रटाए जुमले इस्तेमाल करें लेकिन ऐसा है, नहीं. फिलहाल  वे अपनी दुनिया में अचानक आए इस बड़े बदलाव से लगभग अवाक दिखती हैं. अपने नए घर के बारे में परिणीति की बातें इस ओर इशारा भी करती हैं, ‘ अरे उस घर में तो अभी किराये पर रह रही हूं. लेकिन अब मैं पैसे कमा रही हूं इसलिए इसे खरीद भी सकती हूं…. बहुत बड़ा घर है.’ इस बात में ‘बड़ा’ शब्द को वे खूब खींचकर बोलती हैं. बिलकुल एक स्कूल की लड़की की मासूमियत के साथ. परिणीति अपने आसपास से गुजरने वाले लोगों को, जो उन्हें ध्यान से देखने और पहचानने की कोशिश करते हैं, के पास जाकर खुद बताती हैं कि वे परिणीति हैं. वे कहती हैं, ‘ अरे अभी मैं उस मुकाम पर नहीं हूं कि अपना शिष्टाचार भूल जाऊं.  मैं यह उम्मीद करती हूं कि ऐसा कभी नहीं होगा. मुझे लगता है कि जिस दिन मैंने जिंदगी के प्रति लापरवाही बरती, वह मुझसे छिटक जाएगी.

‘इस क्षण वे रुकती हैं और दार्शनिक होते-होते खुद को संतुलित कर लेती हैं. इंटरव्यू खत्म हो रहा है और हम उनकी अगली हरकत के इंतजार में हैं. वे बाहर देखती हैं और उन्हें इशकजादे के कोरियोग्राफर दिख जाते हैं. यानी अगला व्यक्ति जिसके साथ वे मजाक करने के मूड में दिखने लगी हैं. और हम फिर यह सोचने लगते हैं कि सिर्फ जुमलों में ही नहीं बल्कि ये लड़की अपनी हरकतों में भी बॉलीवुड की परंपरागत नखरे वाली हीरोइनों से अभी बिलकुल जुदा है.

चंबल घाटी की ‘बागी’ सभ्यता

उत्तर भारत में बुंदेलखंडी ही शायद ऐसी बोली होगी जिसका लहजा और शब्द बाहरी लोगों को अभद्र और अक्खड़ लगते हों. हम चंबल में हैं. और हर बार लोगों से बातचीत में यह महसूस कर रहे हैं. मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं में फैले ये बीहड़ उतने उजाड़ नहीं हैं जितने यहां से गुजरने वाली ट्रेनों से दिखते हैं. पर यहां की जटिल भौगोलिक संरचना बीहड़ों के बीच बसे गांवों तक पहुंचना मुश्किल बना देती है. हमें मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में बसे मुरावन गांव तक जाने के लिए जंगल में लगभग 12 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. गांव में घुसते ही हम अपनी कल्पनाओं वाले चंबल में पहुंच जाते हैं.

डाकू पप्पू गुर्जर ने अपनी गैंग की दहशत फैलाने के लिए मोहर सिंह के हाथ और नाक काटकर पुलिस अधीक्षक को भिजवा दिए

पिछले साल अक्टूबर माह में पप्पू गुर्जर नाम के एक डाकू ने मुरावन गांव के मोहर सिंह के दोनों हाथ और नाक काट दिए थे. हम जब उनके घर पहुंचते हैं तो लगभग धमकी भरे अंदाज में बताया जाता है कि हम मोहर सिंह से नहीं मिल सकते. बोली का उजड्डपन और डराने वाला अंदाज अब लोगों के व्यवहार में खुलकर दिखता है. तमाम तरह की आशंकाओं के बीच गांव के एक बुजुर्ग बताते हैं, ‘डकैतों ने हमारा जीना दूभर कर दिया है. जब से पप्पू गुर्जर ने मोहर के हाथ काटे हैं तब से लोग बहुत डरे हुए हैं. उसने धमकी दी है कि उसके गिरोह के सरगना राजेंद्र गट्टा के नाम का चबूतरा मुरावन में नहीं बना और दूसरी मांगें पूरी नहीं हुईं तो वह हमारे और हतेड़ी गांव के सभी लोगों को मार डालेगा.’

डकैत पप्पू गुर्जर चंबल के डाकुओं की फेहरिस्त में शामिल सबसे ताजा नाम है. वह यहां के एक दुर्दांत डाकू राजेंद्र गुर्जर उर्फ गट्टा का भाई है. गट्टा 2009-10 के दौरान मध्य प्रदेश में श्योपुर, शिवपुरी और अशोकनगर जिले के साथ-साथ राजस्थान के धौलपुर, बारां और सवाई-माधोपुर जिलों में सक्रिय इनामी डकैत था. दर्जनों हत्याओं, अपहरणों और डकैतियों के आरोपित गट्टा की उसी के गैंग के सदस्यों ने हत्या कर दी थी. जनवरी, 2011 में मुरावन गांव के पास हुए इस हत्याकांड के बाद पुलिस ने मंदिर से गट्टा की लाश बरामद की थी. इसके बाद गट्टा का भाई पप्पू इस गैंग का मुखिया बन गया. चंबल रेंज के पुलिस उपमहानिरीक्षक डीपी गुप्ता बताते हैं, ‘इस गिरोह ने एक राजस्थानी व्यापारी का अपहरण किया था. उसको छोड़ने के बाद मिली बीस लाख रुपये की रकम डाकुओं के बीच लड़ाई का कारण बन गई जिसमें गट्टा की हत्या कर दी गई.’ पप्पू गुर्जर का कहना है कि उसके भाई की लाश के पास लगभग तीन लाख रुपये, पांच तोला सोना और 159 जिंदा कारतूस थे और इस सामान को मुरावन गांव के लोगों ने चुरा लिया है.

इसी वजह से पप्पू गुर्जर ने मोहर सिंह के हाथ-नाक काटकर श्योपुर के जिला पुलिस अधीक्षक महेंद्र सिंह सिकरवार को भिजवाए थे. इसके साथ ही उसने एक पत्र भी भेजा जिसमें धमकी दी गई थी कि यदि गट्टा की लाश के पास से उठाया गया सामान वापस नहीं किया गया तो वह मुरावन और हतेड़ी गांव के सभी लोगों की हत्या कर देगा. हतेड़ी, मुरावन से करीब आठ किमी दूर स्थित एक आदिवासी गांव है जहां के लोगों से डाकू आए दिन रसद की मांग करते रहते हैं. पप्पू ने मुरावन में राजेंद्र गट्टा के नाम पर एक चबूतरा बनवाने के अलावा उसकी बरसी पर गांव में भोज करवाने की मांग भी रखी थी. इन धमकियों के चलते नवंबर, 2011 में हतेड़ी गांव में रहने वाले सहरिया आदिवासी अपना गांव, घर और खड़ी फसल छोड़कर वहां से पलायन कर गए.

इस मामले पर हुई पुलिस कार्रवाई और वर्तमान स्थिति के बारे में बात करते हुए गुप्ता कहते हैं, ‘हमने पूरे इलाके की सुरक्षा बढ़ाने के साथ-साथ मुरावन और हतेड़ी में कुछ सिपाही तैनात किए हैं. गट्टा की हत्या के बाद इस पूरी बेल्ट में पप्पू गुर्जर और कल्ली गुर्जर, दो सबसे प्रमुख गैंग सक्रिय हैं. हमारी एंटी डकॉइट (डकैत उन्मूलन) टीम इनके खिलाफ रणनीति बना रही है और जल्दी से जल्दी हम इन्हें पकड़ने की तैयारी में जुटे हैं.’

महिलाओं का डाकू गिरोहों से जुड़ना उनकी प्रतिष्ठा का विषय तो था लेकिन बाद में यही इन गिरोहों के पतन का कारण भी बना…आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें उत्पीड़न, प्रेम और पराभव 

मगर पुलिस के इन आश्वासनों के बावजूद हतेड़ी के लोगों के मन में बैठे भय को आसानी से महसूस किया जा सकता है. मुख्य सड़क मार्ग से 18 किलोमीटर दूर पालपुर-कूनो जंगलों के बीच कूनो नदी के किनारे बसे हतेड़ी में कभी सहरिया आदिवासियों के 40 परिवार रहा करते थे. अब यहां सिर्फ दस परिवार बचे हैं. गांव के मंठा आदिवासी बताते हैं, ‘ हम डकैतों से बहुत परेशान हैं. वे जब चाहे आकर आटा-चावल और रसद मांगते हैं. यहां हमें ही दो जून की रोटी मुश्किल से मिल पाती है. उन्हें कहां से देंगे. न दें तो गोली मारने पर उतारू हो जाते हैं. दे दें तो कल को पुलिस पकड़कर ले जाएगी. हम गरीबों को दोनों तरफ से गोली ही खानी है.’ गांववालों का कहना है कि पिछले साल पप्पू गुर्जर के डर से उन्हें अपनी खड़ी फसल छोड़कर गांव से भागना पड़ा था. गांव से पलायन कर चुके परिवारों के बारे में बात करते हुए बनिया आदिवासी कहते हैं, ‘ उस दिन शाम को लगभग आठ बजे पप्पू गुर्जर अपने साथियों के साथ यहां आया और मोहर सिंह के हाथ-नाक काट डाले. उसने हम लोगों से पैसे भी मांगे. हमारे पास तो कुछ है ही नहीं इसलिए जान बचाकर हम लोग यहां से भाग गए. अभी यहां आठ-दस परिवार ही वापस लौटे हैं.’

मुरावन और हतेड़ी पिछले साल इसलिए थोड़े-बहुत चर्चा में आए क्योंकि यहां हुई डाकुओ से जुड़ी कुछ घटनाएं ठीक वैसी ही थीं जैसी अतीत में हुआ करती थीं. लेकिन इनके अलावा भी यहां कई ऐसे गांव हैं जहां देश के संविधान से ज्यादा डाकुओं का कानून चलता है.

अपनी ही तरह के इस सामाजिक-भौगोलिक क्षेत्र को कुख्यात बनाने वाली वजहों में से एक सबसे महत्वपूर्ण यहां से बहने वाली चंबल नदी भी है. इंदौर के पास बसे एक शहर महू से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित विंध्याचल की पहाड़ियां में इस नदी का उदगम स्थल है. इसके बाद राजस्थान के कुछ हिस्सों को पार करते हुए चंबल मध्य प्रदेश के भिंड-मुरैना क्षेत्रों में बहती है, फिर उत्तर प्रदेश के इटावा जिले की तरफ रुख कर लेती है. पानी के कटाव से चंबल के किनारे-किनारे मीलों तक ऊंचे-ऊंचे घुमावदार बीहडों की संरचना हुई है. ये दशकों से डाकुओं के छिपने के अभेद्य ठिकाने रहे हैं.

70 के दशक में सबसे कुख्यात रहे डाकू मलखान सिंह कहते हैं कि चंबल में आज असल बागी होते तो इतनी अराजकता नहीं होती’…आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें ‘पुलिस और नेता नहीं चाहते कि बागी खत्म हों’

पिछले कुछ समय की बात करें तो मध्य प्रदेश में डाकुओं का प्रभाव बुंदेलखंडी इलाकों, रीवा-सतना-छतरपुर से बढ़कर गुना-अशोकनगर तक फैल गया है. पांच महीने पहले ही सतना के जंगलों में हुई पुलिस मुठभेड़ में सुंदर पटेल उर्फ रगिया डाकू मारा गया था जिसका खौफ इन सभी इलाकों में था. इसके पहले इन इलाकों से छिटपुट डकैतियों की खबरें ही आती थीं. रगिया ही ठोकिया के बाद कुख्यात डकैत ददुआ के गैंग को चला और बढ़ा रहा था. आजकल उसकी जगह  सुदेश कुमार उर्फ बालखड़िया ने ले ली है. इस गैंग में शामिल पीलवन उर्फ मदारी गौंड और छुग्गी पटेल को काफी दुर्दांत डाकू माना जाता है.

चंबल घाटी और उससे लगे इलाके की सबसे दुखती रग यह है कि यहां डाकुओं की सक्रियता और उनके भय को आम ग्रामीणों के बीच तो हमेशा देखा जा सकता है लेकिन उनकी चर्चा – मीडिया में या राजनीतिक स्तर पर – तब ही होती है जब पुलिस मुठभेड़ में कोई बड़ा डाकू मारा जाए, आत्मसमर्पण कर दे या फिर कोई बड़ी वारदात को अंजाम दे दे.

हाल-फिलहाल यहां पुलिस मुठभेड़ और वारदातों का सिलसिला तो काफी बढ़ा है लेकिन डाकुओें के आत्मसमर्पण की घटनाएं वैसे नहीं होती जैसा चंबल का इतिहास रहा है. नब्बे के दशक से साल दर साल मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश पुलिस मुठभेडों में डाकुओं को मारती रही है. पिछले एक दशक में पुलिस ने यहां जगजीवन परिहार, निर्भय गुर्जर, गड़रिया बंधुओं जैसे कई दुर्दांत डाकुओं को मुठभेडों में मारा है लेकिन उसके बाद भी यहां डाकुओं और उनके गिरोहों की कभी कमी नहीं रही. इस बीच जो हुआ वह यह कि चंबल की धरती ने अपने यहां पैदा होने वाले अपराधी सरगनाओं को ‘स्वाभिमानी बागी’ से ‘स्वार्थी डाकू’ और ‘स्वार्थी डाकू’ से ‘सस्ते शहरी उठाईगीरों’ में तब्दील होते देखा. अन्याय और शोषण के खिलाफ बंदूक उठाने वाले चंबल के तथाकथित बागियों की छवि और यहां की सामाजिक स्थितियों ने अपराध पर नैतिकता का ऐसा मुलम्मा चढ़ाया कि यह पूरा क्षेत्र डाकुओं की उर्वरा भूमि सरीखा बन गया.

अस्सी के दशक के डाकुओं और 2012 के डकैतों की कार्यप्रणाली और तकनीक में बड़े परिवर्तन आए हैं. चंबल रेंज के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक रहते हुए डकैतों से लगभग 25 मुठभेड़ करने वाले संजय राणा इस पूरे दुष्चक्र पर बात करते हुए कहते हैं, ‘ चंबल में डाकुओं के लगातार पैदा होने के पीछे मीडिया की बड़ी भूमिका रही है. मीडिया ने इनको बागी और अन्याय के खिलाफ लड़ने वाला रॉबिनहुड बनाकर मामला बहुत बिगाड़ दिया. इसमें कोइ शक नहीं कि 60 -70 के दशक के कुछ डाकू ऐसे थे जिन्होंने अपने जीवन में अत्याचार झेले पर ऐसे लोग बहुत कम हैं. ज्यादातर मामलों में डाकुओं ने मीडिया द्वारा गढ़ी गयी अपनी रॉबिनहुड वाली छवि का इस्तेमाल आसानी से धन कमाने के लिए किया. इस तरह धीरे-धीरे डकैती एक ऐसे व्यवसाय में तब्दील हो गई जिसमें निवेश सिर्फ एक बंदूक का था. पहले ये लोग ‘पकड़’ से फिरौती वसूलते थे. अब सीधे-सीधे शहरी ठगों और गुंडों की तरह व्यवहार करने लगे हैं. नए लड़कों को यह आसानी से पैसा कमाने, शराब पीने, गांव से लड़कियां उठवा लेने, अपनी जाति का हीरो बन जाने और मीडिया में गरीबों के मसीहा के तौर पर मशहूर हो जानेवाला पेशा लगने लगा. इसलिए बड़ी संख्या में नौजवान लड़के डाकू बनते रहे.’

250 हत्याओं के आरोपित रहे मोहर सिंह का कहना है कि चंबल के लोग अन्याय बर्दाश्त नहीं कर पाते…आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें ‘चंबल का पानी बहुत तेज है’

चंबल के डाकुओं में दिलचस्पी रखने वाले लोगों में से ज्यादातर के लिए इनका इतिहास मान सिंह, मलखान सिंह, फूलन देवी व हाल के कुछ चर्चित डाकुओं तक ही सीमित होता हैै. लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक चंबल में लूटमार की प्रवृत्तियां सैकडों साल पहले से मौजूद रही हैं. डाकुओं पर कई लोकप्रिय उपन्यास और कहानियां लिखने वाले स्थानीय लेखक मनमोहन कुमार तमन्ना बताते हैं, ‘ यहां के रहस्यमयी बीहड़ सदियों से गोरिल्ला युद्धों के सबसे उपयुक्त स्थान रहे हैं. हर्षवर्धन के काल में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्येन सांग को वर्तमान धौलपुर के आसपाल लूट लिया गया था. पृथ्वीराज चौहान ने भी दिल्ली में हारने के बाद चंबल में ही रहकर बागी का जीवन बिताया था.’

चंबल में घूमते हुए मुगलकाल से जुड़ी एक मशहूर किवदंती भी सुनने को मिलती है. कहा जाता है कि एक यात्रा के दौरान नूराबाद के आसपास मुगल बादशाह अकबर के काफिले के 40 घोड़े चुरा लिए गए थे. जब सेना के कुछ लोग इन्हें नहीं ढूंढ़ पाए तो अकबर ने उन्हें फांसी लगवा दी. आज भी यहां के स्थानीय लोग गर्व से बताते हैं कि वे घोड़े गुर्जरों ने चुराए थे इसलिए अकबर के सैनिक उन्हें नहीं ढूढ़ पाए.

भारत में अंग्रेजों की हुकूमत के दौर में गुर्जर और जाटों के साथ एक नई जाति पिंडारी के डकैतों ने चंबल को अपना ठिकाना बनाया था. कैंब्रिज युनिवर्सिटी से प्रकाशित अपने शोधपत्र – ए नोट ऑन डकॉइट्स ऑफ इंडिया, में लेखक जॉर्ज फ्लोरिस लिखते हैं कि 1920 के आसपास सक्रिय हुआ डोंगर-बटूरी गैंग चंबल का पहला व्यवस्थित गैंग था. वे लिखते हैं, ‘ शुरुआती दौर में डाकू जंगल से गुजर रहे ऊंटों और घोडों के काफिलों को लूट लिया करते थे. चंबल में 1940 के आसपास वह दौर भी आया जब कई राजा डाकू बने और इनमें ठाकुर मानसिंह का नाम सबसे पहले आता है.’

गुलाम भारत से लेकर सन 1960 तक सक्रिय रही चंबल के डाकुओं की इस पहली पीढ़ी में डाकू मान सिंह, तहसीलदार सिंह, सूबेदार सिंह, लुक्का डाकू, सुल्ताना डाकू, पन्ना और पुतली बाई जैसे बड़े नाम शामिल हैं. इनमें से कई बड़े डकैतों ने 1960 में विनोबा भावे के शांति अभियान के चलते आत्मसमर्पण किया था और बाकी पुलिस मुठभेडों में मारे गए. वैसे 1920 में माधोराव सिंधिया ( ग्वालियर से लोकसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के परदादा) द्वारा करवाए गए 97 डकैतों के आत्मसमर्पण को चंबल के इतिहास का पहला आधिकारिक आत्मसमर्पण माना जाता है .पर 1960 में शुरू हुई विनोबा भावे की प्रसिद्ध शांति पहल स्वतंत्र भारत का पहला बड़ा डकैत आत्मसमर्पण अभियान था. इसके बाद 1985 तक मलखान सिंह, माधो-मोहर, माखन-चिड्डा, बाबा मुस्तकीन, फूलन देवी-विक्रम मल्लाह, श्रीराम-लालाराम और ददुआ जैसे दुर्दांत डाकुओं ने चंबलघाटी पर राज किया.

चंबल के इतिहास के सबसे नामी डाकू मानसिंह के गैंग के सदस्य रहे लोकमान दीक्षित उर्फ लुक्का डाकू आज अपनी बीहड़ की जिंदगी याद नहीं करना चाहते…आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें ‘तब डाकू होना रुतबे की बात हुआ करती थी’

इस बीच जयप्रकाश नारायण और डॉ सुब्बाराव ने सन 1972 में लगभग 511 डकैतों को आत्मसमर्पण के लिए राजी कर बीहड़ के इतिहास में सबसे विशाल आत्मसमर्पण अभियान चलाया. फिर 80 के दशक में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने भी कई बड़े डकैतों ने आत्मसमर्पण किया और राज्य-सरकारों ने अपने अपने प्रदेशों से डकैती की समस्या के खात्मे के दावे भी शुरू कर दिए. ठीक इसी समय गुर्जर डाकुओं की एक पूरी पीढ़ी का उदय हुआ. निर्भय गुर्जर, सलीम गुर्जर, रज्जन गुर्जर, पंजाब सिंह गुर्जर और अरविंद गुर्जर जैसे दुर्दांत गुर्जर डाकुओं के साथ ही जगजीवन परिहार जैसे क्रूर ठाकुर गैंग भी इसी समय मजबूत होना शुरू हुए.

अब तक ठाकुर और गुर्जर गैंग से आबाद रहने वाले चंबल ने सन 2005 के आसपास, एक नया बदलाव देखा. पिछड़ी जाति का प्रतिनिधित्व करने वाला कुख्यात गड़रिया गैंग यहां के सबसे क्रूर और दुर्दांत डाकू गैंग के रूप में उभर कर आया. इस समय हजरत रावत, शक्ति-कच्छी, भारत यादव-दामोदर और लाखन लोधी जैसे कई छोटे-छोटे गैंग भी सक्रिय रहे. इस दौर में जातिगत दमन और श्रेष्ठता के नाम पर अपराधियों ने जाति को आधार बनाकर भी अपने गैंग बनाए. पहली बार नाथू जाटव, मेहराम जाटव, राजू आदिवासी और इंदर आदिवासी जैसे अनुसूचित जाति-जनजाति से जुड़े नाम भी डकैतों की इस घाटी में मशहूर हुए. फिलहाल तो इनमें से ज्यादातर डाकू मारे जा चुकी हैं लेकिन उनके गैंग के सदस्य आज भी घाटी में सक्रिय हैं. चंबल घाटी में एक दशक से भी लंबे समय तक काम कर चुके चंबल रेंज के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक विजय यादव बीहड़ की संरचनाओं के साथ-साथ जाति को नए डाकुओं के पनपने और बने रहने की वजह बताते हैं. वे कहते हैं, ‘ इनके पास अपनी-अपनी जाति का जबर्दस्त लोकल सपोर्ट होता है. एक बड़ा डाकू हमेशा अपनी जाति के लिए गर्व का विषय होता है. और जाहिर है जहां जाति है वहां राजनीति और उसका प्रभाव भी होता है.’

चंबल के कटाव से लगातार कम हो रही भूमि व उससे उपजे संघर्ष और बड़ी मात्रा में बंदूकों की मौजूदगी यहां डाकुओं के लगातार पैदा होने और बने रहने की एक प्रमुख वजह है. भिंड जैसे छोटे से जिले में इस समय 23,000 से ज्यादा लायसेंसी बंदूकें हैं वहीं मुरैना में ये संख्या 15, 000 और शिवपुरी में लगभग 11,000 बंदूकें हैं. जानकार बताते हैं कि इलाके में इससे कहीं ज्यादा गैरलायसेंसी बंदूकें हैं. चंबल के बारे में यह किंवदंती मशहूर है कि यहां आदमी के पास खाने को रोटी हो न हो, बंदूक जरूर होगी. बीहड़ की पगडंडियों पर फटे जूते पहने हुए मजदूर भी कंधे पर 60-60 हजार रुपये की कीमत वाली दोनाली बंदूक टांगे आसानी से देखे जा सकते हैं.

गड़रिया गैंग के सरगना रामबाबू गड़रिया की बहन रामश्री डाकुओं के परिवार का सदस्य होने की व्यथा बता रही हैं…आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें ‘आईजी पहले अपने भाई को मरवाकर दिखाते’

ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में लगभग 30 वर्षों से काम कर रहे वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली बताते हैं, ‘ जमीन और औरत को लेकर ही यहां सबसे ज्यादा झगड़ा होता है. लगभग हर आदमी के पास बंदूकें हैं इसलिए छोटी-मोटी लड़ाई में भी गोली चल जाती है. यहां जैसे ही शोर होता है लोग लड़ने लगते हैं. फिर गोली चलने की आवाज आती है और पता चलता है किसी की हत्या हो गई. फिर पुलिस से बचने के लिए हत्यारे जंगल का रुख करते हैं और बीहड़ में एक और डाकू पैदा हो जाता है. पुलिस और ऊंची जाति वालों के अत्याचारों से तंग आकर बागी बनने वाले डाकू तो 60 -70 के दशक में हुआ करते थे. आज तो ये सिर्फ पैसे और दूसरे ऐशोआराम के लिए के लिए डाकू बन रहे हैं.’ पिछले सालों में हुई कुछ घटनाएं इस बात की पुष्टि भी करती है. सबसे ताजा घटना इसी साल 20 फरवरी की है जब शिवपुरी जिले के मानपुरी गांव में पांच डकैतों ने एक परिवार के यहां लूटपाट करने के बाद दो महिलाओं से बलात्कार किया था.

चंबल क्षेत्र में अपराध करके जंगल भागने वाले ज्यादातर लोग सबसे पहले तो बीहडों में सक्रिय किसी बड़े गैंग से जुड़ते हैं, फिर बाद में कुछ अपनी अलग गैंग भी बना लेते हैं. इन नए डाकुओं की कोशिश होती है कि हर अपराध को जातिगत संघर्ष की तरह प्रचारित किया जाए ताकि वे अपनी जाति की सहानुभूति बटोर सकें और क्षेत्र में मजबूत आधार बना सकें. इस तरह चंबल में एक जाति के डाकुओं के अत्याचार के खिलाफ दूसरी जाति के डाकुओं की नई पौध खड़ी हो जाती है. अतीत में चंबल ने ठाकुरों के खिलाफ गुर्जर और मल्लाह, गुर्जरों के खिलाफ गड़रियों, गड़रियों और गुर्जरों के खिलाफ रावत, और इन सभी के खिलाफ ठोकिया, गया कुर्मी, ददुआ और राजू आदिवासी जैसे अनुसूचित जाति के डाकूओं को बनते और कुख्यात होते देखा है. अपनी जाति के लोगों में उस जाति के डाकू की छवि रक्षक और तारणहार की तरह होती है.

जानकार मानते हैं कि क्षेत्रीय लोगों द्वारा डाकुओं के महिमामंडन और सरकार के रवैये ने भी चंबल में डाकुओं के पनपने में बड़ी मदद की है. तमन्ना कहते हैं, ‘ जिस आदमी ने दसियों लोगों की हत्याएं की हों उसे फूल-माला, नौकरी और जमीन का प्लॉट और जिनकी हत्याएं हुईं, उन्हें कुछ नहीं? यह कैसा इंसाफ है? और यह तर्क कि ये लोग अत्याचार की वजह से डाकू बने, एकदम फिजूल है. सवाल यह है कि अन्याय के खिलाफ खड़ा होनेवाला अगर खुद ही अन्याय कर रहा हो तो उसे अच्छा कैसे कहा जा सकता है? इनमें से कोई डाकू कभी उन लोगों से माफी मांगने नहीं गया जिनके परिवार-वालों को इन्होंने मारा और न ही किसी ने उन बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी ली जिन्हें इन्होंने अनाथ बना दिया. इन्हें हमेशा अपने अपराधी होने पर नाज रहा और सरकार के रवैए ने भी इसका मौन समर्थन कर दिया.’

साल 2009 में प्रभात कुमारी के पूरे परिवार को डाकुओं ने जलाकर मार डाला था…आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें ‘डाकुओं के डर से मेरे परिवार को कोई भी बचाने नहीं आया’ 

चंबल क्षेत्र भारत के सबसे अविकसित और पिछड़े इलाकों में से है. सत्तर के दशक में चंबल नहर के आ जाने से यहां के लोगों को खेतीबाड़ी में थोड़ी-बहुत सुविधा तो मिली पर बीहड़ों की वजह से इलाके की ज्यादातर जमीन आज भी बंजर और असिंचित ही है. शिक्षा और रोजगार के अवसरों की भारी कमी को भी यहां लगातार पैदा होने वाले डाकुओं के पीछे एक कारण माना जाता रहा है. लेकिन इस राष्ट्रव्यापी संकट से इतर यहां बसने वाले लोगों की सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना डकैतों की अंतहीन पैदाइश के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है. अपराध और अपराधी के प्रति गौरव का भाव रखने वाली चंबल घाटी में, ‘जाके बैरी जीवित घूमें बाके जीवन को धिक्कार’ जैसे मुहावरे प्रचलित हैं. तमन्ना कहते हैं, ‘ यह दुनिया का शायद एक मात्र समाज है जहां एक लंबे अरसे तक मांएं बदला लेने के लिए अपने बेटे को ही अपराधी बनवाती रही हैं. कुछ जातियों में तो उन लोगों के यहां लड़कियां ब्याहने का रिवाज ही नहीं है जिनके यहां लड़के ने किसी की हत्या न की हो. ऐसा न करने वाले को मर्द नहीं माना जाता. असल में यहां के लोगों में पयाप्त क्षमाशीलता नहीं है. यहां लोग पूरी जिंदगी सिर्फ बदला लेने के लिए स्वाहा कर सकते हैं. पुलिस और राजनेता हमेशा इनका इस्तेमाल करते रहे हैं. नेता वोट जुटवाने के लिए और पुलिस तमगों के लिए.’

पिछले एक दशक में यहां डकैत कम भले नहीं हुए हों मगर मोबाईल फोन और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग (ईवीएम) मशीनों के आने से पुलिस को डकैतों के सफाए में बड़ी मदद मिली है. एक ओर जहां ईवीएम की वजह से वोटिंग बूथ लूटने के लिए नेताओं द्वारा पोषित और संरक्षित किए जाने वाले डाकुओं का राजनीतिक महत्व समाप्त हो गया वहीं मोबाईल टावरों को ट्रेस करके पुलिस ने भी कई बड़े डाकुओं का एनकाउंटर करने में सफलता हासिल की है.

चंबल में डाकुओं के लगातार बने रहने की समस्या के पीछे क्षेत्रीय पुलिस के असंवेदनशील रवैये पर भी सवाल उठते रहे हैं. मध्यप्रदेश सरकार के डकैत उन्मूलन विभाग के प्रसिद्ध एनकाउंटर स्पेशलिस्ट और वर्तमान में रीवा रेंज के पुलिस महानिरीक्षक गाजी राम मीणा यह स्वीकारते हुए कहते हैं कि निचले स्तर पर काम करने वाले पुलिस बल को आम लोगों के प्रति संवेदनशील बनाना डकैती की समस्या को खत्म करने के लिए सबसे जरूरी है. तहलका से बातचीत वे कहते हैं, ‘ हम मुठभेड़ में डाकुओं को मारते जाते हैं और नए डाकू फिर पैदा हो जाते हैं. इसीलिए इस समस्या से निपटने के लिए अब हम लोग मल्टी-एजेंसी एफर्ट पर ध्यान दे रहे हैं. हम थानेदारों के लिए सेन्सेटाइजेशन प्रोग्राम चला रहे हैं. सभी को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि एक भी फरियादी बिना अपनी शिकायत दर्ज करवाए वापस न जाने पाए. हर एक की शिकायत पर ध्यान देकर तुरंत कार्रवाई की जाए ताकि लोग ऐसा न महसूस करें कि उन्हें न्याय पाने के लिए उन्हें डाकू बनना पड़ेगा. विकास के और दूसरे काम और लोगों को समझ कर उनकी परेशानी दूर करने की यह कोशिशें हमें कम-से-कम अगले 10 साल तक लगातार करनी होगी, तभी हम नए डकैतों को पनपने से रोक सकते हैं.’

शहर अंदर ‘समंदर’

 

यह राजस्थान में जोधपुर शहर के यूएस बूट हाउस का एक जादुई बेसमेंट है. जादुई इसलिए कि यह शहर शुष्क रेगिस्तान के मुहाने पर बसा है लेकिन इस बेसमेंट में बारहमासी पानी रिसता रहता है. हालांकि इसकी नींव में कई सालों से पानी रिसता रहा है, लेकिन बीते दो साल से पानी इस स्तर तक बढ़ गया कि पांच पंपों से 24 घंटे पानी उलीचने पर भी यह कम होने का नाम नहीं लेता. हैरानी की बात है कि यह हाल बरसात के पानी से नहीं बल्कि जमीन से रिसने वाले पानी की वजह से हुआ है. इस बेसमेंट के मालिक हरीश मखीजानी की परेशानी यह है कि अगर उन्होंने पंपों को थोड़ा भी आराम दिया तो उनका पूरा माल पानी में तैर जाएगा. उनकी दूसरी परेशानी यह है कि उनकी दुकान शहर के एक प्रमुख स्थान पर है यानी उनके लिए कहीं दूर जाने का मतलब है उनका धंधापानी चौपट हो जाना. इसलिए जब कभी बिजली जाती है तो उन्हें जेनरेटर से पंप चलाकर पानी नालियों में बहाना पड़ता है. यह परेशानी सोजती गेट, त्रिपोलिया, चांदपोल, नवचौकिया, पावटा और घंटाघर सहित पुराने शहर के उन तमाम दुकानदारों और मकान मालिकों की भी है जिन्हें पंपों से रात और दिन तलघरों से पानी उलीचने के सिवाय कोई दूसरा चारा दिखाई नहीं देता.

थार मरुस्थल का हृदय जोधपुर कभी पानी का मोहताज हुआ करता था. आज यही शहर पानी-पानी हो गया है. विशेषज्ञों के मुताबिक थार सहित उत्तर भारत के कई इलाकों का भूजल दो से चार मीटर सालाना की दर से नीचे उतर रहा है लेकिन इसके उलट जोधपुर का भूजल एक से डेढ़ मीटर ऊपर चढ़ रहा है. आलम यह है कि कुएं मीठे पानी से लबालब हैं. नलकूप खोदो तो पूरा समंदर मिल जाता है और छोटे से छोटा निर्माण करो तो जमीन से पानी का फव्वारा फूट पड़ता है. सोजती गेट के एक प्राइवेट स्कूल में कुछ महीने पहले जमीन से पानी अपने आप फूट पड़ा. स्कूल प्रबंधन द्वारा कई पंप चलाने पर भी पानी आने का सिलसिला है कि टूटता ही नहीं. जल जमाव के चलते ही राजस्थान हाई कोर्ट में 60 वकीलों के चैंबर वाला जुबली चैंबर बदलना पड़ा. राज्य का भूजल विभाग बताता है कि शहर में भूजल स्तर कम होने की बजाय तेजी से बढ़ ही रहा है. कहीं-कहीं तो यह जमीन से कुछ सेंटीमीटर ही नीचे रह गया है. यानी इन इलाकों की जमीन हमेशा गीली ही बनी रहती है.

आज यकीन करना मुश्किल है कि डेढ़ दशक पहले तक इन्हीं इलाकों का भूजल पाताल छुआ करता था.  1995 तक जोधपुर की जलापूर्ति पूरी तरह भूजल पर निर्भर थी. लेकिन इसके बाद इंदिरा सागर नहर (इस नहर में सतलुज और व्यास नदी का पानी आता है) से निकली एक शाखा के जोधपुर पहुंचने पर शहर में भूजल का उपयोग लगभग बंद हो गया. साथ में यह भी हुआ कि 19वीं सदी में बनाई गई जोधपुर की कायलाना झील उसकी वास्तविक क्षमता से कहीं अधिक भरी जाने लगी. पीएचईडी के मुताबिक अब शहर में 20 करोड़ लीटर प्रतिदिन की दर से जलापूर्ति की जाती है. इन दिनों एक आदमी पर रोजाना 140 लीटर पानी खर्च किया जाता है. जाहिर है शहर में जल का उपयोग कई गुना बढ़ा है. मगर रेगिस्तान को हरा बनाने के लिए भारी मात्रा में लाए गए हिमालयी पानी का उचित प्रबंधन नहीं कर पाने का खामियाजा जोधपुर को भुगतना पड़ रहा है. यही पानी अपनी अधिकता की वजह से शहर के लिए अभिशाप बन गया है. जोधपुर में बढ़ते जलस्तर की समस्या को वैज्ञानिकों द्वारा राजीव गांधी नहर परियोजना से जोड़कर देखा जा रहा है. मगर वैज्ञानिकों के कई निष्कर्ष एक-दूसरे से अलग-थलग और विरोधाभासी हैं जिससे स्थिति रहस्यपूर्ण और समाधान और मुश्किल बन रहा है.

‘ऐसा लगता है कि जोधपुर की कई कमजोर इमारतें पानी के ऊपर तैर रही हैं. डर है कि भूकंप का मामूली झटका भी कहीं इस ऐतिहासिक शहर को पानी के साथ बहा न ले जाए’

2009 से शहर के गोदामों (बेसमेंट) में आया पानी जब वापस जमीन में नहीं गया और समस्या विकराल होने लगी तो जोधपुर विकास प्राधिकरण ने शहर के भीतर नए गोदाम बनाने पर सख्ती से रोक लगा दी. जोधपुर के एक बिल्डर नगराज कोठारी का मानना है कि गोदामों से तो फिर भी पानी उलीच लिया जाता है लेकिन शहर में कई नई-पुरानी इमारतों की नींव में भी पानी जमा हो रहा है और उसकी वजह से वे बहुत कमजोर हो गई हैं. यहां कई इमारतों में सीलन की परतें और दीवारों पर दरारें साफ दिखती हैं. शहर के चेतानिया की गली में मकानों के धंसने की घटनाएं भी हो चुकी हैं. मालवीय नगर प्रोद्यौगिकी संस्थान, जयपुर के प्रोफेसर और सिविल इंजीनियर अजय जेठू के कहते हैं, ‘ऐसा लगता है कि जोधपुर की कई कमजोर इमारतें पानी के ऊपर तैर रही हैं. डर है कि भूकंप का मामूली झटका भी कहीं इस ऐतिहासिक शहर को पानी के साथ बहा न ले जाए.’

जोधपुर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का विधानसभा क्षेत्र भी है.  2009 में राज्य सरकार ने भूजल रिसाव से निजात पाने के लिए एक आपातकालीन योजना के तहत 12.27 करोड़ रुपये मंजूर किए थे. तब से पीएचईडी द्वारा शहर के चार जोन में दस हॉर्सपवर के 89 पंप लगाकर रात-दिन भूजल उलीचने का काम चालू है. विभाग के मुख्य अभियंता बीसी माथुर के मुताबिक इस तरह प्रतिदिन 3.5 करोड़ लीटर भूजल उलीचा जा रहा है. विभाग द्वारा भूजल कम करने की इस दिलचस्प कवायद में बीते साल 48 लाख रुपये बिजली का बिल जमा किया गया. विभाग ने अभी तक इस तस्वीर का अंदाजा नहीं लगाया है कि जब शहर में पंपिंग पूरी तरह से रोक दी जाएगी तब क्या स्थिति होगी.

आखिर जोधपुर का भूजल खतरनाक स्तर तक क्यों बढ़ रहा है? बीते एक दशक में इस सवाल को लेकर कई नामी संस्थानों के विभिन्न अध्ययन सामने आए हैं. इनमें केंद्रीय भू-जल बोर्ड, जोधपुर विश्वविद्यालय, राजस्थान भू-जल विभाग, इसरो का आरआरएसएससी यानी राजस्थान रीजनल रिमोट सेंसिंग सर्विस सेंटर, बार्क यानी भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (मुंबई), राष्ट्रीय भूभौतिकी अनुसंधान संस्थान (हैदराबाद) और राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (रुड़की) खास हैं.  2001 में केंद्रीय भूजल बोर्ड और जोधपुर विश्वविद्यालय ने जोधपुर के भूजल में आ रहे बदलाव को लेकर एक अध्ययन किया था. उन्होंने समस्या के तीन कारण बताए. पहला यह कि जोधपुर में राजीव गांधी नहर आने के बाद जल का उपयोग कई गुना बढ़ गया और यह पानी भारी मात्रा में रिसकर जमीन के भीतर ही जा रहा है.  हिमालयी पानी मिलने से शहर के सैकड़ों पारंपरिक जलस्त्रोतों का उपयोग बंद होना दूसरा कारण बताया जाता है. तीसरा कारण यह बताया जा रहा है कि समय के साथ शहर की आबादी और जलापूर्ति में भारी बढ़ोतरी से पाइपलाइनों पर जबरदस्त दबाव बना और ये जगह-जगह लीक हो रही हैं. जोधपुर के भूजल विशेषज्ञ  स्व. बीएस पालीवाल के एक अध्ययन के मुताबिक इन कारणों ने मिलकर जोधपुर में जलरिसाव को गंभीर बनाया है.

लेकिन कुछ जानकारों की दलील है कि गोदामों में आने वाला पानी इतना साफ और बदबूरहित है कि इसे पाइपलाइन से लीक हुआ पानी नहीं माना जा सकता. उधर, कुछ का मानना है कि तीनों कारणों से जलरिसाव बढ़ तो सकता है लेकिन इस हद तक भी नहीं.  2001 में ही राजस्थान भूजल विभाग और इसरो के आरआरएसएससी का अध्ययन बताता है कि कायलाना झील की ऊंचाई शहर से काफी अधिक है और झील से शहर की तरफ 40 मीटर की एक ढलान है. सेटलाइट चित्रों में पाया गया कि झील और शहर के बीच भूगर्भीय दरारें हैं. 1995 के बाद झील का जलस्तर जब 45 मीटर की ऊंचाई से बढ़ाकर 55 मीटर तक कर दिया गया तो भूगर्भीय चट्टानों में बहुत अधिक दबाव पड़ने से उनमें दरारें बढ़ गईं. झील का पानी इन्हीं दरारों से रिसकर शहर के भूजल स्तर को बढ़ा रहा है. आरआरएसएससी के वैज्ञानिक डॉ बीके भद्र बताते हैं कि उन्होंने अपनी बात को पुख्ता करने के लिए झील से एक किलोमीटर दूर और दरारों के बीच दो कुएं खोदे. उन्होंने जल की माप की निगरानी के दौरान इन कुओं की तुलना उनके आस-पास और बिना दरारों पर स्थित बाकी कुओं से की. उन्होंने पाया कि बाकी कुओं का पानी खारा है लेकिन इन दोनों कुओं का पानी हिमालयी यानी झील का है. बाकी कुओं का जलस्तर बहुत नीचे है लेकिन दोनों कुंओं का जलस्तर काफी ऊपर है. उसके बाद बार्क (मुंबई) ने भी पाया कि झील और शहर के गोदामों में आया पानी समान है और कायलाना झील के रिसाव को समस्या की एक बड़ी वजह माना जा सकता है.

2009 में जब जोधपुर का भूजल स्तर अचानक तेजी से बढ़ने लगा तो देश के दो अन्य संस्थानों से अध्ययन कराए गए. इन संस्थानों ने राज्य भूजल विभाग, आरआरएसएससी और बार्क के निष्कर्षों से असहमति जताई. 2010 में राष्ट्रीय भूभौतिकी अनुसंधान संस्थान (हैदराबाद) ने सेटलाइट चित्रों से बताया कि कायलाना झील और शहर के बीच की चट्टानों में कुछ दरारें जरूर हैं लेकिन ये इतनी बारीक हैं कि उन्हें जोधपुर में जल रिसाव के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता. इस संस्थान के मुताबिक जोधुपर के भूजल की स्थिति पर अब तक की समझ काफी नहीं है और इस पर और अधिक काम करने की जरूरत है.

2011 में राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान (रूड़की) ने अपने अध्ययन में जलापूर्ति और निकासी के बीच भारी असंतुलन को समस्या की वजह माना. इस संस्थान के वैज्ञानिक डॉ एनसी घोष के मुताबिक जोधपुर में 16 साल से भूजल का उपयोग बंद है. दूसरी तरफ बाहरी स्त्रोत से बड़े पैमाने पर जलापूर्ति जारी है. इससे भूगर्भ में पानी कई परतों के बीच तालाब की तरह जमा हो रहा है. इसलिए जमीन में जल का संतुलन बिगड़ गया है और वह पहले की तरह बाहर नहीं निकल पाने से बढ़ता जा रहा है.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी फिलहाल जमीन में जल असंतुलन को समस्या की मुख्य वजह मानते हुए प्रशासन को युद्ध स्तर पर काम करने की हिदायत दी है.  प्रशासन ने भी बीते दो साल में काफी भूजल उलीच डाला है. वहीं रहवासियों का मानना है कि जब मटकी से पानी पिया जाता है तो उसमें पानी कम होता ही है. मगर लंबे अंतराल तक भूजल उलीचने पर भी कोई विशेष अंतर नहीं आने से स्थिति उलझ गई है.  ऐसे में शहर की दुर्दशा को दूर करने का कोई दूरदर्शी समाधान खोजने की मांग उठ रही है क्योंकि भूजल उलीचने की इस सतत क्रिया में भारी बिजली तो खर्च हो ही रही है, बड़े स्तर पर निवेश करके हिमालय से जोधपुर तक लाए गए पानी की बर्बादी भी बढ़ती जा रही है.

 

मर्ज कुछ, दवा कुछ

झारखंड में राजधानी रांची से लेकर संथाल परगना के किसी सुदूरवर्ती जिला मुख्यालय तक इन दिनों कई नए किस्म के नारों के साथ कुछ होर्डिंग जरूर देखने को मिलते हैं. ये होर्डिंग झारखंड में लडकियों को तरजीह देने की अपील वाले हैं. बिटिया को खास मानने की अपील से भरे हुए. झारखंड में अचानक लड़कियों पर स्नेह की बारिश होने लगी है. सरकार महिलाओं को केंद्र में रख कुछ-कुछ करने की कोशिश करती दिख रही है.

मिसाल के तौर पर लाडली बिटिया योजना को ही लें. सरकार ने चालू वर्ष को लाडली बिटिया वर्ष घोषित किया है. उसके मुताबिक इस योजना का मकसद है लड़कियों का भविष्य संवारना. इस योजना के तहत किसी बच्ची के जन्म पर 6,000 रु डाक घर में जमा करके उसके नाम पर एक खाता खोला जाएगा. अगले चार साल तक हर साल इसमें इतनी ही रकम जमा की जाएगी.

इतना ही नहीं, बच्ची के कक्षा सात में पहुंचते ही उसे एकमुश्त 2,500 रु दिए जाएंगे. कक्षा नौ में यह आंकड़ा चार हजार और कक्षा 11 में साढ़े सात हजार रु हो जाएगा. 11वीं और 12वीं कक्षा की छात्राओें को 200 रु अतिरिक्त दिए जाएंगे. फिर 21 साल की आयु पूरी होने और बारहवीं पास करने पर उसे एक लाख आठ हजार रूपये एक मुश्त दिए जाएंगे ताकि उसका ठीक से विवाह हो सके. शर्त यही है कि विवाह के समय उसकी उम्र कम-से-कम 18 साल होनी चाहिए. सरकार ने इस योजना को चलाने के लिए बजट में अलग से 54 करोड़ रु पारित भी किए हैं. सरकारी दस्तावेज के अनुसार यह योजना पूरे राज्य में बीते 15 नवंबर से लागू हो चुकी है.

लेकिन असल पेंच इस योजना के लागू होने के बाद से ही शुरू हुए हैं. दुमका की चांदमुनी बताती हैं,  ‘हमारी बिटिया का जन्म तीन महीने पहले हुआ है. जन्म के बाद से ही रजिस्टर में उसका नाम चढ़वाने के लिए यहां-वहां धक्के खा रहे हैं लेकिन अब तक सफलता नहीं मिल पाई है.’ थक-हारकर चांदमुनी ने योजना से तौबा कर ली है. वे बताती हैं, ‘तीन-तीन फॉर्म भरने पड़ते हैं. उसके बाद आंगनबाड़ी सेविका से लिखवाना पड़ता है. फिर समाज कल्याण विभाग को एक कापी जमा करनी पड़ती है. फिर उस पर उपायुक्त का रिकमेंडेशन आता है. तब जाकर डाकघर में खाता खुल पाता है.’ झारखंड के अलग-अलग हिस्सों मंे चांदमुनी जैसी कई महिलाएं हैं जिन्होंने दुरूह प्रक्रिया की वजह से इस योजना से तौबा कर ली है.

और बात सिर्फ उलझाऊ प्रक्रिया भर की भी नहीं है. बहुतों को इस तरह की योजना में ही खोट नजर आ रही है. जैसा कि बोकारो में बच्चों के अधिकार पर काम करने वाली ज्योति कहती हैं, ‘यह भूल-भुलैया वाली योजना है. अब तक तो झारखंड के ग्रामीण इलाकों में दहेज का चलन नहीं था लेकिन जब एकमुश्त पैसे आएंगे तो दहेज प्रथा का आरंभ यहां हो जाएगा.’

असल मुद्दा

हालांकि इन चीजों को एकबारगी परे भी कर दें तो  झारखंड की महिलाओं को भविष्य का ख्वाब दिखाने से ज्यादा अहम जरूरत इस बात की है कि उनका वर्तमान सुरक्षित और समृद्ध किया जाए. फिलहाल तो यह कई मायनों में भयावह है. सबसे अहम मानक स्वास्थ्य की बात करते हैं. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि राज्य की 70 फीसदी से अधिक महिलाएं अनीमिया (खून की कमी ) की शिकार हैं. किशोर उम्र की लड़कियों की बात करें तो उनकी आबादी में तीन चौथाई से अधिक अनीमिया ग्रस्त हैं. आंकड़े यह भी बताते हैं कि बाल विवाह के मामले में भी राज्य देश में सबसे अगली पांत में है. महिलाओं की तस्करी भी सबसे ज्यादा यहीं से होती है. पिछले दस वर्षों के आंकड़े देखें तो यहां यौन उत्पीड़न 7,563, अपहरण 3,854, दहेज हत्या 2,707 और दहेज उत्पीड़न के 3,398 मामले सामने आए हैं. झारखंड स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी की मानें तो अब भी राज्य में प्रतिवर्ष औसतन 175 महिलाएं डायन बताकर मारी जा रही हैं. यूनीसेफ की एक रिपोर्ट बताती है कि झारखंड में आधी आबादी के पास अब भी शौचालय नहीं है और न ही पीने का साफ पानी. ऐसे में महिलाओं की अधिकांश आबादी पानी के फेरे में ही अपना अधिकांश समय खपा देती हैं.

झारखंड में 70 फीसदी से अधिक महिलाएं अनीमिया की शिकार हैं जबकि हर साल यहां से लगभग सवा लाख लड़कियां दूसरे राज्यों में पहुंच जाती हैं

अब यदि शिक्षा की स्थिति देखें तो सरकारी आंकड़ों में यह खुशनुमा-सी दिखती है. आंकड़े बताते हैं कि यहां  महिलाओं की साक्षरता दर 56 फीसदी है लेकिन सच यह भी है कि मात्र 11 प्रतिशत लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाती हैं. यूनीसेफ की रिपोर्ट को आधार बनाएं तो प्राथमिक शिक्षा में स्कूल छोड़ने की दर यहां काफी ज्यादा है.

महिलाओं की तस्करी के मसले पर कार्यरत संस्था एटसेक के सचिव संजय मिश्र कहते हैं कि झारखंड से हर वर्ष सवा लाख लड़कियां दूसरे राज्यों में पहुंच जाती हैं. लेकिन इस पर अब तक लगाम नहीं लगायाी जा सकी है. इस कारण अधिकांश लड़कियां शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न की शिकार होती हैं. जिन लड़कियों को इस मकड़जाल से छुड़ाया जाता है उनके लिए भी कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है. बात आगे बढ़ाते हुए समाज कल्याण विभाग के अवर सचिव चंद्रशेखर झा कहते हैं कि सरकार की मंशा में महिलाएं शामिल हैं ही नहीं. वे बताते हंै, ‘राज्य महिला आयोग महिलाओं के सहयोग के लिए है लेकिन उसके पंख कतर दिए गए हैं ताकि वह उड़ान न भर सके. फिर भी हम सीमित संसाधनों में पिछले डेढ़ सालों मे लगभग 600 मामलों को निपटा चुके हैं.’

झारखंड राज्य में 2006 से ही महिला नीति बन कर तैयार है पर सरकार अब तक उसे लागू नहीं करवा सकी है. महिला आयोग की सदस्य वासवी किड़ो कहती हैं, ‘सरकार की मंशा साफ नहीं है. वह महिलाओं को सिर्फ लॉलीपॉप दिखा कर इस्तेमाल करना चाहती है. आयोग के पास सबसे अधिक मामले घरेलू हिंसा के सामने आते रहे हैं. उसके बाद बलात्कार, डायन और संपत्ति के मामले पर सरकार को शायद यह पता ही नहीं है कि राज्य में किस समस्या का समाधान पहले किया जाना है.’ झामुमो विधायक सीता सोरेन कहती हैं, ‘यह योजना तो ठीक है. यह योजना नाउम्मीद के बीच  उम्मीद की एक लौ की तरह दिखती है. लेकिन इसकी पेचीदगियां इतनी हैं कि लगता है यह सिर्फ शहरी लड़कियों के लिए है, ग्रामीण क्षेत्र के लिए नहीं.’ वे यह भी आरोप लगाती हैं कि दलाल इस योजना का बंटाधार करने पर तुले हैं.

क्या है दरकार

सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि झारखंड में लाडली बिटिया योजना बनते समय ही कई सवाल थे लेकिन आनन-फानन में इसे तैयार करके लागू करवा दिया गया. बिना कुछ मौलिक बातों पर गौर किए. उनका यह कहना सही भी लगता है. झारखंड के मूलवासियों में तो परंपरागत रूप से बेटियों को हमेशा से ही ज्यादा तरजीह मिलती रही है. लेकिन इस अधिकारी की मानें तो राज्य सरकार दूसरे राज्यों के नकल के चक्कर में फंस गई. दरअसल पड़ोसी राज्य बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी महिलाओं को केंद्र में रखकर कई योजनाएं शुरू की हैं. लेकिन झारखंड सरकार यह भूल गयी कि बिहार और झारखंड में कुछ चीजों में मौलिक फर्क है. दोनों राज्यों का सामाजिक परिवेश अलग है. झारखंड में लड़कियों को अलग से लक्ष्मी और लाडली कहकर विशेष स्नेह या दयामयी कहने की कभी जरूरत ही नहीं रही. उदाहरण के तौर पर, बिहार में लड़कियों को साइकिल की सवारी करते देखना एक बड़े बदलाव की तरह माना जा सकता है. लेकिन झारखंड के ग्रामीण अंचल में किशोरवय आदिवासी लड़कियां पीढि़यों से सरपट साइकिल दौड़ाती रही हैं.

इसी तरह यहां यदि महिलाओं को अलग-अलग मोर्चे पर सक्रिय देखना हो तो आबादी के अनुपात में चर्चित चेहरे झारखंड में ज्यादा मिलते हैं. तीरंदाज दीपिका, पूर्व महिला हॉकी कप्तान असुंता, हॉकी खिलाड़ी सावित्री पूर्ति, समुराय टेटे, सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बरला, मुक्केबाज अरुणा मिश्रा, रेल चलाने वाली रूपाली जैसी कई महिलाएं यहां सहजता से पनपती रही हैं. राज्य ऐसी कई प्रतिभाओं की खान रहा है. जानकार कहते हैं कि ऐसी प्रतिभाओं को बढ़ावा देने की जरूरत है, लेकिन सरकार लड़कियों को लाडली, बिटिया, लक्ष्मी आदि की शब्दावली में फंसाकर सभी मुश्किलों से पार पाने की पुरजोर कवायद में दिखती है.

नाक की लड़ाई

 

बिहार में गया और मोतिहारी दो अलग-अलग हिस्सों में बसे हुए शहर हैं. दोनों इलाकों के निवासियों में काफी भिन्नता है. मोतिहारी ठेठ भोजपुरी भाषी इलाका है तो गया मगही भाषा और संस्कृति का गढ़. मोतिहारी वालों को इस बात की मुग्धता रहती है कि उनकी ही धरती पर महात्मा गांधी के सत्याग्रह की बुनियाद पड़ी और बाद में वे मोहनदास से महात्मा बन गए. गया वालों को गुमान रहता है कि गया की धरती ने ही ज्ञान की तलाश में भटक रहे राजकुमार सिद्धार्थ को बुद्ध बनने का अवसर दिया. इन दोनों इलाकों में सांस्कृतिक-सामाजिक और भौगोलिक दूरी इतनी ज्यादा है कि आपस में रोटी-बेटी का संबंध न के बराबर होता है. इन दोनों में अड़ोसी-पड़ोसी जैसा कोई संबंध नहीं है. बावजूद इसके आजकल बिहार के इन दोनों इलाकों में एक-दूसरे के लिए सौतिया डाह जैसी भावना चरम पर है. दोनों इलाकों का दौरा करने और स्थानीय लोगों से बातचीत करने पर यह साफ महसूस होता है कि यहां क्षेत्रीय अस्मिता का भाव बिहारी होने के गर्व पर भारी पड़ रहा है. अपनी लड़ाई के समर्थन में मोतिहारी और गया के लोग मानव श्रींखलाएं बना रहे हैं, परचेबाजी कर रहे हैं और दिल्ली दौड़ लगा रहे हैं.

इस अलगाव के केंद्र में है एक केंद्रीय विश्वविद्यालय. वही केंद्रीय विश्वविद्यालय, जिसके स्थान चयन को लेकर देश के मानव संसाधन मंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री मूंछ की लड़ाई लड़ रहे हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मोतिहारी के पक्ष में खड़े हैं तो दूसरी ओर देश के मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल हैं जो गया के पक्ष में अपने वकालत के पेशे वाले अनुभव से तर्क-वितर्क करते हैं.

इस लड़ाई का राजनीतिक असर जो होना है वह तो होगा ही, फिलहाल सबसे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति उन छात्र-छात्राओं की हो गई है जो पिछले तीन साल से कहने को तो केंद्रीय विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे हैं लेकिन उन्हें पटना के बीआईटी परिसर के एक कोने में अपने भविष्य का ताना-बाना बुनना पड़ रहा है. उस कोने की व्यथा यह है कि अक्सर विश्वविद्यालय के कुलपति और बीआईटी प्रबंधन के बीच तू-तू मैं-मैं की नौबत आ जाती है और बीआईटी प्रबंधन उन्हें बाहर निकाल देने की धमकी देता रहता है.

बिहार सरकार के मानव संसाधन मंत्री पीके शाही का कहना है, ‘हमें एक नहीं चार केंद्रीय विश्वविद्यालय चाहिए.’ विपक्षी नेता राष्ट्रीय जनता दल के सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह कहते हैं, ‘बिहार को चाहिए कि वह गया और मोतिहारी, दोनों जगह केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की मांग तो करे ही, साथ ही पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने की पुरानी मांग को भी दुहराए.’ लेकिन इन बिहारी नेताओं की भावना के उलट केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल बार-बार एक ही बात दोहरा रहे हैं कि केंद्रीय विश्वविद्यालय गया में ही खुलेगा, मोतिहारी में उसका एक्सटेंशन सेंटर खोला जा सकता है. साथ में सिब्बल यह सुझाव भी देते हैं कि अगर राज्य सरकार चाहे तो मोतिहारी में एक राज्यस्तरीय विश्वविद्यालय की स्थापना करे, केंद्र सरकार हर संभव सहयोग करेगी. इन सबके बीच प्रस्तावित केंद्रीय विश्वविद्यालय जिसको लेकर सारी लड़ाई जारी है, उसके कुलपति जनक पांडेय ने यह कहकर नया पेंच फंसा दिया है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत बिहार के सभी प्रमंडलों में एक-एक कम्युनिटी कॉलेज खोलना चाहिए. यानी हर जिम्मेदार व्यक्ति के पास अपना-अपना फॉर्मूला है.

मोतिहारी बनाम गया की मौजूदा लड़ाई के अतीत में झांकने पर दिलचस्प जानकारियां मिलती हैं. 2004 में केंद्र में बनी यूपीए सरकार ने देश भर में 15 केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने की योजना बनाई. बिहार के हिस्से में भी एक आया. पटना के बीआईटी परिसर में इसकी शुरुआत हुई. राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उसी दौरान मोतिहारी में इंजीनियरिंग कॉलेज का उद्दघाटन करने गए. यह नीतीश का उत्कर्ष काल था. भारी संख्या में मोतिहारी की जनता उन्हें सुनने के लिए इकट्ठा थी. भीड़ के जोश और मोतिहारी इलाके से एनडीए को मिली भारी सफलता के आवेग में नीतीश ने मंच से उनके लिए केंद्रीय विश्वविद्यालय की घोषणा कर दी बशर्ते जमीन मोतिहारी के लोग उपलब्ध करवा दें. लगे हाथ जनता ने जमीन देने के लिए हामी भर दी. झगड़े के बीज यहीं से पड़े. मुख्यमंत्री ने अपना प्रस्ताव दिल्ली भेजा. दिल्ली ने तीन सदस्यीय टीम मोतिहारी भेजी. टीम ने मोतिहारी के पिछड़ेपन, आवागमन की दुरूहता और आबादी वगैरह को आधार बनाकर नीतीश का प्रस्ताव खारिज कर दिया. लगे हाथ केंद्र सरकार ने गया में सेना की जमीन पर विश्वविद्यालय परिसर स्थापित करने का अपना वैकल्पिक प्रस्ताव भी पेश कर दिया. यहां से नीतीश और केंद्र सरकार के बीच नाक की लड़ाई की बुनियाद पड़ी, जो अब तक चल रही है.

मोतिहारी वालों को मुख्यमंत्री का आसरा था तो गया वालों में उम्मीद केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री ने जगा दी. जाहिर-सी बात है दोनों इलाकों के लोगों ने अपने-अपने हिसाब से नायक-खलनायक तय कर लिए और लड़ाई शुरू कर दी. अब यह मामला इतना जटिल हो चुका है कि इन दोनों जगहों को अगर लॉलीपॉप जैसा कुछ नहीं दिया गया तो हर हाल में राजनीतिक नुकसान राज्य में सत्ताधारी एनडीए गठबंधन को उठाना पड़ेगा. दोनों इलाकों में राजनीतिक वर्चस्व एनडीए का ही है. राजनीतिक हैसियत के मामले में राज्य में अप्रासंगिक हो चुकी कांग्रेस के पास यहां खोने के लिए कुछ नहीं, इसलिए केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री राज्य के मुख्यमंत्री को हर हाल में अंगूठा दिखाने पर आमादा हैं. मोतिहारी जिस पूर्वी चंपारण का मुख्यालय है, उस इलाके की 11 विधानसभा सीटों में से नौ और तीन संसदीय सीटों पर एनडीए का कब्जा है. दूसरी ओर गया में संसदीय सीट पर भाजपा का कब्जा होने के साथ-साथ 10 में से नौ विधानसभा सीटों पर एनडीए ही काबिज है. जाहिर-सी बात है, शिक्षा के एक केंद्र को लेकर यदि सियासी लड़ाई चल रही है तो अब दोनों में से जहां केंद्रीय विश्वविद्यालय नहीं बन सकेगा, वहां एनडीए को नुकसान उठाना होगा.

शिक्षा के इस सियासी खेल में शिक्षा से जुड़े असल सवाल हाशिये पर चले  गए हैं. संसद में बिहार के सांसद मोतिहारी में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर गांधी का अपमान बंद करो जैसे नारे लगा रहे हैं,. शिक्षाविदों के एक वर्ग का सवाल है कि चंपारण में गांधी के नाम से एक केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित कर देने से क्या गांधी का मान रह जाएगा. अपने चंपारण प्रवास के दिनों में गांधीजी ने शिक्षा के क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण काम किए थे. पश्चिमी चंपारण में वृंदावन नाम की एक जगह पर उन्होंने 28 बुनियादी विद्यालयों की शुरुआत करवाई थी. इन विद्यालयों में वर्षों से शिक्षक नहीं हैं. लेकिन यह मुद्दा उठाने वाला कोई नहीं. पश्चिम चंपारण में ही कुमारबाग नामक स्थान में कभी राज्य ही नहीं राष्ट्रीय स्तर का मॉडल स्कूल खुला था. वह खंडहर बना हुआ है, लेकिन उसकी भी कोई सुध लेने वाला नहीं. बुनियादी विद्यालय खोलने के लिए चंपारणवासियों ने उदारता से जो जमीनें दी थीं उनका क्या हो रहा है, यह सवाल भी महत्वपूर्ण है.

दूसरी ओर गया वाले  एक केंद्रीय विश्वविद्यालय से करिश्मे की उम्मीद लगाए हुए हैं. उनके मन में यह सवाल नहीं आ रहा कि उनके यहां तो पहले से ही मगध विश्वविद्यालय के नाम से राज्य का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय मौजूद है. वह क्यों नहीं उत्कृष्ट संस्थान बन सका? गया और मोतिहारी की लड़ाई में ऐसे कई सवाल लुप्त हो गए हैं.

पटना विश्वविद्यालय देश के गिने-चुने विश्वविद्यालयों में एक रहा है. वहां क्या हालत है? शिक्षाविद विनय कंठ कहते हैं, ‘वहां कैडर स्ट्रेंथ अब मात्र 40 प्रतिशत रह गई है, इसके लिए क्या हो रहा है? 90 से ज्यादा कोर्स शुरू हो गए हैं, लेकिन न आधारभूत ढांचा है, न शिक्षक. इसके लिए क्या कोशिश हो रही है?’ बिहार के नौ विश्वविद्यालयों में पिछले नौ सालों से एक भी नियुक्ति का नहीं होना भी कोई कम महत्वपूर्ण सवाल नहीं है. ऐसा नहीं कि इन सबके लिए सिर्फ वर्तमान सरकार दोषी है. लेकिन जब नीतीश कुमार के काल में ही शिक्षा सियासत का मसला बनी है और केंद्रीय और प्रांतीय विश्वविद्यालय का पेंच फंस गया है तब स्थानीय विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता की चर्चा होना भी लाजिमी है. रही बात एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर लड़ाई लड़ रहे लोगों की तो उन्हें इसके संदर्भ में कुछ जानकारियां भी रखनी चाहिए. बिहार में इस वक्त नौ राज्य संचालित विश्वविद्यालय हैं जबकि एक भी केंद्रीय विश्वविद्यालय नहीं है. राज्य से बाहर जाकर और तकनीकी शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्रों को छोड़ दिया जाए तो लगभग 75 फीसदी छात्र इन्हीं संस्थानों से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और इनकी दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है.’

कंठ के सवालों को परे भी करें तो बिहार के बारे में सामान्य-सी जानकारी रखने वाले भी जानते हैं कि यहां दो दशक पहले तक कई उत्कृष्ट शिक्षण संस्थान हुआ करते थे. भागलपुर में टीएनबी कॉलेज, दरभंगा में सीएम साइंस कॉलेज, गया में गया कॉलेज, मुजफ्फरपुर में एलएस कॉलेज, मोतिहारी में एमएस कॉलेज, आरा में जैन कॉलेज, पटना में साइंस कॉलेज, आर्ट्स कॉलेज, कॉमर्स कॉलेज जैसे कई नामी संस्थान थे. इन कॉलेजों में पढ़ना गर्व की बात भी माना जाता था. आज ये सभी संस्थान बस नाम ढो रहे हैं.

सबसे अधिक छात्र राज्यों के विश्वविद्यालयों में जाते हैं और इन विश्वविद्यालयों की सेहत की चिंता किसी को नहीं है. केंद्रीय विश्वविद्यालयों को यूजीसी के बजट का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा दिया जाता है और राज्य के विश्वविद्यालयों को 40 प्रतिशत. यह केंद्र की योजना है. अब राज्य के निवासियों को तय करना चाहिए कि किसकी मजबूती में उनकी भलाई है. जानकार कहते हैं कि केंद्रीय विश्वविद्यालय तो चाहिए लेकिन राज्य के विश्वविद्यालयों का क्या होगा, इस पर भी इतनी ही मजबूती से बात हो, तभी तस्वीर और तकदीर बदल सकती है.

 

‘सत्यमेव जयते’ का सच

अफसोस, सत्य फिर पराजित होता दिख रहा है

आजाद भारत के निर्माताओं ने पता नहीं क्या सोचकर राष्ट्र का आदर्श वाक्य चुना : ‘सत्यमेव जयते’. इसके साथ ही, थाने-कचहरियों से लेकर तमाम सरकारी इमारतों और दफ्तरों पर तीन सिंहों के सिर वाले अशोक स्तंभ के ठीक नीचे यह आदर्श वाक्य चुन दिया गया : ‘सत्यमेव जयते’. यह और बात है कि इन सरकारी इमारतों में सच का गला सबसे ज्यादा घोंटा गया. समय के साथ सच परेशान ही नहीं, पराजित दिखने लगा. कुछ इस हद तक कि लोगों की निराशा और हताशा बेकाबू होने लगी. उनका गुस्सा अलग-अलग शक्लों में फूटने लगा.

इस तरह स्टेज पूरी तरह सेट हो चुका था. ‘यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…’ यानी अब भारत को जरूरत थी एक अवतार की जो उसे इस अधर्म से निकाले और सत्य की जीत में खोई आस्था को बहाल करे. लेकिन अब समय बदल चुका है. यह कलियुग यानी मीडियायुग है. इस युग में अवतार पैदा नहीं होता बल्कि गढ़ा जाता है. अब ईश्वरीय गुणों वाले महानायक देवलोक से नहीं आते, टीवी स्टूडियो या ओबी वैन में जन्म लेते हैं. वे आसमान से नहीं उतरते बल्कि आकाश- तरंगों से घर-घर पहुंच जाते हैं.

इस तरह मीडिया के कंधे पर चढ़ पहले अन्ना हजारे और अब आमिर खान आए हैं, एयरटेल और एक्वागार्ड के सौजन्य से स्टार प्लस और दूरदर्शन पर ‘सत्यमेव जयते’ लेकर. यह कहते हुए कि ‘जब दिल पर लगेगी, तभी बात बनेगी’ .जबरदस्त प्रचार और मार्केटिंग अभियान के साथ शुरू हुए ‘सत्यमेव जयते’ के पहले एपीसोड में आमिर ने कन्या भ्रूण हत्या का मुद्दा जोर-शोर से उठाया.

इस शो में क्या नहीं है? एक ज्वलंत मुद्दा है. ओफ्रा विनफ्रे शैली में पीड़ितों की सच्ची आपबीतियां हैं. आमिर का पर्सनल टच और स्टारडम है. डाॅक्टरों की पोल खोलने वाला एक पुराना स्टिंग और उसके पत्रकारों की हकीकत बयानी है. कन्या भ्रूण हत्या के सामाजिक पहलुओं और डाॅक्टरी खेल पर विशेषज्ञों की राय थी. कुछ तथ्य और तर्क थे और बहुत ज्यादा भावनाएं और आंसू थे. सबसे बढ़कर मुद्दे का तुरत-फुरत और आसान ‘फास्टफूड’ समाधान है. इस तरह दर्शकों के लिए विरेचन (कैथार्सिस) का पूरा इंतजाम है.

नतीजा, जैसा कि दावा था, ‘बात दिल पर ही लगी’ और मीडिया पंडितों की मानें तो ‘बात बन भी गई.’ ‘सत्यमेव जयते’ को टीवी का नया गेम चेंजर माना जा रहा है. किसी को यह व्यावसायिक टीवी पर लोकसेवा प्रसारण की वापसी दिखाई दे रही है. कोई इसे टीवी में सामाजिक जिम्मेदारी का अहसास जगना बता रहा है. कुछ अति उत्साहियों को इसमें कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ एक नई सामाजिक क्रांति की शुरुआत दिखाई दे रही है. टीवी और आमिर खान को इस सामाजिक क्रांति का माध्यम बताया जा रहा है.

आमिर का ‘सत्य’ उस पितृसत्तात्मक सामंती-पूंजीवादी ढांचे तक नहीं पहुंच पाया जो महिलाओं को समाज में अवांछित या एक वस्तु भर बना देता है

चलिए, मान लिया कि टीवी का ह्रदय परिवर्तन होने लगा है. लेकिन यह भी तो बताइए कि रातों-रात टीवी की अंतरात्मा कैसे जग गई? यह सवाल इसलिए भी है कि कल तक टीवी को उसकी सामाजिक जिम्मेदारी की याद दिलाने पर चैनलों के जो संपादक/प्रबंधक उसे लोगों के मनोरंजन और बहलाव का माध्यम बताते नहीं थकते थे और दुनियावी परेशानियों में उलझे अपने दर्शकों को गंभीर मुद्दों से और परेशान करने के लिए तैयार नहीं थे, उनके अचानक ह्रदय परिवर्तन की वजह क्या है? सवाल इसलिए भी मौजूं है कि महिला अधिकारों और जागरूकता की बातों के बावजूद चैनलों और खुद स्टार पर अब भी सामाजिक रूप से ऐसे अनुदार और प्रतिगामी धारावाहिकों की भरमार है जिनमें महिलाओं की पितृ-सत्तात्मक/सामंती जकड़बंदियों का महिमामंडन होता है.

हैरानी की बात नहीं है कि आमिर के कन्या भ्रूण हत्या पर ‘सामाजिक क्रांतिकारी’ शो का नतीजा शंकराचार्य और धर्मगुरुओं की इस मांग के रूप में सामने आया कि गर्भपात पर पूरी तरह से रोक लगाया जाए. अब यह कौन याद दिलाये कि महिला आंदोलन ने लंबी लड़ाई के बाद अपने शरीर पर अपना हक और बच्चा पैदा करने या न करने का यानी गर्भपात का अधिकार पाया! इस अधिकार का मिलना सामाजिक क्रांति थी. लेकिन यहां तो इसे छीनने की मांग उठने लगी है. लेकिन इसका मौका ‘सत्यमेव जयते’ ने ही दिया है. आखिर कन्या भ्रूण हत्या जैसे जटिल और गंभीर सामाजिक अपराध के लिए आमिर ने कुछ लालची डाॅक्टरों, अल्ट्रासाउंड मशीनों, बेटा चाहने वाले सास-ससुर-पतियों को खलनायक और जिम्मेदार ठहराकर कानून के कड़ाई से पालन और अपराधियों के खिलाफ फास्ट ट्रैक कोर्ट का आसान समाधान पेश कर दिया. गोया जब डाॅक्टर और अल्ट्रा साउंड मशीनें नहीं थीं, बेटियों की हत्याएं नहीं होती थीं! और यह भी कि लोग कुलदीपक क्यों चाहते हैं? जाहिर है कि आमिर का ‘सत्य’ उस पितृसत्तात्मक सामंती-पूंजीवादी ढांचे तक नहीं पहुंच पाया जो महिलाओं को समाज और परिवार में अवांछित या एक वस्तु भर बना देता है. इस ढांचे को तोड़े और चुनौती दिए बगैर कन्या भ्रूण हत्या से लेकर दहेज हत्या तक महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार रोकना मुश्किल है.

लेकिन ‘सत्यमेव जयते’ का सच इससे मुंह चुराता दिखता है? यह व्यावसायिक टीवी की सीमा है. वह सामाजिक क्रांति का नहीं, उपभोक्ता क्रांति का माध्यम है. वह बदलाव का नहीं, यथास्थिति का माध्यम है. वह उसे चुनौती नहीं दे सकता जिससे उसे खाद-पानी मिलता है. इसीलिए वह सत्य में नहीं, आधे-अधूरे और सतही ‘सच’ में हल खोजता है जो वास्तव में हल नहीं, हल का आभास भर होता है.

शाह की बादशाहत

 

जिस तरह के काम इस कंपनी ने किए थे उन्हें देखते हुए स्वाभाविक तो यह होता कि इसे ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता. लेकिन सरकारें इस पर मेहरबान रहीं. मामला इन दिनों बहुचर्चित हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट से जुड़ा है. इसके केंद्र में अंडरवर्ल्ड डॉन बबलू श्रीवास्तव के सहयोगी नितिन शाह की भूमिका मुख्य रूप से सामने आ रही है. शाह हत्या के एक मामले में बबलू के साथ सहआरोपी हैं. इस बड़े व्यापारी पर उत्तर प्रदेश की पूर्व बसपा सरकार की कृपा तो रही ही, केंद्र में कांग्रेसनीत सरकार का रुख भी इसके लिए उदार ही दिखता है.

सरकारों की मेहरबानी शाह पर किस तरह बरसती है इसकी एक मिसाल यह है कि उत्तर प्रदेश में वाहनों पर हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट लगाने का ठेका शाह की कंपनी शिमनित उच इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को देने के लिए पूर्ववर्ती बसपा सरकार ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. वह भी तब जब कंपनी ने अपने बारे में सही जानकारी नहीं दी थी और वह इस काम के लिए दूसरे राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा रकम वसूल रही थी. इसके बावजूद तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की अध्यक्षता में आनन-फानन में बाई सर्कुलेशन जारी करके कंपनी को कैबिनेट से हरी झंडी दे दी गई.

अगर हरियाणा, राजस्थान या अन्य राज्यों में हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट का ठेका लेने वाली कंपनियों की बोली की तुलना करें तो पता चलता है कि शिमनित ने टेंडर के लिए जो कीमत तय की थी वह दूसरे राज्यों की तुलना में कई गुना ज्यादा थी. इसके बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार ने इस तथ्य को नजरअंदाज करके शिमनित उच को ठेका देने की कोशिश की. आखिरकार इस मनमानी के विरोध में कोलकाता की कंपनी सेलेक्स टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जिसने टेंडर में खामियां पाते हुए पूरा टेंडर निरस्त कर दिया.

केंद्रीय मोटर गाड़ी नियमावली – 1989 के नियम 50 में मोटर वाहनों में लगने वाले नंबर प्लेट के आकार, रंग और साइज के संबंध में स्पष्ट प्रावधान हैं. अधिकांश राज्यों में यही प्रावधान लागू हैं. साल 2001 में केंद्र सरकार ने इन नियमों में व्यापक फेरबदल किए थे. ऐसा वाहनों की बढ़ती चोरी और आतंकी घटनाओं में चोरी के वाहनों के प्रयोग को देखते हुए किया गया था. इसी बदलाव के तहत तमाम विशिष्टताओं वाली सुरक्षा लाइसेंस प्लेट वाहनों के आगे और पीछे लगाने का नियम भी बनाया गया. इसे हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट के नाम से जाना जाता है. देश भर में हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट लगाने के काम में 18 कंपनियां लगी हुई हैं. ये भारत सरकार की ओर से अधिकृत हैं. इन्हीं में से एक कंपनी नितिन शाह की शिमनित उच इंडिया प्राइवेट लिमिटेड भी है.

20 मई, 2011 को बसपा सरकार ने राज्य में हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट की टेंडर की प्रक्रिया शुरू की. इस प्रक्रिया में शिमनित उच इंडिया प्रा. लि. सहित कुल सात कंपनियों ने हिस्सा लिया. एक महीने बाद यानी 20 जून को टेक्निकल बिड सार्वजनिक होनी था. लेकिन अज्ञात कारणवश उस दिन बिड नहीं खोली गई. गड़बड़ी की शुरुआत यहीं से हुई. सरकार ने अगले ही दिन  यानी 21 जून को बिड के संबंध में कुछ नई शर्तें जोड़ दीं. इसमें यह शर्त भी थी कि उसी कंपनी का टेंडर वैध माना जाएगा जिसके पास देश के किसी राज्य में हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट लगाने का कम-से-कम एक साल का अनुभव हो. अचानक थोपी गई इस नई शर्त को परिवहन विभाग के अधिकारी सरकार की चाल मानते हैं. विभाग के अधिकारी दबी जुबान में यह भी बताते हैं कि सरकार ने बेहद चालाकी से पहले सारे टेंडर देख लेने के बाद आखिरी समय में यह खेल खेला था. टेक्निकल बिड खोलने की नई तारीख पांच जुलाई घोषित की गई. इस बार भी शिमनित सहित उन्हीं सात कंपनियों ने टेंडर डाला. उसी दिन कंपनी के प्रतिनिधियों के सामने टेंडर खोला गया. टेंडर खुलने पर शिमनित उच इंडिया प्राइवेट लिमिटेड एवं टान्जेज ईस्टर्न सिक्योरिटी टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड ही सरकार द्वारा लगाई गई शर्त को पूरा कर सकी.

कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने परिवहन विभाग के प्रमुख अधिकारियों की एक बैठक बुलाकर शिमनित उच को टेंडर आवंटन का लेटर जारी कर दिया

यहां एक नई कहानी सामने आती है. जिन दो कंपनियों ने एक साल के अनुभव की शर्त पूरी की थी उनमें से शिमनित उच तो शाह की कंपनी है पर दूसरी कंपनी टान्जेज ईस्टर्न सिक्योरिटी प्राइवेट लिमिटेड भी कहीं न कहीं शाह से ही जुड़ी हुई पाई गई. बसपा के एक वरिष्ठ नेता का दावा है कि दोनों ही कंपनियां असल में नितिन शाह की हैं. 23 नवंबर, 2011 को निविदा उपसमिति की तकनीकी मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्तुत की गई. इसके मुताबिक मैसर्स टान्जेज ईस्टर्न सिक्योरिटी ने परिवहन आयुक्त गंगटोक, सिक्किम द्वारा जारी प्रमाण दाखिल किया था जिसके मुताबिक यह कंपनी हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट के क्षेत्र में जुलाई, 2009 से कार्य कर रही थी. इसी तरह शिमनित उच ने परिवहन आयुक्त शिलांग, मेघालय द्वारा जारी प्रमाण पत्र पेश किया था जिसके मुताबिक वह 11 अगस्त 2006 से  हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट के क्षेत्र में काम कर रही थी. बाद में यह कंपनी नागालैंड में इस क्षेत्र में काम करती रही जिसका कार्यकाल 15 जून, 2011 से शुरू होता था.

टेंडर दाखिल करने की एक अनिवार्यता और भी थी. इसके मुताबिक टेंडर डालने वाली कंपनी के लिए यह जरूरी था कि उसका कोई टेंडर किसी अन्य राज्य में कभी निरस्त न हुआ हो. पर शाह की कंपनी शिमनित उच ने टेंडर फॉर्म में उक्त कॉलम में कोई जानकारी नहीं दी. जबकि दस्तावेज बताते हैं कि उसका टेंडर गोवा, कर्नाटक और राजस्थान में विभिन्न अनियमितताओं के कारण रद्द हो चुका था. सूत्र बताते हैं कि गोवा में सत्तारूढ़ नई भाजपा की सरकार ने तो शाह की कंपनी के खिलाफ आपराधिक मामले की जांच तक शुरू कर दी है. बाद में जब टेंडर कमेटी के सामने जब इस बात का खुलासा हुआ कि शिमनित उच ने फॉर्म में कई तथ्यों को छिपाया है और टेंडर की शर्तों का उल्लंघन किया है तो उसे राज्य के न्याय विभाग की ओर से कारण बताओ नोटिस जारी किया गया. न्याय विभाग ने पूछा कि कर्नाटक एवं गोवा सरकार द्वारा शिमनित उच इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के टेंडर खारिज करने की जानकारी कंपनी ने क्यों छिपाई. उसका यह कृत्य न्याय विभाग के अनुसार धोखाधड़ी के दायरे में आता है.

इसके जवाब में कंपनी ने न्याय विभाग को बताया कि कर्नाटक एवं गोवा सरकार ने हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट लगाने संबंधी करार पर आपत्ति जताई है लेकिन दोनों ही मामले अदालत में विचाराधीन हैं. कंपनी के इस जवाब पर न्याय विभाग ने टिप्पणी की कि कंपनी को स्पष्ट रूप से इसका उल्लेख करना चाहिए था कि किन कारणों से उनके करार पर राज्य सरकारों ने आपत्ति जताई थी और वर्तमान में उनकी विधिक दशा क्या चल रही है. इस लिहाज से कंपनी ने फॉर्म में असत्य कथन किया है. कहने का अर्थ यह है कि न्याय विभाग ने कहीं न कहीं शिमनित उच को दोषी पाया और गलतबयानी के चलते उसका टेंडर निरस्त होना चाहिए था.

पर हैरानी की बात है कि इसी न्याय विभाग ने कुछ ही दिन बाद अपना रुख बिल्कुल बदल लिया. न जाने ऐसी कौन-सी स्थितियां बनीं कि राज्य के प्रमुख सचिव न्याय ने शिमनित के उक्त कृत्य को धोखाधड़ी की गतिविधि मानने से ही इनकार कर दिया. पहले जहां न्याय विभाग ने अपने दस्तावेजों में शिमनित की गतिविधि को गड़बड़ माना था बाद में उसे सही मान लिया और उसे धोखाधड़ी मानने से इनकार कर दिया.

इतनी सारी गड़बड़ियों के बावजूद इस प्रस्ताव को 21 दिसंबर, 2011 को मंत्रिपरिषद के सामने मुख्यमंत्री के आदेशानुसार भेज दिया गया. परिवहन विभाग की ओर से तैयार किए गए अनुमोदन में बताया गया कि निविदा समिति द्वारा टेक्निकल बिड में योग्य पाई गई दो कंपनियों को अब फाइनेंशियल बिड हासिल करनी है. 21 दिसंबर, 2011 को फाइनेंशियल बिड खोली गई. इसमें शिमनित की दरें दूसरी कंपनी से कम पाई गईं.  परिवहन विभाग ने मंत्रिमंडल को अवगत कराया कि उनके पास इस कार्य हेतु अन्य राज्यों द्वारा स्वीकृत दरें उपलब्ध नहीं हैं, इस वजह से यह जांचना संभव नहीं है कि शिमनित द्वारा दी गई न्यूनतम दरें उचित हैं या नहीं. गौरतलब है कि उस समय शिमनित उच कंपनी की न्यूनतम निविदा का वेटेड एवरेज 530.17 रु था. जबकि उसी समय तमिलनाडु में शिमनित का एवरेज 102.74 रुपये का था. यानी उसी काम के लिए उत्तर प्रदेश में कंपनी पांच गुना से भी ज्यादा पैसा वसूलना चाहती थी.

हाल ही में जब सपा सरकार ने नए सिरे से ठेका आवंटित करने के लिए कंपनियों की बैठक की तो उसमें शिमनित के प्रतिनिधि भी मौजूद थे

टेंडर समिति ने अपनी संस्तुति में कहा कि परिवहन विभाग पहले अन्य राज्यों में चल रही दरों की सूचना जुटाए और इसके बाद न्यूनतम निविदादाता से मोलभाव करके अंतिम दर तय करे. इन टिप्पणियों को परिवहन मंत्री को दिखाने के बाद मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिमंडलीय समिति के सामने प्रस्तुत किया गया. समिति ने यह प्रस्ताव परिवहन विभाग के पास यह कहते हुए भेज दिया कि वह सात दिन के भीतर निर्णय लेकर सरकार को बताए.

लेकिन मंत्रिमंडल में एक तरह से शिमनित का टेंडर पास हो जाने के बाद परिवहन विभाग ने अन्य राज्यों से रेट लेने की जहमत तक नहीं उठाई. विभाग के सूत्र बताते हैं कि सरकार के दबाव में 22 दिसंबर को ही कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह के सचिवालय स्थित कक्ष में परिवहन विभाग के प्रमुख सचिव सहित कई बड़े अधिकारियों की एक बैठक बुलाई गई. इसके तुरंत बाद शिमनित उच को टेंडर आवंटन का लेटर जारी कर दिया गया. बाई सर्कुलेशन द्वारा जिस प्रस्ताव को पास करके एक सप्ताह का समय सरकार की ओर से दिया गया था उसका भी इंतजार करने की जरूरत नहीं समझी गई. कंपनी की ओर से अंतिम वेटेड एवरेज रेट 425.27 रुपये तय कर दिया गया. कैबिनेट सचिव की बैठक के बाद ही कंपनी को अनुबंध पत्र भी जारी कर दिया दिया.

दिलचस्प बात यह है कि ठेके की इस प्रक्रिया में अब तक जितनी भी कमियां उजागर हुई थीं वे सब मुख्यमंत्री की अगुवाई में हुई कैबिनेट की बैठक में रखी गईं. लेकिन न तो मुख्यमंत्री मायावती और न ही किसी मंत्री ने इस पर कोई आपत्ति दर्ज कराई. जब कोलकाता की कंपनी सेलेक्स टेक्नोलाजी मामला लेकर हाई कोर्ट गई तब अदालत ने ठेका रद्द किया.

हैरानी की बात यह भी है कि शिमनित का ठेका रद्द होने के बाद भी उसे आगे बोली लगाने से रोका नहीं जा सकता. हाल ही में जब समाजवादी पार्टी की सरकार ने नए सिरे से हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट का ठेका आवंटित करने के लिए कंपनियों की बैठक की थी तब उसमें शिमनित के प्रतिनिधि भी मौजूद थे. राज्य के एक बड़े अधिकारी बताते हैं कि शाह इस सरकार में भी अपनी पैठ बनाने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं. वे इसके लिए लखनऊ की यात्रा भी कर चुके हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलने के लिए कई लोगों से संपर्क किया लेकिन सफल नहीं हुए. इस दौरान सपा के एक मंत्री से भी शाह की मुलाकात के चर्चे हैं.

सवाल उठता है कि आखिर इतनी गड़बड़ियों के बावजूद आखिर क्यों शिमनित को ब्लैकलिस्ट नहीं किया जा रहा है.  एसोसिएशन ऑफ रजिस्ट्रेशन प्लेट मैनुफैक्चरर्स ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रवि सोमानी कहते हैं,  ‘शाह पर उत्तर प्रदेश सरकार ही मेहरबान नहीं है बल्कि केंद्र सरकार उसकी सबसे बड़ी ढाल बन गई है. तीन-तीन राज्यों में शाह की कंपनियों का ठेका निरस्त होने के बावजूद उसे केंद्र सरकार ने ब्लैक लिस्ट नहीं किया है. हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट लगाने संबंधी प्रमाणपत्र जारी करने का काम केंद्र सरकार का ही है. राज्यों से इसका कोई लेना-देना नहीं. ऐसे में केंद्र से शिमनित उच को बार-बार क्लीन चिट मिलना केंद्र सरकार की ईमानदारी पर भी सवाल खड़े करता है.’

 

सड़न के संकेत

डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया या भारतीय दंत चिकित्सा परिषद (डीसीआई) जिस ढर्रे पर चलती दिखती है उससे तो लगता है कि इसे खुद ही फौरन किसी चिकित्सा की जरूरत है. देश भर में दंत चिकित्सा और इसकी पढ़ाई कराने वाले संस्थानों के नियमन के मकसद से 12 अप्रैल, 1949 को स्थापित इस संस्था पर आज कई तरह की अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं.

डीसीआई का एक अहम काम है देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे डेंटल कॉलेजों को मान्यता देना. इसकी मान्यता के बगैर कोई भी कहीं डेंटल कॉलेज नहीं चला सकता. आरोप है कि कॉलेजों को मान्यता देने के मामले में डीसीआई नियम-कानूनों का पालन नहीं कर रही और गलत ढंग से मान्यता देने व रद्द करने का खेल चला रही है. इसकी वजह है इसके अधिकारियों का भ्रष्टाचार में लिप्त होना.

वैसे डीसीआई पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप नए नहीं हैं. कुछ समय पहले तक डॉ अनिल कोहली इसके अध्यक्ष हुआ करते थे. जब उनके खिलाफ शिकायतों का पिटारा सीबीआई के पास पहुंचा तो जांच एजेंसी ने कोहली के कई ठिकानों पर छापामारी की थी. उन पर यह आरोप था कि उन्होंने गलत ढंग से डेंटल कॉलेजों को मान्यता दी और इस खेल में काफी पैसे बनाए. इन आरोपों की वजह से ही कोहली को डीसीआई का अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा था. हालांकि, यह बात और है कि कई ठिकानों पर छापेमारी और कई तरह के आरोपों के बावजूद आज तक सीबीआई कोहली का कुछ कर नहीं पाई है.

कोहली के डीसीआई के अध्यक्ष पद से हटने के बाद नए अध्यक्ष के तौर पर कोलकाता के डॉ आर अहमद डेंटल कॉलेज के प्राचार्य डॉ दिव्येंदु मजूमदार ने काम-काज संभाला. डीसीआई से जुड़े सूत्र बताते हैं कि तब उम्मीद जगी थी कि कोहली के कार्यकाल में परिषद के काम-काज पर जिस तरह के दाग लगे हैं, मजूमदार उन्हें मिटाने का काम करेंगे. लेकिन आज ये लोग नाराज हैं. इनका आरोप है कि डीसीआई में व्याप्त अनियमितताएं अब तक खत्म नहीं हुई हैं.

मजूमदार पर आरोप है कि उन्होंने कॉलेजों को मान्यता देने के मामले में पक्षपात की नीति को बढ़ावा दिया है. सूत्रों के मुताबिक जिस कॉलेज ने भी मजूमदार को खुश किया उसे मान्यता मिलने में देर नहीं हुई लेकिन जिसने भी उनकी बात नहीं मानी उसकी मान्यता में डीसीआई ने कई रोड़े अटकाए. इन आरोपों की पड़ताल के दौरान तहलका को जो दस्तावेजी सबूत मिले हैं उनसे भी डीसीआई की मान्यता संबंधी निर्णय प्रक्रिया में अनियमितता के आरोपों की पुष्टि होती है.

एक ऐसा ही मामला है बिहार की राजधानी पटना के बीआर अंबेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंसेज ऐंड हॉस्पिटल का. इसके संस्थापक राघवेंद्र नारायण राय हैं. बताते हैं कि एक बार किसी बात को लेकर राघवेंद्र नारायण राय और मजूमदार के बीच कहा-सुनी हो गई थी. इसके बाद मजूमदार ने यह सुनिश्चित कराया कि इस कॉलेज को फिर मान्यता नहीं मिले. 27 अप्रैल, 2011 को डीसीआई की एक समिति ने इस कॉलेज की निरीक्षण रिपोर्ट तैयार की. इस दो सदस्यीय जांच समिति में नागपुर के डॉ. रामकृष्ण शिनॉय और नवी मुंबई के डॉ ओंकार शेट्टी शामिल थे. इस रिपोर्ट पर चर्चा करके इसके आधार पर किसी निर्णय पर पहुंचने के मकसद से 14 मई, 2011 को डीसीआई की कार्यकारी समिति की एक बैठक हुई. इस बैठक में इस रिपोर्ट के अलावा इस डेंटल कॉलेज के प्राचार्य की 26 अप्रैल, 2011 की उस चिट्ठी पर भी चर्चा हुई जिसमें उन्होंने स्वास्थ्य मंत्रालय से डीसीआई को यह निर्देश देने का भी आग्रह किया था कि आगे कोई निरीक्षण न करवाया जाए. इसके बाद 14 जून, 2011 को डीसीआई ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को एक पत्र लिखा जिसमें सिफारिश की गई कि रिपोर्ट और प्राचार्य के पत्र के आधार पर डीसीआई की कार्यकारी समिति ने यह फैसला किया है कि कॉलेज को 2011-12 सत्र में नए छात्रों को दाखिला देने की अनुमति नहीं दी जाए.

जो डीसीआई एक दिन पहले पटना के इस कॉलेज को नया बैच शुरू करने लायक नहीं समझ रही थी, उसी डीसीआई का रुख एक दिन में ही बिल्कुल पलट गया

फिर अचानक अगले दिन यानी 15 जून, 2011 को जो हुआ वह डीसीआई के कामकाज में अनियमितता और पक्षपात के आरोपों की पुष्टि करता हुआ दिखता है. 15 जून को डीसीआई ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को जो पत्र लिखा उसमें 14 जून के पत्र के फैसले को पलटने की सिफारिश की गई और कहा गया कि इस कॉलेज को नए सत्र में छात्रों को दाखिला देने की अनुमति दी जानी चाहिए. तहलका के पास इन दोनों पत्रों की प्रति है. इनसे पता चलता है कि जो डीसीआई एक दिन पहले पटना के इस कॉलेज को इस लायक नहीं समझ रहा था कि वह नया बैच शुरू कर सके उसी डीसीआई को एक दिन बाद यह लग रहा था कि कॉलेज सभी मानकों को पूरा करता है इसलिए उसे नए बैच में छात्रों के दाखिले के लिए अनुमति दी जानी चाहिए. 24 घंटे के अंदर रुख में इस तरह का बदलाव इस ओर इशारा करता है कि संस्था की निर्णय लेने की प्रक्रिया में सब कुछ ठीक नहीं है.

वैसे यह कोई अकेला मामला नहीं है जिसमें डीसीआई ने बहुत कम समय में अपने ही फैसले को पलट दिया हो. बिहार के दरभंगा के सरजुग डेंटल कॉलेज के मामले में भी डीसीआई ने यही किया. इस कॉलेज का निरीक्षण भी 28 अप्रैल, 2011 को रामकृष्ण शिनॉय और ओंकार शेट्टी की दो सदस्यीय समिति ने ही किया था. इस समिति की रिपोर्ट पर चर्चा करने और कोई फैसला करने के लिए डीसीआई की कार्यकारी समिति की बैठक 30 मई, 2011 को हुई. इस समिति के निर्णयों से कॉलेज को अवगत कराने के लिए डीसीआई की तरफ से सात जून, 2011 को एक पत्र कॉलेज को भेजा गया. इसके मुताबिक निरीक्षण में यह पाया गया था कि कॉलेज के पास बुनियादी सुविधाओं व उपकरणों का घोर अभाव है, इलाज में इस्तेमाल होने वाली सामग्री अपर्याप्त है और निरीक्षण के दिन कई प्राध्यापक और शिक्षक मौजूद नहीं थे. पत्र में यह भी लिखा गया कि कॉलेज के कई प्राध्यापक और शिक्षक ऐसे हैं जिनकी उम्र तय सीमा से अधिक है.

लेकिन आश्चर्यजनक ढंग से ठीक एक सप्ताह बाद यानी 14 जून, 2011 को डीसीआई ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को पत्र लिखकर यह बताया कि दरभंगा के सरजुग डेंटल कॉलेज एक स्थापित डेंटल कॉलेज के बुनियादी ढांचे से संबंधित सारे मानकों को पूरा करता है इसलिए इस कॉलेज को नए सत्र में छात्रों को दाखिला देने की अनुमति दी जानी चाहिए. तहलका के पास इन दोनों पत्रों की प्रति है. डीसीआई ने यह भी लिखा कि यह कॉलेज स्थापित डेंटल कॉलेज की श्रेणी में आता है इसलिए नए सत्र में दाखिले की मंजूरी देने के लिए इस कॉलेज के निरीक्षण की जरूरत ही नहीं है.

अब सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कैसे इस कॉलेज ने एक सप्ताह के भीतर उन सारी खामियों को दूर कर लिया जिन पर डीसीआई ने सवाल उठाए थे. सवाल यह भी उठता है कि एक सप्ताह के भीतर आखिर क्या हुआ कि संस्था का रुख बिल्कुल बदल गया. जो डीसीआई एक सप्ताह पहले निरीक्षण के आधार पर खामियों को रेखांकित कर रहा था, उसी ने एक सप्ताह बाद न सिर्फ इस कॉलेज को नए सत्र में दाखिला देने की अनुमति देने की सिफारिश की बल्कि यह भी कहा कि इस कॉलेज को तो निरीक्षण की भी कोई जरूरत नहीं है. हफ्ते भर के भीतर अपना ही फैसला खुद पलट देना डीसीआई में व्याप्त गड़बडि़यों की ओर इशारा करता है.

सूत्रों के मुताबिक ये दो उदाहरण इस बात के हैं कि तमाम आपत्तियों के बावजूद अगर डीसीआई और खास तौर पर उसके अध्यक्ष दिव्येंदु मजूमदार प्रसन्न हो जाएं तो किसी कॉलेज को मान्यता मिलने में देर नहीं होती.

डीसीआई में व्याप्त अनियमितता का दूसरा पहलू यह है कि जो कॉलेज डीसीआई अधिकारियों की इच्छाओं को पूरा नहीं करते उन्हें मान्यता देने के लिए तरह-तरह से परेशान किया जाता है. इसका उदाहरण है बिहार में दरभंगा जिले में बहेड़ा का डॉ नकी इमाम डेंटल कॉलेज. इसके संचालक जफर इमाम हैं. इमाम ने पहले भी डीसीआई में व्याप्त अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई थी. उन्होंने इसकी शिकायत न सिर्फ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद से की थी बल्कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी पत्र लिखा था.

यह भी आरोप है कि जो कॉलेज डीसीआई अधिकारियों की इच्छाओं को पूरा नहीं करते उन्हें मान्यता देने के लिए तरह-तरह से परेशान किया जाता है

इमाम ने बाकायदा शपथ पत्र देकर कहा था कि डीसीआई में किस तरह से धांधली और भ्रष्टाचार का दबदबा है. उन्होंने बताया था कि डेंटल कॉलेजों को मान्यता देने में डीसीआई ने किस तरह से नियमों की अनदेखी की है और भ्रष्ट तरीकों से कॉलेजों को मान्यता देने का काम किया है. अपने शपथ पत्र में उन्होंने इन मामलों की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा था, ‘मैं शपथ पत्र देकर ये आरोप लगा रहा हूं इसलिए अगर मेरे आरोप गलत साबित होते हैं तो आप मुझ पर कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं.’ जाहिर है कि यह बात डीसीआई के अधिकारियों को नागवार गुजरी. खास तौर पर इसलिए भी कि डीसीआई की मान्यता से ही डेंटल कॉलेज चलाने वाले व्यक्ति ने ऐसा किया था.

इसके बाद से डीसीआई ने लगातार इमाम के कॉलेज की मान्यता अटकाने का काम किया. इस संस्थान को केंद्र सरकार ने 2007 में स्पष्ट तौर पर बताया था कि इस कॉलेज को तब तक हर साल निरीक्षण की प्रक्रिया से गुजरना होगा जब तक 2007 बैच के छात्र अपनी आखिरी परीक्षा न दे दें. इस निरीक्षण का आधार 1993 में तय मानक होंगे. इसी आधार पर कॉलेज ने डीसीआई को निरीक्षण कराने के लिए पत्र लिखा और 25 जनवरी, 2012 की तारीख अपनी तरफ से प्रस्तावित की. कॉलेज की तरफ से यह तारीख इसलिए दी गई कि अंतिम परीक्षा इसी दिन से शुरू होनी थी. यह कॉलेज दरभंगा के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से संबद्ध है. 24 जनवरी, 2012 को डीसीआई ने सीधे विश्वविद्यालय को पत्र लिखकर उससे परीक्षा की तिथि बढ़ाने और नई तिथि की सूचना कम-से-कम तीन सप्ताह पहले देने को कहा. इस पर अमल करते हुए विश्वविद्यालय ने परीक्षा की नई तिथि 27 फरवरी, 2012 तय की और इसकी सूचना 6 फरवरी, 2012 को डीसीआई को दे दी.

इसके बाद डीसीआई ने 24 फरवरी को नकी इमाम डेंटल कॉलेज को पत्र लिखकर बताया कि आपके कॉलेज का निरीक्षण 27 फरवरी, 2012 को कराया जाएगा. लेकिन कॉलेज प्रबंधकों का कहना है कि निरीक्षण करने के लिए दो सदस्यीय टीम 25 फरवरी को ही कॉलेज पहुंच गई और उन्होंने 1993 के मानकों की बजाय नए मानकों के आधार पर निरीक्षण करने की बात कही. इस पर कॉलेज प्रबंधन का पक्ष यह था कि उनकी मान्यता में पुराने यानी 1993 के मानकों की बात की गई है. इस सबके बीच इस निरीक्षण दल ने अपना काम पूरा किया.

इसके दो दिन बाद यानी पहले से तय 27 फरवरी की तारीख पर फिर से डीसीआई की एक टीम निरीक्षण के लिए पहुंच गई. इसने भी अपना काम किया. इसके बाद 28 फरवरी, 2012 को डीसीआई ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के पास यह अनुशंसा भेज दी कि 25 फरवरी के निरीक्षण के आधार पर डीसीआई का यह मत है कि इस कॉलेज को नए सत्र में दाखिला देने की अनुमति नहीं दी जाए. डीसीआई ने अपनी अनुशंसा में 25 फरवरी के निरीक्षण का जिक्र तो किया लेकिन 27 फरवरी के निरीक्षण का कोई जिक्र नहीं किया.

इससे कई सवाल खड़े होते हैं. पहली बात तो यह कि आखिर डीसीआई ने पहले से अपने ही द्वारा निरीक्षण की तय तारीख को क्यों बदला? जब इस कॉलेज को मान्यता देते समय ही यह साफ कर दिया गया था कि इसे पहले 1993 के मानकों को पूरा करना है तो फिर पहले निरीक्षण में नए मानकों को आधार बनाने का मतलब क्या है? जब एक निरीक्षण दल ने 25 फरवरी को निरीक्षण पूरा कर लिया तो फिर 27 फरवरी को दूसरा निरीक्षण दल भेजने का क्या औचित्य है? अगरा दूसरा निरीक्षण दल भेजा गया तो फिर इसकी जांच रिपोर्ट को भी अनुशंसा का आधार क्यों नहीं बनाया गया? आखिर क्यों सिर्फ पहले निरीक्षण दल की रिपोर्ट के आधार पर  अनुशंसा कर दी गई? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो इस ओर इशारा करते हैं कि देश में दंत चिकित्सा और इसे पढ़ाने वाले संस्थानों के नियमन के लिए गठित डीसीआई में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.

तमाम आरोपों पर डीसीआई का पक्ष जानने के लिए ‘तहलका’ ने संस्था के अध्यक्ष मजूमदार से संपर्क करने की कोशिश की. लेकिन उनसे बार-बार यही जवाब मिला कि वे अभी व्यस्त हैं.

तो आखिर में सवाल यही कि डीसीआई पर उठते सवालों का जवाब कौन देगा.

 

'मुझे ईश्वर से काफी मानसिक शक्ति मिली है'

मणिपुर में लागू सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफ्स्पा) नाम का कठोर कानून हटाने को लेकर इरोम शर्मिला का आमरण अनशन अपने बारहवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है. सालों के उपवास का असर उनके क्षीण शरीर पर साफ दिखता है. इसके बावजूद उनकी दृढ़ता और अपने उद्देश्य के प्रति उनके समर्पण में जरा भी कमी नहीं आई है. उर्मि भट्टाचार्य के साथ हुई उनकी बातचीत के अंश

बारह साल से आपने अन्न-जल त्याग रखा है. नाक के रास्ते जबरन आपको खाना दिया जाता है. सामान्य आदमी के लिए यह संभव नहीं है. आप कैसे कर पाती हैं?

मुझे ईश्वर से काफी मानसिक शक्ति मिली है. एक बार अगर आप किसी लक्ष्य पर अपना ध्यान केंद्रित कर लें तो कोई भी चीज आपको भटका नहीं सकती, भूख भी नहीं. यह ध्यान जैसी स्थिति है. मुझे अपने अंतर में ईश्वर की अनुभूति होती है. उस ईश्वर की जो मुझे मानवता, सच्चाई और प्रेम के लिए संघर्ष करने की ताकत देता है. देर-सबेर महात्मा गांधी की इस धरती से अफ्स्पा हटेगा. 

आपकी दृढ़ता बहुत-से लोगों की प्रेरणा है, पर आप किससे प्रेरित होती हैं? क्या आपने किसी को अपना आदर्श बनाया है?

(मुस्कुराते हुए) मैंने उन तमाम योगियों की जीवनगाथा पढ़ी है जिन्होंने सालों साल तक हिमालय में चिंतन-मनन किया. स्वामी राम द्वारा लिखी गई ‘लिविंग विद द हिमालयन मास्टर्स’ नाम की किताब का मुझ पर काफी प्रभाव है. उनके वास्तविक जीवन के अनुभवों से मुझे बड़ी प्रेरणा मिलती है. मुझे पता है कि हर घटना के पीछे कोई न कोई मकसद होता है. मुझे थोड़ा धैर्य रखना चाहिए और सच की लड़ाई में कभी हार नहीं माननी चाहिए.

आपको मणिपुर की लौह महिला कहा जाता है. यह संबोधन आपको अच्छा लगता है?

मैं मणिपुरी लोगों के लिए जी रही हूं, वही मेरी ताकत हैं. अगर वे मेरी कोशिशों को स्वीकार कर रहे हैं तो मुझे खुशी है. इससे मुझे अपनी जिम्मेदारियों का अहसास और बढ़ जाता है. मेरी प्रार्थना है कि मेरे प्रयास उन्हें न्याय दिला सकें.

‘मणिपुर से अफ्स्पा का उन्मूलन भ्रष्टाचार खत्म करने की दिशा में पहला कदम होगा. इससे राज्य में स्वस्थ लोकतंत्र का रास्ता तैयार होगा’

आपके व्यक्तिगत रिश्तों को लेकर तमाम खबरें उड़ीं. इस वजह से आपके राज्य में काफी खलबली भी मची. इस पर क्या कहेंगी?

मेरी समझ में नहीं आता कि इससे मेरा मकसद कैसे प्रभावित होता है. मैं इस पर ध्यान नहीं देती. अगर मीडिया वास्तव में संवेदनशील है तो उसे इस मकसद के लिए आवाज उठानी चाहिए. यहां लोग कष्ट में हैं, हम ऐसी तुच्छ बातों पर समय बर्बाद नहीं कर सकते. 

आपके निरंतर प्रतिरोध के बावजूद सरकार इस कानून को हटाने की इच्छुक नहीं दिखती. क्या आपका विरोध धीमा पड़ रहा है? क्या विरोध के अहिंसावादी तरीके में आपका अभी भी विश्वास है?

ऐसा नहीं है, विरोध अब और भी फैल रहा है. भले ही सरकार इच्छुक नहीं दिख रही हो लेकिन हाल के दिनों तक जिस अफ्स्पा के बारे में ज्यादातर लोगों को कुछ पता ही नहीं होता था आज देश का हर आदमी उस बर्बर कानून के बारे में जानता है. सरकार भी अंतत: इसे स्वीकार करेगी. मैं कभी भी अहिंसा का रास्ता नहीं छोड़ूंगी. 

आप बारह साल से आमरण अनशन कर रही हैं. क्या कभी कोई क्षण ऐसा आया जब आपको निराशा ने घेर लिया हो?

मैं हमेशा सकारात्मक सोचती हूं. जब तक हमारे यहां सामाजिक बुराई और भ्रष्टाचार है मेरा संघर्ष जारी रहेगा. सच्चाई पर मेरी आस्था है और यही मुझे प्रेरित करती है. लोग इस बात को समझ रहे हैं और जल्द ही स्थितियां बदलेंगी. 

राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार को देखते हुए क्या आपको लगता है कि यह कानून हटने से मणिपुर के लोगों के अधिकार बहाल हो जाएंगे?

अफ्स्पा हटने भर से मानवाधिकारों का उल्लंघन, सामाजिक पतन और भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा. हालांकि यह भ्रष्टाचार उन्मूलन की दिशा में पहला कदम होगा और इससे राज्य में स्वस्थ लोकतंत्र का रास्ता तैयार होगा. यहां लोगों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी उन्हें नौकरी पाने के लिए घूस देनी पड़ती है.    

कहा जा रहा था कि आपके आंदोलन के मुकाबले अन्ना हजारे के आंदोलन को जरूरत से ज्यादा तवज्जो दी गई. आपको क्या लगता है?

अन्ना के आंदोलन को शायद ज्यादा तवज्जो मिली हो क्योंकि लोगों ने खुद को इससे जुड़ा पाया. सभी राज्यों ने अफ्स्पा के बर्बर रूप को नहीं झेला है. इसकी आड़ में सेना किसी के भी घर में बिना किसी वारंट के घुस सकती है और जो चाहे मनमानी कर सकती है. मुझे पूरा विश्वास है कि अगर हर भारतीय यह देख ले कि उग्रवाद पर काबू पाने के नाम पर किस तरह बलात्कार, हत्या और यातना जैसी चीजें होती हैं तो उसकी रूह कांप जाएगी. मैं केंद्र सरकार के दमनात्मक रवैये के भी खिलाफ हूं क्योंकि कानून की निगाह में हम सभी बराबर हैं.

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में भारत से आग्रह किया गया है कि वह अफ्स्पा हटाए?

मुझे खुशी है कि उन्होंने अफ्स्पा को स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरा माना है. मुझे उम्मीद है कि हमारी सरकार इस संदेश को गंभीरता से लेगी. मैं ज्यादा से ज्यादा आरटीआई कार्यकर्ताओं से अपील करती हूं कि वे यहां आएं और यहां फैले अन्याय और कुशासन को सार्वजनिक करें.

धोखाधड़ी से डॉक्टरी

 

यदि आपका बच्चा पढ़ने में कमजोर हो, 10वीं या 12वीं थर्ड डिवीजन में पास हुआ हो, आप उसे डॉक्टर बनाना चाहते हों लेकिन यह भी समझते हों कि वह मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में पास नहीं हो पाएगा तो चिंता न करें. आपका यह सपना पूरा हो सकता है.

यह फर्जी डॉक्टर बनाने वाले किसी संस्थान का विज्ञापन लग सकता है. लेकिन उत्तराखंड के दोनों सरकारी मेडिकल कॉलेजों का कोई विज्ञापन बने तो वह भी कुछ ऐसा ही होगा. अपनी पड़ताल में तहलका के हाथ जो जानकारियां लगीं वे साफ इशारा करती हैं कि यहां पढ़ रहे छात्रों का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो प्रतिभा नहीं बल्कि जुगाड़ के बल पर यहां आया है. कई छात्र ऐसे हैं जिनका स्कूली शिक्षा का रिकॉर्ड दयनीय है, लेकिन ये न सिर्फ इन कॉलेजों में प्रवेश पा गए बल्कि प्रवेश परीक्षा की लिस्ट में अव्वल भी आए. तहलका की  पड़ताल यह संकेत भी देती है कि यह गोरखधंधा इन कॉलजों की शुरुआत से ही चल रहा है. इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा हैरानी और चिंता की बात यह है कि फर्जीवाड़े का पैमाना इतना बड़ा होने पर भी सरकार ने अब तक किसी उच्च स्तरीय जांच की घोषणा नहीं की है. जो जांच चल रही है और जिस हिसाब से चल रही है उससे लगता नहीं कि सरकार को इस गोरखधंधे के असली खिलाड़ियों को पकड़ने और उन्हें दंडित करने में कोई दिलचस्पी है.

उत्तराखंड में केवल दो सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं.  एक हल्द्वानी और दूसरा श्रीनगर नाम के कस्बे में. 200 की क्षमता वाले इन कॉलेजों में हर साल 170 छात्रों का चयन उत्तराखंड सरकार द्वारा तय एजेंसी प्रदेश स्तरीय मेडिकल परीक्षा के माध्यम से करती है. बाकी छात्र आॅल इंडिया पीएमटी परीक्षा के जरिए चुनकर आते हैं. प्रवेश परीक्षा कराने वाली एजेंसी का चयन चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग करता है.

बताया जाता है कि यह घोटाला तब खुला जब हल्द्वानी स्थित मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य को शक हुआ कि प्रवेश परीक्षा पास करके आ रहे छात्रों का एक बड़ा हिस्सा शैक्षणिक प्रतिभा के मामले में उस स्तर का नहीं है जैसा होना चाहिए. इसके बाद जांच हुई तो 17 छात्र ऐसे निकले जिन्होंने फर्जीवाड़ा करके प्रवेश परीक्षा पास की थी. फिलहाल स्थिति यह है कि ऐसे 33 छात्र मेडिकल कॉलेजों से निकाले जा चुके हैं. इनमें से 16  श्रीनगर (गढ़वाल) स्थित मेडिकल कॉलेज में थे. इनमें दो छात्राएं भी हैं. इन्हें 2011 में हुई राज्य पीएमटी परीक्षा के जरिये प्रवेश मिला था. इन सभी के खिलाफ संगीन धाराओं में मुकदमे भी दर्ज कर लिए गए हैं. आरोप यह है कि इनकी जगह किसी और ने प्रवेश परीक्षा दी थी इसलिए प्रवेश परीक्षा के दिन ली गई इनके अंगूठे की छाप और मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के समय ली गई  अंगूठे की छाप अलग-अलग निकली. छात्रों की बर्खास्तगी का फैसला फॉरेंसिक जांच के नतीजों के आधार पर लिया गया. इनके अलावा श्रीनगर मेडिकल कॉलेज के  40 और छात्र भी शक के दायरे में हैं. ये भी 2011 बैच के हैं. इसी बैच के हल्द्वानी में पढ़ रहे दर्जनों छात्रों पर भी शक की तलवार लटक रही है. ये ऐसे छात्र हैं जिनके अंगूठे के निशान स्पष्ट नहीं हैं और इसलिए इनके मामले में चल रही फॉरेंसिक जांच अभी खत्म नहीं हो पाई है.

दोनों कॉलेजों का मकसद यह था कि गरीब परिवारों से ताल्लुक रखने वाली प्रतिभाएं भी डॉक्टर बन सकें. पर हुआ उल्टा. यानी यह बड़ी नीतिगत असफलता भी है

2011 के बैच में जब इतनी बड़ी संख्या में फर्जीवाड़ा करके आए छात्र पकड़े गए तो श्रीनगर मेडिकल काॅलेज ने फैसला किया कि साल 2010 की परीक्षा के जरिए यहां प्रवेश पाने वाले 89 छात्रों की भी जांच करवाई जाए. कॉलेज ने उस साल प्रवेश परीक्षा कराने वाली एजेंसी उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय को लिखा कि वह परीक्षा कक्ष में ली गई इन छात्र की अंगूठे की छाप भेजे. लेकिन कोई जवाब नहीं आया. छह बार रिमाइंडर देने के बावजूद स्थिति यही रही. कई महीने बाद विश्वविद्यालय ने मेडिकल कॉलेज से ही कॉलेज में प्रवेश के समय ली गई छात्रों के अंगूठे की छाप अपने पास मंगवाई. बताया गया कि विश्वविद्यालय खुद जांच करवाना चाहता है. लेकिन महीनों बीत गए और मसला वहीं का वहीं है. यानी आगे बढ़ने की कोई इच्छा नहीं.

वैसे इसकी पूरी कोशिश हुई थी कि दाखिले के दो साल बाद होने वाली जांच में भी छात्रों को संदेह का लाभ मिल जाए. प्रवेश परीक्षा के समय परीक्षा कक्ष में लिए गए अंगूठे के निशानों के नीचे परीक्षा कक्ष निरीक्षक के हस्ताक्षर नहीं थे. इनके अलावा छात्रों के विवरणों में कई गलतियां भी थीं. यही हाल मेडिकल काॅलेज का भी था. यहां भी प्रवेश देते समय लिए गए अंगूठों के निशानों की पुष्टि करने वाले विश्वविद्यालय के किसी भी अधिकारी के हस्ताक्षर मौजूद नहीं हैं. एक प्राध्यापक बताते हैं, ‘परीक्षा प्रक्रिया में इस तरह की गलतियां जान-बूझ कर किसी गिरोह को मदद करने के लिए की गई होंगी.’ गौरतलब है कि तकनीकी विश्वविद्यालय पहले भी कई गलत वजहों से सुर्खियों में रहा है.

2011 में फर्जी ढंग से प्रवेश पाने वाले इतने सारे छात्र पकड़े गए. प्रवेश परीक्षा के पीछे एक रैकेट सक्रिय है, ऐसी खबरें तो बहुत पहले से ही उड़ रही थीं. इसके बावजूद हैरानी की बात है कि उत्तराखंड शासन ने कभी भी मेडिकल कॉलेजों से यह नहीं कहा कि पुराने बैचों के छात्रों की भी जांच की जाए. गौरतलब है कि पिछले पांच साल के दौरान राज्य में मेडिकल चिकित्सा विभाग ज्यादातर मुख्यमंत्रियों के पास ही रहा है.

इस घोटाले के बारे में न सरकार में कोई कुछ बोलने को तैयार है और न ही मेडिकल कॉलेज या परीक्षा कराने वाली एजेंसी का कोई अधिकारी इस मसले पर कुछ कहना चाहता है. एक जांच अधिकारी बताते हैं, ‘पहली नजर में ही ज्यादातर छात्र फर्जी दिखते हैं , लेकिन परीक्षा आयोजित कराने वालों ने हर स्तर पर ऐसी गलतियां की हैं कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निकाले गए छात्रों को भी अदालत में फर्जी साबित करना मुश्किल होगा.’

तहलका ने 2011 की राज्यस्तरीय मेडिकल मेरिट सूची के पहले 30 अभ्यर्थियों की जांच की. इन 30 में  से  केवल 21 ने ही  राज्य के मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश लिया था. जांच के बाद इन 21 टॉपर छात्रों में से 12 यानी करीब 60 फीसदी छात्र निकाले जा चुके हैं. चार और छात्र शक के दायरे में हैं. ये वही हैं जिनके अंगूठे की छाप अस्पष्ट है. तहलका ने निकाले गए और संदेह का लाभ ले रहे इन 16 छात्रों के हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के अंकों की खोज-बीन की तो पाया ये सभी छात्र इन दोनों परीक्षाओं में द्वितीय श्रेणी में पास हुए थे. इन टॉपर  21 छात्रों में से केवल पांच यानी 25 फीसदी छात्र ही ऐसे थे जिन्हें हाई-स्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा में 80 प्रतिशत के पास या उससे ऊपर अंक मिले थे. इन पांच प्रतिभाशाली छात्रों को अंगूठे की जांच में कोई परेशानी नहीं हुई. तहलका को पता चला कि 2011 में जो 33 छात्र निकाले गए उनमें से इक्का-दुक्का ही ऐसे हैं जो हाई स्कूल या इंटर की परीक्षा में प्रथम श्रेणी से पास हुए हैं.

तहलका ने 2011 से पहले के वर्षों में दाखिला लेने छात्रों की भी पड़ताल की. इनके हाई स्कूल व इंटरमीडिएट परीक्षा के रिकॉर्ड, मेडिकल प्रवेश परीक्षा की मेरिट और मेडिकल काॅलेज में इनके प्रदर्शन पर गौर किया जाए तो फर्जीवाड़ा खुद-ब-खुद बोलता है. उदाहरण के तौर पर, साल 2009 में श्रीनगर मेडिकल काॅलेज में प्रवेश पाने वाले एक छात्र के हाईस्कूल की परीक्षा केवल 39.20 प्रतिशत अंक थे. यह छात्र इंटरमीडिएट की परीक्षा 58.80 प्रतिशत अंकों के साथ पास हुआ. लेकिन मेडिकल प्रवेश परीक्षा में उसकी 58वीं रैंक थी जिसे बहुत अच्छा कहा जाता है. हमने मेडिकल काॅलेज की परीक्षाओं में इस छात्र के प्रदर्शन की जांच की. पता चला कि प्रवेश परीक्षा में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाला यह ‘प्रतिभाशाली’ छात्र दो विषयों की परीक्षा में हाजिरी कम होने के कारण नहीं बैठ पाया और जिन दो विषयों की परीक्षा में वह वैठा, उन दोनों ही में वह फेल हो गया.

ऐसे और भी कई उदाहरण हैं. इसी बैच में हाई-स्कूल की परीक्षा 38.10 और इंटर की परीक्षा 55.80 फीसदी अंक के साथ पास करने वाला एक छात्र मेडिकल प्रवेश परीक्षा में 79वीं रैंक लाया. लेकिन अब उसकी कहानी भी खराब है. प्रवेश परीक्षा में इतना बढ़िया प्रदर्शन करने वाले ये छात्र अभी पहले ही वर्ष की परीक्षा पास करने के लिए जूझ रहे हैं, जबकि इन्हें तीसरे वर्ष में होना चाहिए था. दूसरी ओर इसी बैच में हाईस्कूल व इंटर की परीक्षाओं में 80 से लेकर 90 फीसदी अंक लाने वाली चारु जखवाल और इशिता गुप्ता की रैंक प्रवेश परीक्षा में 128 व 149 आई थी. यह रैंक पहले दो उदाहरणों से काफी पीछे है. प्रवेश परीक्षा में काफी पीछे रहने के बावजूद ये छात्राएं मेडिकल काॅलेज की परीक्षाओं में टॉपर हैं.

हैरानी स्वाभाविक ही है कि पढ़ाई में हमेशा फिसड्डी रहने वाले सारे छात्र अचानक जिंदगी में एक परीक्षा यानी मेडिकल प्रवेश परीक्षा में बेहतरीन प्रदर्शन कर जाएं. इस बैच में दोनों काॅलेजों में दर्जनों ऐसे छात्र हैं जिन्हें हाईस्कूल और इंटर की परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी भी नहीं मिली पर मेडिकल प्रवेश परीक्षा की मेरिट सूची में ये सभी अव्वल स्थान पर रहे. अब ये सभी छात्र मेडिकल काॅलेज में पढ़ाई में फिसड्डी हैं. कॉलेज के एक प्रोफेसर बताते हैं, ‘ये किसी तरह घिसटते-घिसटते 8- 10 सालों में एमबीबीएस पास कर ही लेंगे. फिर सरकार को इन्हें जब नौकरी देनी ही है तो फिर भला इन्हें क्या चिंता?’

मेडिकल कॉलेजों में फर्जी प्रवेश कराने वाला रैकेट और डॉक्टर बनने की हसरत रखने वाले प्रत्याशी उत्तराखंड में कितने बेखौफ होकर काम कर रहे थे इसका एक उदाहरण देखिए. साल 2008 में हरिपाल नाम के एक छात्र को हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में निष्कासित कर दिया गया था. इस छात्र ने उत्तराखंड राज्य का गलत मूल निवास प्रमाण पत्र बनाकर दाखिला लिया था. लेकिन यही हरिपाल एक बार फिर 2011 में परीक्षा देकर श्रीनगर स्थित राज्य के दूसरे मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाने में सफल रहा. यहां भी हरिपाल अंगूठे की जांच में पकड़ा गया और बाहर हो गया. हल्द्वानी कॉलेज में पकड़े जाने पर हरिपाल के शैक्षिक प्रमाण पत्र वहीं जब्त कर लिए गए थे. अब सवाल उठता है कि फिर उसने किन शैक्षिक प्रमाण पत्रों के आधार पर प्रवेश लिया. हरिपाल की 2008 में 48वीं रैंक थी. 2011 में मेडिकल प्रवेश परीक्षा में 180वें स्थान पर आए हरिपाल के प्रमाणपत्र बताते हैं कि उसने हाईस्कूल की परीक्षा 49 और इंटरमीडिएट परीक्षा 59 फीसदी अंकों के साथ पास की है.

 

इसकी पूरी कोशिश हुई है कि जांच में भी छात्रों को संदेह का लाभ मिल जाए. देखा जाए तो प्रवेश परीक्षा से लेकर दाखिले की प्रक्रिया तक कई गड़बड़ियां हैं

 

मेडिकल कॉलेज, तकनीकी विश्वविद्यालय और उत्तराखंड शासन का इस फर्जीवाड़े के प्रति जो रुख है और पुलिस की जांच जिस गति से चल रही है उसे देखकर अंदाजा हो जाता है कि उत्तराखंड में काम कर रहे इस गिरोह की जड़ें बहुत गहरी हैं. सूत्र बताते हैं कि इस गिरोह की पैठ शासन से लेकर कॉलेज तक और पेपर आयोजित कराने वाली एजेंसी से लेकर मेडिकल कॉलेजों तक हर स्तर पर है. यह गिरोह उन छात्रों को अपनी गिरफ्त में लेता है जो कई सालों से कोचिंग कर रहे हैं. डॉक्टर बनने की चाहत रखने वाली धनी मां-बाप की जो संतानें मेहनत से प्रवेश परीक्षा नहीं निकाल सकतीं उन्हें लालच देने का काम होता है. इस सारी प्रक्रिया में कोचिंग कराने वाले संस्थानों की भूमिका भी संदेहास्पद है. देहरादून के एक कोचिंग संस्थान ने तो अपने विज्ञापनों में अभी भी शान के साथ उन छात्रों की फोटो और नाम छापे हुए हैं जो 2011 में मेरिट में आए लेकिन फर्जीवाड़ा पकड़े जाने पर जिन्हें बाद में निकाल दिया गया.

एक मायने में देखा जाए तो यह एक बड़ी नीतिगत असफलता भी है. 2008 में श्रीनगर में मेडिकल कॉलेज के उद्घाटन के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी ने वादा किया था कि इससे आस-पास के पहाड़ी जिलों के प्रतिभाशाली छात्र यहां मेडिकल की पढ़ाई करके इन दुर्गम क्षेत्रों की सेवा करेंगे. परंतु हुआ उल्टा. शुरुआती वर्षों में यहां प्रवेश लेने वाले छात्रों में से उंगली पर गिनने लायक छात्र ही इन जिलों के थे. पहले तीन सालों तक शक के दायरे में आने वाले अधिकांश छात्र ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार और देहरादून के थे. इस बात के फैलने पर इस गिरोह ने अब पहाड़ी जिलों में भी अपना शिकार खोजना शुरू कर दिया था. पिछले साल निष्कासित 33 छात्रों में से चार-पांच छात्र ही इन पहाड़ी जिलों के निवासी हैं.

काॅलेजों से निष्कासित मुन्ना भाइयों के अभिभावकों की चिंता है कि अब उनके बच्चे घर से बाहर निकलने की स्थिति में नहीं हैं. उधर, ऐसे सैकड़ों प्रतिभावान छात्र-छात्राएं भी हैं जो स्कूल में अच्छा प्रदर्शन करने और जी-तोड़ तैयारी के बाद भी मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास नहीं कर पाने के कारण अवसादग्रस्त हो गए हैं. इनके अभिभावकों में से कई ने कर्ज लेकर इन्हें कोचिंग कराई है. फर्जी छात्रों के प्रवेश परीक्षा में निकलने के कारण इन मेधावी बच्चों का समय बर्बाद हुआ और इनके अभिभावकों का पैसा व्यर्थ गया. सवाल यह भी है कि धीरे-धीरे राज्य की मेडिकल सेवा में प्रवेश करने वाले ये मुन्ना भाई गरीबों का कैसा इलाज करेंगे.

वक्त के साथ बदले तरीके

80 के दशक में मेडिकल प्रवेश परीक्षा का पेपर बाहर भेज कर हल कराया जाता था. यह सुविधा बहुत सीमित छात्रों को मिल पाती थी. समय के साथ फर्जीवाड़े के तरीके भी बदले हैं.  अब सारी परीक्षा और हर छात्र को परीक्षा में पास कराने का ठेका एक ही गैंग का होता है. यह गिरोह फॉर्म भराने से लेकर काउंसलिंग से आगे बढ़ाने तक का ठेका लेता है. परीक्षार्थी के बदले कोई और परीक्षा देता है. परीक्षा देने वाले युवक-युवतियों को देश के नामी मेडिकल काॅलेजों का छात्र बताया जाता है. लेकिन हकीकत यह है कि गैंग के ये सदस्य साधारण साइंस पढ़े होते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली छात्रों का मिलना असंभव है. एक साल तक मेडिकल की पढ़ाई के साथ प्रवेश परीक्षा में बढ़िया नतीजे देना भी आसान नहीं है इसलिए अधिक संभावना यह है कि रैकेट की पहुंच प्रवेश परीक्षा के पेपर तक होती होगी. गिरोह के सदस्य  छात्र की हैसियत के हिसाब से उससे पैसा वसूलते हैं. 10 से लेकर 25 लाख तक का सौदा होता है. कोई एडवांस नहीं. लिखित परीक्षा के बाद काउंसलिंग के समय पैसा लेकर छात्र का प्रवेश पत्र वापस किया जाता है. इसके बाद की जिम्मेदारी रैकेट की बजाय प्रवेश लेने वाले छात्र की होती है. सारा पैसा गिरोह के मुखिया के पास पहुंचता है और वही सबको बांटता है.(महिपाल कुंवर और गरिमा सिंह के सहयोग से)