Home Blog Page 1510

जासूसी के जाल में एक गांव…

ये डडवां गांव का रास्ता किधर से जाता है?  इस सवाल के जवाब में सामने खड़ा अधेड़ उम्र का वह व्यक्ति पहले मुझे ऊपर से नीचे तक ध्यान से देखता है, उसके बाद बिना कुछ बोले हाथ के इशारे से बाईं तरफ वाली कच्ची सड़क पर जाने को कहता है. जैसे ही कार गांव में प्रवेश करती है वैसे ही बाहर खड़े लोग अपने घरों के भीतर चले जाते हैं. कुछ लोग हमें अपने घरों की छतों से छिपकर देखते हैं. सामने से आ रहे एक बुजुर्ग को हम हाथ से इशारा करके रुकने के लिए कहते हैं, वह हाथ जोड़ते हुए आगे निकल जाता है.
थोड़ी ही देर में एक बच्चा साइकिल चलाते हुए वहां आता है. उसे हम रोकते हैं और सुनील भोला के घर का पता पूछते हैं. वह सामने वाले घर की तरफ इशारा करता है. हम दरवाजा खटखटाते हैं, लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आती. ‘जासूसों के गांव’ के नाम से चर्चित डडवां में जाने के पहले ही हमें ऐसे किसी असामान्य व्यवहार के लिए चेताया गया था लेकिन यह कुछ ज्यादा ही अजीब है.

दरवाजे के सुराख से अंदर देखने पर एक महिला खड़ी होकर दरवाजे की तरफ देखती हुई नजर आती है. काफी प्रयास के बाद भी जब वह दरवाजा नहीं खोलती तो हमारे साथ खड़े जासूस करामत राही कोशिश करते हैं. वे वृद्ध महिला को संबोधित करते हुए कहते हैं, ‘अरे अम्मा मैं जासूस करामत राही हूं, मैंने भी भोला की तरह ही पाकिस्तान में जासूसी का काम किया है. मेरे साथ ये दिल्ली से पत्रकार आए हैं. हम लोग भोला से मिलना चाहते हैं.’ कुछ देर बाद दरवाजा खुलता है. एक ऐसी महिला का चेहरा हमारे सामने होता है जिसे देखकर लगता है मानो प्रकृति ने दुनिया की सारी तकलीफें इसी के हिस्से में दे दी हों. ये भोला की मां हैं. वे प्लास्टिक की दो कुर्सियां निकालकर बाहर रखती हैं. इससे पहले कि हम उनसे कुछ पूछते वे बेतहाशा रोने लगती हैं. इस बीच में अड़ोस-पड़ोस से कई महिलाएं और पुरुष वहां इकट्ठा हो जाते हैं.

15 मिनट से लगातार रो रही उस महिला को पड़ोस की एक महिला पानी पिलाती है. वे बुजुर्ग महिला हमें बताती हैं, ‘भोला नहीं जाना चाहता था, वह जाते वक्त रो रहा था, घर के बाहर खड़ी गाड़ी में साहब लोग बैठे थे. वे उसे गाड़ी में बैठाकर ले गए. वह अभी तक वापस नहीं लौटा. उसने मुझसे कहा कि माई मैं नहीं जाना चाहता लेकिन एजेंसी वाले मुझे परेशान कर रहे हैं. डेढ़ साल हो गए हैं, हमें अब तक उसकी कोई खबर नहीं मिली.’ उस महिला के मुंह से यह सुनकर हमें हैरानी होती है. दरअसल सितंबर, 2009 में अहमदाबाद में वरिष्ठ अधिवक्ता किशोरी पॉल ने एक पत्रकार वार्ता की थी जिसमें पाकिस्तान में जासूसी करने के लिए लंबी सजा काट चुके तीन लोगों को मीडिया के सामने पेश किया गया था. उन्होंने घंटों विभिन्न खुफिया एजेंसियों के लिए किए गए अपने काम, पाकिस्तान में मिली प्रताड़ना और खुफिया एजेंसियों के विश्वासघात से संबंधित बातें पत्रकारों को बताई थीं. इन तीन जासूसों में से एक सुनील भोला भी था. हमारी हैरानी की वजह यह थी कि उसी भोला को फिर पाकिस्तान भेज दिया गया था.

डडवां में ज्यादातर परिवार ऐसे हैं जिनका कोई न कोई सदस्य पाकिस्तान जाकर विभिन्न एजेंसियों के लिए जासूसी कर चुका है.

गांववाले बताते हैं कि पिछले कुछ सालों तक जासूसी ही इस गांव के लिए रोजगार का एकमात्र जरिया थी. एजेंसियों द्वारा तमाम तरह के वादे करके मुकरने, जरूरत के वक्त कोई सहायता न करने और इस काम में जानलेवा जोखिम होने जैसी वजहों के चलते यहां के लोग अब किसी भी कीमत पर जासूसी के काम में पड़ना नहीं चाहते. लेकिन यही बात अब इन लोगों के लिए खुफिया एजेंसियों का एक और बर्बर चेहरा सामने ला रही है. गांववाले बताते हैं कि यदि लोग जासूसी करने से इनकार करते हैं तो उन्हें कई तरह की प्रताड़नाएं झेलनी पड़ती हैं. इसमें स्थानीय पुलिस से टॉर्चर कराने से लेकर उनके ऊपर फर्जी केस दर्ज कराना, यहां तक कि बम ब्लास्ट तक के झूठे मामलों में उन्हें फंसाना तक शामिल है. तहलका ने इस संबंध में जब खोजबीन शुरू की तो इस तरह का आरोप लगाने वाले कई लोग सामने आए.

इसी गांव के 40 वर्षीय ग्रेफान, जो अभी सब्जियां बेचकर अपने परिवार का पेट पालते हैं, ने भी थोड़े समय के लिए खुफिया जासूसी का काम किया है. वे पाकिस्तान जाते थे और यहां के अधिकारियों के कहे अनुसार खुफिया जानकारियां और पाकिस्तानी लोगों को वहां से लाते थे. ग्रेफान के मुताबिक,  ’कुछ दिनों में ही मुझे जासूसों के प्रति खुफिया एजेंसियों का असंवेदनशील रवैया समझ में आ गया. यह भी कि इस काम में भारी खतरे हैं. इसलिए मैंने जासूसी छोड़ने का मन बना लिया. यह बात जब मैंने अपने अधिकारियों को बताई तो वे नाराज हो गए. वे चाहते थे कि मैं काम करता रहूं. जब मैंने ऐसा करने से मना कर दिया तो उन्होंने मुझे तरह-तरह से परेशान करना शुरू कर दिया. थोड़े ही समय बाद उन्होंने मुझ पर पठानकोट में बम धमाका करने का फर्जी केस डाल दिया. यह धमाका तब हुआ था जब मैं पाकिस्तान में भारत के लिए जासूसी कर रहा था. उस दौरान वे लगातार मुझसे कहते रहे कि तुम जासूसी करने के लिए तैयार हो जाओ तो हम ये केस हटा लेंगे.’ केस चलता रहा और आखिरकार कोर्ट ने ग्रेफान को इस आरोप से बरी कर दिया गया. वे बताते हैं, ‘मुझे लगा कि अब एजेंसी वाले मुझे छोड़ देंगे लेकिन उन्होंने मुझ पर पाकिस्तान के लिए जासूसी करने का केस दर्ज करवा दिया. मैं लंबे समय तक जेल में रहा. अभी जमानत पर बाहर हूं. पुलिसवालों ने स्कूल की किताबों में छपे भारत के नक्शे, किताबों में छपी पुल आदि की तस्वीरें को सबूत के तौर पर पेश करते हुए कहा कि मैं पाकिस्तान के लिए यहां जासूसी कर रहा हूं. ये मामला पिछले 10 साल से चल रहा है. अभी भी इंटेलीजेंस वाले कहते हैं, जासूसी के लिए तैयार हो जाओ तो केस हटवा लेंगे.’

इसी गांव के 50 वर्षीय डेनियल ने सन1993 से 1997 तक खुफिया एजेंसियों के लिए पाकिस्तान में जासूसी की थी. उनका मुख्य काम विभिन्न संवेदनशील दस्तावेजों एवं वहां से लोगों को जासूसी के लिए तैयार करके यहां अपने अधिकारियों तक पहुंचाना था. वे पाकिस्तान में गिरफ्तार हुए और उन्हें चार साल की सजा हुई. सजा काटने के बाद जब डेनियल वापस अपने गांव आए तो उन्होंने इस पेशे को छोड़ने की ठानी. उन्होंने जब अपने इरादे के बारे में अधिकारियों को बताया तो उनके साथ भी वही हुआ जो ग्रेफान के साथ हुआ था. डेनियल को 1993 के अमृतसर बम ब्लास्ट केस में फंसा दिया गया. डेनियल के मुताबिक पुलिसवाले कहते थे कि तुम 1993 में ब्लास्ट करके पाकिस्तान भाग गए थे. यह मामला तीन साल तक चला. आखिरकार डेनियल भी इस मामले में दोषमुक्त साबित हो गए. अभी वे एजेंसियों के एक चक्रव्यूह से बाहर निकले ही थे कि उन पर अवैध तरीके से बॉर्डर क्रॉस करने का केस दर्ज कर दिया गया. यह केस अभी तक चल रहा है. फिलहाल रिक्शा चलाकर अपना और परिवार का पेट पाल रहे डेनियल कहते हैं, ‘अभी भी एजेंसी वाले मिलते हैं तो कहते हैं, हमारे लिए काम करो, तुम्हारा जीवन बना देंगे नहीं तो तुम देख ही रहे हो.’

यही हाल गांव के डेविड का है. लंबे समय तक उन्होंने खुफिया एजेंसियों के लिए जासूसी की.

फिर पाकिस्तान में गिरफ्तार हुए और सात साल की सजा हो गई. कुछ दिनों पहले ही उन पर लकवा का अटैक हुआ. आज शरीर का एक हिस्सा काम करना बंद कर चुका है. लकवा के अटैक के कारण डेविड ठीक से बोल नहीं पाते. उनकी पत्नी बताती हैं, ‘जब ये जेल से सजा काटकर वापस आए तो जासूसी छोड़कर मजदूरी करना शुरू कर दिया. इन्होंने एजेंसी वालों को बता दिया कि अब मैं जासूसी नहीं करूंगा. एजेंसी वालों ने फिर से जासूसी करने का इन पर दबाव बनाया. जब इन्होंने मना किया तो इन पर बॉर्डर क्रॉस करने का केस डाल दिया. वह केस चार साल तक चला.’  गांवोवाले बताते हैं कि जब तक डेविड सही-सलामत थे तब तक दिहाड़ी करके किसी तरह अपना और अपने परिवार का पेट पालते थे. आज उनकी पत्नी दूसरों के घरों में मेहनत-मजदूरी करके किसी तरह परिवार को पाल रही हैं.

डडवां में 90 फीसदी आबादी दलित ईसाइयों की है. बहुत पहले से इस गांव के लोग जासूसी का काम करते आए हैं. एजेंसियों की नजर में यह गांव हीरे की खान जैसा है. इन लोगों को आसानी से जासूस बनाया जा सकता है. इसकी पहली वजह यह है कि इनके साथ बाल और दाढ़ी का धार्मिक बंधन नहीं है जो सिखों के साथ होता है. दूसरी बात यह कि पूरा गांव बेहद गरीब है. यहां के लोग किसी तरह मेहनत-मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं. यहां कोई सब्जी बेचता है तो कोई मजदूरी करता है या रिक्शा चलाता है. तीसरी बात यह कि डडवां गांव सीमा के नजदीक है इसलिए इस पूरे इलाके पर स्थानीय प्रशासन की तुलना में सेना की पकड़ ज्यादा मजबूत है.

ग्रेफान बताते हैं कि एजेंसियों ने उनके साथ ही और दो लोगों को फर्जी तरीके से फंसाया है. संतोष और अमृत नाम के इन दो लोगों से भी एजेंसियों ने जासूस बनने के लिए कहा लेकिन इन्होंने मना कर दिया. ऐसे में उन पर भी झूठा केस कर दिया गया.  
गांव का ही एक आदमी सतपाल खुफिया विभाग के लिए लंबे समय से पाकिस्तान में जासूसी करता था. वह कुछ दिन अपने गांव में रहता और बाकी समय पाकिस्तान में एजेंसियों द्वारा सौंपे गए कामों को अंजाम देता. इस तरह से उसका सरहद पार जाना-आना लगा ही रहता था. 1999 में भी हर बार की तरह वह अपने ‘असाइनमेंट’ पर पाकिस्तान गया हुआ था. जब वह वापस नहीं लौटा तो घरवालों ने एजेंसी वालों से संपर्क किया. मगर उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. कुछ दिनों बाद यह खबर आई कि सतपाल की पाकिस्तानी जेल में मौत हो गई है. सतपाल की मौत के बाद पाकिस्तानी सरकार ने भारत सरकार को सतपाल की लाश ले जाने के लिए कहा.

लेकिन सरकार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. सतपाल का शव लाहौर के सरकारी अस्पताल में पूरे एक महीने तक पड़ा रहा. स्थानीय समाचार पत्रों ने इस मामले को काफी प्रमुखता से उठाना शुरू किया. शुरुआत में संबंधित अधिकारियों  ने मामले को टालने की कोशिश की लेकिन जब पूरा स्थानीय मीडिया जोर-शोर से इस मसले को उठाने लगा तब जाकर स्थानीय नेताओं ने इस मामले को ध्यान देने लायक समझा. मीडिया का दबाव कुछ ऐसा पड़ा कि सरकार ने महीने भर बाद सतपाल की लाश लेने के लिए पाकिस्तान से बात की. सरकार ने सतपाल का शव उसके गांव लाने की व्यवस्था कर दी. उस समय गांववालों की हैरानी का ठिकाना नहीं रहा जब सतपाल के शव को तिंरगे में लपेटकर उसके गांव लाया गया. जो लोग तिरंगे में लपेटकर सतपाल का शव उसके गांव लाए थे ये वही लोग थे जो कुछ समय पहले तक उसकी लाश को भारत लाने के लिए इनकार कर चुके थे. इस मामले में एक और चौंकाने वाली चीज यह हुई कि सतपाल के शव के साथ जो मृत्यु प्रमाण पत्र लाहौर अस्पताल की तरफ से जारी किया गया था उसमें मृतक का नाम सतपाल की जगह दर्शन सिंह था. यह मामला कुछ उसी तरह का था जो आज सरबजीत सिंह और मंजीत सिंह को लेकर चल रहा है.

इस घटना के बाद से गांववाले जासूसी के काम से परहेज करने लगे. लोगों ने रोजगार के लिए मजदूरी करने, रिक्शा चलाने और सब्जी बेचने जैसे काम तलाशना शुरू कर दिया. एजेंसियां इस बदलाव से बेहद परेशान हुईं और जासूसी से इनकार करने वालों को उनका फैसला बदलने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने लगीं. डेविड कहते हैं, ’हमारी जिंदगी तो नर्क बन गई है, हमारे पास अपनी जान लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है, अगर हम जासूसी करते हैं तो पाकिस्तानी एजेंसियां हमें मार डालेंगी और अगर जासूसी करने से इंकार करते हैं तो हमारी अपनी एजेंसियां हमें जीने नहीं देंगी.’

'मेरी पत्नी 17 साल दूसरों के घर नौकरानी का काम करती रही'

जून, 1988 में गिरफ्तार होने से पहले मैं लगभग सैकड़ों बार बॉर्डर पार करके पाकिस्तान जा चुका था. हम वहां से पाकिस्तानी सैनिकों को भारत लाया करते थे. ये वे सैनिक थे जो पाकिस्तानी सेना में रहते हुए भारत के लिए जासूसी करते थे. पाकिस्तान में गिरफ्तार होने और चार साल के इंटेरोगेशन के बाद मुझे 14 साल की सजा सुनाई गई. मुझे खुफिया एजेंसी के लोगों ने कहा था कि अगर मैं पकड़ा जाता हूं तो वे मेरे परिवार का ख्याल रखेंगे. इसलिए सारी प्रताड़नाओं के बावजूद मुझे एक दिलासा यह रहती थी कि भारत में मेरा परिवार ठीक होगा. लेकिन चार साल की इंटेरोगेशन और 14 साल की सजा काटने के बाद जब मैं घर आया तो पता चला कि ऐसा तो कुछ नहीं हुआ. घर में पत्नी और दो बच्चे बहुत बुरी हालत में थे. पत्नी दूसरों के घर में नौकरानी का काम करती थी. मेरी गिरफ्तारी के बाद 11 महीने तक तो उसे 300 रुपये हर महीने मिलते रहे लेकिन उसके बाद कभी कोई मदद नहीं मिली. उसने दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर बच्चों को बड़ा किया. यहां आकर मैं अपने अधिकारियों से मिला, उनसे सहायता मांगी लेकिन वे लोग साफ मुकर गए. उन्होंने किसी तरह की मदद करने से इनकार कर दिया. उसके बाद मैं कोर्ट गया. कोर्ट में जब केस चल रहा था उस समय रॉ के कुछ अधिकारियों ने मुझसे संपर्क किया और 50-60 हजार रुपये लेकर मामला खत्म करने और केस वापस लेने की बात की. मैंने कहा, मुझे भीख नहीं मेरा जायज हक चाहिए. मैंने इनकार कर दिया.

कुछ दिनों के बाद दिल्ली से रॉ के एक बड़े अधिकारी अमृतसर आए. उन्होंने मुझे एक होटल में बुलाया और कहा मैं दो लाख रुपए लेकर केस वापस ले लूं. लेकिन मैंने उनसे कहा कि मामला सिर्फ मेरा अकेले का नहीं है बल्कि बाकी जासूसों के न्याय से भी जुड़ा है. मैंने केस वापस नहीं लिया. खैर, मामला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में चला. सुनवाई के दौरान जज नाराज हो गए, उन्होंने वकील से केस वापस लेने को कहा. जज ने वकील से कहा कि इस तरह के केस को लेकर आप देश के साथ गद्दारी कर रहे हो.

जब मैंने केस वापस लेने से इनकार कर दिया तो जज महोदय ने कहा, ‘ये आदमी लगातार कोर्ट की अवमानना कर रहा है, मैं इस पर फाइन करुंगा.’ और उन्होंने केस वापस न लेने के कारण मुझ पर 25 हजार रुपये का हर्जाना ठोक दिया. मैंने उनसे कहा, ’माई-बाप मैंने अपनी पूरी जिंदगी तो देश की सेवा करते हुए पाकिस्तानी जेलों में गुजार दी है. मेरे पास पैसे कहां हैं कि मैं हर्जाना भर सकूं. मेरे पास तो घर चलाने तक के पैसे नहीं हैं, चाय की दुकान (अमृतसर से 50 किलोमीटर दूर फतेगढ़ चूड़ियां के पास खैरा कलां गांव) से अपना खर्च चला रहा हूं, मैं तो आपके यहां न्याय की आस में आया था, सरकार आपने मुझ पर ही फाइन लगा दिया क्योंकि मैंने न्याय की मांग की. खैर, पैसे तो नहीं हैं मेरे पास किसी दिन बैंक लूटूंगा तो न्याय की चरणों में हर्जाना चढ़ा दूंगा.’  जब सरकार से आदमी थक जाता है तो कोर्ट उसकी आखिरी उम्मीद होती है लेकिन जब यहां भी न्याय न मिले तो आदमी कहां जाएगा.

‘काम पूरा हो जाता है तो खुफिया एजेंसियां खुद पकड़वा देती हैं’

यह 1978 की बात है, तब मेरी उम्र तकरीबन 19 साल रही होगी. मैं दसवीं की परीक्षा पास कर चुका था. मेरे गांव (भैनीमियां गांव, जिला गुरुदासपुर, पंजाब) में सुरेंद्र मोहन नाम का एक आदमी था, जो रॉ के लिए काम करता था. वह एक दिन मुझे पठानकोट स्थित रॉ के दफ्तर ले गया. वहां के जो एसपी थे उनका नाम चरनदास था. उन्होंने मुझसे कहा कि वे मुझे पाकिस्तान में जासूसी करने का काम देने वाले हैं और यह देश सेवा का मौका है जिसे मुझे छोड़ना नहीं चाहिए. उन्होंने उस समय 175 रुपये महीना मेरी पगार तय की. साथ में सख्त हिदायत दी थी कि इस काम के बारे में मैं किसी को ना बताऊं. उस समय देश के लिए काम करने का भूत सिर पर ऐसे सवार हो गया था कि मैं इस काम के लिए तुरंत तैयार हो गया.

अमृतसर में हमारी 12 दिन की ट्रेनिंग हुई. ट्रेनिंग के बाद एक दिन मुझे बॉर्डर पार करवा दी गई. सरहद के उस पार से मैं बस पकड़कर पाकिस्तान के सियालकोट चला गया. वहां होटल में रुका और अपना काम शुरू कर दिया. इस तरह सन 1984 तक मैं हर महीनेे दो से तीन बार जासूसी करने के लिए पाकिस्तान गया. 26 जुलाई, 1984 को भी हर बार की तरह रॉ के अधिकारी मुझे पाकिस्तान भेजने के लिए ले जाने आए थे. इन लोगों ने रात को तीन बजे मुझे बुधवाल पोस्ट पर छोड़ दिया. यहां से बीएसएफ वालों ने मुझे बॉर्डर के उस पार पहुंचा दिया. लेकिन इस बार बॉर्डर क्रॉस करके जैसे ही मैं उस पार पहुंचा, सात-आठ लोगों ने मुझे घेर लिया. ये लोग एफआईयू (फील्ड इंटेलीजेंस यूनिट), पाकिस्तान से थे. उन्होंने मेरी तलाशी लेनी शुरू की. मुझे गिरफ्तार कर लिया गया. उस टीम के मुखिया ने मुझे एक ऐसी बात बताई जिसे सुनने के बाद मेरे होश उड़ गए. उसने बताया कि सीएस मनकोटिया ने उसे मेरे बारे में बताया था. उस समय मैं सब कुछ भूल गया. मेरे दिमाग में बस मनकोटिया का चेहरा और उससे हुई बहस जेहन में उभरने लगी. मनकोटिया गुरदासपुर में रॉ का फील्ड ऑफिसर था. वह चाहता था कि मैं अपनी पगार में से कुछ हिस्सा उसे दूं नहीं तो वह मुझे काम नहीं करने देगा. इससे इनकार करने पर उसने मुझे धमकी दी थी कि अगर मैं नहीं माना तो वह मुझे पकड़वा देगा. मैंने उसकी कही इस बात को गंभीरता से नहीं लिया था.

खैर, अब तो मैं गिरफ्तार हो ही चुका था. पाकिस्तानी अधिकारी मुझे अपनी जीप में  बैठाकर सियालकोट इंटरोगेशन सेंटर ले आए थे, अगले 15 दिन तक अन्न के बिना एक दाने और जितनी तरह की प्रताड़ना संभव है, उन सबसे मैं गुजरा. पानी उतना ही मिलता था कि जीभ गीली हो सके. प्रताड़ना के बारे में मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि जितने तरह के टॉर्चर हो सकते हैं उन्होंने सभी को आजमाया. नाखूनों को सींकचों से बाहर निकालने, गुप्तागों में मिर्च पावडर डालने, जख्मों पर नमक रगड़ने के साथ और भी बहुत कुछ वे करते थे जो मैं बता नहीं सकता. यहां मुझे तीन साल रखा गया. उसके बाद कोर्ट ने मुझे 25 साल की सजा सुनाई. सजा के दौरान शुरुआत के 20 साल तक घरवालों से कोई संपर्क नहीं हुआ. बाद मैं मैंने चोरी-छुपे किसी तरह एक लेटर घर भेजा जिससे घरवालों को पता चला पाया कि मैं क्या काम करता था और आज कहां हूं. मेरे बड़े भाई उस लेटर के मिलने के बाद रॉ के अधिकारियों से मिलने गए जिन्होंने पूरी तरह से इस बात से इनकार कर दिया कि वे ऐसे किसी आदमी को जानते हैं. 

खैर ,  किसी तरह 25 साल की मैंने सजा काटी, सजा काटने के बाद भी जब मेरी रिहाई नहीं हुई तो मेरा भाई सुप्रीम कोर्ट गया. उस समय चीफ जस्टिस मारकंडेय काटजू थे, उन्होंने पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को एक पत्र भेजा जिसमें उन्होंने मुझे रिहा करने की सिफारिश की. मैं रिहा हो गया. 23 साल की उम्र में मैं पाकिस्तान गया था. वापस आया तो उम्र 50 की हो गई थी. यहां आकर रॉ के अधिकारियों से मिला और अपनी देश सेवा के बदले सहयोग की मांग की. सहयोग तो दूर की बात है एजेंसी वालों ने तो पहचानने तक से इनकार कर दिया. 52 साल की उम्र में मैंने शादी की. सरकार की तरफ से एक रुपये तक की सहायता नहीं मिली. फिलहाल यहां शिमला में किराये की कार चलाकर किसी तरह अपना जीवनयापन कर रहा हूं.

अनेक हैं टाइगर

दुनिया भर में मीडिया के लिए वह साल का सबसे बड़ा आयोजन था. यह जुलाई, 2001 की  बात है. पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ और भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के बीच आगरा में शिखरवार्ता चल रही थी. माहौल उम्मीद से भरा हुआ था. ठीक इसी समय आगरा के पश्चिम-उत्तर में तकरीबन एक हजार किमी दूर पाकिस्तान की मियांवली जेल की एक बैरक का भी माहौल कुछ-कुछ ऐसा ही था. पिछली शाम को ही जेल सुपरिंटेंडेंट ने वहां कैद एक भारतीय जासूस को खबर दी थी कि वह रिहा होने वाला है. यह भारतीय जासूस अपने साथियों के साथ उन सब सपनों को साझा कर रहा था जो उसे जेल से रिहा होने के बाद पूरे करने थे. वह जासूसी की जिंदगी हमेशा के लिए छोड़कर श्रीगंगानगर (राजस्थान) लौट जाना चाहता था. अपनी पाकिस्तानी पत्नी और बेटे के साथ उसे एक नई जिंदगी शुरू करनी थी.

शाम को बीबीसी रेडियो के उर्दू बुलेटिन की खबरें शुरू हुईं तो पहली बड़ी खबर थी कि मुशर्रफ-बाजपेयी वार्ता असफल हो गई है. खबर पूरी भी नहीं हो पाई थी कि जेल सुपरिंटेंडेंट ने भारतीय जासूस को सूचना दी कि उसकी रिहाई का आदेश रद्द कर दिया गया है. अब बैरक का माहौल पूरी तरह बदल चुका था. खबर सुनकर वह भारतीय जासूस खामोश हो गया. उसे इतना गहरा सदमा लगा कि उसकी तबीयत खराब रहने लगी और कुछ महीनों के बाद उसकी मौत हो गई. वह जासूस था रवींद्र कौशिक उर्फ नबी अहमद. देश की खुफिया एजेंसियां उसके बड़े-बड़े कारनामों के चलते उसे ब्लैक टाइगर के नाम से पहचानती थीं. रवींद्र की मौत के बाद भी बदकिस्मती ने उसका साथ नहीं छोड़ा. रवींद्र का शव कभी भारत वापस नहीं आ पाया. उस बैरक में रवींद्र के साथ रहे एक और भारतीय जासूस गोपालदास बताते हैं, ‘कौशिक की मौत के बाद जेल सुपरिंटेंडेंट ने हमें बताया था कि उसने भारतीय उच्चायोग से लाश रवींद्र के घर (भारत) पहुंचाने के लिए कहा था. लेकिन उच्चायोग का जवाब था कि उसे वहीं दफना दिया जाए.’

रवींद्र कौशिक का नाम हाल ही में एक बार फिर चर्चा में आ गया जब सलमान खान अभिनीत फिल्म ’एक था टाइगर’ रिलीज होने वाली थी. रवींद्र के परिवार का आरोप है कि फिल्म निर्माताओं को फिल्म बनाने से पहले उनसे अनुमति लेनी चाहिए थी क्योंकि इसकी कहानी रवींद्र के जीवन पर आधारित है. मगर इस सारे विवाद के बीच भारतीय जासूसों के प्रति भारत सरकार और खुफिया एजेंसियों के उस उपेक्षापूर्ण और कहीं-कहीं बर्बर रवैये की ओर किसी का ध्यान नहीं गया जिसके चलते रवींद्र कौशिक जैसे कई जासूस गुमनामी की मौत मर गए. और जो किसी तरह अपने देश वापस आ पाए वे आज तक उस दिन को कोस रहे हैं जब उन्होंने इन एजेंसियों के लिए जासूस बनना स्वीकार किया था.

पंजाब सहित पाकिस्तान की सीमा से सटे राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्होंने भारतीय खुफिया एजेंसियों के लिए पाकिस्तान में जासूसी की है. इनमें से ऐसे जासूसों की संख्या कम नहीं जो जासूसी करते हुए पाकिस्तान में पकड़े गए और उन्हें 25 से 30 साल तक की सजा हुई. कुछ को फांसी भी हुई, कुछ सजा काटने के बाद भी दशकों तक पाकिस्तानी जेल में सड़ते रहे. इनमें से कुछ अब भी वहीं हैं. हाल ही में पाकिस्तान से 30 साल की सजा काट कर आए सुरजीत की तरह ही कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपनी पूरी जवानी जेल में ही बिता दी. कइयों की पाकिस्तानी जेल में ही मौत हो गई. परिवारवालों को उनका शव तक नहीं मिला क्योंकि हमारी सरकार ने उनका शव लेने से ही इनकार कर दिया.

सूत्र बताते हैं कि खुफिया एजेंसियों की सबसे ज्यादा नजर भारत की सीमा से जुड़े गांवों पर ही होती है.

वजह यह है कि यहां के लोगों का रहन-सहन, बातचीत, खान-पान, पहनावा-ओढ़ावा या यह कहें कि लगभग पूरी जीवन संस्कृति उस पार (पाकिस्तान) रहने वालों से काफी मिलती-जुलती है. इन गांवों में खुफिया विभाग का अपना एक व्यापक नेटवर्क है, जो लगातार ऐसे लोगों पर नजर बनाए रखता है जिनसे जासूसी करवाई जा सके. ऐसे लोगों को मनाने के लिए एजेंसियां हर तरह के हथकंडे इस्तेमाल करती हैं. पहले उन्हें अच्छे पैसे और सुनहरे भविष्य का लालच दिखाया जाता है. उनसे कहा जाता है कि अगर वे एजेंसी के लिए काम करते रहे तो उन्हें बहुत जल्दी विभाग में स्थायी कर दिया जाएगा. उन्हें तमाम तरह की सुविधाएं देने का वादा एजेंसियों द्वारा किया जाता है. कहा जाता है कि अगर वे पाकिस्तान में गिरफ्तार हो गए तो उनके घरवालों का पूरी तरह से ख्याल रखा जाएगा. अगर वे गिरफ्तार हो भी गए तो परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि सरकार उन्हें दो से तीन महीने के अंदर आराम से छुड़वा लेगी.

इसके बाद भी अगर सामने वाला तैयार नहीं होता तो अंत में एजेंसियां आखिरी के पहले वाला दांव खेलती हैं. इसके बाद सामने वाला गर्व से सीना फुलाए पाकिस्तान जाने का प्रस्ताव मान लेता है. सामने वाले से अधिकारी कहते हैं कि उन्हें वे जो देश-सेवा का मौका दे रहे हैं वह बहुत कम भारतीयों को नसीब होता है. यह दांव 95 फीसदी से अधिक लोगों को चित कर देता है और वे बिना ज्यादा सवाल-जवाब किए जासूस बनने को राजी हो जाते हैं. बाकी जो पांच फीसदी बचते हैं उनका भी इलाज है एजेंसियों के पास. वह इलाज ऐसा है जिसे सुनकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी (देखें व्यथा कथा – 3).

जीवन संस्कृति में समानता होने के अलावा और भी कई वजहों से एजेंसियों की नजर सीमा पर बसे गांवों के लोगों पर होती है. सबसे पहली बात यह कि बॉर्डर के इन गांवों में प्रायः गरीबी अपनी सभी कलाओं के साथ मौजूद रहती है. न तो इन गांवों में शिक्षा की व्यवस्था है, न स्वास्थ्य की. और न ही यहां कोई रोजगार है. लोग बमुश्किल दो जून की रोटी जुटा पाते हैं. जिन लोगों के पास थोड़ी-बहुत खेती लायक जमीन है, वे अलग परेशान रहते हैं. सीमा पर कंटीले तारों, बारूदी सुरंगों और बाकी अन्य सुरक्षा एहतियातों के कारण खेती करने में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. ऐसे में इन लोगों के पास जीवनयापन का कोई विकल्प नहीं बचता.

अशिक्षा और गरीबी का संयोग अन्य जगहों पर घातक हो सकता है लेकिन जासूसी के लिए यह सबसे मुफीद होता है. ऐसे में लोगों को जासूसी के लिए तैयार करना आसान हो जाता है. भर्ती करने के बाद शुरू होती है ट्रेनिंग की प्रक्रिया. इन जासूसों को शुरू में दो से तीन महीने की ट्रेनिंग दी जाती है. जब ये काम करना शुरू कर देते हैं तो बीच-बीच में विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाता है. प्रशिक्षण में इन्हें विभिन्न हथियारों की पहचान कराई जाती है. पाकिस्तान के बारे में बताया जाता है, वहां की सेना के बारे में बताया जाता है और नक्शा देखना और पढ़ना सिखाया जाता है. इन भावी जासूसों को उर्दू बोलना और इस्लाम धर्म की तमाम बारीकियां भी सिखाई जाती हैं. यहां तक कि कुछ मामलों में इनका खतना तक किया जाता है. फिर उन्हें एक मुसलिम नाम और पाकिस्तानी पहचान दी जाती है.

प्रशिक्षण की पूरी प्रक्रिया से गुजरने के बाद इन लोगों को तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है. पहले वर्ग में वे लोग होते हैं जिन्हें लंबे समय तक प्रशिक्षित किए जाने के बाद पाकिस्तानी नागरिक बनकर वहीं पाकिस्तान में रहना होता है. इन्हें ‘रेजीडेंट एजेंट’ कहा जाता है. रवींद्र कौशिक ऐसा ही एजेंट था. कौशिक को रॉ ने1973 में एजेंट बनाया था और कुछ सालों के बाद ही वह पाकिस्तान में रेजीडेंट एजेंट बन गया था. वहीं उसने एक कॉलेज में एडमिशन लिया और एलएलबी की डिग्री पूरी की जिसके बाद वह पाकिस्तानी सेना में क्लर्क बन गया. 1983 में अपनी गिरफ्तारी तक उसने रॉ को कई खुफिया सूचनाएं भेजीं थीं. रेजीडेंट एजेंटों में से कई अविवाहित होते हैं और किसी पाकिस्तानी लड़की से शादी करके स्थायी नागरिकों की तरह रहने लगते हैं. रवींद्र ने भी पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी की लड़की से शादी की थी.

जासूसों के दूसरे वर्ग में वे लोग आते हैं जिनका काम पहले वर्ग के लोगों तक पैसे आदि पहुंचाना और उनके द्वारा दी गई खुफिया जानकारी को पाकिस्तान जाकर वहां से लाने का होता है. ये लोग सीमा पार करके थोड़े-थोड़े अंतराल पर वहां जाते-आते रहते हैं.

तीसरे वर्ग में वे लोग आते हैं जो ‘गाइड’ कहलाते हैं. इन लोगों का काम दूसरे वर्ग के लोगों को इस पार से उस पार लाना-ले जाना होता है. ये जासूसों को पाकिस्तान बॉर्डर क्रॉस कराते हैं. जासूसों को पाकिस्तान की सीमा में ‘लॉन्च’ कराके ये लोग उन्हें आगे का रास्ता समझाकर वापस आ जाते हैं. लॉन्च शब्द जासूसी की भाषा में सीमा पार कराने के लिए प्रयोग किया जाता है.

लंबे समय तक रॉ के लिए जासूसी कर चुके गोपालदास बताते हैं, ‘हमें पाकिस्तानी फौजी ठिकाने, फौजी हवाई अड्डे, सेना के मूवमेंट्स की डिटेल, तोप, हथियारों और गोला-बारूद की जानकारी, पुलों की फोटो और नक्शे आदि अपनी खुफिया एजेंसियों को देने होते थे.’  इसके साथ ही जो सबसे बड़ा काम इन लोगों को करना होता है वह है ऐसे पाकिस्तानी नागरिकों की तलाश जो भारत के लिए जासूसी कर सकें. इनमें से सबसे ज्यादा डिमांड सेना और विभिन्न सुरक्षा बलों और सत्ता प्रतिष्ठानों से जुड़े लोगों की है. गोपालदास 1978 में रॉ के एजेंट बने थे. उनका काम था सीमापार जाकर पाकिस्तान में तैनात एजेंटों से जानकारी लाना और एजेंसी को सौंपना. 1984 में वे पाकिस्तान में गिरफ्तार हो गए. उन्हें 25 साल की सजा सुनाई गई. पिछले साल ही वे पाकिस्तान की जेल से रिहा होकर भारत आए हैं. (देखें व्यथा कथा -1)

पाकिस्तान में भारत के जासूस रहे करामत राही बताते हैं, ‘मेरे काम का बड़ा हिस्सा यह था कि मैं पाकिस्तानी सेना के उन सैनिकों और अधिकारियों को भारत लेकर आऊं जो भारत सरकार के लिए काम करते हैं.’ करामत के मुताबिक ये लोग रॉ के अधिकारियों से बातचीत करते थे और बाद में भारतीय जासूस ही उन्हें सकुशल सीमा पार करवा देते थे.

जासूसों को मिलने वाला पारिश्रमिक भी उनके काम की तरह ही जटिल है. कुछ जासूस ऐसे हैं जिन्हें हर महीने की एक निश्चित रकम दी जाती है, कुछ को सरहद पार की हर ‘ट्रिप’ के हिसाब से पैसा दिया जाता है. लेकिन बाकी जगहों की तरह यहां भी हफ्ता वसूली और भ्रष्टाचार है. कई ऐसे मामले हैं जहां वरिष्ठ अधिकारी जासूस को मिले पैसों में से एक हिस्से की मांग करते हैं. चूंकि मामले को लेकर न कोई पारदर्शिता है और न ही जासूसों को रखने के लिए कोई लिखा -पढ़ी होती है. पूरी नौकरी जबान पर ही चलती है, ऐसे में जासूसों को भी पता नहीं चलता कि आखिर उन्हें देने के लिए ऊपर से कितना पैसा आता है. कई साल तक देश के लिए जासूसी करते रहे एक शख्स हमें बताते हैं कि कई जासूस स्थायी नौकरी की चाहत में वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करने में लगे रहते हैं. वे सोचते हैं, साहब खुश रहेंगे तो जल्द ही वे उसे परमानेंट कर देंगे.

पाकिस्तान में जासूसी के लिए 10 साल की सजा काट चुके 60 वर्षीय बलविंदर सिंह कहते हैं, ‘एजेंसियां जासूसों को एके-दूसरे के पास थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद भेजती रहती हैं. जैसे कि आज आप रॉ के लिए काम कर रहे हैं, तो कुछ महीनों बाद आपको मिलेट्री इंटेलीजेंस के पास भेज दिया जाएगा. फिर आईबी वालों के यहां. ये लोग ऐसा इसलिए करते हैं ताकि जासूस लंबे समय तक काम करने के बाद स्थाई नौकरी की मांग ना करने लगे. इसलिए वे तीन साल की सर्विस एक साथ पूरी नहीं होने देते, उसके पूरा होने के पहले जासूसों को दूसरी एजेंसी को सौंप दिया जाता है.’ गंभीर रूप से बीमार बलविंदर सिंह इस समय अमृतसर के नजदीक गौंसाबाद में रहते हैं.

स्थायी नौकरी के लालच में ये जासूस अधिकारियों के हर जायज-नाजायज आदेशों का पालन करते रहते हैं.

लेकिन उन्हें पता नहीं होता कि ये लोग एजेंसियों के लिए तभी तक उनके आदमी हैं जब तक वे पकड़े नहीं जाते. पकड़े जाने के बाद उन्हें एजेंसियां अपने काम के लिए खतरा ही मानती हैं और वे उन्हें पहचानने तक से इनकार कर देती हैं.

अगर ये लोग सजा पूरी करके भारत आ भी गए तो एजेंसियां इन पर नजर रखती हैं. दरअसल पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियां भी ऐसे जासूसों की ताक में रहती हैं जो भारत के लिए पाक में काम कर रहे हों. जासूस गोपालदास बताते हैं, ‘पाकिस्तानी अधिकारी कहते हैं कि हम तुम्हें यहां इतना प्रताड़ित करेंगे कि तुम ऐसे ही मर जाओगे. अगर बच गए तो शारीरिक और मानसिक किसी लायक नहीं छोड़ेंगे. इतना डराने-धमकाने के बाद हमें कहा जाता है कि यदि हम उनके लिए काम करना स्वीकार कर लें तो वे हमें छोड़ सकते हैं. जासूसी की भाषा में ऐसे लोगों को डबल एजेंट कहा जाता है.’

डबल एजेंट बनाने की भी प्रकिया बेहद फिल्मी है. भारतीय खुफिया एजेंसियों के लिए लंबे समय तक पाकिस्तान में जासूसी करने वाले तथा जासूसी के जुर्म में ही पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में 18 साल तक कैद रहे मोहनलाल भास्कर अपनी आत्मकथा ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’ में इसका जिक्र करते हैं, ‘वह बोला, ‘देखो, बेवकूफी की बात मत करो. हम तुम्हें एक मौका दे रहे हैं अपनी जिंदगी बनाने का. हिंदुस्तानवालों ने तो तुम्हारी जिंदगी खराब कर दी. अब अगर तुम लौट भी जाओ, जिसकी अभी 10-15 साल तक कोई उम्मीद नहीं, तो वे ही तुम्हें शक की निगाह से देखेंगे, दूसरे वे तुम्हें कौड़ी के मोल नहीं पूछेंगे. वे अफसर जिन्होंने तुम्हें भेजा है, तुम्हें पहचानने से इनकार कर देंगे. तुम तो यहां आराम से बैठे जेल की रोटियां तोड़ रहे हो, उधर तुम्हारी बेबस मां लोगों के बर्तन मांजकर गुजारा चलाती है और तुम्हारी बीवी नौकरानियों जैसी जिंदगी गुजार रही है. अपने बेटे की तरफ सोचो, जिसका अभी मुंह तुमने नहीं देखा. हम जेल से तुम्हारे फरार होने का नाटक रचेंगे. तुम्हारी फरारी की खबर अखबारों और रेडियो में देंगे. … तुम्हें सिर्फ इतना करना है कि या तो किसी तरह खत लिखकर अपने मां-बाप को यहां बुला लो या अपनी बीवी या बहन को. वह जमानत के तौर पर हमारे पास रहेंगे. हम उन्हें मेहमानों की तरह रखेंगे. जब तुम पांच साल तक हमारे लिए काम कर चुके होगे, तो हम उन्हें वापस भेज देंगे.’

जासूसों के पाकिस्तान में पकड़ लिए जाने के बाद उनके साथ वहां की एजेंसियों द्वारा जिस तरह से पूछताछ की जाती है वह पूरी प्रक्रिया हाड़ कंपाने वाली है. पकड़ने के बाद जासूसों की आंख पर पट्टी बांधकर उन्हें पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों के इंटेरोगेशन सेंटर में ले जाया जाता है. जासूस बताते हैं कि उन्हें एक छोटी-सी कोठरी में रखा जाता है जहां 24 घंटे और बारहों महीने रात रहती है. जासूस गोपालदास बताते हैं कि उन्हें पकड़े जाने के 15 दिन तक न कोई खाना दिया गया और न ही पानी. पानी उतना ही मिलता था कि जिससे जीभ गीली हो सके. यहां सुरक्षा एजेंसियों के सबसे बर्बर अधिकारियों को पूछताछ के लिए लगाया जाता है.

गोपालदास अपनी हिरासत के शुरुआती दिन याद करते हुए कहते हैं, ‘जब मैं वहां पहुंचा तो सबसे पहले उन्होंने मेरे पूरे कपड़े उतरवा दिए और फिर थर्ड डिग्री का टॉर्चर शुरू कर दिया. इस दौरान वे रस्सी के सहारे आपको उल्टा लटकाकर हंटर और डंडे से बिना कुछ कहे और पूछे पीटने लगते हैं. एक समय पर एक आदमी को लगातार चार से पांच लोग तब तक पीटते रहते हैं जब तक कि आप बेहोश न हो जाएं, फिर जैसे ही कुछ समय बाद आप होश में आते हैं वे फिर से पीटने लगते हैं. बिजली के शॉक देते हैं, गुप्तांगों में मिर्ची का पावडर लगाते हैं. प्रताड़ना का आलम कुछ ऐसा होता है कि आप चाहते हैं कि कोई आए और आपको गोली मार दे.’

यह पूरी प्रताड़ना जासूसों के पकड़े जाने से लेकर अगले तीन से पांच साल तक लगातार चलती है. पकडे़ जाने के बाद सभी जासूसों को इस चरण से गुजरना होता है. जब फौज के अधिकारी आपको हर तरह से प्रताड़ित कर चुके होते हैं तब आपका मामला वे कोर्ट में ले जाते हैं. गोपालदास कहते हैं, ‘ बहुत-से जासूसों की मौत तो इस तीन से पांच साल तक चलने वाली पूछताछ के दौरान ही हो जाती है. पाक अधिकारियों का यह प्रयास होता है कि वे आपसे पहले पूरी सूचना निकलवा लें. उसके बाद आपको इतना प्रताड़ित करें कि आप जिंदा तो रहें लेकिन शारीरिक और मानसिक रूप से आपकी मौत हो जाए.’ ऐसे ही एक जासूस रॉबिन मसीह के पिता याकूब मसीह कहते हैं, ‘मेरा बेटा 15 साल पाकिस्तान की जेल में सजा काट कर छूटा, जब वह यहां आया तो एक जिंदा लाश में तब्दील हो चुका था. वहां उन्होंने उसे इतना प्रताड़ित किया कि वह शादी के लायक तक नहीं बचा.’

जासूस बताते हैं कि जब कोर्ट से उन्हें जेल की सजा हो जाती है तब जाकर उनकी जान में जान आती है. हर जासूस चाहता है कि उसे जल्द से जल्द जेल की सजा हो जाए क्योंकि इसके बाद ही जिंदा बच पाने की उम्मीद बनती है.

यहां यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है कि जासूसों को ट्रेनिंग के दौरान सबसे पहला पाठ यह पढ़ाया जाता है कि उनके परिवार, दोस्त और नाते-रिश्तेदार किसी को भी यह नहीं पता चलना चाहिए कि वे जासूसी का काम करते हैं. जासूस करामत राही बताते हैं, ‘मैं सालों तक भारतीय एजेंसियों के लिए जासूसी करता रहा लेकिन मेरी पत्नी तक को नहीं पता था कि मैं जासूस हूं.’ यह स्थिति हर जासूस के साथ होती है. सुरजीत सिंह का ताजा मामला हमारे सामने है.

सन 1982 में पाकिस्तान में सुरजीत सिंह की गिरफ्तारी होती है. घरवालों को कुछ पता नहीं होता कि वे कहां हैं. दिन महीनों में और महीने सालों में बदल जाते हैं. जब कहीं से कोई खबर नहीं मिलती तब घरवाले यह मानने को मजबूर हो जाते हैं कि वे अब कभी नहीं आएंगे. 23 साल बाद पाकिस्तान की जेल से एक कैदी रिहा होकर भारत आता है तो अपने साथ एक अन्य कैदी की चिट्ठी भी लाता है. वह उस कैदी के घर जाकर उसकी पत्नी को चिट्ठी सौंपता है. चिट्ठी पढ़कर उस महिला को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होता. यह महिला सुरजीत सिंह की पत्नी हैं जिन्हें सुरजीत ने जेल से रिहा हुए कैदी के माध्यम से यह बताया है कि वह जिंदा है और पाकिस्तान की जेल में कैद है. उन्हें जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है और सजा-ए-मौत सुनाई गई है. सुरजीत जैसे दर्जनों उदाहरण हैं. इनके आधार पर कहा जा सकता है कि गिरफ्तार होने के बाद सिर्फ यह खबर अपने घरवालों तक पहुंचाने में कि वे पाकिस्तानी जेल में हैं, एक जासूस को दो दशक से ज्यादा लग सकते हैं.

यहीं भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का क्रूरतम चेहरा सामने आता है. जासूस कहते हैं कि यह मान लिया कि पाकिस्तान तो उनसे दुश्मनी निकाल रहा है लेकिन भारतीय एजेंसियों का तो यह फर्ज है कि वे उनके घरवालों किसी तरह उनके बारे में बताएं. गोपालदास कहते हैं, ‘ये मान लेते हैं आप जासूसी की बात मत बताओ लेकिन इतना तो हमारे घरवालों को बता ही सकते हो कि हम जिंदा हैं. लेकिन एजेंसी वाले यह तक नहीं करते. जो आदमी इनके लिए अपनी जान पर खेल कर पाकिस्तान में जासूसी कर रहा हो उसकी गिरफ्तारी पर ये लोग उसके घरवालों से न तो कोई संपर्क करते हैं, न ही उन तक कोई सूचना पहुंचाते हैं और न ही उनका कुशलक्षेम पूछते हैं.’ अगर सुरजीत सिंह की ही बात करें तो जेल से छूट कर जब वे अपने घर आए तो उन्हें पता चला कि पिछले 30 साल में कोई उनके घरवालों का हाल-चाल तक लेने नहीं आया था. इस बीच उनके सात भाइयों की मौत हो गई, एक बेटा ब्रेन हैमरेज के चलते चल बसा, उनकी पत्नी चलने-फिरने के लायक नहीं रही, घरवालों के पास इतने पैसे भी नहीं बचे कि वे अपनी रोजी-रोटी चला सकें.

खुफिया एजेंसियों के लिए पाकिस्तान में जासूसी कर चुके और 15 साल पाकिस्तान जेल में सजा काट चुके 65 वर्षीय मोहिंदर सिंह आज अमृतसर की सड़कों पर रिक्शा चलाते हैं. 1986 में जब वे रिहा होकर वापस आए तब उन्होंने शादी की, लेकिन पत्नी कुछ महीनों के बाद ही गंभीर रूप से बीमार हो गईं. खैर,  किसी तरह रिक्शा चलाकर उन्होंने पत्नी का इलाज कराया. लेकिन थोड़े दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई. ‘आप मुझे देख ही रहे हैं, जिस उम्र में आदमी शांति से जीता है, उस उम्र में मुझे रिक्शा चलाकर रोटी कमानी पड़ रही है. पूरी जवानी तो इस देश ने ले ली अब बुढ़ापे में रिक्शा चलवा रहा है…’ मोहिंदर हारे-से स्वर में कहते हैं.

किसी तरह जब जेल की सजा ये जासूस काट लेते हैं तो उसके बाद इन्हें एक नई लड़ाई लड़नी होती है. जेल से बाहर निकलने की.

स्थिति यह है कि पाकिस्तानी जेलों में कई ऐसे जासूस अभी तक कैद हैं जिनकी सजा आठ से 10 साल पहले पूरी हो चुकी है. गोपालदास बताते हैं, ‘पाकिस्तानी जेल में मेरी ऐसे कई कैदियों से मुलाकात हुई जिनकी सजा 10 साल पहले ही पूरी हो चुकी थी, लेकिन कोई उनकी रिहाई के लिए प्रयास नहीं करता. पाकिस्तान से कोई क्या शिकायत करे जब आपके अपने देश की सरकार को ही इस बात से कोई मतलब नहीं है.’  वे ऐसे ही एक व्यक्ति रामलाल के बारे में बताते हैं जिसे बॉर्डर क्रॉस करने के जुर्म में एक साल की सजा हुई लेकिन वह पिछले 10 साल से जेल में है.

गोपालदास के मुताबिक भारत सरकार अगर थोड़ा-बहुत प्रयास करती भी है तो सिर्फ उन मामलों में जो मीडिया में काफी चर्चित रहे हों. उदाहरण के रूप में सरबजीत का मामला है. इसके अलावा उसे उन सैकड़ों भारतीयों से कोई मतलब नहीं है जो बेचारे जेलों में अपनी सजा खत्म होने के बाद भी सड़ रहे हैं. ‘सरकार जासूसों को मरने के लिए छोड़ देती है और उनके मरने के बाद उनकी लाश तक उनके घरवालों को नहीं पहुंचाती’, गोपालदास बताते हैं. रवींद्र कौशिक के अलावा भी ऐसे कई जासूस है जिनकी मौत पाकिस्तान की जेल में हुई लेकिन उनकी लाश कभी अपने वतन नहीं लौट पाई. पंजाब के पठानकोट के रहने वाले इनायत मसीह को सन 1983 में जासूसी के आरोप में पाकिस्तान में पकड़ा गया था. उसे पाकिस्तान में पूछताछ के दौरान इतना प्रताड़ित किया गया कि उसकी मृत्यु हो गई. इस बार भी भारत सरकार ने उसका शव लेने से इनकार कर दिया. ऐसा ही एक मामला अमृतसर के रहने वाले किरपाल सिंह का था. उन्हें जासूसी करने के आरोप में पाकिस्तान में सन 2000 में फांसी दे दी गई. लेकिन उनका शव भी कभी भारत नहीं आ पाया.

इन त्रासदियों और प्रताड़नाओं से गुजरने के बाद जब कोई जासूस किसी तरह रिहा होकर वापस भारत आ जाता है तो उसे उम्मीद होती है कि वह जिन लोगों और एजेंसियों के लिए काम करता था वे उसके किए के लिए उसके कृतज्ञ होंगे और पूरी जवानी देश के लिए पाकिस्तानी जेल में खपा देने का कुछ उसे मुआवजा भी देंगे. लेकिन जब भारत वापस आकर वे उन अधिकारियों से मिलते हैं जिन्होंने उन्हें जासूसी करने पाक भेजा था तो वे उनके योगदान को स्वीकारने और उन्हें सम्मानित करने के बजाय उन्हें पहचानने तक से इनकार कर देते हैं. फिर शुरू होती है एक ऐसी लड़ाई जिसका अंत खुद जासूसों को पता नहीं. ऐसे ही कई जासूसों ने अपने प्रति हुए इस अन्याय के खिलाफ अदालत में शरण ली है. इनका केस लड़ रहे वरिष्ठ वकील रंजन लखनपाल कहते हैं, ‘इन जासूसों के पास ऐसे तमाम सबूत हैं जो ये प्रमाणित कर सकें कि इन लोगों ने भारत की विभिन्न खुफिया एजेंसियों के लिए पाकिस्तान में जाकर जासूसी की है. इन लोगों का योगदान एक सैनिक से बढ़कर है. इन्होंने देश की सेवा में अपना पूरा जीवन होम कर दिया, लेकिन इनके साथ देश की सरकार और खुफिया एजेंसियों द्वारा जिस तरह का व्यवहार किया जा रहा है वह बताता है कि इन्हें बहुत बड़ा धोखा दिया गया है.’

ऐसा नहीं है कि सिर्फ सरकार और खुफिया एजेंसियां इनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रही हैं.  कुछ अदालतें भी इस काम में काफी आगे हैं. ऐसा ही एक मामला करामत राही का है. करामत राही के मामले को लेकर रंजन लखनपाल ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में अपील की थी. जज ने मामले की सुनवाई के दौरान लखनपाल को तुरंत केस वापस लेने के लिए कहा. लखनपाल से कहा गया कि इस तरह के केस लेना देश के साथ गद्दारी है, इसलिए तुरंत यह केस वापस लिया जाए. गोपालदास कहते हैं, ‘जब हम कोर्ट में जाते हैं तो हमसे प्रमाण मांगा जाता है कि दिखाओ क्या सबूत है कि तुम जासूस थे. क्या हमारी कोर्ट यह मानती है कि पाकिस्तानी अदालतें बिना बात के ही किसी को जासूसी के आरोप में सजा दे देती हैं. अगर वे ऐसे ही फर्जी फैसले देतीं तो सारे भारतीय मछुआरे जो पाकिस्तानी सीमा में कभी-कभी चले जाते हैं उन पर भी वे जासूसी का केस ही डालतीं.’

जासूसों से जुड़े इन सभी मसलों पर बात करने के लिए जब तहलका ने खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की तो ज्यादातर ने इसे संवेदनशील मसला बताते हुए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. हालांकि इनमें से रॉ के एक पूर्व प्रमुख ने यह माना कि एजेंसी पाकिस्तान में जासूसी करवाती है लेकिन ऐसे सभी एजेंटों को पहले ही यह बता दिया जाता है कि उनके पकड़े जाने की दशा में एजेंसी उन्हें पहचानने से इनकार कर देगी. वे कहते हैं, ‘जासूसों के साथ एक मौखिक समझौता होता है. और हर एजेंसी का जासूसों की सहायता या पुनर्वास करने का अपना अलग तरीका होता है. चूंकि जासूसी का पूरा तरीका ही गैरपारंपरिक और सीक्रेट होता है इसलिए हम गुपचुप तरीके से ही उनकी मदद करते हैं.’ लेकिन कई सालों से मीडिया में जासूसों के ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जहां उनको कोई मुआवजा नहीं मिला या पुनर्वास नहीं किया गया. इस पर रॉ के ये पूर्व प्रमुख कहते हैं, ‘शोर मचाने वाले लोग चोर-उचक्के होते हैं. यदि कोई सच में जासूस है तो उसकी अच्छे से व्यवस्था की जाती है.’ लेकिन जैसा कि यही अधिकारी स्वीकार करते हैं कि जासूस बनाने का काम अतिगोपनीय होता है, ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि निचले स्तर पर इन जासूसों के साथ क्या बर्ताव होता है. रवींद्र कौशिक के भानजे विक्रम बताते हैं, ‘आज तक रॉ का कोई अधिकारी हमारे परिवार से मिलने नहीं आया. न किसी तरह की कोई सहायता की. मामा जी (कौशिक) की मृत्यु के बाद कुछ समय तक नानी (रवींद्र की मां) के नाम से 500 रुपये का चेक आता था जो बाद में 2000 रुपये हो गया लेकिन 2008 में वह भी बंद हो गया.’

सीमा के नजदीक गांवों में ऐसे कई जासूसों के उदाहरण भी हैं जिन्होंने दस से पंद्रह साल जासूसी के आरोप में जेल में गुजारे. उनके परिवारों को इस दौरान कोई मुआवजा नहीं मिला और वे बेहद बुरी हालत में रहने को मजबूर हैं. बेशक कुछ मामलों में खुफिया एजेंसियों द्वारा जासूसों के पुनर्वास के दावे सही हों लेकिन ऐसे उदाहरण इन इलाकों में एजेंसियों की छवि भी खराब कर रहे हैं साथ ही इससे वे लोग भारतीय सुरक्षातंत्र से दूर भी हो रहे हैं जिनकी मदद के बिना देश की सुरक्षा को पुख्ता बनाना असंभव है.

इन्हें जरूर पढ़ें

व्यथा कथा:1:’काम पूरा हो जाता है तो खुफिया एजेंसियां खुद पकड़वा देती हैं’

व्यथा कथा:2:’मेरी पत्नी 17 साल दूसरों के घर नौकरानी का काम करती हैं’

व्यथा कथा:3:जासूसी के जाल में एक गांव…

ढुलमुल मुखिया, डूबी लुटिया

दो लाख करोड़ रु का कोयला घोटाला जिस तरह हुआ वह बताता है कि एक ढुलमुल और अप्रभावी नेतृत्व भी देश के लिए उतना ही नुकसानदेह हो सकता है जितना कोई भ्रष्ट नेतृत्व. आशीष खेतान की रिपोर्ट.

भ्रष्टाचार पर इन दिनों जो बहस चल रही है उसका एक अहम पहलू प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन भी है. सर्वोच्च न्यायालय से लेकर नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (कैग) और सिविल सोसाइटी तक सभी ने यूपीए सरकार की इस बात के लिए आलोचना की है कि उसने 2जी स्पेक्ट्रम, खनिज और जमीन जैसे अमूल्य संसाधन कौड़ियों के भाव निजी कंपनियों को सौंप दिए. सबसे पहले कैग ने यह भंडाफोड़ किया था कि जनहित को परे रखकर किस तरह चुनिंदा कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए दूरसंचार नीति को मनमुताबिक तोड़ा-मरोड़ा गया. अब कैप्टिव कोल ब्लॉक आवंटन पर उसकी एक नई रिपोर्ट ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर सवाल खड़े कर दिए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इससे सरकारी खजाने को डेढ़ से दो लाख करोड़ रु तक का नुकसान हुआ है. 

राजनीतिक रूप से देखा जाए तो यूपीए के लिए कोयला घोटाले के मायने 2जी घोटाले से कहीं बड़े हैं. इससे पिछली यूपीए सरकार में करीब साढ़े तीन साल तक कोयला मंत्रालय की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ही संभाली थी. मंत्रालय में जूनियर यानी राज्य मंत्री की कुर्सी भी कांग्रेस के पास रही. फिर भी प्रधानमंत्री कोल ब्लॉक आवंटन के लिए प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी (जिसमें सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को ही खनन का ठेका मिलता है) की नीति लाने में विफल रहे. वह भी तब जब प्रधानमंत्री बनने के छह महीने के भीतर ही उन्होंने इस नीति के लिए सैद्धांतिक रूप से मंजूरी दे दी थी. 

देखा जाए तो कोयला घोटाले की यह कहानी कई मायनों में यूपीए सरकार की कहानी भी है. यह दिखाती है कि कैसे एक ढुलमुल और अप्रभावी राजनेता देश के लिए उतना ही नुकसानदेह हो सकता है जितना कोई भ्रष्ट नेता. प्रधानमंत्री की नीयत भले ही अच्छी रही हो मगर चूंकि वे सिर्फ नाम भर के प्रधानमंत्री थे इसलिए एक पारदर्शी और निष्पक्ष कोयला नीति लाने के लिए उनके हर कदम पर उन्हीं की सरकार के कुछ लोग अड़ंगा डालते रहे और वे ऐसे हर मौके पर दृढ़ता दिखाने के बजाय दूसरी तरफ देखते नजर आए. 

लेकिन इससे पहले कि हम कहानी के विस्तार में जाएं, कोयला घोटाले से जुड़े कुछ तथ्य.

यह प्रस्ताव तो 2004 में ही बन गया था कि खनन के लिए कोयले के ब्लॉक यूं ही आवंटित करने के बजाय इनकी नीलामी की जाए. लेकिन इस दौरान तीन बार कोयला मंत्रालय की कमान संभालने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया शिबू सोरेन और कोयला राज्य मंत्री डी नारायण राव हमेशा राह में अडंगा लगाते रहे. जब भी इस मामले पर कोई प्रगति होती, ये दोनों मिलकर इसे किसी न किसी बहाने से टाल देते. राव तो कांग्रेस के ही थे मगर इस मुद्दे पर उन्होंने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री के बजाय सोरेन का साथ दिया. पिछले छह साल के दौरान कोल ब्लॉकों की नीलामी के लिए प्रधानमंत्री के निर्देशों पर बने एक कैबिनेट नोट के मसौदे में छह बार बदलाव किया गया. ऊपरी तौर पर यह दिखाया गया कि इसका मकसद उनकी चिंताओं का भी ख्याल रखना है जो नीलामी के पक्ष में नहीं हैं. लेकिन जब भी नोट में कोई सुधार किया जाता तो इसके फौरन बाद ही नई आपत्तियां भी पेश कर दी जातीं. 

दिलचस्प बात यह है कि नीलामी के जरिए कोल ब्लॉक आवंटन का विरोध करने वालों में उस समय भाजपा शासित राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ व माकपा शासित प. बंगाल की सरकारें (अगले पृष्ठ पर बॉक्स देखें) भी थीं. राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस प्रस्तावित नीति से अपना विरोध जताया था. आज भाजपा और माकपा, दोनों ही स्क्रीनिंग कमेटी सिस्टम के जरिए कोल ब्लॉकों का आवंटन करने पर यूपीए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. इन दोनों दलों का दोहरा रवैया बताता है कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले पूंजीवाद का घुन सिर्फ कांग्रेस को नहीं लगा है. फिर भी चूंकि सरकार यूपीए की थी इसलिए नीतिगत मोर्चे पर इस असफलता के लिए जिम्मेदारी उसकी ही बनती है. 

दूसरे खनिजों से अलग कोयला संघीय सूची का विषय है. यानी इस मामले में फैसले का सारा अधिकार केंद्र सरकार का ही होता है. लेकिन हैरानी की बात है कि यूपीए के भीतर बैठे तत्वों ने नीलामी नीति को टालते रहने के लिए वसुंधरा राजे जैसी शख्सियतों द्वारा उठाई गई आपत्तियों का सहारा लिया जबकि राजस्थान में कोयले का कोई ज्ञात भंडार भी नहीं है. ऐसा करते हुए इस तथ्य की भी उपेक्षा की गई कि कोयला उत्पादक राज्यों में से ज्यादातर को इस नीति पर कोई एतराज नहीं था. यही नहीं, केंद्र के कई मंत्रालय भी इस नीति के पक्ष में थे. प्रस्तावित नीलामी नीति की फाइल प्रधानमंत्री कार्यालय, कोयला मंत्रालय और कानून मंत्रालय में चक्कर काटती रही, लेकिन इसे 2009 तक कैबिनेट के सामने नहीं रखा गया. 2010 में जाकर इस नीति पर मुहर लगी, लेकिन तब भी नीलामी के नियम क्या होंगे, इस पर फैसला होना बाकी था. इसलिए नई नीति आने के बाद भी स्थिति यह है कि अब तक एक भी कोल ब्लॉक का आवंटन नीलामी के जरिए नहीं हुआ है. 

यानी जिस कवायद में ज्यादा से ज्यादा छह महीने लगने चाहिए थे वह छह साल खिंच गई. बल्कि कहें तो खींची गई. 2004 में जब यूपीए की पहली सरकार बनी तो इसके कुछ समय बाद ही कोयला मंत्रालय में तत्कालीन सचिव पीसी परख ने प्रधानमंत्री को बताया कि कोल ब्लॉक आवंटन की प्रचलित व्यवस्था में कई झोल हैं. तब आवंटन एक स्क्रीनिंग कमेटी के जरिये होता था. इस कमेटी का अध्यक्ष कोयला मंत्रालय का सचिव होता था और इसमें कई मंत्रालयों, सरकारी निगमों और राज्य सरकारों के प्रतिनिधि होते थे. परख ने प्रधानमंत्री को बताया था कि यह व्यवस्था मनमानी, अपारदर्शिता और भ्रष्टाचार से भरी हुई है. इसके अलावा उनका यह भी कहना था कि कोयले की उत्पादन लागत और कोल इंडिया लिमिटेड द्वारा सप्लाई किए जा रहे कोयले की कीमत में काफी फर्क है जिसका नतीजा उन लोगों को अप्रत्याशित लाभ के रूप में सामने आ रहा है जिनके पास कोल ब्लॉक हैं.

परख के इस नीति का तीखा विरोध करने के बाद यूपीए ने 2004 में ही नीलामी नीति का एलान किया था. मगर यह अगले छह साल तक भी अमल में नहीं आ सकी. हां, नई नीति के ऐलान का नतीजा यह जरूर हुआ कि 2004 से 2009 के बीच कोल ब्लॉक पाने के लिए भगदड़ मची रही. 2जी घोटाले की पड़ताल बताती है कि उन लोगों ने भी स्पेक्ट्रम खरीद लिया था जिनका मकसद दूरसंचार सेवा देना नहीं बल्कि यह था कि बाद में इस स्पेक्ट्रम को महंगी कीमत पर बेचकर खूब मुनाफा बटोर लिया जाए. कोल ब्लॉकों के आवंटन में भी ऐसा हुआ. निजी ऑपरेटरों ने कई कोल ब्लॉक आवंटित करवा लिए. ये कंपनियां अच्छी तरह जानती थीं कि जो ब्लॉक अभी उन्हें कौड़ियों के दाम मिल रहे हैं, नीलामी नीति के आने पर उनकी कीमत बाजार के हिसाब से तय होगी यानी कई गुना बढ़ जाएगी. 

यह भी हैरत की बात है कि 2004 से 2009 की इस अवधि में यूपीए एक तरफ तो नीलामी नीति को टाले जा रहा था और दूसरी तरफ वह दनादन कोल ब्लॉक आवंटित किए जा रहा था. पांच साल में ही 155 कोल ब्लॉक, जिनमें अरबों टन कोयला मौजूद है, उनके वास्तविक बाजार भाव की तुलना में कौड़ियों के दाम आवंटित कर दिए गए. इनमें से 76 निजी कंपनियों को दिए गए थे और बाकी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को. आगे हम देखेंगे कि जिन हालात में यह काम हुआ वे साफ इशारा करते हैं कि ऐसा करने के पीछे नीतियां बनाने वालों और कोयले के ब्लॉक पाने वाले प्रतिष्ठानों की एक सुनियोजित साजिश थी. 

80 फीसदी से भी अधिक आवंटियों ने अब तक अपने ब्लॉकों से कोयला उत्पादन शुरू नहीं किया है. इससे एक अजीब-सी स्थिति पैदा हो गई है. एक तरफ तो सरकार ने इन ब्लॉकों के आवंटन में असाधारण फुर्ती दिखाई और दूसरी तरफ उसने यह सुनिश्चित करने के लिए कुछ खास नहीं किया कि आवंटी कोयला उत्पादन करना शुरू कर दें. अब जाकर सरकार ने एक कमेटी बनाई है जो यह देखेगी कि कितने आवंटी ऐसे हैं जिन्होंने जान-बूझकर यह देरी की और कितने ऐसे जो जमीन अधिग्रहण या अपनी खनन योजना के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति न मिलने की वजह से काम शुरू नहीं कर सके. गौरतलब है कि धड़ाधड़ कोल ब्लॉक आवंटन के पीछे सरकार का सबसे बड़ा तर्क यही था कि इससे घरेलू कोयला उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी होगी. 

कैग ने अपनी रिपोर्ट का जो मसौदा तैयार किया था उसमें कहा गया था कि इस तरह के आवंटन से सरकारी खजाने को कुल 6.31 से 10.67 लाख करोड़ रु. की चपत लगी. इससे निजी कंपनियों को 2.94 से लेकर 4.79 लाख करोड़ रु. का अप्रत्याशित लाभ हुआ. तहलका को सूत्रों से पता चला है कि कैग की फाइनल रिपोर्ट के मुताबिक निजी ऑपरेटरों को हुए फायदे की रकम का आंकड़ा 1.5 लाख से दो लाख करोड़ रु के बीच बैठ रहा है. भाजपा नेता प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं, ‘ऐसा भ्रष्टाचार पहले कभी नहीं देखा गया था. बाजार में सभी को पता है कि कंपनियों ने ये ब्लॉक लेने के लिए भारी रिश्वत दी. दलाली का रेट 50 से 100 रु प्रति टन था.’ जावड़ेकर द्वारा केंद्रीय सतर्कता आयोग में दर्ज करवाई गई शिकायत के आधार पर सीबीआई ने इन आवंटनों की प्राथमिक जांच शुरू कर दी है. सूत्र बताते हैं कि एजेंसी अब तक ऐसी दर्जन भर से भी ज्यादा कंपनियों की पहचान कर चुकी है जो जरूरी तकनीकी और वित्तीय अर्हता न रखने पर भी कोयले के ब्लॉक पाने में कामयाब रही थीं. मार्च 2011, यानी जब से कैग ने आवंटन के दस्तावेजों की पड़ताल शुरू की, तब से कोयला मंत्रालय ने अपने आप ही ऐसे 14 आवंटन रद्द कर दिए हैं. 

यूपीए की पहली सरकार के दौरान कोयला मंत्रालय का जिम्मा एक कैबिनेट और एक राज्य मंत्री के पास था. इस दरमियान कैबिनेट प्रभार तो कभी सोरेन और कभी मनमोहन सिंह के पास आता-जाता रहा, लेकिन राज्य मंत्री का प्रभार कांग्रेस के पास ही रहा. 23 मई, 2004 से लेकर छह अप्रैल, 2008 तक कांग्रेस नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद डी नारायण राव कोयला राज्य मंत्री रहे. सात अप्रैल, 2008 से 29 मई, 2009 तक यह प्रभार राजस्थान से कांग्रेस के सांसद संतोष बागरोड़िया के पास रहा. दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों ही राज्यसभा सांसद थे और दोनों ने प्रधानमंत्री की प्रस्तावित कोयला नीति को समर्थन देने के बजाय उनका साथ दिया जो इसके विरोध में थे. ढुलमुल रवैया दिखाते हुए प्रधानमंत्री ने भी इन बाधाओं के आगे घुटने टेक दिए. एक टीवी चैनल को दिए गए साक्षात्कार में कोयला मंत्रालय के पूर्व सचिव पीसी परख का कहना था,  ‘प्रधानमंत्री के पास समय-समय पर कोयला मंत्रालय का प्रभार रहा था. वे नीलामी की इस नीति पर दृढ़ता दिखा सकते थे.’  

गौर करने वाली बात यह भी है कि जब-जब  झामुमो मुखिया शिबू सोरेन को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया, प्रधानमंत्री ने उन्हें कोयला मंत्रालय का जिम्मा थमाया. झारखंड में कोयले का अकूत भंडार देखते हुए सोरेन को नीलामी नीति का स्वागत करना चाहिए था. कोयला भले ही संघीय सूची का विषय हो मगर उससे मिलने वाली रॉयल्टी में से एक बड़ा हिस्सा संबंधित राज्य को ही जाता है. यानी अगर नीलामी वाली नीति लागू हो जाती तो झारखंड जैसे राज्य की झोली में आने वाला राजस्व कहीं ज्यादा बढ़ जाता. इसके बावजूद सोरेन जब भी इस कुर्सी पर रहे उन्होंने इस नीति को पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. ऐसा लगता है कि केंद्रीय मंत्री भी इस बात के लिए खुलेआम लामबंदी कर रहे थे कि निजी कंपनियों को कोल ब्लॉक स्क्रीनिंग कमेटी के जरिए ही आवंटित हों. हाल ही में एक निजी कंपनी ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की है. इसमें उसने आरोप लगाया है कि पर्यटन मंत्री सुबोध कांत सहाय ने यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में खाद्य प्रसंस्करण मंत्री रहते हुए एक ऐसी कंपनी को कोल ब्लॉक दिलाने के लिए लामबंदी की जिसका संबंध उनके भाई से है. सहाय ने कथित रूप से प्रधानमंत्री को पत्र लिखे जिनमें उन्होंने कोयले के दो ब्लॉक एसकेएस इस्पात एंड पावर लिमिटेड को आवंटित करने के लिए प्रधानमंत्री से व्यक्तिगत हस्तक्षेप करने को कहा था. 

कोयला घोटाले की प्रक्रिया पर सिलसिलेवार नजर डालने से पता चलता है कि किस तरह से कोयला मंत्रालय में बैठे स्वार्थी तत्वों ने  पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए प्रस्तावित नीति की राह में लगातार बाधा डाली. 

16 जुलाई, 2004: कोयला मंत्रालय में सचिव परख ने प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी की नीति पर डी नारायण राव को एक विस्तृत प्रस्ताव भेजा. इसमें यह बात भी कही गई थी कि वर्तमान व्यवस्था से आवंटियों को अप्रत्याशित लाभ होगा. स्क्रीनिंग कमेटी वाली व्यवस्था पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने बनाई थी जो एनडीए सरकार में भी जारी रही. यूपीए सरकार आने तक इस व्यवस्था के तहत निजी ऑपरेटरों को 39 कोल ब्लॉक आवंटित हुए थे. 

24 जुलाई, 2004: दो दशक पुराने एक नरसंहार के मामले में जब एक स्थानीय अदालत ने सोरेन के खिलाफ वारंट जारी किया तो उन्होंने कोयला मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद मंत्रालय का जिम्मा प्रधानमंत्री ने संभाला. 

28 जुलाई, 2004: परख को भेजे गए एक नोट में डी नारायण राव ने कई बिंदुओं पर सफाई मांगी. जैसे उद्योग जगत की तरफ से इसका कैसा विरोध हो सकता है, खास तौर से ऊर्जा क्षेत्र की तरफ से. 

30 जुलाई, 2004: परख ने जवाब भेजा.

20 अगस्त, 2004: प्रधानमंत्री ने कोयला सचिव को आदेश दिया कि वे प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी पर नोट का एक मसौदा तैयार करें ताकि कैबिनेट इस बारे में विचार करके कोई फैसला ले सके. 

11 सितंबर, 2004: पीएमओ ने कोयला मंत्रालय को एक नोट भेजा जिसमें नीलामी से होने वाले कथित नुकसानों का जिक्र किया गया था. कोयला सचिव ने जवाब दिया कि इन तर्कों में कोई दम नहीं है. परख  ने प्रधानमंत्री के ध्यान में यह बात भी लाई कि स्क्रीनिंग कमेटी पर कुछ चुनिंदा कंपनियों को ब्लॉक आवंटित करने के लिए तरह-तरह के दबाव पड़ रहे हैं. उन्होंने सुझाव दिया कि भविष्य में सभी आवंटन प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी के जरिए ही होने चाहिए. 

4 अक्टूबर, 2004: डी नारायण राव ने परख को लिखा कि प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी नीति पर काम छोड़ दिया जाना चाहिए. इसके पीछे राव का तर्क था कि व्यावसायिक खनन के लिए कोल ब्लॉक आवंटन करने हेतु प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी का रास्ता प्रशस्त करने वाला कोयला खदान (राष्ट्रीयकरण) सुधार विधेयक 2000 ट्रेड यूनियनों और वाममोर्चे के तीखे विरोध के चलते राज्य सभा में लटका पड़ा है. लेकिन जो बात राव ने फाइल पर नहीं लिखी वह यह थी कि वाममोर्चे का विरोध व्यावसायिक कोयला खनन में निजी कंपनियों को इजाजत देने पर है न कि प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी को लेकर. लेकिन दो अलग-अलग मुद्दों को आपस में मिलाकर राव ने प्रस्तावित नीलामी नीति की राह में अड़ंगा डालने की कोशिश की.  

14 अक्टूबर, 2004: एक अहम नीति पर दृढ़ता दिखाने के बजाय प्रधानमंत्री कार्यालय ने परख को राव द्वारा उठाए गए मुद्दों पर जवाब देने के लिए कहा. 

एक नवंबर, 2004: प्रधानमंत्री कार्यालय ने निर्णय लिया कि जो भी आवेदन 28 जून, 2004 तक आ चुके हैं उन पर तत्कालीन व्यवस्था के आधार पर ही फैसला होगा और कोयला खदान कानून संसद के अगले सत्र में एक विधेयक के जरिए सुधारा जाएगा ताकि भविष्य में सभी कोल ब्लॉकों का आवंटन नीलामी के जरिए हो. प्रधानमंत्री कार्यालय ने परख को इस हिसाब से कैबिनेट नोट के मसौदे में सुधार करने को कहा. इस दौरान कुछ महीने जेल में बिताने के बाद शिबू सोरेन जमानत पर रिहा हो गए थे.

27 नवंबर, 2004: सोरेन को फिर से कैबिनेट में शामिल किया गया. कोयला मंत्रालय का जिम्मा अब प्रधानमंत्री से निकलकर उनके हाथों में आ गया. 

23 दिसंबर, 2004: परख ने मसौदे में जरूरी सुधार करने के बाद इसे स्वीकृति के लिए राव को भेजा.

28 जनवरी, 2005: लेकिन अब सोरेन और राव दोनों ने ही नीलामी नीति को चुपचाप दफन करने के लिए आपस में हाथ मिला लिया. सोरेन ने फाइल पर लिखा कि वह राव की इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि प्रस्तावित नीलामी नीति को आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं है. तब झारखंड मुक्ति मोर्चा न सिर्फ केंद्र में कांग्रेस का अहम सहयोगी था बल्कि झारखंड में अगले विधानसभा चुनावों में भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए दोनों पार्टियां मिलकर काम कर रही थीं.

2 मार्च, 2005: झारखंड के तत्कालीन राज्यपाल सैय्यद सिब्ते रजी ने एक विवादास्पद फैसला लेते हुए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की जगह सोरेन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर दिया. भाजपा-जदयू जनतांत्रिक गठबंधन के पास तब 36 विधायक थे, जबकि कांग्रेस-झामुमो गठबंधन के पास सिर्फ 26. सोरेन ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया और झारखंड के मुख्यमंत्री बन गए. कोयला मंत्रालय का प्रभार एक बार फिर प्रधानमंत्री ने ले लिया. 

7 मार्च, 2005: कोयला मंत्रालय में इस बदलाव के बाद परख ने एक बार फिर नीलामी नीति में जान फूंकने की कोशिश की. उन्होंने प्रधानमंत्री को एक नोट लिखा. इसमें उन्होंने कहा कि 28 जून, 2004 तक मिले सारे आवेदनों पर फैसला मार्च, 2005 तक होना है और अगर नीलामी नीति फौरन लागू नहीं हुई तो सरकार पर फिर पुरानी नीति को ही जारी रखने का दबाव बन जाएगा. परख ने लिखा कि कोल ब्लॉकों के आवंटन में पूर्ण पारदर्शिता के लिए यह परिस्थिति ठीक नहीं होगी. 

16 मार्च, 2005: प्रधानमंत्री कार्यालय ने परख से कैबिनेट नोट का मसौदा अपडेट करके भेजने को कहा.

 24 मार्च, 2005: प्रधानमंत्री कार्यालय ने मसौदे को मंजूरी दे दी जिसके बाद इसे ऊर्जा और इस्पात सहित कई मंत्रालयों में भेजा गया ताकि वे इस पर अपनी टिप्पणियां दे सकें. राज्य सरकारों से भी राय मांगी गई. 

21 जून, 2005: परख ने मंत्रालयों और राज्यों की टिप्पणियां मसौदे में शामिल कीं और इसे राव को भेजा ताकि वे इसे मंजूरी के लिए प्रधानमंत्री को भेज सकें. 

4 जुलाई, 2005: राव ने प्रधानमंत्री को लिखा कि ऊर्जा कंपनियां प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी की इच्छुक नहीं हैं क्योंकि इससे उन्हें बिजली की लागत बढ़ने का डर है. राव का कहना था कि नीति पर विस्तृत विचार-विमर्श की जरूरत है. लेकिन उन्होंने यह नहीं लिखा कि योजना आयोग, खदान मंत्रालय, इस्पात मंत्रालय जैसे केंद्रीय मंत्रालय और कई राज्य सरकारें इसके पक्ष में हैं. 

25 जुलाई, 2005: प्रधानमंत्री कार्यालय ने निर्णय लिया कि नीलामी प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिए कोयला खदान (राष्ट्रीयकरण) कानून  में सुधार की जरूरत होगी. लेकिन एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए उसने कोयला मंत्रालय को निर्देश दिया कि चूंकि इस सुधार में कुछ वक्त लगेगा इसलिए फिलहाल जो व्यवस्था है उसे ही जारी रखा जाए. नतीजा यह हुआ कि 2005 में 375 करोड़ टन भंडार वाले कोयले के 24 ब्लॉक आवंटित कर दिए गए. 

देखा जाए तो इस फैसले का कोई औचित्य नहीं था. कोयला खदान कानून 1973 में इंदिरा गांधी सरकार ने बनाया था. इसके जरिए कोयला खनन का काम सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को दे दिया गया था. बाद में कानून में संशोधन हुआ और यह व्यवस्था की गई कि खदानों का आवंटन लोहा और इस्पात निर्माण में लगी कुछ चुनिंदा कंपनियों को भी हो सके. स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा आवंटन की व्यवस्था कांग्रेस सरकार ने 1992 में एक शासनादेश लाकर की. यानी आवंटन की प्रक्रिया को बदलकर उसे प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी के जरिए करने का काम भी एक शासनादेश के जरिए ही किया जा सकता था. प्रधानमंत्री कार्यालय ने कई बार यह फाइल कानून मंत्रालय को भेजी और उससे इस बारे में राय मांगी कि आवंटन के लिए नीलामी नीति का कार्यान्वयन किस तरह किया जाए. 2004 से 2006 के बीच अलग-अलग मौकों पर तुरंत सलाह देने के बाद अगस्त, 2006 में कानून मंत्रालय के सचिव ने साफ कहा कि जब स्क्रीनिंग कमेटी शासनादेश से बन सकती है तो यह नई व्यवस्था भी वैसे ही बन सकती है. यानी सरकार आराम से इस व्यवस्था में सुधार कर सकती थी. बाद में कोयला खदान कानून में भी वही सुधार कर लिए जाते. लेकिन एक निर्बाध सड़क पर प्रधानमंत्री कार्यालय और कोयला मंत्रालय में बैठे स्वार्थी तत्व बाधाएं खड़ी कर रहे थे ताकि अपारदर्शी और भ्रष्टाचार से भरी एक नीति जारी रहे.

12 जनवरी, 2006: जब सुधारा गया कैबिनेट नोट का मसौदा (जिसमें कोयला खदान कानून में सुधार के जरिए नीलामी नीति लाने का प्रस्ताव था) फिर से राव को भेजा गया तो उनका कहना था कि ‘इस मामले में इतनी तात्कालिकता से काम लेने की कोई जरूरत नहीं है और इससे जुड़े मुद्दों को ध्यान में रखते हुए यह नोट उचित समय आने पर फिर से प्रस्तुत किया जाए.’  

जहां राव नीति में बदलाव को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश कर रहे थे वहीं प्रधानमंत्री कार्यालय और कोयला मंत्रालय के बीच हो रहा पत्राचार बताता है कि प्रधानमंत्री लगातार इस बात के लिए दबाव बना रहे थे कि कैबिनेट नोट पेश किया जाए. दूसरी तरफ झामुमो मुखिया सोरेन, जिन्हें झारखंड में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के नौ दिन बाद ही बहुमत साबित न कर पाने पर इस्तीफा देना पड़ा था, फिर से कोयला मंत्रालय पाने के लिए सक्रिय हो गए थे. 

29 जनवरी, 2006: सोरेन को एक बार फिर कोयला मंत्रालय सौंप दिया गया.

 7 अप्रैल, 2006: प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई एक बैठक में यह फैसला हुआ कि खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) कानून 1957 में सुधार करके प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी की व्यवस्था कोयले सहित तमाम खनिजों पर लागू की जाएगी. 

27 अप्रैल, 2006: राव ने फाइल पर टिप्पणी की कि ‘खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) कानून में सुधार के मुद्दे पर एक बार फिर विचार होना चाहिए क्योंकि इससे राज्य सरकार के वर्तमान अधिकार कम होते हैं और इस पर विवाद पैदा होने की आशंका है.’ उसी दिन सोरेन ने राव की राय का समर्थन किया और फाइल पर लिखा कि ‘राज्य मंत्री द्वारा व्यक्त किए गए विचार उचित हैं और कोयला मंत्रालय को ऐसे सुझाव देने से बचना चाहिए जिनसे संघीय नीति के लिए जटिलता पैदा होने की संभावना हो.’ 

सोरेन और राव द्वारा लगातार पैदा की जा रही अड़चनों का नतीजा यह हुआ कि खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) कानून में सुधार के लिए विधेयक आने में और चार साल लग गए. 17 अक्टूबर, 2008 को संसद के पटल पर यह विधेयक रखा गया. इस बीच, 2006 में 1779.2 करोड़ टन भंडार वाले 53 कोल ब्लॉक, 2007 में 1186.2 करोड़ टन भंडार वाले 52 ब्लॉक, 2008 में 355 करोड़ टन भंडार वाले 24 ब्लॉक और 2009 में 689.3 करोड़ टन भंडार वाले 16 ब्लॉक बिना नीलामी के ही आवंटित कर दिए गए. 

खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) सुधार कानून अगस्त, 2010 में संसद के दोनों सदनों में पारित हो गया था. लेकिन आज तक एक भी कोल ब्लॉक नीलामी के जरिए आवंटित नहीं किया गया है. तहलका ने कई बार डी नारायण राव से इस मुद्दे पर बात करके उनका पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. सोरेन के कार्यालय ने भी इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया. 2004 के बाद बनी हर विशेषज्ञ समिति ने स्क्रीनिंग कमेटी वाली व्यवस्था में व्याप्त मनमानी की तरफ इशारा किया है. कोयला क्षेत्र में सुधारों के मुद्दे पर बनी टीएल शंकर समिति ने पारदर्शिता के लिए इस व्यवस्था की मरम्मत की जरूरत बताई. अशोक चावला समिति ने भी कहा कि प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी की व्यवस्था बेहतर है.

अभी तक सरकार यह तर्क देकर अपनी कोयला नीति का बचाव करती रही है कि कोयले से राजस्व बढ़ाना कभी भी इसका उद्देश्य नहीं रहा. वह यह चाहती थी कि ऊर्जा, इस्पात और सीमेंट जैसे अहम उद्योगों को कोयले की उपलब्धता सुनिश्चित हो और इसके दाम भी कम रहें. प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री वी नारायण सामी कहते हैं, ‘कोयला नीति बिल्कुल सही थी. कोयले के ब्लॉक ऊर्जा परियोजनाओं या फिर इस्पात और सीमेंट निर्माताओं को दिए गए थे. अगर हमने कोयले की नीलामी की होती तो बिजली, इस्पात और सीमेंट के दाम बढ़ जाते. उपभोक्ताओं को इससे परेशानी होती.’ 

लेकिन गौर से देखा जाए तो ये तर्क पूरी तरह से खोखले लगते हैं. केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल (देखें इंटरव्यू) कह रहे हैं कि 80 फीसदी ब्लॉकों में कोयले का उत्पादन शुरू नहीं हुआ है. यहीं सरकार के इस तर्क की हवा निकल जाती है कि अगर उसने ये 155 ब्लॉक आवंटित नहीं किए होते तो उद्योग की कोयला जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं. राज्य सभा सांसद और वरिष्ठ माकपा नेता तपन सेन कहते हैं, ‘निजी कंपनियों को जो ब्लॉक आवंटित हुए हैं उनमें से ज्यादातर यूं ही पड़े हुए हैं. लेकिन इन कंपनियों ने इन आवंटनों को स्टॉक मार्केट में अपनी वैल्यू बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया है. निजी कंपनियों को इस आवंटन का नतीजा भ्रष्टाचार के रूप में सामने आया है.’ 

जहां उत्पादन शुरू हो गया है वहां भी ऐसे कोई खास सबूत नहीं हैं जो यह दिखाते हों कि कम उत्पादन लागत का फायदा उपभोक्ताओं को हुआ हो. कोयले के ब्लॉक दर्जनों ऊर्जा कंपनियों को भी मिले थे. इनमें से ज्यादातर ने राज्य सरकारों के साथ ऊर्जा खरीद समझौते नहीं किए हैं. जो कुछेक प्लांट शुरू हुए भी, वे स्वतंत्र ऊर्जा उत्पादक की तरह काम कर रहे हैं और 10 से 12 रु प्रति यूनिट की दर से बिजली बेचकर भारी मुनाफा कमा रहे हैं. कोयला मंत्रालय से सेवानिवृत्त हुए एक नौकरशाह बताते हैं, ‘आप किसी भी अर्थशास्त्री से पूछ लीजिए. कीमतें मांग और आपूर्ति के हिसाब से तय होती हैं न कि उत्पादन सामग्री की लागत से.’ हाल ही में अंबुजा, अल्ट्राटेक और जेपी सीमेंट्स सहित 11 बड़ी सीमेंट कंपनियों पर 6,307 करोड़ रु.का जुर्माना हुआ. आरोप था कि ये सभी कंपनियां एक गुट बनाकर कीमतों, आपूर्ति आदि का निर्धारण कर रही थीं. इससे सरकार के इस तर्क की हवा निकल जाती है कि सीमेंट और इस्पात जैसे क्षेत्रों को सस्ता कोयला उपलब्ध कराने से उपभोक्ता को फायदा हुआ है. 

इसे भी पढ़ें: केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल से आशीष खेतान की बातचीत

ढुलमुल मुखिया,डूबी लुटिया

दो लाख करोड़ रु का कोयला घोटाला जिस तरह हुआ वह बताता है कि एक ढुलमुल और अप्रभावी नेतृत्व भी देश के लिए उतना ही नुकसानदेह हो सकता है जितना कोई भ्रष्ट नेतृत्व. आशीष खेतान की रिपोर्ट.

भ्रष्टाचार पर इन दिनों जो बहस चल रही है उसका एक अहम पहलू प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन भी है. सर्वोच्च न्यायालय से लेकर नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (कैग) और सिविल सोसाइटी तक सभी ने यूपीए सरकार की इस बात के लिए आलोचना की है कि उसने 2जी स्पेक्ट्रम, खनिज और जमीन जैसे अमूल्य संसाधन कौड़ियों के भाव निजी कंपनियों को सौंप दिए. सबसे पहले कैग ने यह भंडाफोड़ किया था कि जनहित को परे रखकर किस तरह चुनिंदा कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए दूरसंचार नीति को मनमुताबिक तोड़ा-मरोड़ा गया. अब कैप्टिव कोल ब्लॉक आवंटन पर उसकी एक नई रिपोर्ट ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर सवाल खड़े कर दिए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इससे सरकारी खजाने को डेढ़ से दो लाख करोड़ रु तक का नुकसान हुआ है. 

राजनीतिक रूप से देखा जाए तो यूपीए के लिए कोयला घोटाले के मायने 2जी घोटाले से कहीं बड़े हैं. इससे पिछली यूपीए सरकार में करीब साढ़े तीन साल तक कोयला मंत्रालय की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ही संभाली थी. मंत्रालय में जूनियर यानी राज्य मंत्री की कुर्सी भी कांग्रेस के पास रही. फिर भी प्रधानमंत्री कोल ब्लॉक आवंटन के लिए प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी (जिसमें सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को ही खनन का ठेका मिलता है) की नीति लाने में विफल रहे. वह भी तब जब प्रधानमंत्री बनने के छह महीने के भीतर ही उन्होंने इस नीति के लिए सैद्धांतिक रूप से मंजूरी दे दी थी. 

देखा जाए तो कोयला घोटाले की यह कहानी कई मायनों में यूपीए सरकार की कहानी भी है. यह दिखाती है कि कैसे एक ढुलमुल और अप्रभावी राजनेता देश के लिए उतना ही नुकसानदेह हो सकता है जितना कोई भ्रष्ट नेता. प्रधानमंत्री की नीयत भले ही अच्छी रही हो मगर चूंकि वे सिर्फ नाम भर के प्रधानमंत्री थे इसलिए एक पारदर्शी और निष्पक्ष कोयला नीति लाने के लिए उनके हर कदम पर उन्हीं की सरकार के कुछ लोग अड़ंगा डालते रहे और वे ऐसे हर मौके पर दृढ़ता दिखाने के बजाय दूसरी तरफ देखते नजर आए. 

लेकिन इससे पहले कि हम कहानी के विस्तार में जाएं, कोयला घोटाले से जुड़े कुछ तथ्य.

यह प्रस्ताव तो 2004 में ही बन गया था कि खनन के लिए कोयले के ब्लॉक यूं ही आवंटित करने के बजाय इनकी नीलामी की जाए. लेकिन इस दौरान तीन बार कोयला मंत्रालय की कमान संभालने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया शिबू सोरेन और कोयला राज्य मंत्री डी नारायण राव हमेशा राह में अडं़गा लगाते रहे. जब भी इस मामले पर कोई प्रगति होती, ये दोनों मिलकर इसे किसी न किसी बहाने से टाल देते. राव तो कांग्रेस के ही थे मगर इस मुद्दे पर उन्होंने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री के बजाय सोरेन का साथ दिया. पिछले छह साल के दौरान कोल ब्लॉकों की नीलामी के लिए प्रधानमंत्री के निर्देशों पर बने एक कैबिनेट नोट के मसौदे में छह बार बदलाव किया गया. ऊपरी तौर पर यह दिखाया गया कि इसका मकसद उनकी चिंताओं का भी ख्याल रखना है जो नीलामी के पक्ष में नहीं हैं. लेकिन जब भी नोट में कोई सुधार किया जाता तो इसके फौरन बाद ही नई आपत्तियां भी पेश कर दी जातीं. 

दिलचस्प बात यह है कि नीलामी के जरिए कोल ब्लॉक आवंटन का विरोध करने वालों में उस समय भाजपा शासित राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ व माकपा शासित प. बंगाल की सरकारें (अगले पृष्ठ पर बॉक्स देखें) भी थीं. राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस प्रस्तावित नीति से अपना विरोध जताया था. आज भाजपा और माकपा, दोनों ही स्क्रीनिंग कमेटी सिस्टम के जरिए कोल ब्लॉकों का आवंटन करने पर यूपीए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. इन दोनों दलों का दोहरा रवैया बताता है कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले पूंजीवाद का घुन सिर्फ कांग्रेस को नहीं लगा है. फिर भी चूंकि सरकार यूपीए की थी इसलिए नीतिगत मोर्चे पर इस असफलता के लिए जिम्मेदारी उसकी ही बनती है. 

दूसरे खनिजों से अलग कोयला संघीय सूची का विषय है. यानी इस मामले में फैसले का सारा अधिकार केंद्र सरकार का ही होता है. लेकिन हैरानी की बात है कि यूपीए के भीतर बैठे तत्वों ने नीलामी नीति को टालते रहने के लिए वसुंधरा राजे जैसी शख्सियतों द्वारा उठाई गई आपत्तियों का सहारा लिया जबकि राजस्थान में कोयले का कोई ज्ञात भंडार भी नहीं है. ऐसा करते हुए इस तथ्य की भी उपेक्षा की गई कि कोयला उत्पादक राज्यों में से ज्यादातर को इस नीति पर कोई एतराज नहीं था. यही नहीं, केंद्र के कई मंत्रालय भी इस नीति के पक्ष में थे. प्रस्तावित नीलामी नीति की फाइल प्रधानमंत्री कार्यालय, कोयला मंत्रालय और कानून मंत्रालय में चक्कर काटती रही, लेकिन इसे 2009 तक कैबिनेट के सामने नहीं रखा गया. 2010 में जाकर इस नीति पर मुहर लगी, लेकिन तब भी नीलामी के नियम क्या होंगे, इस पर फैसला होना बाकी था. इसलिए नई नीति आने के बाद भी स्थिति यह है कि अब तक एक भी कोल ब्लॉक का आवंटन नीलामी के जरिए नहीं हुआ है. 

यानी जिस कवायद में ज्यादा से ज्यादा छह महीने लगने चाहिए थे वह छह साल खिंच गई. बल्कि कहें तो खींची गई. 2004 में जब यूपीए की पहली सरकार बनी तो इसके कुछ समय बाद ही कोयला मंत्रालय में तत्कालीन सचिव पीसी परख ने प्रधानमंत्री को बताया कि कोल ब्लॉक आवंटन की प्रचलित व्यवस्था में कई झोल हैं. तब आवंटन एक स्क्रीनिंग कमेटी के जरिये होता था. इस कमेटी का अध्यक्ष कोयला मंत्रालय का सचिव होता था और इसमें कई मंत्रालयों, सरकारी निगमों और राज्य सरकारों के प्रतिनिधि होते थे. परख ने प्रधानमंत्री को बताया था कि यह व्यवस्था मनमानी, अपारदर्शिता और भ्रष्टाचार से भरी हुई है. इसके अलावा उनका यह भी कहना था कि कोयले की उत्पादन लागत और कोल इंडिया लिमिटेड द्वारा सप्लाई किए जा रहे कोयले की कीमत में काफी फर्क है जिसका नतीजा उन लोगों को अप्रत्याशित लाभ के रूप में सामने आ रहा है जिनके पास कोल ब्लॉक हैं.

परख के इस नीति का तीखा विरोध करने के बाद यूपीए ने 2004 में ही नीलामी नीति का एलान किया था. मगर यह अगले छह साल तक भी अमल में नहीं आ सकी. हां, नई नीति के ऐलान का नतीजा यह जरूर हुआ कि 2004 से 2009 के बीच कोल ब्लॉक पाने के लिए भगदड़ मची रही. 2जी घोटाले की पड़ताल बताती है कि उन लोगों ने भी स्पेक्ट्रम खरीद लिया था जिनका मकसद दूरसंचार सेवा देना नहीं बल्कि यह था कि बाद में इस स्पेक्ट्रम को महंगी कीमत पर बेचकर खूब मुनाफा बटोर लिया जाए. कोल ब्लॉकों के आवंटन में भी ऐसा हुआ. निजी ऑपरेटरों ने कई कोल ब्लॉक आवंटित करवा लिए. ये कंपनियां अच्छी तरह जानती थीं कि जो ब्लॉक अभी उन्हें कौड़ियों के दाम मिल रहे हैं, नीलामी नीति के आने पर उनकी कीमत बाजार के हिसाब से तय होगी यानी कई गुना बढ़ जाएगी. 

यह भी हैरत की बात है कि 2004 से 2009 की इस अवधि में यूपीए एक तरफ तो नीलामी नीति को टाले जा रहा था और दूसरी तरफ वह दनादन कोल ब्लॉक आवंटित किए जा रहा था. पांच साल में ही 155 कोल ब्लॉक, जिनमें अरबों टन कोयला मौजूद है, उनके वास्तविक बाजार भाव की तुलना में कौड़ियों के दाम आवंटित कर दिए गए. इनमें से 76 निजी कंपनियों को दिए गए थे और बाकी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को. आगे हम देखेंगे कि जिन हालात में यह काम हुआ वे साफ इशारा करते हैं कि ऐसा करने के पीछे नीतियां बनाने वालों और कोयले के ब्लॉक पाने वाले प्रतिष्ठानों की एक सुनियोजित साजिश थी. 

80 फीसदी से भी अधिक आवंटियों ने अब तक अपने ब्लॉकों से कोयला उत्पादन शुरू नहीं किया है. इससे एक अजीब-सी स्थिति पैदा हो गई है. एक तरफ तो सरकार ने इन ब्लॉकों के आवंटन में असाधारण फुर्ती दिखाई और दूसरी तरफ उसने यह सुनिश्चित करने के लिए कुछ खास नहीं किया कि आवंटी कोयला उत्पादन करना शुरू कर दें. अब जाकर सरकार ने एक कमेटी बनाई है जो यह देखेगी कि कितने आवंटी ऐसे हैं जिन्होंने जान-बूझकर यह देरी की और कितने ऐसे जो जमीन अधिग्रहण या अपनी खनन योजना के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति न मिलने की वजह से काम शुरू नहीं कर सके. गौरतलब है कि धड़ाधड़ कोल ब्लॉक आवंटन के पीछे सरकार का सबसे बड़ा तर्क यही था कि इससे घरेलू कोयला उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी होगी. 

कैग ने अपनी रिपोर्ट का जो मसौदा तैयार किया था उसमें कहा गया था कि इस तरह के आवंटन से सरकारी खजाने को कुल 6.31 से 10.67 लाख करोड़ रु. की चपत लगी. इससे निजी कंपनियों को 2.94 से लेकर 4.79 लाख करोड़ रु. का अप्रत्याशित लाभ हुआ. तहलका को सूत्रों से पता चला है कि कैग की फाइनल रिपोर्ट के मुताबिक निजी ऑपरेटरों को हुए फायदे की रकम का आंकड़ा 1.5 लाख से दो लाख करोड़ रु के बीच बैठ रहा है. भाजपा नेता प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं, ‘ऐसा भ्रष्टाचार पहले कभी नहीं देखा गया था. बाजार में सभी को पता है कि कंपनियों ने ये ब्लॉक लेने के लिए भारी रिश्वत दी. दलाली का रेट 50 से 100 रु प्रति टन था.’ जावड़ेकर द्वारा केंद्रीय सतर्कता आयोग में दर्ज करवाई गई शिकायत के आधार पर सीबीआई ने इन आवंटनों की प्राथमिक जांच शुरू कर दी है. सूत्र बताते हैं कि एजेंसी अब तक ऐसी दर्जन भर से भी ज्यादा कंपनियों की पहचान कर चुकी है जो जरूरी तकनीकी और वित्तीय अर्हता न रखने पर भी कोयले के ब्लॉक पाने में कामयाब रही थीं. मार्च 2011, यानी जब से कैग ने आवंटन के दस्तावेजों की पड़ताल शुरू की, तब से कोयला मंत्रालय ने अपने आप ही ऐसे 14 आवंटन रद्द कर दिए हैं. 

यूपीए की पहली सरकार के दौरान कोयला मंत्रालय का जिम्मा एक कैबिनेट और एक राज्य मंत्री के पास था. इस दरमियान कैबिनेट प्रभार तो कभी सोरेन और कभी मनमोहन सिंह के पास आता-जाता रहा, लेकिन राज्य मंत्री का प्रभार कांग्रेस के पास ही रहा. 23 मई, 2004 से लेकर छह अप्रैल, 2008 तक कांग्रेस नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद डी नारायण राव कोयला राज्य मंत्री रहे. सात अप्रैल, 2008 से 29 मई, 2009 तक यह प्रभार राजस्थान से कांग्रेस के सांसद संतोष बागरोड़िया के पास रहा. दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों ही राज्यसभा सांसद थे और दोनों ने प्रधानमंत्री की प्रस्तावित कोयला नीति को समर्थन देने के बजाय उनका साथ दिया जो इसके विरोध में थे. ढुलमुल रवैया दिखाते हुए प्रधानमंत्री ने भी इन बाधाओं के आगे घुटने टेक दिए. एक टीवी चैनल को दिए गए साक्षात्कार में कोयला मंत्रालय के पूर्व सचिव पीसी परख का कहना था,  ‘प्रधानमंत्री के पास समय-समय पर कोयला मंत्रालय का प्रभार रहा था. वे नीलामी की इस नीति पर दृढ़ता दिखा सकते थे.’  

गौर करने वाली बात यह भी है कि जब-जब  झामुमो मुखिया शिबू सोरेन को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया, प्रधानमंत्री ने उन्हें कोयला मंत्रालय का जिम्मा थमाया. झारखंड में कोयले का अकूत भंडार देखते हुए सोरेन को नीलामी नीति का स्वागत करना चाहिए था. कोयला भले ही संघीय सूची का विषय हो मगर उससे मिलने वाली रॉयल्टी में से एक बड़ा हिस्सा संबंधित राज्य को ही जाता है. यानी अगर नीलामी वाली नीति लागू हो जाती तो झारखंड जैसे राज्य की झोली में आने वाला राजस्व कहीं ज्यादा बढ़ जाता. इसके बावजूद सोरेन जब भी इस कुर्सी पर रहे उन्होंने इस नीति को पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. ऐसा लगता है कि केंद्रीय मंत्री भी इस बात के लिए खुलेआम लामबंदी कर रहे थे कि निजी कंपनियों को कोल ब्लॉक स्क्रीनिंग कमेटी के जरिए ही आवंटित हों. हाल ही में एक निजी कंपनी ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की है. इसमें उसने आरोप लगाया है कि पर्यटन मंत्री सुबोध कांत सहाय ने यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में खाद्य प्रसंस्करण मंत्री रहते हुए एक ऐसी कंपनी को कोल ब्लॉक दिलाने के लिए लामबंदी की जिसका संबंध उनके भाई से है. सहाय ने कथित रूप से प्रधानमंत्री को पत्र लिखे जिनमें उन्होंने कोयले के दो ब्लॉक एसकेएस इस्पात एेंड पावर लिमिटेड को आवंटित करने के लिए प्रधानमंत्री से व्यक्तिगत हस्तक्षेप करने को कहा था. 

कोयला घोटाले की प्रक्रिया पर सिलसिलेवार नजर डालने से पता चलता है कि किस तरह से कोयला मंत्रालय में बैठे स्वार्थी तत्वों ने  पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए प्रस्तावित नीति की राह में लगातार बाधा डाली. 

16 जुलाई, 2004: कोयला मंत्रालय में सचिव परख ने प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी की नीति पर डी नारायण राव को एक विस्तृत प्रस्ताव भेजा. इसमें यह बात भी कही गई थी कि वर्तमान व्यवस्था से आवंटियों को अप्रत्याशित लाभ होगा. स्क्रीनिंग कमेटी वाली व्यवस्था पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने बनाई थी जो एनडीए सरकार में भी जारी रही. यूपीए सरकार आने तक इस व्यवस्था के तहत निजी ऑपरेटरों को 39 कोल ब्लॉक आवंटित हुए थे. 

24 जुलाई, 2004: दो दशक पुराने एक नरसंहार के मामले में जब एक स्थानीय अदालत ने सोरेन के खिलाफ वारंट जारी किया तो उन्होंने कोयला मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद मंत्रालय का जिम्मा प्रधानमंत्री ने संभाला. 

28 जुलाई, 2004: परख को भेजे गए एक नोट में डी नारायण राव ने कई बिंदुओं पर सफाई मांगी. जैसे उद्योग जगत की तरफ से इसका कैसा विरोध हो सकता है, खास तौर से ऊर्जा क्षेत्र की तरफ से. 

30 जुलाई, 2004: परख ने जवाब भेजा.

20 अगस्त, 2004: प्रधानमंत्री ने कोयला सचिव को आदेश दिया कि वे प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी पर नोट का एक मसौदा तैयार करें ताकि कैबिनेट इस बारे में विचार करके कोई फैसला ले सके. 

11 सितंबर, 2004: पीएमओ ने कोयला मंत्रालय को एक नोट भेजा जिसमें नीलामी से होने वाले कथित नुकसानों का जिक्र किया गया था. कोयला सचिव ने जवाब दिया कि इन तर्कों में कोई दम नहीं है. परख  ने प्रधानमंत्री के ध्यान में यह बात भी लाई कि स्क्रीनिंग कमेटी पर कुछ चुनिंदा कंपनियों को ब्लॉक आवंटित करने के लिए तरह-तरह के दबाव पड़ रहे हैं. उन्होंने सुझाव दिया कि भविष्य में सभी आवंटन प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी के जरिए ही होने चाहिए. 

4 अक्टूबर, 2004: डी नारायण राव ने परख को लिखा कि प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी नीति पर काम छोड़ दिया जाना चाहिए. इसके पीछे राव का तर्क था कि व्यावसायिक खनन के लिए कोल ब्लॉक आवंटन करने हेतु प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी का रास्ता प्रशस्त करने वाला कोयला खदान (राष्ट्रीयकरण) सुधार विधेयक 2000 ट्रेड यूनियनों और वाममोर्चे के तीखे विरोध के चलते राज्य सभा में लटका पड़ा है. लेकिन जो बात राव ने फाइल पर नहीं लिखी वह यह थी कि वाममोर्चे का विरोध व्यावसायिक कोयला खनन में निजी कंपनियों को इजाजत देने पर है न कि प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी को लेकर. लेकिन दो अलग-अलग मुद्दों को आपस में मिलाकर राव ने प्रस्तावित नीलामी नीति की राह में अड़ंगा डालने की कोशिश की.  

14 अक्टूबर, 2004: एक अहम नीति पर दृढ़ता दिखाने के बजाय प्रधानमंत्री कार्यालय ने परख को राव द्वारा उठाए गए मुद्दों पर जवाब देने के लिए कहा. 

एक नवंबर, 2004: प्रधानमंत्री कार्यालय ने निर्णय लिया कि जो भी आवेदन 28 जून, 2004 तक आ चुके हैं उन पर तत्कालीन व्यवस्था के आधार पर ही फैसला होगा और कोयला खदान कानून संसद के अगले सत्र में एक विधेयक के जरिए सुधारा जाएगा ताकि भविष्य में सभी कोल ब्लॉकों का आवंटन नीलामी के जरिए हो. प्रधानमंत्री कार्यालय ने परख को इस हिसाब से कैबिनेट नोट के मसौदे में सुधार करने को कहा. इस दौरान कुछ महीने जेल में बिताने के बाद शिबू सोरेन जमानत पर रिहा हो गए थे.

27 नवंबर, 2004: सोरेन को फिर से कैबिनेट में शामिल किया गया. कोयला मंत्रालय का जिम्मा अब प्रधानमंत्री से निकलकर उनके हाथों में आ गया. 

23 दिसंबर, 2004: परख ने मसौदे में जरूरी सुधार करने के बाद इसे स्वीकृति के लिए राव को भेजा.

28 जनवरी, 2005: लेकिन अब सोरेन और राव दोनों ने ही नीलामी नीति को चुपचाप दफन करने के लिए आपस में हाथ मिला लिया. सोरेन ने फाइल पर लिखा कि वह राव की इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि प्रस्तावित नीलामी नीति को आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं है. तब झारखंड मुक्ति मोर्चा न सिर्फ केंद्र में कांग्रेस का अहम सहयोगी था बल्कि झारखंड में अगले विधानसभा चुनावों में भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए दोनों पार्टियां मिलकर काम कर रही थीं.

2 मार्च, 2005: झारखंड के तत्कालीन राज्यपाल सैय्यद सिब्ते रजी ने एक विवादास्पद फैसला लेते हुए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की जगह सोरेन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर दिया. भाजपा-जदयू जनतांत्रिक गठबंधन के पास तब 36 विधायक थे, जबकि कांग्रेस-झामुमो गठबंधन के पास सिर्फ 26. सोरेन ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया और झारखंड के मुख्यमंत्री बन गए. कोयला मंत्रालय का प्रभार एक बार फिर प्रधानमंत्री ने ले लिया. 

7 मार्च, 2005: कोयला मंत्रालय में इस बदलाव के बाद परख ने एक बार फिर नीलामी नीति में जान फूंकने की कोशिश की. उन्होंने प्रधानमंत्री को एक नोट लिखा. इसमें उन्होंने कहा कि 28 जून, 2004 तक मिले सारे आवेदनों पर फैसला मार्च, 2005 तक होना है और अगर नीलामी नीति फौरन लागू नहीं हुई तो सरकार पर फिर पुरानी नीति को ही जारी रखने का दबाव बन जाएगा. परख ने लिखा कि कोल ब्लॉकों के आवंटन में पूर्ण पारदर्शिता के लिए यह परिस्थिति ठीक नहीं होगी. 

16 मार्च, 2005: प्रधानमंत्री कार्यालय ने परख से कैबिनेट नोट का मसौदा अपडेट करके भेजने को कहा.

 24 मार्च, 2005: प्रधानमंत्री कार्यालय ने मसौदे को मंजूरी दे दी जिसके बाद इसे ऊर्जा और इस्पात सहित कई मंत्रालयों में भेजा गया ताकि वे इस पर अपनी टिप्पणियां दे सकें. राज्य सरकारों से भी राय मांगी गई. 

21 जून, 2005: परख ने मंत्रालयों और राज्यों की टिप्पणियां मसौदे में शामिल कीं और इसे राव को भेजा ताकि वे इसे मंजूरी के लिए प्रधानमंत्री को भेज सकें. 

4 जुलाई, 2005: राव ने प्रधानमंत्री को लिखा कि ऊर्जा कंपनियां प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी की इच्छुक नहीं हैं क्योंकि इससे उन्हें बिजली की लागत बढ़ने का डर है. राव का कहना था कि नीति पर विस्तृत विचार-विमर्श की जरूरत है. लेकिन उन्होंने यह नहीं लिखा कि योजना आयोग, खदान मंत्रालय, इस्पात मंत्रालय जैसे केंद्रीय मंत्रालय और कई राज्य सरकारें इसके पक्ष में हैं. 

25 जुलाई, 2005: प्रधानमंत्री कार्यालय ने निर्णय लिया कि नीलामी प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिए कोयला खदान (राष्ट्रीयकरण) कानून  में सुधार की जरूरत होगी. लेकिन एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए उसने कोयला मंत्रालय को निर्देश दिया कि चूंकि इस सुधार में कुछ वक्त लगेगा इसलिए फिलहाल जो व्यवस्था है उसे ही जारी रखा जाए. नतीजा यह हुआ कि 2005 में 375 करोड़ टन भंडार वाले कोयले के 24 ब्लॉक आवंटित कर दिए गए. 

देखा जाए तो इस फैसले का कोई औचित्य नहीं था. कोयला खदान कानून 1973 में इंदिरा गांधी सरकार ने बनाया था. इसके जरिए कोयला खनन का काम सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को दे दिया गया था. बाद में कानून में संशोधन हुआ और यह व्यवस्था की गई कि खदानों का आवंटन लोहा और इस्पात निर्माण में लगी कुछ चुनिंदा कंपनियों को भी हो सके. स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा आवंटन की व्यवस्था कांग्रेस सरकार ने 1992 में एक शासनादेश लाकर की. यानी आवंटन की प्रक्रिया को बदलकर उसे प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी के जरिए करने का काम भी एक शासनादेश के जरिए ही किया जा सकता था. प्रधानमंत्री कार्यालय ने कई बार यह फाइल कानून मंत्रालय को भेजी और उससे इस बारे में राय मांगी कि आवंटन के लिए नीलामी नीति का कार्यान्वयन किस तरह किया जाए. 2004 से 2006 के बीच अलग-अलग मौकों पर तुरंत सलाह देने के बाद अगस्त, 2006 में कानून मंत्रालय के सचिव ने साफ कहा कि जब स्क्रीनिंग कमेटी शासनादेश से बन सकती है तो यह नई व्यवस्था भी वैसे ही बन सकती है. यानी सरकार आराम से इस व्यवस्था में सुधार कर सकती थी. बाद में कोयला खदान कानून में भी वही सुधार कर लिए जाते. लेकिन एक निर्बाध सड़क पर प्रधानमंत्री कार्यालय और कोयला मंत्रालय में बैठे स्वार्थी तत्व बाधाएं खड़ी कर रहे थे ताकि अपारदर्शी और भ्रष्टाचार से भरी एक नीति जारी रहे.

12 जनवरी, 2006: जब सुधारा गया कैबिनेट नोट का मसौदा (जिसमें कोयला खदान कानून में सुधार के जरिए नीलामी नीति लाने का प्रस्ताव था) फिर से राव को भेजा गया तो उनका कहना था कि ‘इस मामले में इतनी तात्कालिकता से काम लेने की कोई जरूरत नहीं है और इससे जुड़े मुद्दों को ध्यान में रखते हुए यह नोट उचित समय आने पर फिर से प्रस्तुत किया जाए.’  

जहां राव नीति में बदलाव को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश कर रहे थे वहीं प्रधानमंत्री कार्यालय और कोयला मंत्रालय के बीच हो रहा पत्राचार बताता है कि प्रधानमंत्री लगातार इस बात के लिए दबाव बना रहे थे कि कैबिनेट नोट पेश किया जाए. दूसरी तरफ झामुमो मुखिया सोरेन, जिन्हें झारखंड में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के नौ दिन बाद ही बहुमत साबित न कर पाने पर इस्तीफा देना पड़ा था, फिर से कोयला मंत्रालय पाने के लिए सक्रिय हो गए थे. 

29 जनवरी, 2006: सोरेन को एक बार फिर कोयला मंत्रालय सौंप दिया गया.

 7 अप्रैल, 2006: प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई एक बैठक में यह फैसला हुआ कि खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) कानून 1957 में सुधार करके प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी की व्यवस्था कोयले सहित तमाम खनिजों पर लागू की जाएगी. 

27 अप्रैल, 2006: राव ने फाइल पर टिप्पणी की कि ‘खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) कानून में सुधार के मुद्दे पर एक बार फिर विचार होना चाहिए क्योंकि इससे राज्य सरकार के वर्तमान अधिकार कम होते हैं और इस पर विवाद पैदा होने की आशंका है.’ उसी दिन सोरेन ने राव की राय का समर्थन किया और फाइल पर लिखा कि ‘राज्य मंत्री द्वारा व्यक्त किए गए विचार उचित हैं और कोयला मंत्रालय को ऐसे सुझाव देने से बचना चाहिए जिनसे संघीय नीति के लिए जटिलता पैदा होने की संभावना हो.’ 

सोरेन और राव द्वारा लगातार पैदा की जा रही अड़चनों का नतीजा यह हुआ कि खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) कानून में सुधार के लिए विधेयक आने में और चार साल लग गए. 17 अक्टूबर, 2008 को संसद के पटल पर यह विधेयक रखा गया. इस बीच, 2006 में 1779.2 करोड़ टन भंडार वाले 53 कोल ब्लॉक, 2007 में 1186.2 करोड़ टन भंडार वाले 52 ब्लॉक, 2008 में 355 करोड़ टन भंडार वाले 24 ब्लॉक और 2009 में 689.3 करोड़ टन भंडार वाले 16 ब्लॉक बिना नीलामी के ही आवंटित कर दिए गए.  खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) सुधार कानून अगस्त, 2010 में संसद के दोनों सदनों में पारित हो गया था. लेकिन आज तक एक भी कोल ब्लॉक नीलामी के जरिए आवंटित नहीं किया गया है. तहलका ने कई बार डी नारायण राव से इस मुद्दे पर बात करके उनका पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. सोरेन के कार्यालय ने भी इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया.

2004 के बाद बनी हर विशेषज्ञ समिति ने स्क्रीनिंग कमेटी वाली व्यवस्था में व्याप्त मनमानी की तरफ इशारा किया है. कोयला क्षेत्र में सुधारों के मुद्दे पर बनी टीएल शंकर समिति ने पारदर्शिता के लिए इस व्यवस्था की मरम्मत की जरूरत बताई. अशोक चावला समिति ने भी कहा कि प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी की व्यवस्था बेहतर है. अभी तक सरकार यह तर्क देकर अपनी कोयला नीति का बचाव करती रही है कि कोयले से राजस्व बढ़ाना कभी भी इसका उद्देश्य नहीं रहा. वह यह चाहती थी कि ऊर्जा, इस्पात और सीमेंट जैसे अहम उद्योगों को कोयले की उपलब्धता सुनिश्चित हो और इसके दाम भी कम रहें. प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री वी नारायण सामी कहते हैं, ‘कोयला नीति बिल्कुल सही थी. कोयले के ब्लॉक ऊर्जा परियोजनाओं या फिर इस्पात और सीमेंट निर्माताओं को दिए गए थे. अगर हमने कोयले की नीलामी की होती तो बिजली, इस्पात और सीमेंट के दाम बढ़ जाते. उपभोक्ताओं को इससे परेशानी होती.’ 

लेकिन गौर से देखा जाए तो ये तर्क पूरी तरह से खोखले लगते हैं. केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल (देखें इंटरव्यू) कह रहे हैं कि 80 फीसदी ब्लॉकों में कोयले का उत्पादन शुरू नहीं हुआ है. यहीं सरकार के इस तर्क की हवा निकल जाती है कि अगर उसने ये 155 ब्लॉक आवंटित नहीं किए होते तो उद्योग की कोयला जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं. राज्य सभा सांसद और वरिष्ठ माकपा नेता तपन सेन कहते हैं, ‘निजी कंपनियों को जो ब्लॉक आवंटित हुए हैं उनमें से ज्यादातर यूं ही पड़े हुए हैं. लेकिन इन कंपनियों ने इन आवंटनों को स्टॉक मार्केट में अपनी वैल्यू बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया है. निजी कंपनियों को इस आवंटन का नतीजा भ्रष्टाचार के रूप में सामने आया है.’ 

जहां उत्पादन शुरू हो गया है वहां भी ऐसे कोई खास सबूत नहीं हैं जो यह दिखाते हों कि कम उत्पादन लागत का फायदा उपभोक्ताओं को हुआ हो. कोयले के ब्लॉक दर्जनों ऊर्जा कंपनियों को भी मिले थे. इनमें से ज्यादातर ने राज्य सरकारों के साथ ऊर्जा खरीद समझौते नहीं किए हैं. जो कुछेक प्लांट शुरू हुए भी, वे स्वतंत्र ऊर्जा उत्पादक की तरह काम कर रहे हैं और 10 से 12 रु प्रति यूनिट की दर से बिजली बेचकर भारी मुनाफा कमा रहे हैं. कोयला मंत्रालय से सेवानिवृत्त हुए एक नौकरशाह बताते हैं, ‘आप किसी भी अर्थशास्त्री से पूछ लीजिए. कीमतें मांग और आपूर्ति के हिसाब से तय होती हैं न कि उत्पादन सामग्री की लागत से.’ हाल ही में अंबुजा, अल्ट्राटेक और जेपी सीमेंट्स सहित 11 बड़ी सीमेंट कंपनियों पर 6,307 करोड़ रु.का जुर्माना हुआ. आरोप था कि ये सभी कंपनियां एक गुट बनाकर कीमतों, आपूर्ति आदि का निर्धारण कर रही थीं. इससे सरकार के इस तर्क की हवा निकल जाती है कि सीमेंट और इस्पात जैसे क्षेत्रों को सस्ता कोयला उपलब्ध कराने से उपभोक्ता को फायदा हुआ है. 

 

‘देश की नीतियां कैग की रिपोर्टों से नहीं चलतीं’

केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल, आशीष खेतान से बातचीत में बता रहे हैं कि आखिर क्यों कोल ब्लॉक आवंटन पर प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी की नीति लाने में छह साल का वक्त लग गया.

आपकी सरकार ने ऊर्जा, इस्पात और सीमेंट की कीमतों में बढ़ोतरी का हवाला देते हुए कोल ब्लॉक आवंटन को सही ठहराया. लेकिन अधिकांश  ब्लॉकों में तो उत्पादन शुरू ही नहीं हुआ है.

80 फीसदी ब्लॉकों में उत्पादन अब भी शुरू नहीं हुआ है. ज्यादातर ब्लॉकों में वन विभाग की मंजूरी और भूमि अधिग्रहण को लेकर कुछ समस्याएं हैं. हम इस बात को समझते हैं कि समस्याएं वास्तव में होंगी. लेकिन हम इस पर चिंतित भी हैं कि कुछ लोगों की समस्याएं वास्तविक नहीं हैं. हम लोगों ने  मंत्रियों का एक समूह बनाया है जो यह पड़ताल करेगा कि किन कंपनियों ने जान-बूझकर कोयले का उत्पादन अभी तक शुरू नहीं किया है. 

 नए आवंटियों ने इतने लंबे समय तक कोयले का उत्पादन शुरू नहीं किया. ऐसे में क्या आपको नहीं लगता कि इस नीति का उद्देश्य ही पूरा नहीं हो पाया? 

हमने जब कोल ब्लॉक आवंटित करना शुरू किया था तब किसी किस्म की बाधा नहीं थी. समस्याएं बाद में खड़ी हुई हैं. इसलिए हम नीति को गलत नहीं कह सकते. अगर आप कोयले का उत्पादन बढ़ाना चाहते हैं तो आपको कोल इंडिया का उत्पादन बढ़ाना होगा या फिर निजी कंपनियों को कोल ब्लॉक आवंटित करने होंगे. 

क्या आपने ऐसी कंपनियों की पहचान की जिनमें इस काम के लिए कोई गंभीरता नहीं है? 

ऐसी कंपनियां तो हमेशा ही रहेंगी. ऐसी कंपनियों  की पड़ताल का काम मंत्रियों के समूह के जिम्मे है. 

2004 में यह निर्णय लिया गया था कि भविष्य में सभी आवंटन प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी से होंगे. लेकिन इससे संबंधित फाइल पीएमओ और कोयला व कानून मंत्रालयों में चक्कर काटती रही. क्यों? 

कुछ राज्यों ने केंद्र को पत्र लिखकर कहा था कि नीलामी से कोयले की कीमतों पर असर पड़ेगा और नतीजे के तौर पर ऊर्जा की कीमतें बढ़ जाएंगी.   

किन राज्यों ने?

राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड और प. बंगाल ने. वर्ष 2010-11 में हमने इन राज्यों के साथ बैठकें कीं. हमने उनसे कहा कि नीलामी से मिलने वाली आमदनी राज्यों को ही दी जाएगी. केंद्र एक पैसा नहीं रखेगा. 

क्या आपको नहीं लगता कि फैसले में छह साल का वक्त नहीं लगना चाहिए?

 इसमें छह साल नहीं लगे हैं. प्रस्ताव 2006 में आया. निर्णय 2008 में लिया गया. यूपीए- 2 सत्ता में 2009 में आया. प्रस्ताव स्थायी समिति के पास भेजा गया. इस तरह के निर्णय लेने में दो साल का वक्त तो लग ही जाता है. सबसे पहले राज्यों के मंत्रियों की बैठकें हुईं. शर्तों को लेकर उनकी आपसी सहमति बनी.  इसके बाद सुधार विधेयक स्थायी समिति के पास भेजा गया. फिर दिशा-निर्देश बनाए गए. यूपीए-2 के सत्ता में आने के बाद से किसी भी ब्लॉक का आवंटन नहीं किया गया. 

लेकिन नीति बनने के बाद भी ऐसा क्यों है कि कोई ब्लॉक नीलामी के लिए उपलब्ध नहीं है?

मैंने कहा न कि दिशा-निर्देश भी बनाने थे. इसके अलावा ब्लॉकों की पहचान करने का काम भी था. इसमें 6-8 महीने का वक्त लगा. अब एक-दो महीने में नीलामी की प्रक्रिया शुरू हो सकती है.

कैग के अप्रत्याशित लाभ के तर्क पर आप क्या कहेंगे? 

लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार में फैसले किस तरह होते हैं इसे बहीखाते की ऑडिटिंग करते हुए नहीं समझा जा सकता. अप्रत्याशित लाभ क्या है? अगर कोयले की कीमतें ऊपर जाती हैं और इसकी वजह से ऊर्जा की कीमत में बढ़ोतरी की जाती है तो लोगों के लिए बिजली का इस्तेमाल और महंगा हो जाएगा. क्या तब यह हमारी विफलता नहीं होगी? 

संसद में मानसून सत्र में कैग की रिपोर्ट पेश की जाएगी. आप इस चुनौती का सामना कैसे करेंगे?

देश की नीतियां कैग की रिपोर्ट से नहीं चलतीं. कैग को एतराज करने दीजिए. पेट्रोलियम पदार्थों पर सब्सिडी हम कैग के बनाए नियम से नहीं दे रहे. डीजल, पेट्रोल और एलपीजी पर सब्सिडी देना देश की नीति है. हमने यह नीति सस्ती दर पर कोयला आपूर्ति के लिए बनाई थी ताकि ऊर्जा, सीमेंट और इस्पात लोगों की जेब पर भारी न पड़ें. 

क्या आपके पास इसका कोई आंकड़ा है कि कोल ब्लॉक इस तरह देने का ऊर्जा या इस्पात की कीमतों पर क्या असर हुआ? 

अगर आप पिछले 10 सालों में पेट्रोलियम और ऊर्जा की कीमतों में हुई बढ़ोतरी की तुलना करेंगे तो आपको जवाब मिल जाएगा. 

लेकिन यह सस्ती ऊर्जा की आपूर्ति की वजह से नहीं बल्कि राज्य सरकार की ऊर्जा वितरण कंपनियों के लगातार घाटा सहने की वजह से हुआ है. यह घाटा अब 20  खरब करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. 

लेकिन यह तो आप मानेंगे कि सस्ते कोयले से ऊर्जा कंपनियों को सस्ती ऊर्जा खरीदने में तो मदद मिली ही है.

फूट की कूटनीति

विपक्ष में फूट डालने की जिस नीति को अपनाकर कांग्रेस के अर्जुन सिंह से लेकर दिग्विजय सिंह तक ने मध्य प्रदेश में अबाध शासन किया अब शिवराज सिंह चौहान ने उसी नीति से कांग्रेस का पासा पलट दिया है. शिरीष खरे की रिपोर्ट.

इन दिनों मध्य प्रदेश की राजनीति भक्तिकाल से गुजर रही है. इस काल में प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने अपनी मंडली के करीबी मंत्रियों के साथ मथुरा पहुंचकर गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा लगाई है. यह भी संयोग ही है कि इसी बीच नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने भी हरिद्वार की यात्रा पूरी कर ली. मध्य प्रदेश में आई भारी बाढ़ के बीच दोनों नेताओं की तीर्थयात्रा को यदि प्रदेश के हालिया घटनाक्रम से जोड़कर देखा जाए तो चौहान के सामने राजनीतिक चुनौतियों का सूखा दिख रहा है, वहीं अजय सिंह अपनी ही पार्टी की घेराबंदी से कुछ ऐसे घिरे हैं कि चुनौती देते नहीं दिखते.

सत्ता और विपक्ष की स्थितियों ने मध्य प्रदेश के अतीत के उस जमाने की याद दिला दी है जब कांग्रेस अपने शासनकाल में विपक्ष को विभाजित रखती थी. मगर आज समय का पहिया घूम चुका है. कांग्रेस ठीक वैसे ही विभाजित है जैसे अर्जुन सिंह (1980-85) और दिग्विजय सिंह (1993-03) के जमाने में भाजपा थी. दिग्विजय सिंह की सुंदरलाल पटवा सहित भाजपा के कई दिग्गजों जैसे विक्रम वर्मा, बाबूलाल गौर और गौरीशंकर शेजवार से घनिष्ठता जगजाहिर थी. राजनीतिक प्रेक्षकों के मुताबिक दिग्विजय विपक्ष के कुछ नेताओं को साधकर उनके दल के बाकी नेताओं के बीच संशय पैदा करते थे, जिससे उनमें आपसी फूट पड़ जाती थी. दिग्विजय ने विरोधियों से समन्वय बनाकर उनकी धार को भोंथरा बनाए रखा था. उनके करीबियों की मानें तो यह उनके गुरु अर्जुन सिंह की उस नीति का अनुसरण था जिसके मुताबिक- यदि किसी से गुड़ देकर लाभ लिया जा सकता है तो उसे जहर क्यों दिया जाए. समन्वय की यह राजनीति अर्जुन सिंह ने ही शुरू की थी. तब नेता प्रतिपक्ष सुंदरलाल पटवा के साथ उनकी जोड़ी चर्चा के केंद्र में थी. उन्हीं दिनों भाजपा में पटवा के प्रतिद्वंद्वी कहे जाने वाले कैलाश जोशी ने चुरहट लाटरी कांड को लेकर सिंह पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अपने क्षेत्र चुरहट में लाटरी योजना के तहत करोड़ों रुपये की हेराफेरी की है. जोशी ने इस मामले में हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया. कहा जाता है कि उस समय जोशी का उन्हीं के पार्टी के एक बड़े खेमे ने साथ छोड़ दिया था.

‘अब भाजपा ने अपना वर्ग चरित्र बड़ी तेजी से बदला है. पार्टी अब उन मुद्दों की राजनीति कर रही है जो परंपरागत रूप से कांग्रेस का वोटबैंक मजबूत करते थे’

इस घटना को यदि मौजूदा परिदृश्य में देखा जाए तो यह शिवराज सिंह सरकार के डंपर कांड से मेल खाती है. 2005 में शिवराज के मुख्यमंत्री बनने के पांच महीने बाद उनकी पत्नी साधना सिंह ने चार डंपरों की खरीद तो की लेकिन अपने आय-व्यय के ब्योरे में उनका उल्लेख नहीं किया. यह मामला तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी ने उठाया. उनका कहना था कि श्रीमती सिंह ने पंजीयन में अपने पति का नाम और आवास का पता भी गलत लिखा है. नंवबर, 2007 में जब मामला लोकायुक्त में पहुंचा तब कांग्रेस की नैया सुरेश पचौरी के हवाले थी. अगले साल विधानसभा के चुनाव को देखते हुए कई कांग्रेसियों ने इस मौके पर मैदान मारने का मंसूबा भी पाला था लेकिन डंपर व्यवसाय में जब प्रतिपक्ष के नेताओं के भी आर्थिक हित सामने आने लगे तो पार्टी नेतृत्व ठंडा पड़ गया और यह मामला वहीं खत्म हो गया.

अरसे बाद सत्ता और विपक्ष की जुगलबंदी का खुला नजारा बीते विधानसभा सत्र में तब देखने को मिला जब भ्रष्टाचार के एक बड़े मुद्दे पर दोनों की कथित खींचतान ने मुद्दे की ही हवा निकाल दी. बतौर शिक्षक अपना करियर शुरू करने वाले और भाजपा के शिक्षा प्रकोष्ठ के संयोजक सुधीर शर्मा ने पिछले सात साल में इतनी तरक्की की है कि केवल खनन क्षेत्र में उनका टर्न ओवर कुछ करोड़ों से पांच हजार करोड़ रुपये हो गया है. वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले दिलीप सूर्यवंशी की भी 2003 से अब तक रिकॉर्ड कमाई हुई. इस दौरान सड़क निर्माण के क्षेत्र में उनका टर्न ओवर 13 करोड़ रुपये से पांच हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया. कमाई के इन रिकॉडों की छानबीन के लिए जब आयकर विभाग ने दोनों के ठिकानों पर छापामारी की तो उसमें कई ऐसी बातें सामने आईं जो राज्य सरकार की इन लोगों पर कथित रियायत का सबूत थीं.

प्रदेश की आम जनता सहित राजनीतिक जानकारों को उम्मीद थी कि विधानसभा के मानसून सत्र में यह मसला जोर-शोर से उठेगा और भाजपा राज में जिस भ्रष्टाचार की चर्चा गाहेबगाहे होती रहती है उस पर पार्टी को सदन में सफाई देनी पड़ेगी. लेकिन इस मौके पर प्रदेश विधानसभा में जो हुआ उसमें मुद्दे पर चर्चा के अलावा सब कुछ अभूतपूर्व था. बारह दिन के लिए बुलाए गए मानसून सत्र के तीसरे दिन ही स्पीकर से दुर्व्यवहार करने के आरोप में कांग्रेस के दो विधायकों चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी (भिंड) और कल्पना पारूलेकर (महिदपुर) की पहले तो विधायकी छिनी, फिर 24 घंटे के भीतर इस मामले में पुनर्विचार की कोशिशें हुईं और आखिरकार देश के इतिहास में पहली बार विधायकों की बहाली के लिए विशेष सत्र बुलाकर उनकी बहाली भी हो गई.

इस बहाली पर कांग्रेस ने चुप्पी साधे रखी तो भाजपा ने भी अपनी उदारवादी छवि दिखाई, पर पूरी कवायद से भ्रष्टाचार का असल मुद्दा गायब हो गया. विधानसभा में कांग्रेस का व्यवहार बताता है कि भाजपा को भ्रष्टाचार पर घेरने को लेकर उसकी कोई तैयारी नहीं थी. संसदीय रिपोर्टिंग से जुड़े जानकार बताते हैं कि भ्रष्टाचार कोई आपातकाल का मुद्दा नहीं था जिसे स्थगन प्रस्ताव के तहत उठाया जाना चाहिए था. यदि कांग्रेस चाहती तो छापे में सूर्यवंशी के यहां मिली हरी नोटशीट (केवल मंत्रालय के उपयोग में लाई जाने वाली नोटशीट) से चर्चा शुरू करा सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. दूसरा, चर्चा के लिए स्पीकर का आसंदी तक पहुंचना जरूरी था लेकिन उल्टा उसने स्पीकर का ही रास्ता रोक दिया जिसके बाद स्पीकर ने सत्र समाप्ति की घोषणा कर दी.

देखा जाए तो मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री सहित सात मंत्रियों के खिलाफ लोकायुक्त में भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों की जांच चल रही है. शिवराज सरकार के दौरान वित्तीय अनियमितताओं के अलग-अलग मामलों में लोकायुक्त ने अब तक 900 करोड़ रुपये की जब्ती भी की है. जाहिर है यहां भ्रष्टाचार अपने आप में इतना बड़ा मामला है जिसके दम पर कांग्रेस दुबारा खड़ी हो सकती है. मगर यह शिवराज की ‘अर्जुन (सिंह) नीति’ का ही असर दिखता है कि आपसी गुटबाजी से कांग्रेस की कमर टूटी हुई है और उसके बड़े नेता अपने-अपने ठिकानों में आराम की राजनीति फरमा रहे हैं. सरकार की कमजोरियों से ध्यान बंटाने के मामले में भी शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे स्व. अर्जुन सिंह की नीतियों का ही विस्तार किया है. अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अर्जुन सिंह ने शहरों में अस्थायी निवासियों को पट्टे और सिंगल बत्ती कनेक्शन जैसी लुभावनी योजनाओं से लोकप्रियता पाई थी.

ठीक इसी तर्ज पर शिवराज सिंह चौहान ने भी राज्य में विकास का आधार बनाने के बजाय कई लोकप्रिय योजनाओं जैसे लाड़ली लक्ष्मी योजना (जन्म से शादी तक का खर्च) और जननी सुरक्षा योजना (प्रसव का खर्च) को बढ़ावा देकर खुद को आम आदमी का नेता कहलवाया है. इसके अलावा, अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह ने भाजपा से अलग आदिवासी और अल्पसंख्यकों की राजनीति की थी, लेकिन बीते कुछ सालों में शिवराज सिंह चौहान ने भी कांग्रेस की ही राजनीति शुरू कर दी है. वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह बताते हैं, ‘भाजपा ने अपना वर्ग चरित्र बहुत तेजी से बदला है. उसने कांग्रेस के राजनीतिक क्षेत्र में जाकर उसी के वर्ग के मुद्दों को उससे कहीं अधिक आक्रामक तरीके से उठाना शुरू कर दिया है. इससे कांग्रेस असमंजस में है कि अब वह किस किस्म की राजनीति करे.’

2008 के विधानसभा चुनाव में कुल 230 में से भाजपा ने यहां 142 और कांग्रेस ने 72 सीटें जीती थीं.

विपक्ष के नजरिये से यह ठीक-ठाक संख्या थी. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस महज डेढ़ फीसदी के अंतर से हारी. 2009 के लोकसभा चुनाव में कुल 29 में से यहां कांग्रेस की सीटें चार से बढ़कर 12 हो गईं. चुनाव विश्लेषकों के मुताबिक जनता ने राज्य सरकार के खिलाफ असंतोष का इशारा किया था लेकिन उसके बाद कांग्रेस इस असंतोष को वोट में तो नहीं ही खींच पाई, खुद सत्ता की तरफ खिंचती हुई नजर आई. इसकी कीमत उसे सभी पांचों उप चुनाव में अपनी परंपरागत सीटों को भारी अंतर के साथ गंवाकर चुकानी पड़ी.

इस दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कांग्रेस का पुराना दांव उसी पर आजमाकर उसे सत्ता का पिछलग्गू बना लिया. इसके तहत कांग्रेस के कई बड़े नेताओं और उनके संबंधियों को तरह-तरह के ठेके बांटे गए. इसी कड़ी में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया के ओएसडी (विशेष अधीनस्थ अधिकारी) प्रवीण कक्कड़ का नाम भी आता है. भाजपा सरकार ने कक्कड़ को खरगोन में शराब फैक्टरी का लाइसेंस दिया है. इसी के साथ भाजपा ने कहीं-न-कहीं जनता को यह संदेश भी दिया है कि कांग्रेस के नेता अपने फायदे के लिए सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. यही वजह है कि जब भी सरकार का कोई घपला उजागर होता है तो जनता इस बात पर भ्रमित हो जाती है कि इसमें विपक्ष की कितनी हिस्सेदारी है. सूत्रों की मानें तो कांग्रेस में एक बड़ा तबका भाजपा से आर-पार की लड़ाई लड़ना चाहता है लेकिन शीर्ष नेतृत्व ऐसा नहीं चाहता. वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया के मुताबिक, ‘सत्ता पर हमला वही कर सकता है जिसके अपने हित निहित न हों लेकिन कुछ सालों से राजनेताओं के हित कई धंधों में निहित हो गए हैं और बड़े से बड़े मुद्दे पर चुप्पी साध लेना जैसे उनकी मजबूरी बन चुकी है.’

चुनावी राजनीति में निचले स्तर का संगठन सबसे जरूरी आधार होता है, यही मतदाताओं को मतदान केंद्र तक ले जाता है लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेताओं पर से बार-बार भरोसा उठने से कार्यकर्ताओं का उत्साह गहरी नीद में है. वहीं लंबे समय तक भाजपा का सिक्का चलने से प्रदेश में जगह-जगह उसके कार्यकर्ताओं का दंभ साफ दिखाई देने लगा है जिसकी शिकायत हाल ही में दिग्विजय सिंह ने इंदौर में एक कार्यक्रम के दौरान भाजपा सांसद सुमित्रा महाजन से भी की थी. उन्होंने महाजन से कहा, ‘इंदौर में अपराध बहुत बढ़ गए हैं.’ जवाब में महाजन ने कहा, ‘कैलाश को तो आपने ही बढ़ाया था, दिग्विजय!’ कैलाश से महाजन का आशय प्रदेश के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से था. जब दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे तब भाजपा विधायक होने के बावजूद विजयवर्गीय, सिंह के खासमखास थे. दिग्विजय-महाजन का यह लघु संवाद मध्य प्रदेश की राजनीति का सार भी है. सार यह कि भाजपा ने कांग्रेस से जो सीखा था, आज वही उसे लौटा रही है.

…आन गांव के सिद्ध

छत्तीसगढ़ में मध्य प्रदेश से आए बाबू विधानसभा सचिव बने हुए हैं और चपरासी प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था संभाल रहे हैं. अनिल मिश्रा की रिपोर्ट.

हाल ही में छत्तीसगढ़ के विधि विभाग में चपरासियों के पद निकले तो बेरोजगार युवाओं का रेला उमड़ पड़ा. सात पदों के लिए पांच हजार बेरोजगारों ने इंटरव्यू दिया. इसमें से कई इंजीनियरिंग और कंप्यूटर में डिप्लोमाधारी थे.  आखिर उच्च शिक्षितों में चपरासी बनने की ललक क्यों? जवाब इंटरव्यू की लाइन में लगे एक युवा ने दिया, ‘अगर तकनीशियन बने तो जिंदगी में ज्यादा से ज्यादा इंजीनियर तक पहुंच पाएंगे. और अगर मंत्रालय में चपरासी का पद हासिल हो गया तो दस-पंद्रह साल बाद चीफ इंजीनियरों को भी हमारा ही आदेश मानना पड़ेगा.’ दरअसल छत्तीसगढ़ में विधानसभा से लेकर मंत्रालय तक में ऐसी ही विसंगतियां देखने को मिलती हैं जिनके बाद यह जवाब अतिशयोक्ति नहीं लगता. नया प्रदेश छत्तीसगढ़ स्थानीय लोगों के सपनों का प्रदेश भले न बन पाया हो लेकिन यह बंटवारे के तहत मध्य प्रदेश से यहां आए अधिकारियों और कर्मचारियों के सपनों का प्रदेश जरूर बन गया है. 

पहले विधानसभा सचिवालय की ही बात करते हैं जहां प्रदेश की जनता की बेहतरी के लिए कानून बनाए जाते हैं. छत्तीसगढ़ विधानसभा के वर्तमान सचिव देवेंद्र वर्मा आज की स्थिति में मध्य प्रदेश कैडर में हैं और उनका पद अनुसंधान अधिकारी है जो बड़े बाबू के स्तर का पद है. मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ अलग होने के बाद कर्मचारियों के बंटवारे के लिए एक व्यवस्था बनाई गई थी. बताया जाता है कि वर्मा ने इस बंटवारे और आवंटन का फायदा उठाया और अपने पद से तीन ग्रेड ऊपर सचिव का पद हासिल कर लिया. दरअसल बंटवारे के वक्त यह तय किया गया था कि कर्मचारियों से यह पूछा जाएगा कि वे कहां जाना चाहते हैं. कर्मचारियों की सहमति के बाद अंतिम सूची जारी होने पर अगर छत्तीसगढ़ को पर्याप्त कर्मचारी नहीं मिल पाते तो ऐसी स्थिति में प्रतिनियुक्ति पर अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती करके काम चलाया जाएगा. वर्मा ने मध्य प्रदेश कैडर मांगा था. 

मध्य प्रदेश सरकार के 11 मई, 2004 के राजपत्र में वर्मा का नाम मध्य प्रदेश कैडर में अनुसंधान अधिकारी के रूप में दर्ज है.

आरटीआई से मांगी गई जानकारी में भी मध्यप्रदेश विधानसभा ने जनवरी 2012 में उन्हें मध्य प्रदेश विधानसभा में अनुसंधान अधिकारी बताया है, जबकि वर्मा सितंबर, 2004 से छत्तीसगढ़ में विधानसभा सचिव हैं. उन पर आरोप लगता है कि वे मौके का फायदा उठाने यहां चले आए और इसके लिए उन्होंने प्रतिनियुक्ति के नियमों का पालन भी नहीं किया. 6 जुलाई, 2001 को वे इस नए राज्य में प्रमोशन पाकर उप-सचिव बने थे, दो साल बाद 29 सितंबर, 2003 को अपर-सचिव बनाए गए और एक सितंबर, 2004 को सचिव बन गए. जबकि प्रमोशन के लिए सरकारी नियम यह है कि कम से कम पांच साल में ही एक प्रमोशन मिल सकता है. और भी अहम बात यह है कि वे मध्य प्रदेश कैडर में हैं लिहाजा उनका प्रमोशन हो ही नहीं सकता था. आरोप है कि सत्ता की नजदीकी ने एक बाबू को नियमों के विरुद्ध एक बड़ा अफसर बना दिया जबकि विधानसभा में उनसे वरिष्ठ पद के कम से कम चार अफसर हैं जो उनके खिलाफ डर के मारे खामोश बैठे हैं. नियम विरुद्ध सचिव बने वर्मा पर विधानसभा में नियुक्तियों में भी मनमानी के आरोप हैं.

कहा जाता है कि सुरक्षा अधिकारी और अन्य पदों पर 50 से ज्यादा लोगों को बीते कुछ सालों में उन्होंने सीधे नियुक्ति दे दी. इसके लिए न कोई विज्ञापन निकाला गया, न इंटरव्यू हुए और यहां तक कि आरक्षण के नियमों का पालन तक नहीं किया गया. विधानसभा के दूसरे कर्मचारियों ने उन पर प्रताड़ित करने का आरोप लगाया और भूख हड़ताल तक की लेकिन  वर्मा का कुछ नहीं बिगड़ा. यह भी आरोप है कि मीडिया को विधानसभा का पास देने में भी उनकी मनमानी चलती है. यही नहीं, विधानसभा सचिव ने पूरे देश के कानून को धता बताते हुए विधानसभा में आरटीआई के आवेदन का शुल्क 10 की जगह 500 रु कर दिया है. पूर्व विधायक और भाजपा के बागी नेता वीरेंद्र पांडे कहते हैं, ‘वर्मा मध्य प्रदेश कैडर में हैं, इसलिए उनका यहां प्रमोशन हो ही नहीं सकता था.

लेकिन नेताओं की जी हुजूरी करके उन्होंने अपनी राह बनाई. वे अपने पद से ऊपर का वेतन ले रहे हैं, लेकिन शिकायतों के बाद भी सरकार खामोश है. विधानसभा के दूसरे कर्मचारियों के ग्रेडेशन और प्रमोशन में भी वे निमयों को ताक पर रखकर कार्रवाई कर रहे हैं.’ लेकिन खुद वर्मा इन आरोपों से बिलकुल विचलित नहीं दिखते. वे कहते हैं कि उन्होंने हमेशा ईमानदारी का साथ दिया है. उनका दावा है कि 1985 में लाइब्रेरियन के पद पर भर्ती के बाद उनके नियमानुसार चार प्रमोशन हुए और वे सचिव बने. इससे ज्यादा पूछने पर वे नो कमेंट कह कर चुप हो जाते हैं. वीरेंद्र पांडे अब इस मामले में हाई कोर्ट में जनहित याचिका लगाने की तैयारी कर रहे हैं. मामला चलेगा या नहीं यह अभी तय नहीं, लेकिन इस बीच अगले साल वर्मा रिटायर हो जाएंगे.

अब मंत्रालय का हाल देखिए. नक्सलवाद से जूझ रहे प्रदेश में गृह विभाग के उपसचिव विलियम कुजूर के आफिस में एक डीएसपी रैंक के अफसर आते हैं और उन्हें सैल्यूट मारते हैं.

डीएसपी वहां डीजीपी की सेवा पुस्तिका संबंधी फाइल के बारे में पूछने आए हैं. जिस उपसचिव को वे सैल्यूट मार रहे हैं, उनकी सरकारी रिकॉर्ड में शैक्षणिक योग्यता हायर सेकेंडरी है. यानी मध्य प्रदेश के पुराने नियमों के अनुसार 11वीं पास. शायद ही पूरे देश में कहीं ऐसा होता होगा जहां नॉन ग्रैजुएट उपसचिव प्रदेश के पुलिस विभाग के मुखिया की सर्विस बुक देखते हों. यह अकेला मामला नहीं है. मध्य प्रदेश के विभाजन के बाद यहां आए मंत्रालयीन कैडर के मैट्रिक पास अवरसचिव और उपसचिव राज्य में आईएएस अधिकारियों को आदेश दे रहे हैं. यह सच है लेकिन कम ही लोगों को पता है कि जो लोग राज्य में प्रशासनिक व्यवस्था चला रहे हैं उनकी योग्यता चपरासियों से ज्यादा नहीं. इनमे से बहुत से ऐसे हैं जिन्होंने अपनी नौकरी चपरासी के पद से ही शुरू की थी.

नए राज्य में आने पर इन्हें एक प्रमोशन तो तुरंत मिल गया. आरोप है कि उसके बाद से हर तीसरे साल इन लोगों ने प्रमोशन पाने के लिए सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया. इस तरह नौ साल में उन्हें तीन प्रमोशन मिल चुके हैं और अब चौथे प्रमोशन का समय है. मध्य प्रदेश में जो चपरासी थे वे यहां आते ही एलडीसी बने. फिर यूडीसी और सेक्शन ऑफिसर बन गए. अब वे अंडर सेक्रेटरी बनने वाले हैं. जो बाबू थे वे अब डिप्टी सेक्रेटरी हैं और ज्वाइंट सेक्रेटरी बनने की तैयारी कर रहे हैं. यहां मंत्रालय में दो तरह के अफसर हैं. एक मंत्रालय कैडर के और दूसरे राज्य प्रशासनिक सेवा के. अंडर सेक्रेटरी स्तर पर मंत्रालय और राज्य सेवा अधिकारियों का अनुपात 60 और 40 का है. डिप्टी सेक्रेटरी स्तर पर यह अनुपात 80 और 20 है. राज्य सेवा के पद खाली हैं जिन पर मंत्रालय कैडर के अधिकारियों को प्रमोट करके बैठाने का प्रस्ताव है. यानी भविष्य में पूरा तंत्र ही मैट्रिक पास अधिकारियों के अधीन होगा. 

तहलका के पास उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक मंत्रालय कैडर के आठ डिप्टी सेक्रेटरियों में से सिर्फ एक ने ही ग्रैजुएशन किया है जबकि अंडर सेक्रेटरी के कुल 46 पदों में से 12 ग्रैजुएट हैं और सेक्शन ऑफिसर के 92 पदों की भी स्थिति यही है. पूरे प्रदेश में पिछले 12 साल में किसी का प्रमोशन नहीं हुआ है, लेकिन मंत्रालय में हर तीसरे साल प्रमोशन होता है. गृह विभाग के उपसचिव विलियम कुजूर कहते हैं, ‘मैंने इस पद पर आने में बहुत मेहनत की है.’ लेकिन नक्सल प्रभावित प्रदेश में गृह विभाग में अल्प शिक्षित अफसर से कितनी उम्मीद की जा सकती है? उधर, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव वरिष्ठ आईएएस अफसर एन बैजेंद्र कुमार का तर्क है कि शिक्षा से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. वे कहते हैं, ‘इनके पास अनुभव है, जो भी जिम्मेदारी दी जाती है उसका पालन करते हैं. आदिवासी राज्य में मध्य प्रदेश के कर्मचारी आना नहीं चाहते थे, इसलिए उनके लिए प्रमोशन की पॉलिसी बनाई गई.’ लेकिन सरकार के मंत्रालय में सेक्शन ऑफिसरों की भर्ती कर्मचारी चयन आयोग से की जाती है जबकि यहां तो सचिव के पद तक चपरासी प्रमोट हो जाते हैं. इसका कोई संतोषजनक जवाब किसी के पास नहीं है. एक अधिकारी कहते हैं, ‘यहां चपरासी से अफसर बने बाबुओं का ही जलवा है. सरकार उनकी ही सुनती है और अगर हम कुछ बोलेंगे तो जाहिर सी बात है      कि नक्सली इलाकों में भेज दिए जाएंगे. क्या होगा     इस प्रदेश का?

अनशन से सियासत तक

अन्ना हजारे के अनशन को महत्व न देकर उनकी योजना पटरी से उतारने वाली सरकार ने रामदेव के अभियान को दबाने के लिए यही रणनीति अपनाई थी. लेकिन राजग का खुला समर्थन हासिल करके रामदेव ने केंद्र और कांग्रेस के मंसूबों पर पानी फेर दिया. हिमांशु शेखर की रिपोर्ट.

 अन्ना हजारे और उनकी टीम द्वारा राजनीतिक विकल्प का राग छेड़ने के बाद ज्यादातर लोग इसे लेकर सशंकित थे कि स्वामी रामदेव के अभियान को उत्साहजनक समर्थन नहीं मिलेगा. खुद रामदेव की बातों से भी ऐसा ही लग रहा था. लेकिन अचानक परिदृश्य ऐसे बदला कि हर तरफ वे ही छा गए. नौ अगस्त को रामलीला मैदान में अपना अभियान शुरू करने के एक दिन पहले मीडिया से बातचीत में रामदेव बार-बार यह दोहरा रहे थे कि उनका अभियान किसी पार्टी या व्यक्ति के खिलाफ नहीं है बल्कि वे काला धन वापस लाने और कुछ संवैधानिक पदों  की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार चाहते हैं. लेकिन यही रामदेव तीन दिन के बाद नारा देने लगे कि कांग्रेस को हटाना है और देश को बचाना है. अब सवाल उठता है कि आखिर अपने अभियान की शुरुआत बेहद रक्षात्मक ढंग से करने वाले रामदेव तीन दिन में ही इतने आक्रामक कैसे हो गए. जिस दिन रामदेव के अभियान की औपचारिक शुरुआत हुई, उसी दिन केंद्रीय मंत्री हरीश रावत की तरफ से यह बयान आया कि सरकार बातचीत के लिए तैयार है. लेकिन सूत्रों के मुताबिक सरकार के वरिष्ठ मंत्री रामदेव से किसी भी तरह की बातचीत के पक्ष में नहीं थे. सरकार मानकर चल रही थी कि रामदेव के अभियान का हश्र भी अन्ना के अभियान जैसा होगा. इसी उत्साह में केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने यह तक कह डाला कि रामदेव कौन हैं. उनसे पत्रकारों ने यह जानना चाहा था कि रामदेव के अभियान पर सरकार का क्या रुख है. रामदेव ने प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखे उनका भी कोई जवाब सरकार की तरफ से नहीं दिया गया.

लोगों को यह भी लग रहा था कि कहीं रामदेव के साथ वही न हो जो पिछले साल हुआ था. पिछले साल न सिर्फ रामदेव पर पुलिसिया कार्रवाई हुई थी बल्कि उन्हें हरिद्वार में अपना अनशन कुछ उसी तरह से बेआबरू होकर तोड़ना पड़ा था जिस तरह से इस बार अन्ना हजारे और उनके सहयोगी अनशन खत्म करने को बाध्य हुए. लेकिन जानकारों की मानें तो रामदेव ने अंदर ही अंदर अपनी तैयारी कर ली थी. पिछले साल केंद्र सरकार द्वारा बेइज्जत किए जाने और महिलाओं की पोशाक में रामलीला मैदान छोड़कर भागने वाले रामदेव ने इस एक साल में ज्यादातर कांग्रेस विरोधी दलों से संपर्क साधा. उनके एक सहयोगी बताते हैं, ‘इन सभी मुलाकातों में उन्होंने राजनीतिक दलों से समर्थन मांगा लेकिन खुद इस पर कोई वादा नहीं किया कि वे कोई राजनीतिक दल नहीं बनाएंगे. इन मुलाकातों में ज्यादातर नेताओं ने काले धन के मुद्दे पर समर्थन का आश्वासन तो दिया लेकिन रामदेव को राजनीतिक दल न बनाने की नसीहत भी दी. लेकिन बाबा के मन से अलग राजनीतिक दल का मोह नहीं छूट रहा था. योजना यह थी कि नौ अगस्त को अभियान शुरू होगा और 12 अगस्त को रामदेव नई पार्टी की घोषणा करते हुए बताएंगे कि 2014 में सभी लोकसभा सीटों पर वे अपने उम्मीदवार उतारेंगे.’ तो फिर नई पार्टी की घोषणा क्यों नहीं हुई? जवाब में वे कहते हैं, ‘अन्ना हजारे के सहयोगियों से पूछिए कि उन्होंने राजनीतिक विकल्प की घोषणा करने में इतनी जल्दबाजी क्यों की. वे अगर राजनीतिक विकल्प की बात बाद में करते तो लोग कहते कि वे बाबा रामदेव के रास्ते चल रहे हैं. अन्ना के सहयोगियों द्वारा राजनीतिक विकल्प की घोषणा पहले कर देने से यही संकट रामदेव के सामने पैदा हो गया और उन्हें पार्टी बनाने की योजना टालनी पड़ी. उनके सामने अपना अभियान सम्मानजनक स्तर पर ले जाने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का समर्थन हासिल करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.’

जानकारों के मुताबिक भाजपा समेत राजग के सहयोगी दल रामदेव के खुले समर्थन के लिए तब तक तैयार नहीं थे जब तक बाबा यह वादा न कर दें कि वे कोई राजनीतिक दल नहीं बनाएंगे. जब सरकार की तरफ से रामदेव को कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली और उन पर दबाव बढ़ता गया तो पहले उन्होंने तीन दिन के अपने अल्टीमेटम को एक दिन के लिए बढ़ाया. लेकिन फिर भी सरकार ने रामदेव को भाव नहीं दिया. इसके बाद रामदेव के विकल्प सीमित होते गए. 12 अगस्त की दोपहर में संघ के एक बड़े अधिकारी की उनसे मुलाकात हुई. सूत्रों के मुताबिक इस मुलाकात में रामदेव ने संघ के इस अधिकारी से यह आग्रह किया कि वे भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी से बात करें और उन्हें समर्थन के लिए तैयार करें. यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि रामदेव के अभियान को संघ और उसके सहयोगी संगठनों का समर्थन पिछले साल से ही है. भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘संघ के अधिकारियों से भाजपा अध्यक्ष की हुई बातचीत के बाद 12 अगस्त की शाम को नितिन गडकरी और रामदेव के बीच फोन पर बातचीत हुई. रामदेव भाजपा समेत पूरे राजग का समर्थन चाह रहे थे. लेकिन गडकरी पहले यह आश्वासन चाह रहे थे कि रामदेव भविष्य में कोई पार्टी नहीं बनाएंगे. शुरुआत में रामदेव की तरफ से कहा गया कि उनका अभियान कांग्रेस विरुद्ध और राजगपरस्त रहेगा. इस पर गडकरी ने कहा कि राजग के अन्य घटकों को तैयार करना तब तक आसान नहीं होगा जब तक वे राजनीतिक दल नहीं बनाने की बात पर राजी नहीं होते.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘रामदेव ने अंततः यह बात मान ली कि वे राजनीतिक दल नहीं बनाएंगे और उन्होंने गडकरी को राजग के अन्य घटकों को समर्थन के लिए तैयार करने को कहा. गडकरी ने रामदेव से यह कहा कि वे अगली सुबह तक अंतिम तौर पर कुछ बता पाएंगे.’

भाजपा के ये नेता कहते हैं, ‘इस बीच गडकरी ने पहले शरद यादव से बात की. इसके बाद गडकरी और शरद यादव ने राजग के अन्य घटक दलों से बातचीत की. समर्थन के लिए राजग के घटकों को तैयार करने में ज्यादा कठिनाई इसलिए भी नहीं हुई क्योंकि खुद रामदेव इस बार रामलीला मैदान आने से पहले ज्यादातर दलों के प्रमुख से मिल चुके थे. गडकरी ने संसद के दोनों सदनों के नेता प्रतिपक्ष से बात की. न सिर्फ अगले दिन सहयोगियों के साथ रामदेव के समर्थन में रामलीला मैदान जाने की रणनीति बल्कि इस मसले को संसद के दोनों सदनों में जोर-शोर से उठाने की योजना भी बनाई गई. राजग से बाहर के अन्ना द्रमुक और बीजू जनता दल से भी बात की गई. खुद रामदेव ने भी कई नेताओं से बातचीत की और दोहराया कि वे राजनीतिक दल नहीं बनाएंगे.’ 13 अगस्त की सुबह एक बार फिर गडकरी और रामदेव के बीच फोन पर बातचीत हुई. इसके बाद से रामदेव का सुर बदल गया और रामलीला मैदान से उन्होंने न सिर्फ कांग्रेस और केंद्र सरकार पर हमले किए बल्कि कांग्रेस हटाओ, देश बचाओ का नारा भी उछाल दिया. 

इसके बाद पहले राजग के एक घटक जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी रामलीला मैदान पहुंचे.  थोड़ी ही देर में रामदेव के मंच पर नितिन गडकरी और शरद यादव, भाजपा के कई नेता, बीजू जनता दल, शिव सेना, शिरोमणि अकाली दल और तेलगूदेशम पार्टी के प्रतिनिधि भी पहुंच गए. संसद में अन्ना द्रमुक ने भी काले धन के मुद्दे पर राजग का साथ देकर यह संदेश दिया कि वह भी रामदेव के साथ है. अक्सर संप्रग के आयोजनों में दिखने वाले समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव और बहुजन समाज पार्टी की मायावती ने भी रामदेव का समर्थन किया.  लेकिन अब हर तरफ यही बात चल रही है कि राजग के साथ जुड़ने के बाद रामदेव को फौरी राहत भले ही मिल गई हो लेकिन खुद उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का भविष्य अनिश्चय से घिर गया है.