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मातम में मार्केटिंग

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उत्तराखंड की त्रासदी जहां अपनी भयावहता के लिए लोगों के जेहन में हमेशा जिंदा रहेगी तो दूसरी तरफ यह राजनीतिक वर्ग के एक हिस्से द्वारा मातम के इस मौके को भुना कर सस्ता प्रचार पाने की कोशिशों के लिए भी याद रखी जाएगी. इस तबाही के बाद से ही पूरे देश से लोग मदद के लिए आगे आए. विभिन्न राज्य सरकारों और नेताओं ने जहां शांतिपूर्वक और गरिमापूर्ण तरीके से सहायता राशि से लेकर राहत सामग्री उत्तराखंड पहुंचाई वहीं कुछ नेता ऐसे भी रहे जो इस मौके पर अपनी छवि चमकाने की कोशिश करते दिखे. टीवी कैमरों के सामने एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था हुए आंध्र प्रदेश के टीडीपी और कांग्रेसी सांसदों की तस्वीरें यह बताने के लिए काफी थीं कि मातम के इस मौके को भुनाने की जद्दोजहद किस हद तक पहुंच गई है.

हालांकि इसकी शुरुआत तो त्रासदी के साथ ही हो गई थी, लेकिन दिन गुजरने के साथ यह और गहरी होती गई. सस्ती लोकप्रियता पाने की इस राजनीति को एक अलग ऊंचाई पर ले जाने का आरोप गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी लगा. इसकी शुरुआत उस खबर से हुई जिसके मुताबिक गुजरात सरकार ने एक दिन के भीतर ही उत्तराखंड आपदा में जगह-जगह फंसे 15 हजार गुजरातियों को सुरक्षित निकालकर उनके घर पहुंचा दिया था. इस काम के लिए मोदी को ‘रैंबो’ करार देते हुए एक अखबार ने दावा किया कि गुजरातियों को देहरादून के सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के लिए 80 टोयोटा इनोवा गाड़ियां मंगाई गईं. लोगों को बचाने और सकुशल घर तक पहुंचाने के लिए चार बोइंग विमानों के साथ 25 लग्जरी बसों की भी सहायता ली गई. मोदी को महामानव बताने वाली यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई. विरोधी दल इस दावे को असंभव और हास्यास्पद ठहराते नजर आए तो मोदी समर्थक इसे उनकी काबिलियत का एक और प्रमाण बताते. गुजरात सरकार की तरफ से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.

लेकिन क्या सच में ऐसा हुआ था? सूत्रों की मानें तो 15 हजार लोगों को बचाने की खबर बड़ी हद तक कोरी अफवाह थी जो मोदी की पीआर एजेंसी एपको की तरफ से फैलाई गई थी. तहलका ने उत्तराखंड में राहत कार्य का काम देख रहे गुजरात सरकार के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संदीप कुमार से बात की तो उनका कहना था, ’15 हजार का कोई आंकड़ा हमारे पास नहीं है. हां, हरिद्वार से अब तक लगभग 1,800 के करीब लोगों को गुजरात भेजा गया है. बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो राज्य सरकार नहीं बल्कि खुद के इंतजाम से वापस गुजरात गए हैं.’

हरिद्वार के शांति कुंज में गुजरात सरकार का सबसे बड़ा कैंप है. वहां के एक अधिकारी विष्णु पंड्या कहते हैं, ’15 हजार लोगों को निकाले जाने की बात तो हमें नहीं पता है. हां, हमारे यहां से लगभग 2000 के करीब गुजराती लोगों को गुजरात सरकार ने अब तक अपनी व्यवस्था से गुजरात भेजा है.’  हरिद्वार के अलावा देहरादून और ऋषिकेश में भी गुजरात सरकार के कैंप लगे हैं लेकिन ये कैंप हरिद्वार के कैंप से बेहद छोटे हैं. ऐसे में अगर हम बाकी दो अन्य कैंपों से भी 2000-2000 लोगों को जोड़ दें तो आंकड़ा छह हजार तक पहुंचता है, जो 15 हजार के आधे से भी कम है.

ऐसी खबरें भी आईं कि गुजरात सरकार ने गुजरात के लोगों को सीधा वहीं से बचाया जहां वे फंसे थे. लेकिन गुजरात सरकार की वेबसाइट पर 21 और 22 जून को बचाए गए जिन लोगों का नाम दर्ज है उनकी आपबीती कुछ और ही बताती है. उन्हीं लोगों में से एक विट्ठलभाई पटेल कहते हैं, ‘मैं गौरीकुंड में फंसा हुआ था. काफी संघर्ष के बाद सेना की मदद से किसी तरह हरिद्वार पहुंचा. वहां गुजरात सरकार के राहत कैंप में संपर्क किया. फिर वहां से उन्होंने आगे अहमदाबाद जाने के लिए मेरी मदद की.’ यही कहानी मयूर शाह की भी है. वे जोशीमठ में फंसे थे. शाह बताते हैं,’ वहां से हरिद्वार आने के लिए 15 हजार रुपये में प्राइवेट टैक्सी की. गुजरात सरकार के कुछ अधिकारियों से हमारी फोन पर जरूर बात हुई थी लेकिन हरिद्वार तक हम अपनी व्यवस्था से ही पहुंचे थे. बाद में सरकार के राहत शिविर की तरफ से हमें अहमदाबाद भेजने की व्यवस्था की गई.’

यही व्यवस्था लगभग हर राज्य सरकार ने की है. यानी सेना लोगों को जहां वे फंसे होते हैं वहां से बचाकर हरिद्वार और देहरादून जैसे बेस कैंपों तक लाती है. फिर वहां लोग अपने-अपने राज्यों द्वारा लगाए गए राहत शिविरों में जाते हैं या फिर अन्य  शिविरों में. गुजरात सरकार ने भी ऐसा ही किया. लेकिन विभिन्न माध्यमों से ऐसी खबरें आईं मानो बाढ़ में फंसे गुजरातियों को गुजरात सरकार ने चुन-चुन कर निकाला हो और फिर उन्हें उनके घर भेजा हो. अहम सवाल यह उठता है कि इस पूरे दुष्प्रचार में गुजरात सरकार की क्या भूमिका है. 15 हजार लोगों को बचाने का दावा न तो मोदी की तरफ से किया गया था और न ही गुजरात सरकार की तरफ से. वे यह कह कर अपना बचाव भी कर सकते हैं. लेकिन अगर उनकी तरफ से यह दावा नहीं था और इस दावे में उनकी सहमति नहीं थी तो जब इसको लेकर चारों तरफ चर्चा शुरू हुई तो उन्होंने इसका खंडन क्यों नहीं किया?

सूत्रों की मानें तो ये सारा किया-धरा उस पीआर एजेंसी का है जिस पर गुजरात सरकार और मोदी की छवि को चमकाने की जिम्मेदारी है. कहा जा रहा है कि पीआर एजेंसी ने ही यह खबर मीडिया में प्लांट कराई जिससे गुजरात सरकार और मोदी को ‘रैंबो’ दिखाया जा सके. लेकिन आंकड़ों को लेकर गड़बड़ी हो गई इसलिए दावों का दांव उल्टा पड़ गया और स्थिति हास्यास्पद हो गई. उत्तराखंड पहुंचने के बाद मोदी के केदारनाथ मंदिर बनवाने की पेशकश की भी विभिन्न हलकों में आलोचना हुई. भाजपा नेता और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस प्रस्ताव पर मांगी गई प्रतिक्रिया के जवाब में मीडिया से कहा, ‘पहले लोगों को बचाना जरूरी है. घर बनाना जरूरी है. मंदिर बाद में भी बन जाएगा.’

मोदी की आलोचना इस बात के लिए भी हुई कि जो राज्य खुद के सबसे ज्यादा संपन्न होने का दम भरता है उसने उत्तराखंड की इस त्रासदी पर शुरुआत में सिर्फ दो करोड़ रुपये का सहयोग देने की घोषणा की. दूसरी तरफ देखें तो उत्तर प्रदेश ने 25 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र, दिल्ली व हरियाणा ने 10-10 करोड़ रुपये और मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, बिहार, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, ओडि़शा जैसे राज्यों ने पांच-पांच करोड़ रुपये की सहायता राशि भेजी. हरियाणा ने तो 25 गांवों को गोद लेने का भी एलान किया. इसके साथ ही वह पहला ऐसा राज्य भी बना जिसने इस त्रासदी में बराबर के शिकार बेजुबानों की सुध ली. हरियाणा ने आपदा से प्रभावित पशुओं के इलाज के लिए दवाओं के साथ डॉक्टरों की एक टीम भी भेजी है.

उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने 25 करोड़ रुपये की सहायता राशि देने के साथ ही राज्य परिवहन की 300 बसें फंसे हुए यात्रियों को ले आने के लिए भेज दीं. साथ में डॉक्टरों का एक बड़ा दल भी प्रभावितों के इलाज के लिए उत्तराखंड रवाना किया. भाजपा शासित मध्य प्रदेश ने त्रासदी के कुछ समय बाद ही राज्य के संस्कृति मंत्री के साथ एक सात सदस्यीय टीम को देहरादून रवाना किया. इसके साथ ही राज्य के लोगों को वहां से लाने के लिए सरकार ने ट्रेन के साथ ही सरकारी और प्राइवेट विमानों का भी इंतजाम किया. इस तरह से उत्तराखंड में आई बाढ़ के बाद राहत को लेकर विभिन्न राज्यों की भूमिका को देखें तो बाकी के राज्य राहत पहुंचाने के मामले में गुजरात से कहीं आगे दिखाई देते हैं. हां, यह जरूर है कि उन्होंने इसका ढिंढोरा नहीं पीटा और न अपनी ‘महानता’ की खबरें फैलाईं.

मातम की मार्केटिंग के लिए सिर्फ मोदी की ही आलोचना नहीं हुई बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी महासचिव राहुल गांधी भी आलोचना के घेरे में आए. त्रासदी के आठ दिन बाद तक राहुल गांधी का न तो इस हृदयविदारक घटना पर कोई बयान आया और न ही वे कहीं दिखाई दिए. सोशल मीडिया से लेकर बाकी जगहों पर जब हो-हल्ला मचा तो कुछ दिन बाद वे सोनिया गांधी के साथ कांग्रेस दफ्तर के पास राहत सामग्री लेकर जाने को तैयार ट्रकों को झंडा दिखाते दिखे. लेकिन इसके बाद खबरें आईं कि ट्रक तीन दिन पहले से राहत सामग्री लेकर तैयार खड़े थे, लेकिन राहुल के देश से बाहर होने के कारण उन्हें रवाना नहीं किया गया. खैर, ट्रक जैसे-तैसे गए, लेकिन आधे रास्ते में जाकर वे फिर से खड़े हो गए. उनके ड्राइवरों के हवाले से बताया गया कि उन्हें इतना ही डीजल दिया गया था.

अलगाव के आगे

एक नेता हैं भरत मंडल. सहज और सरल स्वभाव के. धनिक लाल मंडल के बेटे हैं. धनिक लाल 60 के दशक में बिहार विधानसभा के अध्यक्ष थे. वीपी सिंह के समय दो राज्यों में राज्यपाल भी रहे. भरत पहले जदयू में थे. एक चुनाव में भाग्य आजमा चुके हैं. अब लालू प्रसाद की पार्टी में हैं. हालिया दिनों में उनसे दो मुलाकातें हुईं. पहली मुलाकात में उन्होंने उंगलियों पर अगड़ों-पिछड़ों-अल्पसंख्यकों का गुणा-गणित लगाते हुए लालू प्रसाद के उभार को समझाया. दूसरी बार, जब भाजपा-जदयू में अलगाव हुआ, तब भी उन्होंने कुछ-कुछ इसी तरह से नीतीश की राजनीति के जातीय-सामाजिक समीकरणों के बारे में बताया.

बीच में सिर्फ यह चर्चा छेड़ने पर कि आप जिस अतिपिछड़े वोट को उंगलियों पर गिनकर कभी लालू प्रसाद तो कभी नीतीश की बात करते हैं, उसी समुदाय के नरेंद्र मोदी भी तो हैं, वे मोदी और भाजपा का कखग भी, जाति-वर्ग के संदर्भ में समझाने लगते हैं.

मंडल से हम सिर्फ जाति जैसी चीजों का गुणा-गणित लगाकर कभी फलां पार्टी को उठाने, कभी फलां नेता को गिराने का औचित्य पूछते हैं. यह भी कि क्या उन्हें लगता है कि बिहार में अब भी सिर्फ इसी आधार पर ही भविष्य की राजनीति तय होगी. वे हंसते हुए कहते हैं, ‘ऐसा मैं ही नहीं कहता, बिहार में हर कोई जानता है. यहां की राजनीति आखिर में जाति के खोल में ही समाती है. बाकी विकास वगैरह तो लटके-झटके हैं.’ भरत के साथ ही मौजूद उनके एक साथी नेता कहते हैं, ‘देख नहीं रहे हैं आप, महाराजगंज में एक चुनाव जीतने के बाद लालू प्रसाद यादव कैसे गदगद भाव से मुस्लिम-यादव के बाद उसमें राजपूतों को भी जोड़ने के नए समीकरण बनाने में ऊर्जा लगाये हुए हैं. और भाजपा भी हर रोज जाति-जाति का जाप शुरू कर दी है.’

मंडल और उनके साथी की बातों को हम नकार नहीं पाते. सच है कि भाजपा-जदयू में अलगाव और उसके पहले महाराजगंज उप चुनाव के बाद से बिहार में जाति की राजनीति को साधने के लिए नए-नये किस्म के दांव चले जाने लगे हैं. भाजपा पिछले दिनों पासवान समाज के बैनर तले कबीर प्रकटोत्सव का आयोजन कर चुकी है. 30 जून को झारखंड के आदिवासियों के बड़े राजनीतिक आयोजन संथाल हूल दिवस को बिहार में नए तरीके से मनाने की भी तैयारी है. सुशील मोदी इन दिनों नरेंद्र मोदी को पिछड़ा-अतिपिछड़ा बताने में मगन हैं. लालू प्रसाद सवर्णों से कई बार माफी मांगने के बाद अब अपने फेसबुक स्टेटस पर लिखने या लिखवाने लगे हैं कि याद रखिए पिछड़ों-दलितों के असली मसीहा वे ही हैं. लेकिन इन तमाम कवायदों के बीच नीतीश इस मसले पर लगभग मौन व्रत में हैं. एक बार उन्होंने बीच में इतना भर कहा कि कोई पिछड़ा या अतिपिछड़ा घर में पैदा होने भर से पिछड़ा या अतिपिछड़ा नहीं हो जाता. नीतीश का निशाना सुशील मोदी द्वारा नरेंद्र मोदी के पक्ष में चलाए जा रहे अभियान के जवाब में था.

बिहार में राजनीतिक पंडितों के विश्लेषणों का दौर एकांगी भाव से लेकिन तेज गति से जारी है. न्यू मीडिया पर, अखबारों में, चौक-चौराहों और चौपालों में. रोजाना दुहराया जा रहा है कि नीतीश मजबूरी में मौन साधे हुए हैं. उन्हें पता है कि भाजपा से अलगाव के बाद वे राजनीतिक तौर पर बेहद कमजोर हो गए हैं और जाति की राजनीति में चारों खाने चित हो जाएंगे. क्योंकि वे जिस जाति के नेता हैं उसकी आबादी तीन-चार प्रतिशत है और इसके अलावा कोई ऐसा आधार वोट नहीं, जिसके जरिए वे आगे की लड़ाई लड़ सकने की स्थिति में हों. इसलिए उन्हें चुप रहना ही पड़ेगा.

ऐसा विश्लेषण एकरसता के साथ-साथ बचकानेपन का भाव भी पैदा करता है. कई जानकार मानते हैं कि बिना ठीक से विचार किए ऐसे परिणाम बताए जा रहे हैं जैसे बिहार के किसी सबसे नासमझ नेता का नाम नीतीश हो, जिसने 17 साल के साथ के बाद सिर्फ भावावेश में आकर भाजपा से अलग होने का फैसला कर लिया है. नीतीश और उनकी राजनीति को जरा भी समझने वालों को पता है कि ऐसा संभव ही नहीं है.

कहा यह भी जा रहा है कि करीब आठ साल पहले विकास के नाम पर राजनीति की शुरुआत की जो कोशिश बिहार में हुई थी, नीतीश भी उसे छोड़कर अंत में जाति की परिधि में चले जाएंगे. अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो अपने दो प्रमुख राजनीतिक दुश्मनों, भाजपा और राजद से पार पाने की राह उनके लिए बेहद मुश्किल होगी. मगर समझने वाली बात वह है जो जदयू अध्यक्ष शरद यादव कहते हैं, ‘हमारा मसला विकास ही रहा है और नीतीश विकास की राजनीति के ही प्रतीक हैं, लेकिन जाति है तो राजनीति में उसका इस्तेमाल होगा ही.’

यानी शरद यादव बिना किसी द्वंद्व-दुविधा के अपनी पार्टी की राजनीति की अगली लाइन साफ-साफ बता रहे हैं कि वे अब आगे की राजनीति विकास को केंद्र में रखकर जाति का इस्तेमाल करते हुए साधेंगे. यह बात राष्ट्रीय जनता दल के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के सामने जबरदस्त चुनौती पेश करेगी. वे अच्छी तरह जानते हैं कि जाति और विकास का कॉकटेल बनाकर राजनीति करने और फिर उसे अपने पक्ष में करने में नीतीश उस्ताद नेता रहे हैं. इसीलिए भाजपा-राजद नेता किसी तरह बार-बार नीतीश को उकसाकर उनसे भी जाति की बात करवाना-कहलवाना चाहते हैं ताकि राजनीति के केंद्र में जाति जैसी चीजें आ जाएं और लड़ाई आसान हो जाए. लेकिन नीतीश फिलहाल इस मसले पर मौन तोड़ने को तैयार ही नहीं.

[box]यही सब है जो नीतीश कुमार को बिहार में विकास पुरुष कहलवाता है और राष्ट्रीय स्तर पर उम्मीदों का नेता.[/box]

बकौल राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन, ‘यह हर कोई जानता है कि नीतीश कुमार ने राजनीति में अपना एजेंडा खुद सेट कर लिया है-बिहारी अस्मिता, गवर्नेंस-विकास और सामाजिक न्याय. वे अब इससे भटककर राजनीति करेंगे ही नहीं बल्कि इसे ही और मजबूती से आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे.’ एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट के सदस्य सचिव व अर्थशास्त्री शैबाल गुप्ता कहते हैं, ‘नीतीश कुमार ने बिहार में गवर्नेंस और बिहारी उपराष्ट्रीयता के मसले को मजबूती से एक स्थान दिलाया है और बिहार के पिछड़ेपन को राष्ट्रीय स्तर पर एक मसला बनाया है. अब बिहार की राजनीति इसी के इर्द-गिर्द चलेगी क्योंकि यह एक ऐसा मसला है जिसे कोई राजनीतिक दल नकार नहीं सकता.’

महेंद्र सुमन या शैबाल गुप्ता की बातों को अगर जमीनी स्तर पर देखें तो नीतीश के प्रयोग ने बिहार की राजनीति में बदलाव तो किया ही है उन्हें एक सक्षम और साहसी नेता के तौर पर स्थापित भी किया है. सामाजिक न्याय के तहत नीतीश कुमार ने अतिपिछड़ों, महादलितों, पसमांदा मुसलमानों और महिलाओं को उभार कर अपने लिए जब एक नया वर्ग तैयार करने का कदम उठाया था, तब भी उनके सामने मुश्किलें और चुनौतियां कम नहीं थी. पंचायतों में 50 प्रतिशत महिलाओं के लिए और 20 प्रतिशत अतिपिछड़ों के लिए आरक्षण देकर नीतीश ने एक साथ सवर्णों और ताकतवर पिछड़ी जातियों से बैर लिया था, जिसे लेकर अब तक गांवों में नीतीश के खिलाफ एक वर्ग विशेष का बैर दिखता है. लेकिन जिस वर्ग के लिए नीतीश कुमार ने यह रिस्क लिया था, वह उनके साथ मजबूती से खड़ा हुआ. अब भाजपा या राजद जैसी पार्टियों को सामाजिक न्याय का इससे अलग हटकर कोई ऐसा एजेंडा दिख नहीं रहा, जिसके आधार पर वे नीतीश को मात दे सकें. लालू प्रसाद से जब तहलका की बात होती है तो वे मुस्लिमों पर तो बात करते हैं लेकिन पसमांदा मुस्लिमों पर अलग से कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं दिखते. अगर वे पिछड़े मुसलमानों की बात करेंगे तो कहा जाएगा कि वे नीतीश कुमार की राह पर चल रहे हैं और इससे अगड़ों के नाराज होने का खतरा भी है. और अगर वे मुस्लिम एकता या अगड़े मुसलमानों की बात करेंगे तो हमेशा के लिए पसमांदा मुसलमान उनकी पहुंच से दूर चले जाएंगे.

ठीक इन्हीं वजहों से लालू अतिपिछड़ों और महादलितों पर भी खुलकर बोलने से परहेज करते हैं. जदयू-भाजपा अलगाव के बाद वे वैसे ही दोहरी परेशानी से गुजर रहे हैं. उन्हें इस बात का अहसास है कि जब नीतीश कुमार भाजपा के साथ रहते हुए उनके मुस्लिम मतों में जोरदार सेंध मारकर अपने पक्ष में करने में सफल होते रहे हैं तो अलगाव के बाद नीतीश के पक्ष में मुस्लिम वोट अगर न भी बढ़ें तो उनके घटने की गुंजाइश तो कहीं से नहीं दिखती.

सामाजिक न्याय के बाद नीतीश ने गवर्नेंस-विकास के मसले को पिछले आठ साल से बिहार की राजनीति में बहुत ही रणनीतिक तरीके से शामिल किया है, जिसे सभी पार्टियां अब अपने एजेंडे में शामिल कर चुकी हैं. चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव मानते हैं कि बिहार में सुशासन न सही, शासन की बात तो सामने आई ही और विकास न सही लेकिन विकास की आस तो जगी ही है. योगेंद्र यादव मानते हैं कि यह ठीक है कि चुनाव में जाति एक तत्व होता है लेकिन वही एकमात्र तत्व नहीं होता.

बिहार के विकास और केंद्र से राज्य के लिए विशेष हक पाने की लड़ाई के नाम पर बिहारी स्वाभिमान को जगाने की जो राजनीतिक लड़ाई नीतीश लड़ रहे हैं वह राजद के लिए तो गले की हड्डी बनी ही हुई थी, अब भाजपा को भी उसने चिंता में डाला हुआ है. भाजपा को डर है कि अगर केंद्र में सत्तासीन कांग्रेस ने बिहार को कोई भारी-भरकम विशेष पैकेज जैसा कुछ दे दिया तो फिर नीतीश उसके जरिए चुनाव आते-आते न जाने कितनी उम्मीदें जगाकर एक बार फिर उम्मीदों के बड़े नेता बनकर उभर जाएंगे.

साफ है कि नीतीश जाति और विकास की राजनीति का कॉकटेल तैयार करने में ऐसे नेता साबित हुए हैं जिनसे पार पाने के लिए भाजपा और राजद को कोई मजबूत काट खोजनी होगी. भाजपा न तो सवर्णों और हिंदू मतों की संरक्षक पार्टी बनकर उन्हें मात देने की स्थिति में दिखती है और न राजद, मुस्लिम-यादव जैसे पुराने समीकरण के सहारे.

बताया जा रहा है कि नीतीश अगर मौन साधे हैं व भाजपा और राजद को आपस में ही खुलकर जाति की राजनीति खेलने देना चाहते हैं तो इसके पीछे भी एक रणनीति है. 28 जून को जदयू के कुछ वरिष्ठ सदस्यों और नीतीश के विश्वस्त नेताओं की बैठक हुई. सूत्रों के मुताबिक यह बैठक हुई तो मंत्रिमंडल के विस्तार के लिए थी लेकिन नीतीश ने इसमें भविष्य की रणनीति के संकेत भी दिए. एक जदयू नेता बताते हैं, ‘हम अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की शाखा जल्दी से जल्दी खुलवाएंगे, जो सीमांचल के इलाके में मुसलमानों के लिए प्रतिष्ठा का विषय बना हुआ है, जिसका विरोध अब तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद करती रही है और विश्वविद्यालय न बनने को लेकर राजद राजनीति करता रहा है.’

नीतीश के पास अभी केंद्रीय सरकार से मिलने वाला पैकेज भी है जिसके खर्च के लिए रणनीतिक तरीके से योजनाएं बन रही हैं. पूरे देश में युवाओं की कुल आबादी का 11 प्रतिशत बिहार में ही रहता है और उनके लिए कोई आकर्षक योजना न सिर्फ उन्हें बल्कि उनके परिवारों को भी आकर्षित करेगी, वैसे ही जैसे अपने पहले कार्यकाल में लड़कियों को साइकिल देकर नीतीश कुमार ने उन लड़कियों के परिवारों को भी अपने पक्ष में कर लिया था.
बताया जा रहा है कि नीतीश कुमार महिलाओं के लिए पंचायत में आरक्षण देने के बाद पंचायत शिक्षकों की बहाली में उन्हें आरक्षण देकर,  उनके लिए अलग से पुलिस बटालियन आदि गठित करके एक बार फिर महिलाओं को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. इसके अलावा उम्मीद है कि नीतीश जल्दी ही न सिर्फ महादलितों और अतिपिछड़ों के लिए कोई आकर्षक योजना पेश करेंगे बल्कि मुसलमानों के लिए पहले से चलाई जा रही हुनर और औजार जैसी व्यावसायिक और कौशल प्रशिक्षण योजनाओं को पटरी पर लाने की कोशिश करेंगे. एक जदयू नेता बताते हैं, ‘सवर्ण आयोग का गठन नीतीश कुमार ने किया था, लेकिन उसे अब तक हाथी का दांत माना जाता रहा है. हमारी तैयारी यह है कि सवर्णों की आर्थिक स्थिति का अध्ययन कर उनके लिए भी अलग से योजना लाई जाए.’ यानी कई जातियों और समूहों का दिल नए सिरे से जीतने की तैयारी है.

ऐसी कई बातें जदयू नेता आगामी योजनाओं के तहत बताते हैं. लेकिन इतने से यह भी नहीं कहा जा सकता कि नीतीश के लिए आगे की राह एकदम से आसान ही है. महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘नीतीश अब सामाजिक न्याय के एजेंडे को किस तरह से और कितनी प्राथमिकता से आगे बढ़ाते हैं, उस पर उनका भविष्य तय होगा. नीतीश ने अतिपिछड़ा, महादलित, पसमांदा और महिलाओं के समूह के साथ चार अलग-अलग सामाजिक समूहों को राजनीतिक तौर पर सशक्त करने का काम किया है. अब इनकी आकांक्षाओं और उम्मीदों को बढ़ाकर नहीं संभाल पाएंगे तो फिर इसके टूटने का खतरा भी उतना ही बना रहेगा.’ यह सही भी है. लालू प्रसाद के समय ऐसा ही हुआ था. उन्होंने भी पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों को एक मजबूत राजनीतिक स्वर तो दिया था. लेकिन जब वे राजनीतिक तौर पर मजबूत हुए और उन्हें अपनी आकांक्षाएं पूरी होती नहीं दिखीं तो उन्होंने लालू को सत्ता से बेदखल कर दिया.

बेशक नीतीश के पास आगे ऐसी तमाम मुश्किलें हैं, जिनसे पार पाना उनके लिए आसान नहीं होगा. लेकिन कुछ छोटी-छोटी उम्मीदें और भी हैं. बात चल रही है कि जदयू और रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा में तालमेल की संभावना बन सकती है. एक समय पासवान ने मुस्लिम मुख्यमंत्री के नाम पर बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री बनने तक की संभावना को ठोकर मारी थी. जानकारों के मुताबिक नीतीश और पासवान मिलकर मुस्लिम और दलित राजनीति के लिए एक और एक ग्यारह भले न बनें, दो तो बन ही सकते हैं.

नीतीश के लिए एक सदाबहार मंच की तरह बिहार में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी है, जिसने सदन में उनके पक्ष में मतदान किया था. भले ही भाकपा के पास अभी एक विधायक ही हो लेकिन उसका इतिहास 35 विधायकों का है और उसका कैडर हर जगह है. इसके अलावा बिहार सरकार के साढे़ सात साल के सफर का जादुई आंकड़ा है जिसमें पिछली पंचवर्षीय योजना के दौरान बिहार ने देश में सबसे ज्यादा विकास दर हासिल की थी. बीते साल 68 लाख टन अधिक अनाज उपजाया था, और पर्यटन के क्षेत्र में भारत आने वाला हर छठा पर्यटक बिहार आया था. इसके अलावा बिहार के नाम सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर प्रति व्यक्ति आय में करीब दस प्रतिशत वृद्धि करने का रिकॉर्ड भी है.

आपदाग्रस्त आपदा प्रबंधन

विज्ञान के क्षेत्र में भारत की तरक्की के कई कसीदे पढ़े जाते हैं. भारतीय अर्थव्यवस्था का एक अच्छा-खासा हिस्सा हर साल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में खर्च होता है. इस साल जनवरी में भारतीय विज्ञान कांग्रेस के सौ साल पूरे हुए तो इसका जश्न भी मनाया गया. उस वक्त बहुत कम बोलने वाले प्रधानमंत्री ने विज्ञान की तरक्की के बारे में बहुत कुछ कहा. लेकिन हकीकत यह भी है कि देश में हर साल हजारों लोग प्राकृतिक आपदाओं में मारे जाते हैं और देश का सारा विज्ञान धरा का धरा रह जाता है.

वैसे आपदाओं से निपटने के लिए 2005 में आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू किया गया था. इसी के चलते राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) का भी गठन किया गया. वर्ष 2011-12 में इसका कुल बजट 348 करोड़ रुपये था. लेकिन इसी साल जारी हुई कैग की रिपोर्ट पर गौर करें तो पता चलता है कि ये प्राधिकरण स्वयं ही आपदाग्रस्त है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि अधिनियम के लागू होने के इतने सालों बाद भी आपदा प्रबंधन की कोई राष्ट्रीय योजना नहीं बन सकी है. रिपोर्ट यह भी बताती है कि एनडीएमए की राष्ट्रीय कार्यकारी समिति ने मई, 2008 के बाद से एक भी बैठक नहीं की है. इस दौरान कई आपदाएं आकर जा चुकी हैं. रिपोर्ट के अनुसार, ‘इस प्राधिकरण को सौंपा गया कोई भी बड़ा कार्य आज तक पूरा नहीं हो सका है. अनुचित नियोजन के चलते ये कार्य या तो बीच में ही बंद करने पड़े या निर्धारित समय के बाद भी अधूरे हैं.’ रिपोर्ट के मुताबिक प्राकृतिक आपदा के दौरान उपयोग होने वाला ‘सिंथेटिक अपर्चर राडार’ तंत्र 28.99 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी स्थापित नहीं किया जा सका है. जबकि ऐसा छह साल पहले हो जाना चाहिए था. आपदा प्रबंधन के लिए जरूरी संचार तंत्र के अन्य तमाम उपकरणों के बारे में भी रिपोर्ट यही बताती है कि कई साल बीत जाने और करोड़ों रूपये खर्च करने के बाद भी ये अभी योजना बनाने के स्तर पर ही अटके हुए हैं.

राज्यों में गठित राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एसडीएमए) की बात करें तो स्थिति और भी बदतर है. बाढ़ की स्थिति में बड़े बांध और भी ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं. लेकिन देश भर के एसडीएमए इस मामले में कितने संवेदनशील हैं इसका खुलासा भी कैग की रिपोर्ट से हो जाता है. रिपोर्ट के अनुसार केवल आठ राज्यों द्वारा ही सिर्फ 192 बड़े बांधों  के लिए आपात योजनाएं बनाई गई हैं. जबकि देश में कुल बड़े बांधों की संख्या 4,728 है.

उत्तराखंड में जो तबाही हुई उसे काफी हद तक कम किया जा सकता था. लेकिन ऐसा तभी हो सकता था यदि राज्य का आपदा प्रबंधन मंत्रालय और प्राधिकरण वे सारे काम ठीक तरह से कर रहे होते जिनके लिए इनका गठन हुआ था. उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन अक्टूबर, 2007 में हुआ था. पिछले साल आई आपदा में उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग में जानमाल का भारी नुकसान हुआ था,  फिर भी कैग की रिपोर्ट के मुताबिक ‘आज तक इसकी एक भी बैठक नहीं हुई है, न ही इसने अब तक कोई नियम, प्रावधान, नीतियां या दिशानिर्देश ही बनाए हैं.’ इसके चलते आपदा के मद में केंद्र सरकार से आने वाला करोड़ों रु का बजट या राहत पैकेज मुख्यमंत्री, आपदा प्रबंधन मंत्री और विभाग के अधिकारियों के वरदहस्त से खर्च होता है. आपदा नीति होती तो उसमें बचाव व राहत कार्यो के लिए योजना व धन का वितरण भी होता.

यह तथ्य भी ध्यान देने लायक है कि 2011-12 में केंद्र सरकार ने राज्य में आपदा प्रबंधन के लिए कोई फंड ही जारी नहीं किया. रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा इसलिए किया गया कि इससे पहले दिया गया फंड खर्च ही नहीं हुआ था. उत्तराखंड एकमात्र ऐसा प्रदेश है जहां आपदा प्रबंधन मंत्रालय के अधीन एक प्राधिकरण के अलावा एक स्वायत्त ‘आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र’ भी गठित किया गया है. लेकिन ऐसे संस्थानों पर यहां हमेशा आरोप लगते रहे हैं कि ये सेवानिवृत्त नौकरशाहों की आरामगाह बन कर रह जाते हैं और इनमें जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोग नियुक्त तक नहीं किए जाते.

कैग रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई है कि उत्तराखंड के एसडीएमए के पास उन लोगों की भारी कमी है जो आपदा के समय बुनियादी काम करते हैं. राज्य में जिला स्तर पर बने इमरजेंसी ऑपरेशन सेलों के करीब 44 फीसदी पद खाली पड़े हैं. यही नहीं, जिला, ब्लॉक और गांव के स्तर पर स्टाफ को प्रशिक्षण देने के लिए ढंग के प्रशिक्षक तक नहीं थे. न ही स्वास्थ्यकर्मियों को ऐसे हालात से निपटने के लिए कोई प्रशिक्षण दिया गया था. ऐसा उस राज्य में हुआ जिसमें 2007 से 2012 तक 653 लोग प्राकृतिक आपदा के चलते जान गंवा चुके थे. इनमें 55 फीसदी मौतें तो चट्टानें खिसकने और भारी बारिश के चलते हुई थीं. इस दौरान राज्य में भूस्खलन की 27 बड़ी घटनाएं हुईं. अकेले 2012 में ही प्राकृतिक आपदाओं के चलते 176 लोगों की जानें गई थीं. रिपोर्ट के मुताबिक जून, 2008 में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने आपदा प्रभावित 233 गांवों में से 101 को संवेदनशील बताया था.

तीन साल पहले भी कैग ने उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी की समीक्षा की थी. इस समीक्षा का हिस्सा रही एक रिपोर्ट ने काफी पहले ही केंद्र और राज्य सरकार को आने वाले खतरे के प्रति आगाह कर दिया था. रिपोर्ट का कहना था कि भागीरथी और अलकनंदा पर परियोजनाओं की भीड़ से पहाड़ों को नुकसान तो हो ही रहा है इससे अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा भी बढ़ रहा है, जिससे जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है. रिपोर्ट का कहना था कि इन नदियों पर 42 परियोजनाएं काम कर रही हैं और 203 का निर्माण कार्य अलग-अलग स्तरों पर है. यानी औसतन देखा जाए तो हर पांच-छह किलोमीटर पर एक परियोजना है. रिपोर्ट चेताती है कि इनकी वजह से खत्म होते जंगलों से भारी नुकसान हो रहा है जिसकी भरपाई भी नहीं हो रही. कैग के मुताबिक जिन आठ परियोजनाओं का अध्ययन किया गया उन्होंने कोई वृक्षारोपण नहीं किया था. लेकिन इतनी सारी चेतावनियों  और संकेतों के बाद भी राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन विभागों की नींद नहीं खुली.

इस पूरे आपदा प्रबंधन तंत्र में यदि किसी की सराहना की जा सकती है तो वह है ‘राष्ट्रीय आपदा मोचन बल’ (एनडीआरएफ). इसका गठन जनवरी, 2006 में विशेष तौर पर आपदा से निपटने के लिए हुआ था और आपदा की स्थिति में सबसे पहले इसी को सहायता और बचाव कार्यों के लिए भेजा जाता है. उत्तराखंड में भी ऐसा ही किया गया. हजारों लोगों को बचाते हुए 25 जून को इस बल के नौ जवान हेलीकॉप्टर दुर्घटना में शहीद हो गए. कैग की रिपोर्ट की मानें तो इन जवानों की जिंदगी से भी खिलवाड़ किया जा रहा है. रिपोर्ट बताती है कि इन जवानों को पर्याप्त प्रशिक्षण तक नहीं दिया जा रहा है. 2006 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने इनके प्रशिक्षण के लिए ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर रिस्पांस’ स्थापित करने की बात कही थी. महाराष्ट्र सरकार ने 2007 में इसके लिए नागपुर में 110 एकड़ जमीन देने का प्रस्ताव रखा जिसे प्राधिकरण ने स्वीकार कर लिया. लेकिन कैग की रिपोर्ट बताती है कि आज तक इस संस्थान की स्थापना नहीं हो सकी है. कैग की रिपोर्ट में यहां तक कहा गया है कि एनडीआरएफ का इस्तेमाल चुनाव के दौरान सुरक्षा व्यवस्था में भी किया जाता रहा है.

एनडीआरएफ की तर्ज पर राज्यों में भी ‘राज्य आपदा मोचन बल’ (एसडीआरएफ) का प्रावधान है. लेकिन अभी तक सिर्फ आठ राज्यों ने इसका गठन किया है जिनमें उत्तराखंड शामिल नहीं हैं. ऐसे राज्यों में बड़ी आपदा आने की स्थिति में एनडीआरएफ को ही भेजा जाता है. केदारघाटी में बचाव कार्य के लिए तैनात एक मेजर बताते हैं, ‘यहां एनडीआरएफ के जवानों ने सराहनीय काम किया है. सबसे पहले उन्हीं लोगों को यहां भेजा गया था. लेकिन प्रशिक्षण की कमी उनमें साफ देखी जा सकती है. ऐसे में इन जवानों की जान से भी खिलवाड़ किया जा रहा है. बिना प्रशिक्षण के जवानों को ऐसी खतरनाक जगह पर भेजना गलत है.’ एनडीआरएफ की स्थिति का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड में हुए हादसे के लगभग दस दिन बाद इसके महानिदेशक का पद भरा गया है जो लंबे समय से खाली था.

आपदा प्रबंधन विभाग को कई वजहों से अन्य विभागों पर भी निर्भर रहना पड़ता है. जैसे मौसम विभाग, केंद्रीय जल आयोग आदि. लेकिन अक्सर इन विभागों में आपसी ताल-मेल की कमी देखने को मिलती है. पिछले कई सालों से लगातार गलत अनुमान जारी करने वाले मौसम विभाग के अनुमान इस बार सही निकले लेकिन इसके बावजूद आपदा प्रबंधन द्वारा उचित कदम नहीं उठाए गए. दूसरी तरफ नदियों के जल स्तर बढ़ने या कम होने सम्बन्धी सूचनाएं केंद्रीय जल आयोग को आपदा प्रबंधन तक पहुंचानी होती हैं. लेकिन कैग की रिपोर्ट बताती है कि केंद्रीय जल आयोग द्वारा ये सूचनाएं जारी ही नहीं की जातीं. रिपोर्ट बताती है कि देश के 4,728 बांधों में से सिर्फ 28 की सूचनाएं ही जल आयोग जारी कर रहा है. यानी हमारे आपदा प्रबंधन को ही पहले आपदा से बाहर लाना होगा.

विपदा और विडंबना

फोटो: विजय पांडे
फोटो: विजय पांडे

किसी भी नेतृत्व की असली परीक्षा संकट में होती है. इस लिहाज से देखा जाए तो हाल की आपदा के दौरान जो हुआ उसने उत्तराखंड सरकार की पोल खोल दी है. सरकार का कहना है कि उसे ऐसी आपदाओं से निपटने का कोई अनुभव नहीं है. लेकिन सच यह है कि जो गंभीरता और इच्छाशक्ति उस अनुभव के लिए जरूरी है वही इस त्रासदी के दौरान उसके व्यवहार में गायब दिखी. ऐसी आपदा के लिए अलग और बड़ी व्यवस्था तो दूसरी बात है, राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व को यही पता नहीं कि जो संसाधन उसके पास उपलब्ध हैं उनका ही इस्तेमाल ऐसे संकट में अच्छी तरह से कैसे किया जाए.

सरकार भले ही तर्क दे कि यह तो अचानक आई आफत थी, पर सच यह है कि यह आपदा न तो दबे पांव आई थी और न ही उत्तराखंड ने ऐसी आपदा पहली बार देखी है. यहां बादल फटने और भूस्खलन का इतिहास रहा है. फिर मौसम विभाग ने पहले ही चेतावनी के संकेत दे दिए थे. प्रकृति ने भी कई इशारे करते हुए धीरे-धीरे ही विकराल रूप धारण किया था. पर न तो समय रहते चेता गया और न ही आपदा के शुरुआती दिनों में सरकार ने पर्याप्त गंभीरता दिखाई. नतीजा सबके सामने है.

केदारनाथ की घटना भले ही 16-17 जून को हुई हो लेकिन 13 जून से ही पहाड़ों में भारी बारिश से हजारों यात्रियों का जगह-जगह फंसना शुरू हो गया था. समय से 15 दिन पहले उत्तराखंड पहुंच गए मानसून की मोटी बौछारों ने माहौल में चिंता घोल दी थी. 15 जून को मौसम विभाग ने फिर अगले 48 से लेकर 72 घंटों तक भारी वर्षा की भविष्यवाणी कर दी थी. ऐसा ही हुआ भी. 15 जून की शाम तक ही नदियां उफान पर आ गई थीं और रुद्रप्रयाग जिले में फाटा, रामपुर, सीतापुर आदि जगहों पर टूट-फूट और जनहानि की घटनाएं दर्ज होने लगी थीं.

लेकिन आपदा के सारे संकेतों के बावजूद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा 16 जून को दिल्ली के लिए रवाना हो गए. उसी दिन दोपहर बाद उत्तरकाशी में भागीरथी के उफनते पानी ने नदी किनारे बने चार-चार मंजिला घरों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया. 16 जून की ही रात साढ़े आठ बजे भारी बारिश के बाद आए पानी के सैलाब ने केदारनाथ के एक हिस्से को तो बहाया ही, उससे सात किमी नीचे रामबाड़ा और 14 किमी नीचे गौरीकुंड का बड़ा हिस्सा भी साफ कर दिया. सूत्र बताते हैं कि पानी और मलबे के इस पहले वेग ने ही केदारनाथ से लेकर 20 किमी नीचे घाटी में बसे सीतापुर तक मरने वालों का आंकड़ा तीन अंकों में पहुंचा दिया था. कई पुल और मकान बह गए थे. इन सभी घटनाओं की सूचना जिला प्रशासन और प्रदेश सरकार को थी. रामबाड़ा से रात को अंतिम बार पुलिस वायरलेस से संपर्क हुआ था. यात्रियों ने भी अपने-अपने घरों में इस जलजले की सूचना पहुंचा दी थी. भागीरथी, उसकी सहायक नदियों और मंदाकिनी नदी से हो रहे विनाश की खबरों से स्थानीय लोगों, यात्रियों और उनके परिजनों की बेचैनी बढ़ रही थी. उफनाई अलकनंदा, मंदाकिनी, भागीरथी और असीगंगा नदियां खतरे के निशानों से कई मीटर ऊपर बह रही थीं. इन सबसे मिलकर बनने वाली गंगा हरिद्वार में खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी. 16 जून तक राज्य में 123 सड़कों के टूटने की सरकारी सूचना थी.

लेकिन इस सबसे निर्लिप्त मुख्यमंत्री बहुगुणा देश की राजधानी दिल्ली में बैठकर प्रदेश का हाल-चाल ले रहे थे. 17 जून को वे देहरादून वापस आए. उस दिन सुबह करीब आठ बजे तक जल प्रलय से केदारनाथ और उसके नीचे के क्षेत्र पूरी तरह से तबाह हो गए थे. लेकिन उस दिन हुई राज्य मत्रिमंडल की बैठक में मुख्यमंत्री ने कैबिनेट के सहयोगी मंत्रियों से इस जल प्रलय से हुई तबाही पर कोई चर्चा नहीं की. इससे लगता है कि मुख्यमंत्री इस आपदा से या तो खुद ही निपटना चाहते थे या वे अपने सहयोगियों की राय को महत्वहीन समझते हैं. यही नहीं, प्रत्येक राज्य की सरकार हर दिन केंद्रीय गृह मंत्रालय की आपदा प्रबंधन डिवीजन को उस दिन राज्य में हुई आपदाओं और फौरी नुकसान की सूचना भेजती है. रिकॉर्ड बताते हैं कि 16 और 17 जून को उत्तराखंड सरकार ने राज्य में आपदा से जान-माल की कोई हानि नहीं दिखाई है. राज्य में 17 जून तक केदारनाथ तबाह हो गया था. फिर भी राज्य सरकार क्यों ये सूचनाएं नहीं भेज रही थी या छिपा रही थी, कोई नहीं जानता.

18 जून को मौसम साफ हो गया था. राज्य सरकार के एक मंत्री और कुछ अधिकारी केदारनाथ की हवाई यात्रा करके देहरादून पहुंच गए थे. उनके द्वारा दी गई तस्वीरों से केदारनाथ की तबाही की खबर सार्वजनिक हो गई थी. इतनी बड़ी तबाही देखकर कई राज्यों के अधिकारी उसी दिन शाम तक देहरादून पहुंच गए थे और किसी भी तरह अपने प्रदेश से आए यात्रियों से संपर्क बनाने की कोशिश में लगे थे. लेकिन दूसरी ओर उत्तराखंड सचिवालय में आम दिनों की तरह ही कामकाज दिख रहा था. आपदा प्रबंधन विभाग से जुडे़ शासन के एक अधिकारी अकेले बचाव, राहत और समन्वय की जिम्मेदारी तो देख ही रहे थे, अपने मोबाइल पर कई राज्यों के लोगों की आशंकाएं भी शांत कर रहे थे. यानी देश-दुनिया को परेशान करने वाली आपदा के बचाव और राहत कार्य में न तो अतिरिक्त अधिकारी ही लगाए गए थे और न ही कर्मचारी. अगले दो दिन तक राज्य आपदा प्रबंधन केंद्र का यही हाल रहा.

18 जून को ही मुख्यमंत्री ने केदारनाथ और उत्तरकाशी के आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बजाय राजधानी देहरादून में अपने प्रिय दो विधायकों के क्षेत्रों में ढहे पुश्तों का जायजा लेना उचित समझा. 19 जून को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आपदाग्रस्त इलाकों के हवाई सर्वेक्षण से पहले बहुगुणा ने पहली बार आपदा प्रभावित क्षेत्रों में से कुछ का हवाई दौरा किया. उस दिन राज्य के एक बड़े अधिकारी ने हवाई सर्वेक्षण करने के बाद बचाव कार्य और फंसे हुए लोगों को निकालने की रणनीति बताने के बजाय यह बयान दिया कि उन्होंने सारे प्रदेश का दौरा कर लिया है और केंद्र के साथ हुई बैठक में राहत और पुनर्निर्माण के लिए तीन हजार करोड़ रु का प्रस्ताव भेज दिया है. इस बयान से समझा जा सकता है कि उस दिन राज्य सरकार की प्राथमिकता क्या थी. दरअसल उत्तराखंड में आपदा राहत के लिए केंद्र से ज्यादा से ज्यादा धन मांगने और वह धन आने के बाद उसकी बंदरबांट का पुराना और हर पार्टी का इतिहास है.

प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के दौरे और अन्य प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों-मंत्रियों-अधिकारियों के देहरादून में डेरा डालने से उत्तराखंड सरकार थोड़ी हरकत में तो आई, लेकिन उसके पास बचाव और राहत कार्य संचालित करने की न तो कोई निश्चित रूपरेखा थी और न कोई प्रबंधन तंत्र. तब तक दिल्ली में केंद्र सरकार की हाई पावर कमेटी सहित कई बैठकें हो चुकी थीं. कांग्रेस पार्टी के दिग्गज भी दिल्ली में बैठक कर चुके थे. लेकिन उत्तराखंड में मुख्यमंत्री अपने दो सहयोगियों और एक बड़े अधिकारी के साथ ही आपदा से निपटने की कोशिश में लगे थे. आपदा के बाद अभी तक एक बार भी राज्य में बड़े निर्णय लेने के लिए कैबिनेट बैठक नहीं हुई. ये मंत्री और कुछ विधायक हेलीकाप्टरों में यहां-वहां उड़ कर महत्वपूर्ण समय और संसाधन बर्बाद कर रहे थे. इन्हीं दिनों दुर्गम पहाड़ों में मौत से जूझती हजारों जानें बचने की एक आस में ऊपर उड़ रहे इन हेलीकाप्टरों को टुकुर-टुकुर देख रही होंगी. 20 जून की रात मुख्यमंत्री ने कैबिनेट के कुछ सहयोगियों से अलग-अलग जिलों की कमान संभालने को कहा. वे 21 जून तक ही प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंच पाए. तब तक पांच दिन बीत चुके थे.

राजनीतिक नेतृत्व की तरह प्रशासनिक नेतृत्व भी सुस्त और दिशाहीन दिखा. 18 जून को केदारनाथ की स्थिति देखने के बाद रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी बीमार होकर देहरादून स्थित अस्पताल में भर्ती हो गए थे. अगले चार दिन तक जिला बिना जिलाधिकारी के ही रहा. उनका काम देखने के लिए ऐसा कोई प्रशासनिक अधिकारी तैनात नहीं किया गया जो अनुभवी हो और प्रशासन, सेना, आईटीबीपी और केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से समन्वय की क्षमता रखता हो. नतीजतन कि सारी व्यवस्थाएं चरमरा गईं और सूचना तंत्र फेल हो गया.  सेना और आईटीबीपी युद्ध-स्तर पर बचाव का काम तो कर रही थी, लेकिन कौन फंसा है, कौन आ गया, किसे अस्पताल भेजा गया है, कौन मर गया है, यह बताने के लिए कोई व्यवस्था नहीं बन पाई. केदारनाथ, गौरीकुंड, सोनप्रयाग, फाटा और गुप्तकाशी में पांच दिन तक कोई डिप्टी कलेक्टर तक तैनात नहीं किया गया जो राजधानी देहरादून तक सही स्थिति बताता और उसके अनुसार आगे की योजना तय होती.

देश-दुनिया में इतने शोर के बाद भी प्रदेश के राजनीतिक नेतृत्व और शीर्ष नौकरशाही की आंख नहीं खुल रही थी. सूत्र बताते हैं कि आपदा के पहले ही दिन से राज्य के कई युवा अधिकारी आगे बढ़कर आपदाग्रस्त क्षेत्रों में जाकर काम करने की इच्छा अपने बड़े अधिकारियों को बता चुके थे , लेकिन उनसे काम लेने को कोई तैयार ही नहीं था. उत्तरकाशी स्थित दुनिया भर में चर्चित नेहरू पर्वतारोहण संस्थान में ऊंचे हिमालयी इलाकों में बचाव और राहत का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है. जब 18 जून तक यहां कोई सरकारी आदेश नहीं पहुंचा तो संस्थान के अधिकारी खुद ही प्रशिक्षकों सहित 110 बचाव विशेषज्ञों की सूची लेकर जिलाधिकारी के पास गए और उनसे बचाव कार्य में लगने की इजाजत मांगी. इसके बाद उन्होंने जिले के अलग-अलग इलाकों से करीब 46 विदेशियों सहित करीब 6,500 लोगों को बचाया. साफ था कि सरकार अपने ही संसाधनों की अहमियत से अनजान थी. अव्यवस्था और देश भर में हो रही बदनामी के बीच केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने माना कि समन्वय में कमी है. इस बीच केंद्र ने आपदाग्रस्त क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन की मदद के लिए कुछ युवा परिवीक्षाधीन अधिकारी भेजे.

इतना सब होने के बाद 21 जून की शाम शासन ने राज्य के 12 युवा अधिकारियों को अलग-अलग आपदाग्रस्त क्षेत्रों में नोडल अधिकारियों के रूप में तैनात करने के आदेश जारी किए. ये अधिकारी 22 जून की रात या 23 जून दोपहर तक किसी तरह इन दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचे. तब तक तबाही हुए छह दिन बीत गए थे, लोगों को बचाने और उनके परिजनों को सांत्वना व सूचना देने का समय जा चुका था. आपदा कभी शोर मचा कर नहीं आती,  लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक गंभीरता से उसकी आहट सुनी जा सकती है. उससे निपटने की तैयारी पहले से की जा सकती है. इस बार भी राज्य में ही मौजूद संसाधनों के जरिये अविलंब मदद पहुंचाकर कई जिंदगियां बचाई जा सकती थीं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस बात का जवाब किसी के पास नहीं कि संकट की ऐसी घड़ी में उत्तराखंड की सरकार को अहम निर्णय लेने में पांच-छह दिन क्यों लगे. अब यह हाल था तो आम दिनों में वह कैसे काम करती होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है.

आमंत्रित आपदा

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उत्तराखंड में यह अब तक की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा है. राहत कार्य में जुटी सेना की मध्य कमान के जीओसी ले.जनरल अनिल चैत बताते हैं, ‘यह आपदा करीबन 40,000 वर्ग किमी में फैली है. पूरब से पश्चिम तक करीब 360 किमी लंबाई में इसका असर पड़ा है.’ आधिकारिक रूप से मौतों की संख्या का आंकड़ा 1000 से कुछ अधिक पहुंच चुका है. बताया जा रहा है कि इस आपदा ने चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ सहित उत्तराखंड के अलग-अलग जिलों में कुल मिलाकर करीब 16 लाख लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया है जिनमें से एक लाख के करीब बेघर हो गए हैं. इसके बाद एक नई बहस भी छिड़ गई है- क्या यह आपदा प्राकृतिक थी या यह इंसान द्वारा प्रकृति के साथ की जा रही छेड़छाड़ का परिणाम है? पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट कहते हैं, ‘हिमालय क्षेत्र में तो आपदाएं हर साल आती ही रहती हैं, पर जब जान-माल का नुकसान होता है तभी हल्ला मचता है.’ वे आगे कहते हैं, ‘मानव ने प्रकृति को नहीं समझा. वह नदी के रास्तों में अवरोध खड़े कर रहा है.

नदी का रास्ता रोका जाएगा, इंसानी गतिविधियां अनावश्यक रूप से बढ़ाई जाएंगी तो नुकसान तो होगा ही.’ यही हुआ. अलग-अलग आपदाग्रस्त इलाकों के कुछ उदाहरण साफ बताते हैं कि इस बार भले ही तीन दिन तक हुई भारी वर्षा से खतरा पैदा हुआ हो, लेकिन नुकसान का बड़ा कारण प्रकृति का तिरस्कार करने वाला इंसानी लालच ही रहा.

केदारनाथ में 14 जून से ही बारिश हो रही थी. भूगर्भ अध्ययन के लिए चर्चित संस्थान वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के केदारनाथ के पास स्थित केंद्र में 15 जून शाम से लेकर 16 जून शाम तक 330 मिली वर्षा रिकॉर्ड की गई जो साल के इस समय के हिसाब से कई गुना ज्यादा थी. 16 जून की रात करीब साढ़े आठ बजे मंदिर के लगभग 500 मीटर पीछे बाईं तरफ स्थित पहाड़ी से सरस्वती गंगा में ढेर सारा पानी और मलबा आया. यह अपने साथ मंदिर के पीछे शंकराचार्य समाधि, लोक निर्माण विभाग के अतिथि गृह, भारत सेवा आश्रम और अन्न क्षेत्र की बड़ी धर्मशाला को बहाकर ले गया. इन भवनों में मौजूद सारे लोग बह गए.

लगभग इसी समय मंदिर के दाईं तरफ स्थित पहाड़ी से आने वाली दूध गंगा के साथ आए मलबे ने मंदाकिनी का रास्ता रोक दिया. इससे मंदिर के बाईं ओर बह रही मंदाकिनी का पानी अब मंदिर की तरफ बढ़ने लगा. साफ है कि पहले दिन आए मलबे ने दूसरे दिन के बड़े नुकसान के लिए रास्ता बना दिया था. पहली अनहोनी से बचे लोगों को भी इसका आभास हो गया था. उन्होंने ऊंचाई पर स्थित मंदिर परिसर में शरण लेना शुरू कर दिया था. 17 जून को मंदिर में सुबह की पूजा हो चुकी थी.

लगभग साढ़े सात बजे भयंकर तूफान शुरू हुआ. टिन की छतें पत्तों की तरह उड़ने लगीं. केदारनाथ के पुजारी बागीश लिंग बताते हैं, ‘पूजा के बाद मैं सामान को भंडार में रख रहा था कि एक जोरदार आवाज सुनाई दी. कुछ ही देर बाद मंदिर के दाईं ओर लगभग चार किमी ऊपर स्थित चैरबाड़ी ताल (गांधी सरोवर) से भयंकर गड़गड़ाहट के साथ पानी आता दिखा.’ एक स्थानीय प्रत्यक्षदर्शी कुंवर सिंह शाह बताते हैं कि इसे मंदिर तक आने में10 मिनट ही लगे. पानी अपने साथ मलबा और बड़े पत्थर लाया.

पुजारी बागीश लिंग बताते हैं, ‘मलबे से के दारनाथ मंदिर परिसर भर गया. मंदिर के अंदर भी पानी भरने लगा तो मैं मंदिर के खंबों पर चढ़ गया और केदारनाथ की विग्रह मूर्ति (जिसकी कपाट बंद होने के बाद पूजा होती है) को भी किसी तरह ऊपर कर लिया.

पानी 10 मिनट रहा और फिर मंदिर के पश्चिमी दरवाजे को तोड़ कर बाहर चला गया. फिर मैंने बाहर आकर देखा तो हर तरफ तबाही का दृश्य था.’ केदारनाथ से शुरू हुई बर्बादी की यह कहानी नीचे घाटी में दसियों किलोमीटर तक फैल गई. उत्तराखंड में इस बार की आपदा में सबसे

अधिक नुकसान केदारनाथ से लेकर गौरीकुंड और सोनप्रयाग तक हुआ है. आधिकारिक रूप से मौतों की संख्या करीब 1000 बताई जा रही हो, लेकिन इस घाटी के हालात बता रहे हैं कि यह आंकड़ा समय के साथ इससे कई गुना ज्यादा हो जाएगा. केदारनाथ पुरी मलबे से पूरी तरह से तहस-नहस हो चुकी है. उससे सात किमी नीचे बसा रामबाड़ा तो नक्शे से ही गायब है, जबकि आपदा से पहले यह यात्रा का सबसे भीड़भाड़ वाला पड़ाव था. रामबाड़ा से सात किमी नीचे गौरी कुंड में सैकड़ों गाड़ियां बहीं और सैकड़ों श्रद्धालुओं की मौत भी हुई.

आगे बढ़कर इस मलबे ने सोनप्रयाग में कार पार्किंग और दर्जन भर होटल और घर बहाए हैं. इसके बाद घाटी में पहुंचे इस पानी से भले ही खास जीवनहानि न हुई हो, लेकिन जो नुकसान हुआ उससे यहां के लोगों को उबरने में कई साल लगेंगे. मंदाकिनी नदी पर बने दर्जन भर पुल बह गए हैं. पहाड़ में पुल ही गांवों की जीवन रेखा यानी सड़कों को जोड़ने वाले अहम बिंदु होते हैं.

नदी तट पर बने सैकड़ों मकान तो इस तबाही का सबसे आसान शिकार थे, लेकिन पानी के साथ बह रहे लाखों टन मलबे और पेड़ों के चलते कई जगहों पर नदी रास्ता भी भटक गई. चंद्रापुरी और सौड़ी जैसे गांवों में उसने अपने मूल रास्ते से एक किमी ऊंचाई पर बसा इलाका भी साफ कर दिया. यहां के लोगों के लिए यह वास्तव में अनहोनी थी. लेकिन हिमालय के इन इलाकों में पिछले कुछ समय से जो हो रहा था उसे देखते हुए यह अनहोनी अवश्यंभावी थी. उसे बस मौके का इंतजार था.

तीर्थों में बेतहाशा निर्माण 
रिकॉर्ड बताते हैं कि 1883 में केदारनाथ में मंदिर के अलावा केवल दो-तीन झोपड़ियां ही थीं. लेकिन आज के केदारनाथ में चप्पे-चप्पे पर भवन बन गए थे. यहां तक कि पुरी के दोनों ओर बह रही मंदाकिनी नदी के पाट को भी नहीं छोड़ा गया था. केदारनाथ में किसी भी निर्माण को नियंत्रित करने के लिए सख्त नियम-कायदे बने हुए हैं, लेकिन लगता है वहां बनने वाले अवैध भवनों को रोकना किसी के बस में नहीं था. रामबाड़ा से लेकर गौरीकुंड तक ऐसा ही हाल था. पिछले साल केदारनाथ यात्रा पर आए नैनीताल उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने तीर्थ की ऐसी बुरी हालत देखकर उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार के माध्यम से खुद ही एक जनहित याचिका दाखिल करवाई थी. अदालत ने केदारनाथ में अवैध अतिक्रमण ध्वस्त करने का आदेश दिया था. राजस्व विभाग के एक अधिकारी बताते हैं कि इस आदेश के बाद केदारनाथ में 35 बड़े अतिक्रमण और 55 छोटे अतिक्रमण चिह्नित किए गए थे. प्रशासन भले ही न्यायालय का आदेश लागू न करा पाया हो लेकिन प्रकृति ने खुद ही ये निर्माण ध्वस्त कर दिए.

गढ़वाल के पूर्व कमिश्नर सुरेंद्र सिंह पांग्ती बताते हैं, ‘मैं 1986 में केदारनाथ गया था. उस समय वहां थोड़े मकान थे लेकिन लोग अपने मकान बनाने के लिए और ठेकेदार सरकारी कामों के लिए मंदिर के पीछे स्थित बड़ी-बड़ी चट्टानों को तोड़ रहे थे. तब मैंने इसका विरोध भी किया था. 2013 में जब मैं केदारनाथ गया तो मंदिर के पीछे स्थित बड़े पत्थर नहीं थे और पुरी में मकान ही मकान बन गए थे.’ विशेषज्ञ बताते हैं कि करीब 1000 साल पुराने इस मंदिर को बहुत सूझ-बूझ से उस शिलाखंड के आगे बनाया गया जो ग्लेशियरों का चट्टानरूपी अवक्षेप होने के चलते बहुत मजबूत था. ऐसी चट्टान को भूगर्भ विज्ञान की भाषा में मोरेन कहते हैं. मंदिर के अगल-बगल वाला क्षेत्र मंदाकिनी का प्राकृतिक रास्ता था जिसे उसकी पूर्वी और पश्चिमी वाहिका कहा जाता है. कई दशकों से मंदाकिनी सिर्फ पूर्वी वाहिका में बह रही थी. लेकिन जानकारों के मुताबिक लोकपरंपरा जानती थी कि वह कभी भी अपने छोड़े रास्ते पर भी चल सकती है इसलिए बीते 1000 सालों के एक बड़े हिस्से में मंदिर के अगल-बगल कोई खास निर्माण नहीं किया गया. नहीं तो जिस सभ्यता ने वहां इतना भव्य मंदिर बनाया वह वहां रहने के लिए कुछ और भव्य भवन भी बना ही सकती थी.

लेकिन बीते कुछ समय के दौरान वह लोकपरंपरा भुला दी गई. इसकी जगह एक सख्त कानून के उतने ही सख्त क्रियान्वयन को लेनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. केदारनाथ एक कस्बा बन गया. मोरेन का बड़ा हिस्सा तोड़ दिया गया. विशेषज्ञों का मानना है कि मोरेनरूपी वे बड़ी चट्टानें अपनी जगह होतीं तो पानी और मलबे का बड़ा कोप वे झेलतीं और जान-माल का नुकसान कम होता. ऐसा ही तब भी होता जब इस तीर्थ का ऐसा अनावश्यक विस्तार न किया गया होता.

केदारनाथ के बाद 16-17 जून की आपदा में सबसे बड़ा नुकसान बदरीनाथ मार्ग पर स्थित पांडुकेश्वर-गोविंदघाट गांवों में हुआ. इसी गांव के एक हिस्से गोविंदघाट से दुनिया में सबसे ऊंचाई पर स्थित गुरुद्वारे हेमकुंट साहिब और फूलों की घाटी का पैदल रास्ता जाता है. पांडुकेश्वर गांव का आधा हिस्सा और गोविंद घाट का गुरुद्वारा व अधिकांश होटल अलकनंदा नदी के भारी और तेज बहाव ने नष्ट कर दिए हैं.

गोविंदघाट तो मानवीय भूल का विलक्षण नमूना है. उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में कानूनन 12 मीटर तक ही भवन निर्माण हो सकता है. लेकिन हर दिन यहां से हेमकुंट साहिब जाने वाले पांच हजार यात्रियों के रहने के लिए यहां नदी के पाट को घेर कर गुरुद्वारा और आठमंजिला धर्मशालाएं तक बना दी गई थीं. यही हाल होटलों और कार पार्किंगों का भी था. जगह नहीं होने के कारण गोविंदघाट में अधिकांश होटल और पार्किंग नदी से लगकर बनाए गए थे. अब उनमें से अधिकांश अलकनंदा में समा गए हैं. अकेले गोविंदघाट में सैकड़ों वाहन, दर्जनों होटल और एक हेलीकाप्टर बह गया है.

नदी किनारे बसी बस्तियां और घर 
इस इलाके में एक पुरानी कहावत है, ‘ नदी-तीर का रोखड़ा जत-कत सौरो पार’  यानी नदी के किनारे बसने वालों के वंश का कभी भी नाश हो सकता है. सड़कों का जाल बिछने से पहले उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में नदियों के एक किलोमीटर दायरे में किसी भी गांव की बसाहट नहीं थी. उत्तराखंड में सड़कों के निर्माण से पहले यात्राएं चट्टी व्यवस्था पर होती थीं. चट्टी यानी रात में ठहरने का पड़ाव.

हर पांच मील पर एक चट्टी होती थी जहां आस-पास के गांवों के लोग यात्रियों को राशन और चौका-बर्तन उपलब्ध कराते थे. श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, गौचर, चटवापीपल, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग और चमोली सहित तब सारे गांव भले ही अलकनंदा नदी के किनारे थे, लेकिन कोई भी यात्रा-चट्टी नदी किनारे नहीं बनाई गई थी. चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी में सड़कों का निर्माण 1950 के बाद हुआ. ये सड़कें नदियों के किनारे बनाई गईं.

नतीजा यह हुआ कि बस्तियां और बाजार नदी के नजदीक बसने लगे. इन बस्तियों में से अधिकांश का दर्जा अभी भी गांव का ही है. उत्तराखंड में गांवों में भवन निर्माण करने के लिए किसी वैधानिक इजाजत की जरूरत नहीं होती है इसलिए नदी किनारे इन गांवों के खेतों में बड़े-बड़े होटल बनने लगे. इनमें से अधिकांश नदी के साथ बह गए हैं. यानी न तो परंपरागत ज्ञान से सबक लिया गया और न ही उनको रोकने वाला कानून ही मौजूद रहा. कस्बों में भवन निर्माण के नियम होने के बावजूद नदियों के तटों पर खूब अवैध निर्माण हुआ है.

पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट बताते हैं, ‘हाल ही में बहे गढ़वाल मंडल विकास निगम के पीपलकोटी, स्यालसौड़ और गबनीगांव स्थित रेजार्ट नदी के तट पर ही बसे थे. जब सरकारी विभाग इस तरह के निर्माण करते हैं तो निजी क्षेत्र के लोग भी उनका अनुकरण करते हैं.’ इस बार की आपदा में मंदाकिनी नदी ने गौरीकुंड से रुद्रप्रयाग तक नदी किनारे बने सैकड़ों मकानों को निगल दिया. यही हाल उत्तरकाशी में रहा.

हेलिकॉप्टर सेवा 
केदारनाथ की ऊंचाई के इलाकों को उत्तराखंड में बुग्याल कहते हैं. बुग्यालों में स्थानीय निवासी गर्मियों में अपनी भेड़ों को चराने जाते हैं या फिर सावन के महीने पूजा के लिए ब्रह्म कमल लेने. बुग्यालों की जीवन पद्धति ही अलग है. इन भेड़ पालकों द्वारा बुग्यालों में चिल्लाने पर पूरी मनाही होती है, यहां तक खांसने से भी परहेज किया जाता है. भेड़पालकों का मानना है कि चिल्लाने से आवाज गूंजती है और हिवालें (ग्लेशियर) टूटते हैं.

लेकिन तबाही से पहले तक हाल यह था कि गुप्तकाशी से केदारनाथ के लिए 10 कंपनियों के 17 हेलिकॉप्टर रोज औसतन 170 बार उड़ान भर रहे थे. लैंडिंग के लिए जगह खाली न होने के कारण ऊपर उड़ने वाला हेलिकॉप्टर केदार पुरी के चक्कर लगाता है. इससे ध्वनि प्रदूषण तो होता ही है इसके पंखों और इंजन से पैदा होने वाली आवाज चारों ओर के पहाड़ों से टकराकर ईको यानी गूंज पैदा करती है. लोकपरंपरा ने अपने अनुभव से इन जगहों के साथ जो व्यवहार विकसित किया था उसके संदर्भ में देखा जाए तो हेलिकॉप्टर  की इन उड़ानों ने केदारनाथ के आसपास के ग्लेशियरों को कितना नुकसान पहुंचाया होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

केदारनाथ की तरह गोविंदघाट से भी हेमकुंट साहिब के लिए हेलिकॉप्टर सेवाएं चलती थीं. यह भी एक रहस्य ही है कि पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क और फूलों की घाटी जैसे क्षेत्र होने के बाद भी इन कंपनियों को हेलीकाप्टर सेवा चलाने की इजाजत कैसे मिल गई.

10 हेलिकॉप्टर कंपनियों की केदारनाथ के लिए चल रही सेवा बंद कराने के लिए स्थानीय लोग 14 जून से आंदोलन भी कर रहे थे. लेकिन रसूखदार लोगों की इन कंपनियों को आंदोलन से रोज करोड़ों रुपये का नुकसान न हो इसके लिए गुप्तकाशी के पास स्थित उनके हैलीपैड पर पीएसी तैनात कर दी गई. प्रशासन व पुलिस के बड़े अधिकारी इसी कारण दो दिन से केदारनाथ में डेरा डाले बैठे थे. यह अलग बात है कि ऐसी प्रशासनिक तत्परता आपदा के दौरान दुर्लभ हो गई.

बिजली परियोजनाएं और नदी की बदलती आदत 
बदरीनाथ घाटी में पांडुकेश्वर से लगभग12 किमी ऊपर बदरीनाथ की तरफ 400 मेगावाट की विष्णुप्रयाग परियोजना का बैराज बना है. यहां से अलकनंदा का पानी रोककर उसे सुरंग के जरिए पावर हाउस में पहुंचा दिया जाता है. सर्दियों और गर्मियों में इस बैराज से लेकर विष्णुप्रयाग यानी लगभग 15 किमी तक अलकनंदा में इतना कम पानी रहता है कि इसे बच्चे भी पार कर सकते हैं. पांडुकेश्वर के लोग बताते हैं कि उस दिन अचानक पानी बढ़ने से परियोजना वालों ने सारा पानी नदी में छोड़ दिया. बाद में बढ़ते पानी और उसके साथ आए मलबे ने बैराज भरते हुए उसके पास की सड़क को तोड़कर अपना रास्ता बना लिया.

स्थानीय निवासी बताते हैं कि पहले जब नदी में बारहों महीने पानी रहता था तो वह धीरे-धीरे अपने तट और रास्ते को बना कर कम नुकसान करती थी. लेकिन अब कई सालों से अलकनंदा नदी में पांच महीने पानी नहीं रहता है. बरसात के महीनों के दौरान अचानक भारी पानी बहने से नदी के किनारों को अधिक नुकसान होता है. इस बार भी भारी बारिश और विष्णुप्रयाग परियोजना से छूटे भारी पानी ने नदी से एक किमी ऊपर बसे पांडुकेश्वर गांव का आधा हिस्सा निगल दिया.

यही हाल केदारनाथ घाटी का भी है. मंदाकिनी नदी पर इस समय दो बड़ी और उसकी सहायक नदी कालीगंगा पर दो छोटी बिजली परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं. 76 मेगावॉट की फाटा-ब्योंगगाड परियोजना और 99 मेगावॉट की सिंगोली-भटवाड़ी परियोजना. इन परियोजनाओं के लिए बन रही मुख्य और सहायक सुरंगों के निर्माण से जानकारों के मुताबिक 30 लाख घनमीटर मलबा निकला. इस मलबे के लिए कोई उचित डंपिंग ग्राउंड नहीं बनाया गया बल्कि इसे मंदाकिनी किनारे फेंक दिया गया. यह मलबा पानी के विशाल प्रवाह के साथ टूट कर आए पेड़ों के साथ संकरी पहाड़ी नदियों पर जगह-जगह पर छोटे-छोटे अस्थाई बांधों की श्रंखला बनाता है. ये बांध बनते-टूटते रहते हैं और अचानक पानी का प्रवाह बढ़ाते रहते हैं. मंदाकिनी नदी में भी इस बार अनियमित-अनियंत्रित पानी और उसमें बहते मलबे ने गौरीकुंड से लेकर रुद्रप्रयाग के दर्जन भर पुल बहाए और इतनी ही बस्तियों को निगल लिया.

बदरीनाथ के बाद आपदा की सबसे ज्यादा मार उत्तरकाशी इलाके पर पड़ी. यहां पिछले साल भी भारी तबाही हुई थी. उसका सबसे बड़ा कारण असीगंगा से आने वाले पेड़ और मलबा थे. असीगंगा पर बनने वाली जलविद्युत परियोजना के लिए सैकड़ों पेड़ काटे गए थे और टनों मलबा खोदा गया था. यही मलबा पिछले साल आपदा का कारण बना. इस बार भी असीगंगा से आने वाले मलबे ने ही भागीरथी नदी में मिलकर उत्तरकाशी में तबाही मचाई. साफ है कि सबक नहीं सीखा गया.

आपदा में गढ़वाल के सबसे बड़े कस्बे श्रीनगर को बड़ा नुकसान हुआ. श्रीनगर में अकेले एसएसबी अकादमी को 100 करोड़ रु की क्षति हुई है. श्रीनगर से पहले जीवीके परियोजना का बैराज बना है. इस बैराज के पानी से यहां प्रसिद्ध धारी देवी मंदिर को डूबना था. स्थानीय धर्मावलंबी और साधु-संत देवी की मूर्ति को हटाने का विरोध कर रहे थे. श्रीनगर के स्थानीय निवासी बताते हैं कि कंपनी ने बैराज के गेटों को बंद कर के धारी देवी मंदिर तक पानी बढ़ने दिया और उसके बाद धारी देवी की मूर्ति को डूबने का बहाना बना कर शिफ्ट करा दिया गया. जो काम सालों से नहीं हो रहा था कंपनी ने पानी के बढ़ने का बहाना बनाकर कर दिया. धारी देवी की मूर्ति को हटाने के बाद कंपनी ने अपने प्रोजेक्ट और पावर हाउस की सुरक्षा के लिए बैराज के सारे गेट खोल दिए. उसी के बाद श्रीनगर कस्बे के एक हिस्से में तबाही मच गई. स्थानीय लोगों का मानना है कि श्रीनगर में हुई तबाही का कारण एक साथ छोड़ा गया यह पानी भी था.

इस आपदा में नुकसान की एक बड़ी वजह भूस्खलन भी रही है जिसने जगह-जगह सड़कों का एक बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया. पहाड़ों में सुरंगें या सड़कें बनाने के लिए विस्फोटकों का व्यापक प्रयोग इन भूस्खलनों में हुई बढ़ोत्तरी का अहम कारण है. बड़े पैमाने पर विस्फोटकों के प्रयोग से पहले से ही कच्चा हिमालय और भी कमजोर हो रहा है. विशेषज्ञों के मुताबिक इन विस्फोटों के कारण धरती में छोटे-छोटे भूकंप पैदा होते हैं. ट्रक या बस जैसी बड़ी गाड़ियों के वहां से गुजरने से भी ऐसे सूक्ष्म भूकंप बनते हैं. रोज लाखों की तादाद में उठने वाले और हिमालय के भीतर पहले से ही मौजूद अनगिनत दरारों को बार-बार-बार कंपाने वाले ये भूकंप पहाड़ों को कमजोर करते जाते हैं. यह कमजोरी भूस्खलन और बर्बादी का कारण बनती है.

बेकाबू गाड़ियां
जब चट्टी व्यवस्था से सड़क यात्रा का जमाना आया तो पहले-पहल पहाड़ों में गेट व्यवस्था लागू की गई. यह एक तरह से नियंत्रित यातायात की व्यवस्था थी. एक निश्चित स्थान से एक निश्चित समय पर गाड़ियों को दूसरे निश्चित स्थान तक भेजा जाता था. बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी जगत सिंह बिष्ट बताते हैं,  ‘गेट व्यवस्था के चलते लोग यात्रा मार्ग के बीच बने कस्बों में भी रुकते थे. अब सारे के सारे यात्री ऋषिकेश से एक ही दिन में बदरीनाथ, गौरीकुंड ,रामबाड़ा व केदारनाथ पहुंच जाते हैं जिससे इन जगहों पर अथाह भीड़ हो जाती है.’ इस बार आपदा के बाद बदरीनाथ, केदारनाथ और गौरीकुंड में फंसे यात्रियों की इस बड़ी संख्या को वहां से निकालना भारी चुनौती रही.

[box]बांधों के चलते कई महीने नदियां करीब सूखी रहती हैं और बारिश में अचानक पानी आने से वे किनारों पर ज्यादा कटाव करने लगती हैं[/box]

हाल की आपदा में भले ही बदरीनाथ में कोई नुकसान न हुआ हो, लेकिन पांडुकेश्वर-गोविंदघाट में सड़क खत्म हो जाने से वहां 10 हजार के लगभग यात्री फंस गए. और जगहों पर हो रही मौतों से बदरीनाथ में फंसे यात्रियों, उनके परिजनों और उनके प्रदेशों की सरकारों ने हाय-तौबा मचानी शुरू कर दी. नतीजा यह निकला कि वहां फंसे यात्रियों में से अधिकांश को हवाई मार्ग से जोशीमठ लाना पड़ा. बदरीनाथ में फंसे यात्रियों को लाने में स्थानीय प्रशासन को अतिरिक्त ऊर्जा लगानी पड़ी. यह ऊर्जा केदारनाथ में ज्यादा राहत पहुंचाने में लग सकती थी. इस तबाही में केदारनाथ में सब कुछ खत्म हो गया है. जैसा कि मंदिर के पुजारी कहते हैं, ‘बचा है तो वही जो 1000 साल पहले भी था. यानी सिर्फ मंदिर.’  शायद प्रकृति ने अपना संदेश दे दिया है. क्या हम अब भी उसे समझेंगे?

(महिपाल कुंवर और रॉबिन चौहान के सहयोग के साथ)

‘कभी नहीं भूल सकता वो मंजर’

2013

मुझे याद आ रहा है, वह जून महीने की 14 तारीख थी और एफआरआई देहरादून में हम इस चर्चा में मुब्तिला थे कि अगर हम प्रकृति को नहीं समझेंगे तो प्रकृति हमें अपने तरीके से समझाएगी. इस बात को तीन ही दिन बीते थे कि रुद्रप्रयाग से पापा का फोन आया, ‘यहां तो बारिश ने कहर बरपा दिया है सड़कें तक बह गई हैं. अच्छा किया तूने जो 10 को ही चला गया. अगस्त्यमुनि में कई घर तबाह हो गए हैं. तेरी बुआ के घर तक भी पानी भर गया है.’ अगला दिन तो और भी हृदयविदारक खबर लेकर आया. पता चला कि केदारनाथ में भारी बारिश से कई लोगों की मौत हो गई है. लेकिन कोई स्पष्ट खबर सामने नहीं आ रही थी. आखिरकार मैंने एक स्थानीय पत्रकार साथी को फोन लगाया.

उन्होंने इस बात की पुष्टि की लेकिन ज्यादा कुछ न कहते हुए फोन काट दिया. तब तक टीवी पर खबरें आनी शुरू हो गई थीं लेकिन यह पता नहीं था कि दरअसल वह दिन कितने लोगों के लिए आखिरी दिन था. दो दिन बाद हमें जैसे ही आपदा का ठीक-ठीक अनुमान लगा, हम देहरादून के एक निजी विश्वविद्यालय के सहयोग से आपदा राहत के काम में जुट गए. 22 जून को 7 बजे सुबह 18 लोगों की टीम 7 ट्रक राहत सामग्री लेकर रुद्रप्रयाग की ओर रवाना हो गई. हम जैसे-तैसे श्रीनगर तक पहुंच गए. वहां हालात दिल दहला देने वाले थे. जलमग्र घर तथा उन पर गिरे विशाल वृक्ष. हमने आगे बढ़ना जारी रखा. रुद्रप्रयाग-तिलवाड़ा मार्ग बंद होने की वजह से हमें मयकोटी, दुर्गाधार होकर तिलवाड़ा जाना पड़ा.

तिलवाड़ा में हमने लोगों को राहत शिविरों में से बुलाकर सामान बांटना शुरू किया. कुछ परिवारों के पास तो केवल तन ढकने को कपड़े ही बचे थे. उनकी मदद करके हम अगस्त्यमुनि की ओर रवाना हो गए. रास्ते में सड़क टूटी थी और सीमा सुरक्षा बल के एक अधिकारी की सलाह पर हमने गुप्तकाशी जाने के लिए मयाली वाला वैकल्पिक रास्ता चुना जो काफी लंबा था. वहां का दृश्य कभी भूला नहीं जा सकता. हजारों लोगों का जन सैलाब, जिसको जहां जगह मिली थी वह ठंस गया था. हमने वह सामग्री वहां काम कर रहे सेना के जवानों और प्रशासन को सौंपी तथा वापस लौटने लगे.

राह में देवभूमि की एक दूसरी ही तस्वीर हमारा इंतजार कर रही थी. स्थानीय लोगों ने सड़कों पर आपदा पीड़ितों के लिए राहत शिविर लगा रखे थे और अपने घर से अनाज लाकर उन्हें मनुहार करके खिला रहे थे. मेरे उम्र तो ज्यादा नहीं लेकिन मुझे अपने पत्रकारिता के पेशे में जितनी भी यात्राओं का जितना अनुभव हुआ है यह उन सब अनुभवों में से सबसे हैरतअंगेज था. प्राकृतिक आपदा का ऐसा महातांडव और ऐसी विनाश लीला मैंने पहले कभी नहीं देखी थी. श्रीनगर, गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, अगस्त्यमुनि, केदारनाथ आदि में मची तबाही ने मेरे साथ ही सबके दिलों को झकझोर कर रख दिया है. इस भीषण आपदा ने हजारों की संख्या में लोगों को मौत की नींद सुला दिया है.

इस बीच यात्रियों के साथ दुर्व्यवहार तथा लूटखसोट की खबरें भी आ रही हैं लेकिन वह केवल एक पक्ष है न कि इकलौता सच. सेना के जवानों तथा स्थानीय लोगों ने जिस साहस, धैर्य और आत्मबल का परिचय इस कठिन समय में दिया है उसे बचने वाले लोग और हम जैसे प्रत्यक्षदर्शी शायद कभी भुला नहीं पाएंगे. अब इस त्रासदी में मानव की भूमिका की पड़ताल भी चालू हो चुकी है.

पता नहीं यह इस बात का सही वक्त है या नहीं लेकिन मुझे बचपन में बुजुर्गों से सुनी एक कहावत याद आती है कि जब-जब इंसान अति करता है तब-तब प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाकर उसे अपनी ताकत का अहसास कराती है. हमें प्रकृति के साथ जीना सीखना होगा न कि उसका शोषण करके. शोषण का नतीजा तो हम देख ही रहे हैं.

प्रियंक ‘मोहन’ वशिष्ठ , 
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और देहरादून में रहते हैं.

कुछ ना कहो, कुछ भी ना कहो

फिल्म समीक्षा

फिल्म » घनचक्कर
निर्देशक»  राज कुमार गुप्ता
लेखक » परवेज शेख, राज कुमार गुप्ता
कलाकार » विद्या बालन, इमरान हाशमी, राजेश शर्मा,
नमित दास

हमारी दुनिया की प्रॉब्लम है कि इसमें हंसी इतने स्वाभाविक ढंग से दाखिल नहीं होती, जैसे जीवन का हिस्सा हो. यही प्रॉब्लम घनचक्कर की भी है. यह कई जगह हंसाती है लेकिन उससे कहीं ज्यादा जगहों पर यह किसी खराब टीवी सीरियल के  ढंग से हंसाने की कोशिश में लगी रहती है. और इसीलिए घनचक्कर के ज्यादातर सीन अपनी जरूरत से लंबे हैं और खिंचते-खिंचते खिसियाने लगते हैं.

शुरू में एक बैंक लूटने का लंबा सीन है जिसमें तीनों चोर फिल्म अभिनेताओं के मुखौटे लगाकर अंदर घुसते हैं. ठीक है, यह मजेदार है. पर आप इसके भरोसे दस मिनट नहीं खींच सकते. घनचक्कर खींचती है. कभी-कभी तो वह बहुत सतही तरीके से अपने कमाल के अभिनेता राजेश शर्मा तक को बेवजह हंसने के लिए कहती है, और उन्हें हंसना पड़ता है. उसका कोई अर्थ नहीं. नमित और राजेश शर्मा की वे ज्यादातर समय खीझ पैदा करती हैं.

ऐक्टरों का काम ज्यादातर जगह अच्छा है. विद्या बालन अपने साथ एक अलग जान लेकर आती हैं अपने किरदारों में, जिसके निशान भी उनकी समकालीन मुख्यधारा की अभिनेत्रियों के हाथ नहीं लगे हैं. उन्हें कोई फिक्र नहीं कि वे तथाकथित सुंदरता की परिभाषाओं में कहां फिट हैं और कैमरा उन्हें किस एंगल से देख रहा है. फिल्म में ज्यादा ऊपर पहुंचने की गुंजाइश है ही नहीं पर आधा-पौन इंच ऊपर वे अकेली करती हैं.

कॉमेडी के लिए कतई जरूरी नहीं कि आपके किरदार बेवकूफ हों. वे बेवकूफियां और गलतियां जरूर कर सकते हैं और वह हंसी पैदा करे तो ज्यादा अच्छा है. आप छोटी-छोटी बचकानी चीजों पर सब टीवी के बहुत सारे सीरियलों की तरह ठहरने लगते हैं तो बस कोफ्त ही होती है.

अंत उम्मीद से अलग है, अच्छा है, लेकिन वह भी आपके भीतर कहीं नहीं उतरता. फिल्म कहीं अपने आधार में ही जड़ों से उखड़ी हुई है. उसकी कहानी के कुछ अच्छे हिस्से हैं लेकिन ज्यादा हिस्सों में विश्वसनीयता नहीं. फिल्म के पास घटनाएं ही बहुत कम हैं और राज कुमार गुप्ता के पास वह विजन भी नहीं दिखता कि वे बिना घटनाओं के फिल्म को रोचक बना सकें.

यह सिर्फ घनचक्कर की ही नहीं, हिंदी फिल्मों की मुख्यधारा की भी बड़ी समस्या है कि फिल्म अपना ट्रेलर होने की कोशिश ज्यादा करती है. उसे अपने किसी भी किरदार से ज्यादा दर्शकों की और उन्हें हंसाने की फिक्र रहती है, और चूंकि वह अपनी कहानी में उतरी ही नहीं है, इसलिए यह काम भी नहीं कर पाती.

यह याददाश्त के खोने का थ्रिलर होता और उसमें नैचुरल ह्यूमर या कुछ भी, तो कहीं बेहतर हो सकता था. लेकिन यह अपने किरदारों के प्यार तक को ठीक से नहीं पकड़ पाती. प्यार के ना होने को भी (अगर कोई कहे कि प्यार था ही नहीं). जो है, यह उसके बारे में भी बात नहीं करती और जो नहीं है, उसके न होने के बारे में भी. हां, यह कुछ भी नहीं कहती. कुछ-कुछ अपने टाइटल गीत की तरह.

-गौरव सोलंकी

…और नहीं आया भेड़िया

देश के इस इकलौते भेड़िया अभयारण्य के कार्यालय में न तो भेड़िये की कोई तस्वीर है न ही कोई अन्य प्रतीक
देश के इस इकलौते भेड़िया अभयारण्य के कार्यालय में न तो भेड़िये की कोई तस्वीर है न ही कोई अन्य प्रतीक

हममें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने रुडयार्ड किपलिंग की लिखी मोगली की कहानी नहीं पढ़ी हो. हां, वही मोगली जिसे भेड़ियों ने पाला था. जाहिर है जब हम रांची से 200 किलोमीटर दूर लातेहार जिले में स्थित देश के एकमात्र भेड़िया अभयारण्य की ओर बढ़े तो हमारे मन में तमाम रोमांचक कल्पनाएं उमड़ती-घुमड़ती रहीं. हम महुआडांड़ स्थित वन विभाग के कार्यालय पहुंचते हैं जहां हमारी मुलाकात रामदेव बड़ाईक से होती है. बड़ाईक वहां के अतिथिगृह की देखभाल करने वाले दिहाड़ी कर्मचारी हैं. हम गौर करते हैं कि देश के इस इकलौते भेड़िया अभयारण्य के कार्यालय में न तो भेड़िये की कोई तस्वीर है न ही कोई अन्य प्रतीक. हमारी जिज्ञासा पर बड़ाईक हमें एक छोटा-सा बोर्ड दिखाते हैं जिस पर लिखा है, ‘महुआडांड़ भेड़िया आश्रयणी, वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा-18-1 के तहत अधिसूचित, अधिसूचना संख्या- 1062, दिनांक- 23/06/1976.’ इसके आगे कुछ जगहों के नाम लिखे हैं मसलन, चेतमा, सरनाडीह, पुरवा, उरुम्बी आदि. कुल 6,317 हेक्टेयर में फैले भेड़िया अभयारण्य का पूरा ब्योरा वहां दर्ज है. बड़ाईक चुनौतीपूर्ण अंदाज में कहते हैं, ‘अब यकीन हुआ न कि आप देश के इकलौते भेड़िया अभयारण्य के कार्यालय में हैं.’

बड़ाईक के सिवा वहां कोई नहीं मिलता और घंटे भर बाद जब हम भेड़ियों के आशियाने वाले इलाके में निकलने को होते हैं तो हमारे साथ पथ प्रदर्शक बनकर बड़ाईक ही चलते हैं. 10-15 किलोमीटर उबड़-खाबड़ रास्ता गाड़ी से तय करने के बाद पांच-छह किलोमीटर की पैदल यात्रा शुरू होती है. हम उनसे पूछते हैं, ‘रास्ते में भेड़िये हमला तो नहीं करेंगे न!’ बड़ाईक न हंसते हैं, न कुछ जवाब देते हैं. दुबारा पूछने पर कहते हैं, ‘अभी तो हम लोग तीन-चार की संख्या में हैं, अगर गलती से भेड़िये अकेले इंसान को भी देख लेंगे तो बेचारे अपनी जान बचाकर भागेंगे.’ दुरूह यात्रा के बाद हम सरनाडीह पहुंचते हैं. सरनाडीह यानी देश के इकलौते भेड़िया अभयारण्य का केंद्र स्थल और वर्षों से भेड़ियों का सबसे सुरक्षित ठिकाना. गांव से थोड़ी दूर पर पत्थरों के विशाल टीले दिखते हैं. बड़ाईक चिल्लाते हैं- मांद नंबर एक दिखने लगी है. मांद नंबर एक के पास पहुंचते ही वे उसके प्रवेश पर लेट जाते हैं. गर्दन घुसाकर गंध लेने की मुद्रा बनाए हुए कहते हैं, ‘आइए ना, गंध सुंघिए.

भेड़िये की गंध आ रही है, सड़े हुए मांस की भी. अंदर होंगे भेड़िये.’ वह काल्पनिक गंध सिर्फ बड़ाईक ही सूंघ पाते हैं. गंध पर हमारे यकीन नहीं करने पर बड़ाईक अपनी टी-शर्ट में सटे एक-दो बाल दिखाते हुए कहते हैं, ‘अच्छा इस बाल को देखिए, अब तो यकीन हो रहा है न कि भेड़िया रहता होगा.’  मांद नंबर दो पहुंचकर भी हमें कुछ नहीं दिखता. बड़ाईक सूखा मल दिखाते हुए कहते हैं, ‘देखिए, भेड़िये का मल है यह. पक्के तौर पर.’ हम समझ नहीं पाए कि वे उसकी पहचान कैसे कर रहे हैं. यहां कई प्राकृतिक मांद हैं, पर कहीं कोई भेड़िया नहीं दिखता, न उसकी कोई ठोस निशानी. बड़ाईक विभाग के वफादार कर्मी की तरह हमें यकीन दिलाने की कोशिश करते हैं कि भेड़िये यहां रहते हैं लेकिन वे भी जानते हैं कि देश के इस इकलौते भेड़िया अभयारण्य में भेड़िया दिखा देना अब इतना आसान नहीं है. रास्ते में हमें सरनाडीह अतिथिगृह दिखता है. कभी भेड़िया प्रेमियों का आशियाना अब खंडहर बन चुका है.

गांव में बने वन आरक्षी केंद्र को देखकर भी यही लगता है कि वर्षों से यहां कोई नहीं आया. रास्ते में ही भेड़ियों की प्यास बुझाने के लिए बनाए गए छोटे तालाब भी दिखते हैं. वहां पानी की एक बूंद भी नहीं है. सरनाडीह गांव में कई लोगों से हम सिर्फ एक सवाल पूछते हैं, ‘क्या हाल के दिनों में आपने किसी भेड़िये को देखा है?’ 78 वर्षीया बुजुर्ग मिलियान एक्का बताती हैं, ‘दो-तीन साल पहले भेड़िया मेरी मुर्गी को उठा ले गया था. पहले भेड़िये आते थे लेकिन अब नहीं दिखते.’ इसी गांव में तिनतुसिया कुजूर से बात होती है. वे भी इसी भेड़िया अभयारण्य से सेवानिवृत्त हुए हैं. वे बताते हैं कि पहले अलसुबह और शाम होते ही भेड़ियों की आवाज सुनाई देने लगती थी लेकिन अब नहीं. वे बताते हैं, ‘सरकार ने तो फिर भी 1976 में इसे, देश का इकलौता भेड़िया अभयारण्य घोषित किया लेकिन जिन मांदो को देखकर आप आ रही हैं, आदिवासी समाज के बीच वे पीढ़ियों से ‘हुंड़ार पारिस’ नाम से ही मशहूर रहे हैं.’ हुंड़ार का मतलब भेड़िया और पारिस का आशय है बंगला.

हमारे साथ सामाजिक कार्यकर्ता और इसी इलाके के बाशिंदे जेरोम जेराल्ड कुजूर भी हैं. वे कहते हैं, ‘हम तो बचपन से ही ‘हुंड़ार पारिस’ जानते हैं और यह भी सुनते रहे हैं कि कभी गांववालों और भेड़ियों में मुठभेड़ नहीं हुई बल्कि गांववाले स्वेच्छा से भेड़ियों के लिए बकरी-सुअर-मुर्गी आदि बाहर छोड़ दिया करते थे ताकि वो आएं तो अपना आहार लेकर लौट जाएं.’ हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर क्यों भेड़ियों का आदिवासी समाज से इतना गहरा रिश्ता रहा है और भेड़ियों की मांद के पास गांव बसाने में आदिवासियों को क्यों डर नहीं लगा. इसका जवाब भेड़िया संरक्षण अभियान से जुड़े डेबरा मैकॉन अपनी वेबसाइट ‘सेक्रेड वुल्फ ड्रीम्स स्पिरिट वर्ल्ड’ में लिखते हैं, ‘आदिवासियों और भेड़ियों के बीच गहरा संबंध रहा है और आदिवासी समाज भेड़ियों के साथ बहुत सहज महसूस करते रहे हैं. वे मानते हैं कि भेड़िये खतरनाक जंगली जानवरों से उनकी रक्षा करेंगे और फिर दोनों की जीवनशैली भी कुछ मायने में एक जैसी है. आदिवासी भी समूह में रहते हैं और भेड़िये भी.’

पुरानी कहानी का पुनर्पाठ

इलस्ट्रेशन: मनीषा यादव
इलस्ट्रेशन: मनीषा यादव
इलस्ट्रेशन: मनीषा यादव

हम किस शहर में रहते हैं? यह सवाल ही गलत है. सवाल यह होना चाहिए कि हम कैसे शहर में रहते हैं. आज हमारे शहर की पहचान क्या है? यह कि जहां शोर इस कदर बढ़ गया है कि सन्नाटे रात को भी नहीं आते! या यह कि यहां का रहवासी इतना सभ्य हुआ या यूं कहें कि शहर ही जंगल हुआ कि जंगल से अब आदमखोर नहीं आते! या फिर यह कि यहां कई अट्टालिकाएं गगनचुंबी हुईं कि बहुतेरी छतों पर अब रवि महाराज नहीं विराजते. कुछ पल के लिए भी नहीं. क्या इसी शहर पर हम इतराते हैं. क्या ऐसे ही शहर की कल्पना की थी हमने! जब कोई शहरी किसी गांववाले को धोती-कुरता पहने, गमछा डाले स्टेशन से बाहर निकलते हुए देखता है, तो सोचता है कि यह भी आ गया मरने. भीड़ बढ़ाने. ठीक वैसे ही जैसे किसी शहरी ने कभी इस वाले शहरी को स्टेशन से बाहर निकलते देख सोचा था. अभी इन्हीं खयालातों में डूब-उतरा रहा था कि शहर को मैंने अपने सामने से जाते देखा. सहसा विश्वास न हुआ. यह तो वही बात हो गई कि शैतान का नाम लो और शैतान हाजिर. मैंने शहर को रोककर कहावत सुना दी. शहर हंसा. मगर मैं गंभीर रहा. वजह थी अखबार में छपी एक खबर. उस खबर का हवाला अब हमारे बीच होने वाले संवादों में आने वाला था.

मैंने शहर से पूछा, ‘कल रात फुटपाथ पर बच्चा भूख से रोता रहा और तू घोड़ा बेचकर सोता रहा!’ शहर मुझे घूरने लगा. उसे इस बाबत कुछ भी पता नहीं था. मैंने अखबार उसके आगे बढ़ा दिया. शहर ने उड़ती नजरों से वह खबर पढ़ी. अखबार मुझे थमाते हुए लापरवाही से बोला, ‘यार, दिन भर का थका था. बिस्तर पर एक बार जो गिरा तो फिर कुछ नहीं पता. तू यह समझ जैसे कि मैं मरा था.’ ‘मैं जानता हूं कि कल रात भी तूने पी रखी होगी, नहीं तो रोना सुनकर झट खिड़कियां बंद कर ली होंगी.’ मेरी इस बात में दम था. वरना शहर अभी तक शोर मचाने लगता. शहर कुछ पल को शांत रहा. यकीन नहीं होता न! मगर वह हुआ, जैसे किसी भयानक विस्फोट के बाद कुछ पल की खामोशी. मनहूस. नितांत मनहूस.

शहर के शांत होने की वजह भी मुझे जल्द ही समझ में आ गई. शहर बोला, ‘मुझे ऐसी नजरों से मत देखो. इसमें मेरा कोई कसूर नहीं. अगर मुझे नींद से जगाना ही था, तो उस भूखे बच्चे को जोर से चीखना-चिल्लाना था न!’ शहर की सफाई सुनकर मैं सोच में पड़ गया. यह इसकी क्रूरता कही जाए या उसका भोलापन या कि हाजिरजवाबी! मैं अभी सोच रहा था कि शहर चलने को हुआ. शहर के पास इतना समय कहां! मैंने उसे रुकने का इशारा किया, मगर वह नहीं रुका. जाते हुए शहर को मैंने जोर से कहा, ‘लगता है कि तू संज्ञाशून्य हो गया है, तभी स्वत: संज्ञान को भूल गया है. अरे पगले, जोर लगाने के लिए भी तो जोर चाहिए. मैं समझ गया, तुझे सिसकियों की जगह शोर चाहिए.’

कह नहीं सकता शहर मेरी बात सुन पाया कि नहीं, क्योंकि मेरे देखते ही देखते शहर भागने लगा था. मित्रों, शहर की यह कहानी आज की नहीं, कल की नहीं बरसों पुरानी है. फुटपाथ पर भूख से व्याकुल बच्चा रोता है और शहर आराम से सोता है. मासूमों-मजलूमों की सिसकियां शहर के तेज खर्राटों में खो जाती हैं. अगली सुबह शहर जगता है, काम पर चलता है, दिन ढलता है, शाम होती है, रात आ जाती है और वही पुरानी कहानी एक बार फिर ताजा-तरीन होकर हमारे सामने आ जाती है. जानते हो कल रात शहर में क्या हुआ? कल रात भी भूख से व्याकुल बच्चा रोता रहा… रोता रहा… और शहर  सोता रहा… सोता रहा…
-अनूप मणि त्रिपाठी

हे भगवान प्लास्टिक

प्लास्टिक ही प्लास्टिक
प्लास्टिक ही प्लास्टिक

लगभग नब्बे बरस पहले हमारी दुनिया में प्लास्टिक नाम की कोई चीज नहीं थी. आज शहर में, गांव में, आस-पास, दूर-दूर जहां भी देखो प्लास्टिक ही प्लास्टिक अटा पड़ा है. गरीब, अमीर, अगड़ी-पिछड़ी पूरी दुनिया प्लास्टिकमय हो चुकी है. सचमुच यह तो अब कण-कण में व्याप्त है–शायद भगवान से भी ज्यादा!

मुझे पहली बार जब यह बात समझ में आई तो मैंने सोचा कि क्यों न मैं एक प्रयोग करके देखूं- क्या मैं अपना कोई एक दिन बिना प्लास्टिक छुए बिता सकूंगी. खूब सोच-समझकर मैंने यह संकल्प लिया था. दिन शुरू हुआ. नतीजा आपको क्या बताऊं, आपको तो पता चल ही गया होगा. मैं अपने उस दिन के कुछ ही क्षण बिता पाई थी कि प्लास्टिक ने मुझे छू लिया था! फिर मैं सोचती रही कि इस विचित्र चीज ने कैसे हम सबको, हमारे सारे जीवन को बुरी तरह से घेर लिया है. सब जानते हैं, या कुछ तो जानते ही हैं कि यह बड़ा विषैला है. पर इस विषैली प्रेम कहानी ने हमें जन्म से मृत्यु तक बांध लिया है. अब हम सब इस बात को भी भूल चुके हैं कि हमारा जीवन कभी बिना प्लास्टिक के भी चलता था, ठीक से चलता था. प्लास्टिक की थैली नहीं थी, प्लास्टिक की बोतल नहीं थी पर हम थे, हमारा जीवन तो था. यही सब सोचते-सोचते मैंने इस विचित्र पदार्थ की जानकारी एकत्र करने की शुरुआत किया. इसके बारे में सोचना-समझना, पढ़ना-लिखना शुरू किया.

तब मुझे यह जानकर बड़ा ही अचरज हुआ कि दुनिया में तेल की, पेट्रोल की खोज के बाद प्लास्टिक का उदय हुआ था. तेल और प्राकृतिक गैस की खुदाई के बाद उनकी सफाई की जाती है. उस सफाई में जो कचरा बच निकलता है–हमारा यह प्लास्टिक उसी का हिस्सा है. यों देखा जाए तो सिद्धांत तो अच्छा ही था. कचरे को यों ही कहीं फेंक देने के बदले उसमें से कोई और काम की चीज बन जाए तो कितनी अच्छी बात है. इस तरह पेट्रोल की सफाई से निकले कचरे से हमारा यह प्लास्टिक बन गया. पर शायद साध्य और साधन दोनों ही गड़बड़ थे. इसलिए सिद्धांत भले ही ठीक था, परिणाम भयानक ही निकला.

फिर धीरे-धीरे मुझे यह भी समझ में आने लगा कि ये प्लास्टिक महाराज एक नहीं हैं, उनके तो कई रूप हैं, कई अवतार हैं. और इनके हर रूप के जन्म की कहानी अलग-अलग है. फिर इन कहानियों में से और कहानियां निकलती हैं. उदाहरण के लिए, प्लास्टिक का पहला प्रकार सैलुलाइड नामक एक उत्पादन था. इससे तरह-तरह के कंघे, कंघियां और बटन आदि बने थे. इस उत्पादन के पहले ऐसी चीजें प्राय: कुछ जानवरों की हड्डियों से बनाई जाती थीं. उस काम के लिए ऐसे जानवरों को मारा जाता था. कच्चा माल आसानी से नहीं मिल पाता था तो पक्का माल भी कम ही बनता था. वह सबकी पहुंच से दूर ही रहता था. जैसे ही यह प्लास्टिक आया, ये सारी चीजें भी एकदम सस्ती हो गईं और खूब मात्रा में मिलने लगीं. हरेक की पहुंच में आ गईं. हर कमीज, कुरते, कुरती में करीने से बने रंग-बिरंगे लगने लगे और फिर कई जेबों में हल्की, मजबूत कंघियां भी रखी गईं. इस सरल-सी बात को कठिन बनाकर कहना हो तो बताया जा सकता है कि इस दौर में अचानक इन चीजों का ‘लोकतांत्रीकरण’ हो गया था.

फिर भी उस दौर में प्लास्टिक कण-कण में व्याप्त नहीं हो पाया था. इसकी शुरुआत तो सन 1920 के आस-पास हुई. इसके पीछे विश्व युद्ध का भी बड़ा हाथ था. अमेरिका और यूरोप के युद्धरत देशों ने अपने-अपने यहां के उद्योगों को इस बात के लिए बड़ा सहारा दिया, प्रोत्साहन दिया कि वे धातु आदि से बनने वाली भारी-भरकम चीजों के बदले उतनी ही मजबूत पर बेहद हल्की चीजों के उत्पादन की प्रक्रिया पर शोध करें. युद्ध में काम आने वाली चीजों का वजन ज्यादा होता था. इस कारण उनको यहां-वहां ले जाना कठिन और महंगा भी था. ऐसे विकल्प सामने आने लगे तो फिर उनका उत्पादन बढ़ाया जाने लगा. कहीं युद्ध में जरूरत की कोई चीज कम न पड़ जाए, किसी कमी की वजह से युद्ध ही न हार जाएं-इस भय से इन चीजों का उत्पादन बढ़ाकर रखा गया.

फिर जब युद्ध खत्म हुआ तो समझ में नहीं आया कि अब युद्ध के लिए लगातार सामान बना रहे इन कारखानों का क्या किया जाए. तब उन्हें एक दूसरे मोर्चे की तरफ मोड़ दिया–बाजार की तरफ. इस तरह प्लास्टिक से बन रही चीजों को युद्ध के मैदान से हटाकर बाजार की तरफ झोंक दिया गया. यही वह दौर है जिसमें अब तक तरह-तरह की धातुओं से, लकड़ी आदि से बन रही चीजें प्लास्टिक में ढलने लगीं. कुर्सी-मेज, कलम-दवात, खेल-खिलौने, चौके के डिब्बे-डिब्बी और तो और कपड़े-लत्ते भी प्लास्टिक से बनने लगे, बिकने लगे. इसके बाद तो प्लास्टिक उत्पादन की लहर पर लहर आती गई. दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया के कई भागों में थोड़ी-बहुत शांति स्थापित हुई, कई देश नए-नए आजाद हुए और नागरिकों के मन में, जीवन में भी थोड़ी शांति, थोड़ा स्थायित्व आने लगा था. ठीक युद्ध की तरह ही इस शांति का भी प्लास्टिक उद्योग ने भरपूर लाभ उठाया. अब तक जम चुके व्यापार को उसने तेज गति दी.

अब उद्योग ने घर-गिरस्ती के दो-तीन पीढ़ी चल जाने वाले सामानों पर अपना निशाना साधा. थाली, कटोरी, बर्तन, कप-बशी, चम्मच, भगोने, बाल्टी-लोटे आदि न जाने कितनी चीजों को बस एक पीढ़ी के हाथ सौंपना और फिर छीन भी लेना उसने अपना लक्ष्य बनाया. वह पीढ़ी भी इस काम में, अभियान में खुशी-खुशी शामिल हो गई. फिर घर भी अब पहले से छोटे हो चले थे, संयुक्त परिवार भी टूटने के कगार पर थे. ऐसे में बाप-दादाओं-दादियों के भारी भरकम वजनी बर्तनों को कहां रखते. इनके बदले बेहद हल्के, शायद उतने ही मजबूत बताए गए रंग-बिरंगे प्लास्टिक के बर्तन आ गए. फिर तो जैसे एक-एक चीज चुनी जाने लगी. जहां-जहां प्लास्टिक नहीं है, वहां-वहां बस यही हो जाए–इस सधी हुई कोशिश ने फिर हमारे पढ़े-लिखे समाज का कोई भी कोना नहीं छोड़ा. हमारे कंधों पर टंगे जूट, कपड़े, कैनवस के थैलों से लेकर जूते-चप्पल- सब कुछ प्लास्टिकमय हो गया. प्लास्टिक की थैलियां सब जगह फैल गईं.

आज पूरी दुनिया, नई, पुरानी, पढ़ी-लिखी और अनपढ़ दुनिया भी इन्हीं प्लास्टिक की थैलियों को लेकर एक अंतहीन यात्रा पर निकल पड़ी है. छोटे-बड़े बाजार, देसी-विदेशी दुकानें हमारे हाथों में प्लास्टिक की थैली थमा देती हैं. हम इन थैलियों को लेकर घर आते हैं. कुछ घरों में ये आते ही कचरे में फेंक दी जाती हैं तो कुछ साधारण घरों में कुछ दिन लपेटकर संभाल कर रख दी जाती हैं, फिर किसी और दिन कचरे में डालने के लिए. इस तरह आज नहीं तो कल कचरे में फिंका गई इन थैलियों को फिर हवा ले उड़ती है, एक और अंतहीन यात्रा पर. फिर यह हल्का कचरा जमीन पर उड़ते हुए नदी-नालों में पहुंच कर बहने लगता है. और फिर वहां से बहते-बहते समुद्र में. यहां भी एक और अंतहीन यात्रा शुरू हो जाती है.

खोज करने वालों ने इस प्लास्टिक की समुद्री यात्रा को भी समझने की कोशिश की है. उन्हें यह जानकर अचरज हुआ कि हमारे घरों से निकला यह प्लास्टिक का कचरा अब समुद्रों में भी खूब बड़े-बड़े ढेर की तरह तैर रहा है. न वह जमीन पर गलता-सड़ता है न समुद्र में ही. यह प्लास्टिक तो आत्मा की तरह अजर-अमर है और प्रशांत महासागर में एक बड़े द्वीप की तरह धीरे-धीरे जमा हो चला है. जिन लोगों को आंकड़ों में ही ज्यादा दिलचस्पी रहती है, उन्हें तो इतना बताया ही जा सकता है कि अमेरिका में हर पांच सेकंड में प्लास्टिक की कोई 60 हजार थैलियां खप जाती हैं. इस तरह के आंकड़ों को किसी विशेषज्ञ ने पूरी दुनिया के हिसाब से भी देखकर बताया है कि हर 10 सेकंड में कोई दो लाख 40 हजार थैलियां हमारे हाथों में थमा दी जाती हैं. थोड़ी ही देर बाद फेंक दी जाने वाली ये थैलियां फिर गिनी नहीं जातीं. कचरा बन जाने पर गिनने के बदले इन्हें तोला जाता है. वह तोल हजारों टन होता है.

ऐसा भी नहीं है कि इस पर किसी का ध्यान न गया हो. प्लास्टिक के फैलते, पसरते व्यवहार को कई देशों ने, कई समाजों ने अपनी-अपनी तरह से रोकने के कई प्रयत्न किए हैं. कुछ देशों ने इस पर प्लास्टिक टैक्स लगाकर देखा है. ऐसा टैक्स लगते ही खपत में एकदम गिरावट भी देखी गई है.  कहीं-कहीं इन पर सीधे प्रतिबंध भी लगाया गया है. इसके बदले फिर अखबार, कागज, कपड़े की थैलियां, लिफाफे भी चलन में आए हैं. पर हमारा दिमाग इन चीजों को भी तुरंत कचरा बनाकर फेंक देता है. तब कचरे का ढेर, पहाड़ प्लास्टिक का न होकर कागज का बन जाता है. दुकानों से घर तक चीजें लाने का माध्यम इतनी कम उमर का क्यों हो, वह चिरंजीव क्यों न बने–प्लास्टिक के कारण अब ऐसे सवाल भी हमारे मन में नहीं उठ पाते. कुल मिलाकर हम सब प्लास्टिक के एक बड़े जाल में फंस गए हैं. यह जाल इतना बड़ा है और हम उसके मुकाबले इतने छोटे बन गए हैं कि हमें यह जाल दिखता ही नहीं. उसी में फंसे हैं. पर हम अपने को आजाद मानते रहते हैं. प्लास्टिक अब एक नया भगवान बन गया है. वह हमारे चारों ओर है. और शायद भगवान की तरह ही वह हमें दिखता नहीं.

(यह लेख जापान से प्रकाशित सोका गकाई इंटरनेशनल त्रैमासिक पत्रिका के जनवरी, 2013 के अंक में छपे एक लंबे इंटरव्यू पर आधारित है. हिंदी में इसे जाने-माने पर्यावरणविद और गांधीवादी अनुपम मिश्र ने प्रस्तुत किया है और यह गांधी मार्ग पत्रिका के मई-जून अंक में प्रकाशित हुआ है)