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अपनी कहानी अपनी जबानी

उम्र का सातवां दशक पार कर चुके डॉ बीपी केशरी का सारा वक्त बीते कुछ महीनों से रांची से करीब 25-30 किलोमीटर दूर पिठोरिया स्थित ‘नागपुरी संस्थान’ के कमरे में ही बीत रहा है. वे 16वीं सदी से लेकर अब तक नागपुरी भाषा के करीब 700 कवियों द्वारा रचित 35 हजार गीतों का संकलन और कुछ कवियों के जीवन परिचय वाली किताब लाने की तैयारी में हैं. उधर, रांची में अश्विनी कुमार पंकज और उनकी पत्नी वंदना टेटे सुबह आठ बजे से लेकर रात के आठ-दस बजे तक व्यस्त रहते हैं. वे तकरीबन हर माह आदिवासी भाषा में एक किताब प्रकाशित करते हैं. इसके अलावा वे आदिवासी भाषाओं में कई पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन के अभियान में भी लगे हुए हैं.

बोकारो के निमाईचंद महतो की दिन भर की चिंता यही होती है कि जहां-जहां खोरठा भाषा को बोलने-जानने-समझने वाले लोग रहते हैं वहां कैसे इस भाषा की पत्रिका ‘लुआठी’ के प्रसार का विस्तार हो. रांची में रहने वाले विरेंद्र कुमार सोय मुंडारी भाषा में ‘कुपुल’ नाम से चार पन्ने की एक पत्रिका निकालकर इसे पाठकों के बीच पहुंचाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं. साथ ही वे इसी भाषा में ‘संगोम’ नाम की त्रैमासिक पत्रिका  भी अपने लोगों के बीच पहुंचाने का अभियान चला रहे हैं.

कुछ इसे वर्षों से दबी आकांक्षाओं को अपनी भाषा के जरिए स्वर देने की कोशिशों का नतीजा बताते हैं, कुछ खत्म हो रही अपनी भाषाओं को बचाए रखने की ललक और कुछ हिंदी द्वारा आदिवासी और देशज समुदाय को उपेक्षित किए जाने के बाद संघर्ष और सृजन की अपनी कहानी बताने की बेताबी. वजह जो भी हो, यह सच है कि झारखंड के आदिवासी और देशज समाज में भाषा, संस्कृति और अस्मिता को बचाने और बढ़ाने का एक अभियान चल रहा है. तमाम मुश्किलों के बीच अपनी राह खुद बनाने की कहानी बयान करता यह अभियान रोचक भी है और बहुतों के लिए प्रेरक भी.

इतिहास में झांकने पर पता चलता है कि झारखंड की आदिवासी पत्र-पत्रिकाओं में सबसे पहला नाम ‘झारखंडी सकम’ का है. इस साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन 1940 में आरंभ हुआ था. जमशेदपुर से निकलने वाली ‘झारखंडी सकम’ में मुंडारी, नागपुरी, हिंदी और अंग्रेजी भाषा में समाचार व लेख होते थे. इस पत्रिका के संपादक जयपाल सिंह मुंडा थे और यह झारखंड पार्टी का प्रकाशन था. इस लिहाज से आदिवासी भाषाओं में प्रकाशन का सिलसिला ज्यादा पुराना नहीं. इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि इस काम में चुनौतियां बहुत हैं. डॉ बीपी केशरी जिस नागपुरी भाषा में इतने बड़े काम को अंजाम दे रहे हैं, वह झारखंड के छोटानागपुर इलाके में भी सिर्फ एक खास हिस्से की भाषा है. एक छोटे-से दायरे में बोली जाने वाली बोली को लेकर होने वाला काम बहुत श्रमसाध्य है. लेकिन वे अकेले नहीं. झारखंड के कई इलाकों में कई बुजुर्ग, नौजवान, जानकार, कम-पढ़े लिखे अपने-अपने दायरे की भाषाओं में इस तरह का साहित्यिक अभियान चला रहे हैं. सबके सामने प्रकाशन का संकट है लेकिन आर्थिक मुश्किलों के बावजूद वे अपनी आकांक्षाओं के स्वर को मूर्त रूप दे रहे हैं. किताबें छपवा रहे हैं और नियमित-अनियमित पत्र-पत्रिकाएं भी प्रकाशित कर रहे हैं.

[box]‘यदि अस्मिताओं को बचाए रखना है तो अपनी अपनी भाषाओं में रचना कार्य निरंतर करते रहना होगा क्योंकि कई आदिवासी भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं’[/box]

भाषा, संस्कृति और अस्मिता के इस अनोखे, प्रेरक अभियान के बारे में पता करने पर कई जानकारियां सामने आती हैं जिनसे मुख्यधारा की दुनिया बहुत हद तक अनजान है. झारखंड की प्रमुख आदिवासी भाषा संथाली में ही जब इसकी पड़ताल शुरू करते हैं तो चांदो मामो, चेचिक, देबान तेनगुन, दिशोम बेउरा, फागुन, हेंदे अरसी, जिवी, मानभूम संवाद, मार्सल ताबोन, रापज सावंत बेवरा, संदेश सकम, सिली, द संघायनी, तोरी सुतम जैसी दर्जन भर से अधिक दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक और त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन की जानकारी मिलती है. इनका प्रकाशन नियमित तौर पर भले न हो रहा हो लेकिन जैसे ही संसाधन जुटते हैं इनके अंक छापे जाते हैं और इन्हें संबंधित पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश होती है. डाक से भेजकर, हाथों-हाथ पहुंचाकर, पत्र-पत्रिकाओं के स्टॉल में उपलब्ध करवाकर या फिर किसी देशज आयोजन में अलग से स्टॉल लगाकर.

रांची में विरेंद्र कुमार महतो ‘गोतिया’ नाम से त्रैमासिक पत्रिका और ‘छोटानागपुर एक्सप्रेस’ नाम से पाक्षिक अखबार प्रकाशित कर रहे हैं. बोकारो में रहनेवाले निमाई चंद महतो खोरठा भाषा में ‘लुआठी’ नाम से पत्रिका प्रकाशित कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘हमारे यहां बातों को सहेजने की मौखिक परंपरा रही है, इसलिए स्थानीय भाषाओं में पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशित होने से लोगों की रुचि बढ़ी है.’

महतो जो कहते हैं वह बात सही भी है. मुंडारी भाषा में ही कुपुल, संगोम, सेंगा सेतेंग आदि कई पत्रिकाओं के प्रकाशन की जानकारी मिलती है. इन पत्र-पत्रिकाओं का प्रसार चाहे जितना कम हो, इनके सामने मुश्किलों का पहाड़ चाहे जितना बड़ा हो लेकिन एक असर तो साफ तौर पर दिख रहा है कि जो अपनी जुबान छोड़कर दूसरी भाषा में लिख-पढ़ नहीं सकते, उन्हें अपनी बातें रखने का मंच मिल रहा है. वे अपनी बात लिख रहे हैं, कह रहे हैं और अपने समुदाय के बीच लेखक-पत्रकार-रचनाकार के तौर पर जाने भी जा रहे हैं.

इस कड़ी में एक बेहद महत्वपूर्ण अभियान वंदना टेटे और उनके पति अश्विनी कुमार पंकज का है. दोनों मिलकर आदिवासी भाषाओं में कई लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन कर रहे हैं. साथ ही वे विभिन्न आदिवासी भाषाओं में उन लेखकों की किताबें प्रकाशित करने के अभियान में लगे हुए हैं जिन्हें मुख्यधारा में कहीं कोई ठौर नहीं मिलता. वे अब तक कुल मिलाकर तीस किताबों का प्रकाशन कर चुके हैं.
वंदना टेटे और अश्विनी कुमार पंकज सिर्फ किताबें नहीं छापते बल्कि अथक परिश्रम से एक नेटवर्क खड़ा करके वे उनके वितरण और बिक्री के भी इंतजाम में लगे हुए हैं. वे बताते हैं कि इसमें उन्हें धीरे-धीरे ही सही पर सफलता मिल रही है. वंदना पिछले कई सालों से त्रैमासिक पत्रिका ‘अखड़ा’ का प्रकाशन कर रही हैं जिसकी पहुंच अब झारखंड के अलावा छत्तीसगढ़, उड़ीसा, असम, पश्चिम बंगाल समेत उन तमाम इलाकों में हैं जहां आदिवासियों की बसाहट है. वंदना साथ में सोरी नानीन नाम से खड़िया पत्रिका भी निकाल रही हैं. वंदना की पत्रिकाएं साहित्य, समाज, संस्कृति और भाषायी और सामुदायिक अस्मिता के इर्द-गिर्द हैं. उनके पति अश्विनी कुमार पंकज स्थानीय और आदिवासी भाषाओं में एक अखबार ‘जोहार दिशुम खबर’ तो छाप ही रहे हैं, समसामयिक व मनोरंजन के मिश्रण वाली पत्रिका ‘जोहार सहिया’ का प्रकाशन भी कर रहे हैं जिसमें स्थानीय भाषाओं में ही मोबाइल इंटरटेनमेंट, सिनेमा सहित तमाम समसामयिक हलचलों से संबंधित सामग्री होती है. इस पत्रिका में दुनिया की क्लासिक रचनाओं का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद भी नियमित तौर पर प्रकाशित होता है जिसके लिए ‘दुनिया आपन भासा में’ जैसा कॉलम निर्धारित है.

‘जोहार दिसुम खबर’ बहुभाषी पाक्षिक अखबार है, जिसमें पंचपरगनिया, खोरठा, कुरमाली, नागपुरी, हो, मुंडारी, संथाली, खड़िया, कुड़ुख, बिरहोरी, असुरी और मालतो भाषाओं में खबरें प्रकाशित होती हैं. अश्विनी कुमार पंकज का कहना है कि जोहार दिसुम खबर संभवतः आदिवासी भाषाओं का पहला अखबार है, जिसे दिल्ली में डीएवीपी प्राप्त हुआ है.

अश्विनी कहते हैं, ‘झारखंड बनने के बाद से ही हम लोगों ने यहां की भाषा, संस्कृति और साहित्य को एक स्वर देने के लिए एक मंच तैयार करने की कोशिश की. अब हम इसके तले इन पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों का प्रकाशन कर रहे हैं.’ उनका मानना है कि जिन चीजों को खत्म करना हो उन्हें विशिष्ट बनाकर-बताकर आत्ममुग्धता की ओर मोड़ा जाता है. आदिवासी भाषाओं के साथ भी ऐसा ही होता रहा है. इसीलिए यह कोशिश की गई. उनके मुताबिक इस काम में मुश्किलें तो बहुत आ रही हैं लेकिन मुश्किलों के बीच कोशिश भी जारी है.’

[box]लेखकों और प्रकाशकों के सामने नयी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में अपनी संस्कृति को बचाए रखने की चुनौती है.[/box]

अलग-अलग भाषाओं में निकल रही इन पत्रिकाओं में कई आरएनआई में सूचीबद्ध हैं. कई पत्र-पत्रिकाएं ऐसी भी हैं, जिनका आरएनआई में निबंधन नहीं है, लेकिन उनका प्रकाशन नियमित तौर पर हो रहा है.

अश्विनी की बातें बहुत हद तक ठीक भी हैं. दरअसल आदिवासी समुदाय की शिकायत और पीड़ा अकारण नहीं है. मुख्यधारा की रचनाधर्मी दुनिया के प्रति उसकी एक हद तक नाराजगी का भाव इस आधार पर रहा है कि उनके समाज को सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास में वह स्थान या महत्व नहीं दिया जा सका जिसका वह असल में हकदार था. भारत भूषण अग्रवाल सम्मान से सम्मानित चर्चित युवा कवि अनुज लुगुन कहते हैं, ‘आदिवासी भाषाओं में रचना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि हिंदी भाषाओं में रचित आदिवासी विषय पर साहित्य और लेखन का बर्ताव हम देखते रहे हैं.’ हालांकि संथाली में साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता भोगला सोरेन ऐसे अभियान की महत्ता को दूसरे नजरिये से देखते हैं. वे कहते हैं, ‘लोकभाषाओं का भविष्य उज्जवल है, ऐसा तो दावा नहीं कर सकता लेकिन यदि अस्मिताओं को बचाए रखना है तो अपनी अपनी भाषाओं में रचना कार्य निरंतर करते रहना होगा. आदिवासी भाषाओं में तो यह और जरूरी है, क्योंकि कई आदिवासी भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं, कई विलुप्ति के कगार पर हैं, निरंतर रचनाधर्मिता इन्हें बचाने में मददगार साबित होगी.’

 

इसी बीच अब सुषमा असुर नाम की एक महिला भी झारखंड में असुर समुदाय के लिए बेहद सक्रिय होकर सामने आ रही हैं. सुषमा अपने समुदाय के लोगों की बातों को उनकी ही जुबान में संकलित और प्रकाशित करने के अभियान में लगी हुई हैं, जिसके लिए वे चंदा इकट्ठा कर रही हैं. उनके इस प्रयास को व्यक्तिगत तौर पर लोगों का सहयोग भी मिल रहा है. गुमला जिले के नेतरहाट इलाके की रहनेवाली सुषमा अपने समुदाय के लोगों की कथा-कहानियों, कविताओं और गीतों को लिपिबद्ध करना चाहती हैं.

पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन और तमाम आदिवासी भाषाओं मंे किताबों को छापने के इस अनोखे अभियान की कड़ी में जनमाध्यम नामक संस्था भी आदिवासी भाषाओं में तरह-तरह के प्रयोग से पुस्तकें व अन्य सामग्री लाने की कोशिश में है. जनमाध्यम की ओर से अब तक 23 किताबें प्रकाशित हुई हैं जिनके जरिए सनिका मुंडा, डोमरो बिरूली, उदयचंद्र बोदरा, लोकेंद्र देवगम, रमेश हेंब्रम जैसे विविध आदिवासी भाषाओं के लेखकों का उभार हुआ है. सनिका मुंडा कहते हैं, ‘ऐसे लेखन का हमारे समुदाय के लिए बेहद महत्व है, क्योंकि इससे सीधे तौर पर गांव-घर के लोग जुड़ते हैं.’  जनमाध्यम के सचिव फैसल अनुराग बताते हैं कि हुलगुलान रेन बार शहीद, कोल्हान दिसुम होड़ दुरंग, हासा सकम आदि किताबों की मांग बहुत है. बकौल फैसल, ‘इन भाषाओं के अल्फाबेट और कैलेंडर भी प्रकाशित कर लोगों तक पहुंचाए जा रहे हैं.’

इन भाषाओं में छप रहे पत्र-पत्रिकाओं या पुस्तकों के सामने आर्थिक मोर्चे से लेकर वितरण-बिक्री तक का संकट तो है ही, एक सवाल यह भी है कि ऐसे प्रकाशनों का संबंधित समाज पर कितनी दूर तक असर पड़ रहा है. संथाल की चर्चित कवयित्री निर्मला पुतुल कहती हैं, ‘स्थानीय भाषाओं में लेखन और प्रकाशन का दायरा मुट्ठी भर लोगों तक सीमित है. और यदि वह ओलचिकी जैसी स्थानीय लिपि में लिखी जा रही हो तो वह और सिमट जाता है, ऐसे में यह जरूरी है कि इसका अनुवाद भी देवनागरी और दूसरी अन्य भाषाओं में होते रहना चाहिए, ताकि दायरा बढ़ सके.’ उनका मानना है कि अपनी भाषा में लिखनेवाले आत्ममुग्धता के शिकार होते जा रहे हैं और अधिकांश सिर्फ गीत, कहानी, उपन्यास, सौंदर्यबोध में ही फंस गए हैं जबकि समस्याओं, कुरीतियों आदि पर ज्यादा लिखा जाना चाहिए. उधर, रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय भाषा विभाग के पूर्व अध्यक्ष गिरिधारी राम गौंझू कहते हैं कि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से देशज भाषा में लिखने वाले लोग लगातार बेहतरी की कोशिश में लगे हुए हैं. उनके मुताबिक इससे नई चीजें सामने आ रही हैं और लोगों को समझने का मौका मिल रहा है.

[box]लेखकों और प्रकाशकों के सामने नयी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में अपनी संस्कृति को बचाए रखने की चुनौती है.[/box]

तमाम संभावनाओं और विडंबनाओं के बीच एक वर्ग का आरोप है कि स्थानीय भाषाओं में इतनी पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन के उभार की कहानी के पीछे बड़े हिस्से का मकसद सरकार से विज्ञापन प्राप्त कके अपनी दुकान चलाना है. लेकिन ज्यादातर लोगों को यह तर्क सही नहीं लगता इसका एक कारण तो यह है कि सरकार से इन पत्रिकाओं को इतना विज्ञापन नहीं मिलता जिससे सालों भर एक रोजगार की जरूरत को पूरा किया जा सके. और यदि यह मान भी लें कि ऐसे अभियान से प्रकाशक औसतन तीन-चार हजार रुपये मासिक आमदनी भी कर लेते होंगे तो यह बेहतर नजरिये से ही देखा जाना चाहिए. आखिर इस बहाने ही सही, वर्षों से दबी एक बड़ी जमात की आकांक्षा उभार ले पा रही है और इतिहास को मौखिक तौर पर सहेजकर रखने की परंपरा अब छपकर सदा-सदा के लिए संकलित हो रही है. कई नये लेखक तैयार हो रहे हैं. जो लेखक थे, वे छपकर सामने आ रहे हैं.

निर्मला पुतुल का मानना है कि आदिवासी साहित्य के उतरोत्तर विकास की राह में कई नई चुनौतियां भी हैं जिनसे रचनाशीलता के पहले चरण में ही लेखकों को जूझना पड़ रहा है मसलन भाषा के मानकीकरण का सवाल, अनेक लिपियों का इस्तेमाल आदि. उनके मुताबिक इन लेखकों और प्रकाशकों के सामने नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में अपनी संस्कृति को बचाये रखने की चुनौती है. अपने एक लेख में वे कहती हैं, ‘ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में भाषा-साहित्य बाजार के पहलू में बैठी राजनीतिक व्यवस्था की दयादृष्टि पर निर्भर हो गया है. आर्थिक मंदी की मजबूरी में पूंजी और साम्राज्यवाद ने दुनिया को एक छोटे-से गांव में बदलने की योजना बनाई है. जाहिर है कि जब एक ही गांव होगा तो भाषा-साहित्य भी एक ही होगा. इसलिए विश्व पूंजी बाजार दुनिया की सभी भाषाओं को लील जाने की तैयारी में है. उसके पहले निशाने पर आदिवासी साहित्य और भाषाएं हैं क्योंकि आदिवासी इलाकों में ही धरती की विशाल धन-संपदा, खनिज, जमीन, पानी और अन्य दूसरे संसाधन हैं.’ उम्मीद है कि आदिवासी भाषाओं में लेखन और प्रकाशन की यह नई बयार इस चुनौती के सामने मजबूती से खड़ी होगी.

मर्ज कुछ इलाज कुछ

बीते महीने के पहले पखवाड़े झारखंड की राजधानी रांची से 125 किलोमीटर दूर लातेहार जिले में माओवादियों ने तीन ग्रामीणों समेत 10 जवानों को मार डाला. यह घटना प्रमंडल जोन के जिस इलाके में घटी वह घने जंगलों के फैलाव वाला दुरूह इलाका है जहां गरीबी-बेरोजगारी चरम पर है. पिछले कुछ समय में माओवादियों ने यहां कई बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया है. इस बार माओवादियों ने न सिर्फ पुलिस को निशाने पर लिया बल्कि ग्रामीणों को भी उड़ाया और एक पुलिसकर्मी के शव को पेट से चीरकर उसमें बम लगा दिया. फिर महीना खत्म होते-होते 28 जनवरी को उन्होंने लातेहार जिले के ही पल्हैया गांव में दिन दहाड़े हथियार लूटने की कोशिश की. हथियारों से लैस करीब 60 माओवादियों का इरादा भाजपा विधायक हरिकृष्ण सिंह और उनके अंगरक्षकों से हथियार लूटने का था, लेकिन विधायक के सही समय पर वहां से निकल जाने के चलते वे कामयाब नहीं हो सके. 20 दिन के अंदर एक ही इलाके में हुई दो घटनाएं बताती हैं कि माओवादियों के मन में पुलिस का खौफ नहीं है और वे उसकी चेतावनियों को जरा भी गंभीरता से नहीं ले रहे.

अब सवाल यह है कि झारखंड में माओवादी क्यों पुलिस से बेखौफ हैं. पुलिस क्यों पूरी तैयारी के बाद भी लातेहार में उनसे मात खा गई? झारखंड के पुलिस महानिदेशक जीएस रथ कहते हैं, ‘माओवादियों को बाहर से समर्थन मिल रहा है, इसलिए वे मजबूत हो रहे हैं और उनके पास अत्याधुनिक हथियार पहुंच रहे हैं.’

हो सकता है रथ सही कह रहे हों, लेकिन यह भी सच है कि माओवादियों को जितनी मजबूती बाहरी समर्थन से मिल रही है, उतनी ही पुलिस की रणनीतिक चूक से भी. पहला सवाल तो यही है कि यदि माओवादी अत्याधुनिक हथियारों से मजबूत होकर पुलिस से मोर्चा लेने को तैयार बैठे हैं तो इसकी सूचना पुलिस को पहले क्यों नहीं मिल पाती. आखिर माओवादियों की सूचनाएं जुटाने के लिए तो पुलिस ने अपने खुफिया विभाग के पदाधिकारियों के अलावा पूरे राज्य में करीब 3,500 से ज्यादा विशेष पुलिस अधिकारी नियुक्त कर रखे हैं. राज्य के पूर्व सुरक्षा सलाहकार और सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी डीएन गौतम कहते हैं, ‘कई बार सूचनाएं मिल भी जाती हैं तो वक्त रहते कदम नहीं उठाया जाता, क्योंकि पुलिस में ऊपरी स्तर पर संवादहीनता ज्यादा है.’

खुफिया तंत्र की चूक और संवादहीनता का फायदा माओवादी उठाते हैं लेकिन कुछ और वजहें भी साफ दिखती हैं जो माओवादियों को दुस्साहसी बना रही हैं. दरअसल झारखंड में माओवादियों से पार पाने के लिए पुलिस अक्सर मर्ज कुछ, इलाज कुछ की तर्ज पर चलती दिखती है. हाल का ही उदाहरण लें. दस जवानों-ग्रामीणों के मारे जाने के तुरंत बाद समीक्षा बैठक हुई. दो-तीन दिन बाद ही रांची में जर्मन शेपर्ड कुत्तों की ट्रेनिंग शुरू हो गई. कहा गया कि ये कुत्ते बम तक पहुंचेंगे, माओवादियों तक पहुंचेंगे. यह सच है कि माओवादियों से लड़ने के लिए और पुलिस को सहयोग करने के लिए खुफिया व खोजी कुत्तों की दरकार है, लेकिन सच यह भी है कि उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए उसके पास ड्राइवर नहीं हैं.

पुलिस में ऊपर के स्तर पर संवाद, समन्वय व सहयोग का अभाव राज्य में माओवादियों को भारी पड़ने का मौका दे रहा है

उल्लेखनीय है कि पिछले 12 साल में राज्य में 4,100 से ज्यादा नक्सली घटनाएं घटी हैं. इन घटनाओं में 417 पुलिसवाले शहीद हुए हैं, जबकि कुल 1,076 लोगों की जान गई है. राज्य में 17 उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य में करीब 2700 नक्सली हैं. पिछले कुछ समय की बात करें तो तीन दिसंबर, 2011 को लोकसभा सांसद इंदर सिंह नामधारी के काफिले पर लातेहार के ही गारू इलाके में माओवादियों ने हमला किया था. नामधारी तो बच गए थे लेकिन 11 जवानों को जान गंवानी पड़ी थी. कुछ दिनों बाद जनवरी, 2012 में गढ़वा जिले के भंडरिया में माओवादियों ने उतने ही जवानों को घेरकर मार डाला था, एक बीडीओ को जिंदा जला दिया था और पुलिस के सारे हथियार भी अपने कब्जे में कर लिए थे. लातेहार में ही चार मार्च को जब जवानों की रसद पहुंचाने के लिए पुलिस हेलिकॉप्टर पहुंचा तो माओवादियों ने उस पर भी गोलीबारी की थी. इन घटनाओं के जिक्र का आशय यह है कि पलामू के अलग-अलग हिस्से में माओवादी इतनी बड़ी घटनाओं को अंजाम देते रहे लेकिन पुलिस की तैयारी उस स्तर पर नहीं हो सकी.

अब भी जिस ढर्रे पर काम हो रहा है उससे खास उम्मीदें नहीं जगतीं. पुलिस ने जब इस बार की घटना के बाद जर्मन शेपर्ड कुत्तों की ट्रेनिंग शुरू करवाई तो सवाल उठा कि कुत्ते गंतव्य का पता तो पुलिसवालों को बता देंगे लेकिन वहां तक पहुंचाने के लिए प्रशिक्षित ड्राइवरों की राज्य में जो कमी है उसका क्या होगा. पुलिस सूत्र बताते हैं कि झारखंड में एनएसजी यानी नेशनल सिक्योरिटी गार्ड से प्रशिक्षण प्राप्त ड्राइवरों की संख्या 10 से भी कम है. इनमें से एक तो हमेशा मुख्यमंत्री के काफिले में ही शामिल रहता है. शेष की ड्यूटी कहां लगाई गई है, यह बताने को कोई तैयार नहीं होता. झारखंड के 24 जिलों में से 18 जिले नक्सल प्रभावित हैं और यहां तकरीबन 500 प्रशिक्षित ड्राइवरों की दरकार है लेकिन ड्राइवरों की कमी झेल रहा राज्य अपने चालकों को एनएसजी कैंप में ट्रेनिंग के लिए नहीं भेज पाता. एनएसजी का ट्रेनिंग कैंप हरियाणा के मानेसर में है और वहां ड्राइवरों को तीन सप्ताह का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है. लेकिन राज्य अपने यहां के ड्राइवरों को तीन सप्ताह के प्रशिक्षण के लिए भेजने की स्थिति में नहीं है. प्रशिक्षण आईजी प्रशांत कुमार का कहना है, ‘ड्राइवरों को एनएसजी ट्रेनिंग सेंटर, मानेसर के मानदंडों के अनुसार उनके सहयोग से राज्य में ही कैसे प्रशिक्षण दिया जाए, इस पर विचार चल रहा है.’

समस्या सिर्फ ड्राइवरों के प्रशिक्षण की नहीं है.  लातेहार में हुई मुठभेड़ के दौरान यह बात उभरी कि जो जवान माओवादियों के खिलाफ अभियान में गए थे वे सुरक्षा उपकरणों से लैस नहीं थे. उनके पास बुलेट प्रूफ जैकेट और हेडगेयर (इससे सिर चोट से बचा रहता है) भी पर्याप्त संख्या में नहीं थे. पुलिस प्रवक्ता आईजी एसएन प्रधान कहते हैं कि इस वक्त राज्य में 40 हजार पुलिसकर्मी नक्सल विरोधी अभियान में अलग-अलग जगहों पर लगे हुए हैं, जबकि बुलेट प्रूफ जैकेट महज पांच हजार हैं. जानकारी के मुताबिक 2010 के बाद से बुलेट प्रूफ जैकेटों की खरीदारी राज्य में बंद है. जो जैकेट हैं, उनमें से अधिकतर एनआइजे थ्री श्रेणी के हैं  जो एके-47 की गोली और 7.62 कैलिबर की गोली को झेल सकने में सक्षम नहीं होते. इसका वजन भी आठ किलोग्राम तक होता है जिसे पहनकर लड़ना सुविधाजनक नहीं होता. इस बारे में बात करने पर आईजी प्रोवीजन आरके मलिक कहते हैं, ‘फंड तो है लेकिन ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट (बीपीआरडी) के गाइडलाइन नहीं मिलने के कारण खरीद नहीं हो पा रही.’

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एक मूल समस्या पुलिस बल की भारी कमी भी है. खुद राज्य के पुलिस महानिदेशक जीएस रथ कह चुके हैं कि राज्य में करीब 16 हजार पुलिसकर्मियों की कमी है. यह संख्या कांस्टेबल से लेकर आईपीएस अधिकारियों तक की है. राज्य में 35 आईपीएस अधिकारियों, चार हजार असिस्टेंट सब इंस्पेक्टरों, दो हजार सब इंस्पेक्टरों, उपाधीक्षकों और करीब 10 हजार कांस्टेबलों की कमी है.

हालांकि इसके बावजूद राज्य में पुलिस ने माओवादियों से लड़ने के लिए समय-समय पर खुद को तैयार भी किया है. फिलहाल झारखंड में 25 जगुआर मारक दस्ते माओवादियों के खिलाफ लड़ने के लिए कार्यरत हैं. ये दस्ते पहले एसटीएफ यानी स्पेशल टास्क फोर्स के रूप में जाने जाते थे. माओवादियों से लड़ने में राज्य में सीआरपीएफ की 17 बटालियनें, इंडियन रिजर्व बटालियन की पांच कंपनियां और स्पेशल ऑक्जिलरी फोर्स की दो बटालियनें लगी हुई हैं. पुलिस ट्रेनिंग सेंटर, हजारीबाग और कमांडो ट्रेनिंग सेंटर, पदमा में पुलिसकर्मियों का प्रशिक्षण भी जारी है और पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष अखिलेश पांडेय की मानें तो बेसिक और एडवांस मिलाकर कुल 17 ट्रेनिंग स्थल  अलग हैं, जहां पुलिसवालों को प्रशिक्षित किया जा रहा है.

खुद राज्य के पुलिस महानिदेशक जीएस रथ कह चुके हैं कि राज्य में करीब 16 हजार पुलिसकर्मियों की कमी है.

फिर भी यह सच है कि अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है. पुलिस में ऊपरी स्तर पर संवाद, समन्वय और सहयोग का अभाव माओवादियों को भारी पड़ने का मौका दे रहा है. झारखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक जेबी महापात्रा बताते हैं, ‘झारखंड में पुलिस और माओवादियों के बीच एक्सिडेंटल एनकाउंटर हो तो दूसरी बात है. यहां तो तैयारियों के साथ ऑपरेशन चलाया जाता है. कई बार कहा जाता है कि चीजों की कमी है लेकिन ऐसा नहीं है. जो भी जवान लड़ने जाते हैं, उन्हें सारी सुविधाओं से लैस कर भेजा जाता है लेकिन अधिकारियों में संवादहीनता और खींचतान इतनी है कि पुलिस चूक जाती है.’ सीआरपीएफ के एक बड़े अधिकारी कहते हैं, ‘ऑपरेशन के समय जिला पुलिस, पुलिस मुख्यालय, विशेष शाखा, आईजी लॉ ऐंड ऑर्डर, आईजी ऑपरेशन ऐंड प्लानिंग और सीआरपीएफ के बीच गहरा समन्वय होना चाहिए और निरंतर संवाद भी, लेकिन समन्वय की लय बीच में ही टूट जाती है और संवाद बीच में ही विवाद का रूप ले लेता है.’

माओवादियों से लड़ने के लिए झारखंड पुलिस ने दो उग्रवादी संगठनों को फलने-फूलने में मदद की और उससे मदद भी लेती है. ये उग्रवादी संगठन तृतीय प्रस्तुति कमिटी और झारखंड प्रस्तुति कमिटी हैं. दोनों प्रतिबंधित हैं लेकिन इनका इस्तेमाल झारखंड पुलिस खुलेआम करती है. इन दोनों संगठनों का राज्य के छह जिलों गढ़वा, पलामू, लातेहार, चतरा, हजारीबाग और रामगढ़ इलाके में प्रभाव है. संगठन के उग्रवादी पुलिस के लिए पेट्रोलिंग करते हैं और माओवादियों से मुठभेड़ भी. झारखंड पुलिस ने इन दोनों उग्रवादी संगठनों पर न तो कोई इनाम घोषित किया है और न ही कभी वह इनके खिलाफ कोई अभियान चलाती है. नतीजा यह कि दोनों उग्रवादी संगठन मुखबिरी करने के साथ-साथ दहशत, अपराध और वसूली अभियान चलाते हैं. हालांकि पुलिस महानिदेशक जीएस रथ इससे इनकार करते हैं.

बहरहाल, एक बार फिर पुलिस माओवादियों के खिलाफ नए ऑपरेशन की तैयारी में जुट गई है. पुलिस को सूचना मिली है कि लातेहार के कटेया जंगल में आतंक मचाने के बाद माओवादी लोहरदगा-गुमला जिले के जंगलों में हैं, सो इस बार वहीं ऑपरेशन होगा. 28 जनवरी को पलामू पुलिस अधीक्षक अनूप टी मैथ्यू ने एक बार फिर अखबारों में बड़े विज्ञापन देकर पुनर्वास पैकेज की घोषणा कर दी है. इस बार उन्होंने 30 हजार रुपये से लेकर 12 लाख रुपये तक की राशि देने का वादा किया है. दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश झारखंड में माओवादियों के सफाये के लिए लंबी योजना की बात करते हैं. सारंडा में गणतंत्र दिवस पर झंडा फहराने के बाद रांची पहुंचे रमेश कहते हैं, ‘सारंडा में लोकतंत्र रास्ते पर आ गया है. लोग अब अपने अधिकार के लिए आंदोलन कर रहे हैं. वन विभाग एक रोड़े की तरह पेंच फंसाता है. छह हजार से अधिक आदिवासियों पर वन विभाग ने मुकदमा ठोककर जेल में बंद कर रखा है, इससे पार पाना होगा.’ रमेश कहते हैं कि वे झारखंड में सब कुछ करने को तैयार हैं लेकिन प्रशासन की सुस्ती और राजनीति की उथल-पुथल अड़चन बन जाती है.

राज्य में फिलहाल राष्ट्रपति शासन है, इसलिए किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद दिखती है. राष्ट्रपति शासन में राज्यपाल के सलाहकार नियुक्त हुए के विजय कुमार कहते हैं, ‘झारखंड में उग्रवादियों से आंध्र के पैटर्न पर लड़ना होगा. सारंडा की तरह पलामू के इलाके में भी एक्शन प्लान चलाएंगे. माओवादियों से लड़ने के लिए बनाई गई इंडियन रिजर्व बटालियन की तरह एक इंजीनियरिंग बटालियन भी बनेगी, जो माओवादी प्रभावित इलाके में विकास कार्यों को गति दे सके.’ अब देखना यह है कि इन बातों पर कितना अमल होता है.

भ्रष्टाचार का ‘राजमार्ग’

देश में कई सालों से सड़क निर्माण के लिए बड़ी कंपनियों को नियमों के विपरीत ठेके देने या सड़क निर्माण में घटिया किस्म की सामग्री इस्तेमाल करके भ्रष्टाचार करने के मामले सामने आते रहे हैं. पर इन दिनों छत्तीसगढ़ में सड़क निर्माण में भ्रष्टाचार का एक ‘अभिनव’ मामला देखने को मिला है. यहां डेढ़ सौ किलोमीटर लंबी एक सड़क के चौड़ीकरण और कुछ हिस्सों में बायपास बनाने के लिए जो जमीन अधिगृहीत की गई है या की जानी है, उसका कई जगह भू-उपयोग बदल दिया गया है ताकि ज्यादा से ज्यादा मुआवजा हासिल किया जा सके.

आज से तकरीबन डेढ़ साल पहले केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय के अधीन कार्यरत नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने छत्तीसगढ़ के आरंग एवं सरायपाली मार्ग (डेढ़ सौ किलोमीटर) में चौड़ीकरण एवं बायपास के निर्माण का फैसला किया था. उसी समय 11 मई, 2011 को छत्तीसगढ़ शासन के राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से एक राजपत्र प्रकाशित किया गया. इसमें उल्लेख था कि चौड़ीकरण एवं बायपास निर्माण के प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए उपखंड अधिकारी (अनुविभागीय अधिकारी) के स्थान पर सक्षम प्राधिकारी की तैनाती की जाएगी.  राजपत्र का प्रकाशन होने के बाद नियमानुसार यह भी तय हो चुका था कि सक्षम प्राधिकारी की तैनाती के बिना भूमि का मूल स्वभाव यानी भू-उपयोग किसी भी प्रयोजन के लिए बदला नहीं जा सकेगा. यानी जमीन के अभिलेख में यदि कहीं यह उल्लिखित है कि अमुक खसरा नंबर पर चट्टान है या बड़े झाड़ का जंगल तो फिर वहां चट्टान और बड़े झाड़ के जंगल का होना अनिवार्य है.

इसी तरह जो खेती की जमीन है वह खेती की ही रहेगी और जो घर या व्यावसायिक भूमि है उसका भू-उपयोग भी जमीन अधिग्रहण से पहले बदला नहीं जा सकता. आरंग से सरायपाली मार्ग के चौड़ीकरण के मामले में उजागर होने वाली गड़बड़ी यही है कि शासन ने 11 मई, 2011 को सक्षम प्राधिकारी तैनात करने की सूचना प्रकाशित तो की लेकिन प्राधिकारी नियुक्त नहीं किया. वहीं 23 दिसंबर, 2011 को जारी किए गए एक दूसरे राजपत्र में भू-व्यपवर्तन (भू-उपयोग में परिवर्तन) के लिए अनुज्ञा (आदेश) जारी करने का अधिकार भू-अभिलेख अधीक्षक, तहसीलदार, अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व ) एवं कलेक्टर को सौंपा गया. इस तरह से 11 मई से 23 दिसंबर की अवधि भू-व्यपवर्तन के लिए प्रतिबंधित थी. इस मामले में भ्रष्टाचार का मामला इसी समयावधि का है. दरअसल इस दौरान महासमुंद जिले की पिथौरा तहसील में पदस्थ रहे अनुविभागीय अधिकारी बीबी पंचभाई ने 40 से ज्यादा लोगों की जमीन के भू-उपयोग को बदल दिया और सरकार को करोड़ों रुपये की चपत लगाने की पृष्ठभूमि तैयार कर दी.

सामान्य तौर पर नियम है कि यदि कोई आवेदक अपनी जमीन के भू-उपयोग में  परिवर्तन करवाना चाहता है तो इसके लिए वह सबसे पहले भू-अभिलेख कार्यालय की डायवर्जन शाखा में आवेदन लगाएगा. शाखा में कार्यरत अधिकारी आवेदन की जांच-पड़ताल के बाद उसे अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के पास भेजेंगे, लेकिन यहां चालीस से ज्यादा आवेदन सीधे पिथौरा तहसील के तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी बीबी पंचभाई के समक्ष लगाए गए.

भू-उपयोग में परिवर्तन के दौरान कृषि भूमि को टिन नंबर, बैंक लोन के कागजात या उद्योग पंजीयन देखे बिना ही व्यावसायिक भूमि में बदलने के कई मामले हैं

हमने जब राजस्व विभाग की दायरा पंजी ( इसमें जमीन के व्यपवर्तन से संबंधित सूचना यथा मामले के प्रारंभ होने की तारीख, गांव का नाम, रकबा, खसरा, भूमि स्वामी का नाम, निराकरण की तारीख आदि दर्ज की जाती है) का अवलोकन किया तो कई चौंकाने वाले तथ्य मिले. दायरा पंजी के क्रमांक 43 में उल्लिखित है कि ग्राम लहरौद के चतुर्भुज अग्रवाल ने अपनी 0.20 हेक्टेयर कृषि भूमि को व्यावसायिक प्रयोजन में बदलने के लिए 28 मई, 2011 को आवेदन लगाया था (जबकि 11 मई, 2011 की प्रतिबंधित अवधि के बाद किसी भी आवेदन पर विचार नहीं हो सकता था), चतुर्भुज अग्रवाल के इस आवेदन पर कार्रवाई करते हुए महज 15 दिन में  उनकी खेती की जमीन व्यावसायिक घोषित कर दी गई. ऐसे ही कई प्रकरण दायरा पंजी में दर्ज हैं.  पिथौरा तहसील के ग्राम राजा सेवैया में खसरा क्रमांक 246 /1 एवं 246/2 पर सरकारी जमीन का होना दिखता है लेकिन अब यह मालती और दयामती के नाम पर चढ़ चुकी है. इसी तरह दायरा पंजी के क्रमांक 59 में 0.66 हेक्टेयर परती भूमि मोहनलाल अग्रवाल पिता रामअवतार अग्रवाल निवासी पिथौरा की बताई गई है. उल्लेखनीय है कि मोहन भाजपा के जिलाध्यक्ष शंकरलाल अग्रवाल के भाई हैं. उनका प्रकरण कब शुरू हुआ इसका जिक्र भी दायरा पंजी में नहीं है, अलबत्ता यह जरूर उल्लिखित है कि उनकी जमीन 22 जून, 2011 को व्यावसायिक कर दी गई.

इस क्षेत्र में कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता अमरजीत चावला तहलका से बातचीत में कहते हैं, ‘चौड़ीकरण एवं बायपास के निर्माण की जद में आने वाली जमीनों के प्रभावितों को उनकी जमीन के स्वभाव के हिसाब से मुआवजा मिलता सो आनन-फानन में पड़त और कृषि भूमि को आवासीय अथवा व्यावसायिक कर दिया गया वह भी यह जाने बगैर कि जहां की जमीन व्यावसायिक बताई जा रही है वहां पहुंच मार्ग अथवा बिजली-पानी की सुविधा है भी या नहीं.’ चावला आगे यह भी आरोप लगाते हैं कि इस पूरी कवायद में सरकार और भाजपा से जुड़े प्रभावशाली लोगों को फायदा पहुंचाया गया है.

वैसे तो दायरा पंजी में गड़बड़ी के अनेक बिंदु हैं लेकिन दो ऐसे हैं जो बताते हैं कि पिथौरा के अनुविभागीय अधिकारी बीबी पंचभाई ने आवेदनों के निराकरण की जल्दबाजी में कई गड़बड़ियां की हैं.  अनुविभागीय अधिकारी ने यह जांचने-पखरने की कोशिश भी नहीं की कि जो लोग अपनी जमीन का व्यपवर्तन करवा रहे हैं वास्तव में जमीन का स्वभाव उस रूप में है अथवा नहीं. पड़त या कृषि भूमि को व्यावसायिक बनाने वालों ने अपने उद्योग के पंजीयन, टिन नंबर, बैंक से लिए गए ऋण आदि के दस्तावेज जमा किए हैं या नहीं. महासमुंद जिले के भू-अभिलेख शाखा के प्रभारी केआर देवांगन कहते हैं, ‘वैसे तो भू- व्यपवर्तन करवाने वाले आवेदकों को अपना पहला आवेदन भू-अभिलेख कार्यालय की डायवर्जन शाखा में ही देना था. नियमानुसार कुछ आवेदन तो डायवर्जन शाखा में लगे थे लेकिन वे आवेदन जो सीधे अनुविभागीय अधिकारी के समक्ष लगाए गए थे उन पर डायवर्जन शाखा की ओर से किसी तरह की जांच- पड़ताल नहीं की गई सो कृषि या आवासीय भूमि को व्यावसायिक किए जाने के संबंध में किसी भी तरह का दस्तावेज भू-अभिलेख कार्यालय में मौजूद नहीं है.’

गड़बड़ी का दूसरा बिंदु मामलों के प्रारंभ होने की तारीख से जुड़ा हुआ है. दायरा पंजी के प्रकरण क्रमांक 44 से लेकर 70 तक में किसी भी मामले के प्रारंभ होने की तारीख ही नहीं डाली गई है. अर्थात यह स्पष्ट नहीं है कि जमीनों के व्यपवर्तन के लिए आवेदकों ने किस तारीख को आवेदन लगाया.

पिथौरा के तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी (वर्तमान में महासमुंद ) बीबी पंचभाई से  जब तहलका ने दायरा पंजी में अंकित किए गए विवरणों में गड़बड़ी की सच्चाई जानने की कोशिश की तो उन्होंने किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार करते हुए कहा, ‘लिपकीय त्रुटियों के चलते विवरण को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया कभी-कभी गड़बड़ा जाती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि भू-व्यपवर्तन के लिए रिकार्डों में हेराफेरी हुई है.’ क्या राजपत्र के प्रकाशन के बाद प्रतिबंधित अवधि में भू-व्यपवर्तन की कार्रवाई की जा सकती है, इस सवाल पर पंचभाई सिर्फ इतना कहते हैं, ‘यदि शासन चाहे तो क्या नहीं हो सकता.’ जबकि नई दिल्ली स्थित नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया के चीफ जनरल मैनेजर एवं भू- अधिग्रहण समन्वयक वीके शर्मा तहलका से बातचीत में साफ कहते हैं, ‘यदि राजपत्र के प्रकाशन से पहले कोई आवेदक राज्य के राजस्व महकमे के अधिकारियों को इस बात की ताकीद करता है कि उसकी भूमि को गलती से पड़त या कृषि भूमि बताया जा रहा है तो वह अपनी भूमि को अन्य प्रयोजन के लिए परिवर्तित करवा सकता है, लेकिन इस परिवर्तन के लिए भी आवेदक को आवश्यक दस्तावेजों के जरिए यह साबित करना होता है कि व्यावसायिक भूमि किस लिहाज से व्यावसायिक है.’ पिथौरा के वर्तमान अनुविभागीय अधिकारी कृष्णदास वैष्णव राजपत्र प्रकाशन के बाद भू-उपयोग में बदलाव पर प्रतिबंध की बात का समर्थन करते हुए कहते हैं, ‘यदि राजपत्र में प्रकाशन की प्रक्रिया के बाद भू-व्यपवर्तन की कार्रवाई को प्रतिबंधित नहीं माना जाएगा तो हर कोई अपनी जमीन के स्वभाव को बदलने की जुगत में लगा रहेगा और सरकारी पैसों को चूना लगाता रहेगा.’

वैसे मार्ग के चौड़ीकरण एवं बायपास निर्माण के लिए आरंग-सरायपाली और बसना इलाके के कुल 96 गांवों की जमीन का अधिग्रहण किया जाना है. अधिग्रहण के लिए फिलहाल 71 करोड़ 40 लाख 38 हजार 73 रुपये जारी किए जा चुके हैं. जिला प्रशासन ने  लगभग 900 प्रभावितों को इस रकम में से करबी 28 करोड़ रुपये बांट भी दिए हैं. अभी 43 करोड़ से भी ज्यादा रकम का वितरण शेष है. मुआवजे के लिए फर्जीवाड़ा किए जाने की भनक लगने के बाद जिला कलेक्टर आर संगीता ने मामले की छानबीन के आदेश दे दिए हैं. लेकिन अभी तक यह साफ नहीं है कि बाकी रकम असली प्रभावितों को मिल पाएगी या नहीं.

कटघरे में शिवराज

मध्य प्रदेश में इस साल हो रहे विधानसभा चुनाव में जीत की हैट्रिक बनाने के लिए भाजपा मुख्यमंत्री चौहान की छवि को लेकर मैदान में उतरने जा रही है. किंतु गेमन इंडिया लिमिटेड कंपनी (मुंबई) को राजधानी भोपाल के बीचोबीच आवंटित 15 एकड़ सरकारी जमीन चौहान के लिए गले की हड्डी बन सकती है. आरोप है कि जमीन का यह आवंटन एक ऐसा महाघोटाला है जिसमें राज्य के कई मंत्रियों और आला अधिकारियों ने चुपचाप और बड़ी चालाकी से एक नहीं दर्जनों नियम तोड़े और कई सौ करोड़ रुपये की इस अमानत को कौडि़यों के भाव बेच दिया. किंतु इसी कड़ी में अब जो नए दस्तावेज आए हैं उनमें मुख्यमंत्री कार्यालय की भूमिका साफ दिखाई दे रही है. बहरहाल इस मामले की एक याचिका हाई कोर्ट में लंबित है, लिहाजा चौहान की उम्मीद और नाउम्मीदी का फैसला अब न्यायालय की चौखट पर ही तय होने वाला है.

यह मामला 2005 में राज्य की भाजपा सरकार की उस पुनर्घनत्वीकरण (रिडेंसीफिकेशन) नाम की योजना से जुड़ा है जिसका मकसद भोपाल के मुख्य बाजार इलाके, दक्षिण टीटी नगर की सरकारी कॉलोनी तोड़कर इसे नए सिरे से बसाना था. इसी के चलते सरकार ने पहले तो यहां के सरकारी मकानों और एक स्कूल को तोड़कर जमीन को खाली कराया. फिर 17 अप्रैल, 2008 को यह बेशकीमती जमीन गेमन कंपनी को 337 करोड़ रुपये में बेच दी. मगर इस पूरे सौदे में जिस तरीके से कंपनी के पक्ष में नीलामी करने, औने-पौने दाम पर कंपनी को जमीन बेचने, लीज रेंट माफ करने,  फ्री-होल्ड (जमीन का


मालिकाना हक) देने और उसे वापस लेने के अलावा कंपनी को विशेष रियायत देने जैसी कई अनियमितताएं सामने आईं उससे सरकार की नीयत पर ही सवाल खड़े हो गए. राज्य सरकार की इन्हीं अनियमितताओं को लेकर एडवोकेट देवेंद्र प्रकाश मिश्र ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका लगाई है. मिश्र के मुताबिक इस योजना की आड़ में राज्य सरकार के नुमाइंदों ने मामला कुछ ऐसा जमाया कि हजारों करोड़ रुपये का लाभ कंपनी के पाले में जाए और उससे होने वाला घाटा शासन की झोली में. इस सौदे में कंपनी के लिए जो लीज रेंट माफ किया गया है उससे उसे तकरीबन 5 हजार 276 करोड़ रुपये का लाभ होगा. याचिका में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके काबीना मंत्रियों (बाबूलाल गौर, जयंत मलैया और राजेंद्र शुक्ल आदि) पर आरोप है कि उन्होंने निजी कंपनी को उपकृत करने के लिए अधिकारियों पर दबाव बनाया और सारे नियमों को ताक पर रखकर जमीन के एक बड़े घोटाले को अंजाम दिया.

क्यों मुख्यमंत्री सवालों के घेरे में हैं.

पुनर्घनत्वीकरण की एक ऐसी ही योजना के तहत ग्वालियर (थाटीपुर) में भी काम किया जाना था. किंतु ग्वालियर में छह साल बीत जाने के बाद भी जहां यह प्रक्रिया शुरू नहीं की गई वहीं भोपाल में सरकार ने गेमन की तमाम अड़चनों को महज 24 घंटे में दूर कर दिया. 17 अप्रैल, 2008 का दिन राज्य के लिए मिसाल है जब 337 करोड़ रुपये की यह प्रक्रिया मुंबई (कंपनी कार्यालय) से भोपाल (कई सरकारी विभाग) तक बेरोकटोक अपने मुकाम पर पहुंच गई. और इसी दिन गेमन ने दीपमाला इन्फ्रास्ट्रक्चर को योजना की सहायक कंपनी बनाते हुए सरकार के साथ एक त्रिपक्षीय समझौता किया और योजना का सारा काम दीपमाला कंपनी को सौंप दिया. तहलका को मिले कागजात में दीपमाला कंपनी द्वारा सीधे मुख्यमंत्री को लिखे गए पत्र और उसके बाद कंपनी के पक्ष में आधिकारिक तौर पर अधीनस्थ विभागों को जारी किए गए निर्देश बताते हैं कि मुख्यमंत्री कार्यालय ने दीपमाला कंपनी को किस हद तक तरजीह दी है. इस कड़ी में 27 अप्रैल, 2008 का वह पत्र भी है जिसमें दीपमाला कंपनी के प्रबंधकों की मुख्यमंत्री से हुई पुरानी मुलाकात का हवाला देते हुए उनसे यह अपेक्षा की गई है कि वे हस्तक्षेप करके इस काम के लिए आधिकारिक अनुमतियां दिलवाएं. इसी पत्र में आधिकारिक तौर पर एक टीप लिखी गई है जिसमें ठीक एक दिन बाद यानी 29 अप्रैल, 2008 को मुख्यमंत्री की बैठक की सूचना देते हुए अधीनस्थ विभागों के आला अधिकारियों को हाजिर रहने का आदेश दिया गया है. और इस तारीख से एक महीने के भीतर दीपमाला कंपनी को कई आवश्यक अनुमतियां मिल जाती हैं.

वहीं 27 सितंबर, 2008 की नोटशीट मुख्यमंत्री कार्यालय की कार्यशैली पर ही प्रश्नचिह्न लगा देती है. इस योजना की नोडल एजेंसी आवास एवं पर्यावरण विभाग को जारी इस नोटशीट पर लिखा है- ‘नोटशीट की प्रतिलिपि करा लें और प्रकरणों में लगा लें. पुनः कोई कार्रवाई आवश्यक हो तो की जाए.’  जानकारों की राय में यह एक ऐसी नोटशीट है जो जरूरत पड़ने पर कहीं भी उपयोग में लाई जा सकती है. जांच का विषय यह है कि यह नोटशीट अब तक किन-किन प्रकरणों में लगाई जा चुकी है.

इसी की अगली कड़ी में इस योजना की पर्यवेक्षक एजेंसी मप्र हाउसिंग बोर्ड द्वारा 2 फरवरी, 2009 को जारी की गई एक नोटशीट है जिसमें उसने मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा भेजी

गई सौ दिन की कार्य योजना और इस संबंध में बताए गए दिशानिर्देशों का जिक्र किया है. हम साथ ही यह भी बताते चलें कि इस मामले में मुख्यमंत्री की दिलचस्पी केवल पत्रों तक सीमित नहीं रही बल्कि उन्होंने कई बार आधिकारिक और अनाधिकारिक तौर पर निर्माण-स्थल का निरीक्षण करके यह जताने की कोशिश भी की है कि योजना सरकारी है. मगर जब तहलका ने दीपमाला कंपनी के महाप्रबंधक रमेश शाह से बातचीत की तो उन्होंने बताया, ‘यह योजना प्राइवेट है और इससे होने वाले लाभ में सरकार की कोई हिस्सेदारी नहीं है.’

मेहरबानियों का सिलसिला
गौरतलब है कि इस आवंटन में हुए गोलमोल की पोल खुलने की शुरुआत बीते साल जून में तब हुई जब सरकार ने कंपनी के पक्ष में जमीन फ्री-होल्ड (मालिकाना हक) कर दी. हालांकि विधानसभा के शीतकालीन सत्र में संसदीय मंत्री नरोत्तम मिश्र का कहना था कि सरकार ने जमीन फ्री-होल्ड नहीं की है, मगर इस बीच जब मामला हाई कोर्ट में  पहुंचा तो सरकार ने 2 नवंबर, 2012 का अपना फैसला वापस ले लिया. सरकार के इस कदम ने जहां खुद ही सिद्ध कर दिया कि वह गलत थी वहीं यह पूरा सौदा ही संदेहास्पद हो गया.

कहा जा रहा है कि कंपनी को लाभ पहुंचाने की भूमिका काफी पहले बना ली गई थी. इसके लिए सरकार ने शहरी इलाके को बेहतर ढंग से बसाने के लिए 2003 में बनाई गई गाइडलाइन को जिस तरह से बदला है उससे सरकार को 5 हजार 250 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ सकता है. पुरानी गाइडलाइन में साफ लिखा था कि जब तक कंपनी निर्माण पूरा नहीं करती तब तक उससे हर साल लीज रेंट लिया जाएगा. मगर 2005 की गाइडलाइन में कंपनी की पक्ष में लीज रेंट माफ कर दिया गया. भारतीय स्टांप की धारा 33 के मुताबिक हर लीज डील में व्यावसायिक उपयोग पर साढ़े सात प्रतिशत और आवासीय उपयोग पर पांच प्रतिशत सालाना लीज रेंट लिया जाना चाहिए. याचिकाकर्ता के मुताबिक इस योजना में कंपनी को यह जमीन तीस साल के लिए लीज पर दी गई है और उसकी प्रीमियम राशि 335 करोड़ रुपये है. इस हिसाब से राज्य को कंपनी से हर साल 25.12 करोड़ रुपये मिलते.

यानी तीस साल में जनता के खजाने में 753 करोड़ रुपये आते. मगर योजना में लीज रेंट नहीं रखने से यह पैसा कंपनी के खाते में जाएगा. वहीं राजस्व के ही नियमों के मुताबिक तीस साल बाद जब लीज का नवीनीकरण किया जाता तो लीज रेंट छह गुना बढ़ जाता और अगले तीस साल तक राज्य को सालाना 150 करोड़ रुपये मिलते. मगर इस पूरी योजना के लिए किए गए अनुबंध में नवीनीकरण करने के बाद भी लीज रेंट शून्य ही रखा गया, लिहाजा यहां भी जनता के खजाने को 4 हजार 522 करोड़ रुपये का चूना लगेगा.  दूसरी तरफ पुरानी गाइडलाइन में तोड़े जाने वाले मकानों को उसी स्थान पर बनाने की बात भी थी. मगर नई गाइडलाइन में पर्यावरण और यातायात के नजरिये से उक्त मकानों को यहां बनाना अनुचित बताया गया. सवाल है कि यदि रहवास के लिए यह स्थान अनुचित है तो दीपमाला कंपनी को रहवासी परिसर बनाने की मंजूरी क्यों दी गई है.

नीलामी के दौरान सरकार द्वारा पारदर्शिता न बरतते हुए जिस तरह से गेमन की तरफदारी की गई उसके चलते नीलामी  की प्रक्रिया भी विवादों के घेरे में है. मई, 2007 में जब नीलामी का विज्ञापन प्रकाशित किया गया तब 28 कंपनियों ने आवेदन दिए. सरकार ने 17 कंपनियों को इस योजना के योग्य मानते हुए उनसे जमीन की प्रस्तावित कीमत मांगी. सरकार का दावा है कि 17 कंपनियों में से केवल गेमन ने ही अंतिम तारीख यानी 30 नवंबर, 2007 तक 337 करोड़ रुपये की प्रस्तावित कीमत भेजी थी. जबकि याचिकाकर्ता का दावा है कि उनके पास रिलायंस इनर्जी प्राइवेट लिमिटेड द्वारा 23 नवंबर, 2007 को शासन को लिखा वह पत्र है जिसमें रिलायंस ने अंतिम तारीख बढ़ाने की मांग की थी. मगर सरकार ने इसमें कोई रुचि न लेते हुए गेमन के साथ करार किया. नई गाइडलाइन में यह साफ लिखा है कि अच्छी बोली की संभावना होने पर नीलामी दोबारा की जा सकती है. सवाल है कि सरकार ने गेमन के साथ करार करने में इतनी हड़बड़ी क्यों की. विशेषज्ञों का मानना है कि नीलामी में गेमन के ब्रांड की बड़ी भूमिका थी. किंतु गेमन को आगे करके बाद में जिस दीपमाला कंपनी को सारा काम सौंप दिया गया वह इस योजना के योग्य नहीं है. रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी (मुंबई) के मुताबिक इस योजना में दीपमाला की खुद की पूंजी सिर्फ एक लाख रूपये है.

Gammon

नीलामी के दौरान सरकार द्वारा पारदर्शिता न बरतते हुए जिस तरह से गेमन की तरफदारी की गई उसके चलते नीलामी  की प्रक्रिया भी विवादों के घेरे में है. मई, 2007 में जब नीलामी का विज्ञापन प्रकाशित किया गया तब 28 कंपनियों ने आवेदन दिएगेमन को सस्ते में जमीन देने का मामला भी सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है. ऐसा इसलिए भी कि उसने यह जमीन उसकी वास्तविक कीमत से काफी कम में बेची. दरअसल जब एक आम आदमी लीज डीड (रजिस्ट्रेशन) में देरी करता है तो उस पर तत्काल अधिभार लगा दिया जाता है मगर दीपमाला कंपनी ने 22 सिंतबर, 2011 यानी जमीन का सौदा होने के तीन साल बाद लीज डीड की. इस समय तक कलेक्टर की गाइडलाइन के मुताबिक जमीन 747 करोड़ रुपये की हो चुकी थी. मगर कंपनी ने 335 करोड़ रुपये ही जमा किए. इस पर भी उसने 335 करोड़ रुपये तीन साल और तीन किश्तों में चुकाए.

इसके लिए सरकार ने उससे न अतिरिक्त ब्याज की मांग की और न ही कंपनी ने यह ब्याज दिया. वहीं इस पूरे प्रकरण का दिलचस्प पहलू यह है कि इन विवादों के बावजूद सरकार द्वारा दीपमाला कंपनी पर की जा रही मेहरबानियों का सिलसिला है कि थमने का नाम नहीं लेता. इसी कड़ी में कंपनी ने नगर निगम को नर्मदा उपकर (पेयजल टैक्स) के रूप में 3.41 करोड़ रुपये की जगह 1.41 करोड़ रुपये जमा किए.

इस संबंध में तत्कालीन नगर निगम आयुक्त रजनीश श्रीवास्तव ने 13 दिसंबर को जब इस कंपनी को नोटिस थमाते हुए बकाया रकम जमा करने को कहा तो मामला तूल पकड़ गया. हालांकि बाद में दीपमाला कंपनी ने नर्मदा उपकर जमा किया लेकिन इसी के साथ श्रीवास्तव को उनके पद से हटा दिया गया. ऐसा ही एक और वाकया है जिसमें सरकार ने कंपनी के साथ मिलकर यहां के सैकड़ों पेड़ों को उखाड़कर कहीं दूसरी जगह स्थापित करने की अनोखी योजना बनाई थी. किंतु उनकी यह अनूठी और विचित्र योजना परवान नहीं चढ़ सकी और सारे पेड़ों को रातोंरात काट दिया गया.

तहलका ने इस बारे में जब मुख्यमंत्री चौहान से बात करनी चाही तो उनके निजी स्टाफ ने कोई रुचि नहीं दिखाई. वहीं राज्य की भाजपा सरकार ने गेमन मुद्दे को चुनावी हथकंडा बताते हुए हाई कोर्ट में इस प्रकरण से चौहान का नाम हटाने की गुहार लगाई है. दूसरी तरफ चौहान को पटखनी देने के लिए मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के हाथ एक बड़ा मुद्दा तो लगा लेकिन उसने भी इस मुद्दे पर विधानसभा में साधारण से सवाल पूछकर पल्ला झाड़ लिया. दरअसल इन दिनों राज्य में होने वाले बड़े घोटालों पर दोनों पार्टी के नेताओं ने एक-दूसरे को छेड़ना बंद-सा कर दिया है. इस बारे में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह से बात करने पर उन्होंने कहा, ‘हमारे पास इसके पुख्ता सबूत हैं कि गेमन घोटाले में सीएम का सीधा हाथ है. पर यह बात हम आपको क्यों बताएं? सही मंच और सही समय पर बताएंगे.’ मध्य प्रदेश में विधानसभा का चुनाव सिर पर है लेकिन कांग्रेस का सही समय पता नहीं कब आएगा?

‘अफसोस है कि मुसलमान इस्लाम से बहुत दूर होते जा रहे हैं’

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क्या इस्लाम की छवि एक कट्टरपंथी धर्म की बनती जा रही है जिसमें आधुनिकता और सुधारों के लिए कोई जगह नहीं ?

मै सबसे पहले इस बातचीत के माध्यम से सभी लोगों से ये कह देना चाहता हूं कि क़पया वे इस्लाम को मुसलमानों के कामों से और उनकी बातों से न समझें. बहुत अफसोस की बात है कि मुसलमान इस्लाम से बहुत दूर होते जा रहे हैं. मै इस्लाम के बारे में जो भी बात करूंगा वो कुरआन और हदीस के आधार पर करूंगा. इस्लाम समाज में सुधार के लिए ही आया था, फिर ये कैसे हो सकता है कि उसमें सुधार की गुंजाइश न हो. सुधार तो हमेशा जारी रहता है और रहना चाहिए. समय आगे बढ़ता है और इसके अनुसार रीफार्म भी होता रहता है. इस्लाम में सुधार के लिए ही शरीयत में इज्तेहाद की प्रक्रिया मौजूद है. इज्तेहाद के माने ही हैं री एप्लीकेशन ऑफ शरिया. शरीयत के बारे में भी लोगों में बहुत सी ग़लतफहमियां हैं. इस्लामी शरीयत पूरी तरह व्यवस्थित है. और दो बुनियादी उसूलों पर निर्भर है. शरीयत में रीज़निंग के खिलाफ कोई बात नहीं रखी जा सकती. अगर कोई बात हमको रीज़निंग के खिलाफ दिखाई देती है तो उसे हमें शरीयत से निकाल फेंकने का अधिकार है, उस पर बहस करने का अधिकार है. इस्लाम आस्था पर नहीं, विश्वास पर आधारित है. विश्वास रीज़निंग (तर्क) के बाद ही आता है. दूसरा बुनियादी उसूल ये है कि शरीयत में अन्याय के लिए कोई जगह नहीं है. याने इस्लाम में सिर्फ मुसलमान ही नहीं बल्कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ अन्याय नहीं किया जा सकता. तो एक ऐसा धर्म जिसकी बुनियाद ही रीज़निंग और न्याय पर है, मुसलमानों का रवैया उससे बिल्कुल अलग जा पड़ा है. इसका हमें बहुत खेद है इसीलिए मै कहता हूं कि इस्लाम को कुरआन और हदीस की बुनियाद पर ही जाना जाए. किसी मुसलमान के कामों के आधार पर नहीं.

विज्ञान और तकनीक से भी इस्लाम का टकराव आए दिन होता रहता है. इनको भी कई मुसलमान गैर-इस्लामी मानते हैं. ऐसी सोच बन गई है कि इस्लाम विज्ञान और तकनीक को तरक्की को अंगीकृत नहीं कर पाता  ?

ऐसा उन मुसलमानों की वजह से हुआ है जो शरीयत को बिना समझे शरीयत के बारे में बात करना शुरू कर देते हैं. बिना इस्लाम को जाने किसी चीज़ को गैर-इस्लामी करार दे देते हैं. अफसोस कि ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है. लेकिन इनमें से ज्यादातर लोगों को अज्ञानतावश सही तथ्य नहीं मालूम. किसी भी काम को करने का अगर साधन बदल जाए तो वह काम या साधन गैर इस्लामी कतई नहीं होता. इस्लाम ज़माने के आगे बढ़ने के साथ तकनीक और साधनों के बदलाव को स्वीकार करता है. क्योंकि विज्ञान और तकनीक से गुरेज़ करके तरक्की कैसे होगी ? अफसोस कि ज्यादातर मदरसों में भी ये चीज़ें नहीं सिखाईं पढ़ाईं जा रहीं. वहां भी एक दूसरे के खिलाफ नफरतें ही पढ़ाई जाती हैं. ज्यादातर मदरसों का अप्रोच ठीक नहीं है.उसमें आधुनिकता नाम की कोई चीज़ नहीं है. मदरसों को अपनी अप्रोच पूरी तरह बदलनी होगी.

परिवार नियोजन के बारे में मुसलमानों की एक बड़ी आबादी में कई पूर्वाग्रह हैं, आप इसको किस तरह देखते हैं ?

इस्लाम में परिवार नियोजन की अनुमति नहीं, ये बहुत बड़ा भ्रम है जिसका सर्वाधिक नुकसान खुद मुसलमानों को ही उठाना पड़ता है. अस्ल में इस्लाम में गर्भपात (एबॉर्शन) करवाने के लिए सख्ती से मनाही है. कुरआन में आया है कि मुफलिसी के डर से अपने बच्चे का कत्ल न करो. जब तक गर्भ में जान ही नहीं आई, वो बच्चा बना ही नहीं तो परिवार नियोजन करने से उसका कत्ल कैसे हो सकता है. इस्लाम में ये भी आता है कि विवाह अपने से अच्छी संतान छोड़कर जाने के लिए किया जाता है न कि अपने से ज्यादा संतान छोड़ कर जाने के लिए. एक ही बच्चा हो लेकिन हीरा हो. इस्लाम में क्वांटिटी पर नहीं क्वालिटी पर ज़ोर है. ईरान ने परिवार नियोजन के ज़रिए ही अपनी आबादी में वृद्धि को एकदम नियंत्रित कर दिया है. अगर इस्लाम में परिवार नियोजन की अनुमति न होती तो ईरान जैसे देश में ये कैसे हो पाता ?

मुस्लिम संगठनों और धर्मगुरूओं के द्वारा जिस तरह फिल्म और साहित्य का विरोध किया जाता है उसके बाद इस्लाम में अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए कितनी गुंजाइश बचती है ?

देखिए अगर आपका इशारा सलमान रूश्दी सेटनिक वर्सेज़ की तरफ है तो मै आपको बता दूं बहुत पहले जब मैं लंदन में था तो मैने खुद वो किताब पढ़ने की कोशिश की थी लेकिन उस किताब की भाषा इतनी अभद्र और आपत्ति जनक है कि वह मुझसे नहीं पढ़ी गई. इस किताब में उन पैगम्बरों के बारे में भी इतनी घटिया गालियों के साथ बातें की गईं हैं जो कि इस्लाम ही नहीं दूसरे धर्मों के लिए भी सम्माननीय हैं. ऐसे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस हरकत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.  अभिव्यक्ति की आज़ादी ज़रूरी चीज़ है और देश का संविधान और इस्लाम दोनों इसे मानते हैं. लेकिन ये बात भी याद रखने लायक है कि आपकी स्वतंत्रता तब तक जायज है जब तक दूसरों की स्वतंत्रता में व्यवधान न पड़े. अपनी आज़ादी के नाम पर आप मेरी नाक नहीं तोड़ सकते. आप किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं का इस तरह अपमान नहीं कर सकते.

अगर किसी चीज़ पर आपको ऐतराज़ है तो उसका विरोध करने के लोकतांत्रिक तरीके हैं, अगर आपको लगता है कि किसी ने कोई अपराध किया है तो आप उसे सजा दिलाने के लिए न्यायपालिका की शरण में जा सकते हैं. लेखक को मार डालने का फतवा जारी कर देना अथवा जान लेने पर उतारू हो जाना कहां तक उचित है ?

यहां मै आपसे सहमत हूं. सही तरीका यही है कि अगर किसी से शिकायत है तो उसके खिलाफ कोर्ट में जाकर न्याय के लिए लड़ाई लड़नी चाहिए न कि खुद ही उसे मार डालने पर आमादा हो जाना चाहिए. सज़ा कोर्ट देगी. मुझे या आपको अधिकार नहीं है सजा देने का. इस तरीके का विरोध भी इस्लाम के बारे में लोगों को ग़लत धारणा बनाने पर मजबूर करता है. पैगम्बर मुहम्मद साहब तो सिर्फ अपने विरोधियों को ही नहीं बल्कि उन लोगों को भी माफ कर दिया करते थे जो उन्हे गालियां देते थे. ऐसी कई मिसालें हमें मिलती हैं.

इस्लाम में कई फिरके और विचारधाराएं हैं, और सभी अपने आप को ही सही बताते हैं. अक्सर वैचारिक मतभेद खूनी संघर्ष में बदल जाता है, ऐसे में किसको सही और किसको ग़लत माना जाए ?

मैने आपको बताया कि इस्लाम के दो बुनियादी उसूल हैं. रीज़निंग के खिलाफ कुछ भी स्वीकार्य नहीं और न्याय के खिलाफ कुछ भी स्वीकार्य नहीं. जो भी फिरका इस पर अमल कर रहा हो, वही सही है. रही बात खून खराबे की तो जो लोग ये कर रहे हैं वे मुसलमान बिल्कुल नहीं हैं. तालिबान जो कुछ कर रहे हैं, वे अपराधी हैं मुसलमान नहीं. इस्लाम में या तो आप मुसलमान हो सकते हैं या क्रिमिनल हो सकते हैं. दोनो एक साथ नहीं हो सकते.

आप जो कह रहे हैं वे आदर्शवादी बाते हैं, लेकिन हो तो इसका उल्टा ही रहा है ?

मैने आपसे इंटरव्यू की शुरूआत में सबसे पहली बात ही ये कही थी कि मुसलमान इस्लाम से बहुत दूर हो गया है. कृपया उसकी बातों और कामों से इस्लाम को न जानें. मै वही बातें कर रहा हूं जो कुरआन और हदीस में हैं. लेकिन अफसोस कि मुसलमान इन्हे जानते समझते नहीं.

आपने कहा कि मुसलमान इस्लाम से बहुत दूर आ पड़ा है, ऐसा क्यों हो रहा है ?

हमारे यहां मौलवियों ने आम मुसलमानों के सामने इस्लाम की एक बिल्कुल ग़लत तस्वीर रखी है. ये जाहिल लोग हैं, इस्लाम जानते ही नहीं. साथ ही ज्यादातर मौलवी खुद ही बहुत तंगनज़र हैं. बहुत कम ही मौलवी हैं जो विज़नरी हैं. इसीलिए कई बार मै गुस्सा होकर अपने स्टूडेंट्स से कह देता हूं अगर आगे बढ़ना है तो मुफ्ती से मुक्ति पाओ. धर्म अपने आप में अमृत है लेकिन जब उसमें जहालत (अज्ञान) और सियासत जैसी चीज़ें घुल जाती हैं तो वह ज़हर बन जाता है. हमारे यहां धर्म में बहुत पहले ही ये चीज़ें आ चुकी हैं. मुसलमानों को चाहिए कि वे इल्म हासिल करें और दुनिया में अपना मुकाम हासिल करें. साथ ही किसी भ्रम की स्थिति में दूसरों के बहकावे में आने के बजाए अपनी अक्ल पर भरोसा करें.

सूर्यनेल्ली बलात्कार कांड

क्या है मामला?

केरल में इदुक्की जिले के सूर्यनेल्ली गांव की रहने वाली एक 16 वर्षिया छात्रा को एक बस कंडक्टर ने ब्लैकमेल करके अपने साथ घूमने जाने पर मजबूर किया. यह 1996 की बात है. फिर 16 से 26 फरवरी तक करीब 40 दिन के दौरान उसके साथ 42 लोगों ने बार-बार बलात्कार किया. आरोपितों ने उसे करीब 4,000 किलोमीटर तक घुमाया. वह विरोध न कर सके, इसके लिए उसे जबरन शराब पिलाई गई और नशे की दवाएं दी गईं. 26 फरवरी को आरोपितों ने उसे घर जाने वाली बस में बिठा दिया.

मामले की सुनवाई में क्या हुआ?
इस मामले में सुनवाई के बाद छह सितंबर, 2000 को विशेष न्यायालय ने 36 लोगों को दंडित किया. हालांकि 2005 में उच्च न्यायालय ने इनमें से 35 लोगों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि मामले में लड़की की सहमति थी क्योंकि उसकी ओर से प्रतिरोध का कोई संकेत नहीं मिला. केवल एक आरोपित एडवोकेट एसएस धर्मराजन की सजा बरकरार रखी गई. हालांकि इस समय वह जमानत पर रिहा होने के बाद फरार है.

राज्य सभा के उपसभापति पीजे कुरियन का मामले से क्या संबंध है और इन दिनों यह मामला क्यों चर्चा में है?
पीड़िता ने कुरियन की तस्वीर पहचान कर कहा कि 19 फरवरी, 1996 को उन्होंने भी एक गेस्ट हाउस में उसका बलात्कार किया था. पुलिस ने जांच में कहा कि कुरियन उस वक्त गेस्ट हाउस में नहीं थे. बाद में चार गवाहों ने उनके वहां होने की पुष्टि की. कांग्रेस नेता कुरियन उच्च न्यायालय में जाकर निचली अदालत की जांच बंद करवाने में कामयाब रहे. 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी उन्हें राहत दे दी. बीती 31 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के रिहाई के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि कोई भी लड़की इतने लोगों के साथ संबंध के लिए सहमति कैसे दे सकती है. उसने उच्च न्यायालय से छह माह के भीतर दोबारा फैसला सुनाने को कहा है. इस बीच मामले के एकमात्र दोषी धर्मराजन ने भी कहा है कि कुरियन उसकी कार में गेस्ट हाउस गए थे. उसने यह भी कहा है कि मुख्य जांचकर्ता ने उस पर दबाव डाला था कि वह कुरियन का नाम न ले.
– पूजा सिंह

ताजपोशी के पीछे

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उत्तराखंड में भाजपा अध्यक्ष पद पर तीरथ सिंह रावत का मनोनयन उतना ही अप्रत्याशित रहा जितना राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में दोबारा नितिन गडकरी की ताजपोशी की तैयारियों के बावजूद राजनाथ सिंह का पार्टी अध्यक्ष बनना. इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी साबित किया कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता.

गडकरी की अध्यक्षता के अंतिम दिनों के दौरान उत्तराखंड में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव का नाटक रचने के साथ-साथ उसका पटाक्षेप भी कर दिया गया था. अध्यक्ष पद के लिए विधायक तीरथ सिंह रावत और और पूर्व मंत्री त्रिवेंद्र रावत ने नामांकन किया था. तीरथ सिंह को पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी और रमेश पोखरियाल निशंकके अलावा पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल का खुला समर्थन था तो अंतिम क्षणों में नामांकन करने वाले त्रिवेंद्र रावत पर पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी का वरदहस्त था.

अध्यक्ष पद के लिए होने वाले संभावित मतदान में 74 मतदाता थे. तीरथ सिंह ने नामांकन के पांच सेट भरे थे. हर सेट में 10 मतदाताओं के हस्ताक्षर होते हैं. इस लिहाज से 50 मतदाताओं का उनके साथ होना लगभग तय था. यानी चुनाव होने की स्थिति में नतीजा उनके पक्ष में आना निश्चित था. त्रिवेंद्र रावत नामांकन के लिए अंतिम क्षणों में सामने आए थे. बताते हैं कि नामांकन तक आम सहमति न बनने पर कोश्यारी खेमा तीरथ के लिए मैदान खाली छोड़ना नहीं चाहता था. पर्यवेक्षक के रूप में वरिष्ठ नेता विजय गोयल देहरादून आए थे. आलाकमान की इच्छा थी कि सर्वसम्मति से किसी और को अध्यक्ष बनाया जाए. सूत्र बताते हैं कि जनवरी के आखिर तक पार्टी का कोर ग्रुप पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को पार्टी अध्यक्ष बनाना चाहता था.

आलाकमान, प्रत्याशियों और उनके राजनीतिक गुरुओं के बीच कई दौर की वार्ताएं हुईं. इस बीच नाम वापसी का समय भी बीत गया और पर्यवेक्षक गोयल की बीमारी का बहाना बनाकर नाम वापसी की समयसीमा बढ़ा दी गई. सूत्रों के मुताबिक मान-मनौवल और आलाकमान की घुड़की के बाद दोनों प्रत्याशियों ने नाम वापस ले लिया. फिर लगभग तय हो गया था कि उत्तराखंड भाजपा के अगले अध्यक्ष की पारी भगत सिंह कोश्यारी खेलेंगे क्योंकि दिल्ली में भाजपा की कोर कमेटी उन पर मुहर लगा चुकी थी. हालांकि चतुर कोश्यारी ने चुनाव के दौरान और उसके बाद कभी भी प्रदेश अध्यक्ष बनने की इच्छा खुलकर जाहिर नहीं की थी, लेकिन उनके एक सहयोगी के शब्दों में वे इस पद के लिए चुनाव लड़ने के बजाय सर्वानुमति के रूप में आना चाहते थे.

इस बीच गडकरी के बदले राजनाथ सिंह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हो गए. कोश्यारी को राजनाथ का समर्थक माना जाता है. लेकिन बदली परिस्थितियों में भी तीरथ को समर्थन दे रही खंडूड़ी, निशंक और चुफाल की तिकड़ी ने हार नहीं मानी. सूत्रों के मुताबिक दिल्ली में आलाकमान के सामने शक्ति प्रदर्शन का दौर चला. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष चुफाल कहते हैं, ‘जीत लोकतंत्र की हुई और अधिक मतदाताओं के समर्थन वाले तीरथ को आलाकमान ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनोनीत कर दिया.

इस चुनाव में भाजपा के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के अक्सर बनने वाले गठबंधन ने फिर नया रूप ले लिया. कोश्यारी, खंडूड़ी और निशंक अपनी राजनीतिक मजबूरियों और नफे-नुकसान के हिसाब से कई बार गठबंधन बना चुके हैं. कई मौकों पर इन तीनों में से कोई दो हाथ मिलाकर तीसरे को धराशायी कर चुके हैं. पिछले विधानसभा चुनावों में कोश्यारी और खंडूड़ी एक हो गए थे. लाख कोशिशों के बावजूद तब राजनीतिक रूप से निस्तेज से हो चुके निशंक अपने इक्का-दुक्का समर्थकों को ही टिकट दिला पाए थे. उनके प्रभाव वाले गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र में कोश्यारी की मदद से खंडूड़ी ने सारे टिकट बांटे थे. चुनाव के नतीजे आने और खंडूड़ी के चुनाव हारने पर भितरघात के आरोप में भाजपा से जिन कई नेताओं का निष्कासन किया गया उनमें भी निशंक समर्थक अधिक थे. लेकिन चुनाव के बाद एक-दूसरे को फूटी आंख से न देखने वाले निशंक और खंडूड़ी पिछले सारे राग-द्वेष  भुलाकर कोश्यारी के खिलाफ एक हो गए.

जल्द ही राज्य में नगर पालिकाओं और उसके बाद पंचायत चुनाव होने हैं. मौजूदा हालात देखें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा बढ़त में दिख रही है, इसलिए हर खेमा अपने अंक बढ़ाना चाहता है. जानकार बताते हैं कि वैसे इन तीनों क्षत्रपों का लक्ष्य 2017 का विधानसभा चुनाव है.

सारे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा राजनीतिक चतुराई निशंक ने दिखाई. राजनीतिक और पारिवारिक कारणों के चलते भाजपा में अलग-थलग दिख रहे निशंक फिर राजनीति के केंद्र में आ गए. पिछली बार खंडूड़ी को मुख्यमंत्री पद से हटाने का अभियान शुरू करने के बाद वे ऐन मौके पर खंडूड़ी से मिलकर उनकी ही मदद से सीएम बनने में सफल हो गए थे. जानकारों के मुताबिक 2017 तक काफी उम्रदराज हो चुके खंडूड़ी से अधिक भाजपा नेताओं को उनमें ही संभावना नजर आएगी.

मोर्वी बांध दुर्घटना

पूरे भारत में टाइल्स के कारोबार के लिए मशहूर मोर्वी शहर गुजरात के समृद्धतम शहरों में से है, लेकिन आज से तकरीबन 34 साल पहले इसने ऐसी आपदा का सामना किया था जब यह लगभग पूरी तरह तबाह हो गया था. अगस्त, 1979 की यह आपदा माच्छू बांध ढहने का नतीजा थी.

उस साल मॉनसून के दौरान पश्चिमी भारत में भारी बारिश हो रही थी. सौराष्ट्र (मोर्वी इसी हिस्से में है) के कुछ क्षेत्रों में हल्की बाढ़ की स्थिति थी और माच्छू बांध पानी से लबालब भर चुका था. सरकारी स्तर पर किसी को यह सूचना नहीं थी कि इस बांध के टूटने का खतरा है. इन हालात में अचानक इस चार किलोमीटर लंबे बांध का टूटना शहर के लिए अचानक आई भयावह आपदा की तरह साबित हुआ. कुछ घंटों के भीतर ही क्षेत्र की 15 से 20 हजार की आबादी (कुछ अनुमानों में इसे 25 हजार तक बताया गया है) काल के गाल में समा गई.  दुनिया में इसे अपनी तरह की सबसे विध्वंसकारी दुर्घटना की तरह दर्ज किया गया.

दुर्घटना की जांच के लिए बाद में राज्य सरकार ने एक आयोग भी बनाया. लेकिन इसे 18 महीने बाद भंग कर दिया गया. राज्य सरकार के इस फैसले की काफी आलोचना हुई. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना था कि आयोग की जांच में सिंचाई विभाग के  बड़े अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था. इस बात के पक्ष में उनके तर्क थे कि बांध निर्माण में तकनीकी गड़बड़ियां तो थी हीं साथ में अधिकारी पानी भराव और निकास के लिए जिस गणना पद्धति का उपयोग करते थे उसमें गलतियां थीं. भारी बारिश के दौरान यही गलतियां बांध टूटने का कारण बनीं. सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को भंग करने के सरकारी फैसले को सही ठहराया. इसके बाद कभी इस मामले की जांच नहीं हो पाई और आज तक इस घटना की जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकी है.

-पवन वर्मा

कुंभ: मोक्ष का महापर्व

कहने को तो यह बांस-बल्लियों और तंबुओं के सहारे बसाई हुई एक अस्थायी व्यवस्था है फिर भी इसके स्वभाव में एक स्थायीपन महसूस होता है. शायद ऐसा लोक के मानस में धर्म और उसके प्रतीकों की स्थायी जगह के चलते होता हो. कस्बाई संस्कृति और अत्याधुनिक तकनीक के मेल से बनी यह कुंभनगरी है जिसके फैलाव का दायरा कुछेक शहरों से भी बड़ा है. यहां डेढ़ माह के लिए बसने वाले लोगों की आबादी भी किसी शहर से ज्यादा है.  इसमें हर दिन पहुंच रहे श्रद्धालुओं के विशाल झुंडों को भी जोड़ दें तो यहां रोज एक लघु भारत आकार लेता है. तमाम दुश्वारियों के बावजूद हर रोज लाखों लोग इलाहाबाद में बसी इस नगरी में पहुंच रहे हैं. ये वे लोग हैं जिन्हें कंपकंपाती ठंड डराती नहीं. पूरी रात बालू पर सोन-जगने से इन्हें परहेज नहीं. इनकी बस एक ही आकांक्षा होती है कि गंगा, यमुना और अदृश्य हो चुकी सरस्वती के संगम में एक डुबकी लगा मोक्ष के अधिकारी बन जाएं. इस तरह देखा जाए तो आस्था की इस नगरी की जान श्रद्धालु ही हैं. वैसे यहां आकर्षण के दूसरे केंद्र भी कम नहीं. कदम कदम पर अजब-गजब नाम और धुन वाले बाबाओं का डेरा है. नंगे बदन पर भभूत लपेटे और धूनी जमाए बैठे नागा साधुओं के शिविरों में हर समय चहल-पहल रहती है. महाकुंभ में आने वाला हर व्यक्ति एक दफा उन्हें जरूर देखना चाहता है. महिला साधुओं के अलग खेमे और मठ ने इस धार्मिक आयोजन में एक नया अध्याय जोड़ा है. तस्वीरें और आलेखः विकास कुमार

रात के समय रोशनी में नहाया कुंभ परिसर

 

पहली बार नागा साधुओं के अखाड़े में महिलाओं को स्वतंत्र और अलग पहचान मिली है.

शाही स्नान के दिन महिला नागा साधुओं ने पुरूष नागा साधुओं के साथ ही संगम में स्नान किया

 

कुंभ आयोजन का जिम्मा मुख्य रूप से नागा साधुओं के हाथ में ही रहता है

 

शाही स्नान के दौरान हर अखाड़े की शोभा यात्रा निकलती है. इसे देखने के लिए श्रद्धालु बड़ी संख्या

में जुटते हैं और घंटों सड़क के दोनों किनारों पर खड़े रहते हैं.

 

श्रद्धालुओं द्वारा संगम में चढ़ाए गए सिक्कों को निकालने में कुछ लड़के जुटे रहते हैं.

दिन ढ़लने तक इनकी सौ से डेढ़ सौ रुपये की कमाई हो जाती है.

 

मजबूरी की सवारी ठेलागाड़ी

 

श्रद्धालु संगम के किनारे केवल महाकुंभ के दौरान जुटते हैं लेकिन ये प्रवासी पक्षी हर साल इस मौसम में यहां भारी संख्या में आते हैं

एक और फांसी

क्या राष्ट्रवादी भावनाओं के उभार में खबर के दूसरे पहलू दबाना जायज है?

आखिरकार संसद पर हमले का षड्यंत्र रचने के आरोप में अफजल गुरु को फांसी हो गई. न्यूज मीडिया को काफी दिनों से इसका इंतजार था.  वह इस फांसी के लिए खुलकर पैरवी भी कर रहा था. हालांकि सरकार ने एक बार फिर से बहुत गुपचुप तरीके से फांसी दी, लेकिन न्यूज मीडिया को कोई शिकायत नहीं है. आखिर फांसी की तारीख, दिन और समय तय करते हुए सरकार ने अपनी राजनीति के साथ-साथ  न्यूज चैनलों का पूरा ध्यान रखा. उसने फांसी के लिए शनिवार का दिन चुना जो खबरों के लिहाज से एक नीरस दिन (लीन डे) माना जाता है. इस दिन न्यूज चैनल खबरों और दर्शकों की तलाश में भटकते रहते हैं क्योंकि मनोरंजन चैनल हिट रीयलिटी शो से लेकर ब्लॉकबस्टर फिल्में दिखाकर सारे दर्शक उड़ा ले जाते हैं.

लेकिन ‘लोकतंत्र के मंदिर’ पर हमला करने वाले ‘देशद्रोही’ अफजल गुरु को फांसी पर लटकाकर सरकार ने चैनलों को शनिवार को सुबह-सुबह ऐसी ब्लाकबस्टर ‘खबर’ दे दी कि उनमें सबसे पहले इस खबर को ब्रेक करने का श्रेय लेने की होड़ मच गई. यह और बात है कि इन चैनलों को इसकी कोई भनक भी नहीं थी. चैनल इसकी भरपाई अति नाटकीय कवरेज से पूरा करते दिखे. आम तौर पर शनिवार को चैनलों पर नजर न आने वाले स्टार एंकर/संपादक सुबह से ही आंखें मीचते हुए चैनलों पर ‘राष्ट्रीय जनभावना’ के प्रकटीकरण में जुट गए.

फिर क्या था, देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भावनाएं स्टूडियो में उमड़ने लगीं. रिपोर्टरों की आवाज खुशी से थरथरा रही थी. लाइव रिपोर्टिंग करते रिपोर्टरों के अंदाज ऐसे थे कि आपके रोयें खड़े हो जाएं. हमेशा की तरह चैनलों पर उन सुरक्षाकर्मियों के परिवारजनों के इंटरव्यू चलने लगे जो संसद पर हुए हमले में मारे गए थे. ‘आज तक’ ने तो ऐसे सभी परिवारजनों को उनके संरक्षक मनिंदरजीत सिंह बिट्टा के साथ स्टूडियो बुला लिया, जहां उनके स्टार एंकर घंटे भर संसद हमले के दिन को याद करते हुए फांसी में हुई देरी पर बात करने से लेकर फांसी के बाद उनकी भावनाएं टटोलने में जुटे रहे.

हमेशा की तरह सभी चैनलों पर कांग्रेस और भाजपा के नेता ‘आतंकवाद से लड़ाई के मुद्दे पर एकजुटता’ और इस पर  ‘राजनीति न करने’  की कसमें खाते हुए और ‘तू-तू,मैं-मैं’ करते हुए खुलेआम राजनीति करते रहे. सच पूछिए तो यह राजनीति ही असल बात थी. लेकिन अफजल गुरु की फांसी की 24×7 कवरेज में उसी की सबसे कम चर्चा थी. सभी चैनलों और एकाध अपवादों को छोड़कर सभी अखबारों में इस फांसी के पीछे की राजनीति और उसके मायनों को खोलने की वैसी कोशिश नहीं की गई जिससे इस जटिल मामले के विभिन्न पहलू सामने आ सकें. कुछ चैनलों और अखबारों में सवाल उठाए गए लेकिन खानापूरी के अंदाज में.

आश्चर्य नहीं कि जिस कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताने में चैनल थकते नहीं हैं, अफजल गुरु को फांसी के बाद उस कश्मीर घाटी में कर्फ्यू और एसएमएस व संचार सेवाओं को ठप करने के केंद्र सरकार के एकतरफा फैसले पर चैनलों की भौंहें नहीं खींचीं. क्या यह सिर्फ संयोग था या फांसी की खबर की उत्तेजना में हुई एक चूक? जाहिर है कि यह सिर्फ संयोग नहीं था और न ही कोई चूक. यह बहुत सोचा-समझा फैसला था. क्या यह चूक भर थी कि अफजल गुरु को फांसी देने के बाद कश्मीर घाटी से बहुत दूर दिल्ली में कश्मीरी पत्रकार इफ्तिखार गिलानी को घर में नजरबंद कर दिया गया लेकिन यह खबर किसी चैनल की सुर्खी नहीं बनी?
क्या यह सिर्फ संयोग है या सोच-समझकर लिया गया संपादकीय फैसला कि अफजल गुरु के परिवारजनों की इन शिकायतों को कोई तवज्जो नहीं दी गई कि उन्हें पूर्व सूचना नहीं दी गई? ऐसे कई गंभीर सवाल हैं लेकिन हमेशा की तरह इस बार भी न्यूज मीडिया और चैनलों पर ‘राष्ट्रीय जनभावना’ के उभार में वे बेमानी हो गए या बना दिए गए.