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कांग्रेस के ‘छत्तीस’गढ़

चरणदास महंत और प्रिय दत्त नक्सलवादी हमले में मारे गए नेताओं की श्रद्धांजलि सभा में; फोटो-अशोक साहू
चरणदास महंत और प्रिय दत्त नक्सलवादी हमले में मारे गए नेताओं की श्रद्धांजलि सभा में; फोटो-अशोक साहू

छत्तीसगढ़ में 2008 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा, भूपेश बघेल, मोतीलाल वोरा के बेटे अरुण वोरा समेत कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता सत्यनारायण शर्मा अपनी-अपनी सीटें हार गए थे. ये राज्य के दिग्गज नेता थे. इनकी हार के साथ ही कांग्रेस में सिरफुटौव्वल मच गई. तमाम नेता एक-दूसरे पर भीतरघात का आरोप लगाने लगे. यह पार्टी में गुटबाजी के सतह पर आने का दौर था. वोरा गुट, जोगी गुट (अजीत जोगी), शुक्ल गुट (विद्याचरण शुक्ल) और महंत गुट (चरणदास महंत) खुलेआम एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे. इसके बाद तीन साल में कांग्रेस की हालत यह हो गई कि विपक्ष की भूमिका निभाना तो दूर कांग्रेस के नेता खुद एक-दूसरे पर सरकार से सांठ-गांठ का आरोप लगाने लगे. यहां तक कि कांग्रेस के पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र सिंह कर्मा को भाजपा की रमन सिंह सरकार का कैबिनेट मंत्री कहा जाने लगा. पार्टी की इसी हालत के बीच अप्रैल, 2011 में नंदकुमार पटेल को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. पटेल को राज्य में एक हद तक गुटनिरपेक्ष कांग्रेसी नेता माना जाता था. यही वजह रही कि अध्यक्ष बनने के बाद से कांग्रेस के धरने-प्रदर्शन सफल होने लगे. इसका पहला नजारा जून, 2011 में कांग्रेस की भ्रष्टाचार विरोधी महारैली में देखने को मिला जब रायपुर में तकरीबन 70-80 हजार लोगों की भीड़ जुट गई. इसे कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेताओं का समर्थन मिला और इसके साथ पार्टी में एकजुटता दिखाई देने लगी.

यह सिलसिला हाल की परिवर्तन यात्रा तक जारी रहा. लेकिन बीती मई इसी परिवर्तन यात्रा में नक्सलवादी हमले और नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा और विद्याचरण शुक्ल की हत्या के बाद कांग्रेस फिर 2008 की हालत में लौटती दिख रही है. इसी जून में चरणदास महंत के कार्यवाहक अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस में एक बार फिर गुटबाजी होने लगी है. इसकी वजह बताते हुए वरिष्ठ पत्रकार नारायण शर्मा कहते हैं, ‘चरणदास महंत की अपनी कोई मौलिक राजनीतिक शैली नहीं है. उनके बारे में विख्यात है कि वे दिग्विजय सिंह से संचालित होते रहे हैं. केंद्र में कृषि राज्य मंत्री बनने के बाद भी उनकी ऐसी कोई उपलब्धि नहीं दिखी जिसे रेखांकित किया जा सके. जहां तक संगठन का सवाल है तो उन्होंने अपने पूर्व के कार्यकाल में ही कभी यह साबित नहीं किया कि वे कार्यकर्ताओं को उत्साह से लबरेज करने के लिए कुछ कर सकते हैं. उनका और उनके समर्थकों का अधिकांश समय अजीत जोगी के शक्तिशाली खेमे से निपटने में ही जाया होता रहा है.’

महंत के बारे में नारायण की राय एक हद तक सही मालूम पड़ती है. बस्तर के कोंडागांव जिले में केशकाल नगर पंचायत के अध्यक्ष पद के लिए इसी जून में हुए चुनाव में इस बात के स्पष्ट संकेत मिले. इनमें पहले कांग्रेस ने अजीत जोगी के समर्थक अमीन मेमन की भाभी शाहिना मेमन को अपना प्रत्याशी बनाया था. लेकिन महंत के कार्यवाहक अध्यक्ष बनने के साथ ही शाहिदा के स्थान पर ममता चंद्राकर नाम की एक महिला को टिकट दे दिया गया. टिकट कटने से नाराज शाहिदा ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और वे चुनाव जीत गईं. इसके बाद से महंत गुट लगातार आरोप लगा रहा है कि यहां अजीत जोगी के समर्थकों ने कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ काम किया है. हारी हुई कांग्रेस प्रत्याशी तो आधिकारिक रूप से प्रदेश कांग्रेस कमेटी में इसकी शिकायत दर्ज करवा चुकी हैं.

गौरतलब है कि वर्ष 2003 में जोगी के सत्ता से हटने के बाद महंत को संगठन में कई मौके मिल चुके हैं. (राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि यह मौके उन्हें दिग्विजय सिंह के करीबी होने की वजह से हासिल होते रहे) कभी उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है, कभी कार्यवाहक तो कभी पूर्णकालिक. वर्ष 2006 और 2007 में वे पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाए गए थे लेकिन संगठन में उनकी निष्क्रियता को लेकर सवाल उठते ही उनसे अध्यक्ष पद की जवाबदारी वापस ले ली गई. इस बार जब चरणदास महंत को दोबारा प्रदेश राज्य कांग्रेस की कमान सौंपी गई तो छत्तीसगढ़ के राजनीतिक प्रेक्षकों के लिए यह चौंकाने वाली घटना थी. दरअसल इसके साथ ही कांग्रेस हाईकमान ने राज्य में पार्टी के सबसे प्रभावी नेता अजीत जोगी को एक तरह से किनारे कर दिया. और अब महंत और जोगी गुट आमने-सामने दिख रहे हैं. हालांकि महंत किसी तरह की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से इनकार करते हैं. संगठन में अपनी बार-बार की पदस्थापना को लेकर सफाई देते हुए वे बस इतना कहते हैं, ‘ मैं तो कांग्रेस का एक अदना-सा सिपाही हूं. संगठन जब-जब जिम्मेदारी सौंपता है, मैं उसका निर्वाह पूरी ईमानदारी के साथ करता हूं.’

दिग्विजय यहां भी
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को छत्तीसगढ़ में सीधे तौर पर कभी कोई जिम्मेदारी नहीं मिली. लेकिन राज्य कांग्रेस में उनकी दिलचस्पी और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव होने के नाते दखल हमेशा बना रहा है. सिंह पर कांग्रेस के सबसे पुराने और ताकतवर शुक्ल खेमे को तबाह करने का आरोप भी काफी पुराना है. प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक रमेश नैय्यर बताते हैं, ‘दिग्विजय सिंह ने एक समय शुक्ल बंधुओं के लिए ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी थीं जिनमें वे सांसद और विधायकों के टिकट वितरण में राय-मश्विरा दिए जाने के काम से भी वंचित कर दिए गए.’ जहां तक जोगी और दिग्विजय सिंह के बीच तनातनी की बात है तो इसकी जड़ें 1992 की एक घटनाक्रम में खोजी जा सकती हैं. उस समय मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए सिंह ने छत्तीसगढ़ के मैनपुर इलाकों में स्थित हीरा खदानों को डी-बियर्स कंपनी को सौंपने का फैसला लिया था.

इस पर जोगी सहमत नहीं थे. उन्होंने पदयात्रा निकालकर इसका विरोध किया और राज्य सरकार का फैसला खटाई में पड़ गया. तब से शुरू हुई राजनीतिक दुश्मनी इन दोनों के बीच अभी तक जारी है. इसकी एक बानगी अभी हाल के दिनों में तब देखने को मिली जब दिग्विजय सिंह नक्सली हमले में मृत नेताओं को श्रद्धांजलि देने छत्तीसगढ़ पहुंचे.

यहां कांग्रेस भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में जोगी ने सिंह को बाहरी नेता बताकर उनके इलाके राघोगढ़ को तुकबंदी में जोड़ते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ का भला छत्तीसगढ़ के नेता ही कर सकते हैं, प्रतापगढ़ और फतेहगढ़ के नेता नहीं. सिंह ने भी पलटवार करते हुए जवाब दिया कि उनका विरोध वे लोग ही कर सकते हैं जो भाजपाई हैं या नक्सली. गौरतलब है कि चरणदास महंत दिग्विजय सिंह के करीबी माने जाते हैं. ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि महंत के कार्यवाहक अध्यक्ष रहते हुए जोगी गुट को राज्य कांग्रेस में महत्वपूर्ण भूमिका से दूर ही रखा जाएगा.

G2जोगी पर नजर
छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि जोगी पर उनके समर्थक नई पार्टी गठित करने के लिए दबाव बनाए हुए हैं. जबकि बदले हुए राजनीतिक समीकरण के मद्देनजर जोगी के एक करीबी नेता का दावा है कि उनसे बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच के आला नेता लगातार संपर्क बनाए हुए हैं. हालांकि तमाम चर्चाओं पर पूर्व मुख्यमंत्री तहलका से बात करते हुए साफ कहते हैं, ‘मेरा कांग्रेस छोड़ने का कोई इरादा नहीं है. लेकिन सक्रिय राजनीति में जब उतार-चढ़ाव का दौर आता है तो समर्थकों के बीच सही और गलत फैसलों को लेकर मंथन चलता ही है.’ क्या महंत की नियुक्ति से कांग्रेसियों में असंतोष है, यह पूछे जाने पर जोगी वर्तमान अध्यक्ष के बजाय नंदकुमार पटेल की तारीफ करते हुए कहते हैं, ‘पटेल के भीतर संघर्ष का माद्दा सिर्फ इसलिए था क्योंकि उन्होंने अपने आस पास कभी व्यापारी और बदनाम लोगों को भीड़ एकत्रित नहीं की. वे जितने सरल और सहज थे उनके आस पास भी उतने ही सरल-सहज और जुझारू लोग मौजूद रहते थे.’

दरअसल पिछले दिनों कांग्रेस पार्टी के काफिले पर नक्सलवादी हमले के बाद राज्य में ऐसी अफवाहें उड़ी थीं कि इसमें जोगी का हाथ है. दिलचस्प बात थी कि इस बारे में सबसे ज्यादा सवाल कांग्रेस पार्टी की ओर से ही उठाए गए. जोगी के एक विश्वासपात्र बताते हैं, ‘यह पार्टी के सामने जोगी को खलनायक दिखाने का खेल था. कांग्रेस के बाकी गुटों का मानना था कि पटेल के बाद जोगी या उनके किसी समर्थक को अध्यक्ष बनाया जा सकता है इसलिए उन्हें बदनाम करके पार्टी से बाहर कर दिया जाए.’ तो क्या इस गुटीय लड़ाई में जोगी का पार्टी से बाहर होना कांग्रेस के लिए सामान्य घटना होगी? वरिष्ठ पत्रकार विक्रम जनबंधु कहते हैं, ‘छत्तीसगढ़ में जोगी का व्यापक जनाधार है, यह बात उनके राजनीतिक विरोधी भी स्वीकारते हैं. उनके पार्टी छोड़ने या अन्य संभावनाओं को तलाशने से कांग्रेस को निर्णायक नुकसान उठाना पड़ सकता है.’

दरअसल अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े और आदिवासी वर्ग के कुछ फीसदी वोटों पर जोगी की अपनी पकड़ आज भी  कायम है. ऐसे ही कुछ फीसदी वोटों के चलते महंत और वोरा गुट से जुड़े लोगों के भीतर जोगी के हस्तक्षेप का एक डर बना हुआ है. इन गुटों के कई नेताओं का विचार है कि जोगी चुनाव में जीत तो नहीं दिलवा सकते लेकिन उनके समर्थकों की परोक्ष अथवा अपरोक्ष कोशिश किसी जीत को हार में जरूर बदल सकती है.

नेताओं की हार के बारे में जोगी का अपना नजरिया है. वे कहते हैं, ‘भीतरघात जैसा शब्द उन लोगों का गढ़ा हुआ है जिनका अपना कोई जनाधार नहीं होता.’ जोगी आगे कहते हैं, ‘प्रदेश अध्यक्ष रहे धनेंद्र साहू चुनाव हारे. हाल में ही कार्यक्रम समन्वयक बनाए गए भूपेश बघेल को पहले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा. यहां तक कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा अपने पुत्र अरुण वोरा की जीत सुनिश्चित नहीं कर सके तो इन नेताओं को समझ लेना चाहिए कि जनता के बीच उनका जनाधार कितना कमजोर है.’ नंदकुमार पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस यह साबित कर चुकी है कि वह यहां दमदार विपक्ष है. लेकिन हाल की गुटबाजी से यह भी साबित हो रहा है कि राज्य में अपने अतीत की तरफ कांग्रेस कभी भी लौट सकती है.

यह कैसी हरकत है सरकार!

इलस्ट्रेशन:मनीषा यादव
इलस्ट्रेशन: मनीषा यादव

एक खबर- सरकार हरकत में आई. हरकत… शब्द बहुत दिलचस्प है. जब यह सरकार के साथ जुड़ता है, तो अलग अर्थ देता है और जब आम आदमी के साथ चस्पा होता है, तो सर्वथा अलग. भला यह कैसी हरकत!   बचपन में जब कभी हम हरकत करते थे मास्साब की छड़ी हरकत करती थी. वो भी हमारे बदन पर. कई बार तो ऐसा होता था कि हम हरकत कम करते थे और मास्साब की छड़ी हमसे ज्यादा. मगर यहां क्या हो रहा है!

सरकार विधिवतरूप से हरकत कर भी नहीं रही है, खरामा-खरामा अभी तो वह हरकत में बस आई है कि पहले पेज की मुख्य खबर बन गई. हरकत में उसके आने का स्वागत हो रहा है. खबर सुनकर एकबारगी ऐसा लगता है जैसे सरकार आईसीयू में भर्ती हो, अचानक से उसके बदन में हरकत हुई हो. और लोग खुश.

देखो! देखो! हरकत कर रही है! हरकत हो रही है! नहीं, नहीं, अभी मरी नहीं, अभी जिंदा है हमारी सरकार. सरकार हरकत में आई! जाहिर-सी बात है अब तक वह शांत थी. अगर सरकार सोई हुई होती, तो कहा जाता सरकार जागी. इसका मतलब यह हुआ कि सरकार सोई हुई नहीं होती, सब देखती-समझती है, मगर हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है. अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि सरकार सही समय पर हरकत में नहीं आती. प्राय: लोग सरकार का मुंह जोहते रहते हंै कि सरकार कब हरकत में आएगी. जनता की तरह सरकार की भी याददाश्त थोड़ी कमजोर होती है. सरकार को याद दिलाना पड़ता है कि वह सरकार है. उसकी कुछ जिम्मेदारी है. इत्ती सी बात याद दिलाने के लिए बस जलाना, ट्रेन रोकना, भारत बंद जैसे पावन कृत्य करने पड़ते हैं. तब जाकर सरकार हरकत में आती है.

इतने दिनों में सरकार की एक पहचान बहुत पुख्ता हुई है. वह यह कि वह लगातार हरकत करने में असमर्थ रहती है. तब सरकार हरकत में कब आती है! किसान मर जाते हैं. मजदूर का पूरा परिवार आत्महत्या कर लेता है. बस्तियां जला दी जाती हैं. ट्रेन पलट जाती है. बाढ़ आती है. सूखा पड़ता है. तब भी नहीं. तब सरकार हरकत में कब आती है! शायद जब वोटबैंक में से अपना खाता बंद होने की आंशका उसे घेरती है. तब!

लोग कहते हैं कि सरकार तुरत-फुरत में हरकत में क्यों नहीं आती! देखा जाए तो इसमें सरकार का कोई दोष नहीं. वह क्या करे. अब इतनी बड़ी सरकार. उसके इतने हाथ तो इतने पैर. इनको हिलाने-डुलाने में काफी ऊर्जा खर्च करनी पड़ती होगी, लिहाजा वह लेटी (पड़ी) रहती है. सरकार बहुत ठस्स चीज होती है. भारी भरकम. कितने तो पुरजे उसके, कितने तो जोड़ उसके. वह एकदम से हरकत में आ भी जाए तो कैसे. सरकार की मजबूरी है. कुछ तो मजबूरी है, कुछ उसकी रूढ़ हो चुकी छवि का भी सवाल है. बात-बात पर हरकत में आ जाएगी, जरूरत के वक्त हरकत में आ जाएगी, तो उसे सरकार कहेगा कौन!

अब यह हरकत देखिए! सरकार के चलते रहने को हरकत नहीं माना जाता. न ही तो सरकार के गिरने को ही. जबकि ये दोनों भी क्रियाएं हैं. यह सरकार के साथ ज्यादती है. चलिए इसे हरकत न मानिए जैसी आपकी मर्जी. चलिए मगर यह मानिए, सरकार किसी भी तरह से हरकत में आ तो गई! तो पहले पहल तो विपक्ष के ऊपर ठीकरा फोड़ेगी. वर्तमान चुनौतियों को भूतपूर्व सरकार के पहलू से नत्थी  करेगी. जब इतनी हरकत से बात नहीं बनेगी तो सरकार और हरकत करेगी और उसके बदन से आयोग, बयान, खंडन, जांच कमीशन! पैकेज! आदि झड़ेंगे. फिर! फिर क्या! फिर सरकार शांत, ठस्स, क्रियाविहीन, लगभग मरणासन्न हो जाती है. तब तक, जब तक कोई होनी अनहोनी में, घटना दुर्घटना में, खबर त्रासदी में न बदल जाए.

-अनूप मणि त्रिपाठी

तिरस्कार की मार

बात सितंबर, 1893 की है. उत्तराखंड के चमोली में बहने वाली बिरही नदी में एक पहाड़ गिर गया. बिरही आगे जाकर अलकनंदा में मिलती है जिसके भागीरथी में मेल के बाद बनी धारा को गंगा कहा जाता है. बिरही में पहाड़ गिरने से एक विशाल झील बन गई. ताल के एक छोर पर गौणा गांव था और दूसरे पर दुर्मी तो कोई इसे गौणा ताल कहता और कोई दुर्मी ताल. तब के शासकों यानी अंग्रेजों ने उस ताल से पैदा हुआ खतरा भांपते हुए दुर्मी में एक तारघर खोल दिया. तारघर से एक अंग्रेज कर्मचारी हर रोज पानी के स्तर की जानकारी नीचे बसे गांवों में भेजता. आशंका गलत नहीं थी. एक साल बाद 16 अगस्त 1894 को भारी बारिश और पहाड़ धसकने से ताल का एक हिस्सा टूट गया. कुछ सालों बाद इस ताल का अध्ययन करने आए स्विस भूगर्भ वैज्ञानिकों के मुताबिक इस चार किमी लंबे, एक किमी चौड़े और 300 मीटर गहरे गौणा ताल में करीब 15 करोड़ घन मीटर पानी था. अनुमान है कि ताल टूटने के बाद भारी मात्रा में पानी बिरही की संकरी घाटी से होते हुए चमोली, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, ऋषिकेश और हरिद्वार की ओर बढ़ा होगा. दस्तावेजों के मुताबिक उस भारी जल प्रवाह से भले ही अलकनंदा घाटी में खेती और संपत्ति को भारी नुकसान हुआ, लेकिन मौत सिर्फ एक हुई थी. वह भी उस साधु की जो लाख समझाने के बावजूद जलसमाधि लेने पर अड़ा हुआ था.

यानी नुकसान इसलिए बहुत कम हुआ कि संकट को समझने और उससे बचने के लिए समय पर सटीक उपाय करने की अंतर्दृष्टि दिखाई गई थी. ताल बनते ही बचाव के उपाय शुरू हो गए थे. अंग्रेज तुरंत सूचना भेजने और लोगों को चौकन्ना करने की व्यवस्था की अहमियत समझते थे इसलिए उन्होंने तब दुर्लभ मानी जाने वाली लगभग 100 मील लंबी तार लाइन भी बना ली थी. कई दशक बाद 20 जुलाई, 1970 को ताल पूरी तरह से टूट गया. बेलाकूची नाम का एक गांव इस जल प्रलय में बह गया. उस समय भी कई यात्री गाड़ियों के बहने और कुल 70 मौतें होने की बात रिकॉर्ड में दर्ज है. यह आजाद भारत का किस्सा है.

आज देश को आजाद हुए करीब 66 साल हो चुके हैं. उत्तराखंड को अलग राज्य बने भी 13 साल हो गए. लेकिन लगता है कि ऐसी आपदाओं को संभालने के मामले में हम एक मायने में 1893 से भी पीछे चले गए हैं. केदारनाथ में आए जलप्रलय का कारण बना गांधी सरोवर यानी चौरबाड़ी ताल केवल 400 मीटर लंबा और 100 मीटर चौड़ा था. इसकी गहराई अधिकतम दो मीटर थी. यानी गौणा ताल की तुलना में इसका आकार एक तलैया से अधिक नहीं था. फिर भी इससे हुई तबाही ने करीब सवा सदी पहले हुई उस तबाही को कहीं पीछे छोड़ दिया. अब तक 1000 से अधिक मौतों और कई हजार करोड़ रु के नुकसान की पुष्टि हो चुकी है.

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक डॉ मनीश मेहता के शोध पत्र के अनुसार चौरबाड़ी ताल 3000 साल पुराना था. इसके किनारे थामने वाला मौरेन (हिमनदों का चट्टानरूपी अवक्षेप) 100 मीटर मोटाई का था, लेकिन यह कुछ सालों से रिस भी रहा था. ताल के नीचे रोज हजारों यात्री आते थे फिर भी सरकार ने न तो इसके टूटने की संभावनाओं को परखा और न बचाव के उपाय किए. उत्तरकाशी में दो साल से तबाही का कारण बन रही असिगंगा का मूल स्रोत भी डोडीताल नाम का एक तालाब ही है.

आज सूचना और आवागमन के साधन हर जगह मौजूद हैं. लेकिन उनका प्रयोग करके भी इस आपदा के असर को कम नहीं किया जा सका. दरअसल आपदा के पहले और बाद में जो हुआ उसे गहराई से देखें तो इसका सीधा कारण व्यवस्था थामने वालों में जिम्मेदारी की भावना और संवेदनशीलता का अभाव दिखता है. वहीं, आम जनता भी परंपरागत ज्ञान और जीवन पद्धति को याद रखती तो नुकसान इतना ज्यादा नहीं होता. आगे जो दर्ज है वह बताता है कि परंपरागत ज्ञान और आधुनिक कानून का उत्तराखंड में जो तिरस्कार हुआ है, एक समाज के रूप में उसकी कीमत चुकाने के लिए हम अभिशप्त हैं.

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आपदा के बाद, कैसे हैं हालात

आपदा से बच कर लौटे एक सैलानी से बातचीत

भारी बारिश ने उत्तराखंड में कहर बरपाया

सपनों की दौड़

मिल्खा सिंहगर्मी की यह एक आम सुबह है लेकिन हवाएं चलने से मौसम खुशनुमा बना हुआ है. इस बीच चंडीगढ़ का गोल्फ क्लब दर्शकों से भर चुका है. क्लब के इस वार्षिक आयोजन के शुरू होने के पहले इसके आयोजक दिगराज सिंह औपचारिक रूप से खेल के नियम बताते हैं. टूर्नामेंट में भाग लेने आए गोल्फरों के लिए ये हजारों बार सुनी गई बातें है, सो वे हर नियम पर चुहल करते दिख रहे हैं. इनके बीच में एक ऐसा व्यक्ति भी है जो इन बातों से बेपरवाह एक किनारे पर शांति से खड़ा है. उसकी नजरें टूर्नामेंट में विजेता को दिए जाने वाले कप पर टिकी हैं. कोई और होता तो शायद उसके लिए ज्यादा समय तक अपने एकांत का आनंद लेना आसान होता.

पर भारत के उड़न सिख मिल्खा सिंह के लिए यह मुमकिन नहीं है. स्थानीय रिपोर्टरों की नजरों से वे बच नहीं पाते. थोड़े देर में ही वे खुद को मीडियाकर्मियों से घिरा पाते हैं. पत्रकार चुनावों से लेकर पंजाब की युवा पीढ़ी में नशे की लत जैसे तमाम मुद्दों पर उनकी राय जानना चाहते हैं. मिल्खा इन पत्रकारों से अनुरोध करते हैं कि वे खेल के बाद सभी सवालों के जवाब देंगे. इस बीच फोटोग्राफर गोल्फरों को ट्रॉफी के आसपास खड़ा होने के लिए कहते हैं. इस मौके पर की गई एक टिप्पणी आपको इस इकहरे बदन वाले सिख के जादुई असर के बारे में और गहराई से बताती है. पंजाब क्रिकेट असोसिएशन के चीफ सेक्रेटरी आईएस बिंद्रा दोस्ताना लहजे में शिकायत करते हैं, ‘मुझे इस आदमी (मिल्खा सिंह) के साथ एक ही फ्रेम में खड़ा होना नापसंद है. उसके रहते हुए मुझ पर कोई ध्यान ही नहीं देता.’

बेशक मिल्खा सिंह के लिए चमक-दमक का दौर नया नहीं है लेकिन बिंद्रा की टिप्पणी आज से तकरीबन पांच दशक पहले के माहौल में ज्यादा सटीक बैठती है. आजादी के बाद हुए दंगों में पाकिस्तान से किसी तरह जान बचाकर भारत आने और 1960 के ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले इस सिख युवक की  कहानी में वे सारे तत्व हैं जो उसे नायक बनाते हैं. हालांकि बीते दशकों के दौरान चंडीगढ़ शहर अपने इस नायक की आभा का अभ्यस्त हो चुका है. वहीं दूसरी ओर पिछले कुछ सालों में ही सेक्टर आठ ने शहर को एक नया सेलेब्रिटी दिया है. ये हैं जीव मिल्खा सिंह. मिल्खा सिंह के बेटे जीव ने दुनिया में किसी भारतीय द्वारा अब तक की सबसे ऊंची रैंकिंग हासिल की है.

आज मिल्खा सिंह की उपलब्धियां समय के साथ कुछ धुंधली पड़ गई हैं. लेकिन हो सकता है राकेश ओम प्रकाश मेहरा द्वारा उनके जीवन पर बनाई जा रही फिल्म- भाग मिल्खा भाग से इस उड़न सिख का चमकदार अतीत एक बार फिर लोगों को आकर्षित करे. हालांकि ऐसी फिल्मों का जीवनकाल उस दौर के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता जिसमें से निकलकर ऐसे नायकों की कहानियां बनती हैं. इस फिल्म में 1946 से 1960 के बीच मिल्खा सिंह की जिंदगी दिखाई गई है. ओलंपिक से जुड़े भारतीय खेल इतिहास की शायद यह सबसे प्रेरणादायक कहानी होगी. आज की पीढ़ी के लिए इस कहानी की प्रेरणा धुंधली पड़ चुकी है, लेकिन खुद इसके सूत्रधार के लिए ऐसा नहीं है. चंडीगढ़ में गोल्फ टूर्नामेंट शुरू होने के चार घंटे बाद घोषणा होती है कि इसके विजेता मिल्खा सिंह हैं. इस समय तक वे गोल्फ क्लब से जा चुके हैं. शायद एक और कहानी रचने. उनके पारिवारिक दोस्त और पत्रकार डॉन बनर्जी हंसते हुए बताते हैं,  ‘उन्हें हमेशा नई चुनौती की तलाश रहती है. जब जीव ने पहली बार एशिया कप जीता था और हम सब इसका जश्न मना रहे थे, तब मिल्खा सिंह अपने बेटे से कह रहे थे- वैलडन, लेकिन अब तुम्हें समझ आ रहा होगा कि यूरोप टूर के लिए तुम्हें कितनी कड़ी मेहनत करनी होगी.

‘मिल्खा जब’ नई चुनौतियों’ की तलाश में नहीं होते तब वे अमूमन अपने दोस्तों के साथ होते हैं और यह उनके हंसी-मजाक का समय होता है. उनके साथी मिल्खा के बारे में कई चटपटी बातें करते हैं और इस उड़न सिख के पास इन किस्से-कहानियों में जोड़ने के लिए और नई बातें होती हैं. जब एक गोल्फर उन्हें चिढ़ाते हुए कहते हैं कि एक दूसरे एथलीट पान सिंह तोमर पर बनी फिल्म बहुत अच्छी थी तो मिल्खा गुस्सा दिखाते हुए जवाब देते हैं कि वे तोमर के कैप्टन रह चुके हैं और एक बार उन्होंने लंबी दूरी की दौड़ में उसे हराया भी था जबकि वे खुद स्प्रिंटर (100 मीटर की दौड़) के चैंपियन थे. इसके साथ ही सभी लोगों की हंसी छूट जाती है.

खेल का इतिहास बताता है कि मिल्खा भारत को एक ओलंपिक मेडल दिलाते-दिलाते चूक गए थे. उस ऐतिहासिक दौड़ के अंतिम क्षणों में उन्होंने अपनी दाईं ओर दौड़ रहे दक्षिण अफ्रीका के मैलकॉम स्पेंस को देखा और उन्हीं के साथ वे फिनिश लाइन पार कर गए. स्पेंस तीसरे स्थान पर रहे और मिल्खा ओलंपिक मेडल से चूक गए. वे बताते हैं, ‘1958 के राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद सभी को लगने लगा था कि मैं ओलंपिक में मेडल जीतूंगा. लेकिन मेरे हाथ से मेडल फिसल गया.’

फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने के सिलसिले में प्रसून जोशी जब मिल्खा सिंह से मिले तो उन्होंने जोशी को एक पतली–सी किताब भेंट की. इसने उन्हें हैरान कर दिया. इस किताब में मिल्खा की जिंदगी से जुड़ी घटनाओं का समयवार ब्योरा है. उनके साथ तकरीबन सौ घंटे बिताने वाले जोशी याद करते हैं कि वे जो कहानी कहना चाहते थे उसके लिए यह किताब  मार्गदर्शक बन गई. वे कहते हैं, ‘यह कुछ ऐसा है जैसे एक ब्रांड और एक आदमी दोनों एक हो गए हैं.’

बस्तर: मुश्किल चुनावी डगर

बस्तर के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां पहुंचने के लिए चुनावकर्मियों को दो से तीन दिन की पैदल यात्रा करनी पड़ती है. फोटो-ईशान तन्खा
बस्तर के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां पहुंचने के लिए चुनावकर्मियों को दो से तीन दिन की पैदल यात्रा करनी पड़ती है. फोटो-ईशान तन्खा
बस्तर के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां पहुंचने के लिए चुनावकर्मियों को दो से तीन दिन की पैदल यात्रा करनी पड़ती है. फोटो-ईशान तन्खा
बस्तर के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां पहुंचने के लिए चुनावकर्मियों को दो से तीन दिन की पैदल यात्रा करनी पड़ती है. फोटो-ईशान तन्खा

दक्षिण छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल अंदरूनी क्षेत्रों में चुनाव करवाना सुरक्षा और यहां तक कि चुनाव सामग्री पहुंचाने के लिहाज से हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है. हर बार माओवादियों का चुनाव विरोधी आक्रामक प्रचार मतदाताओं व चुनाव अधिकारियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उपस्थित होता है. बीते सालों में यहां हजारों मतदान केंद्र पुलिस स्टेशनों के नजदीक तथाकथित सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित किए गए हैं. 2008 के विधानसभा चुनाव में राज्य के ऐसे कई केंद्रों पर 90 फीसदी मतदान की खबरें आई थीं और इस आंकड़े की वजह से बड़े पैमाने पर फर्जी मतदान की आशंका जताई गई. हाल ही में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नवनियुक्त अध्यक्ष चरणदास महंत ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर मांग की है कि आगामी नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के दौरान सभी मतदान केंद्रों पर छिपे हुए कैमरे से वीडियो रिकॉर्डिंग की जाए. कांग्रेस की मांग यह भी है कि चुनावकर्मियों को जीपीएस डिवाइसें दी जाएं जिससे उनकी लोकेशन का पता चलता रहे.

यहां जंगल के बीच ऐसे सुदूर क्षेत्रों में आबादी बसी हैं जहां पहुंचने के लिए लिए चुनावकर्मियों को चुनाव के कई दिन पहले निकलना पड़ता है. उनकी जिम्मेदारी सिर्फ वहां पहुंचने की नहीं होती बल्कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) और अन्य सामग्री को सुरक्षित उस जगह ले जाने की भी होती है. कई बार ऐसा हुआ है कि माओवादियों के कैडर ने इनसे ईवीएम और चुनाव सामग्री छीन ली और धमकी देकर उन्हें वापस लौटा दिया. कुछ क्षेत्रों में तो माओवादियों का प्रभाव इतना ज्यादा है कि उनसे होकर मतदान केंद्रों पर पहुंचना लगभग नामुमकिन होता है. ऐसे में हेलिकॉप्टर के जरिए चुनावकर्मियों को वहां पहुंचाया जाता है. खतरा यहां भी कम नहीं होता. नवंबर, 2008 में जब बीजापुर जिले के पेडिया गांव से चुनावकर्मियों को लेकर एक हेलिकॉप्टर वापस लौट रहा था तब माओवादियों ने उस पर फायरिंग की थी. इसमें एक फ्लाइट इंजीनियर की मौत हो गई थी.

इसी चुनाव की एक और घटना है. माओवादियों ने दंतेवाड़ा विधानसभा सीट के हांदावाड़ा मतदान केंद्र से ईवीएम मशीनें लूट ली थीं. इस केंद्र पर दोबारा मतदान की तारीख तय हुई. चुनावकर्मी 25 किमी का सफर तय करके यहां तक पहुंच गए. रातभर इन लोगों काे आसपास से माओवादियों की आवाजें और चुनाव बहिष्कार के गीत सुनने को मिले और वे डरते रहे. अगले दिन यहां बमुश्किल 19 फीसदी मतदान हो पाया. हालांकि कोंटा विधानसभा क्षेत्र के गौगुंडा बूथ पर पुनर्मतदान की कहानी बहुत अलग है. माओवादियों से डरे हुए चुनावकर्मी यहां पहुंचे ही नहीं और खुद ही तमाम पार्टियों की तरफ से एक निश्चित अनुपात में ईवीएम मशीनों में मत डालकर बीच रास्ते से वापस आ गए. बाद में यह बात उजागर हो गई और इन चुनावकर्मियों को जेल जाना पड़ा. एक राजनीतिक पार्टी का एजेंट जो इस टीम के साथ था, हमें बताता है, ‘माओवादी हमारे रास्ते के आस-पास ही थे. हम आगे बढ़ते तो हमारी हत्या कर दी जाती. हमारे साथ जो पुलिसवाला था वो खुद डरा हुआ था.

आखिर में हमने तय किया कि सभी पार्टियों के लिए हम खुद ही वोट डालेंगे. ‘बाद में यहां चुनाव के लिए एक और टीम भेजी गई और मतदान केंद्र एक गांव के नजदीक अपेक्षाकृत सुरक्षित जगह पर स्थानांतरित कर दिया गया. इसके बावजूद यहां सिर्फ 10 लोगों ने मत डाले जबकि 700 मतदाता यहां पंजीकृत हैं. बस्तर में अपेक्षाकृत सुरक्षित समझे जाने वाले ऐसे कई मतदान केंद्र बनाए जाते हैं लेकिन इसके बाद भी यहां पर्याप्त मतदान सुनिश्चित नहीं हो पाता. इसी चुनाव में राष्ट्रीय राजमार्ग (क्रमांक 30) के नजदीक बनाए गए गोरखा मतदान केंद्र से माओवादियों ने ईवीएम मशीनें लूट ली थीं, जबकि इससे 10 किमी दूर ही इंजारम में सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं का शिविर था. इस मतदान केंद्र पर जब पुनर्मतदान हुआ तो कहा जाता है कि चुनावकर्मी मतदान करवाने के लिए अपने साथ सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं को ले गए. इनमें से सिर्फ एक व्यक्ति का नाम उनकी मतदाता सूची में था. नतीजतन 938 मतदाता वाले केंद्र पर सिर्फ एक मत डाला गया.

माओवाद प्रभावित सुकमा जिले के एक पत्रकार लीलाधर राठी कहते हैं, ‘बस्तर में ठीक-ठाक चुनाव करवाना युद्ध लड़ने से कम नहीं है. इन इलाकों में आए चुनावकर्मियों के परिवारों के लिए ये दिन सबसे भारी चिंता वाले होते हैं.’ बीजापुर शहर के एक शिक्षक मोहम्मद जाकिर खान इस बात पर सहमति जताते हुए कहते हैं, ‘ जंगल जाने वाले चुनावकर्मियों का जाना ऐसा होता है जैसे वे परिवार से अंतिम विदा ले रहे हों और उन्होंने अपनी वसीयत तैयार कर दी हो. ‘ दंतेवाड़ा में तो यह परंपरा ही बन गई है कि कई चुनावकर्मी जंगल में जाने से पहले दंतेश्वरी मंदिर में जाकर पूजा करते हैं.

[box]‘चुनावकर्मियों की जो टोलियां जंगल में रास्ता भटक जाती हैं वे अक्सर खुद ही ईवीएम में फर्जी मत डालकर लौट आती हैं’[/box]

बस्तर में सैकड़ों ऐसे मतदान केंद्र हैं जहां पहुंचने के लिए कई स्तर पर समन्वय की जरूरत पड़ती है. चुनाव के सिलसिले में माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में तीन बार जा चुके एक चुनावकर्मी हमें बताते हैं, ‘ कहीं-कहीं पहुंचने के लिए तो आपको दो दिन तक लगातार चलना पड़ता है. बहुत बार ऐसा होता है कि चुनावकर्मियों के दल जंगल में खो जाते हैं. ऐसे में अक्सर यह होता है कि वे सुरक्षित जगह की तलाश करते हैं और नजदीकी गांव के लोगों को बुलाकर मतदान करवा लेते हैं या फिर खुद ही मतदान करके औपचारिकता पूरी कर देते हैं. ये वोट किसी एक पार्टी को नहीं जाते फिर भी कुछ हद तक सत्ताधारी पार्टी को इसका फायदा मिलता है.’

2009 के लोकसभा चुनावों में माओवाद प्रभावित इलाके के तकरीबन 50 मतदान केंद्र तथाकथित ‘सुरक्षित’ जगहों पर स्थानांतरित किए गए थे. दिलचस्प बात है कि इन चुनावों के ठीक छह महीने पहले विधानसभा चुनावों में इन्हीं केंद्रों पर मतदान हुआ था. उन केंद्रों पर भी मतदान दर्ज किया गया था जहां पहुंचना एक चुनाव अधिकारी के मुताबिक लगभग नामुमकिन है. आंकडों के मुताबिक इनमें से ज्यादातर मत भाजपा के पक्ष में पड़े थे. 2008 के चुनावों में भाजपा ने बस्तर क्षेत्र की 12 में से 11 सीटों पर जीत हासिल की थी. कांग्रेस को यहां महज एक सीट मिल पाई थी. जबकि 2003 के चुनावों में कांग्रेस के पास यहां की तीन सीटें थीं.

माओवाद प्रभावित इलाकों में चुनाव कराने की मुश्किल और खतरों की वजह से फर्जी मतदान के आरोपों को बल मिलता है. पिछले विधानसभा चुनाव में कुछ मतदान केंद्रों पर जहां शून्य मतदान हुआ था वहीं उसके नजदीकी केंद्रों पर भारी मतदान हुआ. भाजपा का दावा है कि कांग्रेस के फर्जी मतदान के आरोप झूठे हैं. नारायणपुर से विधायक और अनुसूचित जाति-जनजाति विकास मंत्री केदार कश्यप कहते हैं, ‘हमारी पार्टी ने आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए बहुत काम किया है. ऐसे में हम वहां क्यों नहीं जीतेंगे? ‘ हालांकि सीपीआई के नेता मनीष कुंजाम बस्तर में फर्जी मतदान के आरोपों को सही मानते हैं. उनके मुताबिक, ‘ कांग्रेस के पास जब मौका था तब उसने भी यही किया. ‘

दरअसल 90 सीटों वाली छत्तीसगढ़ विधानसभा में इस समय भाजपा के पास 49 सीटें हैं और 37 सीटें कांग्रेस के पास हैं. दो विधायक बसपा के हैं. इस लिहाज से बस्तर क्षेत्र की 12 सीटें राज्य में सरकार बनाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. इस समय इनमें से 11 सीटों पर भाजपा के विधायक काबिज हैं. कांग्रेस के पास सिर्फ एक सीट है. ऐसे में यदि चुनाव आयोग कांग्रेस की मांग मानते हुए मतदान की निगरानी के लिए छिपे हुए कैमरे और जीपीएस डिवाइसों की मांग मान लेता है तो अगले विधानसभा चुनाव में यह क्षेत्र ऐसे नतीजे दे सकता है जिनमें आदिवासियों की पसंदगी ईमानदारी से जाहिर हो.

आपदा का खनन

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उत्तराखंड में आई आपदा से हुए नुकसान का आकलन अब भी जारी है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस हादसे में मरने वालों की संख्या लगभग एक हजार के आस-पास है. लेकिन स्थानीय नागरिकों और इस हादसे से बचकर आए लोगों की मानें तो यह दस हजार से अधिक हो सकती है. मारे गए लोगों की संख्या की ही तरह इस हादसे ने एक और विवादास्पद बहस को जन्म दे दिया है. क्या यह हादसा पूरी तरह से प्राकृतिक था जिसे रोक पाना नामुमकिन हो? या फिर यह एक मानव निर्मित आपदा थी? भू-वैज्ञानिकों का मानना है कि बाढ़ और भूस्खलन जैसी समस्याएं तो प्राकृतिक ही हैं लेकिन इनके चलते जो नुकसान उत्तराखंड में हुआ वह पूरी तरह से मानव निर्मित था. विशेषज्ञों के अनुसार नदियों के फ्लड जोन में अतिक्रमण, संवेदनशील इलाकों में खनन और मोटर रोड या विद्युत परियोजनाओं आदि को बनाने के लिए ब्लास्टिंग करना ऐसे हादसों के  महत्वपूर्ण कारणों में से हैं.

ऐसे ही किसी बड़े हादसे को आमंत्रित करने की नींव इन दिनों उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में रखी जा रही है. जिला प्रशासन के संरक्षण में यहां लंबे समय से अवैध खनन और स्टोन क्रशर चलाए जा रहे हैं. हथनीकुंड बैराज जैसा संवेदनशील इलाका भी इससे अछूता नहीं है. इस बैराज के आस-पास कई स्टोन क्रशर काम कर रहे हैं. इन क्रशरों के लिए खनन सामग्री भी अवैध रूप से इसी इलाके से निकाली जा रही है जिससे यह इलाका असुरक्षित होता जा रहा है. स्थानीय नागरिकों के लगातार विरोध के बावजूद जिले में कभी भी अवैध खनन पर रोक नहीं लग सकी. 2011 में स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सैनी ने प्रदेश एवं केंद्र सरकार के संबंधित विभागों के साथ-साथ सर्वोच्च न्यायालय को सहारनपुर में हो रहे अवैध खनन के संबंध में पत्र लिखा. आशीष के पत्र का सर्वोच्च न्यायालय ने संज्ञान लिया और 25 सितंबर, 2011 को इसकी जांच के आदेश दिए.

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी द्वारा इस मामले की जांच की गई. यह समिति विशेष तौर से पर्यावरण से संबंधित मुद्दों की जांच के लिए ही गठित की गई है. समिति ने चार जनवरी, 2012 को अपनी जांच रिपोर्ट न्यायालय में पेश की. इसमें कहा गया कि सहारनपुर जिले में कई खनन पट्टे अवैध तरीकों से आवंटित किए गए हैं और इनकी आड़ में पट्टा धारकों द्वारा अवैध खनन भी किया जा रहा है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अवैध खनन का यह काम जिला प्रशासन के संरक्षण में हो रहा है. जांच में यह भी पाया गया कि यमुना के आस-पास 70 स्टोन क्रशर अवैध तरीकों से चलाए जा रहे हैं जिनमें से कइयों को जिला प्रशासन द्वारा ध्वस्त या सील किया हुआ दिखाया गया है. इस रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को गैरकानूनी तरीके से चल रहे खनन कार्यों एवं स्टोन क्रशरों पर तुरंत रोक लगाने के आदेश दिए. सहारनपुर स्टोन क्रशर्स वेलफेयर एसोसिएशन के सचिव महेंद्र सिंह बताते हैं, ‘कोर्ट के आदेशों के बाद सहारनपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी द्वारा सभी स्टोन क्रशर्स की जांच की गई जिसमें सिर्फ 90 स्टोन क्रशरों को ही वैध पाया गया. बाकी सभी क्रशरों पर रोक लगाते हुए उन्हें तोड़ने के आदेश जिला प्रशासन ने दे दिए थे. कई अवैध स्टोन क्रशरों को आंशिक तौर से तोड़ा भी गया था.’ महेंद्र सिंह आगे बताते हैं कि उस वक्त उन सभी खनन पट्टों पर भी रोक लगा दी गई थी जिनके पास पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति नहीं थी.

मगर थोड़े ही दिनों में स्थिति जस-की-तस हो गई. 2012 का अंत होते-होते सहारनपुर जिला प्रशासन द्वारा कुल 16 खनन पट्टे फिर से आवंटित कर दिए गए. इनमें से तीन पट्टों को बाधित अवधि (17 अप्रैल 2013 से 21 जनवरी 2014 तक) के लिए और बाकियों को पूरे तीन साल के लिए आवंटित किया गया. नवीनीकरण की इस प्रक्रिया में नियम-कानूनों से जमकर खिलवाड़ हुआ. नियमानुसार पट्टों के नवीनीकरण और आवंटन के लिए नीलामी प्रक्रिया का अपनाया जाना आवश्यक है. इसके साथ ही ई-टेंडरिंग और ई-ऑक्शन की शर्त भी कानून में है. लेकिन ये सभी पट्टे बिना नीलामी के ही आवंटित कर दिए गए. ऊपर से आवंटित भी उन्हीं लोगों को किए गए जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कराई गई जांच में अवैध खनन के दोषी पाए गए थे और जिनसे जुर्माना वसूलने की बात कही गई थी.

जिला प्रशासन इन पट्टा धारकों पर क्यों मेहरबान हुआ इसका अंदाजा जिलाधिकारी कार्यालय के खनन अनुभाग से मिली पट्टा धारकों की सूची जांचने पर हो जाता है. आवंटित किए गए ये सभी खनन पट्टे लगभग एक ही समूह के पास हैं. इस समूह में बहुजन समाज पार्टी के विधान परिषद सदस्य मोहम्मद इकबाल के भाई, उनके पुत्र, एवं अन्य नजदीकी लोग शामिल हैं. आवंटित किए गए 16 खनन पट्टों में से आठ मोहम्मद इकबाल के भाई महमूद अली के नाम पर हैं, एक उनके बेटे मोहम्मद वाजिद अली के और चार पट्टे उन जैन भाइयों के नाम पर हैं, जो एक पट्टे में महमूद अली के पार्टनर हैं.

एक स्थानीय जानकार बताते हैं, ‘बसपा नेता मोहम्मद इकबाल के लोगों के पास ही सारे खनन पट्टे हैं. इसलिए पूरे जिले के खनन कार्यों में उनका एकाधिकार हो गया है. अपने पट्टों की आड़ में ये लोग निजी भूमि से लेकर सरकारी भूमि तक में अवैध खनन कर रहे हैं. इन खनन माफियाओं का रसूख इतना है कि ये किसी और को खनन पट्टा आवंटित ही नहीं होने देते. अवैध खनन से अब तक ये लोग प्रदेश को हजारों-करोड़ का नुकसान कर चुके हैं. जाहिर है इस कमाई का एक हिस्सा जिला प्रशासन को भी पहुंच रहा है.’ खनन सामग्री बेचने के लिए पट्टा धारकों को प्रशासन द्वारा एम-एम-11 फॉर्म जारी किए जाते हैं. बोलचाल की भाषा में इन्हें रवाना कहा जाता है. नियमानुसार पट्टाधारक को कोई भी खनिज अपने पट्टे से बाहर भेजने से पहले उसके लिए एक रवाना जारी करना होता है. इसमें खनिज के प्रकार व मात्रा के बारे में जानकारी होती है. इस तरह से एक पट्टे से उत्पादित कुल खनिज भी वहां दर्ज हो जाता है. खनिज की निर्धारित मात्रा खत्म होने पर खनन पर रोक लगा देने का प्रावधान है. पर ये नियम-कानून सिर्फ किताबों तक सीमित हैं. जो धरातल पर होता है वह कुछ इस तरह हैः

सहारनपुर में खनन माफियाओं द्वारा नुनियारी, गंदेवड, रायपुर, बादशाही बाग, सुन्दरपुर, ताजेवाला, जसमौर, नानौली और लांडा पुल पर कुल नौ चौकियां बनाई गई हैं. तहलका की पड़ताल के मुताबिक यमुना और उसके आस-पास वाली किसी भी जगह से निकाला गया अवैध खनिज इन चौकियां में से ही किसी एक से  होकर सहारनपुर से बाहर ले जाया जा सकता है. कहीं से भी अवैध खनिजों के ट्रक इन चौकियों पर आ जाते हैं और पैसे देकर इनसे रवाना हासिल कर लेते हैं. इस तरह से अवैध माल वैध बन जाता है और खनन माफियाओं को बिना हींग और फिटकरी के मोटी रकम मिल जाती है. तहलका ने जब इन अवैध चौकियों के संबंध में इलाके के खान अधिकारी हवलदार सिंह यादव से बात की तो उनका जवाब था, ‘मुझे यहां आए अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है. मेरे संज्ञान में अभी यह मामला नहीं है.’

इसके अलावा जो खनिज प्रशासन द्वारा आवंटित पट्टों से बाहर जाता है उसको लेकर भी तमाम तरह की गड़बड़ियां देखने को मिलती हैं. सहारनपुर के सामाजिक संगठन, सैनी युवा चेतना मंच के एक कार्यकर्ता हमें बताते हैं, ‘इन पट्टों से बड़े-बड़े ट्रकों में माल ले जाया जाता है लेकिन कागजों (एम-एम-11 फॉर्म) पर जितना माल दिखाते हैं उससे ज्यादा तो बैलगाड़ी में ही आ जाता है, प्रशासन बिना आपत्ति के खनन माफियाओं के इस झूठ को स्वीकार करके उन्हें नए रवाने जारी कर देता है. महीने में एक-दो बार किसी ट्रक का चालान भी हो जाता है जिससे जिला प्रशासन की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है.’ रवाने में माल को कम दिखाने वाली बात की पुष्टि करते हुए स्टोन क्रशर्स वेलफेयर एसोसिएशन के सचिव महेंद्र सिंह कहते हैं, ‘जितने खनिजों की बिक्री के लिए इन पट्टाधारकों को तीन साल का पट्टा दिया जाता है उतना तो ये लोग सिर्फ 15 दिन में ही बेच देते हैं. खुले-आम जेसीबी मशीनों से खुदाई की जाती है जो कि नियमानुसार प्रतिबंधित है.’

रवाने में ज्यादा माल को कम दिखाने से न केवल पट्टाधारक सरकार को रॉयल्टी की एक बड़ी रकम देने से बच जाते हैं बल्कि उनके पट्टे के लिए निर्धारित खनिज की मात्रा भी कागजों पर समाप्त नहीं होती. इस वजह से उन्हें प्रशासन से लगातार रवाने मिलते रहते हैं और वे खुद और दूसरों के किए अवैध खनन को वैध बनाने के खेल में लगे रहते हैं. जिला प्रशासन द्वारा खनन माफियाओं को गलत तरीकों से अधिक रवाने जारी करने की बात सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर हुई जांच में भी सामने आई थी. इसमें कहा गया था कि ‘सहारनपुर जिले में सिर्फ तीन महीने के दौरान ही 60,176 अतिरिक्त रवाने जारी किए गए हैं. इन रवानों के जरिए 2,40,704 क्यूबिक मीटर अवैध खनिज बेचा गया है. और असल में तो बेचे गए अवैध खनिज की मात्रा इससे भी कहीं ज्यादा होगी क्योंकि ये रवाने ट्रैक्टर ट्राली के हिसाब से जारी किए जाते हैं. जबकि इन खनिजों को अधिकतर बड़े ट्रकों में ले जाया जाता है.’

सहारनपुर जिले में खनन का काम इसलिए भी खूब फल-फूल रहा है कि यह उत्तर प्रदेश का ऐसा जिला है जिसकी सीमा तीन राज्यों से मिलती हैं. इस कारण उत्तर प्रदेश के साथ ही यहां से उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल में भी खनिज बेचा जाता है. सहारनपुर और हरियाणा की सीमा को वही यमुना नदी अलग करती है जिसको नोंच-नोंच कर यह खनन किया जा रहा है. जानकारों के मुताबिक हरियाणा में इन दिनों खनन बंद होने से वहां खनिज की मांग बहुत ज्यादा हो गई है. ऐसे में हरियाणा के लोग यमुना के दूसरी ओर खनन करने के बाद उसे कानूनी रूप देने के लिए खनन माफियाओं से रवाना हासिल कर लेते हैं.

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खनन पट्टे पाने वाले समूह में बहुजन समाज पार्टी के विधान परिषद सदस्य मोहम्मद इकबाल के भाई, उनके पुत्र एवं अन्य नजदीकी लोग शामिल हैं

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एक तरफ इस क्षेत्र में अवैध खनन का खेल जारी है तो दूसरी तरफ अवैध स्टोन क्रशर इसके पूरक का काम कर रहे हैं. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद कई स्टोन क्रशरों पर रोक लगाई गई थी लेकिन इनमें से ज्यादातर कभी बंद ही नहीं हुए. स्थानीय अखबारों में लगातार सील किए गए क्रशरों के चलते रहने की खबरें छपती रही हैं. इससे भी ज्यादा गंभीर बात यह है कि कई स्टोन क्रशर यमुना नदी में ही लगा दिए गए हैं. नियमानुसार किसी भी स्टोन क्रशर की नदी तट से दूरी कम से कम पांच सौ मीटर होनी चाहिए. लेकिन सहारनपुर में दर्जनों स्टोन क्रशर इन मानकों का खुले आम उल्लंघन करते हैं. यहां तक कि हथनीकुंड बैराज से महज दो किलोमीटर से भी कम दूरी पर एक-दो नहीं बल्कि सात स्टोन क्रशर स्थापित किए जा चुके हैं. ईमानदारी से स्टोन क्रशर चलाने की इच्छा रखने वालों की परेशानियों के बारे में बताते हुए महेंद्र सिंह कहते हैं, ‘ऐसे स्टोन क्रशरों ने उन सभी का काम मुश्किल कर दिया है जो वैध तरीके से क्रशर चला रहे हैं. हमें कच्चा माल नदी से अपने क्रशर तक लाना पड़ता है. इसमें काफी खर्च आता है. जबकि जो स्टोन क्रशर नदी में ही बने हैं वे वहीं से कच्चा माल उठा रहे हैं.’

ऐसे अवैध क्रशरों से होने वाले खतरों के बारे में आशीष सैनी बताते हैं, ‘बैराज के इतने नजदीक बने ये क्रशर वहां खनन भी खुलेआम कर रहे हैं. कुछ समय बाद यह बैराज टूटने के कगार पर होगा. हजारों की जिंदगी को दांव पर लगाकर यह खनन हो रहा है. इन अवैध स्टोन क्रशरों में से एक उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री असलम खान का है और एक हरियाणा के यमुनानगर से विधायक दिलबाग सिंह का. जब इतने प्रभावशाली लोग ऐसे अवैध धंधे में हैं तो कोई क्या करे ?’

नमक में कुछ काला है !

annpurna
नमक हरामी, नमक हलाली,
 जले पर नमक छिड़कना, नमक बजाना जैसी बातें आपने खूब कही और सुनी हैं. अब इसी तर्ज पर मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार की नौकरशाही एक और नई इबारत-नमक से चूना लगाना, गढ़ने की राह पर है. इस मुहावरे का मूल प्रदेश के नागरिक आपूर्ति निगम की उस कवायद से निकलता है जिसके तहत उसने गरीबों के लिए नमक खरीद में कई तरह से हेराफेरी की पृष्ठभूमि तैयार कर दी है. फिलहाल यह मामला इस साल खरीद के पहले ही चर्चा में आ गया. लेकिन पिछले साल के आंकड़े बताते हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए नमक खरीद में हेराफेरी का यह खेल बीते सालों में भी खूब चला है.

इस मामले को समझने से पहले हम उस प्रक्रिया पर जाते हैं जिससे प्रदेश में नमक खरीदा जाता है. मध्य प्रदेश की सरकार भी बाकी राज्यों की तरह राशन की दुकानों के मार्फत गरीबों को रियायती दर पर नमक बांटती है. इसके लिए खरीद गुजरात के कच्छ (गांधीधाम) से होती है. प्रदेश का नागरिक आपूर्ति निगम निविदाओं के आधार पर कच्छ की किसी एक कंपनी  का चयन करता है और फिर उसे करोड़ों रुपये के नमक की आपूर्ति का ठेका दिया जाता है. कहने को यह संक्षिप्त और साफ-सुथरी प्रक्रिया लगती है लेकिन जब हम तथ्यों पर जाते हैं तो तुरंत ही निगम की कार्यप्रणाली संदिग्ध लगने लगती है.

पिछले साल के आंकड़े बताते हैं कि गुजरात ने जिस नमक को 3,300 रुपये प्रति मेट्रिक टन के भाव से खरीदा था वही नमक पड़ोसी राज्य मप्र ने 6,700 प्रति रुपये मेट्रिक टन में खरीदा. जबकि गुजरात से काफी दूर और पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश 5,600 रुपये मेट्रिक टन के भाव में नमक खरीदता है. और तो और, गुजरात से कई राज्यों को पार कर पहुंचने वाला नमक आंध्र प्रदेश में 5,900 रुपये मेट्रिक टन के भाव से खरीदा जाता है. जाहिर है कि बाकी राज्यों के मुकाबले मप्र ने नमक खरीदने के लिए हर मेट्रिक टन पर डेढ़ हजार रुपये से ज्यादा पैसा खर्च किया था. सरकारी अधिकारियों के मुताबिक यह कोई पहली बार नहीं है जब मध्य प्रदेश ने महंगा नमक खरीदा हो. ऐसे में आपूर्तिकर्ताओं से लेकर महकमे के अधिकारियों और मंत्री तक की ईमानदारी पर सवाल उठना लाजिमी है.

दरअसल इस गड़बड़झाले की बुनियाद उन नियमों में है जिनके तहत नमक खरीद होती है. आरोप है कि नमक खरीदने के लिए जारी निविदा सूचना में जानबूझकर ऐसे पेंच डाले गए हैं जिससे सिर्फ दो-तीन कंपनियां ही निविदा भरने के योग्य  रह पाती हैं. जैसे कि निगम की निविदा सूचना में यह शर्त जोड़ी गई है कि ठेका उसी कंपनी को दिया जाएगा जिसने सालाना दस हजार मेट्रिक टन नमक की आपूर्ति सरकार या बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए की हो. इस वजह से अच्छी उत्पादन क्षमता व बाजार में अच्छी साख रखने के बावजूद कई कंपनियां प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाती हैं.

काबिले गौर है कि इस साल मप्र सरकार सूबे के लगभग 72 लाख गरीब परिवारों के लिए लगभग एक लाख मेट्रिक टन नमक खरीदेगी. लेकिन आश्चर्य कि निगम की निविदा में नमक आपूर्ति का ठेका उन कंपनियों को भी देने की छूट दे दी गई है जिनकी उत्पादन क्षमता न्यूनतम 75 हजार मेट्रिक टन हो. सरकार हर साल एक ही कंपनी को नमक आपूर्ति का ठेका देती है. अब सवाल है कि जिन कंपनियों की उत्पादन क्षमता ही 75 हजार मेट्रिक टन होगी तो वे कैसे एक लाख मेट्रिक टन नमक की आपूर्ति करेंगी. गुजरात की आधा दर्जन नमक कंपनियां आरोप लगा रही हैं कि निगम के अधिकारियों की कुछ चहेती कंपनियों की उत्पादन क्षमता 75 हजार मेट्रिक टन से ज्यादा नहीं है इसीलिए निविदा में जान-बूझकर यह शर्त जोड़ी गई है.

निविदा की तीसरी बड़ी शर्त है कि नमक आपूर्ति का ठेका उसी कंपनी को मिल सकता है जिसका आईएसआई चिह्न वाले आयोडीनयुक्त नमक का सालाना टर्नओवर कम से कम 20 करोड़ रुपये है. नमक कारोबार से जुड़े गुजरात के कई व्यापारियों का कहना है कि निगम की यह शर्त व्यावहारिक नहीं है. नमक कारोबार करने वाली एक कंपनी कच्छ ब्राइन (अहमदाबाद) के मुख्य प्रबंधक राजीव गुप्ता के मुताबिक, ‘सरकार के पास इस बात की जांच का कोई तरीका या व्यवस्था नहीं है कि किसी कंपनी ने यदि 20 करोड़ रुपये का नमक बेचा है तो पूरे का पूरा नमक आईएसआई चिह्न वाला आयोडीनयुक्त नमक ही होगा.’ गुप्ता का आरोप है कि निगम ने सारा खेल इस ढंग से खेला है कि बीते सालों की तरह इस साल भी चुनी हुई दो-तीन कंपनियों को क्वालीफाई करवाकर उनमें से किसी एक को नमक आपूर्ति का ठेका दिया जा सके.

गुजरात के नमक कारोबारी बताते हैं कि हिमाचल या आंध्र प्रदेश जैसे दूसरे राज्यों की नमक खरीद निविदाओं में ऐसी शर्तें नहीं हैं. इसके चलते कहीं ज्यादा संख्या में कंपनियां वहां निविदा भर पाती हैं. जाहिर है जब मध्य प्रदेश में गिनी-चुनी कंपनियां ही स्पर्धा में रहेंगी तो सरकार को नमक के लिए ज्यादा दाम चुकाने पड़ेंगे और इस बात की संभावना भी ज्यादा होगी कि अधिकारी कंपनियों से सांठ-गांठ करके आसानी से हेराफेरी कर पाएं.
नमक आपूर्ति के टेंडर को लेकर नमक कंपनियों ने मप्र सरकार को अब अदालत में घसीटा है. बीती 5 मई को कच्छ ब्राइन सहित कई कंपनियों ने निगम की शर्तों के खिलाफ जबलपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की. और इसके एक दिन बाद यानी 7 मई को कोर्ट ने स्थगत आदेश देते हुए निगम के नमक आपूर्ति के वर्क ऑर्डर (कार्य आदेश) पर रोक लगा दी है.

दूसरी तरफ मप्र नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारी नाम न बताने की शर्त पर (चूंकि मामला न्यायालय में है) बात करते हुए कहते हैं, ‘निगम तो बीते कई सालों से महंगी कीमत पर नमक खरीदता रहा है लेकिन किसी कंपनी ने पहले आपत्ति नहीं की. इस साल पहले के मुकाबले तीन गुना अधिक नमक खरीदा जाना है इस वजह से हर कंपनी आपूर्ति का ठेका लेना चाहती है.’

इस चुनावी साल में राज्य की शिवराज सरकार ने लाखों गरीब परिवारों को एक रुपये में एक किलो नमक देने का वादा किया है. सरकारी अनुमान के मुताबिक सरकार इसके लिए तकरीबन 65 करोड़ रुपये खर्च करेगी. लिहाजा गुजरात की कई नमक कंपनियों के बीच प्रदेश में नमक आपूर्ति का ठेका लेने की होड़ लग गई है. और इसी के चलते निगम की कई अनियमितताएं भी अब बाहर आ रही हैं. वहीं सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे मामले में भाजपा के पूर्व विधायक और निगम के चेयरमैन रमेश शर्मा को अंधेरे में रखा गया है. तहलका से बातचीत में शर्मा कहते हैं, ‘मुझसे न तो टेंडर की स्वीकृति ली गई है और न ही किसी अधिकारी ने मुझे कुछ बताया है.’

गेहूं, बारदाने जैसी चीजों की खरीद से जुड़े घोटाले नए नहीं हैं. मगर नमक जैसी सस्ती चीज की खरीद में हेराफेरी का यह मामला दुर्लभ हो सकता है. कहानी सीधी है कि महंगाई के इस जमाने में भले ही गरीब लोग नमक-रोटी खाने के लिए तरस रहे हैं लेकिन नौकरशाही उनके लिए आए नमक के पैसे पर भी गिद्ध झपट्टा मारने से नहीं चूक रही.

चैनल और आपदा

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उत्तराखंड की तबाही ने देश को हिला दिया है. ऐसी बड़ी प्राकृतिक आपदाएं सबके लिए परीक्षा की घड़ी होती हैं. मीडिया भी अपवाद नहीं है. ऐसे समय में जब भारी तबाही हुई हो और लाखों लोगों की जान दांव पर लगी हो, सूचनाओं की मांग बहुत बढ़ जाती है. संकट के समय में लोग अपने सगे-संबंधियों, मित्रों और सबसे बढ़कर अपने जैसे लोगों की पल-पल की खैर-खबर जानना चाहते हैं. आश्चर्य नहीं कि ऐसे संकट के समय में 24 घंटे के न्यूज चैनलों के दर्शकों की संख्या बहुत बढ़ जाती है.

चैनल भी इसे जानते हैं. उनके लिए यह अपनी कवरेज से दर्शकों का भरोसा जीतने और अपने दर्शक वर्ग के विस्तार का मौका होता है. जाहिर है कि कोई चैनल ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के कवरेज में पीछे नहीं रहना चाहता. हालांकि अधिकांश राष्ट्रीय चैनलों का देहरादून में स्थायी संवाददाता और ब्यूरो नहीं है, ज्यादातर स्ट्रिंगर्स के भरोसे हैं और यही कारण है कि इस आपदा और उसकी भयावहता का राष्ट्रीय चैनलों को पहले एक-दो दिन तक ठीक अंदाजा नहीं हुआ. इसके चलते सबसे तेज से लेकर आपको आगे रखने वाले चैनलों को रिएक्ट करने में समय लगा.

यानी सिर्फ उत्तराखंड की विजय बहुगुणा सरकार को ही इस आपदा की तीव्रता को समझने और राहत-बचाव का काम शुरू करने में देर नहीं लगी बल्कि चैनल भी देर से जगे. अगर राष्ट्रीय चैनलों ने 16-17 जून की रात/सुबह से इस खबर को उठा लिया होता, उनके स्थायी संवाददाता फील्ड में उतर गए होते और उसकी रिपोर्टिंग को प्राथमिकता दी गई होती तो शायद राज्य और केंद्र सरकार पर राहत-बचाव को जल्दी और बड़े पैमाने पर शुरू करने का दबाव बना होता. यह एक सबक है. राष्ट्रीय चैनल होने का दावा करने वाले चैनलों के पास देश के कोने-कोने में तो दूर, राज्यों की राजधानियों में भी स्थायी संवाददाता और ब्यूरो नहीं हैं. आखिर क्यों?

लेकिन एक बार जब न्यूज चैनल उत्तराखंड आपदा की कवरेज में उतरे तो उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया. चैनलों में अधिक से अधिक रिपोर्टिंग टीम भेजने और आपदाग्रस्त क्षेत्रों में सबसे पहले पहुंचने का दावा करने की होड़-सी लग गई. चैनलों के जाने-पहचाने स्टार एंकरों/रिपोर्टरों के अलावा दर्जनों रिपोर्टर/कैमरामैन आपदाग्रस्त इलाकों में ओबी वैन के साथ उतर गए. कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता था. जल्दी ही बचाव में लगे वायु सेना और राज्य सरकार के हेलिकॉप्टर्स पर चढ़कर आपदाग्रस्त इलाकों तक पहुंचने और राहत व बचाव की ‘एक्सक्लूसिव’ कवरेज दिखाने की होड़ में स्टार रिपोर्टरों की हैरान-हांफती-उत्तेजनापूर्ण रिपोर्टें चैनलों पर छा गईं. पीपली लाइव से हालात बन गए.

यह और बात है कि उत्तराखंड और वहां के भूगोल-पारिस्थितिकी से अनजान रिपोर्टर उसकी भरपाई नाटकीयता और तबाही के विजुअल्स से करते नजर आए. हद तो यह कि कई चैनल केदारनाथ की तबाही के बीच मंदिर के बचे रहने के चमत्कार से अभिभूत दिखे. उधर, ‘विकास’ की चिंता में हमेशा दुबले और पर्यावरणवादियों को ‘विकास’ के दुश्मन बताने वाले चैनलों के संपादक-एंकरों को इलहाम हुआ कि उत्तराखंड में बेलगाम और विनाशकारी ‘विकास’ के कारण ही यह प्राकृतिक आपदा वास्तव में, मानव-निर्मित आपदा है. चैनलों पर अचानक पर्यावरणवादियों की पूछ बढ़ गई. हिमालय में मौजूदा अनियंत्रित ‘विकास’ के मॉडल पर तीखे सवालों के बीच चैनलों के स्टूडियो गर्म हो गए.

लेकिन जल्दी ही यह गुस्सा मोदी बनाम राहुल और कांग्रेस-बीजेपी की तू-तू-मैं-मैं में स्खलित हो गया. यह संकेत है कि कुछ ही दिनों में उत्तराखंड की त्रासदी चैनलों की सुर्खियों से उतर जाएगी. आपदा भुलाई जाने लगेगी. स्टार एंकर/रिपोर्टर दिल्ली लौट आएंगे. हिमालय की कराह पीछे छूट जाएगी. चैनलों पर फिर से ‘विकास’ का अहर्निश कोरस शुरू हो जाएगा. जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. लेकिन क्या मानव निर्मित आपदा की शुरुआत यहीं से नहीं होती है?

अनहोनी का हिमालय

बड़ी त्रासदियां छोटी त्रासदियों को ढक लेती हैं. पिछले एक पखवाड़े की सारी खबरें उत्तराखंड की बाढ़ और तबाही पर केंद्रित रहीं. यह होना भी चाहिए था. लेकिन क्या इस बड़ी त्रासदी का शोक भी हमारे भीतर उतना ही बड़ा है? क्या ऐसी कोई राष्ट्रीय हूक दिख  रही है जो जैसे सब कुछ स्थगित कर दे? शोक का शोर नहीं होता, शोक में चुप्पी होती है. शोक में हम अपने भीतर टटोलते हैं.

फिर यह तो हिमालय जैसी विराट त्रासदी है. इस पर तो जैसे पूरे राष्ट्र को-उसके राजनीतिक नहीं, सामुदायिक आशयों में- एक बार चुप और मौन हो जाना चाहिए था, सोचना चाहिए था कि क्या अघटित घटित हुआ है, क्यों हुआ है, हम क्या न करें कि अगर जीवन देने वाली नदियां कभी उमड़ें, भरोसा दिलाने वाले पहाड़ कभी उखड़ें, कभी बादल फट जाए तो भी उन्हें सहेजने-समेटने और उनकी त्रासदी को कम करने लायक जगह बची रहे.
लेकिन जिस तरह का जीवन हम जीने लगे हैं, जिस तरह की मनुष्यता हम ओढ़ने लगे हैं, उसमें ऐसी चुप्पी की, और उससे निकलने वाले ऐसे प्रश्नों की जगह नहीं है. इस तबाही ने जिन परिवारों को बर्बाद कर दिया, उनके अलावा शायद बाकी सबके लिए उसका ज्यादा मोल नहीं है. निश्चय ही इस संकट में उन बचाव एजेंसियों ने बेमिसाल काम किया जिन्होंने खतरा उठाकर, मुसीबत मोल लेकर, भूख और बीमारी झेलते हुए और कभी-कभी जान देते हुए भी, रास्ते पर पड़े पहाड़ हटाए, नदियों पर कामचलाऊ पुल बनाए और ऐसे हजारों लोगों को निकाला जो बिल्कुल मौत के जबड़ों या दड़बों में बंद थे.

इसके बावजूद कहीं कुछ रुका नहीं. राजनीतिक दलों की सियासत चलती रही, टीवी चैनल त्रासदी को तमाशा बनाकर बेचते रहे, ब्रेकिंग न्यूज की न खत्म होने वाली पट्टियों के बीच मौत और तबाही को ज्यादा से ज्यादा सनसनीखेज बनाकर, संवेदना को भावुक लिजलिजेपन की पन्नी में लपेट कर पेश करने का काम चलता रहा. बेशक, मीडिया के कई रिपोर्टरों ने बिल्कुल सैनिकों की तरह तबाही के छोरों को छूने-समझने की कोशिश की, कई बार बेहद संवेदनशील पत्रकारिता की मिसाल भी पेश की, लेकिन इन सबके बावजूद सूचना के इस युग में एक बड़ा दायित्व भी जैसे तमाशे या कारोबार में बदल गया.

क्या इसलिए नहीं कि सूचना और सफलता की आपाधापी और भागदौड़ में हमने वह भाषा खो दी है जो ऐसी विराट त्रासदी के मर्म तक पहुंच सके? हमने वह विन्यास तोड़ दिया है जिसके भीतर ऐसा अघटित समा पाता?  मौत और त्रासदी ब्रेकिंग न्यूज नहीं हैं, लेकिन अगर इसे ब्रेकिंग न्यूज नहीं बनाएंगे तो निजी दुख की इस विराट कथा को उस बाजार तक कैसे पहुंचाएंगे जो सूक्ष्म रेखाओं को नहीं, स्थूल पट्टियों को ही देख पाता है और संवेदना के धरातल पर इतना कुंद हो चुका है कि ऐसी चीखती हुई पट्टियों से ही समझ पाता है कि कुछ बड़ा घटा है. इसके बाद उसका राहत उद्योग खुलता है, उसकी पर्यावरण की फिक्र चलती है, उसकी विकास की बहस शुरू होती है. ऐसी बहसों में सवाल भी जैसे तय होते हैं और जवाब भी जैसे तैयार होते हैं. मसलन, त्रासदी के पहले ही दिन सबको खयाल आ गया कि यह पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ का नतीजा है. अगले दिन उत्तराखंड में विकास की परियोजनाओं पर सवाल उठाए जाने लगे. उसके एक दिन बाद पर्यावरण बनाम विकास की बहस चली. इन सबके बीच आस्था में लहालोट लोग बताते रहे कि सब कुछ भले खत्म हो गया हो, भगवान ने केदारनाथ का मंदिर बचा लिया. भगवान होगा तो वह भी अपनी इस तारीफ पर रोया होगा.

निस्संदेह, उत्तराखंड में जो कुछ हुआ, उसमें विकास और धार्मिक पर्यटन के नाम पर पैदा किए गए बहुत सारे विद्रूपों का भी हाथ है. लेकिन जब यह पर्यटन का कारोबार नहीं था, तब भी त्रासदियां होती थीं और वे कम मर्मांतक नहीं होती थीं. इन सबका सबक एक ही है- प्रकृति को जितनी जगह चाहिए, उतनी हम नहीं दे रहे. लेकिन क्या यह सिर्फ उत्तराखंड की सच्चाई है? दिल्ली की हकीकत भी यही है- कभी एक बड़ा भूकंप आया तो यह पूरा महानगर जैसे ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा. और दिल्ली ही क्यों, विकास और बाजार के नाम पर तबाही के अलग-अलग बीज हमने तमाम शहरों में बो दिए हैं. जानते हुए भी हम इसे देखने को तैयार नहीं होते क्योंकि अगर यह विकास नहीं होगा, यह बाजार नहीं आएगा तो हमारी वह निर्बाध जीवन शैली नहीं चलेगी जिसकी हमें लत लग गई है. बेरोकटोक उपभोग का जो स्वर्ग हमने बसाया है, उसकी कोख में कई नरक बसते हैं, हमें मालूम है. लेकिन हम बदलते नहीं, जब कोई उत्तराखंड घटित होता है, तब कुछ दहल जाते हैं और जुमलों की तरह उन मुहावरों को दुहराने लगते हैं जो विकास, पर्यावरण, धर्म और आधुनिकता- सबके सौदागर हमें दे रहे हैं.

मगर हम इसे ज्यों का त्यों ले क्यों रहे हैं? क्योंकि एक समाज के रूप में, हमने अपनी भाषा, अपनी पहचान, अपने सरोकार खो दिए हैं- हम दु:ख व्यक्त करना नहीं जानते, दुख महसूस करना नहीं चाहते. दुख, बचाव, राहत- सबके पैकेज हैं जो कभी ऊपर से नीचे गिराए जा रहे हैं और कभी नीचे से ऊपर उठाए जा रहे हैं. जब उत्तराखंड में इस तथाकथित बचाव का काम खत्म हो जाएगा, तब असली मुसीबत आएगी, क्योंकि जो सड़ा हुआ, बदबू देता पहाड़ बचा रहेगा उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं होगा. तब शायद प्रकृति ही कुछ करेगी जो अंतत: सारी दुर्गंध सोख लेगी, सारे गुम शवों का खुद अंतिम संस्कार कर डालेगी, और नदियों को फिर से स्वच्छ और पहाड़ों को फिर से हरा-भरा बनाएगी. लेकिन तब तक हमारी जरूरतों, आदतों, लतों और हसरतों की वजह से लोगों को जो कुछ झेलना पड़ा उसका जिम्मेदार कौन होगा? और कौन यह गारंटी लेगा कि हमारी अनदेखी का जो हिमालय है उसमें और कोई अनहोनी घटित नहीं होगी?

करवट लेती कुदरत

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जुलाई 2005 में मुंबई की बाढ़
26 जुलाई, 2005 को मुंबई में 944 मिमी पानी गिरा. यह बारिश इतनी थी कि पिछले 100 साल की शहर की याददाश्त में कभी इतना पानी नहीं गिरा था. इस अप्रत्याशित बारिश ने एक अप्रत्याशित बाढ़ को जन्म दिया जिसने देश की आर्थिक राजधानी को अगले चार दिन तक अपंग बनाए रखा. जगह-जगह पानी भरा होने के कारण सड़कें टूट गई थीं और नाले जाम थे. इस बाढ़ में करीब 100 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. उस साल पूरे महाराष्ट्र में ही जरूरत से ज्यादा बारिश हुई थी. पूरे राज्य में मौतों का आंकड़ा दो सौ के पार पहुंच गया था. वैज्ञानिकों के मुताबिक जल निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं होने और जनसंख्या में हुई बेहिसाब बढ़ोतरी के कारण इस बारिश का दोहरा दुष्प्रभाव सामने आया था. तबाही के बाद अगले कुछ दिनों में वैज्ञानिकों ने काफी विचार के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि मुंबई की बाढ़ के पीछे ग्लोबल वार्मिंग की भूमिका है. साल दर साल बढ़ते तापमान की वजह से समुद्री पानी के वाष्पीकरण की दर बहुत तेज हो गई है. ‘मरीन ऑब्जर्वेशन’ के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं. उनके मुताबिक पिछले 50 वर्षों में समुद्री सतह से वाष्प उत्सर्जन में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इसी अध्ययन में यह भी कहा गया है कि पिछली आधी सदी में भयंकर वर्षा या बादल फटने की घटनाओं में प्रति दशक 14.5 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हुई है. मुंबई की बाढ़ और बारिश इसी का नतीजा थी और चेतावनी भी.

लेह में बादल का फटना
कोल्ड डेजर्ट यानी ठंडा रेगिस्तान. लद्दाख को इसी उपनाम से जाना जाता है. इसकी वजह यह है कि यहां जितनी ज्यादा ठंड होती है उतनी ही तेज सूर्य की किरणें भी यहां पड़ती हैं. एक साथ ही यहां धूप में तेज गर्मी और छांह में ठंड का अहसास लिया जा सकता है. अधिकतर वक्त चटख धूप वाले लद्दाख के लेह इलाके में छह अगस्त, 2010 को बादल फटने की विनाशकारी घटना हुई. इसकी वजह से पूरे लेह क्षेत्र में भयंकर बाढ़ और भूस्खलन की घटना हुई. इस आपदा में  डेढ़ सौ से अधिक लोगों की मौत हो गईं और गांव के गांव बह गए. इसके अलावा लेह की आजीविका के मुख्य आधार इनके जानवर बड़ी संख्या में मारे गए. इससे लेह की पूरी अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गई. स्कूलों, दफ्तरों, रास्तों और पुलों समेत तमाम दूसरी जगहों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ा था.

जानकारों के मुताबिक लेह की त्रासदी इंसानी हस्तक्षेप की वजह से हुई. लेह में आई बाढ़ और भूस्खलन की वजह असल में ये थी कि वह पूरा का पूरा इलाका एक ऐसी धारा के ऊपर बसा हुआ था जो काफी समय से सूखा पड़ा था. बीते कुछ सालों के दौरान इस रास्ते में बड़ी मात्रा में निर्माण  कार्य हुए जिससे पुरानी धारा जिस रास्ते से बहती थी वह बेहद संकरा हो गया था. 2010 के अगस्त महीने में जब अचानक से भीषण बरसात हुई तो पानी को बहने के लिए पर्याप्त रास्ता नहीं मिल पाया. पर पानी अपना रास्ता बना ही लेता है. अपने रास्ते में पड़ने वाले हर घर-मकान को तोड़ते पानी आगे निकल गया और पीछे तबाही के निशान छोड़ गया. भुरभुरी मिट्टी के ऊपर बने ये मकान पानी के प्रचंड दबाव के सामने टिक नहीं सके. जानकारों के मुताबिक लेह में बादल फटना एक सामान्य घटना थी लेकिन इतनी बड़ी जनहानी की वजह रही मानवीय लापरवाही. लोगों ने पारंपरिक तरीके छोड़कर आधुनिक कंक्रीट और सीमेंट आदि के घर बनाना शुरू कर दिया है. लद्दाख में ऐसा भी देखने में आया कि हाल के समय में बने मकान मलबे के ढेर में बदल गए थे जबकि स्थानीय शैली में बने 400 साल पुराने भवन अपनी जगहों पर सुरक्षित बने रहे.

उड़ीसा का चक्रवाती तूफान
1999 में आया उड़ीसा का चक्रवाती तूफान हिंद महासागर में आया सबसे शक्तिशाली तूफान माना जाता है. यह 25 अक्टूबर, 1999 से शुरू होकर 3 नवंबर, 1999 तक चला. 260 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाला यह तूफान देखते ही देखते उड़ीसा के तटीय क्षेत्रों से आगे बढ़ते हुए लगभग बीस से तीस किलोमीटर भीतर तक तबाही फैला चुका था. इस तूफान में 15,000 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. लगभग दस लाख हेक्टेयर में फैली खेती तबाह हो गई और सोलह लाख लोग बेघर होकर सड़कों पर आ गए. तटीय इलाकों में आया यह सबसे विकराल तूफान था और इसका दायरा सबसे अधिक था. उड़ीसा के पुरी, गंजाम, बालासोर, भद्रक, केंद्रापड़ा और जगतसिंहपुर समेत कुल 14 जिले इस आपदा की चपेट में पूरी तरह से ध्वस्त हो गए थे. इस तूफान ने देश के सामने एक बड़े मानवीय विस्थापन का संकट भी खड़ा किया था. लाखों परिवारों को उड़ीसा के तटीय इलाकों से हटा कर सुरक्षित जगहों पर ले जाया गया. अकेले रेड क्रास के 23 राहत शिविरों में 44,500 के करीब लोगों को रखा गया था. इसकी विभीषिका तूफान गुजरने के काफी दिनों बाद तक इन इलाकों में देखने को मिली. सैकड़ों लोग भुखमरी, संक्रामक बीमारी और गंदे पानी के चलते अपनी जान से हाथ धो बैठे. इस चक्रवाती तूफान को ‘सायक्लोन जीरो बी’ के नाम से भी जाना जाता है.

हिमाचल के मैदानी इलाकों में बर्फबारी
2012 के जनवरी महीने में हिमाचल प्रदेश एक अनोखी घटना का चश्मदीद बना. प्रदेश के मैदानी इलाकों में भयंकर बर्फबारी हुई. इसने वहां के लोगों की दिनचर्या को तहस-नहस कर दिया. इस घटना ने आम लोगों के साथ-साथ वैज्ञानिकों को भी सकते में डाल दिया. प्रदेश के कम ऊंचाई वाले इलाकों ऊना जिले के चिंतपूर्णी और कांगड़ा जिले के नूरपुर, जसूर तथा हमीरपुर शहरी क्षेत्र के साथ-साथ लगभग सभी निचले इलाकों में बर्फबारी हुई. समुद्रतल से महज 400 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ का गिरना यूं भी अजीबोगरीब घटना थी. कई इलाकों के निवासियों ने तो अपने जीवनकाल में कभी भी बर्फबारी देखी ही नहीं थी. ज्यादातर जगहों पर पहली बार बर्फ गिरी थी. हिमाचल में उस साल बर्फबारी ने 76 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया था. इससे पहले 1971 में अवाहदेवी और टौणीदेवी इलाके में हल्की बर्फबारी हुई थी लेकिन इतने बड़े पैमाने पर बर्फबारी की यह पहली घटना थी. वैज्ञानिकों ने हिमाचल के निचले इलाकों में हुई इस बर्फबारी के लिए यूरोप के पश्चिमोत्तर में स्थित काला सागर में सक्रिय हुए एक पश्चिमी विक्षोभ को वजह माना था. वैज्ञानिकों का कहना था कि इस विक्षोभ के कारण पैदा हो रही हवाओं का वेग इतना बढ़ गया था कि ऊंचे इलाकों में गिरने वाली बर्फ हवा के साथ उड़कर निचले इलाकों तक पहुंच गई थी.

चेरापूंजी में सूखा
बचपन में सामान्य ज्ञान के सवालों में पूछा जाता रहा है कि भारत में सबसे अधिक वर्षा कहां होती है और उसका उत्तर हमेशा चेरापूंजी हुआ करता था. शायद नई पीढ़ी के लिए इस सवाल का उत्तर कुछ और हो जाए. कभी सर्वाधिक वर्षा वाली जगह के रूप में चर्चित चेरापूंजी से बारिश साल दर साल मुंह फेरती जा रही है. पिछले साल देश ने चेरापूंजी का एक विचित्र चेहरा देखा. साल भर पानी से सराबोर रहने वाले चेरापूंजी के लोग पीने के पानी के लिए लाइन लगाकर इंतजार कर रहे थे. पर्यावरणविदों का कहना है कि चेरापूंजी में होने वाली बारिश में हर साल 15 से 20 प्रतिशत तक की कमी आ रही है. बारिश की मात्रा में यह कमी पिछले एक दशक से देखी जा रही है. औसतन यहां 1,100 सेंटीमीटर बारिश होती थी. 2005 के बाद सालाना 800 से 900 सेंटीमीटर बारिश ही हो रही है. चेरापूंजी में कभी भी बड़े-बड़े जंगल नहीं रहे हैं और यहां पेड़ कटान की घटनाएं भी ना के बराबर ही होती रही हैं. इसलिए माना जा रहा है कि दूसरे हिस्सों में हो रही पर्यावरणीय घटनाओं (ग्लोबल वार्मिंग) का दुष्प्रभाव चेरापूंजी पर पड़ रहा है. बरसात केपर्यायवाची चेरापूंजी में आलम यह है कि लोगों को सर्दियों में पानी की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है. जनसंख्या में बढ़ोतरी भी चेरापूंजी में पानी की कमी का एक बड़ा कारण है. 1961 में इस इलाके की आबादी मात्र 7,000 थी जो अब करीब पंद्रह गुना बढ़ गई है. चेरापूंजी के लिए चिंता की बात यह भी है कि यदि बारिश की मात्रा इसी तरह कम होती गई तो चेरापूंजी के आस-पास मौजूद तमाम जल-प्रपातों के लिए भी संकट खड़ा हो सकता है.