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नाम का मनरेगा!

फोटो: साहिल मदान
फोटो: साहिल मदान

राजधानी भोपाल के सीहोर रोड पर बन रही एक गगनचुंबी इमारत के नीचे कुछ मजदूर परिवारों ने ईंटों की अस्थायी चारदीवारी बना ली है. इन्हें अंदाजा है कि वे कुछ महीनों तक यहीं रहेंगे. ठीक से हिंदी न बोल पाने वाले ये सभी लोग धार जिले की डही जनपद पंचायत के भिलाला आदिवासी हैं और अपने घर में भूखों मरने से बचने के लिए 500 किलोमीटर का सफर तय करके यहां तक पहुंचे हैं.

मार्च के बाद प्रदेश में खेतीबाड़ी के काम बंद हो जाते हैं. इसके बाद मजदूरों को काम की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है. कुछ सालों पहले तक इन दिनों में निमाड़, मालवा सहित बाकी आदिवासी अंचल के लाखों लोग पड़ोसी राज्य गुजरात और महाराष्ट्र के बड़े शहरों की ओर कूच कर जाते थे. किंतु महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गांरटी योजना आने के बाद उनका हर साल का यह क्रम टूट गया. उन्हें गांव में ही काम मिलने लगा. इसीलिए पिछले छह साल में प्रदेश से अप्रैल, मई और जून के महीनों में होने वाला पलायन रुक-सा गया था. धार जिले के डही पंचायत के ही सुगरलाल बताते हैं कि उनके लिए यह योजना मुसीबत के दिनों में घर चलाने का अच्छा जरिया बन गई थी. मगर इस साल एक अप्रैल के बाद से उनकी पंचायत में किसी को एक दिन का भी काम नसीब नहीं हुआ. इसलिए एक बार फिर आस-पास के गांव के गांव खाली हो गए हैं.

दरअसल मध्य प्रदेश में सतपुड़ा और विंध्याचल की पहाड़ियों के बीच बसे लाखों लोगों के लिए काम की उम्मीद जगाने वाली मनरेगा इस वित्तीय वर्ष में अकाल मौत के मुंह में चली गई है. हालत यह है कि जिन महीनों में कई सौ करोड़ रुपये खर्च होने चाहिए थे, उनमें यह आंकड़ा अभी तक पचास करोड़ रुपये तक भी नहीं पहुंचा. नतीजा यह कि मनरेगा से बेदखल लोग जिंदा रहने के लिए सालों पुरानी परंपरा यानी पलायन पर लौट आए हैं.  आधे दशक के बाद प्रदेश के लाखों मजदूर काम की तलाश में अब फिर से इधर-उधर भटक रहे हैं.

मध्य प्रदेश पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं. लेकिन तहलका के पास मौजूद विभाग की ताजा रिपोर्ट के आंकड़े काफी चौंकाने वाले हैं. बीते साल अप्रैल से जून तक मनरेगा में 12 सौ करोड़ रुपये खर्च हुए थे. इस साल सरकार ने इस अवधि के लिए अनुमानित राशि 16 सौ करोड़ रुपये रखी थी. पर हैरानी की बात है कि इस साल अप्रैल से अब तक मप्र के सभी 50 जिलों में 25 करोड़ रुपये भी खर्च नहीं हुए. दूसरे शब्दों में मनरेगा के तहत हर साल इन तीन महीनों में खर्च की जाने वाली राशि का यह दो प्रतिशत पैसा भी नहीं है. ऐसा तब है जब बीते साल धार और बालाघाट जैसे एक-एक आदिवासी जिले में सौ-सौ करोड़ रुपये का काम हुआ था. यही वजह है कि इस बार मनरेगा का पैसा गांवों तक नहीं पहुंचने से जहां गांवों में विकास का काम ठप पड़ा है वहीं जिस संख्या में ग्रामीण गांवों से पलायन कर रहे हैं उसे भांपते हुए विभाग के होश उड़ गए हैं. लिहाजा बीती 27 मई को विभाग आयुक्त ने सभी कलेक्टरों को यह फरमान भेजा है कि वे कैसे भी राज्य के 20 लाख मजदूरों को पलायन से रोकें.

सवाल उठता है कि बीते सालों तक जो योजना ठीक-ठाक चल रही थी वह यह साल शुरू होने से पहले ही ठप क्यों हो गई.  दरअसल ऐसा हुआ राजधानी भोपाल में बैठे चंद अदूरदर्शी नौकरशाहों के चलते. इन्होंने मनरेगा को हाईटेक बनाने के लिए इस साल जनवरी में बिना तैयारी के सभी जिलों में ई-वित्तीय प्रबंधन लागू कर दिया. इसके लिए उन्हें लाखों मजदूरों के खातों को न केवल राष्ट्रीयकृत बैंक से जुड़वाना था बल्कि उन खातों को ‘नरेगा सॉफ्ट’ नामक सॉफ्टवेयर में डलवाते हुए सभी का ई-मस्टर (कम्प्यूटर पर मजदूर की मजदूरी का ब्योरा) बनवाना था. प्रदेश में मनरेगा के 50 लाख से ज्यादा मजदूर हैं, इस लिहाज से एक जिले के एक लाख मजदूरों के खाते बैंकों में खुलवाना इतना बड़ा काम था जिसे कुछ दिनों में कर पाना संभव नहीं था. यह सारा काम मार्च तक हो जाना था, लेकिन नहीं हुआ. इस तरह योजना का सारा काम रुक गया और इसका खामियाजा बेकसूर मजदूरों को भुगतना पड़ा.

प्रदेश में इसके पहले 13वें वित्त आयोग और राज्य वित्त आयोग की राशि ग्राम पंचायतों को सौंपी जाती थी और पंचायतें ग्रामसभा के जरिए निर्माण कार्य कराती थीं. मगर अब जबकि मनरेगा सहित सभी कामों के वित्तीय अधिकार से सरपंचों को बेदखल किया जा चुका है तो उनमें असंतोष है और इसलिए उन्होंने मार्च के बाद से मनरेगा से खुद को अलग कर लिया है.

इसके पहले मनरेगा के मामले में मध्य प्रदेश अव्वल राज्यों में गिना जाता था. बालाघाट, बैतूल और अनूपपुर जैसे जिलों को प्रधानमंत्री ने उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए अवॉर्ड भी दिया था. आज इन्हीं जिलों के लाचार मजदूर अधिकारियों से काम की गुहार लगा रहे हैं. इस मुद्दे पर कोई भी आला अधिकारी आधिकारिक जवाब नहीं देना चाहता. पंचायत और ग्रामीण मंत्री गोपाल भार्गव इस बारे में विभाग की अतिरिक्त प्रमुख सचिव अरुणा शर्मा से संपर्क साधने को कहते हैं. शर्मा मानती हैं कि मनरेगा के मामले में प्रदेश पिछड़ गया है. वे कहती हैं, ‘आने वाले दिनों में इसकी भरपाई कर ली जाएगी.’ सवाल है कि भरपाई होगी कैसे. आने वाले तीन महीने बारिश में निकल जाएंगे और उसके बाद का समय चुनावी सरगर्मियों में जाएगा.

वहीं एक वर्ग की सोच है कि मनरेगा में मनमानी, कामचोरी और अनियमितताओं के चलते भी राज्य में यह योजना बैठ गई. दिल्ली में बहस चल रही है कि मनरेगा के चलते किसानों को खेती के लिए मजदूर नहीं मिलते. जबकि राज्य में मनरेगा इतना फटेहाल है कि मजदूर मनरेगा में काम करने के बजाय शहर जाना चाहता है. बड़वानी में काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता माधुरी कृष्णास्वामी बताती हैं कि मनरेगा में मजदूरों को एक तो आधा-अधूरा पैसा बांटा जाता है और उस पर भी यह उन तक छह महीने के बाद तक पहुंचता है. वे कहती हैं, ‘बीते कुछ सालों में ही मनरेगा में मजदूर आदिवासियों की तेजी से घटती संख्या उनका मोहभंग दिखाती है.’
मनरेगा के चलते बीते सालों तक मप्र के 52 हजार गांवों में सालाना साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये आते थे. इसलिए यह योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था की अहम धुरी बन गई थी. भले ही यह पैसा मजदूरों के खातों से निकलकर छोटे-छोटे दुकानदारों तक पहुंचता था, लेकिन धनराशि का यह चक्र करीब दो करोड़ आबादी के बीच चलता था. इन दिनों यदि यह पैसा दिल्ली से प्रदेश के गांवों तक पहुंचता तो न केवल मजदूर परिवारों को काम मिलता बल्कि उनके खर्च की क्षमता भी बढ़ती. और इसका असर तीज-त्योहार और हाट बाजारों पर पड़े बिना नहीं रहता. लेकिन ऐसा नहीं होने से ग्रामीण इलाके के हाट बाजारों में जहां पिछले साल के मुकाबले लाखों रुपये की कम खरीदी हुई है वहीं इन बाजारों की रौनक भी उड़ी हुई है.

इंडियन पैसा लीग

प्रियदर्शन
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आईपीएल में सट्टेबाजी और स्पॉट फिक्सिंग के ताज़ा विवाद का वास्ता सिर्फ क्रिकेट में चली आई गंदगी से नहीं, बल्कि एक ज्यादा बड़ी सड़ांध से है जो हमारी नई पूंजीपरस्त व्यवस्था में मौजूद है. इस व्यवस्था को पूंजी और सत्ता का एक गठजोड़ चलाता है जो तटस्थ होने का दिखावा करता है, लेकिन मूलतः भ्रष्ट है. जब कोई बड़ा खुलासा आता है तो उसकी तटस्थता तार-तार हो जाती है, उसका गठजोड़ उजागर हो जाता है.

आईपीएल में भी यही हुआ है. पहले बीसीसीआई प्रमुख श्रीनिवासन को बचाने की कोशिश हुई और जब लगा कि यह संभव नहीं होगा तो उस शख्स को लाकर बिठा दिया गया, जिस पर कभी बीसीसीआई ने ही गंभीर आरोप लगाए थे. अब जगमोहन डालमिया खेल की गंदगी दूर करने की बात कर रहे हैं. यह सब उस बीसीसीआई में हो रहा है जिसकी प्रशासकीय कमेटी में कांग्रेस के राजीव शुक्ला और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी शामिल हैं और बीजेपी के अरुण जेटली और नरेंद्र मोदी भी, और जिसके अलग-अलग आयोजनों में किसी न किसी रूप से देश के कई बड़े औद्योगिक घराने जुड़े हुए हैं. शुचिता की खूब बात करने वाली बीजेपी के सबसे बड़े नेता यहां किसी का इस्तीफा नहीं मांग रहे, बीच का रास्ता खोज रहे हैं कि विवादों का सांप भी मर जाए और गठजोड़ की लाठी भी बची रहे.

दरअसल यह पूंजी का खेल है जो अपने नियम और अपनी संस्कृति गढ़ रही है. सिर्फ क्रिकेट ही नहीं, हमारी राजनीति, हमारे मनोरंजन, समूचे सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों के निर्धारण और नियमन में यह पूंजी सबसे बड़ी भूमिका निभा रही है. कभी कभी तो वह स्वयं नियामक भी हो जाती है और तर्क भी. बहुत सारे स्कूल, अस्पताल और कारखाने इसलिए बंद कर दिए जा रहे हैं कि वे मुनाफा नहीं दे रहे या पूंजी पैदा नहीं कर रहे. जिन दूसरे खेलों और उपक्रमों को पूंजी का यह आशीर्वाद हासिल नहीं है, वे विपन्न हैं, पीछे छूटे हुए हैं.

यह बस इतना याद दिलाने की कोशिश है कि धीरे-धीरे हम एक ऐसे समाज में बदलते जा रहे हैं जहां पूंजी ही इकलौती नैतिकता है, मुनाफा ही इकलौता तर्क है. इस पूंजीतंत्र में काले पैसे और हवाला से लेकर श्रम कानूनों की अवहेलना का एक पूरा जंजाल फैला हुआ है. लेकिन यही पूंजी तय करती है कि खेल किस तरह चलेगा, फिल्में कैसी बनेंगी, राजनीति किस तरह से होगी, पढ़ाई कैसे होगी, इलाज कैसे होगा, लोग सड़कों पर किस तरह चलेंगे, वे कहां रहेंगे, क्या खाएंगे, कैसे जिएंगे और कैसे मरेंगे. यह अनायास नहीं है कि हमारे समय के सबसे बड़े नायक लेखक या चिंतक या कलाकार नहीं हैं, बल्कि उद्योगपति और उनके इशारों पर बनाए जा रहे अभिनेता और क्रिकेटर हैं. हद तो यह है कि ये उद्योगपति सिर्फ पैसा कमाने के गुर नहीं सिखा रहे हैं, समाज को चलाने का ढंग भी बता रहे हैं. वे शिक्षा सुधार कमेटी में होते हैं, वे सामाजिक परिवर्तन की कमेटी में होते हैं, वे हुनर तय करने वाली कमेटी में हैं- वे बाजार में पैसा बनाने में सफल हैं, इसलिए हर जगह सफलता की गारंटी बने हुए हैं.

दुर्भाग्य से जिन संस्थाओं या प्रतिष्ठानों को पूंजी के इस आक्रमण या अतिक्रमण का प्रतिरोध करना है, वे या तो एक-एक कर खत्म की जा रही हैं या फिर पूंजी की जरूरतों के हिसाब से बदली जा रही हैं. स्कूलों से लेकर कॉलेजों तक में पढ़ाई इसलिए नहीं कराई जा रही कि देश को अच्छे इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, प्रबंधक, लेखक या विचारक मिलें, बल्कि इसलिए कराई जा रही है कि उन्हें अच्छे पैसे वाली नौकरी मिले. विश्वविद्यालय ऐसी नौकरी दिलाने में नाकाम हैं तो वे अप्रासंगिक हैं, उन्हें बदला जा रहा है. स्कूल और अस्पताल भी इस तरह खोले जा रहे हैं कि वे फाइव स्टार होटल लगें और वहां किया जा रहा निवेश कई गुना बड़ा होकर वापस लौटे.यह पूंजी हमारे पूरे कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को ही क्षतिग्रस्त कर रही है. उसे अपने लिए सस्ते कर्ज चाहिए, रियायतें चाहिए, सस्ती ज़मीन चाहिए, लेकिन गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी उसे मंजूर नहीं, उन सरकारी अस्पतालों और स्कूलों में पैसा लगाना मंजूर नहीं जहां मुफ्त में पढ़ाई या इलाज का इंतजाम हो.

इस पूरी व्यवस्था में, अमीरों की इस आम सहमति में, हमारे लोकतंत्र की सबसे मुश्किल चुनौतियां छिपी है. सामाजिक बराबरी का या सबके लिए संसाधनों का सवाल बहुत पीछे छूट गया है. दलित, आदिवासी, पिछड़े सब जैसे हाशियों पर खोए हुए हैं. एक ताकत उनके पास उनके वोट की है जिसकी वजह से उनका एक तबका इस राजनीतिक लूटतंत्र में अपना हिस्सा वसूल लेता है, लेकिन कुल मिलाकर उनकी सुनवाई यहां नहीं है. ऐसे में इस लोकतंत्र से निराश या नाराज लोग, विकास के नाम पर उजाड़े जा रहे समुदाय तरह-तरह की हिंसा के जाल में घिरते दिखाई देते हैं.

आईपीएल या क्रिकेट को साफ करना निश्चय ही जरूरी है, लेकिन उससे जरूरी हमारे समय के इस आक्रामक, अराजक और वैश्विक पूंजीवाद के संदिग्ध कारोबार से निपटना है, जो भारत में तरह-तरह से बना हुआ है.पिछले दिनों सामने आए तमाम तरह के घपले-घोटालों में नेताओं, अफसरों और उद्योगपतियों का जो गठजोड़ फंसता दिखाई पड़ा, इत्तिफाक से वही गठजोड़ आईपीएल में भी नज़र आ रहा है. दरअसल असली घपला यही है कि हमारे यहां पूंजी के सामने समर्पण भाव बढ़ता जा रहा है. वह एक समाज के रूप में हमारी स्मृति, चेतना और नैतिकता पर लगातार हमला कर रही है, उसे बदल रही है ताकि यह समर्पण स्थायी हो सके, उसका दानवी विस्तार अवेध्य-अवध्य हो सके. सवाल है, क्या इस उग्र पूंजीवाद से लड़ने की क्षमता हम विकसित कर पाएंगे? इस सवाल का सीधा जवाब समझ में नहीं आता, लेकिन यह जरूर समझ में आता है कि अगर नहीं लड़ पाएंगे तो एक समाज के रूप में बने रहने की ताकत खो देंगे.

शुक्ल-कृष्ण के बीच

विद्याचरण शुक्ल कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ सीधा संपर्क रखने और सक्रियता से काम करने वाले शायद ऐसे इक्का-दुक्का कांग्रेसी नेताओं में रहे होंगे जिन्होंने उनके परनाना नेहरू के साथ भी इतनी ही सक्रियता से काम किया था. यह 1956 की बात है जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल के निधन के बाद खुद नेहरू ने 27 साल के उनके बेटे विद्याचरण को लोकसभा चुनाव लड़ने की सलाह दी थी. 1957 में कांग्रेस ने उन्हें छत्तीसगढ़ की महासमंद सीट से टिकट दिया और वे 28 साल की उम्र में ही सांसद बन गए.

बीती 25 मई को नक्सली हमले में घायल होने के बाद गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में अपने जीवन की अंतिम सांस (11 जून को) लेने वाले शुक्ल ऐसे राजनेता रहे जिनके लिए राजनीति का संगीत राजनीतिक विचार मंथन से नहीं, बल्कि भारी राजनीतिक सक्रियता से निकलता था. उन्हें अपने जीवन में कभी इसका रियाज नहीं करना पड़ा. विद्याचरण शुक्ल को राजनीति अपने पिता से विरासत में मिली थी. यह भी खास बात है कि जमीनी राजनीति के सबक उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन में सीखे थे. उस दौरान जब उनके पिता पंडित रविशंकर शुक्ल के साथ घर के अन्य पुरुष सदस्य जेल में बंद रहते तो वे अपने साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ साइक्लोस्टाइल पैंफलेट तैयार करके उसे वितरित किया करते थे.

वैसे तो शुक्ल की पूरी जिंदगी कई बड़े राजनीतिक झंझावतों के दौर से गुजरी है, लेकिन उनके जीवन में पहला बड़ा राजनीतिक मोड़ तब आया था जब वे 1962 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के एक प्रभावशाली नेता खूबचंद बघेल को पराजित करके लोकसभा पहुंचे. तब विपक्ष ने उनके इस निर्वाचन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई और कोर्ट ने उनके निर्वाचन को अवैध मानते हुए उनके छह साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ जब शुक्ल ने चुनाव आयोग को एक आवेदन दिया तो आयोग ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी. राजनीति से जुड़े लेकिन उससे बाहर के दांव-पेंचों से शुक्ल का यह पहला वास्ता था और वे इसमें जीत चुके थे. इस जीत ने उनका आत्मविश्वास इतना बढ़ाया कि इस बूते वे नेहरू जी के बाद जल्द ही इंदिरा गांधी के करीबी हो गए.

शुक्ल के राजनीतिक जीवन का जो सबसे चर्चित और विवादित अध्याय है वह गांधी परिवार के नजदीक रहते हुए ही उनके हिस्से में आया. 25 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 के बीच आपातकाल के दौरान वे सूचना प्रसारण मंत्री थे. इस समय मीडिया पर जिस कड़ाई से उन्होंने सेंसरशिप लागू की वह आज तक लोगों को याद है. खबरों पर प्रतिबंध के अलावा अमृत नाहटा द्वारा बनाई गई फिल्म ‘ किस्सा कुर्सी का ‘ (कहा जाता है कि इस फिल्म की कहानी इंदिरा गांधी और आपातकाल से प्रेरित थी ) पर प्रतिबंध और उसकी रीलों को नष्ट करने का मामला, ऑल इंडिया रेडियो पर किशोर कुमार के गानों पर प्रतिबंध जैसी कई घटनाएं उनकी सत्ता केंद्र के प्रति कथित प्रतिबद्धता की मिसाल मानी जाती हैं.

आपातकाल की समाप्ति के बाद कांग्रेस के जो वरिष्ठ नेता चुनाव हारे उनमें शुक्ल भी शामिल थे. यह एक तरह से सत्ता केंद्र से उनके दूर हो जाने का समय था.  इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में वे थोड़े समय के लिए हाशिये पर चले गए. इसी दौर में पहली बार शुक्ल ने कांग्रेस छोड़ी थी. 1987 में उन्होंने वीपी सिंह, अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद जैसे नेताओं के साथ मिलकर जनमोर्चा का गठन किया. वीपी सिंह के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही शुक्ल एक बार फिर कैबिनेट में मंत्री बन गए. इसके बाद चंद्रशेखर और पीवी नरसिंह राव की सरकारों में भी वे मंत्री रहे.

केंद्र की राजनीति में हमेशा खुद को दिग्गज साबित करते रहे विद्याचरण शुक्ल के लिए यह बड़ी विडंबना रही कि छत्तीसगढ़ में वे राज्य के क्षत्रपों से आगे नहीं बढ़ पाए. उन्होंने छत्तीसगढ़ के निर्माण के लिए लाखों कार्यकर्ताओं को लामबंद करके संघर्ष मोर्चा का गठन किया था. शुक्ल को उम्मीद थी कि वे राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बनेंगे लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने अजीत जोगी को मुख्यमंत्री बना दिया. वर्ष 2000 से 2003 तक का पूरा दौर उनके लिए राजनीतिक उठापटक से भरा रहा. इस दौरान शुक्ल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए. उस समय हुए विधानसभा चुनाव में  राकांपा को मात्र एक सीट मिली, लेकिन उसे मिले वोटों ने जोगी को सत्ता से बाहर कर दिया. वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में शुक्ल ने भाजपा का दामन थामा और अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी अजीत जोगी से पराजय के बाद बेहद खुले मन से यह भी माना कि वे सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली पार्टी के चक्कर में फंस गए थे.

उम्र के 84 पड़ाव देख चुके शुक्ल नवंबर, 2007 में अपनी मूल पार्टी कांग्रेस में लौटे थे. अपनी इस वापसी के साथ ही उन्होंने खुद को बेहद चुस्त-दुरुस्त और सक्रिय भी कर लिया था. उन्होंने इच्छा जाहिर की थी कि वे अंतिम बार महासमुंद सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं. हाल ही में वे जिस तरह से कांग्रेस की रैलियों में शामिल हो रहे थे उससे एक बार फिर लगने लगा था कि उनकी प्रासंगिकता राजनीति में अभी खत्म नहीं हुई है.

हिचक का सबब

शैलेश गांधी, पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त
शैलेश गांधी, पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) द्वारा हाल ही में राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के दायरे में लाने का फैसला स्वागत योग्य है.

इस पर राजनीतिक दलों ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है उस पर किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए. आखिर सत्ता में बैठा हुआ कौन व्यक्ति पारदर्शी होना चाहता है? यह स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति है.

दरअसल इस देश के राजनीतिक वर्ग को पूरी तरह से पता ही नहीं है कि आरटीआई है क्या. बल्कि इस कानून का इस्तेमाल करने वाला आम आदमी इसे नेताओं से ज्यादा अच्छी तरह समझता है. राजनीतिक वर्ग खुद को दूसरे लोगों की तुलना में विशेष समझता है. उसकी नकारात्मक प्रतिक्रिया इसी मानसिकता से उपजी है. ऐसे में राजनीतिक दलों से तीन सवाल आवश्यक तौर पर पूछे जाने चाहिए. पहली बात, क्या उन्हें सरकार से किसी तरह की वित्तीय मदद नहीं मिलती? अगर नहीं मिलती तो सीआईसी का फैसला गलत है. लेकिन अगर उन्हें मिलती है तो उन्हें आरटीआई के दायरे में आना चाहिए. आरटीआई अधिनियम स्पष्ट कहता है कि कोई भी गैरसरकारी संस्थान जिसे सरकार से अच्छा-खासा पैसा मिलता है वह जनता के प्रति जवाबदेह संस्था है और राजनीतिक दल इसी श्रेणी में आते हैं. इस फैसले में पीठ ने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक दलों को टैक्स में भारी छूट के अलावा सरकारी भूमि आवंटन में भी जमकर सब्सिडी मिलती है.

दूसरी बात, क्या राजनीति दलों को करोड़ों रुपये का चंदा नहीं मिल रहा है? क्या यह राशि महत्वपूर्ण नहीं है? वे इससे इनकार नहीं कर सकते और इसलिए उनकी जनता के प्रति जवाबदेही बनती है. इस पर भी अगर वे आपत्ति करते हैं तो उन्हें यह बताना होगा कि उनको आरटीआई के दायरे में क्यों न रखा जाए. तीसरी बात, क्या राजनीतिक दल यह मानते हैं कि पारदर्शिता उनके हित में है? अगर उनको ऐसा नहीं लगता तो उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि पारदर्शिता से उनका क्या नुकसान होगा.

अगर आप सरकारी संस्था हैं तो आप आरटीआई के दायरे में आते हैं. लेकिन यह अधिनियम कुछ खास किस्म की सूचनाओं को जारी नहीं करने की रियायत भी देता है. इन रियायतों के साथ ही अनेक सरकारी प्रतिष्ठान पिछले सात साल से बिना किसी नुकसान के काम कर रहे हैं.

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राजनीतिक दलों का कहना है कि लोग उनसे अपने प्रत्याशियों की चयन प्रक्रिया के बारे में जानकारी देने के लिए कैसे कह सकते हैं. जवाब यही है कि वे नहीं कह सकते. जिस जानकारी का पार्टियां औपचारिक रिकॉर्ड नहीं रखती हैं वह सूचना नहीं है और इसलिए उसे उपलब्ध कराने की बाध्यता भी नहीं है. लेकिन नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि क्या ऐसी कोई प्रक्रिया है भी और अगर है तो उसके मानक क्या हैं. बस, यहीं तक यह कानून प्रभावी होगा. साफ है कि इसके जरिए कोई आम नागरिक किसी राजनीतिक दल के लिए शर्तें तय नहीं कर सकता.

अपने बचाव में राजनीतिक दलों का यह तर्क भी है कि निर्वाचन आयोग तो पहले से ही उनकी निगरानी कर रहा है तो फिर आरटीआई क्यों. क्या वे यह कह रहे हैं कि वे नहीं चाहते कि आम लोग उन पर निगरानी रखें या वे आम लोगों के प्रति जवाबदेह नहीं हैं? उनसे यह सवाल पूछा जाना चाहिए. कुछ राजनीतिक दलों ने तो खुद को निजी संस्थान तक घोषित कर दिया है. क्या वे वाकई यह मानते हैं कि वे कारोबारी संगठन हैं?
मुझे लगता है कि राजनीतिक दलों को डर है. इस बात का डर कि कौन जाने आरटीआई उनके लिए किस तरह की मुसीबत ले आए? राष्ट्रमंडल खेल घोटाले का खुलासा इस कानून के चलते ही हुआ था. यह एक अनजान ताकत की तरह है और यही वजह है कि राजनीतिक दल इससे दूर ही रहना चाहते हैं. उनके कुछ अवैध कारनामे, उनकी मनमानियां इसकी वजह से उजागर हो सकती हैं. उनके मन में यही डर है.

पारदर्शिता आपको बेहतर बनाती है. यह खुद में सुधार लाने का उपाय है. मेरा मानना है कि लंबी अवधि में इससे राजनीतिक दलों का भला ही होगा. आज राजनीतिक दलों के प्रति लोगों में जो अविश्वास भरा है वह पारदर्शिता से दूर हो सकता है. अगर भारतीय जनता पार्टी यह कह दे कि वह इसके लिए तैयार है तो कांग्रेस भी उसका अनुकरण करेगी. लेकिन अगर राजनीतिक दल सीआईसी के आदेश को न्यायालय में चुनौती देते हैं तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा और अगर न्यायालय ने स्थगन आदेश दे दिया तो यह मामला अनिश्चित काल के लिए लटक जाएगा. एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स नामक संगठन ने दिल्ली उच्च न्यायालय में आपत्ति याचिका दायर करके कहा है कि किसी राजनीतिक दल द्वारा स्थगन आदेश लेने से पहले ही इस पर सुनवाई की जाए.

समाचार चैनलों पर लगातार इस तर्क को आधार बनाकर चर्चा की जा रही है कि क्या लोगों को जानने का अधिकार नहीं है.  यह एक कानूनसम्मत दलील नहीं है. कोई संस्थान इस आधार पर जनता के लिए जवाबदेह नहीं बनता कि लोगों को जानने का अधिकार है. हमारे पास पुख्ता सबूत हैं कि राजनीतिक दलों को सरकार से भारी-भरकम वित्तीय मदद मिलती है और इसलिए वे आरटीआई के दायरे में आते हैं.

मेरा आरटीआई में यकीन है. इसलिए मैं मानता हूं कि ‘आरटीआई नहीं तो वोट नहीं’ जैसा अभियान बहुत कारगर होगा. अगर हम इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर माहौल बना सके तो कुछ उम्मीद है कि इस आदेश का प्रभावी क्रियान्वयन हो सके. यह लोकतंत्र के लिए बेहद अहम कदम होगा.
(शोनाली घोषाल से बातचीत पर आधारित)

समय होत बलवान

संजय दुबे, कार्यकारी संपादक
संजय दुबे, कार्यकारी संपादक

कई या उससे भी ज्यादा बार असाधारण लगने वाले व्यक्तियों के ऐसा बनने के पीछे उनकी कम और असाधारण परिस्थितियों की भूमिका ज्यादा होती है.

मोदी जिस तरह के विकास और सुशासन आदि के दम पर – अपने खिलाफ लगते रहे तमाम आरोपों के बाद भी – यदि राजनीति में लगातार आगे बढ़ते दिख रहे हैं तो इसका श्रेय केंद्र की यूपीए सरकार को भी जाता है. अनिर्णय, अराजकता और भ्रष्टाचार की जो स्थिति आज देश में दिख रही है यदि वह नहीं होती तो शायद राजनीतिक जमात के बड़े हिस्से से लोगों का इस कदर मोहभंग भी नहीं होता और तब जबरदस्त प्रचार पर टिका मोदी का ‘राजसूय यज्ञ’ भी इतना आगे नहीं बढ़ा होता.

नरेंद्र मोदी को आगे बढ़ाने में जितनी उनकी, उनके प्रचार और जबरदस्त ब्रांड बिल्डिंग की भूमिका है उतनी ही राजनाथ सिंह की सीमित क्षमताओं और महत्वाकांक्षाओं की भी है. राजनाथ को पता है कि भाजपा में उनकी स्थिति मजबूत कर सकने वाले केवल दो ही घटक हैं- संघ परिवार और मोदी को उनके दिए सहारे के एवज में उन्हें मिलने वाला मोदी का सहारा. बस वे इन दोनों ताकतों का इस्तेमाल करके इतिहास को तिहराने की जुगत भिड़ा रहे हैं. उन्हें लगता है कि जिस तरह से वे दो बार अध्यक्ष बने, वक्त आने पर प्रधानमंत्री भी बन सकते हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि मोदी आज देश के सबसे प्रभावशाली नेताओं में हैं. ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी. लेकिन अगर सब कुछ फिट भी बैठा तो भी मोदी भाजपा को सबसे बड़ी यानी 175-180 सासंदों वाली पार्टी तो बना सकते हैं मगर खुद या गठबंधन के बूते सरकार बना सकने वाली पार्टी नहीं. इसके लिए वाजपेयी या देवेगौड़ा या गुजराल सरीखे किसी व्यक्ति की जरूरत होगी. ऐसे में राजनाथ को अपना भविष्य उज्जवल लगने लगता है. उन्हें लगता है कि अभी मोदी के विश्वासपात्र होने या दिखने का इनाम उन्हें मौका आने पर प्रधानमंत्री पद के रूप में भी मिल सकता है.

नरेंद्र मोदी अगर आज यहां तक पहुंचे हैं तो इसमें 2002 में हुए गोधरा कांड के बाद गुजरात में हुए दंगों की बड़ी भूमिका है. एक ऐसे प्रदेश में, जिसमें अल्पसंख्यक 10 फीसदी से भी कम हों, बहुसंख्यक आबादी के ध्रुवीकरण का परिणाम जानने के लिए किसी गणितज्ञ की जरूरत नहीं. मोदी तीन बार यहां जबरदस्त बहुमत के साथ चुनाव जीतकर अपनी सरकार बना चुके हैं. हालांकि दंगों के बाद आडवाणी जी की कृपा से किसी तरह अपना मुख्यमंत्रित्व बचा पाए मोदी ने अपनी नई पहचान गढ़ने के फेर में गुजरात में ठीक-ठाक काम भी किया है. मगर यहां का विकास और मोदी का काम इतना और ऐसा भी नहीं है जैसा खुद मोदी, उनके संगी-साथी और जनसंपर्क संस्था एप्को प्रचारित करते रहते हैं. इसीलिए विकास के इतने हो-हल्ले के बाद भी पिछले दस साल में मोदी हमेशा बहुसंख्यकों के ही नेता रहे. उन्होंने कभी अल्पसंख्यकों के ज्यादा नजदीक दिखने की कोशिश तक नहीं की.

जिस तरह से 2002 के दंगों ने मोदी को गुजरात में मजबूत बनाने की भूमिका निभाई, कुछ-कुछ वैसी ही भूमिका भाजपा में मोदी की भी है. मोदी के राजनीतिक जीवन में 2002 के दंगों से उपजे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के फायदे केवल गुजरात तक सीमित है. इससे आगे की बड़ी राजनीति के लिए यह काफी नहीं है. ठीक इसी प्रकार भाजपा के लिए भी मोदी की भूमिका उसे सबसे बड़ी पार्टी बनाने तक ही सीमित है. सरकार बनाने के लिए उसे भी मोदी से आगे जाकर कोशिश करनी होगी.

हमारे या किसी भी अन्य लोकतंत्र के इतिहास को देखें तो एक क्षेत्र, जाति या संप्रदाय को लेकर चलने वाले व्यक्ति या पार्टी एक निश्चित दायरे से बाहर की सफलता हासिल नहीं कर सके हैं. आज जिन आडवाणी को नीतीश कुमार और कांग्रेस भी मोदी से ज्यादा या सहज रूप से स्वीकार्य मान रहे हैं वे खुद भी इस बात के उदाहरण हैं. सभी जानते हैं कि भाजपा को दो से 182 सासंदों की पार्टी बनाने में अटल जी से ज्यादा बड़ी भूमिका आडवाणी की थी. लेकिन इससे वे देश के सर्वोच्च पद के स्वाभाविक अधिकारी नहीं बन सके.

खुद भाजपा भी इस बात का उदाहरण है. अपनी राजनीति के स्वर्णिम दौर में भी वह अधिकतम 182 सीटें ही जीत सकी थी. सरकार बनाने के लिए उसने अपने सभी विवादित मुद्दे–राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता–ठंडे बक्से में रख दिए. इसके बाद ही जैसे-तैसे उसे कुछ छोटी-बड़ी बैसाखियों का सहारा मिल सका था.

मुखिया से खुली बगावत

उत्तराखंड कांग्रेस में इन दिनों खुले आम असंतोष अभियान चल रहा है. असंतुष्ट कांग्रेसी विधायकों, मुख्यमंत्री और कांग्रेस संगठन के पदाधिकारियों के बीच फिल्मी अंदाज में डायलॉग बोले जा रहे हैं. इस राजनीतिक ड्रामे की शुरुआत धारचूला के विधायक हरीश धामी के बयान से हुई . नेपाल और चीन सीमा पर बसा धारचूला बहुत ही पिछड़ा हुआ इलाका है. पांच जून को धामी ने राजधानी देहरादून में आकर बयान दिया कि उनके विधानसभा क्षेत्र का विकास नहीं हो रहा है और अगर 15 दिन के भीतर इस दिशा में सरकार की ओर से सकारात्मक प्रयास नहीं हुए तो वे विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देंगे. उन्होंने इस्तीफा देकर धारचूला से बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ने की बात तो कही ही, मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को भी अपने खिलाफ मैदान में उतरने की चुनौती दे डाली. उनका कहना था, ‘मुख्यमंत्री बेहद कमजोर हैं और उनमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं है. इन दोनों कारणों से राज्य में नौकरशाही बेलगाम है और भ्रष्टाचार चरम पर है.’

जिस दिन धामी देहरादून में मीडिया के माध्यम से इस्तीफा देने की धमकी दे रहे थे, उसी दिन विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने भी नैनीताल से बयान दे डाला कि उत्तराखंड ने भ्रष्टाचार के मामले में उत्तर प्रदेश को भी पीछे छोड़ दिया है. खुद को सरकारी मशीनरी के कामकाज से व्यथित बताते हुए उनका कहना था, ‘प्रदेश में पैसा देने से मना करने पर शवों का पोस्टमार्टम तक नहीं किया जाता.’  पिछले महीने भी उन्होंने राज्य में बढ़ते भ्रष्टाचार पर सार्वजनिक बयान दिया था.

ये बयान बम फूटने के अगले ही दिन अपनी ही सरकार से नाखुश कांग्रेसी विधायकों और उन्हें समर्थन देने वाले निर्दलीय विधायकों के भी नाराजगी भरे बयान खुलकर आने लगे. चंपावत के विधायक हेमेश खर्कवाल, पिथौरागढ़ के मयूख महर, कफकोट के विधायक ललित फर्स्वाण और अल्मोड़ा के मनोज तिवारी धामी के आरोपों की पुष्टि करते हुए उनके समर्थन में आगे आए. उन्होंने भी अपने क्षेत्रों की दुर्दशा और राज्य में भ्रष्टाचार का रोना रोया.

सरकार के कामकाज पर उंगली उठाने वाले ये सारे विधायक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और केंद्र सरकार में मंत्री हरीश रावत खेमे के माने जाते हैं. धामी के बयान देने के अगले दिन रावत ने असंतुष्ट विधायकों की मांगों का समर्थन भी किया था. मुख्यमंत्री को नसीहत देते हुए उनका कहना था, ‘विकास के मामले में विधायकों की चिंताओं को दूर किया जाना चाहिए .’ लेकिन इसके दो दिन बाद मुख्यमंत्री बहुगुणा ने दिल्ली से देहरादून आते ही एक बयान देकर असंतोष की आग को और भड़का दिया. उनका कहना था कि उन्हें 41 विधायकों का समर्थन है और चार विधायकों के जाने से सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता. असंतुष्टों पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि वे टाइगर हैं और हिरनों की परवाह नहीं करते. मुख्यमंत्री के बयान पर हरीश रावत का कहना था, ‘मैं सालों से पहाड़ों की पगडंडियों पर हिरन की तरह भाग रहा हूं और हर बार कोई टाइगर झपट्टा मार कर मेरी मेहनत उड़ा कर ले जाता है.’

मुख्यमंत्री के टाइगर-हिरन वाले भड़काऊ बयान के बाद असंतुष्ट विधायकों की संख्या बढ़कर 10 तक हो गई. सुनवाई न होते देख धामी ने कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाने की मांग कर दी. आखिर पांचवें दिन मुख्यमंत्री ने नाराज विधायकों को वार्ता के लिए सचिवालय बुलाया. इस बुलावे को असंतुष्ट विधायकों ने अस्वीकार कर दिया. इसके बाद मुख्यमंत्री के करीबी कांग्रेस प्रवक्ता धीरेंद्र प्रताप ने वार्ता निमंत्रण ठुकराने वाले विधायकों में से अलग-अलग जिम्मेदारियां संभाल रहे तीन विधायकों को इस्तीफा देने की चुनौती दे दी. इससे  माहौल और भड़क गया.

खुले आम असंतोष दिखाने वाले इन विधायकों में से सभी दुर्गम पर्वतीय जिलों से चुन कर आए हैं. उनका दर्द है कि मंत्री और नौकरशाह पहाड़ी क्षेत्र की समस्याओं और उनका निदान जानने की कोशिश तक नहीं करते हैं. हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में हरीश रावत खेमे की भी भूमिका बताई जा रही है. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेसी विधायकों की संख्या के हिसाब से सबसे अधिक विधायक रावत के साथ थे. लेकिन इसके बावजूद उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया. बताया जा रहा है कि रावत खेमा इस समय मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए जोर लगाने के बजाय पार्टी अध्यक्ष पद पर अपने खेमे के किसी नेता को बैठाना चाहता है. हर तरफ से हो रही नित नई बयान बाजी से यह लग रहा है कि असंतुष्टों का गुस्सा अब दिल्ली दरबार की मध्यस्थता से ही शांत होगा.

घुसपैठ का नुकसान

भारतीय जनता पार्टी का मीडिया खासकर न्यूज चैनलों से और न्यूज चैनलों का भाजपा से प्यार किसी से छिपा नहीं है. यह स्वाभाविक भी है क्योंकि भाजपा के कई नेताओं की ‘लोकप्रियता’ और उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में ‘चमकाने’ में टीवी की बड़ी भूमिका है. कई तो बिना किसी राजनीतिक जमीन के सिर्फ चैनलों के कारण भाजपा की राजनीति में चमकते हुए सितारे हैं. दूसरी ओर, मीडिया और न्यूज चैनल भी भाजपा को इसलिए पसंद करते हैं कि दोनों का दर्शक वर्ग एक है और दोनों तमाशा पसंद करते हैं. न्यूज चैनलों का कारोबार तमाशे से चलता है तो भाजपा की राजनीति तमाशे के बिना कुछ नहीं है.

आश्चर्य नहीं कि बीते सप्ताह गोवा में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जब पार्टी में लंबे समय से जारी सत्ता संघर्ष अपने क्लाइमैक्स पर पहुंचा तो उस तमाशे को 24×7 और वाल-टू-वाल कवर करने के लिए मीडिया और चैनलों की भारी भीड़ मौजूद थी. जाहिर है कि वहां एक हाई-वोल्टेज तमाशे के सभी तत्व मौजूद थे. पार्टी में कथित तौर पर ‘सबसे लोकप्रिय’ नेता नरेंद्र मोदी को 2014 के आम चुनावों के लिए चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर कयास और कानाफूसियां तेज थीं. आडवाणी और कई दूसरे नेता इसे लेकर नाराज बताए जा रहे थे और बीमारी का बहाना बनाकर गोवा नहीं पहुंचे.

इसके बाद भारतीय झगड़ा पार्टी बनती जा रही भाजपा में गोवा और फिर दिल्ली में जो कुछ हुआ. उसका कुछ आंखों देखा और कुछ कानों सुना हाल पूरे देश ने चैनलों पर देखा और अहर्निश देख रहे हैं. एक धारावाहिक सोप आपेरा की तरह यह ड्रामा चैनलों पर जारी है जहां घटनाक्रम हर दिन और कई बार कुछ घंटों और मिनटों में नया मोड़ ले रहा है. इसमें एक पल उत्साह और खुशी के पटाखे हैं और दूसरे पल आंसू और बिछोह है और तीसरे पल साजिशों और कानाफूसी का रहस्य-रोमांच है

कहने की जरूरत नहीं है कि इस तमाशे में ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ और ‘पार्टी विथ डिफरेन्स’ का दावा करने वाली भाजपा की नैतिकता और अनुशासन की धोती सार्वजनिक तौर पर खुल रही है. लेकिन मुश्किल यह है कि पार्टी इसकी शिकायत किससे करे. आखिर चैनलों में भाजपा के अंदरूनी सत्ता संघर्ष के बारे में चल रहे किस्से-कहानियों, साजिशों, उठापटक और खेमेबंदी से जुड़ी ‘खबरों’ का स्रोत खुद भाजपा और संघ के नेता हैं. सच यह है कि ‘खबरों’ के नाम पर चल रहे इन किस्से-कहानियों में सबसे ज्यादा कथित ‘खबरें’ भाजपा और संघ के विभिन्न गुटों के नेताओं की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ ‘प्लांटेड स्टोरीज’ हैं.

खास बात यह है कि इनमें से ज्यादातर ‘खबरें’ भाजपा बीट कवर करने वाले उन रिपोर्टरों के जरिए आ रही हैं जो खुद भी भाजपा के इस या उस खेमे के करीब माने जाते हैं. इन रिपोर्टरों की पहुंच भाजपा या संघ के अंत:पुर तक है और कुछ उनके किचन कैबिनेट तक में शामिल हैं. इनमें से कई रिपोर्टर चैनलों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण के नाम पर भाजपा के विभिन्न गुटों या खेमों के प्रवक्ता-से बन जाते हैं और संबंधित गुटों का बचाव करते दिखने लगते हैं. हालांकि यह कोई नई बात नहीं है. भाजपा और चुनिंदा पत्रकारों के बीच रिश्ता बहुत पुराना है. अतीत में इनमें से कई पत्रकार बाद में पार्टी में एमपी और मंत्री भी बने हैं.

सच पूछिए तो भाजपा या संघ में पत्रकारों की यह घुसपैठ काफी अंदर तक है. लेकिन इसके उलट मीडिया के अंदर भाजपा की घुसपैठ भी काफी दूर तक रही है. इस घुसपैठ के नतीजे राम जन्मभूमि अभियान के दौरान दिखे और इन दिनों नरेंद्र मोदी को लेकर मीडिया के एक बड़े हिस्से के उत्साह में भी दिखाई दे रहा है. लेकिन भाजपा-न्यूज मीडिया के इस ‘मुहब्बत’ की कीमत वे पाठक-दर्शक चुका रहे हैं जिन्हें देश के मुख्य विपक्षी दल के बारे में ‘खबरों’ के नाम पर ‘प्लांटेड स्टोरीज’ और कानाफूसियों-अफवाहों से काम चलाना पड़ रहा है.

दिखावे का बैर!

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उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा प्रभाव रखने वाली समाजवादी पार्टी खुद को धर्मनिरपेक्ष और अल्पसंख्यकों का सबसे बड़ा हितैषी बताती है. एक समय यहां सबसे ज्यादा प्रभाव रखने वाली भारतीय जनता पार्टी को सपा धुर-सांप्रदायिक और अल्पसंख्यकों के साथ पूर्वाग्रह रखने वाली पार्टी मानती है. तहलका की खोजबीन में इस तरह के तमाम उदाहरण सामने आते हैं जो बताते हैं कि ये दोनों पार्टियां प्रदेश में कई स्तरों पर जैसे भी संभव हो एक-दूसरे का सहयोग करने को तैयार रहती हैं. यह सहयोग पार्टी की घोषित मूल विचारधारा के साथ समझौता करके भी किया जा सकता है. इस मिलीभगत का एक उदाहरण तहलका की हालिया तहकीकात में भी दिखा था. तहलका ने पिछले माह खुलासा किया था कि कैसे सपा ने भाजपा महासचिव वरुण गांधी को 2009 के लोकसभा चुनाव में दिए गए उनके भड़काऊ भाषण से संबंधित मामलों में बरी करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. खुद समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बयान देकर वरुण गांधी पर दर्ज तीनों मामले वापस लेने की बात कही थी.

हालांकि ऐसा हो नहीं सका क्योंकि जिन मुसलमानों के हित की राजनीति वे करते हैं उन्हें ही यह बात रास नहीं आई. इसके बाद उनकी पार्टी के एक नेता और उत्तर प्रदेश सरकार में खादी एवं ग्रामोद्योग मंत्री रियाज अहमद इस काम में लग गए. तहलका की तहकीकात में कुछ महत्वपूर्ण लोगों ने बताया कि रियाज अहमद ने वरुण गांधी के खिलाफ गवाही देने वाले मुसलिम गवाहों को मुकरने के लिए तैयार किया. ऐसा नहीं है कि सिर्फ सपा ही वरुण का साथ दे रही थी. 2012 के विधानसभा चुनावों के दौरान वरुण गांधी ने भी पीलीभीत से अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार सतपाल गंगवार को हराकर सपा के इन्हीं उम्मीदवार रियाज अहमद को जिताने के निर्देश दिए थे. इसकी पुष्टि करते ऑडियो टेप तहलका ने जारी किए थे. भड़काऊ भाषण से संबंधित मामलों में वरुण गांधी की रिहाई हो गई. सरकार इस मामले में वादी थी, मामला मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाने का था. इसके बावजूद खुद को मुसलमानों की हितैषी कहने वाली सपा सरकार ने आखिरी तारीख बीत जाने दी और ऊपरी अदालत में अपील नहीं की. तहलका की रिपोर्ट के बाद मचे शोर के दबाव में सरकार ने अब सेशन कोर्ट में अपील दायर की है. जीवविज्ञान का एक शब्द है सहजीवन. भिन्न-भिन्न जीव-जंतु या पेड़-पौधे अपनी जरूरतों के लिए एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं. सपा-भाजपा की आपसी निर्भरता इसी सहजीवन का आदर्श उदाहरण है. वरुण गांधी रिहाई का मामला इसे साबित करती अकेली कहानी नहीं है. तहलका की खोजबीन में इस तरह के तमाम उदाहरण सामने आए.

मोदी और राजगणित

भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना दिया है. यानी वे 2014 में होने वाले 16वें आम चुनाव में भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी की कमान संभालेंगे. अक्टूबर, 2001 में मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले शायद ही किसी ने सोचा होगा कि मोदी एक दिन इतने बड़े हो जाएंगे कि उन्हें देश की सबसे बड़ी गद्दी के दावेदार के तौर पर देखा जाएगा. तब तक वे भाजपा के उन नेताओं में हुआ करते थे जो परदे के पीछे रहकर अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि यह एक दुर्लभ विशेषाधिकार है जो पार्टी के 33 साल के इतिहास में सिर्फ दो लोगों को मिला है. पहले अटल बिहारी वाजपेयी जो इस दावेदारी के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने में सफल भी हुए और दूसरे लाल कृष्ण आडवाणी, जो उपप्रधानमंत्री रहे और 2009 के आम चुनावों में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने. 33 साल की इस अवधि में भाजपा के कई अध्यक्ष हुए, लेकिन इनमें सिर्फ वाजपेयी और आडवाणी थे जिन्हें प्रधानमंत्री पद के योग्य समझा गया. मोदी इस सूची में तीसरा नाम बन गए हैं. आम चुनाव में अब एक साल से भी कम का वक्त बचा है. इस लिहाज से देखें तो जीत के लिए टीम और रणनीति बनाने या 2002 के गुजरात दंगों के चलते बनी विभाजनकारी नेता की अपनी छवि बदलने के लिए उनके पास ज्यादा समय नहीं है.

पिछले आम चुनाव में आडवाणी के नेतृत्व के साथ मैदान में उतरी भाजपा को पराजय मिली थी. सवाल उठता है कि क्या मोदी पार्टी को विजय दिला पाएंगे. क्या वे उन मोर्चों पर सफल हो पाएंगे जहां आडवाणी नाकामयाब रहे थे? क्या 2009 के आडवाणी के मुकाबले वोटरों में मोदी का ज्यादा आकर्षण है? क्या भाजपा के मौजूदा या संभावित सहयोगी प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी को स्वीकार कर पाएंगे? मोदी के समर्थकों और विरोधियों, दोनों में उनकी मुस्लिमविरोधी छवि है. इसके चलते गठबंधन सहयोगी जनता दल यूनाइटेड के साथ भाजपा की तनातनी हुई. मोदी उन कुछ राजनेताओं में से हैं जिन्हें भारत की बहुलतावादी राजनीति के लिए खतरे के तौर पर देखा जाता है. क्या उनकी मुस्लिम विरोधी छवि भारत की 80 फीसदी हिंदू जनसंख्या में भाजपा के समर्थन का तूफान पैदा कर सकेगी? या फिर इसके चलते भाजपा को एक बार फिर पराजय का सामना करना पड़ेगा?

मोदी की एक दूसरी छवि भी है. एक ऐसे नेता की छवि जिसने तेज आर्थिक विकास के बूते अपने राज्य में खुशहाली पैदी की. वे अपनी इस उपलब्धि का जिक्र जमकर करते भी हैं. सवाल उठता है कि गुजरात में सुशासन का मोदी का दावा क्या भारत के 80 करोड़ वोटरों का उतना हिस्सा अपनी तरफ खींच पाएगा जिसके बल पर उनकी पार्टी की सरकार बन सके. 2004 में भाजपा ने भारत उदय और इंडिया शाइनिंग के नारों के साथ ऐसा ही दावा किया था जिसका लोगों पर इतना असर नहीं हो पाया कि भाजपा सत्ता में वापसी कर पाती. और आखिरी सवाल यह है कि विधानसभा चुनाव में लगातार तीन बार जीत क्या संसदीय चुनाव में पहली बार विजय पताका फहराने की उनकी कोशिश में उनके काम आएगी.

राज्यों में भाजपा का हाल
2009 के मुकाबले इस वक्त भाजपा की हालत पतली है. इसका मतलब यह हुआ कि मोदी की राह 2009 के आडवाणी से कहीं ज्यादा मुश्किल है. आडवाणी उस समय तुलनात्मक रूप से फायदे की स्थिति में थे. पांच साल पहले भाजपा के पास सात राज्यों की सत्ता थी. आज उसके पास सिर्फ चार राज्य हैं- मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और गोवा. इसमें राजनीतिक प्रासंगिकता के हिसाब से गोवा न के बराबर है. बिहार में वह जदयू के साथ गठबंधन के सहारे सत्ता में है. 2005 से यह गठबंधन वहां अटूट रहा है. 2009 में बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से भाजपा ने 12 जीती थीं और 1999 में अपने सबसे बढ़िया प्रदर्शन की बराबरी की थी. 2010 के विधानसभा चुनाव में भी इसने बढ़िया प्रदर्शन किया. लेकिन आज भाजपा-जदयू गठबंधन टूट के कगार पर है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चिंता है कि मोदी के साथ दिखने से बिहार के 17 फीसदी मुस्लिम मतदाता उनसे दूर जा सकते हैं. पड़ोसी राज्य झारखंड में अवसरवादी राजनीति के चलते इस साल जनवरी में ही भाजपा ने सरकार गंवाई है. राज्य में अब राष्ट्रपति शासन है. पिछले साल उत्तराखंड और हिमाचल में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी सत्ता से बाहर हुई है.

जनसंख्या और राजनीतिक असर के हिसाब से देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में भी पार्टी का हाल बुरा है. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी 403 में से सिर्फ 48 सीटें जीत पाई थी और तीसरे स्थान पर रही थी. उसका यह प्रदर्शन 2007 के मुकाबले तो खराब ही था जब उसने 51 सीटें जीती थीं 2002 की तुलना में तो यह कोसों दूर था जब उसने 88 सीटों पर विजय हासिल की थी. यह दिखाता है कि भाजपा 2002 से राज्य की सत्ता में रही सपा और बसपा सरकारों की असफलताओं का फायदा उठाने में नाकामयाब रही है. उसके लिए चिंता की बात यह भी है कि 2007 के मुकाबले 2012 में जहां सपा और कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ा वहीं भाजपा का वोट प्रतिशत 17 फीसदी के मुकाबले 15 फीसदी रह गया. वैसे देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से पार्टी का लगातार पतन हुआ है. 1996 से अब तक हुए चार विधानसभा चुनावों में उसकी सीटों की संख्या और वोट प्रतिशत दोनों में गिरावट आई है. 1996 में पार्टी ने 32.5 फीसदी वोटों के साथ 425 में से 174 सीटें जीती थीं.

महाराष्ट्र का हाल भी कुछ ऐसा ही है. 1999 से अब तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में वहां भाजपा-शिवसेना गठबंधन हर बार हारा है. सीट संख्या और वोट प्रतिशत दोनों लिहाज से भाजपा का प्रदर्शन लगातार गिरा है. यानी जनसंख्या के मामले में इस दूसरे सबसे बड़े राज्य में भी वह अपने सबसे बुरे दौर में है. उड़ीसा में जब बीजू जनता दल नेता और राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने 2009 में इससे गठबंधन तोड़ा तो इसकी नैया ही डूब गई थी. भाजपा को कुछ राहत पिछले साल पंजाब में मिली जहां शिरोमणि अकाली दल के साथ इसके गठबंधन ने विधानसभा चुनाव में अपनी सत्ता कायम रखी थी. बड़े लाभ की उम्मीद भाजपा को सिर्फ राजस्थान में है जहां वह नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनावों में सत्ता विरोधी लहर के सहारे सत्तासीन कांग्रेस को हराने के सपने देख रही है.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पार्टी ने 2003 से लगातार दो बार सरकार बनाई है. यहां भी विधानसभा चुनाव छह महीने दूर हैं. हालांकि वहां की भाजपा सरकारें खुद को लोकप्रिय बता रही हैं, लेकिन कांग्रेस को उम्मीद है कि दस साल से सत्ता में बैठी इन सरकारों के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर बनेगी और वहां वह वापसी करेगी. अगर भाजपा ने इन दो में से एक भी राज्य गंवा दिया तो वोटरों और पार्टी दोनों में मोदी की अपील बुरी तरह घट सकती है.

लोकसभा में भाजपा
केंद्र में भाजपा की पहली सरकार सिर्फ 13 दिन चली थी. 1996 में तब उसे बहुमत के आंकड़े यानी 272 सीटों तक पहुंचने के लिए पर्याप्त दलों का समर्थन नहीं मिल पाया था. 1998 में बनी पार्टी की दूसरी सरकार 13 महीने चली. 1999 में बनी इसकी तीसरी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया. 1998 में भाजपा ने 182 सीटें जीती थीं. 1999 में यह आंकड़ा 183 हुआ. दोनों बार दूसरे दलों के समर्थन से उसकी सरकार बनी.
माना जा सकता है कि अगर भाजपा अगले आम चुनाव में 185 सीटों के आस-पास पहुंच जाती है तो वह केंद्र में सरकार बनाने की दावेदार होगी. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मोदी के रास्ते में जो अड़चनें हैं वे उन अड़चनों से कहीं बड़ी हैं जो 2009 में आडवाणी के सामने थीं. 2009 में जब भाजपा आडवाणी के नेतृत्व में मैदान में उतरी थी तो उसके खाते में 2004 के आम चुनावों में मिली 137 लोकसभा सीटों की पूंजी थी. यानी पार्टी को करीब 45 सीटों की खाई पाटनी थी. अभी भाजपा के पास 116 लोकसभा सीटें हैं. यानी मोदी को दूसरी पार्टियों से 70 के करीब सीटें छीननी होंगी. जिस तरह से 2009 के बाद हुए विधानसभा चुनावों और लोकसभा उपचुनावों में भाजपा का प्रदर्शन गिरा है, उसे देखते हुए उनके सामने बहुत बड़ी चुनौती है. खासकर तब तो बहुत ही बड़ी अगर पिछली बार की तरह इस बार भी भाजपा 543 में से 365 लोकसभा सीटों पर लड़ी और बाकी सीटें उसे गठबंधन सहयोगियों के लिए छोड़नी पड़ीं.

उत्तर प्रदेश
अपनी पार्टी को सत्ता में लाने और खुद प्रधानमंत्री बनने का जो सपना मोदी देख रहे हैं वह तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक वे उत्तर प्रदेश में पार्टी की किस्मत नहीं बदल देते. उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं जो किसी भी राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा हैं. इनमें से सिर्फ नौ ही आज भाजपा के पास हैं. 1996, 1998 और 1999 के तीन लोकसभा चुनावों में भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आई थी. इन चुनावों में उसने क्रमश: 52, 59 और 29 सीटें जीती थीं. 2004 में जब वाजपेयी सरकार सत्ता से बाहर हुई तब भाजपा सिर्फ 10सीटें जीत पाई थी.

यह रिकॉर्ड इशारा करता है कि दिल्ली की सत्ता में वापसी करने के लिए भाजपा को उत्तर प्रदेश में कम से कम 25 सीटें तो जीतनी ही होंगी. यानी मौजूदा सीटों से 16 सीट ज्यादा. अगले साल 25 सीटें जीतना भाजपा के लिए 1999 की स्थिति की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल है. 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कुल 30 प्रतिशत वोट हासिल करके 25 सीटें जीती थीं. दरअसल 1991 से 1999 का दौर उत्तर प्रदेश में भाजपा का स्वर्णिम दौर रहा था. इस दौरान हुए चारों लोकसभा चुनावों में पार्टी ने 30 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल किए. 1998 में तो यह आंकड़ा 37.5 प्रतिशत तक भी पहुंचा. लेकिन 2004 में यह घटकर 22 प्रतिशत पर आ गया और 2009 में तो पार्टी को कुल 17.5 प्रतिशत वोट ही हासिल हुए. कोढ़ में खाज यह कि 14 साल में सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल उत्तर प्रदेश में मजबूत ही हुए हैं. 90 के दशक में हुए विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भाजपा का वोट प्रतिशत या तो सबसे ज्यादा होता था या फिर वह इस मामले में दूसरे स्थान पर रहती थी. लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है. अपवाद के रूप में 2009 के लोकसभा चुनाव को छोड़ दें जब कांग्रेस ने बसपा से एक ज्यादा यानी 21 सीटें हासिल की थीं, तो वोट प्रतिशत का सबसे बड़ा हिस्सा अब सपा और बसपा में बंटता है.

आखिरी उतार

Untitled_1_436756225कार्ल मार्क्स का एक चर्चित कथन है कि इतिहास खुद को दुहराता है, पहले यह त्रासदी के रूप में घटित होता है और बाद में तमाशे में तब्दील हो जाता है. यह कथन राजनीतिक आकलनों में न जाने कितनी बार इस्तेमाल हो चुका है. फिर भी पिछले हफ्ते भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने जो छोटा-सा विद्रोह किया उसका आकलन करते हुए इस कथन के इस्तेमाल से खुद को रोक पाना मुश्किल है. विद्रोह की इस कहानी का पटाक्षेप नायक की हार के रूप में हुआ. नरेंद्र मोदी को 2014 के चुनाव अभियान का चेहरा घोषित किए जाने के विरोध में आडवाणी ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था. लेकिन पार्टी की तीखी प्रतिक्रिया के बाद 24 घंटे के भीतर उन्होंने चुपचाप अपना इस्तीफा वापस ले लिया. आडवाणी की इस आखिरी कोशिश ने सिर्फ एक बात स्थापित की कि वे भाजपा के लिए कितने महत्वहीन हो चुके हैं.

आडवाणी की हैसियत में आई इस गिरावट और इस सदी की शुरुआत तक संघ में रहे उनके प्रभाव का इतना क्षरण समझने के लिए जरूरी है कि हम उस घटना की तरफ लौटें जब उन्होंने पहली बार पार्टी से अपनी नाराजगी सार्वजनिक रूप से जाहिर की थी. यह 2005 के जिन्ना प्रकरण की बात है. जो 2005 में हुआ और जो 2013 में हुआ, उसका अंतर इन सालों के दौरान भाजपा की अंदरूनी राजनीति और सत्ता समीकरण में आए बदलाव की कहानी खुद-ब-खुद बयान करता है.

2005 में आडवाणी पाकिस्तान की यात्रा पर गए थे. वहां उन्होंने पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना को धर्म निरपेक्षता का प्रमाणपत्र दे दिया. जिन्ना की प्रशंसा के जरिए वे एक राजनेता के रूप में अपनी छवि बदलना चाह रहे थे. उनकी कोशिश थी कि कट्टरवादी के बजाय वे एक उदारवादी नेता के रूप में दिखें जिससे मुसलमान वोटर भी उनके करीब आएं.

लेकिन यह उनके लिए बड़ी गलती साबित हुई. भाजपा के भीतर इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई. आडवाणी के एक सहयोगी ने पाकिस्तान से उनका जिन्ना वाला बयान पार्टी की मीडिया सेल को फैक्स करके उसे जारी करने को कहा था. उस समय पार्टी कार्यालय में मौजूद प्रवक्ता ने फैक्स की प्रतियां सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और प्रमोद महाजन को भेज दीं. तीनों आडवाणी के शिष्य थे. तीनों ने इस बयान को यह कहकर खारिज कर दिया कि इसे पार्टी के आधिकारिक बयान के रूप में जारी नहीं किया जा सकता. इसके बाद तूफान खड़ा हो गया. पार्टी, कैडर, कार्यकर्ता से लेकर संघ तक कोई भी आडवाणी के साथ नहीं था.

ताव खाए आडवाणी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. पार्टी की दूसरी पीढ़ी के नेताओं के लिए यह परीक्षा की घड़ी थी. उन्हें अपने उस गुरु के साथ असहमत होने के लिए मजबूर होना पड़ रहा था जिसने उन्हें राजनीति का ककहरा सिखाया था. फिर भी उन्होंने कई तरीकों से गुरु का बचाव करने की कोशिश की. इसकी कई वजहें थीं और इनमें सबसे बड़ी थी आडवाणी के प्रति उनका आदर भाव. वे चाहते थे कि बात संभल जाए और आडवाणी के खिलाफ कोई निर्णायक कदम न उठाया जाए . कुछ समय तक उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद पर बने रहने के लिए संघ को मना लिया गया. जिन्ना प्रकरण पर आडवाणी की हर आलोचना को उनकी व्यापक भूमिका की दुहाई देकर और एक अपवाद बताकर दबा दिया गया.

आडवाणी इस मामले में भी भाग्यशाली रहे कि उन्हें मीडिया के एक हिस्से का साथ मिल गया. उसने यह मान लिया कि जिन्ना की तारीफ आडवाणी की एक ईमानदार कोशिश है और वे संघ के साथ दो-दो हाथ करने को तैयार हैं. भारत में दक्षिणपंथ को एक नई दिशा देने के लिए उनकी जमकर तारीफ हुई. इंडिया टुडे पत्रिका ने उन्हें ‘न्यूजमेकर ऑफ द ईयर’ का खिताब दिया और इन शब्दों में उनकी प्रशंसा की, ‘एक हिंदू राष्ट्रवादी जिसने शत्रु की प्रशंसा की हिम्मत की.’

लेकिन इस विवाद ने अंतत: आडवाणी के प्रभाव और उनकी राजनीतिक हैसियत दोनों को खत्म कर दिया था. फिर भी चूंकि पार्टी की दूसरी पांत के नेता उनके साथ कोई निर्णायक लड़ाई नहीं लड़ना चाहते थे इसलिए आडवाणी का इतना रसूख बना रहा कि इसके बूते वे वापसी कर सकें. ऐसा हुआ भी. धीरे-धीरे उन्होंने पार्टी में पुरानी धमक हासिल कर ली, यहां तक कि उन्होंने संघ को भी फिर साध लिया. इस प्रक्रिया में उन्होंने दूसरी पांत के नेताओं के मन में अपने प्रति आदर भाव को जितना हो सकता था, भुनाया. पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी जानते थे कि आडवाणी सबसे अच्छे विकल्प नहीं हैं क्योंकि उनका सर्वश्रेष्ठ दौर बीत चुका है. लेकिन 2009 में उन्हें कमान देकर उन्होंने अपनी गुरुदक्षिणा चुकाई.

बीते पखवाड़े भी आडवाणी ने 2009 की यही रणनीति दोहराने की कोशिश की. मोदी के मनोनयन पर अपने विरोध को उन्होंने भाजपा में संघ की दखलअंदाजी से अपनी सैद्धांतिक असहमति के चोले में ढकने की कोशिश की. मीडिया का एक हिस्सा इस काम में उनका हथियार बन गया. आडवाणी और उनके सलाहकारों ने चुनिंदा पत्रकारों और मीडिया हाउसों को यह खबर दी. आडवाणी परिवार के सबसे पुराने अंग्रेजीभाषी स्वयंसेवक हैं और दिल्ली में मीडिया से उनका बेहद पुराना और गहरा रिश्ता हैं. वे मानकर चल रहे थे कि उनके इस्तीफे पर मीडिया तूफान खड़ा कर देगा जिससे भाजपा और संघ बचाव की मुद्रा में आ जाएंगे. उनको विश्वास था कि एक बार फिर से अपनी चिर-परिचित इमोशनल अत्याचार वाली रणनीति के जरिए दूसरी पांत के अपने शिष्यों को वैसे ही मजबूर कर देंगे. यहीं वे चूक गए. मीडिया का शोर तो हुआ लेकिन यह खाली शोर ही था. इस बात से शायद ही किसी को इनकार होगा कि भाजपा के लिए मोदी एक दमदार चुनावी उम्मीदवार और तर्कसंगत विकल्प हैं.

इसके अलावा दूसरी पीढ़ी भी अब आडवाणी की नौटंकी वाली राजनीति से ऊब चुकी थी. उनके इस्तीफे के अगले दिन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह राजस्थान में पार्टी के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए निकल गए. नरेंद्र मोदी भी तुरंत दिल्ली नहीं दौड़े बल्कि ट्वीट करके काम चला लिया. अरुण जेटली परिवार से मिलने के लिए विदेश रवाना हो गए. 2005 में जिन्ना विवाद के दौरान वे विदेश यात्रा बीच में रद्द करके वापस दौड़े थे. असल में जिस तरह से आडवाणी और उनके कुछ खास लोगों ने गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का बहिष्कार किया था उससे पार्टी के सब्र का बांध टूट चुका था. दूसरी पांत पर अपने अहसानों की कीमत वे 2005 वाले प्रकरण के बाद ही वसूल चुके थे.

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उनके एक प्रबंधक तो कुछ ज्यादा ही आगे चले गए जिससे हालात और खराब हुए. आडवाणी को मनाने में राजनाथ सिंह ने बेहद विनम्रता दिखाई थी लेकिन आडवाणी के एक करीबी किसी पत्रकार से कथित तौर पर यह कहते पाए गए कि ‘भाजपा अध्यक्ष उत्तर प्रदेश की ठाकुर राजनीति को भाजपा में घुसा रहे हैं’. इससे राजनाथ सिंह बेहद नाराज हो गए. इस नाराजगी ने राजनाथ और दूसरे नेताओं को गोवा में किए गए निर्णय पर दृढ़ रहने के लिए उकसाया और साथ ही इसके लिए भी कि कोई दूसरी चुनाव समिति नहीं बनेगी. इसके बाद आडवाणी समर्थक नेताओं का समूह, जो उनके अलगाव से अपना भविष्य खतरे में पा रहा था, भूल सुधार की कोशिश में लग गया. आडवाणी के घर से संघ प्रमुख मोहन भागवत को फोन किया गया और उनकी संघ प्रमुख से बात करवाई गई. इसने आडवाणी को शांति बहाली की घोषणा करने का बहाना दिया.

इस बीच भी मीडिया प्रबंधन जारी रहा. पहले खबर लीक हुई कि भागवत ने आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तय करने का आश्वासन दिया है. जब इसका खंडन हुआ तब नई चर्चा छिड़ गई कि आडवाणी जदयू को एनडीए में बनाए रखने के लिए अहम हैं और उन्होंने एनडीए से अलग न होने के लिए नीतीश से अपील की है. जबकि देखा जाए तो हाल के सालों में आडवाणी बमुश्किल ही गठबंधन प्रबंधन का हिस्सा रहे हैं. बल्कि अगर उनकी चलती तो नीतीश कभी बिहार के मुख्यमंत्री नहीं बनते. 2005 में मुख्यमंत्री पद के लिए उनकी पहली पसंद शत्रुघ्न सिन्हा थे. मान-मनौव्वल के बाद आधे मन से वे नीतीश के नाम पर सहमत हुए थे.
भागवत से बातचीत के बाद आडवाणी के झंडा झुकाने से एक सवाल पैदा हुआ है- क्या यह भाजपा के रोजमर्रा के कामकाज में उसके नियंत्रण का सबूत है? यह सवाल बेहद जटिल है, इसका जवाब सीधे ‘हां’ या ‘ना’ में नहीं दिया जा सकता. संघ और भाजपा का रिश्ता बेहद घुमावदार और बहुपरतीय है. इसे आसानी से समझा नहीं जा सकता. कई मौकों पर संघ के  पदाधिकारी राजनीतिक मसलों पर पार्टी में हद से ज्यादा हस्तक्षेप करते हैं तो कई मामलों में भाजपा के नेताओं को पर्याप्त स्वायत्तता प्राप्त है.

यह सच है कि आडवाणी साल 2000 (जिन्ना प्रकरण से काफी पहले) से ही कह रहे थे कि व्यापक पहुंच वाली पार्टी के रूप में भाजपा संघ द्वारा बनाए गए अपने घोंसले के आकार से कहीं ज्यादा बड़ी हो चुकी है, उसे अब अपना सारा ध्यान सुशासन और नए लोगों को अपने साथ जोड़ने पर लगाना चाहिए. ज्यादातर लोग उनसे सहमत भी थे. पर आडवाणी के साथ समस्या यह थी कि वे इस दूरगामी विचार का अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के साथ घालमेल कर रहे थे.

यहां यह याद कर लेना भी महत्वपूर्ण है कि 2005 में आडवाणी को तत्काल पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने का नरेंद्र मोदी ने विरोध किया था. उनकी चिंता थी कि इस तरह की प्रतिक्रिया से पार्टी में एक बड़ा खालीपन आ जाएगा जिसका फायदा संघ को होगा जो भाजपा नेताओं के लिए अच्छी स्थिति नहीं होगी. हालांकि आखिर में ऐसा ही हुआ. अध्यक्ष के रूप में राजनाथ सिंह का पहला कार्यकाल (2006-09) और उसके बाद नितिन गडकरी का दौर पूरी तरह से संघ की पकड़ को ही मजबूत करता रहा. हालांकि पिछले कुछ महीनों के दौरान हवा का रुख दूसरी तरफ पलटा है. दिसंबर, 2012 में मोदी की गुजरात में जीत और गडकरी को पार्टी अध्यक्ष का दूसरा कार्यकाल दिला पाने में भागवत की असफलता यह बताती है. फिर भी राजनाथ संघ की ही पसंद हैं और यह बताता है कि इसके भाजपा के मामलों में वीटो पावर होने की बजाय पार्टी के लिए सिर्फ एक महत्वपूर्ण हिस्सेदार के रूप में सीमित होने की ऐतिहासिक प्रक्रिया को अभी लंबा वक्त लगना है.

आडवाणी से गलती यह हुई कि उन्होंने भाजपा पर नियंत्रण रखने की संघ की कोशिशों को मोदी के उभार से जोड़ने की कोशिश की. उनके खेमे ने यह दिखाने की कोशिश की कि मोदी को भाजपा पर थोपा जा रहा है. यह हकीकत के उलट और मूर्खतापूर्ण बात थी. हकीकत यह है कि मोदी साफ तौर पर भाजपा कार्यकर्ताओं और पार्टी की राज्य इकाइयों के लिए सबसे पसंदीदा नेता और उम्मीदवार बन चुके थे. इस तरह से वे लोकप्रिय राजनीतिक पसंद हैं और इस फैसले में संघ की राय का महत्व न के बराबर है. आडवाणी ने इस यथार्थ को उलझाने और मोदी की लोकप्रियता को चुनौती देने की कोशिश की. इसके नतीजे में लोगों ने उनकी त्रासदी देखी और उनकी पार्टी का तमाशा.