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लुगदी या लोकप्रिय : मुख्यधारा के मुहाने पर

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वर्दी वाला गुंडा, पतझड़ का सावन, सूरजमुखी, प्सासी नदी, प्यासे रास्ते, झील के उस पार, शर्मीली, चिंगारी, पाले खां, चेंबूर का दादा, लाल निशान, नरक का जल्लाद, पिशाच का प्यार, तड़ीपार, काला अंग्रेज, पुलिस क्या करे, पुनर्जन्म कातिल, बहरूपिया, सुहाग और सिंदूर, सिंगला मर्डर केस, दहकते शहर… ये कुछ ऐसे उपन्यासों के नाम हैं, जिन्होंने लोकप्रियता के झंडे गाड़े और हिंदी पट्टी के युवा वर्ग पर अपनी बादशाहत कायम की. इन उपन्यासों के लेखक इब्ने शफी, रानू, गुलशन नंदा, सुरेंद्र मोहन पाठक, वेदप्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश काम्बोज, कुशवाहाकांत, रीमा भारती, कर्नल रंजीत और दिनेश ठाकुर जैसे लेखक हैं. इन उपन्यासों की बिक्री सबसे ज्यादा रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड के बुक स्टॉल से हुआ करती थी. 1960-70 में इन किताबों की इतनी धूम थी कि लेखकों को अग्रिम रॉयल्टी दी जाती थी. अग्रिम रॉयल्टी दिए जाने के बारे में एक किस्सा बहुत मशहूर है. वह यह कि गुलशन नंदा जब दिल्ली या मुंबई के एयरपोर्ट से बाहर निकलते थे तो प्रकाशक रुपयों से भरी अटैची लेकर उनके पीछे-पीछे दौड़ता था. आलम यह था कि जो प्रकाशक गुलशन नंदा को बैग पकड़ाने में सफल हो जाता, वह अगले कुछ महीने चैन की नींद सो सकता था क्योंकि अगला उपन्यास नंदा उनके लिए ही लिखने वाले होते थे. यह वह दौर था जब गुलशन नंदा और राजेश खन्ना का कॅरियर अपने परवान पर था. गुलशन नंदा की कहानियों पर 35 से ज्यादा हिंदी फिल्में बनीं और करीब 25 फिल्में सुपरहिट रहीं. इन सुपरहिट फिल्मों में राजेश खन्ना अभिनीत बहुत सारी फिल्में शुमार रहीं. नंदा के बारे में एक किस्सा और प्रचलित है. कहा जाता है कि जब वह अपनी प्रसिद्घि के चरम पर थे तो अपना एक उपन्यास राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को भेंट करने पहुंच गए.दिनकर ने उनके उपन्यास को घटिया साहित्य कहकर कहकर फेंक दिया था. तब नंदा अपना-सा मुंह लेकर वापस लौटे थे.

‘सुरेंद्र मोहन पाठक के दोनों उपन्यासों के प्रिंट ऑर्डर 30 हजार हैं. ऑनलाइन रिटेल स्टोर ‘अमेजन’ पर उनकी किताब सर्वाधिक बिक रही है’

हिंदी आलोचकों ने लोकप्रिय और सस्ता होने की वजह से इसे लुगदी साहित्य का नाम दिया. हिंदी के आलोचकों के इस दृष्टिकोण को युवा कथाकार व जानकीपुल ब्लॉग के मॉडरेटर प्रभात रंजन सामंती करार देते हैं. वे बताते हैं, ‘हिंदी साहित्य का सबसे ज्यादा नुकसान आलोचकों ने किया है. यही वजह है कि अब आलोचकों की भूमिका खत्म हो रही है. अब लेखक, पाठक और प्रकाशक बच गए हैं. खांचेबाजी का आलम देखिए कि नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य के बड़े उपन्यासकार-कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु को आंचलिक कहकर खारिज करने की कोशिश की थी.’ हिंदी प्रकाशन का नजरिया अब बदल रहा है और गंभीर साहित्य छापने वाले प्रकाशक भी इन लुगदी सितारों की किताबें छापने लगे हैं. हार्पर कॉलिन्स प्रकाशन ने सुरेंद्र मोहन पाठक के दो उपन्यास ‘कोलाबा कॉन्सपिरेसी’ और ‘जो लड़े दीन के हेत’ छापे हैं. हार्पर कॉलिन्स मूलतः अंग्रेजी का प्रकाशक है लेकिन पिछले कुछ सालों से हिंदी की किताबें भी छाप रहा है. इस प्रकाशन ने लुगदी के पहले लेखक इब्ने सफी को भी छापना शुरू किया है. हार्पर कॉलिन्स की संपादक मीनाक्षी ठाकुर ने ‘तहलका’ से बातचीत में बताया, ‘सुरेंद्र मोहन पाठक के दोनों उपन्यासों के प्रिंट ऑर्डर 30 हजार हैं. इन किताबों को बहुत अच्छा रिस्पाॅन्स मिल रहा है. ऑनलाइन रिटेल स्टोर ‘अमेजन’ पर सुरेंद्र मोहन पाठक की किताब सर्वाधिक बिक रही है.’ हिंदी के बड़े प्रकाशकों ने अभी तक लुगदी साहित्य से दूरी बनाई हुई थी लेकिन पिछले कुछ सालों से उन्हें भी इस साहित्य या इसके आसपास के साहित्य की लोकप्रियता और बाजार पर पकड़ बनाने का मोह सताने लगा है.

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हालांकि लुगदी साहित्य के बारे में वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत कहते हैं, ‘लुगदी साहित्य, गंभीर साहित्य के लिए जरूरी है. पहले भी लुगदी में ईमानदारी, नेकी, देश प्रेम जैसे मूल्य आधारित विषय होते थे और आज भी जो लिखा जा रहा है उसमें भी कुछ मूल्य होते हैं.’ राजकमल प्रकाशन समूह के अधिकारी सत्यानंद निरूपम ‘तहलका’ से बातचीत में कहते हैं, ‘राजकमल प्रकाशन ने लुगदी साहित्य का जब-तब प्रकाशन किया है. हमारे यहां चंद्रकाता और चंद्रकांता संतति का प्रकाशन पहले किया जा चुका है, जिसे पाठकों की ओर से अच्छा रिस्पाॅन्स मिला है. समूह ने बीच-बीच में लुगदी साहित्य को कई बार छापने की कोशिश की है. अब हम इस तरह का साहित्य छापने के लिए ‘फंडा’ नाम का उपक्रम शुरू करने जा रहे हैं.’ इस उपक्रम के बारे में वह कहते हैं, ‘हिंदी समाज में मास लिटरेचर के पाठक हमेशा से बहुत रहे हैं. उनकी बहुत बेकद्री भी हुई है. सिर्फ आम पाठकों के लिहाज से हम इस साल सितंबर तक एक और नया उपक्रम ‘फंडा’ नाम से ला रहे हैं, जिसमें स्तरीय जीवनोपयोगी साहित्य और स्वस्थ मनोरंजन प्रधान साहित्य छापा जाएगा. हम जब फिक्शन छापेंगे तो जाहिर है उसके तहत जासूसी उपन्यास भी प्रकाशित होंगे.’

हिंदी में लुगदी साहित्य की शुरुआत इब्ने सफी के उपन्यासों से हुई. इब्ने सफी, इब्ने सईद और राही मासूम रजा तीनों दोस्त थे. एक दिन बातचीत के दौरान उनके बीच जासूसी उपन्यासों पर चर्चा निकल पड़ी. तब बातों ही बातों में राही मासूम रजा ने कहा कि बगैर सेक्स का तड़का डाले जासूसी उपन्यास लोकप्रिय नहीं हो सकता है. असरार अहमद उर्फ इब्ने सफी ने इसे चुनौती के तौर पर लिया और बगैर किसी सेक्स प्रसंग के पहला उपन्यास ‘दिलेर मुजरिम’ लिखा. यह उपन्यास जबरदस्त हिट साबित हुआ. फिर तो इब्ने सफी ने जासूसी उपन्यासों की दुनिया में तहलका मचा दिया. वरिष्ठ कथाकार असगर वजाहत भी इब्ने सफी की रचनाओं के प्रशंसक रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘इब्ने सफी जासूसी उपन्यासों के उस्ताद थे. उनके उपन्यास में सामाजिकता का पुट होता था.’ इब्ने सफी के इमरान सीरीज के उपन्यासों की बदौलत उनके मित्र अली अब्बास हुसैनी ने भी अपना एक प्रकाशन गृह खोल लिया. उनकी एक किताब का अनुवाद अंग्रेजी के मशहूर प्रकाशन रैंडम हाउस ने प्रकाशित किया. हार्पर कॉलिन्स ने  उनकी 15 किताबों को प्रकाशित कर एक तरह से जासूसी उपन्यासों के इस पहले भारतीय लेखक की ओर ध्यान आकर्षित करने का काम किया. सफी की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके बारे में एक दौर में कहा जाता था कि ‘चंद्रकांता’ और ‘चंद्रकांता संतति’ ने बड़े पैमाने पर हिंदी के पाठक तैयार किए, जिस जमीन पर हिंदी साहित्य की विकास यात्रा शुरू हुई.

रहस्य और रोमांच से भरे कथानक वाले उपन्यासों की धूम इस कदर मची कि रानू और गुलशन नंदा तो हिंदी पट्टी के तकरीबन हर घर में पहुंचने लगे थे. रानू और गुलशन नंदा महिलाओं और कॉलेज छात्र-छात्राओं की पहली पसंद हुआ करते थे. गुलशन नंदा ने जब 1962 में अपना पहला उपन्यास लिखा तो उसकी 10 हजार प्रतियां छपीं. ये प्रतियां बाजार में आते ही खत्म हो गईं और मांग को देखते हुए दोबारा दो लाख और प्रतियां छपवानी पड़ी थी. पहले उपन्यास की सफलता से उत्साहित प्रकाशक ने भविष्य में गुलशन नंदा के उपन्यासों का पहला संस्करण ही पांच लाख का छपवाना शुरू कर दिया था. उस दौर में उन उपन्यासों की कीमत पांच रुपये हुआ करती थी और सारा खर्चा काटकर भी प्रकाशक को हर प्रति पर एक रुपये का मुनाफा होता था, जो कि उस वक्त के लिहाज से बेहतरीन मुनाफा माना जाता था. इस तरह के उपन्यासों की मांग यात्राओं के दौरान बेहद ज्यादा होती थी. छोटी और लंबी यात्रा करने वाले पांच से दस रुपये तक का यह उपन्यास खरीदते और अपने गंतव्य तक पहुंचने से पहले इसे पढ़ जाते थे. इनकी लोकप्रियता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सुरेंद्र मोहन पाठक का उपन्यास ‘पैंसठ लाख की डकैती’ की अब तक 25 लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं. भले ही 40 साल में ये आंकड़ा हासिल हुआ हो, लेकिन हिंदी के लिए यह स्थिति अकल्पनीय है. इस तरह के उपन्यासों की लोकप्रियता को देखते हुए कई घोस्ट राइटर्स ने भी पैसे की खातिर लिखना शुरू कर दिया. ‘मनोज’ ऐसा ही काल्पनिक नाम था जिसकी आड़ में कई लेखक लिखा करते थे. ‘वर्दी वाला गुंडा’ जैसे लोकप्रिय उपन्यास के लेखक वेद प्रकाश शर्मा भी स्वीकारते हैं कि उन्होंने लगभग दो दर्जन उपन्यास बतौर ‘घोस्ट राइटर’ लिखे हैं. जासूसी और हल्की रोमांटिक कथाओं के बड़े बाजार बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कुछ-कुछ राजस्थान के अलावा दिल्ली और मुंबई जैसे महानगर भी थे. इन रोमांटिक उपन्यासों में जिस तरह का हल्का-फुल्का सेक्स प्रसंग होता था, जिसने इन्हें लोकप्रिय बनाने में मदद की. साठ और सत्तर के दशक में भारतीय समाज में सेक्स प्रसंगों को लेकर इस तरह का खुलापन नहीं था, जैसा अब है.

1970-90 तक ऐसे साहित्य के लिए हिकारत-सा माहौल था. वहीं जब इन उपन्यासों पर ‘कटी पतंग’ जैसी फिल्में बनतीं तो पूरा परिवार देखता था

हल्का-फुल्का कहे जाने वाले उपन्यासों की अग्रिम बुकिंग का भी अपना जलवा है. जासूसी उपन्यासों के सम्राट वेद प्रकाश शर्मा ने बताया, ‘पहले ही दिन मेरे उपन्यास वर्दी वाला गुंडा की 15 लाख प्रतियां बिक गई थीं.’ सच तो यह है कि इस उपन्यास को थ्रिलर उपन्यास में क्लासिक का दर्जा हासिल है. इस उपन्यास की अब तक 8 करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं. सुरेंद्र मोहन पाठक का उपन्यास ‘पैंसठ लाख की डकैती’ की भी 25 लाख से ज्यादा कॉपियां बिकीं. हिंदी साहित्य में किसी लेखक की कोई कृति इस आंकड़े को छूने की बात तो दूर आसपास भी नहीं पहुंची होगी. हिंदी के बड़े लेखक खुद ही बताते हैं कि प्रकाशक हमारी किताब की चार या पांच सौ प्रतियां छापते हैं.

1970-90 तक खुद को सभ्य और संस्कारी कहलाने वाले घरों में लुगदी साहित्य को लेकर हिकारत-सा माहौल बना दिया गया था. वहीं जब उन्हीं उपन्यासों पर बनीं ‘कटी पतंग’ और ‘झील के उस पार’ जैसी फिल्मों को दूरदर्शन पर प्रसारित कराया जाता या ये शहर-कस्बों के सिंगल स्क्रिन पर लगते तो पूरा परिवार देखने साथ जाता था. अौर तो और किसी भावुक कर देने वाले दृश्य पर सबकी आंखों से एक साथ आंसू झरते और फिल्म की कहानी पर कई-कई दिनों तक चर्चा में पूरा परिवार मशगूल रहता. स्लेटी कागजों और चटख रंग के कवर वाले इन उपन्यासों को छोटे शहरों के रेलवे स्टेशन पर विक्रेता छुपाकर रखता था और अपने खास ग्राहकों के आते ही इधर-उधर नजरें घुमाता और मौका पाते ही हाथ में उपन्यास पकड़ाते हुए कहता, ‘भैया, परसों 150 कॉपी आई थी. बस एक कॉपी आपके लिए बचाकर रखा था.’ घर में इन उपन्यासों के पाठक भी इसे घर में बिस्तर के नीचे, पुआल में दबाकर या छप्पर या कनाती में खोंसकर रखते थे ताकि किसी की नजर न पड़े. छिपकर या चोरी से इन उपन्यासों को पढ़ने की वजह युवा कथाकार संदीप मील बताते हैं, ‘हमें इसे चोरी से इसलिए पढ़ना पढ़ता था क्योंकि हमारे घरवालों को लगता था कि हम पाठ्यक्रम की पढ़ाई से दूर न हो जाएं. दरअसल इन उपन्यासों का नशा बड़ा जोरदार होता था. एक बार उपन्यास पढ़ना शुरू करता तो उसे खत्म करके ही दम लेता था.’ क्या आपने कुछ ऐसे उपन्यास भी पढ़े जो अश्लील थे? इसके जवाब में वे कहते हैं, ‘हां, कुछ लेखक सेक्स बेचते हैं. ऐसे लोग लुगदी में भी हैं और तथाकथित गंभीर और तथाकथिक स्त्री विमर्श रचनाकारों में भी. अगर इन आलोचकों को अश्लीलता की फिक्र है तो होली और शादी-ब्याह के मौके पर भौंडे गीतों का कारोबार बंद करवाएं. अब काशीनाथ सिंह की काशी का अस्सी को किस श्रेणी में रखा जाए? खुशवंत सिंह के किस्सों को क्या माना जाए?’

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लुगदी साहित्य के दीवानों में वे भी रहे जो ठीक से पढ़-लिख नहीं पाते थे. मेरे मित्र की दादी की पढ़ाई कक्षा एक के बाद ही छूट गई. वह लगभग अनपढ़ थीं, लेकिन उपन्यास को लेकर उनकी दीवागनी ऐसी थी कि वह एक-एक शब्द जोड़कर उसका अर्थ निकालती थीं. दरअसल कई छोटी-छोटी नदियां मिलकर एक बड़ी नदी और कई बड़ी-छोटी नदियों का जल इकट्ठा होकर सागर और महासागर बनता है. जीवन के किसी भी अनुशासन में विस्तार या व्यापकता इसी रास्ते आती है. मगर हिंदी के पुरोधा, समीक्षक और आलोचक कई तरह के भेदभावों को जिंदा रखते हुए साहित्य की समृद्घि और साहित्य जगत का विस्तार करना चाहते हैं. लेकिन हकीकत यह है कि जाति, क्षेत्र, गुट, वरिष्ठ, कनिष्ठ के अलावा सस्ता, महंगा, लोकप्रिय, अलोकप्रिय, गंभीर, हल्का जैसे अनगिनत भेद के बने रहने के चलते हिंदी साहित्य का संसार समय के साथ बड़ा होने के बजाय सिकुड़ता जा रहा है. इन भेदभावों से न ही गंभीर साहित्य का भला हो पा रहा है और न ही पल्प (लुगदी) साहित्य का. हिंदी में इस परिपाटी के लिए कथाकार प्रभात रंजन कहते हैं, ‘सस्ता है, लोकप्रिय है तो लुगदी है. इस तरह की परिभाषा का क्या मतलब? मानो सस्ता होना या लोकप्रिय होना कोई अपराध हो?’ प्रभात लुगदी साहित्य लेखन की प्रतिबद्घता के बारे में बताते हैं, लुगदी साहित्य में एक बड़े लेखक ओमप्रकाश शर्मा हुए जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के मजदूर संगठन अखिल भारतीय मजदूर संघ (एटक) के सदस्य भी थे. ओमप्रकाश शर्मा दिल्ली में अंबा सिनेमा के निकट बिड़ला मिल में मजदूरी करते थे और शाम को प्रतिबद्घता के साथ मजदूरों के लिए उपन्यास लिखा करते थे. उनकी मान्यता यह थी कि इस तरह के साहित्य पढ़ने से उनमें पढ़ने की आदत डलती है और मजदूर अपराध से दूर रहते हैं. आज की तारीख में बता दीजिए कौन साहित्यकार इतनी प्रतिबद्घता के साथ मजदूरों के लिए लिख रहा है? आप उसे गंभीर और लुगदी के चक्कर में एक कौड़ी का लेखक मानने को तैयार नहीं है.’

हिंदी के गंभीर उपन्यासों की तुलना में सुरेंद्र मोहन पाठक और वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास ज्यादा बिकते हैं. दरअसल वेद प्रकाश शर्मा और सुरेंद्र मोहन के उपन्यास के किरदार बहुत सामान्य या असफल किस्म के लोग होते हैं. किसी उपन्यास का पात्र मामूली इंश्योरेंस एजेंट, वकील, पत्रकार होता है. वेद प्रकाश के उपन्यास पर एक सीरियल ‘केशव पंडित’ बना है जिसका मुख्य पात्र केशव वकील हैं. उसने वकालत की कोई पढ़ाई नहीं की है लेकिन अदालत में उसके तर्कों के आगे बड़े-बड़े वकीलों के पसीने छूटते हैं. केशव के तर्कों का जवाब देने के लिए जजों को किताब पढ़ना पढ़ता है. आप ट्रेन या बस में सफर करते हुए अकसर लोगों को ऐसी बातचीत करते हुए सुना होगा कि नेता तो बेकार हैं. इन नेताओं से ज्यादा राजनीति तो मैं जानता हूं. वास्तव में ऐसे सामान्य जीवन के संवाद इन उपन्यासों में मिलते हैं जो आसानी से ‘लूजर क्लास’ के मन में एक किस्म का ‘सेंस ऑफ एचीवमेंट’ पैदा करते हैं.

वेद प्रकाश शर्मा का वर्दी वाला गुंडा उपन्यास लुगदी साहित्य का संभवतः अंतिम सर्वाधिक हिट उपन्यास रहा है. यह उपन्यास राजीव गांधी की हत्या को केंद्र में रखकर लिखा गया है. हालांकि वेद प्रकाश शर्मा इस उपन्यास की रचना प्रक्रिया के बारे में बताते हैं, ‘मैं एक दिन शाम को घूम रहा था तब एक चौराहे पर पुलिस चौकी के आसपास भीड़ जमा थी और एक पुलिस वाला एक आदमी को डंडा दिखा रहा था. पुलिस के इस तरह के आतंक को लेकर वर्दी वाला गुंडा उपन्यास अस्तित्व में आया.’ इस उपन्यास के प्रचार-प्रसार के लिए उत्तर भारत के शहरों में होर्डिंग्स लगाए गए थे. अग्रिम बुकिंग हुई थी. हालांकि इस तरह के साहित्य का वह स्वर्णिम दौर टीवी पर ढेर सारे जासूसी और फैमिली ड्रामा वाले धारावाहिकों के प्रसारित होने से अब कमजोर होने लगा है. वेद प्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक और रीमा भारती का बाजार अभी भी है. हिंदी के बड़े प्रकाशक इस साहित्य को लेकर योजनाएं शुरू कर रहे हैं. इसका मतलब यह लगाया जाना चाहिए कि गंभीर कहा जाने वाला साहित्य पाठकों से दूर हुआ है जबकि लुगदी साहित्य में अभी भी मुनाफे की संभावनाएं बची हुई हैं. वरिष्ठ साहित्यकार और ‘समयांतर’ के संपादक पंकज बिष्ट का कहना है कि आप साहित्य और लुगदी साहित्य को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करके देखें, यह ठीक नहीं है. इस समय लोगों की पढ़ने की आदत ही खत्म हो रही है. गुलशन नंदा के साहित्य में ही नहीं बल्कि उस दौर के किसी भी लेखक की रचनाओं में अश्लीलता नहीं है. आजकल जो साहित्य रचा जा रहा है, वह गुलशन नंदा की रचनाओं से कमतर है. हिंदी में बेस्ट टैलेंट नहीं आ रहा है. मीडियॉकर लोग आ रहे हैं, जो साहित्य में कब्जा जमा रहे हैं. मध्यवर्ग हिंदी सहित अपनी-अपनी भाषाओं से दूर होकर अंग्रेजी में लिखना और बोलना अच्छा समझने लगा है.

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कुपोषण : पहले जरा इसे समझिए

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एक ही दवा लगातार खाने से उसका असर कम होने लगता है. कुपोषण पर अब तक इतनी बहस हुई कि यह विषय ही बेमानी -सा लगने लगा है. फिलहाल नीति निर्धारकों के लिए कुपोषण का मतलब किन्हीं खास डिब्बाबंद पोषण आहार कंपनियों के लिए दरवाजे खोलने का पर्यायवाची है. कुपोषण के मूल कारणों के समाधान में उनकी रुचि नहीं है. संभवत: इसलिए क्योंकि जीडीपी तभी बढ़ेगी जब किसी कंपनी को हजारों करोड़ के ठेके मिले. कहीं आंगनबाड़ी में अंडे का विरोध मध्य प्रदेश सरकार की पैकेटबंद पोषण आहार कंपनियों के लिए बेहतर, स्थायी और प्रभावी विकल्प खड़ा करने की कोशिश तो नहीं? कुपोषण की राजनीति को समझने वाली मध्य प्रदेश की सरकार दस सालों में समुदाय आधारित प्रबंधन का कार्यक्रम खड़ा नहीं कर पाई. जीवन का 90 प्रतिशत शारीरिक और मानसिक विकास पांच साल की उम्र तक हो जाता है. यदि कुपोषण जकड़ ले तो यह विकास 85 प्रतिशत तक भी सीमित रह सकता है या 50 प्रतिशत तक भी. इसका मतलब है कि शिक्षा से लेकर मेक इन इंडिया तक सब इस बात से तय होता है कि बच्चे कितने कुपोषित हैं.

पोषण की असुरक्षा का पहला और सबसे गहरा असर महिलाओं और छोटे बच्चों पर पड़ता है. गर्भवती और धात्री महिलाओं को पर्याप्त प्रोटीन, लौह तत्व और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व नहीं मिलते, तो गर्भस्थ शिशु का सही विकास नहीं हो पाता है. वे कम वजन के पैदा होते हैं. बीते ढाई दशकों में विकास के दावों के साथ कुपोषण भी बढ़ा है. सबसे पहले 1992-93 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-1 से पता चला कि मध्य प्रदेश में 57.4 फीसदी बच्चे कम वजन और 22.3 प्रतिशत बच्चे अति कम वजन के हैं. बाद में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-2 से पता चला कि राज्य में कम वजन के बच्चे 55.1 प्रतिशत के रह गए हैं. तब तक उदारवाद का साया इतना नहीं गहराया था, इसलिए कम वजन के बच्चों की संख्या कुछ घटी. फिर 2001 में पीपुल्स यूनियन फाॅर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा कि एक तरफ अनाज के गोदाम लबालब भरे हैं और दूसरी तरफ राजस्थान, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, बिहार में लोग भूखे मर रहे हैं. इनमें आधे से ज्यादा बच्चे हैं. तब कोर्ट ने निर्देशित किया कि सभी खाद्य, सामाजिक और रोजगार सुरक्षा की योजनाओं का जवाबदेह क्रियान्वयन हो. इसके बाद 2005-06 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के नतीजों से यह साफ हो गया कि अनियोजित विकास कुपोषण बढ़ा रहा है. मध्यप्रदेश में कम वजन के बच्चों की संख्या बढ़कर 60 प्रतिशत हो गई, यानी 100 में से 60 बच्चे कम वजन के. फिर भी सरकार गतिशील नहीं हुई क्योंकि कुपोषण उसके लिए गंभीर मामला नहीं था.

ऐसे विकास का क्या फायदा ?

समुदाय को लगातार अच्छा, विविधतापूर्ण भोजन नहीं मिलने की स्थिति कुपोषण पैदा करती है. ऐसी स्थिति कब बनती है? क्यों बनती है? किनके लिए बनती है? जाहिर है जब अनाज, दाल, सब्जियों, दूध, अंडों, फलों का उत्पादन कम हो, कीमतें बढ़ती जाएं, लोगों के पास स्थायी और सुरक्षित रोजगार के साधन न हों, तब पोषक भोजन भला कैसे नसीब होगा?  मध्य प्रदेश को तीन बार भारत सरकार से कृषि कर्मण पुरस्कार मिल चुका है. लेकिन इसके पीछे की कहानी यह है कि 2005-2014 के बीच कुल कृषि रकबा 19711 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 23233 हजार हेक्टेयर हो गया. सिंचित क्षेत्रफल भी 5878 हजार से बढ़कर 8965 हजार हेक्टेयर हुआ. इससे खाद्यान्न उत्पादन तो बढ़ना ही था, जो 143.31 लाख टन से बढ़कर 276 लाख टन पर पहुंच गया. मध्य प्रदेश फिलहाल प्रति व्यक्ति 380 किलो अनाज पैदा करता है. हालांकि, प्रति व्यक्ति अनाज की खपत 141 किलो (ग्रामीण) और 124 किलो (शहरी) पर ही टिकी है.

राशन प्रणाली को छोड़कर बच्चों और महिलाओं के पोषण हकों को विकास की कालीन के नीचे छिपा दिया गया है

अब हमें दो सवालों के जवाब खोजने हैं. पहला यह कि खाद्यान्न माने क्या?  दूसरा सवाल यह है कि उत्पादन में इजाफे का लाभ किसे मिला? भारत में एनएसएसओ की पौष्टिक अंतर्ग्रहण (अक्टूबर 2014 में जारी) रिपोर्ट से पता चलता है कि मध्य प्रदेश के गांवों में 1972-73 के दौरान प्रति व्यक्ति उपभोग 2423 कैलोरी था, जो 2011-12 में घटकर 2110 कैलोरी रह गया, जबकि शहरों में यह 2229 कैलोरी से घटकर 2029 कैलोरी हो गया. गांवों में प्रोटीन अंतर्ग्रहण 68 ग्राम से घटकर 61.8 ग्राम और शहरों में 61 से 58 ग्राम तक घटा.

मध्य प्रदेश (ग्रामीण) में प्रति व्यक्ति अनाज की दैनिक खपत 384 ग्राम है. हर व्यक्ति के हिस्से में 28 ग्राम दाल रोज आती है. 179 ग्राम सब्जी, 24 ग्राम फल, 1.7 ग्राम सूखे मेवे, 13.6 ग्राम मसाले भी रोज के खाने में शामिल हैं. दूध की प्रति व्यक्ति खपत 135 मिलीलीटर है. एनएसएसओ के मुताबिक, औसतन एक व्यक्ति के भोजन पर रोज का खर्च 24.32 रुपये आता है. मध्य प्रदेश के शहरों में अनाज का उपभोग और कम हुआ है. यहां हर व्यक्ति की थाली में रोजाना 339 ग्राम अनाज आता है. दाल का उपभोग 31 ग्राम प्रतिदिन है. शहरी क्षेत्रों में भोजन पर रोजाना का खर्च लगभग 29 रुपये है. साफ है कि उत्पादन की बढ़ोतरी का असर खाद्य सुरक्षा पर पड़ता नहीं दिख रहा है. शायद इसलिए कि कृषि या कृषि उत्पादन के मकसद बदल गए हैं.

असंवेदनशील सोच

भारत सरकार के सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे (2013) के मुताबिक, मध्य प्रदेश में प्रति एक लाख जीवित जन्म पर पांच साल से कम उम्र के 69 बच्चों की मृत्यु होती है. इस परिभाषा के अनुसार, 2013 में जीवित पैदा हुए 19 लाख बच्चों में से 1.383 लाख बच्चे पांचवां जन्मदिन मनाने से पहले ही दुनिया छोड़ गए. इसका सीधा संबंध कुपोषण के ऊंचे स्तर से है. कुपोषित बच्चों के डायरिया, निमोनिया, खसरा और मलेरिया से मरने की आशंका 19 गुना तक बढ़ जाती है. अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य शोध पत्रिका ‘द लांसेट’ के मानकों पर सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे (2013) में बताई गई मृत्यु दर के आधार पर आकलन करें तो मध्य प्रदेश में निमोनिया से 34,382 और डायरिया से 27,696 बच्चों की मौत हुई. दरअसल हमें ऐसी सोच की जरूरत है, जो कुपोषण से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन आवंटित करे, अलग-अलग समुदायों में भोजन के व्यवहार को संरक्षित और प्रोत्साहित करे. जिसमें सांस्कृतिक भेदभाव न हो, पोषण आहार कालाबाजारियों के हवाले न रहे और कुपोषण से लड़ाई में समाज को मुख्य भूमिका में रखा जाए. मध्य प्रदेश में ऐसा कुछ नहीं हुआ. केवल बाल पोषण कार्यक्रम के लिए 2010-11 से 2014-15 के दौरान 5139.56 करोड़ रुपये खर्च किए गए. लेकिन 1.07 करोड़ बच्चों के पोषण पर खर्च 3 रुपये प्रतिदिन से ज्यादा नहीं बढ़ा.

‘बीमारू’ राज्य की छवि को बदलने के लिए राज्य सरकार ने विजय राजे सिंधिया बीमा योजना शुरू की. नवजात शिशु उपचार इकाइयां भी बनाईं. गंभीर कुपोषित बच्चों के इलाज की व्यवस्था, यानी पोषण पुनर्वास केंद्रों का ढांचा खड़ा हुआ. बाद में ऐसी योजनाएं कब बंद हो जाती हैं किसी को खबर तक नहीं लगती है. मुफ्त दवा योजना के तहत घटिया क्वालिटी की दवाएं बांटी जाती हैं. डाॅक्टरों के आधे पद खाली पड़े हैं; क्यों?  न तो यह सवाल पूछा जाता है, न जवाब देने के लिए कोई उत्तरदायी है. स्वास्थ्य, पोषण, कृषि जैसे क्षेत्रों में नवाचारी पहल के लिए मध्य प्रदेश बीते एक दशक में देश का सबसे अग्रणी राज्य रहा है, लेकिन इसमें दृष्टि और निरंतरता का अभाव साफ झलकता है. शायद यही वजह है कि कई योजनाएं आगे बढ़ने से पहले ही दम तोड़ गईं.

लिंगभेद किशोरी और बालिकाओं के विकास और विश्वास तो तोड़ देता है. इसी संदर्भ में मध्य प्रदेश में कन्यादान योजना सरकार खुद चलती है, जिसमें विवाह भेंट का आवरण डालकर दहेज की व्यवस्था की जाती है. मातृत्व हकों की बात करते हुए हमारे सामने अकसर ऐसी घटनाएं तैर जाती हैं जब पता चलता है कि गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा के दौरान स्वास्थ्य सेवकों ने थप्पड़ मार-मार कर चुप करवाया, कभी ऐसे डांटा कि मां के हाथ से नवजात शिशु छिटक कर गिर गया और कई बार बच्चे का जन्म सड़क के किनारे ही हो गया. महिला श्रमिक प्रसव से एक दिन पहले तक कड़ा श्रम करने के लिए मजबूर हैं क्योंकि उन्हें मातृत्व हक नहीं मिलता. यह हिंसा भी कुपोषण का एक बहुत बड़ा कारण है, इसे खारिज नहीं किया जा सकता.

राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण की 68वें दौर की रिपोर्ट (2014) में पौष्टिक अंतर्ग्रहण के संदर्भ में कहा गया है कि मध्य प्रदेश की ग्रामीण जनसंख्या कुल ऊर्जा का 62.82 प्रतिशत और प्रोटीन का 67 प्रतिशत हिस्सा अनाज से लेती है. असल में सही और गुणवत्तापूर्ण पोषण के लिए यह हिस्सा दालों,  दूध,  अंडे, फल-सब्जियों और पशुजन्य प्रोटीन से लिया जाना चाहिए. गरीबी और संसाधनों पर से नियंत्रण जाने का मतलब है, थाली में रोटी और नमक रह जाना. लोगों को आर्थिक रूप से संपन्न मत बनाइए, उन्हें संसाधनों से संपन्न बनाइये; तब कम से कम पोषण आहार के लिए किसी बच्चे को आंगनबाड़ी केंद्र न आना पड़ेगा. भोजन में विविधता का सार यही है. लेकिन मध्य प्रदेश में अब भी स्थानीय मूल के बारीक और मोटे अनाजों (जैसे रागी, मक्का, कोदो, कुटकी आदि) को प्रोत्साहित नहीं किया जा रहा है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने दुनिया भर के उद्योगपतियों को संदेश दिया है कि वे जिस जमीन पर उंगली रखेंगे, वह झट से मिल जाएगी. अलबत्ता, ऐसी प्रतिबद्धता किसानों, खेतिहर मजदूरों, बच्चों-महिलाओं की पोषण सुरक्षा के लिए नहीं दिखती. विगत दस सालों में मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड-बघेलखंड के 12  जिलों से होने वाला मजबूरी का पलायन तीन गुना बढ़ गया. क्योंकि आजीविका का संकट गहराता गया, ऐसे में कुपोषण जड़ से खत्म होने से रहा. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (2013) के तहत राज्य सरकार को आंगनबाड़ी, मध्याह्न भोजन, राशन प्रणाली और मातृत्व हक से जुड़े कानूनी प्रावधान लागू करने थे किन्तु राशन प्रणाली को छोड़कर बच्चों और महिलाओं के पोषण हकों को विकास की कालीन के नीचे छिपा दिया गया है.

चित्र कथा : दर्द के निशां

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13 साल का अमान अली हिंसा के समय भागते हुए अपनी कुछ किताबें साथ ले गया था. वापस आकर अपनी बची हुई किताबों और स्कूल बैग को जला हुआ देखकर वो दुखी हो गया. अमान पिछले कई हफ्तों से स्कूल नहीं गया 


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75 साल के अब्दुल हफीज आगजनी में जलाई गई अपनी धार्मिक किताबों के अवशेष के साथ. वो बताते हैं कि विवादित मस्जिद स्थल के सामने बना उनका घर हिंसा का सबसे अधिक शिकार हुआ है. मस्जिद के निर्माण को मॉनीटर करने के लिए लगा हुआ सीसीटीवी कैमरा हफीज के घर से ही संचालित होता था, उसकी हार्ड डिस्क को काफी नुकसान पहुंचा है


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विवादित मस्जिद स्थल पर नमाज पढ़ते लोग. हिंसा के दौरान टूटी बाहरी दीवार की मरम्मत प्रशासन द्वारा करवाई गई है.


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आस मोहम्मद प्राइवेट नौकरी करते हैं, और उन्होंने वापस नौकरी पर जाना शुरू कर दिया है वहीं उनकी पत्नी घर की देखरेख कर रही हैं. दंगे में उनके मात्र एक कमरे के घर से कुछ कीमती सामान और पैसे लूट लिए गए. उनके चार बच्चे अभी तक रिश्तेदार के घर से वापस गांव नहीं लौटे हैं


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नगमा बताती हैं कि उनकी 6 महीने की बेटी को गुस्साई भीड़ ने आग में फेंक दिया था पर उनके पड़ोसियों ने बच्ची को बचा लिया. नगमा अपने पति शेरदिल और तीन बच्चों के साथ रहती हैं. हिंसा से बच्चे इतने डर गए हैं कि उन्होंने घर लौटने से ही मना कर दिया है


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25 साल के युसूफ की हाल ही में शादी हुई थी. वो बताते हैं कि घर में जलाया हुआ सब समान और फर्नीचर बिलकुल नया था. उनकी पत्नी इतनी डर गईं हैं कि उन्होंने गांव लौटने से ही मना कर दिया है. युसूफ एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं और उन्हें डर है कि बिना किसी सूचना के इतने दिनों तक काम पर न जाने के कारण उनकी नौकरी न चली जाए


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ऑटो ड्राइवर रईसुद्दीन रोते हुए कहते हैं, ‘उनका घर पूरी तरह बर्बाद हो गया है. ये मरम्मत से परे है, हमें इसे फिर से बनाना होगा.’ वो अपना काम फिर से शुरू भी नहीं कर सके हैं. तनाव के डर से वो अब तक अपनी पत्नी और बच्चों को गांव ले कर नहीं आए हैं.


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बेवा नन्नो अपने एक कमरे के छोटे से घर में. वो अपने इकलौते बेटे के साथ रहती हैं जिसकी शादी दिसंबर में होनी है. जो थोड़ा-बहुत फर्नीचर उनके पास था और जो भी पैसा उन्होंने बेटे की शादी के लिए बचाया था वो सब दंगे में बर्बाद हो गया

‘कर्म कर वेतन की चिंता छोड़ दे’

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॥ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

यह गीताप्रेस, गोरखपुर की ओर से प्रकाशित और देशभर में प्रसारित होने वाली ‘श्रीमदभगवतगीता’ के अध्याय दो का 47वां श्लोक है. इसका अर्थ है- तेरा कर्म में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं. इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो. इसके अर्थ की और व्याख्या करें तो इस श्लोक में चार तत्व हैं. पहला, ‘कर्म करना तेरे हाथ में है’. दूसरा, कर्म का फल किसी और के हाथ में है. तीसरा, कर्म करते समय फल की इच्छा मत कर और चौथा फल की इच्छा छोड़ने का यह अर्थ नहीं है कि तू कर्म करना भी छोड़ दे.

इस हिसाब से लगता है गीताप्रेस प्रबंधन ने इस श्लोक और इसमें निहित अर्थ को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया है. तभी तो ‘फल’ यानी वेतन को लेकर पिछले कुछ महीनों से कर्मचारियों ने प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. इस कहानी के दो पहलू हैं. कर्मचारियों के नजरिये से देखें तो यह उनके अधिकारों के हनन की दास्तां बयां करता है. दूसरा पहलू गीताप्रेस प्रबंधन का है जो मामले में खुद को पाक-साफ बता रहा है. वहीं प्रशासन कह रहा है कि सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा है. आपसी खींचतान की ये कहानी पिछले साल तीन दिसंबर को लोगों के सामने आई, जब वेतन विसंगति को लेकर कर्मचारियों ने धरना प्रदर्शन किया.

इस लड़ाई की पड़ताल करने पर पता चला कि  इतिहास में इसकी जड़ें कई दशक गहरी हैं. कोलकाता के गोबिंद भवन ट्रस्ट की ओर से गीताप्रेस का संचालन किया जाता है. इस ट्रस्ट की ओर से ऋषिकेश में गीता भवन के नाम से कुछ फर्म जैसे- सत्संग केंद्र, आयुर्वेदिक दवा की दुकान और कपड़े की एक दुकान चलाए जाते हैं. वार्षिक वेतन वृद्घि और वेतन विसंगति की असल लड़ाई गीता भवन को लेकर ही है. कर्मचारी नेता मुनिवर मिश्र बताते हैं, ‘इन फर्मों के कर्मचारियों को पूरे वेतन पर 10 प्रतिशत वृद्घि, 100 रुपये की विशेष वृद्घि और 10 प्रतिशत का एचआरए (मकान किराया भत्ता) अलग से मिलता है मगर गोरखपुर में इस तरह की कोई भी सहूलियत कर्मचारियों को नहीं दी जाती.’ कर्मचारियों की मांग है कि प्रदेश सरकार की ओर से जारी न्यूनतम वेतन के जीओ को लागू करने के साथ वार्षिक वेतन वृद्घि, आवास भत्ता, जैसे गीता भवन, ऋषिकेश में लागू किया गया है, वही सुविधा गीताप्रेस की सभी यूनिटों पर बिना किसी भेदभाव के समान रूप से लागू की जाए. इसके अलावा गीताप्रेस में कैंटीन खोलने की मांग भी कर्मचारियों ने रखी थी.

वेतन को लेकर प्रबंधन की ओर से की जा रही गड़बड़ियों की कोई जांच नहीं हुई थी. जांच इस बात की हुई थी कि गीताप्रेस में मैन पावर कितना है. वहां कैंटीन खोली जाए या नहीं. इसी की जांच हुई थी. कैंटीन खोलने का मामला था. प्रबंधन का कहना था कि 500 से कम कर्मचारी हैं. फिर जांच हुई तो 500 से ज्यादा कर्मचारी पाए गए थे. इसके बाद प्रबंधन का कहना था कि इसमें ज्यादातर ठेके के कर्मचारी है. समझौते में एडीएम सिटी ने आदेश कर दिया कि संख्या ज्यादा हो या कम, फिलहाल आप कैंटीन खोलिए. वेतन के मामले की जांच को लेकर जिलाधिकारी से अनुमति लेनी होती है. इसके लिए हमें किसी तरह की अनुमति नहीं थी. उनकी मांगों के दो-तीन बिंदु श्रमायुक्त कानपुर को भेजा गया है. उस पर अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है. अगर कर्मचारी वेतन विसंगति की जांच होने की बात कर रहे हैं तो इसमें मैं क्या कह सकता हूं. ये तो उन्हीं से पूछा जाना चाहिए

 आरसी गुप्ता, उप श्रमायुक्त गोरखपुर

गीताप्रेस में इन दिनों 200 से ज्यादा स्थाई और 400 से ज्यादा अस्थाई कर्मचारी हैं. कर्मचारियों के अनुसार प्रबंधन प्रदेश सरकार की ओर से जारी हर पुनरीक्षित न्यूनतम वेतन राजाज्ञा (जीओ) को चुनौती देता रहा है. इस संबंध में 31 मई 1992 को जारी जीओ को गीताप्रेस की ओर से इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी. इसकी सुनवाई 19 वर्षों तक चली. मामले में 23 दिसंबर 2010 को निर्णय देते हुए गीताप्रेस की याचिका हाई कोर्ट ने खारिज कर दी. हाई कोर्ट ने 31 मई 1992 को जारी जीओ को पूरी तरह से वैध ठहराया था. कर्मचारी नेता रवींद्र सिंह बताते हैं, ‘इस निर्णय के आने के बाद भी प्रबंधन ने इसे लागू करने में कोई रुचि नहीं दिखाई. इसके बाद सितंबर, 2011 में कर्मचारियों की मांग पर उप श्रमायुक्त गोरखपुर ने गीताप्रेस की स्थलीय जांचकर मामले की रिपोर्ट दी. रिपोर्ट में प्रबंधन को न्यूनतम वेतन देने के नियम का उल्लंघन करने का दोषी ठहराया गया था.’ हालांकि उप श्रमायुक्त गोरखपुर आरसी गुप्ता इस बात का खंडन करते हुए कहते हैं, ‘मेरे कार्यालय में सिर्फ कैंटीन बनाने को लेकर हुए विवाद का निपटारा हुआ था. वेतन विसंगति की जांच मेरी ओर से नहीं की गई थी.’

वेतन विसंगति को लेकर हम लोगों का आंदोलन चल रहा है. इस साल की शुरुआत में प्रशासन का हस्तक्षेप हुआ तब बातचीत के बाद हमने एक-दो महीने के लिए आंदोलन स्थगित कर दिया था. अब हमने प्रबंधन को मांगें पूरी करने के लिए 30 जून तक का समय दिया है. उसके बाद हम आंदोलन को आगे बढ़ाएंगे. हमने मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिया है और जिलाधिकारी को भी पत्र लिखा है. जिलाधिकारी ने कर्मचारियों से कहा था कि आप लोग एक-दो महीने शांत रहिए. उसके बाद जो उचित होगा किया जाएगा. गीताप्रेस की व्यवस्था के बारे में प्रशासन को उन्होंने (प्रबंधन) एकतरफा बात बताई है. हम लोगों का पक्ष सुना नहीं गया. हम लोग किसी भी कीमत पर अपना आंदोलन वापस नहीं लेंगे. चाहे उसके लिए अपनी जान देनी पड़े या कुछ भी करना पड़े. हम लोगों की शर्तें पूरी हुए बिना हम किसी के धमकाने से पीछे हटने वाले नहीं

रमन कुमार श्रीवास्तव, कर्मचारी नेता, गीताप्रेस

बीते साल तीन दिसंबर को कर्मचारियों का गुस्सा एक बार फिर फूट पड़ा. कर्मचारियों ने शहर के कुछ दूसरे मजदूर संगठनों के साथ मिलकर जुलूस निकाल कर जिलाधिकारी कार्यालय पर धरना-प्रदर्शन किया. कर्मचारियों ने वेतन विसंगति खत्म करने की मांग पूरी होने तक आंदोलन जारी रखने का संकल्प लिया था. हालांकि उस वक्त जिलाधिकारी रंजन कुमार ने आश्वासन दिया था कि प्रबंधन से बातचीत कर असहमतियों को सुलझा लिया जाएगा. इसके बाद कर्मचारियों ने धरना खत्म कर दिया था. आवाज बुलंद कर रहे गीताप्रेस के कर्मचारियों के जुलूस में माध्यमिक शिक्षक संघ, डेली मजदूर संघ, मजदूर बिगुल दस्ता, नौजवान सभा व चीनी मिल मजदूर यूनियन के कार्यकर्ता भी शामिल हुए थे. उस दिन कर्मचारियों ने सामूहिक अवकाश लेकर यह प्रदर्शन किया था. इसके बाद मामला शांत हो गया, लेकिन कर्मचारियों की मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया.

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कर्मचारियों के अनुसार, इसके विरोध में 16 दिसंबर को प्रबंधन ने गीताप्रेस के तीन कर्मचारियों को बर्खास्त करते हुए यहां अनिश्चितकालीन तालाबंदी कर दी. मुख्य गेट पर ताला लगा हुआ था और एक नोटिस चस्पा था, जिसमें तीन दिसंबर के धरना प्रदर्शन का हवाला देते हुए ये कार्रवाई करने का हवाला दिया गया था. नोटिस के अनुसार, ‘कर्मचारियों ने बिना सूचना दिए प्रदर्शन व जुलूस निकाला, यह उत्तर प्रदेश औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 6 (एस) का उल्लंघन है. उत्तर प्रदेश औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 6 (एस) (3) प्रबंधन को तालाबंदी घोषित करने का अधिकार देती है. इस अराजक माहौल में प्रतिष्ठान चलाना संभव नहीं है. कभी भी कोई अप्रिय घटना घट सकती है. इसलिए प्रबंध तंत्र ने अनिश्चितकालीन तालाबंदी का निर्णय लिया है.’ इसकी वजह यह थी कि उन्होंने 15 दिसंबर को वेतनवृद्घि और वेतन विसंगति को लेकर जिलाधिकारी को एक मांगपत्र सौंपा था. तालाबंदी के खिलाफ कर्मचारियों ने एक बार फिर जिलाधिकारी से गुहार लगाई. कर्मचारियों को बर्खास्त करने के पहले उन्हें नोटिस भी नहीं दिया गया था. तब जिलाधिकारी ने तालाबंदी व कर्मचारियों की बर्खास्तगी को गैरकानूनी बताया था. मुनिवर मिश्र बताते हैं, ‘जिलाधिकारी को मांगपत्र सौंपना प्रबंधन को नागवार गुजरा था. इसके अगले दिन 16 दिसंबर, 2014 को जब हम काम करने के लिए गीताप्रेस पहुंचे तो मेन गेट पर ताला लगा हुआ था. साथ ही प्रेस में अनिश्चितकालीन बंद को लेकर एक नोटिस लगाया था, जिसमें प्रबंधन की ओर से बताया गया था कि तीन कर्मचारियों- मैं और मेरे दो साथी वीरेंद्र सिंह और रामजीवन शर्मा को बर्खास्त कर दिया गया है.’ वह कहते हैं, ‘हमने एक बार फिर जिलाधिकारी से मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई. जिसके बाद 17 दिसंबर 2014 को गीताप्रेस में अनिश्चितकालीन तालाबंदी को हटाने के साथ बर्खास्त कर्मचारियों की पुनर्बहाली का आदेश दिया गया. इसके बाद 24 दिसंबर 2014 से 19 मार्च 2015 तक उप श्रमायुक्त कार्यकर्ता से अपर जिलाधिकारी (नगर) की अध्यक्षता में बातचीत के कई दौर चले. इसमें जीओ के मुताबिक जिन मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई थी, उसे अपर श्रमायुक्त, कानपुर के मार्गदर्शन के लिए भेजा गया.’

‘प्रबंधन के लोग अब तानाशाही पर उतर आए हैं. पहले गीताप्रेस में इन लोगों ने हंगामा करवाया अब गीता भवन में हंगामा करवा रहे हैं. इन सबका कोई मतलब नहीं है. लगभग 20 सालों से हमें वार्षिक वेतन वृद्घि मिलती थी, जो इस साल नहीं दी गई. बगैर किसी कारण के इन लोगों (प्रबंधन) ने इसे बंद कर दिया. जब इन लोगों से बात की गई तो इनका एक ही जवाब था कि हम लोग वेतन वृद्घि नहीं देंगे, आप लोगों को जैसा करना है कर लीजिए. इसके बाद कई बार प्रबंधन से बात करने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी एक ही रट थी कि इस मामले को लेकर हमसे बात करने के लिए मत आइए. मजबूरी में हमें जनप्रतिनिधियों को बीच में लाना पड़ा. जनप्रतिनिधियों से भी उन्होंने अंट-शंट बात की तो हंगामा शुरू हो गया. इस पर प्रबंधन के लोगों ने रातोरात प्रतिष्ठानों पर ताला लगाया और भाग गए. उसके बाद हम लोगों ने भी प्रतिष्ठानों में अपना ताला लगाकर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं. उप श्रमायुक्त के यहां भी बैठक के लिए चार बार बुलाया गया, लेकिन प्रबंधन की ओर से कोई पहुंचा नहीं’

राजीव शर्मा, कर्मचारी, गीता भवन, ऋषिकेश

कर्मचारियों का आरोप है कि न्यूनतम वेतन के संबंध में जारी राजाज्ञा को लेकर गीताप्रेस प्रबंधन की ओर स्थाई और अस्थाई श्रेणी के कर्मचारियों का लगातार शोषण किया जा रहा है. आरोप है कि गीताप्रेस में 400 से ज्यादा अस्थाई कर्मचारी हैं, जो पिछले 25 सालों से कार्यरत हैं. इन्हें न तो न्यूनतम वेतन दिया जा रहा है और न ही श्रम कानून का पालन किया जा रहा है. कर्मचारियों का कहना है कि तमाम मुद्दों पर उप श्रमायुक्त कार्यालय में सहमति बनने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई. इस बीच 12 दिसंबर को उप श्रमायुक्त कार्यालय पर गीताप्रेस में कैंटीन खोलने की सहमति बनी थी. इसके अलावा तय हुआ कि ओवरटाइम करने पर श्रमिकों को दोगुने दर से भुगतान किया जाएगा. श्रमिकों की सेवानिवृत्ति आयु 58 से 60 वर्ष करने के संबंध में श्रमिक प्रतिनिधियों द्वारा स्थायी आदेश में संशोधन के लिए प्रार्थना पत्र दिया जाएगा. एडहॉक वेतन को मूल वेतन में समायोजित करने के संबंध में न्यूनतम वेतन के संबंध में जारी राजाज्ञा वर्ष 2006 व 2014 के संबंध में शासन से मार्गदर्शन प्राप्त किया जाएगा.

अभी तो गीताप्रेस में कोई दिक्कत नहीं है. बातचीत हो गई है. उसके बाद कोई आया नहीं. हम लोगों का काम धमकाने का थोड़े ही है. हम लोग कार्रवाई करेंगे कि धमकी देंगे. प्रशासन का आदमी भला धमकी क्यों देगा. देखिए सबका परसेप्शन अलग-अलग है. मान लीजिए गीताप्रेस में काम चलने लगा और करोड़ों प्रतियां निकलने लगीं तो किसी को खराब लग रहा होगा, तो लोग कुछ भी बोल सकते हैं. बहुत लोग ऐसे हैं जो केवल नकारात्मक विचारधारा में जीते हैं. वो चाहते हैं कि हर चीज रुकी रहे तो सब उनको पूछेगें. अगर नहीं रुकेगी तो उनको कौन पूछेगा. वहां (गीताप्रेस) एक-दो (कर्मचारी) हैं उस तरह के, जो काम चलता है तो दुखी हो जाते हैं. कुछ लोग चाहते हैं कि काम रुका रहे. एक महीने से कोई दिक्कत रिपोर्ट नहीं हुई है

रंजन कुमार, जिलाधिकारी गोरखपुर

कर्मचारियों का आरोप है कि मूल वेतन में सालाना वृद्घि न करके प्रबंधन की ओर से एडहॉक वेतन पर वृद्घि की जा रही है. रवींद्र सिंह बताते हैं, ‘वेतन दो हिस्सों में होता है. ‘मूल वेतन’ और ‘महंगाई भत्ता’. वहीं गीताप्रेस में वेतन को दो भागों में बांट दिया गया है. ‘मूल वेतन’ और ‘एडहॉक’. प्रबंधन इंक्रीमेंट के पैसे को मूल वेतन में न जोड़कर एडहॉक में डाल देता है. जबकि नियम के मुताबिक इंक्रीमेंट मूल वेतन में जुड़ता है. बाकी के पैसे पर महंगाई भत्ते की चोरी की जा रही है. जैसे किसी कर्मचारी का मूल वेतन 5750 रुपये है. अब जब इंक्रीमेंट लगता है तो महंगाई भत्ता बढ़ता है. अब मान लीजिए उस कर्मचारी का वेतन 5750 से 7000 रुपये हो गया है. ऐसे में 1250 रुपये की जो बढ़ोतरी हुई उसे एडहॉक वेतन में डाल दिया जाता है. अगली बार जब फिर इंक्रीमेंट लगेगा तो उसी 5750 रुपये के मूल वेतन पर ही लगेगा. पिछली बार मिली 1250 रुपये की वृद्घि को मूल वेतन में जोड़ा जाता तो अगली बार 7000 रुपये के मूल वेतन पर प्रबंधन को इंक्रीमेंट देना पड़ता. प्रबंधन का ये खेल कई वर्षों से जारी है.’

इस बीच फरवरी में कर्मचारियों ने उस वक्त फिर से हंगामा शुरू कर दिया जब उनसे ‘फॉर्म 12’ की जगह ‘फॉर्म 18’ भरने को कहा गया. कर्मचारियों के अनुसार उप श्रमायुक्त कार्यालय पर हुई बैठक में उनकी हाजिरी ‘फॉर्म 12’ भरे जाने पर सहमति बनी थी. ‘फॉर्म 12’ स्थाई कर्मचारियों की ओर से भरे जाने के लिए था जबकि ‘फॉर्म 18’ ठेका कर्मचारियों से भरवाया जाता है. मामला कर्मचारियों को स्थाई करने का था, लेकिन प्रबंधन ने ऐसा करने से मना कर दिया था. मार्च में न्यूनतम वेतन को लेकर एक बार कर्मचारियों ने हंगामा किया. कर्मचारियों का आरोप था कि उप श्रमायुक्त की जांच में कुल 337 ठेका कर्मचारी मौके पर कार्य करते पाए गए थे, जिसमें से प्रबंधन मात्र 100 कर्मचारियों को ही न्यूनतम वेतनमान दे रहा है. साथ ही गत दिसंबर में डेढ़ दिन के तालाबंदी का वेतन ठेका कर्मचारियों को नहीं दिया गया जबकि स्थायी कर्मचारियों को दे दिया गया है. कर्मचारियों का आरोप है, ‘श्रमायुक्त कार्यालय पर मार्च में हुई बैठक में अस्थाई कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट लेबर के रूप में रखने का प्रशासन की ओर से दबाव डाला गया. इसके अलावा प्रबंधन की ओर से बातचीत में बनी सहमतियों का पालन करने से इंकार कर दिया गया. जिलाधिकारी और दूसरे कर्मचारियों की ओर से दबाव डालकर कर्मचारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने की धमकी दी गई और कर्मचारियों से मामले की जांच को छह महीने तक स्थगित रखने के लिए कहा गया.’

गीताप्रेस एक सार्वजनिक संस्था है. यह मुनाफा कमाने वाली कंपनी नहीं है. हम कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन देने के नियमों का पालन करते हैं. कर्मचारियों के वेतन में वृद्घि भी की गई थी. उन्हें कम देने का सवाल ही नहीं उठता. इसके अलावा कर्मचारी अगर और मांगते हैं तो ये हमारे बस की बात नहीं है. वेतन और वेतन वृद्घि देने का नियम अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग होता है. आप दूसरे प्रांत की बात  नहीं कर सकते. दूसरे प्रांतों के कानून को यहां लागू नहीं किया जा सकता

बैजनाथ अग्रवाल, न्यासी व्यवस्थापक, गीताप्रेस

हालांकि गोरखपुर के जिलाधिकारी इन बातों का खंडन करते हुए कहते हैं, ‘हम धमकी क्यों देंगे, जबकि हमारा काम कार्रवाई करने का है.’ बहरहाल उप श्रमायुक्त कार्यालय में हुई बैठक में जिन मुद्दों पर सहमति नहीं बनी थी उनकी सूची श्रमायुक्त, कानपुर को भेजी गई है. कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी एक मांगपत्र भेजकर मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है.

निजता पर नजर

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तमाम तरह की सुधारवादी योजनाओं को लागू करने के बीच भारत सरकार की चाहत ये भी है कि अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी (एनएसए) की प्रिज्म परियोजना की तर्ज पर वह भी भारतीयों के फोन कॉल, मैसेज, वीडियो कॉल, ईमेल और तमाम निजी जानकारियों पर निगरानी रखे. इस चाहत को पूरा करने के लिए सरकार इस साल के अंत तक देश में सेंट्रल मॉनीटरिंग सिस्टम (सीएमएस) योजना को लागू करने वाली है. इसके लागू होने के बाद फोन कॉल से लेकर इंटरनेट पर किए गए सारे काम भारतीय खुफिया एजेंसियों की नजर में रहेंगे.

इस कवायद का मतलब ये है कि सरकार आपके फोन कॉल सुनने, मैसेज और ईमेल पढ़ने के अलावा आपका पासवर्ड भी जान सकती है. साथ ही गूगल लोकेशन सर्विस और जीपीएस के जरिए आपके हर कदम की जानकारी रख सकती है.

सीएमएस परियोजना की बुनियाद 2007-2008 में संप्रग सरकार ने मुंबई हमले के बाद रखी थी. इसका जिम्मा भारतीय दूरसंचार प्रौद्योगिकी संस्था सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स (सी-डॉट) को सौंपा गया था. सीएमएस के तहत खुफिया एजेंसियां बगैर मोबाइल और इंटरनेट कंपनियों के हस्तक्षेप और इजाजत के लोगों का सारा डाटा ले सकती हैं और उनके फोन टैप कर सकती हैं.  सीएमएस के लागू होते ही सरकार के पास लोगों के इलेक्ट्रॉनिक संचार से जुड़ी हर जानकारी होगी जो पहले सिर्फ मोबाइल और इंटरनेट कंपनियों के पास होती थी.

संप्रग सरकार को उम्मीद थी कि इस परियोजना को 2013 तक पूरा कर लिया जाएगा पर कुछ कारणों से इसे पूरा नहीं किया जा सका. अब केंद्र की भाजपा सरकार ने योजना को इस साल के आखिर तक लागू करने के संकेत दे दिए हैं. गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक सीएमएस को लेकर बंगलुरु में केंद्रीय गृह सचिव एलसी गोयल की अध्यक्षता में आला अफसरों ने दूरसंचार विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक की. बैठक में गृह सचिव ने इस योजना में हो रही देरी और इसे इस साल के अंत में लागू करने में आ रही दिक्कतों की समीक्षा की. गृह मंत्रालय के एक आला अफसर के मुताबिक कुछ कारणों से यह परियोजना पिछले छह महीनों से लटकी है. परियोजना के तहत दिल्ली और बंगलुरू में सीएमएस की इकाई (सेंट्रलाइज डाटा सिस्टम) बनाई गई है. यहां इसका परीक्षण जारी है. सीएमएस के तहत इंटरसेप्शन स्टोर एंड फॉरवर्ड (आईएसएफ) के सर्वर देश के 195 दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के साथ स्थापित कर दिए गए हैं. सीएमएस के तहत देशभर में 21 क्षेत्रीय निगरानी तंत्र (आरएमसी) की स्थापित किए जाएंगे. उन्होंने यह भी कहा कि इस परियोजना के तहत किए गए फोन कॉल के रिकॉर्ड के विश्लेषण से देश के खिलाफ चल रहीं साजिशों, असामाजिक तत्वों और कर चोरी जैसी गंभीर समस्याओं से निपटा जा सकेगा.

भारत में किसी शख्स पर पुख्ता शक के आधार पर उसकी जासूसी करने के लिए एजेंसियों को केंद्रीय गृह सचिव से इजाजत लेनी होती है. एक आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के अनुरोध पर केंद्रीय गृह सचिव रोजाना 300 फोन टैप करने की इजाजत देते हैं. अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी ‘रॉयटर्स’ के मुताबिक भारत सरकार ने 2012 में गूगल से लोगों की निजी जानकारियां मांगने के लिए 4750 आवेदन किए थे. ऐसे आंकड़े मांगने के मामले में भारत अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर है. 9 जून, 2013 को अमेरिका की सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी (सीआईए) के पूर्व कर्मचारी एडवर्ड स्नोडेन ने इतिहास का सबसे बड़ा खुलासा करते हुए दुनिया को यह बताया था कि एनएसए अमेरिकी नागरिकों सहित कुछ दूसरे देशों के लोगों की अवैध तरीके से जासूसी कर रही है. इस खुलासे ने दुनिया भर के लोगों में डर का माहौल पैदा कर दिया. इस घटनाक्रम से अमेरिका को दुनिया भर में फजीहत भी झेलनी पड़ी थी.

दुनियाभर में ऐसी परियोजनाओं का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ है. मानवाधिकार संगठन इसे लोकतंत्र के लिए खतरा मानते हैं. अगर तथ्यों पर नजर डालें तो पता चलता है कि ऐसी निगरानी परियोजनाओं से भी आतंकवाद पर लगाम नहीं लगाई जा सकी है. मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक ऐसी परियोजनाएं सिर्फ लोगों में असुरक्षा और भय पैदा करती हैं. लोकतंत्र में सरकार सुरक्षा कारणों का हवाला देकर अपने ही नागरिकों की जासूसी करे, इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता. ऐसे उदाहरण मिले हैं जहां सत्ताधारी दल विपक्षी दलों के नेताओं का फोन टैप करवाता है. ऐसे में यह भी संभव है कि सत्ताधारी दल अपने हितों को साधने के लिए सीएमएस का इस्तेमाल करे. गृह मंत्रालय के एडीजी कुलदीप सिंह धतवालिया ने बताया, ‘राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रजातांत्रिक सुरक्षा के लिए सीएमएस बहुत जरूरी है. इसके जरिए हम लोगों पर निगरानी रखेंगे. लोगों को इससे घबराने की जरूरत नहीं है.’

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सीएमएस खुफिया एजेंसियों को भारतीय नागरिकों की तमाम निजी बातचीत सुनने और उनसे जुड़ी जानकारी हासिल करने का अधिकार देगा. यह नागरिकों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा जिसके अंतर्गत लोगों को निजता का अधिकार मिला हुआ है. अगर किसी के ऊपर पुख्ता शक है तो सरकार को ये अधिकार है कि वह उसकी निगरानी रखे और उसकी बातचीत रिकॉर्ड करे. यह सही भी है, लेकिन सीएमएस के जरिए खुफिया एजेंसी उन लोगों के भी बातचीत का रिकॉर्ड रख सकेगी जिनके ऊपर किसी तरह का शक नहीं है. मतलब यह कि सीएमएस के जरिए हम सभी पर अपराधी की तरह निगरानी रखी जाएगी जो एक लोकतंत्र के लिए पूरी तरह से अस्वीकार्य है. दुनियाभर में ऐसे कम ही प्रमाण हैं जिससे यह साबित हो कि सीएमएस जैसी निगरानी वाली परियोजनाएं सुरक्षा और आतंकवाद के लिए हितकारी रही हैं.

डॉ. एंजा कोवाक्स, संस्थापक व शोधकर्ता इंटरनेट डेमोक्रेसी

एडवर्ड स्नोडेन ने यह भी खुलासा किया था कि खुफिया एजेंसियां ऐसी जानकारी से 1.5 फीसद मुजरिमों को ही गिरफ्त में ले पाती है. जब अमेरिका और ब्रिटेन जैसे तकनीक संपन्न मुल्कों में लोगों की निगरानी करनी वाली परियोजनाएं लगभग नाकाम साबित हुई हैं. ऐसे में भारत में सीएमएस कितना कामयाब हो पाएगा, ये बड़ा सवाल है. अमेरिकी खुफिया एजेंसी की निगरानी परियोजना ‘प्रिज्म’ के भारी विरोध और नाकामयाबी की वजह से अमेरिका ने लोगों पर सीमित निगरानी रखने के लिए यूएस फ्रीडम एक्ट पास किया है जिसके तहत लोगों की फोन से जुड़ी जानकारियां अब खुफिया एजेंसी के पास नहीं बल्कि टेलीकॉम कंपनियों को पास होंगी.

नागरिकों के मानवाधिकार और निजता के हनन के सवाल पर गृह मंत्रालय के एडीजी का कहना है, ‘लोगों को अधिकारियों पर भरोसा रखना चाहिए और जो व्यक्ति राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलिप्त नहीं हंै उन्हंे सीएमएस से कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. उन्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है. अधिकारी देश की सुरक्षा के लिए तत्पर हैं और यह परियोजना देशहित में है.’ अमेरिका में ‘प्रिज्म’ परियोजना पर उठे सवाल पर उन्होंने कहा कि हम अमेरिका से तुलना नहीं कर सकते.

एनजीओ ‘इंटरनेट डेमोक्रेसी की संस्थापक और शोधकर्ता डॉ. एंजा कोवाक्स के अनुसार, ‘अमेरिकी सिविल लिबर्टीज यूनियन के आंकड़ों के मुताबिक आतंकवादियों पर लगाम लगाने में पारंपरिक जांच ही अहम भूमिका अदा करते हैं. आतंकवाद से निपटने में इस तरह की ऑनलाइन निगरानी परियोजनाओं का योगदान कम ही रहा है. चिंताजनक बात यह है कि खुफिया एजेंसियों की जवाबदेही सिर्फ गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री के प्रति होती है. संसद के प्रति उनकी कोई जवाबदेही नहीं होती और भारत में दूसरे लोकतंत्रिक देशों की तरह निगरानी पर नियंत्रण रखने जैसी कोई व्यवस्था नहीं है. ऐसे में सीएमएस के दुरुपयोग की आशंका ज्यादा है. सीएमएस से भले ही खुफिया एजेंसियों का काम आसान हो जाए पर यह पूरी तरह से नागरिकों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. मैं इसे देश के लिए लाभदायक नहीं मान सकती.’

पूर्व केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार राज्यमंत्री मिलिंद देवड़ा, जिनके कार्यकाल में इस परियोजना की नींव पड़ी, मानते हैं कि इसका गलत इस्तेमाल किया जा सकता है. देवड़ा के मुताबिक, ‘इस परियोजना के फायदे और नुकसान दोनों हैं. इसके लागू होने से यह पता कर पाना मुश्किल होगा कि कौन बेवजह जासूसी का शिकार हो रहा है. इसके साथ एक और कानून की जरूरत होगी जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि नागरिकों के मौलिक अधिकार का हनन न हो. भारत में कोई भी ऐसा कानून नहीं है जिसके तहत सरकार लोगों की जासूसी कर सके.’

भारत के आईटी एक्ट, 2000 के तहत शक के आधार पर सीमित समय के लिए किसी व्यक्ति का फोन टैप किया जा सकता है. इसके लिए केंद्रीय गृह सचिव से मंजूरी लेनी जरूरी है. दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटिश शासन के दौरान बनाए गए इंडियन टेलीग्राफ एक्ट में भी आम लोगों की निजता का काफी ख्याल रखा गया था. इस कानून के मुताबिक फोन से जुड़ी जासूसी या तो लोगों के सुरक्षा कारणों या फिर आपातकाल लागू होने पर की जा सकती थी. 2008 में भारत सरकार ने इंडियन टेलीग्राफ एक्ट में काफी बदलाव कर आईटी एक्ट पास किया. इसमें इस प्रावधान को बदल दिया गया. अब सरकार किसी मामले की छानबीन के दौरान या किसी पर शक होने पर फोन टैप कर सकती है.

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सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के मुताबिक बिना पुख्ता सबूत के लोगों की इस तरह से निगरानी करवाना गैरकानूनी है. किसी व्यक्ति या संस्थान की निगरानी के लिए गृह सचिव की इजाजत जरूरी है. साथ ही मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा होना चाहिए. सेंट्रल मॉनीटरिंग सिस्टम के तहत अगर किसी व्यक्ति का फोन बिना पुख्ता वजह से टैप किया जा रहा है तो उस व्यक्ति के साथ उन लोगों की भी निजता खतरे में पड़ जाएगी जो उससे फोन पर बात करते हैं. ऐसे मामलों में दस में से आठ फोन ऐसे होंगे जो उसके लिए निजी होंगे. ऐसे में उन आठ लोगों की भी निजता में सेंध लग जाएगी जिनका उस मामले से कोई सरोकार नहीं है.

प्रशांत भूषण, वरिष्ठ वकील 


दिल्ली स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के सीनियर फेलो और इंडिया स्पेशल फोर्स के लेखक सैकत दत्त के मुताबिक, ‘सीएमएस भारतीय नागरिकों के अधिकार को पूरी तरह से खतरे में डाल देगा. अगर देश सीएमएस जैसे अपारदर्शी तरीके से अपने ही नागरिकों की जासूसी करने लगे तो सरकार की ओर से इसका दुरुपयोग नहीं किया जाएगा, इस आशंका से कैसे बचा जा सकेगा. संयुक्त राष्ट्र संघ ने बिना पुख्ता वजह लोगों की इलेक्ट्रॉनिक जासूसी जैसे फोन टैपिंग और इंटरनेट ट्रेसिंग को मानवाधिकार का उलंघन बताया है. न्यूयॉर्क स्थित मानवधिकार कार्यकर्ता और इंटरनेट शोधकर्ता सिंथिया वोंग के मुताबिक, ‘अगर भारत सत्तावादी शासन की तरह आगे नहीं बढ़ना चाहता, तो भारत को इस मुद्दे पर पारदर्शिता अपनाते हुए लोगों को यह जानकारी देनी होगी कि कौन उनके निजी डाटा को इकट्ठा कर रहा है और यह इस्तेमाल कहां हो रहा है. यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इकट्ठा किए गए आंकड़ों का गलत इस्तेमाल न हो.

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) बनाम भारत सरकार के मामले में 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने फोन टैपिंग को निजता के अधिकार का उल्लंघन बताया था. कोर्ट के मुताबिक अवैध तरीके से किए गए फोन टैपिंग असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक हैं. इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फोन टैपिंग के लिए कुछ गाइडलाइन तय की थी जिसके अनुसार केंद्रीय गृह सचिव की अनुमति के बिना कोई फोन टैप नहीं किया जा सकता है. साथ ही फोन टैपिंग के रिकॉर्ड साठ दिन के अंदर नष्ट कर दिए जाने चाहिए. 1988 में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े के कार्यकाल में भी फोन टैपिंग का बड़ा मामला सामने आया था. विपक्ष का आरोप था कि हेगड़े ने विपक्षी नेताओं के फोन टैप के आदेश देकर उनकी निजता में सेंध लगाई है. भारी विरोध के बाद हेगड़े को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

इंडिया सेंटर फॉर इंटरनेट के कार्यकारी प्रबंधक सुनील अब्राहम के मुताबिक, ‘इस तरह के निगरानी तंत्र की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसके लागू होने से हैकर केे लिए लोगों की निजी जानकारियों में सेंध लगाना आसान हो जाएगा. हैकर डाटा चुराने के लिए सीधे सीएमएस के डेटाबेस को निशाना बनाएंगे. उन्हें एक साथ तमाम लोगों की निजी जानकारियां मिल जाएंगी.

भारत में ऐसे कई मामले सामने आएं हैं जब सत्ताधारी दलों ने सीबीआई जैसी संस्था का दुरुपयोग किया है. संप्रग सरकार के समय सीबीआई को ‘सरकार का तोता’ तक कहा गया. ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या सीएमएस जैसी परियोजना का दुरुपयोग नहीं होगा

शाकाहारी सरकार, कुपोषित नौनिहाल

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मध्य प्रदेश के लिए कुपोषण एक ऐसा नासूर है, जिसे जितना कुरेदो दर्द उतना ही बढ़ता है. गाहे-बगाहे बहस में आने वाला यह मुद्दा बीते दो माह में फिर चर्चा का विषय बना, क्योंकि सरकार ने कुपोषण के खिलाफ अपने ही विभाग के तार्किक प्रस्ताव को खारिज कर दिया. राज्य के महिला एवं विकास विभाग ने चर्चा के लिए प्रस्ताव रखा था कि तीन जिलों- अलीराजपुर, मंडला और होशंगाबाद में एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम (आईसीडीएस) के तहत बच्चों को हफ्ते में 2 से 3 दिन अंडे खिलाए जाएं. प्रस्ताव के शुरुआती दौर में ही राज्य के जैन संगठनों ने विरोध करना शुरू कर दिया था. प्रभावशाली समुदाय के जरिये मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को प्रेरित किया गया कि वे इसका विरोध करें.

आखिरकार, फैसला यही हुआ कि आंगनबाड़ी में बच्चों को अंडा नहीं मिलेगा. मीडिया रिपोर्ट कहती हैं कि कट्टर शाकाहारी मुख्यमंत्री ने बच्चों को अंडा खिलाने के प्रस्ताव को खारिज किया. इन खबरों से ऐसा लगता है कि शासन व्यवस्था पूरी तरह से व्यक्ति केंद्रित हो चुकी है. अव्वल तो यह निर्णय राज्य सरकार और शासन व्यवस्था के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े करता है, साथ ही यह संकेत भी देता है कि कुपोषण को लेकर सामाजिक ही नहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भी पूरी तरह से अभाव है.

दाल-चावल, सब्जी, रोटी, खीर-मक्खन, सोया-पनीर कुछ भी हो, कुपोषण से निपटने के लिए अच्छे ही हैं. उसी कड़ी में अंडा भी ज्यादा पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत है. यदि आप सम्मान के साथ बिना भ्रष्ट आचरण के ये सब खिला सके तो कुपोषण तो कम हो ही जाएगा. इसमें कोई शक नहीं है. शक तो मंशा पर है कि क्या वास्तव में हम कुपोषण के पहाड़ को चढ़ने की मंशा रखते भी हैं. दाल कम पानी ज्यादा, पोषण आहार के पैकेट में बदबू, कभी मिले-कभी न मिले; कोई भरोसा नहीं; जो खिलाने की नीति बनाई उस पर अनैतिक क्रियान्वयन हावी हो गया. ऐसे में ही सरकार का कहना कि भले अच्छा हो, पर अंडे का विकल्प लागू न होगा. यह एक विकल्प है, अनिवार्यता नहीं.

दूध या अंडा ?

बात केवल अंडे तक सीमित नहीं है; न ही यह अंतिम विकल्प है. बात बेहतर पोषण, सहज उपलब्धता की है. बाल पोषण अधिकार की विशेषज्ञ डॉ. दीपा सिन्हा कहती हैं, ‘भोजन में विविधता महत्वपूर्ण है. यदि बच्चों को दूध, दाल, फल, सब्जी, अनाज, तेल मिल पाएं, तो भी सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत पूरी हो सकती है. लेकिन एनएसएसओ और नेशनल न्यूिट्रशन मॉनीटरिंग ब्यूरो के अध्ययन बताते हैं कि ज्यादातर आबादी को विविधतापूर्ण भोजन नहीं मिल पाता. इस सूरत में बच्चों के लिए अंडा एक अनिवार्यता बन जाती है, क्योंकि प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्वों का दूसरा कोई बेहतर विकल्प भी नहीं.’

भारत में अक्टूबर 2014 की पौष्टिक अंतर्ग्रहण रिपोर्ट (एनएसएसओ) कहती है कि मध्य प्रदेश में लोगों को 70.7 प्रतिशत प्रोटीन अनाज से मिलता है. बाकी का 10.8 प्रतिशत प्रोटीन दाल और 9 प्रतिशत दूध से मिलता है. अनाज से मिलने वाला प्रोटीन अच्छी गुणवत्ता का नहीं माना जाता. प्रोटीन का अच्छा स्रोत दूध है, लेकिन ऊंची कीमत और शुद्धता के अभाव ने उसे समाज से दूर किया है. मध्यप्रदेश में 5 साल से छोटे बच्चों के दूध पर औसतन 54 रुपये मासिक (1.80 रुपये प्रतिदिन) खर्च होता है. अब मध्यप्रदेश सरकार भरोसा दिला रही है कि आंगनबाड़ी में बच्चों को सप्ताह में 2 से 3 दिन दूध मिलेगा.

‘अंडा केवल पोषण के लिहाज से ही नहीं, बल्कि किफायती और सुरक्षित भी है. इसे आसानी से पकाया जा सकता है और यह समुदाय में पोल्ट्री उद्योग को बढ़ावा देने में कारगर होगा. वैसे भी बच्चों को जो विविधताभरा भोजन चाहिए, वह संपन्न परिवारों को ही नसीब होता है’

वंदना प्रसाद, कम्युनिटी पीडियाट्रिशियन और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की पूर्व सदस्य

अंडे को लेकर जारी बहस के बीच राज्य खाद्य पदार्थ परीक्षण प्रयोगशाला की रिपोर्ट में सामने आया कि 2014-15 में दूध के 983 नमूनों की जांच में 282 यानी 29 प्रतिशत मिलावटी निकले. सीधी जिले में तो 100 फीसदी दूध मिलावटी निकला. जब 88 लाख बच्चों को नियमित रूप से दूध देने की बात हो रही है तो इस पक्ष को नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है?   यह भी देखें कि आंगनबाड़ी में तीन दिन दूध देने के लिए महीने भर में 21.12 लाख लीटर दूध जरूरी होगा.

कोरकू आदिवासियों के साथ काम कर रही स्पंदन की सीमा प्रकाश कहती हैं, ‘आंगनबाड़ी में अगर बच्चों को अंडा मिला तो उनकी और महिलाओं की मौजूदगी बढ़ेगी. बच्चों की सही वृद्धि, निगरानी और स्वास्थ्य जांच भी हो सकेगी. यह पहल स्थानीय समुदाय को मुर्गी पालन के लिए प्रेरित करेगी, जो पूरे परिवार की पोषण सुरक्षा में भी योगदान देगा.’

जमीनी अध्ययनकर्ता और इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी (दिल्ली) में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाली एसोसिएट प्रोफेसर रीतिका खेरा मानती हैं, ‘अंडे बच्चों और लड़कियों के लिए पशु उत्पादित प्रोटीन का श्रेष्ठ स्रोत है. इसमें विटामिन-सी के अलावा हर पोषक तत्व मौजूद है. देश के 15 राज्यों में आंगबाड़ी और मध्याह्न भोजन में बच्चों को अंडा मिल रहा है. छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अगड़ी जातियों ने अंडे की राह में रोड़े अटकाए, लेकिन शाकाहारी परिवारों के लिए इसकी जगह दूध और केले दिए जा सकते हैं. यह एक पक्षीय निर्णय नहीं हो सकता.’ राष्ट्रीय पोषण संस्थान (हैदराबाद) ने भी अंडे को प्रोटीन का बेहतर स्रोत माना है. संस्थान ने वंचित तबकों, खासतौर पर बच्चों और महिलाओं के लिए इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने की सिफारिश की है. अंडे में लगभग सभी अमीनो एसिड्स मौजूद हैं. अगर एक किलोग्राम वजन के बच्चे को अंडा मिले तो उसे रोजाना 1.2 ग्राम प्रोटीन की जरूरत होगी. इसके बजाय उसे यदि सब्जी और अनाज खिलाएं तो 2 ग्राम प्रोटीन की जरूरत होगी.

शाकाहारी राज्य और शाकाहारी समाज 

यह जानना बेहद दिलचस्प है कि मध्य प्रदेश में अंडे पर नीतिगत निर्णय जैन समाज के किसी कार्यक्रम के मंच पर ही होता है. ऐसे ही एक मंच से 2009-10 में अंडे की खिलाफत की जमीन तैयार की गई थी. इस साल फिर यही हुआ. शाकाहारी परिवार के बच्चे पर अंडा खाने की बाध्यता बेशक नहीं होनी चाहिए. उन्हें दूध-केले का विकल्प दिया जा सकता है. लेकिन इस मुद्दे पर चर्चा नहीं हो रही. बस फैसला सुना दिया जाता है.  राज्य में आधे बच्चों और गर्भवती-धात्री महिलाओं को टेक होम राशन दिया जाता है, यदि चाहना हो तो अंडे के लिए अलग व्यवस्था बनाई जा सकती है.

शिवपुरी जिले में सहरिया आदिवासियों के बीच काम कर रहे अजय यादव कहते हैं, ‘पोहरी ब्लॉक में 24 तरह के पैकेट बंद आहार गांव की छोटी-छोटी दुकानों में मिल रहे हैं. उन पर पहले पाबंदी लगानी चाहिए थी. अंडा तो इनसे कहीं ज्यादा जरूरी है.’

‘द हिंदू’ और ‘सीएनएन-आईबीएन’ के वर्ष 2006 में किए गए अध्ययन से पता चला कि मध्य प्रदेश की 35 प्रतिशत जनसंख्या शाकाहारी है. जनगणना 2011 के मुताबिक, भारत में सबसे ज्यादा आदिवासी (1.52 करोड़) मध्य प्रदेश में रहते हैं. इनमें से 90 प्रतिशत शाकाहारी नहीं हैं. लेकिन इनमें कुपोषण इस कदर है कि 28.27 लाख बच्चों में से 71.4 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं. दलित बच्चों में 17.59 लाख में से 62.6 प्रतिशत कम वजन के हैं. फिर भी सरकार इन तबकों से कभी नहीं पूछती कि उन्हें अंडे से परहेज तो नहीं? जिस मंच पर ‘अंडा रहित पोषण’ का निर्णय लिया गया, वह सामाजिक-आर्थिक रूप से सबसे संपन्न तबकों का है. पोषण आहार कार्यक्रम का लाभ लेना उनकी प्राथमिकता में नहीं है.

नीति नहीं, राजनीति

मध्य प्रदेश में वर्ष 2008-09 में 67.15 करोड़ अंडों का उत्पादन हुआ, जो 2014 में बढ़कर 96.71 करोड़ हो गया. मछली पालन को लेकर मध्य प्रदेश सरकार की नीति कहती है, ‘बढ़ती आबादी, बेरोजगारी तथा पौष्टिक आहार में कमी की सूरत में मत्स्य पालन रोजगार के साथ प्रोटीन युक्त किफायती भोजन भी देता है (आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15).’ इसका मतलब है कि अंडे पर रोक सरकारी नीति नहीं, बल्कि एक खास संदर्भ और परिस्थिति में लिया गया निर्णय है. सितंबर 2007 में मध्य प्रदेश सरकार ने गंभीर कुपोषित बच्चों के इलाज के लिए प्रोजेक्ट शक्तिमान शुरू किया था. इसमें एक साल के लिए 19 जिलों के 38 विकासखंडों के 1000 गांवों में बच्चों को उबले अंडे और उबले आलू खिलाए गए. कुपोषणग्रस्त 10 हजार बच्चों का इलाज हुआ. सरकार का दबाव अंडे की जरूरत पर भारी पड़ता दिख रहा है. मार्च से अगस्त 2010 के बीच इंदौर के गांवों में पंचायतों की पहल पर 4123 गंभीर कुपोषित बच्चों को अंडे खिलाए गए. इससे 3077 बच्चों का वजन बढ़ा, 1452 बच्चे गंभीर से मध्यम श्रेणी में आ गए और 310 बच्चे सामान्य हो गए. इसके बावजूद 2010 में अटल बाल स्वास्थ्य और पोषण मिशन की स्थापना से ही अंडा देने का प्रावधान हटा लिया गया क्योंकि राज्य के तीन मंत्रियों- गोपाल भार्गव, अर्चना चिटनिस और जयंत मलैया को इस पर आपत्ति थी. अंडे का विरोध समाज ने नहीं किया. राज्य सरकार ने ही इसे रोकने की पहल की थी. जरा नजर उठाकर देखिए; समाज का एक हिस्सा कभी भी दूसरे हिस्से के खान-पान को रोकते हुए नजर न आएगा; फिर रोक की पहल कौन कर रहा है; जरा सोचिये!

इसके बाद भी कुपोषण प्रबंधन कार्यक्रमों की नीति बनाते समय अंडे के विकल्प की बात कही गई, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया. 1 जून 2015 को जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में राज्य की पशुपालन मंत्री कुसुम महदेले ने मुख्यमंत्री की मौजूदगी में कहा कि मछली या मांस खाने वालों को अंडा देने में कुछ गलत नहीं है. असल में वे राज्य को मछलीमय और कछुआमय बनाने की बात कह रही थीं. मध्य प्रदेश में 3 से 6 साल के बच्चों को स्वयं सहायता समूहों से गरम और पका हुआ पोषण आहार मिलता है. एक बच्चे के लिए 4 रुपये का बजट बहुत कम है. इस पर भी स्वयं सहायता समूहों से बिल पास करवाने के नाम पर रिश्वत मांगी जाती है. दूसरी तरफ टेक होम राशन की व्यवस्था में भी गुणवत्ता और मात्रा को लेकर सवाल उठते रहे हैं. टेक होम राशन में मिल रही खिचड़ी में नमक, हल्दी और तेल मिला होने से स्वाद में बदलाव और अजीब तरह की बू की शिकायत के चलते बच्चे, महिलाएं उसे नहीं खा पाते. प्रोफेसर ज्यां द्रेज कहते हैं, ‘पोषण आहार के लिए अंडा बेहतर विकल्प है.’

वस्तुतः जब यह स्पष्ट है कि पोषण आहार का एक खास स्रोत किसके लिए (समाज के उस तबके के लिए जो सामाजिक आर्थिक रूप से हाशिए पर धकेला गया है और जहां अंडा त्याज्य नहीं है) जरूरी खाद्य पदार्थ है. उस विषय पर सांस्कृतिक सवाल कौन (सामाजिक और आर्थिक रूप से ऊंचे मुकाम पर बैठा समुदाय, जिसने कुपोषण का दंश ही न झेला हो) उठा रहा है! इस व्यवस्था में प्रभावशाली समुदायों द्वारा उठाई गई सांस्कृतिक आपत्तियों पर समावेशी शासन-व्यवस्था के तहत समाज से कोई चर्चा किए बिना सरकार तत्काल निर्णय ले लेती है कि सभी बच्चों को (जिनमें आदिवासी और दलित समुदाय के बच्चे सबसे ज्यादा हंै) अंडे के विकल्प से वंचित किया जाता है. यह विषय केवल आंगनबाड़ी, कुपोषण और अंडे तक ही सीमित नहीं है, यह अनुभव हमें राज्य और समाज के मौजूदा वर्ग चरित्र का दर्शन भी करवाता है.     l

‘प्रोटीन का मापन उसके जैविक मूल्य के आधार पर होता है. दालों और अनाज का जैविक मूल्य 60 और 70 के बीच है, जबकि अंडे में प्रोटीन का जैविक मूल्य 100 है. अंडे में अमीनो एसिड्स होने के कारण शरीर इसे सौ फीसदी सोख लेता है. इसे सरल शब्दों में समझें तो शाकाहारी भोजन से प्राप्त प्रोटीन का जैविक मूल्य पशु उत्पादों से कम होता है’

वीणा शत्रुघ्न, राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद की पूर्व उप-निदेशक

विदेशी तर्कों पर टिकी देसी ‘प्रगतिशीलता’

अंडे पर रोक का ऐलान करने के 48 घंटे के भीतर पीपुल्स फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) की देसी शाखा ने शिवराज सिंह चौहान को ‘प्रगतिशील अवॉर्ड’ थमा दिया. इसके लिए यह दलील दी गई कि अंडा खाने से हार्ट अटैक की 19 और डायबिटीज की 68 फीसदी आशंका बढ़ जाती है. इसके अलावा आंतों का कैंसर होने की बात भी पेटा की विज्ञप्ति में कही गई है. राष्ट्रीय पोषण संस्थान की पूर्व उप निदेशक वीणा शत्रुघ्न इन दलीलों को निराधार ठहराती हुई कहती हैं कि अव्वल तो ये विदेशों में हुए अध्ययनों पर टिकी हैं, जहां लोग फल-सब्जियों के बजाय शक्कर, वसा, सोडियम ज्यादा खाते हैं. उनके भोजन में मांस ज्यादा, अनाज कम होता है. नतीजा मोटापा, दिल की बीमारी और कैंसर के रूप में दिखाई देता है. भारतीय परिप्रेक्ष्य में ऐसा कोई अध्ययन नहीं हुआ, जिससे साबित होता हो कि अंडा खाने से कैंसर और हार्ट अटैक का खतरा रहता है. अलबत्ता यह जरूर है कि गर्भावस्था में पोषण की कमी से कम वजन के बच्चे पैदा होते हैं. वे कहती हैं कि पेटा को पहले भारतीय संदर्भों में पोषण की जानकारी जुटा लेनी चाहिए.

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बढ़ते सामाजिक तनाव का ग्रामीण चेहरा

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सांप्रदायिकता के इस दौर में दंगों और संघर्ष का माहौल चुटकी बजाते ही तैयार हो जाता है और पलक झपकते ही इसकी आंच देश-प्रदेश में फैल जाती है. हाल ही में हुए अटाली दंगे भी ‘जंगल की आग’ भड़काने वाली एक चिंगारी बन सकते थे.

विभिन्न संप्रदायों के बीच दिनों-दिन आपसी नफरत का दायरा बढ़ने को कुछ लोग राजनीतिक अपवाद मानते हैं पर जिस तरह समय-समय पर ऐसी सांप्रदायिक हिंसा बढ़ रही है, ये चिंतनीय है. दो साल पहले हुए मुजफ्फरनगर दंगों के बाद समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता ने दृढ़ता से कहा था कि साझा अर्थव्यवस्था पर आधारित बरसों पुराने ग्रामीण संबंध तेजी से नष्ट हो रहे हैं और अर्थव्यवस्था में आता हुआ ये बदलाव समाज में भी देखा जा सकता है. हरियाणा के अटाली गांव पिछले दिनों जो हुआ वो दीपांकर के दावे को और पक्का करता है.

2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जानबूझकर फैलाई जा रही इस नफरत के कई उदाहरण देखने को मिले हैं. पुराना ग्रामीण समाज शोषक था पर जिस तरह अब लगातार सांप्रदायिक झगड़े देखे जा रहे हैं, दो साल पहले तक ऐसा नहीं था. जातिवाद को लेकर लोग कट्टर थे पर एक हद तक सामंजस्य बनाकर भी रखा जाता था. पर अब ये सब बहुत तेजी से बदल रहा है. अगर पांच साल पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश का शहाबपुर गांव जातिवाद के नाम पर हुए भेदभाव के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जगह बना सकता है तो इस मुद्दे की गूंज देश के नेताओं को तो सुननी होगी.

एक स्वतंत्र ग्रुप द्वारा तथ्यों को बताती एक रिपोर्ट और कुछ अन्य सूत्रों की माने तो दिखता है कि कैसे पिछले कुछ समय में पंचायतें खुद ही कानून बन गई हैं और उनको नियंत्रित करने की कोई भी कोशिश द्वेषपूर्ण रूप ले लेती हैं. ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर किया गया उनका ‘कड़ा’ नियंत्रण अब बढ़कर सामाजिक बंधनों और अंतरजातीय संबंधों को भी नियंत्रित करने का जरिया बनता जा रहा है, साथ ही हिंदुत्व कट्टरपंथियों द्वारा समाज में फैलाई गई  ‘लव जिहाद’ जैसी बेबुनियाद बात अब बहुत आगे जा चुकी है.

भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) का नेतृत्व भले ही साक्षी महाराज और गिरिराज सिंह के बयानों से शर्मिंदा हो पर इनके और इनके साथियों को पसंद करने वालों की तादात बढ़ती जा रही है. हालांकि यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है कि मुजफ्फरनगर दंगों के बाद भाजपा के मुख्य नेतृत्व को प्रत्यक्ष रूप से इनका जिम्मेदार ठहराया गया था और सांप्रदायिक आधार पर मतदाताओं को अलग-अलग बांटने की नीयत से कुछ संदिग्धों को भी टिकट दिया गया. इस गैर-जिम्मेदाराना दृष्टिकोण के परिणाम अब कई मामलों में देखे जा सकते हैं. ‘ग्रामीण भारत का बदलता चेहरा’ विषय पर किए गए शिक्षाविद एलिजाबेथ बासिल और इशिता मुखोपाध्याय के एक अध्ययन के अनुसार:

  •  समाज के महत्वपूर्ण वर्गों को समान विकास और मौलिक लोकतंत्र के प्रति आश्वस्त न कर पाने की सरकार की विफलता ग्रामीण भारत में दिखाई देती है.
  •  ‘सामुदायिक मान्यताओं’ को दबा दिया गया है. जैसे-जैसे धर्मनिरपेक्षता का कमजोर आधार सामने आ रहा है हिंदुत्व की मानते हुए ‘सामुदायिक समस्याओं’ को ‘सांप्रदायिक नजर’ से सुलझाया जा रहा है.

 आशावादियों की मानें तो उन्हें लगता है कि दंगे की आग में जली और अस्थिर हरियाणा सरकार अटाली जैसे मामलों को आसानी से संभाल लेगी पर सच्चाई अलग है. मोहन भागवत से लेकर साक्षी महाराज तक ने इन विवादों को सुलझाने के बजाय तल्ख ही बनाया है. रोज एक भड़काऊ बयान इस सांप्रदायिक नफरत की फसल को सींचता है और हिंदुवादी कट्टरपंथी इसके जवाब में ओवैसी और उस जैसे कईयों को इसी तरह के जवाब देने के लिए प्रेरित करते हैं. खाप पंचायतें हों या ऑनर किलिंग, या फिर बहुचर्चित ‘लव जिहाद’ के मामले, ये सभी एक रणनीति का हिस्सा हैं. इन समूहों की अनाधिकृत अदालतें बस अपने फरमान थोपती हैं, खासकर महिलाओं पर. इन मूर्खतापूर्ण और अर्थहीन फरमानों में कपड़े क्या पहने जाने चाहिए और जीवनसाथी कौन और कैसा होगा का फैसला भी ये अदालतें ही लोगों के लिए लेना चाहती हैं. यह संकीर्ण मानसिकता हर जगह प्रभावी है जिसके परिणामस्वरूप शहरों और गांवों में होने वाले सामाजिक तनाव लगभग समान हो गए हैं.

गांवों में जातिवाद को लेकर लोग कट्टर जरूर थे पर एक हद तक सामंजस्य बनाकर भी रखा जाता था. पर अब ये सब बहुत तेजी से बदल रहा है

केंद्र और कई राज्यों में भाजपा का शासन होने के कारण छोटे स्तर पर भी आरएसएस की ‘शाखाओं’ का बनना एक नए नियम जैसा हो गया है. अब इनके काम करने का तरीका किसी अस्पष्टता में छुपा हुआ नहीं है- गौमांस खाने के मुद्दे से लेकर किसी समुदाय विशेष के पलायन तक ऐसा कुछ भी नहीं बचा है जिस पर इनकी नजर न पड़ी हो. यहां तक कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग में भी दीनानाथ बत्रा और वाई एस राव जैसे आरएसएस की कट्टर मानसिकता वाले लोग काम कर रहे हैं. ये तथाकथित ‘संस्कृति के रखवाले’ कुछ विशेष, पसंदीदा मिथकों को प्रचारित करने के लिए दोबारा इतिहास लिख रहे हैं. प्रचारित विचार के अनुसार दंगे शहरों में ही हुआ करते थे पर अब ये आंतरिक क्षेत्रों यानी गांवों में भी तेजी से बढ़ते देखे जा सकते हैं. दीपांकर बताते हैं कि आजादी के समय कृषि का भारत की जीडीपी में 60 प्रतिशत योगदान था, जो अब 14 प्रतिशत पर आ गया है और ये बदलाव

समाज और जीवन के विभिन्न पहलुओं में साफ तौर पर देखा जा सकता है. वे लोग, जो कभी धर्मनिरपेक्ष योजनाओं का चेहरा हुआ करते थे, आज निशाना बने हुए हैं और उनके नाम रिव्यू कमेटी और ऐसे ही फोरमों से हटाए जा रहे हैं.

देखा जाए तो सरकार का बीता हुआ एक साल खासी चर्चाओं में रहा पर चर्चा के कारण विवादित ही रहे. (संयोग से, अटाली दंगा भी सरकार के एक साल पूरा होने की पूर्वसंध्या पर ही भड़का था) अगर शहरी परिदृश्य संस्थागत ध्रुवीकरण को दिखा रहे हैं तो गांवों से आने वाली तस्वीर बढ़ते आर्थिक संकट और सामाजिक तनाव की है. तथाकथित सेकुलर(धर्मनिरपेक्ष) ब्रिगेड प्रत्यक्ष रूप से इस लक्ष्यहीन बहस से किनारा किए हुए है. समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में चल रहे अपने कार्यकाल के दौरान ही अपनी जड़ें खो दी हैं, वहीं कांग्रेस और लेफ्ट भी किसी काम के नहीं हैं. इस सब खेल के बीच अब भाजपा का एजेंडा किसी से छिपा नहीं रह गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार कहते रहते हैं कि उनके कार्यकाल में किसी भी समुदाय को निशाना नहीं बनाया जाएगा पर संघ परिवार के ‘सैनिकों’ पर इस बात का कोई असर नहीं दिख रहा है. जमीनी हकीकत कुछ और ही बताती है.

इस बीच, स्वतंत्र रूप से की गई जांचें बताती हैं कि अटाली की हिंसा पूर्व-निर्धारित थी, ऐसे में आरएसएस के पुराने वफादार यानी हरियाणा के मुख्यमंत्री की भूमिका कथित रूप से सामने आ रही है.

भाजपा प्रमुख अमित शाह के लिए राजनीति, सामाजिक सामंजस्य की कीमत पर सिर्फ जीतने का नाम है और ऐसे में निचले स्तर पर लोग बिना किसी प्रशासनिक कौशल के सिर्फ किसी व्यक्ति विशेष और ‘परिवार’ के प्रति अपनी वफादारी के बल पर फलते-फूलते रहते हैं. अगर ये संस्थान इन सब को अपने गले की फांस नहीं बनाना चाहते हैं तो उन्हें खुद में बदलाव लाने होंगे क्योंकि कोई भी छोटा या बड़ा उल्लंघन समय के साथ बढ़ते हुए रोष को दिखाएगा.

दर्द के निशां

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दिल्ली से लगभग 70 किमी दूर हरियाणा के फरीदाबाद जिले के अटाली गांव की एक उजाड़ सड़क पर एक बड़ा-सा फ्रीजर टूटा पड़ा है. यह अहमद का है, जिनकी कन्फेक्शनरी की दुकान को 25 मई की शाम हुई सांप्रदायिक हिंसा में तोड़-फोड़ के बाद लूट लिया गया. उस शाम के बाद से अहमद किसी अनजान जगह पर अपने रिश्तेदार के यहां छिपे हुए हैं.

हमेशा की तरह, ये दंगे भी हिंदू-मुस्लिमों के बीच आपसी भरोसे की कमी और बढ़ती अफवाहों के बाद ही शुरू हुए. उस शाम तक सब कुछ ठीक ही था जब हिंदू समुदाय के लगभग 2000 लोगों की भीड़ ने मामले को आर या पार करने की ठान ली. इस भीड़ पर आरोप है कि इसने मुसलमानों पर हमला किया और उनके घरों को आग लगा दी. अटाली के घटनाक्रम को अयोध्या में हुए मंदिर-मस्जिद मामले जैसा ही समझा जा रहा है पर यहां मंदिर के पास मस्जिद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की अनुमति के साथ बनाई जा रही थी. इन सब के बीच राहत की बात ये है कि इतनी बड़ी हिंसा में कोई मौत नहीं हुई हालांकि 50 से ज्यादा लोग घायल और चोटिल हुए, मगर इससे मिला सदमा कभी न भूलने वाला है. गांव के सभी मुस्लिम परिवारों के साथ कुछ हिंदू परिवार भी घर छोड़कर चले गए थे.

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क्या था विवाद
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ये जानना दिलचस्प है कि ये मामला 70 के दशक से चला आ रहा है, कैसे धीरे-धीरे बात बिगड़ती रही जब एक विवादित जमीन पर हिंदुओं को पूजा करने का अधिकार दिया गया. हिंदू इस जगह को राम जन्मभूमि कहते हैं और उनका कहना है ये गांव की पंचायत की संपत्ति है. वहीं मुस्लिमों का कहना है ये जमीन वक्फ बोर्ड की है जिस पर कोर्ट द्वारा उन्हें मस्जिद बनाने की आज्ञा भी मिल चुकी है. लगभग चार दशकों से ये मुद्दा जस का तस बना हुआ है.

गांव के हिंदुओं का कहना है कि सत्तर के दशक की शुरुआत तक उस जमीन पर मुस्लिमों का एक कब्रिस्तान हुआ करता था. चूंकि पास ही एक प्राचीन मंदिर था तो ऐसा सोचा गया कि कब्रिस्तान को यहां से हटा कर किसी दूसरी जगह बना दिया जाए. इसके लिए 1972 में, मुस्लिमों को कब्रिस्तान बनाने के लिए गांव के पास ही एक एकड़ जमीन भी दी गई. (हिंदुओं के अनुसार मस्जिद भी यहीं बनाई जानी थी) हालांकि मुस्लिम अब तक उसी विवादित जगह पर ही इबादत किया करते थे. बीते समय में हिंदुओं द्वारा इस मुद्दे को अधिकारियों की नजर में भी लाया गया पर बात कभी इतनी नहीं बिगड़ी कि दोनों संप्रदायों के बीच संघर्ष या टकराव कि स्थितियां बन जाएं.

स्थानीय निवासी तिलक कुमार शिकायती लहजे में कहते हैं, ‘वो दी गई जमीन पर मस्जिद क्यों नहीं बना रहें हैं जबकि वो तो इससे काफी बड़ी भी है!’ तिलक ये भी चाहते हैं कि गांव में मुस्लिम सुरक्षित लौट आएं. ‘ये हम सभी के लिए अच्छा होगा, हम कोई हिंसा नहीं चाहते. हम सब इतने समय से साथ रह रहे हैं पर वो (मुस्लिम) आज भी विवादित जगह पर ही मस्जिद बनाए जाने के लिए अड़े हुए हैं. कुछ समझौते तो करने ही पड़ते हैं.’

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अटाली के घटनाक्रम को अयोध्या के बाबरी मामले जैसा ही समझा जा रहा है. यहां मंदिर के पास मस्जिद कोर्ट की अनुमति से बनाई जा रही थी
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हालांकि मुस्लिमों का कुछ और ही कहना है. वे कहते हैं कि अलग से दी गई जमीन सिर्फ कब्रिस्तान के लिए थी मस्जिद के लिए नहीं. इसके अलावा ये जमीन गांव से बहुत दूर है. उनके अनुसार वो विवादित जगह पर बने एक अस्थायी भवन में ही इबादत किया करते थे पर 1992 में हिंदुओं द्वारा उसे जला दिया गया, जिसके बाद वहां एक टिन शेड बनाया गया जहां 2009 तक वे लोग नमाज पढ़ते थे.

हालिया संघर्ष में चोटिल 50 वर्षीय सुलेमान कहते हैं, ‘आखिर क्यों हमें नमाज पढ़ने के लिए दूर जाना चाहिए? ये हमारी जमीन है और मस्जिद यहीं बनेगी. कोर्ट ने भी हमारे ही पक्ष में फैसला दिया है. उन्हें (हिंदुओं) कोर्ट का फैसला मानना चाहिए.’ 31 मार्च को फरीदाबाद कोर्ट ने मुस्लिमों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें मस्जिद बनाने कि अनुमति दी थी. सुलेमान आगे बताते हैं, ‘हमने हरियाणा के वक्फ बोर्ड से संपर्क किया था और उन्होंने हमें आगे बढ़ने को कहा. साथ ही मस्जिद के निर्माण के लिए 2 लाख रुपये की मदद भी दी.’

2009 में दोनों संप्रदायों के बीच गुस्सा तब बढ़ने लगा जब मुस्लिमों ने विवादित भूमि पर मस्जिद और बाउंड्री बनाने का काम शुरू किया. हिंदुओं ने इसका विरोध किया और मस्जिद के निर्माण पर कोर्ट से स्टे आॅर्डर ले लिया. हिंदुओं का कहना है कि इसी वक्त, ग्राम प्रधान राजेश चौधरी ने, जो उस वक्त सरपंच के चुनाव में प्रत्याशी थे, मुस्लिमों से वादा किया कि यदि वे जीत गए तो मस्जिद बनवाने में मदद करेंगे. उस समय गांव में 500 के लगभग मुस्लिम मतदाता थे जो 3000 हिंदू मतदाताओं के अलग-अलग गुटों के बंटे होने के कारण उस चुनाव में निर्णायक साबित हो सकते थे. इस बार कोर्ट का ये फैसला गलत समय पर आया है. गांव में इस साल पंचायत के चुनाव होंगे जो अगस्त या सितंबर के बीच किसी भी समय हो सकते हैं.

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‘लव जिहाद’ कनेक्शन
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हालांकि एक तरह से देखा जाए तो दोनों संप्रदायों के बीच पनपी दुश्मनी अंतरधार्मिक विवाहों के कारण और बढ़ गई हैं. अगर आजकल की राजनीतिक ध्रुवीकरण की भाषा में कहें तो इसे ‘लव जिहाद’ का नाम भी दिया जा सकता है. ये सुनने में अतिरंजित शब्द लग सकता है पर फिर भी ये ग्रामीणों को उत्तेजित करने के लिए काफी है.

लगभग साल भर पहले, अहमद के 23 साल के बेटे नौशाद ने गांव की ही एक हिंदू लड़की के साथ भाग कर शादी कर ली. ग्रामीणों ने इस शादी का कड़ा विरोध किया. उसके बाद दोनों संप्रदायों में कई दौर की बातचीत के बाद गांव वालों ने इस शादी को स्वीकार कर लिया पर फिर भी स्थानीय लोगों की प्रतिक्रियाओं के डर से इस दंपति ने एक पड़ोसी गांव में रहना ही उचित समझा. हाल ही में इनके यहां बेटा भी हुआ है. इनकी शादी का मामला लोगों के ध्यान से उतर ही रहा था कि मस्जिद निर्माण का विवाद उठ खड़ा हुआ. दोनों की भागकर की गई शादी करने की बात दोनों समुदायों के लोगों के लिए एक-दूसरे पर तंज कसने और छींटाकशी करने का मुद्दा बन गई. इन सब विवादों के बाद ये दंपति अपने नवजात बच्चे के साथ कहीं छिप गए हैं.

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ये सुनने में हास्यास्पद है पर गांव में इस शादी को लेकर होने वाली व्यर्थ चर्चाओं ने तनाव को और बढ़ाया था. 53 वर्षीय फूलवती चूल्हे पर खाना बनाते हुए बताती हैं, ‘मुसलमान औरतें बोलती थीं कि हिंदुओं की लड़कियां तो ऐसे ही भागेंगी. हिंदुओं से अपनी लड़कियां नहीं संभल रहीं.’ संयोग से इस झगड़े के कारण गांव की पाइपलाइन से होने वाली गैस सप्लाई बंद हो गई है. लोग या तो चूल्हे पर खाना बना रहे हैं या ब्लैक में एलपीजी सिलेंडर खरीद रहे हैं. यहां छोचक एक रस्म होती है, जिसमें बेटी के यहां बच्चे के जन्म पर उपहार भेजे जाते हैं. ऐसा बताया गया कि इसे लेकर भी तानाकशी हुई जिसने तमाम प्रौढ़ महिलाओं में खासा गुस्सा भर दिया. वैसे पुरुषों ने इन सब को सिरे से ही नजरअंदाज किया. पर शायद उन्हें ध्यान देना चाहिए था.

मस्जिद निर्माण कार्य में साथ दे रहीं मुस्लिम महिलाएं उस रास्ते से मंदिर आने-जाने वाली हिंदू औरतों पर ताने कसती थीं. ऐसे एक मौके पर तो पथराव भी हुआ था. ‘शुरुआत उन्होंने की थी,’ आठ महिलाओं के दल के साथ नियमित रूप से मंदिर जाने वाली फूलवती आरोप लगाती हैं, ‘पहले तो हमने उनके उलाहनों पर ध्यान नहीं दिया पर जब हद पार हो गई तो हम सभी ने इसका विरोध किया, जिसके जवाब में उन्होंने हम पर पत्थरों से हमला कर दिया.’ भारत के शहरों में ऐसा अमूमन तब होता है जब किसी एक समुदाय का कोई धार्मिक जुलूस किसी दूसरे समुदाय के बाहुल्य वाले इलाके से होकर गुजरता है.

खैर, पुरानी ग्रामीण परंपराओं के अनुसार मामला पंचायत में पहुंचा और दोनों संप्रदायों के लोगों के बीच बातचीत भी हुई. पर आखिरकार हिंदुओं ने ये फैसला लिया कि वो उस प्राचीन मंदिर के पास हो रहे मस्जिद निर्माण का विरोध करेंगे. 25 मई की सुबह मस्जिद निर्माण के विरोध में रैली निकाल रही हिंदू महिलाओं पर पथराव भी हुआ था.

शाम तक ये मामला चरम तक पहुंच गया. जैसे ही हिंसा और आगजनी बढ़ी, गांव के लगभग 200 मुस्लिम परिवारों ने रातों-रात अटाली से 12 किमी. दूर बल्लभगढ़ पुलिस थाने में शरण ली. इस बीच अटाली गांव में प्रशासन ने धारा 144 लगा दी. बड़ी संख्या में पुलिस के जवान और कमांडो मस्जिद निर्माण स्थल सहित पूरे गांव की चौकसी में तैनात हो गए.

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थाने में जिंदगी
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संघर्ष के बाद थाने में रहे सुलेमान अपने टूटे घर के फोटो देख के रो पड़े. ‘जैसे ही हमें हिंसा और झगड़े के बढ़ने का पता चला, हमने जरूरी सामान बांधा और भाग निकले. इससे पहले कि हमलावर हम तक पहुंच पाते, हम गांव से बाहर निकल चुके थे.’ उनका घर मस्जिद के ठीक सामने है. वो आज उस जगह जाने में डरते हैं, जहां वो पले-बढ़े, जिसे वो घर कहते थे. उन्होंने मीडिया से निवेदन भी किया था कि वे उन्हें वहां से उनकी धार्मिक किताबें लाकर दे दें. दंगों के बाद लगभग 500 मुस्लिम बल्लभगढ़ थाने में रहे. ये किसी आपदा के बाद बने रिलीफ कैंप के जैसा दृश्य था. कुछ लोगों के बहुत अधिक गर्मी की शिकायत के बाद एसडीएम ने यहां तीन कूलरों की व्यवस्था भी करवाई.

रिलीफ कैंप में मदद कर रहे 21 साल के मो.जहीर ने बताया, ‘अभी तक तो खाने की कोई किल्लत नहीं हुई है. कभी हम घर से कुछ ले आते हैं तो कभी किसी एनजीओ के लोग दान करते हैं. प्रशासन ने कई शिकायतों के बाद यहां कुछ कूलर भी लगवा दिए हैं. पर इन सब के बावजूद, ये कोई जीने का तरीका तो नहीं है.’ गांव की ही एक शिक्षिका ने बताया, ‘ज्यादातर औरतों के पास अतिरिक्त कपड़े नहीं थे. खाने के लिए, मदद के लिए हम किसी और पर निर्भर थे. हमने भिखारियों जैसी जिंदगी जी. मुझे तो ये भी नहीं पता कि मैं अपनी नौकरी पर दोबारा जा भी पाऊंगी या नहीं.’ बहरहाल स्थितियां अब सामान्य होने लगी हैं. लगभग दस दिनों के बाद प्रशासन द्वारा सुरक्षा का आश्वासन देने पर मुस्लिम घर लौटे हैं पर मुश्किलें अभी भी बनी हुई हैं.

फोटो फीचर : देखें अटाली दंगे के बाद का मंजर

‘हमने गैर हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी नहीं लगाई, उसे नियंत्रित किया है’

BGमंदिर में गैर हिंदुओं के बिना मंजूरी प्रवेश पर पाबंदी क्यों लगाई गई है?

देखिए, तकरीबन एक माह पहले मंदिर में आए कुछ गैर हिंदुओं की सुरक्षाकर्मियों के साथ झड़प हो गई थी. उस घटना के बाद एक ऐसे नियम की जरूरत महसूस की गई जिससे भविष्य में आगे कोई बड़ा झगड़ा-फसाद न हो. इस कारण से ये नियम बनाया गया है. लोग इस नियम का पालन कर रहे हैं. ये तो सामान्य-सी बात है. पता नहीं मीडिया इस पर इतना हंगामा क्यों मचा रहा है.

लेकिन सुरक्षाकर्मियों के साथ झड़प तो किसी की भी हो सकती है. नियम गैर हिंदुओं को लेकर ही क्यों बनाया गया?

कोई बड़ी घटना घटित हो इसके पहले हमें इसे नियंत्रित करना जरूरी था. हर व्यवस्था का अपना एक नियम होता है. मान लीजिए कहीं धोती पहनकर प्रवेश करने का नियम है और कोई कुछ और पहनकर चला जाए तो दिक्कत होगी ही. झगड़ा हो जाएगा. सबका अलग-अलग नियम होता है. जहां पवित्रता है, यानी मंदिर है वहां सब देखकर करना पड़ता है.

क्या इस नियम के पीछे कहीं ये सोच तो नहीं है कि मंदिर में अगर कोई हिंदू आएगा तो वो कोई समस्या खड़ी नहीं करेगा, जबकि गैर हिंदू कर सकता है?

हां, बिलकुल ऐसा है. ये भी हो सकता है कि कोई दूसरे धर्म का आता है और उससे गलती से कुछ हो जाता है तो भी लोग यही मानेंगे कि इसने जानबूझकर किया होगा.

मंदिर में तो बड़ी संख्या में लोग आते हैं. उनके बीच आप ये कैसे पहचानेंगे कि कौन हिंदू है और कौन गैर हिंदू?

मंदिर के प्रवेश द्वार पर भारी सुरक्षा व्यवस्था है. वहां तैनात सुरक्षाकर्मी और गार्ड्स को जो गैर हिंदू और विदेशी दिखते हैं वो उन्हें अलग बुला लेते है. बाकी वो लोग भी साइनबोर्ड पढ़कर खुद आकर पूछते हैं कि बताइए साइन कहां करना है. वहां एक रजिस्टर रखा हुआ है उसमें उनका नाम-पता नोट करने और उनसे साइन कराने के बाद गार्ड उन्हें साथ लेकर मंदिर दर्शन कराने जाता है और अपने साथ ही वापस लाता है. सारे गैर हिंदुओं के लिए ये नियम है. इसमें कोई दिक्कत नहीं है. सब बिना किसी बाधा के चल रहा है.

गैर हिंदुओं के प्रवेश संबंधी नियम की काफी आलोचना हो रही है. क्या इस नियम पर पुनर्विचार की संभावना है?

बिलकुल नहीं. देखिए यहां अनेक धर्मों के लोग दर्शन के लिए आते हैं. किसी ने अभी तक इस नियम का विरोध नहीं किया है. रजिस्टर रखा हुआ है, लोग अपनी एंट्री करके जा रहे हैं. इसको लेकर अभी तक मंदिर में आने वाले किसी व्यक्ति ने कोई नाराजगी व्यक्त नहीं की है.

क्या ये धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं है. क्या इसे एक सांप्रदायिक कदम नहीं माना जाना चाहिए?

देखिए ये देश में पहली बार नहीं हो रहा है. कई धार्मिक स्थलों पर ऐसी व्यवस्था है. कहीं आपको सिर ढककर जाना होता है तो कहीं कुछ और नियम है. तिरुपति बालाजी से लेकर जगन्नाथ मंदिर, पद्मनाभम मंदिर, त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग, द्वारिकाधीश मंदिर आदि अलग-अलग देवस्थानों के अपने नियम-कायदे हैं. हमने पाबंदी नहीं लगाई है लेकिन उसको नियंत्रित किया है. हमें कोई दिक्कत नहीं है. हमारे कुछ नियम हैं, आप उसका पालन करके दर्शन कीजिए.

‘योग का मतलब तो कुल-जमा होता है !’

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‘योग और इस्लाम’ को आप एक बार गूगल पर सर्च कर के तो देखिये! भारत ही नहीं दर्जनों मुस्लिम देशों में योग पर चर्चा और समर्थन दिख जाएगा. और तो और अशरफ एफ.निजामी ने 1977 में ही बाकायदा एक किताब लिखी जिसका शीर्षक है ‘नमाज : द योगा ऑफ इस्लाम’. यानी योग मुसलमानों के लिए कोई इस्लाम विरोधी क्रिया नहीं रही है, वरना नमाज की एक सकारात्मक तुलना योग से क्यों होती रही बार-बार? बल्कि योग ही नहीं आयुर्वेद, शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय-नृत्य आदि भी हिंदू पद्धति की ऐसी ही देन हैं जिस पर हिंदू-मुसलमान सभी भारतीय समान अधिकार मानते हैं. तो फिर आखिर ऐसा क्या हुआ की योग को लेकर समझदार, उच्च शिक्षित और धर्मनिरपेक्ष मुसलमान भी विरोध में खड़ा हो गया? दरअसल ये जिद पैदा करवाई गई. एक फ्रंट खोला गया जो ये आभास कराए कि अब भारत हिंदूवादी दस्तूर की तरफ बढ़ रहा है और गैर-हिंदू यहां लाचार होकर जिएगा.

भारतीय जनता पार्टी के 2014 के चुनाव घोषणा पत्र में ‘योग-व्यायाम और सूर्य-नमस्कार’ को अनिवार्य बनाना नहीं लिखा था. जो लिखा था वो है अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, कश्मीर से धारा 370 का खात्मा और यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करना. इसके अलावा वादा था कि महंगाई खत्म होगी, भ्रष्टाचार खत्म होगा, महिलाओं पर हिंसा खत्म होगी, काला धन वापस आएगा. जाहिर है, जो लिखा था और जिसका वादा था उससे तो सरकार और पार्टी दोनों मुंह मोड़ चुकी हैं, बल्कि इसके उलट कश्मीर में भाजपा गठबंधन की सरकार में लगातार वो काम किए गए जो अगर पिछली सरकार के समय हो जाते तो आसमान टूट पड़ता, लेकिन फिर भी अपने उस वोटर के लिए कुछ तो करना था जो ये मान रहे थे कि मोदी जी की सरकार बनी तो मुसलमानों को ‘ठीक’ कर देंगे. ऐसे मानस को शांत रखने के लिए सरकार ने हिंदूवादी संगठन और चेहरों को बेलगाम कर रखा है जो बयानबाजी से ये आभास देते रहे कि मुसलमानों को इस सरकार ने टाइट कर रखा है और अब मुसलमानों को भारत में रहना है तो ‘हमारी’ शर्तों पर रहना होगा.

भारतीय संविधान का मात्र क-ख जानने वाले भी जानते हैं कि वंदे मातरम की ही तरह योग को भी सबके लिए अनिवार्य करना सरकार के लिए नामुमकिन है और इसके लिए धर्म की आजादी का तर्क लाने की भी जरूरत नहीं. देश का संविधान ये आजादी देता है कि आप न चाहें तो आपसे जबरदस्ती ऐसा कोई काम नहीं करवाया जा सकता, भले ही वो आपकी सेहत के लिए कितना भी लाभदायक क्यों न हो. तमाम गैर-हिंदू, जिनमें धार्मिक अल्पसंख्यक और नास्तिक अल्पसंख्यक शामिल हैं, उन्हें इस ‘जबरदस्ती’ के कारण ही योग का विरोध करना पड़ा जबकि दुनिया के तमाम हिस्सों में स्वेच्छा से योग-दिवस मनाया जाएगा. ‘स्वेच्छा’ को ‘जबरिया’ में बदलकर योगी आदित्यनाथ और उनके हमखयाल हिंदू-संस्कृति के रखवालों ने इस तरफ ध्यान दिला दिया की योग एक ‘धार्मिक पद्धति’ है, इसमें ओम, सूर्य-नमस्कार, मंत्रोच्चारण, श्लोक आदि भी शामिल हैं और भारत का विश्वविद्यालय अनुदान आयोग योग के सिलेबस में लपेटकर धर्म पढ़ा रहा है. यानी, योग के शाब्दिक अर्थ तो हैं ‘कुल-जमा’, जिसे राजनीति ने ‘घटाने’ का औजार बना दिया.
खुद योगाचार्यों के बीच इस बात को लेकर काफी रोष है कि बाबा रामदेव ने योग का पेटेंट और ब्रांडिंग जिस प्रकार की है वो अश्लील बाजारवाद है और इस सरकारी अनिवार्यता की कोशिश को वो पतंजलि बिजनेस साम्राज्य की सेवा मानते हैं. दूसरी तरफ कानूनविद हैं जो संविधान के अनुच्छेद 25 और 28 के तहत ऐसी किसी भी अनिवार्यता को असंवैधानिक करार दे चुके हैं, तीसरी तरफ हैं वो मुसलमान प्रवक्ता जो इसे इस्लाम से जोड़कर धर्म आधारित विरोध कर रहे हैं और चौथी तरफ वो समाज है जो धर्म को नहीं मानता. सूर्य उसके लिए ब्रह्मांड का एक सितारा मात्र है और भूख से बदहाल देश में योग एक ‘ओवररेटेड’ बेवकूफी.
योगी आदित्यनाथ ने भारत में ही योग के कई मुखर विरोधी अपने उस एक बयान से पैदा कर दिए, जिसमें उन्होंने फरमाया की ‘सूर्य नमस्कार करना
जरूरी है, जिसे एतराज हो वो समंदर में डूब मरे’(और अल्पसंख्यकों को आधी रात में भी साथ देने का भरोसा दिलाने वाले प्रधानमंत्री विभाजन की इस राजनीति पर चुप हैं).
योगी आदित्यनाथ से मेरा सवाल है कि अगर मैं नमाज न पढ़ूं तो क्या कोई मौलाना मुझे समंदर में फेंक सकता है?