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ब्रेकिंग न्यूज के बादशाह!

INDIA-RELIANCE

बीसवीं सदी की शुरुआत में बोर्ड पर खेले जाने वाले लूडोनुमा खेल ‘मोनोपोली’ ने, जिसे भारत में ‘व्यापार’ नाम से जाना गया, बाजार में दस्तक दी थी. इसे भूमि स्वामित्व और सामंतवाद की बुराईयों को उजागर करने के लिए तैयार किया गया था. बाद में पार्कर बंधुओं की ओर से इसमें किए गए बदलावों के बाद ये खेल मुक्त व्यापार, पूंजीवाद और व्यवसायीकरण के चारों ओर ही घूमने लगा. बोर्ड पर घूमते हुए खिलाड़ी संपत्ति की खरीद-फरोख्त करते हैं, घर और होटल बनाते हैं, अपने ‘शहरों’ पर किराया वसूलते हैं और अपनी विरासत बनाने का प्रयास करते हैं. इसके साथ ही विजेता अपने प्रतिद्वंद्वी को दिवालिया करने की कोशिश में भी लगा रहता है.

 अंबानी बंधु यानी बड़े भाई मुकेश और छोटे भाई अनिल की कार्यप्रणाली को देखें तो पता चलता है कि उनके दिमाग में भी कुछ ऐसी ही रणनीति चल रही है. वे देश के सबसे बड़े मीडिया समूह का निर्माण करना चाहते हैं. साथ ही अमेरिका, यूरोप, दक्षिण और पूर्वी एशिया, अफ्रीका और पश्चिम एशिया तक भी अपने पंख फैलाना चाहते हैं. अगर ये दोनों बेगाने भाई हाथ मिला लेते हैं- जैसा इन्होंने पिछले कुछ अवसरों पर किया है- तो वे अगले न्यूज कॉर्प, सीबीएस कॉरपोरेशन, टाइम वार्नर, बर्टेल्समैन एजी, वाल्ट डिज्नी, विवेंडी या सोनी की तरह एक बड़ा नाम बनकर उभर सकते हैं.

अगर उनकी योजनाएं सफल होती हैं तो उनके मीडिया साम्राज्य का विस्तार प्रिंट से लेकर ब्रॉडकास्ट और डिजिटल तक सभी क्षेत्रों में हो जाएगा. वे केबल, डायरेक्ट टू होम (डीटीएच), ऑप्टिक-फाइबर नेटवर्क (जमीन और समुद्र के भीतर भी), टेलीकॉम टावर और मल्टीप्लेक्स जैसी वितरण श्रृंखला के भी मालिक होंगे. डिजिटल और टेलीकॉम (2जी, 3जी और ब्रॉडबैंड) समेत वे विभिन्न मंचों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराएंगे. इनके कंटेंट (विषय वस्तु) में समाचार, मनोरंजन, ई-कॉमर्स, सुरक्षा, वित्तीय सेवाएं, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और प्रशासन आदि शामिल होंगे.

अंबानी बंधु यानी मुकेश और छोटे भाई अनिल की कार्यप्रणाली को देखें तो पता चलता है कि वे देश के सबसे बड़े मीडिया समूह का निर्माण करना चाहते हैं

अगर ऐसा होता है तो न्यूज कॉर्प के मालिक रूपर्ट मर्डोक की तरह, अंबानी बंधु भी सूचना के क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े निर्माता, अधिग्रहणकर्ता और प्रसारक में से एक हो सकते हैं. गौरतलब है कि मर्डोक ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ और ‘द टाइम्स’ (यूके) समेत 150 प्रिंट पब्लिकेशन, कई केबल और सेटेलाइट चैनलों और पब्लिशिंग हाउस के मालिक हैं. वे डीटीएच वितरण के क्षेत्र में भी हैं साथ ही डिजिटल प्लेटफार्म पर भी मौजूद हैं. वे फिल्म और टीवी सीरियल में भी पैसा लगाते हैं. उनके पास म्यूजिक गैलरी के अधिकार हैं. साथ ही प्रमुख खेल आयोजनों जैसे नेशनल फुटबाल लीग (यूएस) के टेलीविजन प्रसारण अधिकार हैं. इन सब के साथ ही वे सभी महाद्वीपों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं.

कंटेंट के बादशाह

नेटवर्क 18 और ईटीवी समूह का अधिग्रहण करने के बाद मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) अंग्रेजी, हिंदी, तेलुगू, उर्दू, बंगाली और गुजराती जैसी विभिन्न भाषाओं में कई चैनलों द्वारा रोज-ब-रोज प्रसारित होने वाले ढेर सारे कंटेंट तक पहुंच बना ही चुका है. ये कंटेंट प्राथमिक रूप से समाचार (मुख्यधारा और व्यापार) और मनोरंजन (फिल्म, संगीत, धारावाहिक और खेल) का मेल हैं. 2011 में आरआईएल ने स्कूली शिक्षा और डिजिटल लर्निंग पर केंद्रित डिजिटल प्लेटफार्म ‘एक्स्ट्रामार्क्स एजुकेशन’ को भी अधिग्रहित किया था.

अनिल ने ‘टीवी टुडे’ और ‘ब्लूमबर्ग टीवी’ के शेयर खरीदने के साथ ‘बीबीसी’ और ‘रेडियो नीदरलैंड्स’ जैसे अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनलों से करार भी किया है

आरआईएल ने बार-बार सार्वजानिक रूप से कहा है कि उसका उद्देश्य ‘शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सुरक्षा, वित्तीय सेवा, मनोरंजन और सरकार-नागरिक इंटरफेस जैसे प्रमुख क्षेत्रों’ में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना है. इरादा ये है कि उपभोक्ता आसानी से, डिजिटली उपलब्ध ‘नए कंटेंट’ तक पहुंचे, जिससे देश में एक नए डिजिटल युग की शुरुआत हो सके. मुकेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘डिजिटल इंडिया’ में अपना योगदान देकर, उसे विस्तार देना चाहते हैं.

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छोटे भाई अनिल ने भी कंटेंट पर पकड़ कायम करने में खासी तरक्की की है. शुरुआत उन्होंने ‘टीवी टुडे’ और ‘ब्लूमबर्ग टीवी’ जैसे समाचार चैनलों के कम पर पर्याप्त शेयर खरीदने से की थी. मगर बाद में उन्होंने ‘बीबीसी’ और ‘रेडियो नीदरलैंड्स’ जैसे अंतरराष्ट्रीय समाचार सामग्री निर्माताओं से करार किया. उनका ‘आर वर्ल्ड’ नियमित रूप से दिनभर अंतरराष्ट्रीय खबरें देता है. हालांकि पिछले कुछ वर्षों से अनिल ने अपना ध्यान संगीत, फिल्म, खेल और मनोरंजन से जुड़ी दूसरी सामग्रियों की ओर केंद्रित किया है.

यूनिवर्सल म्यूजिक के साथ किए गए एक करार के अनुसार अनिल की कंपनी से जुड़े उपभोक्ता तीन लाख गानों में से अपनी पसंद चुन सकते हैं. उन्होंने कुछ प्रमुख फिल्म प्रोडक्शन हाउस, जिनके मालिक स्टीवन स्पीलबर्ग, जूलिया रॉबर्ट्स, ब्रैड पिट, निकोलस केज, जिम कैरी और टॉम हैंक्स जैसे फिल्मी सितारें हैं, के साथ भी एग्रीमेंट किए हैं. 2008 में अनिल ने स्पीलबर्ग के प्रोडक्शन हॉउस ‘ड्रीम वर्क्स’ के साथ 1.5 बिलियन डॉलर (तकरीबन 96 अरब 3 करोड़ 75 लाख रुपये) का व्यावसायिक गठबंधन किया था, जिसके तहत आने वाले पांच सालों में 30-35 फिल्में बनाने का लक्ष्य रखा गया लेकिन कुछ ही फिल्में बनाई जा सकीं.

इसके साथ ही ‘वार्नर होम वीडियो’ और ‘पैरामाउंट पिक्चर्स’ जैसी दुनिया की बड़ी कंपनियों से किए गए करार भी अनिल की फिल्म और म्यूजिक कंपनियों के कारोबार में इजाफा करेंगे. वार्नर के साथ हुए करार के तहत वे भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश में उनकी वीसीडी, सीडी और ब्लू-रे उत्पादों की बिक्री और वितरण कर सकते हैं. इस समूह के एक वरिष्ठ प्रबंधक के अनुसार, ‘यह विशेष लाइसेंस… न केवल इन दोनों पक्षों के लिए बल्कि फिल्म प्रेमियों के लिए भी फायदेमंद होगा.’ इन सबके साथ अनिल फिल्म रेस्टोरेशन (संग्रहण) के भी एक प्रोजेक्ट से जुड़े हुए हैं.

हालांकि अब तक अनिल के कुछ प्रयास ज्यादा सफल नहीं हुए, पर वे अब भी कंप्यूटर गेमिंग (जपाक डॉट कॉम, जंप गेम और इंडिया गेम्स का गठजोड़), सोशल नेटवर्क्स (अपने उपभोक्ताओं को फेसबुक, ट्विटर और लिंक्ड-इन के उपयोग की सुविधा देना) टीवी पर इंटरनेट, माइक्रोसॉफ्ट विंडो और क्लाउड कंप्यूटिंग के रूप में अप्रत्यक्ष सामग्री को लेकर बहुत ज्यादा उत्साही हैं. आने वाले समय में वे इन सभी सुविधाओं को डीटीएच, डिजिटल और मोबाइल क्षेत्र में भी लाना चाहते हैं.

बराबर के वितरक

टेलीविजन वितरण में अनिल अपने बड़े भाई से पहले ही शुरुआत कर चुके है. वे डीटीएच के सबसे बड़े कारोबारियों में से एक हैं. हाल ही में उन्होंने पुरानी कंपनी रिलायंस के साथ जुड़े चोटी के चार केबल मल्टी-सिस्टम-ऑपरेटर में से प्रमुख ‘डीजी केबल’ का भी अपनी डीटीएच कंपनी में विलय किया है. अब समूह की सभी टेलीविजन वितरण सेवाएं चाहे वो डीटीएच हो, केबल हो या इंटरनेट प्रोटोकॉल टीवी, इस नई व्यापारिक इकाई के साथ ही काम करेंगी. दो साल पहले ऐसी खबरें आई थीं कि अनिल अपने डीटीएच व्यवसाय को चेन्नई के सन ग्रुप को बेच सकते हैं, लेकिन ये सौदा हुआ नहीं. उनके पास देश-भर में सैकड़ों सिनेमाघर हैं, हालांकि उन्होंने मल्टीप्लेक्स कारोबार को बेच दिया है. देश-भर में उनकी कंपनी के लगभग 50 एफएम स्टेशन चलते हैं, एक रेडियो स्टेशन सिंगापुर में भी है जिसे 2008 में शुरू किया गया था.

इस दौड़ में बड़े भाई मुकेश भी पीछे नहीं हैं. हाल ही में उन्होंने पूरे देश में कारोबार करने के लिए एक केबल एमएसओ (मल्टीपल सिस्टम ऑपरेटर) लाइसेंस के लिए आवेदन किया है. विशेषज्ञों की मानें तो मुकेश की रिलायंस जिओ इंफोकॉम (आरजेआई) को मिलाकर कुल 150 आवेदकों को डिजिटल केबल वितरण की इजाजत मिल सकती है. ऐसी अफवाहें भी सुनी गईं है कि आरजेआई देश के सबसे बड़े चार या पांच केबल एमएसओ में से एक के 26 प्रतिशत शेयर की हिस्सेदारी चाहती है. वैसे भारत में समीर मनचंदा की सबसे बड़ी केबल डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ‘डेन नेटवर्क्स’ में उनकी एक प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी है.

करार-दर-करार

मीडिया की सत्ता पाने के इस खेल में, दोनों भाइयों के लिए डिजिटल मोबाइल कंवर्जेंस सबसे फायदेमंद सौदा होगा. मुकेश के पास पूरे देश में 4जी (ब्रॉडबैंड) सेवा मुहैया कराने का लाइसेंस है. वो देश के 5000 शहरों और कस्बों यानी 90 प्रतिशत शहरी भारत और लगभग 2.15 लाख गांवों में 4जी सेवा देने के लिए 70,000 करोड़ रुपये का विशाल निवेश करने की योजना बना रहे हैं. एक तरह से देखा जाए तो यह मोदी के ‘डिजिटल इंडिया’ का निजीकृत स्वरूप होगा. 4जी और केबल के साथ, आरजेआई वायरलेस, वायरलाइन और केबल के जरिये कंटेंट  का वितरण कर सकती है.

जिन बड़ी वैश्विक परियोजनाओं में मुकेश ने निवेश किया है उनमें से एक ‘बे ऑफ बंगाल गेटवे’ (बीबीजी) परियोजना है. समुद्र के अंदर स्थापित 8000 किलोमीटर लंबी यह केबल व्यवस्था परियोजना मलेशिया और सिंगापुर को भारत (मुंबई और चेन्नई) और श्रीलंका के रास्ते पश्चिमी एशिया से जोड़ेगी. आरआईएल की एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया, ‘बीबीजी निर्माण की योजना न सिर्फ दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य पूर्व के बीच संपर्क बनाएगी, बल्कि भारत, मिडिल ईस्ट और सुदूर पूर्व एशिया में बने हुए और नए बन रहे इंटर-कनेक्शन के जरिए यूरोप, अफ्रीका और सुदूर पूर्व एशिया को जोड़ेगी.’

अगर उनकी 4जी और ब्रॉडबैंड रणनीति चल पड़ती है तो वायरलाइन (ऑप्टिक फाइबर, पानी के भीतर व जमीनी केबल व्यवस्था) और वायरलेस (टेलीकॉम टावर) के रूप में आधारभूत संरचनाएं बनाना बहुत श्रमसाध्य काम होगा, इसलिए आरजेआई ने बीबीजी के अलावा टेलीकॉम कंपनी भारती एयरटेल के साथ भी एक समझौता किया है. ‘इंडीफिजीबल राइट टू यूज’ (तोड़ा न जा सकने वाला करार) समझौते के तहत भारती, आरजेआई को समुद्र के भीतर स्थापित अपनी आई2आई सबमरीन केबल पर डाटा क्षमता उपलब्ध कराएगा. गौरतलब है कि भारती एयरटेल की ये केबल भारत और सिंगापुर को जोड़ती है, जिसके लैंडिंग बिंदु भारत में चेन्नई और सिंगापुर में टुअस में हैं.

न्यूज कॉर्प के मालिक रूपर्ट मर्डोक की तरह, अंबानी बंधु भी सूचना के क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े निर्माता, अधिग्रहणकर्ता और प्रसारक में से एक हो सकते हैं

 घरेलू स्तर पर, मुकेश अपने छोटे भाई से ऑप्टिक फाइबर नेटवर्क के उपयोग के लिए अनुबंध कर चुके हैं. अप्रैल 2013 में मुकेश ने अपनी 4जी सेवाओं को शुरू करने के लिए अनिल के 1.2 लाख किलोमीटर लंबे इंटरसिटी ऑप्टिक फाइबर नेटवर्क के इस्तेमाल करने के लिए 1200 करोड़ रुपये का भुगतान किया था. एक साल बाद, आरजेआई ने 5 लाख किलोमीटर लंबे इंटरसिटी फाइबर नेटवर्क के इस्तेमाल के लिए इसी तरह के एक अन्य समझौते पर दस्तखत किए. इसी तरह वायरलेस सेवाओं के प्रयोग के लिए, अनिल की कंपनी के जमीनी और छत पर लगे टेलीकॉम टावरों का इस्तेमाल करने के लिए मुकेश अपने छोटे भाई को 1200 करोड़ रुपये देने पर राजी हुए. इसी तरह के कई समझौते उन्होंने कुछ अन्य घरेलू कंपनियों के साथ भी किए, जिनके पास बड़ी संख्या में टेलीकॉम टावर हैं.

जैसा कि पहले बताया गया कि अनिल ऑप्टिक फाइबर और टेलीकॉम टावरों के नेटवर्क के मालिक हैं. 2जी और 3जी मोबाइल सेवाओं में सफल प्रवेश के बाद उन्होंने अपने बड़े भाई की तरह 4जी और ब्रॉडबैंड सेवाओं पर अपनी नजरें गड़ाई हुई हैं. इसके अतिरिक्त वे फ्लैग (फाइबर-ऑप्टिक केबल अराउंड द ग्लोब) के रूप में काम करने वाले समुद्र के भीतर केबल लिंक के भी मालिक हैं. साथ ही वे चीन से भारत होते हुए पूर्वी एशिया को जोड़ने वाले जमीनी केबल कनेक्शन के निर्माण संबंधी समझौते पर भी हस्ताक्षर कर चुके हैं. उनका एक नया प्रोजेक्ट ‘मेट्रो ईथरनेट’ है, जो सिनेमाघरों में डिजिटल फिल्म को दिखाने की सुविधा उपलब्ध कराता है.

 रणनीतिक साझेदारी

एक हालिया रिपोर्ट की मानें तो मुकेश ने सन समूह को खरीदने की कोशिश की है, सन समूह का ताना-बाना प्रिंट, प्रसारण, डिजिटल और रेडियो से लेकर केबल और डीटीएच वितरण तक फैला हुआ है. हालांकि आरआईएल और सन दोनों ही इस बात का खंडन कर चुके हैं- पर आरआईएल के एक प्रबंधक ने अनौपचारिक रूप से ‘तहलका’ को बताया कि सन के साथ कोई बात नहीं हुई है- हालांकि दोनों रणनीतिक साझेदारी कर सकते हैं. यह साझेदारी शेयर खरीदने से संबंधित भी हो सकती है जहां आरआईएल सन के कुछ शेयर खरीद सकती है या फिर सामग्री तथा वितरण में हिस्सेदारी ले सकती है.

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 एक वेबसाइट (www.newslaundry.com) में प्रकाशित एक हालिया लेख में यह दावा किया गया है कि आरआईएल संभवतः एक अन्य बड़े प्रसारक समूह एनडीटीवी के साथ भी एक डील साइन कर चुकी है, ये बिलकुल वैसी ही डील है जैसी आरआईएल ने नेटवर्क 18 समूह को आधिकारिक रूप से टेकओवर करने से पहले उनके साथ की थी. आरआईएल की एक पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी ने शिनानो रिटेल (जो कि आरआईएल समूह का ही हिस्सा है) को 403.85 करोड़ रुपये दिए, जहां से ये पैसा विश्वप्रधान कॉमर्शियल नाम की एक और कंपनी तक पहुंचा. जब यह सौदा हुआ तब शिनानो रिटेल और विश्वप्रधान कॉमर्शियल का पता एक ही था. इसी वर्ष एनडीटीवी समूह की मुख्य संस्थापक कंपनी राधिका रॉय प्रणय रॉय प्राइवेट लिमिटेड को ठीक इतनी ही धनराशि 403.85 करोड़ रुपये अनसिक्योर्ड लोन (बिना किसी सिक्योरिटी के ऋण) के रूप में प्राप्त हुई थी. हालांकि कंपनी की बैलेंसशीट में इसके स्रोत का कोई उल्लेख नहीं था लेकिन आयकर विभाग का दावा है कि यह पैसा उसे विश्वप्रधान कॉमर्शियल से मिला. ये घटनाक्रम बिलकुल वैसा ही था जैसा आरआईएल ने नेटवर्क 18 के मामले में किया था. उस मामले में ऋण की राशि को बाद में इक्विटी और औपचारिक मालिकाना हक में बदल दिया गया.

एकाधिकार काे लेकर बेकरार

केबल टीवी, डिजिटल और टेलीकॉम और ऐसे ही कई कंटेंट और प्रचार-प्रसार के अन्य माध्यमों के स्वामित्व की जिस कोशिश में अंबानी बंधु लगे हुए हैं, वैसी स्थिति दुनिया में कहीं भी मौजूद नहीं है. ज्यादातर विकसित देशों में

क्रॉस मीडिया ओनरशिप पर प्रतिबंध है, यहां तक की मीडिया के बड़े खिलाड़ी भी इस तरह की संपूर्ण और विशाल उपस्थिति दर्ज करने की उम्मीद नहीं कर सकते. हालांकि मुकेश और अनिल को ये एहसास है कि भविष्य में

उन्हें तेज कदम बढ़ाने होंगे.

पिछले कुछ वर्षों में, भारत में आलोचकों और नियामकों ने क्रॉस मीडिया ओनरशिप को प्रतिबंधित करने के लिए काफी शोर मचाया गया है, जिससे मीडिया में एकाधिकारों और अल्पाधिकारों को रोका जा सके. उनमें से कुछ का तर्क ये भी है कि ऐसा हो ही चुका है. हाल ही में टेलीकॉम नियामक इस मुद्दे पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय को अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कर चुके हैं. हालांकि सरकार ने इन्हें खारिज कर दिया है, पर उन पर बढ़ता दबाव शायद मीडिया नीतियों में बदलाव ला सकता है.

वर्तमान में ऐसे कई व्यवसायी हैं जिनके पास मुकेश और अनिल के बराबर ही मीडिया संगठन हैं या उतने ही संसाधन हैं. लेकिन अंबानी बंधुओं समेत ये सब इस बात को जानते हैं कि इससे पहले कि क्रॉस-मीडिया ओनरशिप पर प्रतिबंध लगे, उन्हें अपने मीडिया साम्राज्य को एक मुकाम तक पहुंचा देना होगा. इस तरह के हालात में सरकार के लिए पूर्वव्यापी प्रतिबंध लगाना मुश्किल होगा और वो भविष्य के लिए ही सोचेगी. मीडिया के इस बोर्ड गेम में जो भी, जितनी जल्दी मोनोपोली (एकाधिकार) कायम कर लेगा, वही असली विजेता होगा.

किराये पर किचकिच

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महानगरों की सीमा के पार स्थित गांव, कस्बों और छोटे शहरों के लाखों बच्चों का सपना होता है कि वह महानगर में आकर अपनी पढ़ाई-लिखाई कर भविष्य के रास्ते संवारे. इनमें से अधिकांश युवाओं का सपना राजधानी दिल्ली से होकर गुजरता है. हर साल लाखों की संख्या में छात्र-छात्राएं अपना भविष्य बनाने दिल्ली की ओर कूच करते हैं. मगर दिल्ली जैसे महानगरों की हकीकत कुछ और है. यहां आने के बाद उनके जीवन का सफर संघर्ष में बदल जाता है. किराये का मकान खोजने से इस संघर्ष की शुरुआत होती. फिर किराया और मकान मालिकों के चंगुल में वे ऐसा फंसते हैं कि निकलना मुश्किल होता है.

 राजधानी वजीराबाद में रहकर यूपीएसी की तैयारी करने वाले संतोष कुमार आजमगढ़ से हैं. वे बताते हैं, ‘जब दिल्ली आया तो मेरे एक जानने वाले यहां पहले से तैयारी कर रहे थे. पहले सोचा था कि मुखर्जी नगर में रहूंगा, लेकिन यहां कमरा बिना प्रॉपर्टी डीलर के नहीं मिलता है. प्रॉपर्टी डीलर से यहां के महंगे किराये के बारे में पता चला. किसान परिवार से मेरे जैसे आए लड़कों का यहां रहना काफी मुश्किल है. फिर कुछ लोगों ने बताया कि बाइपास की दूसरी तरफ वजीराबाद है. वहां सस्ता मकान मिल जाता है.’

 वजीराबाद की कहानी ये है यहां सभी सुविधाएं नहीं मिलती हैं. नोट्स भी लेना हो तो उसके लिए मुखर्जी नगर आना होता है. इस वजह से काफी समय बर्बाद होता है. इसके अलावा वजीराबाद में बिजली और पानी की भी काफी दिक्कत होती है. सारा समय इन दिक्कतों से निपटने में ही खत्म हो जाता है. इसके इतर मुखर्जी नगर जैसे इलाकों में रहने वाले के लिए 12 हजार से लेकर 16 हजार रुपये तक किराया है. वहीं दिल्ली के दूसरे इलाकों में पांच से छह हजार रुपये में कमरे आसानी से मिल जाते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में आसपास के इलाकों में कमरों का किराया दिन-ब-दिन आसमान छू रहा है. हाल ये है कि तमाम इलाकों में नियम-कानून को परे रख मनमाना किराया वसूला जा रहा है. इस वजह से छात्र-छात्राओं को मजबूर होकर सड़क पर उतरना पड़ा. इसके लिए छात्र-छात्राएं दिल्ली रूम रेंट कंट्रोल मूवमेंट संगठन के बैनर तले पिछले कुछ दिनों से आंदोलन कर रहे हैं. इतना ही नहीं संगठन ने गांधी जयंती पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल करने का फैसला लिया है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज की छात्रा श्वेता सिंह हॉस्टल न मिलने की वजह से गांधी विहार में रहती है. श्वेता बताती हैं, ‘मैं बिहार के सहरसा के एक गांव से 12वीं करने के बाद दिल्ली पढ़ने आई. हॉस्टल के अलावा कहीं और रहना काफी महंगा पड़ता है. मेरे कमरे का किराया 12 हजार है. इसमें मेरे अलावा दो लड़कियां और रहती हैं. घर से सात से आठ हजार रुपये ही मिलते हैं. अचानक कोई खर्च आ जाए तो उतने पैसों में गुजारा करना मुश्किल हो जाता है.’

आंदोलन कर रहे छात्र-छात्राओं की मांग है कि दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 लागू किया जाए ताकि किराये की दर हर जगह समान हो

 दिल्ली रूम रेंट कंटोल मूवमेंट से जुड़कर आंदोलन कर रहे छात्र-छात्राओं की मांग है कि दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 लागू किया जाए ताकि किराये की दर हर जगह समान हो. एक जगह तीन हजार तो दूसरी जगह 13 हजार रुपये का किराया न वसूला जाए. संगठन का आरोप है कि राजधानी में मकान मालिक किराये की रसीद तक नहीं देते हैं. इसके अलावा किरायेदारों से ढंग से पेश भी नहीं आते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके दूसरे कॉलेजों में चल रही दाखिले की प्रक्रिया के चलते राजधानी में इन दिनों कमरों के किराये में आग लगी हुई है और छात्र-छात्राएं मकान मालिकों के मनमाने किराये पर कमरा लेकर रहने को मजबूर हो रहे हैं. किराये पर कमरा लेने की प्रक्रिया कितनी जटिल और महंगी है इसे ऐसे समझा जा सकता है. हालात इतने बुरे हैं कि कुछ मकान मालिक खुद अपने मकान के एजेंट या प्रॉपर्टी डीलर बन जाते हैं या अपने किसी पड़ोसी को बना देते हैं. प्रक्रिया ये है कि किराये का कमरा दिलाने के एवज में एजेंट या प्रॉपर्टी डीलर 15 दिन का किराया अपने मेहनताने के तौर पर वसूलता है. इसके बाद छात्र-छात्राओं को मालिक को सिक्योरिटी मनी यानी एक महीने का किराया और एक महीने का किराया बतौर एडवांस चुकाना पड़ता है. मान लीजिए एक कमरे का किराया 10 हजार है. ऐसे में आपको पांच हजार यानी 15 दिन का किराया एजेंट को, 10 हजार रुपये सिक्योरिटी मनी और कमरे का एडवांस किराये के रूप में 10 हजार और देने पड़ते हैं. यानी 10 हजार कमरा लेते वक्त आपको कुल 25 हजार रुपये चुकाने पड़ते हैं, जो किसी छात्र के लिए अदा करना खासा मुश्किल होता है. इन परिस्थितियों में मकान मालिक खुद या उसका कोई करीबी एजेंट बन जाए तो उसे इस जटिल प्रकिया के चलते पांच हजार रुपये सीधे-सीधे मिल जाते हैं.

 दिल्ली रूम रेंट कंटोल मूवमेंट के संयोजक प्रवीण कुमार बताते हैं, ‘दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 में, वर्ष 1995 में संशोधन किया गया, लेकिन उस पर फिर कभी कोई बात नहीं की गई. दिल्ली सरकार ने भले ही बिजली-पानी की दर सस्ती कर दी हो लेकिन छात्र-छात्राओं से अब भी पुरानी दरों पर बिल वसूला जा रहा है.’ इन मांगों के समर्थन में अब तक 30,000 से अधिक लोगों ने मांगपत्र पर हस्ताक्षर किया है. दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यापक संघ भी इसके समर्थन में नजर आ रहे हैं.

 दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (डूटा) की अध्यक्ष नंदिता नारायण कहती हैं, ‘दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए हर साल लाखों की संख्या में छात्र-छात्राएं आते हैं. मैं छात्रों की हर मांग का समर्थन करती हूं. गरीब छात्रों के लिए रियायती दरों पर भोजन, पानी और आवास उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है. विश्वविद्यालय और इसके हॉस्टलों के बाहर भी इसे लागू करना चाहिए.’

दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन (डूसू) के उपाध्यक्ष परवेश मलिक कहते हैं, ‘हम लोग विश्वविद्यालय से लगातार हॉस्टल की संख्या बढ़ाने का लेकर बात कर रहे हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन ने हमें आश्वासन दिया है कि जल्दी ही हॉस्टलों की संख्या बढ़ाई जाएगी. इसे लेकर हम दिल्ली सरकार से भी मिल चुके हैं. दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 छात्रहित में लागू होना चाहिए. दिल्ली विश्वविद्यालय में आइसा के अध्यक्ष अमन नवाज कहते हैं, ‘आइसा इस मामले को काफी समय से विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने उठाती रही है, लेकिन डूसू में आइसा का प्रतिनिधित्व न होने के कारण प्रशासन हमारी बातों को सही तरह से नहीं सुनता है. आइसा दिल्ली रूम रेंट कंट्रोल मूवमेंट केे साथ है.’

दिल्ली विश्वविद्यालय अधिनियम की धारा 33 में हर छात्र-छात्रा के लिए अनिवार्य रूप से आवास की व्यवस्था करना विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी बताई गई है. दिल्ली विश्वविद्यालय में हॉस्टल की संख्या काफी कम है, जिसकी वजह से छात्रों को मजबूरी वश बाहर कमरा लेकर रहना पड़ता है और मकान मालिक का अत्याचार सहना पड़ता है.

दिल्ली के वैसे तो लगभग सभी इलाकों में छात्र-छात्राएं रहते हैं, लेकिन मुख्य तौर पर मुखर्जी नगर, दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास के इलाकों में, लक्ष्मी नगर के आसपास और जेएनयू के आसपास रहते हैं. कमरा लेते वक्त किरायेदार उनसे तमाम तरह के सवाल पूछते हैं, फिर तमाम दस्तावेज मांगे जाते हैं.

देवघर झारखंड के मूल निवासी सौरभ पांडे लक्ष्मी नगर में रहकर सीए की तैयारी कर रहे हैं. उनका कहना है, ‘किरायेदार का पुलिस की ओर से सत्यापन होने के बाद और तमाम दस्तावेज जमा होने के बाद भी मकान मालिक किरायेदार को शक की निगाह से देखता है कि ये किराया देगा या भाग जाएगा. किराया देने में अगर एक दिन की भी देरी हो जाए तो मकान मालिक बेचैन होने लगता है और सामान तक बाहर फेंकने की बात करने लगता है.’

‘छात्र-छात्राएं घर वालों से किराये के लिए समय से पैसा लेते हैं, पर हमें समय से नहीं देते. समय पर हमें पैसा नहीं मिलेगा तो हम अपना काम कैसे करेंगे?’

दिल्ली विश्वविद्यालय के नजदीक ही क्रिश्चियन कॉलोनी है. मणिपुर के मांगचा यहां रहकर लॉ की पढ़ाई कर रहे हैं. पांच साल पहले वह डीयू में पढ़ाई करने के लिए आए थे. हॉस्टल न मिलने की वजह से उन्हें बाहर रूम लेकर रहना पड़ रहा है. उन्होंने डीयू से ही स्नातक किया है. जब पढ़ने आए तो तीन दोस्तों ने मिलकर विजय नगर में दो रूम का एक मकान 8000 रुपये महीने की दर से किराये पर लिया. लेकिन एक साल बाद ही मकान मालिक ने किराया बढ़ाकर 12 हजार रुपये कर दिया. वे बताते हैं, ‘इस वजह से कमरा छोड़ना पड़ा. क्रिश्चियन कॉलोनी में काफी दिक्कत है. कमरा थोड़ा सस्ता है मगर छोटा है. कॉमन वॉशरूम हैं, घर की हालत भी बहुत जर्जर है. पर किराया कम होने से लोग यहां रहने को मजबूर हैं.’

कमोबेश यही हाल दिल्ली के लाडो सराय में रहने वाली मेघा का है. वह एक साल पहले ही टोंक स्थित बनस्थली विद्यापीठ से बीटेक करने के बाद यहां गेट  की तैयारी करने आई हैं. वह बताती हैं, ‘मकान मालिक मकान देने से पहले दो महीने का सिक्योरिटी मनी मांगते हैं. एडवांस नहीं देने पर पीजी मिलना मुश्किल होता है. किराया देने में एक-दो दिन देरी हो जाए तो मकान मालिक काफी गंदे तरीके व्यवहार करते हैं.’

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 इन परिस्थितियों से दिल्ली आने वाले हर छात्र-छात्राएं रूबरू हो रहे हैं. इन सब दिक्कतों की मुख्य वजह दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 का लागू न होना है. इस कानून का मुख्य उद्देश्य किरायेदारों के हितों की रक्षा करना है. यह कानून मकान मालिक को किरायेदारों से ज्यादा किराया वसूलने और जबरदस्ती मकान से निकालने से प्रतिबंधित करता है. विश्व के लगभग 40 देशों में किराया नियंत्रण कानून मौजूद है. इस कानून के लागू होने के 30 साल बाद इसमें संशोधन कर दो बदलाव किए गए. पहला 3500 रुपये से ज्यादा किराया चुकाने वालों को इस कानून के दायरे से बाहर कर दिया गया. दूसरा, हर तीन साल पर 10 प्रतिशत तक किराया बढ़ाने का प्रावधान किया गया. इसके बाद 1995 में भारत सरकार ने दिल्ली किराया अधिनियम पास कर दिया. इसके तहत बाजार भाव के हिसाब से किराया तय करने और जरूरत पड़ने पर किरायेदार को मकान से बेदखल करने का प्रावधान कर दिया गया. किरायेदारों ने इसका विरोध किया तो सरकार को इसे वापस लेना पड़ा.

पढ़ाई करने के लिए दिल्ली आने वाले छात्र-छात्राओं के प्रति मकान मालिकों का नजरिया भी ठीक नहीं होता. मकान मालिकों का ये मानना है कि जो बच्चे यहां आते हैं उनके परिवार वालों के पास इतना तो पैसा होता है कि वे 10,000 या 12,000 रुपये तक किराया चुका सकंे. तभी वह इतने महंगे शहर में पढ़ने के लिए अपने बच्चों को भेजते हंै. इसे मकान मालिक सुखबीर मल्होत्रा की नजर से समझा जा सकता है. वे कहते हैं, ‘अगर इतना किराया नहीं दे सकते तो यहां क्यों पढ़ने आते हैं? हमने भी तो अपनी मेहनत के पैसे से घर बनाया है. अगर हमें समय से किराया न मिले तो हम अपने घर में इन्हें क्यों रहने दें? छात्र-छात्राएं अपने घर वालों से किराये के लिए समय से पैसा ले लेते हैं, लेकिन हमें समय से नहीं देते. अगर सही समय पर हमें पैसा नहीं मिलेगा तो हम अपना काम कैसे करेंगे? ये जब हमारे यहां रहने आते हैं तो काफी सभ्य बनकर आते हैं, बाद में कमरे पर पार्टी और हुल्लड़बाजी करते हैं.’ इस तरह की सोच वाले मकान मालिकों का मानना है दिल्ली किराया नियंत्रण कानून नहीं लागू होना चाहिए क्योंकि इससे सभी मकान मालिकों को दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा और छात्र-छात्राएं मनमानी करने लगेंगे.

2009 में दिल्ली में हाउस टैक्स संबंधी नियमावली बनाई गई थी, जिसके तहत हाउस टैक्स संपत्ति के क्षेत्रफल के हिसाब से तय किया जाता है. पहले यह संपत्ति पर मिलने वाले किराये पर तय किया जाता था, लेकिन क्षेत्रफल के हिसाब से हाउस टैक्स तय किए जाने के वजहों से मकान मालिक अब मनमाने तरीके से किराया वसूलने के साथ टैक्स की चोरी करता है. 2005 में शहरी क्षेत्रों के विकास के लिए जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) लागू किया गया था. इसके तहत शहरी क्षेत्रों में सात जरूरी सुधार होने थे. इनमें किराया अधिनियम में भी सुधार किया जाना था. दिल्ली की एक स्वयंसेवी संस्था पीआईएल वाच ग्रुप ने इस मिशन और इसके तहत किराया कानून से संबंधित किराया कानूनों की पड़ताल कर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इसमें बताया गया कि जेएनएनयूआरएम के शुरू होने के बाद किसी भी एक राज्य में किराये से संबंधित कानून में कोई बदलाव नहीं हुआ है. खैर, दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच छिड़ी जंग में छात्र-छात्राओं से जुड़ा ये अहम मुद्दा कहीं खो सा गया है.

लुगदी, घासलेट, अश्लील, मुख्यधारा… साहित्य के स्टेशन

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मिलिट्री डेयरी फार्म, सूबेदारगंज, इलाहाबाद. लौकी की लतरों से ढके एस्बेस्टस शीट की ढलानदार छतों वाले उन एक जैसे स्लेटी, काई से भूरे मकानों का शायद कोई अलग नंबर नहीं था. हर ओर ऊंची पारा और लैंटाना घास थी. कंटीले तारों से घिरे खेत थे जिनके आगे बैरहना का जंगल था. घास में ट्यूबवेल की नालियों और बिना टोटियों वाले नलकों का पानी रिसता रहता था जिससे हमेशा तरोताजा रहने वाली ऊब मुझे पकड़ लेने के लिए घात लगाए दुबकी रहती थी. सत्तर के दशक के वे दिन बेहद बड़े होते थे.

हर तरफ इतनी ऊब कि घर के पास अस्तबल के घोड़े आधी रात को हिनहिनाते थे और दूर बाड़े में बंद जर्सी गायें तक सूनी दोपहरी से घबराकर चिल्लाती थीं… ऊपर से डेयरी फार्म के मिल्क प्लांट में सफेद वर्दी पहन काम करने वाले लगभग जल्लाद थे. वे मेरी उम्र के बच्चों को पुचकार कर प्लांट के अंदर बुला लेते थे और धमका कर केन के ढक्कनों में जबरदस्ती दूध पिलाते थे. दूध पीते समय हांफने और घुटी हुई सांसों से हमारी यातना का पता चलता था जिससे वे काफी खुश होते थे. यह ऊब ही थी जिससे त्रस्त होकर लड़के एयरगन या गुलेल से मारी गई कोई भी चिड़िया सूखी घास पर भून कर खा जाते थे, फ्रीजर से सांड़ों के सीमन चुरा के कई दिन शैतानी कल्पना में गोते लगाते थे कि किसी लड़की को इससे गर्भवती कर दिया जाए तो पैदा होने वाला बछड़ा या बच्चा कैसा होगा, मैं दबे पांव लेटर बाक्स में करीने से सजी चिट्ठियां पार किया करता था ताकि एकांत में पढ़कर जान सकूं कि यहां रहने वालों के पेट में और फौज के भीतर क्या चल रहा है.

मैं छठी या सातवीं में पढ़ता था. स्कूल में हमेशा से नींद आती थी क्योंकि वह मधुमक्खी का छत्ता था जिसमें टीचरों, छात्रों का अस्तित्व भन-भन-भन से ज्यादा कुछ नहीं था जो कभी कभार डंक भी मारते थे. पढ़ाई बोझ थी लेकिन बाहर पढ़ने का चस्का विकट था. साइनबोर्ड, सामानों के लेबल, लिफाफे, काॅपियों पर चढ़े अखबारों के कवर सब चाट जाता था फिर भी ऊब से छुटकारा नहीं था. छिपकर घोड़ों की प्रणयलीला देखने के बाद उफनाई बौराहट से भरकर स्टॉक यार्ड में घास के बंडलों पर कूदना पड़ता था, ट्यूबवेल की किलोमीटरों लंबी नाली में लेटकर शलजम खाते हुए दोपहर काटनी पड़ती थी. पढ़ना जादू जैसी चीज है जो उड़ाकर कहां से कहां ले जाती है, यह मैं अनपढ़ लोगों की आंखों में वीरानी और अचरज से भांपने लगा था.

पड़ोस में पंजाब से आए काफी गंभीर से लगते जयपाल सिंह उर्फ पप्पू भइया थे, जिनके पास एक स्टील की कंघी थी. इंटर पास करने में ही उनके घने बाल तिल-चावली हो चुके थे जिन्हें विनोद मेहरा स्टाइल में खूब जतन से संवारते थे. वे नीम के पेड़ के नीचे एक चारपाई पर लेटे हमेशा कोई मोटी किताब पढ़ते या क्रिकेट की कमेंटरी सुनते रहते थे. उनके रेडियो से अक्सर फूटने वाला एक गाना…जलता है जिया मेरा भीगी भीगी रातों में… मेरी जबान पर चढ़ गया था जिसके कारण मुझे शर्मिंदगी झेलनी पड़ती थी क्योंकि सुनने वालों के कान खड़े हो जाते थे और मैं काफी छोटा था. बाद में इसी गाने की धुन तुलसीदास से भी अधिक लोकप्रिय लेखक मस्तराम की सीलबंद किताबें पढ़ते हुए मेरे भीतर बजने लगती थी. बिहारी और घनानंद पर मुंह बिचकाने वाले हिंदी के पुरोधा अपनी कल्पित शालीन छवियों के खोल में घोंघों की तरह सिमटे रहे, इन्हीं किताबों ने कई पीढ़ियों को फर्जी धार्मिक लंतरानियों, नैतिकता, पवित्रता और संबंधों को आंधी की तरह मरोड़ देने वाली सेक्स की शक्ति की सहजता से परिचित कराया, फूहड़ तरीके से ही सही औरत-मर्द को समझने की अंतदृष्टि दी. जाड़े की एक दोपहर क्रिकेट कमेंट्री चल रही थी, आसमान में सरसराती पटरंगा और चांदतारा के पेंच लड़ रहे थे, जर्सी गाएं ऊब के मारे बिलबिला रही थीं, किताब नीचे गिर गई थी और पप्पू भइया खटिया पर मुंह खोले खर्राटे ले रहे थे. मैंने चुपचाप किताब उठा ली और घास पर लेटकर पढ़ने लगा.

वहां ब्लास्ट अखबार का एक रिपोर्टर सुनील था जो दरअसल बड़ा भारी जासूस था. वह लकी स्ट्राइक सिगरेट से धुएं के छल्ले बनाते हुए सोचता था, उसके पास एक बहुत पॉवरफुल बाइक थी और एक रिवॉल्वर था जिसे अनलोड करते समय सावधान न रहे तो कारतूस का खोखा सीधे थोबड़े पर लगता था. उसे एक मर्डर को खोलने का काम सौंपा गया था, उसने पता लगा लिया था कि हत्यारा लंगड़ा है जिसका एक जूता जमीन पर पूरा नहीं पड़ता और वह पूरी सिगरेट नहीं पीता. इसी सुराग के बूते उसे यकीन था कि वह उसे जल्दी ही पकड़ लेगा.

पप्पू भइया जब तक जागे तब तक मैं मटमैले मोटे पन्नों वाली आधी किताब भकोस कर किसी वयस्क में बदल चुका था जो हत्यारे को पकड़ने और बचने की तरकीबें सोचता हुआ दुनिया के दिलफरेब रहस्यों में खोया हुआ था. उन्होंने हैरत से देखते हुए अपनी किताब लेने के लिए हाथ बढ़ाया, मैने याचना के भाव से देखा, जिसका मतलब यह था कि आप मुझसे जो चाहे ले लें लेकिन यह किताब बस थोड़ी देर और मेरे पास रहने दें. मैंने किताब नहीं दी तो वे उठकर मेरी तरफ बढ़े मैं उसे पढ़ते-पढ़ते पीछे सरकने लगा. थोड़ी देर तक यह खिसकम खिसकाई चली फिर वह ठिठक गए. वह एक विरल क्षण रहा होगा. हम दोनों ने एक-दूसरे को पहचान लिया जो दरअसल उम्र में काफी फासला होने के बावजूद एक ही दुनिया के बाशिंदे थे. इत्तफाक था कि वह सुरेंद्र मोहन पाठक का उपन्यास था. वह प्रेमचंद, मुक्तिबोध, शमशेर, निराला, महादेवी, अज्ञेय या धर्मवीर भारती की भी कोई किताब हो सकती थी लेकिन उनमें तब न हम दोनों की रुचि थी न संवेदना कि उन्हें समझ सकें. यह बात अपनी जगह है कि इनमें से किसी ने जासूसी उपन्यास और क्राइम थ्रिलर नहीं लिखे जिनके जरिए हम हर कहीं अपराध की अचूक उपस्थिति, अपराधियों की पारदर्शी भूमिगत दुनिया और उन पर काबू पाने के विचित्र तरीकों जो खुद पुलिस वालों को अपराधियों में बदल देते हैं, के बारे में कोई अनुमान लगा सकें. फिर भी हम दोनों को कुछ वैसा उदात्त सा लगा जैसा शेक्सपियर, कालिदास या दोस्तोयेवस्की की रचनाओं को समझने वाले साहित्यिक लोगों को गहन विमर्श के बीच की चुप्पियों में महसूस होता है.

यह चरित्रों, उनके वर्णन की शैली और किताब में आए सभी की जिंदगियां जी लेने की असंभव इच्छा रखने वाले दो बेमेल रसिकों की साझा अनुभूति थी. इसके बाद उन्होंने मुझे जेम्स हेडली चेइज का उपन्यास ‘दुनिया मेरी जेब’ में पढ़ने को दिया. अक्सर वह किराए पर दो किताबें लाते थे, जिस किताब को नहीं पढ़ रहे होते उसे मैं चुपचाप उठाकर घरों के पिछवाड़े की ओर निकल जाता और पकड़ लिए जाने के डर से हड़बड़ी में असामान्य तेज गति से पढ़कर वापस कर देता था. गुलशन नंदा, कुश्वाहा कांत, प्यारेलाल आवारा, रानू, राजन-इकबाल सीरिज वाले सीएस बेदी, इब्ने शफी आदि को पढ़ना एकांत में प्रेमिका से मिलने जैसा असामाजिक काम था जिसका नतीजा घर वालों की नजर में मेरी पढ़ाई, जिंदगी और उनकी छद्म नैतिकता सबकुछ को तबाह कर सकता था.

इन किताबों ने रहस्यों को पचाकर भी गुमसुम बने रहने का जो आत्मविश्वास दिया उससे जल्दी ही मनोहर कहानियां और सत्यकथाएं पढ़ने का भी जुगाड़ बैठ गया. उन पत्रिकाओं के कटेंट से ज्यादा इंद्रजाल, वशीकरण, मर्दानगी, कुष्ठ रोग, बवासीर, भगंदर, कद बढ़ाने, गोरा बनाने, शराब छुड़ाने, यौन रोगों से मुक्ति दिलाने वाली दवाओं के विज्ञापन आसपास के लोगों के असल व्यक्तित्वों के बारे में बताते थे जो इन्हें वीपीपी से मंगाने के बारे में बड़ी हसरत से बात किया करते थे. वही यह भी बताते थे कि फलां की वीपीपी में कैमरे की जगह ईंट या दवाओं की जगह खड़िया का चूरा निकला, यह सब कुछ फरेब है. एक विज्ञापन जोरो शॉट रिवाल्वर का था जो जानवरों को डराने, आत्मरक्षा और नाटकों में इस्तेमाल के लिए था. साथ में 12 कारतूस मुफ्त थे, जिसे पैसे जुटा लेने के बाद भी मंगाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. तब की वीपीपी अब मुझे जिंदगी के रूपक जैसी लगती है जिसमें एेन वक्त पर ऐसा कुछ हो जाता है कि बड़ी हसरतें पूरी नहीं होतीं.

आठवीं पास कर गांव लौटने पर मैंने पाया कि लुगदी साहित्य ने मेरे एक चाचा हरिश्चंद्र ‘हरीश’ को बदल दिया है. उन्होंने अपना उपन्यास ‘प्रतिशोध की ज्वाला’ खेत रेहन रखकर छपवाया था. वे बैक कवर पर अपनी फोटो वाली किताब घर आने वाले मेहमानों को सत्कार के बाद देते थे, पुस्तक भेंट के उन तरल क्षणों में उनके प्रधान पिता उन्हें लेखक नहीं, घर फूंकने वाले लेखक की देह के खास हिस्से पर उगे उपेक्षित बालों के गुच्छे की उपाधि से विभूषित कर रहे होते थे. उनके उपन्यास की शुरुआत ही काफी अविश्वसनीय तरीके से हुई थी जिसमें घोड़े पर भागती चंबल की एक डकैत, पुलिस फायरिंग के बीच पहाड़ी से कूद जाती है और अपने पेटीकोट में फिट पैराशूट के सहारे चकमा देकर बच निकलती है. संभवतः फूलन देवी से प्रेरित वह उनकी आखिरी किताब साबित हुई. उसके बाद उन्होंने स्कूल खोला, नाटक खेले, कविताएं लिखीं और धक्के खाते हुए लगभग तबाह हुए.

मुझे अब तक कम से कम दस ऐसे लोग मिले हैं जिन्होंने ऐसे उपन्यास लिखे और उनकी जिंदगी का एकमात्र मकसद उन्हें दुनिया के सामने लाना था. ऐसे लोगों में दिल्ली सरकार का परिवहन मंत्री गोपाल राय भी शामिल हैं, जिन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में हुई एक झड़प में गोली खाने के बाद उपेक्षित हालत में गांव में रहते हुए दो रजिस्टरों में एक उपन्यास लिखा था. वे अनछपे रजिस्टर बहुत दिनों तक मेरे पास पड़े रहे. मैं मेरठ के रूढ़िवादी जाट परिवार की पांच बच्चों की उस मां के बारे में बताऊं जो अपने बड़े बेटे की उम्र के एक लड़के से प्यार करती थी, दो चोटियां बांधती थी और हमेशा गुलशन नंदा या रानू को पढ़ती रहती थी. ताश खेलना और छिप कर सिगरेट पीना उसका एक और शौक था. वह मरने के दिन तक ऐसी ही रही. उसका कहना था, अगर मैं ये नॉवेल न पढ़ती तो कब की मर गई होती. ऐसी महिलाओं की हमारे समाज में कमीं नहीं जिन्हें ये उपन्यास कल्पनाओं में मुकम्मल जिंदगी देते हैं. इन किताबों के लेखक मुझे जनता की नब्ज जानने वाले उन सांसदों जैसे लगते हैं जो जातिवाद, क्षेत्रवाद, प्रलोभन, आतंक और लोकप्रियता के घालमेल से हर बार चुनाव जीत जाते हैं और हिंदी की तथाकथित मुख्यधारा के लेखक टीवी चैनलों पर बैठे जमीन से कटे उन बौद्धिक चुनाव विश्लेषकों जैसे जो हमेशा गलत साबित होते हैं. हिंदी का औसत लेखक साल में जो न पढ़ी जा सकने लायक, अनजानी भाषा में एक-दो कहानियां लिख पाता है उससे कहीं अधिक दिलफरेब कहानियां अखबारों में हर दिन छपी मिलती हैं. उसका अपने पाठक से कनेक्ट टूट गया है इसलिए आमलोग प्रेमचंद के बाद के किसी लेखक का नाम तक नहीं जानते. लुगदी, घासलेट, अश्लील, तथाकथित मुख्यधारा ये छोटे छोटे स्टेशन हैं जो साहित्य की लंबी यात्रा में आते हैं. साहित्य निरंतर बदलते आदमी के धूसर, अज्ञात अब तक न कहे गए हिस्से को कहने की कोशिश ही तो है.

सुब्रत राय और सुप्रीम कोर्ट में ‘छत्तीस’ का आंकड़ा

subrata_roy_jpg_1424443fसहारा प्रमुख सुब्रत राय को एक बार ‌फिर सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा और उन्हें जमानत नहीं मिल सकी. सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रत राय को जमानत के लिए 5000 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी और 5000 करोड़ रुपये नकद जमा कराने के लिए कहा है.फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिलहाल बैंक गारंटी दिए बिना जमानत नहीं दी जा सकती. इसके बाद अगर वो रिहा हो जाते हैं, तो उन्हें 9 किस्तों में 18 महीने के भीतर बाकी रकम जमा करानी होगी. पहली किश्त के तौर पर तीन महीने के भीतर तीन हजार करोड़ रुपये देने होंगे, जबकि बाकी रकम आठ किस्तों में चुकाने होंगे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर राय लगातार तीन किस्तें चुकाने में नाकाम रहते हैं तो उन्हें और तिहाड़ में बंद सहारा के दो निदेशकों को हिरासत में ले लिया जाएगा.
राय को ब्याज सहित निवेशकों के 36 हजार करोड़ रुपये लौटाने को सुप्रीम कोर्ट ने कहा है. सुब्रत राय पिछले साल मार्च से तिहाड़ जेल में बंद हैं.कोर्ट ने उन्हें मार्च 2014 में निवेशकों के 24000 करोड़ रुपये लौटाने का आदेश दिया था, जिसे पूरा करने में सहारा राय नाकाम रहे. दरअसल सहारा समूह की दो कंपनियों सहारा इंडिया रियल स्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड और सहारा हाउसिंग फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड ने साल 2007-2008 के दौरान निवेशकों से 24000 करोड़ इकट्ठा किए गए थे. कोर्ट ने यह रकम सहारा को 15 फीसद ब्याज के साथ निवेशकों को लौटाने के लिए कहा था. इस तरह कोर्ट ने सुब्रत राय को निवेशकों के कुल 36000 करोड़ रुपये लौटाने के लिए निर्देश दिया है. कोर्ट ने आदेश दिया है कि जेल से रिहा होने के बाद सुब्रत राय और अन्य आरोपियों को अपना पासपोर्ट जमा कराना होगा. साथ ही कोर्ट के आदेश पर ही वे विदेश यात्रा कर सकेंगे. भारत में भी कहीं आने-जाने के लिए उन्हें पुलिस को सूचना देनी होगी. ये सब तक करना होगा जब वे बैंक‌ गारंटी जमा करेंगे.

‘जो जिया सो लिखा, हवा-हवाई कुछ नहीं’

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आपके उपन्यास  ‘वर्दी वाला गुंडा’  की आठ करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं. ये रिकॉर्ड बिक्री है. इसके बनने की प्रक्रिया क्या थी?

प्रक्रिया लंबी थी पर मैं संक्षेप में बताता हूं. मैं जिस समाज से आता हूं वहां वर्दी का खौफ हमेशा से रहा है. इसके अलावा हर रोज किसी न किसी से एक ऐसी कहानी सुनने को मिलती थी जिसमें किसी पुलिस वाले की दबंगई शामिल रहती थी. ये सारी फुटकर कहानियां दिमाग में किसी कोने में कुलबुला रही थीं. एक शाम मैं अपने दोस्त के साथ टहल रहा था, तभी देखा कि उत्तर प्रदेश पुलिस का एक वर्दीधारी सिपाही नशे में धुत चौराहे पर इधर-उधर लाठियां भांज रहा है. उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि लाठी किसके माथे पर लग रही है, किसकी कमर पर. इस सिपाही को देखकर पहली दफा मेरे मन में ख्याल आया कि ये तो वर्दी की गुंडागर्दी है और इसी से ‘वर्दी वाला गुंडा’ नाम मेरे जहन में आया. मुझे लगा कि ये रोचक नाम है और फिर मैं इस नाम से उपन्यास लिखने लगा. थोड़ा लिखने के बाद महसूस हुआ कि कहानी में अभी दम नहीं है, कहानी कमजोर है. इसी दौरान एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना में राजीव गांधी की मौत हो गई और मैंने इस घटना को भी अपने उपन्यास में शामिल किया. लोगों ने इसे बहुत पसंद किया. मुझे लगता है कि पाठकों को कथानक से ज्यादा ‘वर्दी वाला गुंडा’ नाम पसंद आया.

छोटी उम्र में ही आपके पिता जी का देहांत हो गया था. किराये के जिस घर में आप रहते थे वो एक बारिश में ढह गया. निजी जीवन में एक के बाद एक कई दुख देखे हैं, लेकिन जो आप लिखते हैं उसमें वो दुख या पीड़ा नहीं दिखती. उसमें थ्रिलर होता है, रोमांस होता है. क्या जो जीवन में भोगा उसे लिखने का ख्याल कभी नहीं आया?

ऐसा नहीं है. मैंने वही लिखा जो अपने और दूसरों के जीवन से महसूस किया. आप जिसे दुख कह रहे हैं, मैं उसे एक तरह का थ्रिल मानता हूं. अपना-अपना नजरिया है. आपने सही कहा बचपन में ही मेरे पिता जी गुजर गए थे,जब मैं दस-बारह साल का था तब बारिश में हमारा किराये का घर ढह गया था.

आज जब मैं उन घटनाओं को याद करता हूं तो खास तरह का थ्रिल महसूस करता हूं. तब दुख हुआ होगा लेकिन आज उन दुखों को याद करके कांप जाता हूं. मेरे जैसा जीवन न जाने कितने लोगों ने जिया होगा. मैंने जो भी लिखा है वो जिया हुआ यथार्थ है, हवा-हवाई कुछ भी नहीं है. मेरे जीवन में जो दुख आए उन्हीं से यह सीख मिली कि चाहे कुछ भी हो रुकना नहीं है, आगे ही बढ़ना है.

समय-समय पर कई साहित्यकारों और जानकारों ने साहित्य को परिभाषित किया है. आपकी दृष्टि  में साहित्य के क्या मायने हैं? आपके विचार से साहित्य क्या है या किसे कहना चाहिए?

हमारे सामने ‘साहित्य’ की कई परिभाषाएं हैं. मैंने भी साहित्य की कई परिभाषाएं देखी-सुनी हैं, लेकिन इन सब में जो मुझे याद है या जिस परिभाषा से मेरी सहमति है वो है- साहित्य समाज का दर्पण है. मैं इस एक पंक्ति से ही साहित्य को समझता हूं. हालांकि हम जो लिखते हैं उसे कई लोग साहित्य न कहकर ‘लुगदी साहित्य’ कहते हैं जबकि हम वही लिखते हैं जो समाज में चल रहा होता है. हम समाज से ही कहानियां लेते हैं. हां, इन कहानियों में हम अपनी कल्पना जरूर डालते हैं. ‘वर्दी वाला गुंडा’ में उसी तरह की पुलिसवालों का जिक्र है जैसे हमारे बीच होते हैं.

जब मैंने देखा कि दहेज के लिए लड़कियों को जलाया जा रहा है, प्रताड़ित किया जा रहा है तो मैंने ‘बहू मांगे इंसाफ’ लिखी. इस उपन्यास को भी पाठकों ने बहुत पसंद किया. कई हजार पत्र मिले. थोड़े दिनों बाद मैंने ऐसी कई कहानियां सुनी जिसमें कुछेक परिवारों पर दहेज के फर्जी मामले दर्ज करा दिए गए थे. तब मैंने ‘दुल्हन मांगे दहेज’ लिखी. पाठकों ने इसे भी खूब सराहा. मेरे विचार से हम समाज से कहानियां लेते हैं और उसे आसान और रोचक तरीके से समाज को वापस करते हैं. अगर इसे कोई व्यक्ति साहित्य नहीं मानता है तो न माने, उसकी मर्जी है. मुझे केवल उन पाठकों से मतलब है जिन्होंने हर एक उपन्यास के बाद मुझे झोले भर-भर के पत्र लिखे हैं.

आखिर वे कौन लोग हैं जो तय करते हैं कि कौन-सा उपन्यास  ‘लुगदी साहित्य’  है और कौन-सा  ‘वास्तविक साहित्य’  है? क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति या ऐसी किसी संस्था को जानते या मानते हैं?

(हंसते हुए) पचास साल उम्र हो गई है. लंबे वक्त से लिख भी रहा हूं. पाठकों का प्यार भी मिलता है लेकिन आजतक मैं ऐसे किसी व्यक्ति या ऐसी किसी संस्था को नहीं जान पाया हूं. जब जानता ही नहीं हूं तो मानने का सवाल कहां उठता है. हां, मैं अपने उन असंख्य पाठकों को जानता हूं जिनसे मुझे हर रोज मरते दम तक लिखते रहने की प्रेरणा मिलती है. जिसकी जो मर्जी हो कहता रहे, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मुझे ऐसे किसी कथित साहित्यिक उपन्यास का लेखक बनना पसंद नहीं, जिसकी पांच सौ या हजार प्रतियां छपें और वो भी लाइब्रेरी के शेल्फ में जाकर कैद हो जाए. मैं अपने पाठकों के बीच रहना चाहता हूं और इसी से मुझे खुशी मिलती है. वैसे तो मैं इन चीजों के बारे में कभी कुछ सोचता नहीं हूं लेकिन कभी-कभी दुख होता है कि बिना पढ़े ही किसी किताब को ‘लुगदी  साहित्य’ बता दिया जाता है. किसी भी किताब को अच्छा या बुरा कहने से पहले उसे पढ़ना चाहिए. किसी किताब का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि वो किस तरह के कागज पर छप रही है.

साहित्य रचनाओं के लिए कई सम्मान मिलते हैं, सभा-गोष्ठियां होती हैं. इन सम्मानों के बारे में क्या सोचते हैं? क्या कभी इच्छा नहीं हुई कि आपको साहित्य के मंच से सम्मान मिले?

सच कहूं तो कभी भी नहीं. एक पल के लिए भी नहीं. कभी खयाल नहीं आया कि मुझे किसी मंच से कोई सम्मान मिलेगा भी या नहीं. शायद इसके पीछे वजह यह थी कि मैं शुरू से ही जानता था कि ऐसा कभी होगा नहीं. दूसरी बात कि मंच से मिलने वाला शॉल या कोई सम्मान उतना बड़ा नहीं हो सकता जो मुझे पाठकों से मिला है. पाठकों से जो प्रेम और सम्मान मुझे मिला है या जो अभी भी मिल रहा है वो ऐसे कई सम्मानों से कई गुना ज्यादा बड़ा है और मेरे लिए महत्वपूर्ण भी है. अपने जीवन की सबसे यादगार घटना सुनाता हूं. ‘वर्दी वाला गुंडा’ तब बाजार में आ चुका था. मैं अपने चार बच्चों और पत्नी के साथ ट्रेन से दार्जिलिंग जा रहा था. हमारी चार बर्थ को छोड़कर हर बर्थ पर लोग ‘वर्दी वाला गुंडा’ ही पढ़ रहे थे. बच्चे छोटे थे तो वो शोर मचाने लगे कि पापा-पापा आपकी किताब. बड़ी मुश्किल से मैंने उन्हें चुप करवाया और ऊपर वाली सीट पर कंबल डालकर सो गया. आप कल्पना कीजिए कि मुझे उस वक्त कैसा लगा होगा. उस वक्त जो खुशी मुझे मिली वो ऐसे किसी भी सम्मान से बहुत बड़ी थी.

हिंदी साहित्य में क्या-क्या पढ़ा है? खासकर यदि अपने समकालीन  साहित्यकारों का कुछ पढ़ा हो तो बताएं?

मैंने प्रेमचंद का पूरा काम पढ़ा है. आज भी जब मन कई बार थकता है तो मैं उन्हें ही पढ़ता हूं. बाकी अपने समकालीनों में से किसी को नहीं पढ़ा. अगर कभी कोई किताब उठाई भी तो बहुत बोरियत हुई. कई किताबें तो ऐसी हैं कि अगर उनमें से देह, बिस्तर और सेक्स निकाल दीजिए तो कुछ बचेगा ही नहीं. सेक्स के बाहर भी एक दुनिया है. एक बहुत बड़े लेखक हैं, नाम नहीं लेना चाहूंगा. उनका एक कहानी संग्रह ‘जन्नत’ पढ़ने बैठा. बाप रे बाप! हर पन्ने पर सेक्स, हर पन्ने पर बिस्तर! इसके अलावा कुछ है ही नहीं. ऐसे शब्द और ऐसे चित्रण हैं कि मैं बता भी नहीं सकता. सेक्स पर लिखने या बात करने से मुझे कोई गुरेज नहीं लेकिन हम इसे कितना और कैसे लिखें इसकी एक सीमा तो तय होनी ही चाहिए न? एक किताब में कहानी के हिसाब से बिस्तर या बेडरूम का जिक्र हो सकता है लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए कि केवल यही हो और कहानी कुछ हो ही नहीं. ईमानदारी से कहूं तो मैंने अपने समकालीन हिंदी साहित्यकारों को बहुत पढ़ा नहीं है और ऐसा न कर पाने का कोई अफसोस भी नहीं है.

तन-बदन सुलगाने वाले उपन्यास

50-1सवाल: रहस्य व रोमांच के धागे, कलम रूपी सुई में पिरोकर रोचक व तेज रफ्तार वाले कथानक का ‘ताना-बाना’ बुनने वाले केशव पंडित के थ्रिलर, सस्पेंस और रोमांस से फुल हाहाकारी उपन्यास सबसे ज्यादा क्यों पढ़े जाते हैं?

जवाव: ये उस दूल्हे से पूछिए, जो ‘सुहाग-सेज’ पर बैठी दुल्हन को भुलाकर पहले केशव पंडित के उपन्यास को पढ़ता है तथा फिर उसी उपन्यास को ‘मुंह दिखाई’ में अपनी दुल्हन को भेंट कर देता है!

माफ कीजिएगा यह मेरा सवाल-जवाब नहीं है. यह तो प्रोमो है… प्रोमो है केशव पंडित के आने वाले हाहाकारी उपन्यास का. ऐसा हाहाकारी उपन्यास जो आपके तन, बदन और मन तीनों को सुलगा कर रख देगा. अब जरा इस तरह के अन्य प्रलयंकारी उपन्यासों के नामों पर एक नजर डालिए – जूता करेगा राज, खून से सनी वर्दी, कानून किसी का बाप नहीं, सोलह साल का हिटलर, धमाका करेगी रोटी, लाश पर सजा तिरंगा, खून बहा दे लाल मेरे, शेर के औलाद, तबाही मचाएगी विधवा, नागिन मांगे दूध, चींटी लड़ेगी हाथी से, पगली माई बोले जयहिंद, लड़ेगा भाई भगवान से, अंधा वकील गूंगा गवाह, गंगा बहेगी अदालत में, जूता ऊंचा रहे हमारा, तू पंडित मैं कसाई, बालम का चक्रव्यूह, झटका 440 वोल्ट का, बारात जाएगी पाकिस्तान, कातिल मिलेगा माचिस में, दहेज में रिवाल्वर… और भी कई अगड़म-बगड़म नाम इसमें शुमार हैं.

जवान हो रहा था. स्कूलिया साहित्य से मन ऊब सा गया था. सुभद्रा कुमारी चौहान के वीर रस की कविताओं का रस भी सूख सा गया था. सिलेबस की किताबें काटने को दौड़ती थीं. तब इन्हीं लुगदी कागज पर लिखे जाने वाले साहित्यों ने मुझे बचाया था. कहने का मतलब पढ़ने में मेरी रुचि को बचाए रखा था. ये अगड़म-बगड़म नहीं होते तो आज मैं भी वो नहीं होता जो आज हूं. और भी अच्छा हो सकता था या और भी बुरा. बाद वाले की संभावना ज्यादा थी. उस वक्त दिल को दो ही लोग सुकून देते थे. मिथुन चक्रवर्ती और वेदप्रकाश शर्मा. इन घासलेटी साहित्य से अपना दिल कुछ ऐसा लगा कि परिवार और समाज ने ‘आवारा’ का तगमा तक दे दिया. पिताजी विद्यापति, प्रेमचंद और नागार्जुन से जितना प्यार करते थे उससे कई गुना ज्यादा मेरे आदर्श वेदप्रकाश शर्मा, रानू, कुशवाहा कांत या फिर गुलशन नंदा से नफरत. देश में जिस वक्त रामायण, महाभारत जैसे सीरियल सड़कों को वीरान बना रहे थे, ठीक उसी समय ‘वो साला खद्दरवाला’ मेरे अंदर बैठे विद्रोही को सुलगा रहा था. टेलीविजन पर रामायण शुरू होते ही लोग उससे चिपक जाते थे और मैं अपने घासलेटी साहित्य से. शायद यही कारण रहा हो कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम या फिर धर्म राज के जगह मेरा आदर्श कर्नल रंजीत बना. कर्नल रंजीत जिसके पास दुनिया के हर समस्या का समाधान था. जो साइंटिफिक तरीके से सोचता था. कमाल तो भगवान राम भी करते थे. लेकिन उनके चमत्कार में मेरे ‘कैसे?’ का जवाब नहीं होता था. वहीं रंजीत के हर कमाल का साइंटिफिक एक्सप्लेनेशन होता था. फिर चाहे वो सिगरेट के राख से कातिल को पकड़ना हो या डीएनए टेस्ट से मरने वाले के बारे में पता लगा लेना. उन अगड़म-बगड़म कहानियों के खलनायकों के नाम भी मुझे खासे आकर्षित करते थे. मसलन ‘चक्रम’, ‘अल्फांजो’, ‘जम्बो’, ‘गोगा’, ‘टिंबकटू’, ‘कोबरा’ आदि आदि. कहानियों को लिखने का अंदाज इतना निराला होता था कि पाठक उसे पढ़ते वक्त सिर्फ और सिर्फ उसी के होकर रह जाते थे. कुछ-कुछ वैसा ही कंसंट्रेशन (एकाग्रता) जैसे वाल्मिकी या दुर्वाशा का तपस्या करते वक्त रहा होगा. संवाद ऐसे जीवंत और फिसलते हुए कि सिनेमा या सीरियल के बड़े-बड़े उस्ताद स्क्रिप्ट राइटर, कथाकार के शागिर्द बनने को मचल उठते थे. लेखन कौशल की कुछ बानगी आप भी देखिए-

‘एक सिगरेट होठों के बीच दबाने पर उसने माचिस से एक तिली निकाल कर मसाले पर उसके सिर को रगड़ा. चट… की आवाज के साथ तिली जली- लेकिन बारिश की आवाज, बादलों की गरज और बिजली की कड़क में दबकर रह गई.’

‘उसने सिगरेट में कश लगाकर कसैले धुएं की बौछार नैना के चेहरे पर छोड़ी तथा पान का पीक जमीन पर थूका. नैना चीख पड़ी. उसने नैना की दोनों कलाइयों को आपस में मिलाकर दाहिने हाथ से पकड़ ली और बायीं हथेली को उसके होंठ पर प्रेशर कुकर के ढक्कन की मानिन्द ही चिपका दिया.’

सौंदर्य बोध की भी इन लेखकों में कोई कमी नहीं होती है. और उपमा-अलंकार में तो कोई कंजूसी करते ही नहीं-

‘मैं डिटेक्टिव एजेंसी खोलना चाहती हूं केशव… ओनली फॉर लेडीज… चारमीनार की सिगरेट गुलाबी होंठों के करीब पहुंची ही थी कि झील-सी नीली आंखों वाले केशव ने हाथ को नीचे करके सिगरेट को ऐश-ट्रे में डाल दिया और मुस्कुराते हुए सोफिया को देखने लगा. कोई उन्तीस वर्षीय सोफिया. बला की खूबसूरत अप्सरा सी. रंग ऐसा कि मानो चांदी के कटोरे में भरे दूध में गुलाब की पंखुड़ियों को घोल दिया गया हो. आंखें ऐसी की मानो कांच की बड़ी प्यालियों में शराब डालकर उनमें हरे रंग के जगमगाते हीरे डाल दिए गए हों. मोतियों से सफेद व दमकते दांत तथा पतले-पतले, नाजुक, गुलाबी व रसीले होंठ. सुनहरे रंग के घने व लंबे केश. लंबे कद वाला जिस्म- मानो ऊपर वाले ने मोम को अपने हाथों में सजा-संवारकर उसमें प्राण फूंक दिए हों…’ बाप रे बाप….

इन उपन्यासों को लिखने वाले प्रमुख लेखकों में वेदप्रकाश शर्मा, रानू, कुशवाहा कांत, गुलशन नंदा, केशव पंडित आदि हैं. लेकिन इनमें भी वेदप्रकाश शर्मा ने सबसे ज्यादा नामवरी और धन दोनों कमाया. वेदप्रकाश शर्मा जिसे हिंदी साहित्यकारों की बिरादरी लेखक भी शायद ही माने कि उनकी रचनाओं ने निर्मल वर्मा, कमलेश्वर या राजेंद्र यादव जैसे दिग्गजों को काफी पीछे छोड़ दिया है. मेरठ के वेदप्रकाश 2005 में अपनी उम्र के पचास साल पूरे होने के मौके पर एक विशेषांक ‘काला अंग्रेज’ लिखा, जो उनका 150वां उपन्यास था. शर्मा पिछले बीस साल से सबसे बिकाऊ लेखक हैं. उनका सबसे ज्यादा बिकने वाला उपन्यास ‘वर्दी वाला गुंडा’ था जिसकी करीब 8 करोड़ प्रतियां बिकीं. उनके दूसरे उपन्यास भी औसतन 4 लाख बिक जाते हैं. शर्मा के उपन्यास पर फिल्म- ‘बहू मांगे इंसाफ’ बनी जिसमें दहेज की समस्या को नए कोण से उठाया था. इसके अलावा उनके उपन्यास ‘लल्लू’ पर ‘सबसे बड़ा खिलाड़ी’ और ‘सुहाग से बड़ा’ पर ‘इंटरनेशनल खिलाड़ी’ बन चुकी हैं. अब हैरी बावेजा ‘कारीगर’ बना रहे हैं, वहीं ‘कानून का बेटा’ पर भी एक फिल्म बनाई जा रही है. इनकी पटकथाएं भी शर्मा लिख रहे हैं. इन उपन्यासों के लेखकों के हिसाब से उनका पात्र भी यूनिक होता है और उनकी पसंद भी. मसलन सुरेंद्र मोहन पाठक के हीरो सुनील और विमल महंगे ‘डनहिल’ या ‘लकी स्ट्राइक’ सिगरेट का ही कश लेगा. वहीं केशव पंडित के कहानियों का हीरो केशव मुफलिसी में जीता है और सस्ते ‘चारमीनार’ को धूककर ही संतुष्ट दिखता है. इसी प्रकार सुरेंद्र मोहन पाठक के ‘ब्लास्ट’ अखबार का रिपोर्टर सुनील जिस होटल या रेस्तरां में जाता था घटना या दुर्घटना भी वहीं होती थी.

लगभग हरेक उपन्यास के पीछे लेखक के आगामी उपन्यास का टीजर जरूर छपता है. इन टीजरों को इतने आकर्षक ढंग से लिखा जाता है कि पाठक अगले उपन्यास को खरीदने को मजबूर सा हो जाता है. इसकी भी एक बानगी पढ़िए…

‘इस बार दिमाग के जादूगर इंस्पेक्टर विजय की टक्कर अपनी ही बीवी सोफिया से हो रही है.’,

‘मुजरिमों को तिगनी का नाच नचाने वोले केशव  पंडित का दिमाग अपना चमत्कार दिखला पाएगा या सिर्फ घूमकर ही रह जाएगा?’, ‘बिल्कुल नई थीम’ नए ‘आइडिया’ पर लिखा गया बेहद रोचक, तेज रफ्तार और सस्पेंस से भरपूर उपन्यास, जो आपके धैर्य की भरपूर परीक्षा लेगा!’

इन उपन्यासों को गौर से पढ़ने पर एक दिलचस्प बात यह सामने आई कि लगभग सभी प्रकाशक मेरठ के ही हैं. यह भी एक शोध का विषय हो सकता है. उपन्यास के पीछे या बीच में छपे विज्ञापन भी काफी मनोरंजक होते है और प्राय: एक ही तरह के होते हैं. मसलन-

जोरो शाॅट रिवाल्वर- जानवरों को डराने के लिए, आत्मरक्षा और नाटकों के लिए. रिवाल्वर के साथ बारह कारतूस मुफ्त में प्राप्त करें.’ या ‘मात्र 30 दिनों में अंग्रेज़ी सीखें’ यह भी देखने में आता है कि इस तरह के उपन्यास बस स्टैंड या रेलवे स्टेशनों पर ही ज्यादा बिकते हैं. इसका भी मनोवैज्ञानिक विश्लेषण होना चाहिए.

हिंदी की ऐसी हल्की-फुल्की, मनोरंजक किताबें हाथों हाथ बिकती हैं जिन्हें साहित्य की श्रेणी में रखने में भी शायद आलोचकों को झिझक हो. अब आलोचकों को यह तथ्य स्वीकार कर लेना चाहिए कि मनोरंजक पुस्तक लोकप्रिय होते हैं. अब यह समय आ गया है कि गंभीर साहित्य लिखने का तरीका भी बदले ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को आकर्षित किया जा सके. अगर गंभीर साहित्य लिखने वाले लोग वेद प्रकाश शर्मा या सुरेंद्र मोहन पाठक के उपन्यास पढ़ लें, तो वे भी सोचने को मजबूर हो जाएंगे कि वे क्यों पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं. निजी तौर पर कहूं तो मैंने सभी तरह की किताबें पढ़ी हैं. उन लेखकों में मुंशी प्रेमचंद भी हैं और वेदप्रकाश शर्मा भी. अपने-अपने क्षेत्र में दोनों ही महान हैं. दोनों का अपना अलग मुकाम है. आप उनकी तुलना कैसे कर सकते हैं, क्या केएल सहगल भांगड़ा या रॉक संगीत गा सकते हैं? वही बात इन दोनों लेखकों की भी है. आप क्या सोचते हैं..?

‘मजेदार कथानक साहित्य होता है’

Minakshi Thakurदेश के बड़े हिंदी प्रकाशन समूह अब भी लोकप्रिय साहित्य प्रकाशित करना  ‘टैबू’  (वर्जित कार्य) समझते हैं ऐसे में हार्पर कॉलिंस की ओर से लुगदी साहित्य प्रकाशित करने की कोई खास वजह?

देश का कोई भी प्रकाशक जबरदस्त कहानी ही तो ढूंढता है और हिंदी अपराध लेखन में सुरेंद्र मोहन पाठक (सुमोपा) से जबरदस्त कोई नाम नहीं. हिंदी में पॉकेट बुक प्रकाशन और लुगदी साहित्य का कल्चर था इसलिए बड़े हिंदी प्रकाशक ‘सुमोपा’ जैसे लेखकों को नहीं छापते थे. इसे लेकर एक किस्म की स्नॉबरी (दंभ) भी था. हम अपराध लेखन को मुख्यधारा में ले आए. मैं खुद सुरेंद्र मोहन पाठक के शिल्प की मुरीद हूं. मजेदार कथानक साहित्य होता है, न कि लुगदी साहित्य या उच्च साहित्य. अब तक हमने उनके तीन उपन्यास प्रकाशित किए हैं और पिछले डेढ़ साल में इनकी लगभग 30-30 हजार प्रतियां बेच चुके हैं.

फिर भी सुरेंद्र मोहन पाठक ही क्यों?

आप उनसे मिलें, अपराध लेखन, अन्य साहित्य के बारे में या फिर सिर्फ जीवन के बारे में ही बात कीजिए, आप खुद जान जाएंगी कि वो हमारे वक्त के खास लेखक हैं जिन्हें हम सब के बीच होना चाहिए, जिनकी किताबें घर-घर पहुंचनी चाहिए. वे ‘मासेस’ (आम जनता) के लेखक हैं और जल्द ही ‘क्लासेज’ (वर्ग विशेष) के लेखक भी बन जाएंगे. उनकी किसी किताब पर किसी ने अब तक फिल्म नहीं बनाई है पर अगर कोई अक्षय कुमार या सलमान खान को लेकर फिल्म बनाता तो बॉक्स ऑफिस पर बेहद सफल रहती.

उनकी किताबों का फीडबैक कैसा रहा?

दोनों उपन्यासों की लगभग तीस हजार कॉपी बिक चुकी हैं और अब भी बिक ही रही हैं.

‘कोलाबा कांस्पीरेसी’  का अंग्रेजी अनुवाद भी आया है, क्या उम्मीद है कि अंग्रेजी के पाठक इसे किस तरह लेंगे?

हमने इस महीने बाजार में अंग्रेजी की 5000 प्रतियां भेजी हैं. अभी तक तो अच्छा चल रहा है, आगे देखते हैं कि कितने अंग्रेजीदां कन्वर्ट होते हैं. वैसे ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट ‘अमेजन’ पर हिंदी संस्करण पिछले वर्ष की सबसे सफल किताबों में से एक था.

क्या किसी अन्य हिंदी रचना (विशेषकर पल्प फिक्शन) का भी अंग्रेजी अनुवाद करवाया जा रहा है? 

हमने पहले भी इब्ने सफी के 15 उपन्यास प्रकाशित किए थे. और कई किताबों के अनुवाद पर भी काम चल रहा है. ये खासकर ‘न्यूजहंट’ (मोबाइल एप) पर बहुत अच्छी बिकती हैं.

आपने पहले कहीं बताया था कि आपको हिंदी किताबों के डिस्ट्रीब्यूशन में काफी परेशानी हुई जबकि अन्य प्रकाशकों के अनुसार हिंदी के पाठकों तक पहुंचना आसान है. क्या आपको लगता है कि आप आमजन तक पहुंचने में चूक रहे हैं?

जो कह रहे हैं कि हिंदी पाठकों तक पहुंचना आसान है उनका या तो खुद का डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क है या फिर उन्हें असली पाठक की कोई फिक्र ही नहीं है, उनका काम लाइब्रेरी के आॅर्डर से चल जाता है. पिछले दस सालों में तो कम से कम हिंदी डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क में कोई सुधार नहीं हुआ है. फिर कुछ किताबें हैं जो अपने दम पर चल जाती हैं, पाठक उनको ढूंढते हुए दुकानों तक आ जाते हैं तो डिस्ट्रीब्यूटर खुद किताबें उपलब्ध करवाने लगते हैं. हमारे यहां ऐसा पाठक की किताबों, पाउलो कोएल्हो के अनुवाद, अरविंद केजरीवाल की ‘स्वराज’ आदि के साथ हुआ है.

लोकप्रिय है, लुगदी नहीं

लोकप्रिय साहित्य को लुगदी साहित्य कहना ठीक नहीं है क्योंकि साहित्य के नाम जो कुछ परोसा जा रहा है, उसमें से बहुत कुछ ऐसा है जो लुगदी की तुलना में बहुत ही खराब और बेहद गिरा हुआ है. लोकप्रियता अगर किसी चीज के अच्छे होने का प्रमाण नहीं है तो लोकप्रिय होते ही कोई चीज खराब नहीं हो जाती है. मैं अपनी बात करूं तो मैंने छठी, सातवीं और आठवीं कक्षा की गर्मी की छुट्टियों में शरतचंद्र की ‘गृहदाह’, ‘शेष प्रश्न’, ‘चरित्रहीन’, ‘देवदास’ आदि पढ़ी. रवींद्रनाथ की ‘गोरा’, रांघेय राघव की ‘कब तक पुकारूं?’ गुलशन नंदा की ‘मैं अकेली’, ‘काली घटा’, ‘माधवी’, ‘घाट का पत्थर’, ‘पत्थर के होंठ’ आदि पढ़ डाली. कक्षा नौ में मैंने गुलशन नंदा की ‘कलंकिनी’ पढ़ी. मैं अब जब गुलशन नंदा के लेखन का मूल्यांकन करूं तो मुझे उनका लेखन ‘लाइट रीडिंग’ लगता है. लाइट रीडिंग से मेरा आशय भावनात्मक विषयों से है. ये साहित्य हल्के मनोभाव से पढ़े जाते हैं लेकिन असर लंबे समय तक पड़ता है. ये साहित्य किशोरावस्था से युवावस्था में प्रवेश करने की उम्र में पढ़े जाते हैं. इससे भावनात्मक मनोभूमि का निर्माण होता है.

शरतचंद्र की ‘गृहदाह’ और ‘चरित्रहीन’ में जो पात्र हैं, उनके उपन्यास में जो घर और पारिवारिक परिवेश दर्शाए गए हैं, वे यथार्थ जीवन से आते हैं. वहीं गुलशन नंदा ने अपने उपन्यासों में यथार्थ दिखाने की जगह आदर्श व भावनात्मक मूल्यों को दिखाने की कोशिश की. वे इन्हें मोहब्बत की दास्तान कहते हैं. मोहब्बत की दास्तान कहना भी उतना ही जरूरी है जितना यथार्थ की कहानी. जीवन के लिए दाल-रोटी कमाना और हल जोतना ही सिर्फ जरूरी नहीं है. जीवन को प्रेम की, भावना की भी बहुत जरूरत है. मेरे कहने का मतलब यह है कि जीवन का यथार्थ या जीवन से जुड़ी भावना केवल गंभीर साहित्य में है, वहां नहीं है ऐसा कहना ठीक नहीं.

मैंने लाइट रीडिंग की बात की है. मोहब्बत में पड़ गए. एक-दूसरे के लिए जीने-मरने लगे, ऐसी बातों के बगैर जीवन नहीं ठहरता लेकिन यह उदात्त है. ऐसी भावनागत बातें हमें दूसरी दुनिया में जीना सिखाता है. आज साहित्य के नाम पर बहुत अश्लील लिखा जा रहा है. 30-40 साल पहले गुलशन नंदा का उपन्यास ‘कलंकिनी’ आया था. यह इनसेस्ट (कुटुंब व्यभिचार) की कहानी है. यह चाचा द्वारा एक भतीजी को प्रताड़ित करने की कहानी है. उनकी ‘काली घटा’ में एयर होस्टेज की कहानी है. 1970-80 के दशक के जटिल मुद्दे उनके उपन्यासों के विषय बनाए गए. उन मुद्दों को वे प्रेम कहानियों के जरिए पाठकों तक पहुंचाते थे. उनके उपन्यासों के कथानकों का मूल्यांकन प्रेम कथानकों की तरह होना चाहिए. मुझे दुख है कि वे आज पूरी तरह से भुला दिए गए हैं. उनके उपन्यास बाजार में अब मिलते ही नहीं. यह भी दुखद है कि अश्लील साहित्य के बारे में बात करते हुए अक्सर गुलशन नंदा को मुहावरों की तरह इस्तेमाल में लाया जाता है. मैं जोर देकर कहना चाहूंगी कि गुलशन नंदा का साहित्य कहीं से भी अश्लील नहीं है. मैंने उन्हें छोटी उम्र में पढ़ा और मेरा मानना है कि छोटी उम्र में अश्लील बातों को लेकर ज्यादा दिक्कत महसूस होती है. मैं जब गुलशन नंदा को पढ़ रही थी तब प्रेमचंद और शरतचंद को भी पढ़ रही थी और मुझे उनकी रचनाओं में कहीं भी अश्लीलता नजर नहीं आई. गुलशन नंदा के उपन्यासों के पात्र करोड़पति नहीं थे. वे सामान्य जीवन के ही किरदार थे. उनके कथानकों में विधवा विवाह, बाल विवाह, नशाखोरी जैसे सवालों को शामिल किया गया. कोई किशोरवय जब युवावस्था में प्रवेश कर रहा होता है तब उसे इस तरह की साहित्य की दरकार होती है. ऐसा साहित्य इस उम्र में उदात्त प्रवृत्तियों की ओर प्रवृत्त करता है.

हिन्द पॉकेट बुक्स उन दिनों घरेलू लाइब्रेरी योजना चलाती थी जिसके अन्तर्गत सोलह रुपये में हर महीने छह किताबें पढ़ने को मिलती थीं. मैंने इस योजना के अन्तर्गत बहुत सारी किताबें पढ़ीं. अब इस तरह की कोई योजना नहीं चलाई जाती है. शिवानी हमारी प््रिय लेखिका हैं जिनकी हमने ‘कृष्णकली’, ‘शमशान चंपा’, ‘चौदह फेरे’, ‘भैरवी’ आदि पढ़ी हैं. वे जाति धर्म के राजनीतिक प्रश्न नहीं उठाती हैं तो क्या? मगर उन्होंने हमारा सिर्फ हिंदी भाषा से परिचय कराया उसकी तुलना बाणभट्ट की कादम्बरी से की जा सकती है. संस्कृतनिष्ठ भाषा के बावजूद आमजन उनकी किताबें बुक स्टाल से खरीदकर पढ़ता रहा. मूल प्रश्न यह है कि क्या अच्छा साहित्य है क्या लुगदी, इसका निर्णय कौन करेगा? साहित्य वही है जो पाठक के दिल में बसे. साहित्य के नाम पर ‘हंस’ या और दूसरी पत्रिकाओं में प्रेम के नाम पर कहानियां छापी गई हैं, वे मोहब्बत से दूर, पूरी तरह वीभत्सता का नमूना हैं. इस तरह की वीभत्स कहानियों को इसलिए कहानियों का दर्जा मिल जाता है क्योंकि वे हंस या ऐसी ही किसी साहित्यिक पत्रिकाओं में छप जाती हैं. यह बिल्कुल गलत धारणा है कि जो रचना साहित्यिक पत्रिका में छप गई और लोकप्रिय नहीं हुई, इसलिए अच्छी हैं. और कोई दूसरी रचना साहित्यिक पत्रिकाओं में नहीं छपी और पॉकेट बुक्स में छपकर लोकप्रिय हो गईं, इसलिए साहित्य नहीं, लुगदी है.

                                             स्वतंत्र मिश्र से बातचीत पर आधारित

‘साहित्य में तुम मेरी पीठ खुजाओ, मैं तुम्हारी खुजाता हूं… बेहद आम बात हैै’

surindr mohan

आपने एक साक्षात्कार में बताया था कि उर्दू और बंग्ला के साहित्यकारों ने आपको ज्यादा छुआ. हिंदी में सभी को आजमाया लेकिन जो तृप्ति उर्दू या बंग्ला के लेखकों को पढ़कर हुई वो हिंदी वालों को पढ़कर नहीं हुई. क्या हिंदी की किसी एक किताब ने भी प्रभावित नहीं किया?

नहीं, मैंने यह कभी नहीं कहा कि हिंदी के लेखक अच्छे नहीं हैं, प्रतिभासंपन्न नहीं है. भैरव प्रसाद गुप्त, इलाचंद्र जोशी, उपेंद्रनाथ अश्क, मनोहर श्याम जोशी, श्रीलाल शुक्ल और अमृतलाल नागर जैसे कितने ही लेखकों को मैंने अपनी कम उम्र में पढ़ा और सराहा. मैंने वस्तुत: यह कहा था कि मेरे खुद के लेखन और उसकी किस्म के मद्देनजर हिंदी का कोई लेखक मेरा प्रेरणास्रोत नहीं बन सका. ये मेरी व्यक्तिगत समस्या है, इसके अलावा कुछ नहीं.

अगर बात को थोड़ा और विस्तार दूं तो मेरे मन में कभी अभिलाषा ही नहीं जगी कि मैं फलां हिंदी लेखक जैसा बन सकूं और उस जैसा लिखकर, वैसी ख्याति अर्जित करूं. लेकिन कृश्न चंदर जैसा अल्फाज का जादूगर बनने की अभिलाषा हमेशा रही. इस्मत चुगताई जैसा किस्सागो बनने की मैंने हमेशा कोशिश की. मंटो की तरह सब्जेक्ट पर तीखी पकड़ हासिल करने का ख्वाब हमेशा देखा. ताराशंकर बंदोपाध्याय जैसा रचनाशिल्पी बन पाने की हसरत दिल में हमेशा रही. अपने 55 वर्षीय लेखन काल में मैं इन लेखकों की परछाई भी नहीं बन सका लेकिन उनकी हस्ती से, उनकी हैसियत से मैं निरंतर प्रेरणा पाता रहा हूं. हिंदी की बहुत सी किताबों ने मुझे बहुत बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है.

रागदरबारी (श्रीलाल शुक्ल), बूंद और समुद्र (अमृतलाल नागर), गिरती दीवारें (उपेंद्रनाथ अश्क), कुरु कुरु स्वाहा (मनोहर श्याम जोशी), गुनाहों के देवता (धर्मवीर भारती) जैसे कई उपन्यासों को मैंने बहुत चाव से पढ़ा है. लेकिन कृश्न चंदर, इस्मत चुगताई, राजेंद्र सिंह बेदी, ख्वाजा अहमद अब्बास, वाजिद तबस्सुम, सआदत हसन मंटो, अहमद नदीम कासमी की रचनाओं को कई-कई बार टेक्स्ट बुक की तरह पढ़ा. इस तरह से मैं हिंदी के दिग्गज लेखकों को भी न पढ़ सका. हिंदी के कुछेक लेखकों को छोड़कर, जिनमें से कुछ के नाम मैंने पहले बताए. ज्यादातर हिंदी साहित्यकारों को पढ़कर कई बार ऐसा लगा कि जैसे मैं कहानी, उपन्यास, आत्मकथा और रिपोर्ताज की जगह केवल भाषा पढ़ रहा हूं. उर्दू और बंगाली लेखकों के साथ कभी मैंने ऐसा महसूस नहीं किया.

गंभीर साहित्य सृजन के बजाए लोकप्रिय साहित्य सृजन में हाथ आजमाने का फैसला क्यों किया?

मेरा शुरुआती रुझान गंभीर साहित्य में ही बना था और तब साठ के दशक की शुरुआत में मेरी कुछ कहानियां नई सदी, निहारिका, मनोहर कहानियां, मेनका, चित्रलेखा वगैरह में छपी थीं, लेकिन लोकप्रिय लेखन की कशिश ने जल्दी ही मुझे अपने शिकंजे में जकड़ लिया था. लोकप्रिय साहित्य के पाठक शुरू से ही बहुत ज्यादा रहे हैं. इस विधा का कोई लेखक उनकी उम्मीदों पर खड़ा उतरकर दिखाए तो उसकी तरक्की की रफ्तार बहुत  होती है. इस प्रलोभन ने मुझे भी चुंबक की तरह अपनी तरफ खींचा फिर मैं मिस्ट्री राइटर बन गया, मकबूल मिस्ट्री राइटर. दूसरा प्रलोभन पैसा था जिसे आसानी से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था. इस संदर्भ में मैं अमेरिकी लेखक सैमुअल जॉनसन द्वारा कही गई एक पंक्ति का जिक्र करना चाहूंगा. जॉनसन कहते हैं, ‘कोई मूर्ख ही होगा जो बिना पैसे की उम्मीद के लिखता होगा.’ मेरे खयाल से पैसा किसी को नहीं काटता. हर कोई पैसा चाहता है. लेखक कैसा भी हो, किसी भी विधा का हो, हर कोई पैसे का तमन्नाई है. हर लेखक लोकप्रिय होना चाहता है क्यों भला? क्योंकि लोकप्रियता, मुद्राप्राप्ति का भी माध्यम है. लोकप्रियता के पीछे-पीछे ही पैसा चलता है बल्कि एक हद के बाद तो पैसा आगे-आगे चलने लगता है. कोई अपनी जुबानी कबूल करे न करे लेकिन सच्चाई तो यह है कि हर लेखक अपने लेखन से अर्थोपार्जन का अभिलाषी है. स्वान्त: सुखाय के लिए कोई नहीं लिखता, हर लेखक पैसे के लिए लिखता है.

अगर ऐसा न हो तो क्यों लेखक और प्रकाशक के बीच रॉयल्टी को लेकर झगड़े हों. कई बार तो दोनों ऐसे झगड़े कि मामला अदालतों की चौखट तक जा पहुंचा. अगर पैसा महत्वपूर्ण नहीं है तो क्या कोई स्थापित हिंदी लेखक टाॅलस्टाय की मिसाल बन सकता है जो अपनी जिंदगी में ही अपने सारे साहित्य को कॉपीराइट फ्री कर देने का अभिलाषी था?

गंभीर साहित्यकारों में से श्रीलाल शुक्ल, मनहर चौहान और आनंद प्रकाश जैन ने जासूसी उपन्यास लिखने में अपना हाथ आजमाया लेकिन वो अपनी कोशिशों में मुंह के बल गिरे. इन लोगों ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि इन्हें वहां पैसा दिखाई दिया, लेकिन इस कोशिश को करते वक्त वे भूल गए कि जिसका काम उसी को साझे, दूजा करे तो डंडा बाजे. अंत में इतना कहना है कि मैंने लोकप्रिय साहित्य को पैसे की वजह से चुना. ऐसा कहने और मानने में मुझे कोई झिझक नहीं है.

सत्तर-अस्सी के दशक को लोकप्रिय साहित्य और पॉकेट बुक्स व्यवसाय का स्वर्णकाल माना जाता है लेकिन आप इसे  ‘बहती गंगा में हाथ धोने’  का दौर कहते हैं, आखिर क्यों?

तब इस धंधे में गधे-घोड़े सब एक बराबर हो गए थे. इतने प्रकाशक हो गए थे, स्क्रिप्ट की खपत इतनी बढ़ गई थी कि तब जो कूड़ा-करकट छपता था जैसे-तैसे बिक ही जाता था. टीवी, इंटरनेट, केबल के अभाव में जो कुछ भी हाथ आता था, लोग पढ़ने बैठ जाते थे. तब गुणवत्ता की न कोई शिनाख्त थी, न अहमियत. इसी वजह से उस दौर में छद्म नामों (घोस्ट राइटिंग) से लेखन का प्रेत उठ खड़ा हुआ. अच्छा लेखक अच्छे पैसे मांगता था. इससे बचने के लिए प्रकाशकों ने अपने ट्रेडमार्क जैसे नकली लेखकों को साबुन-तेल की तरह प्रमोट करना शुरू कर दिया था. बड़े-बड़े साहित्यकारों को पॉकेट बुक्स में छापने की प्रशस्ति और गौरव प्राप्त करने वाले प्रकाशन ‘हिंद पॉकेट बुक्स’ ने कर्नल रंजीत के ट्रेड नाम से पहला घोस्ट राइटर खड़ा किया जो आगे चलकर व्यापक भ्रष्टाचार की मिसाल बना. हालात इतने बिगड़े कि प्रकाशक लेखकों को ब्लैकमेल करने लगे कि अगर वे इस धंधे से बाहर नहीं होना चाहते तो इन ट्रेड नामों से उपन्यास लिखना कबूल करें. अब ऐसे वक्त को मैं बहती गंगा में हाथ धोने का दौर न कहूं तो और क्या कहूं.

हिंदी में लोकप्रिय साहित्य को लेकर एक शुद्धतावादी रवैया दिखता है. इसके पीछे आप क्या वजह देखते हैं?

हां, इस बारे में एक भ्रम बना दिया गया है. ऐसा लगता है मानो हिंदी साहित्य लेखक बहुत कुलीन हैं और उनके मुकाबले लोकप्रिय साहित्य लेखक का दर्जा बाजारू औरत का है. ये हाउसवाइफ और हारलोट (वेश्या) जैसी तुलना है. इसके जरिये साहित्यिक लेखक अपने ईगो की तुष्टि करते हैं. जब राजकपूर बतौर फिल्म निर्माता अपनी मकबूलियत के शिखर पर थे तब किसी ने कहा था कि वो सत्यजीत रे जैसी फिल्में कभी नहीं बना सकते. इसका माकूल जवाब राजकपूर के बड़े बेटे ने दिया था कि क्या सत्यजीत रे राजकपूर जैसी फिल्में बना सकते थे? एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के काम को हिकारत की निगाह से देखना गलत है, नाजायज है, गैरजरूरी है! क्या जासूसी उपन्यास लिखने में मेहनत नहीं लगती! ऊर्जा खर्च नहीं होती! क्या इस काम को बिना कमिटमेंट के, लापरवाही से अंजाम दिया जा सकता है! आप ऐसा कैसे मान सकते हैं कि लोकप्रिय साहित्य पढ़ने वाले पाठक के सामने कुछ भी परोसा जा सकता है. ऐसा नहीं है. पाठक घोड़े और गधे में फर्क कर लेता है. लोकप्रिय साहित्य का पाठक कल था, आज है और आगे भी रहेगा लेकिन ‘साहित्य’ का पाठक हमेशा नहीं रहता क्योंकि पाठक है ही नहीं. इसमें दोष पाठकों का नहीं है. गंभीर साहित्य लेखकों की तरफ से, प्रकाशकों की तरफ से ऐसी कोशिशें ही नहीं होती कि पाठक तक साहित्य आसानी से पहुंच जाए. जो लेखक और प्रकाशक पाठकों की कमी का रोना रोते हैं वही अपनी 100 पन्ने की किताब की कीमत 100 रुपये रखकर एक तरह से पाठक को धकियाते हैं, नतीजा ये होता है कि साहित्यिक किताबें आपस में पढ़ी-पढ़वाई जाती हैं.

एक सीमित, स्थापित जमात में उसकी चर्चा होती है बल्कि सप्रयास कराई जाती है और वाहवाही बटोरी जाती है. ‘ए’ की रचना प्रकाशित हुई तो ‘बी’ ने उसे उम्दा करार दे दिया और जब ‘बी’ ने एक किताब लिखी तो ‘ए’ ने उसकी तारीफ कर दी. साहित्यिक हलको में ‘यू स्क्रैच माई बैक, आई स्क्रैच योर्स’ माने ‘तुम मेरी पीठ खुजाओ, मैं तुम्हारी खुजाता हूं’ बेहद आम है. सबसे खास बात ये है कि इस पूरी प्रक्रिया में पाठक का कोई दखल नहीं होता है. अब आप ही फैसला कीजिए कि यह प्रक्रिया ठीक है या लोकप्रिय साहित्य का सिलसिला ठीक है, जिसमें पाठक का अपने प्रिय लेखक से निरंतर जुड़ाव बना रहता है. लोकप्रिय साहित्य का पाठक अपने लेखक की हैसियत बनाता है. खालिस साहित्यकार इस हैसियत से वंचित है क्योंकि पाठक उन्हें नसीब ही नहीं होता.

क्या आप ये मानते हैं कि इस शुद्धतावादी रवैये की वजह से लोकप्रिय साहित्य लेखकों का कोई नुकसान हुआ. क्या कभी अपने-आपको गंभीर साहित्यकारों से कमतर महसूस किया?

सवाल ही नहीं उठता. लोकप्रिय साहित्य का अपना संसार है और उसमें उसका लेखक अपना वजूद महसूस करता है. उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी अखबार या पत्रिका में उसके बारे में कुछ अच्छा छपा या नहीं. उसका पाठक उसके साथ है जो उसे मकबूलियत के उस सिंहासन पर स्थापित करता है जिस तक गंभीर साहित्य के लेखक की कभी पहुंच नहीं होती. दूसरी बात, मैं क्यों अपने-आपको उनसे कमतर महसूस करूं? क्या कमी है मुझमें या मेरे लेखन में? अलबत्ता खूबियां कई हैं, जिन्होंने मुझे उस मुकाम पर पहुंचाया है जिस पर मैं आज हूं और जिससे गंभीर साहित्य के अधिकतर लेखक रश्क करते हैं. एक अरसा पहले की बात है, तब हिंदी के एक बड़े साहित्यकार ने ‘कादंबिनी’ पत्रिका में एक लेख लिखा था. लेख में महाशय ने गुलशन नंदा जैसे लोकप्रिय लेखकों के खिलाफ खूब विष-वमन किया था और मांग की थी कि ऐसे लेखकों और प्रकाशकों पर बैन लगा देना चाहिए. इसी लेख में उन्होंने मांग की थी कि लेखन-प्रकाशन के धंधे में आने वालों के लिए एक ‘मिनीमम क्वालीफिकेशन’ होनी ही चाहिए. यहां एक बात और बता दूं कि ये लेख लिखने वाले बड़े साहित्यकार लोकप्रिय लेखन में हाथ आजमा चुके थे और मुंह के बल गिरे थे. जिस लेखन को वो घटिया और बैन लगाने लायक बता रहे थे उसी में उन्होंने घोस्ट नाम से जासूसी उपन्यास लिखे और फॉरेन मिस्ट्री मैगजीन की तर्ज पर हिंदी में जासूसी कहानियों की पत्रिका भी निकाल चुके थे. अब आप ही यह फैसला कीजिए कि क्यों मैं ऐसे मोटिवेटेड साहित्यबाजों से खुद को कमतर महसूस करूं.

पिछले पांच-दस साल में आपने हिंदी की कौन सी किताबें पढ़ीं हैं? खासकर जिन्हें गंभीर साहित्य माना जाता हो.

मैं 75 वर्ष का हो चुका हूं और इस उम्र में मेरा लिखने पर जोर ज्यादा है, पढ़ने पर कम है. क्योंकि पढ़ा हुआ तो मेरे साथ ही चला जाना है, लिखा मुझे पीछे छोड़ जाना है. जब काम ज्यादा, वक्त कम हो तो उस काम को अहमियत देनी पड़ती है जिसका हासिल ज्यादा हो. जब वक्त था, तब मैं दुनिया-भर के साहित्यिक लेखकों को पढ़ता था लेकिन अब ऐसा नहीं कर पाता. फिर भी पिछले पांच-दस साल में मैंने कुछ साहित्यक किताबें पढ़ी हैं जैसे, गालिब छूटी शराब (रवींद्र कालिया), वधस्थल (मनोहर श्याम जोशी), आग का दरिया (कुर्तुल एन हैदर), विवर (समरेश बसु), बस्ती (इंतजार हुसैन), रामनगरी (राम नगरकर), अभ्युदय (नरेंद्र कोहली), अभिशप्त (नानक सिंह), एक खत एक खुशबू (कृश्न चंदर), मोहन दास (उदय प्रकाश), कितने पाकिस्तान (कमलेश्वर), खट्टर काका (हरि मोहन झा) इनके अलावा कुछ और पुस्तकें भी पढ़ीं लेकिन उनके नाम इस घड़ी याद नहीं आ रहे हैं.

गंभीर साहित्यकारों के एक वर्ग का मानना है कि इंटरनेट, टीवी और फिल्मों की वजह से पाठक कम हुए हैं. किताबें कम बिक रही हैं. क्या आप इस बात से सहमति रखते हैं?

उनका यह मानना कि गंभीर साहित्य पढ़ने वाले पाठक इंटरनेट या टीवी की वजह से कम हुए हैं, गलत है, भ्रामक है. जो चीज कभी थी ही नहीं वो कम कैसे होगी? पहले ही कहां रखे थे गंभीर साहित्य पढ़ने वाले पाठक जो अब किन्ही वजहों कम होते जा रहे हैं. अगर सामूहिक तौर से देखा जाए तो इस बात में दम है. इंटरनेट, टीवी और फिल्मों के साथ-साथ तेजी से फैल रहे पिज्जा कल्चर ने पढ़ने का ढंग तो बदला है. आज लोग हिंदी पढ़ने के बजाए अंग्रेजी पढ़ने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं. नया पाठक वर्ग तैयार ही नहीं हो रहा है. मेरे जैसे लेखक के साथ एक अच्छी बात यह है कि मेरा एक तय पाठक वर्ग है जो वर्षों से मेरे साथ खड़ा है. गंभीर साहित्य लिखने वालों की ऐसी कोई बुनियाद न कभी बनी है, न बनने वाली है. इस सवाल का दूसरा पहलू भी है. इस दौरान अंग्रेजी फिक्शन की रीडरशिप बड़ी तेजी से बढ़ी है. ऐसा हुआ है इसीलिए चेतन भगत के हालिया उपन्यास ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ का प्रिंट ऑडर बीस लाख प्रतियों तक गया है. ऐसा लगता है कि पिज्जा पार्लर जाना, मल्टीप्लेक्स जाना, इंटरनेट में रुचि लेना और देसी लेखकों के अंग्रेजी उपन्यास पढ़ना एक ही लेवल के शौक बन गए हैं. हिंदी का लेखक इस समीकरण से बाहर है. हकीकत ये है कि साहित्य की जैसी कद्र बंगाली, मलयाली और मराठी में है, वो हिंदी में नहीं है. हिंदी कहने को तो राष्ट्रभाषा है लेकिन इसकी जो थोड़ी बहुत पूछ है वो देश की हिंदी बेल्ट की वजह से ही है. हमारे मौजूदा समाज में नई पौध को पठन-पाठन के लिए प्रोत्साहित करनेवाला कोई नहीं है. आधुनिक माता-पिता अपनी औलाद को पिज्जा और शॉपिंग का अर्थ तो समझाते हैं लेकिन उसे पुस्तकों के अद्भुत, विलक्षण संसार से अवगत नहीं करवाते.

गंभीर साहित्य रचने वालों को कई तरह के सम्मान मिलते हैं. क्या आपने कभी ऐसे सम्मान की चाहत की?

मुझे तो ऐसा कभी ख्याल तक नहीं आया. मैं जिस हाल में हूं, जिस मुकाम पर हूं, उससे संतुष्ट हूं. मेरे पाठकों की निगाह में मेरा जो दर्जा है, वो मुझे सबसे बड़ा इनाम जान पड़ता है. मेरे पाठक मुझ जैसे छोटे इंसान को किसी काबिल समझते हैं, ये क्या कम बड़ा इनाम है!

हिन्दी में जिन्हें गंभीर साहित्यकार माना जाता है उनके काम को आप कैसे देखते हैं? क्या किसी गंभीर साहित्यकार ने आपको प्रभावित किया है यदि हां तो कौन और क्यों ?

गंभीर साहित्यकारों के काम को मैं काबिले रश्क मानता हूं. उनकी साधना के मुकाबले में मेरे जैसे कारोबारी लेखक का लेखन कहीं नहीं ठहरता. उनके मुकाबले में अपने बारे में मुझे कोई खुशफहमी नहीं. वे लोग महान हैं, साहित्य साधक हैं, जन-जन के लिए प्रेरणादायक हैं जबकि मैं तो लेखक भी नहीं हूं. मैं तो एक व्यापारी हूं जिसका व्यापार लिखना है. कोई मुझे लेखक मानता है तो वो मुझ पर एहसान करता है. मैंने बेइंतहा गंभीर लेखकों को पढ़ा है लेकिन कृश्न चंदर ने मुझ पर सबसे गहरी छाप छोड़ी है. भाषा में साहित्य पैदा करना, बात को सजा-सजा कर कहना, तहरीर में दरिया जैसी रवानगी पैदा करना, अल्फाज की जादूगरी दिखाना कोई कृश्न चंदर से सीखे. मैंने उनकी एक-एक रचना को कई-कई बार पढ़ा है और हर बार ऐसा महसूस हुआ कि पहली दफा पढ़ रहा हूं. मेरे अंदाजे बयां पर उनकी स्पष्ट छाप है. मैं यह कहते हुए फख्र महसूस कर रहा हूं कि कम से कम अंदाज-ए-बयां के मामले में मैं कृश्न चंदर का गैर-ऐलानिया शागिर्द हूं.

जासूसी और सेक्स थ्रिलर का कॉकटेल

James Headly Chase

लुगदी साहित्य में जासूसी के साथ रोमांस परोसने का सिलसिला काफी पुराना है. इस तरह के उपन्यासों की पाठक संख्या आज भी बनी हुई है. 80 और 90 के दशक में प्रकाशित उपन्यासों में रोचकता को बनाए रखने के लिए जासूसी एक महत्वपूर्ण तत्व होता था. इसके अलावा इसमें रोमांस का तड़का लगाया जाता था. जेम्स हेडली चेइज ऐसे ही एक उपन्यासकार थे, जिन्होंने 90 से ज्यादा जासूसी उपन्यास लिखे. इन उपन्यासों की बदौलत यूरोप में उन्हें थ्रिलर उपन्यासों का बादशाह कहा जाने लगा था. इतना ही नहीं उनके लिखे 50 से ज्यादा उपन्यासों पर फिल्में भी बन चुकी हैं.

 24 दिसंबर 1906 को लंदन में जन्मा यह उपन्यासकार भारत में काफी लोकप्रिय हुआ था. क्राइम फिक्शन, रहस्य, रोमांच, जासूसी और रोमांस के कॉकटेल से वे उपन्यास रचते थे. जिनका हिंदी में अनुवाद करके भारत में प्रकाशित कराया जाता था. जासूसी उनकी पसंदीदा विधा थी, इसका पता इस बात से चलता है कि उन्होंने अपने कई नाम रखे हुए थे. वे कई नामों (पेन नेम) से लिखा करते थे. जन्म के बाद उन्हें ‘रेने लॉज ब्रेबेजॉन रेमंड’ नाम मिला. इसके अलावा वह ‘जेम्स एल. डोचर्टी’, ‘रेमंड मार्शल’, ‘आर. रेमंड’ और ‘एंब्रोस ग्रांट’ के नाम से भी जाने जाते थे. हालांकि वे सबसे ज्यादा लोकप्रिय जेम्स हेडली चेज के नाम से ही हुए. भारत में इसी नाम से आए उनके उपन्यास अच्छी खासी संख्या में बिक चुके हैं.

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जेम्स ने अपने पेशेवर सफर की शुरुआत द्वितीय विश्व युद्घ के समय इंग्लैंड की रॉयल एयरफोर्स में सेवा देकर की थी, लेकिन ये उन्हें ज्यादा समय तक रास नहीं आया और किताबें पढ़ने और बेचने का शौक उन्हें उपन्यास लेखन की दुनिया में ले आया. 90 के दशक में जेम्स हेडली चेइज की लोकप्रियता को देखते हुए कुछ दूसरे भारतीय लेखकों ने भी छद्म नामों से बाजार में उपन्यास उतारे. इनमें जासूसी और रोमांस के साथ सेक्स को भी खूब जगह मिलती थी. ऐसा ही एक छद्म नाम रीमा भारती का है. जिनके उपन्यास का कंटेंट पूरी तरह से फिल्मी होता है. शायद ये एक तरह का चलन है. छद्म नाम होने की वजह से आप किसी भी हद तक इरोटिक (कामुक) कंटेंट पाठकों को परोस सकते हैं. इससे वास्तविक लेखक की पहचान और प्रसिद्घि भी प्रभावित नहीं होते.

 बहरहाल, मसाला फिल्मों की तरह ये उपन्यास मार-धाड़ के साथ जासूसी, देशभक्ति, थ्रिलर और एडल्ट कंटेंट से भरपूर होते हैं. रीमा भारती की बात करें तो उन्हें उनके उपन्यासों में भारत की कथित सीक्रेट सर्विस एजेंसी ‘आईएससी’ का एजेंट बताया जाता है. उपन्यासों में रीमा भारती का किरदार एक देशभक्त के रूप में गढ़ा जाता है जो अपने मकसद को पूरा करने के लिए अपने शरीर का इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकतीं. जेम्स हेडली चेइज के उपन्यास अब बहुत ही कम नजर आते हैं, लेकिन जासूसी, रोमांच, रोमांस और सेक्स के इसी कॉकटेल की वजह से ‘रीमा भारती’ जैसे लेखक आज भी रेलवे स्टेशनों के बुक स्टॉलों की शान बने हुए हैं.