Home Blog Page 119

हाईकोर्ट जज के बयान पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, लिया स्वत संज्ञान; मुस्लिम इलाके को बताया था पाकिस्तान

बेंगलुरु : कर्नाटक हाई कोर्ट के जज वेदव्यासचार श्रीशानंद की मुश्किलें बढ़ गई हैं। जज ने हाल ही में बेंगलुरु के एक मुस्लिम बहुल इलाके, गोरी पाल्या, को “पाकिस्तान” बताया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया  पर वायरल हो गया। इस मामले पर अब सुप्रीम कोर्ट  ने स्वत: संज्ञान लिया है।

चीफ जस्टिस  डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि इस मुद्दे पर दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि अदालती कार्यवाही के दौरान जज द्वारा की गई टिप्पणियों पर मीडिया रिपोर्ट्स ने ध्यान आकर्षित किया है। जस्टिस श्रीशानंद ने यह टिप्पणी 28 अगस्त को एक मामले की सुनवाई के दौरान की थी।

सीजेआई (CJI) ने कर्नाटक हाई कोर्ट के जज से अनुरोध किया है कि वह हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से निर्देश लेकर रिपोर्ट प्रस्तुत करें। इस रिपोर्ट के लिए दो दिन का समय दिया गया है, और इसे हाई कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल द्वारा तैयार किया जा सकता है। एजी (AG) और एसजी इस प्रक्रिया में कोर्ट की सहायता करेंगे। इस मामले में अगली सुनवाई 25 सितंबर को होगी।

जस्टिस वेदव्यासचार श्रीशानंद ने 28 अगस्त को सुनवाई के दौरान गोरी पाल्या को पाकिस्तान बताया और कहा कि “यहां कानून लागू नहीं होता”। उन्होंने यह भी कहा कि “गोरी पाल्या से मैसूर फ्लाईओवर तक का इलाका पाकिस्तान में है, भारत में नहीं।” जज श्रीशानंद किराया नियंत्रण अधिनियम से संबंधित मामले की सुनवाई कर रहे थे।

जस्टिस श्रीशानंद ने 5 मई 2020 को कर्नाटक हाई कोर्ट के एडिशनल जज के रूप में शपथ ली थी और 25 सितंबर 2021 को स्थायी जज बने।

प्रधानमंत्री मोदी को मिले इन खास गिफ्ट्स की हो रही है नीलामी

नई दिल्ली :  हर साल की तरह इस साल भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिले गिफ्ट्स की नीलामी की जा रही है। इन गिफ्ट्स में पैरालिंपिक पदक विजेताओं की वस्तुएं और अयोध्या के राम मंदिर की प्रतिकृति या रेप्लिका समेत करीब 600 चीजें शामिल हैं।

प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया हैंडल पर लिखा, ‘हर साल मैं सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान मिलने वाले विभिन्न स्मृति चिह्नों की नीलामी करता हूं। नीलामी की आय नमामि गंगे पहल में जाती है। मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि इस साल की नीलामी शुरू हो गई है। उन स्मृति चिन्हों के लिए बोली लगाएं जो आपको दिलचस्प लगते हैं।’

कितनी हो सकती है कीमत–  संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने सोमवार को यहां नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट में, प्रधानमंत्री को मिले स्मृति चिह्न का प्रदर्शन करने वाली प्रदर्शनी का अवलोकन किया। बाद में उन्होंने एक संवाददाता सम्मेलन में बताया कि इन उपहारों की नीलामी के लिए आधार मूल्य एक सरकारी समिति तय करती है और कीमतें न्यूनतम 600 रुपये से लेकर अधिकतम 8.26 लाख रुपये तक होती हैं। जिन वस्तुओं का आधार मूल्य सबसे ज्यादा रखा गया है, उनमें पैरालिंपिक कांस्य पदक विजेता नित्या श्री सिवन और सुकांत कदम के बैडमिंटन रैकेट के अलावा रजत पदक विजेता योगेश खातुनिया का ‘डिस्कस’ शामिल है। इनका आधार मूल्य 5.50 लाख रुपये के आसपास तय किया गया है। पैरालंपिक कांस्य पदक विजेता अजीत सिंह और सिमरन शर्मा तथा रजत पदक विजेता निशाद कुमार द्वारा भेंट किए गए जूतों के अलावा रजत पदक विजेता शरद कुमार की हस्ताक्षरित टोपी का आधार मूल्य 2.86 लाख रुपये के आसपास रखा गया है।

राम मंदिर की एक प्रतिकृति जिसकी कीमत 5.50 लाख रुपये है, मोर की एक मूर्ति जिसकी कीमत 3.30 लाख रुपये है, राम दरबार की एक मूर्ति जिसकी कीमत 2.76 लाख रुपये है और चांदी की वीणा जिसकी कीमत 1.65 लाख रुपये है, उच्च आधार मूल्य वाली अन्य वस्तुओं में शामिल हैं। सबसे कम आधार मूल्य वाले उपहार में सूती अंगवस्त्रम, टोपी और शॉल शामिल हैं, जिनकी कीमत 600 रुपये रखी गई है।

इस तरह ले सकते है भाग- https://pmmementos.gov.in/ वेबसाट पर रजिस्टर कर नीलामी में भाग ले सकते हैं। अगर आपके पास पहले ही लॉगिन डिटेल्स मौजूद हैं, तो इनकी मदद से आप पसंदीदा चीजों को कार्ट में जोड़ सकते हैं। वहीं, नए यूजर मोबाइल नंबर, ई-मेल जैसी जानकारी की मदद से साइन अप कर सकते हैं। साथ ही अगर ममेंटोज को राजधानी दिल्ली स्थित जयपुर हाउस में नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट में देख सकते हैं। इन्हें सुबह 11 बजे से लेकर शाम 6 बजे तक देखा जा सकता है।

बिहार के नवादा में दबंगों ने फायरिंग कर 80 घरों को किया आग के हवाले

नवादा :बिहार के नवादा में जमीन विवाद को लेकर दबंगों ने दलित बस्ती में आग लगा दी। करीब 80 घर इस आग में जलकर खाक हो गए। पुलिस का कहना है कि 20 घर ही आग में जले हैं और इस घटना में किसी की मौत नहीं हुई है। इस मामले में पुलिस ने 10 आरोपियों को गिरफ्तार भी कर लिया है। वहीं आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने इस घटना पर नीतीश सरकार को घेरा है। यह घटना नवादा के मुफस्सिल थाना क्षेत्र के ननौरा के पास स्थित कृष्णा नगर दलित बस्ती की है। यहां दो पक्षों में जमीन को लेकर विवाद चल रहा था। जिसको लेकर बुधवार रात दबंगों ने दलित परिवारों के साथ मारपीट की थी और फिर हवाई फायरिंग के बाद उनके घरों को आग लगा दी।

बताया जा रहा है कि गांव में जमीन के एक हिस्से पर फिलहाल दलित परिवारों का कब्जा है। इस जमीन पर कब्जे को लेकर दूसरे पक्ष से विवाद चल रहा है। पीड़ितों का आरोप है कि बुधवार रात को अचानक दबंगों ने हमला कर दिया। मारपीट के साथ उनके घरों में आग लगा दी गई। एसपी अभिनव धीमान ने बताया, कि सूचना मिली थी कि कुछ व्यक्तियों द्वारा घरों को जलाया गया है। शुरुआत में दावा किया गया था कि 40-50 घर जलाए गए, लेकिन हमने जितना अभी तक सिविल साइड और पुलिस ने रात के अंधेरे में जितना सर्वे किया है, करीब 21 घरों के परिवारों को हमने चिन्हित किया है।इसके साथ ही पुलिस अधीक्षक ने यहां हवाई फायरिंग की घटना से इनकार किया है।

एसपी ने बताया कि इस घटना के जो मुख्य आरोपी बताए जा रहे थे, उनको हमने गिरफ्तार कर लिया है। मुख्य आरोपी के साथ-साथ 10 लोगों को गिरफ्तार किया है। उन्होंने कहा, जब तक हालात सामान्य नहीं हो जाते, तब तक पुलिस फोर्स तैनात रहेगी। बताया जा रहा है कि लगभग 5 थानों की पुलिस को यहां बुलाया गया है।

नवादा की घटना पर तेजस्वी यादव का बयान आया है। तेजस्वी ने इस घटना की तुलना महा जंगलराज, महा दानवराज, महा राक्षसराज से की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखा, “महा जंगलराज महा दानवराज महा राक्षसराज। नवादा में दलितों के 100 से अधिक घरों में लगाई आग। नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के राज में बिहार में आग ही आग। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बेफिक्र, NDA के सहयोगी दल बेखबर। गरीब जले, मरे-इन्हें क्या? दलितों पर अत्याचार बर्दाश्त नहीं होगा।

अमेरिका की अदालत ने खालिस्तानी गुरपतवंत पन्नू केस में भारत सरकार और अजित डोभाल को जारी किया समन

नई दिल्ली:खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश के आरोप में अमेरिका की एक अदालत ने भारत सरकार के नाम समन जारी किया है। इसे लेकर भारत सरकार ने सख्त आपत्ति जताई है।

विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने इस संबंध में पूछे जाने पर कहा कि यह एकदम गलत है और हम इस पर आपत्ति जताते हैं। न्यूयॉर्क के दक्षिणी जिले के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने यह समन भारत सरकार, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, रॉ के पूर्व चीफ सामंत गोयल, रॉ एजेंट विक्रम यादव और कारोबारी निखिल गुप्ता के नाम जारी किया है। इस समन में सभी पक्षों से 21 दिन के अंदर जवाब देने को कहा गया है। विदेश सचिव ने अमेरिकी अदालत के समन पर कहा कि जब पहली बार यह मामला हमारे संज्ञान में लाया गया तो हमने ऐक्शन लिया। इस मसले पर एक हाईलेवल कमेटी पहले ही गठित की गई है, जो जांच कर रही है। मैं अब उस शख्स की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं, जिसने यह केस दर्ज किया है। गुरपतवंत सिंह पन्नू का इतिहास सभी को पता है, वह किस तरह एक गैर-कानूनी संगठन से जुड़ा रहा है। यह सभी को पता है।

गुरपतवंत सिंह एक कट्टरपंथी संगठन सिख्स फॉर जस्टिस का मुखिया है। वह भारतीय नेताओं और संस्थानों के खिलाफ जहरीले बयान देता रहा है। भारत सरकार ने 2020 में गुरपतवंत सिंह पन्नू को आतंकवादी घोषित कर दिया था। बीते साल नवंबर में ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया था कि पन्नू की हत्या की साजिश अमेरिका ने नाकाम कर दी है। पन्नू के पास अमेरिका और कनाडा दोनों ही देशों की नागरिकता है। इस रिपोर्ट की बाद में जो बाइडेन प्रशासन ने भी पुष्टि की थी। इस मसले की जानकारी मिलने पर विदेश मंत्रालय ने कहा था कि यदि ऐसा है तो यह चिंता का विषय है। हम इस मामले की उच्च स्तरीय जांच करा लेते हैं।

‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ को मिली मंजूरी, मोदी कैबिनेट में पास हुआ प्रस्ताव

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली कैबिनेट ने भारत में ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। बुधवार को हुई कैबिनेट बैठक में इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर चर्चा की गई। इस पहल के जरिए भारत में चुनावों की प्रक्रिया को सरल और समेकित करने का प्रयास किया जाएगा, जिससे चुनावी खर्च और समय की बचत हो सकेगी।

कल मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के 100 दिन पूरे होने पर गृह मंत्री अमित शाह ने बड़ा ऐलान किया था। शाह ने कहा था कि एक देश एक चुनाव सरकार इसी कार्यकाल में लागू करेगी। इससे पहले लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने अपने मेनिफेस्टो में भी एक देश एक चुनाव के वादे को शामिल किया था। यह कदम राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है, और इसके संभावित प्रभावों पर देश भर में चर्चाएँ शुरू हो गई हैं।

बता दें, वन नेशन-वन इलेक्शन की दिशा में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में 2 सितंबर 2023 को एक कमेटी गठित की गई थी। इस कमेटी ने 14 मार्च 2024 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। कमेटी ने 191 दिनों तक विभिन्न विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से चर्चा की और 18,626 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सभी राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल बढ़ाकर 2029 तक किया जाए, ताकि अगले लोकसभा चुनाव के साथ ही इन विधानसभाओं के चुनाव भी कराए जा सकें।

जम्मू-कश्मीर के राजौरी में सेना का वाहन खाई में गिरने से एक जवान शहीद

जम्मू  : जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले में सेना का एक वाहन खाई में गिर जाने से एक जवान शहीद हो गया और पांच अन्य घायल हो गए है।

जानकारी के अनुसार जवानों को ले जा रहा सेना का वाहन एक गहरी खाई में गिर गया जिससे छह जवान घायल हो गए और उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां एक जवान का निधन हो गया।

व्हाइट नाइट कोर ने एक्स पर पोस्ट किया, ‘सभी रैंक लांस नायक बलजीत सिंह के परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हैं जो मंजाकोट, राजौरी के पास आतंकवाद विरोधी ड्यूटी के दौरान एक दुखद सड़क दुर्घटना में अपनी जान गंवाने वाले बहादुर थे।’

जनप्रतिनिधियों का शिक्षित और संस्कारी होना ज़रूरी

देश में सांसदों, विधायकों और दूसरे चुने हुए जनप्रतिनिधियों का हुक्म अपने-अपने स्तर पर उन लोगों पर चलता है, जो अच्छे-ख़ासे पढ़े-लिखे होते हैं। इसमें अधिकतर नौकरशाह और वरिष्ठ अधिकारी होते हैं। लेकिन जनप्रतिनिधि अनपढ़ भी हो सकता है। उसका रिकॉर्ड आपराधिक भी हो सकता है और वह काम चलाऊ रूप से भी पढ़ा-लिखा, यानी दो-चार क्लास तक पढ़ा-लिखा भी हो सकता है। यानी जिसकी कोई योग्यता न हो, वह नेता बन सकता है। हालाँकि इसे लेकर कई बार माँग उठती रही है कि जनप्रतिनिधियों की योग्यता निर्धारित होनी चाहिए, यानी वे कम-से-कम कॉलेज या यूनिवर्सिटी से शिक्षा हासिल कर चुके हों। हाल ही में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी कहा कि देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सांसदों-विधायकों की शिक्षा के मामले में न्यूनतम योग्यता की अनिवार्यता न होने को लेकर अफ़सोस जताया था; लेकिन उनके इस पछतावे पर आज तक ध्यान नहीं दिया गया।

दरअसल हाई कोर्ट के जस्टिस महाबीर सिंह सिंधु ने 26 नवंबर, 1949 को देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के संविधान सभा में दिये भाषण का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि क़ानून बनाने वालों की बजाय, क़ानून को लागू करने या लागू करने में मदद करने वालों के लिए उच्च योग्यता पर ज़ोर देना असंगत है। उन्होंने सांसदों और विधायकों की शैक्षणिक योग्यता तय नहीं करने को पहली और देश की भाषा में संविधान नहीं लिखने को दूसरी ग़लती बताते हुए इस पर अफ़सोस ज़ाहिर किया था। जस्टिस महाबीर सिंह सिंधु ने कहा कि 75 साल बीत गये; लेकिन आज तक पहला पछतावा सुधार की प्रतीक्षा कर रहा है। आज भी देश में मंत्री, सांसद या विधायक बनने के लिए शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं है। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की यह टिप्पणी तब आयी, जब भाजपा नेता और पूर्व विधायक राव नरबीर सिंह के ख़िलाफ़ नामांकन-पत्र में शैक्षणिक योग्यता की ग़लत जानकारी देने के आरोप में एक याचिका दायर की गयी थी, जिसे योग्यता निर्धारित न होने के चलते कोर्ट ने पहले राष्ट्रपति की अफ़सोस वाले भाषण को दोहराते हुए ख़ारिज कर दिया।

दरअसल इस मामले में जस्टिस महावीर सिंह सिंधु ने कहा कि लगभग 75 वर्ष बीत चुके हैं; लेकिन आज तक ‘पहला पछतावा’ सुधार की प्रतीक्षा कर रहा है। आज भी हमारे देश में मंत्री, संसद सदस्य या विधानसभा सदस्य बनने के लिए किसी शैक्षिक योग्यता की ज़रूरत नहीं है। इस टिप्पणी के दौरान हाई कोर्ट ने याचिकाओं को सुना और उन्हें यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि पर्याप्त सामग्री है, जो स्पष्ट रूप से इंगित करती है कि प्रतिवादी ने वर्ष 1988 में हिंदी मध्यमा (विशारद) की डिग्री प्राप्त की थी, जो बीए के समकक्ष है और साथ ही वर्ष 2001 में उत्तम (साहित्य रत्न) की डिग्री प्राप्त की थी, जो बीए (ऑनर्स) के समकक्ष है। ऐसी स्थिति में इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि प्रतिवादी के पास 15 जनवरी, 2005 और 25 सितंबर, 2014 को नामांकन-पत्र दाख़िल करते समय स्नातक की डिग्री थी। कोर्ट ने कहा कि भले ही डिग्री किसी ऐसी यूनिवर्सिटी से हासिल की गयी हो, जो यूजीसी से मान्यता प्राप्त नहीं है; लेकिन इससे प्रतिवादी को नामांकन पत्र के साथ संलग्न फॉर्म संख्या-26 में कोई ग़लत घोषणा करने या इसके समर्थन में हलफ़नामा दाख़िल करने और कथित तरीक़े से अभियोजन का सामना करने के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।

बहरहाल, इस विषय पर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में भी संसद में ख़ूब चर्चा हुई और इस बात पर कुछ सांसदों ने ज़ोर डाला कि लोकसभा का चुनाव लड़ने से लेकर राज्यसभा तक में अच्छे पढ़े-लिखे और क़ाबिल लोगों को आना चाहिए, जिसके लिए सांसदों और विधायकों की शैक्षिक योग्यता निर्धारित की जानी चाहिए। लेकिन ज़्यादातर सांसदों ने इस प्रस्ताव को नकार दिया था और इस प्रस्ताव को नकारने वालों में काफ़ी संख्या में पढ़े-लिखे सांसद भी थे। लेकिन सवाल यह है कि सभी जनप्रतिनिधियों की बात तो दूर, क्या आज सभी सांसद और सभी विधायक पढ़े-लिखे हैं? हालाँकि आज अगर देखें, तो तक़रीबन 80 फ़ीसदी सांसद और विधायक कम-से-कम ग्रेजुएशन या उससे ज़्यादा पढ़े-लिखे हैं। हालाँकि यह अच्छी बात है कि इस बार की 18वीं लोकसभा में कोई सांसद निरक्षर नहीं है, जिसकी वजह कई पुरानों को टिकट न मिलना भी है। इनमें से 34 सांसद 10वीं पास हैं। 65 सांसद 12वीं पास हैं। 147 सांसद ग्रेजुएट हैं। 147 सांसद पोस्ट ग्रेजुएट हैं और 98 सांसद ग्रेजुएट प्रोफेशनल हैं। इनमें से भाजपा के 240 सांसदों में से 64 सांसद ग्रेजुएट हैं। 49 पोस्ट ग्रेजुएट हैं। 87 सांसदों के पास दूसरी डिग्रियाँ हैं। बाक़ी 40 सांसद कक्षा पाँच से 12वीं तक ही पढ़े-लिखे हैं। वहीं कांग्रेस के 99 सांसदों में से 24 ग्रेजुएट हैं। 27 पोस्ट ग्रेजुएट हैं और 21 सांसद प्रोफेशनल ग्रेजुएट हैं। जबकि 19 सांसद कम पढ़े-लिखे हैं। तक़रीबन यही हाल बाक़ी पार्टियों का भी है। लेकिन कई सांसदों और विधायकों की शिक्षा पर सवाल उठते रहे हैं।

दो-तीन साल पहले तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्रियों को लेकर भी देश भर में काफ़ी बवाल मचा था और यह मामला न सिर्फ़ उन्हें डिग्री देने वाली यूनिवर्सिटी के सुबूत देने तक पहुँचा, बल्कि कोर्ट तक भी पहुँचा। इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि देश भर में एक बहस छिड़ गयी और कुछ लोग अनपढ़ और चौथी फेल जैसे शब्दों का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर करते दिखे। हालाँकि इसे उचित नहीं माना जा सकता; लेकिन इसका असर यह हुआ कि गृह मंत्री अमित शाह को प्रेस कॉन्फ्रेंस तक करनी पड़ी और प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री दिखानी पड़ी। हालाँकि बाद में उस पर भी सवाल उठते रहे और लोगों ने मार्क कर करके डिग्री में ग़लतियों को उजागर करने का दावा किया। इस मामले में सन् 1978 में कम्प्यूटराइज्ड बीए की डिग्री होने पर सबसे ज़्यादा सवाल उठे, जो उनके द्वारा दी गयी जानकारी या यह कहें कि डिग्री के मुताबिक, दिल्ली यूनिवर्सिटी से मिली हुई है। इसके बाद उनकी एमए की डिग्री साल 1983 की है, जो उन्होंने गुजरात की एक यूनिवर्सिटी से ली है। हालाँकि ये अलग मसला है कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उन्होंने एंटायर पॉलिटिक्स में एमए किया है, जिसे लेकर काफ़ी लोग सोशल मीडिया पर मज़ाक़ के लहजे में काफ़ी दिनों तक भिड़े रहे।

बहरहाल, मेरा मानना यह है कि सांसदों और विधायकों से लेकर छोटे स्तर के चुनावों तक में भी ऐसे नेताओं के चुनाव लड़ने से रोक होनी चाहिए, जिनकी योग्यता कम हो और जो भले ही बहुत अच्छी शिक्षा हासिल कर चुके हों; लेकिन उनका आपराधिक रिकॉर्ड रहा हो। बल्कि ऐसे लोगों का बहिष्कार सभी पार्टियों को भी करना चाहिए और उन्हें पार्टी की सदस्यता तक नहीं देनी चाहिए। आज हम देख रहे हैं कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों में बड़ी संख्या में सांसद, विधायक और दूसरे चुने हुए जनप्रतिनिधियों का आपराधिक रिकॉर्ड है और खुलेआम वो न सिर्फ़ घूम रहे हैं, बल्कि किसी भी आपराधिक मामले में उन्हें सज़ा नहीं हो रही है। और ऐसे लोग चुनाव लड़कर संसद और विधानसभाओं में बैठे हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक, इस साल हुए लोकसभा चुनाव में जीतकर आए 543 सांसदों में से 251 सांसद दाग़ी हैं। यानी क़रीब 46 फ़ीसदी सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इसी प्रकार से हर विधानसभा में काफ़ी संख्या में आपराधिक मुक़दमों से घिरे हुए विधायक और मंत्री मिल जाएँगे।

दरअसल, संविधान ने अनुच्छेद-19 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, जिसका मतलब यह है कि देश के हर नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार है। लेकिन अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे, जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि रही है, वो न सिर्फ़ चुनावों से लेकर संसद और विधानसभा पहुँचने पर भी कुछ भी ऊटपटाँग बोलते हैं, बल्कि कई के बयान तो देश में भ्रम, नफ़रत, दंगा-फ़साद और बवाल फैलाने के लिए के लिए काफ़ी होते हैं। आज जितने उम्मीदवार चुनाव में खड़े होते हैं, उनमें ज़्यादा उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि वाले होते हैं। ये लोग चुनाव में जो अनाप-शनाप करोड़ों रुपये उड़ाते हैं, वो भी सब ईमानदारी का नहीं होता। ज़ाहिर है जितना बड़ा चुनाव होता है, उसमें उतना ज़्यादा दमख़म दिखाने और दिखावा करने का चलन हो चुका है; और जो जितना ज़्यादा पैसा ख़र्च करता है, वो पैसा उससे की गुना भ्रष्टाचार से बनाता भी है। कहावत है कि बिना शिक्षा के कोई भी आदमी सही शिक्षित साक्षर या शिक्षित ही नहीं होता, बल्कि शिक्षा तरीक़े से न हो, तो देश का तो दूर की बात किसी क्षेत्र या एक गाँव का भला नहीं कर सकता। हालाँकि शिक्षित होने का मतलब महज़ किसी का साक्षर होना या स्कूली शिक्षा हासिल करना ही नहीं है, बल्कि संस्कारित होना भी है। लेकिन आज देश की सियासत में शामिल अशिक्षित और असंस्कारित जनप्रतिनिधियों की वजह से युवाओं पर कितना बुरा असर पड़ रहा है, इस पर हमें विचार करने की ज़रूरत है। इसलिए अगर देश का सर्वांगीण विकास चाहिए, तो कम कम-से-कम उन चुने हुए जनप्रतिनिधियों का उच्च स्तर तक पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी है, जो उच्च स्तर की पढ़ाई करने के बाद देश की सबसे कठिन परीक्षाओं को पास करके बने अफ़सरों पर हुक्म चलाते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

स्वच्छता से बाल-मृत्यु दर घटी, कुपोषण से नहीं

शौचालय का नाम सुनते या उसके पास से गुज़रते हुए पहली तस्वीर ज़ेहन में यही उकरती है कि यह महज़ एक ऐसी जगह है, जिसका इस्तेमाल दीर्घ शंका के लिए किया जाता है। दरअसल शौचालय और वो भी स्वच्छ शौचालय तक पहुँच कई बीमारियों से बचाव का एक सशक्त ज़रिया भी माना जाता है। लोगों की ख़ासकर बच्चों की जान बचाने में मददगार भी हो सकते हैं।

प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका नेचर ने हाल ही में अपने एक अध्ययन में कहा है कि भारत सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के तहत घरों में बनाये गये शौचालयों के निर्माण व राष्ट्रीय स्वच्छता कार्यक्रम के तहत बेहतर साफ़-सफ़ाई सेवाओं ने वर्ष 2014-2020 के दरमियान देश में नवजात और पाँच साल से कम आयु के बच्चों की सालाना मृत्यु दर को कम करने में अहम योगदान दिया है। इस पत्रिका में दावा किया गया है कि इससे हर साल 60,000 से 70,000 नवजातों की ज़िन्दगियाँ बची हैं।

ग़ौरतलब है कि स्वच्छ भारत मिशन को 02 अक्टूबर, 2014 में लॉन्च किया गया था। इस राष्ट्रीय अभियान का मुख्य उद्देश्य सभी घरों में शौचालय की सुविधा प्रदान करके देश को खुले में शौच से मुक्त करना है। इसके साथ ही सामुदायिक और सार्वजनिक स्थलों पर शौचालय का निर्माण करके गंदे शौचालयों को फ्लश वाले शौचालयों में बदलना है। देश की गलियों, सड़कों और बुनियादी ढाँचे की सफ़ाई करना भी इसका हिस्सा है। केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी के एक बयान के मुताबिक जुलाई, 2024 तक बीते नौ वर्षों में ग्रामीण और शहरी भारत में लगभग 12 करोड़ शौचालय बनाये गये थे।  हालाँकि अभी देश के हर व्यक्ति की शौचालय तक पहुँच संभव नहीं हो सकी है।

टायॅलेट कंस्ट्रशन अंडर द स्वच्छ भारत मिशन और इंफेट मोरटिलटी नामक रिपोर्ट को इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीटयूट, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और ओहयो स्टेट यूनिवर्सिटी ने तैयार की है। इस शोध पत्र के लेखकों ने वर्ष 2011 से 2020 तक 35 राज्यों और 640 ज़िलों में एक वर्ष से कम आयु के शिशुओं और पाँच साल से कम आयु के बच्चों की मुत्यु दर का अध्ययन किया। इस अध्ययन में बताया इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि स्वच्छ भारत मिशन में शौचालयों का निर्माण बड़े स्तर पर हुआ और संभव है कि बड़ी संख्या में शौचालयों के निर्माण की वजह से मुत्यु दर में कमी आयी है। इसके अलावा शुद्ध पानी और सफ़ाई की उपलब्धता के कारण भी शिशु मुत्यु दर में की आयी है।

विश्लेषण यह भी बताता है कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत 30 प्रतिशत से अधिक शौचालय कवरेज वाले ज़िलों में प्रति हज़ार जीवित जन्मों पर नवजात मृत्यु दर में 5.3 प्रतिशत और पाँच वर्ष से कम आयु में 6.8 प्रतिशत की कमी देखी गयी। अगर संख्या में देखें, तो यह आँकड़ा 60,000 से 70,000 का होगा। इसमें यह भी बताया गया है कि किस तरह पहले खुले में शौच की वजह से डायरिया और अन्य इस तरह की बीमारियों से बच्चे मर जाते थे, जिनमें आज काफ़ी कमी आयी है।

ग़ौरतलब है कि स्वच्छता यानी साफ़-सफ़ाई को बीती सदी से ही महत्त्वपूर्ण जन स्वास्थ्य हस्तक्षेपों में से एक माना जाता है, इसके प्रमाण 1900 के शुरुआती वर्षों में अमेरिका व पश्चिमी देशों में शिशु मृत्यु दर में जबरदस्त गिरावट वहाँ की साफ़-सफ़ाई की सेवाओं को सुधारने से दर्ज की गयी। भारत में वर्ष 2003 में प्रति हज़ार जीवित जन्मों पर नवजात मृत्यु दर 60 थी, जो 2020 में गिरकर 30 रह गयी। लेकिन यह रिपोर्ट इस ओर भी रेखांकित करती है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा व आंध्र प्रदेश में कुछ ऐसी जगह हैं, जहाँ नवजात मृत्यु दर 45 से 60 लगातार प्रति हज़ार बनी हुई है। सरकार को इसमें सुधार लाने के विशेष प्रयास करने होंगे। इसके साथ ही इस रिपोर्ट के लेखकों ने यह भी कहा है कि हालाँकि लाभों के बावजूद जाति और धर्म आधारित भेदभावपूर्ण प्रथाओं के कारण शौचालयों को अपनाने और इस्तेमाल करने में असमानताएँ बनी हुई हैं। यह बहुत बड़ी चिंता का विषय है। स्वच्छ भारत मिशन के कई पहलू हैं। नि:संदेह नवजात व पाँच साल से कम आयु के बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार वाला बिंदु इससे जुड़ा हुआ है। लेकिन इसके साथ-साथ जैसा कि रिपोर्ट में इनके इस्तेमाल में भेदभावपूर्ण वाले बिंदु को रेखांकित किया गया है, सरकार को इसकी पड़ताल करके उसकी ओर प्रभावी क़दम उठाने होंगे। न्यायसंगत कार्यान्वयन की दरकार है। दूसरी ओर देश में हर साल कुपोषण से पाँच साल से कम उम्र के 5,00,000 बच्चे मर जाते हैं। इससे पता चलता है कि आँगनबाड़ी के ज़रिये सरकारेेंपोषक आहार देने में असफल हैं। दुनिया के कई देशों में कुपोषण से बच्चे मर रहे हैं; लेकिन भारत में सिर्फ़ यह संख्या 20 प्रतिशत से ज़्यादा है। ऐसे में शौचालयों का बनाना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं मानी जा सकती।

भारत ने एशियन चैंपियंसट्रॉफी 2024 के फाइनल में चीन को 1-0 से हराकर गोल्ड मेडल जीता

नई दिल्ली : भारत ने एशियन चैंपियंस ट्रॉफी 2024 के फाइनल में चीन को 1-0 से हराकर गोल्ड मेडल जीत लिया। इस निर्णायक मुकाबले में भारत के लिए एकमात्र गोल जुगराज सिंह ने किया, जो अंततः विजयी साबित हुआ। भारत ने कुल पांचवीं बार एशियन चैंपियंस ट्रॉफी का खिताब अपने नाम किया है। चीन ने पहली बार फाइनल में जगह बनाई थी और उससे पहले ही बार में शिकस्त मिली है।

भारत की टीम ने टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन करते हुए सेमीफाइनल तक 25 गोल किए थे, जबकि चीन ने इस दौर में केवल 10 गोल किए थे। हालांकि, फाइनल में चीन ने भारत को कड़ी चुनौती दी, लेकिन भारतीय टीम ने अपने शानदार खेल से जीत दर्ज की। इस महत्वपूर्ण जीत के साथ भारत ने एक बार फिर अपने हॉकी कौशल और टीम स्पिरिट का लोहा मनवाया है।

इससे पहले सेमीफाइनल में भारतीय हॉकी टीम ने कोरिया को 4-1 से शिकस्त दी थी। सेमीफाइनल में कोरियाई टीम के खिलाफ हरमनप्रीत सिंह, उत्तम सिंह और जरमनप्रीत सिंह ने गोल किए। कप्तान हरमनप्रीत ने कुल दो गोल किए थे।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने आतिशी को नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया

नई दिल्ली: दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) ने आतिशी को राजधानी का नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया है। विधायक दल की बैठक में उनके नाम पर मुहर लगाई गई, जिसमें पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने आतिशी के नाम का प्रस्ताव रखा। सभी विधायकों ने खड़े होकर इस प्रस्ताव को स्वीकार किया, जिससे आतिशी दिल्ली की तीसरी महिला मुख्यमंत्री बन गई हैं। इससे पहले सुषमा स्वराज और शीला दीक्षित इस पद पर काबिज रह चुकी हैं।

अरविंद केजरीवाल आज शाम 4:30 बजे उपराज्यपाल (LG) विनय सक्सेना को अपना इस्तीफा सौंपेंगे। इस हफ्ते नए मुख्यमंत्री और उनके कैबिनेट का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया जाएगा। इसके साथ ही, 26 और 27 सितंबर को दिल्ली विधानसभा का दो दिवसीय सत्र भी बुलाया गया है।

केजरीवाल ने 13 सितंबर को शराब नीति केस में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद 15 सितंबर को मुख्यमंत्री पद छोड़ने का ऐलान किया था। उन्होंने कहा, “अब जनता तय करे कि मैं ईमानदार हूं या बेईमान। जनता ने दाग धोया और विधानसभा चुनाव जीता तो फिर से कुर्सी पर बैठूंगा।”