‘वामपंथी उग्रवाद’ का नया प्रतिवाद!

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इलस्ट्रेशनः आनंद नॉरम

बस्तर में इन दिनों अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है. कई दिनों से न तो पुलिस-नक्सली मुठभेड़ हुई है, न ही नक्सलियों ने एंबुश लगाकर सुरक्षाबल के जवानों को निशाना बनाया है. केंद्र में नई सरकार बनने के कुछ दिनों पहले से ये हालात इन क्षेत्रों में दिखाई दे रहे हैं. कहा जा रहा है कि माओवादी बगैर किसी गतिविधि को अंजाम दिए इस समय केवल सरकार के मंसूबों को भांपने में लगे हैं. दूसरी तरफ राज्य सरकार भी अपनी शक्ति बढ़ानें में जुटी हुई है. दोनों तरफ की यह शांति बस्तरवासियों को बेचैन किए हुए है.

सूत्रों से मिली जानकारी पर विश्वास किया जाए तो इस शांति के पीछे असल कहानी यह है कि नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ समेत सभी राज्यों में बड़े संयुक्त नक्सल विरोधी ऑपरेशन की तैयारी की जा रही है. इस ऑपरेशन की खासियत यह होगी कि इसमें केंद्र और राज्यों के सभी विभाग मिलकर काम करेंगे. गृह मंत्रालय इस ऑपरेशन की नोडल एजेंसी होगा. बस्तर में पुलिस विभाग में बड़े फेरबदल के साथ इसकी भूमिका बननी शुरू हो चुकी है. केंद्र सरकार ने भी बस्तर में तैनात करने के लिए अर्द्धसैनिक बलों की अतिरिक्त 10 बटालियन देने के साथ ऑपरेशन को हरी झंडी दिखा दी है.

बस्तर में नए सिरे से नक्सल विरोधी ऑपरेशन शुरू होने से पहले केंद्र सरकार ने माओवाद को एक नया आधिकारिक नाम ‘वामपंथी उग्रवाद’ भी दे दिया है. इस नए नाम से ही जाहिर है कि केंद्र सरकार नक्सलवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपना चुकी है और इससे आतंकवाद की तरह पेश आने की तैयारी कर रही है. पुलिस के खुफिया सूत्र बता रहे हैं कि इस वक्त माओवादी भी थोड़े कमजोर पड़े हैं. उनके कैडर में भर्ती होने वाले नए रंगरूटों की संख्या तेजी से कम हुई है. लोगों का विश्वास भी उनके प्रति थोड़ा कम हुआ है.

राज्य सरकार इस अवसर का पूरा फायदा उठाने के लिए तैयार दिख रही है. इसी रणनीति पर आगे बढ़ते हुए उसने बस्तर संभाग के सात जिलों में से पांच में पुलिस कप्तान बदल दिए हैं. छत्तीसगढ़ सरकार ने आईपीएस एसआरपी कल्लूरी को आईजी बनाकर बस्तर भेजा है. कल्लूरी को नक्सल मोर्चे का विशेषज्ञ माना जाता है. वे नक्सल मोर्चे पर सीधी लड़ाई के पैरोकार रहे हैं. सरगुजा को नक्सलमुक्त इलाका बनाने का श्रेय भी कल्लूरी को ही दिया जाता है. यह बात अलग है कि कल्लूरी धुर नक्सली इलाके ताड़मेटला, मोरपल्ली गांवों में तीन सौ घरों में आगजनी के मामले को लेकर जांच के घेरे में भी रहे हैं. ताड़मेटला जाते वक्त स्वामी अग्निवेश पर हुए हमले का जिम्मेदार भी उन्हें ही ठहराया गया था. लेकिन उनकी पोस्टिंग बस्तर में किए जाने को राज्य सरकार के इस संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि माओवादी मोर्चे पर कुछ नीतिगत बदलाव किए गए हैं.

अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक आरके विज तहलका को बताते हैं, ‘ हमने इस समय बस्तर में ज्यादा अनुभवी अधिकारियों की तैनाती की है. यह भी सच है कि हमने नक्सलवाद से निपटने के लिए नए सिरे से एक ठोस रणनीति बनाई है. लेकिन हमारी योजना में विकास का भी उतना ही महत्व है जितना की पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के उपयोग का. हम चाहते हैं कि नक्सलियों को पीछे खदेड़ने के साथ हम विकास भी करते चलें ताकि उन्हें दोबारा पनपने का मौका ही न मिल पाए. यही कारण है कि हमारे एक्शन प्लान में न केवल पुलिस बल्कि पीडब्ल्यूडी, शिक्षा, पेयजल, दूरसंचार जैसे दूसरे विभागों की भी जिम्मेदारी तय की जा रही है.’

इस हफ्ते की शुरुआत में नई दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ हुई एक बैठक में मुख्यमंत्री रमन सिंह का भी कहना था कि देश से वामपंथी उग्रवाद को समाप्त करने के लिए सबसे बड़ी लड़ाई बस्तर में लड़नी होगी. रमन सिंह ने अपनी बात रखते हुए यह भी कहा कि एक बार अगर हम बस्तर के सभी हिस्सों में शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, रोजगार और अधोसंरचना का जाल फैलाने में कामयाब हो गए तो फिर माओवादी आम लोगों को गुमराह नहीं कर पाएंगे और इस समस्या का स्थाई हल निकाला जा सकेगा. रमन सिंह ने बैठक में केंद्र से सुरक्षा बलों की अतिरिक्त 26 बटालियन भी मांगी. हालांकि केंद्र ने फिलहाल छत्तीसगढ़ को 10 बटालियन देने को मंजूरी दी है.

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अब तक का नुकसान
राज्य बनने के बाद से लेकर 2014 तक 14 सालों में नक्सलियों ने हर विभाग को नुकसान पहुंचाया है. अब तक नक्सलियों द्वारा 119 सड़क और पुलियों को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया गया है. वहीं आम लोगों के 739 वाहन भी उनका निशाना बने हैं. बैंक में लूट और नुकसान की 19 घटनाएं नक्सलियों के नाम दर्ज हैं. वन विभाग के डिपो और भवनों को नुकसान पहुंचाने का आंकड़ा 77 है. इन सालों में नक्लवादियों ने 113 स्कूलों को बम लगाकर उड़ाया है तो वहीं 75 सांस्कृति भवनों को भी ध्वस्त किया है. दर्जनों अस्पताल व 34 सार्वजनिक वितरण प्रणाली की इकाइयां भी नक्सल आंदोलन के निशाने पर आई हैं.

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इस वक्त पूरे छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ, आईटीबीपी जैसे सुरक्षा बलों की 36 बटालियन तैनात हैं. इनमें से दो सरगुजा में और पांच राजनांदगांव, धमतरी और गरियाबंद में कैंप बनाकर तैनात हैं. वहीं 29 बटालियन अकेले बस्तर में लगाई गई हैं. केंद्र सरकार जो 10 बटालियन भेजने पर राजी हुई है वे भी सीधे बस्तर भेजी जाएंगी. यानी बस्तर में 39 बटालियन हो जाएंगी. एक बटालियन में 780 जवान होते हैं, लेकिन मोर्चे पर लड़ने के लिए 400 से 450 जवान ही मौजूद होते हैं. कहने का मतलब यह की आने वाले दिनों में बस्तर को 5,000 अतिरिक्त जवान मिलेंगे. पहले से तैनात जवानों की संख्या 18 से 20 हजार के आसपास है. अब जवानों की कुल संख्या लगभग 25 हजार हो जाएगी. जबकि छत्तीसगढ़ में करीब 40 सक्रिय माओवादी संगठन हैं. इनमें करीब 50 हजार सशस्त्र माओवादी शामिल हैं और एक अनुमान के मुताबिक इसमें 44 प्रतिशत के आसपास महिलाएं हैं. ये सभी प्रशिक्षित लड़ाके हैं, जिन्हें छापामार लड़ाई के लिए तैयार किया गया है. माओवादी लड़ाके अपनी जान पर खेलने के लिए तैयार रहते हैं. ऐसे में राज्य सरकार की योजना नक्सलवादियों की अपेक्षा लगभग आधे जवानों के भरोसे कितनी सफल हो पाएगी इस पर संदेह उठना लाजिमी है. इस बारे में साउथ एशिया टेरेरिज्म पोर्टल और इंस्टीट्यूट ऑफ कॉनफ्लिक्ट मैनेजमेंट के एक्जीक्यूटीव डायरेक्टर अजय साहनी कहते हैं, ‘छत्तीसगढ़ को त्रिपुरा से सीखना चाहिए. हर बार यह कह देना की जवानों की संख्या कम है, इसलिए हम नक्सल मोर्चे पर विफल हैं, ठीक बात नहीं है. त्रिपुरा में उग्रवादियों से निपटने के लिए ऐसी रणनीति बनाई गई थी कि कम जवान भी हर बार दुश्मन पर भारी पड़ते थे. त्रिपुरा के जंगल छत्तीसगढ़ से ज्यादा घने थे लेकिन समस्या के मूल को समझकर सही रणनीति बनाने से ही सफलता मिल सकती है.’ साहनी एक अहम बात यह भी बताते हैं, ‘ नक्सलवाद से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें नए सिरे से सक्रिय हो रही हैं, यह अच्छी बात है. लेकिन मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि पहले सही रणनीति बनाई जाए, फिर टारगेट तय किया जाए. अब तक छत्तीसगढ़ में इसके उलट होता आया है. पहले टारगेट तय किया जाता है फिर उसे पाने के लिए सच्चे-झूठे तरीके अपनाए जाते हैं. अगर नक्सलवाद से निपटने की रणनीति को हम लक्ष्य केंद्रित बना देंगे तो लक्ष्य प्राप्ति दिखाने के लिए सही और गलत तरीके अपनाए ही जाएंगे. इसे रोका नहीं जा सकता. इसलिए छत्तीसगढ़ को पंजाब, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा से सीखना चाहिए कि किस तरह अपनी समस्या को सही तरीके से समझकर फिर कारगर योजना बनानी चाहिए. केवल फोर्स लगा देने से नक्सलवाद खत्म नहीं हो सकता.’

केंद्र और राज्य सरकार की नक्सलविरोधी नई रणनीति पर पुलिस महकमे का एक तबका काफी संतुष्ट नजर आ रहा है. नाम न छापने की शर्त पर पुलिस मुख्यालय में पदस्थ एक अधिकारी बताते हैं, ‘अब नक्सलवाद से जिस तरह हम निपटना चाहते हैं, वैसा कर सकेंगे. केंद्र की नई सरकार कम से कम हमारी बात को धैर्य से सुन रही है. पहले दस तरह के सवाल किए जाते थे, लेकिन इस बार की पहली ही बैठक में हमें न केवल सुना गया बल्कि हमारी कई मांगों पर हाथों हाथ अनुमति दे दी गई.’

माओवादी भी केंद्र सरकार के रुख को समझ रहे हैं. यही कारण है कि नक्सलियों ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाना शुरू कर दिए हैं. भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की सेंट्रल कमेटी के प्रवक्ता अभय की तरफ से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, ‘अच्छे दिन आ गए हैं, यह सुनकर लोग इस भ्रम में है कि यह सुशासन की शुरुआत है और नरेंद्र मोदी कुछ परिवर्तन लाएंगे. यह सरकार विकास के नहीं हिंदू फासीवादी एजेंडे पर चलेगी और जन आंदोलन को कुचलेगी..’ प्रेस विज्ञप्ति में यह भी आरोप लगाया गया है कि अकेले नरेंद्र मोदी की छवि चमकाने के लिए कॉर्पोरेट मीडिया में 30 हजार करोड़ रुपया खर्च किया गया.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि माओवाद छत्तीसगढ़ के लिए विकास अवरोधक की भूमिका निभाता आया है. बस्तर के पिछड़ेपन को इसी बात से समझा जा सकता है कि इस इलाके के राष्ट्रीय राजमार्ग भी खस्ताहाल हैं. जगदलपुर से कोंटा और गीदम से भोपालपटनम जाने वाले दो राष्ट्रीय राजमार्गों पर सड़क आपको ढूंढे से नहीं मिलेगी. इसके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं भी बस्तर के रहवासियों की पहुंच से बाहर हैं. खुद पुलिस या सुरक्षा बलों के जवानों के लिए बस्तर में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना आसान नहीं होता. यही कारण है कि केंद्र सरकार राज्य को चार हैलीकॉप्टर देने को भी राजी हो गई है. एडीजी नक्सल ऑपरेशन आरके विज कहते हैं, ‘ हम नक्लसियों पर कोई हवाई अटैक नहीं करने जा रहे. लेकिन हमें अतिरिक्त हेलीकॉप्टर चाहिए थे क्योंकि हम पुलिस और सुरक्षा बलों के मूवमेंट को आसान बनाना चाहते हैं. किसी भी इमरजैंसी में हम कम से कम समय पर मौके पर पहुंचे, इसके लिए हमें हैलीकॉप्टर की जरूरत पड़ती है. अब अगर में हम नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने की दिशा में बढ़ रहे हैं तो इसमें किसी को कोई आपत्ति क्यों है. इस बार हम रिजल्ट चाहते हैं, इसलिए हर वह कदम उठाएंगे, जो जरूरी होगा.