धर्म का धर्म

imh4जब भी हम धर्म पर विचार करते हैं तो किसी धर्म विशेष को उसके किसी मूर्त बिंदु जैसेकि कोई विशिष्ट व्यक्ति या विधि के हिसाब से देखने लगते हैं. लेकिन धर्म वास्तव में किसी व्यक्ति विशेष के क्रियाकलाप नहीं हैं और न ही किसी विधि विशेष का अनुसरण. ये तो उसके बाह्य स्वरूप मात्र हैं. किसी भी विचार या संकल्पना के बाह्य स्वरूप से उसे पूर्ण समग्रता के साथ परिभाषित नहीं किया जा सकता. जैसे जल का बाह्य स्वरूप तरल और शीतल है लेकिन उसका अंतस दो अत्यंत प्रज्वलनशील गैसों हाइड्रोजन और आॅक्सीजन की संधि का परिणाम है. मात्र इतना कह देना कि जल शीतल और तरल है, जल की आधी-अधूरी परिभाषा होगी. लोगों की अलग-अलग समझ है और इसलिए विशिष्ट व्यक्तियों और विधियों को देखने-समझने का उनका तरीका भी अलग है. इसलिए धर्म की कोई सार्वभौमिक, सर्वमान्य और समग्र परिभाषा नहीं होती. किसी एक समूह को कोई एक परिभाषा मान्य होती है जिसे अपनाकर वह अपना धर्म मान लेता है तो किसी दूसरे समूह को कोई दूसरी. जितने समूह उतने धर्म. धर्म का प्रचलित स्वरूप समाज के समूह विशेष की अस्मिता को परिभाषित करता है परिणामस्वरूप वह धर्म को एक ब्रांड के रूप में उपयोग में लाता है.

राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर और नानक किसी समूह विशेष के धर्म की स्थापना के लिए नहीं आए, वे आए थे शिथिल समाज को स्पंदित करने के लिए. परंतु समाज ने उन्हें अपनी अस्मिता हेतु अपने समूह का ब्रांड एंबेसडर बना दिया. गैर भारतीय समाजों में भी यही हुआ.

ज्ञान का प्रथम पाठ शंका है. शंका की कोख से ही ज्ञान की उत्पत्ति होती है. शंका नहीं होगी तो अन्वेषण और चिंतन नहीं होगा और इनके न होते हुए ज्ञान अर्जित नहीं होगा. ज्ञान का केंद्र मस्तिष्क या बुद्धि है. लेकिन अध्यात्म इनपर आधारित नहीं होता तो वह कैसे परिभाषित होगा? मनुष्य इसे अनुभव करता है. ज्ञान से अध्यात्म अप्राप्य है.

क्या समाज का कोई सामूहिक अध्यात्म भी होता है? सरसरी तौर से सोचने पर लगता है कि शायद सामूहिक अध्यात्म का वजूद नहीं होता लेकिन थोड़ा गहराई से सोचें तो अन्य समाजों में न सही लेकिन भारतीय समाज के मानस में सामूहिक अध्यात्म एक अविभाज्य अंग रहा है.

जब धर्म संस्थागत होने लगता है तो वह समाज को अपनी जकड़न में बांधता है जबकि उसका उद्देश्य मनुष्य को मुक्त करना है. संस्थागत धर्म कभी-कभी प्रकृति के मूल नियमों के विरुद्ध चलने लगता है

यदि समाज का सामूहिक धर्म और अध्यात्म एक नहीं होते तो यह द्वंद्व की स्थिति है. भारतीय समाज ने इस द्वंद्व को बहुत ही सकारात्मक ढंग से जीना सीखा. इस समाज में धर्म और अध्यात्म का द्वंद्व उन दो धागों की तरह है जिसमें एक की गति ऊर्ध्वाधर (वर्टिकल) होती है तो दूसरा धागा उसे क्षैतिज (हॉरिजेंटल)दिशा से काटता है. जिस तरह वस्त्र का निर्माण ताने और बाने की परस्पर विरोधी दिशाचाल का परिणाम है उसी तरह धर्म और अध्यात्म के द्वंद्व के परिणामस्वरूप ही इस समाज का निरंतर निर्माण और विकास हुआ.

भारतीय समाज में दो मुख्य धर्म समूह – हिंदू और मुसलमान – कभी-कभी अपनी ही दिशा को सही दिशा मानने लगते हैं और दूसरे की दिशा और गति को रोकने का काम करते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि इस जिद से तो इस समाज के विकास का ह्रास ही होगा. भले ही यह स्थिति एक छोटे कालखंड तक ही सीमित रहती है लेकिन अपना प्रभाव अवश्य छोड़ जाती है.

सन 1993 के बाद से उभरती इस जिद को दोनों भारतीय समाजों को घटनामात्र मानकर भूलना नहीं चाहिए. इसे भूलना एक बड़ी भूल होगी बल्कि उससे यह सबक लेना होगा कि विचारों की भिन्नता के पारस्परिक द्वंद्व का ह्रास इस संपूर्ण समाज के अस्तित्व के लिए घातक होगा.

दुनिया के अन्य समाजों के समकक्ष भारतीय समाज अत्यंत विशिष्ट है. यह समाज दुनिया की हर धर्म पद्धति, हर रंग और रूप के साझेपन को अपने में संजोए है. यह उसी समाज में संभव है जहां समाज की आध्यात्मिक चेतना उसके मानस में मौजूद हो. यह वही सामाजिक अध्यात्म है जिसने इस समाज को तरल और लचीला बनाया. जो समाज कठोर और खुश्क थे वे टूट गए. भले ही कभी बेहद सशक्त एवं विशाल क्यों न रहे हों. अल्लामा इक़बाल जब यह प्रश्न पूछते हैं कि:

यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहां से,
अब तक मगर है बाकी नाम ओ निशां हमारा.
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा.

इक़बाल के प्रश्न का उत्तर इस समाज की तरलता और लचीलापन है जिसने उसकी हस्ती को बचाए रखा.

भारतीय समाज यह बखूबी जानता है कि आध्यात्मिकता हिंदू, बौद्ध या ईसाई नहीं होती. उस पर किसी धर्म का आवरण नहीं चढ़ सकता. यह समाज यदि लचीला न होता तो शिरडी के एक मुसलमान फकीर को हिंदू समाज, साईं का दर्जा न देता और अपना आराध्य न बनाता. और न ही मुसलमान अपनी पूजा पद्धति को नमाज की संज्ञा देते. कुरान के मुताबिक इस्लामी पूजा ‘सलात’ के नाम से जानी जाती है लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप का मुसलमान तो इसे नमाज कहकर अदा करते हैं. नमाज का उद्गम नम: शब्द सेे हुआ है.

समाज की धार्मिक अस्मिता और आध्यात्मिकता अलग-अलग रहकर शिथिल और निष्क्रिय ही रहेंगी.  आध्यात्मिकता के पास दृष्टि होती है किंतु गति नहीं और समाज की धार्मिक अस्मिता के पास गति तो है लेकिन दिशा ज्ञान नहीं. धर्म और आध्यात्मिकता का संगम दृष्टि एवं दिशा का मेल होगा. यदि यह समाज इस मिलाप के तारतम्य को समझ कर चलेगा तो इसके विकास और नवनिर्माण की क्रिया निर्बाध चलती रहेगी. यह इस समाज को समझना होगा कि अब तक इसी मिलाप और सामंजस्य के तहत विपरीत परिस्थितियों में भी इसका ह्रास नहीं हुआ. इसीलिए बहुतेरे समाज बने और बिगड़े लेकिन भारतीय समाज अब भी जिंदा और गतिशील है.

जब धर्म संस्थागत होने लगता है तो वह समाज को अपनी जकड़न में बांधता है जबकि उसका मूल उद्देश्य मनुष्य को मुक्त करना है. यह संस्थागत धर्म कभी-कभी तो प्रकृति के मूल नियमों के विरुद्ध आचरण करने लगता है. इस परिस्थिति में संस्था सर्वोच्च होने लगती है और धर्म गौण. ईसाई धर्म में जब चर्च और उसका पादरी सर्वोपरि हुआ तो वह गैलीलियो की मुक्त आवाज को जकड़ लेता है जिसने बाइबल के उस सिद्धांत को चुनौती दी जिसमें कहा गया था कि सूर्य पृथ्वी के इर्द-गिर्द घूमता है. जबकि गैलीलियो ने यह सिद्ध किया कि पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है. गैलीलियो के इस विचार को धर्म विरुद्ध करार दिया और उससे कहा गया कि या तो वह माफी मांग ले और अपनी पुस्तक से वह अंश निकाल दे जो बाइबल और चर्च के खिलाफ है नहीं तो मृत्युदंड भुगतने के लिए तैयार रहे. गैलीलियो ने कहा कि वह अपनी पुस्तक से इस अंश को निकाल तो लेगा परंतु यह तो किसी भी हाल में लिखेगा कि गैलीलियो के माफी मांगने के बावजूद भी पृथ्वी ही सूर्य के चक्कर लगाएगी!

आज दुनिया के समस्त तथाकथित विकसित समाजों में बाजार नाम की संस्था सर्वोच्च बन रही है जो मनुष्य के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का केंद्र बन बैठी है और प्रकृति पर विजित होने का दंभ भरने लगी है. मानवीय मूल्यों और प्रकृति को बिकने वाली वस्तु बना दिया है. बाजार की मठाधीशी आज दुनिया का सबसे बड़ा संकट है और इस समय धर्म और अध्यात्म का यह कर्त्तव्य बन पड़ता है कि वह बाजार की संस्था को चुनौती दे और मानवीय मूल्यों और प्राकृतिक उपहारों को ‘माल’ में तब्दील कर उन्हें बेचने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाए. धर्म का यह कर्त्तव्य बनता है कि वह प्रकृति के हर पदार्थ और जीव को उसका प्राकृतिक धर्म निभाने में सहायक सिद्ध हो. यही धर्म का धर्म है और उससे यही आशा भी है और विश्वास भी.

आशाएं और आशंकाएं
31 जनवरी 2009