‘मुसलमानों को भारत से निकालना हिंदुत्व नहीं’, धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक: RSS प्रमुख मोहन भागवत

RSS प्रमुख मोहन भागवत न्यूयॉर्क में वन वर्ल्ड वन ह्यूमैनिटी कार्यक्रम में भाषण देते हुए
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में हिंदुत्व, धर्म और मानवता को लेकर बड़ा बयान दिया।

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को न्यूयॉर्क के ‘वन वर्ल्ड वन ह्यूमैनिटी’ कार्यक्रम में हिंदुत्व, धर्म और मानवता को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा, “अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुस्लिम नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह सकता। हिंदू होने का मतलब यह मानना है कि सभी रास्ते एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं और हर इंसान की गरिमा एक समान है।”

भागवत ने कहा कि वे खुद कोई धार्मिक विद्वान नहीं हैं। जिस समाज में वे काम करते हैं, उसकी परंपरा मानती है कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है। सभी रास्ते ईश्वर तक जाते हैं।

भागवत ने कही धर्म से जुड़ी 4 बड़ी बातें

भागवत ने कहा- धर्म हमें सत्य की ओर ले जाता है, 4 बड़ी बातें:

  1. सत्य एक है और पूरी मानवता उसी की उपज है। लोग अपनी सोच और नज़रिए के अनुसार सत्य को अलग-अलग तरीके से समझते और व्यक्त करते हैं।
  2. कर्मकांडों का अनुशासन जरूरी। उन्होंने कहा कि धार्मिक अनुशासन और कर्मकांड व्यक्ति को दिव्यता की ओर बढ़ने में मदद करते हैं।
  3. ‘एक विश्व, एक मानवता’ की परंपरा। भागवत ने कहा कि भारत की ‘एक विश्व, एक मानवता’ की परंपरा आज भी मौजूद है और लोगों को अनावश्यक बोझ से मुक्त होकर मानवता को समझना चाहिए।
  4. राजनीति स्वार्थ का खेल। उन्होंने कहा कि ‘मैं और मेरा’ की सोच समाधान नहीं देती। इसके बजाय ‘हम और हमारा’ की भावना जरूरी है। बदलाव की शुरुआत राजनीति से नहीं, बल्कि समाज से होनी चाहिए।

न्यूयॉर्क में इस्कॉन सेंटर भी पहुंचे भागवत

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को न्यूयॉर्क में दुनिया के पहले इस्कॉन सेंटर का दौरा किया था। मंदिर में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि आज दुनिया में कई तरह के संघर्ष हैं। ऐसे समय में ‘कृष्ण चेतना’ शांति ला सकती है।

भागवत 26 सेकंड एवेन्यू स्थित उस जगह पर भी पहुंचे, जहां स्वामी प्रभुपाद ने जुलाई 1966 में इस्कॉन की स्थापना की थी।

मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भी कार्यक्रम

भागवत शनिवार देर रात यानी भारतीय समयानुसार करीब 1 बजे न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भी स्पीच देंगे। इस कार्यक्रम में करीब 5,000 लोगों के शामिल होने की उम्मीद है।

2018 में भी अमेरिका गए थे भागवत

मोहन भागवत इससे पहले सितंबर 2018 में अमेरिका गए थे। उन्होंने शिकागो में 7 से 9 सितंबर 2018 तक आयोजित दूसरे वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस में हिस्सा लिया था।

इस कार्यक्रम में 60 देशों से करीब 2,500 प्रतिनिधि शामिल हुए थे। भागवत ने कांग्रेस के उद्घाटन सत्र में मुख्य भाषण दिया था।

दुनिया के सामने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश

अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में डॉ. भागवत की उपस्थिति किसी राजनीतिक अभियान का स्वरूप नहीं रखती। इसका मूल भाव भारत, हिंदू समाज और संघ को लेकर बनी धारणाओं के बीच प्रत्यक्ष संवाद, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भारतीय दृष्टि को समकालीन विश्व के सामने रखना और हिंदू समाज को यह विश्वास दिलाना है कि अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ खड़े रहना आधुनिकता अथवा लोकतांत्रिक नागरिकता के विरुद्ध नहीं है।

संघ की दृष्टि में भारतीयता का अर्थ किसी के प्रति वैमनस्य नहीं, बल्कि स्वयं को जानकर दुनिया से अधिक आत्मविश्वास और आत्मीयता के साथ जुड़ना है।

संघ के शताब्दी वर्ष से जुड़ी यात्रा

यह संयोग नहीं है कि इस यात्रा का समय संघ के शताब्दी वर्ष से जुड़ा है। सौ साल पूरे करना किसी संगठन के लिए केवल उत्सव का क्षण नहीं होता, बल्कि यह आत्ममंथन का भी अवसर होता है।

संघ अपने इस शताब्दी-वर्ष को समाज में ‘अपनत्व’ बढ़ाने का वर्ष मानता है। व्यक्ति को परिवार से, परिवार को समाज से, समाज को राष्ट्र से और राष्ट्र को विश्व से जोड़ने का भाव संघ की भाषा में संगठन और सेवा का आधार है।

डॉ. भागवत की यात्रा उस भावना को भारत की सीमाओं से बाहर, प्रवासी हिंदू समाज और पश्चिमी लोकतांत्रिक समाजों तक पहुंचाने का प्रयास है।

विदेशों में संघ का संवाद नया नहीं

संघ का विदेशों में संवाद नया नहीं है। भारतीयों के विदेश जाने के साथ ही सांस्कृतिक जुड़ाव की आवश्यकता भी पैदा हुई।

1946 में केन्या जा रहे एक जहाज पर शाखा लगने का उल्लेख संघ की प्रवासी-यात्रा के आरंभिक प्रतीक के रूप में किया जाता है। 1947 में नैरोबी में भारतीय स्वयंसेवक संघ की औपचारिक स्थापना हुई।

बाद के दशकों में ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और अन्य देशों में हिंदू स्वयंसेवक संघ के माध्यम से यह कार्य विकसित हुआ। इन संस्थाओं ने स्थानीय कानूनों और नागरिक संरचना के भीतर रहकर बच्चों के संस्कार-वर्ग, युवाओं के प्रशिक्षण, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सेवा-कार्यों और समुदाय-संपर्क की परंपरा विकसित की।

संघ प्रमुख की यात्रा का व्यापक संदेश

डॉ. मोहन भागवत की अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन यात्रा को यदि केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक का विदेश दौरा माना जाए, तो उसके बड़े अर्थ को समझना कठिन होगा।

यह यात्रा संघ के शताब्दी वर्ष में उस सांस्कृतिक चेतना का स्वाभाविक विस्तार है, जिसने एक शताब्दी तक भारत में व्यक्ति-निर्माण, समाज-संगठन और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का कार्य किया है।

आज वही चेतना विश्व के उन देशों तक संवाद का हाथ बढ़ा रही है, जहां भारतीय मूल के लाखों लोग अपनी मेहनत, प्रतिभा और संस्कारों के बल पर सम्मानजनक स्थान बना चुके हैं।

सरसंघचालकों की विदेश यात्राएं

सरसंघचालकों के विदेश संवाद भी समय-समय पर होते रहे हैं। रज्जू भैया ने 1997 में केन्या और 1998 में जापान की यात्रा की।

डॉ. भागवत 2016 में ब्रिटेन और यूरोप के हिंदू समाज से संवाद कर चुके हैं। 2018 में शिकागो में विश्व हिंदू कांग्रेस के मंच से उन्होंने हिंदू समाज की एकता और विश्व कल्याण की भारतीय दृष्टि पर बात की थी।

सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले की हाल की ब्रिटेन, अमेरिका और जर्मनी यात्राएं भी यह संकेत देती हैं कि संघ अब विदेशों में केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालयों, चिंतकों, नीति-विमर्श और व्यापक नागरिक समाज से बातचीत को भी महत्व दे रहा है।