
तहलका एक्सक्लूसिव….
आईसीएमआर के 20 अस्पतालों के अध्ययन में कार्बापेनेम-प्रतिरोधी संक्रमणों से जूझ रहे मरीजों में मौत का खतरा ज्यादा मिला; कुछ गंभीर मामलों में हर दो में से एक पेशेंट की जान गई
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
एंटीबायोटिक दवाओं का असर खत्म होना अब सिर्फ डॉक्टरों और अस्पतालों के लिए चिंता की बात नहीं है। यह सीधे मरीज की जिंदगी और परिवार की जेब पर असर डालने वाला खतरा बन रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के 20 बड़े अस्पतालों में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि कार्बापेनेम-प्रतिरोधी संक्रमण, यानी ऐसे संक्रमण जिन पर कार्बापेनेम जैसी महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक दवाओं का असर नहीं होता, मरीजों के लिए ज्यादा जानलेवा और महंगे साबित हो रहे हैं। सबसे गंभीर तस्वीर तब सामने आई, जब संक्रमण खून में फैल गया। ऐसे मामलों में कुछ प्रमुख बैक्टीरिया से संक्रमित मरीजों में मृत्यु दर 46.4 से 50.8% तक रही। यानी कुछ गंभीर संक्रमणों में लगभग हर दो में से एक मरीज की मौत हुई।
यह अध्ययन आईसीएमआर के एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर- बैक्टीरिया पर दवाओं का असर कम या खत्म होने की स्थिति) निगरानी नेटवर्क के तहत अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 के बीच किया गया। इसमें देश के 20 बड़े अस्पतालों को शामिल किया गया, जहां गंभीर और जटिल मरीजों का इलाज होता है। अध्ययन के नतीजे द लैंसेट रीजनल हेल्थ- साउथईस्ट एशिया में हाल ही में प्रकाशित हुए।
1.59 लाख मरीजों के आंकड़ों से सामने आई तस्वीर
शोधकर्ताओं ने 20 अस्पतालों में भर्ती 1,59,336 मरीजों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इनमें 27,283 मरीजों में लैब टेस्ट से संक्रमण की पुष्टि हुई और 26,213 मरीजों में ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया यानी एक खास प्रकार के बैक्टीरिया का संक्रमण पाया गया। इनमें 16,025 यानी 61.1% मरीजों में कार्बापेनेम-प्रतिरोधी संक्रमण था।
अध्ययन में चार प्रमुख बैक्टीरिया- ई. कोलाई, क्लेब्सिएला न्यूमोनिया, एसीनेटोबैक्टर बॉमानी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा को देखा गया। इनके कार्बापेनेम-प्रतिरोधी संक्रमणों की तुलना उन्हीं बैक्टीरिया के ऐसे संक्रमणों से की गई, जिन पर कार्बापेनेम दवाएं असर करती थीं।
आखिर ये चार बैक्टीरिया क्यों बड़ी चिंता का कारण हैं?
ये बैक्टीरिया शरीर या आसपास के वातावरण में पाए जा सकते हैं, लेकिन अस्पताल में भर्ती और गंभीर रूप से बीमार मरीजों में इनके कारण गंभीर संक्रमण हो सकता है। खतरा तब बढ़ता है, जब इन पर कार्बापेनेम जैसी महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक दवाओं का असर भी खत्म हो जाए।
1. ई. कोलाई (Escherichia coli): यह आम तौर पर आंत में पाया जाने वाला बैक्टीरिया है, लेकिन शरीर के दूसरे हिस्सों में पहुंचने पर संक्रमण पैदा कर सकता है। इसके कार्बापेनेम-प्रतिरोधी संक्रमण में मृत्यु दर 24.4%, जबकि संवेदनशील संक्रमण में 17.3% रही।
2. क्लेब्सिएला न्यूमोनिया (Klebsiella pneumoniae): यह अस्पतालों में गंभीर संक्रमण से जुड़ा प्रमुख बैक्टीरिया है और कार्बापेनेम-प्रतिरोधी संक्रमणों में सबसे अधिक पाया गया है। ऐसे संक्रमण में मृत्यु दर 31.2% रही, जबकि संवेदनशील संक्रमण में 23.5% रही।
3. एसीनेटोबैक्टर बॉमानी (Acinetobacter baumannii): यह खास तौर पर अस्पताल में भर्ती गंभीर मरीजों के लिए चिंता का कारण है। इसके 95.1% संक्रमण अस्पताल से जुड़े पाए गए। प्रतिरोधी संक्रमण में मृत्यु दर 37.9%, जबकि संवेदनशील संक्रमण में 32.8% रही।
4. स्यूडोमोनास एरुजिनोसा (Pseudomonas aeruginosa): यह भी अस्पतालों में गंभीर मरीजों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। इसके 91.9% संक्रमण अस्पताल से जुड़े पाए गए। प्रतिरोधी संक्रमण में मृत्यु दर 28.9%, जबकि संवेदनशील संक्रमण में 20.2% रही।
कार्बापेनेम-प्रतिरोधी ई. कोलाई में मौत का जोखिम संवेदनशील संक्रमण की तुलना में 41% अधिक था, जबकि स्यूडोमोनास में 43% अधिक था। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इन मौतों के लिए केवल दवा-प्रतिरोध जिम्मेदार था। मरीज की हालत की गंभीरता, सही दवा मिलने में लगा समय, संक्रमण कहां से शुरू हुआ और उसके स्रोत को नियंत्रित किया जा सका या नहीं—इन सभी कारकों का असर भी पड़ सकता है।
संक्रमण मरीज के खून में पहुंचा तो खतरा और बढ़ा
अध्ययन का सबसे गंभीर निष्कर्ष ब्लडस्ट्रीम इंफेक्शन यानी रक्तप्रवाह संक्रमण को लेकर है। जब बैक्टीरिया खून में पहुंच जाता है तो संक्रमण पूरे शरीर में फैल सकता है और स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है। कार्बापेनेम-प्रतिरोधी एसीनेटोबैक्टर और स्यूडोमोनास से होने वाले रक्तप्रवाह संक्रमणों में मृत्यु दर 46.4 से 50.8% तक रही। कार्बापेनेम-प्रतिरोधी ई. कोयला में यह दर 39.3 से 44.8% के बीच रही। यानी गंभीर स्थिति में जब महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम हो जाता है, तो डॉक्टरों के पास संक्रमण को रोकने के प्रभावी विकल्प सीमित हो सकते हैं।
ऐसे में अस्पतालों से जुड़े संक्रमण बड़ी चिंता बने
अध्ययन में शामिल चारों बैक्टीरिया के संक्रमणों का बड़ा हिस्सा हेल्थकेयर-एसोसिएटेड यानी अस्पताल से जुड़े संक्रमण था। ई. कोलाई के 85%, क्लेब्सिएला के 91.6%, एसीनेटोबैक्टर के 95.1% और स्यूडोमोनास के 91.9% संक्रमण इसी श्रेणी में आए। रक्तप्रवाह संक्रमणों में भी 85% से अधिक मामले अस्पताल से जुड़े थे। कार्बापेनेम-प्रतिरोधी संक्रमण वाले मरीजों में ल्यूमिनल डिवाइस यानी शरीर के भीतर लगाई जाने वाली चिकित्सा नलियां या उपकरण और हाल में हुई सर्जरी के मामले भी ज्यादा पाए गए। यह संक्रमण की रोकथाम और अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण की अहमियत को रेखांकित करता है।
आम दवाओं की तुलना में इसकी दवा 2 गुना तक महंगी
अध्ययन में केवल एंटीबायोटिक दवाओं पर होने वाले खर्च को देखा गया। इसमें कार्बापेनेम-प्रतिरोधी संक्रमणों के इलाज की लागत संवेदनशील संक्रमणों की तुलना में 1.1 से 2 गुना तक ज्यादा रही। ई. कोलाई के प्रतिरोधी संक्रमण के इलाज पर औसतन करीब ₹37,000 (420 डॉलर) खर्च हुआ, जबकि संवेदनशील संक्रमण में यह करीब ₹18,600 (211 डॉलर) था। क्लेब्सिएला न्यूमोनिया के मामले में यह खर्च करीब ₹51,600 (587 डॉलर) बनाम ₹44,400 (505 डॉलर) रहा। एसीनेटोबैक्टर बॉमानी में करीब ₹57,600 (655 डॉलर) बनाम ₹38,400 (436 डॉलर) और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा में करीब ₹61,800 (702 डॉलर) बनाम ₹44,900 (510 डॉलर) खर्च हुआ। ये आंकड़े पूरे इलाज का खर्च नहीं बताते। इनमें अस्पताल का बेड, जांच, डॉक्टर की फीस और मरीज की अन्य देखभाल का खर्च शामिल नहीं है। इसलिए वास्तविक आर्थिक बोझ इससे अधिक हो सकता है। शोधकर्ताओं ने दवाओं की कीमत सरकारी जनऔषधि योजना की दरों के आधार पर निकाली है, जो बाजार की कीमतों से कम हो सकती है।
ऐसे में कम दिन अस्पताल में रहना भी अच्छी खबर नहीं
अध्ययन में एसीनेटोबैक्टर और स्यूडोमोनास के प्रतिरोधी संक्रमण वाले मरीज अस्पताल में संवेदनशील संक्रमण वाले मरीजों की तुलना में कम दिन रहे। पहली नजर में यह बेहतर परिणाम लग सकता है, लेकिन शोधकर्ताओं की व्याख्या इसके उलट है। इन दोनों संक्रमणों में मृत्यु दर अधिक थी। इसलिए कुछ मरीजों की जल्दी मौत हो जाने के कारण अस्पताल में रहने की औसत अवधि कम हुई हो सकती है। यानी कम अस्पताल-स्टे को जल्दी ठीक होने का संकेत नहीं माना जा सकता।
नई एंटीबायोटिक दवाओं से उम्मीद, लेकिन समाधान मुश्किल
अध्ययन में सेफ्टाजिडाइम-एविबैक्टम जैसी नई एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल को भी देखा गया। कार्बापेनेम-प्रतिरोधी ई. कोलाई और क्लेब्सिएला में इस दवा पर आधारित इलाज का इस्तेमाल पॉलीमिक्सिन आधारित इलाज से ज्यादा हुआ। इन दोनों संक्रमणों में सेफ्टाजिडाइम-एविबैक्टम का इस्तेमाल कम मृत्यु से जुड़ा पाया गया। लेकिन स्यूडोमोनास के मामले में तस्वीर अलग थी और वहां इस दवा से स्पष्ट लाभ नहीं दिखा। इसलिए अध्ययन के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि कोई एक नई दवा हर तरह के प्रतिरोधी संक्रमण का समाधान है। शोधकर्ताओं ने यह भी चेताया है कि मरीज की बीमारी की गंभीरता, सही दवा शुरू करने में लगा समय, संक्रमण का स्रोत और बैक्टीरिया में मौजूद प्रतिरोध के तरीके जैसे कई महत्वपूर्ण कारकों का मरीज के स्तर पर पूरा विश्लेषण नहीं किया गया था।
‘सिर्फ यह जानना काफी नहीं कि कौन-सी दवा बेअसर है’
“एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के खिलाफ लड़ाई सिर्फ यह पता लगाने की नहीं है कि कौन-सी दवा काम नहीं कर रही है। हमें यह भी जानना होगा कि इसके कारण मरीजों के इलाज के नतीजों पर क्या असर पड़ रहा है। भारत को केवल दवा-प्रतिरोध की निगरानी से आगे बढ़कर ऐसी एकीकृत निगरानी की जरूरत है, जो एएमआर के आंकड़ों को मरीज के परिणामों से जोड़े। समय पर जांच, संक्रमण की रोकथाम, एंटीबायोटिक के सही इस्तेमाल और प्रभावी नई दवाओं तक पहुंच मजबूत करने की जरूरत है।”
-कामिनी वालिया, वरिष्ठ वैज्ञानिक, आईसीएमआर (जैसा उन्होंने अपनी लिंक्डइन पोस्ट में लिखा)
निगरानी सिर्फ बैक्टीरिया की नहीं, मरीज की भी हो
अध्ययन का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि प्रतिरोधी बैक्टीरिया से कितने मरीज मरे। यह भारत में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को देखने के तरीके पर भी सवाल उठाता है। अब तक उपलब्ध बहुत-सा डेटा यह बताता रहा है कि किसी बैक्टीरिया पर कौन-सी दवा काम करती है और कौन-सी नहीं। लेकिन इससे अकेले यह पता नहीं चलता कि उस प्रतिरोध का मरीज की जान, अस्पताल में रहने और इलाज के खर्च पर कितना असर पड़ा।
आईसीएमआर के शोधकर्ताओं के मुताबिक निगरानी व्यवस्था को इस स्तर तक ले जाने की जरूरत है कि प्रयोगशाला में मिले बैक्टीरिया और मरीज के वास्तविक इलाज के नतीजों को एक साथ देखा जा सके।
सही जांच में देरी भी बन सकती है जान पर खतरा
किसी मरीज में संक्रमण है या नहीं और कौन-सा बैक्टीरिया इसका कारण है, यह समय पर पता लगना बेहद महत्वपूर्ण है। जांच में देरी होने पर सही दवा शुरू करने में भी देरी हो सकती है। इसीलिए शोधकर्ताओं ने समय पर और सटीक जांच को एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस से निपटने की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है। दूसरी तरफ, हर बुखार या संक्रमण में बिना जरूरत एंटीबायोटिक का इस्तेमाल भी समस्या को बढ़ा सकता है। इसका समाधान एंटीमाइक्रोबियल स्टेवार्डशिप यानी एंटीबायोटिक दवाओं का सही और जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल है।
अब 51% के आंकड़े को कैसे समझें?
अध्ययन में सामने आया 50.8% मृत्यु दर पूरे भारत में कार्बापेनेम-प्रतिरोधी संक्रमणों की सामान्य मृत्यु दर नहीं है। यह 20 तृतीयक अस्पतालों में कुछ कार्बापेनेम-प्रतिरोधी रक्तप्रवाह संक्रमणों वाले मरीजों में दर्ज मृत्यु दर है। इसे यह भी नहीं कहा जा सकता कि इन मौतों का कारण केवल दवा-प्रतिरोध था। मरीज की बीमारी की गंभीरता, सही दवा मिलने में देरी और दूसरे जोखिम कारक भी भूमिका निभा सकते हैं। शोधकर्ताओं ने माना है कि मरीज की बीमारी की गंभीरता, सही दवा मिलने का समय, संक्रमण का स्रोत और प्रतिरोध के तंत्र जैसे सभी कारकों का पूरा समायोजन नहीं किया गया।
इसलिए “कार्बापेनेम रेजिस्टेंस से 51% मरीज मरते हैं” कहना सही नहीं होगा। सही अर्थ यह है कि इन 20 अस्पतालों में कुछ कार्बापेनेम-प्रतिरोधी रक्तप्रवाह संक्रमणों से जूझ रहे मरीजों में कुल मृत्यु दर 50.8% तक पहुंची।
कमजोर अस्पतालों में स्थिति और खराब हो सकती है
अध्ययन में शामिल ज्यादातर अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण के मानक अपेक्षाकृत बेहतर थे। इसके बावजूद इतनी ऊंची मृत्यु दर सामने आई। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि जहां प्रयोगशाला सुविधाएं कमजोर हैं और संक्रमण की पहचान तथा सही इलाज में ज्यादा समय लगता है, वहां मरीजों के नतीजे इससे भी खराब हो सकते हैं। हालांकि, यह शोधकर्ताओं का अनुमान है, अध्ययन में प्रत्यक्ष रूप से मापा गया तथ्य नहीं है।
आगे भारत के सामने चार मोर्चों की चुनौती
कार्बापेनेम-प्रतिरोध से निपटने के लिए सिर्फ नई एंटीबायोटिक दवाएं उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा। आईसीएमआर अध्ययन के मुताबिक चार स्तरों पर एक साथ काम करना होगा-
पहला, संक्रमण के फैलने को रोकना।
दूसरा, एंटीबायोटिक का सही और जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल करना।
तीसरा, संक्रमण की जल्दी और सही पहचान करना।
चौथा, जरूरत पड़ने पर प्रभावी नई दवा मरीज तक समय पर और किफायती तरीके से पहुंचाना।
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस: खतरा आज का है
आईसीएमआर का यह अध्ययन एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की समस्या को केवल प्रयोगशाला की रिपोर्ट से बाहर निकालकर मरीज की जिंदगी और इलाज के वास्तविक बोझ के रूप में सामने रखता है। 20 अस्पतालों के आंकड़ों में कार्बापेनेम-प्रतिरोधी चार प्रमुख बैक्टीरिया से संक्रमित मरीजों में मृत्यु दर अधिक रही और दवाओं का खर्च भी बढ़ा। रक्तप्रवाह संक्रमण में स्थिति सबसे गंभीर रही, जहां कुछ संक्रमणों में मृत्यु दर लगभग 50% तक पहुंची।
सबसे बड़ी चुनौती है कि दवा के बेअसर होने का इंतजार करने के बजाय उससे पहले कार्रवाई की जाए। संक्रमण की रोकथाम, सही समय पर जांच, एंटीबायोटिक का संयमित इस्तेमाल और प्रभावी उपचार तक पहुंच- इन सभी को मजबूत करना होगा। क्योंकि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की लड़ाई आखिरकार मरीज की जिंदगी बचाने की लड़ाई है।


