पहली बार गैर-संचारी रोगों के साथ मानसिक एवं नशा संबंधी विकारों की एक साथ स्क्रीनिंग होगी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डिजिटल सिस्टम डॉक्टरों, कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर और आशा कार्यकर्ताओं को उपचार का चरणबद्ध मार्गदर्शन देगा
एम. रियाज हाशमी

नई दिल्ली। देश में पहली बार हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और अन्य गैर-संचारी रोगों (एनसीडी- नॉन कम्युनिकेबल डिजीज) से इलाज कराने वाले मरीजों की मानसिक बीमारी की भी नियमित जांच शुरू की जा रही है। इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने इसके लिए एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) आधारित आईसीएमआर-माइंड्स (मेंटल हेल्थ इम्प्लीमेंटेशन थ्रू इम्प्लीमेंटेशन रिसर्च एंड डिजिटल इनोवेशन) परियोजना शुरू की है। सात राज्यों के सात जिलों में इसका पायलट चल रहा है। यदि यह मॉडल सफल रहता है तो इसे राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में लागू किया जा सकता है। देश में करीब 31.5 करोड़ लोग हाई ब्लड प्रेशर और लगभग 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज़ से जूझ रहे हैं।
आईसीएमआर के अनुसार, भारत में मानसिक रोगों के उपचार में अब भी बड़ा अंतर बना हुआ है। बड़ी संख्या में मरीज ऐसे हैं, जिन्हें मानसिक बीमारी की पहचान ही नहीं हो पाती, जबकि अवसाद, चिंता और नशा संबंधी विकार अक्सर डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और अन्य गैर-संचारी रोगों के साथ मौजूद रहते हैं। इससे मरीजों के उपचार का पालन, जीवन की गुणवत्ता और स्वास्थ्य परिणाम प्रभावित होते हैं। इसी चुनौती को देखते हुए आईसीएमआर ने ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसमें सामान्य अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर आने वाले मरीजों की मानसिक स्वास्थ्य जांच, उपचार और जरूरत पड़ने पर रेफरल (विशेषज्ञ के पास भेजने) की व्यवस्था एक ही प्रणाली में शामिल होगी।
इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता सीडीएसएस (क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम) है। यह एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो स्वास्थ्यकर्मियों को मरीज की स्क्रीनिंग, मानसिक स्थिति का आकलन, गंभीरता के अनुसार प्राथमिकता तय करने, उचित उपचार शुरू करने और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ के पास भेजने तक हर चरण में डिजिटल मार्गदर्शन देता है। इसका उद्देश्य यह है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं केवल विशेषज्ञ अस्पतालों तक सीमित न रहें, बल्कि प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था का नियमित हिस्सा बन जाएं।
आईसीएमआर ने इस परियोजना के तहत स्वास्थ्य व्यवस्था के अलग-अलग स्तरों के लिए अलग डिजिटल कार्यप्रवाह (वर्कफ्लो) तैयार किए हैं। सीएचओ (कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर) के लिए मानसिक रोगों की पहचान, प्राथमिक उपचार और रेफरल का सरल डिजिटल मॉडल बनाया गया है। इसके साथ मेडिकल ऑफिसर और आशा (एक्रेडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) के लिए भी अलग-अलग कार्यप्रवाह विकसित किए गए हैं, ताकि गांव से लेकर जिला अस्पताल तक मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं एकीकृत रूप से उपलब्ध कराई जा सकें।
परियोजना फिलहाल असम के कामरूप, गुजरात के गांधीनगर, हरियाणा के फरीदाबाद, कर्नाटक के बेंगलुरु ग्रामीण, मध्य प्रदेश के विदिशा, ओडिशा के खोरधा और पंजाब के मोहाली जिलों में लागू की जा रही है। इन जिलों का चयन अलग-अलग भौगोलिक और स्वास्थ्य व्यवस्था की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गया है, ताकि भविष्य में इसे पूरे देश में लागू करने के लिए विश्वसनीय मॉडल तैयार किया जा सके।
आईसीएमआर का कहना है कि शुरुआती अनुभव उत्साहजनक रहे हैं। परियोजना के तहत स्वास्थ्यकर्मियों में मानसिक रोगों की पहचान और प्रबंधन की क्षमता बढ़ी है। स्क्रीनिंग का दायरा विस्तृत हुआ है, मरीजों को समय पर रेफरल मिल रहा है और डिजिटल निगरानी व्यवस्था मजबूत हुई है। इन अनुभवों के आधार पर कई राज्यों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, डिजिटल उपकरणों के उपयोग और निगरानी प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। आईसीएमआर के मुताबिक, यह परियोजना देश में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ, समान और व्यक्ति-केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। इसका लक्ष्य मानसिक एवं नशा संबंधी विकारों की पहचान और उपचार को सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं का अभिन्न हिस्सा बनाना है, ताकि मरीजों को अलग से मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों तक जाने की आवश्यकता कम पड़े और प्राथमिक स्तर पर ही समय रहते उपचार शुरू हो सके।
