मौत के कमरे में बदलते PG! 22 हजार किराया, नंगी बिजली की तारें और लकड़ी का कमरा… क्या छात्रों की जिंदगी से हो रहा खिलवाड़?

सत्या निकेतन पीजी हादसा: बिल्डिंग मालिक हरिराम गुप्ता गिरफ्तार
सत्या निकेतन में पांच मंजिला पीजी इमारत गिरने से 7 लोगों की मौत हो गई। बिल्डिंग मालिक हरिराम गुप्ता को राजस्थान के भिवाड़ी से गिरफ्तार किया गया है।

रिपोर्ट: स्नेहलता और प्रिया तिवारी | तहलका इन्वेस्टिगेशन

नई दिल्ली: दिल्ली को देशभर के लाखों युवाओं के सपनों का शहर कहा जाता है। कोई IAS बनने आता है, कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर तो कोई अपने परिवार की जिंदगी बदलने का सपना लेकर राजधानी पहुंचता है। लेकिन इन सपनों के बीच रहने की मजबूरी कई छात्रों को ऐसे Paying Guest Houses तक ले जा रही है, जहां मोटा किराया देने के बावजूद सुरक्षा व्यवस्था खुद सवालों के घेरे में नजर आती है।

तहलका की पड़ताल में दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर और करोल बाग इलाके के कुछ PG में ऐसे हालात सामने आए, जो किसी बड़े हादसे की आशंका को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

22 हजार का किराया… लेकिन सुरक्षा के नाम पर क्या?

तहलका टीम ने रूम लेने के बहाने एक PG का रियलिटी चेक किया। करीब 4×7 फीट के छोटे से कमरे के लिए प्रति व्यक्ति करीब 22 हजार रुपये महीना किराया बताया गया। खाना और बिजली का खर्च अलग।

कमरे के भीतर सीलन और बदबू थी। लेकिन सबसे चौंकाने वाली तस्वीर कमरे से बाहर दिखाई दी—फायर सेफ्टी उपकरण अपनी मियाद पूरी कर चुका था।

यानी जिस उपकरण की जरूरत आग लगने जैसी आपात स्थिति में पड़ सकती है, वही एक्सपायर्ड हालत में पड़ा था।

एक छात्रा ने तहलका टीम से बातचीत में दावा किया कि कुछ दिन पहले फायर सेफ्टी विभाग की ओर से PG को नोटिस भी दिया गया था।

लेकिन जब टीम उस जगह पहुंची तो कथित नोटिस वहां दिखाई नहीं दिया।

सवाल है—अगर सुरक्षा को लेकर आपत्ति जताई गई थी तो नोटिस कहां गया? और क्या कार्रवाई के बावजूद PG में छात्रों का रहना जारी रहा?

नंगी तारें… खुला MCB बोर्ड… और नीचे रहते छात्र

PG के अंदर तहलका कैमरे में एक और गंभीर तस्वीर कैद हुई। बिजली की नंगी तारें लटकती दिखाई दीं। MCB बोर्ड भी जगह-जगह से खुला हुआ था और तारें बाहर निकली थीं।

यही वह जगह है जहां से छात्र रोज गुजरते हैं।

लेकिन खतरा सिर्फ बिजली की वायरिंग तक सीमित नहीं है।

इमारत के अंदर लकड़ी का कमरा भी मौजूद है।

अब जरा कल्पना कीजिए—अगर शॉर्ट सर्किट से चिंगारी निकली और आग इस लकड़ी के कमरे तक पहुंच गई तो क्या होगा?

बाहर निकलने का रास्ता कहां है?
फायर एग्जिट कहां है?
इमरजेंसी में छात्रों को सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था कहां है?

चार मंजिल की इमारत… करीब 70 लड़कियां… लाखों का किराया

तहलका की पड़ताल में सामने आया कि करीब चार मंजिल की इस इमारत में लगभग 70 लड़कियों के रहने की बात सामने आई। प्रति छात्रा करीब 22 हजार रुपये किराया लिया जाए तो सिर्फ कमरे के किराये से ही लगभग 15.40 लाख रुपये महीने की रकम बनती है। बिजली का भुगतान अलग।

यानी एक तरफ लाखों रुपये का कारोबार और दूसरी तरफ सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल।

कॉरिडोर बेहद संकरा है। कमरे छोटे हैं। जगह-जगह सीलन और बदबू की शिकायत सामने आती है।

ऐसे में सवाल यह है कि आपात स्थिति में अगर एक साथ दर्जनों छात्र बाहर निकलने की कोशिश करें तो क्या यह व्यवस्था पर्याप्त होगी?

फैक्ट्री से PG? बदल गया इस्तेमाल तो अनुमति किसने दी?

तहलका टीम से बातचीत में एक स्थानीय चाय विक्रेता ने दावा किया कि जिस जगह पर अब PG संचालित हो रहा है, वहां पहले फैक्ट्री थी और बाद में इसे PG में बदल दिया गया।

अगर यह दावा सही है तो सवाल और गंभीर हो जाता है।

क्या इमारत का Land Use बदला गया?
क्या Building Use बदलने की अनुमति ली गई?
क्या PG के तौर पर संचालन के लिए जरूरी अनुमतियां मौजूद हैं?

इन सवालों का जवाब संबंधित विभागों और PG संचालक से लिया जाना जरूरी है।

करोड़ों-अरबों का कारोबार… लेकिन सुरक्षा कौन देखेगा?

ओल्ड राजेंद्र नगर और करोल बाग जैसे इलाके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों से भरे रहते हैं। बड़ी संख्या में कोचिंग संस्थानों के आसपास PG और हॉस्टल का कारोबार भी तेजी से फैला है।

दिल्ली सरकार से जुड़े 2026 के एक प्रस्ताव में राजेंद्र नगर, मुखर्जी नगर, लक्ष्मी नगर और करोल बाग जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में PG accommodation संचालित होने का अनुमान सामने आया है।

लेकिन सवाल सिर्फ PG की संख्या का नहीं है।

सवाल उन कमरों का है जहां हर महीने हजारों रुपये देकर छात्र रहते हैं।

क्या हर PG के पास जरूरी Fire NOC है?
क्या सभी इमारतें Building Use के नियमों के मुताबिक संचालित हो रही हैं?
क्या बिजली की वायरिंग सुरक्षित है?
क्या इमरजेंसी एग्जिट उपलब्ध है?
और क्या प्रशासन नियमित रूप से इन इमारतों की जांच करता है?

हादसे के बाद जागेगा सिस्टम या पहले?

दिल्ली में PG और हॉस्टल से जुड़े हादसे पहले भी चिंता बढ़ा चुके हैं। हर हादसे के बाद जांच, नोटिस और कार्रवाई की बातें होती हैं। लेकिन कुछ समय बाद वही सवाल फिर सामने खड़े हो जाते हैं।

तहलका की पड़ताल में दिखाई दीं—

नंगी बिजली की तारें।
खुला MCB बोर्ड।
सीलन भरे कमरे।
संकरे कॉरिडोर।
एक्सपायर्ड फायर सेफ्टी उपकरण।
और लकड़ी का कमरा।

इन तस्वीरों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या ये Paying Guest Houses हैं… या मौत के Paying Guest Houses?

माता-पिता बच्चों को दिल्ली पढ़ने और अपना भविष्य बनाने भेजते हैं। PG संचालक उनसे हर महीने हजारों रुपये लेते हैं। ऐसे में छात्रों की सुरक्षा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि सबसे पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए।

क्योंकि बच्चे दिल्ली सपने पूरे करने आते हैं… मौत का इंतजार करने नहीं।

यह तहलका की पड़ताल है।