कांग्रेस में शीत युद्ध!

अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस विघटन की कगार पर है। गांधी परिवार के सदस्यों के बीच ही ठन जाए तो कांग्रेस के लिए इससे ज्यादा बुरा और क्या हो सकता है। विश्लेषण कर रहे हैं राकेश रॉकी।

संजय निरुपम व्यथित हैं। अशोक तंवर कांग्रेस से विदा हो गए। आने वाले दिनों में और भी बहुत कुछ घटित होने की संभावना है। व्यथा और नाराज़गियों में डूबी कांग्रेस को लेकर सवाल ही सवाल हैं। सबसे बड़ा यह, कि क्या कांग्रेस ‘दोफाड़’ हो गयी है- राहुल और सोनिया कांग्रेस में। संकेत कुछ ऐसे ही हैं।

अभी तक कांग्रेस में नेताओं की गुटबाजी की खबरें सुर्खयों में रहती थीं। नेता कांग्रेस में आते-जाते रहते थे। शरद पवार से लेकर अशोक तंवर तक पिछले दो दशक में कई नेता कांग्रेस से बाहर हुए लेकिन कांग्रेस अपनी जगह स्थिर रही। कारण था पार्टी की सबसे बड़ी ताकत-गांधी परिवार- का उसके साथ होना। लेकिन अब अचानक गांधी परिवार के बीच ही ‘दरार’ सी दिख रही है। इस दरार के एक छोर पर पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी खड़े हैं तो दूसरे छोर पर सोनिया गांधी और उनके बुजुर्ग समर्थक नेता। तीसरी प्रियंका गांधी, एक किनारे दुविधा की सागर में हैं।

गांधी परिवार के बीच ‘जंग’ की खबरों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या राहुल गांधी को बुजुर्ग नेताओं ने सिर्फ इसलिए ‘फेल’ करने की कोशिश की क्योंकि वे राहुल के रहते अप्रसांगिक होने की तरफबढ़ रहे थे और युवा नेता कांग्रेस का नेतृत्व ओडऩे की तैयारी कर रहे थे !

दिल्ली के बंद कमरों में बैठकर सुदूर इलाकों के टिकट तय करने वाले यह बुजुर्ग नेता राहुल के समय कमोवेश अप्रसांगिक हो रहे थे। राजनीति की भाषा में कहें तो इनकी ‘दुकान’ बंद हो रही थी। यह राहुल ही थे जिन्होंने अपने इस्तीफेके बाद यह कहने की हिम्मत की थी कि कांग्रेस को गांधी परिवार से बाहर का अध्यक्ष चुनना चाहिए। लेकिन कांग्रेस के भीतर बुजुर्ग नेताओं ने राहुल की इस कोशिश को बहुत योजनाबद्ध तरीके से किनारे कर अस्वस्थ चल रहीं सोनिया गांधी को दोबारा कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया। क्या कांग्रेस राहुल के युवा और सोनिया गांधी के बुजुर्ग साथियों के बीच बंट गयी है? या संजय निरुपम और अन्य के भीतर की बैचेनी का कोई और कारण है। कहीं संजय शिव सेना में जाने की भूमिका तो तैयार नहीं कर चुके। बड़े सवाल हैं, लेकिन एक बात सच है कि कांग्रेस में राहुल गांधी को किनारे करने की कोशिश हो रही है।

राहुल के काम करने के तरीके पर नजर दौड़ाएं तो सा$फ होता है कि वे कांग्रेस को लोकतंत्रिक तरीके से पुनर्जीवित करने की कोशिश रहे थे। ज़मीन से जुड़े लोगों और आम कार्यकर्ता की सलाह को फैसलों में शामिल करने की राहुल की कोशिश एक खुला सच है। इसी तरह टिकट वितरण में भी वे कार्यकर्ता की सलाह को शामिल करने पर ज़ोर दे रहे थे। बुजुर्ग हो रहे या हो चुके नेता इससे विचलित थे। उन्हें लग रहा था कि इससे तो पार्टी में उन्हें कोइ पूछेगा तक नहीं। उन्हें यह बिलकुल गवारा नहीं था।

राहुल कांग्रेस में कितने अकेले हो चुके हैं यह उनकी गतिविधियों से जाहिर होता है। हाल के लोकसभा चुनाव में जनवरी तक वे पीएम मोदी को गंभीर टक्कर देते दिख रहे थे। लोकप्रियता दिखाने वाले सर्वे राहुल को लगातार मोदी के निकट आते दिखा रहे थे। लोग उनकी बातों को गंभीरता से सुन रहे थे।

लेकिन ‘पुलवामा और बालाकोट ने’ सारा परिदृध्य बदल दिया। मोदी (भाजपा) का ग्राफ अचानक दोबारा ऊपर चढ़ गया। यह देश की राजनीति का ऐसा घटनाक्रम था जिसमें राहुल की कोई भूमिका राजनीतिक दोष या नाकामी नहीं थी। यह ऐसा घटनाक्रम था जिसके असर को इतनी जल्दी और किसी राजनीतिक कलाबाजी से बदला नहीं जा सकता था। राहुल भी नहीं बदल सकते थे। इसलिए माहौल के जोर पर मोदी दोबारा ज्यादा ताकत के साथ सत्ता में लौट आये। लेकिन राहुल पार्टी की हार के बाद कांग्रेस के भीतर ‘अकेले’ से पड़ गए।

राहुल ऐसे नेता नहीं जो तिकड़मबाजी और समर्थकों की ताकत के बूते राजनीति करें। कांग्रेस में इसलिए वे अलग.थलग दिख रहे हैं। वे समर्थकों के होते हुए भी सोनिया के इर्द-गिर्द जमा बुजुर्ग नेताओं को चुनौती नहीं दे पायेंगे। विपक्ष से ज्यादा पार्टी के ही इन नेताओं ने कांग्रेस के भीतर यह विचार स्थापित कर दिया है कि राहुल पार्टी को चुनाव ‘नहीं’ जितवा सकते।

राहुल अध्यक्ष होते हुए भी मर्जी के फैसले नहीं कर पा रहे थे। आठ महीने पहले तीन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद मुख्यमंत्री चयन के समय ही यह साफ हो गया था। राहुल जिन्हें सीएम बनाना चाहते थे, वे नहीं बने। राहुल का जोर युवाओं को जिम्मा देने का था। ऐसा कांग्रेस की इस बुजुर्ग कोटरी ने ही नहीं होने दिया।

बहुत दिलचस्प बात है कि कांग्रेस की जो युवा ब्रिगेड आज राहुल गांधी के साथ है, इसे किसी और ने नहीं खुद सोनिया गांधी ने बनाया है पार्टी अधयक्ष रहते। तब राहुल और यह सभी नेता काफी युवा थे। सोनिया ने इन्हें बेटों की तरह पार्टी के भीतर बहुत योजनाबद्ध तरीके से ताकत दी। लेकिन समय का फेर देखिये कि सोनिया के अध्यक्ष रहते हुए ही यह युवा नेता किनारे हो रहे हैं

इसका कारण है सोनिया गांधी का बुजुर्ग नेताओं पर ज़रूरत से ज्य़ादा निर्भर हो जाना। कांग्रेस की जैसी हालत है उसमें शायद यह उनकी मजबूरी भी है। अन्यथा सोनिया आज से दस-ग्यारह साल पहले अध्यक्ष के नाते जितनी ताकतवर थीं, उसमें इस तरह की संभावनाओं के लिए जगह ही नहीं थी। सोनिया की रणनीति कांग्रेस में बुजुर्ग और युवा नेताओं का सांझा नेतृत्व बनाने की रही। यह ठीक भी है। लेकिन राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद युवा जिस तरह उभरे, उसने बुजुर्ग नेताओं में असुरक्षा का भाव जगा दिया क्योंकि राहुल उन्हें यह सन्देश नहीं दे पाए कि वे उनका भी साथ चाहते हैं।

राहुल दरअसल कांग्रेस का ढांचा बदलना चाहते थे। वे पार्टी सिस्टम को ज्यादा खुला और लोकतांत्रिक बनाना चाहते थे। वे चाहते थे कि संगठन फैसलों से लेकर टिकट वितरण तक में कार्यकर्ता को इन्वॉल्व किया जाये। लेकिन बुजुर्ग नेताओं को लगता है कि इससे उनकी अपनी प्रसांगिकता $खत्म हो जाएगी। जब असुरक्षा की यह भावना उनपर बहुत हावी हो गयी तो उन्होंने राहुल के साथ ही ‘असहयोग’ की नीति अपना ली। इसमें सिर्फ कांग्रेस का नुक्सान हुआ है।

सिर्फ छह महीने पहले तक कांग्रेस अध्यक्ष और पार्टी के भविष्य के पीएम उम्मीदवार  राहुल गांधी आज कांग्रेस में अकेले और चुपचाप हैं। उनके बनाये लोगों को सोनिया गांधी के दोबारा अध्यक्ष बनने के बाद एक.एक करके निपटा दिया है। उनके बहुत से समर्थकों को चुनावों में टिकट से महरूम कर उनकी ज़मीन खत्म की जा रही है। इनमें ज्य़ादातर ऐसे हैं जो ज़मीन से जुड़े कार्यकर्ता हैं और लगातार पार्टी के लिए काम करते रहे हैं। राहुल अपने मन की कांग्रेस बनाने से कुछ कदम ही दूर रह गए। यह राहुल ही कर सकते थे कि कांग्रेस में गैर गांधी अध्यक्ष बनाने की ईमानदार और बहुत लाभकारी सलाह दें, खुद अपना पद त्यागकर। भले इसके पीछे ‘बहाना’ लोकसभा चुनाव में हार का हो। राहुल कांग्रेस को कभी कमजोर नहीं कर रहे थे बल्कि एक ऐसा स्वरूप देने की कोशिश कर रहे थे, जो संगठन को ज़मीन से जोडक़र स्थाई मजबूती दे।

अब सोनिया गांधी और उनके बुजुर्ग सलाहकारों के सामने हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव कांग्रेस को जिताने की बड़ी चुनौती है। सभी टिकट उनकी मर्जी से बंटे हैं। जिम्मेदारियां उनकी मर्जी से दी गयी हैं। चुनाव प्रचार का पूरा नियंत्रण उनके लोगों के हाथ में है। ऐसे में कांग्रेस को जीतना चाहिए। नहीं जीती तो सोनिया के इन बुजुर्ग सलाहकारों के पास क्या जवाब होगा। राहुल के नेतृत्व में तो कांग्रेस ने 2018 की दिसंबर में तीन प्रदेशों में विधानसभा चुनाव जीते थे।

दुविधा में प्रियंका

कांग्रेस की इस सारी जंग में महासचिव प्रियंका गांधी का क्या रोल है? शायद फिलहाल कोई नहीं। यह भी सा$फ नहीं कि कांग्रेस को चलाने के लिए वे सोनिया गांधी की सोच के साथ हैं या राहुल गांधी की। फिलहाल तो वे उत्तर प्रदेश पर फोकस करती दिख रही हैं।

प्रियंका गांधी ने 2019 के लोक सभा चुनाव के दौरान कांग्रेस की स्थिति को नजदीक से देखा है। इस चुनाव में पहली बार वे अमेठी और रायबरेली से बाहर निकलकर दूसरे प्रदेशों में प्रचार के लिए निकलीं। पार्टी की बड़ी हार के बाद वे कमोवेश हर बड़ी बैठक का हिस्सा रही हैं। उन्होंने मां सोनिया गांधी और उनके बुजुर्ग समर्थकों से लेकर राहुल गांधी और उनके युवा समर्थकों तक के विचार बैठकों में सुने हैं। कांग्रेस में ऐसे बहुत से नेता हैं जो यह मानते हैं कि राहुल गांधी के मुकाबले प्रियंका  पार्टी को ज्यादा आक्रमक तरीके से खड़ा कर सकती हैं। लेकिन ऐसे भी बहुत हैं जो यह मानते हैं कि राहुल बहुत बेहतर भाषा वाला भाषण न दे सकने के बावजूद एक नेता के रूप में ज्यादा बेहतर हैं।

अपना नाम न छपने की शर्त पर एक युवा कांग्रेस नेता ने कहा – ‘‘गांधी परिवार के बिना कांग्रेस नहीं चल सकती। कारण नेतृत्व का है। हमारे पास बहुत से नेता हैं लेकिन वे गांधी परिवार से बाहर दूसरे के नेतृत्व में काम नहीं करेंगे। प्रियंका गांधी दुविधा में हो सकती हैं लेकिन इसमें कोइ दो राय नहीं कि आम लोगों और पार्टी के बीच उनकी लोकप्रियता है। वे ‘अथॉरिटी’ के साथ काम करती हैं और साथ ही कार्यकर्ताओं को पुचकारने में भी उनका कोइ सानी नहीं। उनके विपरीत राहुल गांधी के काम में अभी तक शक्तियों के विकेन्द्रीकरण की सोच झलकती है। पार्टी में इन दो युवा गांधियों की सोच को लेकर भी बंटबारा है। ‘‘एग्रेसिव सोच वाले’’ प्रियंका को पसंद करते हैं जबकि ‘‘गांधीवादी और ज्यादा लोकतांत्रिक’’ सोच वाले राहुल के साथ हैं।

कांग्रेस नेताओं से बातचीत के बाद यह बात भी छनकर सामने आती है कि सोनिया गांधी चुनाव नतीजों के बाद राहुल गांधी के इस्तीफा देने से ज्यादा खुश नहीं थीं। वे राहुल के गैर गांधी को अध्यक्ष बनाने की सोच से भी बहुत ज्यादा सहमत नहीं थीं, हालांकि उनकी इस असहमति के पीछे ज्यादा तर्क उनके बुजुर्ग सलाहकारों के थे जो राहुल के नेतृत्व संभालने के बाद कांग्रेस की राजनीति में बियावान की तरफ जाते दिख रहे थे। राहुल गांधी और सोनिया गांधी के बुजुर्ग समर्थक नेताओं के बीच जंग सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं है। उन राज्यों में भी जहाँ कांग्रेस की सरकारें हैं। सबसे बड़े उदाहरण राजस्थान और मध्य प्रदेश हैं।  राजस्थान में उपमुख्‍यमंत्री सचिन पायलट की मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत से नहीं पैट रही। दोनों दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े दिखते हैं। मध्‍य प्रदेश में ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया का कमलनाथ के साथ छतीस का आंकड़ा साफ़ दृष्टिगोचर होता है। हाल में देश के बड़े मुद्दों तीन तलाक़ और जेके में धारा 370 पर कांग्रेस पूरी तरह बंटी दिखी थी। दो राज्यों महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनाव के बीच राहुल गांधी का विदेश चले जाना इस बात का संकेत है कि वो बहुत ज्यादा खफा हैं। पार्टी के कामकाज में रु चि न दिखाने से जाहिर होता है कि वे पार्टी के भीतर बुजुर्ग नेताओं की ‘‘कारगुजारी’’ से घोर असहमति रखते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस के बीच अध्यक्ष पद से हटने के बावजूद राहुल गांधी ही धुरी बने हुए हैं और भाजपा भी राहुल को ही सबसे ज्यादा निशाने पर रखती है। जनता में भी राहुल को अभी तक कांग्रेस का ‘‘असली चेहरा’’ माना जाता है।

भाजपा पार्टी के नाते और मोदी सरकार दोनों कांग्रेस के घोर विरोधी हैं। खुद पीएम मोदी के निशाने पर हमेशा गांधी परिवार रहा है। यहाँ तक कि वे कमोवेश हर जनसभा में जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी का नाम लेना नहीं भूलते।  प्रियंका फिलहाल उत्तर प्रदेश की राजनीति पर फोकस करती दिख रही हैं। प्रियंका ने उतर प्रदेश की जनता के बीच रहने के लिए लखनऊ में घर ढूंढ़ लिया है। यही नहीं संगठन में भी उनकी नई टीम सामने आ गयी है। यूपी कांग्रेस का नया अध्यक्ष दो बार के विधायक अजय कुमार लल्लू को बनाया है जिन्हें प्रियंका गांधी की पसंद माना जाता है।

इसी तरह आराधना मिश्रा कांग्रेस विधायक दल की नेता बनाई गई हैं जो वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी की बेटी हैं। आराधना प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से विधायक  हैं। उन्हें भी अजय की तरह प्रियंका का करीबी माना जाता है। याद रहे प्रियंका गांधी की ‘‘गंगा यात्रा’’ में वे बहुत सक्रिय दिखी थीं। प्रियंका की नई टीम बहुत छोटी है। पिछली टीम के 500 लोगों के मुकाबले उनकी  टीम में महज 67 चेहरे हैं। टीम की औसत उम्र 40 साल है। अध्यक्ष समेत 45 फीसदी सदस्य पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों से हैं जबकि स्वर्ण 20 फीसदी और दलित भी इतने ही फीसदी हैं। सलाहकार परिषद में 18 वरिष्ठ नेता हैं लेकिन तमाम वरिष्ठ लोगों को इसमें कोई जगह नहीं मिली है।

लखनऊ में घर ले लेने से साफ़ है कि प्रियंका गांधी पूरी तरह उत्तर प्रदेश पर फोकस कर रही हैं। प्रियंका ने अपने लिए जो घर चुना है वह लखनऊ के पॉश गोखले मार्ग पर है। यह बँगला गांधी परिवार की रिश्तेदार पूर्व केंद्रीय मंत्री शीला कौल का है। कौल परिवार बाहर रहता है और यह बंगला बंद पड़ा था। दो मंजिल के इस घर के बाहर काफी चौड़ी सडक़ भी है। दिलचस्प यह है कि इस घर के प्रवेश द्वार पर बरगद का जो पेड़ लगा है वह और किसी ने नहीं, महात्मा गांधी ने लगाया था। पिछले दिनों में प्रियंका गांधी ने वह हर मुद्दा उठाया है जो उत्तर प्रदेश से जुड़ा रहा है। उन्नाव रेप मामला हो या शाहजहांपुर की घटना। सोनभद्र का मामला रहा हो या कोई और। प्रियंका ने हर बार इसपर योगी सरकार और भाजपा को घेरा है।

इसमें कोइ दो राय नहीं कि प्रियंका के सामने यूपी में बहुत बड़ी चुनौती है। साल  1989 के बाद पार्टी सत्ता से बाहर है। पारंपरिक वोट बैंक पार्टी से छिटक चुका है।  संगठन भी लचर हो चुका है। ऐसे में प्रियंका के पास यूपी जैसे सबसे बड़े राज्य में अपनी राजनीतिक क्षमता दिखाने का अवसर भी है।

कुछ खास ब्यान

‘सोनिया गांधी के लोग राहुल गांधी के खिलाफ साजिश रच रहे हैं। लोक सभा चुनाव के ऐन वक्त पर मुझे हटाया गया। मुझे दुख हो रहा है कि उस घटना का असर बढ़ता चला गया। लगता है कि पार्टी को अब संघर्ष करने वाले लोगों की आवश्यकता नहीं है। काम करने वाले लोगों को महत्व देना होगा नहीं तो पार्टी की स्थिति और भी ज्यादा खराब हो जाएगी। मुंबई में कांग्रेस पार्टी ने जिस तरह से अपने प्रत्याशी फाइनल किए हैं, उनमें तीन-चार को छोड़ दें तो शायद बाकी सभी की जमानत जब्त होगी। पार्टी ने बगैर किसी प्रतिक्रिया और किसी सर्वे के विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी फाइनल किए और सिर्फ पसंद और नापसंद के आधार पर नाम तय कर दिए गए।’

संजय निरुपम, मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष