पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने राज्य सरकार को यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि सोशल मीडिया पोस्ट में जिस घटना का जिक्र किया गया था, वह वास्तव में हुई थी या नहीं। सुनवाई के दौरान पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट अब एक “न्यूजेंस” यानी परेशानी का कारण बन गए हैं।
एलपीयू के छात्रों के बीच प्रसारित इस पोस्ट में आरोप लगाया गया था कि कैंपस में एक कर्मचारी ने एक छात्रा के साथ दुष्कर्म किया और बाद में विश्वविद्यालय ने उसे घर भेज दिया। पोस्ट में आगे दावा किया गया कि छात्रा ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली।
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि मामले की जांच अभी जारी है और इस स्तर पर वह निर्णायक रूप से यह नहीं कह सकती कि कथित घटना हुई ही नहीं थी।
इस पर हाई कोर्ट ने दोनों संभावनाओं पर स्पष्ट जवाब मांगा। अदालत ने पूछा कि यदि घटना वास्तव में हुई थी तो इस मामले में क्या कार्रवाई की गई और यदि घटना नहीं हुई थी तो सोशल मीडिया पोस्ट प्रसारित करने वालों के खिलाफ क्या कदम उठाए गए। अदालत ने निर्देश दिया कि पुलिस कमिश्नर के हस्ताक्षर से दाखिल की जाने वाली स्टेटस रिपोर्ट में पोस्ट के प्रसार के बाद हुई घटनाओं और उसे हटाने के लिए उठाए गए कदमों का भी उल्लेख किया जाए।
मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को होगी। सीबीआई जांच की मांग वाली यह याचिका एलपीयू के छात्र रवि राज ने दायर की है। याचिका में दावा किया गया है कि वायरल पोस्ट और उसके बाद प्रसारित हुए WhatsApp संदेशों के कारण करीब 2,000 छात्र हॉस्टल GH-3 के बाहर जमा हो गए। इसके बाद प्रदर्शनकारियों के एक वर्ग ने रात करीब 2 बजे फगवाड़ा और जालंधर के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग-44 को कथित तौर पर जाम कर दिया।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि इसके बाद हालात बिगड़ते चले गए। इमारतों में आग लगाने, संपत्ति में तोड़फोड़ करने, सुरक्षा कर्मचारियों पर हमला करने और सामान लूटने के आरोप लगाए गए हैं। याचिका में यह भी दावा किया गया है कि कुछ बाहरी लोग कैंपस में दाखिल हुए और उनमें से कुछ कथित तौर पर हथियारों से लैस थे। हालांकि, ये सभी आरोप फिलहाल याचिका का हिस्सा हैं और अदालत में अभी साबित नहीं हुए हैं।
याचिकाकर्ता ने पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए हैं। उसका आरोप है कि अधिकारियों को छात्रों के जमावड़े की जानकारी थी, इसके बावजूद हाईवे जाम, आगजनी और तोड़फोड़ को रोकने के लिए समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए।
याचिका में मूल दुष्कर्म-आत्महत्या के दावे को लेकर पुलिस के बयानों में कथित विरोधाभास का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, जहां वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने इन दावों को अफवाह बताया, वहीं बाद में हॉस्टल GH-3 में कथित दुष्कर्म के संबंध में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64 के तहत FIR दर्ज की गई।
याचिका में इससे पहले चिटकारा यूनिवर्सिटी, राजपुरा में हुए विवाद का भी उल्लेख है। वहां दो छात्राओं की कथित मौत से संबंधित अपुष्ट सोशल मीडिया दावों के बाद विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे। बाद में विश्वविद्यालय और पुलिस ने ऐसी मौतों की खबरों से इनकार किया था।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव चोपड़ा पेश हुए। केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन, जबकि पंजाब की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एवं अतिरिक्त महाधिवक्ता चंचल के. सिंगला ने पैरवी की।




