Arvind Chaturvedi
नई दिल्ली: तहलका के एक खुलासे के बाद जंतर-मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों की सच्चाई पर सवाल उठने लगे हैं। तहलका की पड़ताल के दौरान जंतर-मंतर के पास खाने की एक दुकान चलाने वाले स्थानीय दुकानदार ने नाम न छापने की शर्त पर कई चौंकाने वाली बातें बताईं।
दुकानदार ने खुलासा किया कि सौरभ दास और आशुतोष राकां अक्सर उनकी दुकान पर खाना खाते थे, लेकिन वह कभी उनके विचारों से प्रभावित नहीं हुए। दुकानदार के मुताबिक, उनकी ज्यादातर बातें पूरी तरह से बनावटी और दिखावटी थीं।
बारह दिन बाद खुलीं दुकानें, धारा 163 का असर दुकानदार ने बताया कि पाबंदियों के चलते पिछले बारह दिनों से दुकानें बंद थीं, जो अब खुली हैं। इलाके में अब भी धारा 163 लागू होने के कारण व्यापार बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। आज भी जंतर-मंतर की तरफ आने वाले हर ग्राहक की पूरी तलाशी ली जा रही है और आई-कार्ड मांगा जा रहा है। सरकार ने हाल ही में एक कानून के जरिए जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन करने के अधिकार को समाप्त कर दिया है।

जंतर-मंतर: विरोध प्रदर्शनों का एक लंबा इतिहास अगर जंतर-मंतर के अतीत पर नजर डालें, तो 1993 में निषेधाज्ञा (Prohibitory Orders) के तहत बोट क्लब लॉन को सील किए जाने के बाद यह राजधानी का आधिकारिक विरोध स्थल बना था। संसद मार्ग पर स्थित 18वीं सदी की खगोलीय वेधशाला वाला यह स्थल दशकों से देश के बड़े आंदोलनों का गवाह रहा है:
* इरोम शर्मिला का अनशन: मणिपुर में AFSPA के खिलाफ उनका 16 साल लंबा अनशन।
* प्रमुख आंदोलन: 2012 का दिल्ली सामूहिक बलात्कार विरोध, इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन, और नर्मदा बचाओ आंदोलन।
* हालिया प्रदर्शन: कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पहलवानों का विरोध, और जुलाई में CJP के नेतृत्व में हुआ नीट (NEET) पेपर लीक विरोधी प्रदर्शन।
इन बड़े आंदोलनों के अलावा, यहाँ ASHA कार्यकर्ताओं के बेहतर वेतन की माँग और सफाई कर्मचारियों के विरोध जैसे छोटे-छोटे प्रदर्शन भी नियमित रूप से होते रहे हैं। हालांकि, 2017 में NGT ने शोर और ट्रैफिक का हवाला देते हुए यहाँ प्रदर्शनों पर रोक लगाई थी, जिसे 2018 में पलट दिया गया था।
एसबीआई अधिकारियों और पुलिस की प्रतिक्रिया जंतर-मंतर पर दोपहर का खाना खाने आए स्टेट बैंक (SBI) के कुछ अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि CJP के दूसरे आंदोलन में ज्यादातर तमाशबीन लोग शामिल थे, जो इन मुद्दों पर बहुत गंभीर नहीं थे। बैंक के एक कर्मचारी, जो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के आगरा स्थित आवास के पास रहते हैं, ने जंतर-मंतर से विरोध स्थल को दूसरी जगह शिफ्ट करने का स्वागत किया।
इन अधिकारियों का यह भी कहना था कि CJP के पहले आंदोलन को सही मुद्दों के कारण सत्ताधारी दल के लोगों का भी समर्थन प्राप्त था, लेकिन बाद के आंदोलनों को उन्होंने राजनीति से प्रेरित बताया।
संसद मार्ग थाने में तैनात सब-इंस्पेक्टर हरीराम ने तहलका संवाददाता को बताया कि उनकी ड्यूटी पिछले छह महीने से जंतर-मंतर पर लगातार चल रही है। जब उनसे पूछा गया कि यह कब खत्म होगी, तो उनका जवाब था— “ये तो ऊपर वाला ही जाने।”
मौजूदा स्थिति जंतर-मंतर आंदोलन स्थल के पास अब भी एक बड़ा बोर्ड लगा है जिस पर साफ-साफ लिखा है कि धारा 163 लागू है। स्थल के आसपास दंगा नियंत्रण वाहन और ढेरों बसें खड़ी हैं, जिनमें पुलिस के जवान इस इंतजार में बैठे हैं कि कब उन्हें इस बंद रास्ते से हटने का आदेश मिले।




