एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
नेपाल के हिमालयी इलाके में 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी बाढ़ के पीछे की कहानी अब धीरे-धीरे सामने आ रही है। पहली नजर में यह एक बड़ी प्राकृतिक आपदा लग सकती है, लेकिन वैज्ञानिकों के नए अध्ययन ने इसके पीछे छिपी घटनाओं की ऐसी शृंखला की ओर ध्यान दिलाया है, जो हिमालय में भविष्य की आपदाओं को समझने का तरीका बदल सकती है। भारतीय वैज्ञानिकों के शोध के मुताबिक, नेपाल के लांगटांग लिरुंग पर्वत के उत्तरी हिस्से में करीब 5,130 मीटर की ऊंचाई पर चट्टान और बर्फ का विशाल हिस्सा ढह गया था। इसके बाद नीचे गिरती चट्टान, बर्फ, पिघले पानी और ढीले पत्थरों ने मिलकर ऐसा मलबा प्रवाह पैदा किया, जिसने त्रिशूली नदी तंत्र के आसपास सड़क, पुल, सुरंग और इमारतों को भारी नुकसान पहुंचाया।
जर्नल ऑफ द इंडियन सोसाइटी ऑफ रिमोट सेंसिंग में प्रकाशित शोधपत्र ‘26 August 2026 Rock- Ice Avalanche in Nepal: Rapid Assessment of the Cascading Disaster Using Satellite Data’ में वैज्ञानिकों ने उपग्रहों, भूकंपीय आंकड़ों और हिमनद की गतिविधियों का विश्लेषण कर इस आपदा का घटनाक्रम समझने की कोशिश की है। अध्ययन में सबसे महत्वपूर्ण संकेत यह है कि जिस ढलान पर बाद में तबाही हुई, वहां पहले से असामान्य हलचल के प्रमाण मिलने की बात कही गई है। यानी पहाड़ के ढहने से पहले उसके भीतर या सतह पर हो रहे बदलावों को समझना इस तरह की आपदाओं के जोखिम का आकलन करने में अहम साबित हो सकता है।
यह शोध भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी) के 12 वैज्ञानिकों ने मिलकर किया है। शोध के प्रमुख लेखक प्रियॉम रॉय हैं। उनके साथ रित्विक मजूमदार, प्रकाश चौहान, पुनीत जालान, ज्ञानस्मिता प्रधान, दिव्यांश श्रीवास्तव, तपस रंजन मार्था, पी. सशिवर्धन रेड्डी, एस.वी.एस.पी. शर्मा, ए.वी. सुरेश बाबू, ईश्वर चंद्र दास और के.एच.वी. दुर्गा राव इस अध्ययन में शामिल हैं। इन वैज्ञानिकों ने उपग्रह से मिली तस्वीरों, रडार आंकड़ों, भूकंपीय संकेतों और हिमनद की गतिविधियों का विश्लेषण करके यह समझने की कोशिश की कि पहाड़ का विशाल हिस्सा कैसे ढहा और उसके बाद तबाही की शृंखला कैसे आगे बढ़ी।
9.9 करोड़ घन मीटर मलबा, 1,300 मीटर से सीधे गिरा
शोधपत्र के अनुसार, पहाड़ के जिस हिस्से से चट्टान और बर्फ अलग हुई, उसका क्षेत्रफल करीब 9.9 लाख वर्ग मीटर था। वैज्ञानिकों ने वहां से विस्थापित सामग्री का आयतन लगभग 9.9 करोड़ घन मीटर आंका है। इसमें करीब एक करोड़ घन मीटर की अनिश्चितता भी शामिल है। यह मात्रा केवल बर्फ की नहीं, बल्कि चट्टान और बर्फ के संयुक्त मलबे की है।
हिमस्खलन के दौरान यह विशाल हिस्सा अलग होने के बाद करीब 1,300 मीटर नीचे गिरा। इसके बाद मलबा घाटी के तल से लगभग 5.9 किलोमीटर तक आगे बढ़ा और ल्हेंदे खोला नदी की दिशा में पहुंचा। इस दौरान उसे करीब 870 मीटर की अतिरिक्त ऊंचाई का अंतर पार करना पड़ा।
इस घटना की भयावहता समझने के लिए केवल गिरे हुए मलबे की मात्रा देखना पर्याप्त नहीं है। जब इतनी बड़ी मात्रा में चट्टान और बर्फ तेजी से नीचे गिरती है, तो वह रास्ते में मौजूद ढीली मिट्टी, पुराने हिमनदीय मलबे और पानी को भी अपने साथ समेट सकती है। इससे शुरुआती हिमस्खलन आगे बढ़ते हुए कहीं अधिक व्यापक और विनाशकारी मलबा प्रवाह में बदल सकता है।
अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (आईसीआईएमओडी) के 13 अक्टूबर 2026 को जारी प्रारंभिक आकलन में चट्टान और हिमनदीय बर्फ के अलग हुए हिस्से का अनुमान करीब 13.2 करोड़ घन मीटर बताया गया है। दोनों अध्ययनों के आंकड़ों में अंतर है, इसलिए इन अनुमानों को एक समान अंतिम माप नहीं मानना चाहिए। फिर भी, दोनों अध्ययन इस घटना के असाधारण पैमाने और इसके बाद पैदा हुए व्यापक मलबा प्रवाह की ओर संकेत करते हैं।
पहाड़ ढहने से पहले उपग्रहों ने खतरे के संकेत पकड़े थे?
इस पूरे अध्ययन का सबसे अहम सवाल यही है। भारतीय वैज्ञानिकों ने निसार नामक उपग्रह मिशन के रडार आंकड़ों का विश्लेषण किया। निसार, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ‘इसरो’ का संयुक्त मिशन है। इसका रडार बादलों और अंधेरे की स्थिति में भी धरती की सतह में होने वाले बदलावों का अध्ययन कर सकता है। शोध के मुताबिक, ढलान के एक हिस्से में चट्टान और बर्फ के ढहने से पहले असामान्य गति दर्ज हुई। 20 जून से 19 अगस्त 2026 के बीच चार लगातार समय-अंतरालों के आंकड़ों में उसी हिस्से में पहले से हलचल के संकेत मिले। इससे यह समझने में मदद मिली कि घटना के पीछे केवल अचानक हुई टूट-फूट ही नहीं, बल्कि ढलान की पहले से मौजूद अस्थिरता भी भूमिका एक भूमिका हो सकती है।
हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। उपग्रह के आंकड़ों में किसी ढलान की हलचल दिखाई देना और यह बता पाना कि वह किस दिन या किस समय ढहेगी, दो अलग बातें हैं। इस अध्ययन से यह साबित नहीं होता कि आपदा का सटीक समय पहले से बताया जा सकता था। लेकिन यह जरूर स्पष्ट होता है कि उपग्रहों से मिलने वाले संकेतों को जोखिम की पहचान और निगरानी के लिए इस्तेमाल करने की संभावना पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। आईसीआईएमओडी की अलग वैज्ञानिक रिपोर्ट में भी सेंटिनल-1 उपग्रह के रडार आंकड़ों के आधार पर ढहने से पहले 48 दिनों के दौरान ढलान में अधिकतम 40 सेंटीमीटर तक बदलाव दर्ज होने की बात कही गई है। यह उपग्रह की दृष्टि की दिशा में सतह के बदलाव का माप है, न कि जमीन के सीधे नीचे धंसने का सटीक आंकड़ा।
भूकंपीय संकेतों ने बताया, पहाड़ सुबह 08:22:10 बजे टूटा
इस आपदा की वैज्ञानिक जांच में भूकंपीय आंकड़े भी महत्वपूर्ण साबित हुए। शोधपत्र के अनुसार, केकेएन स्टेशन के आंकड़ों से चट्टान और बर्फ के ढहने का समय 26 अगस्त को 02:52:10 यूटीसी, यानी भारतीय समयानुसार सुबह 8 बजकर 22 मिनट 10 सेकंड दर्ज किया गया। आमतौर पर भूकंप मापने वाले उपकरण जमीन में कंपन दर्ज करते हैं। लेकिन बड़े भूस्खलन और हिमस्खलन के दौरान भी ऐसे कंपन पैदा हो सकते हैं। वैज्ञानिकों ने इन संकेतों को बाद में नदी में बहते मलबे से पैदा हुए कंपन से अलग करने का प्रयास किया। इससे घटना की शुरुआत और उसके बाद घाटी में फैले मलबे के प्रवाह को समझने में मदद मिली।
यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी बड़ी पर्वतीय आपदा में नुकसान केवल शुरुआती ढलान के ढहने से नहीं होता। उसके बाद मलबा किस रास्ते से गुजरता है, कितना पानी और तलछट अपने साथ लेता है और नदी के प्रवाह को किस तरह प्रभावित करता है, यह भी तबाही का पैमाना तय करता है।
गर्मियों की असामान्य गर्मी भी आपदा के पीछे एक अहम कड़ी
शोधकर्ताओं ने 2026 की गर्मियों के तापमान की तुलना 2001 से 2025 के औसत से की। अध्ययन के अनुसार, उस गर्मी में हवा का तापमान सामान्य संदर्भ अवधि की तुलना में असामान्य रूप से अधिक था। वैज्ञानिकों ने इसे उन परिस्थितियों में शामिल किया है, जिन्होंने संभवतः पहाड़ की अस्थिरता और आपदा की शृंखला में भूमिका निभाई। गर्मी बढ़ने से हिमनदों की बर्फ पिघल सकती है। पिघलता पानी चट्टानों की दरारों तक पहुंच सकता है और कुछ परिस्थितियों में ढलान की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। लेकिन किसी एक घटना में इन प्रक्रियाओं की भूमिका तय करने के लिए चट्टान की बनावट, बर्फ की स्थिति, पानी की मौजूदगी और भूवैज्ञानिक कमजोरी जैसे पहलुओं को भी देखना पड़ता है।
इसलिए नेपाल की इस आपदा को केवल जलवायु परिवर्तन का नतीजा घोषित करना जल्दबाजी होगी। अध्ययन असामान्य गर्मी, हिमनद की सक्रियता और ढलान की पूर्ववर्ती हलचल को एक साथ रखकर संभावित कारण-शृंखला समझाता है, लेकिन इनमें से किसी एक को निर्णायक कारण बताने के लिए और प्रमाण चाहिए।
यह सामान्य बाढ़ नहीं, लगातार जुड़ी कईं आपदाओं की शृंखला
आईसीआईएमओडी के प्रारंभिक आकलन के मुताबिक, नेपाल की यह घटना सामान्य हिमनदीय झील के अचानक फटने से आई बाढ़ नहीं थी। इसकी शुरुआत लांगटांग लिरुंग पर्वत पर चट्टान और बर्फ के ढहने से हुई। नीचे गिरती सामग्री ने रास्ते में मौजूद मलबे और पानी को अपने साथ मिलाया और फिर तेज प्रवाह के रूप में नदी घाटी की ओर बढ़ी। इसी तरह की घटना को ‘कैस्केडिंग डिजास्टर’ यानी एक के बाद एक जुड़ती आपदाओं की शृंखला कहा जाता है।
इसमें एक घटना दूसरी को जन्म देती है और नुकसान का दायरा शुरुआती घटना से कहीं बड़ा हो जाता है। इस मामले में पहाड़ का ढहना, मलबे का तेजी से नीचे आना, पानी और तलछट का उसमें शामिल होना तथा नदी तंत्र में विनाशकारी प्रवाह पैदा होना एक-दूसरे से जुड़े चरण थे। आईसीआईएमओडी के अनुसार, नेपाल में इस आपदा में कम से कम 1,451 लोगों की मौत हुई और 5,745 लोग लापता बताए गए। चीन की ओर से भी मौतों और लापता लोगों की सूचना दी गई। ये आंकड़े प्रारंभिक आकलन पर आधारित हैं और इन्हें अंतिम आंकड़ा नहीं समझना चाहिए।
भारत के हिमालयी इलाकों के लिए इसमें क्या सबक छुपा है?
नेपाल की घटना भारत के लिए भी चेतावनी है। भारतीय हिमालय में सड़कें, सुरंगें, पुल, जलविद्युत परियोजनाएं और पर्वतीय बस्तियां ऐसी घाटियों में मौजूद हैं, जहां भूस्खलन, हिमनदों में बदलाव और अचानक आने वाले मलबा प्रवाह का खतरा रहता है। ऐसी घटनाओं में केवल बारिश और नदी के जलस्तर की निगरानी पर्याप्त नहीं हो सकती। यदि खतरे की शुरुआत किसी ऊंची ढलान पर चट्टान और बर्फ के ढहने से होती है, तो पारंपरिक बाढ़ चेतावनी प्रणाली उस शुरुआती घटना को पकड़ने के लिए तैयार नहीं भी हो सकती है।
इसलिए संवेदनशील ढलानों की पहचान, उपग्रह से उनकी नियमित निगरानी, भूकंपीय आंकड़ों का विश्लेषण और नदी प्रवाह पर लगातार नजर रखने की व्यवस्था को एक साथ जोड़ने की जरूरत है। इसके साथ ही नेपाल, भारत और चीन के बीच समय पर सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिमालय से निकलने वाली नदियां और उनसे जुड़े खतरे राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहते। नेपाल की इस आपदा का सबसे बड़ा सबक यही है कि पहाड़ों में होने वाली हर बड़ी तबाही को केवल अचानक आई बाढ़ या प्राकृतिक दुर्घटना मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। वैज्ञानिक आंकड़े यह समझने में मदद कर सकते हैं कि कौन-सी ढलानें अस्थिर हो रही हैं और कहां अतिरिक्त निगरानी की जरूरत है। लेकिन इन संकेतों को वास्तविक चेतावनी में बदलने के लिए बेहतर तकनीक के साथ स्पष्ट जिम्मेदारी, प्रशासनिक तैयारी और समय पर कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी है।




