पंजाब सरकार के लाखों कर्मचारी अपनी लंबित मांगों को लेकर बुधवार और गुरुवार, 21 और 22 अक्टूबर को सामूहिक आकस्मिक अवकाश (मास कैजुअल लीव) पर रहे। कर्मचारियों की संयुक्त कार्रवाई समिति और अन्य कर्मचारी एवं पेंशनर संगठनों के नेतृत्व में किए गए इस आंदोलन से राज्यभर में सरकारी कामकाज प्रभावित हुआ। वहीं, परिवहन कर्मचारियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल के कारण सरकारी बस सेवाओं पर भी असर पड़ा।
प्रदर्शनकारी कर्मचारी पुरानी पेंशन योजना बहाल करने, महंगाई भत्ते की लंबित किस्तों और बकाया राशि जारी करने, वेतन विसंगतियां दूर करने, संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों को नियमित करने सहित लंबे समय से लंबित अन्य मांगों को पूरा करने की मांग कर रहे हैं।
कर्मचारी प्रतिनिधियों के अनुसार, बुधवार को तीन लाख से अधिक सरकारी कर्मचारियों ने सामूहिक अवकाश लेकर आंदोलन में भाग लिया। इसमें सरकारी शिक्षक, विभिन्न विभागों के कर्मचारी तथा पंजाब रोडवेज, पनबस और पंजाब रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन के संविदा कर्मचारी शामिल रहे।
कार्यालयों और परिवहन पर असर
हड़ताल के कारण सरकारी कार्यालयों, निदेशालयों, जिला प्रशासनिक परिसरों और तहसील कार्यालयों में कामकाज प्रभावित हुआ। कर्मचारी संगठनों ने पंजाबभर में प्रदर्शन करने का आह्वान किया। चंडीगढ़ स्थित पंजाब सिविल सचिवालय के बाहर और मोहाली में पुडा भवन के नजदीक प्रमुख रैलियां आयोजित करने की योजना बनाई गई। जिलों में कर्मचारियों ने उपायुक्त कार्यालयों के बाहर भी प्रदर्शन किए।
सार्वजनिक परिवहन सेवाएं भी प्रभावित हुईं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, करीब 7,500 परिवहन कर्मचारी आंदोलन में शामिल हुए, जिसके चलते राज्यभर में लगभग 2,700 बसें सड़कों से दूर रहीं।
इसके बाद पंजाब रोडवेज, पनबस और कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स यूनियन ने अपनी राज्यव्यापी हड़ताल को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया। यूनियन ने स्पष्ट किया कि मांगों पर ठोस निर्णय होने तक आंदोलन जारी रहेगा।
सरकारी बसों पर निर्भर यात्रियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। कामकाजी लोगों, विद्यार्थियों और अन्य यात्रियों को अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए वैकल्पिक साधनों का सहारा लेना पड़ा।
सरकार के साथ वार्ता बेनतीजा
कर्मचारी प्रतिनिधियों और मुख्य सचिव केएपी सिन्हा के बीच बुधवार शाम चार बजे शुरू हुई बैठक में गतिरोध दूर नहीं हो सका। यह बैठक मुख्यमंत्री भगवंत मान के साथ पहले हुई बैठक के कार्यवृत्त (मिनट्स) जारी किए जाने के बाद हुई। कर्मचारी यूनियनों ने इसकी मांग की थी।
कर्मचारियों और पेंशनरों के 39 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने सरकारी अधिकारियों से मुलाकात की, लेकिन प्रतिनिधियों का कहना था कि कई प्रमुख मांगों पर उन्हें कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला। करीब दो घंटे तक चली बैठक बेनतीजा रही, जिसके बाद यूनियनों ने गुरुवार को भी दो दिवसीय सामूहिक अवकाश आंदोलन जारी रखने का फैसला किया।
आंदोलन का नेतृत्व कर रही संयुक्त कार्रवाई समिति के समन्वयक सुखचैन सिंह खैहरा ने कहा कि कर्मचारियों की अनुपस्थिति के कारण निदेशालयों सहित विभिन्न सरकारी कार्यालयों में कामकाज प्रभावित हुआ है।
पंजाब सिविल सचिवालय कर्मचारी यूनियन के महासचिव साहिल शर्मा ने सरकार पर समाधान टालने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कर्मचारी पहले ही कई बैठकों में अपनी मांगें रख चुके हैं, लेकिन सरकार उनसे बार-बार उन्हीं मांगों को दोहराने के लिए कह रही है।
यूनियनों ने अस्थायी शिक्षकों की स्थिति पर भी चिंता जताई। कर्मचारी प्रतिनिधियों के अनुसार, सरकार ने स्पष्ट किया कि जिन अस्थायी शिक्षकों को नियमित किए जाने की बात कही जा रही है, उन्हें केवल ‘कार्यकाल की सुरक्षा’ (सिक्योरिटी ऑफ टेन्योर) दी गई है। उन्हें नियमित कर्मचारियों को मिलने वाले वित्तीय लाभ नहीं दिए जाएंगे।
पुरानी पेंशन, डीए बकाया और वेतन विसंगतियां प्रमुख मांगें
कर्मचारी यूनियनें लंबे समय से वित्तीय लाभों और सेवा संबंधी मुद्दों को उठाती रही हैं। उनका कहना है कि बार-बार मांगें उठाने और सरकार से आश्वासन मिलने के बावजूद कई महत्वपूर्ण मुद्दे अब तक हल नहीं हुए हैं। कर्मचारियों की प्रमुख मांगें:
- सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना बहाल की जाए।
- महंगाई भत्ते की लंबित किस्तें और 18 प्रतिशत बकाया जारी किया जाए।
- वेतन विसंगतियां दूर कर 2.59 गुणांक लागू किया जाए।
- सुनिश्चित करियर प्रगति के लाभ बहाल किए जाएं।
- संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों को नियमित किया जाए।
- 15 जनवरी, 2015 के उस आदेश को वापस लिया जाए, जिसके तहत परिवीक्षा अवधि में भर्ती कर्मचारियों को सामान्य भत्तों के बिना केवल मूल वेतन दिया जाता था।
- 17 जुलाई, 2020 के उस आदेश को वापस लिया जाए, जिसके तहत निर्धारित तारीख के बाद भर्ती कुछ कर्मचारियों को केंद्र के निचले वेतनमानों पर रखा गया था।
- संशोधित वेतन संरचना से जुड़ी अन्य विसंगतियों का समाधान किया जाए।
सरकारी स्कूलों के शिक्षकों से भी 21 अक्टूबर को सामूहिक आकस्मिक अवकाश लेकर प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की गई थी। शिक्षक संगठनों ने कर्मचारियों और पेंशनरों की मांगों का समर्थन करते हुए सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग की।
आश्वासनों से संतुष्ट नहीं कर्मचारी संगठन
वर्तमान आंदोलन से पहले भी कर्मचारी संगठन कई दौर के प्रदर्शन कर चुके हैं और सरकार के साथ उनकी बैठकें हुई हैं। सितंबर में कर्मचारी प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री भगवंत मान से मुलाकात की थी। इसके बाद कुछ मुद्दों पर मिले आश्वासनों के आधार पर पहले चल रहे कलम छोड़ आंदोलन को वापस ले लिया गया था।
हालांकि, इस फैसले से यूनियनों के कुछ वर्गों में असंतोष पैदा हुआ। कर्मचारियों का मानना था कि उनकी किसी भी प्रमुख मांग को ठोस रूप से स्वीकार नहीं किया गया। इसके बाद संगठनों ने अपना आंदोलन जारी रखा और सरकार को मांगें पूरी करने के लिए समयसीमा देते हुए 21 और 22 अक्टूबर को सामूहिक आकस्मिक अवकाश पर जाने की घोषणा की।
विपक्षी दलों ने भी किया आंदोलन का समर्थन
कर्मचारियों के आंदोलन पर विपक्षी दलों ने भी प्रतिक्रिया दी है। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष परगट सिंह ने आम आदमी पार्टी सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि बड़ी संख्या में कर्मचारियों की भागीदारी सरकारी कर्मचारियों में बढ़ते असंतोष को दर्शाती है। उन्होंने सरकार से स्थिति को और बिगड़ने देने के बजाय बातचीत के जरिए समस्याओं का समाधान करने की अपील की।
सरकार और कर्मचारी प्रतिनिधियों के बीच वार्ता में कोई ठोस समाधान नहीं निकलने के कारण अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि सरकारी कामकाज कब सामान्य होगा। परिवहन कर्मचारियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल जारी रहने से यात्रियों की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। कर्मचारी संगठनों ने साफ कर दिया है कि वे केवल आश्वासन नहीं, बल्कि अपनी लंबित मांगों पर ठोस फैसले चाहते हैं।




