स्नेहलता | नई दिल्ली
दिल्ली की जमीन पर एक बड़ा सवाल खड़ा है—जिस जगह पर मस्जिद है, क्या उस जमीन का मालिकाना हक सरकार के पास है? अगर किसी धार्मिक स्थल को वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचित किया गया है, तो क्या इससे जमीन के मालिकाना हक का विवाद अपने आप खत्म हो जाता है? और यदि सरकारी जमीन पर किसी धार्मिक स्थल के होने को लेकर विवाद है, तो क्या उसके खिलाफ कार्रवाई से पहले उसके दस्तावेजों, कानूनी स्थिति और ऐतिहासिक दर्जे की अलग-अलग जांच नहीं होनी चाहिए?
दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को लेकर सामने आया विवाद इन्हीं सवालों को फिर चर्चा में ले आया है। एक तरफ दिल्ली वक्फ बोर्ड का दावा है कि मस्जिद और उससे लगा कब्रिस्तान सरकारी गजट में वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचित हैं। दूसरी तरफ, रेस कोर्स क्षेत्र की जमीन को केंद्र सरकार के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) के अधीन बताया जा रहा है। इसी बीच मस्जिद की बिजली-पानी की आपूर्ति काटे जाने और परिसर खाली करने के कथित नोटिस की खबरों ने मामले को और गंभीर बना दिया है।
इस विवाद को समझने के लिए एक और महत्वपूर्ण सरकारी रिकॉर्ड देखना जरूरी है। संसद में 2023 में दिए गए जवाब के मुताबिक, 123 संपत्तियों का मालिकाना हक भारत सरकार के पास बताया गया था। इनमें 61 संपत्तियां L&DO और 62 दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के अधीन थीं। लेकिन इन आंकड़ों का अर्थ यह नहीं है कि सभी 123 संपत्तियों को बेदखली के नोटिस जारी हो चुके हैं या रेस कोर्स मस्जिद निश्चित रूप से इसी सूची में शामिल है।
तहलका की इस पड़ताल में तीन अलग-अलग सवालों को समझना जरूरी है—जमीन का मालिक कौन है, धार्मिक स्थल का कानूनी दर्जा क्या है और प्रशासन ने वास्तव में कौन-सी कार्रवाई की है।
रेस कोर्स मस्जिद: बिजली–पानी बंद, परिसर खाली करने के निर्देश की खबर
दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के नजदीक स्थित रेस कोर्स मस्जिद का विवाद अक्टूबर 2026 में उस समय सामने आया, जब आसपास की झुग्गियों को हटाने की कार्रवाई के दौरान मस्जिद की बिजली और पानी की आपूर्ति बाधित होने की खबरें आईं। बताया गया कि यह कार्रवाई 7 अक्टूबर को हुई थी।
दिल्ली वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी तनवीर अहमद ने 19 अक्टूबर को संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की। बोर्ड के मुताबिक, मस्जिद और उससे लगा कब्रिस्तान लगभग दो बीघा क्षेत्र में फैला है। पत्र में दावा किया गया कि यह संपत्ति 8 सितंबर 1977 की दिल्ली प्रशासन की गजट अधिसूचना में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज है। बोर्ड ने यह भी कहा कि मस्जिद का बिजली कनेक्शन 1976 से मौजूद था और इसका उल्लेख NDMC की धरोहर सूची में भी है।
मस्जिद के इमाम मोहम्मद हारून राही की ओर से आरोप लगाया गया कि 17 अक्टूबर को कुछ लोग, जिन्होंने खुद को L&DO का अधिकारी बताया, परिसर पहुंचे और मस्जिद खाली करने को कहा। कुछ खबरों में तीन दिन की समयसीमा का जिक्र है, जबकि अन्य में 19 अक्टूबर के आसपास छह दिन के भीतर परिसर खाली करने का कथित नोटिस दिए जाने की बात कही गई।
लेकिन इस मामले में एक महत्वपूर्ण विरोधाभास भी सामने आया। केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से यह बात सामने आई कि L&DO ने मस्जिद को कोई नोटिस जारी नहीं किया था। वक्फ बोर्ड के CEO ने भी कहा कि मस्जिद को गिराने का कोई आदेश उनके संज्ञान में नहीं आया था। वहीं, दूसरी ओर मस्जिद प्रबंधन को लगभग 19 अक्टूबर को छह दिन में परिसर खाली करने का नोटिस मिलने की बात भी सामने आई।
यानी एक तरफ नोटिस मिलने की खबर है और दूसरी तरफ L&DO की ओर से नोटिस जारी किए जाने से इनकार की जानकारी। ऐसे में नोटिस की मूल प्रति, उस पर दर्ज अधिकारी का नाम, जारी करने की तारीख और कानूनी आधार सामने आना बेहद जरूरी है।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मस्जिद खाली कराई जाएगी या नहीं। सवाल यह भी है कि नोटिस वास्तव में किसने जारी किया, किस जमीन के लिए जारी किया और उसके पीछे कौन-सा कानूनी आदेश है।
दो बीघा मस्जिद और 53.2 एकड़ सरकारी जमीन: क्या दोनों एक ही हैं?
रेस कोर्स मस्जिद विवाद में जमीन के क्षेत्रफल को लेकर भी भ्रम पैदा हो सकता है। दिल्ली वक्फ बोर्ड के पत्र में मस्जिद और उससे जुड़े कब्रिस्तान का क्षेत्रफल लगभग दो बीघा बताया गया है। दूसरी ओर, रेस कोर्स क्षेत्र में मौजूद करीब 53.2 एकड़ जमीन को L&DO के अधीन बताया गया है, जिसे रखरखाव और विकास के लिए केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) को सौंपे जाने की जानकारी सामने आई है।
दोनों आंकड़े अलग-अलग क्षेत्र बताते हैं। पूरे रेस कोर्स क्षेत्र की सरकारी जमीन का स्वामित्व और उसके भीतर स्थित किसी विशेष धार्मिक स्थल का कानूनी दर्जा एक ही सवाल नहीं हैं।
इसे आसान भाषा में समझिए। किसी बड़े सरकारी भूखंड के भीतर कोई पुरानी मस्जिद, दरगाह या कब्रिस्तान मौजूद हो सकता है। उस पूरे भूखंड का सरकारी विभाग के अधीन होना अपने आप में उस धार्मिक स्थल के इतिहास, अधिसूचना या उससे जुड़े कानूनी दावों का पूरा जवाब नहीं है। इसी तरह, किसी धार्मिक स्थल का वक्फ के रूप में दर्ज होना भी जमीन के स्वामित्व पर उठने वाले हर विवाद को अपने आप समाप्त नहीं करता।
इसलिए रेस कोर्स मस्जिद के मामले में जमीन का राजस्व रिकॉर्ड, 1977 की गजट अधिसूचना, धरोहर सूची में दर्ज विवरण और किसी भी लागू न्यायिक आदेश को साथ रखकर देखना होगा।
संसद में 123 संपत्तियों का मामला: 61 L&DO के पास, 62 DDA के पास
अब उस सरकारी रिकॉर्ड पर आते हैं, जिसने दिल्ली की धार्मिक संपत्तियों को लेकर चल रही बहस को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
13 मार्च 2023 को राज्यसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में तत्कालीन केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 123 संपत्तियों के मालिकाना हक को भारत सरकार के पास बताया था। इनमें 61 संपत्तियां L&DO और 62 संपत्तियां DDA के अधीन बताई गई थीं।
उस संसदीय जवाब में यह भी कहा गया था कि संबंधित संपत्तियों का भौतिक निरीक्षण उस समय शुरू नहीं हुआ था और उन्हें दूसरे उपयोगों के लिए आवंटित करने की प्रक्रिया भी शुरू नहीं की गई थी। जवाब में डीनोटिफाइड वक्फ संपत्तियों के विषय पर गठित दो सदस्यीय समिति के सामने दिल्ली वक्फ बोर्ड की ओर से आपत्ति या प्रतिनिधित्व नहीं दिए जाने का उल्लेख भी था।
इस पड़ताल का सबसे अहम निष्कर्ष यही है कि 123 संपत्तियों का सरकारी रिकॉर्ड मौजूद होना और उन सभी पर बेदखली की कार्रवाई होना दो अलग-अलग बातें हैं।
L&DO की सूची में मस्जिदें, दरगाहें और कब्रिस्तान
संसद में रखी गई सूची में L&DO के अधीन 61 संपत्तियों का उल्लेख किया गया था। इनमें दिल्ली के विभिन्न इलाकों में स्थित धार्मिक स्थलों के नाम शामिल हैं।
सूची में दर्ज उदाहरणों में अब्दुल नबी मस्जिद, मथुरा रोड; बाबर शाह मस्जिद और तकिया, तिलक ब्रिज के पास; मिंटो ब्रिज मस्जिद; इरविन अस्पताल परिसर की मस्जिद; मिर्दर्द रोड की मस्जिद और शाह वलिउल्लाह मोहम्मद की मजार; तुर्कमान गेट क्षेत्र में मस्जिद और कब्रिस्तान; चौंसठ खंभा की मस्जिद और कब्रिस्तान; जफ्ता गंज मस्जिद; वेस्टर्न कोर्ट मस्जिद, जनपथ; तथा अशोक रोड और रेड क्रॉस रोड के पास स्थित धार्मिक स्थलों के नाम बताए जाते हैं।
DDA की 62 संपत्तियों में कौन–कौन से नाम?
DDA के अधीन बताई गई 62 संपत्तियों की सूची में भी मस्जिदों, दरगाहों, मजारों और कब्रिस्तानों के नाम शामिल हैं।
उदाहरण के तौर पर, सूची में जामा मस्जिद के सामने स्थित दरगाह हरे-भरे, दरियागंज की मस्जिद बोरीवाली, सदर बाजार के मदरसा इस्लामिन और मस्जिद तकियावाली, करोल बाग की मस्जिद कप्तानवाली, झंडेवालान की दरगाह मम्मू भांजा, सदर बाजार की मजार भोलू शाह, दरियागंज की मस्जिद बेलनवाली, लाल मस्जिद और दरियागंज साउथ स्थित दरगाह व कब्रिस्तान जैसे नाम शामिल बताए गए हैं।
क्या 123 संपत्तियों को नोटिस मिल चुके हैं?
रेस कोर्स क्षेत्र में झुग्गियों को हटाने की कार्रवाई और धार्मिक स्थल को खाली करने के कथित निर्देशों की खबरें जरूर सामने आई हैं। लेकिन इन खबरों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि L&DO की सभी 61 और DDA की सभी 62 संपत्तियों को नोटिस जारी किए जा चुके हैं।
रेस कोर्स क्षेत्र में भाई राम कैंप, मस्जिद कैंप और DID कैंप नाम से पहचाने जाने वाले झुग्गी समूहों को अक्टूबर 2025 में सरकारी जमीन खाली करने और पात्र लोगों को सावदा घेवरा में पुनर्वासित करने के निर्देश दिए जाने की खबरें भी प्रकाशित हुई थीं। इस संबंध में जनवरी 2024 में L&DO और DDA की ओर से किए गए संयुक्त सर्वेक्षण का भी उल्लेख सामने आया था।
जमीयत उलेमा–ए–हिंद ने मंत्री को ज्ञापन सौंपा, लेकिन आगे क्या हुआ?
रेस कोर्स मस्जिद के विवाद में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से हस्तक्षेप की मांग की। संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने मस्जिद और उससे लगे कब्रिस्तान के संरक्षण, बिजली-पानी की आपूर्ति बहाल करने और नमाजियों की आवाजाही सुनिश्चित करने की मांग रखी।
तहलका की ओर से संगठन के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी से L&DO और DDA के अधीन बताई जा रही धार्मिक संपत्तियों की स्थिति तथा रेस कोर्स मस्जिद के मामले में संगठन की भूमिका पर सवाल पूछे गए। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उन्होंने विस्तार से टिप्पणी करने के बजाय बताया कि संगठन मंत्री को ज्ञापन सौंप चुका है और आगे की स्थिति मंत्री के जवाब के बाद स्पष्ट होगी।
दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग को जानकारी नहीं?
तहलका ने दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष निर्मल जैन से भी संपर्क किया। उनसे पूछा गया कि क्या रेस कोर्स मस्जिद के मामले में वक्फ बोर्ड या किसी अन्य पक्ष ने आयोग से संपर्क किया है और क्या आयोग ने संबंधित विभागों से रिपोर्ट मांगी है।
निर्मल जैन ने कहा कि उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं है। उन्होंने किसी शिकायत, जांच या संबंधित विभाग से रिपोर्ट मांगे जाने की पुष्टि नहीं की।
वक्फ बोर्ड की भूमिका पर भी सवाल
मस्जिद के इमाम मोहम्मद हारून राही ने आरोप लगाया कि उन्होंने पिछले कई महीनों से वक्फ बोर्ड से मदद मांगी, लेकिन उन्हें अपेक्षित सहायता नहीं मिली। दूसरी ओर, वक्फ बोर्ड के CEO ने 19 अक्टूबर को संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर मस्जिद की सुरक्षा और बिजली-पानी बहाल करने की मांग की थी।




