नीलेश माथुर
गोवा में एक महिला कथित तौर पर जिस ‘डिजिटल अरेस्ट’ की शिकार हुई। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के मुताबिक, महिला को वीडियो कॉल पर लगातार
निगरानी में रखा गया, उन्हें विश्वास दिलाया गया कि वह एक आपराधिक जांच के दायरे में हैं और उनसे “2.60 करोड़ से अधिक की रकम ऐसे खातों में ट्रांसफर कराई गई, जिन्हें झूठे तौर पर ‘सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट्स’ बताया गया था।
जो मामला एक साइबर फ्रॉड के तौर पर शुरू हुआ, उसने आगे चलकर एक कहीं बड़े संगठित नेटवर्क की तस्वीर सामने रखी।
ईडी ने 23 अगस्त 2026 को फहीम मोइन हुसैन सैयद और नईम मुईन सैयद को पीएमएलए के तहत गिरफ्तार किया। एजेंसी के मुताबिक, पीड़िता की रकम कुछ ही घंटों में निष्क्रिय और नए खोले गए बैंक खातों के जरिए आगे बढ़ी और 400 से अधिक लाभार्थी खातों में बांट दी गई।
जांच आगे बढ़ी तो 27 अगस्त को ईडी ने भूषण सूर्यकांत मोये, विलास नारायण पवार और शैलेश दगडू चव्हाण को गिरफ्तार किया। इसके साथ इस मामले में गिरफ्तार लोगों की संख्या पांच हो गई।
ईडी के मुताबिक, यह रकम एक ऐसे संगठित तंत्र में पहुंची, जहां साइबर फ्रॉड से हासिल रकम को पहले बैंकिंग क्रेडिट के रूप में लिया गया, फिर नकदी में बदला गया और उसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक से फुल फ्लीज्ड मनी चेंजर का लाइसेंस रखने वाली कंपनियों के जरिए विदेशी मुद्रा में बदला गया।
एजेंसी का कहना है कि रकम 400 से अधिक लाभार्थी खातों में बांटी गई और ऐसी कंपनियों तक पहुंचाई गई, जिनके रिकॉर्ड में निदेशक ऐसे लोग थे जिनके पास कोई वास्तविक आर्थिक साधन नहीं था, जबकि खातों का संचालन दूसरे लोग कर रहे थे। इन कंपनियों से जुड़े खातों को 20 से अधिक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 330 पीड़ित शिकायतों और 163 एफआईआर से जोड़ा गया है। इन मामलों में कुल “417.49 करोड़ के नुकसान की सूचना है, जबकि इन संस्थाओं के बैंकिंग लेनदेन “27,850 करोड़ से अधिक रहे हैं।
ईडी के अनुसार, चार्टर्ड अकाउंटेंट भूषण सूर्यकांत मोये ने उपलब्ध कराए गए पहचान दस्तावेजों के आधार पर नेटवर्क की 21 कंपनियां बनाई थीं। वह इन कंपनियों और उनके 43 कथित डमी निदेशकों को एक समूह की तरह संभालता था। विलास नारायण पवार ने कथित तौर पर आरटीजीएस एंट्री की व्यवस्था की, जिसके जरिए संदिग्ध रकम नेटवर्क के खातों में पहुंची, जबकि शैलेश दगडू चव्हाण ने कथित तौर पर इन ट्रांसफर के बदले नकदी उपलब्ध कराई। तीनों के परिसरों की 21 अगस्त को तलाशी ली गई थी।
गोवा का यह मामला महज एक उदाहरण है एआई या आभासी दुनियां के भ्रमजाल या चक्रव्यूह का जो किसी आॅक्टोपस की तरह लोगों को घेरता जा रहा है।
धोखे के लिए किसी बेहद परिष्कृत और पूरी तरह विश्वसनीय डीपफेक की जरूरत नहीं पड़ी। एक भरोसेमंद डिजिटल बातचीत, स्क्रीन के दूसरी तरफ मौजूद अधिकार का आभास और इतना मनोवैज्ञानिक दबाव काफी था कि पीड़िता ने कार्रवाई कर दी।
एआई अब इस पुराने फार्मूले में एक नई और बेहद शक्तिशाली परत जोड़ रहा है।
समस्या सिर्फ यह नहीं है कि मशीन किसी नकली चीज को असली जैसा दिखा सकती है।
समस्या यह है कि जो चीजें सिर्फ इसलिए भरोसेमंद मानी जाती थीं क्योंकि वे वास्तविक दिखती थीं, वे अब यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं कि वास्तव में हुआ क्या था।
तकनीकी बाधा लगभग खत्म हो चुकी है
कुछ साल पहले किसी भरोसेमंद सिंथेटिक मीडिया को तैयार करना विशेषज्ञों का काम था। इसके लिए तकनीकी जानकारी, कंप्यूटिंग संसाधन और समय चाहिए होता था। अब यह बाधा काफी हद तक खत्म हो चुकी है।
दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (डीटीयू) में सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख प्रो. दिनेश के. विश्वकर्मा के मुताबिक, जेनरेटिव एआई ने सिंथेटिक मीडिया बनाने की तकनीकी जटिलता का बड़ा हिस्सा अपने आप संभालना शुरू कर दिया है। अब ऐसे टूल उपलब्ध हैं जो अपेक्षाकृत कम तकनीकी जानकारी के साथ तस्वीरें बना या बदल सकते हैं, आवाज की नकल कर सकते हैं, चेहरे बदल सकते हैं और होंठों की गतिविधियों को आवाज के साथ मिला सकते हैं।
पुराने डीपफेक में चेहरे के अस्वाभाविक हावभाव, खराब लिप-सिंक, आंखों की अजीब गतिविधियां या विकृत बैकग्राउंड जैसे संकेत मिल जाते थे। लेकिन जेनरेटिव मॉडल बेहतर होने के साथ ये पुराने संकेत भी कम भरोसेमंद होते जा रहे हैं।
समस्या तब और जटिल हो जाती है जब सामग्री पूरी तरह नकली न हो। वीडियो का ज्यादातर हिस्सा वास्तविक हो सकता है, लेकिन उसमें किसी चेहरे, आवाज या खास बयान को बदल दिया गया हो।
एनफोल्डएआई के सह-संस्थापक मयंक तलवार के मुताबिक, आवाज की क्लोनिंग सबसे आसान प्रक्रियाओं में से एक है। इंस्टाग्राम रील, शादी के वीडियो या वेबिनार से किसी व्यक्ति की 30 से 60 सेकंड की रिकॉर्डिंग भी एक विश्वसनीय वॉइस क्लोन बनाने के लिए पर्याप्त हो सकती है।
तलवार के मुताबिक, उनकी कंपनी ने एक ऐसे व्यक्ति के साथ इसका परीक्षण किया जिसका तकनीकी बैकग्राउंड नहीं था और उसने पहली कोशिश में 15 मिनट से भी कम समय में इस्तेमाल करने लायक वॉइस क्लोन तैयार कर लिया। यानी अब असली बदलाव सिर्फ डीपफेक की गुणवत्ता में नहीं है। बदलाव यह है कि नकली सामग्री तैयार करने के लिए विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं रहा। एआई शायद ही कभी अकेले काम करता है।
तलवार के मुताबिक, जो तरीका उभर रहा है उसमें एआई सोशल इंजीनियरिंग के साथ मिलकर काम करता है। धोखेबाज पहले लिंक्डइन, कंपनी की वेबसाइट, इंस्टाग्राम या सार्वजनिक रिकॉर्ड से किसी व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटा सकते हैं। इसके बाद असली लोगो वाला नकली व्हाट्सऐप बिजनेस प्रोफाइल, मिलती-जुलती वेबसाइट या स्पूफ्ड कॉलर आईडी तैयार किया जा सकता है।
जब संदेह दूर करना हो, तब एआई काम आता है—बॉस की आवाज में एक छोटा वॉइस नोट या वीडियो कॉल, जिसमें कोई वरिष्ठ अधिकारी या वदीर्धारी अधिकारी स्क्रीन पर दिखाई देता है। इसके बाद आता है धोखाधड़ी का पुराना तरीका—जल्दबाजी, गोपनीयता और दबाव। रकम म्यूल अकाउंट में जाती है और कुछ ही मिनटों में आगे बढ़ाई जा सकती है।
हम भरोसा करने के लिए इतने तैयार क्यों रहते हैं? तकनीक बताती है कि नकली चीज बनाई कैसे जाती है। मनोविज्ञान बताता है कि लोग उस पर भरोसा क्यों कर लेते हैं। सकरा वर्ल्ड हॉस्पिटल, बेंगलुरु की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट शिल्पी सरस्वत के मुताबिक, लोगों के लिए किसी सूचना को खारिज करने की बजाय स्वीकार कर लेना कई बार मानसिक रूप से आसान होता है। बार-बार सामने आना इसका एक कारण है। ‘इल्यूजरी ट्रुथ इफेक्ट’ के तहत किसी दावे को बार-बार देखने से वह परिचित लगने लगता है और दिमाग इस परिचय को उसकी सत्यता का संकेत मान सकता है।
भावनाएं इस समस्या को और बढ़ाती हैं। डर, गुस्सा और आक्रोश तुरंत प्रतिक्रिया पैदा कर सकते हैं और व्यक्ति के उस क्षण रुककर सूचना की जांच करने की संभावना कम कर सकते हैं। फिर आता है भरोसा। किसी दोस्त या रिश्तेदार से व्हाट्सऐप पर आया संदेश किसी अनजान स्रोत से आए संदेश जैसा नहीं लगता। रिश्ता खुद उस सूचना के लिए एक तरह का अप्रत्यक्ष प्रमाण बन जाता है। एमिटी इंस्टीट्यूट आॅफ बिहेवियरल हेल्थ एंड अलाइड साइंसेज की निदेशक डॉ. आर. कल्पना श्रीवास्तव के मुताबिक, वीडियो को मनोवैज्ञानिक रूप से अधिक अधिकार इसलिए मिल सकता है क्योंकि वह व्यक्ति को यह महसूस कराता है कि वह किसी घटना को सीधे देख रहा है। चेहरा, आवाज, हावभाव और गतिविधि मिलकर वास्तविकता का मजबूत अहसास पैदा करते हैं।
वीडियो असली, लेकिन दावा झूठा
हर भ्रामक सामग्री एआई से बनाई हुई नहीं होती। प्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया (पीटीआई) के चीफ एडिटर-डिजिटल सर्विसेज, एआई इंटीग्रेशन एंड फैक्ट चेक, प्रत्युष रंजन के मुताबिक, एआई से बने वीडियो, तस्वीरों और सिंथेटिक आॅडियो के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद पारंपरिक गलत सूचना भी बड़े पैमाने पर मौजूद है।
पुलिस कैसे तय करती है कि वीडियो असली है?
पुलिस के लिए किसी डिजिटल सामग्री की प्रामाणिकता तय करना अब सिर्फ चेहरे में गड़बड़ी तलाशना नहीं है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के आईएफएसओ के डीसीपी गौरव त्यागी के मुताबिक, जांचकर्ता तकनीकी परीक्षण के साथ पारंपरिक जांच के तरीकों का भी इस्तेमाल करते हैं।
मेटाडेटा, टाइमस्टैम्प, डिवाइस की जानकारी, सॉफ्टवेयर सिग्नेचर, कम्प्रेशन आर्टिफैक्ट्स और एन्कोडिंग में असंगतियों की जांच की जा सकती है। वीडियो में चेहरे की गतिविधियों, रोशनी, छाया, लिप-सिंक या बदली गई वस्तुओं से जुड़े असामान्य संकेतों को फ्रेम-दर-फ्रेम देखा जा सकता है। आॅडियो की स्पेक्ट्रल एनालिसिस भी की जा सकती है।
लेकिन कोई एक संकेत निर्णायक नहीं होता।
जांचकर्ता यह भी पता लगाने की कोशिश करते हैं कि सामग्री सबसे पहले कहां सामने आई और उसका सबसे पुराना उपलब्ध संस्करण क्या है। रिवर्स इमेज और वीडियो सर्चेज मदद कर सकते हैं। यदि वीडियो किसी वास्तविक घटना से जुड़ा है तो उसे सीसीटीवी फुटेज, कॉल रिकॉर्ड, प्रत्यक्षदर्शियों और दूसरे स्वतंत्र सबूतों से मिलाया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर सामग्री को फॉरेंसिक लैबोरेटरीज भेजा जाता है। मकसद नकली होने का कोई एक ‘जादुई’ संकेत ढूंढना नहीं है। मकसद सबूतों की एक पूरी कड़ी तैयार करना है। और हर बार जब कोई फाइल बदली जाती है, वह कड़ी कमजोर हो सकती है। यह एक विचित्र विरोधाभास है।
चेक और काउंटरक्लेम्स के लगातार संपर्क से लोग थक सकते हैं। कुछ लोग अंतत: यह पूछना ही छोड़ सकते हैं कि सही क्या है और गलत क्या—और मान सकते हैं कि किसी को वास्तव में कुछ पता नहीं या सब कुछ ही मैनिपुलेटेड है।
यह खतरा सिर्फ किसी एक झूठ पर विश्वास करने से बड़ा है। गलत सूचना लोगों को सच खोजने से ही थका सकती है।
जो व्यक्ति हर चीज पर विश्वास करता है, उसे सबूतों से सुधारा जा सकता है। लेकिन जो व्यक्ति किसी चीज पर विश्वास ही नहीं करता, वह विश्वसनीय पत्रकारिता, वैज्ञानिक प्रमाण और विशेषज्ञों की जानकारी को भी नकली सामग्री के बराबर रख सकता है।
सबूत का नया अर्थ
गोवा का डिजिटल-अरेस्ट मामला एक महिला को स्क्रीन के जरिए धोखा देने से शुरू हुआ। लेकिन जांच आगे बढ़ी तो मामला बैंक खातों, नकदी, कंपनियों, मनी चेंजर्स और फाइनेंशियल ट्रेल्स तक पहुंचा। स्क्रीन सिर्फ शुरूआत थी। गलत सूचना के साथ भी यही बात लागू होती है।
एक नकली वीडियो से होने वाला नुकसान उस डिवाइस तक सीमित नहीं रहता जिस पर वह देखा गया। वह किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकता है, धोखाधड़ी को अंजाम देने में मदद कर सकता है, सार्वजनिक बहस को प्रभावित कर सकता है और लोगों के किसी वास्तविक घटनाक्रम को समझने के तरीके को बदल सकता है। तकनीक आगे बढ़ती रहेगी। उसे इस्तेमाल करने वाले तरीकों में भी बदलाव आएगा। इसका स्थायी जवाब हर व्यक्ति को डीपफेक पहचानना सिखाना भर नहीं है। जरूरत ऐसे सिस्टम बनाने की है जिनमें प्रामाणिकता का अनुमान लगाने की बजाय उसे साबित किया जा सके। पत्रकारों के लिए इसका मतलब है स्रोत और प्रोवेनेंस की पुष्टि। जांचकतार्ओं के लिए मूल फाइलों को सुरक्षित रखना और डिजिटल सबूतों की स्वतंत्र पुष्टि। टेक कंपनियों के लिए डिवाइसेज और प्लेटफॉर्म्स में आॅथेंटिकेशन को शामिल करना। सरकारों के लिए ऐसी नीतियां और इंफोर्समेंट मैकेनिज्म विकसित करना जो तकनीक की गति के करीब पहुंच सकें।
और आम लोगों के लिए इसका मतलब है एक नई आदत विकसित करना:
▪ परिचित लगने वाली चीज को प्रामाणिक न समझें।
▪ चेहरा असली हो सकता है और आवाज नकली।
▪ वीडियो वास्तविक हो सकता है और उसका संदर्भ झूठा।
▪ रिकॉर्डिंग असली हो सकती है और उसके साथ किया गया दावा मनगढ़ंत।
▪ और अब वास्तविक सबूतों को सिर्फ इसलिए खारिज किया जा सकता है क्योंकि हर कोई जानता है कि विश्वसनीय नकली सामग्री बनाई जा सकती है।
पुरानी दुनिया ने हमें एक सरल समीकरण दिया था:
▪ देखना ही विश्वास करना था।
▪ डिजिटल दुनिया अब हमें यह सुविधा नहीं देती।
▪ अब हमें एक ज्यादा कठिन और ज्यादा जिम्मेदार रास्ता चुनना होगा:
▪ स्रोत की जांच करें। संदर्भ देखें। प्रोवेनेंस स्थापित करें। सबूतों की स्वतंत्र पुष्टि करें।
▪ जेनरेटिव एआई के दौर में भरोसा अब सिर्फ आंखों से देखी या कानों से सुनी चीज पर आधारित नहीं हो सकता।
▪ भरोसा उसी चीज पर करना होगा जिसे सत्यापित किया जा सके।




