तिब्बत में 7.0 तीव्रता का भूकंप: हिमालय के नीचे पल रहा है बड़ा खतरा

16 मौतें, 65 घायल; भूकंप के 413 आफ्टरशॉक दर्ज हुए, केंद्र की गहराई जमीन के 10 से 18 किमी भीतर, तिब्बत से नेपाल तक आपदाओं के संकेत, भारत के लिए कितनी बड़ी चेतावनी? हिमालय के सामने सबसे बड़ी चुनौती भूकंप को रोकना नहीं, बल्कि उस दिन के लिए तैयार रहना है जब धरती फिर हिलेगी

एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
तिब्बत में 7.0 तीव्रता के भूकंप ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र की भूगर्भीय अस्थिरता को दुनिया के सामने ला दिया है। तिब्बत के नागचू शहर के बाचेन काउंटी के निकट आए इस भूकंप में अब तक 16 लोगों की मौत और 65 लोगों के घायल होने की सूचना है। 12 हजार से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। चीन के भूकंप नेटवर्क केंद्र के मुताबिक, मुख्य झटके के बाद 413 आफ्टरशॉक भी दर्ज किए गए हैं। कम से कम 339 मकानों और 20 पशुशालाओं के ढहने की सूचना है। राहत और बचाव अभियान जारी है। भूकंप के केंद्र की गहराई चीन के अनुसार 10 किलोमीटर थी, जबकि अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने इसे 18 किलोमीटर आंका है। यह अंतर अलग-अलग संस्थाओं के आंकलन और गणना पद्धतियों के कारण हो सकता है।

लेकिन इस घटना का महत्व केवल मृतकों, घायलों और क्षतिग्रस्त मकानों की संख्या तक सीमित नहीं है। तिब्बत से नेपाल और भारत तक फैली हिमालयी पर्वत शृंखला दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में से एक है। यहां पृथ्वी की विवर्तनिक प्लेटों की टक्कर से भूगर्भ में लगातार तनाव पैदा होता रहता है। यह तनाव लंबे समय तक चट्टानों में जमा हो सकता है और फिर अचानक मुक्त होकर बड़े भूकंप का रूप ले सकता है। तिब्बत में आया ताजा भूकंप इस क्षेत्र की भूगर्भीय सक्रियता की याद दिलाता है। असली सवाल यह है कि हिमालय में बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के बीच भारत और उसके पड़ोसी देश कितने तैयार हैं?

नेपाल की पिछली बाढ़ से तिब्बत के भूकंप का क्या जुड़ाव?

अगस्त 2026 में नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ल्हेंडे घाटी में चट्टान और बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटकर गिरने से नदी का प्रवाह बाधित हुआ। इसके बाद पानी और मलबे के तेज बहाव ने नेपाल के भोटे कोशी क्षेत्र में तबाही मचाई। रासुवागढ़ी-केरुंग सीमा परिसर और सड़क संपर्क को भी नुकसान पहुंचा।

क्या तिब्बत के ताजा भूकंप और नेपाल की इस बाढ़ के बीच सीधा संबंध है? फिलहाल उपलब्ध प्रमाण इसकी पुष्टि नहीं करते। दोनों घटनाओं के कारण अलग हो सकते हैं। भूकंप चट्टानों में जमा भूगर्भीय तनाव के अचानक मुक्त होने से आता है, जबकि हिमनद झील का बांध टूटने, अत्यधिक वर्षा, बर्फ या चट्टान गिरने और भूस्खलन से अचानक बाढ़ आ सकती है।

हालांकि, शक्तिशाली भूकंप चट्टानों को तोड़कर पहाड़ी ढलानों को अस्थिर कर सकता है और हिमनद झीलों के आसपास की भू-संरचना प्रभावित कर सकता है। लेकिन हर भूकंप से बाढ़ नहीं आती और हर हिमनद बाढ़ का कारण भूकंप नहीं होता। सबसे बड़ी चिंता इन आपदाओं का संयुक्त प्रभाव है। भूकंप से सड़कें टूटने और भूस्खलन या बाढ़ आने पर राहत अभियान बाधित हो सकता है। इसलिए हिमालय में भूकंपीय गतिविधियों, हिमनद झीलों, मौसम, नदी के जलस्तर और पहाड़ी ढलानों की एकीकृत निगरानी जरूरी है।

तिब्बत में पहले कब-कब भूकंप ने मचाई तबाही?

तिब्बत और आसपास का भूकंपीय इतिहास बताता है कि अक्टूबर 2026 का भूकंप कोई भूगर्भीय अपवाद नहीं है। यह क्षेत्र दशकों से शक्तिशाली भूकंपों का सामना करता रहा है।

15 अगस्त 1950 को असम-तिब्बत क्षेत्र में लगभग 8.6 तीव्रता का विनाशकारी भूकंप आया था, जिसे चायु या मेडोग भूकंप भी कहा जाता है। इसने पूर्वोत्तर भारत और तिब्बत में भारी तबाही मचाई। भूस्खलन, जमीन में दरारों और नदियों के रास्ते बाधित होने से नुकसान बढ़ा।

अक्टूबर 2008 में तिब्बत के दमशुंग क्षेत्र में लगभग 6.6 तीव्रता का भूकंप आया। इसमें कम से कम 10 लोगों की मौत और 34 लोगों के घायल होने की खबरें आई थीं।

अप्रैल 2010 में चीन के छिंगहाई प्रांत के युशू में 7.1 तीव्रता के भूकंप ने 2,600 से अधिक लोगों की जान ले ली। इसके बाद 7 जनवरी 2025 को तिब्बत के डिंगरी क्षेत्र में 6.8 तीव्रता का भूकंप आया, जिसमें कम से कम 95 लोगों की मौत हुई।

ये घटनाएं बताती हैं कि हिमालय और तिब्बती पठार में भूकंप का खतरा लगातार बना रहता है। इनके बीच वर्षों का अंतर भूगर्भीय जोखिम खत्म होने का संकेत नहीं है। चट्टानों में तनाव जमा होने की प्रक्रिया जारी रहती है, लेकिन किसी खास जगह अगला बड़ा भूकंप कब आएगा, इसकी सटीक भविष्यवाणी विज्ञान अभी नहीं कर सकता।

आखिरकार तिब्बत में बार-बार भूकंप क्यों आते हैं?

तिब्बत में बार-बार भूकंप आने की प्रमुख वजह भारतीय और यूरेशियाई विवर्तनिक प्लेटों की टक्कर है। भारतीय प्लेट उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियाई प्लेट पर दबाव डाल रही है। दोनों के बीच अभिसरण की दर लगभग 40 से 50 मिलीमीटर प्रतिवर्ष मानी जाती है। करोड़ों वर्षों से जारी इस प्रक्रिया ने हिमालय और विशाल तिब्बती पठार को आकार दिया है।

पृथ्वी की बाहरी परत कई प्लेटों में बंटी है, जो लगातार गतिशील रहती हैं। इनके दबाव से चट्टानों में तनाव जमा होता है। जब यह तनाव चट्टानों की सहनशीलता से अधिक हो जाता है, तो वे भ्रंश यानी धरती के भीतर मौजूद दरारनुमा संरचना के आसपास अचानक खिसकती हैं। इसी से ऊर्जा निकलती है और भूकंप आता है।

हिमालय के नीचे मेन हिमालयन थ्रस्ट सहित कई सक्रिय भूगर्भीय संरचनाएं हैं। तिब्बती पठार के भीतर भी सक्रिय भ्रंश मौजूद हैं। इसलिए भूकंप का केंद्र, गहराई और प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं। इसका खतरा तिब्बत तक सीमित नहीं, बल्कि भारत, नेपाल, भूटान और पूर्वोत्तर क्षेत्र से भी जुड़ा है।

क्या इस भूकंप की आशंका पहले से थी? वैज्ञानिक हिमालय और तिब्बत को लंबे समय से भूकंप की आशंका वाला क्षेत्र मानते हैं। पुराने भूकंपों के रिकॉर्ड, सक्रिय भ्रंशों और उपग्रहों से मिले आंकड़ों के आधार पर जोखिम का आकलन किया जाता है। लेकिन 22 अक्टूबर 2026 को इसी स्थान पर 7.0 तीव्रता का भूकंप आएगा, इसकी सटीक भविष्यवाणी संभव नहीं थी।

विज्ञान अभी किसी भूकंप की निश्चित तारीख, समय, स्थान और तीव्रता पहले से नहीं बता सकता। इसलिए बचाव की सबसे प्रभावी रणनीति भूकंपरोधी निर्माण, पुलों और अस्पतालों की सुरक्षा जांच, आपातकालीन संचार व्यवस्था और नियमित आपदा-अभ्यास है।

ऐसे भूकंप से भारत के लिए क्या चेतावनी है?

तिब्बत का भूकंप भारत में किसी निश्चित बड़े भूकंप की भविष्यवाणी नहीं है, लेकिन यह हिमालयी क्षेत्रों की आपदा-तैयारी पर गंभीर सवाल उठाता है। जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और पूर्वोत्तर के राज्य अलग-अलग स्तर के भूकंपीय जोखिमों का सामना करते हैं। मैदानी इलाकों और बड़े शहरों में भी संभावित नुकसान की अनदेखी नहीं की जा सकती।

सबसे बड़ी चुनौती पुराने और कमजोर भवन हैं। अस्पतालों, स्कूलों, पुलों और आपातकालीन सेवाओं से जुड़ी इमारतों की भूकंपरोधी क्षमता की जांच जरूरी है। निर्माण मानकों का पालन और पुराने भवनों को मजबूत बनाना जानमाल का नुकसान घटा सकता है।

दूसरी चुनौती हिमालय में सड़क, सुरंग, बांध और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षा है। कठिन भूगर्भीय परिस्थितियों में इनकी योजना बनाते समय चट्टानों की स्थिति, पहाड़ी ढलानों की स्थिरता और भूकंपरोधी डिजाइन का वैज्ञानिक आकलन आवश्यक है।

तीसरा जोखिम सीमा पार आपदाओं का है। तिब्बत में भूकंप से भूस्खलन या हिमनद झीलों को नुकसान पहुंचने की स्थिति में बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए भारत, नेपाल और चीन के बीच मौसम, नदी के जलस्तर और संभावित खतरों से जुड़े आंकड़ों के आदान-प्रदान की व्यवस्था महत्वपूर्ण है।

भारत का राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र भूकंपीय गतिविधियों की निगरानी करता है। भूकंप के शुरुआती चेतावनी तंत्र कुछ स्थानों पर तेज झटके पहुंचने से पहले कुछ सेकंड दे सकते हैं, लेकिन ये भूकंप की तारीख और समय की भविष्यवाणी नहीं करते।

भारत के लिए असली कसौटी है- क्या संवेदनशील क्षेत्रों में भवन, सड़कें, पुल और अस्पताल बड़े भूकंप के दौरान सुरक्षित रहने के लिए तैयार हैं? निगरानी के साथ मजबूत निर्माण, प्रशिक्षित राहत दल और प्रभावी निकासी व्यवस्था ही नुकसान कम कर सकती है।

हिमालयी क्षेत्र पर कितना बड़ा खतरा मंडरा रहा है?

हिमालय में खतरे का आकलन केवल भूकंप की तीव्रता से नहीं, बल्कि भूगर्भीय जोखिम, आबादी और बुनियादी ढांचे की संवेदनशीलता तथा आपदा से निपटने की तैयारी से होता है। इतिहास इस खतरे की गंभीरता बताता है। 1934 के बिहार-नेपाल भूकंप की तीव्रता लगभग 8.1 और 1950 के असम-तिब्बत भूकंप की तीव्रता लगभग 8.6 आंकी गई थी। 2015 के नेपाल भूकंप में 7.8 तीव्रता का मुख्य झटका आया था। ये घटनाएं बताती हैं कि हिमालयी क्षेत्र में विनाशकारी भूकंप पैदा करने में सक्षम भूगर्भीय संरचनाएं मौजूद हैं। हालांकि, इनसे अगले भूकंप का स्थान या समय तय नहीं किया जा सकता।

खतरा केवल इमारतों के ढहने तक सीमित नहीं है। बड़े भूकंप से सड़कें और पुल टूट सकते हैं, भूस्खलन हो सकता है तथा कुछ परिस्थितियों में हिमनद झीलों और पहाड़ी ढलानों को नुकसान पहुंच सकता है। यदि इसके साथ अचानक बाढ़, मलबे का बहाव और संचार व्यवस्था बाधित होने जैसी घटनाएं जुड़ जाएं, तो राहत अभियान भी प्रभावित हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन जोखिम की इस तस्वीर को और जटिल बनाता है। हिमनदों का पिघलना, कुछ हिमनद झीलों का विस्तार और अत्यधिक वर्षा बाढ़ तथा भूस्खलन की आशंका बढ़ा सकते हैं। हालांकि, जलवायु परिवर्तन को सीधे विवर्तनिक भूकंपों का कारण मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।

हिमालय में अगला बड़ा भूकंप कब आएगा, यह बताना संभव नहीं है। लेकिन भूकंपरोधी निर्माण, सुरक्षित अस्पताल, मजबूत सड़कें, प्रशिक्षित राहत दल और प्रभावी आपातकालीन व्यवस्था सुनिश्चित करना हमारे हाथ में है। असली सवाल यही है कि आपदा आने से पहले हमारी तैयारी कितनी मजबूत है।

आखिर क्यों आते हैं भूकंप?

पृथ्वी की बाहरी ठोस परत कई बड़ी और छोटी विवर्तनिक प्लेटों में बंटी हुई है। ये प्लेटें लगातार बहुत धीमी गति से चलती रहती हैं। जब वे एक-दूसरे से टकराती हैं, दूर जाती हैं या एक-दूसरे के किनारे से खिसकती हैं, तो चट्टानों में तनाव पैदा होता है।

कई बार चट्टानें लंबे समय तक एक-दूसरे से फंसी रहती हैं। तनाव बढ़ता रहता है, लेकिन चट्टानें तुरंत नहीं खिसकतीं। जब तनाव चट्टानों के प्रतिरोध से अधिक हो जाता है, तो भ्रंश के दोनों ओर की चट्टानें अचानक खिसक जाती हैं। इस दौरान जमा ऊर्जा भूकंपीय तरंगों के रूप में फैलती है और धरती हिलने लगती है।

भूकंप की गहराई, केंद्र से दूरी, जमीन की प्रकृति और इमारतों की गुणवत्ता तय करती है कि उसका प्रभाव कितना गंभीर होगा। समान तीव्रता के दो भूकंप भी अलग-अलग स्थानों पर बहुत अलग नुकसान पहुंचा सकते हैं।

हिमालय का निर्माण और उसकी भूकंपीय सक्रियता एक ही भूगर्भीय प्रक्रिया के दो पहलू हैं। भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों की टक्कर ने दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत शृंखलाओं में से एक को जन्म दिया, लेकिन इसी टक्कर से क्षेत्र में तनाव भी जमा होता है। इसलिए भूकंप हिमालय की भूगर्भीय प्रकृति का हिस्सा हैं।

तिब्बत का ताजा भूकंप हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के इस तंत्र को रोका नहीं जा सकता, लेकिन इसके जोखिम को समझा जा सकता है। वैज्ञानिक निगरानी, सुरक्षित निर्माण, सीमा पार सहयोग और समय पर राहत की तैयारी से जानमाल के नुकसान को कम किया जा सकता है। हिमालय के सामने सबसे बड़ी चुनौती भूकंप को रोकना नहीं, बल्कि उस दिन के लिए तैयार रहना है जब धरती फिर हिलेगी।