हिंदुत्व के बाद आंदोलन के पिच पर कांग्रेस को लाने वाली भाजपा की रणनीति

सुजीत ठाकुर, नई दिल्ली
बीते तीन लोकसभा और दर्जनों विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत की एक बड़ी वजह सियासी पिच रही है। भगवादल अपने मजबूत पिच पर कांग्रेस को लाने की रणनीति बनाती रही है। पार्टी इसमें सफल भी रही है और चुनावी सफलता में इस सियासी पिच की बड़ी भूमिका भी रही है।

मौजूदा समय में सीजेपी आंदोलने से जो सियासी पिच तैयार हो रही है वह भाजपा को ज्यादा परेशान नहीं कर रही है। क्यों? भाजपा के एक वरिष्ठ महासचिव का कहना है कि आंदोलन कांग्रेस की मजबूत पिच नहीं रही है। कांग्रेस ने आजादी के बाद कभी भी आंदोलन के जरिए सत्ता में न तो वापसी की है न ही आंदोलन के सेंटिमेंट को अपने साथ जोड़ पाई है। यह विपक्ष खासकर एनडीए का पिच है। यही वजह है कि सीजेपी आंदोलन में कांग्रेस सीधे तौर पर शामिल नहीं हो रही है। वह एक मुद्दे को लेकर सड़क पर तो दिखती है लेकिन आंदोलन की अगुवाई करने से बचती दिख रही है।

1965 में तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन की सियासी पिच पर डीएमके ने कांग्रेस को आने पर मजबूर किया। कांग्रेस सत्ता गंवा बैठी और दोबारा फिर राज्य में कभी वापसी नहीं कर सकी। यह स्वतंत्र भारत में ऐसा महत्वपूर्ण उदाहरण है जिसमें एक बड़े जनआंदोलन ने सीधे तौर पर राज्य की सत्ता की राजनीति बदल दी।

1965 में तत्कालीन मद्रास राज्य में हिंदी को संघ की प्रमुख आधिकारिक भाषा बनाने की आशंका के खिलाफ छात्रों और डीएमके के नेतृत्व में बड़ा आंदोलन हुआ। प्रदर्शन, बंद, हिंसा और पुलिस कार्रवाई के बाद केंद्र को अंग्रेजी के इस्तेमाल को जारी रखने का आश्वासन देना पड़ा। उस समय राज्य में कांग्रेस की सरकार और मुख्यमंत्री एम. भक्तवत्सलम थे। दो साल बाद 1967 के विधानसभा चुनाव में डीएमके ने 138 सीट जीत कर बहुमत हासिल किया और सी.एन. अन्नादुरै मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस पहली बार राज्य की सत्ता से बाहर हुई।

इसके बाद 1966-67 में पश्चिम बंगाल में खाद्य आंदोलन हुआ। 1966 में पश्चिम बंगाल में खाद्य संकट, राशन और महंगाई को लेकर बड़ा आंदोलन हुआ। वाम दलों ने इसे व्यापक जनआंदोलन में बदल दिया। 1967 के चुनाव में कांग्रेस को इसका बड़ा राजनीतिक नुकसान हुआ। 1967 में कांग्रेस के पीसी सेन  मुख्यमंत्री थे। चुनाव में कांग्रेस बहुमत से दूर रह गई और विभिन्न विपक्षी दलों ने मिलकर यूनाइटेड फ्रंट सरकार बनाई। अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री और ज्योति बसु उपमुख्यमंत्री बने।

इसके बाद गुजरात नव निर्माण आंदोलन ने कांग्रेस को बड़ा झटका दिया। 1973 के अंत में अहमदाबाद में छात्रों ने हॉस्टल फीस और मेस शुल्क बढ़ाए जाने के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। यह आंदोलन महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दों से जुड़कर नव निर्माण आंदोलन बन गया। आंदोलन इतना व्यापक हुआ कि मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को फरवरी 1974 में इस्तीफा देना पड़ा। और विधानसभा भंग कर दी गई।

1975 में हुए चुनाव में कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ और जनता मोर्चा को सत्ता हासिल हुई। चुनाव के ठीक पहले हुए इस सत्ता परिवर्तन को जेपी आंदोलन और बाद में आपातकाल की राष्ट्रीय राजनीति से भी जोड़कर देखा गया। बाद में जेपी आंदोलन और आपातकाल के बाद पहली बार केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार 1977 में बनी। भारत में पहली बार केंद्र में कांग्रेस के अलावा किसी गठबंधन/पार्टी ने सरकार बनाई। इसके बाद आंदोलन लगातार कांग्रेस की कमजोर पिच बन गई। 1979 से 1985 तक चला असम आंदोलन मुख्यतः अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर हुआ। बाद में हुए चुनाव में असम गण परिशद ने सरकार बनाई। 1985 के चुनाव में एजीपी ने 63 सीट जीत कर सरकार बनाई।

राम जन्मभूमि आंदोलन 1980 के दशक के उत्तरार्ध और 1990 के दशक की शुरुआत में भाजपा की राजनीति के विस्तार का प्रमुख आधार बना। 1991 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में BJP ने 221 सीट जीत कर स्पष्ट बहुमत हासिल किया और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस सिर्फ 46 सीटों पर रह गई।

2011 में दिल्ली में अन्ना आंदोलन से बनी आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को दिल्ली की सत्ता से बाहर कर दिया। इतना ही नहीं 2014 में लोकसभा चुनाव में अन्ना आंदोलन की वजह से बने माहौल ने भी भाजपा को फायदा पहुंचाया। भाजपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ लोकसभा चुनाव जीती। इतना ही नहीं 30 साल बाद लोकसभा में किसी भी पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता हासिल की।