चर्चित किताब ‘ग्लोबल सनातन’ और ‘शूर्पणखा के शाप’ के लेखक और काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) विश्व भूषण मिश्र से बातचीत की ‘तहलका’ के डिजिटल हेड राघवेंद्र द्विवेदी ने
आप ने किताब का नाम ‘ग्लोबल सनातन’ ही क्यों रखा? वैश्विक सनातन क्यों नहीं?
- जब हम किसी बात, विचार या वस्तु के लिए ग्लोबल शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो उसका मतलब ये निकलता है कि वो पहले से सर्वत्र मौजूद है लेकिन जब हम उसके लिए वैश्विक शब्द का प्रयोग करते हैं तो मन में धारणा आती है कि वो विस्तारित हो कर विश्व में गया है।
सनातन के संबंध में शोध का परिणाम ये निकल कर आया कि सनातन सर्वत्र उपस्थित था। भारत उसकी केंद्र भूमि है या नहीं, इस पर प्रश्न हो सकता है। आज ये कहा जा सकता है कि भारत सनातन की श्रेष्ठ भूमि है, लेकिन भारत ही केंद्रीय भूमि था या भारत से ही सनातन का प्रसार प्रारंभ हुआ था हम ये नहीं कह सकते।
आजकल सनातन के बारे में समाज में अलग अलग राय है। कुछ लोग सनातन में कमियाँ गिनाते हैं। आप के हिसाब से सनातन क्या है?
- ये व्यक्ति की समझ और ज्ञान की है कि वो सनातन की व्याख्या कैसे करता है। अगर कोई अज्ञानी व्यक्ति दो और दो का जोड़ पाँच बताने लगे तो क्या उसे सही माना जाएगा? सही जोड़ और जवाब तो चार ही रहेगा।
सनातन के बारे में व्यापक शोध और तार्किक मनन के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि सनातन ही एक मात्र धर्म है और ये नित्य शाश्वत धर्म है। मतलब जो शाश्वत है, जो धर्म है और जिसका नित्य में निरंतरता का संबंध है। सनातन एक जीवन पद्धति है। जन्म लेने वाला हर बालक प्रकृति से सनातनी होता है। ये महाभारत में आया हुआ प्रसंग है। यहीं से किताब की शुरुआत होती है। ‘ग्लोबल सनातन’ में सनातन के विभिन्न आयाम और दृष्टिकोण का विस्तृत वर्णन है।
आप ने दीक्षा पर एक अध्याय लिखा है। क्या दीक्षा हर सनातनी के लिए अनिवार्य है?
- जन्म के समय हर बच्चा सनातनी होता है जब तक उसे दूषित न किया जाए। जब तक उस पर दूसरे तरह के संस्कार थोपे नहीं न जाएं। प्राकृतिक अवस्था में प्रकृति के साध सामंजस्य बनाते हुए रहने दें तो वो निश्चित रूप से सनातन धर्मी होगा, मानव धर्मी होगा।
दीक्षा की जरूरत उसे होती है जो भटका हुआ हो। भटकाव में वापस लौटने की गुंजाइश रहती है और उसके लिए दीक्षा जरूरी है। वापस लौटने के लिए सिर्फ सनातनी संकल्प ही काफी है। किसी मौलवी, पुजारी या पादरी की आवश्यकता नहीं है।
किताब में एक अध्याय नवीन सनातन पर भी है। जब सनातन आदि अनंत काल से है तो फिर नवीन सनातन क्या है और इसकी जरूरत क्यों?
- इंसान के जीवन कुछ व्यावहारिक समस्याएं आती हैं। वैवाहिक संबंध कहाँ होंगे? उसके खान-पान की पद्धति क्या होगी? उसके कुल गोत्र का नियमन कैसे होगा? ऐसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या है जो सनातन में आस्था तो रखते हैं, सनातन में विश्वास भी जताते हैं लेकिन सामाजिक कारणों से सनातन समाज में सम्मिलित नहीं हो पाते।
इसलिए उनके लिए एक नवीन सनातन समाज की स्थापना करनी होगी। जिससे वो संभव और समन्वय के साथ संबंध स्थापित कर सकें। सनातन में रक्त और जन्म की शुद्धि का बहुत महत्व है। बाहरी पाश्चात्य संस्कारों की वजह से इंसान की सामाजिक ग्रा‘ता पर सवाल लग गया है। प्राचीन सनातन में एक नवीन धारा जोड़ने की आवश्यकता है। कलयुग में समय के बदलाव को देखते हुए लोगों को अपने मूल स्वाभाविक वैचारिक रास्ते पर लौटना जरूरी है। हम ने अपना विचार रखा है, सनातन के प्रहरियों को इस पर ध्यान देना और सोचना है।
आपकी दूसरी चर्चित किताब ‘शूर्पणखा के शाप’ है। किताब का पहला अध्याय है ‘राजनीति का सत्य और धर्म की सत्ता’। सवाल ये कि अगर धर्म की सत्ता स्थापित है तो ऐसे में राजनीति का सच क्या है?
- राजनीति जब तक धर्म के अनुसार रहेगी तब तक वो समाज का कल्याण करेगी। राजदंड को धर्मदंड के अधीन ही रहना चाहिए। जैसे ही राजनीति धर्म से विमुख होती है उसमें अवगुण पैदा हो जाते हैं। सबसे बड़ा अवगुण अहंकार का होता है। हालाँकि अहंकार का क्षय होना सुनिश्चित है।
‘शूर्पणखा के शाप’ जो किताब का नाम है और किताब में शामिल प्रतिनिधि कथा भी है। इसमें क्या कहना चाहते हैं आप?
- समाज में एक नैरेटिव ये है कि अगर शूर्पणखा ने प्रणय निवेदन किया था तो उसके बदले उसके नाक कान काटने की क्या आवश्यकता थी? कथा ये है कि शूर्पणखा का निवेदन जब अस्वीकार किया गया तो उसके बाद वो आक्रामक हो गई, इतनी आक्रामक कि खाने को दौड़ पड़ी। तब उसको दंडित किया गया।
दूसरी बात, एक अकेला व्यक्ति आक्रामक शूर्पणखा के नाक कान आसानी से काट दे। ये मुझे संभव नहीं लगता। कथानक में नाक काटना रूपक है। नाक कटने का मतलब होता है इज्जत चली जाना। कान कटने से आशय है सुनने की क्षमता का खत्म हो जाना।
शूर्पणखा कहती है कि मैं काम पीड़ित स्त्री हूँ और काम पीड़ित स्त्री की हाय जरूर लगती है। शूर्पणखा शाप देती है और आगे कहती है कि अयोध्या कुमारों को शूर्पणखा के साथ नहीं रहना चाहिए। यहाँ अयोध्या कुमार और शूर्पणखा दोनों रूपक हैं। दोनों शब्द नई परिभाषा के दायरे में खुलते हैं। एक निश्चल प्रेम का प्रतीक है और दूसरा प्रतीक शारीरिक वासना से भरी औरत का है।
आप ने जवाब में प्रेम का जिक्र किया। आज के दौर में प्रेम का स्वरूप बहुत बिगड़ गया है। रिश्तों में छल कपट धोखे से भरी आपराधिक कहानियाँ अक्सर सुनने को मिलती हैं। आप की नजर में प्रेम क्या है?
- प्रेम आपकी भावनाओं का प्रकटीकरण है। भावनाओं का स्वरूप मनुष्यता के केंद्र से तय होता है। जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो उसका आदर सम्मान भी करते हैं। उसका ध्यान रखते हैं। उसका दुख देखा नहीं जाता। ये सब मनुष्यता के दायरे में रहते हुए ही महसूस हो सकता है। प्रेम त्याग और दूसरे के प्रति समर्पण का भाव है।
रामायण भी रिश्तों को निभाने का पाठ पढ़ाती है। राम प्रेम और करुणा के प्रतीक हैं। आज के दौर में इच्छाओं का असीमित होना और उन इच्छाओं की हर हाल में पूर्ति के लिए किसी दूसरे को जरिया बनाने और पूर्ति न होने पर किसी भी स्तर तक जाने की प्रतिशोधात्मक प्रवृत्ति से प्रेम का रूप बिगड़ रहा है। मूल्यों में गिरावट आ रही है।
नाम – ग्लोबल सनातन
प्रकाशक – प्रभात प्रकाशन
पृष्ठ – 152
मूल्य – 300 रूपए (पेपर बैक)




