कांग्रेस का नया दांव- ज्ञानेश पर निशाना, पर मोदी-शाह को कठघरे में लाना

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित संसदीय कार्रवाई और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर विपक्ष की चर्चा
ज्ञानेश कुमार से जुड़े विवाद पर विपक्ष संसदीय कार्रवाई और साझा रणनीति पर विचार कर रहा है। यह प्रतिनिधि तस्वीर है।

महाभियोग नोटिस दो बार पहले खारिज, अब तीसरी कोशिश में चुनाव आयोग की अंदरूनी असहमतियां नया हथियार; राहुल गांधी के पिछले आंदोलन की अधूरी रणनीति को फिर धार देने की कवायद, 2 अक्टूबर से सड़क पर उतरेगा विपक्ष, असली लड़ाई मोदी-शाह से जवाबदेही की

एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की तीसरी बार महाभियोग लाने की कोशिश के पीछे केवल उनके इस्तीफे की मंशा नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और उसकी संस्थागत जवाबदेही को चुनौती देने की रणनीति है। कांग्रेस इस बार आयोग के भीतर दर्ज बताई गई आपत्तियों को संसदीय कार्रवाई का आधार बनाकर इंडिया गठबंधन को साझा मोर्चे पर लाना चाहती है। लेकिन इस रणनीति का एक और राजनीतिक पहलू है- चुनाव आयोग के फैसलों के लिए केवल सीईसी नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जवाबदेही का सवाल भी उठाना।
कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, पार्टी की नजर में ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली और केंद्र सरकार के शीर्ष नेतृत्व के बीच संबंध इस विवाद का अहम हिस्सा हैं। विपक्ष का राजनीतिक आरोप है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हुई है। हालांकि, प्रधानमंत्री या गृह मंत्री की ओर से आयोग को निर्देश दिए जाने अथवा उसके फैसलों को नियंत्रित करने का कोई स्वतंत्र रूप से स्थापित प्रमाण सामने रखे बिना इसे आरोप और राजनीतिक रणनीति के दायरे में ही देखना होगा। लेकिन कांग्रेस अब इसी एजेंडे को आगे बढ़ाती नजर आ सकती है।

इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट से आगे: आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल

इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से आयोग के फैसलों पर बार-बार आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात सामने आई थी। चुनाव आयोग ने आंतरिक विचार-विमर्श को सामान्य संवैधानिक प्रक्रिया बताते हुए कहा कि अंतिम फैसले पूर्ण आयोग की प्रक्रिया से लिए जाते हैं। विपक्ष अब इसी विवाद को व्यापक सवाल में बदलने की कोशिश कर रहा है- यदि चुनाव आयोग के भीतर महत्वपूर्ण फैसलों पर मतभेद हैं, तो उनकी वैधानिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी? हालांकि, किसी आयुक्त की असहमति अपने आप में सीईसी के कदाचार का प्रमाण नहीं है। हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया में आरोपों को निर्धारित आधार पर साबित करना होगा।

कांग्रेस की रणनीति: सीईसी से जवाबदेही की कड़ी मोदी-शाह तक

कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति का संभावित विस्तार यहीं से शुरू होता है। पार्टी के लिए ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव एक संस्थागत कार्रवाई है, लेकिन इसके जरिए चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और केंद्र सरकार की भूमिका को एक ही राजनीतिक बहस में लाने का प्रयास भी है।
यह रणनीति पिछले आंदोलन के घटनाक्रम से जुड़ती है। राहुल गांधी ने पहले प्रधानमंत्री आवास पर धरना देकर चुनावी प्रक्रिया के सवाल पर प्रधानमंत्री से जवाबदेही तय करने का राजनीतिक संदेश दिया था। उस समय भी कांग्रेस की रणनीति प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की भूमिका पर भी सवाल उठाने की थी। बाद में धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफे के साथ वह आंदोलन जिस राजनीतिक मोड़ पर पहुंचा, उसके बाद यह व्यापक जवाबदेही वाला अभियान आगे नहीं बढ़ सका। अब कांग्रेस चुनाव आयोग के विवाद को केंद्र सरकार के शीर्ष नेतृत्व की जवाबदेही से जोड़ने की कोशिश कर सकती है। फर्क यह है कि इस बार सड़क के विरोध के साथ संसद में सीईसी को हटाने का नोटिस और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की जांच का मुद्दा भी है। यानी राजनीतिक दबाव को संवैधानिक प्रक्रिया के साथ जोड़ने की कोशिश।

महाभियोग: तीसरी कोशिश, लेकिन पहले दो नोटिस क्यों नहीं बढ़े?

संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत सीईसी को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है। आधार सिद्ध कदाचार या अक्षमता होना चाहिए। लोकसभा में कम-से-कम 100 या राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस जरूरी है। स्वीकार होने पर जांच समिति आरोपों की पड़ताल करती है। इसके बाद दोनों सदनों में कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई समर्थन आवश्यक है। भारत में अब तक कोई मुख्य चुनाव आयुक्त इस प्रक्रिया से नहीं हटाया गया है। मार्च 2026 में लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों ने नोटिस दिया था। 6 अप्रैल को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति ने उसे स्वीकार नहीं किया। 24 अप्रैल को राज्यसभा में 73 सांसदों के हस्ताक्षर से नौ आरोपों वाला दूसरा नोटिस भी स्वीकार नहीं हुआ। इस बार आयोग के भीतर दर्ज बताई गई आपत्तियों को नए आधार के रूप में पेश किया जा रहा है। लेकिन नोटिस पेश करना, उसका स्वीकार होना, जांच समिति गठित होना और अंततः सीईसी को हटाया जाना अलग-अलग संवैधानिक पड़ाव हैं। नया दस्तावेजी आधार भी अपने आप इन सभी बाधाओं को पार नहीं कराता।

इंडिया गठबंधन: साझा निशाना, लेकिन रणनीति में फिर अंतर

अखिलेश यादव ने सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की अपील की है। ममता बनर्जी ने सीईसी को हटाने और गिरफ्तार करने के साथ एसआईआर के बाद चुनाव करा चुके राज्यों में पुराने मतदाता आंकड़ों के आधार पर नए चुनाव कराने की मांग की। अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे ने भी गिरफ्तारी और दोबारा चुनाव कराने की मांगें उठाई हैं। इन बयानों में चुनाव आयोग की जांच और सीईसी को हटाने की मांग साझा है, लेकिन रास्ते अलग हैं। कांग्रेस संसदीय प्रक्रिया और संस्थागत जवाबदेही पर जोर दे रही है, जबकि कुछ क्षेत्रीय दल चुनाव रद्द करने और दोबारा कराने जैसी व्यापक मांगें कर रहे हैं। यही अंतर गठबंधन की वास्तविक परीक्षा बनेगा- क्या सभी दल महाभियोग नोटिस और आगे की संसदीय प्रक्रिया में साथ रहेंगे या एकजुटता राजनीतिक बयानों तक सीमित रहेगी?

2 अक्टूबर: आंदोलन से संसद तक जवाबदेही की लड़ाई

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने 2 अक्टूबर से देशव्यापी आंदोलन की घोषणा की है। पार्टी ने इसे मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और चुनाव आयोग की जवाबदेही से जोड़ा है। इस बार आंदोलन के साथ संसद में हटाने की प्रक्रिया और न्यायिक जांच की मांग भी जुड़ रही है। पिछले आंदोलन के दौरान राहुल गांधी का प्रधानमंत्री आवास पर धरना केंद्र सरकार के शीर्ष नेतृत्व को सीधे जवाबदेही के सवाल पर घेरने की कोशिश के रूप में सामने आया था। अब कांग्रेस के सामने उस राजनीतिक सवाल को संस्थागत प्रक्रिया से जोड़ने की चुनौती है। लेकिन आंदोलन का जनसमर्थन, संसद में नोटिस का स्वीकार होना और आरोपों का संवैधानिक रूप से साबित होना अलग-अलग परिणाम हैं।

इस बार विपक्ष के सामने दो परीक्षाएं हैं- मतदाता अधिकारों के मुद्दे को व्यापक जनसमर्थन में बदलना और संसद में आरोपों को संवैधानिक जांच तक पहुंचाना। यदि इंडिया गठबंधन इन दोनों मोर्चों को जोड़ पाता है, तो विवाद चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और केंद्र सरकार की जवाबदेही पर लंबी संस्थागत बहस का रूप ले सकता है। अन्यथा तीसरी कोशिश भी राजनीतिक दबाव तक सीमित रह सकती है।

इंडिया गठबंधन की बैठक अब 30 सितंबर को

सीईसी ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर इंडिया गठबंधन की बैठक अब 30 सितंबर को होगी. ममता बनर्जी ने राहुल गांधी से जल्द से जल्द मीटिंग बुलाए जाने की मांग की थी. गठबंधन की पिछली बैठक जून में दिल्ली में हुई थी