रैफेल से गोर तक: तीन दशक में कश्मीर पर कैसे बदली वॉशिंगटन की भाषा; ‘विवादित क्षेत्र’ से ‘भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा’ तक का सफर

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का श्रीनगर दौरा, कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया
US Ambassador Sergio Gor ने श्रीनगर में CM Omar Abdullah से मुलाकात की।

नई दिल्ली, 24 अगस्त | रियाज वानी

जब भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर 19 अगस्त को श्रीनगर पहुंचे, तो जम्मू-कश्मीर को लेकर उन्होंने जिस अंदाज में बात की, वैसी भाषा तीन दशक पहले किसी वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक के मुंह से सुनना मुश्किल था

जब भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर 19 अगस्त को श्रीनगर पहुंचे, तो जम्मू-कश्मीर को लेकर उन्होंने जिस अंदाज में बात की, वैसी भाषा तीन दशक पहले किसी वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक के मुंह से सुनना मुश्किल था। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात के बाद गोर ने कहा, “यह भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।” उन्होंने जम्मू-कश्मीर की खूबसूरती की तारीफ की और सुरक्षा स्थिति में सुधार के बाद संकेत दिया कि वॉशिंगटन जम्मू-कश्मीर के लिए अपनी यात्रा संबंधी सलाह की समीक्षा कर सकता है। गोर के इस बयान पर पाकिस्तान ने तत्काल कूटनीतिक प्रतिक्रिया दी। इस्लामाबाद ने अमेरिकी दूतावास के प्रभारी अधिकारी को तलब किया और जम्मू-कश्मीर को “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” बताए जाने पर विरोध दर्ज कराया।

1993 : रॉबिन रैफेल और कश्मीर पर बड़ा विवाद, ‘विवादित क्षेत्र’ बयान से नई दिल्ली में राजनीतिक तूफान

अमेरिका की सबसे महत्वपूर्ण दखलंदाजियों में से एक 1993 में हुई, जब दक्षिण एशिया मामलों की तत्कालीन सहायक विदेश मंत्री रॉबिन रैफेल ने सार्वजनिक रूप से कश्मीर को “विवादित क्षेत्र” बताया। एक पृष्ठभूमि वार्ता में रैफेल ने कहा था कि वॉशिंगटन 1947 के विलय-पत्र को इस अर्थ में स्वीकार नहीं करता कि कश्मीर “हमेशा के लिए भारत का अभिन्न हिस्सा” है। इस बयान से नई दिल्ली में राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने सार्वजनिक रूप से इस धारणा को खारिज किया कि कश्मीर की स्थिति अब भी खुली हुई है। रैफेल की भाषा तत्कालीन क्लिंटन प्रशासन की उस नीति को दर्शाती थी, जिसके तहत अमेरिका कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ सक्रिय संपर्क चाहता था। रैफेल अलगाववादी नेताओं से भी नियमित मुलाकात करती थीं।

विस्नर का दौर : अलगाववादियों से भी संवाद, 1995 में कश्मीर दौरा, यासीन मलिक से मुलाकात, ‘कश्मीर निर्णायक मोड़ पर’

जब फ्रैंक विस्नर भारत में अमेरिकी राजदूत बने, तब भी माहौल आज से काफी अलग था। विस्नर ने जून 1995 में कश्मीर का दौरा किया और विभिन्न वर्गों के लोगों से मुलाकात की। आधिकारिक संसदीय रिकॉर्ड के अनुसार, उन्होंने राज्यपाल, सरकारी अधिकारियों, मुख्यधारा के राजनीतिक नेताओं, ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के सदस्यों, छात्रों, शिक्षाविदों, पत्रकारों और कारोबारी प्रतिनिधियों से बातचीत की। उन्होंने अलगाववादी नेताओं से भी मुलाकात की। इनमें जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के अध्यक्ष यासीन मलिक भी शामिल थे। समकालीन रिपोर्टों के अनुसार, उस यात्रा के दौरान विस्नर ने कहा था, “कश्मीर एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है।” हालांकि विस्नर का रुख अलगाववाद के समर्थन जैसा नहीं था। वे हिंसा के विरोधी थे, चुनावों में भागीदारी और राजनीतिक संवाद को प्रोत्साहित करते थे।

11 सितंबर 2001 के बाद बदली पूरी शब्दावली, रॉबर्ट ब्लैकविल ने हुर्रियत नेताओं से मुलाकात नहीं की, कश्मीर को आतंकवाद के नजरिये से देखा

11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिकी भाषा में बड़ा बदलाव आया। 2002 में जब भारत में अमेरिकी राजदूत रॉबर्ट ब्लैकविल जम्मू-कश्मीर पहुंचे, तो उन्होंने हुर्रियत नेताओं या दूसरे अलगाववादी प्रतिनिधियों से मुलाकात नहीं की। यह पहले के अमेरिकी राजनयिकों की परंपरा से स्पष्ट बदलाव था। इसके बजाय उन्होंने सुरक्षा प्रतिष्ठान से जानकारी ली और नियंत्रण रेखा के आसपास अग्रिम इलाकों तथा सैन्य ठिकानों का दौरा किया। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि ब्लैकविल कश्मीर को आतंकवाद के नजरिये से देखने लगे। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के दक्षिण एशिया कार्यक्रम द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, अक्टूबर 2002 में उन्होंने कश्मीर में आतंकवाद को “बाहरी रूप से संचालित” बताया था। बाद में उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी युद्ध में कश्मीर का आतंकवाद भी शामिल होगा।

मध्यस्थता से द्विपक्षीय समाधान तक, रिचर्ड वर्मा और एरिक गार्सेटी की भाषा में स्पष्टता, ‘संबंधित पक्षों द्वारा तय किया जाना चाहिए’

यह बदलाव भारत-अमेरिका संबंधों में आए व्यापक परिवर्तन के साथ हुआ। जैसे-जैसे वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच रणनीतिक संबंध मजबूत हुए, कश्मीर ऐसा मुद्दा बनता गया जिस पर अमेरिका संप्रभुता को लेकर कोई स्पष्ट पक्ष लेने से बचने लगा। जब रिचर्ड वर्मा भारत में अमेरिकी राजदूत थे, तब तक अमेरिकी नीति की भाषा काफी स्पष्ट हो चुकी थी। 2016 में हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में भड़के व्यापक विरोध के दौरान वर्मा ने कहा था कि अमेरिका का पुराना रुख यही है कि यह मामला “संबंधित पक्षों द्वारा तय किया जाना चाहिए।” 2023 में एरिक गार्सेटी ने इस स्थिति को और स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि कश्मीर मुद्दे का समाधान भारत और पाकिस्तान के बीच होना चाहिए, “किसी तीसरे पक्ष, जिसमें अमेरिका भी शामिल है, के जरिए नहीं।”

अनुच्छेद 370 के बाद एक और परीक्षा, अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन ने वॉशिंगटन के सामने खड़ी की चुनौती

अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन ने वॉशिंगटन के सामने एक और चुनौती खड़ी की। अमेरिका ने घाटी में प्रतिबंधों, राजनीतिक स्वतंत्रता और स्थिति को लेकर चिंता जताई, लेकिन उसने कश्मीर के संवैधानिक दर्जे के सवाल को उस तरह दोबारा नहीं उठाया, जैसा 1993 में रैफेल की टिप्पणी से संकेत मिलता था। जनवरी 2020 में अमेरिकी राजदूत केनेथ जस्टर भारत सरकार द्वारा आयोजित विदेशी राजनयिकों के एक प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में कश्मीर पहुंचे। विस्नर की 1995 की यात्रा से इसकी तुलना महत्वपूर्ण थी। अब अमेरिकी राजदूत अलगाववादी नेतृत्व से स्वतंत्र रूप से मुलाकात करने के बजाय मुख्य रूप से नई दिल्ली द्वारा तय किए गए कूटनीतिक ढांचे में कश्मीर का दौरा कर रहे थे।

गोर का कश्मीर बयान और लद्दाख का संदेश, ‘यह भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है’ से तीन दशक की यात्रा पूरी

इस पूरे इतिहास की पृष्ठभूमि में गोर का श्रीनगर में दिया गया बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह बेहद सरल था। “यह भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।” उन्होंने केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा सुरक्षा की स्थिति में किए गए सुधारों की तारीफ की और संकेत दिया कि अमेरिका अपनी यात्रा संबंधी सलाह की समीक्षा कर सकता है। पाकिस्तान ने तत्काल आपत्ति जताई और कहा कि वह जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा बताए जाने की बात को “कड़े शब्दों में खारिज और निंदा” करता है। इसके बाद गोर का लद्दाख दौरा हुआ। लद्दाख यात्रा महज जांस्कर में अमेरिकी राजदूत के रिवर राफ्टिंग करने की तस्वीरों तक सीमित नहीं है। 2020 के भारत-चीन सैन्य टकराव और गलवान संघर्ष के बाद किसी वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक की इस रणनीतिक सीमा क्षेत्र में मौजूदगी अपने आप में महत्वपूर्ण है।