ओडिशा में ओलिव रिडले कछुए ने 271 दिनों में तय की 6,719 किमी दूरी, WII-अडानी फाउंडेशन स्टडी के नतीजे जारी

ओडिशा तट पर ओलिव रिडले समुद्री कछुआ और सैटेलाइट ट्रैकिंग से जुड़ा संरक्षण अध्ययन
WII के नेतृत्व वाली स्टडी में ओडिशा के ओलिव रिडले कछुओं की समुद्री आवाजाही, आवास और नेस्टिंग पैटर्न का अध्ययन किया गया। यह प्रतिनिधि तस्वीर है।

ओडिशा में ओलिव रिडले कछुओं की आवाजाही पर नई जानकारी, WII-अडानी फाउंडेशन की स्टडी में 6,719 किमी की यात्रा का खुलासा
तीन साल की रिसर्च के पहले साल के नतीजे जारी; सैटेलाइट ट्रैकिंग में नर-मादा कछुओं के अलग-अलग मूवमेंट पैटर्न सामने आए, 2025-26 में 1,390 कछुए और 67 मेटिंग जोड़े भी रिकॉर्ड किए गए

भुवनेश्वर, 3 अक्टूबर 2026: ओडिशा के समुद्री तट पर ओलिव रिडले कछुओं की आवाजाही, प्रवास और आवास को समझने के लिए चल रही तीन साल की वैज्ञानिक रिसर्च के पहले साल के नतीजे सामने आए हैं। देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के नेतृत्व में की जा रही इस स्टडी में सैटेलाइट टेलीमेट्री, नाव आधारित सर्वे और शोरलाइन एनालिसिस को शामिल किया गया है।
ओडिशा सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन, श्रम एवं ESI राज्य मंत्री गणेश राम सिंह खुंटिया ने भुवनेश्वर में अध्ययन की पहले साल की रिपोर्ट जारी की। यह रिसर्च ओडिशा वाइल्डलाइफ ऑर्गनाइजेशन, राज्य के वन एवं पर्यावरण विभाग, धामरा पोर्ट कंपनी लिमिटेड (DPCL) और अडानी फाउंडेशन के सहयोग से की जा रही है।

सैटेलाइट ट्रैकिंग में ओलिव रिडले कछुओं के नर और मादा मूवमेंट में क्या अंतर मिला?

अध्ययन के सबसे अहम निष्कर्षों में सैटेलाइट टेलीमेट्री से मिले आंकड़े हैं। शोधकर्ताओं ने 10 ओलिव रिडले कछुओं को कुल 1,748 दिनों तक ट्रैक किया। इससे नर और मादा कछुओं की समुद्री आवाजाही में अंतर सामने आया।
अध्ययन के मुताबिक, नर कछुओं ने ऑफशोर माइग्रेशन अपेक्षाकृत पहले शुरू किया, जबकि मादा कछुए लंबे समय तक तट के नजदीकी पानी में बनी रहीं। ट्रैकिंग डेटा से कॉन्टिनेंटल शेल्फ और बंगाल की खाड़ी के पार संभावित फीडिंग स्टॉपओवर की ओर भी संकेत मिले हैं।
सबसे लंबी दर्ज यात्राओं में से एक में एक मादा ओलिव रिडले ने 271 दिनों में 6,719 किलोमीटर की दूरी तय की और श्रीलंका के पूर्वी समुद्री क्षेत्र तक पहुंची।
एक अन्य कछुए ने गहिरमाथा से रुशिकुल्या और फिर वापस करीब 200 किलोमीटर की यात्रा की। यह आंकड़ा ओडिशा के अलग-अलग तटीय हिस्सों के बीच इन कछुओं की आवाजाही को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

2025-26 नेस्टिंग सीजन के सर्वे में कितने कछुए और मेटिंग जोड़े मिले?

2025-26 के नेस्टिंग सीजन के दौरान किए गए नाव आधारित सर्वे में 1,390 अलग-अलग ओलिव रिडले कछुए और 67 मेटिंग जोड़े दर्ज किए गए।
रिपोर्ट के अनुसार, ज्यादातर कछुए समुद्र तट से दो किलोमीटर के दायरे में पाए गए। यह जानकारी तटीय जलक्षेत्र के उन हिस्सों की पहचान में मदद कर सकती है, जिनका इस्तेमाल कछुए नेस्टिंग से पहले या उसके दौरान करते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि आगे भी ट्रैकिंग और मॉनिटरिंग जारी रखी जाएगी, ताकि यह समझा जा सके कि कछुओं के मूवमेंट और उनके हैबिटैट के इस्तेमाल का नेस्टिंग साइट्स के संरक्षण पर क्या प्रभाव पड़ता है।

गहिरमाथा और रुशिकुल्या ओलिव रिडले नेस्टिंग के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं?

ओडिशा दुनिया के महत्वपूर्ण ओलिव रिडले नेस्टिंग क्षेत्रों में शामिल है। राज्य में केंद्रपाड़ा जिले का गहिरमाथा और गंजाम जिले का रुशिकुल्या बड़े पैमाने पर नेस्टिंग के लिए जाने जाते हैं।
ओलिव रिडले को भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत संरक्षण प्राप्त है। इस वजह से इन कछुओं के प्रवास, भोजन और प्रजनन क्षेत्रों को समझना संरक्षण नीति और तटीय प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है।
मौजूदा अध्ययन में शुरुआती फील्डवर्क का ध्यान गहिरमाथा क्षेत्र पर रहा, जबकि गहिरमाथा और रुशिकुल्या दोनों से कछुओं की सैटेलाइट टैगिंग की गई।

ओडिशा में ओलिव रिडले कछुओं की सैटेलाइट ट्रैकिंग दोबारा क्यों शुरू की गई?

WII के एंडेंजर्ड स्पीशीज मैनेजमेंट विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आर. सुरेश कुमार के मुताबिक, ओडिशा में करीब 15 साल बाद ओलिव रिडले कछुओं की सैटेलाइट ट्रैकिंग दोबारा शुरू हुई है।
उन्होंने कहा कि वन विभाग, धामरा पोर्ट और अडानी फाउंडेशन के साथ साझेदारी ने कछुओं के मूवमेंट और हैबिटैट इस्तेमाल को लेकर नई जानकारी जुटाने में मदद की है। उनके मुताबिक, यह डेटा भविष्य में साक्ष्य आधारित संरक्षण योजना के लिए वैज्ञानिक आधार तैयार कर सकता है।
स्टडी के अगले चरण में और कछुओं को ट्रैक करने की योजना है, ताकि लंबे समय में इस्तेमाल किया जा सकने वाला बड़ा डेटासेट तैयार किया जा सके।

ओलिव रिडले संरक्षण पर प्रीति अडानी ने क्या कहा?

अडानी फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति अडानी ने ओलिव रिडले को ओडिशा की प्राकृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि कछुओं के सफर और उनके व्यवहार को बेहतर तरीके से समझना उनके संरक्षण के लिए जरूरी है।
उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के नेतृत्व वाली ओडिशा सरकार के सस्टेनेबिलिटी और पर्यावरण संरक्षण पर फोकस की भी सराहना की और कहा कि इससे इस तरह के वैज्ञानिक संरक्षण प्रयासों के लिए आधार तैयार होता है।
कार्यक्रम में अडानी फाउंडेशन के CEO डॉ. अभिषेक लखटकिया भी शामिल हुए।

तटीय संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के बीच यह डेटा क्यों महत्वपूर्ण है?

ओडिशा में धामरा और गोपालपुर पोर्ट का संचालन अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (APSEZ) करता है। ऐसे में ओलिव रिडले के समुद्री आवास और आवाजाही को लेकर तैयार हो रहा वैज्ञानिक डेटा तटीय क्षेत्र के संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के बीच संतुलन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
हालांकि, मौजूदा रिपोर्ट मुख्य रूप से अध्ययन के पहले साल के वैज्ञानिक निष्कर्षों को सामने रखती है। इसलिए कछुओं के दीर्घकालिक मूवमेंट पैटर्न या इन निष्कर्षों के आधार पर किसी स्थायी संरक्षण नीति के प्रभाव का आकलन अभी जल्दबाजी होगा।
फिलहाल 10 कछुओं की सैटेलाइट ट्रैकिंग और 2025-26 के सर्वे से मिले आंकड़े एक महत्वपूर्ण आधार तैयार करते हैं। अगले दो वर्षों की निगरानी से यह स्पष्ट हो सकेगा कि सामने आए मूवमेंट पैटर्न कितने स्थायी हैं और ओडिशा के तटीय संरक्षण प्रबंधन में उनका किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।