
अजय राय की जगह आराधना मिश्रा ‘मोना’, इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष और महाराष्ट्र में तीन MLC उम्मीदवार कांग्रेस के फैसले सिर्फ चेहरे बदलने तक सीमित नहीं हैं; इनके पीछे संगठन, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और आने वाले चुनावों की तैयारी के अलग-अलग संकेत दिखाई देते हैं।
तहलका पॉलिटिकल डेस्क | नई दिल्ली/लखनऊ/मुंबई
कांग्रेस ने 2 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में ऐसे फैसले किए, जिन्हें अलग-अलग घटनाओं की तरह पढ़ना आसान है। लेकिन दोनों राज्यों की घोषणाओं को साथ रखकर देखें तो एक साझा बात सामने आती है पार्टी चुनाव से पहले अपने संगठन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नए सिरे से व्यवस्थित कर रही है।
उत्तर प्रदेश में अजय राय की जगह तीन बार की विधायक और अब तक कांग्रेस विधायक दल की नेता रही आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया है। सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि देविंदर निषाद और आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष तथा चौधरी वीरेंद्र सिंह को कांग्रेस विधायक दल का नेता बनाया गया है।
महाराष्ट्र में कांग्रेस ने 23 अक्टूबर को होने वाले विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव के लिए तीन नाम घोषित किए हैं नागपुर स्नातक से मौजूदा MLC अभिजीत वंजारी, पुणे शिक्षक से मौजूदा MLC जयंत असगांवकर और अमरावती शिक्षक से प्रो. अदिति पोहरे।
लेकिन असली सवाल यह है कि कांग्रेस ने ये चेहरे ही क्यों चुने और इन नियुक्तियों से पार्टी क्या हासिल करना चाहती है?
उत्तर प्रदेश में अजय राय की जगह मोना: सिर्फ बदलाव या संगठन का नया मॉडल?
अजय राय अगस्त 2023 से उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। कांग्रेस ने उनके कार्यकाल को समाप्त करते हुए आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश की कमान सौंपी है। पार्टी के आधिकारिक बयान में राय के योगदान की सराहना की गई है, लेकिन उनके हटाए जाने का कोई विशिष्ट कारण सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसलिए इसे किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
राय के कार्यकाल को उस दौर में देखा जाना चाहिए जब कांग्रेस उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक रूप से कमजोर स्थिति से गुजर रही थी। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 403 में से सिर्फ दो सीटें मिली थींरामपुर खास से आराधना मिश्रा और फरेंदा से वीरेंद्र चौधरी।
हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर कुछ बदली। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की 17 सीटों पर चुनाव लड़कर छह सीटें जीतीं, जबकि उसकी सहयोगी समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनी। दोनों दलों ने मिलकर 80 में से 43 सीटें जीतीं।
यही विरोधाभास 2027 की तैयारी को महत्वपूर्ण बनाता है लोकसभा चुनाव में गठबंधन से मिली राजनीतिक वापसी को विधानसभा स्तर के संगठन में कैसे बदला जाए?
मोना की नियुक्ति को इसी सवाल के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
आराधना मिश्रा मोना: परिवार की विरासत के साथ अपना चुनावी रिकॉर्ड
आराधना मिश्रा की राजनीति को केवल उनके पारिवारिक नाम से समझना अधूरा होगा। वह प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से 2014, 2017 और 2022 में लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीत चुकी हैं। 2022 में उन्होंने भाजपा के नागेश प्रताप सिंह को 14,741 मतों से हराया था।
उनके पिता वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी का रामपुर खास से लंबा राजनीतिक संबंध रहा है। इस पारिवारिक आधार ने निश्चित रूप से उन्हें एक स्थापित क्षेत्रीय नेटवर्क दिया है, लेकिन तीन लगातार विधानसभा जीतों ने मोना की अपनी राजनीतिक मौजूदगी भी बनाई है।
यही बात उनकी नई जिम्मेदारी में महत्वपूर्ण है।
प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उन्हें अब केवल अपनी विधानसभा सीट नहीं संभालनी है। उन्हें उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में कमजोर कांग्रेस संगठन को सक्रिय करना होगा, जिला और ब्लॉक स्तर की इकाइयों को चुनावी मशीनरी में बदलना होगा और उम्मीदवारों के चयन से लेकर स्थानीय गठबंधनों तक काम करना होगा।
उनकी सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि रामपुर खास में काम करने वाला राजनीतिक मॉडल पूरे उत्तर प्रदेश में कितना दोहराया जा सकता है।
मोना के साथ इमरान मसूद: पश्चिमी यूपी को अलग राजनीतिक आवाज
कांग्रेस ने इसी फेरबदल में सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। यह नियुक्ति संगठन में क्षेत्रीय संतुलन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
2024 के लोकसभा चुनाव में मसूद ने सहारनपुर सीट कांग्रेस के लिए जीती थी। उन्हें 5,47,967 वोट मिले और उन्होंने भाजपा के राघव लखनपाल को 64,542 मतों से हराया।
इसलिए कांग्रेस के नए ढांचे में एक तरफ प्रतापगढ़ की स्थापित विधानसभा राजनीति से आने वाली मोना हैं, तो दूसरी तरफ पश्चिमी उत्तर प्रदेश का संसदीय चेहरा मसूद हैं।
मसूद का महत्व सिर्फ उनके लोकसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान मुद्दे, सामाजिक समीकरण, स्थानीय संगठन और समुदाय आधारित राजनीतिक नेटवर्क महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे क्षेत्र में एक सक्रिय संसदीय चेहरे को राज्य संगठन के शीर्ष ढांचे में जगह देना कांग्रेस की क्षेत्रीय पहुंच बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
लेकिन यहां एक दूसरा सवाल भी है।
समाजवादी पार्टी के साथ 2027 की सीट-बंटवारे की बातचीत में कांग्रेस कितनी स्वतंत्र राजनीतिक जगह चाहती है?
सितंबर के अंत में कांग्रेस की ओर से उत्तर प्रदेश में कम-से-कम 150 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात सामने आई थी। इसके बाद समाजवादी पार्टी ने 350 सीटों को अपने लिए चिन्हित करने की बात कही। इसका मतलब यह है कि गठबंधन का सवाल अभी केवल सिद्धांत का नहीं, बल्कि सीटों के वास्तविक बंटवारे का भी है।
ऐसे में मसूद की भूमिका केवल संगठनात्मक नहीं होगी। उन्हें पार्टी की राजनीतिक बातचीत और पश्चिमी यूपी में कांग्रेस की उपस्थितिदोनों मोर्चों पर काम करना पड़ सकता है।
यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि उनकी नियुक्ति का आधिकारिक उद्देश्य SP के साथ सीट-बंटवारे में कांग्रेस की स्थिति मजबूत करना है। कांग्रेस ने ऐसा कारण घोषित नहीं किया है। लेकिन समय और राजनीतिक संदर्भ इस संभावना को चर्चा में जरूर लाते हैं।
मोना और मसूद से आगे: कांग्रेस ने काम भी बांट दिया
इस फेरबदल का सबसे दिलचस्प हिस्सा शायद यही है कि कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में सारी जिम्मेदारी एक ही पद पर केंद्रित नहीं रखी।
- आराधना मिश्रा मोना प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष
- इमरान मसूद कार्यकारी अध्यक्ष
- देविंदर निषाद और आलोक प्रसाद वरिष्ठ उपाध्यक्ष
- चौधरी वीरेंद्र सिंह कांग्रेस विधायक दल के नेता
इसका अर्थ यह है कि पार्टी संगठन, राजनीतिक पहुंच और विधानसभा के भीतर नेतृत्व की भूमिकाओं को अलग-अलग चेहरों के बीच बांट रही है।
मोना अब संगठन पर ध्यान दे सकती हैं, जबकि वीरेंद्र सिंह विधानसभा के भीतर कांग्रेस विधायक दल का नेतृत्व करेंगे। यह बदलाव खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मोना खुद अब तक विधायक दल की नेता थीं।
यानी कांग्रेस ने केवल नया प्रदेश अध्यक्ष नहीं चुना है; उसने प्रदेश संगठन और विधानसभा नेतृत्व की जिम्मेदारियां अलग कर दी हैं।
महाराष्ट्र में कहानी अलग है: यहां कांग्रेस ने संगठन नहीं, खास मतदाता समूहों को चुना
उत्तर प्रदेश की तरह महाराष्ट्र में कोई प्रदेश नेतृत्व परिवर्तन नहीं हुआ है।
यहां कांग्रेस का फैसला पूरी तरह विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों पर केंद्रित है।
23 अक्टूबर को महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों के लिए मतदान होना हैऔरंगाबाद, पुणे और नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र तथा अमरावती और पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र। मतगणना 27 अक्टूबर को होगी। नामांकन की अंतिम तारीख 6 अक्टूबर है।
इन चुनावों की राजनीति विधानसभा चुनाव से अलग है। यहां मतदाता सामान्य विधानसभा मतदाता नहीं होते; शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की अलग मतदाता सूचियां होती हैं।
इसलिए यहां पार्टी के लिए बड़ी रैली से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता हैस्थानीय शिक्षक नेटवर्क, पेशेवर संगठनों से संपर्क, मतदाता पंजीकरण, पुराने राजनीतिक संबंध और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान।
और कांग्रेस के तीन नामों में यही रणनीति दिखाई देती है।
अभिजीत वंजारी: कांग्रेस ने नागपुर में continuity चुनी
नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस ने मौजूदा MLC अभिजीत वंजारी को फिर उम्मीदवार बनाया है।
उनका 2020 का चुनाव कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण था। वंजारी ने भाजपा के संदीप जोशी को 18,910 वोटों से हराकर नागपुर स्नातक सीट पर भाजपा/जनसंघ के लंबे राजनीतिक प्रभुत्व को समाप्त किया था।
इसलिए 2026 में उन्हें दोबारा उतारना एक नए प्रयोग की बजाय मौजूदा राजनीतिक नेटवर्क और पिछले प्रदर्शन पर भरोसा करने का संकेत है।
इस सीट का महत्व इसलिए भी है क्योंकि नागपुर लंबे समय से भाजपा और RSS की राजनीतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
कांग्रेस के सामने अब सवाल यह है कि 2020 की जीत से बना नेटवर्क छह साल बाद कितना मजबूत है और क्या वह बदलते मतदाता आधार के बीच उसे दोहरा सकता है।
जयंत असगांवकर: शिक्षक राजनीति में पुराना चेहरा
पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस ने मौजूदा MLC जयंत दिनकर असगांवकर पर फिर भरोसा किया है। वह 2020 में इस सीट से निर्वाचित हुए थे और पेशे से शिक्षक रहे हैं। ADR/MyNeta के उपलब्ध प्रोफाइल में उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला घोषित नहीं था।
असगांवकर की राजनीति में शिक्षा क्षेत्र से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे हैं। उन्होंने शिक्षकों की नियुक्ति, पेंशन और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विषयों पर सरकार को घेरा है।
इसलिए उनका टिकट केवल “मौजूदा विधायक को दोबारा टिकट” देने का मामला नहीं है। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में उम्मीदवार की अपनी पेशेवर पहचान भी चुनावी राजनीति का हिस्सा बनती है।
कांग्रेस के सामने चुनौती यह होगी कि पिछले छह वर्षों की उनकी राजनीतिक मौजूदगी शिक्षक मतदाताओं के बीच कितनी प्रभावी बनी है।
अदिति पोहरे: महाराष्ट्र सूची का सबसे नया चेहरा
अगर वंजारी और असगांवकर निरंतरता का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो प्रो. अदिति ऋषिकेश पोहरे कांग्रेस के नए प्रयोग का चेहरा हैं।
कांग्रेस ने उन्हें अमरावती शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया है। वह चुनाव से कुछ समय पहले कांग्रेस में शामिल हुईं। रिपोर्टों के अनुसार उनका अकादमिक बैकग्राउंड इंजीनियरिंग और मनोविज्ञान से जुड़ा है और वह शिक्षा क्षेत्र में भी काम कर चुकी हैं।
उनका पारिवारिक नेटवर्क भी राजनीतिक रूप से उल्लेखनीय है। वह पूर्व मंत्री हर्षवर्धन देशमुख की बेटी और वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश पोहरे की बहू हैं।
लेकिन चुनावी मैदान में पारिवारिक पहचान अपने आप में पर्याप्त नहीं होगी।
अमरावती शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में वास्तविक परीक्षा यह होगी कि वह शिक्षक समुदाय के मुद्दों और अपने राजनीतिक नेटवर्क को कितनी प्रभावी चुनावी अपील में बदल पाती हैं।
और यह मुकाबला इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि मौजूदा सदस्य किरण सरनाइक पहले निर्दलीय जीते थे और बाद में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना से जुड़े। इसलिए कांग्रेस यहां एक ऐसी सीट पर अपना उम्मीदवार उतार रही है जो पहले से किसी स्थायी कांग्रेस राजनीतिक कब्जे में नहीं है।
एक ही दिन के फैसले, लेकिन दो अलग संदेश
2 अक्टूबर की दोनों घोषणाओं को जोड़कर देखें तो कांग्रेस की रणनीति में दो अलग-अलग स्तर दिखाई देते हैं।
उत्तर प्रदेश में पार्टी संगठन को पुनर्गठित कर रही है
यहां कांग्रेस ने एक पुराने प्रदेश अध्यक्ष को बदलकर विधानसभा की जमीनी राजनीति से आने वाली नेता को प्रदेश की कमान दी है। साथ ही पश्चिमी यूपी के एक प्रमुख सांसद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है और विधायक दल की जिम्मेदारी अलग नेता को दी है।
यह मॉडल बताता है कि कांग्रेस के सामने 2027 से पहले केवल चुनाव लड़ने का सवाल नहीं है। उसे संगठन खड़ा करने, क्षेत्रीय नेतृत्व तैयार करने और गठबंधन की राजनीति के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने की चुनौती भी है।
महाराष्ट्र में पार्टी ने continuity और new face दोनों को मिलाया है
नागपुर और पुणे में दो मौजूदा MLC को दोबारा टिकट देना पुराने नेटवर्क पर भरोसा है। अमरावती में अदिति पोहरे को उतारना नया चेहरा और शिक्षा क्षेत्र की पृष्ठभूमि जोड़ने की कोशिश है।
यहां चुनाव का पैमाना छोटा है, लेकिन राजनीतिक महत्व कम नहीं। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र अक्सर पार्टियों को उन मतदाता समूहों तक पहुंच देते हैं जो सामान्य चुनावों में अलग तरीके से संगठित होते हैं।
अब असली परीक्षा नियुक्तियों की नहीं, उनके बाद के काम की है
कांग्रेस के लिए इन फैसलों का परिणाम केवल यह नहीं होगा कि कौन प्रदेश अध्यक्ष बनेगा या किसे टिकट मिलेगा।
उत्तर प्रदेश में मोना के सामने सबसे बड़ा काम होगा राज्य संगठन को जिला और बूथ स्तर तक सक्रिय करना। 2022 में दो विधानसभा सीटों पर सिमटी कांग्रेस ने 2024 में लोकसभा चुनाव में छह सीटें जीतीं। अब उसे यह देखना है कि लोकसभा की वापसी को विधानसभा संगठन में कैसे बदला जाए।
इमरान मसूद के लिए चुनौती अलग होगीपश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी की मौजूदगी मजबूत करना और साथ ही गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस की भूमिका को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना।
और महाराष्ट्र में वंजारी, असगांवकर और पोहरे के सामने परीक्षा ज्यादा स्थानीय है विशेष मतदाता समूहों के बीच व्यक्तिगत संपर्क, संगठन और मुद्दों को वोट में बदलना।
इसलिए 2 अक्टूबर के फैसलों को सिर्फ कांग्रेस के “नए चेहरे” की कहानी मानना शायद पर्याप्त नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने कमान बदली है; महाराष्ट्र में उसने चुनावी चेहरे तय किए हैं। अब दोनों जगह सवाल एक ही है: क्या इन फैसलों के पीछे संगठनात्मक ताकत भी खड़ी की जा सकेगी?
यही इन नियुक्तियों और टिकटों की वास्तविक राजनीतिक परीक्षा होगी।



