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नयी आबकारी नीति और दिल्ली मॉडल

राजनीति में तेज़ी से लोकप्रिय हो रहे दिल्ली मॉडल को नयी आबकारी नीति से जैसे ग्रहण लग गया है। नयी नीति से जहाँ सरकारी राजस्व में बड़ा घाटा हुआ, वहीं इसमें भ्रष्टाचार और अनियमितता के आरोप लगे हैं। आरोप यह है कि इस आबकारी नीति में पारदर्शिता नहीं बरती गयी। ज़ाहिर है जहाँ पारदर्शिता नहीं होती, वहाँ गड़बड़ी की आशंका प्रबल होती है। मुख्य सचिव नरेश कुमार की इस रिपोर्ट के बाद कि ‘आबकारी नीति में नियमों की अनदेखी कर भ्रष्टाचार किया गया है और चहेते लोगों को लाभ पहुँचाया गया है;’ उप राज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने तत्कालीन आबकारी आयुक्त आरव गोपीकृष्ण समेत 11 अधिकारी और कर्मचारी निलंबित कर दिये गये थे।
अब इसमें केंद्रीय गृह मंत्रालय भी कूद पड़ा है। उप मुख्यमंत्री व आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया समेत एक दर्ज़न लोगों के नाम प्राथमिकी दर्ज हो चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि भ्रष्टाचार सिद्ध हो सकेगा? क्योंकि अभी तक सिर्फ़ आरोप हैं। इसीलिए इस मामले में किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है। भाजपा के लोगों का कहना है कि देर-सबेर इस प्रकरण में बड़े स्तर पर गिरफ़्तारियाँ होंगी। क्योंकि हर जगह दिल्ली मॉडल को सफलता से लागू करने की बात कहने वाले आबकारी नीति पर बग़ले झाँकते हुए नज़र आ रहे हैं। दरअसल यह आबकारी नीति दिल्ली सरकार के गले की फाँस बन गयी है। शराब से मिलने वाला राजस्व साल-दर-साल बढ़ता है; लेकिन दिल्ली में इस नीति के चलते बहुत कम राजस्व सरकार को प्राप्त हुआ है। सवाल यह है कि इस नुक़सान की ज़िम्मेदारी किसकी है? नयी नीति जब बनी थी, तो इससे क़रीब 10,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा के राजस्व का अनुमान लगाया गया था। लेकिन नवंबर में जारी इस नीति के तहत जुलाई अन्त तक 2,000 करोड़ रुपये भी सरकारी खाते में नहीं आये।
चार माह के दौरान 10,000 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाना सम्भव नहीं था। मतलब दिल्ली सरकार को बड़ा घाटा हुआ। फिर शराब की बढ़ती खपत से कौन लोग मुनाफ़ा कमा रहे थे? निश्चित ही कुछ लोग मोटी कमायी कर रहे होंगे। ये लोग कौन है? सीबीआई इसी की जाँच में जुटी है। हालाँकि सिसोदिया के घर सीबीआई छापेमारी करके उनका मोबाइल, कम्प्यूटर और कुछ फाइल्स सीबीआई टीम ले जा चुकी है। लेकिन ख़ामोश बैठी है। ईडी को मनी लॉन्ड्रिंग का कोई मामला नहीं मिला। माना जा रहा है कि नयी आबकारी नीति में बिचौलियों की भूमिका सामने आएगी। हो सकता है कि इन बिचौलियों में कुछ लोग सरकार के क़रीबी हों। जिन 15 लोगों पर आरोप हैं, उनमें से दो अभी देश से बाहर हैं। लुकआउट नोटिस के बाद अब उनमें से किसी का बाहर जाना मुश्किल है।

नयी आबकारी नीति में एकमुश्त 10 फ़ीसदी कमीशन बढ़ाने का क्या औचित्य था? अब बोलीदाताओं की सुरक्षा राशि वापस करना भी सन्देह के घेरे में है। आबकारी नीति को मंत्रिमंडल ने मंज़ूरी दी थी; लेकिन इसके बाद भी इसमें अतिरिक्त संशोधन किये गये। पूर्व उप राज्यपाल अनिल बैजल ने उसे पास किया। मंत्रिमंडल समूह में आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और कैलाश गहलोत थे। सवाल यह भी है कि जब पुरानी नीति के तहत शराब की बिक्री चल रही थी, तो नयी नीति की ज़रूरत क्यों पड़ी? क्या इसका उद्देश्य किसी को लाभ पहुँचाना था? या सरकारी राजस्व में बढ़ोतरी करने का था? नयी नीति में स्पष्ट अंकित है कि उत्पादक, वितरक और ख़ुदरा विक्रेता तीनों अलग-अलग होने चाहिए। किसी का किसी के साथ कोई तालुल्क़ नहीं होना चाहिए। आरोप है कि इसकी अनदेखी हुई है। दो कम्पनियाँ ऐसी हैं, जो उत्पादक, वितरक और ख़ुदरा में शामिल हैं। जहाँ-जहाँ ऐसा होता है, वहाँ सरकार को राजस्व नाम मात्र की कमायी होती है, जबकि बोली दाता को मोटी कमायी। बोलीदाताओं पर यह दरियादिली दिखाने का कुछ तो मक़सद रहा होगा। जाँच में ऐसे कई राज़ खुल सकते हैं। सवाल यह है कि यह सब सरकार की जानकारी में रहा; लेकिन इसकी जाँच उसने नहीं करायी।

शराब से मिलने वाला राजस्व राज्य सरकारों के लिए जीएसटी के बाद सबसे बड़ा होता है। सरकारें इस राजस्व को बढ़ाने के लिए हर वर्ष नीति में बदलाव करती हैं, ताकि ज़्यादा-से-ज़्यादा राजस्व प्राप्त हो सके। हालाँकि दिल्ली सरकार ने भी यही किया। लेकिन ज़्यादा के चक्कर में उसे घाटा उठाना पड़ गया। पहली तालाबंदी में उसने शराब पर टैक्स भी बढ़ाया था। लेकिन बाद में शराब पर मुफ़्त की योजना लागू कर दी।

दिल्ली में सस्ती शराब के चलते इसकी खपत बहुत ज़्यादा बढ़ी। एक ख़रीदो, दो ले जाओ (बोतल या पेटी) की स्कीम भी चली। पर इसका फ़ायदा सरकार को नहीं हुआ। क्योंकि नयी नीति में सरकार की सीधे तौर पर कोई भूमिका नहीं थी। आबकारी मंत्री होने के नाते मनीष सिसोदिया प्राथमिकी में पहला आरोपी बनाया गया है; लेकिन इसकी आँच केजरीवाल तक भी पहुँच सकती है। ज़ाहिर है मसौदे मंत्रिमंडल में पास होने और फिर अलग से मंत्रिमंडल समूह में अतिरिक्त संशोधन जैसे फ़ैसलों की जानकारी मुख्यमंत्री को भी होगी ही। सत्येंद्र जैन पर ईडी का शिकंजा कसे जाने के बाद अब कौन-कौन मंत्री निशाने पर आएँगे? ऐसी चर्चा है।
संगीन आरोपों से घिरे मनीष सिसोदिया ने हर सवाल और आरोप का जवाब देते हुए दहाड़ लगा दी है और चुनौती दी है कि उनके ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं मिलने वाला, क्योंकि वह निर्दोष हैं। वह आरोपों को झूठ का पुलिंदा बता रहे हैं। उनका कहना है कि 800 करोड़ के घोटाले से भाजपा एक करोड़ के घोटाले के आरोप पर आ गयी है। यह झूठ साफ़ दिख रहा है। बता दें कि सत्येंद्र जैन के मामले में भी एक न्यायालय ने ईडी की कड़ी फटकार लगायी थी कि वह इस तरह किसी को आरोपी कैसे बना सकता है, जब उनके नाम कम्पनी तक नहीं है। उन्होंने कहा कि भाजपा के एक बड़े नेता ने उन्हें फोन पर आम आदमी पार्टी को तोडक़र भाजपा में शामिल होने का ऑफर दिया है। अगर यह आरोप सही है, तो यह कोई छोटी बात नहीं है। कोई भले ही खुलकर नहीं बोल रहा हो; लेकिन भाजपा किस तरह से लोगों को अपने ख़ेमे में करने या उन्हें नष्ट करने में लगी है, यह किसी से छिपा भी नहीं है।

इधर जाँच में फँसे सिसोदिया केजरीवाल के साथ गुज़रात का चुनावी दौरे पर भी गये। बीच-बीच में केजरीवाल भी सिसोदिया की तरह अपनी गिरफ़्तारी की आशंका भी जताते रहते हैं। केजरीवाल सिसोदिया को ईमानदार, देशभक्त और देश का सबसे अच्छा शिक्षामंत्री बताते हैं। सवाल यह है कि अब तक बेदाग़ छवि के रहे सिसोदिया क्या अपनी प्रतिष्ठा को बचाये रखने में सफल होंगे? या फिर उन्हें भी सत्येंद्र जैन की तरह जेल जाना पड़ेगा? यह तो जाँच में मिले सुबूतों के आधार पर तय होगा। लेकिन जाँच निष्पक्ष होनी चाहिए, यह ज़िम्मेदारी जाँच एजेंसियों की बनती है।

एक दर्ज़न से ज़्यादा विभागों को सँभाल रहे सिसोदिया केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद व्यक्ति हैं। लोगों में उनकी एक अच्छी छवि है। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने सराहनीय काम किया है और उनके इस काम की तारीफ़ न्यूयॉर्क टाइम्स से लेकर दुनिया के कई बड़े अख़बारों, पत्रिकाओं और देशों मंन हुई है। हो सकता है कि शिक्षा की तरह वह आबकारी नीति में भी कुछ नया और बड़ा करना चाहते हों; लेकिन इससे आरोप तो यही लगे कि वह सरकार के चहेतों को लाभ पहुँचाना चाहते थे। इस नीति के तहत बिचौलियों के माध्यम से कोई बड़ा हेरफेर किया गया है। बहरहाल जब तक मामले का कोई फ़ैसला नहीं आ जाता, तब तक दिल्ली मॉडल से दिल्ली सरकार की आबकारी नीति को तो बाहर ही रखा जाना चाहिए।


“वे (भाजपाई) सिसोदिया को 22 साल से जानते हैं। वह ईमानदार और देशभक्त हैं। आबकारी नीति में नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की नीयत में खोट है। मैंने तीन माह पहले ही कह दिया था कि सत्येंद्र जैन के बाद अब निशाने पर मनीष सिसोदिया होंगे। मेरी बात सही साबित हो रही है। केंद्र सरकार को दिल्ली में आप सरकार खटक रही है।’’
अरविंद केजरीवाल
मुख्यमंत्री, दिल्ली


“मुझे आप छोडक़र भाजपा में आने का प्रस्ताव आया। इसके एवज़ में मेरे ख़िलाफ़ सभी मामले रफ़ा-दफ़ा करने का ऑफर है। इसका सुबूत मेरे पास है, जिसे समय आने पर पेश किया जाएगा। मेरे ख़िलाफ़ जाँच राजनीति से प्रेरित और दिल्ली सरकार को गिराने की साज़िश है। मैं बेदाग़ हूँ और रहूँगा। मैं जाँच में पूरा सहयोग करूँगा; क्योंकि मैंने कोई ग़लत काम नहीं किया है।’’
मनीष सिसोदिया
उप मुख्यमंत्री, दिल्ली

पंजाब में शराब पर घटा टैक्स
पंजाब में आबकारी नीति का मामला पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में लम्बित है। वितरकों ने इसे सरकार की मोनोपोली (एकाधिकार) बताते हुए इसे रद्द करने की याचिका दायर की है। न्यायालय ने सरकार को नोटिस देकर इस बाबत जवाब माँगा है। वैसे पंजाब की आबकारी दिल्ली जैसी ही है। यहाँ भगवंत मान सरकार ने शराब पर कर (टैक्स) 350 फ़ीसदी से घटाकर 150 फ़ीसदी किया है। कांग्रेस राज में यह 6,156 करोड़ वार्षिक था, वहीं आम आदमी पार्टी ने अब 9,648 करोड़ से ज़्यादा का लक्ष्य रखा है। पहले पंजाब में चंडीगढ़ और हरियाणा से काफ़ी महँगी शराब थी; लेकिन अब 10 से 15 फ़ीसदी सस्ती हो गयी है। कम टैक्स पर ज़्यादा राजस्व शायद शराब की ज़्यादा खपत और अवैध शराब की बिक्री पर रोक से इकट्ठा होना सम्भव होगा।

नेशनल हेराल्ड मामला, रियल एस्टेट का खेल!

यह सन् 2013 की बात है, जब भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने एक निचली अदालत में याचिका के ज़रिये यह आरोप लगाया कि गाँधी परिवार ने धोखाधड़ी से नेशनल हेराल्ड समाचार पत्रों की प्रकाशन कम्पनी का अधिग्रहण किया था। अब साल 2022 में एक साक्षात्कार में अर्थशास्त्री से राजनेता बने स्वामी ने कहा है कि इस मामले में उपलब्ध सभी तथ्यों के आधार पर सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और अन्य को निश्चित रूप से जेल में डाल दिया जाएगा। अगर भाजपा सरकार सत्ता में रहती है, तो उन्हें निश्चित रूप से जेल में डाल दिया जाएगा।

सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि पूरा लेन-देन प्रमोटरों ने 2,000 करोड़ रुपये से अधिक की अचल सम्पत्ति हासिल करने के लिए दुर्भावनापूर्ण तरीक़े से अंजाम दिया था। रियल एस्टेट रिसर्च फर्म लिएसस फोरास, जिसे डाटा और सलाहकार सेवाओं की पेशकश करने वाली एक अत्यधिक सम्मानित ग़ैर-ब्रोकरेज रियल एस्टेट रिसर्च फर्म होने का दर्जा हासिल है; ने एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) द्वारा आयोजित अचल सम्पत्ति के सन् 2010 से सन् 2016 तक अनुमानित बाज़ार मूल्य वृद्धि पर ध्यान दिया।

कुल अचल सम्पत्ति
यह अनुमान लगाया गया कि 63,750 वर्ग फुट में फैली दिल्ली की सम्पत्ति सन् 2010 में 28.69 करोड़ रुपये थी, जो सन् 2016 तक बढक़र 57.38 करोड़ रुपये हो गयी। क़रीब 69,610 वर्ग फुट में फैली लखनऊ की सम्पत्ति इस दौरान 3.48 करोड़ रुपये से बढक़र 6.96 करोड़ रुपये हो गयी। वहीं 37,660 वर्ग फुट में फैली पंचकूला की सम्पत्ति इन्हीं छ: वर्षों में 7.53 करोड़ रुपये से बढक़र 13.18 करोड़ रुपये हो गयी थी। इसी तरह मुम्बई के बांद्रा के उपनगर में 26,508.605 वर्ग फुट में फैली सम्पत्ति का मूल्य सन् 2010 में 29.16 करोड़ रुपये था, जो सन् 2016 में 45.06 करोड़ रुपये पर पहुँच गया। एजेएल के पास 31 मार्च, 2021 तक नई दिल्ली और पटना में लीजहोल्ड ज़मीन थी। आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत भूमि और विकास कार्यालय द्वारा 1962 में 4,88,599 रुपये में नई दिल्ली की ज़मीन लीज पर दी गयी थी, जहाँ आज हेराल्ड हाउस है।

एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड के शुरुआती शेयरधारक के रूप में शुरुआत में 5,000 से अधिक स्वतंत्रता सेनानी थे। हालाँकि सितंबर, 2010 तक नई दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, मुम्बई, इंदौर, पटना और पंचकुला में एजेएल के 1,057 शेयरधारक और करोड़ों की सम्पत्ति थी। दिल्ली में हेराल्ड हाउस अपने आप में एक छ: मंज़िला इमारत है, जिसमें लगभग 10,000 वर्ग मीटर कार्यालय की जगह है। अपने धन के बावजूद एजेएल का उत्पाद (नेशनल हेराल्ड) सन् 2008 में गम्भीर नक़दी संकट के कारण बन्द हो गया।

कांग्रेस का पक्ष
जाँच के केंद्र में 90 करोड़ रुपये का ब्याज मुक्त ऋण है, जिसे कांग्रेस ने 2001 से समय-समय पर अपने फंड से एजेएल को दिया है। कांग्रेस का बचाव इस तथ्य में निहित है कि यंग इंडियन धारा-25 के तहत बनी एक ग़ैर-लाभकारी कम्पनी के रूप में पंजीकृत है। एजेएल को सन् 1956 के कम्पनी अधिनियम की धारा-25 के तहत कम्पनी के रूप में वर्गीकृत किया गया था, जिसका अर्थ है कि एक ग़ैर-लाभकारी संगठन के रूप में पंजीकृत कम्पनी, जो दान, विज्ञान, शिक्षा, संस्कृति और अन्य सामाजिक चीज़ों को बढ़ावा देती है, और इसके मालिक एक नियमित कम्पनी की तरह लाभ या लाभांश प्राप्त नहीं कर सकते हैं। 23 नवंबर, 2010 को यंग इंडियन नामक एक और धारा-25 कम्पनी शुरू की गयी थी। सन् 1937 में एजेएल की तरह यंग इंडियन को 5,00,000 रुपये की चुकता पूँजी के साथ शामिल किया गया था और उसी 5ए, हेराल्ड हाउस, बहादुर शाह जफ़र मार्ग पते के साथ पंजीकृत किया गया था।

कहाँ हुई चूक?
13 दिसंबर, 2010 को राहुल गाँधी को यंग इंडियन का निदेशक नियुक्त किया गया था और एक महीने बाद 22 जनवरी, 2011 को सोनिया गाँधी निदेशक मंडल में शामिल हो गयीं। 31 मार्च, 2021 तक सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी (प्रत्येक) की यंग इंडियन में 38 फ़ीसदी हिस्सेदारी (1,900 शेयर) थी। वहीं पूर्व राज्यपाल, पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत मोती लाल वोरा और पूर्व केंद्रीय मंत्री दिवंगत ऑस्कर फर्नांडीस में से प्रत्येक के पास 12 फ़ीसदी हिस्सेदारी यानी 600 शेयर थे। वोरा का 21 दिसंबर, 2020 को निधन हो गया, जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री फर्नांडीस का 13 सितंबर, 2021 को निधन हो गया। 30 मार्च, 2022 तक उनके शेयरों के ट्रांसमिशन के लिए कोई अनुरोध नहीं किया गया था।

यंग इंडियन के निदेशक के रूप में राहुल गाँधी की नियुक्ति के लगभग एक हफ़्ते बाद कांग्रेस ने यंग इंडियन को एजेएल का ऋण सौंपा, जिसका मतलब था कि एजेएल पर अब यंग इंडियन का 90 करोड़ रुपये बक़ाया है। दिलचस्प बात यह है कि यंग इंडियन ने कांग्रेस को 90 करोड़ रुपये का ऋण ख़ुद पर ट्रांसफर करने के लिए केवल 50 लाख रुपये का भुगतान किया। 21 दिसंबर 2010 को एजेएल के बोर्ड ने यंग इंडियन को संचित ऋणों के आवंटन को मंज़ूरी दी। लेकिन राशि का भुगतान करने में असमर्थ एजेएल ने इसके बजाय अपनी इक्विटी का एक हिस्सा यंग इंडियन को हस्तांतरित कर दिया, जिसका अर्थ है कि सोनिया और राहुल द्वारा नियंत्रित निजी कम्पनी सार्वजनिक रूप से सीमित एजेएल का अधिग्रहण कर रही थी और एजेएल के साथ वे कथित तौर पर सात शहरों में मूल्यवान अचल सम्पत्ति सम्पत्तियों को नियंत्रित करना चाहते थे।

कांग्रेस शासन में प्रकाशन बन्द
01 अप्रैल, 2008 को दिल्ली में अख़बार के अन्तिम संस्करण के आने के साथ नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन बन्द हो गया। लखनऊ संस्करण उससे 10 साल पहले ही बन्द हो चुका था। सन् 2008 को एडिटर-इन-चीफ टीवी वेंकटचलम को शीर्ष पर रहते हुए 20 वर्ष हो चुके थे। आख़िरी संस्करण में एक नोटिस के ज़रिये समाचार पत्र के अस्थायी निलंबन की घोषणा की गयी। वेंकटचलम ने समापन की पूर्व संध्या पर घोषणा की कि ‘एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड के प्रबंधन द्वारा नेशनल हेराल्ड और क़ौमी आवाज़ को अस्थायी रूप से बन्द करने की घोषणा की गयी थी, जिसने अख़बार का प्रकाशन किया था।’

अख़बार के बन्द होने का कारणों में अत्यधिक स्टाफ, मुख्य रूप से प्रेस और ग़ैर-पत्रकारों की वजह से होने वाली हानियाँ और विज्ञापनों से होने वाली आय की कमी जैसे कारण शामिल थे। 31 अगस्त, 2016 को कांग्रेस ने नेशनल हेराल्ड और नवजीवन के पुनरुद्धार की घोषणा की। नीलाभ मिश्र, जो पहले आउटलुक (हिन्दी) के सम्पादक थे; प्रधान संपादक बनाये गये। विडंबना यह है कि सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दायर याचिका के आधार पर दिल्ली की एक न्यायालय ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और तत्कालीन पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गाँधी को नोटिस जारी करने के कुछ दिन बाद पुनरुद्धार की घोषणा की। उन्होंने आरोप लगाया कि एजेएल को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का ऋण अवैध था, क्योंकि एक राजनीतिक दल को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा 29(ए) से लेकर (सी) तक और आयकर अधिनियम-1961 की धारा-13(ए) के तहत व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए पैसा उधार देने पर रोक लगी है।

कोलकाता फर्म की भूमिका
नेशनल हेराल्ड मामले में कोलकाता स्थित एक कथित फ़र्ज़ी फर्म की संलिप्तता का भी आरोप लगाया गया है। स्वामी के अनुसार, डोटेक्स नाम की फर्म से एक करोड़ रुपये लिये गये थे, जिस पर उन्होंने हवाला लेन-देन और धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) में शामिल होने का आरोप लगाया था। उनका दावा है कि इस रक़म में से 50 लाख रुपये का इस्तेमाल एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड के अधिग्रहण में किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने स्विट्जरलैंड स्थित बैंकों से डोटेक्स को चेक जारी किये थे। डोटेक्स ने उन पैसों को आईएनआर में बदल दिया था और कांग्रेस को भुगतान कर दिया था। इसी से यह धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) का स्पष्ट उदाहरण बन गया।
इस साल जून में मामले ने तब फिर तूल पकड़ लिया, जब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को समन जारी किये। राहुल गाँधी से 13 जून, 14 जून, 15 जून, 20 जून और 21 जून को क़रीब 55 घंटे तक पूछताछ की गयी। वहीं सोनिया गाँधी से 21 जुलाई को, 26 जुलाई को और 27 जुलाई को कुल 11 घंटे की पूछताछ की गयी। पूछताछ कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खडग़े और यंग इंडिया के एक पदाधिकारी से भी की गयी, जो 11 अप्रैल और 4 अगस्त को कुल 12 घंटे तक चली। कांग्रेस के अंतरिम कोषाध्यक्ष पवन बंसल, जो एजेएल के एमडी भी हैं; से 12 अप्रैल को पूछताछ की गयी थी।

वर्तमान परिदृश्य
राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी को ईडी की तरफ़ से इस मामले में पूछताछ के लिए तलब करने के प्रत्येक दिन कांग्रेस के नेताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। वरिष्ठ नेताओं ने गिरफ़्तारी भी दी। सोनिया गाँधी से पूछताछ के एक हफ़्ते बाद ईडी ने 2 अगस्त को दिल्ली के बहादुर शाह जफ़र मार्ग स्थित नेशनल हेराल्ड के हेड ऑफिस और कोलकाता में ‘डोटेक्स’ शेल कम्पनी के ठिकाने समेत 11 अन्य जगहों पर छापेमारी की गयी। ईडी ने 3 अगस्त को नेशनल हेराल्ड के परिसर में यंग इंडियन के कार्यालय स्थान को भी अस्थायी रूप से सील कर दिया। इस मामले में अब आगे क्या होगा, यह समय ही बताएगा।

स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही बरत रहे भारतीय

भारतीय चिकित्सा पद्धति दुनिया की सबसे मज़बूत और पुरातन चिकित्सा पद्धति मानी जाती है। कहा जाता है कि यहाँ के खानपान में ही चिकित्सा का ध्यान ऋषि, मुनियों के दौर से रखा गया है। लेकिन आजकल के बिगडऩे खानपान के चलते ही अब सबसे ज़्यादा बीमारियाँ भी भारतीयों को ही हो रही हैं। हमारे आम समाज के लोगों को फास्ट फूड और तली-भुनी चीज़ों का इतना आदि बना दिया है कि लोगों में कुछ बीमारियाँ तो हमेशा के लिए घर कर चुकी हैं। इन बीमारियों में तनाव, चिड़चिड़ापन, सुगर, बीपी, कमज़ोरी, मोटापा, पेट के रोग शामिल हैं। इन बीमारियों को सबसे ज़्यादा बढ़ाने में चाइनीज फास्ट फूड का योगदान है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि फास्ट फूड की सबसे ज़्यादा खपत वाले टॉप 10 देशों की सूची में भारत शामिल है। भारत में क़रीब 38 फ़ीसदी लोग नाश्ते में चाइनीज फास्ट फूड का इस्तेमाल करते हैं। इसमें नूडल्स का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। हमारे देश में हेल्दी डाइट के बहुतायत में चलन के बावजूद भी कोरोना-काल के बाद मैगी की बिक्री में 25 फ़ीसदी की बिक्री इसका सुबूत है कि यहाँ लोग मैगी को तब भी नहीं छोडऩा चाहते, जब डॉक्टर भी कई बार इससे होने वाले नुक़सानों के बारे में आगाह कर चुके हैं। लोग तो यह भी भूल गये कि साल 2015 में ख़ुद भारत सरकार ने मैगी में शीशे की मात्रा अधिक होने के चलते इस पर बैन लगा दिया था। बाद में मैगी में सुधार होने के बाद इसे फिर से बिकने दिया गया। लेकिन फिर भी मैगी में मैदा और शीशे की मात्रा होने से साफ़ ज़ाहिर है कि लगातार इसे खाना स्वास्थ्य से खिलवाड़ ही करना है।

मिंटेल ग्लोबल न्यू प्रोडक्ट्स डेटाबेस (जीएनपीडी) के अनुसार, 2018 में भारत में लॉन्च हुए 42 फ़ीसदी इंस्टेंट नूडल मसाला फ्लेवर वाले थे। इसके बाद से कई नये फ्लेवर वाले नूडल्स मार्केट में उतर चुके हैं और यह लोगों के भोजन का कब हिस्सा बन गये, किसी को ध्यान ही नहीं है।

सन् 2020 में चीन के नॉर्थ-ईस्ट रीज़न के हिले जियांग प्रांत में घर में बने नूडल सूप को पीने से एक ही परिवार के नौ लोगों की मौत के बावजूद नूडल्स से भारतीयों का प्यार लगातार बढ़ता जा रहा है। ख़ासकर बच्चे नूडल्स के दीवाने होते जा रहे हैं और घर में बड़े उन्हें इसका शिकार बना रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह घर की महिलाएँ हैं, जो बनाने के आलस से भारतीय व्यंजनों से नाक-भौं सिकोडऩे लगी हैं। एक अमेरिकी शोध के अनुसार भारत में जो महिलाएँ हर दूसरे-तीसरे नूडल्स खाती हैं, उनमें दिल के रोग, पेट के रोग, माइग्रेन, चिड़चिड़ेपन, मोटापा, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल बढऩे से मेटाबॉलिक सिंड्रोम के लक्षणों मिले हैं। वहीं हफ़्ते में दो बार नूडल्स खाने वाली महिलाओं में भी हार्ट रिस्क बढ़ा है। इतना ही नहीं, इससे कैंसर जैसी बीमारी में भी बढ़ोतरी हुई है। वहीं बच्चों का बौद्धिक और शारीरिक विकास भी रुका है, उनमें मिसकैरेज का रिस्क बढऩे के साथ-साथ उनमें हृदय और पेट सम्बन्धी रोग बढ़े हैं।

यह खानपान का ही असर है कि लोगों का स्टैमिना कमज़ोर हो रहा है और उनका इम्युनिटी सिस्टम भी लगातार कमज़ोर होता जा रहा है। इसी का नतीजा था कि साल 2020 में दस्तक देने वाली नयी महामारी कोरोना वायरस ने 2020 के बाद 2021 में भी तांडव मचाया, जिससे लाशों के ढेर लग गये। इस कोरोना ने अभी तक किसी भी देश का पीछा पूरी तरह नहीं छोड़ा है। इसके नये-नये वैरिएंट आते जा रहे हैं। भारत में कोरोना के मामले फिर से बढऩे की रिपोट्र्स हर रोज़ आ रही हैं। मेडिकल रिपोट्र्स के मुताबिक, जीनोम अनुक्रमण के लिए भेजे गये 90 सैंपल्स की जाँच के दौरान कोरोना के इस नये रूप की पहचान की गयी है। अब तक कोरोना के सब-वैरिएंट के रूप में आठ से ज़्यादा वैरिएंट आ चुके हैं। इसी तरह इस साल मंकी पॉक्स की डरावनी जानकारियों ने सभी को सहमाया हुआ है। इस वक़्त कई देशों में मंकीपॉक्स वायरस काफ़ी तेज़ी से फैल रहा है, जिनमें भारत भी है। हालाँकि भारत में इसकी रफ़्तार काफ़ी धीमी है। लेकिन इसकी रफ़्तार कम होगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
इतना ही नहीं भारत में खानपान बिगडऩे से लोगों की औसत आयु और औसत लम्बाई के घटने की भी रिपोट्र्स सामने आ चुकी हैं। पहले कहा जाता था कि एक व्यक्ति की औसत आयु 100 साल होती थी। आज भी ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपने बड़े-बुज़ुर्गों की उम्र 100 साल या उससे ज़्यादा होते देखी होगी। लेकिन अब यह आयु औसतन 65 साल मानी जाती है। अब अगर कोई व्यक्ति 100 साल हो जाए, तो लोगों को आश्चर्य होता है। वहीं औसत लम्बाई भी भारत में पिछले दो दशक से हैरतअंगेज़ तरीक़े से घटी है।

दरअसल ओपन एक्सेस साइंस जर्नल पलॉस वन की सन् 2021 की स्टडी में पता चला है कि भारतीयों की औसत लम्बाई घट रही है। प्लॉस वन ने साल 1998-99, साल 2005-06 और साल 2015-16 में हुए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में वयस्क महिलाओं और पुरुषों की औसत ऊँचाई की तुलना की गयी। इस अध्ययन में पाया कि 2005-06 और 2015-16 में सबसे ग़रीब तबक़े के लोगों की औसत लम्बाई सबसे ज़्यादा घटी है। वहीं इस दौरान 15 से 25 वर्ष की उम्र की महिलाओं में भी ज़्यादा ग़रीब महिलाओं की औसत लम्बाई 150.37 सेंटीमीटर से घटकर 149.74 सेंटीमीटर हो गयी थी। लेकिन मध्यम वर्ग की महिलाओं की लम्बाई 0.17 सेमी और अमीर महिलाओं की औसत लम्बाई 0.23 सेमी बढ़ी भी है। लेकिन अगर औसत देखें, तो भारतीयों की लम्बाई लगातार घट रही है।

जनरल फिजिशियन डॉक्टर मनीष कहते हैं कि व्यक्ति के खानपान पर उसका स्वास्थ्य तो निर्भर करता ही है, साथ ही उसका शारीरिक और मानसिक विकास भी निर्भर करता है। किसी व्यक्ति का खानपान जितना शुद्ध होगा, वह उतना ही ज़्यादा स्वस्थ। लेकिन साथ ही डॉक्टर मनीष यह भी कहते हैं कि लेकिन आजकल स्वास्थ्य का मामला केवल खानपान से ही नहीं जुड़ा है, बल्कि खानपान में हो रही मिलावट, जलवायु प्रदूषण और भागदौड़ भरी ज़िन्दगी से जुड़ा है। फिर भी अगर लोग अपना खानपान ठीक कर लें, तो वे काफ़ी हद तक स्वस्थ रह सकते हैं। सभी लोगों को ध्यान यह रखना चाहिए कि शरीर भी एक प्राकृतिक मशीन है, जिसमें जितना कचरा और केमिकल जाएगा, यह मशीन उतनी ही बिगड़ती जाएगी।

वहीं बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर धवल का कहना है कि बच्चों में जितनी बीमारियाँ आजकल देखने को मिल रही हैं, उतनी बीमारियाँ पहले देखने को नहीं मिलती थीं। इसकी वजह हमारी माताओं का उलटा-सीधा खानपान और बच्चों का शुरू से ही फास्ट फूड की ओर मोह पैदा होना है। इसलिए यह ज़िम्मेदारी तो माता-पिता की है कि वे अपने को भी स्वस्थ रखने के लिए घर का बना साफ़, शुद्ध खाना खाएँ और अपने बच्चों को भी बाज़ारू चीज़ें खाने से बचाएँ; ख़ासतौर पर पैक्ड प्रोडक्ट्स और नूडल्स आदि से बच्चों को कोसों दूर रखने की कोशिश करें। अगर बच्चा कुछ ऐसा खाने को मागता है, तो उसे घर में बनाकर भारतीय व्यंजन ही खिलाएँ, ताकि उसका स्वास्थ्य सही रह सके।

महिला रोग विशेषज्ञ डॉक्टर परेस कहते हैं कि महिलाओं पर पूरे घर के स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी होती है। यदि वे चाहें तो वे पूरे घर की सेहत सुधार सकती हैं और यदि वे चाहें तो पूरे घर को बीमार कर सकती हैं। लेकिन आजकल देखा जाता है कि महिलाएँ ख़ुद भी फास्ट फूड, ख़ासतौर पर चाइनीज फास्ट फूड ख़ुद भी चाव से खाती हैं और अपने बच्चों को भी खिलाती हैं। ऐसे में उन्हें रोगों से कौन बचा सकता है?

जातिगत भेदभाव की बीमारी

राजस्थान के जालौर ज़िला के सुराणा गाँव के एक निजी स्कूल में पढऩे वाले नौ साल के दलित छात्र की मौत के मामले ने देश के मीडिया और सियासत में सुर्ख़ियाँ बटोरीं। 20 जुलाई को सवर्ण जाति के शिक्षक द्वारा कथित तौर पर इंद्र मेघवाल की बेरहमी से पिटाई के बाद उसकी 13 अगस्त को मौत हो गयी। कहा जा रहा है कि इंद्र मेघवाल ने स्कूल में रखे शिक्षक के मटके से पानी पी लिया था और ग़ुस्साये शिक्षक ने उसकी पिटाई कर दी। सारा मामला जातिगत भावना से प्रेरित है। बहरहाल पुलिस ने आरोपी शिक्षक को गिरफ्तार करके उस पर हत्या और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 जैसे प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया है।

सवाल यह है कि देश में आज़ादी के इतने साल बाद भी जातिवाद की मानसिकता लोगों के दिमाग़ से निकल क्यों नहीं रही है? राजस्थान तो हाल यह है कि वहाँ कई जगहों पर दलित दूल्हों को घोड़ी पर बैठकर बारात नहीं निकालने दी जाती। कई बार दलितों की इसे लेकर पिटाई के मामले सामने आ चुके हैं। कर्नाटक, तमिलनाडु में भी दलितों के ख़िलाफ़ जातिगत भेदभाव वाली ख़बरें हमारा ध्यान खींचती हैं। कई मर्तबा वहाँ दलितों की पिटाई सिर्फ़ इसलिए कर दी जाती है, कि वे कथित उच्च जाति के लोगों के भोजन या पानी को छू देते हैं या उनकी बराबरी करते हैं।

इसी साल 15 अगस्त के मौक़े पर देश में आज़ादी की 75वीं वर्षगाँठ अमृत महोत्सव के रूप में मनायी गयी और केंद्र सरकार ने इसे जोशीली राष्ट्रभक्ति में बदलने में कोई क़सर नहीं छोड़ी। मगर अफ़सोस इस देश के सामने कई चुनौतियाँ बरक़रार हैं, बल्कि बढ़ रही हैं। इन चुनौतियों में जातिगत भेदभाव एक दुर्भाग्यपूर्ण सामाजिक बुराई है। आख़िर सरकारें और समाज ख़ुद से यह सवाल क्यों नहीं पूछते कि आख़िर जाति के नाम पर भेदभाव, हिंसा ख़त्म करने में हम कहाँ असफल हुए हैं? सरकारों ने नगरों को महानगरों में तब्दील कर दिया। बहुमंज़िला इमारतें खड़ी कर दीं। हाईवे बना दिये। हवाई अड्डों की संख्या भी बढ़ रही है। मगर सामाजिक ताना-बाना, सामाजिक समरसता में खटास और कड़वाहट घुलने से नहीं रोक सकी। स्कूलों में दलितों के हाथ से बना मिड-डे मील नहीं खाने की ख़बरों के बावजूद भी सरकार कोई कड़ी कार्रवाई जब नहीं करती, तो ज़ाहिर है यह ज़हर बढ़ेगा ही। दलित डिलीवरीमैन से खाने का पैकेट नहीं लेने वाली ख़बरें भी परेशान करती हैं।

सवाल यह है कि यह समाज किधर जा रहा है? क्या ज़िन्दगी में हर वक़्त इंटरनेट, वाई-फाई का तेज़ गति से चलना ही सब कुछ है? क्या इस बात की भी फ़िक्र है कि देश में दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार के आँकड़ों में वृद्धि हुई है? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट-2021 में कहा गया है कि सन् 2020 में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के ख़िलाफ़ अपराध में बढ़ोतरी हुई है। एनसीआरबी की ओर से जारी आँकड़ों के अनुसार, सन् 2011 में अनुसूचित जाति के ख़िलाफ़ दर्ज मामलों की संख्या 33,719 थी। जबकि सन् 2020 में अनुसूचित जाति के ख़िलाफ़ देश भर में 50,291 मामले दर्ज किये गये। ये सन् 2019 के 45,961 मामलों की तुलना में ये 9.4 फ़ीसदी ज़्यादा हैं। सन् 2020 में दर्ज 50,291 मामलों में से 16,543 मामले मामूली रूप से चोट पहुँचाने के दर्ज हुए। इसके अलावा बलात्कार के लिए शील भंग करने के इरादे से महिलाओं पर हमले के 3,372 मामले, हत्या के 855 मामले और हत्या के प्रयास के 1,119 मामले दर्ज किये गये। ध्यान देने वाली बात यह है कि सन् 2020 में अनुसूचित जाति के ख़िलाफ़ सबसे अधिक 12,714 (25.2 फ़ीसदी) मामले यानी कुल मामलों के एक-चौथाई से अधिक भाजपा शासित राज्य उत्तर प्रदेश में दर्ज किये गये। दूसरे नंबर पर बिहार रहा, जहाँ जातिगत भेदभाव के 7,368 मामले दर्ज हुए। इसी प्रकार राजस्थान तीसरे स्थान पर रहा और मध्य प्रदेश चौथे स्थान पर, जहाँ क्रमश: 7,017 और 6,899 मामले दर्ज हुए। कुल मिलाकर केवल इन चार प्रदेशों में अनुसूचित जाति के ख़िलाफ़ प्रताडऩा के दर्ज मामलों की संख्या देश भर में दर्ज कुल मामलों की दो-तिहाई है। पूरे देश में अनुसूचित जाति के लोगों की आबादी क़रीब 19.7 करोड़ है और उसमें से 40 फ़ीसदी इन चार राज्यों में बसते हैं।

एनसीआरबी के आँकड़ों में कहा गया है कि सन् 2020 में हर 10 मिनट में अनुसूचित जाति के व्यक्ति को आपराधिक प्रताडऩा का सामना करना पड़ा। 15 अगस्त से चार दिन पहले ही यानी 11 अगस्त को तमिलनाडु अस्पृष्यता उन्मूलन मोर्चा (टीएनयूईएफ) ने एक सर्वे जारी किया। इस सर्वे में पाया गया कि राज्य में कई दलित पंचायत अध्यक्षों को उनके कार्यालयों में कुर्सी तक नहीं दी गयी है। राज्य के 24 ज़िलों में किये गये सर्वे में पाया गया कि कई दलित पंचायत अध्यक्षों को राष्ट्रीय ध्वज फहराने तक की अनुमति नहीं मिली। कुछ मामलों में पंचायत अध्यक्षों को स्थानीय निकाय कार्यालयों में प्रवेश तक की अनुमति नहीं दी गयी। वहीं कई मामलों में उन्हें दस्तावेज़ों का आकलन नहीं करने दिया गया।

इस सर्वेक्षण का नेतृत्व करने वाले महासचिव पी. सैमुअल राज ने पत्रकारों से कहा कि सर्वेक्षण का नतीजा चौंकाने वाला व दु:खद है। यह देखकर दु:ख होता है कि तमिलनाडु में जातिगत भेदभाव प्रचलित है। एक ऐसा राज्य, जो जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ लडऩे वाले पेरियार की विचारधारा पर निर्भर है। हम सरकार से दलित पंचायत अध्यक्षों की शिकायतों के निवारण के लिए एक विशेष तंत्र बनाने की अपील करते हैं।

जातिगत भेदभाव मामले आज़ाद भारत में घटे भी हैं; लेकिन बढ़े भी हैं। कांग्रेस की सरकार में भी ऐसे मामले बढ़े; लेकिन भाजपा की सरकार में ऐसे मामलों में तेज़ी से बढ़ोतरी देखी जा रही है। दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा और भेदभाव के कुचक्र में राजनीति की भागीदारी सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। इससे अलावा सामाजिक और आर्थिक असमानता भी इसके बहुत बड़े कारण हैं। सवर्ण जातियाँ इसके चलते भी उन्हें आसानी से अपना निशाना बना लेती हैं। एक अहम बात यह भी है कि ऐसे मामलों में अधिकांश लम्बित रहते हैं। न्यायालयों में लम्बी सुनवाई चलती रहती है। मामलों में सज़ा की दर कम है। सन् 2018 में भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि अधिकतर मामलों में एफआईआर, शिकायत करने में देरी, गवाह के मुकर जाने जैसे कई कारणों से भी आरोपी छूट जाते हैं। अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत न्यायालयों में लम्बित मामलों की दर सन् 2020 में 96.5 फ़ीसदी थी, जो सन् 2019 के 94 फ़ीसदी के मुक़ाबले 2.5 फ़ीसदी बढ़ी है। एक बढ़ोतरी एक साल में हुई है। ऐसे मामलों में सज़ा की दर का कम होना चिन्तनीय है। क्योंकि जिस तरह से भरतीय समाज की संरचना में जाति अपनी मज़बूत भूमिका निभाती है, उसके मद्देनज़र देश के दलितों को क़ानून, न्याय व्यवस्था से ही न्याय की उम्मीद है। देश में दलितों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 है। इसके तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के सदस्यों के ख़िलाफ़ किये गये अपराधों का निपटारा किया जाता है। इसमें अपराधों के सम्बन्ध में मुक़दमा चलाने और दण्ड (सजा) देने का प्रावधान किया गया है। हमारे देश में क़ानून तो बहुत हैं; लेकिन उस अनुपात में संरक्षण नहीं मिलता। लोग इसे सार्वजनिक रूप से मानने को तैयार ही नहीं होते कि दलितों के ख़िलाफ़ भेदभाव आज भी मौज़ूद है। फिर क़ानून का अमल कराने वाली सरकारी संस्थाओं में बैठे कर्मचारी, अधिकारीगण ख़ुद ही इस मुद्दे के प्रति संवेदनशील नज़र नहीं आते। पुलिस जहाँ एक दलित अपने ख़िलाफ़ हुई हिंसा के बारे में मामला दर्ज कराने जाता है, तो उसे वहाँ कमतर इंसान समझा जाता है। अभी भी यह भावना लोगों में घर किये हुए है कि ये लोग (दलित और महादलित) सम्मान के हक़दार नहीं हैं। ऐसे में उन्हें न्याय कैसे मिल सकेगा?

राजस्थान के जिस मामले का ज़िक्र शुरू में किया गया है, उसके विरोध में राजस्थान के ही एक कांग्रेसी विधायक पनाचंद मेघवाल ने इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने इस इस्तीफ़े में कहा है कि ऐसे मामलों की जाँच के नाम पर केवल फाइलें ही स्थानातंरित की जाती हैं। ऐसे मामले विधानसभा में उठाने के बाद भी पुलिस ने तेज़ी से कार्रवाई नहीं की। उन्होंने यह भी कहा कि जब हम अपने समाज के अधिकारों की रक्षा और न्याय सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं, तो हमें इस पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।

अक्सर देखा गया है कि जब भी ऐसे मामले मीडिया में अपनी जगह बनाते हैं, तो सत्तारूढ़ व विपक्षी दल आपस में भिड़ जाते हैं। कुछ दिनों के बाद यह मुद्दा बासी सब्ज़ी की तरह कूड़ेदान में चला जाता है। अगर क़ानून का कड़ाई से पालन हो, तो समाज में सभी को बराबरी का माहौल तैयार करने में मदद मिले भी। स्कूलों से इसकी शुरुआत होनी चाहिए। इसके लिए पाठ्यक्रमों में कुछ समानतावादी अध्यायों को शामिल करना होगा। भेदभाव करने वाले अध्यापकों से कड़ाई से निपटना होगा। राजनीतिक धड़ों की तरफ़ से, $खासतौर से सरकारों द्वारा समानता को लेकर मज़बूत सन्देश देना और भेदभाव करने वालों के ख़िलाफ़ कड़ाई से निपटना होगा। दलितों, महादलितों को केवल फ़ौरी आर्थिक राहत देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन्हें टिकाऊ संसाधन उपलब्ध कराकर उन्हें भी मज़बूत करना होगा।

शिक्षा पर भी मज़हबी रंग!

मज़बूत शिक्षा व्यवस्था किसी भी देश के विकास और समृद्धि का आधार होती है। चाणक्य ने कहा है कि शिक्षा के बिना इंसान का जीवन कुत्ते की पूँछ की तरह होता है। जिस प्रकार कुत्ते की पूँछ उसके किसी काम की नहीं होती, ठीक उसी प्रकार शिक्षा विहीन मनुष्य का कोई अस्तित्व नहीं होता। शिक्षा की शुरुआत घर और समाज से होती है। इसके बाद स्कूल आता है। पिछले एक दशक में भारत में शिक्षा व्यवस्था पर कमज़ोर होने के आरोप लगे हैं। एक तरफ़ जहाँ स्कूलों तक बच्चों के जाने की सुविधाएँ बढ़ रही हैं, स्कूलों की ख़राब होती दशा और कोरोना में ठप हुई बच्चों की पढ़ाई ने चिन्ता बढ़ायी है। हालाँकि पिछले चार-पाँच दशक में दाख़िले के आँकड़े बढ़े हैं, जिसके पीछे छात्रवृत्ति और मिड-डे मील जैसी योजना का योगदान रहा है। लेकिन इससे न ही शिक्षा की गुणवत्ता में ख़ास सुधार हुआ और न ही निम्न वर्ग से आने वाले बच्चों की दशा में।

इसी का नतीजा रहा कि झारखण्ड में शिक्षा का स्तर भी गिरा और मज़हबी जुनून भी हावी हुआ। राज्य के विभिन्न ज़िलों में स्थानीय लोगों के दबाव में स्कूल के नाम में उर्दू शब्द जुड़ गया। मज़हब के तौर पर स्कूलों का इस्तेमाल किया जाने लगा है। रविवार की जगह शुक्रवार को साप्ताहिक अवकाश होने लगा। वहीं बच्चे हाथ मोडक़र प्रार्थना करने लगे हैं। यह लम्बे अर्से से चल रहा। जब मामले का ख़ुलासा हुआ, तो सरकार हरकत में आयी। स्कूलों के नाम ठीक कराये गये। अधिकारियों और शिक्षकों पर दबाव बनाया गया। हालाँकि कुछ इलाक़ों के स्कूलों की स्थिति थोड़ी बदली है। लेकिन कितने समय तक बदली रहेगी और भविष्य में इस तरह की घटना दोबारा नहीं होगी, यह कहना मुश्किल है। क्योंकि समस्या सामाजिक है। दरअसल समाज में जो धर्म का ज़हर घुल रहा, उसका असर झारखण्ड के स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर दिख रहा। इसे दूर करने की ज़रूरत है। न कि दबाव बनाकर तात्कालिक लीपापोती कर मामले को टालने की। नहीं तो आने वाले दिनों में मामला फिर से तूल पकड़ सकता है।

519 स्कूलों में बदलाव हैरानी की बात है कि झारखण्ड में राज्य के गढ़वा, दुमका और जामताड़ा समेत कई ज़िलों में सरकारी स्कूलों के नाम बदल दिये गये। सरकारी स्कूलों के नाम में उर्दू शब्द जुड़ गया और स्कूल के बोर्ड पर भी लिख गया। इन स्कूलों का नाम राजकीय प्राथमिक विद्यालय या राजकीय प्राथमिक मध्य विद्यालय था। इन्हें एक साज़िश के तहत बदलकर ‘राजकीय उर्दू प्राथमिक विद्यालय’ और ‘राजकीय उर्दू प्राथमिक मध्य विद्यालय’ लिख दिया गया। ऐसे एक-दो नहीं, बल्कि पूरे राज्य में 519 स्कूल थे। इसी तरह इन स्कूलों में रविवार की जगह शुक्रवार को साप्ताहिक अवकाश होने लगा। विभागीय जानकारी के अनुसार, देवघर के 156 स्कूलों, गोड्डा के 88, गिरिडीह के 67, पलामू के 50, दुमका के 10, जामताड़ा के 10, गढ़वा के 10, साहिबगंज के आठ, लातेहार के सात, पूर्वी सिंहभूम के पाँच, कोडरमा, चतरा, रामगढ़ और रांची के दो-दो और गुमला व सरायकेला के एक-एक स्कूल के नाम बदले दिये गये थे। वहीं राज्य के इन ज़िलों के 519 स्कूलों में रविवार की जगह शुक्रवार को छुट्टी हो रही थी। हालाँकि इस तरह के स्कूल सरकारी आँकड़े से अधिक हों, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

घातक प्रयास

स्कूल वो जगह है, जहाँ बच्चों का भविष्य बनाया जाता है। उन्हें अच्छी शिक्षा के साथ-साथ अच्छा नागरिक बनने का भी पाठ पढ़ाया जाता है। समानता, समरसता का पाठ पढ़ाने के लिए खोली गये इन्हीं स्कूलों में अगर नौनिहालों का मन बदलने का प्रयास हो, तो यह भविष्य के लिए घातक साबित होगा। राज्य के 519 स्कूलों में कुछ ऐसा ही हो रहा है। कुछ स्कूलों में बच्चे नियम के तहत प्रार्थना नहीं करते। वे हाथ जोडऩे के बजाय हाथ बाँधकर खड़े रहते हैं। कई बच्चे हैं, जो हाथ जोडक़र या खोलकर प्रार्थना करने का अर्थ भी नहीं समझते हैं। फिर हाथ न जोडऩे की सोच उनमें कौन भर रहा है? स्कूलों के नाम बदलने में भी बच्चों की भूमिका का सवाल नहीं है। ज़ाहिर है कुछ परिवारों और समाज से यह मानसिकता स्कूलों तक पहुँच रही है।

विधानसभा में उठा मामला
स्कूलों के नाम बदलने और छुट्टी के दिन बदलने का मामला मानसून सत्र के दौरान झारखण्ड विधानसभा में उठा। विधायक अनंत कुमार ओझा ने स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग से इस सम्बन्ध में जानकारी माँगी थी। विभाग ने बताया है कि इस सम्बन्ध में विभिन्न ज़िलों से प्रतिवेदन प्राप्त हुआ है। वस्तुस्थिति यह है कि राज्य के 407 स्कूलों में स्थानीय स्तर पर उसे उर्दू स्कूल घोषित किया गया था। इसी तरह से राज्य भर के 509 ऐसे स्कूलों का पता लगा, जिसमें रविवार को निर्धारित सरकारी अवकाश की बजाय शुक्रवार को साप्ताहिक अवकाश दिया जा रहा था। कई स्कूलों में एक विशेष समुदाय द्वारा हाथ जोडक़र प्रार्थना करने से मना किये जाने के सवाल पर भी स्कूली शिक्षा विभाग ने जानकारी दी।

एनआईए जाँच की माँग
पिछले दिनों लोकसभा के मानसून सत्र के दौरान गोड्डा सांसद निशिकांत दूबे ने भी इस मुद्दे को उठाया था। सांसद निशिकांत दुबे ने दावा किया कि झारखण्ड में 1,800 स्कूलों में रविवार की बजाय शुक्रवार को छुट्टी हो रही है। उन्होंने कहा कि यह प्रमाणित करता है कि देश इस्लामीकरण की तरफ़ बढ़ रहा है। उन्होंने सदन में शून्यकाल के दौरान यह विषय उठाते हुए कहा कि इस मामले की जाँच राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) से कराई जाए, ताकि कड़ा सन्देश दिया जा सके।

देरी से उठा पर्दा
राज्य के 24 ज़िले हैं। यह मामला 16 ज़िलों तक पहुँचा। यह साज़िश लम्बे समय का परिणाम है। हालाँकि यह सब सरकारी या विभागीय आदेश पर नहीं हुआ। विशेष समुदाय के स्थानीय लोगों और नेताओं के दबाव में हुआ। लेकिन हैरानी है कि इसकी भनक शिक्षा विभाग और स्थानीय अधिकारियों को नहीं लगी। या यह कहें कि इस गतिविधि को नज़रअंदाज़ किया गया। सवाल यह है कि आख़िर स्कूलों के शिक्षकों ने इस बारे में शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों को इसकी सूचना क्यों नहीं दी? सरकार भी काफ़ी देर बाद तब जागी, जब मीडिया में इस मामले का ख़ुलासा हुआ। फ़िलहाल स्कूल के नाम से उर्दू शब्द हटाने का आदेश जारी कर दिया गया। शुक्रवार की जगह रविवार को अवकाश बनाये रखने का आदेश दिया गया। सवाल यह है कि सरकार कब तक विशेष समुदाय की इस सोच पर रोक लगा सकेगी? क्योंकि जिन स्कूलों में यह सब हुआ, वो सभी मुस्लिम बहुल क्षेत्र में हैं। लेकिन यहाँ सनातन और दूसरे धर्मों के भी बच्चे हैं। बच्चों को इस राजनीति का अंजाम नहीं मालूम है, उन्हें तो सिर्फ़ मोहरा बनाया जा रहा है। समाज में घर्म का नशा घोला जा रहा है। नौनिहालों को इसमें शामिल किया जाना समाज और देश के लिए घातक है।

स्कूल केवल शिक्षा का मन्दिर
मैं ख़ुद एक क्रिश्चन माइनॉरिटी स्कूल का छात्र रहा हूँ। स्कूल में ईसाई समुदाय की तरह प्रार्थना कराया जाता था। प्रार्थना के शब्द ‘अवर फादर, हू आर्ट इन हेवन….’ लगभग 32 साल बाद आज भी याद हैं। इसे सभी छात्र करते थे। चाहे वे किसी भी धर्म के हों। मेरी तरह लाखों-करोड़ों की संख्या में लोग होंगे, जो जिस भी स्कूल में पढ़ते थे, वहाँ के निर्धारित तरीके से ही प्रार्थना करते थे। स्कूल में या बच्चों में मज़हब और धर्म जैसे शब्द नहीं होते थे। स्कूल केवल शिक्षा का मन्दिर हुआ करता था।

कालांतर में इसमें बदलाव आने लगा है, जो धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है। राजनीतिक और सामाजिक गड़बड़ी और कुरीतियों का असर शिक्षा पर छाने लगा। यही झारखण्ड के स्कूलों में भी हुआ। सामाजिक दबाव, राजनीति के खेल और वोट बैंक ने स्कूलों की व्यवस्था को बदला। बच्चों की सोच को बदलने का प्रयास किया जा रहा। ऐसी बातों को प्रश्रय देने का सीधा-सीधा निहितार्थ यही है कि धर्म के आधार पर समाज का बँटवारा। धार्मिक वैमनस्यता की विष बेल रोपना स्वीकार्य नहीं हो सकता। इस तरह तो एक नई और बेहद विध्वंसक परम्परा की शुरुआत हो जाएगी। स्कूली शिक्षा को इससे अलग रखना आवश्यक है। इस पर समाज के सभी वर्ग, जाति, धर्म और सम्प्रदाय के लोगों को सोचना होगा। शिक्षा का वह मन्दिर जहाँ हम इकबाल का लिखा हुआ गीत एक सुर में सीख कर गाते हैं कि ‘हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्ताँ हमारा।’ इसे कायम रखना होगा। तभी भविष्य सुदृढ़ हो सकेगा। समानता, समरसता का पाठ पढ़ाने के लिए खोली गयी संस्थाएँ राजनीति का अखाड़ा बनाने से रोकना होगा। तभी भविष्य में धर्म और जाति का विष बेल बड़ी होकर समाज को और नहीं बाँट सकेगी।

जल दोहन से बढ़ रहा संकट

जल संकट से बचने के लिए परम्परागत जल संसाधनों का संरक्षण ही बड़ा उपाय

देश में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और तमिलनाडु ऐसे राज्य हैं, जहाँ भूजल यानी ग्राउंड वाटर की 100 फ़ीसदी खपत होती आ रही है। जो कुछ हिस्सों में 385 फ़ीसदी के स्तर तक जा चुकी है। 267 ज़िलों में राष्ट्रीय औसत से अधिक भूजल निकाला जा चुका है। कई और राज्यों में भी भूजल की ऐसी स्थिति है। कहा गया है कि विश्व भर में केवल भारत में भूजल का दोहन सबसे अधिक हो रहा है। जितना पानी एक साल में ज़मीन के अन्दर जाता है, उसका 63 फ़ीसदी निकाल लिया जाता है। ज़्यादातर जल स्रोत दूषित हैं और प्रदूषण की वजह से नदियाँ भी सूख रही हैं। जलवायु परिवर्तन, ख़राब प्रबंधन, जल स्रोतों की घटती संख्या और निवेश की कमी आदि कई चुनौतियाँ हैं, जो जल संकट के लिए ज़िम्मेदार हैं। वैज्ञानिकों ने वर्ष 2050 तक 87 देशों में पानी के गहरे संकट का अनुमान जताया है। ऐसे में जल संकट से बचने के लिए परंपरागत जल संसाधनों का पुनर्भरण और संरक्षण आवश्यक हो जाता है।

अंतरराष्ट्रीय सर्वे की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पानी की खपत इतनी है जितनी चीन और अमेरिका मिलकर करते हैं। वैज्ञानिकों की मानें तो विश्व में तीन फ़ीसदी ही ताज़ा पानी है। दो-तिहाई पानी जमे हुए ग्लेशियरों में है, जो मानव के उपयोग के लिए उपलब्ध नहीं है। स्टॉकहोम अंतरराष्ट्रीय जल संस्थान द्वारा सन् 1991 से हर साल होने वाले कार्यक्रम के तहत इस बार 23 अगस्त से पहली सितंबर तक विश्व जल सप्ताह मनाया गया, जिसका थीम ‘सीइंग द अनसीन : द वैल्यू ऑफ वाटर’ रही। आज की वैश्विक ज़रूरत है कि जल को समझा जाए और उसका सम्मान किया जाए। जल सप्ताह आयोजन के दौरान कई कार्यक्रम कड़ी में हैं। इनमें तीन मुख्य जल आयाम हैं:- लोगों व विकास के लिए पानी का मूल्य, प्रकृति व बदलते मौसम के लिए पानी का मूल्य, और पानी का वित्तीय एवं आर्थिक मूल्य।

देश में पारम्परिक जल स्रोतों के संरक्षण, विकास व उनके देश हित में उपयोग के लिए तालाब विकास प्राधिकरण के गठन के लिए अरण्य संस्था के सचिव संजय कश्यप ने 23 अगस्त, 2014 को तत्कालीन जल संसाधन मंत्री उमा भारती को एक पत्र लिखा था। उन्होंने कहा था कि देश इन दिनों गम्भीर जल संकट से गुज़र रहा है। बढ़ती आबादी, खेती, नगरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण पानी की बढ़ती खपत और नदियों को बाँधने के व्यापक व्यय व दुष्परिणाम सभी के सामने हैं। ऐसे में हमारे पारम्परिक जल स्रोत तालाब ही उम्मीद की किरण की तरह हैं। पत्र में वे लिखते हैं कि आज़ादी के समय 24 लाख तालाब थे। बरसात का पानी इन तालाबों में इकट्ठा हो जाता था, जो भूजल स्तर को बनाये रखने के लिए बहुत ज़रूरी होता था। देश भर में तालाबों, बावडिय़ों और पोखरों की वर्ष 2000-2001 में गिनती की गयी थी। देश में इस तरह के जलाशयों की संख्या साढे पाँच लाख से ज़्यादा है। आज़ादी के बाद 53 वर्षों में हमारा समाज कोई 20 लाख तालाब चट कर गया। क़रीब 15 फ़ीसदी बेकार पड़े हैं। आज 20 लाख तालाब बनवाने का ख़र्च 20 लाख करोड़ से कम नहीं होगा। इसलिए उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय तालाब प्राधिकरण का गठन करने का अनुरोध किया।

तालाब कई मायनों में महत्त्वपूर्ण होता है। जहाँ यह स्थानीय लोगों को पानी उपलब्ध कराता है, वहीं जैव विविधता, पर्यटन और आर्थिक स्थिति मज़बूत करने के लिए भी सहायक होता है। मध्य प्रदेश के भोपाल शहर का भोज ताल इसके लिए प्रसिद्ध उदाहरण है। भोज ताल यानी बड़े तालाब का निर्माण 11वीं शताब्दी में राजा भोज ने करवाया था। इसका निर्माण कमला पार्क में कोलांज नदी पर मिट्टी का बाँध बनाकर किया गया था। बड़े तालाब से भोपाल शहर की लगभग 40 फ़ीसदी जनसंख्या को पेयजल प्रदान किया जाता है।

जल संरक्षण और वर्षा जल संचय (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) के लिए जाने जाते आईएएस स्वर्गीय अनुपम मिश्रा अपने संबोधन में कहा करते थे कि सैकड़ों, हज़ारों तालाब अचानक शून्ये से प्रकट नहीं हुए थे। इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की, तो दहाई थी बनाने वालों की। यह इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ा, हज़ार बनती थीं। पिछले 200 वर्षों में नये क़िस्म की थोड़ी-सी पढ़ाई पड़ गये समाज ने इस इकाई, दहाई, सैकड़ा, हज़ार को शून्य ही बना दिया।

‘आज भी खरे हैं तालाब’ अनुपम मिश्रा की एक अच्छी कृति है, जिसमें तालाबों के बारे में विस्तार से गाथा गायी गयी है। अनुपम मिश्रा ने अपने एक लेख ‘अकेले नहीं आते बाढ़ और अकाल’ में बड़े सुन्दर ढंग से समाज को आईना दिखाया है। वह कहते हैं कि जब अंग्रेज हमारे यहाँ आये थे, तो हमारे देश में कोई सिंचाई विभाग नहीं था। कोई इंजीनियर नहीं था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई नहीं थी। वैसी शिक्षा देने वाला कोई विद्यालय, महाविद्यालय तक नहीं था। सिंचाई की शिक्षा नहीं थी। पर सिंचाई का शिक्षण हर जगह था और समाज उस शिक्षण को अपने मन में संजोकर रखता था। उस शिक्षण को अपनी ज़मीन पर उतारता था।

जब अंग्रेज यहाँ आये, तब हमारे यहाँ एक भी सिविल इंजीनियर नहीं था। पर सचमुच कश्मीर से कन्याकुमारी तक, पश्चिम से पूर्व तक कोई 25 लाख छोटे-बड़े तालाब थे। इनसे भी ज़्यादा संख्या में ज़मीन का स्वभाव देखकर अनगिनत कुएँ बनाये गये थे। वर्षा का पानी तालाबों में कैसे आएगा? किस तरह के क्षेत्र से यहाँ-वहाँ से बहता आएगा? उसको अपनी अनुभवी आँखों से नाप लिया जाता था। फिर यह पानी साल भर कैसे पीने का पानी जुटाएगा और किस तरह की $फसलों को जीवन देगा, इस सब की बारीक़ योजना सैकड़ों मील दूर बैठे लोग नहीं बनाते थे, जबकि वहीं बसे लोग उस क्षेत्र में अपना बसना सार्थक करते थे।

राजनीति के गटर में फुटबॉल

भारतीय फुटबॉल को झटका देने के बाद फीफा ने एआईएफएफ से हटायी पाबंदी

खेल संगठनों में राजनीति से जुड़े लोग होने चाहिए या नहीं? देश में यह सवाल दशकों से रहा है। देखें, तो यह अनुभव मिलाजुला रहा है। कुछ राजनेताओं ने खेलों में बेहतरी की, तो अन्य ने इन्हें पैसे कमाने का ज़रिया बना लिया, या उनकी दादागीरी ने खेलों को बर्बाद कर दिया। हाल के दशकों में खेल संगठनों में खींचतान ने कई खिलाडिय़ों का करियर तबाह किया है। हाल ही में तब बवाल फिर शुरू हुआ, जब फुटबॉल की सर्वोच्च संस्था अंतरराष्ट्रीय फेडरेशन इंटरनेशनेल डी फुटबॉल एसोसिएशन (फीफा) ने अगस्त के शुरू में अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) पर प्रतिबन्ध लगा दिया। हालाँकि बाद में इसे वापस ले लिया। ज़ाहिर है खिलाडिय़ों के लिए यह बड़ा झटका था। ज़ाहिर है इसके पीछे भारतीय फुटबॉल महासंघ में राजनीति बड़ा कारण था।

भारत के लिए फीफा की पाबंदी इसलिए भी बड़ा झटका था, क्योंकि 85 साल में ऐसा पहली बार हुआ था। भारत में फुटबॉल के प्रेमी इस बात से दु:खी थे। उन्हें तो भारतीय फुटबॉल को इस स्थिति में देखकर काफ़ी कष्ट तो हुआ ही, भारतीय फुटबाल के लिए भी यह बहुत दु:खद अध्याय माना गया। विश्व फुटबॉल की सर्वोच्च संचालन संस्था के इस निलंबन आदेश से भारत में इसी साल अक्टूबर में होने वाले अंडर-17 महिला विश्व कप की मेज़बानी खटाई में पड़ गयी थी। नामी फुटबॉल खिलाड़ी शब्बीर अली ने फीफा के फ़ैसले को दुर्भाग्यपूर्ण और भारतीय फुटबॉल के लिए करारा झटका बताया था। फीफा के इस बैन से भारत के फुटबॉल खिलाडिय़ों का भविष्य अधर में लटक गया था। यही नहीं, फ़ैसले के बाद भारत के घरेलू क्लब एएफसी प्रतियोगिताओं में भी खेलने के पात्र नहीं होते। फीफा ने जब यह पाबंदी लगायी गोकुलम केरल क्लब की महिला टीम एएफसी महिला क्लब चैम्पियनशिप में हिस्सा लेने के लिए ताशकंद पहुँची ही थीं। एआईएफएफ के निलंबन के कारण वह इसमें हिस्सा लेने से वंचित हो गयीं और वहाँ फँस गयीं।

निश्चित ही फीफा के फ़ैसले को भारतीय फुटबॉल के लिए बड़े नुक़सान के रूप में इंगित कर सकते हैं। निश्चित ही इसकी ज़िम्मेदारी भारतीय खेल संघों की ख़राब व्यवस्था पर है, जिसमें राजनीति बड़े पैमाने पर हावी है। फीफा के प्रतिबन्ध वाले फ़ैसले की शुरुआत दरअसल इसके अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल के इस्तीफ़े से हुई। बता दें कि शरद पवार की पार्टी एनसीपी के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री भी हैं।

अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) के पूर्व अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल ने दिसंबर, 2020 में अपना तीसरा कार्यकाल ख़त्म होने के बावजूद पद छोडऩे से इनकार कर दिया। पटेल ने सर्वोच्च न्यायालय में सन् 2017 से लम्बित मामले की आड़ लेते हुए कहा कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय से नये संविधान को लेकर फ़ैसला नहीं आता, तब तक चुनाव नहीं होंगे। खेल संहिता कहती है कि देश के किसी भी राष्ट्रीय खेल महासंघ में कोई पदाधिकारी अधिकतम 12 साल तक ही पद पर रह सकता है। पटेल यह अवधि पूरी कर चुके थे। लेकिन उन्होंने बहाने लगाकर पद छोडऩे से मना कर दिया। ज़ाहिर है इसके बाद मामला न्यायालय में चला गया। हालाँकि फीफा ने तीसरे पक्ष की दख़लअंदाज़ी देखते हुए एआईएफएफ को निलंबित किया था। अब एआईएफएफ प्रशासन ने संस्था के को चलाने के लिए स्थापित प्रशंसकों की समिति को समाप्त करके स्वयं नियंत्रण कर लिया है।

इस साल 18 मई को उच्च न्यायालय के फ़ैसले के बाद प्रफुल्ल पटेल और उनकी पूरी कार्यकारी समिति (वर्किंग कमेटी) को इस्तीफ़ा देना पड़ा। यही नहीं, उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ए.आर. दवे, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. क़ुरैशी और भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व कप्तान भास्कर गांगुली की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय प्रशासक समिति (सीओए) का गठन भी कर दिया। वैसे प्रफुल्ल पटेल ने 23 मई को फीफा प्रमुख जियानी इन्फेंटिनो से अनुरोध किया था कि एआईएफएफ का संचालन प्रशासकों की समिति को सौंपे जाने के बाद देश पर प्रतिबंध न लगाया जाए। फीफा-एएफसी और भारतीय फुटबॉल का संचालन कर रहे सीओए के बीच 21 जून को बैठक भी हुई थी। इसके बाद 13 जुलाई को सीओए ने फीफा को एआईएफएफ का अन्तिम मसौदा संविधान भेजा और 16 जुलाई को यही मसौदा संविधान को मंज़ूरी के लिए उच्चतम न्यायालय को सौंपा। हालाँकि एआईएफएफ की राज्य इकाइयों ने सीओए के अन्तिम मसौदे के संविधान में कई प्रावधानों पर नाख़ुशी जतायी।

फीफा ने एआईएफएफ से सिफ़ारिश की कि सीओए के संविधान मसौदे में निर्धारित 50 फ़ीसदी के बजाय एआईएफएफ को अपनी कार्यकारी समिति में 25 फ़ीसदी प्रख्यात खिलाडिय़ों का प्रतिनिधित्व रखना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने 3 अगस्त को एआईएफएफ कार्यकारी समिति को सीओए द्वारा प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार चुनाव जल्द-से-जल्द कराने के निर्देश दिये और कहा कि एआईएफएफ की कार्यकारी समिति के लिए निर्वाचक मंडल में 36 राज्य संघों के प्रतिनिधि और 36 प्रख्यात फुटबॉल खिलाड़ी शामिल होंगे।

इस बीच 13 अगस्त को एआईएफएफ के 28 अगस्त को होने वाले चुनाव के लिए निर्वाचक मंडल में शामिल मतदाताओं की सूची में बाईचुंग भूटिया और आईएम विजयन सहित 36 प्रतिष्ठित खिलाड़ी शामिल करने की घोषणा की। हालाँकि फीफा ने 15 अगस्त को खेल मंत्रालय को सूचित किया कि वह अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) के चुनावों के लिए निर्वाचक मंडल में व्यक्तिगत सदस्यों को शामिल करने के विरोध पर अडिग है। फीफा ने तीसरे पक्ष के अनुचित प्रभाव के कारण एआईएफएफ को निलंबित कर दिया था, जिससे भारत से अंडर-17 महिला विश्वकप के मेज़बानी का अधिकार छिन गया था।

फीफा के फ़ैसले का यह असर हुआ है कि जब तक प्रतिबन्ध नहीं हटता ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन और भारतीय फुटबॉल टीम किसी भी अंतरराष्ट्रीय मैच का हिस्सा नहीं ले सकेगी। भारतीय फुटबॉल संघ पर लगा यह बैन तभी हट सकता है, जब एआईएफएफ एक्जीक्यूटिव कमेटी को पूरी तरह से हटाकर उसकी जगह सीओए (कमेटी ऑफ एडमिनिस्ट्रेटर्स) को शक्ति दी जाए और एआईएफएफ प्रशासन को रोज़मर्रा के कामों के लिए पूरी ताक़त सौंप दी जाए।

एआईएफएफ के पूर्व महासचिव कुशाल दास ने कहा था कि इस फ़ैसले पर दु:ख है। उन्होंने कहा- ‘हमने 12 साल तक पूरी क्षमता के साथ वित्तीय स्थिति को मज़बूत किया। उन्होंने कहा कि जब मैंने फेडरेशन को छोड़ा उसके पास 20 करोड़ रुपये की सम्पत्ति थी, जो बीसीसीआई के बाद शायद सबसे ज़्यादा होगी। लिहाज़ा वित्तीय अनियमितता के दावे सही नहीं हैं। फीफा के फ़ैसले से भारतीय फुटबॉल पर बेहद ख़राब प्रभाव पड़ेगा।’

“फीफा परिषद् ब्यूरो ने भारतीय फुटबॉल संघ पर तीसरे पक्ष के अनुचित दख़ल के कारण लगाया गया निलंबन हटाने का फ़ैसला किया है। परिणामस्वरूप 11 से 30 अक्टूबर तक होने वाला अंडर-17 महिला विश्व कप भारत में ही होगा।’’
फीफा का बयान


“यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि फीफा ने भारतीय फुटबॉल को प्रतिबंधित कर दिया है; और मुझे लगता है कि यह फ़ैसला बेहद कड़ा है। लेकिन इसके साथ ही मुझे लगता है कि यह अपनी व्यवस्था को सुधारने का बेहतरीन मौक़ा है। यह बेहद महत्त्वपूर्ण है कि सभी हित धारक महासंघ, राज्य संघ साथ आएँ और व्यवस्था को सुधारें तथा भारतीय फुटबॉल की बेहतरी के लिए काम करें।’’
बाइचुंग भूटिया
पूर्व फुटबॉल कप्तान

धर्म की नुमाइश

आजकल नुमाइश का दौर है। वैसे तो लोग अपने फ़ायदे के लिए किसी भी चीज़ की नुमाइश करते हैं। लेकिन जिस तरह लोग ख़ुद को धार्मिक दिखाने की नुमाइश करते हैं, वो आश्चर्यजनक है। यह पूरी तरह आडम्बर है। आजकल हर धर्म में ऐसे लोगों की भरमार है। ये लोग अपने धर्म को समझे बग़ैर ही ख़ुद को सबसे बड़ा धर्मपरायरण समझते हैं। ऐसे लोगों को अज्ञानी अथवा मूर्ख कहा जाए, तो ग़लत नहीं होगा। सही मायने में यह कट्टरता है। इनकी बात कोई न माने अथवा सवाल करे, तो ये क्रोध में आपा खो देते हैं। यह इनका सबसे बड़ा और पहला अवगुण है, जो बात-बात में सामने आ जाता है। मगर इन लोगों में एक भी अपने धर्म के संस्थापकों की राह पर नहीं दिखता। सब धर्म ग्रन्थों और उनसे सम्बन्धित ग्रन्थों में लिखी कहानियाँ सुनते-सुनाते रहते हैं। अफ़सोस, कहानियों से सीख भी नहीं लेना चाहते। सबको धर्म की अफ़ीम खाकर उन्मादी नारे लगाने से फ़ुरसत नहीं है। सही मायने में अपने धर्म का पालन कोई नहीं कर रहा है।

आज न सनातन धर्म के लोग सनातन संस्कृति का पालन कर रहे हैं। न इस्लाम धर्म के लोग इस्लाम की सुन्नतों पर अमल कर रहे हैं। न ईसाई धर्म के लोग ईसाई धर्म पर चल रहे हैं। न बौद्ध धर्म के लोग धम्म के उपदेशों पर हैं। न जैन धर्म के लोग जिन की वाणी पर खरे उतर रहे हैं। न पारसी धर्म के लोग अपने धर्म पर चल रहे हैं। न ही यहूदी अपने धर्म पर टिके हैं। और न ही किसी पंथ के लोग अपने-अपने पंथ की गरिमा बनाकर रख रहे हैं। लेकिन धर्म से भटके हुए सब लोग धर्म पर होने का दावा करते हैं। कोई भी व्यक्ति यह नहीं कहता कि वह धर्म से भटक गया है। पहला अधर्म तो यही है कि सब एक-दूसरे के धर्म में ख़ामी निकालने, उसे बदनाम करने और एक-दूसरे पर हमला करने में लगे हैं। जबकि इसकी इजाज़त कोई भी धर्म नहीं देता। सवाल यह है कि क्या एक-दूसरे के धर्म से नफ़रत करने वाले लोग एक-दूसरे के बग़ैर अपना हर काम चला लेंगे? नहीं। सच तो यह है कि सभी लोग अपनी मनोदशा स्वार्थ के आधार पर तय करते हैं। सबकी सोच इसी बात पर टिकी है कि उनका फ़ायदा कहाँ, किससे होगा? अगर किसी को काम पड़ जाए या उस पर मुसीबत आ जाए, तो वह किसी भी धर्म के उस व्यक्ति के पास जाने में संकोच नहीं करता, जिसके पास उसका समाधान हो। धर्म के आधार पर वह भले ही उससे नफ़रत करता हो। लेकिन अगर उसकी मुसीबत का हल दूसरे धर्म के व्यक्ति के पास हो, तो वह अपने स्वार्थ के लिए दिखावे की मित्रता का बाना पहनकर उसके सामने दण्डवत् दिखायी देगा। जब ज़रूरत न हो, तो दूसरे धर्म का व्यक्ति दुश्मन नज़र आता है। आख़िर क्यों बिना एक-दूसरे से झगड़े, बिना एक-दूसरे का कालर पकड़े किसी की रोटी हज़्म नहीं होती? मज़हबों में दिये गये प्यार के सन्देश और इंसानियत के रास्ते पर चलने के पैग़ाम से उस समय किसी को कोई वास्ता नहीं रहता। कोई किसी के धर्म के बारे में सच भी कह दे, तो धर्म उनका निजी मामला हो जाता है, और उसे ग़ुस्सा आने लगता है। लेकिन जब कोई धार्मिक रीति का जुलूस निकालना हो, तो धर्म दिखावे की वस्तु बन जाता है। कुछ लोग तो झगड़े की जड़ें टटोलने में लगे रहते हैं।

क्या कोई सनातनधर्मी बतायेगा कि सनातन धर्म में जितने भी देवता, अवतार और महान् लोग हुए हैं, उन्होंने कभी हिंसा का रास्ता अपनाया हो? कभी किसी को सिर्फ़ इसलिए मार दिया हो कि वह दूसरे धर्म का व्यक्ति था? क्या कभी कोई मुस्लिम जवाब देगा कि पैगम्बर मोहम्मद ने कभी किसी से ज़रा भी नफ़रत की हो? कभी उस बुढिय़ा को गाली दी हो या उस पर हमला किया हो, जो उन पर रोज़ कूड़ा फेंकती थी? कभी किसी की इसलिए हत्या कर दी हो कि वह एक अल्लाह को नहीं मानता? क्या कभी किसी ईसाई ने ख़ुद को पीटने वाले को या जान से मारने की कोशिश करने वाले को माफ़ किया? ईशु ने तो अपनी हत्या करने वालों को माफ़ करके उनके लिए प्रार्थना की। कोई बौद्धिस्ट बताएगा कि बुद्ध ने कहाँ हिंसा, मांस भक्षण और अशान्ति फैलाने को कहा है? कोई माने अथवा न माने; लेकिन सच यही है कि किसी भी धर्म और पन्थ के लोग शत्-प्रतिशत् धर्म पर नहीं टिके हैं। किसी भी धर्म या पन्थ में बेईमानी, झूठ बोलने, दूसरों का हक़ मारने, पर स्त्री पर ग़लत नज़र डालने, दूसरों पर अत्याचार करने, उन्हें नुक़सान पहुँचाने और उनके प्रति मन में किसी प्रकार का द्वेश रखने की अनुमति तक नहीं है। कितने लोग इन नियमों पर टिके हुए हैं? जो धर्म के ठेकेदार हैं, वे तो और भी धृष्ट-भ्रष्ट हैं। उनकी नीयत में तो खोट-ही-खोट है।

सवाल यह है कि धर्मों को लेकर लोगों में टकराव बढ़ क्यों रहा है? इसकी सबसे बड़ी वजह धर्मों में होने वाला दिखावा है। धर्म की नुमाइश नहीं करनी चाहिए। लेकिन लोग अब धर्म की नुमाइश करने को ही धर्म पर चलना समझते हैं। वास्तव में धर्म क्या है? यह दुनिया में उँगलियों पर गिने जाने लायक लोग ही शायद समझते होंगे।

ईरान से तनाव के बीच इजरायल ने सीरिया के दो हवाई अड्डों पर की एयर स्ट्राइक

बुधवार रात सीरिया के अलेप्पो एयरपोर्ट सहित दो हवाई अड्डों पर इजरायल के हमले के बाद ईरान के साथ उसकी युद्ध जैसी स्थिति बन रही है। रात के इस हमले में इजरायल ने एक ईरानी विमान को भी निशाना बनाया है। इस एयर स्ट्राइक के बाद दोनों ही तरफ से तनाव बढ़ाने वाले बयान आये हैं। इजराइल ने हफ्तेभर से कम समय में दूसरी बार यह एयर स्ट्राइक की है।

एक रिपोर्ट में बताया गया है कि इस हमले की अमेरिका को पहले से जानकारी थी क्योंकि इजरायल के प्रधानमंत्री यैर लैपिड ने राष्ट्रपति जो बाइडेन को फोन पर इसकी सूचना दी थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक जिस ईरानी विमान पर इजरायल ने हमला किया है वह मिसाइल और वेपन (हथियारों) से लैस था। इजराइल ने एक घंटे के भीतर दो हवाई अड्डों को निशाना बनाया। यह एक एयर स्ट्राइक थी। ईरानी मीडिया के मुताबिक उसके विमान को उतरने से रोकने के लिए इजरायल ने अलेप्पो एयरपोर्ट को निशाना बनाया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इजरायली हमले से एयरपोर्ट पर काफी नुकसान पहुंचा है, हालांकि, किसी के हताहत होने की जानकारी नहीं है। हमले के दौरान एयरपोर्ट पर एयर डिफेंस सिस्टम एक्टिव था और मिसाइल को रोकने की कोशिश भी की गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक एयर स्ट्राइक से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से इजरायल के प्रधानमंत्री यर लैपिड ने फोन पर बात की थी।

उधर सीरियन अरब न्यूज एजेंसी के मुताबिक, सीरियाई एयर डिफेंस ने दमिश्क के ग्रामीण इलाके में इजराइली हमले का सामना करते हुए उसकी कई मिसाइलें गिरा दीं। सीरियाई सेना के हवाले से आई रिपोर्ट्स के मुताबिक रात करीब सवा नौ बजे उत्तरी अधिकृत फिलिस्तीन में तिबेरियास झील की दिशा से इजरायल ने दमिश्क के दक्षिण पूर्व में कुछ जगहों को निशाना बनाते हुए हमला किया।

रात करीब आठ बजे इजराइल ने अलेप्पो अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हमला किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक इजरायली हमले से एयरपोर्ट को तो नुकसान हुआ है लेकिन कोई व्यक्ति हताहत नहीं हुआ।

यूएन रिपोर्ट में चीन पर शिनजियांग क्षेत्र में मानवाधिकार हनन करने का आरोप

अपने तीसरे कार्यकाल की तैयारी कर रहे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को लेकर संयुक्त राष्ट्र्र ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें उनके नेतृत्व में चीन के उइगर मुस्लिम आबादी वाली शिनजियांग क्षेत्र में गंभीर मानवाधिकार हनन में संलिप्त होने का दावा किया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘शिनजियांग क्षेत्र में यातना के आरोप तथ्यपरक थे और मानवता के खिलाफ संभावित अपराधों का संकेत देते हैं’। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार की यह रिपोर्ट इसके उच्चायुक्त मिशेल बाचेलेट का चार साल का कार्यकाल पूरा होने से ऐन पहले जारी की गई जिसमें चीन पर शिनजियांग क्षेत्र में गंभीर मानवाधिकार हनन के आरोप लगाए गए हैं।

इस रिपोर्ट को बुधवार रात जारी किया गया। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ‘चीन सरकार के आतंकवाद-रोधी और अतिवाद-विरोधी रणनीतियों के आवेदन के संदर्भ में शिनजियांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन किए गए हैं’। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ‘वहां जबरन चिकित्सा उपचार और हिरासत की प्रतिकूल परिस्थितियों सहित यातना या दुर्व्यवहार के पैटर्न के आरोप विश्वसनीय हैं’।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि क्षेत्र में मानवाधिकार की स्थिति पर सरकार, संयुक्त राष्ट्र के अंतर सरकारी निकायों और मानवाधिकार प्रणाली के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अधिक व्यापक रूप से तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।